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Republic Day chief guest: इस बार किस देश के राष्ट्राध्यक्ष होंगे 76वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि? इन नामों की चल रही है चर्चा

Republic Day Chief Guest: Speculations Hint at Doha Connection
Credit: MEA

Republic Day chief guest: गणतंत्र दिवस 2025 के मुख्य अतिथि को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। अभी तक 26 जनवरी के मुख्य अतिथि का नाम का एलान नहीं हुआ है। इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर पिछले कुछ दिनों से अमेरिका के दौरे पर थे, जहां अमेरिका के नए राष्ट्रपति को मुख्य अतिथि बनाने की चर्चाएं थीं। लेकिन अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बार कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री, शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जसीम अल थानी को भारत में इस महत्वपूर्ण अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जा सकता है। हालांकि, अभी तक इस बारे में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

Republic Day Chief Guest: Speculations Hint at Doha Connection
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Republic Day chief guest: कतर और भारत के रिश्तों में मजबूती

अमेरिका दौरे से लौटने के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर इस साल चौथी बार कतर की यात्रा कर रहे हैं, जिससे इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि कतर के प्रधानमंत्री गणतंत्र दिवस 2025 के मुख्य अतिथि बन सकते हैं। इससे पहले डॉनल्ड ट्रंप के नाम का कयास लगायाा जा रहा था। जहां वे 19-20 जनवरी को अमेरिका की राट्रपति की शपथ लेंगे। डॉ. जयशंकर ने इससे पहले जुलाई में दोहा फोरम में हिस्सा लिया था और इस साल फरवरी और जून में भी कतर की यात्रा की थी। यह यात्रा भारत और कतर के बीच मजबूत रिश्तों का प्रमाण है।

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कतर भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। 2023-24 में भारत और कतर के बीच द्विपक्षीय व्यापार 14.08 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। कतर भारत के ऊर्जा क्षेत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण साझेदार है। इसके अलावा, 2025 में भारत में एक डॉइंट वर्किंग ग्रुप (JWG) की बैठक भी निर्धारित है, इस बैठक में दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा होगी।

Republic Day chief guest: भारतीय नौसेना के आठ अधिकारियों की रिहाई

इस साल की शुरुआत में भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल की थी, जब कतर ने आठ भारतीय नौसेना अधिकारियों की मृत्युदंड की सजा को पलट दिया। इनमें से सात अधिकारी फरवरी 2024 में भारत लौट आए। यह घटना भारत-कतर के संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को और गहरा किया।

Republic Day chief guest: जयशंकर की आगामी यात्रा के उद्देश्य

अपनी आगामी यात्रा के दौरान, विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जासिम अल थानी से मुलाकात करेंगे। विदेश मंत्रालय के अनुसार, “इस यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं जैसे राजनीतिक, व्यापार, निवेश, ऊर्जा, सुरक्षा, सांस्कृतिक और जनता के बीच संपर्क पर चर्चा करना है। साथ ही, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी बातचीत होगी।”

कतर के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनने की संभावनाएं

कतर के प्रधानमंत्री का गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि बनने की संभावना इसलिए भी खास है क्योंकि यह दोनों देशों के बीच बढ़ते कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत करेगा। भारत के लिए कतर न केवल ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह खाड़ी देशों में भारतीय समुदाय के लिए भी एक प्रमुख केंद्र है।

गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि का महत्व

भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि का चयन हमेशा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक निर्णय होता है। यह न केवल भारत के संबंधों को मजबूती देता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को भी प्रदर्शित करता है। कतर के प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना इस दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।

ATOR N1200: बेहद खास है भारतीय सेना का ये बाहुबली, इसके टायरों के दाम सुन कर जाएंगे चौंक, इतनी कीमत में आ जाएंगी चार हैचबैक कारें

ATOR N1200: Indian Army's 'Baahubali' with Tires Worth 4 Hatchbacks!

ATOR N1200: भारतीय सेना ने हाल ही में एडवांस ATOR N1200 स्पेशलिस्ट मोबिलिटी व्हीकल (SMV) को शामिल किया है, जो हाई एल्टीट्यूड के दुर्गम इलाकों और बर्फ से ढके पहाड़ों में सेना की ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे भारतीय सेना का बाहुबली भी कहा जाता है।

ATOR N1200: Indian Army's 'Baahubali' with Tires Worth 4 Hatchbacks!

भारतीय सेना ने हाल ही में अपने एक्स अकाउंट पर सिक्किम के सबसे दुर्गन इलाकों में ATOR N1200 स्पेशलिस्ट मोबिलिटी व्हीकल (SMV) की फोटो साझा की। यह विशेष वाहन बर्फ से ढके पहाड़ों से लेकर ऊबड़-खाबड़ इलाकों में बखूबी काम करता है। खास बात यह है कि जहां यह अपनी खासियतों के चलते बेहद महंगा है, वही इसके टायर भी कम सस्ते नहीं हैं। इनकी कीमत इतनी है कि इस दाम में चार नई हैचबैक कारें या महिंद्रा थार का टॉप वैरिएंट आ सकता है।

दरअसल यह यूक्रेनी शेर्प एन1200 व्हीकल है। लेकिन इसका निर्माण अब भारत में ही किया जा रहा है। इस साल की शुरुआत में जेएसडब्ल्यू गेको मोटर्स प्राइवेट लिमिटेड ने एटीओआर एन1200 के नाम से ब्रांडेड 96 स्पेशलिस्ट मोबिलिटी वाहनों के निर्माण और आपूर्ति के लिए रक्षा मंत्रालय से 250 करोड़ रुपये का ऑर्डर हासिल किया था। ये वाहन चंडीगढ़, पंजाब में जेएसडब्ल्यू गेको की नई स्थापित मैन्युफैक्चरिंग युनिट में बनाए जा रहे हैं और जून 2024 से सशस्त्र बलों को डिवीलरी की गई थी। इस वाहन को भारतीय सेना ने 2024 के गणतंत्र दिवस परेड में भी प्रदर्शित किया था।   

ATOR N1200: Indian Army's 'Baahubali' with Tires Worth 4 Hatchbacks!

ATOR N1200 SMV कठिन इलाकों, जैसे बर्फ से ढके पहाड़, दलदल और रेगिस्तानों में काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह वाहन जमीन और पानी दोनों पर बेहद आसानी से चलता है। अपनी हाई मोबिलिटी और “गो-एनीवेयर” क्षमताओं के कारण, यह वाहन बचाव अभियानों के लिए भी उपयुक्त है।

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ATOR N1200 की विशेषताएं

  • अम्फीबियस वाहन: यह पानी और जमीन दोनों पर चल सकता है।
  • सैनिकों की क्षमता: इसमें 9 सैनिक आराम से बैठ सकते हैं।
  • उच्च भार क्षमता: यह वाहन 1200 किलोग्राम तक का भार उठा सकता है।
  • हर मौसम में काम: माइनस 40 से 45 डिग्री तक के तापमान में भी यह वाहन आसानी से चल सकता है।

ATOR N1200: Indian Army's 'Baahubali' with Tires Worth 4 Hatchbacks!

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में उपयोग

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए यह वाहन एक गेम चेंजर साबित हो सकता है। ATOR N1200 बर्फ और कठिन पहाड़ी इलाकों में सैनिकों को ले जा सकता है। वहीं, यह अपने टायरों की वजह से यह वाहन ऐसे स्थानों पर भी काम करता है, जहां अन्य साधारण वाहन फेल हो जाते हैं।

ATOR N1200: Indian Army's 'Baahubali' with Tires Worth 4 Hatchbacks!

ATOR N1200 के एक टायर की कीमत 5.8 लाख रुपये 

इस वाहन की सबसे खास बात इसके 4×4 ड्राइवट्रेन वाले 71 x 23 x 25 इंच के विशाल और अल्ट्रा-लो प्रेशर टायर हैं। इन टायरों की पेटेंटेड क्वाड्रो शेरप डिज़ाइन, वाहन को जमीन पर बेहतर पकड़ प्रदान करती है और पानी में चलने की क्षमता देती है। ATOR N1200 के इन टायरों की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 7,000 डॉलर यानी कि 5.8 लाख रुपये प्रति टायर है। ये टायर वाहन का सबसे महंगा कंपोनेंट हैं, जो इसे एक मिड-साइज़ कार जितना महंगा बना देता है। इनका खास डिज़ाइन और मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस के चलते इनकी कीमत बढ़ जाती है। महंगे टायरों की वजह से वाहन की कीमत भी काफी बढ़ जाती है। एक ATOR N1200 की कुल कीमत लगभग 2 करोड़ रुपये है।

  • लो-प्रेशर डिज़ाइन: टायरों को अल्ट्रा-लो प्रेशर पर काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, ताकि यह वाहन किसी भी प्रकार की सतह पर चल सके।
  • एलास्टिकिटी: टायरों की लचीलापन और मजबूती उन्हें दलदली और बर्फीले इलाकों में अनुकूल बनाती है।
  • पानी में प्रोपल्शन: यह टायर वाहन को पानी में भी चलने की क्षमता प्रदान करते हैं, जो amphibious mobility के लिए जरूरी है।

ATOR N1200: Indian Army's 'Baahubali' with Tires Worth 4 Hatchbacks!

भारतीय सेना में 96 ATOR N1200 

भारतीय सेना ने हाल ही में अपने बेड़े में 96 ATOR N1200 स्पेशलिस्ट मोबिलिटी व्हीकल (SMV) शामिल किए हैं। ये इन वाहनों का निर्माण JSW Gecko की चंडीगढ़ स्थित नई फैक्ट्री में किया गया है। JSW Gecko और UK-based Copato Ltd. के बीच साझेदारी के तहत, यह वाहन भारत में बनाए जा रहे हैं। हालांकि, टायर का अभी भी आयात किया जा रहा है। JSW Gecko और Copato Ltd. के बीच तकनीकी साझेदारी के तहत, यह उम्मीद की जा रही है कि भारत में टायर, इंजन और अन्य कंपोनेंट्स का उत्पादन किया जा सकेगा। यह कदम न केवल सेना के लिए इन वाहनों को सस्ता बनाएगा, बल्कि भारत की रक्षा निर्माण क्षमता को भी मजबूती देगा।

ऐसे में, JSW Gecko के लिए इन टायरों का देश में बनाना बेहद जरूरी हो जाता है। यदि ये टायर भारत में बनाए जा सकें, तो इनकी लागत में भारी कमी आ सकती है।

ATOR N1200 ब्रिटेन की कंपनी Copato Ltd द्वारा डिज़ाइन किए गए SHERP N1200 का स्वदेशी संस्करण है। JSW Defence और JSW Gecko ने संयुक्त उपक्रम और तकनीकी आपूर्ति लाइसेंस समझौते के माध्यम से इस वाहन का स्थानीय स्तर पर उत्पादन शुरू किया है।

सेना का आधुनिकीकरण

भारतीय सेना ने 2024 को “Year of Technology Absorption” घोषित किया है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक रणनीतियों में अत्याधुनिक तकनीकों को शामिल करना है। ATOR N1200 जैसे वाहन इस दिशा में एक बड़ा कदम हैं, जो कठिन इलाकों में सेना की परिचालन क्षमता को बढ़ाने में सहायक हैं।

Aksai Chin: अक्साई चिन पर भारत के दावे से घबराया ड्रैगन, गुपचुप दो प्रांतों में बांटने का चला दांव, ये है चीन की रणनीति

Aksai Chin: China Secret Move to Divide Region Amid India's Claim

Aksai Chin: एक तरफ जहां भारत और चीन में सीमा पर शांति स्थापित करने को लेकर बातचीत चल रही है, तो वहीं दूसरी तरफ चीन ने एक बार फिर विवादास्पद कदम उठाते हुए भारतीय क्षेत्र अक्साई चिन को लेकर अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया है। हाल ही में, चीन ने शिंजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र में दो नए काउंटी – हेआन काउंटी और हेकांग काउंटी – बनाने का एलान किया है। चीन के इस कदम ने भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।

Aksai Chin: China Secret Move to Divide Region Amid India's Claim

Aksai Chin: क्या है चीन का नया कदम?

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, उत्तर-पश्चिमी चीन के होटन प्रांत द्वारा इन दोनों नए काउंटी का प्रशासन किया जाएगा। हेआन काउंटी की सीट होंगलिउ टाउनशिप में और हेकांग काउंटी की सीट ज़ेयिडुला टाउनशिप में बनाई गई है। हेआन काउंटी लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करता है, जिसमें भारत का अक्साई चिन का बड़ा हिस्सा शामिल है। यह वही इलाका है जिसे भारत अपना क्षेत्र मानता है और चीन पर अवैध कब्जे का आरोप लगाता है।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधि लगभग पांच साल बाद सीमा विवाद पर वार्ता के लिए बीजिंग में मिले थे। इस वार्ता के ठीक 10 दिन बाद चीन ने यह विवादास्पद फैसला लिया।

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Aksai Chin: भारत की प्रतिक्रिया

नई दिल्ली ने चीन के इस कदम पर अपनी नजर बनाए रखी है। हालांकि, भारत की ओर से इस पर आधिकारिक बयान नहीं आया है। वहीं, विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि चीन को डर है कि भारत लगातार अक्साई चिन को लद्दाख का हिस्सा बताता रहा है। 2019 में जब भारत ने लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया, तब से चीन की चिंता और बढ़ गई। इसी वजह से उसने अक्साई चिन को दो नए प्रांतों में विभाजित करने का फैसला किया।

Aksai Chin और उसका सामरिक महत्व

अक्साई चिन, जो भारत के लद्दाख क्षेत्र का हिस्सा है, चीन के लिए सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र जी-219 हाईवे से जुड़ा हुआ है, जो चीन के झिंजियांग और तिब्बत को जोड़ता है। होंगलिउ टाउनशिप, जिसे हेआन काउंटी का प्रशासनिक मुख्यालय बनाया गया है, भारतीय सीमा रेखा से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। होंगलिउ को “दाहोंगल्युतन” भी कहा जाता है।

होंगलिउ पहले एक साधारण सैन्य बैरक और ट्रक-स्टॉप था। लेकिन 2017 से इस क्षेत्र का तेजी से विकास किया जा रहा है। यह जगह भारतीय सीमा के करीब है और यहां खनिज संसाधनों, खासकर लिथियम खनन, के चलते इसका रणनीतिक महत्व बढ़ गया है।

चीन का प्रशासनिक बदलाव और रणनीतिक संकेत

चीन ने हेआन काउंटी और हेकांग काउंटी की स्थापना के साथ अक्साई चिन में अपनी स्थिति को और मजबूत करने का संकेत दिया है। हेआन काउंटी में प्रशासनिक मुख्यालय की स्थापना के साथ, यह संभावना है कि क्षेत्र में नई वित्तीय और प्रशासनिक गतिविधियों का विस्तार होगा।

चीन ने इन काउंटी की स्थापना के जरिए यह संकेत दिया है कि वह अक्साई चिन पर अपने कब्जे को और मजबूत करना चाहता है। होंगलिउ जैसे क्षेत्र को काउंटी मुख्यालय बनाकर चीन ने इसे प्रशासनिक और रणनीतिक केंद्र बनाने का प्रयास किया है।

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भारत-चीन सीमा विवाद का ऐतिहासिक संदर्भ

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन ने अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अवैध कब्जा कर लिया था। इसके अलावा, पाकिस्तान ने 1963 में साक्सगाम घाटी के 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन को सौंप दिया था।

चीन अरुणाचल प्रदेश के 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर भी दावा करता है और इसे दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताता है। इसके अलावा, चीन हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के 2,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर भी अपना दावा करता है।

चीन का क्या है उद्देश्य

चीन ने अक्साई चिन में दो नए काउंटी बनाकर एक स्पष्ट संदेश दिया है। हेआन काउंटी और हेकांग काउंटी के माध्यम से चीन न केवल अपने क्षेत्रीय दावों को सशक्त कर रहा है, बल्कि वह इस क्षेत्र में आर्थिक और सामरिक गतिविधियों को भी बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है। साथ ही, अपने दावे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैध दिखाने की कोशिश भी है।

चीन की यह चाल, भारत की सीमा पर अपनी स्थिति को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया कदम है। यह रणनीति न केवल सीमा पर तनाव को बढ़ा सकती है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी चुनौती पेश कर सकती है।

लिथियम खनन और चीन की आर्थिक रणनीति

होंगलिउ टाउनशिप, जो अब हेआन काउंटी का प्रशासनिक मुख्यालय है, एक उभरता हुआ लिथियम खनन केंद्र है। लिथियम, जो बैटरी निर्माण में उपयोग होता है, वैश्विक बाजार में अत्यधिक मांग में है। चीन के इस कदम से संकेत मिलता है कि वह अक्साई चिन को न केवल एक सामरिक संपत्ति के रूप में देख रहा है, बल्कि एक आर्थिक संसाधन के रूप में भी मान रहा है।

भारत के लिए क्या है चिंता की बात?

चीन का यह कदम भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह भारत की सीमाओं के करीब गतिविधियां बढ़ाने का संकेत देता है। भारत को न केवल अपने क्षेत्रीय दावे को सुदृढ़ करना होगा, बल्कि चीन की इन गतिविधियों का जवाब देने के लिए नई रणनीतियां भी अपनानी होंगी।

भारत को अपनी सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन की इस रणनीति का कड़ा विरोध करना होगा। इसके अलावा, भारत को अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास को तेजी से बढ़ावा देना होगा।

चीन की यह नई रणनीति दर्शाती है कि वह अपने क्षेत्रीय दावों को सशक्त करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। अक्साई चिन में नई प्रशासनिक संरचना की स्थापना भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि चीन अपने दावों को लेकर कितना गंभीर है।

क्या है अक्साई चिन विवाद और इसका इतिहास?

अक्साई चिन भारत और चीन के बीच विवाद का एक अहम क्षेत्र है, जो लद्दाख और चीन के शिनजियांग प्रांत के बीच स्थित है। यह क्षेत्र 38,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और भारत इसे अपने लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा मानता है, जबकि चीन ने इस पर 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अवैध रूप से कब्जा कर लिया।

ब्रिटिश शासन के दौरान अक्साई चिन क्षेत्र को लेकर कोई स्पष्ट सीमांकन नहीं था। 19वीं सदी में ब्रिटिश भारत और तत्कालीन किंग साम्राज्य के बीच दो प्रमुख सीमा रेखाओं की बात हुई—जॉनसन रेखा और मैककार्टनी-मैकडोनाल्ड रेखा। भारत ने जॉनसन रेखा को मान्यता दी, जिसमें अक्साई चिन भारत का हिस्सा है, जबकि चीन ने मैककार्टनी-मैकडोनाल्ड रेखा को प्राथमिकता दी, जिससे यह क्षेत्र उनके नियंत्रण में आ जाता।

चीन ने 1950 के दशक में अक्साई चिन के माध्यम से शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने के लिए एक सड़क बनाई। इसने भारतीय क्षेत्र पर अवैध कब्जे को मजबूती दी। भारत ने इसका विरोध किया, लेकिन 1962 के युद्ध में चीन ने पूरे अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया।

Dhruv-NG Helicopter: सिविल एविएशन में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का बड़ा दांव; क्या ध्रुव-NG हेलीकॉप्टर से बदलेगा सिविल हेलीकॉप्टर का बाजार?

HAL Pawan Hans Dhruv NG Helicopter Deal
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Dhruv-NG Helicopter: हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा निर्मित स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) के सिविल वेरिएंट को हाल ही में पहला कॉन्ट्रैक्ट मिलने के बाद, HAL अब सिविल एविएशन क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की योजना बना रहा है। हाल ही में पवन हंस लिमिटेड ने HAL द्वारा निर्मित चार ध्रुव-NG हेलीकॉप्टरों को ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) के ऑफशोर ऑपरेशंस के लिए चुना है।

Dhruv-NG Helicopter: HAL's Big Bet in Civil Aviation; A Game-Changer for the Market?
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Dhruv-NG Helicopter: पवन हंस को मिला ONGC का कॉन्ट्रैक्ट

इस साल अप्रैल में पवन हंस लिमिटेड ने ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) के ग्लोबल टेंडर में चार HAL-निर्मित ध्रुव-NG हेलीकॉप्टरों की पेशकश की थी। यह कॉन्ट्रैक्ट 2,141 करोड़ रुपये का है और 10 वर्षों की अवधि के लिए है। पवन हंस को यह ठेका इसी महीने आधिकारिक रूप से सौंपा गया।

एक अधिकारी के मुताबिक, देश में सिविल हेलीकॉप्टर बाजार अभी भी छोटा है, लेकिन अगले 10-15 वर्षों में इसमें बड़े विस्तार की संभावना है। HAL के ध्रुव-NG हेलीकॉप्टर ने अपनी सैन्य सफलता के बाद अब सिविल एविएशन क्षेत्र में संभावनाओं को देखते हुए कदम बढ़ाया है। यह हेलीकॉप्टर घरेलू बाजार में बड़े हिस्से पर कब्जा करने के लिए अच्छी स्थिति में है और इसमें निर्यात की अपार संभावनाएं भी हैं। HAL के एक अधिकारी ने बताया, “ध्रुव-NG ने ग्लोबल टेंडर में हिस्सा लेकर दूसरी कंपनियों को पीछे छोड़ते हुए यह कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है।”

क्या हैं स्वदेशी हेलीकॉप्टर Dhruv-NG Helicopter की खासियतें

5.5 टन वजनी यह हेलीकॉप्टर मल्टी-रोल और मल्टी-मिशन क्षमताओं से लैस है। यह दिन और रात दोनों समय संचालन में सक्षम है। इसे दो स्वदेशी इंजन द्वारा संचालित किया जाता है, जो कैट ‘ए’ परफॉर्मेंस के साथ आते हैं। इसके साथ ही, इसमें ONGC के ऑफशोर ऑपरेशनल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए AS4 (Applicability Statement)-अनुकूल सिस्टम भी लगाए गए हैं।

ONGC की ये हैं शर्तें

ONGC ने 14 दिसंबर को कॉन्ट्रैक्ट देने का एलान किया। यह चार क्रू-चेंज टास्क हेलीकॉप्टरों के चार्टर हायरिंग के लिए था। इन हेलीकॉप्टरों का अधिकतम वजन 7,000 किलोग्राम और न्यूनतम 11 सीटें (पायलटों के लिए 2 अतिरिक्त सीटों के साथ) हैं। ONGC ने स्पष्ट किया कि सभी हेलीकॉप्टर नए फैक्ट्री-निर्मित होने चाहिए। ठेकेदार को हेलीकॉप्टरों के सीरियल नंबर 30 दिनों के भीतर जमा करने होंगे। ऐसा न करने पर ठेका रद्द किया जा सकता है। प्रत्येक हेलीकॉप्टर का चार्टर किराया 10 वर्षों की अवधि तक लागू रहेगा।

DGCA और इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन

ध्रुव हेलीकॉप्टर के चार सैन्य वेरिएंट पहले से ही ऑपरेशनल हैं। इसे सैन्य उपयोग के लिए सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थीनेस सर्टिफिकेशन (CEMILAC) और सिविल उपयोग के लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) से प्रमाणन प्राप्त है। ध्रुव-NG को जून 2023 में यूरोपियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA) से भी प्रमाणपत्र मिला था।

मिलिट्री ऑपरेशंस में चार तरह के ध्रुव हेलीकॉप्टर हैं, जिनमें से 335 हेलीकॉप्टर पहले से ही सेवा में हैं। इन्होंने अब तक 3,75,000 घंटे से अधिक की उड़ानें पूरी की हैं। सिविल वेरिएंट के साथ, HAL का लक्ष्य सिविल एविएशन में नई ऊंचाइयों को छूना है।

सिविल एविएशन में काफी है स्कोप

HAL के अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि ध्रुव-NG की सफलता केवल भारत तक सीमित नहीं है। इस हेलीकॉप्टर की तकनीकी क्षमताएं और लागत-प्रभावशीलता इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी प्रतिस्पर्धी बनाती हैं। इसके सिविल संस्करण को न केवल घरेलू एविएशन कंपनियों में उपयोग किया जा सकता है, बल्कि यह विभिन्न सरकारी और आपातकालीन सेवाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

HAL का यह कदम भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान का प्रतीक है और स्वदेशी प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है। ध्रुव-NG का उपयोग सिविल और सैन्य दोनों क्षेत्रों में बढ़ते भारतीय वर्चस्व का संकेत है।

Shivaji Maharaj Statue row: 1971 की पेंटिंग के बाद पैंगोंग झील के किनारे लगे शिवाजी महाराज के स्टेच्यू को लेकर क्यों हो रहा है विवाद? जनरल जोरावर का नाम क्यों आया सामने

Shivaji Maharaj Statue at Pangong Sparks Row: Why General Zorawar's Name Emerges

Shivaji Maharaj Statue row: 28 दिसंबर को लद्दाख की पेंगोंग झील के किनारे भारतीय सेना ने छत्रपति शिवाजी महाराज की 30 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की, जिसके बाद सोशल मीडिया पर यूजर तरह-तरह के कमेंट्स करने लगे। इनमें न केवल स्थानीय लद्दाखी लोग शामिल थे, बल्कि रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों ने भी सेना के इस कदम पर सवाल उठाए। इस प्रतिमा को सेना ने चीन के साथ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के पास 14,300 फीट की ऊंचाई पर स्थापित किया है। कुछ यूजर्स का मानना है कि इस जगह पर डोगरा जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा अधिक उपयुक्त होती, जिन्होंने लद्दाख पर जीत हासिल की थी और तिब्बत में लड़ाई लड़ी थी। रक्षा समाचार डॉट कॉम ने सबसे पहले इस खबर को प्रकाशित किया था।

Shivaji Maharaj Statue at Pangong Sparks Row: Why General Zorawar's Name Emerges

शिवाजी महाराज की इस प्रतिमा का उद्घाटन भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कोर (14 कोर) के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने किया, जो मराठा लाइट इन्फैंट्री के कर्नल भी हैं। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि शिवाजी महाराज के साहस, रणनीति और न्याय के आदर्श आज के मिलिट्री ऑपरेशंस के लिए भी प्रासंगिक हैं। बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे हैं, और उनके पिता रिटायर्ड ब्रिगेडियर रहे हैं। दो बार शौर्य चक्र (1996, 2002) और सेना पदक से सम्मानित चुके हैं।

हालांकि, इस प्रतिमा की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि पेंगोंग झील पर शिवाजी महाराज की जगह जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा होनी चाहिए थी, जिन्होंने 1800 के दशक में लद्दाख और तिब्बत में अपनी वीरता दिखाई थी।

Pangong Tso: सेना ने पूर्वी लद्दाख में 14,300 फीट की ऊंचाई पर लगाई छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा, दिया ये बड़ा संदेश

Shivaji Maharaj Statue row:  स्थानीय काउंसलर ने जताई नाराजगी

पेंगोंग के नजदीक ही चुशुल इलाके के काउंसलर कोनचोक स्टैंजिन ने इस प्रतिमा को लेकर अपनी नाराज़गी जताई। उन्होंने ट्वीट किया,

“एक स्थानीय निवासी के रूप में, मुझे पेंगोंग पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा लगाने से आपत्ति है। यह बिना स्थानीय समुदायों की सहमति के स्थापित की गई है। हमें ऐसे प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो हमारी संस्कृति और पर्यावरण का सम्मान करें।”

वहीं स्टैनजिन के इस बयान ने राष्ट्रीय प्रतीकवाद और स्थानीय पहचान के बीच संतुलन पर व्यापक बहस छेड़ दी है।

राजनीतिक कार्यकर्ता और 2019 में लद्दाख से संसदीय उम्मीदवार रह चुके सज्जाद कारगिली ने कहा:

“लद्दाख में श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक प्रासंगिकता नहीं है। हम उनकी विरासत का सम्मान करते हैं, लेकिन ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को यहां थोपना गलत है। हम स्थानीय ऐतिहासिक शख्सियतों जैसे ख्री सुल्तान चो, अली शेर खान अंचेन और सेंगे नामग्याल की प्रतिमाएं लगाने का समर्थन करेंगे।”

सज्जाद ने यह भी कहा, “हालांकि, इन प्रतिमाओं को भी पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे पैंगोंग में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि ऐसे स्थानों को संरक्षित करने की आवश्यकता है।”

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Shivaji Maharaj Statue row: रिटायर्ड सैन्य अफसरों ने भी जताई आपत्ति

रिटायर्ड मेजर जनरल बीएस धनोआ ने कहा, “सशस्त्र बलों में किसी भी प्रतीक को राष्ट्रीय ध्वज और रेजिमेंटल ध्वज से ऊपर नहीं होना चाहिए। 14 कॉर्प्स में यह निर्णय क्यों लिया गया और इसे सोशल मीडिया पर प्रचारित क्यों किया गया?”

वहीं, रिटायर्ड कर्नल अनिल तलवार ने कहा, “सेना को अपने मुख्य मिशन और मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि ऐसे आयोजन करने चाहिए जो राष्ट्रीय रक्षा और एकता के व्यापक उद्देश्यों से संबंधित नहीं हैं।”

रक्षा विशेषज्ञ मन अमन सिंह चिन्ना ने लिखा, “डोगरा जनरल जोरावर सिंह, जिन्होंने लद्दाख पर विजय प्राप्त की और तिब्बत में युद्ध लड़ा, की प्रतिमा यहां अधिक उपयुक्त होती।”

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं

एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “पेंगोंग झील एक रणनीतिक स्थान है और इसे ऐसे नायक की प्रतिमा से सजाया जाना चाहिए, जिसका इस क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व हो। जनरल जोरावर सिंह ने तिब्बत तक जाकर मानसरोवर को आज़ाद कराया और लद्दाख को भारत का हिस्सा बनाया।

एक अन्य यूजर ने कहा, “शिवाजी महाराज का सम्मान है, लेकिन यह प्रतिमा उनकी कर्मभूमि से बहुत दूर है। जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा यहां ज्यादा प्रासंगिक होती।

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कौन थे जनरल जोरावर सिंह?

जनरल जोरावर सिंह को लद्दाख और तिब्बत पर विजय प्राप्त करने के लिए जाना जाता है। वह महाराजा रणजीत सिंह की सेना के एक महान सेनापति थे। उनके नेतृत्व में लद्दाख, तिब्बत और मानसरोवर पर विजय हासिल की गई, जो भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मेजर जनरल (रिटायर्ड) कुलदीप संधू ने कहा, “छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान नेता थे, लेकिन उनका लद्दाख से कोई ऐतिहासिक संबंध नहीं था। पेंगोंग झील पर जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा लगाई जाती तो ज्यादा बेहतर होता।”

कर्नल राजेंद्र भादुड़ी (सेवानिवृत्त) ने लिखा: “… पैंगोंग त्सो में शिवाजी के खिलाफ कुछ नहीं, बस इतना है कि वह अपनी कर्मभूमि से बहुत दूर हैं। जनरल जोरावर सिंह कहलूरिया की एक प्रतिमा उपयुक्त होती, जिन्होंने पश्चिमी तिब्बत के 500 मील से अधिक हिस्से पर विजय प्राप्त की थी।”

रिटायर्ड कर्नल संजय पांडे भी कहते हैं, “जोरावर सिंह पेंगोंग त्सो से होते हुए खुरनाक किले तक गए, मानसरोवर तक चौकियाँ स्थापित कीं। तिब्बत में लड़ते हुए उनकी मृत्यु हो गई। लेह किले को जोरावर किला कहा जाता है। वहां शिवाजी की प्रतिमा क्यों? मैं एक शुद्ध डोगरा यूनिट से महाराष्ट्रीयन हूं, महाराजा गुलाब सिंह की पहली यूनिट। श्रीनगर के लाल चौक में शिवाजी की एक और प्रतिमा क्यों नहीं? या द्रास में? या कारगिल में? जोरावर सिंह ने 180 साल पहले युद्ध लड़े थे, मौसम आज जैसा ही था। वह वहाँ होने के हकदार हैं।”

सोशल मीडिया पर एक इंजीनियर ने लिखा, “पैंगोंग त्सो वह जगह है, जिसके पास 1962 के नायक मेजर शैतान सिंह ने चीनियों से लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए थे। यही वह जगह है, जहां से जनरल जोरावर सिंह ने चीनी तिब्बत पर आक्रमण के लिए अपनी सेना के साथ मार्च किया था।”

रिटायर्ड कर्नल रोहित वत्स नाम का कहना है, “मैं छत्रपति शिवाजी महाराज का बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनकी प्रतिमा लगाने के लिए यह सही स्थान है। इस जगह के इतिहास को देखते हुए, जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा यहां लगाना अधिक उपयुक्त होता। उनकी निर्भीकता, सामरिक और रणनीतिक कौशल की वजह से ही लद्दाख आज भारत का हिस्सा है।”

क्या कहती है सेना?

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, पैंगोंग झील के किनारे शिवाजी महाराज की प्रतिमा मराठा यूनिट के स्वैच्छिक योगदान से लगाई गई है। इस पर कोई पब्लिक फंड खर्च नहीं हुआ। उन्होंने बताया, “इन्फैंट्री (पैदल सेना) यूनिटों में अपनी यूनिट से संबंधित प्रतीक लगाने की लंबी परंपरा रही है। यह सैनिकों को प्रेरित करने के लिए किया जाता है।”

पैंगोंग झील का यह क्षेत्र मराठा यूनिट के तहत आता है, जो एक प्रतिबंधित क्षेत्र है। यहां की यूनिट के सैनिकों और पूर्व सैनिकों ने मिलकर स्वैच्छिक योगदान से यह प्रतिमा स्थापित की है।

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पेंगोंग झील का सामरिक महत्व

पेंगोंग झील भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का प्रमुख स्थान है। 2020 में सीमा विवाद के दौरान यह क्षेत्र सुर्खियों में था। हाल ही में, भारतीय सेना प्रमुख के लाउंज में पेंगोंग झील की पेंटिंग लगाई गई थी, इससे पहले वहां 1971 के पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण की एतिहासिक पेंटिंग लगी थी। लेकिन जब इसे हटाए जाने को लेकर विवाद बढ़ा तो 1971 की पेंटिंग को नई दिल्ली स्थित मानेकशॉ सेंटर में शिफ्ट कर दिया गया।

स्थानीय नायकों की अनदेखी?

एक सोशल मीडिया यूजर मनु खजूरिया ने लिखा, “शिवाजी महाराज के प्रति मेरी गहरी श्रद्धा है, लेकिन यह ऐसा है जैसे रायगढ़ किले पर डोगरा जनरल जोरावर सिंह की मूर्ति लगाई जाए। जनरल जोरावर सिंह और कर्नल मेहता बस्ती राम ने महाराजा गुलाब सिंह के नेतृत्व में लद्दाख पर विजय पाई और पश्चिमी तिब्बत में चीनी-तिब्बती सेना से युद्ध किया। डोगरा सेना, जो पर्वतीय युद्ध में माहिर थी, ने यहां अपना खून बहाया। यह समझ नहीं आता कि स्थानीय इतिहास और नायकों को क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।”

हिस्ट्री ऑफ़ राजपूताना नाम के एक अन्य सोशल मीडिया अकाउंट ने लिखा, “पैंगोंग एक रणनीतिक जगह है। इसे ऐसे व्यक्ति की प्रतिमा से सजाया जाना चाहिए, जिसका इस स्थान से ऐतिहासिक संबंध हो। जनरल जोरावर सिंह तिब्बत तक गए और सैकड़ों वर्षों बाद मानसरोवर को मुक्त कराया। लद्दाख आज भारत का हिस्सा है, यह उनकी वजह से है। हमें खुद को बेवकूफ बनाने की जरूरत नहीं है।”

सेना को मजबूत करने की पहल

पेंगोंग झील पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण सेना की उस व्यापक पहल का हिस्सा है, जिसमें लद्दाख क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने के प्रयास शामिल हैं। सेना द्वारा बेहतर बुनियादी ढांचा, निगरानी और सैनिकों की तैनाती की क्षमता को बढ़ाने के कदम उठाए गए हैं।

इस प्रतिमा को स्थापित करना एक रणनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है, जो भारतीय सेना की ताकत और सीमा की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, स्थानीय और राष्ट्रीय प्रतीकों के बीच संतुलन बनाना एक चुनौतीपूर्ण मुद्दा बनकर उभरा है।

पहले भी लग चुकी हैं शिवाजी की प्रतिमाएं:

नवंबर 2023 में जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में एलओसी के पास 10.5 फीट ऊंची शिवाजी की प्रतिमा का अनावरण किया था। यह प्रतिमा मुंबई से भेजी गई थी और 41 राष्ट्रीय राइफल्स (मराठा लाइट इन्फैंट्री) के मुख्यालय में लगाई गई।
दिसंबर 2022 में नेवी डे के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग में 35 फीट ऊंची शिवाजी की प्रतिमा का अनावरण किया था। हालांकि, यह प्रतिमा अगस्त 2023 में ढह गई।

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Karan Singh: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की ऐतिहासिक भूमिका और इसके हटने के बाद के प्रभावों पर चर्चा करते हुए, कश्मीर के महाराजा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. करण सिंह ने हाल ही में अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री के पॉडकास्ट कार्यक्रम “खरी बात”में उन्होंने अनुच्छेद 370 की जरूरत, इसके ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 एक समय में घाटी के लोगों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी था। उन्होंने उम्मीद जताई कि जम्मू-कश्मीर को जल्द ही पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी तकलीफ जताई कि हमें हमेशा भारत का मुकुट कहा जाता था। लेकिन आज हम हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से भी छोटा हो गए हैं। केंद्र शासित प्रदेश बन जाना कश्मीरी और डोगरा दोनों को आहत करता है।

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Karan Singh: अनुच्छेद 370 की जरूरत क्यों पड़ी?

डॉ. करण सिंह ने कहा, “जब अनुच्छेद 370 लाया गया, उस समय जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच एक संवैधानिक संबंध स्थापित करने की आवश्यकता थी। हमारे संविधान ने 1950 में आकार लिया, लेकिन 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद के दो वर्षों में यह स्पष्ट नहीं था कि राज्य का भारत के संविधान में क्या स्थान होगा। इसलिए, इसे एक अस्थाई प्रावधान के रूप में लाया गया।” इसका उद्देश्य था जम्मू-कश्मीर के लोगों को भारतीय संविधान के साथ जोड़ने का एक रास्ता देना, जबकि राज्य अपनी अलग पहचान बनाए रख सके।

उन्होंने कहा, “1947 में मेरे पिता महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद भी जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच संवैधानिक संबंध स्पष्ट नहीं थे। भारतीय संविधान 1950 में लागू हुआ और तब तक जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान लाना जरूरी था।”

डॉ. करण सिंह ने बताया कि उनके पिता महाराजा हरि सिंह ने 1927 में दो बड़े फैसले लिए थे। पहला, राज्य के बाहर के लोग कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते थे, और दूसरा, बाहरी लोग यहां नौकरी नहीं कर सकते थे।

उन्होंने कहा, “कश्मीर उस समय आर्थिक रूप से कमजोर था। अगर बाहरी लोग जमीन खरीद लेते या नौकरियां ले लेते, तो स्थानीय लोगों का हक पूरी तरह से खत्म हो जाता।” उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 370 इन्हीं अधिकारों की सुरक्षा के लिए जरूरी था।

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डॉ. सिंह ने इस साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। “यह जम्मू राज्य था, जिसमें कश्मीर, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्र शामिल थे। परंतु 1947 के युद्ध के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, और अक्साई चिन को चीन ने हड़प लिया।”

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उन्होंने कहा, “हमें हमेशा भारत का मुकुट कहा जाता था। लेकिन आज हम हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से भी छोटा हो गए हैं। केंद्र शासित प्रदेश बन जाना कश्मीरी और डोगरा दोनों को आहत करता है।”

उन्होंने आगे उम्मीद जताई कि जम्मू-कश्मीर को जल्द ही पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा। उन्होंने कहा, “सरकार ने चुनाव कराने की बात कही है और सुप्रीम कोर्ट में भी कहा है कि उचित समय पर राज्य का दर्जा वापस मिलेगा।”

Karan Singh: अनुच्छेद 370 हटने के बाद हालात

डॉ. सिंह ने कहा कि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद कई बदलाव हुए हैं। उन्होंने माना कि पत्थरबाजी और बंद जैसी घटनाएं बंद हो गई हैं, लेकिन आतंकवाद अभी भी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन स्थिति पहले से बेहतर है। । “आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई जारी है, लेकिन यह समस्या पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। पत्थरबाजी और बंद का दौर खत्म हो गया है।”

उन्होंने कहा कि आतंकवाद के लिए सीमा पार से आने वाले आतंकियों और स्थानीय आतंकियों दोनों की भूमिका है। उन्होंने कहा कि इस समस्या का हल बातचीत और सख्ती दोनों से निकाला जा सकता है।

बिना युद्ध के नहीं मिलेगा पीओके

पाकिस्तान के साथ संबंधों और पीओके पर भारत की स्थिति के बारे में डॉ. सिंह ने कहा, “संसद का संकल्प है कि पीओके को वापस लिया जाएगा, लेकिन यह बिना युद्ध के संभव नहीं है। पाकिस्तान के साथ बातचीत पर करण सिंह का मानना है कि भारत को किसी से बात करने से डरना नहीं चाहिए। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है, और पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध रखना जरूरी है। अगर बातचीत से समाधान निकले, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तान के साथ समाधान के करीब पहुंचा गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश, राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं।

गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों का चलन बढ़ा

डॉ. सिंह ने राजनीति के बदलते स्वरूप पर अपनी राय देते हुए कहा, “पहले राजनीतिक विरोध में भी गरिमा और मर्यादा थी। आजकल, गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों का चलन बढ़ गया है। यह हमारी संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।”

उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में चुनावों में धन का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। “पहले जहां विचारधारा और नेतृत्व पर जोर होता था, अब पैसे और जातिगत समीकरण हावी हो गए हैं। आज टिकट पाना करोड़ों रुपये का खेल हो गया है। इससे गरीब और ईमानदार व्यक्ति के लिए राजनीति में आना मुश्किल हो गया है।”

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देश में बढ़ते धार्मिक और राजनीतिक तनाव पर भी डॉ. करण सिंह ने चिंता जताई। उन्होंने कहा, “धर्म और जाति के नाम पर दुश्मनी बढ़ाना भारत की महान संस्कृति के खिलाफ है।” उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस रोक का समर्थन किया, जिसमें धार्मिक स्थलों को लेकर नए विवाद उठाने पर पाबंदी लगाई गई।

वन नेशन, वन इलेक्शन और यूसीसी पर विचार

वन नेशन, वन इलेक्शन पर डॉ. सिंह ने कहा, “यह एक दिलचस्प विचार है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में व्यावहारिक चुनौतियां हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इसे लागू करना आसान नहीं होगा।”

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर उन्होंने कहा, “भारत में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों की विविधता को देखते हुए, यह विषय बेहद संवेदनशील है। इसे लागू करने से पहले गहराई से विचार करना होगा।”

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संविधान और संशोधन की प्रक्रिया

डॉ. सिंह ने भारतीय संविधान की प्रशंसा करते हुए कहा, “हमारा संविधान एक मजबूत और विस्तृत दस्तावेज है, जिसे समय-समय पर संशोधित किया गया है। लेकिन संशोधन रचनात्मक होने चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए। संविधान में बदलाव से पहले इसके मूल ढांचे का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।”

नेहरू और वर्तमान राजनीति पर चर्चा

अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभव पर करण सिंह ने कहा कि राजनीति का धर्म ही उथल-पुथल है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य नेताओं के साथ अपने अनुभव साझा किए। जवाहरलाल नेहरू की आलोचना पर उन्होंने कहा, “नेहरू जी को सभी समस्याओं का जिम्मेदार ठहराना अनुचित है। उन्होंने देश को आजादी के बाद स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई। उनके योगदान को कम करके आंकना इतिहास के साथ अन्याय है।”

उनका कहना है कि राजनीति में आने वाले लोगों को वाणी में संयम और दृष्टिकोण में उदारता रखनी चाहिए। राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि यह देश और समाज की सेवा का माध्यम भी है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता की भी प्रशंसा की, लेकिन यह जोड़ा कि राजनीति में संवाद और सहिष्णुता की कमी चिंता का विषय है।

विदेश में हिंदुओं पर हमले

कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में हिंदू मंदिरों पर बढ़ते हमलों पर उन्होंने कहा, “यह बहुत चिंताजनक है। सरकार को इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए और अन्य देशों से इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग करनी चाहिए।”

दो पार्टी प्रणाली और छोटी पार्टियां

भारत में दो पार्टी प्रणाली की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “भारत में इतनी विविधता है कि दो पार्टी प्रणाली व्यावहारिक नहीं है। लेकिन छोटे राजनीतिक दल जो केवल पैसे और सत्ता के लिए बने हैं, उन्हें हटाया जाना चाहिए।”

Pangong Tso: सेना ने पूर्वी लद्दाख में 14,300 फीट की ऊंचाई पर लगाई छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा, दिया ये बड़ा संदेश

Pangong Tso: Shivaji Maharaj Statue Installed at 14,300 Ft in Eastern Ladakh
Credit- Indian Army

Pangong Tso: पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग त्सो झील के किनारे 14,300 फीट की ऊंचाई पर छत्रपति शिवाजी महाराज की एक भव्य प्रतिमा का अनावरण किया गया है। 26 दिसंबर 2024 को इस ऐतिहासिक प्रतिमा का उद्घाटन भारतीय सेना के फायर एंड फ्यूरी कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने किया। वह मराठा लाइट इन्फैंट्री के कर्नल भी हैं। सेना के इस प्रयास को ‘कर्म क्षेत्र’ थीम से जोड़ कर देखा जा रहा है, जिसमें सेना को एक “धर्म के रक्षक” के रूप में दिखाया गया है, जो केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं बल्कि न्याय की रक्षा और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ती है।

Pangong Tso: Shivaji Maharaj Statue Installed at 14,300 Ft in Eastern Ladakh
Credit- Indian Army

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व

श्री छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे शासक थे, जिन्होंने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की बल्कि न्याय और शासन के उच्च मानदंड स्थापित किए। इस प्रतिमा के अनावरण का उद्देश्य न केवल उनके जीवन और उपलब्धियों को याद करना है, बल्कि वर्तमान समय में उनके मूल्यों को बढ़ावा देना भी है। वहीं यह प्रतिमा साहस, न्याय और भारत के महान शासक की विरासत का प्रतीक है।

Pangong Tso: लगातार ऐसी पहल कर रही है भारतीय सेना

यह आयोजन भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के प्रयासों का हिस्सा है, जो लद्दाख क्षेत्र में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम कर रही है। इससे पहले इसी साल, पूर्वी लद्दाख के लुकुंग और चुशुल क्षेत्रों में भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं का अनावरण किया गया था। यह पहल न केवल क्षेत्र के सांस्कृतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करती है, बल्कि भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थायित्व और शांति को भी बढ़ावा देती है।

इसी साल जुलाई में भारत ने चीन के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन (साइकोप) या साइकोलॉजिकल ऑपरेशन शुरू करते हुए पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे दो हॉटस्पॉट-लुकुंग और चुशुल में भगवान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित की थीं।

Buddha Statue at Lukung
Buddha Statue at Lukung

वहीं ये दोनों जगहें बेहद खास भी हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान लुकुंग और चुशुल, इन दोनों ही जगहों पर भीषण जंग हुई थी। भारतीय सैनिकों ने इन दोनों जगहों पर चीनियों को रोके रखा था। एक जुलाई को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास लुकुंग और चुशुल इलाकों में भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की मूर्तियों का अनावरण किया गया। लुकुंग पैंगोंग त्सो के उत्तर-पश्चिमी किनारे ‘फिंगर 4’ के पास है, जबकि चुशुल में मूर्ति स्पैंगगुर गैप के सामने है, जो दोनों सेनाओं का सीमा मीटिंग प्वॉइंट है। मोल्डो में चीनी गैरिसन वहां से लगभग 8 किमी दूर है।

सूत्रों ने बताया कि इसी तरह की दो और प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। इनमें से एक डेमचोक में स्थापित की जाएगी, जबकि दूसरी प्रतिमा के लिए अभी जगह का चयन नहीं किया गया है।

सेना के सूत्रों ने उस वक्त बताया था, “फायर एंड फ्यूरी कोर ने सीमावर्ती क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने, सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उन्नत करने और प्रमुख सीमावर्ती गांवों के आध्यात्मिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए लद्दाख के लोगों के साथ भारतीय सेना के लंबे सहयोग की स्मृति में लुकुंग और चुशुल के सीमावर्ती गांवों में ध्यान कॉर्नर्स को समर्पित किया है। यह पूर्वी लद्दाख के अग्रिम क्षेत्रों में एकजुटता को बढ़ावा देने, आध्यात्मिक मूल्यों और शाश्वत शांति को बनाए रखने के लिए वसुधैव कुटुम्बकम (दुनिया एक परिवार है) के सार को कायम रखने की पहल है।”

भगवान बुद्ध की मूर्तियों को “भूमिस्पर्श मुद्रा” में दिखाया गया है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूज़लेटर “महान बुद्ध की मुद्राएं: प्रतीकात्मक इशारे और मुद्राएं” में “भूमिस्पर्श मुद्रा” को “पृथ्वी को छूना” बताया गया है। इसमें आगे कहा गया है, “यह बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध के ज्ञानोदय का प्रतीक है, जब उन्होंने पृथ्वी देवी स्थावरा को अपने ज्ञानोदय की गवाही देने के लिए बुलाया था।”

सेना प्रमुख के कमरे में Pangong Tso की पेंटिंग

इससे पहले इसी महीने 16 दिसंबर को विजय दिवस से पहले सेना प्रमुख के कमरे से 1971 में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर वाली पेंटिंग हटा कर एक दूसरी पेंटिंग लगई गई थी। जिसकी काफी आलोचना भी हुई थी। बाद उस पेंटिंग को दिल्ली में मानेकशॉ सेंटर में स्थापित किया गया था। वहीं सेना प्रमुख के कमरे में लगााई गई नई पेंटिंग में पेंगोंग त्सो को दिखाया गया है। पेंटिंग बर्फ से ढकी पहाड़ियां पृष्ठभूमि में दिख रही हैं, दाएं ओर पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील और बाएं ओर गरुड़ा और श्री कृष्ण की रथ, साथ ही चाणक्य और आधुनिक उपकरण जैसे टैंक, ऑल-टेरेन व्हीकल्स, इन्फैंट्री व्हीकल्स, पेट्रोल बोट्स, स्वदेशी लाइट कॉम्बेट हेलीकॉप्टर्स और एच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर्स दिखाए गए हैं।

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नई पेंटिंग में माइथोलॉजिकल और फ्यूचरिस्टिक तत्वों का समावेश है। इसमें एक ऋषि, जिन्हें चाणक्य का रूप दिया गया है, आक्रोशित मुद्रा में आदेश देते हुए दिखाई देते हैं। उनके पीछे महाभारत का रथ, श्रीकृष्ण और अर्जुन का प्रतीक, और ऊपर गरुड़ जैसी संरचना नजर आती है।

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पेंटिंग के निचले हिस्से में आधुनिक सैन्य उपकरण जैसे T-90 टैंक, अपाचे हेलीकॉप्टर, ड्रोन और पैरा-कमांडो दर्शाए गए हैं। यह पेंटिंग भविष्य की सेना की तकनीकी क्षमताओं और आधुनिक युद्ध के लिए तैयार भारत का संदेश देने की कोशिश करती है।

सेना के सूत्रों ने कहा कि नई पेंटिंग, ‘कर्म क्षेत्र– कर्मों का क्षेत्र’, जिसे 28 मद्रास रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने बनाई है। इस पेंटिंग में सेना को एक “धर्म के रक्षक” के रूप में दर्शाया गया है, जो केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं बल्कि न्याय की रक्षा और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ती है।  यह पेंटिंग बताती है कि सेना तकनीकी रूप से कितनी एडवांस हो गई है।

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भारतीय सेना और भारत की सांस्कृतिक विरासत को मिलेगी मजबूती

सेना सूत्रों के मुताबिक भारत सरकार के वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम ने सीमावर्ती गांवों में तेजी से विकास किया है। अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के केरन सेक्टर जैसे क्षेत्रों में इस कार्यक्रम ने अच्छे परिणाम दिए हैं। यह पहल न केवल इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार कर रही है, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा दे रही है।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा और भगवान बुद्ध की मूर्तियों का अनावरण भारतीय सेना और भारत की सांस्कृतिक विरासत के बीच एक मजबूत संबंध को दर्शाता है। ये पहलें न केवल क्षेत्र में मनोबल बढ़ाने का काम करती हैं, बल्कि एकता, शांति और सांस्कृतिक मूल्यों को भी बढ़ावा देती हैं। यह प्रयास दिखाता है कि कैसे भारत अपनी सैन्य ताकत को सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जोड़कर एक सशक्त संदेश दे रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा और भगवान बुद्ध की मूर्तियां लद्दाख में न केवल मनोवैज्ञानिक ताकत का प्रतीक हैं, बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत की झलक भी प्रस्तुत करती हैं।

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Trump Presidency 2.0: Will Pakistani Drug Nexus Be Exposed?
"The Nukes, the Jihad, the Hawalas and Crystal Meth" Writer Iqbal Chand Malhotra

Trump Presidency 2.0: भले ही आज तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ है और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ अपने लड़ाकुओं को पाक-अफगान सीमा पर भेज रहा है। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब दोनों नशे के कारोबार में पूरी तरह से डूबे हुए थे और पूरी दुनिया को नशीले पदार्थों की सप्लाई कर रहे थे। जनवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रंप 2.0 शुरू होने से पहले, एक नई किताब ने अफगानिस्तान से नशीले पदार्थों की तस्करी पर अमेरिकी कार्रवाई और पाकिस्तानी सेना की साजिशों का पर्दाफाश किया है। इस किताब का नाम है ‘द न्यूक्स, द जिहाद, द हवाला और क्रिस्टल मेथ’ (‘The Nukes, the Jihad, the Hawalas and Crystal Meth’), जिसे लेखक इकबाल चंद मल्होत्रा ने लिखा है। किताब में खुलासा किया गया है कि कैसे पाकिस्तानी सेना ने तालिबान के साथ मिलकर क्रिस्टल मेथ की अवैध लैब को बचाने की साजिश रची, जबकि ट्रंप प्रशासन ने इन लैब्स को नष्ट करने का आदेश दिया था।

Trump Presidency 2.0: Will Pakistani Drug Nexus Be Exposed?
“The Nukes, the Jihad, the Hawalas and Crystal Meth” Writer Iqbal Chand Malhotra

Trump Presidency 2.0: अमेरिकी सेना का मिशन और पाकिस्तानी सेना की चालाकी

मल्होत्रा ने किताब में पेज संख्या 150 पर इस विषय पर एक चैप्टर भी लिखा है। ‘ऑपरेशन टेम्पेस्ट एंड द ट्रेचरी अराउंड नारकोटिक्स’ इसमें लिखा है कि पाकिस्तानी सेना ने क्रिस्टल मेथ लैब्स की सुरक्षा के लिए तालिबान को बचाने की कोशिश की, ताकि नशीले पदार्थों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार जारी रहे। इस दौरान, ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी वायुसेना (USAF) को इन लैब्स को नष्ट करने का आदेश दिया था। डायरेक्टोरेट एस की रणनीति यह थी कि तालिबान शहरों और उनके आसपास के इलाकों में अपनी गतिविधियों को तेज करे। इस रणनीति का उद्देश्य सुरक्षा बलों को ग्रामीण इलाकों से हटाकर शहरी इलाकों में केंद्रित करना था। ताकि तालिबान राजमार्गों पर कब्जा कर सके और शहरों को अलग-थलग कर सके। ताकि जनता में भय पैदा हो। लेकिन इस रणनीति की सफलता में एकमात्र बड़ा बाधा अमेरिकी वायुसेना (USAF) थी।”

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मल्होत्रा लिखते हैं कि ट्रंप ने अमेरिकी वायुसेना (USAF) को अफगानिस्तान के मादक पदार्थ उद्योग को निशाना बनाने का आदेश दिया था। “6 मई 2019 को, USAF ने “स्मार्ट म्यूनिशन” का इस्तेमाल करते हुए 68 मेथ लैब्स को बमबारी करके नष्ट कर दिया। ये सभी लैब्स फराह प्रांत के बक्वा जिले में स्थित थीं।”

Trump Presidency 2.0: एफेड्रा की खेती और नशीले पदार्थों का उत्पादन

किताब के अनुसार, 2018 से ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (DEA) ने देखा कि फराह और हेलमंद से व्यापारी पहाड़ियों के पास फसल खरीदने पहुंचते थे। “एपेड्रा की बढ़ती मांग ने इसके दाम 2017 से 2018 के बीच तीन गुना कर दिए। किसान एक दिन में 70 किलो एफेड्रा तक काट सकते थे, और गधों की मदद से वे प्रतिदिन $125 तक कमा सकते थे।”

किताब में यह भी कहा गया है कि एफेड्रा अफगानिस्तान के वारदक, गोर, हेलमंद, उरुज़गन और गजनी प्रांतों की पहाड़ियों में जंगली तौर पर उगता है। “गजनी के 15 गांवों से एक सीजन में लगभग 2,500 मीट्रिक टन फसल काटी जा सकती थी, जिससे 8 से 25 मीट्रिक टन मेथामफेटामिन तैयार किया जा सकता था।”

अमेरिकी कार्रवाई का असर और पाकिस्तानी सेना की चिंता

मल्होत्रा ने लिखा कि अमेरिकी वायुसेना के हमले के बाद नशीले पदार्थों का व्यापार अंडरग्राउंड हो गया। व्यापारियों ने खुले बाजार की जगह अपने घरों से कारोबार करना शुरू कर दिया। 2018 में बकवा बाजार में 450 ग्राम एफेड्रा की कीमत $284 थी। इस एफेड्रा से लगभग 12 किलो एफेड्रिन तैयार किया जा सकता था। इसके बाद एफेड्रिन को मेथ में बदलने के लिए केवल सामान्य रसायनों का उपयोग किया जाता है।

किताब में यह भी बताया गया है कि 2019 में अमेरिका में 1 किलो मेथ की कीमत $40,000 थी। “बकवा बाजार में तैयार 8 किलो मेथ की कीमत लगभग $2,500 थी, लेकिन अमेरिकी बाजार में इसकी कीमत $320,000 थी।”

मल्होत्रा बताते हैं कि 2019 तक अफगानिस्तान में मेथामफेटामिन की जब्ती 650 किलो तक पहुंच गई थी। “बक्वा जिले का अब्दुल वदूद बाज़ार एफेड्रा व्यापार का केंद्र था। 2018 में, 450 ग्राम एफेड्रा की कीमत $284 थी। इससे 12 किलो एफेड्रीन तैयार किया जा सकता था, जो 8 किलो 95% शुद्ध क्रिस्टल मेथ में बदल सकता था।”

डायरेक्टोरेट एस और नशीले पदार्थों का व्यापार

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के डायरेक्टरेट एस ने इस व्यापार को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। यह व्यापार तालिबान और मैक्सिकन ड्रग कार्टेल्स जैसे सिनालोआ और सीजेजीएनजी के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।

किताब में दावा किया गया है कि अमेरिकी हमलों के बावजूद नशीले पदार्थों का यह व्यापार जारी रहा। 2010 में जब पहली बार मेथ जब्त की गई, तो यह मात्रा केवल कुछ किलो थी। लेकिन 2018 तक यह बढ़कर 180 किलो हो गई। 2019 के पहले छह महीनों में यह मात्रा रिकॉर्ड 650 किलो तक पहुंच गई।

पाकिस्तानी सेना की साजिश

मल्होत्रा ने लिखा कि पाकिस्तानी सेना ने इस व्यापार को जारी रखने के लिए तालिबान और स्थानीय व्यापारियों को सुरक्षा मुहैया कराई। उन्होंने यह भी दावा किया कि आईएसआई ने नशीले पदार्थों की सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए। उन्होंने कहा कि “डायरेक्टरेट एस के लिए नशीले पदार्थों के व्यापार को बचाना इतना महत्वपूर्ण था कि इसने अपने पूरे नेटवर्क का इस्तेमाल किया।”

अफगानिस्तान का क्रिस्टल मेथ व्यापार और अमेरिकी रणनीति

मल्होत्रा ने यह भी बताया कि अफगानिस्तान में नशीले पदार्थों का व्यापार अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। ट्रंप प्रशासन ने इसे रोकने के लिए कई कदम उठाए, लेकिन पाकिस्तानी सेना और तालिबान की साजिशों के कारण इसमें पूरी सफलता नहीं मिली।

ट्रंप 2.0 में नशीले पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई का वादा

डोनाल्ड ट्रंप ने 2024 के चुनाव प्रचार में एक बार फिर से नशीले पदार्थों के व्यापार को खत्म करने का वादा किया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी दूसरी पारी में इस मुद्दे पर क्या कार्रवाई होती है। ‘द न्यूक्स, द जिहाद, द हवाला और क्रिस्टल मेथ’ नामक इस किताब ने पाकिस्तान की साजिशों और अमेरिकी रणनीतियों के बीच चल रहे Tug of War को बेहतरीन तरीके से उजागर किया है।

China-India Talks: बड़ा खुलासा! भारत-चीन वार्ता से पहले भाजपा के इस थिंकटैंक ने किया था बीजिंग का सीक्रेट दौरा, कूटनीतिक संबंधों की बहाली को लेकर की थी बात

China-India Talks: BJP Think Tank India Foundation Secret Beijing-lhasa Visit
A Delegation From India Foundation Visits Tibetan Parliament-in-Exile

China-India Talks: भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार और ट्रैक-2 की डिप्लोमेसी को फिर से शुरू करने के लिए देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के एक थिंक टैंक ने हाल ही में चीन का दौरा किया था। यह दौरा बिल्कुल गुपचुप किया गया था और किसी को इस दौरे की कानोंकान खबर तक नहीं लगी। यह दौरा देशों के नेताओं और विशेष प्रतिनिधियों डोभाल और वांग यी के बीच हुई बैठक से पहले हुआ था, जिसमें पूर्वी लद्दाख में तनाव को कम करने और डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को लेकर बातचीत की गई थी। इसके बाद ये प्रतिनिधिमंडल धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार के सदस्यों से भी मिला था।

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China-India Talks: शंघाई और ल्हासा में संवाद

सूत्रों ने बताया कि भारत और चीन के बीच बढ़ते तनाव के बीच ट्रैक-2 डिप्लोमेसी को फिर से शुरू करने के लिए नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल हाल ही में चीन गया था। यह दौरा नवंबर के आखिर में हुआ था, जो पहले फुदान गया और बाद में वहां से ल्हासा। सूत्रों के मुताबिक इस दौरे का मकसद दोनों देशों के बीच संवाद को बढ़ावा देना और आपसी विश्वास बहाल करना था। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष और भाजपा नेता राम माधव के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल पहले शंघाई गया। यह यात्रा शंघाई के फ़ुदान विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर हुई, जिसके साथ इंडिया फाउंडेशन का नियमित संवाद होता है। इसके बाद, प्रतिनिधिमंडल ल्हासा (तिब्बत) पहुंचा, जिसका नेतृत्व इंडिया फाउंडेशन के निदेशक कैप्टन आलोक बंसल ने किया था।

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इंडिया फाउंडेशन के सूत्रों ने बताया, “यह दौरा डायलॉग ऑन चाइना-इंडिया रिलेशंस के दूसरे चरण का हिस्सा था। पहला चरण शंघाई के फ़ुदान विश्वविद्यालय में हुआ था। यह हर साल आयोजित होने वाला संवाद है। पिछले साल चीन से एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भारत आया था, और इस बार हमारी बारी थी।” उन्होंने यह भी कहा कि इस बार ल्हासा का दौरा भी संभव हो सका, हालांकि काशगर जाने की योजना पूरी नहीं हो पाई। इस प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ राजनयिक अशोक के. कंथा, पूर्व भारतीय राजदूत, थिंक टैंक से जुड़ी सोनू त्रिवेदी, सीनियर रिसर्च फेलो सिद्धार्थ सिंह शामिल थे।

वहीं, चीन के एक अखबार ने भी इस यात्रा की पुष्टि की। उसमें बताया गया, “हाल ही में इंडिया फाउंडेशन का एक थिंक टैंक प्रतिनिधिमंडल चीन आया और उन्होंने ल्हासा का दौरा भी किया।”

भारत लौटने के बाद, इंडिया फाउंडेशन के प्रतिनिधिमंडल ने धर्मशाला में तिब्बती निर्वासित सरकार (CTA) के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस बैठक का नेतृत्व पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने किया।

China-India Talks: भारत-चीन संबंधों में ऐसे हो सकता है सुधार

इंडिया फाउंडेशन के इस दौरे बाद फ़ुदान यूनिवर्सिटी के साउथ एशियन स्टडीज सेंटर के निदेशक झांग जियाडोंग ने चीनी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में लिखा कि भारत और चीन जैसे दो शक्तिशाली और महत्वपूर्ण देशों के बीच यह स्थिति चिंताजनक है।

उन्होंने कहा, “इन दोनों देशों के बीच आपसी समझ में अस्पष्टता और असमंजस की स्थिति बनी हुई है, जो केवल अधिक से अधिक सांस्कृतिक और आपसी संवाद के माध्यम से कम किया जा सकता है।” झांग जियाडोंग ने कहा कि इन दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और लोगों के बीच संपर्क अब भी बहुत सीमित है।

China-India Talks: सांस्कृतिक और आपसी संवाद की कमी

झांग जियाडोंग का मानना है कि हिमालयी सीमा पर लंबे समय तक तनाव और विवाद के चलते दोनों देशों के बीच संवाद की कमी और आपसी विश्वास में कमी आई है। यह स्थिति आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए बाधा बन रही है। झांग के अनुसार, “ट्रैक-2 डिप्लोमेसी” जैसे गैर-सरकारी संवादों के माध्यम से दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।

झांग ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अभी भी कमी है। 2019-2020 शैक्षणिक वर्ष के दौरान लगभग 20,000 भारतीय छात्र चीन में अध्ययन कर रहे थे। लेकिन गलवान घाटी संघर्ष के बाद यह संख्या लगभग शून्य तक पहुंच गई। 2021-2022 में यह संख्या 8,580 हो गई, जबकि 2023-2024 में घटकर 6,500 रह गई।

वहीं, भारत में पढ़ने वाले चीनी छात्रों की संख्या और भी कम है। 2020-2021 में यह संख्या 166 थी, जो 2023-2024 में केवल 25 रह गई।

कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसे कार्यक्रम फिर से शुरू हों

सीमा विवाद और कोविड-19 महामारी के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा अब तक बहाल नहीं हो पाई है। यह यात्रा हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक पवित्र तीर्थ यात्रा है, जिसमें वे तिब्बत के माउंट कैलाश और माप्हम युम्त्सो झील की परिक्रमा करते हैं।

झांग ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों को फिर से शुरू करने से दोनों देशों के बीच आपसी समझ और विश्वास को बढ़ावा मिलेगा।

ट्रैक-2 डायलॉग और भविष्य की दिशा

झांग ने कहा कि बीजिंग और नई दिल्ली दोनों ही रुकी हुई बातचीत को फिर से शुरू करने के प्रयास कर रहे हैं। नवंबर 2020 के बाद पहली बार भारत में ट्रैक-2 संवाद आयोजित किया गया था। लेकिन छात्रों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे अन्य आदान-प्रदान अभी भी अपेक्षाकृत धीमी गति से बहाल हो रहे हैं। झांग ने कहा कि चीन और भारत को इन क्षेत्रों में पिछड़ेपन को दूर करने के लिए तेजी से कदम उठाने चाहिए।

कोविड-19 महामारी के दौरान बंद हुई भारत-चीन के बीच सीधी उड़ानें अब भी बहाल नहीं हुई हैं। झांग के अनुसार, उड़ानों को फिर से शुरू करना दोनों देशों के बीच यात्रा और आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करेगा।

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तिब्बती निर्वासित संसद का दौरा

इंडिया फाउंडेशन के प्रतिनिधिमंडल ने 9 दिसंबर को धर्मशाला स्थित तिब्बती निर्वासित संसद का दौरा किया। उन्होंने संसद के अध्यक्ष खेनपो सोनम टेनफेल और उपाध्यक्ष डोलमा त्सेरिंग तेयखांग से मुलाकात की। इस प्रतिनिधिमंडल में सुरेश प्रभु, लेफ्टिनेंट जनरल अरुण कुमार सहनी,  शौर्य डोभाल, अशोक मलिक, प्रोफेसर सुनीना सिंह, कैप्टन आलोक बंसल, रामी देसाई, न्गावांग गामत्सो हार्डी और चित्रा शेखावत शामिल थे। इस बैठक में कहा गया कि CTA तिब्बतियों का वैध प्रतिनिधि है। तिब्बत की स्वतंत्रता और उसके पड़ोसी देशों के साथ ऐतिहासिक कूटनीतिक संबंधों और वन-चाइना नीति पर पुनर्विचार करने को लेकर बातचीत हुई।

भारत-चीन संबंधों में सुधार

इससे पहले 18 दिसंबर को भारत और चीन के बीच विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता की पुनः शुरुआत हुई। इस बैठक में दोनों देशों ने सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने समेत छह बिंदुओं पर सहमति जताई। इन बिंदुओं में कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, सीमा पार नदियों पर डाटा साझाकरण, और सीमा व्यापार का फिर से शुरू होना शामिल था।

इससे पहले, नवंबर में जी20 बैठक के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ब्राजील में अपने चीनी समकक्ष से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिति बहाल करने और अगले कदम उठाने पर सहमति जताई। वहीं, अक्टूबर में कज़ान, रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक ने संबंधों में सुधार नींव डाली थी।

मोदी ने शी जिनपिंग से कहा था, “हमारे संबंधों का आधार आपसी विश्वास, आपसी सम्मान और आपसी संवेदनशीलता होना चाहिए। आज हमें इन सभी मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने का अवसर मिला है। मुझे विश्वास है कि हमारी बातचीत रचनात्मक होगी।”

सीमा पर घटा तनाव

21 अक्टूबर को भारत और चीन ने पेट्रोलिंग पर सहमति जताई थी, जिसके तहत पूर्वी लद्दाख में देमचोक और देपसांग क्षेत्रों में नियंत्रण रेखा (LAC) पर गश्त की अनुमति दी गई। हाल ही में दोनों सेनाओं ने दीवाली के अवसर पर मिठाइयों का आदान-प्रदान भी किया। बता दें कि वर्तमान में, दोनों देशों के लगभग 1,00,000 सैनिक सीमा पर तैनात हैं। जून 2020 में गलवान संघर्ष के बाद भारत ने पूर्वी लद्दाख में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी थी, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे।

OROP Update: वन रैंक, वन पेंशन योजना पर आया बड़ा अपडेट, सेना मुख्यालय ने अतिरिक्त पेंशन और पेंशन कटौती पर दिया ये जवाब

Commutation of Pension: How the 15-year restoration period is under scrutiny, veterans seek reduction to 12 years
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OROP Update: भारतीय सेना के पेंशनरों और पूर्व सैनिकों के लिए वन रैंक वन पेंशन (OROP) योजना हमेशा से चर्चा में रही है। इस योजना के तहत समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले पेंशनरों को समान पेंशन मिलनी चाहिए। हाल ही में इंडियन एक्स-सर्विसेस लीग (IESL) के अध्यक्ष ब्रिगेडियर इंद्रमोहन सिंह (सेवानिवृत्त) ने OROP से जुड़ी विसंगतियों पर सवाल उठाए। उनके इन सवालों के जवाब में सेना मुख्यालय ने 12 दिसंबर 2024 को एक विस्तृत पत्र जारी किया।

OROP Update: Key Clarifications on Additional Pension and Deductions by Army HQ
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OROP की परिभाषा और विसंगतियां

ब्रिगेडियर सिंह ने OROP के तहत पेंशन निर्धारण के तरीके पर सवाल उठाए। सेना मुख्यालय ने जवाब में कहा कि OROP का उद्देश्य समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले पेंशनरों को समान पेंशन देना है, चाहे उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख कोई भी हो।

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हालांकि, सरकार ने 7 नवंबर 2015 को एक पत्र जारी कर पेंशन को औसत (average) के आधार पर तय करने की बात कही। यह फैसला OROP की मूल भावना से अलग था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2022 में इसे वैध ठहराया। इस बदलाव से OROP अब “वन रैंक, फाइव पेंशन” जैसी स्थिति में बदल गया है, जहां समान रैंक के पेंशनरों को अलग-अलग राशि मिल सकती है।

OROP-3: नई पेंशन दरें और संशोधन

OROP-3 का रिवीजन 1 जुलाई 2024 से लागू किया गया। इसके तहत कुल 121 पेंशन सूचियां जारी की गईं, जिनमें रैंक और सेवा अवधि के आधार पर नई पेंशन दरें दी गईं। सेना मुख्यालय के अनुसार, 01 जुलाई 2024 को इन आदेशों के अनुसार संशोधित पेंशन, 01 जुलाई 2024 को मौजूदा पेंशन/पारिवारिक पेंशन से कम होती है, पेंशन को पेंशनभोगी/पारिवारिक पेंशनभोगी के नुकसान के लिए संशोधित नहीं किया जाएगा। अगले OROP संशोधन 01 जुलाई 2029, 2034 और हर पांच साल बाद किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में कुल तीन बार पेंशन दरों में सुधार होगा। OROP के लाभ के अलावा वेतन का लाभ भी दिया जाएगा। इस योजना के तहत पेंशन में कमीशन भी दिया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत अगले 10 वर्षों में पेंशनरों को तीन बार पेंशन में बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा।

One Rank One Pension: OROP-3 में पेंशन विसंगतियों से नाराज हैं सेवानिवृत्त सैन्य कर्मी, 401 JCOs ने रक्षा मंत्रालय और नेवी चीफ को भेजा कानूनी नोटिस

OROP Update: 80 वर्ष की आयु पर अतिरिक्त पेंशन

OROP के तहत, 80 वर्ष की आयु पूरी करने पर पेंशन में मूल पेंशन का 20 फीसदी अतिरिक्त दिया जाता है। यह लाभ 85, 90, 95 और 100 वर्ष की आयु पर क्रमशः 30%, 40%, 50% और 100% तक बढ़ जाता है।

हालांकि, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 79 वर्ष पूरे होने पर ही अतिरिक्त पेंशन देने का आदेश दिया था। इस पर रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय न्यायालय विशेष है और इसके लिए केंद्रीय स्तर पर नीति तय की जाएगी। पेंशन संबंधी मामलों के नोडल विभाग होने के नाते इस मामले को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग और पेंशनभोगी कल्याण विभाग के साथ विचार-विमर्श के लिए भेजा गया है। रक्षा मंत्रालय ने यह भी सूचित किया है कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की टिप्पणी प्राप्त होने के बाद ही इस मामले पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

OROP Update: पेंशन कटौती

पेंशन के कम्यूटेड मूल्य की कटौती 15 वर्षों के बाद बहाल की जाती है। यह नीति सुप्रीम कोर्ट के 1986 के फैसले पर आधारित है। वर्तमान में इसे 12 वर्षों में बहाल करने का कोई प्रावधान नहीं है।

12 वर्षों के बाद पेंशन के कम्यूटेड मूल्य को बहाल करने की याचिका के आधार पर, एएफटी (पीबी) नई दिल्ली ने 24 जुलाई 2024 के अपने आदेश के माध्यम से निर्देश दिया था कि 12 वर्षों के बाद पेंशन की वसूली पर रोक लगाई जाए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 12 वर्षों के बाद पेंशन कटौती को बहाल करने के एक आदेश पर रोक लगा दी है। रक्षा मंत्रालय इस पर उचित कार्रवाई के लिए विचार कर रहा है।

स्पर्श (SPARSH) प्रणाली: पेंशन वितरण में पारदर्शिता

वहीं, स्पर्श को लेकर सेना मुख्यालय ने जवाब दिया कि स्पर्श प्रणाली को अगस्त 2021 में लागू किया गया, ताकि पेंशन वितरण को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जा सके। हालांकि, शुरुआती चरण में तकनीकी समस्याओं के कारण पेंशनभोगियों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सेना मुख्यालय ने बताया कि इन समस्याओं के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं। जैसे स्पर्श की दिक्कतों को दूर करने के लिए टीसीएस की एक टीम पीसीडीए (पी) कार्यालय में तैनात की गई है। रक्षा मंत्रालय, सीजीडीए और टीसीएस के साथ लगातार नियमित समीक्षा बैठकें हो रही हैं। वहीं, मेरठ और चेन्नई में स्पर्श संबंधित मामलों के समाधान के लिए समस्या समाधान केंद्र बनाए गए हैं।

OROP की समीक्षा प्रक्रिया और चुनौतियां

OROP को लेकर सरकार और पेंशनरों के बीच लगातार चर्चा और असहमति बनी रहती है। पेंशनरों का कहना है कि OROP के तहत सभी को समान लाभ मिलना चाहिए, जबकि सरकार का दृष्टिकोण औसत (average) आधारित है।

OROP को लागू करने में मुख्य चुनौती इसके वित्तीय बोझ की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि OROP को मूल रूप में लागू किया जाता है, तो इससे सरकार पर भारी वित्तीय दबाव पड़ेगा।