Home Blog Page 137

Anti-Drone Ammunition: ‘ड्रोन वॉरफेयर’ से निपटने को तैयार भारतीय सेना, ZU-23 एंटी-एयरक्राफ्ट गन को देश में ही मिलेगा अपडेटेड गोला-बारूद

Anti-Drone Ammunition: Indian Army issued RFI for manufacturing of ZU-23 mm Anti-Drone ammunition

Anti-Drone Ammunition: दुनियाभर में चल रहे हालिया युद्धों में ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर तेजी देखी गई है। ड्रोन छोटे आकार, कम लागत और एडवांस टेक्नोलॉजी के चलते दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर करने और सटीक हमले करने में सक्षम हैं। इन खतरों से निपटने के लिए भारतीय सेना अब बड़ी तैयारी कर रही है। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने भारतीय उद्योगों से 23mm एंटी-ड्रोन गोला-बारूद की सप्लाई के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFI) जारी किया है। (RFI) जारी किया है। भारतीय सेना ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन जैसे हवाई खतरों से निपटने के लिए अब बड़ी तैयारी में जुट गई है।

Anti-Drone Ammunition: Indian Army issued RFI for manufacturing of ZU-23 mm Anti-Drone ammunition
Shilka एंटी-एयरक्राफ्ट गन

क्या है ZSU-23-4 Shilka एंटी-एयरक्राफ्ट गन

ZSU-23-4 शिल्का वेपन सिस्टम एक ऑटोमैटिक एंटी-एयरक्राफ्ट गन सिस्टम है, जिसे सोवियत संघ ने डिजाइन किया था। इसमें चार 23 मिमी की ऑटोमौटिक तोपें (2A7) लगी हैं, जो तेज रफ्तार से फायरिंग करने और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई खतरों जैसे लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और ड्रोन को मार गिरा सकती हैं। इसकी प्रभावी फायरिंग रेंज 2.5 किमी है और फायरिंग स्पीड 4,000 राउंड प्रति मिनट तक पहुंच सकती है।

शिल्का प्रणाली में इन-बिल्ट रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम है, जो दिन और रात के किसी भी समय दुश्मन के लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है। इसे किसी भी गाड़ी पर लगाया जा सकता है, जिससे इसे आसानी से सीमावर्ती क्षेत्रों और ऊंचाई वाले स्थानों पर तैनात किया जा सकता है।

Anti-Drone Ammunition: Indian Army issued RFI for manufacturing of ZU-23 mm Anti-Drone ammunition
ZU 23mm

Anti-Drone Ammunition: क्या है ZU 23mm सिस्टम

ZU 23mm सिस्टम एक डबल बैरल एंटी-एयरक्राफ्ट ऑटोकैनन है, जिसे रूसी मूल का माना जाता है। इसका पूरा नाम “जेनिटनाया उस्तानोवका” है। भारतीय सेना के पास लगभग 470 ZU-23 सिस्टम हैं, जिन्हें सोवियत संघ से खरीदा गया था और भारत में ही अपग्रेड किया गया। इस अपग्रेड में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम जोड़ा गया, जो दुश्मन को ट्रैक कर उसकी पहचान करने और सटीक हमला करने की क्षमता प्रदान करता है।

यह सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई खतरों को खत्म करने में सक्षम है। इसका काम करने का तरीका “गैस ऑपरेटेड एक्शन” पर आधारित है। इस ऑटोकैनन का वजन लगभग 0.95 टन है, जबकि इसकी लंबाई 10 फीट और बैरल की लंबाई 6.5 फीट है, जो इसे लंबी दूरी तक मारक क्षमता प्रदान करती है। पूरे सिस्टम की चौड़ाई 9.5 फीट और ऊंचाई 4 फीट है।

Indian Army: सेना प्रमुख के दफ्तर की दीवार से गायब हुई यह एतिहासिक फोटो, पूर्व अफसर बोले- क्या भारतीय सेना की गौरवमयी जीत की अनदेखी कर रही सरकार?

इस सिस्टम को संचालित करने के लिए दो लोगों की जरूरत होती है- एक गनर और एक कमांडर। यह 23 मिमी कैलिबर के गोले दागने में सक्षम है और माइनस 10 डिग्री से प्लस 90 डिग्री तक के कोण पर हमला कर सकता है। इसके अलावा, यह 360 डिग्री घूमकर दुश्मन के हर दिशा में निशाना साध सकता है।

यह सिस्टम एक मिनट में 2,000 गोलियां दागने की क्षमता रखता है। इसके गोले 50 राउंड की बेल्ट में लोड किए जाते हैं। इसकी मारक दूरी ढाई किलोमीटर तक होती है, जहां यह सटीकता के साथ हमला कर सकता है।

ZU 23mm सिस्टम को किसी भी गाड़ी पर लगाया जा सकता है, जिससे इसे आसानी से सीमा पर तैनात किया जा सकता है। इसे ट्रक से बांधकर या विमान में लोड करके ऊंचाई वाले स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है।

भारत में इस सिस्टम के 320 यूनिट खींचकर तैनात करने वाले सिस्टम हैं, जबकि बाकी ट्रकों पर लगाए गए हैं। यह बहुमुखी सिस्टम दुश्मन के हवाई खतरों से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार है, जो सेना की ताकत को बढ़ाता है।

Anti-Drone Ammunition: क्यों चाहिए 23mm एंटी-ड्रोन गोला-बारूद?

23mm एंटी-ड्रोन गोला-बारूद मौजूदा ZU-23 और शिल्का हथियार प्रणालियों जैसे एंटी-एयरक्राफ्ट गन के साथ इस्तेमाल के लिए डिज़ाइन किया गया है। लेकिन इनसे दागे जाने वाले मौजूदा गोला-बारूद के हिट करने का संभावित औसत काफी कम है। इन गनों के ऑपरेट करने में इंसानों की भूमिका होने की वजह से सटीकता की कमी रहती है। इस कमी को पूरा करने के लिए 23 मिमी एंटी-ड्रोन गोला-बारूद तैयार किया जा रहा है, जिसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होगा। बता दें कि इन एंटी-एयरक्राफ्ट गन में 23 मिमी आर्मर पियर्सिंग इनसेन्डियरी ट्रेसर (एपीआईटी) और हाई एक्सप्लोसिव इनसेन्डियरी ट्रेसर (एचईआईटी) एम्युनिशन का इस्तेमाल किया जाता है।

यहां देखें सेना की तरफ से जारी RFI

ये गोला-बारूद छोटे आकार और कम रडार क्रॉस-सेक्शन वाले ड्रोन को नष्ट करने में सक्षम होने चाहिए। मौजूदा गोला-बारूद की तुलना में इसमें हाई “हिट प्रॉबेबिलिटी” होगी, जिससे यह मॉर्डन वारफेयर में ज्यादा प्रभावी साबित होगा। भारतीय सेना के पास ZU 23 मिमी और शिल्का हथियार प्रणाली जैसे एंटी-एयरक्राफ्ट गन हैं, लेकिन इनसे दागे जाने वाले मौजूदा गोला-बारूद का हिट करने का संभावित औसत कम है।

Anti-Drone Ammunition: होनी चाहिए ये खूबियां

23 मिमी एंटी-ड्रोन गोला-बारूद का डिज़ाइन भारतीय सेना की जरूरतों और मॉर्डन वारफेयर की चुनौतियों को ध्यान में रखकर किया गया है। इस गोला-बारूद को ZU 23 मिमी और शिल्का सिस्टम जैसे मौजूदा हथियारों के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इन गोला-बारूद में एक प्रॉक्सिमिटी या टाइम्ड फ्यूज सिस्टम होगा, जैसे ही यह ड्रोन के पास पहुंचेगा यह सक्रिय हो जाएगा। टाइम्ड फ्यूज को पहले से प्रोग्राम किया जाएगा ताकि यह निश्चित दूरी (जैसे 1000 मीटर, 1500 मीटर, 2500 मीटर आदि) पर विस्फोट कर सके। इससे दुश्मन के ड्रोन को नष्ट करने में आसानी होगी।

प्री-फ्रैगमेंटेड शेल का डिज़ाइन इस तरह से तैयार किया गया है कि इसके टुकड़े बड़े क्षेत्र में फैलकर दुश्मन के ड्रोन को अधिकतम नुकसान पहुंचा सकें। ये टुकड़े उचित आकार, संख्या और डेनसिटी में होंगे, जिससे ड्रोन को नष्ट करने की संभावना बढ़ जाएगी।

वहीं, इस गोला-बारूद की शेल्फ लाइफ कम से कम 10 साल तक होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि यह लंबे समय तक बिना किसी खराबी के स्टोरेज में रखा जा सकता है। इससे भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स और कॉस्ट मैनेजमेंट में भी मदद मिलेगी।

साथ ही, यह गोला-बारूद -30°C से +45°C के बीच के तापमान में पूरी क्षमता से काम करने की खूबी होनी चाहिए। इसके अलावा, इसे बिना किसी स्पेशल स्टोरेज सिस्टम के कठिन परिस्थितियों में भी सुरक्षित रखा जा सके। भारत की जलवायु और सैन्य हालातों को देखते हुए यह बेहद जरूरी है।

रूस ने बनाया “ड्रोन किलर” सिस्टम

बता दें कि जेडएसयू-23-4 शिल्का सिस्टम का उपयोग पहले से ही रूसी सेना में किया जाता रहा है। इसकी फायरिंग रेंज 2.5 किमी है और यह तेजी से फायर कर सकता है। वहीं यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध को देखते हुए रूस ने “ड्रोन किलर” सिस्टम लॉन्च किया है। रूस ने ड्रोन से मुकाबला करने के लिए बीटीआर-82 व्हीकल पर ज़ेडएसयू-23-4 शिल्का सिस्टम की दो 23 मिमी एंटी-एयरक्राफ्ट गन लगााई हैं। यह सिस्टम विशेष रूप से ड्रोन जैसे आधुनिक हवाई खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है।

‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा

रक्षा मंत्रालय के इस प्रस्ताव के तहत, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (DPSUs) और निजी उद्योगों को अपने-अपने सॉल्यूशंस पेश करने का मौका दिया गया है। मंत्रालय ने कंपनियों से आग्रह किया है कि वे इसमें हिस्सा लें और भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए तकनीकी जानकारी और प्रपोजल साझा करें।

भारतीय सेना ने इस परियोजना के लिए एक “सिंगल स्टेज-टू बिड सिस्टम” अपनाया है। इसका मतलब है कि टेक्निकल और कॉमर्शियल प्रपोजल अलग-अलग लिफाफों में जमा किए जाएंगे। सभी तकनीकी प्रस्तावों का मूल्यांकन एक टेक्निकल इवैल्यूएशन कमेटी द्वारा किया जाएगा। वहीं, आरएफआई जमा करने की अंतिम तिथि 17 फरवरी 2025 तय की गई है।

Ganga Task Force: भारतीय सेना की गोमती को नई जिंदगी देने की तैयारी! जानें कैसे गंगा टास्क फोर्स बदलेगी नदी की तस्वीर

Ganga Task Force: Indian Army’s Mission to Revive Gomti River!

Ganga Task Force: भारतीय सेना की टेरिटोरियल आर्मी (Territorial Army) ने गोमती नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। भारत की पवित्र नदियों की स्वच्छता और संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, दुनिया की पहली कंपोजिट इकोलॉजिकल टास्क फोर्स (CETF), जिसे गंगा टास्क फोर्स (GTF) के नाम से जाना जाता है, उसने एक बड़ी पहल की है। इस मिशन के तहत गंगा टास्क फोर्स (Ganga Task Force) की एक नई कंपनी को लखनऊ में तैनात किया गया है। गंगा टास्क फोर्स (GTF) अभी तक गंगा नदी की स्वच्छता और संरक्षण में जुटती थी, लेकिन अब गोमती नदी के पुनर्जीवन के लिए भी काम करेगी। इस पहल का औपचारिक शुभारंभ 1 जनवरी 2025 को लखनऊ छावनी में हुआ।

Ganga Task Force: Indian Army’s Mission to Revive Gomti River!

गंगा नदी की स्वच्छता और संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान देने वाली गंगा टास्क फोर्स (GTF) अब गोमती नदी के लिए भी काम करेगी। इस टास्क फोर्स में अधिकांश सदस्य पूर्व सैनिक हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य गंगा की पवित्रता को बनाए रखना है।

उद्घाटन समारोह के दौरान टेरिटोरियल आर्मी के ग्रुप हेडक्वार्टर के कमांडर ब्रिगेडियर चिन्मय मधवाल ने गंगा टास्क फोर्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल अरविंद प्रसाद एस को प्रतीकात्मक ध्वज सौंपा। इस कार्यक्रम में सैन्य और नागरिक क्षेत्रों के कई गणमान्य लोग मौजूद थे, जिनमें बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. वेंकटेश दत्ता भी शामिल थे।

Mountain Artillery: अब भारतीय सेना का हिस्सा नहीं रहेंगे खच्चर, ड्रोन, ATV और रोबोटिक म्यूल ने ली जगह, सेना ने ऐसे दी विदाई

डॉ. दत्ता ने गोमती नदी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके सामने मौजूद समस्याओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस पहल की सराहना करते हुए इसे नदी के पुनर्जीवन के लिए एक सकारात्मक पहल बताया।

Ganga Task Force: Indian Army’s Mission to Revive Gomti River!

क्या करेगी Ganga Task Force?

भारतीय सेना की गंगा टास्क फोर्स बटालियन ने इस अभियान के तहत प्रदूषण की निगरानी को प्राथमिकता दी है। गंगा टास्क फोर्स की टीमें नदी के घाटों और किनारों पर नियमित गश्त करेंगी। यह गश्त न केवल प्रदूषण के कारणों की पहचान करेगी, बल्कि उन्हें रोकने के लिए ठोस कदम भी उठाएगी।

इसके साथ ही, यह टीम सार्वजनिक जागरूकता अभियान भी शुरू करेगीी। इन अभियानों का उद्देश्य स्थानीय लोगों को स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करना है। स्वच्छता बनाए रखने, कचरा प्रबंधन और नदी के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।

गोमती नदी के किनारों को मजबूत करने के लिए किनारों का स्थिरीकरण एक अहम हिस्सा होगा। इस प्रयास का लक्ष्य कटाव रोकना और नदी के किनारों को संरक्षित करना है, जिससे यह लंबे समय तक सुरक्षित और स्थिर बने रहें।

इसके अलावा, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्निर्माण भी इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नदी के आसपास पौधारोपण और पारिस्थितिकी तंत्र के विकास के जरिए जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

Ganga Task Force: Indian Army’s Mission to Revive Gomti River!

उत्तर प्रदेश के कई जिलों से होकर बहती है गोमती नदी

गोमती नदी गंगा की एक सहायक नदी है, और उत्तर प्रदेश के कई जिलों से होकर बहती है। गोमती को लखनऊ शहर की जीवनरेखा माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ते प्रदूषण और अतिक्रमण ने इसे संकट में डाल दिया है। नदी का जल स्तर कम होता जा रहा है, और इसका पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ चुका है।

राजीव गांधी ने शुरू किया था गंगा एक्शन प्लान

गंगा सफाई का प्रयास पिछले कई दशकों से चलता आ रहा है। 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए गंगा एक्शन प्लान शुरू किया था। गंगा नदी को स्वच्छ और संरक्षित करने के लिए नमामि गंगे मिशन की शुरुआत 2014 में की गई थी। इस मिशन के तहत कई नालों को गंगा में गिरने से रोका गया, घाटों को साफ किया गया, और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए।

वहीं, गंगा टास्क फोर्स के माध्यम से प्रदूषण की निगरानी, प्लास्टिक कचरे को हटाने और स्वच्छता अभियानों को लागू किया गया। इसके साथ ही, स्थानीय समुदायों को जागरूक करने और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए।

नई कंपनी को जल शक्ति मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के तहत स्थापित किया गया है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा सितंबर 2024 में आदेश जारी किए गए थे।

गंगा टास्क फोर्स का यह प्रयास सेना और आम नागरिकों के बीच एक मजबूत सहयोग का प्रतीक है। यह पहल न केवल गोमती नदी के लिए, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान का हिस्सा है। भारतीय सेना ने इस पहल के माध्यम से यह संदेश दिया है कि हर व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण है।

The Ganga Task Force is a specialized team responsible for the preservation and restoration of the Ganga River. Committed to maintaining the ecological balance and promoting sustainable practices, the Ganga Task Force plays a crucial role in ensuring the long-term health and vitality of this iconic waterway. Through their diligent efforts, the Ganga Task Force strives to protect the river’s sacred and environmental significance for future generations.

Mountain Artillery: अब भारतीय सेना का हिस्सा नहीं रहेंगे खच्चर, ड्रोन, ATV और रोबोटिक म्यूल ने ली जगह, सेना ने ऐसे दी विदाई

Mountain Artillery Retires: Mules Make Way for Drones, ATVs & Robotic Mules in Indian Army

Mountain Artillery: भारतीय सेना ने अपनी ऐतिहासिक और बहादुर पशु परिवहन (माउंटेन आर्टिलरी) यूनिट्स को श्रद्धांजलि देने के लिए एक खास डाक कवर जारी किया है। यह आयोजन सेना की उन यूनिट्स को याद करने के लिए किया गया, जिन्होंने दुर्गम पहाड़ों और कठिन हालात में सेना का साथ दिया। इस मौके पर सेना के वरिष्ठ अधिकारी (क्वार्टर मास्टर जनरल), लेफ्टिनेंट जनरल प्रीत मोहिंद्रा सिंह (निदेशालय आपूर्ति एवं परिवहन), और वरिष्ठ कर्नल कमांडेंट के साथ मेजर जनरल एमके खान (सहायक निदेशालय सेना डाक सेवा) और सेना सेवा कोर के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

Mountain Artillery Retires: Mules Make Way for Drones, ATVs & Robotic Mules in Indian Army

Mountain Artillery: खच्चरों का सेना के साथ पुराना रिश्ता

भारतीय सेना का खच्चरों के साथ एक गहरा और ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। 250 से ज्यादा सालों तक ये पशु, कठिन इलाकों में सेना के अभियानों की रीढ़ रहे। चाहे वह हिमालय की बर्फीली चोटियां हों या दुर्गम पहाड़ी इलाके, खच्चरों ने हर चुनौती को पार करते हुए रसद, हथियार और अन्य जरूरी सामान सैनिकों तक पहुंचाया। खच्चरों की खासियत उनकी ताकत, सहनशक्ति और कठिन हालात में काम करने की क्षमता रही। इन्हीं गुणों ने उन्हें सेना के लिए अनमोल साथी बना दिया।

Indian Army AI Incubation Centre: बेंगलुरु में शुरू हुआ भारतीय सेना का एआई इनक्यूबेशन सेंटर; रक्षा क्षेत्र में तकनीकी क्रांति की नई शुरुआत

ये खच्चर वहां तक पहुंच जाते हैं, आधुनिक वाहन और तकनीक भी बेकार साबित हो जाती हैं, म्यूल (खच्चर) और उनके देखभालकर्ता, जिन्हें ‘म्यूलटियर’ कहा जाता है, हमेशा से भरोसेमंद साथी रहे हैं।

इस मोके पर लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन ने कहा, “यह कदम हमारे पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखने का एक प्रतीक है। यह दिखाता है कि भारतीय सेना अपने हर साथी की सेवा को महत्व देती है।”

मेजर जनरल एमके खान ने कहा, “यह कवर म्यूल और उनके म्यूलटियर्स की कहानियों को जीवित रखने का एक प्रयास है। उनके योगदान को याद करना हमारा कर्तव्य है।”

Mountain Artillery Retires: Mules Make Way for Drones, ATVs & Robotic Mules in Indian Army

Mountain Artillery: तकनीक ने ली खच्चरों की जगह

अब समय बदल गया है। जहां पहले खच्चरों ने रसद पहुंचाने का काम किया, वहीं अब ड्रोन, ऑल-टेरेन व्हीकल्स और रोबोटिक म्यूल्स ने उनकी जगह ले ली है। सेना आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अपनी कार्यक्षमता को और मजबूत कर रही है। इन्हीं परिवर्तनों के चलते सेना की ‘एनिमल ट्रांसपोर्ट’ यूनिट्स को अब सक्रिय सेवा से हटाया जा रहा है। यह कदम सेना की बढ़ती आधुनिकता और भविष्य की सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

भारतीय सेना का आर्मी सर्विस कॉर्प्स (ASC) उन सेवाओं में से एक है, जो सेना की लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति का आधार है। इसकी शुरुआत लगभग 250 साल पहले हुई थी और शुरू में इसका फोकस एनिमल ट्रांसपोर्ट पर था। समय के साथ, ASC ने अपने दायरे का विस्तार करते हुए आधुनिक लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति प्रबंधन में भी महारत हासिल की।

ASC की ‘एनिमल ट्रांसपोर्ट’ यूनिट्स, जो माउंटेन आर्टिलरी का हिस्सा थीं, भारत के हर युद्ध क्षेत्र में सक्रिय रही हैं। ये यूनिट्स युद्ध के दौरान, खासकर 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान, महत्वपूर्ण साबित हुईं।

Mountain Artillery Retires: Mules Make Way for Drones, ATVs & Robotic Mules in Indian Army

खास डाक कवर का क्या है मतलब

जारी किया गया डाक कवर इन यूनिट्स के योगदान को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों को उनकी कहानियां सुनाने का एक प्रयास है। यह उन खच्चरों और उनके संचालकों को सलाम करता है, जिन्होंने अपनी मेहनत और ताकत से भारतीय सेना को हर मुश्किल को पार करने में मदद की।

पशु परिवहन यूनिट्स का योगदान सिर्फ सामान ढोने तक सीमित नहीं था। ये इकाइयां सैनिकों की जान बचाने और दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में अहम भूमिका निभाती थीं। कारगिल युद्ध और अन्य अभियानों में उनकी भूमिका आज भी प्रेरणादायक है। स्वतंत्रता के बाद, पशु परिवहन का उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में और ज्यादा बढ़ गया। 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के दौरान म्यूलटियर्स ने हिमालय की ऊंची चोटियों पर रसद पहुंचाई। इसी तरह, 1999 के कारगिल युद्ध में, जब टोलोलिंग और टाइगर हिल जैसे क्षेत्रों में सड़कें नहीं थीं, म्यूल ही सेना का एकमात्र सहारा थे।

आज, जब सेना आधुनिक तकनीकों को अपनाकर खुद को भविष्य के लिए तैयार कर रही है, तब भी यह कदम दिखाता है कि परंपरा और इतिहास को भूला नहीं जा सकता। म्यूलटियर्स और उनके पशु, जो भारतीय सेना की पहचान का हिस्सा रहे हैं, हमेशा याद किए जाएंगे।

भारतीय सेना का यह कदम दिखाता है कि तकनीकी प्रगति के बावजूद सेना अपनी जड़ों को सम्मान देती है और उन्हें सहेजने की हर संभव कोशिश करती है।

यह खास डाक कवर सेना की माउंटेड हेरिटेज को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक जरिया है। यह हमें याद दिलाता है कि कैसे खच्चरों और उनके संचालकों ने सेना को हर चुनौती में मजबूती दी। उनकी यह कहानी हमेशा भारतीय सेना की गौरवशाली यात्रा का हिस्सा बनी रहेगी।

The Mountain Artillery is an essential component of modern military operations. Its specialized skills and equipment enable it to operate effectively in rugged and difficult terrain. The Mountain Artillery’s ability to provide precision firepower in challenging environments significantly enhances its tactical capabilities. With its expertise in mountain warfare, this unit plays a crucial role in maintaining military readiness and securing strategic objectives.

Year of Reforms: साल 2025 भारतीय सेनाओं के लिए होगा खास, रक्षा मंत्रालय इस साल मनाएगा ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’

Year of Reforms: 2025 to Mark a Transformative Year for Indian Armed Forces

Year of Reforms: 2025 भारतीय सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2025 को ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’ ‘Year of Reforms’ घोषित किया है, जिसका उद्देश्य सशस्त्र बलों को तकनीकी रूप से एडवांस बनाना और युद्ध के लिए रेडी फोर्स में बदलना है। यह घोषणा नए साल की पूर्व संध्या पर रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद की गई।

Year of Reforms: 2025 to Mark a Transformative Year for Indian Armed Forces

रक्षा मंत्री ने कहा, “यह कदम देश की रक्षा तैयारियों में अभूतपूर्व प्रगति का आधार बनेगा और 21वीं सदी की चुनौतियों के बीच भारत की सुरक्षा और संप्रभुता सुनिश्चित करेगा।”

Year of Reforms: क्या होगा मुख्य फोकस?

‘सुधार वर्ष’ के तहत कई बड़े बदलावों और परियोजनाओं पर काम किया जाएगा। इनका उद्देश्य सशस्त्र बलों के विभिन्न क्षेत्रों में सुधार करना और उन्हें आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करना है। रक्षा मंत्रालय ने 2025 में जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने का निर्णय लिया है, उनमें शामिल हैं:

1. जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन:

तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल के लिए संयुक्त संचालन को बढ़ावा देना। इसके तहत इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स की स्थापना की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।

2. नए डोमेन में सुधार:

सशस्त्र बलों को साइबर, अंतरिक्ष, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, हाइपरसोनिक तकनीक, और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में महारत दिलाने की योजना बनाई गई है। भविष्य के युद्धों में इन तकनीकों के महत्व को ध्यान में रखते हुए नए टैक्टिक्स और प्रक्रियाएं विकसित की जाएंगी।

Indian Navy warships: नए साल पर नौसेना को बड़ी सौगात, 15 जनवरी को नेवी को मिलेंगे तीन नए योद्धा- नीलगिरि, सूरत और वाग्शीर

3. अधिग्रहण प्रक्रिया में सुधार:

सैन्य साजोसामान खरीद की प्रक्रिया को तेज और सरल बनाया जाएगा, ताकि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को जल्द से जल्द उन्नत क्षमताएं मिल सकें।

4. सार्वजनिक-निजी भागीदारी:

रक्षा क्षेत्र और नागरिक उद्योगों के बीच प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ज्ञान साझा करने को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसमें मेक इन इंडिया पहल के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी को और मजबूत किया जाएगा।

5. वैश्विक रक्षा निर्यातक के रूप में भारत:

भारत को एक विश्वसनीय रक्षा उत्पाद निर्यातक के रूप में स्थापित करने के लिए अनुसंधान और विकास (R&D) तथा विदेशी रक्षा निर्माताओं के साथ साझेदारी की जाएगी। इससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने का मौका मिलेगा।

6. सेवानिवृत्त सैनिकों का कल्याण:

सुधार योजनाओं में पूर्व सैनिकों के कल्याण को प्राथमिकता दी जाएगी। उनके अनुभवों का उपयोग कर सशस्त्र बलों की क्षमताओं को और उन्नत किया जाएगा।

7. भारतीय संस्कृति और आत्मनिर्भरता पर जोर:

सुधार प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति और स्वदेशी क्षमताओं को शामिल करते हुए आधुनिक सैन्य रणनीतियों से सीख ली जाएगी। इसका उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूती से बढ़ना है।

भारतीय सशस्त्र बलों में सुधार की प्रक्रिया नई नहीं है। 1999 के कारगिल युद्ध के बाद कारगिल समीक्षा समिति ने कई सुधारों की सिफारिश की थी। उसी के बाद मुख्य रक्षा अध्यक्ष (CDS) पद का गठन और थिएटर कमांड्स का विचार शुरू हुआ। हालांकि, इन सुधारों को पूरी तरह लागू करने में समय लगा।

Indian Armed Forces ADC reform: नया साल तीनों सेनाओं के लिए होगा गेमचेंजर, अब ऐसे बनेंगे एडीसी, जानें क्या होते हैं Aides-de-Camp?

2020 में चीन के साथ सीमा तनाव के दौरान भारत ने देखा कि युद्ध के नए स्वरूपों के लिए तत्काल बदलाव की जरूरत है। तब से, मेक इन इंडिया , आत्मनिर्भर भारत, और उन्नत हथियार प्रणालियों के विकास पर जोर दिया जा रहा है।

2024 था Year of Tech Absorption

पिछला वर्ष, यानी 2024, भारतीय रक्षा मंत्रालय द्वारा ‘प्रौद्योगिकी अवशोषण का वर्ष’ (Year of Tech Absorption) के रूप में मनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों में उन्नत तकनीकों को शामिल करना और भविष्य की चुनौतियों के लिए उन्हें तकनीकी रूप से मजबूत बनाना था।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): सेना ने दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखने और रणनीतिक निर्णय लेने में AI आधारित उपकरणों का इस्तेमाल किया।
  • ड्रोन और सैटेलाइट: असम बाढ़ के दौरान ड्रोन और सैटेलाइट इमेजिंग से सैकड़ों लोगों को बचाया गया।
  • स्वदेशी निर्माण: DRDO ने उन्नत रडार और हथियार प्रणालियों का सफल परीक्षण किया, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम था।
  • डिजिटल इंटरऑपरेबिलिटी: सेना, नौसेना और वायुसेना ने साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम शुरू किया, जिससे तेज़ और संगठित संचालन संभव हुआ।

2024 ने सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की नींव रखी, जो 2025 के ‘ईयर ऑफ रिफॉर्म्स’ की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

The Year of Reforms marked a significant turning point in our society. These reforms have brought about fundamental changes in various sectors, reshaping our economy, education system, and legal framework. The impact of the Year of Reforms will continue to be felt for years to come, as we strive towards a more progressive and equitable society.

Indian Navy warships: नए साल पर नौसेना को बड़ी सौगात, 15 जनवरी को नेवी को मिलेंगे तीन नए योद्धा- नीलगिरि, सूरत और वाग्शीर

indian Navy warships: Nilgiri, Surat, Vaghsheer to Join Fleet on Jan 15

Indian Navy warships: 15 जनवरी 2025 भारतीय नौसेना के इतिहास में एक ऐतिहासिक दिन बनने जा रहा है। इस दिन नौसेना के बेड़े में तीन अत्याधुनिक युद्धपोत और पनडुब्बी – ‘नीलगिरि’, ‘सूरत’ और ‘वाग्शीर’ को शामिल किया जाएगा। यह आयोजन मुंबई के नौसैनिक डॉकयार्ड में होगा। यह पहली बार है जब एक ही दिन में तीन प्रमुख युद्ध प्लेटफॉर्म्स को कमीशन किया जाएगा। आइए, जानते हैं इन तीनों के बारे में विस्तार से।

indian Navy warships: Nilgiri, Surat, Vaghsheer to Join Fleet on Jan 15

नए कमीशन किए जाने वाले युद्धपोतों में सबसे विशाल है 7,400 टन वजनी गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर ‘सूरत’। इसके बाद आता है 6,670 टन वजनी स्टील्थ फ्रिगेट ‘नीलगिरी’ और 1,600 टन वजनी पनडुब्बी ‘वाग्शीर’। ये सभी अत्याधुनिक सेंसर और शक्तिशाली हथियारों से लैस हैं, जो इन्हें दुश्मनों के लिए बेहद खतरनाक बनाते हैं। हाल ही में मुंबई के मझगांव डॉक (MDL) ने सूरत और नीलगिरी को भारतीय नौसेना को सौंप दिया है।

Indian Navy warships: नीलगिरि (Project 17A स्टील्थ फ्रिगेट)

नीलगिरि, भारतीय नौसेना के प्रोजेक्ट 17A का पहला युद्धपोत है। यह शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स का एडवांस वर्जन है और इसे अत्याधुनिक स्टील्थ तकनीकों के साथ तैयार किया गया है। इसका डिज़ाइन ऐसा है कि इसे दुश्मन के रडार पर पकड़ना बेहद मुश्किल होगा।

indian Navy warships: Nilgiri, Surat, Vaghsheer to Join Fleet on Jan 15 ‘नीलगिरी’ प्रोजेक्ट-17ए के तहत निर्मित हो रहे सात मल्टी-रोल फ्रिगेट्स में पहला है। इन अत्याधुनिक फ्रिगेट्स में से चार को मुंबई के मझगांव डॉक (MDL) में और तीन को कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) में तैयार किया जा रहा है। लगभग 45,000 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे इन फ्रिगेट्स को विशेष रूप से ऐसे डिज़ाइन किया गया है कि इन्हें दुश्मन के लिए ट्रैक करना बेहद कठिन हो।

Indian Navy Warships: भारतीय नौसेना के लिए नया साल होगा खास, 2025 में दो वारशिप और एक पनडुब्बी होगी कमीशन

‘नीलगिरी’ और इसके साथ के सभी सात फ्रिगेट्स को 2026 के अंत तक नौसेना में शामिल करने का लक्ष्य है, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा में बड़ी मजबूती आएगी।

  • रडार से बचने की क्षमता। (Reduced Radar Signature)।
  • एडवांस सेंसर और वीपन सिस्टम।
  • हेलीकॉप्टर संचालन के लिए आधुनिक सुविधाएं, जिसमें सी किंग, चेतक, ALH और MH-60R जैसे हेलीकॉप्टर शामिल
  • महिला अधिकारियों और नौसैनिकों के लिए विशेष आवास की व्यवस्था।

Indian Navy warships: सूरत – प्रोजेक्ट 15बी का अंतिम डेस्ट्रॉयर

सूरत, प्रोजेक्ट 15बी के तहत चौथी और आखिरी स्टील्थ डेस्ट्रॉयर है। यह कोलकाता-क्लास डेस्ट्रॉयर (प्रोजेक्ट 15ए) का एडवांस वर्जन है। इसका डिज़ाइन और निर्माण प्रक्रिया भी पूरी तरह से स्वदेशी है।

indian Navy warships: Nilgiri, Surat, Vaghsheer to Join Fleet on Jan 15

‘सूरत’ भारतीय नौसेना का पहला युद्धपोत है जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक से सुसज्जित है। इस आधुनिक युद्धपोत की तैनाती से नौसेना की संचालन क्षमता में कई गुना वृद्धि होगी। ‘सूरत’ के निर्माण में 72% स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती प्रदान करता है। इसकी लंबाई 164 मीटर है और यह 4,000 नॉटिकल मील तक का सफर करने में सक्षम है।

यह शक्तिशाली युद्धपोत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, बराक-8 मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, 76mm सुपर रैपिड गन, और पनडुब्बी रोधी हथियार जैसे रॉकेट और टॉरपीडो से लैस है, जो इसे बेहद घातक और अद्वितीय बनाते हैं।

  • अत्याधुनिक हथियार और सेंसर से लैस।
  • लंबी दूरी तक दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले की क्षमता।
  • हेलीकॉप्टर ऑपरेशंस के लिए एडवांस सुविधाएं।
  • दुश्मन के जहाज और पनडुब्बियों का पता लगाने और नष्ट करने की क्षमता

indian Navy warships: Nilgiri, Surat, Vaghsheer to Join Fleet on Jan 15

Indian Navy warships: वाग्शीर (स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बी)

वाग्शीर, कलवरी क्लास के तहत बनने वाली छठी और आखिरी पनडुब्बी है। इसे अत्याधुनिक स्कॉर्पीन डिजाइन पर बनाया गया है और यह एक बहुमुखी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी है। इसका डिज़ाइन इसे बेहद शांत और दुश्मन के लिए खतरनाक बनाता है। इसे मझगांव डॉक और फ्रांस की नेवल ग्रुप के सहयोग से बनाया गया है।

‘वाग्शीर’ फ्रांसीसी डिजाइन पर आधारित स्कॉर्पीन या कलवरी-श्रेणी की पनडुब्बी को 23,000 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट-75 के तहत तैयार किया गया है। यह पनडुब्बी अत्याधुनिक तकनीक और स्वदेशी क्षमताओं का अद्भुत संगम है, जो भारत की समुद्री सुरक्षा को और मजबूत बनाएगी।

भारत और फ्रांस फिलहाल तीन और स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण के लिए समझौता वार्ता कर रहे हैं। योजना के अनुसार, पहली नई पनडुब्बी छह वर्षों में तैयार होगी, इसके बाद हर साल एक पनडुब्बी नौसेना में शामिल की जाएगी। यह कदम भारतीय नौसेना की दीर्घकालिक समुद्री रणनीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।

  • एंटी-सबमरीन और एंटी-सरफेस वारफेयर की क्षमता।
  • वायर-गाइडेड टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइल।
  • क्षेत्र निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने की खूबी।
  • भविष्य में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक को शामिल करने की संभावना।
  • यह पनडुब्बी वायर-गाइडेड टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइलों से लैस है, जो इसे समुद्र में बेहद खतरनाक बनाती हैं।

ये तीनों युद्धपोत और पनडुब्बी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) , मुंबई में पूरी तरह से भारत में डिज़ाइन और निर्मित किए गए हैं। यह भारतीय रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी तकनीक की बढ़ती शक्ति का प्रतीक है।

स्टील्थ तकनीक का फायदा

स्टील्थ तकनीक के उपयोग से युद्धपोतों और पनडुब्बियों की रडार पर पकड़ कम हो जाती है, जिससे वे दुश्मन के हमलों से सुरक्षित रहते हैं। नीलगिरि और सूरत में इस तकनीक का इस्तेमाल उनकी प्रभावशीलता को और बढ़ाता है।

महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम

इन जहाजों पर महिला अधिकारियों और नौसैनिकों के लिए विशेष आवास की व्यवस्था की गई है। यह भारतीय नौसेना के महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रोजेक्ट 17 और 17A

शिवालिक क्लास (Project 17): 2000 के दशक की शुरुआत में, शिवालिक क्लास के फ्रिगेट्स को नौसेना में शामिल किया गया। ये युद्धपोत आधुनिक हथियार और सेंसर सिस्टम से लैस थे।
प्रोजेक्ट 17A, शिवालिक क्लास का एडवांस वर्जन है, जिसमें स्टील्थ तकनीक और बेहतर डिज़ाइन शामिल हैं।

प्रोजेक्ट 15, 15A और 15B

1990 के दशक में दिल्ली क्लास (Project 15) के साथ शुरुआत हुई। इसके बाद कोलकाता क्लास (Project 15A) और अब सूरत क्लास (Project 15B) को डिज़ाइन किया गया है। ये सभी डेस्ट्रॉयर अत्याधुनिक हथियार और सेंसर सिस्टम से लैस हैं।

स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजना (Project 75)

कलवरी क्लास: फ्रांस की मदद से यह परियोजना शुरू हुई और भारत ने अब तक पांच स्कॉर्पीन पनडुब्बियां नौसेना में शामिल की हैं। वाग्शीर छठी और अंतिम पनडुब्बी है।

Indian Navy Project-76: क्या है भारतीय नौसेना का ये खास Project-76? समुद्र के नीचे चीन-पाकिस्तान को टक्कर देने की कर रही बड़ी तैयारी!

मार्च के पहले सप्ताह तक आएगा INS तुशील

भारतीय नौसेना की ताकत को बढ़ाने के लिए 3,900 टन वजनी रूसी निर्मित फ्रिगेट INS तुशील अपनी लंबी यात्रा पर है। यह फ्रिगेट बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर से होते हुए भारत आ रही है। अगले साल, मार्च-अप्रैल 2025 में, रूस से एक और फ्रिगेट INS तामल की डिलीवरी की जाएगी, जिससे नौसेना की क्षमता और बढ़ेगी। फिलहाल वह मोरक्को के कासाब्लांका पोर्ट पर है।

वर्तमान में भारतीय नौसेना 130 से अधिक युद्धपोतों और 251 विमानों व हेलीकॉप्टरों का संचालन कर रही है। इसके अलावा, देश के शिपयार्ड में 60 नए युद्धपोत और जहाज निर्माणाधीन हैं। भविष्य की योजना के तहत 31 और युद्धपोतों को मंजूरी दी गई है, जिनमें सात नई पीढ़ी के फ्रिगेट, आठ कॉर्वेट और छह स्टील्थ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां शामिल हैं।

2030 तक युद्धपोतों की संख्या में कमी का खतरा

हालांकि, मौजूदा बेड़े और निर्माण योजनाओं के बावजूद, 2030 तक भारतीय नौसेना के युद्धपोतों की संख्या केवल 155-160 तक ही पहुंचने का अनुमान है। इसका मुख्य कारण भारतीय शिपयार्ड में निर्माण की धीमी प्रक्रिया और पुराने युद्धपोतों का चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटना है।

यह स्थिति नौसेना के लिए बड़ी चुनौती है, खासकर तब जब क्षेत्रीय समुद्री ताकतें अपने बेड़ों का तेजी से विस्तार कर रही हैं। भारतीय नौसेना के सामने अब आवश्यकता है कि वह निर्माण प्रक्रिया में तेजी लाए और अपनी दीर्घकालिक समुद्री सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाए।

The Indian Navy warships are renowned for their exceptional capabilities and strategic importance in the region. Their advanced technology and skilled crew make them a formidable force in maritime operations. With their presence, the Indian Navy upholds national security and contributes to maintaining peace in the waters.

Indian Armed Forces ADC reform: नया साल तीनों सेनाओं के लिए होगा गेमचेंजर, अब ऐसे बनेंगे एडीसी, जानें क्या होते हैं Aides-de-Camp?

Indian Armed Forces ADC Reform: A Gamechanger for 2024! Know About Aides-de-Camp
Credit: Indian Army

Indian Armed Forces ADC reform: भारतीय सशस्त्र बलों में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार के तहत, अब सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों के लिए पर्सनल स्टााफ ऑफिसर यानी एड्स-डे-कैंप यानी Aides-de-Camp (ADC) अब उनकी खुद की सेवा से नहीं, बल्कि दूसरी सर्विसेज से नियुक्त किए जाएंगे। यह नई व्यवस्था 1 जनवरी से लागू हो गई है और इसे तीनों सेवाओं के प्रमुखों ने स्वीकार भी कर लिया है। यह कदम तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है।

Indian Armed Forces ADC Reform: A Gamechanger for 2024! Know About Aides-de-Camp
Credit: Indian Army

Indian Armed Forces ADC reform: क्या काम करते हैं ADC?

ADC यानी पर्सनल स्टाफ ऑफिसर का काम चीफ की आधिकारिक बैठकों और कार्यक्रमों में भाग लेना, शेड्यूलिंग, पत्राचार और अन्य प्रशासनिक कामकाज देखना शामिल है। अब ADC अन्य सर्विसेज से नियुक्त किए जाने पर, यह उम्मीद की जा रही है कि इससे सेवाओं के बीच गहरी समझ और सहयोग को बढ़ावा मिलेगा। इससे पहले, परंपरागत रूप से सेवा प्रमुख अपने ADC को अपनी ही सेवा से चुनते थे, अक्सर उन्हीं यूनिटों से जिनसे उनका व्यक्तिगत जुड़ाव होता था। मॉर्डन मिलिट्री ऑपरेशंस में एकीकृत दृष्टिकोण की जरूरत को देखते हुए यह पहल एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

Indian Army: सेना प्रमुख के दफ्तर की दीवार से गायब हुई यह एतिहासिक फोटो, पूर्व अफसर बोले- क्या भारतीय सेना की गौरवमयी जीत की अनदेखी कर रही सरकार?

सैन्य सूत्रों ने बताया कि इस नए सिस्टम का उद्देश्य सेना के भीतर एक ज्वाइंटनेस (एकजुटता) की संस्कृति को बढ़ावा देना है। डिफेंस सर्विसेज के स्टाफ कॉलेज में पहले ही एक विशेष जॉइंट डिवीजन स्थापित किया गया है, जहां तीनों सेवाओं के अधिकारियों को इंटीग्रेटेड स्ट्रेटेजी और आपसी सहयोग पर प्रशिक्षण दिया जाता है।

Indian Armed Forces ADC reform: इतिहास में ADC की परंपरा

ADC की परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है। उस समय, ADC का चयन मुख्यतः उनकी यूनिट की प्रतिष्ठा और सेवा प्रमुख के साथ उनके संबंधों के आधार पर किया जाता था। सरल शब्दों में कहें तो इतिहास में अब तक, तीनों सेवाओं के प्रमुख अपने ADC को अपनी-अपनी शाखाओं से ही चुनते थे। अक्सर यह चयन उन यूनिट्स से होता था, जिनसे प्रमुखों का व्यक्तिगत जुड़ाव रहा हो। उदाहरण के लिए, एक आर्मी चीफ अपने पुराने रेजिमेंट से किसी अधिकारी को ADC के रूप में चुनते थे। यह न केवल उस प्रमुख की यूनिट के प्रति सम्मान और गर्व का प्रतीक होता था, बल्कि एक तरह से उनकी सर्विस की पहचान भी बनता था।

भारतीय स्वतंत्रता के बाद भी, इस परंपरा को जारी रखा गया। ADC की नियुक्ति एक प्रतिष्ठित जिम्मेदारी मानी जाती थी, जिसमें युवा अधिकारियों को अपने प्रमुख के साथ घनिष्ठ रूप से काम करने और नेतृत्व के गुण सीखने का अवसर मिलता था।

CDS का 200-पॉइंट सुधार एजेंडा

यह नया फैसला चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान की तरफ से सुझाए गए 200-पॉइंट सुधार एजेंडा का हिस्सा है। इस एजेंडा का मुख्य उद्देश्य आर्मर्ड फोर्सेज के बीच एकजुटता और सामंजस्य को बढ़ावा देना है। ADC की नियुक्ति में यह बदलाव भले ही देखने में छोटा लगे, लेकिन महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो तीनों सेवाओं के अधिकारियों को एक-दूसरे के कार्य पद्धति को समझने का अवसर देगा।

बता दें कि CDS ने पहले भी कई बार यह स्पष्ट किया है कि आने वाले समय में वार ऑपरेशंस के लिए तीनों सेनाओं के बीच सामूहिकता और एकीकृत दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

सूत्रों ने बताया कि तीनों सेनाओं – थलसेना, नौसेना और वायुसेना – के बीच तालमेल आज के समय में और भी जरूरी हो गया है। मॉर्डर्न वारफेयर सिस्टम में आपसी कॉर्डिनेशन और इनफॉरमेशन का साझा करना बेहद जरूरी हो गया है। इसीलिए, ADC की इस नई व्यवस्था से सेवाओं के बीच एक नई समझ और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिलेगा।

इस नई व्यवस्था के तहत, ADC अब विभिन्न सेवाओं से आएंगे, जिससे उन्हें अन्य सेवाओं के कामकाज और कार्यशैली को जानने और समझने का मौका मिलेगा। इससे सेवा प्रमुखों और ADC के बीच एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित होगा, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण में योगदान करेगा।

थिएटर कमांड्स की शुरुआत

भारतीय सशस्त्र बलों में इंटीग्रेटेड कल्चर की शुरुआत हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी है। थियेटर कमांड्स की थ्योरी में जहां तीनों सेनाओं के ऑपरेशंस को एकसाथ लाने पर जोर दिया जा रहा है, इसका प्रमुख उदाहरण है। ADC के इस बदलाव को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

Indian Armed Forces ADC reform: क्या होंगे फायदे?

यह पहल केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि इससे तीनों सेवाओं के अधिकारियों को एक-दूसरे की कार्यशैली और संस्कृति को समझने का मौका भी मिलेगा। उदाहरण के लिए, अगर किसी आर्मी चीफ का ADC वायुसेना से आता है, तो वह सेना की प्रक्रियाओं और प्रोटोकॉल के साथ-साथ वायुसेना की ताकतों और तरीकों को भी करीब से देख और समझ सकता है।

तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने इस पहल का स्वागत किया है। सेना प्रमुख, नौसेना प्रमुख और वायुसेना प्रमुख ने इसे अपनी स्वीकृति देते हुए कहा कि यह तीनों सेनाओं के बीच सहयोग और तालमेल को मजबूत करेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “ADC का अन्य सेवा से चयन, न केवल सशस्त्र बलों की एकता को बढ़ावा देगा, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मिसाल बनेगा।”

सशस्त्र बलों में सुधार की दिशा में अन्य कदम

एडीसी को लेकर उटाया गया यह कदम अकेला नहीं है। इसके साथ ही, सशस्त्र बलों में कई अन्य सुधार किए जा रहे हैं:
1. संयुक्त थिएटर कमांड : तीनों सेवाओं को एकीकृत करने के लिए थिएटर कमांड की स्थापना पर विचार हो रहा है।
2. साझा प्रशिक्षण कार्यक्रम : तीनों सेवाओं के अधिकारियों को साझा प्रशिक्षण देने के लिए नई नीतियां बनाई जा रही हैं।
3. तकनीकी सहयोग : आधुनिक तकनीकों और उपकरणों को साझा रूप से उपयोग करने पर जोर दिया जा रहा है।

नए कदम की चुनौतियां और संभावनाएं

जानकारों का कहना है कि हालांकि यह कदम सशस्त्र बलों के बीच एकता को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है, लेकिन इसके लागू करने में कुछ चुनौतियां भी आ सकती हैं। उदाहरण के लिए, अलग-अलग सेवाओं के अधिकारियों के बीच प्राथमिकताओं और कार्यशैली में अंतर हो सकता है। लेकिन इसे दूर करने के लिए नियमित संवाद और संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम मददगार हो सकते हैं।

The Indian Armed Forces are currently undergoing a reform in their ADC system. This reform aims to enhance the efficiency and effectiveness of the Armed Forces by streamlining the ADC process. As part of this reform, comprehensive measures are being implemented to ensure a smooth transition and improved performance. The Indian Armed Forces are optimistic that these reforms will significantly contribute to their overall operational capabilities.

ECHS card suspension: ECHS ने पेंशनर्स को क्यों जारी किया ‘कारण बताओ नोटिस’, बंद होगा कार्ड, लौटाना होगा इलाज का खर्च?

ECHS Card Suspension: Why Pensioners Received ‘Show Cause Notices’?
Credit: AI Image for Rep. Only

ECHS card suspension: भारतीय सेना के रिटायर्ड जवानों और उनके परिवारों के लिए चिकित्सा सुविधाओं की रीढ़ कहे जाने वाले ECHS (Ex-Servicemen Contributory Health Scheme) ने हाल ही में ऐसा कदम उठाया है, जिसने पेंशनर्स के बीच चिंता और असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। कई पेंशनर्स को ‘कारण बताओ नोटिस’ भेजा गया है, जिसमें उनसे पूछा गया है कि उन्होंने इलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों का चुनाव क्यों किया। इस नोटिस में यह भी कहा गया है कि उनकी चिकित्सा पर हुए खर्च को वापस लिया जा सकता है।

ECHS Card Suspension: Why Pensioners Received ‘Show Cause Notices’?
Credit: AI Image for Rep. Only

ECHS card suspension: Why did ECHS send notice? : क्यों भेजे ECHS ने नोटिस

ECHS भारत सरकार की एक स्वास्थ्य योजना है, जो पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करती है। योजना के तहत, पेंशनर्स और उनके परिवारों को सरकारी या ECHS सूचीबद्ध अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा दी जाती है।

ECHS: आयुष्मान कार्ड को लेकर ईसीएचएस ने पूर्व-सैनिकों को किया सावधान! अगर की ये गलती तो जिंदगी भर पड़ेगा पछताना

हालांकि, हाल ही में कई पेंशनर्स को ‘कारण बताओ नोटिस’ भेजे गए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि कुछ पेंशनर्स ने योजना के दिशानिर्देशों का पालन किए बिना निजी अस्पतालों में इलाज करवाया। ECHS अधिकारियों का कहना है कि ये कदम योजना के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है।

ECHS card suspension: नोटिस भेजने के पीछे की वजह

ECHS के नियम कहते हैं कि इलाज केवल सूचीबद्ध अस्पतालों में होना चाहिए। अगर किसी आपातकालीन स्थिति में प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवाना पड़े, तो इसका खर्चा ECHS से मंजूर कराना होगा। लेकिन, ECHS को शिकायतें मिलीं कि कई पेंशनर्स ने निजी अस्पतालों में इलाज कराकर बढ़े हुए खर्चे का दावा किया है।

ECHS ने ऐसे पेंशनर्स को नोटिस जारी करते हुए उनसे पूछा है कि क्यों न उनका कार्ड अस्थायी रूप से बंद कर दिया जाए।

पेंशनर्स की ये हैं दिक्कतें

कई पेंशनर्स का कहना है कि ECHS क्लीनिक में अक्सर डॉक्टर मौजूद नहीं होते, दवाइयों की कमी रहती है और कई जरूरी टेस्ट वहां उपलब्ध नहीं हैं। यही कारण है कि उन्हें प्राइवेट अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। पेंशनर्स का यह भी कहना है कि क्लेम प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि उसमें कई बार तकनीकी खामियां रह जाती हैं। उनका यह भी कहना है कि इमरजेंसी के दौरान उन्हें यह तय करने में मुश्किल होती है कि ECHS क्लीनिक जाएं या सीधे प्राइवेट अस्पताल।

राजस्थान के एक रिटायर्ड मेजर का कहना है, “मैंने कई बार ECHS क्लीनिक में कोशिश की, लेकिन मुझे हर बार किसी ना किसी कारण से लौटा दिया गया। मजबूरी में मुझे प्राइवेट अस्पताल जाना पड़ा। अब अगर ये नोटिस मुझे खर्च वापस करने को कहते हैं, तो मैं क्या करूं?”

ECHS Scam: ईसीएचएस योजना में घोटालों से परेशान सेना! रोक लगाने के लिए जारी की ये नई गाइडलाइंस

सरकारी अस्पतालों में लंबी वेटिंग

ECHS योजना में कई सरकारी और पैनल में शामिल अस्पतालों को जोड़ा गया है, लेकिन इनकी सेवाएं सीमित हैं। सरकारी अस्पतालों में लंबी वेटिंग लिस्ट और जरूरी संसाधनों की कमी के चलते मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।

दूसरी ओर, प्राइवेट अस्पताल मरीजों को तत्काल सुविधाएं देते हैं, लेकिन इसके बदले में मोटी फीस लेते हैं। पेंशनर्स के अनुसार, “अगर कोई मेडिकल इमरजेंसी हो और ECHS सुविधाएं उपलब्ध न हों, तो हमारे पास और क्या विकल्प बचता है?”

प्राइवेट अस्पतालों और पेंशनर्स के बीच मिलीभगत

ECHS अधिकारियों का कहना है कि कुछ मामलों में यह देखा गया है कि प्राइवेट अस्पतालों और पेंशनर्स के बीच मिलीभगत चल रही है। इसमें फर्जी बिल तैयार किए जाते हैं और योजना का दुरुपयोग होता है। अधिकारियों का कहना है कि नोटिस जारी करने का उद्देश्य ऐसे मामलों की जांच करना और योजना की पारदर्शिता बनाए रखना है। ECHS अधिकारियों ने कहा है कि यह कदम किसी को परेशान करने के लिए नहीं उठाया गया है। उनका कहना है कि योजना का उद्देश्य पेंशनर्स को स्वास्थ्य सेवाएं देना है।

ECHS Card Suspension: Why Pensioners Received ‘Show Cause Notices’?

ECHS card suspension: क्या ECHS कार्ड का होगा निलंबन

जिन पेंशनर्स को नोटिस मिला है, उनके लिए ECHS ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर वे उचित जवाब नहीं दे पाए, तो उनका कार्ड अस्थायी रूप से बंद किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि वे ECHS की स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाएंगे। ECHS ने यह भी संकेत दिया है कि यदि पेंशनर्स की दलीलें संतोषजनक नहीं हुईं, तो उन्हें इलाज का खर्च खुद वहन करना पड़ सकता है। इससे पेंशनर्स के बीच चिंता का माहौल बन गया है।

ECHS ने कहा है कि सभी पेंशनर्स को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलेगा। लेकिन अगर पेंशनर्स उचित कारण दे पाते हैं, तो उनके कार्ड को निलंबित नहीं किया जाएगा। वहीं, भविष्य में नियमों को स्पष्ट करने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।

देश के लिए अपनी जिंदगी दी, अब इलाज का पैसा वापस मांग रहे

वहीं, कई पेंशनर इस नोटिस के आने के बाद से परेशान हैं। कई पेंशनर्स को पहले ही अपने इलाज पर मोटा खर्च उठाना पड़ता है। अब अगर उन्हें वह खर्च वापस करना पड़ा, तो यह उनके लिए और भी मुश्किल हो जाएगा।

रिटायर्ड कर्नल अशोक शर्मा कहते हैं कि उन्होंने हाल ही में ECHS के जरिए इलाज करवाया था, वह बताते हैं,

“मेरे क्षेत्र में ECHS का नजदीकी अस्पताल 40 किलोमीटर दूर है। जब मेरी पत्नी को अचानक स्वास्थ्य समस्या हुई, तो मुझे नजदीकी प्राइवेट अस्पताल जाना पड़ा। अब मुझे नोटिस मिला है कि मैंने नियम तोड़ा है। यह मेरे लिए बहुत कठिनाई पैदा कर रहा है।”

वहीं रिटायर्ड सूबेदार राम सिंह का कहना है, “ECHS के नियम इतने जटिल हैं कि उन्हें समझना आसान नहीं है। मेरे इलाज का बिल 80,000 रुपये था, लेकिन अब ECHS कह रही है कि मैं इसे खुद भरूं। यह अन्यायपूर्ण है।”

दिल्ली के एक रिटायर्ड सूबेदार ने बताया, “हमने देश के लिए अपनी जिंदगी दी। अब जब हमें स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है, तो यह योजना ही हमारे खिलाफ हो गई है। मैं अपनी पेंशन से इलाज का खर्चा कैसे वापस कर सकता हूं?”

क्या कहते हैं जानकार?

ECHS के इस फैसले पर विशेषज्ञ भी अपनी राय दे रहे हैं। रक्षा मामलों के जानकार कर्नल (सेवानिवृत्त) मनोज त्रिपाठी का कहना है, “ECHS एक महत्वपूर्ण योजना है, लेकिन इसके संचालन में पारदर्शिता और सरलता होनी चाहिए। पेंशनर्स को अनावश्यक परेशान करना सही नहीं है।”

वहीं, ECHS से जुड़े अस्पतालों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। कई पेंशनर्स का कहना है कि सूचीबद्ध अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती। इसके अलावा, कई बार अस्पताल जरूरी सेवाएं देने में भी असमर्थ रहते हैं।

The ECHS card suspension has raised concerns about the role of ECHS-affiliated hospitals. Many pensioners claim that the quality of treatment in listed hospitals is not satisfactory. Additionally, hospitals often struggle to provide essential services.

China Military-proof 5G: चीन लाया दुनिया का पहला मिलिट्री-प्रूफ 5G नेटवर्क, एक साथ 10,000 रोबोट्स को होंगे कनेक्ट

china-military-proof-5g-network-to-connect-10000-robots

China Military-proof 5G: 6वीं पीढ़ी के फाइटर जेट और दुनिया का सबसे बड़ा एंफीबियस शिप पेश करने के बाद चीन ने दुनिया का पहला ऐसा मोबाइल 5G बेस स्टेशन पेश किया है, जो युद्ध के मैदान पर तैनाती के लिए तैयार है। इस तकनीक को कठोर परीक्षणों के बाद मंजूरी दी गई है। चीन के मोबाइल कम्युनिकेशंस ग्रुप और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने इसे डेवलप किया है। यह नेटवर्क 3 किलोमीटर के दायरे में 10,000 यूजर्स को हाई-स्पीड, लो-लेटेंसी और अत्यधिक सुरक्षित डेटा सर्विसेज प्रदान कर सकता है।

china-military-proof-5g-network-to-connect-10000-robots

कैसे काम करेगा यह China Military-proof 5G?

PLA द्वारा उपयोग किया जाने वाला यह 5G बेस स्टेशन ऐसे समय में भी अपनी कनेक्टिविटी बनाए रख सकता है जब सैनिक पहाड़ी क्षेत्रों या शहरी इलाकों में 80 किमी/घंटा (50 मील/घंटा) की गति से आगे बढ़ रहे हों। यहां तक कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हस्तक्षेप (electromagnetic interference) के दौरान भी यह 10 जीबी (गीगाबिट) प्रति सेकंड की डेटा स्पीड और 15 मिलीसेकंड से कम विलंबता (latency) प्रदान कर सकता है।

इस तकनीक के बाारे में जानकारी 17 दिसंबर को प्रकाशित एक शोधपत्र में दी गई है। इसे PLA की 31567 यूनिट के वरिष्ठ इंजीनियर हाउ जिये और उनकी टीम ने चीनी जर्नल टेलीकम्युनिकेशन साइंस में साझा किया है।

China Military-proof 5G और आम 5G में अंतर

मिलिट्री 5G, नागरिक 5G तकनीक से कई मामलों में अलग है। PLA को ऐसी तकनीक की आवश्यकता है, जो ग्राउंड बेस स्टेशनों की गैरमौजूदगी में या सैटेलाइट के सिग्नल  बाधित होने की स्थिति में भी बिना रुके कनेक्टिविटी प्रदान कर सके।

China-India Talks: बड़ा खुलासा! भारत-चीन वार्ता से पहले भाजपा के इस थिंकटैंक ने किया था बीजिंग का सीक्रेट दौरा, कूटनीतिक संबंधों की बहाली को लेकर की थी बात

इसके अलावा, सैन्य वाहनों पर लगाए गए एंटीना की ऊंचाई 3 मीटर (9.8 फीट) से अधिक नहीं हो सकती, ताकि यह इमारतों या पेड़ों से टकराए बिना काम कर सके। हालांकि, यह सीमित ऊंचाई हाई क्वॉलिटी वाले सिग्नल की कवरेज रेंज को प्रभावित करती है, लेकिन PLA ने इसे कुशलता से मैनेज किया है।

कैसे बदलेगा युद्ध का स्वरूप?

इस तकनीक के जरिए चीन के युद्ध के मैदान पर बड़े पैमाने पर इंटेलिजेंट मशीनों का इस्तेमाल कर सकेगा। चीन दुनिया की सबसे बड़ी अनमैन्ड आर्मी (बिना पायलट या चालक की सेना) बना रहा है। इसमें शक्तिशाली और किफायती ड्रोन, रोबोटिक डॉग्स और अन्य अनमैन्ड प्लेटफॉर्म शामिल हैं। यह तकनीक उन ड्रोन, रोबोट डॉग्स और अन्य मानव रहित युद्ध प्लेटफॉर्म के लिए डेटा एक्सचेंज की समस्या को हल कर सकती है, जिनकी संख्या भविष्य के युद्धक्षेत्र में सैनिकों से अधिक हो सकती है। यह तकनीक इन रोबोट्स के बीच बड़े पैमाने पर डेटा का आदान-प्रदान करने में सक्षम है, जो कि पारंपरिक सैन्य संचार तकनीकों के लिए एक चुनौती थी। क्योंकि ड्रोन और रोबोट के संचालन के लिए बड़ी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है, जिसे पारंपरिक सैन्य संचार तकनीक पूरा नहीं कर पाती।

China on LAC: पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर चीन की बड़ी तैयारी; चीनी सेना के लिए बना रहा किला, रखेगा बड़े हथियारों का जखीरा

चीन ने 5G तकनीक में लंबे समय से अग्रणी भूमिका निभाई है। 2019 में, चीन ने नागरिक 5G नेटवर्क को बड़े पैमाने पर शुरू किया। हालांकि, मिलिट्री 5G का विकास नागरिक उपयोग के लिए 5G तकनीक की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल है।

वहीं, चीन की इस प्रौद्योगिकी प्रगति ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। मिलिट्री 5G का इस्तेमाल केवल रक्षा तक ही सीमित नहीं है; यह संभावित रूप से निगरानी और साइबर युद्ध जैसे क्षेत्रों में भी भूमिका निभा सकता है।

यह तकनीक विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर और भारत-चीन सीमा जैसे विवादित क्षेत्रों में PLA की क्षमताओं को बढ़ाने में मदद कर सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह तकनीकी उन्नति एक रणनीतिक चुनौती बन सकती है, क्योंकि चीन इसे सीमा क्षेत्रों में अपनी कम्यूनिकशन कैपेबिलिटीज को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है।

चीन का एंफीबियस असाल्ट शिप “सिचुआन”

हाल ही में चीनी नौसेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) ने शंघाई के एक शिपयार्ड में Type 076 उभयचर हमला जहाज (Amphibious Assault Ship) लॉन्च किया। इसे “सिचुआन” नाम दिया गया है, जो दक्षिण-पश्चिमी चीन के प्रांत पर है। इस जहाज का वजन 40,000 टन से अधिक (फुल-लोड डिस्प्लेसमेंट) है। वहीं इसमें डुअल-आइलैंड सुपरस्ट्रक्चर और फुल-लेंथ फ्लाइट डेक लगा है। इसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट और अरेस्टर टेक्नोलॉजी लगी है, जो इसे फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट, हेलिकॉप्टर और एंफीबियस उपकरण ले जाने में सक्षम बनाती है। इस जहाज की तकनीक की तुलना केवल अमेरिका के USS Gerald R Ford से की जा सकती है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम का उपयोग करता है।

चीन का छठवीं पीढ़ी का फाइटर जेट J-36

असाल्ट शिप लॉन्च करने से एक दिन पहले ही सोशल मीडिया पर चीन के छठी पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट की अनवेरिफाइड तस्वीरें वायरल हुईं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस जेट को J-36 नाम दिया गया है।

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक, इस एयरक्राफ्ट को सिचुआन प्रांत के चेंगदू शहर के ऊपर दिन के उजाले में उड़ते देखा गया, जिसमें इसे पांचवीं पीढ़ी के J-20 फाइटर जेट के साथ उड़ान भरते हुए देखा गया। J-36 का ट्रायएंगुलर टेललेस डिज़ाइन से स्टील्थ और रफ्तार मिलती है।

हालांकि चीन की सरकार और सैन्य अधिकारियों ने इस जेट पर आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। हालांकि, इसके खुलासे का वक्त माओ जेडॉन्ग के जन्मदिन (जनवादी गणराज्य के संस्थापक) पर किया गया, जो एक रणनीतिक संदेश देता है।

यह जेट चीन की मिलिट्री एविएशन कैपेबिलिटी में एक बड़ा कदम है और अमेरिके हवई वर्चस्व के लिए एक चुनौती पेश कर सकता है। नवंबर में आयोजित झुहाई एयरशो में चीन ने Baidi White Emperor ‘B Type’ छठी पीढ़ी के फाइटर जेट का भी खुलासा किया था।

China’s military-proof 5G technology is a significant development in the telecommunications industry. This advanced network infrastructure ensures robust security measures that can withstand potential military interference. Its implementation will strengthen both national and international communication systems, enabling a safer and more reliable digital future.

Explainer Nimisha Priya: कौन हैं निमिषा प्रिया और क्यों हो रही है उनकी फांसी की सजा पर चर्चा? क्या ‘ब्लड मनी’ से बचेगी उनकी जान?

Nimisha Priya Case: Iran Offers Help, Promises Talks with Houthis for Clemency

Explainer Nimisha Priya: भारत ने मंगलवार को कहा कि वह यमन में मौत की सजा का सामना कर रही केरल की नर्स निमिषा प्रिया के मामले में सभी संभावित विकल्पों को तलाशने में हरसंभव मदद कर रहा है। निमिषा प्रिया पर एक यमनी नागरिक की हत्या का आरोप है और उन्हें इस मामले में मौत की सजा सुनाई गई है। विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा, “हम यमन में निमिषा प्रिया को दी गई सजा से अवगत हैं। हमें जानकारी है कि प्रिया का परिवार इस मामले में प्रासंगिक विकल्पों की तलाश कर रहा है। हालांकि, उनकी जिंदगी एक अप्रत्याशित मोड़ लेगी, यह किसी ने सोचा नहीं था। निमिषा का नाम एक हत्या के मामले में आया, जिसने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। आईए जानते हैं कौन हैं निमिषा प्रिया?

Explainer Nimisha Priya: Who is Nimisha Priya and Can 'Blood Money' Save Her?

Explainer Nimisha Priya: कौन हैं निमिषा प्रिया

दरअसल निमिषा प्रिया एक भारतीय नर्स हैं, जो केरल के पलक्कड़ जिले के कोल्लेंगोड की रहने वाली हैं। अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने और बेहतर जीवन जीने के सपने के साथ, वह 2008 में यमन चली गईं। भारत में नर्सों के लिए खाड़ी देशों में काम करना बेहतर वेतन और करियर ग्रोथ के लिए एक बड़ा मौका होता है। वहां उन्होंने हेल्थ सेक्टर में काम किया और वहां एक अच्छे करियर की शुरुआत की। निमिषा का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था; उनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे, और उनके पति व बेटी 2014 में आर्थिक तंगी के चलते भारत लौट आए।

यमन में काम करने के दौरान, निमिषा ने कई अस्पतालों में नौकरी दी और 2015 में अपना खुद का क्लिनिक खोलने की योजना बनाई। इसके लिए उन्हें एक यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी की मदद लेनी पड़ी, क्योंकि यमन के कानून के अनुसार केवल वहां के नागरिक ही क्लिनिक खोल सकते हैं।

यमन में शुरू किया खुद का क्लिनिक

2015 में, तलाल महदी ने निमिषा के साथ मिलकर क्लिनिक शुरू किया। हालांकि, इस साझेदारी में सब कुछ ठीक नहीं रहा और यह साझेदारी जल्द ही कड़वाहट में बदल गई। निमिषा के परिवार के अनुसार, निमिषा के परिवार का आरोप है कि महदी ने दस्तावेजों में हेरफेर कर क्लिनिक का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और निमिषा को उनका हिस्सा देने से इनकार कर दिया। उसने यह भी दावा किया कि निमिषा उसकी पत्नी हैं, और इसके लिए उसने निमिषा की शादी की तस्वीरों का गलत इस्तेमाल भी किया। तलाल ने निमिषा का पासपोर्ट भी जब्त कर लिया, जिससे वह यमन छोड़कर भारत नहीं आ सकीं।

निमिषा की शिकायत पर पुलिस ने दिखाई बेरुखी

2017 में, दोनों के बीच कड़वाहट औऱ बढ़ गई। तलाल ने न केवल निमिषा के पैसे और गहने हड़प लिए, बल्कि उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया। निमिषा ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन यमन की पुलिस ने उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया। इसके उलट, उन्हें छह दिन तक जेल में रखा गया। जेल से लौटने के बाद, तलाल का उत्पीड़न और बढ़ गया।

पासपोर्ट पाने के लिए तलाल को खिलाई बेहोशी की दवा

तलाल से अपना पासपोर्ट वापस पाने की कोशिश में, निमिषा ने कथित तौर पर उसे बेहोशी की दवा दी। दुर्भाग्यवश, दवा की अधिक मात्रा के कारण तलाल की मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद, निमिषा यमन से भागने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 2018 में उन्हें हत्या का दोषी ठहराया गया और 2020 में सना की एक अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। निमिषा ने इसे आत्मरक्षा का कदम बताया, क्योंकि महदी ने उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया था और वह उन्हें लगातार परेशान कर रहा था। वहीं, महदी के परिवार ने निमिषा पर हत्या का आरोप लगाया। यमन पुलिस ने निमिषा को गिरफ्तार कर लिया, और उन्हें 2018 में हत्या का दोषी ठहराया गया।

Republic Day chief guest: इस बार किस देश के राष्ट्राध्यक्ष होंगे 76वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि? इन नामों की चल रही है चर्चा

मौत की सजा और “ब्लड मनी”

2020 में, सना की अदालत ने निमिषा प्रिया को फांसी की सजा सुनाई। उनके परिवार और वकीलों ने अपील की, लेकिन नवंबर 2023 में यमन की सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल ने उनकी अपील खारिज कर दी। लेकिन “ब्लड मनी” (खून बहाने का मुआवजा) के जरिए माफी की संभावना खुली रखी। यमन की शरिया कानून व्यवस्था के तहत, यदि पीड़ित का परिवार मुआवजा स्वीकार कर ले, तो आरोपी की सजा माफ की जा सकती है।

ब्लड मनी: अंतिम उम्मीद

यमन में ब्लड मनी एक प्राचीन प्रथा है, जिसे अरबी में “दीया” कहा जाता है। जहां आरोपी मृतक के परिवार को आर्थिक मुआवजा देकर माफी मांग सकता है। निमिषा का परिवार और समर्थक अब महदी के परिवार को ब्लड मनी के जरिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं। मामले से जुड़े एक वकील का कहना है कि यदि महदी का परिवार ब्लड मनी स्वीकार कर लेता है, तो निमिषा की फांसी टल सकती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में समय और बड़ा धनराशि जुटाना एक बड़ी चुनौती है। निमिषा के परिवार ने ब्लड मनी के रूप में मुआवजा देने की पेशकश की है। इसके लिए उन्होंने करीब 70 लाख रुपये जुटाने की कोशिश शुरू की है।

भारत सरकार से मदद की गुहार

भारत सरकार इस मामले में सक्रिय है। विदेश मंत्रालय ने यमन सरकार के साथ संपर्क किया है। साथ ही, यमन स्थित भारतीय दूतावास निमिषा को कानूनी मदद उपलब्ध करा रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयसवाल ने कहा, “सरकार इस मामले में हर संभव सहायता प्रदान कर रही है। भारत सरकार ने निमिषा के मामले को गंभीरता से लिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सरकार इस मामले में सभी संभव मदद कर रही है। यमन में भारतीय दूतावास निमिषा की कानूनी सहायता और अन्य विकल्पों पर काम कर रहा है।”

निमिषा के परिवार ने भी भारतीय नागरिकों और सरकार से मदद की अपील की है। उनकी मां ने कहा, “तलाल ने मेरी बेटी को झूठे कागजातों और बंदूक के दम पर प्रताड़ित किया। अगर उसे न्याय नहीं मिला, तो उसकी जान चली जाएगी।”

निमिषा की मां का कहना है कि उनकी बेटी ने अपनी जान बचाने के लिए यह कदम उठाया। वह कहती हैं, “महदी ने हमारी बेटी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। उसने हमारे परिवार को तोड़ने की कोशिश की और हमारी बेटी को बंदी बना रखा था।”

परिवार का दावा है कि निमिषा ने यमन पुलिस से शिकायत भी की थी, लेकिन महदी के प्रभाव के चलते कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सोशल मीडिया पर अभियान

जब निमिषा प्रिया की कहानी भारत में आई, तो यह मामला तेजी से सुर्खियों में आ गया। कई लोगों ने उनकी फांसी की सजा को लेकर सवाल उठाए। मानवाधिकार संगठनों और उनके परिवार ने उनकी रिहाई के लिए आवाज उठाई। सोशल मीडिया पर #SaveNimishaPriya नामक अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें लोगों से मुआवजे के लिए धन जुटाने की अपील की जा रही है। कई मानवाधिकार संगठनों ने भी निमिषा को माफी दिए जाने की मांग की है। केरल में कई सामाजिक संगठनों ने सरकार से अपील की कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे। लोगों का मानना है कि निमिषा के साथ न्याय होना चाहिए और उन्हें एक और मौका मिलना चाहिए।

क्या होगा आगे?

क्या निमिषा प्रिया अपनी फांसी की सजा से बच पाएंगी? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। निमिषा की सजा को लेकर अंतिम फैसला यमन सरकार और खालिद के परिवार की सहमति पर निर्भर करेगा। भारत सरकार और सामाजिक संगठन लगातार इस मामले पर नजर रख रहे हैं। निमिषा प्रिया का मामला सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और उनके अधिकारों पर भी सवाल खड़ा करता है। यह घटना उन महिलाओं के लिए भी एक उदाहरण है, जो विदेशों में काम करते हुए मुश्किल परिस्थितियों का सामना करती हैं।

Explainer Nimisha Priya is currently a topic of discussion due to her sentencing to death. The article aims to shed light on who Nimisha Priya is and why she is facing capital punishment. Will her life be spared from ‘Blood Money’?

LCA Tejas Mk2 delay: तेजस Mk-2 प्रोजेक्ट के लिए नई चुनौती! बढ़ सकती हैं GE-414 इंजन की कीमतें, वायुसेना की तैयारियों पर पड़ेगा असर!

LCA Tejas Mk2 Delayed: Rising GE-414 Engine Costs Impact IAF Readiness!

LCA Tejas Mk2 delay: जहां चीन एक तरफ छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की टेस्टिंग कर रहा है, वहीं भारत के चौथी पीढ़ी के फाइटर जेट्स के डेवलपमेंट की राह में रोड़े खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान LCA Tejas Mk2 के लिए अमेरिकी कंपनी से GE-414 इंजन की सप्लाई को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस से इंजन की सप्लाई को लेकर की गई डील में अब नए GE-414 इंजन की कीमत बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। कीमतों को लेकर अब अमेरिकी कंपनी और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच इस पर चर्चा जारी है।

LCA Tejas Mk2 Delayed: Rising GE-414 Engine Costs Impact IAF Readiness!

बता दें कि LCA Mark-1A में इस्तेमाल होने वाले GE-404 इंजन की सप्लाई में पहले ही 18 महीने से अधिक की देरी हो चुकी है। अब यह सप्लाई मार्च 2025 से पहले शुरू होने की उम्मीद नहीं है। सूत्रों के अनुसार, GE-414 इंजन सौदे की कीमत इस देरी और सप्लाई चेन की चुनौतियों के कारण बढ़ सकती है। अमेरिकी निर्माता कंपनी ने सप्लाई चेन से जुड़ी समस्याओं को इस देरी की वजह बताया है।

The delay in the development of LCA Tejas Mk2 is primarily due to the necessary integration of the GE-414 engine. The incorporation of this engine is crucial for enhancing the performance and capabilities of the aircraft.

क्यों जरूरी है GE-414 इंजन?

GE-414 इंजन प्रोजेक्ट भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए बेहद अहम है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य भारत को 4th जनरेशन का लड़ाकू विमान विकसित करने में आत्मनिर्भर बनाना है। हालांकि, GE-404 इंजन की देरी और अन्य तकनीकी दिक्कतों के चलते यह कार्यक्रम प्रभावित हो रहा है।

GE-414 इंजन 98 किलो न्यूटन की ताकत वाला एडवांस इंजन है, जिसे LCA Mk 2 के लिए डिजाइन किया गया है। भारतीय वायुसेना को अपनी ऑपरेशनल कैपेबिलिटी बनाए रखने और मॉर्डर्न वारफेयर का सामना करने के लिए इन विमानों की सख्त जरूरत है।

इंजन आपूर्ति में देरी का असर न केवल LCA मार्क 1A और मार्क 2 परियोजनाओं पर पड़ा है, बल्कि इंजन सप्लाई में हो रही देरी ने भारतीय वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारियों को भी प्रभावित किया है। HAL और रक्षा मंत्रालय के बीच चल रही चर्चाओं के बावजूद, समय पर इंजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने में चुनौतियां बनी हुई हैं। वायुसेना ने पहले ही 83 LCA Mark-1A विमानों का ऑर्डर दिया है और 97 और विमानों की आवश्यकता पर काम चल रहा है।

LCA Tejas Mk2 Delayed: Rising GE-414 Engine Costs Impact IAF Readiness!

तेजस के प्रोडक्शन में देरी पर संसदीय समिति ने जताई नाराजगी

भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने और स्क्वाड्रन की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से संसद की स्थायी रक्षा समिति ने तेजस लड़ाकू विमानों के उत्पादन में हो रही देरी पर चिंता जाहिर की है। समिति ने शीतकालीन सत्र के दौरान रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) से इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए कदम उठाए। यह सिफारिश समिति के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद राधा मोहन सिंह की अध्यक्षता में पेश की गई रिपोर्ट में की गई है।

HAL को वायुसेना के लिए 83 तेजस मार्क-1ए लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दिया गया था, जिसकी कुल लागत 48,000 करोड़ रुपये है। इन विमानों की डिलीवरी मार्च 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक एक भी विमान वायुसेना को सौंपा नहीं गया है। समिति ने इस देरी पर गहरी चिंता जताई है और HAL को अपनी उत्पादन क्षमता में सुधार करने का निर्देश दिया है।

LCA Tejas Mk2 delay: वायुसेना में स्क्वाड्रन की कमी

रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान और चीन के साथ संभावित दो-फ्रंट युद्ध की तैयारी के लिए 42 फाइटर स्क्वाड्रन की जरूरत है। हालांकि, फिलहाल वायुसेना के पास केवल 31 सक्रिय स्क्वाड्रन हैं, जिनमें प्रत्येक में 16-18 लड़ाकू विमान शामिल हैं। यह कमी भारतीय सुरक्षा रणनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

1983 में शुरू हुआ था LCA कार्यक्रम

भारत के हल्के लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम 1983 में शुरू हुआ था। तेजस LCA (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू विमान है, जिसे 2001 में पहली बार उड़ाया गया। इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय वायुसेना को स्वदेशी तकनीक से लैस करना और विदेशी विमानों पर निर्भरता को कम करना था। तेजस के डेवलपमेंट में कई तकनीकी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन HAL और DRDO ने मिलकर इसे सफल बनाया। वर्तमान में LCA मार्क 1A भारतीय वायुसेना का हिस्सा है और मार्क 2 तथा AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) परियोजनाएं प्रगति पर हैं।

हालांकि, इंजन का मुद्दा लंबे समय से इस परियोजना के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा है। शुरुआत में डीआरडीओ के बनाए स्वदेशी Kaveri इंजन का इस्तेमाल करने की योजना थी, लेकिन वह तकनीकी कमियों और जरूरी थ्रस्ट पावर न होने के कारण यह सफल नहीं हो पाया। इसके बाद भारत ने अमेरिकी GE-404 और GE-414 इंजन पर भरोसा जताया।

31 मार्च 2024 तक सौंपा जाना था पहला तेजस Mk-1A

भारतीय वायुसेना (IAF) को पहला तेजस Mk-1A विमान 31 मार्च 2024 तक सौंपा जाना था, लेकिन यह समय सीमा पूरी नहीं हो पाई। देरी के मुख्य कारणों में कुछ जरूरी सर्टिफिकेशन में बाधा और GE की ओर से समय पर इंजन की आपूर्ति न होना शामिल है। अमेरिकी कंपनी GE को वित्तीय वर्ष 2023-24 में HAL को छह F404 इंजन सप्लाई करने थे, लेकिन सप्लाई चेन की समस्याओं के कारण यह पूरा नहीं हो सका। सूत्रों के अनुसार, GE ने मैसाचुसेट्स स्थित लिन में F404 इंजन की प्रोडक्शन लाइन को कुछ साल पहले बंद कर दिया था। इसे फिर से शुरू करने पर पुर्जों और कंपोनेंट्स के सर्टिफिकेशन से जुड़ी दिक्कतें सामने आईं। अब GE ने इन समस्याओं का समाधान कर लिया है और HAL के अधिकारियों ने भी इस महीने GE के सप्लायर्स के साथ चर्चा की है।

LCA Tejas Mk1A Engine: ऑनलाइन मिल रहा तेजस का GE-F404 इंजन! यूजर बोले- HAL को कैश ऑन डिलीवरी ऑप्शन दे दो, अब शायद समय पर इंजन मिल जाए

तेजस Mk-1A पुराने Mk-1 वर्जन के मुकाबले ज्यादा आधुनिक है। इसमें उन्नत रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल हैं। वहीं, HAL ने तेजस विमानों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए नासिक में नई प्रोडक्शन लाइन स्थापित की है। यह लाइन सालाना 24 विमान बनाने की क्षमता रखती है, जबकि बेंगलुरु में मौजूदा प्रोडक्शन लाइन 16 विमान सालाना तैयार कर सकती है।

HAL और GE एयरोस्पेस ने तेजस Mk-2 के लिए F414 इंजन के संयुक्त उत्पादन का समझौता किया है। इस समझौते के तहत GE भारत में 80% तकनीकी हस्तांतरण (ToT) करेगा। यह पहल न केवल स्वदेशी जेट इंजनों के विकास को बढ़ावा देगी बल्कि निर्यात के लिए भी नई संभावनाएं खोलेगी। वहीं, तेजस Mk-1A वायुसेना के आधुनिकीकरण के रोडमैप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भारतीय वायुसेना ने अगले दशक में 350 तेजस विमानों (Mk-1, Mk-1A और Mk-2) को शामिल करने की योजना बनाई है। यह विमान वायुसेना की भविष्य की युद्धक क्षमताओं का आधार बनेगा।

AMCA में अभी देरी

भारत के लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम में LCA Mark-1A और Mark-2 के साथ-साथ पांचवीं पीढ़ी के एडवांस मीडियम रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का विकास भी शामिल है। AMCA प्रोजेक्ट को भविष्य में भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना जा रहा है। यह विमान स्टेल्थ तकनीक, सुपरक्रूज़ क्षमता और एडवांस हथियार प्रणालियों से लैस होगा।

DRDO और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के अधिकारियों के अनुसार, AMCA के प्रोटोटाइप की पहली टेस्टिंग फ्लाइट साल 2026-27 तक होने की उम्मीद है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चलता रहा, तो इसका उत्पादन वर्ष 2032 तक शुरू हो सकता है।

AMCA की खासियतें
  • स्टेल्थ डिजाइन: दुश्मन के रडार से बचने के लिए आधुनिक स्टेल्थ तकनीक।
  • सुपरक्रूज़ क्षमता: बिना आफ्टरबर्नर के आवाज की गति से तेज उड़ान।
  • सेंसर फ्यूजन: वास्तविक समय पर डेटा साझा करने की उन्नत प्रणाली।
  • डुअल रोल: हवा से हवा और हवा से जमीन तक हमला करने की क्षमता।
  • स्वदेशी इंजन: GE के साथ साझेदारी में बनाए जा रहे इंजन के साथ ToT (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर)।