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Pakistan Propaganda: आखिर आतंक की फैक्टरी होने के बावजूद पाकिस्तान से क्यों प्रेम कर रहा है पश्चिमी मीडिया? ट्रंप ने भी बताया ‘महान स्टेट’

Pakistan Propaganda: Why Does Western Media Back a Terror State? Trump Calls It 'Great'

Pakistan Propaganda: भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव के बीच एक हैरान करने वाला सवाल उठ रहा है। आखिर क्यों पश्चिमी मीडिया आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के बावजूद पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है? ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर उसकी सैन्य ताकत को बड़ा झटका दिया, लेकिन इसके बाद भी पश्चिमी मीडिया और कुछ वैश्विक नेता पाकिस्तान की तरफदारी करते दिख रहे हैं। यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की तुलना भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की और पाकिस्तान को “महान देश” बताया। इस बीच, भारत को भी अपने नैरेटिव को मजबूत करने के लिए विपक्षी नेताओं को आगे करना पड़ रहा है। जिन्हें कई देशों की याात्रा पर भेजा जाएगा, जो वहां जा कर पाकिस्तान के झूठ के बेनकाब करेंगे।

Pakistan Propaganda: पाकिस्तान के साथ है पश्चिमी मीडिया!

पिछले कुछ दिनों में पश्चिमी मीडिया ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एकतरफा रुख अपनाया है। हालांकि सभी से पहलगाम हमले की निंदा तो की, लेकिन पाकिस्तान को ज्यादा खरीखोटी नहीं सुनाई। भारत ने साफ तौर पर कहा कि उसने सिर्फ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, लेकिन पाकिस्तान ने दावा किया कि भारत ने आम नागरिकों पर हमला किया। पश्चिमी मीडिया ने पाकिस्तान के इस दावे को प्रमुखता दी, जबकि भारत के सबूतों को नजरअंदाज किया। मिनट मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई पश्चिमी मीडिया हाउस ने भारत पर “झूठा नैरेटिव” बनाने का आरोप लगाया और पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई को “जवाबी हमला” बताकर उसकी तारीफ की।

एक्स पर कुछ पोस्ट्स में भी इस बात का जिक्र है कि पश्चिमी मीडिया लगातार भारत की सच्चाई को कमतर दिखा रहा है और पाकिस्तान के प्रोपेगैंडा को बढ़ावा दे रहा है। एक यूजर ने लिखा, “पश्चिमी मीडिया इस्लामिक आतंकवाद को समर्थन देता है और भारत के खिलाफ पाकिस्तान के झूठ को फैलाता है।”

ट्रंप ने पाकिस्तान को बताया महान देश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर के एलान के बाद दोनों देशों के नेताओं की तारीफ की। लेकिन उनके बयान ने भारत में कई सवाल खड़े कर दिए। ट्रंप ने कहा, “मैं शहबाज शरीफ और नरेंद्र मोदी को अच्छी तरह जानता हूं। दोनों महान नेता हैं और पाकिस्तान एक महान देश है।” ट्रंप ने यह भी कहा कि वो भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ ट्रेड बढ़ाना चाहते हैं।

इस बयान की भारत में कड़ी आलोचना हुई। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक इंटरव्यू में कहा, “ट्रंप का बयान निराशाजनक है। भारत और पाकिस्तान को एक समान बताना ठीक नहीं है। भारत ने हमेशा आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है, जबकि पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है।”

पाकिस्तान का झूठ तोड़ने की तैयारी

पाकिस्तान के नैरेटिव को काउंटर करने के लिए भारत को अब विपक्षी नेताओं को भी आगे करना पड़ रहा है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, भारत ने अपने विपक्षी नेताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भेजने का फैसला किया है, ताकि पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब किया जा सके। भारत ने साफ कर दिया है कि वो किसी भी तरह के आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और पाकिस्तान को जवाब देने के लिए हर कदम तैयार है।

पाकिस्तान की साख पर सवाल

पाकिस्तान को आतंकी गतिविधियों का समर्थन करने वाला देश माना जाता है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शहबाज शरीफ से साफ कहा कि पाकिस्तान को आतंकी संगठनों का समर्थन बंद करना होगा। लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी मीडिया और कुछ नेताओं का रुख हैरान करने वाला है। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी सीजफायर के बाद पाकिस्तान की तारीफ की, जबकि भारत ने कहा कि पाकिस्तान ने समझौते का उल्लंघन किया।

राफेल को लेकर फैलाया नैरेटिव

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की तरफ से खबरें फैलाई गईं कि इस हमले में उसके चीनी जे-10सी ने एक राफेल मार गिराया है। हालांकि सूबत के नाम पर पाकिस्तान के पास कुछ नहीं था। सोशल मीडिया पर भी पुरानी फोटो शेयर मॉर्फ करके शेयर की जा रही थीं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा शरीफ भी चैनलों पर सोशल मीडिया का हवाला देकर झूठी जानकारी दे रहे थे। वहीं इस सब के बावजूद पश्चिमी मीडिया इस नैरेटिव को फैलाने में पाकिस्तान का साथ दे रहा था।

खुद फ्रांस में ही राफेल को लेकर सवाल उठाए गए। भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने तीन राफेल जेट्स को मार गिराया। हालांकि, फ्रांस24 ने इस दावे की पुष्टि करने वाली कोई ठोस जानकारी नहीं दी, लेकिन उसने राफेल की परफॉर्मेंस पर बहस छेड़ दी।

पाकिस्तान के इस दावे को लेकर कई पश्चिमी मीडिया हाउस ने भी रिपोर्ट्स छापीं। सीएनएन ने एक फ्रांसीसी इंटेलिजेंस ऑफिसर के हवाले से कहा कि कम से कम एक राफेल जेट मार गिराया गया। लेकिन द वाशिंगटन पोस्ट ने साफ किया कि जो मलबा मिला, वो जरूरी नहीं कि राफेल का ही हो, वो मिराज 2000 का भी हो सकता है। फ्रांस24 ने इस बात पर भी जोर दिया कि फ्रांस सरकार और दसा एविएशन ने ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान राफेल के कथित नुकसान पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। हालांकि फ्रांस24 ने इस बात को हाइलाइट किया कि ये जियोपॉलिटिकल गेम का हिस्सा हो सकता है, जिसमें अमेरिका और चीन अपने-अपने हथियारों को बढ़ावा देना चाहते हैं। फ्रांस24 ने एक फ्रांसीसी एक्सपर्ट जेवियर टाइटलमैन के हवाले से इस मामले पर कहा, “वायरल तस्वीरों में जो मलबा दिख रहा है, वो एक ड्रॉप टैंक का है। राफेल जैसे जेट्स मिशन के दौरान हल्का होने के लिए ड्रॉप टैंक गिरा देते हैं। ये तस्वीरें इस बात का सबूत नहीं हैं कि कोई जेट मार गिराया गया।”

क्यों समर्थन कर रहा है पश्चिमी मीडिया?

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट केजेएस ढिल्लन भी इस मामले को ज्योपॉलिटिक्स से जोड़ कर देख कर रहे हैं। वह कहते हैं, जिस तरह से कई देश भारत को यूनाइटेड नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का परमानेंट मेंबर होते नहीं देखना चाहते, वैसे ही वहां का मीडिया भी भारत को आगे बढ़चा नहीं देखना चाहता। जब से भारत ने पश्चिमी देशों से हथियारों की खरीदारी कम की है, तब से उनके हित प्रभावित हुए हैं, औऱ वे भारत कमतर करके आंकना चाहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर रिजवान अहमद कहते हैं, पाकिस्तान खुद आतंक की फैक्टरी है। अमेरिका में आतंकी हमले हुए उनकी साजिश पाकिस्तान में ही रची गई। मुंबई टैरर अटैक हुआ, तो आतंकी पाकिस्तान से आए थे। ओसामा बिन लादेन मारा जाता है, तो पाकिस्तान में, जहां उसे पनाह मिली हुई थी। ऑपरेशन सिंदूर में जब भारत ने मुरीदके और बहावलपुर में आतंक के मदरसे नष्ट किए तो पाकिस्तान फिर से लश्कर के मदरसों को बनवाने की बात कह रहा है। जिसका खर्च पाकिस्तान सरकार उठाएगी। वह कहते हैं कि आखिर पश्चिमी मीडिया को यह बात कब समझ में आएगी। वह कहते हैं कि पाकिस्तान खुद को आतंक से पीड़ित होने की बात करता है। पहले आतंक को पालता है फिर खुद पर हमले भी करवाता है और कहता है हम पर आतंकी हमले हो रहे हैं। बलुचिस्तान में हो रहे हमलों पर भारत का हाथ होने की बात कहता है। जबकि भारत औऱ बलुचिस्तान का नक्शा कहीं आपस में मिलता ही नहीं। जबकि आतंक की फैक्टरी पीओके भारत से लगा हुआ है।

कई जानकारों का मानना है कि पश्चिमी मीडिया का ये रवैया जियोपॉलिटिकल हितों से प्रेरित है। भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव से कुछ पश्चिमी देश असहज हैं और वो पाकिस्तान को एक काउंटर के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान ने हमेशा से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर “पीड़ित” का नैरेटिव बनाया है, जिसे पश्चिमी मीडिया आसानी से स्वीकार कर लेता है। मून ऑफ अल्बामा की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रंप प्रशासन भारत-पाकिस्तान तनाव में तटस्थ रुख अपनाना चाहता है, ताकि दोनों देशों के साथ अपने आर्थिक हितों को बनाए रख सके।

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वहीं, भारत ने साफ कर दिया है कि वो किसी भी विदेशी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत ने अपनी ताकत से पाकिस्तान को सीजफायर के लिए मजबूर किया। ये हमारा आंतरिक मामला है।”

NavIC Powers Operation Sindoor: नाविक ने ऑपरेशन सिंदूर में कैसे किया कमाल? BrahMos को दिखाया रास्ता, पाकिस्तान को किया बरबाद

NavIC Powers Operation Sindoor: Guides BrahMos, Devastates Pakistan
NavIC Powers Operation Sindoor: भारत ने हाल ही में पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के जरिए एक ऐसी सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया, जिसने न केवल पाकिस्तान की सैन्य ताकत को झकझोर दिया। इस ऑपरेशन में भारत की ब्रह्मोस मिसाइल ने इतनी सटीकता के साथ पाकिस्तान के एयरबेसों पर हमला किया कि पूरा पाकिस्तान का हुक्मरान घुटनों के बल आ गया। इस ऑपरेशन में भारत के अपने बनाए नाविक (Navigation with Indian Constellation-Navic) सिस्टम और Integrated Air Command and Control System ने कमाल कर दिखाया। इसने दिखाया कि भारत अब न सिर्फ अपने दम पर दुश्मन को जवाब दे सकता है, बल्कि अपनी टेक्नोलॉजी से दुनिया को चौंका भी सकता है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि नाविक ने इसमें क्या रोल निभाया।

NavIC Powers Operation Sindoor : नाविक (Navic) है?

नाविक भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम है, जिसे इसरो (Indian Space Research Organisation) ने बनाया है। ये वैसा ही है जैसे अमेरिका का जीपीएस (GPS), रूस का ग्लोनास (GLONASS), या चीन का बेइदोउ (Beidou)। लेकिन नाविक खास है क्योंकि ये पूरी तरह भारत में बना है और भारत के आसपास 1,500 किलोमीटर तक बेहद सटीक लोकेशन बताता है।

के.एल. विलेन, जो एलिना जियो कंपनी के फाउंडर हैं, उन्होंने बताया, “नाविक एक ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम है, जो जीपीएस की तरह काम करता है। लेकिन ये इंडियन सिस्टम है, जिसमें 9 सैटेलाइट्स हैं। ये L5 और S-बैंड सिग्नल देता है, और जल्दी ही L1 बैंड भी देगा। इससे हमें 1 मीटर तक की सटीक लोकेशन मिलती है।”

जीपीएस आमतौर पर 10 मीटर तक सटीक होता है, लेकिन नाविक 1 मीटर या उससे भी कम की सटीकता देता है। यानी अगर आपको किसी चीज का सटीक पता करना है, तो नाविक उसका बिल्कुल सही ठिकाना बता देता है। ये सिस्टम अफ्रीका से ऑस्ट्रेलिया तक और 40 डिग्री उत्तर से 40 डिग्री दक्षिण तक काम करता है। विलेन ने कहा, “हमने पेरिस, लंदन, मॉरिटानिया, और ऑस्ट्रेलिया में भी नाविक की टेस्टिंग की है। हर जगह ये शानदार काम करता है।”

ऑपरेशन सिंदूर में क्या हुआ?

ऑपरेशन सिन्दूर एक छोटा लेकिन बहुत पावरफुल सैन्य ऑपरेशन था, जो सिर्फ 4 दिन यानी 96 घंटे तक चला। इसका मकसद था पाकिस्तान के आतंकवाद को खत्म करना और उसकी परमाणु धमकियों को बेकार करना। पाकिस्तान हमेशा से ये कहता रहा कि अगर भारत ने उसके खिलाफ कुछ किया, तो वह परमाणु हथियार (न्यूक्लियर वेपन्स) इस्तेमाल करेगा। लेकिन इस बार भारत ने उसकी इस धमकी को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

मेजर जनरल (रि.) राजीव नारायण ने कहा, “पाकिस्तान हमेशा अपनी न्यूक्लियर छतरी के नीचे आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा। वो सोचता था कि दुनिया उसकी न्यूक्लियर धमकी से डर जाएगी। लेकिन इस बार हमने उसकी धमकी को खत्म कर दिया।”

मेजर जनरल (रि.) राजीव नारायण ने कहा, भारत ने पाकिस्तान के दो बड़े न्यूक्लियर वेपंस स्टोरेज वाले ठिकानों किराना हिल्स और चगाई हिल्स पर सटीक हमले किए। इन हमलों के बाद वहां 4.0 और 5.7 रिक्टर स्केल की सिस्मिक गतिविधियां दर्ज हुईं। इसका मतलब है कि वहां न्यूक्लियर मैटेरियल में कुछ रिसाव (रेडियोलॉजिकल लीक) हुआ। मेजर जनरल नारायण ने बताया, “किराना हिल्स में 5-7 टनल्स थीं, जिनमें से हमने 5 को सील कर दिया। चगाई हिल्स में भी हमने स्टोरेज को हिट किया। अब वहां रेडिएशन की वजह से कोई 1000 साल तक नहीं जा सकता।”

भारत ने एक ही रात में पाकिस्तान के 11 बड़े एयरबेस को नष्ट कर दिया। इनमें जैकबाबाद भी शामिल था, जहां पाकिस्तान के F-16 विमान रखे थे। ये विमान न्यूक्लियर वेपंस ले जा सकते हैं। मेजर जनरल नारायण ने कहा, “11 एयरबेस को हमने पूरी तरह बेकार कर दिया। उनकी एयरफोर्स अब कुछ नहीं कर सकती।”

नाविक ने कैसे किया कमाल

नाविक ने इस ऑपरेशन में सबसे बड़ा रोल निभाया। इसकी 1 मीटर की सटीकता की वजह से भारत की ब्रह्मोस मिसाइल, ड्रोन, और तोपखाने ने दुश्मन के ठिकानों को बिल्कुल सटीक निशाना बनाया। केएल विलेन ने बताया, “नाविक की मदद से हम 50 किलोमीटर दूर 3×2 फीट के छोटे से दरवाजे को भी हिट कर सकते हैं। हमारी मिसाइल्स और ड्रोन्स को फ्लाइट में रीयल-टाइम लोकेशन डेटा मिलता है, जिससे वो बिल्कुल सही टारगेट पर जाती हैं।”

आकाशतीर को दी ताकत

इस ऑपरेशन में भारत की स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम आकाशतीर ने भी कमाल किया। ये सिस्टम S-400, MR-SAM (इजरायल के साथ मिलकर बनाया), और स्वदेशी ड्रोन्स के साथ जुड़ा था। आकाशतीर ने दुश्मन के हवाई हमलों को रोका और भारतीय हथियारों को सही टारगेट तक पहुंचाया। मेजर जनरल नारायण ने कहा, “आकाशतीर ने दुनिया को चुप करा दिया। ये दिखाता है कि हमारी पुरानी गन्स को भी अपग्रेड करके मॉडर्न वॉर में इस्तेमाल किया जा सकता है।”

इस ऑपरेशन में इस्तेमाल हुए सारे बड़े उपकरण नाविक, आकाशतीर, ड्रोन, और मिसाइल्स भारत में बने थे। मेजर जनरल नारायण ने गर्व से कहा, “इस पूरे सिस्टम में एक भी चीज विदेशी नहीं थी। ये है ट्रूली आत्मनिर्भर भारत।”

पाकिस्तान की हालत क्यों खराब हुई?

ऑपरेशन सिन्दूर ने पाकिस्तान को हर तरह से तोड़ दिया। मेजर जनरल नारायण ने बताया, “पाकिस्तान के पास अब न फ्यूल बचा है, न गोला-बारूद। उनकी आर्मी पूरी तरह टूट चुकी है।” पाकिस्तान के 11 एयरबेस नष्ट हो गए। उसकी एयरफोर्स अब कुछ नहीं कर सकती। न्यूक्लियर स्टोरेज साइट्स को नुकसान पहुंचा, जिससे उसकी परमाणु ताकत कमजोर हो गई है। उन्होंने कहा, पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। अब उसके पास सैन्य ऑपरेशन्स चलाने के लिए पैसे नहीं हैं। उसने अमेरिका और चीन से मदद मांगी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मेजर जनरल नारायण ने कहा, “चीन ने साफ मना कर दिया। अमेरिका के प्लेन्स आए, लेकिन वो सिर्फ टोही उड़ान भर रहे थे। कोई मदद नहीं मिली।”

मेजर जनरल नारायण के अनुसार, अमेरिका और चीन के डिफेंस सिस्टम्स को भी नाकामी का सामना करना पड़ा। अमेरिका के प्रोटेक्शन सिस्टम्स चगाई हिल्स में फेल हो गए। चीन के सिस्टम भी कुछ नहीं कर पाए।

नाविक का इस्तेमाल कहां-कहां?

नाविक सिर्फ आर्मी के लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी बहुत काम का है। के.एल. विलेन ने बताया कि इसका इस्तेमाल कई जगह हो सकता है। जैसे ड्रोन से सटीक कीटनाशक छिड़काव, जमीन के नक्शे बनाने और प्रॉपर्टी विवाद सुलझाने में, गाड़ियों की ट्रैकिंग और नेविगेशन के अलावा 5G और 6G नेटवर्क के लिए सटीक टाइम सिग्नल में भी इसका यूज हो सकता है।

विलेन ने कहा, “अगर नाविक को सही से इस्तेमाल करें, तो हम 50 फीसदी तक वेस्टेज बचा सकते हैं और 30 फीसदी से ज्यादा आउटपुट पा सकते हैं।”

ऑपरेशन सिंदूर ने दिए भारत को कई बड़े सबक

के.एल. विलेन के मुताबिक, नाविक में और सैटेलाइट्स जोड़ने की जरूरत है। “हमें 11 सैटेलाइट्स चाहिए, ताकि L1, L5, और S-बैंड मिलकर और बेहतर कवरेज दें।” के.एल. विलेन ने भी जोड़ा, “नाविक आज दुनिया का सबसे बेहतर नेविगेशन सिस्टम है। अगर हम इसे पूरी तरह अपनाएं, तो भारत की ताकत और दोगुनी हो जाएगी।” साथ ही, भारत को अपने डिफेंस इंडस्ट्री में और पैसे लगाने होंगे। मेजर जनरल नारायण ने कहा, “हमारी डिफेंस इंडस्ट्री ने दिखा दिया कि अगर इच्छा हो, तो रास्ता निकल आता है।”

नाविक सिस्टम को करें और मजबूत

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इस साल 29 जनवरी को NVS-02 सैटेलाइट लॉन्च किया था। इसका मकसद पुराने IRNSS-1E सैटेलाइट को रिप्लेस करना और नाविक (Navigation with Indian Constellation) सिस्टम को और मजबूत करना था। लेकिन एक तकनीकी खराबी (पायरो वाल्व में दिक्कत) की वजह से ये सैटेलाइट अपने सही ऑर्बिट (Geostationary Orbit) तक नहीं पहुंच सका और Geostationary Transfer Orbit (GTO) में अटक गया।

2015 से 2018 तक इसरो के पूर्व चेयरमैन रहे ए.एस. किरण कुमार ने इस असफलता, नाविक सिस्टम की मौजूदा स्थिति के बारे में कहा, “हम NVS-02 सैटेलाइट का इस्तेमाल दिन में कुछ घंटों के लिए कर रहे हैं। भले ही ये अपने पूरे मकसद को पूरा नहीं कर पाया, लेकिन अगले 10 साल तक ये काम कर सकता है। हम नाविक को और बेहतर करने के लिए काम कर रहे हैं। जल्द ही NVS-03 और NVS-04 सैटेलाइट्स लॉन्च होंगे।”

उन्होंने बताया कि नाविक का पूरा सिस्टम तैयार करने की जरूरत है, ताकि भारत की नेविगेशन क्षमता और मजबूत हो।

स्मार्टफोन में हो सकता है यूज

क्या नाविक को स्मार्टफोन्स में इस्तेमाल किया जा सकता है? इस सवाल पर किरण कुमार ने जवाब दिया, “आज कई स्मार्टफोन्स में नाविक का सपोर्ट है। भारत ने नए मोबाइल फोन्स में नाविक सिग्नल्स का सपोर्ट अनिवार्य कर दिया है। अगर आप भारत में हैं या इसके 1,500 किलोमीटर के दायरे में, तो आपका फोन नाविक का इस्तेमाल कर सकता है।”

उन्होंने कहा कि नाविक, जीपीएस से अलग है क्योंकि ये भारत का अपना सिस्टम है और खास तौर पर भारत और आसपास के इलाकों के लिए बनाया गया है। ये ज्यादा सटीक है और 24 घंटे कवरेज देता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीटिक में भी कारगर

किरण कुमार ने नाविक की राष्ट्रीय सुरक्षा में अहमियत पर जोर देते हुए कहा, “नाविक भारत को एक स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम देता है, जो विदेशी सिस्टम्स पर निर्भर नहीं है। ये खासकर रणनीतिक और सुरक्षा के लिहाज से बहुत जरूरी है।” उन्होंने बताया कि नाविक सैटेलाइट्स के सिग्नल्स से जमीन पर मौजूद डिवाइसेज अपनी सटीक लोकेशन पता कर सकती हैं। ये सैन्य ऑपरेशन्स, ड्रोन नेविगेशन, और मिसाइल टारगेटिंग के लिए बहुत काम आता है।

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क्या नाविक को सार्क देशों के साथ कूटनीति के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? इस सवाल पर किरण कुमार ने कहा, “नाविक का ‘क्षेत्रीय’ मतलब है भारत की सीमा से 1,500 किलोमीटर का दायरा। इस इलाके में कोई भी नाविक-सपोर्टेड डिवाइस लोकेशन सर्विस दे सकती है। नाविक के सैटेलाइट्स जियोस्टेशनरी हैं, यानी वो हमेशा एक ही जगह रहते हैं। इससे 24/7 कवरेज मिलता है और सटीकता बढ़ती है।” उन्होंने बताया कि भारत इस सिस्टम को अपने पड़ोसी देशों के साथ शेयर कर सकता है, जिससे क्षेत्रीय सहयोग बढ़ेगा।

Operation Sindoor attack: जब ‘दिल’ और ‘डायमंड’ पर लगी चोट, तो अमेरिका से पाकिस्तान बोला- त्राहि माम-त्राहि माम

Operation Sindoor attack: IAF Strikes Pindi, Forces Pak to Seek US Help

Operation Sindoor attack: 10 मई 2025 की सुबह, जब भारतीय वायुसेना (IAF) ने पाकिस्तान के 11 बड़े एयरबेस पर ज़बरदस्त हमले किए, तो पूरा दक्षिण एशिया हैरान रह गया। इन हमलों में रावलपिंडी के पास चकलाला (नूर खान), सरगोधा और जैकोबाबाद जैसे स्ट्रैटेजिक एयरबेस को निशाना बनाया गया। इन हमलों ने पाकिस्तान की सैन्य ताकत को ऐसा करारा झटका दिया कि उनके आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से ‘त्राहि माम-त्राहि माम’ कहना पड़ा। उन्होंने भारत के साथ तनाव कम करने के लिए मदद मांगी। भारतीय सेना की इस कार्रवाई ने न सिर्फ पाकिस्तान की एयर डिफेंस सिस्टम की औकात दिखा दी, बल्कि दोनों देशों की सैन्य ताकत का फर्क भी साफ कर दिया।

Operation Sindoor attack: पहलगाम हमले से शुरू हुआ सब

ये सारी कहानी 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले से शुरू हुई। इस हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर टूरिस्ट थे। भारत ने इस हमले का ज़िम्मेदार लश्कर-ए-तैयबा के शेडो संगठन ‘द रेसिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) और इसके पीछे पाकिस्तान को ठहराया। इसके जवाब में भारत ने 7 मई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान और PoK (पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर) में 9 आतंकी ठिकानों को तबाह किया गया। इनमें जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के बड़े कैंप थे, जो 2008 के मुंबई हमले और 2019 के पुलवामा हमले जैसे गुनाहों के लिए ज़िम्मेदार थे।

पाकिस्तान ने इसका जवाब 8 से 10 मई के बीच भारत पर ड्रोन और मिसाइल अटैक से दिया। उन्होंने श्रीनगर, अवंतिपुर और उधमपुर में स्कूल और हॉस्पिटल जैसे जगहों को टारगेट किया। भारत ने इसे “घटिया और गलत” बताया। जवाब में, 10 मई की सुबह भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 11 एयरबेस पर ब्रह्मोस मिसाइल और स्कैल्प क्रूज मिसाइलों से हमला बोला। इनमें चकलाला (नूर खान), सरगोधा, जैकोबाबाद, भोलारी, रफीकी, मुरिद, रहीम यार खान, सक्कर, चुनियां, सियालकोट और स्कर्दू शामिल थे।

दिल और डायमंड पर लगी चोट

सूत्रों ने बताया कि ये हमले सिर्फ जवाबी कार्रवाई नहीं थे। ये पाकिस्तान को उसकी सैन्य ताकत की औकात दिखाने का एक बड़ा प्लान था। रावलपिंडी में चकलाला (नूर खान) एयरबेस, जो इस्लामाबाद से बस 10 किलोमीटर दूर है, यह एयरबेस पाकिस्तान की वायुसेना के लिए बेहद अहम है, इसे पाक वायुसेना का दिल भी कहा जाता है। यहां बड़े ट्रांसपोर्ट प्लेन, रिफ्यूलिंग प्लेन और रडार सिस्टम वाले प्लेन रखे जाते हैं। ये एयरबेस पाकिस्तान की हवाई डिफेंस और प्लानिंग के लिए बेहज स्ट्रैटेजिक है। भारतीय हमले ने यहां के रनवे, हैंगर और गाड़ियों को भारी नुकसान पहुंचाया। इससे पाकिस्तान की हवाई ताकत को जबरदस्त झटका लगा।

सरगोधा का मुशाफ एयरबेस, जो पाकिस्तानी वायुसेना का डायमंड एयर बेस है, यह भी भारतीय हमलों का बड़ा टारगेट था। खास बाात यह है कि यहां F-16, JF-17 और मिराज 5 जैसे फाइटर जेट तैनात हैं। ये एयरबेस पाकिस्तान की वायुसेना का सेंट्रल कमांड और ट्रेनिंग सेंटर भी है। सैटेलाइट फोटो में दिखा कि यहां रनवे पर दो बड़े गड्ढे हो गए और कई हैंगर बरबाद हो गए।

राजस्थान के लोंगेवाला से 200 किलोमीटर पश्चिम में स्थित जैकोबाबाद का शाहबाज एयरबेस भी भारतीय मिसाइलों की जद में आ गया। यहां F-16, JF-17 और कुछ हेलीकॉप्टर तैनात थे। ये एयरबेस 2001 में नाटो के अफगानिस्तान मिशन में भी इस्तेमाल किया गया था। भारतीय हमले ने यहां के मुख्य हैंगर को तबाह कर दिया और एयर ट्रैफिक कंट्रोल बिल्डिंग को भी नुकसान पहुंचा।

पाकिस्तान का एयर डिफेंस फेल

भारतीय हमलों ने पाकिस्तान के हवाई डिफेंस को पूरी तरह से बेकार कर दिया। सैन्य सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान के पास इन हमलों का कोई जवाब नहीं था, क्योंकि उनके रडार और डिफेंस सिस्टम काम ही नहीं कर रहे थे। पासरूर और सियालकोट के रडार साइट्स को भी नष्ट किया गया, जिससे उनकी एरियल सर्विलांस की ताकत और कम हो गई। भारतीय वायुसेना के एक सीनियर अफसर औऱ महानिदेशक एयर ऑपरेशंस (डीजीएओ) एयर मार्शल एके भारती ने कहा, “हम चाहते तो पाकिस्तान के हर सैन्य सिस्टम को टारगेट कर सकते थे, लेकिन हमने सिर्फ़ मिलिट्री ठिकानों पर अटैक किया, ताकि आम लोगों को नुकसान न हो।”

मैक्सार और भारत की कावा स्पेस जैसी कंपनियों ने जो सैटेलाइट इमेज शेयर कीं, उन्होंने इन हमलों का असर साफ दिखाया। रहीम यार खान के रनवे पर बड़ा गड्ढा, भोलारी में टूटा हुआ हैंगर और सरगोधा में रनवे पर कई गड्ढे इस बात का सबूत थे कि भारत की टेक्नोलॉजी और मिलिट्री पावर पाकिस्तान से बहुत आगे है।

मार्को रुबियो से लगााई गुहार

एयरबेस पर हुए हमलों के बाद पाकिस्तान में खलबली मच गई। उसी दिन, 10 मई को, पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने नेशनल कमांड अथॉरिटी की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई। ये अथॉरिटी उनके न्यूक्लियर हथियारों को मैनेज करती है। चकलाला पर हमला खासतौर पर बेहद खौफनाक था, क्योंकि ये एयरबेस पाकिस्तान के न्यूक्लियर हथियारों के मैनेजमेंट सेंटर से कुछ ही दूर है। उनके पास 170 से ज़्यादा न्यूक्लियर हथियार हैं। एक विदेशी अखबार ने लिखा, “पाकिस्तान को डर था कि भारत उनकी न्यूक्लियर कमांड को खत्म कर सकता है।”

इसी डर के चलते पाकिस्तान को तुरंत युद्ध रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा। जनरल मुनीर ने मार्को रुबियो से बात की। रुबियो ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी फोन पर बात की। रुबियो ने दोनों देशों से तनाव कम करने और बातचीत शुरू करने को कहा। इसके बाद, पाकिस्तान के मिलिट्री ऑपरेशंस के डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल काशिफ अब्दुल्ला ने भारतीय डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई से दोपहर 3:35 बजे बात की और युद्धविराम का सुझाव दिया। भारत ने इसे मान लिया, लेकिन चेतावनी दी कि भविष्य में कोई भी आतंकी हमला, युद्ध माना जाएगा।

यूनाइटेड नेशन में भी भारत ने घेरा

भारत ने सिर्फ़ मिलिट्री एक्शन ही नहीं लिया, बल्कि दुनिया के सामने अपनी बात भी रखी। 16 मई 2025 को, भारतीय टीम ने यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल की सेंक्शंस कमेटी से मुलाकात की। उन्होंने TRF को आतंकी ग्रुप घोषित करने की मांग की और पहलगाम हमले में TRF और पाकिस्तान की भूमिका के सबूत दिए। हालांकि, पाकिस्तान, जो UNSC का टेम्परेरी मेंबर है, और चीन ने इसका विरोध किया। फिर भी, भारत ने अपनी बात मजबूती से रखी।

ऑपरेशन सिंदूर ने बदला मिलिट्री बैलेंस

ऑपरेशन सिंदूर ने भारत-पाकिस्तान के बीच मिलिट्री बैलेंस को पूरी तरह बदल दिया। सूत्रों का कहना है कि ये 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर भारत का सबसे बड़ा मिलिट्री अटैक था। इन हमलों ने पाकिस्तान की 20 फीसदी हवाई ताकत को खत्म कर दिया और ये साफ कर दिया कि भारत अब सिर्फ डिफेंस में नहीं रहेगा। भारत की टेक्नोलॉजी और स्ट्रैटेजी ने पाकिस्तान को दिखा दिया कि वो भारत से मुकाबला नहीं कर सकते।

Operation Sindoor: भारत ने क्यों चुनीं पाकिस्तान में ये नौ खास साइटें? स्कैल्प क्रूज मिसाइलों और हैमर बमों ने मचाया कहर

ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने अपनी मिलिट्री और डिप्लोमैटिक ताकत के जरिए बता दिया कि वह अब सहेगा नहीं, बल्कि जवाब देगा। हालांकि इस सारे मसले की जड़ आतंकवाद है, जो अभी भी जारी है। भारत ने साफ कर दिया कि वो अब कोई आतंकी हमला बर्दाश्त नहीं करेगा। अमेरिका और चीन जैसे देशों की मध्यस्थता के बावजूद, भारत की सख्ती की वजह से ही पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए मजबूर होना पड़ा।

Manipur M4 Rifle Recovery: कश्मीर के बाद अब मणिपुर में उग्रवादियों से बरामद हुई M4 असाल्ट राइफल, पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने की बड़ी तैयारी

Manipur M4 Rifle Recovery: Militants' Plot to Disrupt Northeast Foiled

Manipur M4 Rifle Recovery: 14 मई 2025 को मणिपुर के चंदेल जिले में भारत-म्यांमार सीमा के पास न्यू समताल गांव में असम राइफल्स ने इस ऑपरेशन में 10 उग्रवादियों को मार गिराया गया। उग्रवादियों के पास से बड़ी मात्रा में हथियारों का जखीरा बरामद किया गया है। खास बात यह है कि जखीरे में उग्रवादियों के पास से पहली बार अमेरिकी M4 राइफल भी बरामद हुई है। यह पहली बार है कि जब पूर्वोत्तर के उग्रवादियों से एम4 असाल्ट राइफल मिली है। पिछले साल अपुष्ट खबरें आईं थी कि यहां के उग्रवादियों के पास एम4 जैसी अत्याधुनिक राइफलें देखी गई हैं। लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हुई थी। एम4 राइफलें अभी तक जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से मुठभेड़ के बाद बरामद हुई हैं। जो उन्हें पाकिस्तान सेना की तरफ से उपलब्ध कराई गईं।

Manipur M4 Rifle Recovery: कैसे शुरू हुआ ऑपरेशन?

मणिपुर का चंदेल जिला भारत-म्यांमार सीमा के करीब है, अपनी जटिल भौगोलिक स्थिति और उग्रवादी गतिविधियों के लिए जाना जाता है। खेंगजॉय तहसील में पड़ने वाले न्यू समताल गांव एक पहाड़ी और जंगली इलाका है। यहां 398 किलोमीटर लंबी खुली सीमा हैं, जहां से उग्रवादी हथियारों की तस्करी को अंजाम देते हैं। 14 मई को असम राइफल्स को खुफिया जानकारी मिली कि इस क्षेत्र में कुछ सशस्त्र लोग छिपे हैं।

इस सूचना के आधार पर, असम राइफल्स की एक टुकड़ी ने गश्त शुरू की। जैसे ही जवान न्यू समताल के पास पहुंचे, उन पर सेना की वर्दी पहने उग्रवादियों ने अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। गोलियों की बौछार के बीच, असम राइफल्स के जवानों ने तुरंत कवर लिया और जवाबी कार्रवाई की। इस गोलीबारी में असम राइफल्स ने 10 उग्रवादियों को ढेर कर दिया। खास बात यह रही कि इस ऑपरेशन में असम राइफल्स का कोई जवान घायल नहीं हुआ।

M4 राइफल बरामद

गोलीबारी खत्म होने के बाद, असम राइफल्स ने इलाके की गहन तलाशी ली। इस दौरान उन्हें हथियारों का एक बड़ा जखीरा मिला, जिसमें सात AK-47 राइफलें, एक RPG लॉन्चर, चार सिंगल-बैरल ब्रीच-लोडिंग (SBBL) राइफलों के अलावा एक M4 राइफल भी बरामद हुई। इसके अलावा, भारी मात्रा में गोला-बारूद, विस्फोटक सामग्री, और सामरिक उपकरण जैसे रेडियो सेट और बैकपैक भी बरामद हुए। अभी तक वहां के उग्रवादियों से AK-47 जैसी राइफलें बरामद होती रही हैं। लेकिन एम4 राइफल का मिलना चौंकाने वाली बात है।

M4 राइफल अमेरिका में कोल्ट द्वारा निर्मित एक अत्याधुनिक असॉल्ट राइफल है। M4 राइफल अमेरिकी सेना का प्रमुख हथियार है और इसे नाइट-विज़न स्कोप या लेजर साइट जैसे उपकरणों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत के पूर्वोत्तर में इस तरह का अत्याधुनिक हथियार मिलना बेहद चिंताजनक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह राइफल म्यांमार के रास्ते तस्करी से भारत में लाई गई होगी। म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध ने वहां हथियारों की कालाबाजारी को बढ़ावा दिया है, और वहीं से ये हथियार भारत के उग्रवादी समूहों तक पहुंच रहे हैं। 2024 में मणिपुर पुलिस ने 161 हथियार बरामदगी की घटनाओं की सूचना दी, जिसमें विदेशी मूल के हथियार शामिल थे। सूत्रों का कहना है कि इस बात का पता लगाया जा रहा है कि उग्रवादियों के पास ये एम4 राइफल कहां से आई है। असम राइफल्स और मणिपुर पुलिस इस राइफल के ऑरिजन और इसके सीरियल नंबर की जांच कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मणिपुर के उग्रवादी समूहों ने M4 राइफल को अंतरराष्ट्रीय हथियार डीलरों से खरीदा हो सकता है। यह खरीद म्यांमार के रास्ते हुई हो सकती है, जहां मैतई और कुकी उग्रवादी समूह सक्रिय हैं।

सूत्रों का कहना है, एम4 राइफल मिलने का मतलब यह है कि यहां अब जल्दी शांति नहीं लौटने वाली है। उग्रवादी गुट बड़ी तैयारी कर रहे हैं और यहां अस्थिरता फैलाने की फिराक में हैं। यह इस बाक संकेत हैं कि उग्रवादी समूह अब म्यांमार के जरिए अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजारों तक पहुंच बना रहे है। उन्होंने कहा कि अगर यह पहली बार है, तो यह उग्रवादियों की बढ़ती सैन्य क्षमता का संकेत है।

मणिपुर में 2023 में शुरू हुई थी हिंसा

मणिपुर लंबे समय से उग्रवाद और जातीय हिंसा से जूझ रहा है। मई 2023 से मैतई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच हिंसा ने 130 से ज्यादा लोगों की जान ली और 400 से ज्यादा घायल हुए। चंदेल जिला उग्रवादियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना रहा है। यह इलाका नगा और अन्य आदिवासी समुदायों का गढ़ है। यहां उग्रवादी समूह उगाही, हथियार तस्करी, और सीमा पार हमलों में शामिल रहते हैं।

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असम राइफल्स ने 2024 में 425 से ज्यादा ऑपरेशन किए, जिनमें 1,000 से अधिक हथियार बरामद हुए। चंदेल और उखरूल जैसे जिलों में अवैध अफीम की खेती को भी नष्ट किया गया। इस साल जनवरी में ही 13 उग्रवादियों को पकड़ा गया और 35 हथियार जब्त किए गए।

Three Brothers Alliance: पाकिस्तान-तुर्किए-अजरबैजान की यह जुगलबंदी क्यों बढ़ा रही है भारत की टेंशन? पढ़ें ये एक्सप्लेनर

Three Brothers Alliance: Why Pakistan-Turkey-Azerbaijan Trio Worries India? Explained
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Three Brothers Alliance: ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान, तुर्किए और अजरबैजान के नापाक गठबंधन का खुलासा हुआ है। जिसके बाद भारत में तुर्किए और अजरबैजान को लेकर विरोध शुरू हो गया है। पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई में तुर्किए का नाम सामने के बाद भारत के कई विश्वविद्यालयों ने वहां की यूनिवर्सिटीज के साथ संबंध तोड़ लिए हैं। इसके अलावा तुर्किए की एविएशन कंपनी सेलेबी से भारत सरकार ने सिक्योरिटी क्लीयरेंस वापस ले लिया है। यह कंपनी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोचिन, अहमदाबाद, गोवा, और कन्नूर जैसे नौ प्रमुख हवाई अड्डों पर ग्राउंड हैंडलिंग और कार्गो संचालन का काम देखती है। साथ ही कई भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने तुर्किए की यात्रा और वहां के उत्पादों का बहिष्कार करने की अपील की है। मेकमायट्रिप और ईजमायट्रिप जैसी ऑनलाइन ट्रैवल कंपनियों ने बताया कि तुर्किए जाने की बुकिंग्स में भारी गिरावट आई है। वहीं अजरबैजान की बुकिंग्स भी रद्द की गई हैं। तीनों देशों का यह गठबंधन भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

Three Brothers Alliance: क्या है और कैसे बना?

थ्री ब्रदर्स अलायंस (Three Brothers Alliance) की शुरुआत 2021 में हुई, जब पाकिस्तान, तुर्किए और अजरबैजान के नेताओं ने अजरबैजान की राजधानी बाकू में एक अहम शिखर सम्मेलन आयोजित किया। इस बैठक में तीनों देशों ने फैसला लिया कि वे अपने राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रिश्तों को मजबूत करेंगे। इस गठजोड़ का नाम “थ्री ब्रदर्स अलायंस” पड़ा, क्योंकि ये तीनों देश एक-दूसरे को भाई की तरह देखते हैं। इनके बीच सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्ते भी हैं। तुर्किए और अजरबैजान की जड़ें तुर्किक संस्कृति से जुड़ी हैं, वहीं तीनों देश इस्लामिक बहुल हैं।

इस गठबंधन (Three Brothers Alliance) का मुख्य मकसद है कि ये तीनों देश एक-दूसरे के हितों को बढ़ावा दें। मसलन, अगर पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर समर्थन चाहिए, तो तुर्किए और अजरबैजान उसकी मदद करेंगे। इसी तरह, अगर अजरबैजान को नागोर्नो-कराबाख विवाद में समर्थन चाहिए, तो पाकिस्तान और तुर्किए उसका साथ देंगे। तुर्किए भी उत्तरी साइप्रस के अपने विवाद में इन दोनों देशों का समर्थन लेता है।

भारत के लिए क्यों बन गया है खतरा?

हाल ही में पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव फिर से बढ़ गया। पिछले महीने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें 36 लोग मारे गए और 57 घायल हो गए। भारत ने इसका जवाब ऑपरेशन सिंदूर से दिया औऱ पाकिस्तान को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दियाा। इस दौरान तुर्किए और अजरबैजान ने खुलकर पाकिस्तान (Three Brothers Alliance) का समर्थन किया। तुर्किए ने तो पाकिस्तान को ड्रोन तक दिए, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया। इन ड्रोनों में तुर्किए का मशहूर बायकर बायरक्तर, और एसिसगार्ड सॉन्गर ड्रोन भी शामिल था।

1971 के बाद यह पहली बार था जब भारत और पाकिस्तान (Three Brothers Alliance) के इतने जबरदस्त हमले देखे गए। भारत ने कहा कि पाकिस्तानी गोलाबारी में उसके 16 नागरिक मारे गए, वहीं भारत ने इन हमलों को पहलगाम आतंकी हमले का जवाब बताया। लेकिन पाकिस्तान ने आतंकी हमले में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया। इस तनाव के बीच थ्री ब्रदर्स अलायंस ने भारत के खिलाफ एकजुटता दिखाई, जिससे भारत को चिंतित होना लाजिमी था।

यह गठबंधन (Three Brothers Alliance) भारत के लिए एक बड़ी टेंशन के तौर पर उभर रहा है। खासकर 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने पर तुर्किए ने संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर बार-बार इस मसले को उठाया, औऱ पाकिस्तान का साथ दिया। जिससे भारत की नाराजगी बढ़ी। वहीं, अजरबैजान ने भी पाकिस्तान के कश्मीर रुख का समर्थन किया। इसके अलावा, तुर्किए और अजरबैजान ने पाकिस्तान को सैन्य मदद दी, जैसे ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य हथियार, जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा बढ़ गया।

इस गठबंधन के पीछे तुर्किए की क्या भूमिका है?

इस गठबंधन की शुरुआत तुर्किए ने की ही थी। तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन अपने देश का प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। वे इस्लामिक और तुर्किक देशों के साथ गठजोड़ (Three Brothers Alliance) करके अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। तुर्किए और अजरबैजान के बीच तुर्किक सांस्कृतिक रिश्ते बहुत पुराने हैं। 2020 में जब अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-कराबाख को लेकर युद्ध हुआ, तब तुर्किए ने अजरबैजान को सैन्य मदद दी। इस मदद की वजह से अजरबैजान ने आर्मेनिया को हरा दिया। पाकिस्तान ने भी इस युद्ध में अजरबैजान का साथ दिया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ पाकिस्तानी भाड़े के सैनिकों ने अजरबैजान की तरफ से लड़ाई भी लड़ी। इस जीत के बाद इन तीनों देशों ने अपने रिश्तों को और मजबूत किया और थ्री ब्रदर्स अलायंस बनाया।

भारत ने तेज की अपनी कूटनीति

भारत ने इस गठबंधन (Three Brothers Alliance) का मुकाबला करने के लिए अपनी कूटनीति को तेज कर दिया है। भारत ने उन देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं, जो इस गठबंधन से परेशान हैं। इनमें आर्मेनिया, ईरान, साइप्रस और ग्रीस जैसे देश शामिल हैं। आर्मेनिया के साथ भारत ने सैन्य सहयोग बढ़ाया है। भारत ने आर्मेनिया को हथियार-स्थान रडार, तोपखाने और रॉकेट लांचर जैसे उपकरण बेचे हैं। जेम्सटाउन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में भारत और आर्मेनिया के बीच 2 बिलियन डॉलर का रक्षा समझौता हुआ था, जिसके बाद आर्मेनिया भारत से सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाला देश बन गया।

लेकिन इससे अजरबैजान नाराज हो गया। अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने पिछले साल भारत से आर्मेनिया को हथियार देना बंद करने की मांग की थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब भारत में अजरबैजान का विरोध शुरू हुआ तो गुरुवार सुबह 10 बजे, अजरबैजान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर भारत से आर्मेनिया को हथियारों की आपूर्ति बंद करने की मांग की। हालांकि यह पहली बार नहीं हुआ है, पिछले साल अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने भी भारत से ऐसा ही अनुरोध किया था, लेकिन भारत ने इसे ठुकरा दिया था।

वहीं गुरुवार को भी अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच तनाव की खबरें आईं। नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र में आज सुबह दोनों देशों की सेनाओं के बीच हल्की झड़प हुई, जिसमें किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। अजरबैजान ने आर्मेनिया पर सीमा उल्लंघन का आरोप लगाया था, वहीं, आर्मेनिया ने इसे खारिज कर दिया।

ईरान भी इस गठबंधन से चिंतित

थ्री ब्रदर्स अलायंस (Three Brothers Alliance) से केवल भारत ही नहीं ईरान भी इस गठबंधन से चिंतित है। ईरान में लाखों अजरी लोग रहते हैं, जो सांस्कृतिक रूप से अजरबैजान से जुड़े हैं। ईरान को डर है कि अजरबैजान इन रिश्तों का इस्तेमाल अलगाववादी आंदोलनों को बढ़ावा देने के लिए कर सकता है। भारत ने ईरान के साथ मिलकर इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बनाने की बात कही है, जो भारत को ईरान और आर्मेनिया के रास्ते यूरोप से जोड़ता है। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत हुई है।

भारत ने साइप्रस और ग्रीस के साथ भी अपने कूटनीतिक रिश्ते मजबूत किए हैं। साइप्रस का तुर्किए के साथ उत्तरी साइप्रस को लेकर पुराना विवाद है। भारत ने साइप्रस का समर्थन किया, और बदले में साइप्रस ने भारत के कूटनीतिक मुद्दों का साथ दिया है।

तुर्किए-अजरबैजान का बॉयकॉट

हाल के दिनों में भारत के तुर्किए और अजरबैजान (Three Brothers Alliance) के साथ रिश्ते और खराब हुए हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने एक तुर्किए विश्वविद्यालय के साथ अपना शैक्षणिक समझौता भी रद्द कर दिया है। वहीं, जामिया यूनिवर्सिटी ने भी ऐसा ही कदम उठाया है। भारतीय पर्यटक भी तुर्किए और अजरबैजान का बहिष्कार कर रहे हैं।

पश्चिमी एशिया (मिडिल ईस्ट) मामलों के जानकार और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) में डिप्टी डायरेक्टर और फैलो कबीर तनेजा का कहना है, “यह गठबंधन (Three Brothers Alliance) भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा नहीं है। यह भारत के लिए एक स्थानीय समस्या तो है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह ज्यादा प्रभावशाली नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि तुर्किए और अजरबैजान ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में ज्यादा निवेश नहीं किया है, जिससे इस गठबंधन की ताकत सीमित है।”

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर थ्री ब्रदर्स अलायंस अपने सैन्य और कूटनीतिक सहयोग को और बढ़ाता है, तो यह भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। वहीं, भारत इसके लिए पहले से ही तैयारियों में जुटा हुआ है। वह अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ा रहा है और नए गठबंधनों को मजबूत कर रहा है। रूस का इस क्षेत्र में प्रभाव कम होना भी भारत के लिए एक मौका है, क्योंकि आर्मेनिया जैसे देश अब रूस की जगह भारत की ओर देख रहे हैं।

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Pakistan Air Defence: 2022 Blunder Powers India's Operation Sindoor Triumph
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Pakistan Air Defence: भारतीय सेनाओं में एक किताब अवश्य पढ़ाई जाती है, Sun Tzu की “The Art of War”। Sun Tzu एक प्राचीन चीनी सैन्य रणनीतिकार, दार्शनिक और लेखक थे। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, “लोगों को वही दिखाओ जिसकी उन्हें अपेक्षा हो। इससे वे आपके फैंके जाल में फंस जाते हैं, और तुम उस क्षण की प्रतीक्षा कर सकते हो जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते।” वहीं, उन्होंने एक जगह यह भी लिखा है, “युद्ध की सर्वोच्च कला यह है कि बिना लड़े ही दुश्मन को पराजित कर दिया जाए।” कुछ ऐसा ही पाकिस्तान के साथ हुआ है। 2022 में हुई एक घटना जिसे बेहद सामान्य मान कर पाकिस्तान ने इग्नोर कर दिया था, उसका खामियाजा आज उसे ऑपरेशन सिंदूर में अपने 11 एयरबेसों पर हुई सटीक मिसाइल स्ट्राइक के तौर पर भुगतना पड़ा और बिना लड़े ही घुटने टेकने पड़े।

Pakistan Air Defence: क्या हुआ 9 मार्च, 2022 को?

9 मार्च 2022 को एक खबर आई थी कि ब्रह्मोस मिसाइल पाकिस्तानी इलाके (Pakistan Air Defence) में आ कर गिरी है। उस दौरान पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के महानिदेशक मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार ने 10 मार्च 2022 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि पाकिस्तान वायु सेना (PAF) के एयर डिफेंस ऑपरेशंस सेंटर ने 9 मार्च 2022 को शाम 6:43 बजे भारतीय क्षेत्र के अंदर एक “हाई-स्पीड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट” को ट्रैक किया था। मिसाइल को हरियाणा के सिरसा से लॉन्च किया गया था। उनके अनुसार, मिसाइल ने अपनी तय दिशा से अचानक पाकिस्तानी क्षेत्र की ओर रुख किया और शाम 6:50 बजे मियां चन्नू, खानेवाल जिला, पंजाब में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। पाकिस्तान ने कहा कि मिसाइल ने 124 किमी तक पाकिस्तानी क्षेत्र में 3 मिनट 44 सेकंड तक उड़ान भरी थी।

वहीं, 11 मार्च 2022 को, इस घटना के लगभग 48 घंटे बाद, भारत के रक्षा मंत्रालय ने एक संक्षिप्त बयान जारी किया था। इसमें कहा गया, “9 मार्च 2022 को, नियमित रखरखाव के दौरान एक तकनीकी खराबी के कारण एक मिसाइल गलती से लॉन्च हो गई। यह मिसाइल पाकिस्तान के एक क्षेत्र में गिरी। भारत ने इस घटना पर खेद जताया था और कहा था कि यह राहत की बात है कि इससे किसी की जान नहीं गई।”

मंत्रालय ने यह भी बताया कि सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और एक उच्च-स्तरीय जांच समिति (Court of Enquiry) का गठन किया है। हालांकि इस बयान में मिसाइल के प्रकार का उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन बाद में सूत्रों ने पुष्टि की कि यह भारत-रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल थी। 15 मार्च 2022 को, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारतीय संसद में इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा, “नियमित रखरखाव और निरीक्षण के दौरान एक मिसाइल का अनजाने में लॉन्च हो जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। हमें बाद में पता चला कि मिसाइल पाकिस्तान (Pakistan Air Defence) के क्षेत्र में गिरी।” उन्होंने दोहराया कि यह घटना “खेदजनक” थी और सरकार ने इसे रोकने के लिए प्रक्रियाओं की समीक्षा शुरू कर दी है।

तब भी पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम हुआ था फेल

हालांकि पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने मिसाइल को ट्रैक किया, लेकिन सूत्रों का का कहना है कि पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) उस समय भी फेल हो गया था। उस समय भी पाकिस्तान के पास चीनी मूल के HQ-9 और HQ-16 (LY-80) सिस्टम शामिल थे औऱ वे इस सुपरसोनिक मिसाइल को प्रभावी ढंग से ट्रैक करने या रोकने में असमर्थ रहे। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान के चीनी रडार सिस्टम ने मिसाइल को किसी भी चरण में डिटेक्ट नहीं किया, और केवल इसके दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद ही पाकिस्तानी सेना ने इसकी जानकारी दी।

सूत्रों ने बताया कि अगर पाकिस्तान ने मिसाइल को ट्रैक किया था, तो उसने इसे इंटरसेप्ट क्यों नहीं किया, खासकर जब यह न्यूक्लियर-कैपेबल मिसाइल थी। उस समय भी पाकिस्तान टुडे की एक रिपोर्ट में इस ओर इशारा किया गया था और पाकिस्तान के एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) पर सवाल उठाए गए थे कि मियां चन्नू में दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले ही मिसाइल को क्यों नहीं रोका गया था।

भारतीय सैन्य सूत्रों ने बताया कि समझदार के लिए इशारा ही काफी है। उस समय दोनों देशों के बीच कोई जंग तो छिड़ी नहीं थी। ऐसे में मिसाइल की स्टेल्थ कैपेबिलिटी को टेस्ट करने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता था। गलती मान ली और बात रफादफा हो गई। उन्होंने दावा किया कि मिसाइल का लॉन्च “आकस्मिक” नहीं, बल्कि जानबूझकर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया समय और रक्षा क्षमताओं का टेस्टिंग करने के लिए किया गया था।

ब्रह्मोस की रफ्तार और रेंज के आगे हुए फेल

पाकिस्तान के पास उस समय HQ-9 और HQ-16 (जिसे LY-80 भी कहा जाता है) जैसे एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) थे। लेकिन ये ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों को रोकने में नाकामयाब रहे। HQ-9 की क्रूज मिसाइलों के खिलाफ प्रभावी रेंज केवल 25 किमी के आसपास है, जो ब्रह्मोस की रफ्तार और रेंज (290-500 किमी) के सामने बेकार है। हालांकि 2022 की घटना के बाद पाकिस्तान ने अपने LY-80 सिस्टम में 388 तकनीकी दिक्कतों की एक सूची चीन को सौंपी थी, जिनमें से 255 में तत्काल सुधार की जरूरत थी। हालांकि 2024 में पाकिस्तान ने HQ-16FE जैसे एयर डिफेंस सिस्टम को शामिल करने की पहल की थी।

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ऑपरेशन सिंदूर में मिला ‘गलती’ का फायदा

सूत्रों ने बताया कि ‘गलती’ से ब्रह्मोस मिसाइल गिरने से भारत ने बहुत कुछ सीखा और ऑपरेशन सिंदूर में इसका जबरदस्त फायदा मिला। भारतीय वायुसेना ने 7 से 10 मई के बीच पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी और सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए। ये हमले तब किए गए जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयर डिफेंस (AD) सिस्टम (Pakistan Air Defence) को जाम कर दिया।

सरकारी बयान के मुताबिक, भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की एयर डिफेंस (Pakistan Air Defence) को जाम कर 23 मिनट के भीतर मिशन पूरा किया। इन हमलों में नौ आतंकवादी शिविरों को नष्ट किया गया। रात 9-10 मई को, IAF ने रफीकी, मुरिद, चकलाला, रहीम यार खान, सियालकोट, सक्कर, स्कार्दू, सर्गोधा, जैकोबाबाद, कराची के भोलारी और मलिर कैंट सहित 13 एयरबेस पर हमले किए। खास बात यह रही कि इन हमलों में ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया गया। यह 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर सबसे बड़ा हमला था।

भारतीय वायुसेना ने चीनी HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) को जाम कर दिया, जिससे पाकिस्तान के रडार को सिग्नल नहीं मिला, और भारतीय विमानों को टारगेट करने में फेल हो गए। यही नहीं, भारत ने पहली बार इतने व्यापक स्तर पर लोइटरिंग म्यूनिशन (आत्मघाती ड्रोन) का इस्तेमाल किया, जिससे दुश्मन के हाई-वैल्यू टारगेट जैसे रडार और मिसाइल यूनिट तबाह कर दिए गए। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल किया और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों, जैसे डिकॉय, सिग्नल ब्लॉकिंग और रडार जैमिंग का इस्तेमाल किया। SEAD (Suppression of Enemy Air Defenses) रणनीति के तहत हार्पी ड्रोन ने पाकिस्तानी रडार और मिसाइल सिस्टम को नष्ट किया। लाहौर, सियालकोट और कराची में तैनात रडार यूनिट्स पूरी तरह बेकार हो गईं।

23 मिनट में पूरा किया मिशन

वायुसेना सूत्रों का कहना है, भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के चीनी एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) को नाकाम और जाम कर दिया, मात्र 23 मिनट में मिशन पूरा किया। जामिंग के चलते दुश्मन के रडार कन्फ्यूज हो गए और मिसाइलों को डिटेक्ट नहीं कर पाए। सूत्रों ने बताया कि 2022 तो छोड़िए 2019 में भी पुलवामा आतंकी हमले के बाद जब भारतीय फाइटर जेट बालाकोट में घुसे थे, तो भी पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम उन्हें ट्रैक नहीं कर पाया था।

ऑपरेशन सिंदूर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार ने बताया था कि मिशन के दौरान हमले में स्कैल्प क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। ये मिसाइलें राफेल लड़ाकू विमानों में लगाई गई थीं। ये फ्रांसीसी मूल की मिसाइलें चुपचाप हमला करने के लिए जानी जाती हैं और 500 किलोमीटर से अधिक की रेंज और जमीन के करीब उड़ान भरने की खबियों के लिए जानी जाती हैं। इन मिसाइलों ने पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में बिना रडार की पकड़ में आए निशाने पर सटीक वार किया। एक भी मिसाइल को रडार डिटेक्ट नहीं कर पाए।

सूत्रों का कहना है कि कई सालों की खरीद और अपग्रेड के बावजूद, पाकिस्तान का इंटीग्रेटेड एय़र डिफेंस नेटवर्क (Pakistan Air Defence) उस समय पूरी तरह विफल हो गया जब उसकी असली परीक्षा थी। HQ-9 स्कैल्प मिसाइलों को ट्रैक ही नहीं कर पाया। पाकिस्तान को समझना चाहिए कि जिस बीजिंग के हथियारों के भरोसे वह जंग के मैदान में उतरा है, वह कितने कारगर हैं।

एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है ब्रह्मोस

सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के एयर डिफेंस (Pakistan Air Defence) के जाम होने का फायदा ब्रह्मोस को मिला और वे उसे डिटेक्ट नहीं कर पाए। बता दें कि ब्रह्मोस की रफ्तार लगभग 2.8 से 3.5 मैक है, जो दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज मिसाइलों में से एक है। इस तेज रफ्तार के कारण दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है। 290 किमी की रेंज वाली ब्रह्मोस कुछ ही मिनटों में लक्ष्य तक पहुंच सकती है, जिससे इंटरसेप्शन मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा ब्रह्मोस समुद्र की सतह से 3-10 मीटर की ऊंचाई पर उड़ान भर सकती है (सी-स्किमिंग) और जमीनी लक्ष्यों के लिए इलाके के करीब (टेरेन-हगिंग) उड़ान भरती है। इससे रडार इसका पता नहीं पाते क्योंकि क्योंकि कम ऊंचाई पर रडार की लाइन-ऑफ-साइट सीमित होती है।

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इसके अलावा ब्रह्मोस विभिन्न फ्लाइट पाथ, जैसे कि ऊंची उड़ान, सीधी गोता (Steep Dive), और समुद्र-स्तर की उड़ान, का उपयोग कर सकती है। इस ट्रैजेक्टरी के चलते एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना मुश्किल हो जाता है। साथ ही, ब्रह्मोस में भी स्टील्थ खूबियां हैं, जो इसके रडार क्रॉस-सेक्शन को कम करती हैं। इससे यह रडार द्वारा आसानी से डिटेक्ट नहीं होती। ब्रह्मोस-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) में यह खूबी और एडवांस होगी, जिससे इसे डिटेक्ट करना और मुश्किल होगा। ब्रह्मोस में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS), जीपीएस/ग्लोनास, और एक्टिव/पैसिव रडार सीकर का कॉन्बिनेशन है। जो इसे इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेज़र्स (ECCM) के खिलाफ ताकतवर बनाता है, क्योंकि यह दुश्मन के जैमिंग प्रयासों को नजरअंदाज कर लक्ष्य को भेद सकता है।

Trump Meets Al-Shara: सामने आया अमेरिका और ट्रंप का दोगलापन, ‘पूर्व वांटेड आतंकी’ से की मुलाकात, रखा था 85 करोड़ का इनाम

Trump Meets Al-Shara: U.S. Hypocrisy Exposed, $10M Bounty to Ally

Trump Meets Al-Shara: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात की। यह मुलाकात इसलिए भी सुर्खियों में है क्योंकि अल-शरा वही शख्स हैं, जिन पर कुछ साल पहले अमेरिका ने 10 मिलियन डॉलर (लगभग 85 करोड़ रुपये) का इनाम रखा था और उन्हें आतंकवादी घोषित किया था। इस मुलाकात ने न केवल पूरी दुनिया को चौंकाया है, बल्कि इससे अमेरिका और ट्रंप का दोहरा चेहरा भी सामने आ गया है।

Trump Meets Al-Shara: कौन है अल-शरा?

अहमद अल-शरा (Trump Meets Al-Shara) को पहले अबू मोहम्मद अल-जुलानी के नाम से जाना जाता था। जो एक समय अल-कायदा से जुड़े रहे थे। 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले के बाद वे वहां अमेरिकी सेना के खिलाफ लड़ने वाले विद्रोहियों में शामिल हो गए थे। बाद में, उन्होंने सीरिया में नुसरा फ्रंट की स्थापना की, जो अल-कायदा की सीरियाई शाखा थी। इस संगठन को बाद में हयात तहरीर अल-शाम (HTS) के रूप में पुनर्गठित किया गया, जो कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित है।

अमेरिका ने अल-शरा (Trump Meets Al-Shara) को उनकी आतंकवादी गतिविधियों के लिए मोस्ट वांटेड सूची में शामिल किया था और उनके सिर पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा था। इराक में उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी, लेकिन बाद में वे रिहा हो गए और सीरियाई गृहयुद्ध में एक प्रमुख चेहरा बन गए। दिसंबर 2024 में, HTS के नेतृत्व में विद्रोही समूहों ने दमिश्क पर कब्जा कर लिया और बशर अल-असद के 54 साल पुराने शासन का अंत कर दिया। जनवरी 2025 में अल-शरा को सीरिया का अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया गया।

ट्रंप का यू-टर्न

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Trump Meets Al-Shara) ने मंगलवार, 13 मई 2025 को सऊदी अरब में एक इनवेस्टमेंट समिट को संबोधित करते हुए सीरिया पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा की। यह घोषणा अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक कदम थी, क्योंकि ये प्रतिबंध बशर अल-असद के शासन के दौरान लगाए गए थे ताकि सीरियाई सरकार पर आर्थिक और राजनयिक दबाव बनाया जा सके। ट्रंप ने कहा, “सीरिया में एक नई सरकार है, और हम उन्हें शांति और पुनर्निर्माण का मौका देना चाहते हैं। मैं सभी प्रतिबंध हटाने का आदेश देता हूं। सीरिया, हमें कुछ विशेष दिखाएं।”

इस घोषणा के ठीक एक दिन बाद, ट्रंप ने अल-शरा (Trump Meets Al-Shara) से मुलाकात की। यह 25 वर्षों में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति और सीरियाई नेता की पहली मुलाकात थी। इससे पहले 2000 में, तत्कालीन सीरियाई राष्ट्रपति हाफिज अल-असद ने जिनेवा में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुलाकात की थी। ट्रंप और अल-शरा की यह मुलाकात सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की मौजूदगी में हुई, और तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन भी फोन कॉल के जरिए इस चर्चा में शामिल रहे।

मुलाकात का क्या है कूटनीतिक महत्व

यह मुलाकात कई मायनों में महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, यह अमेरिका की सीरिया नीति में एक बड़े बदलाव का प्रतीक है। जहां एक समय अल-शरा को अमेरिका आतंकवादी (Trump Meets Al-Shara) मानता था, वहीं अब ट्रंप प्रशासन ने उनके साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ट्रंप ने इस मुलाकात को क्षेत्रीय स्थिरता और ईरान के प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा बताया। सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय शक्तियों ने भी अल-शरा की सरकार को समर्थन दिया है, क्योंकि उनका मानना है कि इससे सीरिया में ईरान का प्रभाव कम होगा, जिसने असद शासन के दौरान वहां अपनी पकड़ मजबूत की थी।

दूसरा, इस मुलाकात ने सीरिया के लिए आर्थिक और कूटनीतिक राहत की संभावनाएं खोली हैं। प्रतिबंधों के हटने से सीरिया को पुनर्निर्माण और आर्थिक सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता मिलने की उम्मीद है। सीरिया के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के इस फैसले को “सीरियाई लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण” बताया और कहा कि यह देश को युद्ध के दर्दनाक दौर से बाहर निकालने में मदद करेगा।

सीरिया में जश्न का माहौल

ट्रंप की प्रतिबंध हटाने की घोषणा के बाद सीरिया (Trump Meets Al-Shara) की राजधानी दमिश्क में जश्न का माहौल देखा गया। सरकारी समाचार एजेंसी ‘सना’ ने वीडियो और तस्वीरें जारी कीं, जिनमें उमय्यद स्कवायर पर लोग आतिशबाजी करते और नया सीरियाई झंडा लहराते नजर आए। कई लोगों ने अपनी कारों के हॉर्न बजाकर खुशी जाहिर की। यह जश्न इस बात का प्रतीक था कि सीरियाई जनता, जो पिछले 14 वर्षों से गृहयुद्ध और आर्थिक संकट से जूझ रही थी, अब एक नई शुरुआत की उम्मीद कर रही है।

हालांकि, ट्रंप की इस मुलाकात (Trump Meets Al-Shara) और प्रतिबंध हटाने के फैसले पर विवाद भी खड़ा हुआ है। कई आलोचकों का कहना है कि यह मुलाकात अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति के खिलाफ है। अल-शरा का संगठन HTS अभी भी अमेरिका और अन्य देशों की आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुलाकात सऊदी अरब के दबाव और व्यापारिक हितों के कारण हुई। सऊदी अरब ने हाल ही में अमेरिका में 600 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की है, और माना जा रहा है कि ट्रंप ने यह कदम क्षेत्रीय सहयोगियों को खुश करने के लिए उठाया।

इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों ने अभी तक इस पर कोई ठोस बयान नहीं दिया है, लेकिन कुछ यूरोपीय नेता स्थिरता और प्रवास की नई लहरों को रोकने के लिए सीरिया के साथ आर्थिक जुड़ाव की वकालत कर रहे हैं।

वहीं कुछ विशेषज्ञों ने ट्रंप की इस मुलाकात (Trump Meets Al-Shara) को क्षेत्रीय स्थिरता और ईरान के प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा, “सीरिया में एक नई सरकार है। हमें उनके साथ काम करने का मौका लेना चाहिए।” यह मुलाकात सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों के समर्थन से संभव हुई, जो मानते हैं कि अल-शरा की सरकार सीरिया में ईरान की पकड़ को ढीला कर सकती है।

अल-शरा का नया चेहरा

अल-शरा ने हाल के महीनों में खुद को एक उदारवादी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। वे पश्चिमी शैली के सूट पहनते हैं और सीरिया के विकास के लिए प्रतिबंध हटाने की वकालत करते हैं। उन्होंने अल-कायदा से अपने संबंध तोड़ लिए हैं और अल्पसंख्यकों व महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की बात की है। हालांकि, कई विश्लेषकों को संदेह है कि क्या वे इन वादों पर लंबे समय तक अमल कर पाएंगे।

सऊदी अरब में भव्य स्वागत

ट्रंप का सऊदी अरब में शाही अंदाज में स्वागत किया गया। जैसे ही एयर फोर्स वन रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा, सऊदी पायलटों द्वारा उड़ाए गए छह अमेरिकी निर्मित F-15 लड़ाकू विमानों ने उन्हें एस्कॉर्ट किया। ट्रंप ने बैंगनी रंग के कालीन पर कदम रखा, जो सऊदी अरब में रेगिस्तानी जंगली फूलों और आतिथ्य का प्रतीक है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सैकड़ों सैन्य, सरकारी और व्यावसायिक अधिकारियों के साथ उनकी अगवानी की। अमेरिकी और सऊदी झंडों के साथ सफेद अरबी घोड़ों पर सवार सैनिकों ने ट्रंप के काफिले को शाही टर्मिनल तक पहुंचाया, जहां पारंपरिक कॉफी समारोह का आयोजन हुआ। यह भव्य स्वागत 2022 में जो बाइडन के दौरे के विपरीत था, जब खशोगी हत्याकांड के बाद तनावपूर्ण संबंधों के बीच बाइडन का स्वागत बेहद सादा रहा था।

आर्थिक और रक्षा समझौते

ट्रंप की यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना था। यूएस-सऊदी निवेश मंच में 600 बिलियन डॉलर के समझौतों की घोषणा की गई, हालांकि दस्तावेजों से पता चला कि केवल 283 बिलियन डॉलर के समझौते ही पक्के हुए हैं। इनमें सबसे बड़ा था 142 बिलियन डॉलर का रक्षा सौदा, जिसे “इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा बिक्री समझौता” बताया गया। इस सौदे के तहत सऊदी अरब को उन्नत अमेरिकी सैन्य उपकरण, प्रशिक्षण और सहायता मिलेगी।

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सऊदी टेक कंपनी डाटावोल्ट ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा बुनियादी ढांचे में 20 बिलियन डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई। एनवीडिया ने सऊदी कंपनी ह्यूमैन को 18,000 से अधिक ब्लैकवेल एआई चिप्स बेचने का समझौता किया। अमेरिकी कंपनियां जैसे जैकब्स और AECOM सऊदी अरब में किंग सलमान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, किंग सलमान पार्क और किद्दिया सिटी जैसे बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं।

Air Defense: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान रूस ने भारत को दिया था S-500 का बड़ा ऑफर! ‘स्वदेशी S-400’ करेगा चीन-पाकिस्तान की नींद हराम

Air Defense: Russia offers India S-500 production; India trusts Project Kusha

Air Defense: भारत ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपने एयर डिफेंस और अपनी सैन्य ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने न केवल दुश्मन देश पाकिस्तान के होश उड़ गए, बल्कि चीन को भी तगड़ा सरप्राइज मिला। इस अभियान में भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान के भीतर नौ आतंकी ठिकानों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में भारतीय सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोनों से हमले किए, लेकिन भारत के अचूक एयर डिफेंस सिस्टम ने इन सभी खतरों को नाकाम कर दिया। इस ऑपरेशन ने भारत की मल्टी लेयर डिफेंस सिस्टम को दुनिया के सामने ला खड़ा किया, जिसमें रूस से मिले S-400 ट्रायम्फ, इजरायल के साथ विकसित बराक-8, स्वदेशी आकाश मिसाइल, और डीआरडीओ की एडवांस टेक्नोलॉजी ने अहम भूमिका निभाई।

Air Defense: रूस ने दिया S-500 का ऑफर

इस सफलता के बाद रूस ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ही भारत को एडवांस S-500 प्रोमेथियस एय़र डिफेंस सिस्टम के संयुक्त उत्पादन का भी प्रस्ताव दिया है। इससे पहले जुलाई 2024 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान, रूस ने S-500 के संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव दिया था। दिसंबर 2021 में, रूसी उपप्रधानमंत्री यूरी बोरिसोव ने कहा था कि भारत S-500 सिस्टम का पहला विदेशी खरीदार हो सकता है। S-500 प्रोमेथियस (Prometheus), जिसे 55R6M त्रिउम्फ़टोर-M भी कहा जाता है, यह रूस का सबसे एडवांस सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है, जो S-400 का उत्तराधिकारी है। एस-500 की रेंज 600 किमी (बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए) और 500 किमी (वायु रक्षा के लिए) है। यह हाइपरसोनिक मिसाइलों, स्टील्थ विमानों, इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM), और निम्न-कक्षा उपग्रहों को भी निशाना बना सकती है। इसका AESA रडार 2,000 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्य का पता लगा सकता है, और इसका प्रतिक्रिया समय केवल 4 सेकंड है, जो S-400 के 10 सेकंड से कहीं तेज है।

हालांकि भारत ने रूस के इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक तौर पर कोई बयान जारी नहीं किया है। रक्षा सूत्रों का कहना है कि दीर्घकालिक स्वदेशी समाधानों पर ध्यान दे रहा है। क्योंकि भारत को अमेरिका, इजरायल, और अन्य पश्चिमी देशों के साथ रक्षा सहयोग को भी बनाए रखना है। उन्होंने बताया कि S-400 सौदे के बाद CAATSA प्रतिबंधों का खतरा था। S-500 के लिए भी यही जोखिम है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पहले ही बाकी बची दो S-400 की डिलीवरी में देरी हुई है, जो S-500 के लिए भी हो सकती है। ऐसे में भारत स्वदेश में ही निर्मित एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी पर फोकस कर रहा है।

Air Defense: Project Kusha
Project Kusha

भारत का स्वदेशी S-400!

रक्षा सूत्रों के मुताबिक भारत अपने स्वदेशी S-400 को बनाने में जुटा है। डीआरडीओ का प्रोजेक्ट कुशा, यह लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (LRSAM) है, जो S-400 के समकक्ष है, जिसका पहला परीक्षण 2026 में होने की उम्मीद है। यह सिस्टम भारतीय वायुसेना (IAF) और नौसेना को हवाई खतरों जैसे स्टील्थ फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल, ड्रोन, और बैलिस्टिक मिसाइलों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। अप्रैल 2024 में कुशा का डिजाइन फेज पूरा हुआ, और अब डुअल-पल्स रॉकेट मोटर और नए प्रोपेलेंट फ्यूल-1 की टेस्टिंग जल्द होने वाली है। प्रोजेक्ट कुशा को रूस के S-400 ट्रायम्फ और इज़राइल के आयरन डोम के समकक्ष माना जा रहा है। यह भारत के एयर डिफेंस हवाई को मजबूत करने के साथ-साथ विदेशी हथियार प्रणालियों पर निर्भरता को कम करेगा। हाल ही में फरवरी में हुए एयरो इंडिया 2025 में प्रोजेक्ट कुशा का स्केल मॉडल भी शोकेस किया गया था, जिसमें तीन अलग-अलग SAM (120-350 किमी रेंज) और उनकी टेक्नोलॉजी को दिखाया गया था।

सूत्हरों का कहना है, हमें चीनी हाइपरसोनिक क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल खतरों का मुकाबला करने के लिए S-500 जैसी स्वदेशी प्रणाली की जरूरत है। S-500 मैक-20 की गति वाली मिसाइलों को रोक सकता है, जबकि प्रोजेक्ट कुशा मैक-7+ की मिसाइलों को रोकने में सक्षम है, जो पर्याप्त नहीं है।

350-400 किलोमीटर होगी रेंज

अगस्त 2024 तक, डीआरडीओ ने M1 मिसाइल (150 किमी रेंज) के लिए पांच यूनिट्स का निर्माण शुरू कर दिया था। इसके लिए 20 सेट एयरफ्रेम, 20 सेट रॉकेट मोटर, और 50 किल व्हीकल (वॉरहेड) का ऑर्डर दिया गया। इस सिस्टम में तीन तरह की इंटरसेप्टर मिसाइलें होंगी, जिनकी रेंज 150, 250, और 350-400 किलोमीटर होगी। मिसाइल की रफ्तार मैक 5.5 होगी, और यह IR+RF सीकर से लैस होगी। इसमें लंबी दूरी का सर्विलांस और फायर कंट्रोल रडार शामिल होगा, जिसमें LRBMR (लॉन्ग रेंज बैटल मैनेजमेंट रडार) S-बैंड रडार 500 किमी से अधिक की दूरी तक खतरों का पता लगा सकता है। खास बात यह होगी कि यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के साथ पूरी तरह इंटीग्रेट होगा, जो विभिन्न रडारों और वेपन सिस्टम को जोड़ता है।

वहीं, अगर भारत में ही सिस्टम तैयार होता है, तो भारत को एस-400 की मिसाइलों की तरह इसके लिए मिसाइलें खरीदने के लिए विदेश की तरफ नहीं ताकना होगा। भारतीय नौसेना इसे अपने अगली पीढ़ी के युद्धपोतों पर तैनात करने की योजना बना रही है। 2022 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी, और 2023 में रक्षा मंत्रालय ने 21,700 करोड़ रुपये की लागत से पांच स्क्वाड्रन की खरीद को हरी झंडी दिखाई। इसे 2028-29 तक वायुसेना और नौसेना में तैनात किया जाएगा। भारतीय वायुसेना कुल 10 स्क्वाड्रन शामिल करने की योजना बना रही है, जिससे भारत का एय़र डिफेंस मजबूत होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोजेक्ट कुशा की सफलता के बाद भारत इसे ASEAN देशों को निर्यात कर सकता है, जिससे चीन के क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिलेगी।

मोदी सरकार ने मजबूत किया एयर डिफेंस सिस्टम

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता रातोंरात नहीं मिली। यह पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की रक्षा नीति और रणनीतिक तैयारी का नतीजा है। 2014 के बाद से, भारत ने अपनी हवाई रक्षा को मजबूत करने के लिए कई बड़े और ठोस कदम उठाए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है रूस के साथ 2018 में हुआ 35,000 करोड़ रुपये का सौदा, जिसमें भारत ने पांच S-400 ट्रायम्फ स्क्वाड्रन खरीदे। इनमें से तीन स्क्वाड्रन अब चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात हैं। यह प्रणाली 400 किलोमीटर की दूरी तक हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम है और ऑपरेशन सिंदूर में इसने पाकिस्तानी मिसाइलों और ड्रोन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अलावा, भारत ने 2017 में इजरायल के साथ 2.5 बिलियन डॉलर का सौदा किया, जिसके तहत बराक-8 मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम खरीदा था। यह सिस्टम अब बठिंडा जैसे अग्रिम सैन्य अड्डों की सुरक्षा में तैनात है। डीआरडीओ के स्वदेशी आकाश मिसाइल सिस्टम ने भी छोटी और मध्यम दूरी के खतरों को नष्ट करने में अपनी क्षमता साबित की। साथ ही, डीआरडीओ की एंटी-ड्रोन तकनीक और मैन पोर्टेबल काउंटर ड्रोन सिस्टम (MPCDS) ने पाकिस्तानी ड्रोन को जाम कर उन्हें मार गिराया।

एलओसी पार किए बिना सर्जिकल स्ट्राइक

2021 में भारत ने स्वदेशी लॉइटरिंग म्यूनिशन्स का ऑर्डर दिया था, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार युद्ध में हिस्सा लिया। ये आत्मघाती ड्रोन एक साथ कई लक्ष्यों पर सटीक हमले करने में सक्षम हैं। इसके अलावा, इजरायल के हारोप ड्रोन, जो अब भारत में ही बनाए जा रहे हैं, ने पाकिस्तानी हवाई रक्षा इकाइयों को नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई। राफेल विमानों ने SCALP और HAMMER मिसाइलों के साथ जमकर कहर बरपाया, जिससे साबित हुआ कि भारत एलओसी पार किए बिना ही पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक करने की ताकत रखता है। इन सभी सिस्टम को इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के साथ जोड़ा गया है। यह सिस्टम विभिन्न रडारों और वेपन सिस्टम को एकजुट करता है, जिससे भारत को एक ऐसी हवाई रक्षा छतरी मिली है, जो खतरों का पता लगाने के साथ-साथ उन्हें तुरंत नष्ट कर सकती है। यह सिस्टम ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का आधार बना।

Operation Sindoor: भारत की जवाबी कार्रवाई, ढेर हुआ चीन से खरीदा पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन से लाहौर तक की मार!

ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पूरी दुनिया ने भारत की डिफेंस कैपेबिलिटी को देखा है। जिसने यह दिखा दिया कि खुद को बेहद एडवांस कहने वाली पाकिस्तानी सेना भी घुटने टेकने को मजबूर हो गई। साथ ही ये भी बता दिया कि बिना सीमा लांघे भारत न केवल दुश्मन के इलाके में भी निर्णायक कार्रवाई कर सकता है, बल्कि अपने आसमान और अपनी सीमाओं की भी सुरक्षा कर सकता है।

India-China: इधर देश ऑपरेशन सिंदूर में उलझा रहा, उधर चीन ने अरुणाचल प्रदेश में रची ये बड़ी साजिश, भारत ने दिखाया आइना

India-China: China renames Arunachal Pradesh locations, India rejects
Credit: AI Image

India-China: जब पूरा देश भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और ऑपरेशन सिंदूर की सफलताओं में व्यस्त था, उसी दौरान चीन ने चुपचाप भारत के राज्य अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नाम बदलने की घोषणा कर दी। यह कोई पहली बार नहीं है, बल्कि चीन की ओर से अरुणाचल को लेकर इस तरह की यह पांचवीं सूची है, जिसमें उसने भारतीय क्षेत्र को अपने नक्शे और नामों में शामिल करने की कोशिश की है।

वहीं भारत ने इसे चीन का एक और बेतुका और आधारहीन प्रयास करार देते हुए कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। साथ ही, भारत सरकार ने चीन के प्रोपेगंडा पर कड़ी कार्रवाई करते हुए चीन के माउथपीस ग्लोबल टाइम्स औऱ शिनहुआ न्यूज एजेंसी के एक्स अकाउंट को भारत में ब्लॉक कर दिया है।

India-China: जांगनान का हिस्सा मानता है चीन

चीन ने अपने नागरिक मामलों के मंत्रालय के जरिए 11 मई को अरुणाचल प्रदेश के 27 जगहों के लिए नए नामों का एलान किया। चीन के सिविल अफेयर्स मंत्रालय ने इसे “दक्षिण तिब्बत क्षेत्र के सार्वजनिक नामकरण (पांचवी सूची)” के रूप में जारी किया है। चीन इसे तिब्बत के दक्षिणी हिस्से (जिसे वह “जांगनान” कहता है) का हिस्सा मानता है और इन नामों को “मानकीकृत भौगोलिक नाम” के रूप में पेश करता है।

भारत ने दिया जवाब

भारत ने इसे चीन का एक और बेतुका और आधारहीन प्रयास करार देते हुए कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। विदेश मंत्रालय का कहना है, “चीन की यह हरकत न केवल आधारहीन है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों और भारत की संप्रभुता का उल्लंघन भी है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इस तरह की कोशिशें न तो ऐतिहासिक तथ्यों को बदल सकती हैं और न ही अरुणाचल प्रदेश के लोगों की भावनाओं को।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “चीन बार-बार अरुणाचल प्रदेश में जगहों के नाम बदलने की नाकाम कोशिश कर रहा है। हम इस तरह के प्रयासों को पूरी तरह खारिज करते हैं।” चीन की इस हरकत को लेकर भारत ने साफ कर दिया है कि इस तरह की “नामकरण” की कोशिशें अरुणाचल प्रदेश की वास्तविकता को कभी नहीं बदल सकतीं। जयसवाल ने कहा, “यह सच्चाई अटल है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है और रहेगा।”

विदेश मंत्री का सख्त रुख

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब चीन ने इस तरह की हरकत की हो। यह अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने की उसकी यह पांचवीं सूची है। इससे पहले भी चीन ने कई बार इस तरह की कोशिशें की हैं, जिन्हें भारत ने हर बार करारा जवाब दिया है।

इससे पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी इस मुद्दे पर चीन को कड़ा संदेश दिया था। उन्होंने कहा था, “अगर मैं आपके घर का नाम बदल दूं, तो क्या वह मेरा हो जाएगा? अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। नाम बदलने से हकीकत नहीं बदलती।” जयशंकर ने यह भी कहा था कि चीन की यह हरकत “बेतुकी” है और बार-बार ऐसा करने से भी यह बेतुकी ही रहेगी।

उन्होंने यह भी जोड़ा, “मैं इसे इतनी स्पष्टता से कह रहा हूं कि न केवल देश में, बल्कि देश के बाहर भी लोग इस संदेश को अच्छी तरह समझ लें।” जयशंकर का यह बयान न केवल चीन के लिए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक साफ संदेश था कि भारत अपनी संप्रभुता पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा।

क्या है इस विवाद की जड़?

चीन और भारत के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। चीन अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों को तिब्बत का हिस्सा मानता है और इसे “जांगनान” कहता है। वह समय-समय पर इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, बस्तियां बसाने और नाम बदलने जैसी गतिविधियां करता रहता है, जिन्हें भारत अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।

अरुणाचल प्रदेश भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और सामरिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह क्षेत्र भारत-चीन सीमा पर स्थित है और दोनों देशों के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही इस क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है।

दबे शब्दों में चीन की बौखलाहट

खास बात यह है कि चीन ने इस सूची को भारत-पाकिस्तान तनाव के समय जारी किया, जब भारत का फोकस सीमा पर सैन्य ऑपरेशन और राजनयिक गतिविधियों पर था। यह चीन की रणनीति हो सकती है कि जब भारत किसी और मोर्चे पर व्यस्त हो, तब वह अपने पुराने एजेंडे को आगे बढ़ाए।

लेकिन भारत ने समय रहते प्रतिक्रिया दी और चीन की इस कूटनीतिक चाल को नकार दिया। भारत ने चीन की इस हरकत पर कड़ा लेकिन संतुलित प्रतिक्रिया दी। सरकार की नीति यह रही है कि उकसावे में आए बिना, तथ्यों और कूटनीतिक आधार पर जवाब दिया जाए। भारत ने न केवल इस कदम की आलोचना की, बल्कि चीन को यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि नाम बदलना, इतिहास और भूगोल को नहीं बदल सकता।

वहीं, अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानूनों और सीमाओं के अनुसार मजबूत है। यहां लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार है, संविधान के तहत शासन है, और यहां के लोग खुद को भारतीय नागरिक मानते हैं।

संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों ने भी यह साफ कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। चीन की इस प्रकार की गतिविधियां वैश्विक समुदाय में उसकी स्थिति को और कमजोर करती हैं।

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भारत सरकार ने इस क्षेत्र में विकास कार्यों को तेज किया है, जिसमें सड़कें, पुल, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है। अरुणाचल प्रदेश के लोग भी चीन की इन हरकतों का पुरजोर विरोध करते हैं। भारत ने वहां अपनी सीमाओं की सुरक्षा को और मजबूत किया है। अरुणाचल प्रदेश में सैन्य अड्डों का निर्माण, सड़कों का जाल और संचार सुविधाओं का विस्तार इसका प्रमाण है। भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

Nur Khan Airbase: जब ‘दिल’ पर लगी चोट, तो क्यों घबराया पाकिस्तान? इसलिए घुटने पर आने को हुआ मजबूर, चीन भी हुआ बेनकाब

Nur Khan Airbase Strike: Why Pakistan Buckled and China Got Exposed

Nur Khan Airbase: 10 मई 2025 की रात पाकिस्तान के लिए एक बुरे सपने की तरह थी, जब भारत ने रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस या चकलाला एयरबेस को तबाह कर दिया। यह हमला न केवल पाकिस्तान के ‘दिल’ के पर चोट थी, बल्कि उसके सबसे बड़े साझेदार चीन को भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। इस दिल पर लगी चोट की वजह से ही पाकिस्तान घुटने पर आया और संघर्ष विराम के लिए मजबूर हुआ। यह हमला सिर्फ नूर खान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत ने 90 मिनट के भीतर पाकिस्तान के कई अन्य एयरबेस को भी निशाना बनाया।

सैन्य सूत्रों का कहना है कि यह एयरबेस पाकिस्तान की परमाणु रणनीति का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। भारत ने इस हमले के जरिए न केवल पाकिस्तान की सैन्य ताकत को झकझोर दिया, बल्कि उसकी परमाणु हथियारों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अब पाकिस्तान की हरकतों का जवाब सख्ती से देगा। इस हमले ने पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया है और उसे अपनी रक्षा नीतियों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।

वहीं भारत ने इस हमले से दो बातें स्पष्ट कर दीं, पहली यह कि भारत आतंक के हर अड्डे को उसके गढ़ में घुसकर नष्ट करेगा, और दूसरी, अब पाकिस्तान की ‘परमाणु धमकी’ की ब्लफिंग काम नहीं करेगी।

Nur Khan Airbase पर हमला: क्या हुआ?

10 मई की रात भारत ने एक सटीक सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया। इस हमले में रावलपिंडी के नूर खान एयरबेस को निशाना बनाया गया। यह बेस इस्लामाबाद के बेहद करीब है और कहा जाता है कि यहां पाकिस्तान ने अपने परमाणु जखीरे को रखा हुआ है। यह हमला इतना सटीक था कि नूर खान एयरबेस के कई अहम ढांचे मिनटों में तबाह हो गए। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, भारत ने इस हमले में ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया, जो अपनी सटीकता के लिए जाना जाती है औऱ किसी रडार सिस्टम की पकड़ में नहीं आती है।

लेकिन भारत का हमला सिर्फ नूर खान तक सीमित नहीं था। भारत ने एक के बाद एक कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इनमें रफीकी एयरबेस (शोरकोट), मुरिद एयरबेस (पंजाब), सुक्कुर एयरबेस (सिंध), सियालकोट एयरबेस, सरगोधा एयरबेस, स्कर्दू एयरबेस, भोलारी एयरबेस (कराची के पास), जैकोबाबाद एयरबेस और पासरूर हवाई पट्टी शामिल थे। ये सभी हमले 90 मिनट के भीतर किए गए, जिसने पाकिस्तान की वायु सेना को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया।

ऑपरेशन सिंदूर के तहत की गई कार्रवाई में भारत ने न केवल पाकिस्तान के हमलों का जवाब दिया, बल्कि पाकिस्तान की ओर से दागी गई 8 मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया। इसके बाद भारत ने लाहौर और इस्लामाबाद में भी जवाबी कार्रवाई की।

नूर खान एयरबेस क्यों है इतना अहम?

नूर खान एयरबेस पाकिस्तान की सैन्य और परमाणु रणनीति का एक बड़ा केंद्र है। यह बेस रावलपिंडी में है, जो इस्लामाबाद से ज्यादा दूर नहीं है। इसकी खासियत यह है कि यह पाकिस्तान की सेना के मुख्यालय के करीब है। इस वजह से यह बेस सेना और वायु सेना के बीच तालमेल बनाने में अहम भूमिका निभाता है।

खुफिया सूत्रों के मुताबिक, नूर खान एयरबेस पर कई अहम सैन्य उपकरण रखे गए थे। यहां पर साब एरियाई जैसे हवाई चेतावनी सिस्टम, C-130 ट्रांसपोर्टर विमान और IL-78 रिफ्यूलिंग विमान मौजूद थे। ये सिस्टम पाकिस्तान की वायु सेना के लिए बहुत जरूरी हैं, क्योंकि ये निगरानी, सामान ढोने और विमानों को हवा में ईंधन भरने का काम करते हैं। यह बेस न सिर्फ वीआईपी ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स का मुख्य अड्डा है, बल्कि यहां से एयर मोबिलिटी कमांड और ड्रोन ऑपरेशंस का संचालन भी होता है। यही वह स्थान है जहां से शाहपर-I और तुर्की निर्मित बैरक्तार TB2 ड्रोन उड़ाए जाते थे, जो हाल ही में भारत के खिलाफ हमलों में इस्तेमाल हुए।

Nur Khan Airbase Strike: Why Pakistan Buckled and China Got Exposed

नूर खान बेस का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से जुड़ा हुआ है। यहां पर परमाणु हथियार रखे जाते हैं। इस बेस पर परमाणु हथियारों से लैस विमानों को तैनात किया जाता है, जो भारत के खिलाफ पाकिस्तान की परमाणु रणनीति का हिस्सा हैं। इसके अलावा, यह बेस इस्लामाबाद और रावलपिंडी के करीब होने की वजह से पाकिस्तान की त्वरित प्रतिक्रिया रणनीति में अहम भूमिका निभाता है।

सूत्रों ने बताया कि नूर खान बेस का इस्तेमाल बड़े नेताओं और वीआईपी लोगों को ले जाने वाले विमानों के लिए भी होता था। यहाँ पर खास पायलटों को ट्रेनिंग दी जाती थी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जैसे लोग इस बेस से अपने विमानों का इस्तेमाल करते थे। इतना ही नहीं, यह बेस सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी शामिल था।

पाकिस्तान आया घुटनों पर

इस हमले ने पाकिस्तान को कई तरह से नुकसान पहुंचाया। सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि नूर खान एयरबेस के नष्ट होने से पाकिस्तान की वायु सेना और सेना के बीच का संपर्क टूट गया। यह बेस पाकिस्तान की वायु सेना की रीढ़ की हड्डी माना जाता था। इसके तबाह होने से पाकिस्तान के एयर डिफेंस और जवाबी हमले करने की क्षमता पर बड़ा असर पड़ा। नूर खान एयर बेस पर परमाणु हथियारों से लैस मिराज-5 विमानों को तैनात करने की क्षमता है, जो भारत के खिलाफ पाकिस्तान की परमाणु प्रतिरोधक रणनीति का हिस्सा हैं।

दूसरा, इस हमले ने पाकिस्तान के डिफेंस सिस्टम को तार-तार कर दिया। नूर खान एयरबेस की सुरक्षा में चीनी रडार तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन भारतीय हमले ने स्पष्ट कर दिया कि HQ-9 जैसे चीनी सिस्टम भारतीय मिसाइलों के सामने बेकार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि “यह हमला चीन के लिए भी शर्मनाक है क्योंकि उसकी टेक्नोलॉजी पाकिस्तान के लिए ढाल नहीं बन सकी।”

तीसरा, इस हमले ने पाकिस्तान की सैन्य छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान हमेशा से खुद को भारत के बराबर की सैन्य ताकत बताता रहा है, लेकिन इस हमले ने उसकी इस छवि को तोड़ दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और तस्वीरों में नूर खान एयरबेस के जलते ढांचे साफ दिख रहे थे। पाकिस्तान की सेना ने दावा किया कि उसने भारत के हमले को रोक लिया, लेकिन इन तस्वीरों ने उसके दावों की पोल खोल दी।

पाकिस्तान में आम लोगों ने भी अपनी सेना का मजाक उड़ाया। सोशल मीडिया पर लोग मीम्स और वीडियो शेयर कर रहे थे, जिनमें वे सेना के झूठे दावों की हंसी उड़ा रहे थे। इससे पाकिस्तान की सेना को अपने ही देश में शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

पाकिस्तान के अन्य सैन्य ठिकानों का हाल

पाकिस्तान के पास कई ऐसे सैन्य ठिकाने हैं, जो परमाणु हथियारों से जुड़े हैं। नूर खान एयरबेस के अलावा भारत ने कई अन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया। वाह कैंट में पाकिस्तानी ऑर्डिनेंस फैक्ट्री को भी निशान बनाया गया, जो परमाणु हथियार बनाने का एक बड़ा केंद्र है। यहां पर परमाणु हथियारों के लिए जरूरी सामान तैयार किया जाता है। वहीं, हरिपुर में तरनावा मिसाइल कॉम्प्लेक्स को निशाना बनाया, यह जगह मिसाइलों और परमाणु हथियारों को बनाने और उनकी टेस्टिंग के लिए जानी जाती है।

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जबकि इस्लामाबाद के निलोर रीप्रोसेसिंग प्लांट में परमाणु हथियारों के लिए प्लूटोनियम बनाया जाता है, इसे भी निशाना बनाया गया। इसके अलावा फतेह जंग के नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स, जहां परमाणु हथियारों और मिसाइलों को बनाया जाता है, वहां भी भारतीय मिसाइलों ने चोट पहुंचाई। इसके अलावा काहुता एनरिचमेंट प्लांट (काहुता), जहां परमाणु हथियारों के लिए यूरेनियम को तैयार किया जाता है, वहां भी भारतीय मिसाइलों के हमले हुए। इन सभी ठिकानों का नूर खान एयरबेस के साथ सीधा कनेक्शन है।