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Permanent Commission for Woman: सुप्रीम कोर्ट ने नौसेना को लगाई फटकार, ‘अहंकार छोड़ें, महिला अधिकारी को दें परमानेंट कमीशन’

SC to Navy: Drop Ego, Grant Permanent Commission to Woman Officer
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Permanent Commission for Woman: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय नौसेना को कड़ी फटकार लगाई है। नौसेना ने 2007 बैच की एक शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) महिला अधिकारी को स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) देने में ढिलाई बरती, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। यह अधिकारी नौसेना की जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) शाखा में कार्यरत हैं और उनका नाम सीमा चौधरी है। कोर्ट ने नौसेना को साफ निर्देश दिए कि वह अपना अहंकार छोड़ें और इस अधिकारी को तुरंत स्थायी कमीशन दें।

Permanent Commission for Woman: क्या है पूरी कहानी

सीमा चौधरी ने 6 अगस्त 2007 को भारतीय नौसेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन ऑफिसर के रूप में जेएजी शाखा में अपनी सेवा शुरू की थी। 2009 में उन्हें लेफ्टिनेंट और 2012 में लेफ्टिनेंट कमांडर के पद पर पदोन्नति मिली। उनकी सेवा के दौरान, नवंबर 2016 में उन्हें दो साल का विस्तार दिया गया और फिर अगस्त 2018 में दोबारा इतने ही समय के लिए विस्तार मिला। लेकिन 5 अगस्त 2020 को उन्हें सूचित किया गया कि उनकी सेवा 5 अगस्त 2021 को समाप्त हो जाएगी।

सीमा इसके खिलाफ अदालत पहुंच गईं। उन्होंने पहले भी कई बार कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दरअसल, 17 मार्च 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम लेफ्टिनेंट कमांडर एनी नागराजा मामले में फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि शिक्षा, कानून और लॉजिस्टिक्स कैडर की सभी एसएससी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन के लिए विचार किया जाना चाहिए। इस फैसले के तहत सीमा का नाम भी उन अधिकारियों में शामिल था, जिन्हें स्थायी कमीशन मिलना था। लेकिन नौसेना ने उन्हें यह अवसर नहीं दिया।

क्या था नौसेना का तर्क?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, नौसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने पक्ष रखते हुए कहा कि सीमा चौधरी की 2016-2017 से 2018-19 तक की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में कुछ नकारात्मक टिप्पणियां थीं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि इन टिप्पणियों को रिव्यू ट्रिब्युनल ने पहले ही रद्द कर दिया था। कोर्ट ने सवाल किया कि जब सीमा हर मापदंड में फिट पाई गईं, तो फिर उन्हें स्थायी कमीशन क्यों नहीं दिया गया?

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति सूर्या कांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए नौसेना के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई। न्यायमूर्ति कांत ने कहा, “अब बहुत हो गया। नौसेना को अपना अहंकार छोड़ना होगा। हम आपको एक हफ्ते का समय देते हैं कि सीमा चौधरी को स्थायी कमीशन दे दिया जाए।” उन्होंने यह भी कहा कि नौसेना के पुरुष अधिकारियों का रवैया सही नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सीमा ने सभी क्षेत्रों में अच्छे अंक हासिल किए, लेकिन एक पुरुष अधिकारी ने उनकी मेहनत को नजरअंदाज करते हुए उन्हें अयोग्य करार दे दिया।

सीमा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली ने कोर्ट में कहा कि नौसेना पुरुषों को सीधे स्थायी कमीशन देती है, लेकिन महिलाओं को पहले शॉर्ट सर्विस कमीशन से गुजरना पड़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि नौसेना में बहुत कम जेएजी महिला अधिकारी हैं और अभी तक किसी को भी स्थायी कमीशन नहीं मिला है।

2024 में अपने फैसले में ये कहा था

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने सीमा चौधरी के मामले में नौसेना को निर्देश दिए हैं। 2024 में, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने नौसेना को निर्देश दिया था कि वह सीमा के मामले पर नए सिरे से विचार करे। कोर्ट ने कहा था कि एक नया चयन बोर्ड बनाया जाए और सीमा के मामले को अलग से देखा जाए, क्योंकि वह 2007 बैच की एकमात्र जेएजी अधिकारी थीं, जिनके स्थायी कमीशन पर विचार किया जाना था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर सीमा को जगह देने के लिए रिक्तियों में बढ़ोतरी करनी पड़े, तो ऐसा किया जाए, लेकिन यह भविष्य के लिए मिसाल न बने।

इसके बावजूद, नौसेना ने कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया। सीमा ने नौसेना पर कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाते हुए दोबारा सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें स्थायी कमीशन इसलिए नहीं दिया जा रहा, क्योंकि उन्होंने एक पुरुष अधिकारी के खिलाफ कार्यस्थल पर उत्पीड़न की शिकायत की थी। जांच में उनकी शिकायत सही पाई गई थी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें एक दिन के अंदर ट्रांसफर कर दिया गया, जबकि उस पुरुष अधिकारी को उसी जगह पर रहने दिया गया।

“2024 का फैसला अंतिम”

न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने नौसेना को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, “2024 का फैसला अंतिम है और उसमें साफ निर्देश दिए गए थे। नौसेना के अधिकारी अपनी मर्जी से फैसले नहीं ले सकते। उन्हें यह अहंकार का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। सीमा चौधरी को तुरंत स्थायी कमीशन दिया जाए।” कोर्ट ने यह भी कहा कि यह अन्याय लंबे समय से चला आ रहा है और अब इसे ठीक करने का समय है।

Permanent Commission: ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका निभाने वाली महिला विंग कमांडर को मिलेगा परमानेंट कमीशन, सुप्रीम कोर्ट ने खोला रास्ता

कोर्ट ने इस मामले को जुलाई के पहले हफ्ते में सुनवाई के लिए रखा है। नौसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. बालासुब्रमण्यम ने कोर्ट से अपील की है कि उन्हें अपने पक्ष को तैयार करने के लिए कुछ समय दिया जाए। लेकिन कोर्ट ने साफ कर दिया कि नौसेना को जल्द से जल्द इस मामले में फैसला लेना होगा।

Permanent Commission: ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका निभाने वाली महिला विंग कमांडर को मिलेगा परमानेंट कमीशन, सुप्रीम कोर्ट ने खोला रास्ता

Supreme Court Opens Door for Permanent Commission to Woman Officer Who Played Key Role in Operation Sindoor
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Permanent Commission: ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका निभाने वाली एक महिला विंग कमांडर के परमानेंट कमीशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट एक ऐतिहासिक फैसले में भारतीय वायुसेना की एक महिला विंग कमांडर को अगस्त 2025 में होने वाले रिटायरमेंट की बजाय अपनी सेवा जारी रखने की अनुमति दी है। विंग कमांडर पांडे ने ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन बालाकोट जैसे महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया था। उन्होंने स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

Permanent Commission: भारतीय वायुसेना में 13 साल तक दी सेवाएं

विंग कमांडर पांडे ने भारतीय वायुसेना में 13 साल तक अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान उन्होंने कई चुनौतीपूर्ण हालात में अपनी ड्यूटी को पूरी जिम्मेदारी के सााथ पूरा किया। ऑपरेशन बालाकोट 2019 में हुआ था, भारत की आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक कार्रवाई थी। जबकि ऑपरेशन सिंदूर हाल ही में पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ शुरू किया गया था, जो अभी भी जारी है।

इसके बावजूद, विंग कमांडर पांडे को अगस्त 2025 में रिटायर होने का आदेश मिला। भारतीय वायुसेना में परमानेंट कमीशन मिलने के बाद उनकी सेवा अवधि बढ़ जाती है और उच्च पदों तक पहुंचने का रास्ता खुल जाता है। लेकिन महिलाओं के लिए यह अवसर अभी भी सीमित हैं। इस आदेश के खिलाफ, पांडे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और परमानेंट कमीशन देने की मांग की।

भविष्य में स्थायी कमीशन के लिए बनाए नीति

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्या कांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने की। सुनवाई के दौरान, विंग कमांडर पांडे की ओर से सीनियर वकील मनेका गुरुस्वामी ने उनका पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट से कहा, “विंग कमांडर पांडे ने 13 साल तक भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन बालाकोट जैसे महत्वपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया। इतने अनुभव और योगदान के बावजूद, उन्हें अगले महीने रिटायर होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह उनके साथ अन्याय है और देश की डिफेंस कैपेबिलिटी के लिए भी नुकसानदायक है।”

न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने इस मामले में गहरी संवेदनशीलता दिखाते हुए उन्होंने सरकार की ओर से मौजूद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी से कहा, “उन्हें सेवा में बने रहने दें। हमें ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।” उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सरकार को भविष्य में ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन का रास्ता खुले।

सरकार ने कही ये बात

एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि विंग कमांडर पांडे ने स्थायी कमीशन के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने से पहले संबंधित प्राधिकरणों या ट्रिब्यूनल में कोई आवेदन नहीं दिया। उन्होंने यह भी बताया कि वायुसेना के बोर्ड ने पांडे को स्थायी कमीशन के लिए अनफिट माना था। भाटी ने यह दावा भी किया कि हाल के सालों में काफी महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया गया है। उन्होंने कहा, “अगर आप आंकड़े देखें, तो महिलाओं को पहले की तुलना में कहीं अधिक स्थायी कमीशन मिल रहा है।”

हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने इस दलील पर जोर दिया कि केवल आंकड़ों की बात करना काफी नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें समानता और योग्यता के आधार पर नीतियां बनानी चाहिए। अगर एक सक्षम अधिकारी, जिसने महत्वपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया है, उसे रिटायर होने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो यह नीतिगत कमी को दर्शाता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि इस फैसले से कोई विशेष अधिकार (इक्विटी) नहीं बनाया जाएगा। इसका मतलब है कि विंग कमांडर पांडे को फिलहाल अपनी सेवा जारी रखने की अनुमति दी गई है, लेकिन इस मामले का अंतिम फैसला पूरी सुनवाई के बाद होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार और भारतीय वायुसेना को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश काफी अहम माना जा रहा है। इससे अन्य महिला अधिकारियों को भी फायदा होगा, जो स्थायी कमीशन की मांग कर रही हैं।

2020 में खुला था स्थायी कमीशन का रास्ता

भारतीय सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। पहले, महिलाओं को केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत भर्ती किया जाता था, जिसकी अवधि सीमित होती थी। हाल के वर्षों में, सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों ने महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का रास्ता साफ किया है। 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन और कमांड पोस्ट देने से इनकार करना लैंगिक भेदभाव है। इस फैसले के बाद, कई महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन मिला।

न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने सुनवाई के दौरान यह सुझाव दिया कि सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जो अधिक महिलाओं को स्थायी कमीशन प्रदान करने की प्रक्रिया को आसान बनाएं। यह सुझाव भारतीय सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वर्तमान में, भारतीय वायुसेना में महिलाएं पायलट, नेविगेटर और अन्य तकनीकी भूमिकाओं में अपनी सेवाएं दे रही हैं। लेकिन स्थायी कमीशन की प्रक्रिया में अभी भी कई बाधाएं हैं, जैसे चयन बोर्ड की सख्त मापदंड और सीमित कोटा।

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कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर कोर्ट ने कही थी ये बात

इससे पहले ऑपरेशन सिंदूर का चेहरा बनीं कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया थाा। 17 फरवरी 2020 को, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) देने के अपने ऐतिहासिक फैसले में कर्नल सोफिया कुरैशी की उपलब्धियों की विशेष रूप से जिक्र किया था। कोर्ट ने कहा था कि कर्नल सोफिया, जो आर्मी सिग्नल कोर में लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में कार्यरत थीं, पहली महिला अधिकारी थीं, जिन्होंने 2016 में ‘एक्सरसाइज फोर्स 18’ नामक मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज में भारतीय सेना के दस्ते का नेतृत्व किया था। यह भारतीय सेना द्वारा आयोजित सबसे बड़ा विदेशी सैन्य अभ्यास था।

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने 2006 में कांगो में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने युद्धविराम की निगरानी और मानवीय सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नल सोफिया के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि महिला अधिकारी पुरुष सहकर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की सेवा कर रही हैं और उनकी क्षमताओं पर लिंग के आधार पर सवाल उठाना संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है। कोर्ट ने जोर दिया कि महिलाओं को कमांड भूमिकाओं से वंचित करना अनुचित है और उनकी योग्यता को सम्मान देना चाहिए।

Srinagar Air base: भारतीय वायुसेना के पूर्व फाइटर पायलट बोले, श्रीनगर एयरबेस पर क्यों मंडरा रहा पाकिस्तानी खतरा! कैसे होगी भारत के फ्रंटलाइन बेस की सुरक्षा?

Srinagar Airbase: Why It's at Risk and How India Plans to Secure It
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Srinagar Air base: सन् 1947 में, श्रीनगर हवाई अड्डे पर भारत ने अपनी पकड़ बहुत मुश्किल से बरकरार रखी थी। लेफ्टिनेंट कर्नल देवान रंजीत राय के नेतृत्व में 1 सिख और भारतीय वायुसेना की 12वीं स्क्वाड्रन की डकोटा विमानों की बहादुरी के चलते पाकिस्तानी मिलिशिया को मुंह की खानी पड़ी। पाकिस्तानी मिलिशिया हवाई अड्डे से सिर्फ 30 मील दूर तक पहुंच गई थी। लेकिन देश के बहादुर जवानों से उसे खदेड़ दिया। इसके बाद 1965 और 1971 के युद्धों में, पाकिस्तानी वायुसेना (PAF) ने श्रीनगर पर बार-बार हमले किए।

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों को 14 दिसंबर 1971 को श्रीनगर के ऊपर एयर फाइट में उनकी अदम्य वीरता के लिए भारतीय वायुसेना का एकमात्र परम वीर चक्र दिया गया। हाल ही में, 10 मई 2025 को पाकिस्तान ने ऑपरेशन बनयान-अल-मरसूस के तहत श्रीनगर हवाई अड्डे पर हवाई हमला किया। इस हमले में ड्रोन, मिसाइल और फाइटर जेट शामिल थे। यह एक सुनियोजित हमला था, जिसमें पाकिस्तानी वायुसेना ने अंजाम दिया। फिर भी, श्रीनगर हवाई अड्डा खुला रहा और भारतीय वायुसेना के मिशन सफलतापूर्वक जारी रहे। इन हमलों से एक बात साफ हुई कि पाकिस्तान का इरादा श्रीनगर एयरफील्ड की ऑपरेशनल कैपेसिटी को नुकसान पहुंचाना था।

एलओसी और आईबी के नजदीक है Srinagar Air base: 

7 मई को शुरू हुए भारत के ऑपरेशन सिंदूर और इसके जवाब में 10 मई को पाकिस्तान ने ऑपरेशन बनयान-अल-मरसूस शुरू किया। पाकिस्तान ने स्वार्म ड्रोन, एंटी-रेडिएशन मिसाइल (ARM) क्षमता के साथ कामिकेज़ ड्रोन, 100 किमी से अधिक दूरी तक मार करने वाले लंबी दूरी के स्टैंडऑफ हथियार, और 200 किमी से अधिक रेंज वाली बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (BVR) मिसाइलें शामिल थीं। अगर इन हथियारों को समय पर निशाना न बनाया गया होता तो, श्रीनगर हवाई अड्डे को ऑपरेट करना मुश्किल हो जाता।

Srinagar airbase is vulnerable to Pakistan attack. These are ways to secure it
Former Indian Air Force (IAF) Group Captain Ajay Ahlawat

भौगोलिक रूप से देखा जाए तो श्रीनगर नियंत्रण रेखा (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (IB) के नजदीक है, इसलिए इसे खतरा भी ज्यादा है। उरी, बारामूला और तुंगधार एलओसी से केवल 60-70 किमी दूर हैं, जबकि अखनूर में इंटरनेशनल बॉर्डर 120 किमी दूर है। पाकिस्तान का कादरी एयरबेस, जो श्रीनगर से 160 किमी दूर स्कर्दू में है, J-10C, F-16 और JF-17 जैसे एडवांस फाइटर जेट्स से लैस है। श्रीनगर से 100 किमी दूर पाकिस्तान का कोटली और रावलाकोट बेस से हेलीकॉप्टर और ड्रोन ऑपरेट किया जा सकते हैं। इसके अलावा पाकिस्तानी वायु सेना श्रीनगर से बेहद दूर स्थित मसरूर (कराची) जैसे ठिकानों से भी हमले कर सकती है, जिसमें हवा में ईंधन भरने (AAR) और लंबी दूरी की सटीक हथियारों का इस्तेमाल हो सकता है।

पाकिस्तानी वायुसेना का आधुनिक हथियार भंडार, जिसमें डेटा-लिंक्ड फाइटर जेट्स और साब 2000 एरिआई एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AEW&C) उसकी पहुंच को बढ़ावा देते हैं। वहीं, श्रीनगर से 100-150 किमी दूर पाकिस्तानी एयर स्पेस से उनका एक कॉम्बैट एयर पेट्रोल (CAP) भारतीय लड़ाकू विमानों को उड़ान भरते ही निशाना बना सकता है, खासकर तब जब वे आसपास के इलाकों में उड़ान भर रहे हों। वहीं, इससे पहले कि भारतीय विमान ऊंचाई हासिल कर सकें या बेहतर स्थिति में आए, उससे पहले ही पाकिस्तानी वायुसेना 200 किमी से अधिक रेंज वाली बियोंड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइलों से भी हमला कर सकती है।

इसके अलावा, स्वार्म ड्रोन और एंटी-रेडिएशन मिसाइल से लैस कामिकेज़ ड्रोन हमारे रडार और एयर डिफेंस सिस्टम्स को निशाना बना सकते हैं, जबकि सतह से लॉन्च की जाने वाली मिसाइलें और अग्रिम तैनात तोपखाने हवाई अड्डे के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़ा खतरा हैं। अगर ये सब मिल कर एक साथ हमला करें, तो यह रनवे या महत्वपूर्ण सुविधाओं को घंटों के लिए बेकार कर सकता है, जिससे भारतीय वायुसेना को मिशन को अंजाम देने में दिक्कत आ सकती है।

10 मई का हमला, हालांकि प्रतीकात्मक था, और सीमित पैमाने का था। लेकिन भविष्य में पाकिस्तान एयर फोर्स विशेष रूप से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) से जमीनी युद्धाभ्यास या अखनूर में सुनियोजित तरीके से इस तरह के ऑपरेशन को अंजाम दे सकती है। अगर ऐसा होता है, तो यह भारत की रक्षा क्षमताओं के लिए मुश्किल परीक्षा होगी, खासकर अगर पाकिस्तान श्रीनगर में प्री-इम्प्टिव स्ट्राइक और लगातार हवाई हमलों को अंजाम दे।

बड़ा होगा हमला, तो श्रीनगर की सुरक्षा में होगी मुश्किल

श्रीनगर हवाई अड्डे की सुरक्षा को धीमी रफ्तार वाले ड्रोन, कामिकेज ड्रोन, एंटी रेडिएशन मिसाइलें, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, लंबी दूरी तक मार करने वाली आर्टिलरी और सटीक हवाई हथियार जैसे मुश्किल खतरों का सामना करना पड़ सकता है। श्रीनगर हवाई अड्डा पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों और हवाई क्षेत्र के बहुत करीब है। इस वजह से यह आसानी से निशाना बन सकता है। अगर पाकिस्तान एक साथ कई हथियारों से हमला करता है, तो हवाई अड्डे का रनवे कुछ समय के लिए काम करना बंद कर सकता है। इससे भारतीय वायुसेना के विमान जमीन पर ही रह जाएंगे। साथ ही, पाकिस्तान की लंबी दूरी की मिसाइलें और हवाई गश्ती विमान (PAF CAP) उड़ान भरते समय भारतीय विमानों को निशाना बना सकते हैं। ये दोनों स्थिति भारत की श्रीनगर के ऊपर हवाई नियंत्रण की क्षमता को कमजोर कर सकती हैं।

भारत अभी “गन्स टाइट” नियम का पालन करता है। इसके तहत हमारी मिसाइलें और एयर डिफेंस विपंस तब तक हमला नहीं करते, जब तक अनुमति न मिले। ऐसा इसलिए ताकि अपने ही विमानों पर गलती से हमला न हो जाए। लेकिन यह तरीका तेजी से आने वाले खतरों, जैसे छोटे ड्रोन या कम उड़ान भरने वाले हमलावर ड्रोन, के खिलाफ कमजोर है। श्रीनगर से भारतीय विमानों का उड़ाना भी जोखिम भरा है, क्योंकि पाकिस्तान के रडार और मिसाइलें उड़ान भरते ही उन्हें निशाना बना सकती हैं।

पाकिस्तान का हालिया हमला, जिसे ऑपरेशन बनयान-अल-मरसूस कहा गया, ज्यादा नुकसान नहीं कर पाया। लेकिन इसने श्रीनगर की कमजोरियों को उजागर कर दिया। पाकिस्तान ने दिखाया कि वह बड़े जोखिम लेने को तैयार है। भविष्य में वह एक साथ कई हथियारों और बेहतर योजना के साथ हमला कर सकता है। भारतीय वायुसेना को यह नहीं मानना चाहिए कि अगर युद्ध बड़ा हो तो श्रीनगर हर हमले का सामना कर लेगा।

भारत अपनाए “गन्स टाइट” की जगह “गन्स फ्री” की नीति

पाकिस्तान के खतरों से निपटने के लिए भारत को एयर सुपिरियिटी के बजाय हवाई अवरोध (एयर डिनायल) रणनीति अपनानी चाहिए। भारत के पास मजबूत जमीनी एयर डिफेंस सिस्ट्म्स हैं, जैसे इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS), आकाशतीर डिटेक्शन सिस्टम, और S-400, बराक-8, और आकाश मिसाइलें। ये एक मजबूत ढाल की तरह काम कर सकती हैं।

S-400 मिसाइल सिस्टम 600 किमी दूर तक दुश्मन के विमानों को देख सकता है और 400 किमी तक उन्हें नष्ट कर सकता है। वह पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में भी टारगेट कर सकता है। छोटी और मध्यम दूरी की मिसाइलें और एयर डिफेंस गन्स अतिरिक्त सुरक्षा दे सकती हैं। अगर भारत “गन्स टाइट” की जगह “गन्स फ्री” की नीति अपनाए, तो श्रीनगर से 400 किमी तक का इलाका नो-फ्लाई ज़ोन बन सकता है। इससे पाकिस्तानी विमानों के लिए अपने ही हवाई क्षेत्र में उड़ना मुश्किल हो जाएगा।

इस रणनीति में भारतीय विमानों को श्रीनगर में बिखरे हुए सुरक्षित ठिकानों (कठोर विमान आश्रयों) में रखा जा सकता है या पास के अन्य हवाई अड्डों पर भेजा जा सकता है। जरूरत पड़ने पर लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस भारतीय विमान, रडार विमानों (AWACS) की मदद से, अन्य ठिकानों से उड़ान भरकर श्रीनगर के ऊपर हवाई नियंत्रण बना सकते हैं। इससे जमीन पर हमले का खतरा कम होगा। यह तरीका जमीनी रक्षा को हर हवाई खतरे से तुरंत निपटने की आजादी देता है।

यह रणनीति पाकिस्तान के हवाई हमलों को कमजोर करती है, क्योंकि भारत की मजबूत रक्षा उनके लिए बड़ा खतरा बनेगी। इससे पाकिस्तान डर सकता है और हमला करने के लिए उसे बहुत सारे संसाधन खर्च करने पड़ेंगे।

हवाई नियंत्रण को सबसे जरूरी मानने वाली भारतीय वायुसेना के लिए यह रणनीति अपनाना मुश्किल हो सकता है। मैं खुद एक पूर्व लड़ाकू पायलट हूं और समझता हूं कि हम हवाई नियंत्रण को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन श्रीनगर की खास स्थिति-पाकिस्तानी ठिकानों की नजदीकी और एडवांस विपेंस के खतरों के कारण हवाई अवरोध (एयर डिनायल) एक बेहतर और व्यावहारिक रास्ता है।

इतिहास से लें सबक

एयर डिनायल स्ट्रेटेजी 1973 के योम किपुर युद्ध से प्रेरित है। उस युद्ध में मिस्र ने स्वेज नहर के पास मजबूत हवाई रक्षा बनाई थी, जिसने इजरायली वायुसेना को रोक दिया था। इजरायल ने बाद में हवाई नियंत्रण हासिल किया, लेकिन उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। पाकिस्तान के पास भारत के एडवांस डिफेंस सिस्टम्स के सामने ऐसी कोई खास तकनीकी बढ़त नहीं है। भारत का S-400, आकाशतीर, और IACCS मजबूत सुरक्षा दे सकते हैं, जिससे हवाई अवरोध रणनीति (एयर डिनायल स्ट्रेटेजी) कारगर साबित हो सकती है।

Indian Air Force: पूर्व वायुसेना ग्रुप कैप्टन की चेतावनी; अगले 3-4 दशकों तक चीन को युद्ध में नहीं हरा सकता भारत, बताई ये बड़ी वजह

हवाई नियंत्रण (एयर सुपीरियरिटी) को प्राथमिकता देने वाली भारतीय वायुसेना के लिए यह रणनीति नई लग सकती है। लेकिन श्रीनगर की रक्षा के लिए यह एक प्रभावी और व्यावहारिक तरीका है। यह पाकिस्तानी वायुसेना की ताकत को कमजोर कर सकता है और हवाई अड्डे को हमेशा चालू रख सकता है।

लेखक ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत (सेवानिवृत्त) भारतीय वायुसेना लड़ाकू पायलट रह चुके हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं। उन्हें एक्स अकाउंट @Ahlawat2012 पर फॉलो कर सकते हैं।

चीन पाकिस्तान को दे रहा सस्ते J-35A Fighter Jets, इस इनाम के पीछे क्या है ड्रैगन की चाल!

China Offers Cheap J-35A Fighter Jets to Pakistan

J-35A Fighter Jets: भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए सैन्य तनाव के बाद चीन भी अपनी घटिया राजनीति करने में जुट गया है। यह पता होने के बावदूज कि पाकिस्तान आतंकी देश है, बावजूद इसके चीन पाकिस्तान के अपने एडवांस पांचवी पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट्स, जे-35ए, की डिलीवरी दे रहा है। इसके साथ ही, चीन ने इन जेट्स पर 50% की भारी छूट देने का ऐलान किया है। चीन के इस कदम को भारत-पाकिस्तान के हालिया सैन्य टकराव के बाद पाकिस्तान को “इनाम” के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, चीन का यह कदम दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन प्रभावित कर सकता है। उधर, भारत ने भी अपनी सैन्य ताकत को और मजबूत करने के लिए सुखोई-30 एमकेआई फाइटर जेट्स के लिए नया ‘विरुपाक्ष’ एईएसए रडार पेश किया है, जिसे हाल ही में एयरो इंडिया 2025 में प्रदर्शित किया गया था।

J-35A Fighter Jets: एक जेट की कीमत लगभग 600 करोड़ रुपये

सूत्रों के अनुसार, चीन ने पाकिस्तान को जे-35ए स्टील्थ फाइटर जेट्स (J-35A Fighter Jets) की पहली खेप अगस्त 2025 तक देने का वादा किया है। इस खेप में 30 जेट्स शामिल होंगे, जो जल्दी डिलीवर किए जाएंगे। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ इन दिनों चीन की आधिकारिक यात्रा पर हैं, जहां उन्होंने चीनी सैन्य और राजनीतिक अधिकारियों के साथ इस सौदे को अंतिम रूप दिया है।

चीन का यह कदम भारत-पाकिस्तान के बीच हाल के सैन्य टकराव के बाद देखा जा रहा है। कूटनीतिक सूत्रों ने इसे पाकिस्तान के लिए ‘इनाम’ करार दिया है। जे-35ए जेट्स की लागत सामान्य तौर पर 70 मिलियन डॉलर (लगभग 600 करोड़ रुपये) प्रति जेट है। 30 जेट्स (J-35A Fighter Jets) की कुल लागत लगभग 2.1 बिलियन डॉलर (18,000 करोड़ रुपये) होने का अनुमान था। लेकिन 50% छूट के बाद यह लागत घटकर 1 बिलियन डॉलर (9,000 करोड़ रुपये) रह गई है। इसके अलावा, चीन ने भुगतान की शर्तों को भी आसान किया है।

पाकिस्तानी पायलट पहुंचे चीन

पाकिस्तानी पायलट पहले से ही चीन में इन जेट्स (J-35A Fighter Jets) को उड़ाने के लिए एडवांस ट्रेनिंग ले रहे हैं। जे-35ए पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है, जो रडार से बचने, लंबी दूरी तक मार करने, और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक विपंस सिस्टम से लैस है। वहीं अगर यह जेट पाकिस्तान के हाथों में पड़ता है, तो इससे रीजनल एय़र पावर बैलेंस बदल सकता है। ये भारत के 4.5 जनरेशन राफेल और सुखोई-30 एमकेआई जैसे फाइटर जेट्स से भी एडवांस है।

सुखोई में विरुपाक्ष रडार लगाने की तैयारी

इधर, भारत भी अपनी रक्षा तैयारियों को और मजबूत करने में जुटा है। बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया 2025 में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने अपने नए एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (एईएसए) रडार ‘विरुपाक्ष’ को पहली बार प्रदर्शित किया था। यह रडार भारतीय वायुसेना के सु-30 एमकेआई फाइटर जेट्स के लिए डेवलप किया जा रहा है और इसे मौजूदा पैसिव रडार के मुकाबले ज्यादा एडवांस है।

डीआरडीओ के एक वैज्ञानिक ने बताया कि विरुपाक्ष रडार अगले कुछ सालों में लाइव टेस्टिंग के लिए तैयार हो जाएगा। यह रडार गैलियम नाइट्राइड (जीएएन) तकनीक पर आधारित है, जिसमें लगभग 2400 रेडिएटिंग एलिमेंट्स का इस्तेमाल किया गया है। यह तकनीक रडार को ज्यादा पावरफुल, छोटा और हीट रजिस्टेंट बनाती है। यह रडार न केवल सुखोई-30 एमकेआई के लिए बल्कि भारत के पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

डीआरडीओ के वैज्ञानिक का कहना है कि रडार का सॉफ्टवेयर तैयार है, और हार्डवेयर के कुछ हिस्सों को स्थापित करने के बाद जमीनी परीक्षण शुरू होंगे। यह रडार भारत के 7.2 बिलियन डॉलर के सुखोई-30 एमकेआई मॉर्डनाइजेशन प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य इन विमानों की लाइफ साइकिल को 25 साल तक बढ़ाना है।

दक्षिण एशियाई भू-राजनीति और डिफेंस स्ट्रेटेजिस्ट एक्सपर्ट प्रियांशु शर्मा का कहना है, “चीन का जे-35ए जेट्स (J-35A Fighter Jets) को सस्ते दामों में और जल्दी डिलीवरी का फैसला भारत के बढ़ते सैन्य प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा है। यह कदम क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है, लेकिन भारत की स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी, जैसे विरुपाक्ष रडार और एएमसीए, इसे लंबी अवधि में आत्मनिर्भर और मजबूत बनाएगी।”

चीन-पाकिस्तान का यह रक्षा सौदा भारत के लिए चिंता का विषय है, खासकर तब जब भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पहले से ही तनावपूर्ण हैं। जे-35ए जेट्स (J-35A Fighter Jets) की तैनाती से पाकिस्तान की वायुसेना को नई ताकत मिलेगी, जो भारत के लिए एक चुनौती हो सकती है। हालांकि, भारत का ध्यान स्वदेशी तकनीकों पर फोकस है। डीआरडीओ के उत्तम रडार और अब विरुपाक्ष रडार जैसी उपलब्धियां बताती हैं कि भारत तकनीकी क्षेत्र में महारत हासिल कर रहा है।

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पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियां

चीन की ओर से दी गई छूट (J-35A Fighter Jets) के बावजूद, पाकिस्तान के लिए 1 बिलियन डॉलर का भुगतान करना आसान नहीं होगा। देश की अर्थव्यवस्था पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबी है, और यह सवाल उठ रहा है कि पाकिस्तान इस राशि का भुगतान कैसे करेगा। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस सौदे के बदले पाकिस्तान से रणनीतिक सुविधाएं या व्यापारिक रियायतें मांग सकता है।

China-Bangladesh: क्या डोकलाम ट्राईजंक्शन पर फिर है चीन की नजर? इस बार बांग्लादेश भी है साथ, भारत ने ‘तीस्ता प्रहार’ से दिया जवाब

China-Bangladesh Eye Doklam Tri-Junction Again, India Responds with 'Teesta Prahar'
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China-Bangladesh: भारत और पाकिस्तान के बढ़ते तनाव के बीच चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। पहले तो चीन ने पांचवी बार अरुणाचल प्रदेश में कुछ जगहों के नाम बदले, जिसका भारत ने पुरजोर विरोध जताया। वहीं अब खबर यह है कि चीन अब बांग्लादेश को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है। हाल ही में चीनी सेना के अधिकारियों ने बांग्लादेश के रंगपुर जिले में एक पुराने हवाई अड्डे का दौरा किया, जो भारत की सीमा से मात्र 20 किलोमीटर दूर है। यह हवाई अड्डा भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को जोड़ने वाले सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ से सिर्फ 135 किलोमीटर की दूरी पर है और डोकलाम ट्राईजंक्शन के पास है। भारतीय खुफिया एजेंसियां इस घटना पर नजर रख रही हैं और इसे भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।

China-Bangladesh: बांग्लादेश में चीन की बढ़ती मौजूदगी

चीन ने पहले पाकिस्तान को भारत के खिलाफ अपने हथियारों की ‘टेस्टिंग’ करने के लिए इस्तेमाल किया था। वहीं, अब वह बांग्लादेश को भी इसी तरह की रणनीति में शामिल करने की कोशिश कर रहा है। चीन की नजरें रंगपुर जिले में स्थित द्वितीय विश्व युद्ध के समय के लालमोनिरहाट हवाई अड्डे पर हैं। इस हवाई अड्डे को 1931 में एक सैन्य अड्डे के रूप में बनाया गया था और उस समय यह एशिया के सबसे बड़े हवाई अड्डों में से एक था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने इस अड्डे से बर्मा और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में सैन्य अभियान चलाए थे।

हालांकि, 1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद इस हवाई अड्डे को बांग्लादेश वायु सेना (बीएएफ) का मुख्यालय बनाने की योजना बनी थी, लेकिन यह योजना धूल खाती रही। अब मार्च 2025 में ढाका ने इस हवाई अड्डे को फिर से डेवलप करने का फैसला किया है और इसके लिए चीन से मदद मांगी है।

भारत के लिए क्यों है खतरा?

लालमोनिरहाट हवाई अड्डा भारत के लिए कई कारणों से खतरा बन सकता है। यह हवाई अड्डा भारत की सीमा से बहुत करीब है और सिलिगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर और सिक्किम को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। यह कॉरिडोर सिर्फ 22 किलोमीटर चौड़ा है और कुछ जगहों पर तो यह चौड़ाई 17 किलोमीटर तक है। यह इलाका नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से घिरा हुआ है, जिसके कारण इसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है।

भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल अनिल आहूजा (रिटायर्ड) का कहना है, “अगर बांग्लादेश ने चीनी वायु सेना (पीएलएएएफ) या पाकिस्तानी वायु सेना (पीएएफ) को इस हवाई अड्डे तक पहुंच दे दी, तो यह भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा होगा। इससे न सिर्फ हमारे उत्तर-पूर्वी राज्यों पर खतरा मंडराएगा, बल्कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, जो मलक्का स्ट्रेट के मुहाने पर हैं, वे भी प्रभावित होंगे। मलक्का स्ट्रेट चीन के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, और अगर चीन वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाता है, तो भारत की सामरिक स्थिति कमजोर हो सकती है।”

समुद्री सुरक्षा पर असर

लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने यह भी बताया, बांग्लादेश में हवाई अड्डे तक पहुंच से चीन की वायु सेना को बंगाल की खाड़ी तक अपनी पहुंच बढ़ाने का मौका मिलेगा। अभी तक चीन के पास इतनी दूर तक पहुंचने की क्षमता नहीं थी। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत के लिए सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इससे भारत की हिंद महासागर में स्थिति मजबूत होती है। अगर चीन वहां तक अपनी वायु सेना को भेजने में सक्षम हो गया, तो भारत की समुद्री सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है।

बांग्लादेश के पास हैं चीनी हथियार

चीन पिछले कई सालों से बांग्लादेश को हथियारों की सप्लाई कर रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच पाकिस्तान को 82 फीसदी हथियार चीन से मिले थे। हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने चीनी हथियारों का जमकर इस्तेमाल किया था। इसमें जे-10सी और जेएफ-17 लड़ाकू विमान, पीएल-12 और पीएल-15 मिसाइलों के अलावा एचक्यू-9 एय़र डिफेंस सिस्टम शामिल थे।

बांग्लादेश की सेना में भी चीनी हथियारों की भरमार है। सिपरी के अनुसार, बांग्लादेश की सेना के 82 फीसदी हथियार चीन से आए हैं। इनमें मिंग-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक हमलावर पनडुब्बियां, शादिनोता-क्लास सी13बी कॉर्वेट्स, एमबीटी-2000 टैंक, वीटी-5 हल्के टैंक, एचक्यू-7 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और 36 एफ-7बीजीआई लड़ाकू विमान शामिल हैं। इसके अलावा, चीन ने बांग्लादेश को छोटे और हल्के हथियार बनाने का लाइसेंस भी दिया है।

लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने चेतावनी दी, “अगर बांग्लादेश ने चीन या पाकिस्तान को हवाई अड्डे तक पहुंच नहीं भी दी, तब भी यह खतरा बना रहेगा। अगर चीन ने बांग्लादेश को वही हथियार और हवाई मिसाइलें दीं, जो उसने पाकिस्तान को दी हैं, तो भारत के लिए खतरा बढ़ जाएगा। हमें इन पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है।”

बांग्लादेशी नेताओं के बयान- खतरे की घंटी 

वहीं, बांग्लादेश की सरकार और वहां के नेताओं के बयान भी चिंता बढ़ा रहे हैं। बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के करीबी नेताओं ने हाल ही में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों पर कब्जा करने की बात कही है। ये बयान भारत के लिए खतरे की घंटी हैं, क्योंकि अगर बांग्लादेश और चीन मिल गए तो तो भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

भारतीय सेना के (रिटायर्ड) पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल सुब्रत साहा ने कहा, “शांतिकाल में इतने करीब एक हवाई अड्डा दुश्मन को हमारी गतिविधियों पर नजर रखने का मौका देता है। लेकिन युद्ध के समय यह दुश्मन के लिए एक कमजोरी भी बन सकता है, क्योंकि इसे आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। हालांकि, बड़े ज्योस्ट्रेटेजिक के लेंस में देखें, तो उत्तर में चीन और दक्षिण में यूनुस का बांग्लादेश भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। अगर यह रिपोर्ट सही है, तो इसे जल्द से जल्द रोकना होगा।”

सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा बेहद जरूरी

सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उत्तर-पूर्वी राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने का एकमात्र रास्ता है। अगर इस कॉरिडोर पर किसी तरह का हमला होता है या इसे बंद कर दिया जाता है, तो उत्तर-पूर्वी राज्यों का संपर्क मुख्य भारत से टूट सकता है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति इसे और भी संवेदनशील बनाती है, क्योंकि यह तीन देशों नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से घिरा हुआ है। यह नेपाल, भूटान, और बांग्लादेश की सीमाओं के साथ-साथ भारत-चीन-भूटान ट्राई-जंक्शन (Doklam area) के पास है।

अगर चीन और बांग्लादेश मिलकर इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हैं, तो भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां बढ़ जाएंगी। लालमोनिरहाट हवाई अड्डे का चार किलोमीटर लंबी रनवे, बड़ा टैक्सीवे और हैंगर किसी भी मिलिट्री ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल हो सकता है। अगर चीनी या पाकिस्तानी वायु सेना को यहां से उड़ान भरने की अनुमति मिलती है, तो वे आसानी से सिलिगुड़ी कॉरिडोर को निशाना बना सकते हैं।

भारतीय सेना ने कसी कमर

सिलीगुड़ी कॉरिडोर को अहमियत भारत भी समझता है। चीन औऱ पाकिस्तान जिस तरह से इस कॉरिडोर से सटे रंगपुर पर नजरें गड़ाएं बैठे हैं, इस पर भारत की पूरी नजर है। इसी महीने मई 2025 में सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास भारतीय सेना ने एख मिलिट्री एक्सरसाइज “तीस्ता प्रहार” भी की थी। यह अभ्यास पश्चिम बंगाल के तीस्ता फील्ड फायरिंग रेंज में हुआ और इसका उद्देश्य क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करना था। तीन दिन तक चले इस अभ्यास में पैदल सेना (इन्फैंट्री), तोपखाना, बख्तरबंद रेजिमेंट, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, स्पेशल फोर्सेज, आर्मी एविएशन, इंजीनियर और सिग्नल यूनिट्स ने हिस्सा लिया। इसमें आधुनिक हथियारों, जैसे हैवी आर्टिलरी और LMG, के साथ-साथ लेटेस्ट टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया गया। अभ्यास का उद्देश्य प्रतिकूल परिस्थितियों में दुश्मन को परास्त करने की रणनीतियों को मजबूत करना और विभिन्न सैन्य इकाइयों के बीच तालमेल सुनिश्चित करना था।

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हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि लालमोनिरहाट हवाई अड्डे को नागरिक उपयोग के लिए डेवलप किया जा रहा है या सैन्य उद्देश्यों के लिए। लेकिन यह साफ है कि भारत को अपनी सुरक्षा रणनीति को और मजबूत करना होगा। लेफ्टिनेंट जनरल साहा ने सुझाव दिया कि भारत को इस खतरे को शुरूआत में ही रोकना होगा। इसके लिए कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर कदम उठाने की जरूरत है। भारत को बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि वह चीन के प्रभाव में न आए। साथ ही, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अपनी सैन्य मौजूदगी को और बढ़ाना होगा, ताकि बंगाल की खाड़ी में भारत की स्थिति मजबूत रहे।

Gen Munir Promotion!: क्या ऑपरेशन सिंदूर में हुई करारी हार को छोटा करने के लिए फील्ड मार्शल बने जनरल असीम मुनीर? 1965 की जंग में शिकस्त के बाद जनरल अयूब भी कर चुके हैं ऐसा

Munir Promotion: Field Marshal Rank to Mask Operation Sindoor Defeat, Echoes Ayub’s 1965 Move
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Gen Munir Promotion!: पाकिस्तान एक बार फिर इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है, जहां सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक स्थिरता दांव पर है। पाकिस्तान से आ रहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक शहबाज शरीफ कैबिनेट ने सेना प्रमुख जनरल सैयद असीम मुनीर को फील्ड मार्शल का ओहदा देने का एलान किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बिल्कुल वैसा ही जब 1965 में जनरल मोहम्मद अयूब खान खुद फील्ड मार्शल बन गए थे। यह तब हुआ था जब 1965 के भारत-पाक युद्ध में करारी हार के बाद छवि बचाने और सेना में असंतोष को दबाने के लिए ऐसा किया गया था। सूत्रों का दावा है कि ऑपरेशन सिंदूर (7-10 मई 2025) में भारत के हाथों करारी हार के बाद, अगर मुनीर को यह दर्जा न दिया जाता, तो सेना के भीतर बगावत की आशंका थी। आर्थिक संकट, बलूचिस्तान और TTP विद्रोह, और इमरान खान के समर्थकों का विरोध भी इस फैसला के पीछे बड़ी वजह है।

Gen Munir Promotion!: ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की करारी हार

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए, जिसके बाद भारत-पाक तनाव को चरम पर पहुंच गया। भारत ने इसका जवाब ऑपरेशन सिंदूर (7-10 मई 2025) के जरिए दिया। भारतीय सेना ने सटीक मिसाइल और हवाई हमलों के जरिए पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकी ठिकानों और सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। भारत ने 9 आतंकी ठिकानों पर बमबारी करके जैश-ए-मोहम्मद (बहावलपुर में मारकज सुभान अल्लाह, मुजफ्फराबाद में सैय्यदना बिलाल), लश्कर-ए-तैयबा (मुरिदके में मारकज तैबा), और हिजबुल मुजाहिदीन के ठिकानों को नष्ट कर दिया। इसमें 100+ आतंकवादी मारे गए।

इसके अलावा भारत ने ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान के 12 हवाई अड्डों को तबाह कर दिया। नूर खान एयर बेस (रावलपिंडी), मुरिद, रफीकी (झांग), स्कर्दू, जैकोबाबाद, सरगोधा, और भोली के हवाई अड्डों को निशाना बनाया गया। इसमें रडार सिस्टम, विमान हैंगर, और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो गए। पाकिस्तानी सेना प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ ने चार से छह अड्डों को नुकसान की पुष्टि की। इसके अलावा भारतीय ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों, स्कैल्प मिसाइलों, पाकिस्तान के चीनी मूल के HQ-9 और LY-80 एय़र डिफेंस सिस्टम को बेकार कर दिया। सियालकोट के पासरूर आर्मी कैंट, नूर खान बेस, और लाहौर के रडार सिस्टम नष्ट हुए। PoK और सीमावर्ती क्षेत्रों में कई पाकिस्तानी सैन्य चौकियां भी तबाह हुईं। सैटेलाइट तस्वीरों ने इन चौकियों को नुकसान की पुष्टि की।

इसके अलावा भारतीय हमले में पाकिस्तान के 5-7 फाइटर जेट और सैकड़ों ड्रोन भी निशाना बने। भारत ने गुजरात के कच्छ और जम्मू-कश्मीर में कई पाकिस्तानी ड्रोन मार गिराए। इन हमलों पाकिस्तान के 35-40 सैनिकों समेत 100+ आतंकवादी भी मारे गए। हालांकि पाकिस्तान ने पहले केवल 11 सैनिकों की मौत स्वीकारी थी। पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की जवाबी कार्रवाई से पाकिस्तान इतना घबराया कि 9-10 मई की रात जनरल मुनीर ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को फोन कर हमलों की गंभीरता बताते हुए युद्धविराम करने की बात कही।

बंकर में छुप गए थे मुनीर

वहीं, भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई इतनी जबरदस्त थी कि पूरी पाकिस्तानी सेना घुटनों पर आ गई। इन हमलों ने न केवल पाकिस्तानी सेना की कमजोरी उजागर की, बल्कि जनरल मुनीर की रणनीति पर भी सवाल उठाए। खुद पाकिस्तान की अवाम ने भी अपनी सेना की कायरता को जमकर कोसा। सूत्रों के अनुसार, भारतीय हमलों के दौरान असीम मुनीर को रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स (GHQ) में एक बंकर में छिपना पड़ा। इमरान खान के समर्थकों ने उनकी इस “कायरता” पर जमकर हमला बोला। पूरे पाकिस्तान में #MunirOut जैसे सोशल मीडिया कैंपेन चलाए गए।

1965 में भी हुआ था ऐसा

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान के मौजूदा हालात 1965 की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल और नाजुक हैं। अब जनरल मुनीर अपने पूर्ववर्ती जनरलों के तरह तख्तापलट तो कर नहीं सकते थे, क्योंकि अमेरिका अब ऐसा होने नहीं देगा। तो मुनीर के सामने अपनी छवि बचाने के लिए एक ही रास्ता था कि वह जनरल अयूब की तरह फील्ड मार्शल बन जाएं औऱ सेना के भीतर उठ ही नाराजगी पर कुछ लगाम कसने की कोशिश करें।

मोहम्मद अयूब खान 1951 में वे पाकिस्तान के पहले सेनाध्यक्ष बने थे। 1958 में, उन्होंने तख्तापलट के जरिए सत्ता पर कब्जा किया और राष्ट्रपति बन गए। इस तख्तापलट की वजह उन्होंने तत्कालीन सरकार की अस्थिरता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अराजकता को बताया और देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया। लेकिन वहां की अवाम में सेना को लेकर नाराजगी शुरू हो गई। जिसके बाद अपनी साथ बचाने के लिए जनरल अयूब ने कश्मीर का सहारा लिया और कश्मीर में ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया, जिसमें पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठियों को कश्मीर भेजा और विद्रोह भड़काने की कोशिश की। लेकिन यह योजना असफल रही, क्योंकि कश्मीरी अवाम ने इसका समर्थन नहीं किया, और भारतीय सेना ने घुसपैठियों को पकड़ लिया और मार गिराया। इससे पाकिस्तान बुरी तरह भड़क गया और ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर पर कब्जा करने की कोशिश की। यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र था, क्योंकि यह जम्मू को कश्मीर घाटी से जोड़ता था। भारत ने इस हमले का जवाब न केवल कश्मीर में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर आक्रामक कार्रवाई के साथ दिया।

भारतीय सेना ने पार की अंतरराष्ट्रीय सीमा

पाकिस्तान ने युद्ध को कश्मीर तक सीमित रखने की योजना बनाई थी, यह उम्मीद करते हुए कि भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हमला नहीं करेगा। लेकिन भारत ने 6 सितंबर 1965 को पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके लाहौर और सियालकोट सेक्टरों में हमला बोला। जहां पाकिस्तान ने अपनी अधिकांश सैन्य ताकत कश्मीर में लगा रखी थी, तो भारतीय सेना ने कश्मीर पर दबाव कम करने के लिए लाहौर और सियालकोट पर हमला बोल दिया। भारतीय सेना का लाहौर के बाहरी इलाकों में इच्छावाक नहर (Lahore Canal) तक पहुंच गई। इस दौरान, भारतीय सेना ने कई महत्वपूर्ण गांवों और कस्बों जैसे बुरकी पर कब्जा जमा लिया। यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका था। हालांकि, भारतीय सेना ने लाहौर शहर पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की। वहीं, भारतीय सेना ने सियालकोट सेक्टर में चविंडा और अन्य क्षेत्रों में भारी टैंक युद्ध लड़े, जो सबसे बड़े टैंक युद्धों में से एक था। युद्ध सितंबर 1965 में ताशकंद समझौते के साथ समाप्त हुआ, जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी सीमाओं पर वापस लौट गए। ताशकंद समझौता के तहत भारत ने हाजी पीर दर्रा जैसे कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान को वापस कर दिया।

1965 में भी चलाया जीत का प्रोपेगंडा

जैसे 2025 में जिस तरह से पाकिस्तान की हार हुई है, तब भी अयूब को करारी हार का सामना करना पड़ा था। पाकिस्तानी सेना का प्रचार तंत्र तेज हो गया औऱ 1965 के युद्ध को अपनी जीत बताना शुरू कर दिया। लेकिन पाकिस्तानी प्रचार ने दावा किया कि उसने लाहौर को “बचा लिया,” लेकिन वास्तव में भारतीय सेना ने रणनीतिक रूप से इन क्षेत्रों में दबाव बनाए रखा, जिससे पाकिस्तान को अपनी सेना को कश्मीर से हटाकर पंजाब में तैनात करना पड़ा। भारतीय सेना का लाहौर और सियालकोट तक पहुंचना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक संदेश था कि भारत न केवल रक्षात्मक, बल्कि आक्रामक कार्रवाई करने में भी सक्षम है। वहीं, चविंडा की लड़ाई को पाकिस्तान में एक बड़ी जीत के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन वास्तविक परिणाम इसके उलट थे। खुद पाकिस्तानी सेना में ही जनरल अयूब की रणनीति पर सवाल उठने लगे, सेना में असंतोष बढ़ने लगा। इसी असंतोष को दबाने के लिए और बड़ी जीत का दिखावा करने के लिए जनरल अयूब ने खुद को फील्ड मार्शल घोषित कर दिया। इस तरह से पाकिस्तान को पहला स्वयंभू फील्ड मार्शल मिला।

1965 के बाद धीरे-धीरे कम होने लगी अयूब की लोकप्रियता

अयूब खान ने फील्ड मार्शल का दर्जा हासिल करके खुद को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित किया गया और युद्ध को “सफलता” के रूप में प्रचारित किया गया। यह सेना को एकजुट करने और उनके नेतृत्व में विश्वास बनाए रखने की कोशिश थी। यह अमेरिका जैसे सहयोगियों को यह दिखाने की भी कोशिश थी कि वह एक मजबूत क्षेत्रीय नेता हैं। 1965 के युद्ध ने पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष को बढ़ाया, क्योंकि बंगाली आबादी को लगता था कि उनकी सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया। यह 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की एक बड़ी वजह बना। अयूब की लोकप्रियता 1965 के बाद धीरे-धीरे कम होने लगी। हालांकि फील्ड मार्शल का दर्जा अयूब की छवि को कुछ समय के लिए मजबूत करने में सफल रहा, लेकिन उन पर आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार के आरोप, और राजनीतिक दमन के आरोप लगने लगे। 1968-69 में विरोध प्रदर्शनों ने उन्हें सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। 1969 में, अयूब को सत्ता छोड़नी पड़ी, और जनरल याह्या खान ने मार्शल लॉ लागू कर दिया।

करगिल में हार के बाद मुशर्रफ ने किया था तख्तापलट

करगिल युद्ध में करारी हार के बाद तत्कालीन पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने 12 अक्टूबर 1999 को तख्तापलट करके तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार को उखाड़ फेंका और खुद सत्ता हथिया ली थी। मुशर्रफ 1998 से सेना प्रमुख थे, उन्होंने करगिल में घुसपैठ की योजना बनाई, जिसके बारे में नवाज शरीफ को पूरी जानकारी नहीं थी। करगिल युद्ध में पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ, और नवाज शरीफ ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में सैनिकों को वापस बुलाया, जिससे सेना में असंतोष बढ़ा। 1999 में करगिल हार के बाद शरीफ ने मुशर्रफ को हटाने की कोशिश की, लेकिन सेना ने तख्तापलट कर शरीफ को अपदस्थ कर दिया। मुशर्रफ ने चीफ एग्जीक्यूटिव का पद संभाला और 2001 में राष्ट्रपति बने।

2025 में पाकिस्तान में आतंरिक चुनौतियां

मुनीर का फील्ड मार्शल बनने के पीछे भी यही वजह है। ऑपरेशन सिंदूर की हार ने उनकी स्थिति को कमजोर किया है, और सेना के भीतर बगावत की आशंका ने इस कदम को जरूरी बना दिया। ऑपरेशन सिंदूर में जिस तरह से नूर खान बेस, रडार सिस्टम, और सैन्य चौकियों की तबाही हुई उससे मुनीर की रणनीतिक कमजोरी साफ दिखी। उनके कार्यकाल में बलूचिस्तान में विद्रोही हमले और खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की गतिविधियां बढ़ रही हैं। इससे सेना के मनोबल पर असर पड़ रहा है। अगर मुनीर को यह दर्जा न दिया जाता, तो तख्तापलट या बगावत की आशंका थी। इमरान खान समर्थकों ने मुनीर को “कायर” और “अक्षम” करार दिया है। #MunirOut अभियान ने उनकी स्थिति को और कमजोर किया है।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना के कुछ वरिष्ठ अफसर मुनीर की भारत और अफगानिस्तान नीतियों को “आत्मघाती” मानते हैं। वह कहते हैं कि ऐसा करके मनीर को खुद को ‘सेफ’ कर लिया। मुनीर का कार्यकाल नवंबर 2025 में समाप्त हो रहा है। हालांकि उन्हें कार्यकाल खत्म होने के बाद जनरल का पद छोड़ना पड़ेगा, लेकिन वह आजीवन फील्ड मार्शल बने रहेंगे। इससे सेना में उन्हें जीवनभर ‘सम्मान’ मिलता रहेगा और सेना पर पकड़ बनी रहेगी। साथ ही, इससे चीन और रूस जैसे सहयोगियों को यह संदेश देने की कोशिश है कि पाकिस्तानी सेना एकजुट और ताकतवर है।

भारत की जीत को छोटा करने की कोशिश

ऑपरेशन सिंदूर में जिस तरह से भारतीय सेना ने शानदार प्रदर्शन करके पाकिस्तान की सैन्य ताकत को औकात दिखाई है, वह पाकिस्तान के गले नहीं उतर रही है। भारत ने पहलगाम हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ अपनी सख्त नीति को वैश्विक मंच पर मजबूती से रखा। ऑपरेशन सिंदूर से भारतीय सेना ने अपनी सटीक और आक्रामक जवाबी कार्रवाई की क्षमता का प्रदर्शन पूरी दुनिया के सामने किया है, इससे उसकी साख बढ़ी है। पाकिस्तान का यह कदम भारत के नैरेटिव, विशेष रूप से कश्मीर में आतंकवाद और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर, को कमजोर करने की कोशिश हो सकता है।

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भारत में फील्ड मार्शल- सैन्य गौरव का प्रतीक

वहीं, पाकिस्तान के उलट भारत में फील्ड मार्शल का पद बेहद सम्मानजनक माना जाता है। यह पद केवल असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। अब तक केवल तीन सैन्य नायकों को यह दर्जा मिला है: सैम मानेकशॉ, कोडंडेरा एम. करियप्पा, और अर्जन सिंह। सैम मानेकशॉ को जनवरी 1973 में फील्ड मार्शल बनाया गया, उसी महीने वे सेना प्रमुख के पद से रिटायर हुए थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनकी रणनीति ने बांग्लादेश की स्थापना और पाकिस्तान की हार सुनिश्चित की। कोडंडेरा एम. करियप्पा, भारत के पहले सेना प्रमुख, उन्हें 1986 में यह दर्जा मिला, यानी उनके 1953 के रिटायरमेंट के 33 साल बाद। 1947-48 के भारत-पाक युद्ध में उनकी नेतृत्व क्षमता ने कश्मीर की सुरक्षा की। वहीं अर्जन सिंह, भारतीय वायुसेना के दिग्गज, को 2002 में मार्शल ऑफ द एय़रफोर्स बनाया गया। 1969 में रिटायर होने के बाद, 1965 के युद्ध में उनके नेतृत्व को सम्मानित किया गया।

Pakistan Clutter Strike Strategy: सस्ते ड्रोन भेजकर भारतीय रडारों को ‘कन्फ्यूज’ करना चाहता था पाकिस्तान, कई ड्रोनों में नहीं थे कैमरे या जासूसी उपकरण

Pakistan Clutter Strike Strategy: Cheap Drones to Confuse Indian Radars

Pakistan Clutter Strike Strategy: 8 और 9 मई की रात को पाकिस्तान ने जिस तरह से भारत की पश्चिमी सीमा के कई इलाकों में ड्रोन अटैक किया, उससे पाकिस्तानी सेना की एक बड़ी चौंकाने वाली रणनीति का खुलासा हुआ है। दरअसल पाकिस्तानी सेना की चाल थी कि बेहद सस्ते और बेसिक ड्रोन भारतीय सीमा में दाखिल करके भारतीय रडार सिस्टम को कन्फ्यूज किया जाए और फिर बड़े हमले को अंजाम दिया जाए।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक इस रणनीति के तहत पाकिस्तान ने सैकड़ों सस्ते और बेसिक ड्रोन भारतीय सीमा में भेजे। इस भीड़ में कुछ खतरनाक हमलावर और जासूसी ड्रोन छिपाकर भेजे गए थे। ये यब भारतीय रडार सिस्टम को भ्रमित करने के लिए किया गया था। 8 मई की रात को पाकिस्तान ने भारत की पश्चिमी सीमा पर बारामूला से लेकर बाड़मेर तक कई जगहों पर ड्रोन भेजे। पहले दिन कुछ ही आर्म्ड ड्रोन देखे गए, लेकिन अगले दिन यानी 9 मई को हालात औऱ गंभीर हो गए। सूत्रों ने बताया कि दूसरी रात को करीब 300 से 400 ड्रोन भारतीय सीमा में दाखिल हुए। इन ड्रोनों को कई ग्रुप में बांटा गया था, और हर ग्रुप में सैकड़ों ड्रोन शामिल थे।

Pakistan Clutter Strike Strategy: भारतीय रडारों को “सैचुरेट” करने की साजिश

इन ड्रोनों की खास बात यह थी कि इनमें से ज्यादातर बेहद सस्ती क्वॉलिटी के और साधारण ड्रोन थे। इनमें न तो कोई हथियार था और न ही कोई खास तकनीक। लेकिन इन बेहद सस्ते क्वॉलिटी के ड्रोनों की भीड़ में कुछ खतरनाक ड्रोन छिपे हुए थे। इनमें से कुछ हमलावर ड्रोन थे और कुछ जासूसी करने वाले ड्रोन। सैन्य सूत्रों के मुताबिक चाल दिन तक चले ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने करीब 800 से 1000 ड्रोन का इस्तेमाल किया। ये ड्रोन अलग-अलग साइज और टाइप के थे। पाकिस्तान की रणनीति थी कि बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन भेज कर भारतीय रडारों को “सैचुरेट” (भर देना) किया जाए, ताकि आर्म्ड ड्रोन छिपकर हमला कर सकें।

लेकिन भारतीय सेना ने इस रणनीति को समझ लिया था। सूत्रों ने बताया कि भारतीय सेना ने पहले से ही 26 से 28 अप्रैल को एक सिमुलेशन एक्सरसाइज की थी, जिसमें ड्रोन हमलों का सामना करने की तैयारी की गई थी। इस एक्सरसाइज में जवानों को सिखाया गया कि रडार को बेवजह ही चालू न करें, ताकि दुश्मन को हमारी स्थिति का पता न चले। जब ड्रोन हमले की शुरुआत हुई, तो सेना ने सही समय पर रडार चालू किए और एंटी-एयरक्राफ्ट गनों से उन्हें मार गिराया।

खतरनाक ड्रोन को पहचानना मुश्किल

सैन्य सूत्रों का कहना, पाकिस्तान की इस रणनीति का मुख्य मकसद भारतीय रडार सिस्टम को “क्लटर” करना था। क्लटर का मतलब है रडार पर इतनी सारी चीजें एक साथ दिखाना कि असली खतरे को पहचानना मुश्किल हो जाए। जब सैकड़ों ड्रोन एक साथ उड़ते हैं, तो रडार स्क्रीन पर बहुत सारे बिंदु (डॉट्स) दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा ड्रोन खतरनाक है और कौन सा नहीं।

सूत्रों ने बताया कि इन सस्ते ड्रोनों का काम रडार को बिजी रखना था, ताकि असली हमलावर और जासूसी ड्रोन भारतीय सीमा में अंदर तक घुस सकें। जासूसी ड्रोन में कैमरे और सेंसर लगे हुए थे, जो भारतीय सेना की गतिविधियों की जानकारी जुटा रहे थे। वहीं, हमलावर ड्रोनों में छोटे-छोटे विस्फोटक थे, ताकि वे भारतीय ठिकानों पर हमला कर सकें। सूत्रों का कहना है कि अगर सेना समय पर इस रणनीति को समझने में चूक कर जाती तो, वे हमारे एयर डिफेंस नेटवर्क की कमजोरियों का पता लगा सकते थे।

ड्रोनों को मार गिराने में खर्च हुआ खूब गोला-बारूद

सूत्र ने यह भी कहा कि पाकिस्तान का एक और मकसद था भारत का गोला-बारूद और मिसाइलों बेवजह बरबाद करना। इन ड्रोनों की वजह से भारत को काफी गोला-बारूद खर्च करना पड़ा। साथ ही, इतने सारे ड्रोनों ने आम लोगों में डर भी पैदा कर दिया।

सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान ने अपने सर्विलांस ड्रोनों में LiDAR (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) तकनीक का इस्तेमाल किया था, ताकि अहम भारतीय सैन्य ठिकानों की जानकारी जुटा सके। सूत्रों ने बताया कि यह सही है कि इनमें से कुछ ड्रोन तुर्की के बने थे, हालांकि सभी ड्रोनों की जानकारी नहीं मिली।

जैसे ही भारतीय सेना को इन ड्रोनों की गतिविधियों का पता चला, उन्होंने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी। भारतीय वायु सेना ने अपने एय़र डिफेंस सिस्टम को एक्टिवेट किया और ड्रोन को रोकने के लिए कई कदम उठाए। सेना ने पुरानी लेकिन आज भी प्रभावी सोवियत-युग की एल/70 एंटी-एयरक्राफ्ट गन का इस्तेमाल किया, जो ड्रोन को मार गिराने में कारगर साबित हुईं। इसके अलावा, स्वदेशी हथियारों जैसे पेचोरा, ओएसए-एके और एलएएडी गन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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वहीं, इस रणनीतिक हमले ने भारत के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी है। सस्ते ड्रोन की भीड़ के बीच खतरनाक ड्रोन को पहचानना और उन्हें रोकना आसान नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसे हमले और बढ़ सकते हैं, क्योंकि ड्रोन तकनीक सस्ती और आसानी से उपलब्ध हो रही है। भारतीय सेना को अब अपने रडार और एय़र डिफेंस सिस्टम को और एडवांस बनाना होगा।

BrahMos NG: सुखोई के बाद अब तीन और फाइटर जेट होंगे BrahMos से लैस, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना का बड़ा फैसला!

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BrahMos NG: भारतीय वायुसेना (IAF) ने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमानों से ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइल दागकर बड़ी सफलता हासिल की। अब भारत एक कदम और आगे बढ़ाने की तैयारी में है। वायुसेना और भारत और रूस की संयुक्त कंपनी ब्रह्मोस एयरोस्पेस मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल का एक नया और हल्का संस्करण तैयार करने जा रहे हैं। इसे ब्रह्मोस नेक्स्ट जेनरेशन (BrahMos NG) कहा जा रहा है। इस मिसाइल को वायुसेना के तीन और लड़ाकू विमानों, मिग-29, मिराज 2000 और स्वदेशी तेजस (LCA) में लगाने की योजना है।

BrahMos NG: ब्रह्मोस मिसाइल की ताकत

ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) भारत और रूस ने मिलकर बनाई है। यह दुनिया की इकलौती सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे लड़ाकू विमान से दागा जा सकता है। इसकी रफ्तार 2.8 मैक यानी करीब 3400 किलोमीटर प्रति घंटा है। इतनी तेज रफ्तार की वजह से दुश्मन के लिए इसे रोकना लगभग नामुमकिन है। ऑपरेशन सिंदूर में सुखोई-30 MKI विमानों ने भारत की सीमा से 100-200 किलोमीटर अंदर पाकिस्तान के ठिकानों को निशाना बनाया। 10 मई की सुबह इन हमलों ने पाकिस्तान को घुचने पर ला दिया और उसी दिन उन्हें अमेरिका से बीचबचाव करने के लिए भीख मांगनी पड़ी।

BrahMos NG: पहले सी हल्की और ज्यादा खतरनाक

अब तक ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) का वजन 2.5 टन था, जिसे सुखोई जैसे बड़े विमान ही ले जा सकते थे। लेकिन ब्रह्मोस NG को सिर्फ 1.3 टन वजन का बनाया जाएगा। इसका मतलब है कि इसे छोटे विमान जैसे मिग-29, मिराज 2000 और तेजस में भी लगाया जा सकेगा। यह मिसाइल भारतीय वायुसेना की मुख्य हथियार बनने वाली है, जो दुश्मन के ठिकानों को आसानी से नष्ट कर सकती है। ब्रह्मोस NG (BrahMos NG) में पारंपरिक वॉरहेड होगा, जो दुश्मन के मजबूत कमांड सेंटर, कंट्रोल रूम और कम्यूनिकेशन सेंटर को निशाना बनाएगा।

आसान काम नहीं था सुखोई में ब्रह्मोस लगाना

सुखोई विमानों में ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) लगाना आसान काम नहीं था। भारत ने 1997 से सुखोई विमानों का इस्तेमाल शुरू किया था। 2005 में लोकसभा को बताया था कि भारतीय और रूसी वैज्ञानिकों ने मिलकर सुखोई में ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) लगाने की संभावना को साबित कर दिया है। इसके बाद 2012 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने 42 सुखोई विमानों में बदलाव करने और 216 हवा से दागी जाने वाली ब्रह्मोस मिसाइलें (BrahMos NG) खरीदने की मंजूरी दी।

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वैज्ञानिकों ने दो बड़े काम किए। पहला, सुखोई विमानों को इस तरह बदला गया कि वे भारी मिसाइल ले जा सकें। दूसरा, ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) का वजन 500 किलो कम करके 2.5 टन किया गया और इसे हवा में स्थिरता देने के लिए ‘फिन्स’ (पंख) जोड़े गए। जनवरी 2020 में वायुसेना ने पहली स्क्वाड्रन तैयार की, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस सुखोई विमान शामिल थे। अब वायुसेना की लगभग हर स्क्वाड्रन में ऐसे सुखोई विमान हैं।

रेंज बढ़ाने की कोशिश

शुरुआत में ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) की रेंज 290 किलोमीटर थी, क्योंकि मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजिम (MTCR) के नियमों की वजह से रेंज सीमित थी। लेकिन 2016 में भारत MTCR का सदस्य बना और इसके बाद मिसाइल की रेंज को 450 किलोमीटर तक बढ़ा दिया गया। अब इसे 600 किलोमीटर तक ले जाने की योजना है। इतनी लंबी रेंज की वजह से भारत अपनी सीमा से काफी अंदर तक दुश्मन के ठिकानों को निशाना बना सकता है, वो भी बिना अपने विमानों को खतरे में डाले।

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की ताकत

ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) ने अपनी ताकत साबित की। सुखोई-30 MKI विमानों ने भारत की सीमा से ही मिसाइल दागी और पाकिस्तान के अंदर 100-200 किलोमीटर दूर ठिकानों को तबाह कर दिया। इतनी तेज रफ्तार वाली मिसाइल को रोकने की तकनीक पाकिस्तान के पास नहीं थी। इन हमलों ने न सिर्फ दुश्मन के ठिकानों को नष्ट किया, बल्कि पाकिस्तान को यह अहसास भी दिलाया कि भारत की ताकत को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।

क्यों जरूरी है BrahMos NG?

भारतीय वायुसेना के पास सुखोई के अलावा कई छोटे और हल्के लड़ाकू विमान हैं, जैसे मिग-29, मिराज 2000 और तेजस। अभी तक ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) का वजन ज्यादा होने की वजह से इन्हें इन विमानों में नहीं लगाया जा सका। लेकिन ब्रह्मोस NG (BrahMos NG) के हल्के वजन की वजह से अब ये फाइटर जेट भी इस ताकतवर मिसाइल से लैस हो सकेंगे। इससे वायुसेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। छोटे विमान ज्यादा तेजी से उड़ान भर सकते हैं और अलग-अलग इलाकों में आसानी से पहुंच सकते हैं। ऐसे में ब्रह्मोस NG (BrahMos NG) इन विमानों को और खतरनाक बना देगी।

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ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos NG) भारत की डिफेंस स्ट्रेटेजी का एक अहम हिस्सा है। यह मिसाइल न सिर्फ दुश्मन के ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम है, बल्कि इसे रोकना भी बेहद मुश्किल है। सुखोई के बाद अब मिग-29, मिराज 2000 और तेजस जैसे विमानों में इसे लगाने की योजना से भारत की हवाई ताकत और मजबूत होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा में एक बड़ा फायदा देगा।

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Army Chief Longewala Visit: Strela-10M and ZU-23 Anti-Aircraft Guns Spotted

Army Chief Longewala Visit: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सोमवार को 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अपनी ऐतिहासिक जीत के लिए प्रसिद्ध राजस्थान के लोंगेवाला में इंटरनेशनल बॉर्डर के नजदीक स्थित सैन्य चौकी का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में अहम योगदान देने वाले सैनिकों की जमकर तारीफ की। जनरल द्विवेदी ने भारतीय वायुसेना (IAF) और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के साथ मिलकर किए गए संयुक्त अभियान की समीक्षा भी की, जिसमें रेगिस्तानी इलाके में रणनीतिक तैयारियों और कॉर्डिनेशन पर विशेष ध्यान दिया गया। आर्मी चीफ के इस दौरे के दौरान उनके पीछे नजर आया एक खास वेपन सिस्टम जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। आर्मी चीफ ने उसी के आगे खड़े होकर वहां मौजूद जवानों को संबोधित किया। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने लोंगेवाला के दौरे के दौरान इस जंग की वीरता को याद किया। उन्होंने कहा, “लोंगेवाला की जंग हमें सिखाती है कि हिम्मत और रणनीति के सामने कोई ताकत नहीं टिक सकती। आज भी हमारे सैनिक उसी जज्बे के साथ देश की रक्षा कर रहे हैं।”

Army Chief Longewala Visit: लोंगेवाला का क्या है ऐतिहासिक महत्व

लोंगेवाला भारत-पाकिस्तान सीमा के पास एक छोटा सा गांव है, जो रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। 1971 के युद्ध में, मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के नेतृत्व में 120 भारतीय सैनिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद यहां 3000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों और टैंकों को रोककर इतिहास रच दिया था। आज भी यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत-पाकिस्तान सीमा के करीब स्थित है और रेगिस्तानी युद्ध की तैयारियों के लिए एक प्रमुख केंद्र है। इस जीत ने भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक कुशलता को पूरी दुनिया के सामने प्रदर्शित किया। आज भी यह क्षेत्र भारतीय सेना के लिए एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक स्थल है, जहां नियमित रूप से सैन्य अभ्यास और तैयारियां की जाती हैं।

यह कहानी 4 दिसंबर 1971 की रात की है, जब राजस्थान के थार रेगिस्तान की सर्द रेत में 120 भारतीय सैनिक एक बड़े खतरे का सामना करने को तैयार थे। 1971 का युद्ध मुख्य रूप से पूर्वी मोर्चे पर केंद्रित था, जहां भारत बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ रहा था। उस समय पश्चिमी मोर्चे पर शांति थी, लेकिन पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान की योजना कुछ और थी। उन्हें पता था कि पूर्वी पाकिस्तान ज्यादा दिन नहीं टिकेगा, इसलिए उन्होंने पश्चिमी सीमा पर हमला करने का फैसला किया।

उनका निशाना थी भारत-पाक सीमा के पास लोंगेवाला की छोटी सी चौकी। इस चौकी पर सिर्फ 120 सैनिक तैनात थे, जो 23वीं बटालियन, पंजाब रेजिमेंट का हिस्सा थे। इनके कमांडर थे मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी। उनके पास कोई टैंक नहीं था। दूसरी ओर, पाकिस्तान की तरफ से 2000 से ज्यादा सैनिक, 40 टैंक और भारी तोपखाने उनकी तरफ बढ़ रहा था। मेजर चांदपुरी के सामने दो रास्ते थे, या तो रामगढ़ की ओर पीछे हट जाएं, या फिर डटकर मुकाबला करें। उन्होंने हार नहीं मानी और लड़ने का फैसला किया। जवानों ने तुरंत रणनीति बनाई। उन्होंने नकली एंटी-टैंक माइंस बिछाकर दुश्मन को भ्रम में डाला, अपनी पोजीशन ली और हमले का इंतजार किया। आधी रात को पाकिस्तानी टैंक चौकी के करीब पहुंच गए और लोंगेवाला की जंग शुरू हो गई।

नकली माइंस बिछा कर पाकिस्तान को दिया चकमा

रात के 12:30 बजे पहला गोला दागा गया। धमाकों से रेगिस्तान में उजाला हो गया, लेकिन भारतीय सैनिकों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने तब तक गोली नहीं चलाई, जब तक दुश्मन के टैंक 15 से 30 मीटर की दूरी पर नहीं आ गए। फिर रिकॉइललेस राइफल्स से हमला बोला गया और दो टैंक तुरंत नष्ट कर दिए गए। पाकिस्तानी सेना की मुश्किलें यहीं शुरू हो गईं। उनके कई टैंक रेगिस्तान की नरम रेत में फंस गए। कुछ टैंकों ने कांटेदार तार देखे और सोचा कि वहां माइंस बिछी हैं। उन्होंने इंजीनियरों को बुलाने के लिए दो घंटे तक इंतजार किया, लेकिन बाद में पता चला कि यह भारतीय सैनिकों की चाल थी। ये दो घंटे जंग के लिए निर्णायक साबित हुए।

Army Chief Longewala Visit: Strela-10M and ZU-23 Anti-Aircraft Guns Spotted

मेजर चांदपुरी और उनके जवानों ने ऊंचे टीलों से दुश्मन पर नजर रखी। उस रात चांदनी थी, जिसके कारण विस्फोट की रोशनी में रेगिस्तान साफ दिख रहा था। भारतीय सैनिकों ने इसका फायदा उठाया और दुश्मन पर हमला जारी रखा। दूसरी तरफ, पाकिस्तानी सेना की हालत खराब थी। उनके पास सही नक्शे नहीं थे, रेगिस्तानी इलाके का अनुभव नहीं था, टैंकों का ईंधन खत्म हो रहा था और रात उनके लिए मुसीबत बन गई। भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद और समय दोनों खत्म हो रहा था। लेकिन जैसे ही सुबह हुई और आसमान गड़गड़ाहट से गूंज उठा। भारतीय वायुसेना के हॉकर हंटर और एचएएल मारुत विमान मौके पर पहुंच गए। पाकिस्तान के पास कोई एयर डिफेंस नहीं था। भारतीय वायुसेना ने रॉकेट, मशीन गन और सटीक हमलों से दुश्मन पर कहर बरपाया। पायलटों ने इसे बाद में “टर्की शूट” कहा, क्योंकि दुश्मन के टैंक आसानी से निशाना बन गए थे। एक छोटे विमान में बैठे फॉरवर्ड एयर कंट्रोलर ने जेट्स को सटीक दिशा-निर्देश दिए। खतरों के बीच उतरते-चढ़ते उन्होंने टारगेट मार्क किए। देखते ही देखते रेगिस्तान पाकिस्तानी टैंकों का कब्रिस्तान बन गया। उस युद्ध में पाकिस्तान के 36 टैंक तबाह हो चुके थे, 100 से ज्यादा बख्तरबंद वाहन नष्ट हो गए थे।

स्ट्रेला-10M ने खींचा सभी का ध्यान

आर्मी चीफ का लोंगोवाला दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब भारत अपनी सीमाओं पर बढ़ते खतरों का सामना कर रहा है। लेकिन इस बार पाकिस्तान के टैंक नहीं, बल्कि उसके ड्रोन हैं, जिन्हें भारत के एय़र डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया। सेना प्रमुख के दौरे के दौरान उनके पीछे खड़े कॉम्बैट व्हीकल स्ट्रेला-10M ने सभी का ध्यान खींचा। कॉम्बैट व्हीकल 9K35 स्ट्रेला-10M (Strela-10M) है, जो एक शॉर्ट-रेंज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम (SAM) है। इसे NATO में SA-13 Gopher के नाम से जाना जाता है। भारतीय सेना इस सिस्टम का उपयोग हवाई हमलों, खासकर निचली ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोनों से अपनी टुकड़ियों की सुरक्षा के लिए करती है।

स्ट्रेला-10M को सोवियत संघ ने 1970 के दशक में बनाया था। भारतीय सेना ने इसे 1980 के दशक में अपने बेड़े में शामिल किया था और तब से यह सेना के एय़र डिफेंस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुई है। यह सिस्टम निचली ऊंचाई पर उड़ने वाले हेलीकॉप्टरों, विमानों और ड्रोनों को आसानी से निशाना बना सकता है।

स्ट्रेला-10M एक ट्रैक वाले वाहन (MT-LB) पर लगी होती है, जो इसे रेगिस्तानी और पहाड़ी इलाकों में आसानी से ले जाने में मदद करता है। इस वाहन पर चार मिसाइल लांचर लगे होते हैं, जो 9M37 मिसाइलों से लैस होते हैं। ये मिसाइलें 5 किलोमीटर की दूरी और 3.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक दुश्मन के हवाई लक्ष्यों को मार गिरा सकती हैं। इसकी खासियत यह है कि यह इन्फ्रारेड सेंसर और ऑप्टिकल गाइडेंस सिस्टम से लैस है, जिसके कारण यह रात में या खराब मौसम में भी काम कर सकती है।

भारतीय सेना ने स्ट्रेला-10M को किया अपग्रेड

भारतीय सेना में स्ट्रेला-10M का इस्तेमाल मुख्य रूप से मैदानी टुकड़ियों की सुरक्षा के लिए किया जाता है। यह सिस्टम ब्रिगेड स्तर पर तैनात कि जाता है, जहां यह दुश्मन के हवाई हमलों से सैनिकों और टैंकों को बचाने का काम करती है। भारत जैसे देश में, जहां अलग-अलग तरह के इलाके जैसे रेगिस्तान, पहाड़ और मैदान हैं, ऐसे हालात में स्ट्रेला-10M बेहद उपयोगी है। इसका ट्रैक वाला वाहन रेगिस्तान की रेत में भी आसानी से चल सकता है।

हाल के वर्षों में ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ा है, जिसके चलते भारतीय सेना ने स्ट्रेला-10M को अपग्रेड करने का फैसला किया। 2024 में इस सिस्टम को आधुनिक बनाने का काम शुरू हुआ, जिसमें नए सेंसर और ड्रोन-रोधी तकनीकों को जोड़ा गया। आर्मी चीफ के दौरे के दौरान इस अपग्रेडेड सिस्टम को प्रदर्शित किया गया, जो यह दिखाता है कि सेना अपनी पुरानी तकनीकों को भी आधुनिक युद्ध के लिए तैयार कर रही है।

ZSU-23-2 एंटी-एयरक्राफ्ट गन भी दिखी

लोंगेवाला में आर्मी चीफ के आगे दो ZSU-23-2 एंटी-एयरक्राफ्ट गन भी देखी गईं। ये गन तेजी से फायरिंग करके हवाई लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम है। जेनिटनाया उस्टानोव्का ZU-23 (Zenitnaya Ustanovka ZU-23) एंटी-एयरक्राफ्ट गन ने 7 से 10 मई के बीच चले ऑपरेशन सिंदूर में तुर्की और चीनी ड्रोनों को आसमान से मार गिराने में अहम भूमिका निभाई। ZSU-23 और स्ट्रेला-10M मिलकर किसी भी छोटे-मोटे हवाई खतरे का सामना करने में सक्षम हैं।

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

ZU-23 एक सोवियत-युग की 23mm ट्विन-बैरल एंटी-एयरक्राफ्ट गन है, जिसे 1960 में बनाया गया था। यह गन 2.5 किलोमीटर की ऊंचाई और 2 किलोमीटर की दूरी तक हवाई लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। इसकी फायरिंग रेट 2000 राउंड प्रति मिनट है। ड्रोनों और निचली ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों के लिए यह काल है। विशेषज्ञों का कहना है कि ZU-23 जैसे हथियार आधुनिक युद्ध में ड्रोन खतरों से निपटने के लिए बेहद जरूरी हैं।

AI in Operation Sindoor: कैसे भारत की ‘छतरी’ बना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस? ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तानी हवाई हमलों को ऐसे किया नाकाम

AI in Operation Sindoor: How artificial intelligence Thwarted Pakistan Aerial Attacks
Credit: AI Image

AI in Operation Sindoor: पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई करते हुए न केवल पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट किया बल्कि उसके कई सैन्य ठिकानों और एयर स्ट्रिप्स को भी नुकसान पहुंचाया। जिसमें पाकिस्तान ने ड्रोन और मिसाइलों के जरिए भारत पर हवाई हमला करने की कोशिश की थी, जिसके जवाब में भारत ने उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। खास बात यह रही कि भारत और पाकिस्तान के बीच 6 से 10 मई के बीच हुए चार दिन के सैन्य संघर्ष में भारतीय वायुसेना और सेना ने जिस कुशलता से जवाब दिया, उसके पीछे एक अदृश्य लेकिन बेहद ताकतवर सहयोगी था एडवांस “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” यानी AI। जी हां, भारत के पास पहले से ही तैयार की गई AI आधारित टेक्नोलॉजी ही थीं जिन्होंने दुश्मन के ड्रोन और मिसाइल हमलों को हवा में ही निशाना बना दिया।

डिफेंस सूत्रों के अनुसार, भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कई हवाई ठिकानों और सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर को सफलतापूर्वक निशाना बनाया और पाकिस्तान की ओर से आने वाले दर्जनों हवाई हमलों को नाकाम किया। इस पूरे ऑपरेशन में भारत की ‘स्पेस टेक्नोलॉजी’, ‘इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर’ और ‘कंप्यूटर साइंस’ का जबरदस्त कॉम्बिनेशन देखने को मिला।

AI in Operation Sindoor: क्या हुआ था उस 6 और 7 मई की रात?

15 मई की रात, जब पूरा देश नींद में था, तब पाकिस्तानी सेना (AI in Operation Sindoor) ने भारत की सीमा के पास अपने ड्रोन और मिसाइलों को तैनात किया। इन हथियारों का मकसद भारत के सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाना और सीमावर्ती इलाकों में दहशत फैलाना था। डिफेंस सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने इस हमले के लिए अत्याधुनिक ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जो रात के अंधेरे में चुपके से सीमा पार कर सकते थे। इसके अलावा, कुछ मिसाइलें भी दागी गईं, जो भारत के रडार सिस्टम को चकमा देने के लिए डिजाइन की गई थीं।

लेकिन पाकिस्तान की यह चाल कामयाब नहीं हो सकी। भारत की सेना ने अपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI in Operation Sindoor) से लैस एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल कर इन हमलों को न केवल रोका, बल्कि दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि इस ऑपरेशन में भारत की “क्लाउड-बेस्ड इंटीग्रेटेड एय़र कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम” ने अहम भूमिका निभाई। इस सिस्टम ने न सिर्फ दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों का पता लगाया, बल्कि उनकी लोकेशन ट्रैक करके उन्हें नष्ट करने के लिए सही समय पर सटीक कार्रवाई भी की।

मिशन सिंदूर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने कैसे की मदद?

सूत्रों ने बताया कि भारत ने पिछले कुछ सालों में अपने डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) पर काफी काम किया है। 2018 में, रक्षा मंत्रालय ने एक खास टास्क फोर्स बनाई थी, जिसका मकसद नेशनल सिक्योरिटी के लिए एआई टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना था। इसके बाद डिफेंस AI काउंसिल (DAIC) और डिफेंस AI प्रोजेक्ट एजेंसी (DAIPA) का गठन हुआ, ताकि सेनाओं में AI को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके। इस टास्क फोर्स ने कई सरकारी और निजी कंपनियों के साथ मिलकर एआई-बेस्ड डिफेंस सिस्टम्स को डेवलप करने की दिशा में काम शुरू किया। 2022 तक, भारत ने 129 एआई-बेस्ड प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी, जिनमें से 77 पूरी हो चुकी हैं। इन प्रोजेक्ट्स पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।

इन प्रोजेक्ट्स में से एक अहम सिस्टम है “इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम” (AICCS), जिसने इस हमले को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई। यह सिस्टम एआई (AI in Operation Sindoor) की मदद से दुश्मन के हथियारों का पता लगाने, उनकी लोकेशन ट्रैक करने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिस्टम इतना एडवांस है कि यह रात के अंधेरे में भी दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों को कैच कर सकता है। इसके अलावा, यह सिस्टम हवा में मौजूद सभी वस्तुओं को स्कैन करता है और यह तय करता है कि कौन सी वस्तु खतरा है और कौन सी नहीं।

सूत्रों ने बताया कि यह सिस्टम जमीन, समुद्र और आकाश से दुश्मन की किसी भी गतिविधि को रियल टाइम में पहचान सकता है और उस पर तुरंत जवाबी कार्रवाई कर सकता है। AICCS ने मिसाइल और ड्रोन को ट्रैक करके उन्हें टारगेट पर पहुंचने से पहले ही हवा में नष्ट कर दिया।

भारत में बने सिस्टम ने दिखाई ताकत

पिछले कुछ सालों में भारत ने अपनी डिफेंस टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। रक्षा मंत्रालय ने निजी कंपनियों को भी इस क्षेत्र में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया है। 2022 में, सरकार ने 70 डिफेंस कंपनियों को एआई प्रोजेक्ट दिए, जिनमें से 40 पूरे हो चुके हैं। इनमें से भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने एक AI आधारित सिस्टम विकसित किया है, जो दुश्मन के विमानों की गतिविधियों को पहचान कर अलर्ट जारी करता है। यह सिस्टम भारत के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) में इंटीग्रेट किया गया, इस सिस्टम ने पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को पकड़ने में अहम भूमिका निभाई।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआई टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) ने भारत के डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह से बदल दिया है। पहले, भारत को दुश्मन के हमलों का पता लगाने के लिए पारंपरिक रडार सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता था, जो कई बार चूक जाते थे। लेकिन अब, एआई की मदद से भारत न केवल दुश्मन के हमलों को रोक सकता है, बल्कि सटीक कार्रवाई कर जवाब भी दे सकता है।

वहीं, रक्षा मंत्रालय ने अब अपनी तैयारियों को और मजबूत करने का फैसला किया है। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि वह एआई टेक्नोलॉजी को और डेवलप करने के लिए काम करेगा, ताकि भविष्य में ऐसे हमलों को और बेहतर तरीके से रोका जा सके।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी कहा कि वह सेना के सभी अंगों में एआई टेक्नोलॉजी (AI in Operation Sindoor) को लागू करने की योजना बना रहा है। इसके लिए मंत्रालय ने कई निजी कंपनियों के साथ करार किए हैं, जो एआई-आधारित सिस्टम डेपलप करने में मदद करेंगी। मंत्रालय का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत की पूरा डिफेंस सिस्टम एआई टेक्नोलॉजी पर आधारित हो।

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हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए। अगर यह टेक्नोलॉजी गलत हाथों में पड़ जाए, तो यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा भी बन सकती है। इसलिए, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल केवल सही मकसद के लिए हो।