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Explainer Integrated battle Groups: क्या है इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप? ब्यूरोक्रेसी से परेशान सेना प्रमुख ने क्यों दी पूरा IBG प्रोजेक्ट कैंसिल करने की धमकी!

Explainer: What Are Integrated Battle Groups and Why Is the Army Chief Considering Cancelling the IBG Project?

Explainer Integrated battle Groups: भारतीय सेना के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (IBG) पर अंतिम फैसला जल्द ही लिया जा सकता है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि यह प्रोजेक्ट 2025 तक लागू होगा या इसे रद्द कर दिया जाएगा। सेना की इस नई रणनीति का उद्देश्य युद्ध के दौरान तेज़ और प्रभावी कार्रवाई को सुनिश्चित करना है।

Explainer: What Are Integrated Battle Groups and Why Is the Army Chief Considering Cancelling the IBG Project?

आर्मी डे की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि इस विषय पर रक्षा मंत्रालय में सभी संबंधित अधिकारियों को प्रजेंटेशन दिया जा चुका है। हालांकि, उनकी तरफ से कुछ सवाल और सुझाव आए हैं, जिन पर विचार किया जा रहा है। जनरल द्विवेदी ने सीधे-सीधे उत्तर देते हुए कहा, “आईबीजी कब तक तैयार होगी, इसकी सटीक टाइमलाइन देना मुश्किल है क्योंकि ब्यूरोक्रेसी इनवॉल्व होती है, ऐसे मामलों में समय लगता है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह परियोजना या तो इसी साल पूरी हो जाएगी, या फिर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा।

कुछ महीने पहले, सेना ने आईबीजी के निर्माण के लिए सरकारी स्वीकृति पत्र (जीएसएल) का मसौदा प्रस्तुत किया था, जिसका उद्देश्य सीमाओं पर युद्ध क्षमताओं को बढ़ाना है।

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Explainer Integrated battle Groups: क्या है IBG? 

भारतीय सेना आधुनिक युद्धक्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (IBG) स्ट्रेटेजिक फॉर्मेशन पर काम कर रही है। IBG को सेना की पारंपरिक संरचनाओं से अलग, छोटे, चुस्त और आत्मनिर्भर फाइटर युनिट के तौर में विकसित किया जा रहा है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने IBG की अवधारणा पर बात करते हुए कहा, “हर IBG आत्मनिर्भर होगा, जिसमें इलाके और ऑपरेशनल जरूरतों के अनुसार सभी जरूरी सैन्य शाखाओं और सेवाओं का संयोजन होगा।”

IBG को छोटे और फ्लेक्सिबल फॉर्मेशन के तौर पर डिजाइन किया गया है, जो किसी भी खतरे का सामना करने के लिए तेजी से प्रतिक्रिया दे सके। प्रत्येक IBG में पैदल सेना, तोपखाना, बख्तरबंद इकाइयां, इंजीनियर, सिग्नल और एयर डिफेंस जैसी ब्रांचों को भी शामिल किया जाएगा। IBG का नेतृत्व मेजर-जनरल रैंक के अधिकारी द्वारा किए जाने की उम्मीद है। प्रत्येक आईबीजी में लगभग 5,000 कर्मियों की सैन्य ताकत होगी, जो एक ब्रिगेड (3,000-3,500 सैनिक) से बड़ी होगी, लेकिन एक डिवीजन (10,000-12,000 सैनिक) से छोटी होगी। यह फॉर्मेशन IBG को 12 से 48 घंटों के भीतर युद्ध के लिए तैयार होने में सक्षम बनाएगी।

IBG की प्रारंभिक योजना के तहत दो युनिट बनाई जाएंगी। पहली IBG को 9 कोर के तहत पाकिस्तान के साथ लगी पश्चिमी सीमा पर तैनात किया जाएगा, जबकि दूसरी IBG को 17 स्ट्राइक कोर के तहत चीन के साथ उत्तरी सीमा पर चुनौतीपूर्ण इलाकों में तैनात किया जाएगा। यह युनिट्स दुश्मन की हरकतों का तेजी से जवाब देने और सीमाओं पर भारतीय सेना की ताकत को और मजबूत बनाने के लिए तैयार की जा रही हैं।

छोटे और चुस्त फॉर्मेशन से दुश्मन को देंगे मात

IBG के जरिए सेना की पारंपरिक संरचना में बदलाव लाने का लक्ष्य है। IBG छोटे और चुस्त फॉर्मेशन के जरिए दुश्मन के खिलाफ तेज़ी से हमले करने में सक्षम होगी। यह तकनीकी रूप से एडवांस और आधुनिक युद्धक्षेत्र की जरूरतों के अनुकूल होगी। IBG बड़ी सैन्य संरचनाओं के धीमे और बोझिल तरीकों को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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सेना प्रमुख जनरल द्विवेदी ने कहा कि IBG की अवधारणा पर काम लगभग पूरा हो चुका है। “हमने इस प्रोजेक्ट पर रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को प्रजेंटेशन दे दिया है। हालांकि, उनके कुछ सवाल थे जिन पर विचार किया जा रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि IBG कब तक तैयार होगी, इसकी सटीक समयसीमा देना मुश्किल है। “जहां ब्यूरोक्रेसी शामिल होती है, वहां थोड़ा वक्त लगता है। लेकिन हमें उम्मीद है कि 2025 तक यह प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक लागू हो जाएगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसे रद्द करने का भी फैसला भी लिया जा सकता है।”

‘हिमविजय’ सैन्य अभ्यास से मिली थी प्रेरणा

IBG के कॉन्सेप्ट को अक्तूबर 2019 में भारतीय सेना की उत्तरी थिएटर कमांड द्वारा किए गए ‘हिमविजय’ सैन्य अभ्यास के बाद लागू करने की योजना बनाई गई। इस अभ्यास में पहाड़ी इलाकों में सेना की तेज़ और प्रभावी प्रतिक्रिया की क्षमता का परीक्षण किया गया था। हिमालयी क्षेत्र जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में IBG को विशेष रूप से उपयुक्त माना जा रहा है। 2019 में हुए ‘हिमविजय’ नामक अभूतपूर्व और नए सैन्य अभ्यास से सीखे गए सबक शामिल किए गए हैं।

भारतीय सेना की यह पहल आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। IBG की तैनाती से सीमाओं पर भारत की सैन्य शक्ति और संचालन क्षमता को एक नई दिशा मिलेगी। हालांकि, इसके क्रियान्वयन के लिए वित्तीय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा करना अभी बाकी है। सेना को उम्मीद है कि IBG 2025 तक भारतीय रक्षा रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा।

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नई जगह पर पेंटिंग

1971 surrender painting row: 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण की ऐतिहासिक पेंटिंग को हटाकर सेना प्रमुख के लाउंज में एक नई पेंटिंग लगाए जाने पर उठे विवाद पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस बदलाव को सेना के इतिहास, वर्तमान और भविष्य के प्रतीकात्मक संदेश के साथ जोड़ा। बता दें कि रक्षा समाचार डॉट कॉम ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया था।

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नई जगह पर पेंटिंग

पिछले महीने यह पेंटिंग साउथ ब्लॉक स्थित आर्मी चीफ लाउंज से हटाकर मानेकशॉ सेंटर में स्थापित की गई थी। इसके स्थान पर “कर्म क्षेत्र” नामक एक नई पेंटिंग लगाई गई, जिसे सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने तैयार किया है।

सेना प्रमुख ने नई पेंटिंग “कर्म क्षेत्र” के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह भारतीय सेना के विकास और आधुनिक रणनीतिक सोच को दर्शाती है। यह पेंटिंग भारतीय संस्कृति, धर्म और सैन्य परंपरा का एक प्रतीक है।

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नई पेंटिंग में पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग झील के बर्फीले पहाड़, भगवान कृष्ण का रथ और चाणक्य को दिखाया गया है। सेना प्रमुख ने इसे सेना की रणनीतिक बुद्धिमत्ता और तकनीकी उन्नति का प्रतीक बताया।

उन्होंने कहा, “यदि भारतीय चाणक्य को नहीं पहचानते, तो उन्हें अपने सांस्कृतिक दृष्टिकोण की ओर लौटने की जरूरत है। यह पेंटिंग सेना के अतीत, वर्तमान और भविष्य का संगम है।”

सेना प्रमुख ने कहा, “वह पेंटिंग हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य को दर्शाती है। कुछ लोगों ने टिप्पणी की कि पेंटिंग में दिखाया गया रथ माइथोलॉजिकल (पौराणिक) है। अगर आप मूल भारतीय संविधान देखें, तो उसके अध्याय चार में कृष्ण और अर्जुन भी रथ में हैं। तो क्या संविधान भी पौराणिक है? यह सवाल आप खुद से पूछिए।”

आगे उन्होंने कहा, “जो लोग यह कह रहे हैं कि पेंटिंग में एक ब्राह्मण खड़ा है, उन्हें समझना चाहिए कि वह चाणक्य हैं। अगर भारत में कोई चाणक्य को नहीं पहचानता, तो यह जरूरी है कि हम अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को फिर से समझें।”

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1971 surrender painting row: क्या कहा है सेना प्रमुख ने

“जहां तक ​​इस पेंटिंग का सवाल है, मैं आपको बता दूं कि दो चीफ लाउंज हैं। यहां एक चीफ लाउंज है और साउथ ब्लॉक में एक चीफ लाउंज है। जैसा कि आप जानते हैं, शायद साल के अंत तक हमें साउथ ब्लॉक खाली कर देना चाहिए। अगर थल सेना भवन जो निर्माणाधीन है, समय पर बन जाता है तो हम वहां से चले जाएंगे। 16 दिसंबर को मानेकशॉ सेंटर में आत्मसमर्पण की पेंटिंग लगाने की तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि वह एक शुभ तिथि है, जब हमें इसे लगाना चाहिए था…अगर आप भारत के स्वर्णिम इतिहास को देखें, तो इसमें तीन अध्याय हैं। इसमें ब्रिटिश काल, मुगल काल और उससे पहले का काल है। इसलिए अगर आप इसे और उस विजन को जोड़ना चाहते हैं, जो मैंने आपको शुरुआत में दिया है, तो प्रतीकात्मकता महत्वपूर्ण हो जाती है…एक आत्मसमर्पण चित्र है जो चीफ लाउंज में है, जो यहां मानेकशॉ सेंटर में है और एक नया चित्र है जो वहां है। यह भी बताया गया है कि ये पौराणिक हैं…”- भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 

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पूर्व सैनिकों ने जताई थी नाराजगी

1971 की सरेंडर पेंटिंग को हटाने और नई पेंटिंग लगाने के फैसले पर कई पूर्व सैनिकों ने नाराजगी जाहिर की थी। सेना प्रमुख ने इस पर कहा कि ऐतिहासिक पेंटिंग का महत्व कम नहीं हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया, “हमारे पास दो चीफ लाउंज हैं। एक साउथ ब्लॉक में और दूसरा मानेकशॉ सेंटर में। सरेंडर पेंटिंग को मानेकशॉ सेंटर में स्थापित करना एक सोचा-समझा निर्णय था, और 16 दिसंबर को इसे लगाने के लिए शुभ दिन चुना गया।”

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना ने शानदार विजय प्राप्त की थी। यह युद्ध बांग्लादेश की मुक्ति के लिए लड़ा गया था, जिसमें पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया। यह दिन भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।

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सरेंडर पेंटिंग इसी ऐतिहासिक पल का प्रतिनिधित्व करती है और इसे मानेकशॉ सेंटर में प्रमुखता से रखा गया है। सेना प्रमुख ने कहा कि यह पेंटिंग हमारी सेना की ताकत और इतिहास का प्रतीक है और इसे उचित स्थान दिया गया है।

जनरल द्विवेदी ने भारतीय इतिहास के तीन अध्यायों का उल्लेख किया: ब्रिटिश काल, मुगल काल और उससे पहले का युग। उन्होंने कहा कि सेना की प्रतीकात्मकता को इन अध्यायों से जोड़ने की जरूरत है।

उन्होंने कहा, “यह पेंटिंग हमारी सेना के मूल्यों को केवल ऐतिहासिक घटनाओं तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण को भी प्रदर्शित करती है।”

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किसने बनाई नई पेंटिंग?

नई पेंटिंग ‘कर्म क्षेत्र – कर्मों का क्षेत्र’ 28 मद्रास रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब द्वारा बनाई गई है। यह पेंटिंग सेना को “धर्म के रक्षक” के रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें सेना को केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं, बल्कि न्याय और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ने वाले संरक्षक के रूप में दिखाया गया है।

इस पेंटिंग में भारतीय सेना की तकनीकी उन्नति और आधुनिक क्षमताओं को प्रदर्शित किया गया है। पृष्ठभूमि में बर्फ से ढकी पहाड़ियां दिखाई देती हैं, जबकि दाईं ओर पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील और बाईं ओर गरुड़ व भगवान श्रीकृष्ण का रथ नजर आता है। इसके अलावा, पेंटिंग में चाणक्य और आधुनिक सैन्य उपकरण जैसे टैंक, ऑल-टेरेन व्हीकल्स, इन्फैंट्री व्हीकल्स, पेट्रोल बोट्स, स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर्स और एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर्स को भी जगह दी गई है।

खाली करना होगा सााउथ ब्लॉक

सेना प्रमुख ने यह भी बताया कि साउथ ब्लॉक में स्थित चीफ लाउंज को इस साल के अंत तक खाली करना होगा, क्योंकि थल सेना भवन का निर्माण कार्य प्रगति पर है। यह भवन भारतीय सेना के आधुनिक दृष्टिकोण का प्रतीक होगा।

सेना प्रमुख ने कहा, “थल सेना भवन में हमारा स्थानांतरण भारतीय सेना के नए अध्याय की शुरुआत करेगा। यह भवन केवल एक ऑफिस नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और भविष्य का केंद्र बनेगा।”

Zorawar Tank: क्या सेना ने रिजेक्ट कर दिया है स्वदेशी जोरावर टैंक? ट्रायल्स को लेकर सेना प्रमुख ने दी बड़ी जानकारी

Zorawar Tank: Army Plans 354 Units, Trials Underway with Improvements in Progress

Zorawar Tank: पिछले साल दिसंबर में भारतीय सेना के स्वदेशी लाइट टैंक (ILT) ने लद्दाख के न्योमा इलाके में 4200 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था। उस समय रक्षा मंत्रालय की तरफ से कहा गया था कि इस टैंक ने विभिन्न रेंज से गोले दागे और हर बार सटीक निशाना लगाया। लेकिन अब सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जोरावर टैंक को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा है कि सेना ने लगभग 354 टैंकों को शामिल करने की योजना बनाई है। इन टैंकों के लिए जनवरी 2023 में ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (Acceptance of Necessity – AON) दी गई थी।

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354 Zorawar Tank को शामिल करने की योजना

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सोमवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सेना ने लगभग 354 टैंकों को शामिल करने की योजना बनाई है। इन टैंकों के लिए जनवरी 2023 में ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (Acceptance of Necessity – AON) दी गई थी। इसके बाद अप्रैल 2023 में 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया गया।

उन्होंने कहा कि सेना इस परियोजना को दो चरणों में पूरा करना चाहती है। पहले चरण में 59 टैंकों का निर्माण डीआरडीओ की पहल के तहत होगा, जबकि 295 टैंक ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बनाए जाएंगे।

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‘तथाकथित जोरावर’ में कुछ सुधारों का सुझाव

जोरावर लाइट टैंक ने 4,200 मीटर से अधिक ऊंचाई पर विभिन्न रेंज पर गोले दागे और हर बार सटीक निशाना साधा।  इस टैंक ने लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों में सफलतापूर्वक ट्रायल्स पूरे किए हैं। सेना प्रमुख ने बताया कि इन ट्रायल्स से प्राप्त अनुभव के आधार पर ‘तथाकथित ज़ोरावर’ में कुछ सुधारों का सुझाव दिया गया है। वर्तमान में टैंक को चेन्नई वापस लाया जा रहा है, जहां इन सुधारों पर काम किया जाएगा। सुधार के बाद इसे नए चरण के परीक्षणों के लिए तैयार किया जाएगा।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक टैंक को चेन्नई भेजा गया है, जहां उसमें कुछ जरूरी सुधार किए जाने हैं। इसमें वक्त लग सकता है। जिसके चलते भारतीय सेना में इसे शामिल करने में अभी और देरी हो सकती है। पहले कहा जा रहा था कि अगर इसके सभी परीक्षण सफल हुए तो जोरावर को 2027 तक सेना में शामिल किया जा सकता है। लेकिन अब इसमें और देरी हो सकती है।

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क्या कहा था सेना प्रमुख ने?

जहां तक ज़ोरावर लाइट टैंक का सवाल है, हम शुरुआत में लगभग 354 टैंकों के साथ शुरुआत करना चाहते हैं और जनवरी 2023 में हमने AON (आवश्यकता की स्वीकृति) दी है, जिसके लिए अप्रैल 2023 में रुचि की अभिव्यक्ति (expression of interest) दी गई थी और यह राशि 17 हज़ार करोड़ से अधिक थी। इसलिए अब तक हम मेक-1 के हिस्से के रूप में 295 और DRDO पहल के हिस्से के रूप में 59 पर विचार कर रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि कुछ वेंटरंस ने हाथ मिलाया है और हमने हल्के टैंक ‘तथाकथित ज़ोरावर’ की झलक देखी है और यह पहले से ही उच्च ऊंचाई पर परीक्षण कर रहा है और मैंने इस पर काम कर रहे महानिदेशक से बात की है और आज जब हम बात कर रहे हैं, तो इसने चेन्नई की यात्रा शुरू कर दी है और इन ट्रायल्स के दौरान जिस तरह के सुधारों का सुझाव दिया गया है, हम इसके नए वर्जन में देखेंगे। उसके बाद हम इसके और ट्रायल्स करेंगे।

जनरल जोरावर सिंह के सम्मान में रखा नाम

जोरावर लाइट टैंक को खास तौर पर ऊंचाई वाले क्षेत्रों और कठिन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। यह टैंक न केवल हल्का है, बल्कि ऊंचाई पर भी सटीकता और दमखम के साथ काम करने में सक्षम है।

इस टैंक का नाम जनरल जोरावर सिंह के सम्मान में रखा गया है, जिन्होंने 19वीं सदी में लद्दाख, तिब्बत और गिलगित-बाल्टिस्तान में अद्भुत सैन्य विजय हासिल की थी। यह टैंक आधुनिक युद्ध के मानकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसमें गतिशीलता, मारक क्षमता और सुरक्षा का संतुलन शामिल है।

जोरावर लाइट टैंक का पहला प्रोटोटाइप जुलाई 2024 में एलएंडटी के हजीरा मैन्युफैक्चरिंग डिवीजन में पेश किया गया था। यह प्रोटोटाइप जोरावर टैंक प्रोजेक्ट को स्वीकृति मिलने के केवल 19 महीनों के भीतर तैयार किया गया। पहले प्रोटोटाइप ने लद्दाख की बर्फीली चोटियों और राजस्थान के बीकानेर के पास महाजन फील्ड फायरिंग रेंज रेगिस्तान में फायरिंग टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। इसके अलावा, दूसरे प्रोटोटाइप का निर्माण जारी है ताकि सेना के फीडबैक के आधार पर बदलाव किए जा सकें।

वहीं, इसके दूसरे प्रोटोटाइप का निर्माण वर्तमान में प्रगति पर है, जो इस परियोजना की विकास प्रक्रिया को गति देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारतीय सेना को टैंक के डिजाइन में सुधार करने और पहले प्रोटोटाइप से प्राप्त फीडबैक के आधार पर आवश्यक बदलाव लागू करने का अवसर मिलेगा।

चीन ने तैनात किया हल्का टैंक ZTQ-15

2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुई झड़प के बाद से भारत ने अपनी सीमा पर सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने का काम तेज कर दिया है। चीन ने एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर अपने हल्के टैंक ZTQ-15 तैनात किए हैं। जोरावर टैंक को इन्हीं चीनी टैंकों का मुकाबला करने के लिए डिजाइन किया गया है।

जोरावर टैंक को लद्दाख, सियाचिन और अन्य दुर्गम क्षेत्रों में तैनात करने की योजना है, ताकि भारत की सीमाएं अधिक सुरक्षित हो सकें।

Zorawar Tank की खासियतें

जोरावर टैंक को हल्के वजन और दमदार प्रदर्शन के लिए तैयार किया गया है।

  • लगभग 25 टन, जो इसे ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात करने के लिए आदर्श बनाता है।
  • 105 मिमी की गन, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और मॉड्यूलर एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर।
  • ड्रोन इंटीग्रेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एंटी-एयरक्राफ्ट गन से लैस।
  • इसे एयरक्राफ्ट, रेल और सड़क मार्ग से आसानी से तैनात किया जा सकता है।
  • डीआरडीओ ने तैयार किया है माउंटेन टैंक ‘जोरावर’
  • इसे चलाने के लिए सिर्फ तीन लोगों की जरूरत होती है.

जोरावर लाइट टैंक को लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) और डीआरडीओ ने “मेक इन इंडिया” पहल के तहत तैयार किया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सक्रिय सुरक्षा प्रणाली (Active Protection System) है, जो इसे एंटी-टैंक मिसाइलों और अन्य खतरों से बचाने में सक्षम बनाती है।

इसके अलावा, जोरावर टैंक अम्फीबियस क्षमता से लैस है, यानी यह पानी और जमीन दोनों पर काम कर सकता है। यह विशेषता इसे पैंगोंग झील जैसे जलक्षेत्रों में तैनात करने के लिए आदर्श बनाती है। टैंक की इस अनूठी विशेषता से सेना को बहुस्तरीय लड़ाई के लिए बेहतर तैयारी मिलती है।

Army Chief: सेना प्रमुख बोले- सर्दियों में भारत-चीन सीमा पर कम नहीं होगी सेना की तैनाती, गर्मियों में इस आधार पर होगा फैसला

Army Chief said, No Reduction in Troops Along India-China Border This Winter

Army Chief: भारतीय सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि सर्दियों के दौरान चीन से सटी उत्तरी सीमा पर सैनिकों की तैनाती में कोई कमी नहीं की जाएगी। सोमवार को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि गर्मियों में तैनाती को लेकर फैसला बातचीत और चीन के साथ चल रही वार्ताओं के नतीजों के आधार पर लिया जाएगा।

Army Chief said, No Reduction in Troops Along India-China Border This Winter

चार साल पहले गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय और 30 से ज्यादा चीनी सैनिकों (आधिकारिक 4) की मौत के बाद दोनों देशों ने विवादित क्षेत्रों में गश्त करना बंद कर दिया था। हालांकि, दोनों देशों ने इसके बाद वहां काफी संख्या में सैनिकों को इन इलाकों में तैनात कर दिया था।

सैनिकों की संख्या घटाने की योजना नहीं

भारत और चीन के बीच 2020 में हुई झड़प के बाद से लद्दाख में तनाव बढ़ गया था। इस दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे के करीब अपनी सैन्य मौजूदगी को मजबूत किया। लेकिन अक्तूबर 2022 में, दोनों देशों ने तनाव कम करने के लिए एक समझौता किया। इसके बाद कुछ दिनों में दोनों पक्षों ने विवादित क्षेत्रों से अपने सैनिकों को पीछे हटा लिया था।

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हालांकि, सेना प्रमुख ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस में संकेत दिए कि सर्दियों के लिए रणनीतिक तैनाती में किसी भी तरह की कमी नहीं होगी। उन्होंने कहा, “सर्दियों के दौरान तैनाती स्वाभाविक रूप से कम होती है। लेकिन फिलहाल हम किसी भी प्रकार से सैनिकों की संख्या घटाने की योजना नहीं बना रहे हैं।”

सेना प्रमुख ने कहा कि गर्मियों में सैनिकों की तैनाती का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि उस समय तक भारत और चीन के बीच बातचीत और समझौतों में कितना प्रगति हुई है। उन्होंने कहा, “जब गर्मियों की रणनीति की बात होगी, तब हम यह समीक्षा करेंगे कि उस समय तक कितनी बातचीत और बैठकें हो चुकी हैं। उसी के आधार पर अगला कदम तय किया जाएगा।”

1991 के समझौतों के बाद स्थिरता, लेकिन 2020 ने बढ़ाया तनाव

1962 के बाद, भारत और चीन ने 1991 से शुरू होकर कई राजनयिक स्तर की बातचीत और समझौतों के जरिए संबंधों को स्थिर किया। इन प्रयासों का नतजा यह निकला कि व्यापार और व्यवसाय में बढ़ोतरी हुई। लेकिन 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसा ने इन संबंधों को फिर से तनावपूर्ण बना दिया।

वर्तमान में, दोनों देशों ने राजनयिक और सैन्य स्तर पर कई वार्ताओं के माध्यम से विवादित क्षेत्रों में शांति बनाए रखने की कोशिश की है। लेकिन सीमा पर तैनाती और सैनिकों की संख्या को लेकर दोनों पक्षों के बीच अब भी स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई है।

वहीं, गलवान संघर्ष के बाद, भारत ने अपनी सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। सीमा पर निगरानी और नई तकनीकों का उपयोग बढ़ाया गया है। सेना ने ठंडे इलाकों में तैनात सैनिकों के लिए विशेष उपकरण और बुनियादी ढांचे को भी बेहतर बनाया है।

सेना प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्दियों के लिए सैनिकों की तैनाती को लेकर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि सीमा पर स्थिरता बनी रहे और किसी भी संभावित स्थिति से निपटा जा सके।

Army Chief: सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी बोले- भारत-चीन एलएसी पर हालात ‘संवेदनशील लेकिन स्थिर’

Army Chief said- India-China LAC Situation 'Sensitive but Stable'

Army Chief: सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारत-चीन सीमा पर तनाव को लेकर कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थिति “संवेदनशील लेकिन स्थिर” बनी हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्वी लद्दाख के देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में पारंपरिक गश्त और चरागाह का काम सामान्य रूप से जारी है।

Army Chief said- India-China LAC Situation 'Sensitive but Stable'

सेना प्रमुख ने कहा, “हमारी तैनाती संतुलित और मजबूत है। हम किसी भी स्थिति को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं।” एलएसी के भविष्य पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि वर्तमान में सीमा पर बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और कैपेसिटी बिल्डिंग पर फोकस किया जा रहा है।

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15 सितंबर को मनाए जाने वाले आर्मी डे पर आयोजित सेना की सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि सभी कोर कमांडर्स को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे गश्त और चरागाह से जुड़े छोटे मुद्दों को जमीनी स्तर पर ही हल करें। उन्होंने कहा, “हमारी तैनाती संतुलित और मजबूत है। हम किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। उत्तरी सीमा पर क्षमता विकास और युद्ध प्रणाली में नवीनतम तकनीक को शामिल करने पर हमारा ध्यान केंद्रित है।” उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा बल स्थानीय मुद्दों को हल करने और सीमावर्ती इलाकों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए तत्पर हैं।

जम्मू-कश्मीर: सीमा पार आतंकवाद जारी

जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश में हालात नियंत्रण में हैं, लेकिन सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशें अब भी जारी हैं। उन्होंने बताया, “पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर सीजफायर समझौता बना हुआ है, लेकिन घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं।”

सेना प्रमुख ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में आतंकी ढांचे अब भी सक्रिय हैं और पड़ोसी देश सीमा पार आतंकवाद को समर्थन दे रहा है। उन्होंने बताया, “पिछले साल जम्मू-कश्मीर में मारे गए 60 फीसदी आतंकवादी पाकिस्तान से थे।”

मणिपुर में स्थिति नियंत्रण में

मणिपुर में हिंसा पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि सरकार और सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों से राज्य में स्थिति नियंत्रण में है। उन्होंने कहा, “सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों और सरकार की सक्रिय पहल से मणिपुर में हालात पर काबू पा लिया गया है।”

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में हिंसा की घटनाएं समय-समय पर सामने आ रही हैं। सेना इन परिस्थितियों में शांति स्थापित करने की कोशिश कर रही है। जनरल द्विवेदी ने बताया, “मणिपुर में हिंसा की घटनाएं साइक्लिक फॉर्म  से हो रही हैं, लेकिन सुरक्षा बल शांति बहाल करने के लिए काम कर रहे हैं। म्यांमार सीमा पर निगरानी बढ़ाई गई है और सीमा पर बाड़ लगाने का काम जारी है।”

सीमा पर टेक्नोलॉजी का बढ़ता उपयोग

सेना प्रमुख ने यह भी उल्लेख किया कि उत्तरी सीमा पर अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को शामिल करने से भारत की युद्धक क्षमताओं में सुधार हो रहा है। उन्होंने कहा, “नवीनतम तकनीकों को युद्धक प्रणाली में शामिल कर उत्तरी सीमा पर क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया है।”

एलएसी पर स्थिति पर सेना प्रमुख के ये बयान उस समय आए हैं, जब भारत और चीन के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के प्रयास जारी हैं।

Eastern Ladakh: हानले से फोटी ला तक सेना की तैयारियां होंगी और मजबूत, गोला-बारूद भंडारण के लिए सरकार से मिली बड़ी मंजूरी

Defence Projects in Ladakh

Eastern Ladakh: पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना की सामरिक क्षमताओं को बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने गोला-बारूद भंडारण और अन्य सैन्य परियोजनाओं के निर्माण को मंजूरी दी है। पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने चीन-भारत सीमा पर सामरिक संरचनाओं की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इन परियोजनाओं को स्वीकृति दी। यह फैसला 21 दिसंबर 2024 को पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की बैठक में लिया गया।

Eastern Ladakh: Hanle to Fotu La, Army Gets Major Boost with Ammunition Storage Approval Eastern Ladakh: Hanle to Fotu La, Army Gets Major Boost with Ammunition Storage Approval Eastern Ladakh: Hanle to Fotu La, Army Gets Major Boost with Ammunition Storage Approval

बैठक में Eastern Ladakh के हानले और फोटी ला जैसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों पर “फॉर्मेशन एम्युनेशन स्टोरेज फैसिलिटी” (FASF) स्थापित करने और भूमिगत कैवर्न के निर्माण की योजना को हरी झंडी दी गई। इसके अलावा, पैंगोंग त्सो झील के किनारे लुकुंग गांव और दुर्बुक क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति को मजबूत करने के प्रस्तावों को भी स्वीकृति दी गई। ये परियोजनाएं अप्रैल से जुलाई 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित की गई थीं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं से सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बलों कीपरेशनल कैपेबिलिटीज में बढ़ोतरी होगी। एफएएसएफ जैसे स्ट्रक्चर गोला-बारूद के सुरक्षित भंडारण और निगरानी के साथ क्विक रेस्पॉन्स कैपेबिलिटी को बढ़ाने में सहायक होंगी। वर्तमान में, अधिकांश गोला-बारूद 250-300 किमी दूर अस्थायी भंडारण केंद्रों में रखा जाता है, जिससे आकस्मिक स्थितियों में रेस्पॉन्स में देरी होती है। इन सुविधाओं के निर्माण से सैनिकों और सामरिक संसाधनों की त्वरित तैनाती सुनिश्चित हो सकेगी।

पूर्वी लद्दाख (Eastern Ladakh) के हानले, फोटी ला, पंगुक, और कोयुल जैसे स्थान सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। फोटी ला, दुनिया के सबसे ऊंचे मोटरेबल पासों में से एक, हानले से 30 किमी दूर स्थित है। यह देमचोक और अन्य अग्रिम मोर्चों को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है। ये स्थान ब्रिगेड स्तर के सैनिकों और अन्य बलों की तैनाती के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य हैं।

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के साथ सेना की परिचालन तैयारियों को मजबूत करने के लिए भूमिगत कैवर्न के निर्माण को स्वीकृति दी गई है। इन संरचनाओं में गोला-बारूद और अन्य सामरिक उपकरणों को सुरक्षित रखा जाएगा। 2020 में चीन के साथ सीमा तनाव के बाद क्षेत्र में सैनिकों की बढ़ती संख्या के साथ स्थायी संरचनाओं की आवश्यकता महसूस की गई थी। ये कैवर्न न केवल शत्रु की निगरानी से बचाव करेंगे, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं से भी सुरक्षा प्रदान करेंगे।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने पूर्वी लद्दाख (Eastern Ladakh) में अन्य सैन्य निर्माण परियोजनाओं को भी मंजूरी दी है। इनमें पैंगोंग त्सो झील के किनारे लुकुंग गांव में अंतर्देशीय जल परिवहन प्लाटून के लिए स्थायी संरचना और एराथ क्षेत्र में एक स्थायी पैदल सेना बटालियन कैंप का निर्माण शामिल है। यह परियोजनाएं सैनिकों और सामरिक उपकरणों की त्वरित आवाजाही सुनिश्चित करेंगी।

इन परियोजनाओं को मंजूरी देते समय पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया है। हानले और फोटी ला क्षेत्र हिम तेंदुए, कस्तूरी मृग, और काले गर्दन वाले सारस जैसे दुर्लभ और संरक्षित प्रजातियों का आवास हैं। पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि निर्माण कार्यों के दौरान पर्यावरणीय दिशानिर्देशों का पालन किया जाए। मंत्रालय ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि परियोजनाओं के कारण वन्यजीवों पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।

LCA Tejas Delivery: क्या मार्च तक मिल पाएगा तेजस फाइटर जेट? वायुसेना को फटाफट डिलीवरी के लिए HAL कर रहा ये बड़ी तैयारी

Tejas Mk-1: HAL Plans Fourth Assembly Line at Nashik to Address Delivery Delays
Air Chief Marshal Amar Preet Singh

LCA Tejas Delivery: देश में स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस (Tejas Mk-1) के उत्पादन में तेजी लाने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने नासिक में चौथी असेंबली लाइन स्थापित करने की योजना बनाई है। एचएएल ने यह कदम अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) की ओर से F-404 इंजन की आपूर्ति में हो रही देरी के चलते उठाया है।

HAL के सूत्रों के अनुसार, GE ने अब तक 26 इंजन के ऑर्डर में देरी की है। हालांकि, कंपनी ने वादा किया है कि मार्च तक पहला इंजन उपलब्ध कराया जाएगा और इसके बाद उत्पादन में तेजी लाई जाएगी।

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Air Chief Marshal Amar Preet Singh

LCA Tejas Delivery: बेंगलुरु और नासिक में मौजूदा असेंबली लाइन्स

वर्तमान में HAL के पास बेंगलुरु में दो असेंबली लाइन्स हैं, जिनकी सालाना उत्पादन क्षमता आठ लड़ाकू विमान है। इसके अलावा, नासिक में भी एक असेंबली लाइन है, जो आठ विमानों का उत्पादन कर सकती है। नासिक प्लांट से पहला तेजस विमान मार्च तक तैयार होने की उम्मीद है।

HAL अब नासिक में दूसरी असेंबली लाइन स्थापित करने की योजना बना रहा है। हालांकि, यह तब ही संभव हो पाएगा जब GE की इंजन आपूर्ति नियमित रूप से शुरू हो जाए। एक नई असेंबली लाइन को स्थापित करने में लगभग 1.5 साल का समय लगेगा।

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नासिक में चौथी असेंबली लाइन: क्यों जरूरी है?

HAL द्वारा नासिक में चौथी असेंबली लाइन का निर्मााण करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह प्रोडक्शन प्रोसेस को तेज करेगा। इससे भारत के लिए लड़ाकू विमानों की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी और वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता को मजबूत किया जा सकेगा।

हालांकि, यह योजना तभी लागू होगी जब GE नियमित रूप से इंजन की आपूर्ति शुरू करेगा। नई सुविधा स्थापित करने में लगभग डेढ़ साल का समय लगेगा। इस योजना की सफलता GE द्वारा समय पर इंजन की आपूर्ति पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर GE नियमित रूप से इंजन की डिलीवरी शुरू कर दे, तो HAL अपने उत्पादन लक्ष्यों को आसानी से पूरा कर सकता है।

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IAF की कम होती स्क्वाड्रन क्षमता

भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए तेजस जेट्स का उत्पादन बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता लगातार घट रही है। IAF के पास 42 स्क्वाड्रन की स्वीकृत संख्या के मुकाबले फिलहाल केवल 31 स्क्वाड्रन ही हैं। इस साल MiG-21 के आखिरी दो स्क्वाड्रन के फेज़ आउट होने के साथ यह संख्या और कम हो सकती है। इसके अलावा, तेजस की पहली पीढ़ी के दो स्क्वाड्रन का उपयोग मुख्य रूप से प्रशिक्षण के लिए किया जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय ने 2021 में HAL के साथ 83 तेजस Mk-1A विमानों (73 फाइटर्स और 10 ट्रेनर्स) की आपूर्ति के लिए 45,696 करोड़ रुपये का समझौता किया था। इसके लिए GE को 99 इंजन की आपूर्ति करनी थी।

हालांकि, अमेरिकी कंपनी ने “सप्लाई चेन दिक्कतों” का हवाला देते हुए समय पर इंजन नहीं भेजे। इस मामले को हल करने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष से चर्चा की थी। इसके बाद भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों के बीच कई बैठकें हुईं।

अब तक HAL ने 40 तेजस LCA विमानों में से 38 की डिलीवरी कर दी है। शेष दो ट्रेनर्स को जल्द ही डिलीवर किया जाएगा। वहीं, HAL ने अपने रिजर्व इंजन के स्टॉक का उपयोग करते हुए पहला तेजस Mk-1A तैयार किया है, जबकि दूसरा उत्पादन में है। पहला Mk-1A अब परीक्षण के विभिन्न चरणों से गुजर रहा है और इसे आगामी एयरो इंडिया 2025 में उड़ान भरते हुए देखा जा सकता है।

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तेजस Mk-1A: धीमे उत्पादन से बढ़ी चुनौती

भारतीय वायुसेना को चौथी पीढ़ी के तेजस Mk-1A फाइटर्स के उत्पादन में देरी का सामना करना पड़ रहा है। वायुसेना प्रमुख ने इस पर निराशा व्यक्त की और कहा, “पहला तेजस विमान 2001 में उड़ा था। लेकिन अब तक पहले 40 विमानों की भी आपूर्ति पूरी नहीं हो पाई है। यही हमारी उत्पादन क्षमता को दर्शाता है, जिसे सुधारने की सख्त जरूरत है।”

तेजस फाइटर जेट के धीमे उत्पादन को देखते हुए वायुसेना प्रमुख ने रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल से उत्पादन क्षमता में सुधार हो सकता है।

वायुसेना प्रमुख ने यह भी बताया कि भारतीय वायुसेना को कम से कम 180 तेजस Mk-1A और 108 तेजस Mk-2 विमानों की जरूरत है। जब तक AMCA प्रोजेक्ट पूरा नहीं होता, ये विमान वायुसेना की ताकत को बनाए रखने में मदद करेंगे।

भारत में 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स की कमी

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में चीन की सैन्य क्षमताओं में हो रहे बड़े बदलावों पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा, “चीन ने सिक्स्थ जनरेशन के दो स्टील्थ फाइटर जेट्स का प्रदर्शन किया है। यह कदम न केवल उनकी तकनीकी क्षमता को दिखाता है, बल्कि क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी बदल सकता है।”

चीन के ये टेललेस, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वाले फाइटर जेट्स पूरी दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय बन गए हैं। इन विमानों की खासियत उनकी कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता है। वहीं, अमेरिका अभी भी अपने छठी पीढ़ी के फाइटर प्रोजेक्ट को अंतिम रूप नहीं दे पाया है।

भारत अभी तक 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के विकास में पीछे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने 2022 में स्विंग-रोल एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। हालांकि, इसका पहला प्रोटोटाइप अगले चार-पांच वर्षों में ही तैयार हो पाएगा। इसका मतलब है कि 2035 तक इन विमानों को वायुसेना में शामिल करना संभव नहीं होगा।

BrahMos Missile Deal: कभी अंडमान पर कब्जा करना चाहता था इंडोनेशिया, अब 3,735 करोड़ रुपये में खरीद रहा ब्रह्मोस, पाकिस्तान का दौरा भी किया रद्द

BrahMos Missile Deal: Indonesia Eyes ₹3,735 Crore Purchase, Drops Pakistan Visit!
Indonesia President Prabowo Subianto

BrahMos Missile Deal: दुनिया बदल रही है और रिश्तों की परिभाषा भी। कभी भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर कब्जा करने की योजना बनाने वाला इंडोनेशिया अब भारत के साथ दोस्ती की नई इबारत लिख रहा है। ताजा खबर यह है कि इंडोनेशिया भारत से ($450 मिलियन) यानी 3,735 करोड़ रुपये की ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने की तैयारी में है। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने इस डील को लेकर भारतीय दूतावास को एक औपचारिक पत्र भेजा है। वहीं, भारत ने भी इस सौदे को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है। बता दें कि इंडोनेशिया के राष्ट्रपति इस बार भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि हैं। वहीं, 26 जनवरी को ही इस डील को लेकर आधिकारिक एलान हो सकता है।

BrahMos Missile Deal: Indonesia Eyes ₹3,735 Crore Purchase, Drops Pakistan Visit!
Indonesia President Prabowo Subianto

BrahMos Missile Deal: डील के लिए भारत दे सकता है लोन

सूत्रों ने बताया कि इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में भारत के जकार्ता स्थित दूतावास को एक पत्र भेजा है, जिसमें 450 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस मिसाइल डील की पुष्टि की गई है। इस डील को और आसान बनाने के लिए भारत इंडोनेशिया को ऋण देने की भी योजना बना रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह ऋण भारतीय स्टेट बैंक या किसी अन्य सरकारी बैंक के माध्यम से दिया जाएगा। पहले EXIM बैंक के जरिए यह प्रक्रिया पूरी होनी थी, लेकिन अब इस पर नए सिरे से काम किया जा रहा है।

इंडोनेशिया के वर्तमान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतों ने 2020 में भारत दौरे के दौरान इस डील की चर्चा की थी, लेकिन वित्तीय कारणों से इसे उस समय अंतिम रूप नहीं दिया जा सका।

इंडोनेशिया इस डील को लेकर काफी उत्सुक है, लेकिन बजट की कमी उसकी राह में रोड़ा बन रही है। इंडोनेशिया सरकार ने पिछले साल सामाजिक योजनाओं पर ज्यादा फोकस किया, जिससे रक्षा क्षेत्र के लिए पर्याप्त फंड नहीं बचा। ऐसे में इंडोनेशिया ने भारत से ऋण की मदद मांगी है। भारत भी इस डील को सफल बनाने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है।

1965 में अंडमान पर चाहता था कब्जा करना

बता दें कि 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, इंडोनेशिया ने पाकिस्तान का समर्थन करते हुए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर कब्जा करने की धमकी दी थी। यह भारत के लिए एक बड़े खतरे की तरह था, क्योंकि इंडोनेशिया पाकिस्तान के पक्ष में दूसरा मोर्चा खोलने की योजना बना रहा था। पाकिस्तान की योजना थी कि उस वक्त इंडोनेशिया  भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर हमला करने और कब्जा करने की रणनीति अपनाए ताकि भारत को कश्मीर और पंजाब में कमजोर किया जा सके।

गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो इस साल भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि होंगे। उनके दौरे से यह उम्मीद की जा रही है कि ब्रह्मोस मिसाइल डील को औपचारिक रूप दिया जा सकता है। हालांकि, उनके पाकिस्तान दौरे की योजना ने भारत के साथ कुछ असहज स्थिति पैदा कर दी थी। लेकिन भारत के नाराजगी जताने के बाद प्रबोवो ने पाकिस्तान का दौरा रद्द कर दिया और अब वे भारत से सीधे मलेशिया जाएंगे।

अब पाकिस्तान का साथ नहीं दे रहा इंडोनेशिया

वहीं, हाल के वर्षों में इंडोनेशिया ने कश्मीर मुद्दे पर ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) की बैठकों में पाकिस्तान का समर्थन करने से परहेज किया है। रिपोर्ट के अनुसार, मध्य एशियाई देशों और सीरिया में पूर्व असद शासन की तरह, इंडोनेशिया ने भी कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन नहीं किया है। गौरतलब है कि हाल के वर्षों में खाड़ी और अरब जगत के नेताओं ने भारत के आधिकारिक दौरों के दौरान पाकिस्तान से दूरी बनाए रखी है। पिछले पांच वर्षों में पाकिस्तान को उच्च-स्तरीय आधिकारिक दौरों की संख्या में भी कमी देखने को मिली है।

फिलीपींस से मिली प्रेरणा

यह पहली बार नहीं है जब भारत ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात कर रहा है। अप्रैल 2024 में, भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल की पहली खेप भेजी थी। इस डील की कीमत करीब 2,700 करोड़ रुपये थी और इसमें तीन मिसाइल बैटरियां शामिल थीं। जनवरी 2022 में फिलीपींस ने $374.96 मिलियन (2,700 करोड़ रुपये) के सौदे के तहत मिसाइल की खरीद की थी। इसके बाद वियतनाम ने भी ब्रह्मोस खरीदने का निर्णय लिया। अब, इंडोनेशिया इस श्रेणी में शामिल होने वाला तीसरा दक्षिण-पूर्व एशियाई देश बन सकता है।

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इंडोनेशिया को क्यों चाहिए ब्रह्मोस?

फिलीपींस की तरह, इंडोनेशिया के पास भी लंबा समुद्री तट है। ब्रह्मोस मिसाइल की तैनाती से उसकी सुरक्षा क्षमता को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति और लंबी समुद्री सीमा को देखते हुए उसे इस तरह की एडवांस्ड मिसाइल तकनीक की आवश्यकता है। इंडोनेशिया के मौजूदा राष्ट्रपति, जो एक पूर्व जनरल हैं, देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं।

इसके अलावा, इंडोनेशियाई वायु सेना के पास पहले से ही रूस निर्मित सुखोई-30 लड़ाकू विमान हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते इन विमानों की रखरखाव संबंधी दिक्कतों को लेकर इंडोनेशिया भारत से मदद मांग सकता है।

पिछले साल ब्रिक्स में शामिल हुआ था इंडोनेशिया

इंडोनेशिया ने पिछले साल जनवरी में ब्रिक्स (BRICS) संगठन में शामिल होकर अपनी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति को मजबूत किया। ब्रिक्स में शामिल होने से इंडोनेशिया और भारत के बीच रुपया-रुपियाह लेनदेन का रास्ता भी खुला। यह डील आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से दोनों देशों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

दिसंबर में नौसेना चीफ गए थे इंडोनेशिया

इससे पहले नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी पिछले साल दिसंबर के मध्य में 4 दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर इंडोनेशिया गए थे। सूत्रों का कहना है कि ब्रह्मोस की बिक्री को लेकर बातचीत पहले से ही जारी थी। नौसेना प्रमुख ने इस यात्रा के दौरान इंडोनेशिया के शीर्ष सरकारी और रक्षा अधिकारियों के साथ द्विपक्षीय चर्चा की थी। उन्होंने इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सजाफ्री सजामसोएद्दीन, इंडोनेशियाई सशस्त्र बलों के कमांडर जनरल अगुस सुबियान्टो और इंडोनेशियाई नौसेना के चीफ ऑफ स्टाफ एडमिरल मुहम्मद अली से भी मुलाकात की थी।

290 किलोमीटर की रेंज

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस के सहयोग से विकसित की गई है। यह मिसाइल 290 किलोमीटर की रेंज और 2.8 मैक (ध्वनि की गति से तीन गुना तेज) की स्पीड से दुश्मन के ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम है। इस मिसाइल की 290 किमी तक की मारक क्षमता इसे किसी भी युद्ध क्षेत्र में निर्णायक हथियार बनाती है। ब्रह्मोस का इस्तेमाल जमीन आधारित, नौसेना और हवाई प्लेटफॉर्म से किया जा सकता है।

China Y-20 Cargo Aircraft: भूकंप प्रभावित तिब्बत के शिगात्से डिंगरी में चीन ने पहली बार उतारा अपना जंबो एयरक्राफ्ट, अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर को देता है टक्कर

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

China Y-20 Cargo Aircraft: हाल ही में तिब्बत के शिगात्से डिंगरी काउंटी में आए 7.1 मैग्नीट्यूड के भूकंप ने इस इलाके को तहसनहस करके रख दिया है। इस भूकंप में कम से कम 126 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक घायल हो गए। भूकंप के झटके नेपाल, भूटान और उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में भी महसूस किए गए। वहीं इस प्राकृतिक आपदा से न केवल जनजीवन प्रभावित हुआ, बल्कि वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर को भी भारी नुकसान हुआ है। राहत और बचाव कार्यों के लिए चीन ने पहली बार अपने अत्याधुनिक Y-20 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया है। इस एयरक्राफ्ट ने शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट पर लैंडिंग की, जो कि दिसंबर 2022 में तैयार हुआ था।

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

China Y-20 Cargo Aircraft: चीनी पौराणिक पक्षी कुनपेंग पर रखा गया है इसका नाम

Y-20 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट यानी कुनपेंग चीन का पहला स्वदेशी रूप से विकसित भारी परिवहन विमान है। इसका नाम चीन की लोककथाओं में एक पौराणिक पक्षी “कुनपेंग” के नाम पर रखा गया है। इसे चीन की वायुसेना ‘चबी गर्ल’ के नाम से भी पुकारती है। यह विमान 73 टन तक भार ले जाने की क्षमता रखता है। यह चीन के सबसे बड़े टैंक ZTZ99 को भी ढोने की क्षमता रखता है। इसे मुश्किल हालात में भी ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। इसे मानवीय राहत, सैन्य अभियान और उपकरणों के ट्रांसपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस विमान में चार शेनयांग WS-20 इंजन लगे हैं,  जो इसे लंबी दूरी तक उड़ान भरने और हवा में ही हवाई ईंधन भरने की क्षमता प्रदान करते हैं।

China-India Talks: बड़ा खुलासा! भारत-चीन वार्ता से पहले भाजपा के इस थिंकटैंक ने किया था बीजिंग का सीक्रेट दौरा, कूटनीतिक संबंधों की बहाली को लेकर की थी बात

Y-20 को दिसंबर 2023 में दुबई एयर शो में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया गया था। यह चीन का सबसे बड़ा मिलिट्री टांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है। इजिप्ट, नाइजीरिया और मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों ने इसे खरीदने में रुचि दिखाई है।

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

China Y-20 Cargo Aircraft से अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर को टक्कर

Y-20 को अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है। C-17 1995 में लॉन्च हुआ था और अमेरिकी सेना के लिए बेहद कारगर साबित हुआ है। वहीं, Y-20 भी चीन के लिए ऐसी ही भूमिका निभा रहा है। हालांकि, शुरुआती Y-20 वर्जन में रूसी इंजन लगे थे, और “गर्म और ऊंचे” हवाई क्षेत्रों से उड़ान भरने में सक्षम नहीं थे। लेकिन WS-20 इंजन के साथ Y-20B वर्जन ने इन सभी बाधाओं को पार कर लिया है। वहीं चीन ने Y-20 कार्गो विमान पर बेस्ड एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) विमान भी तैयार कर लिया है।

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट का रणनीतिक महत्व

चीन का शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट और Y-20 की तैनाती भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह हवाईअड्डा भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के करीब है और इसे चीन की सैन्य तैयारियों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

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तिब्बत में पांच एयरपोर्ट हैं, जिनका चीन मिलिट्री और सिविल के तौर पर इस्तेमाल करता है। वहीं इनमें से चार एयरपोर्ट भारतीय सीमा से महज 60 किमी की दूरी पर हैं। जबकि शिनजियांग में 2017 से अब तक 15 हवाई अड्डों को अपग्रेड किया गया है, जिनमें से सात मिलिट्री और सिविल उपयोग वाले हैं, जिनमें भारतीय सीमा से सिर्फ 240 किमी दूर स्थित होतान भी शामिल है।

शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट का निर्माण अगस्त 2019 में शुरू हुआ और दिसंबर 2022 में इसे तैयार कर लिया गया। यह एयरपोर्ट तिब्बत में चीन के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि यह एयरपोर्ट नेपाल की सीमा से मात्र 65 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं डोकलाम से इसकी दूरी मात्र 230 किमी है। इस एयरपोर्ट पर चीन ने एक खास बड़ी अंडरग्राउंड फैसिलिटी बनाई है, जिसमें कम से कम तीन प्रवेश द्वार हैं। यह एय़रपोर्ट 3.3 किमी की लंबाई में फैला है।

UNIFIL QRF Vehicles: शांति मिशन में भारतीय वाहनों की एंट्री! अब ‘मेड-इन-इंडिया’ वाहनों पर भरोसा करेंगे लेबनान में तैनात भारतीय जवान

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

UNIFIL QRF Vehicles: लेबनान में संयुक्त राष्ट्र के UNIFIL मिशन में तैनात भारतीय जवानों को पहली बार स्वदेशी वाहन मिलने जा रहे हैं। यह वाहन टाटा मोटर्स ने बनाए हैं और इन्हें 15 जनवरी को मनाए जाने वाले सेना दिवस के मौके पर भारतीय बटालियन तक पहुंचाया जाएगा। इनमें पहली बार टाटा के बने 45 क्यूआरएफ वाहन भी शामिल हैं। इससे पहले भारतीय सेना स्वीडन के बनाए SISU व्हीकल्स का इस्तेमाल करती थी।

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

UNIFIL QRF Vehicles: ड्राई लीज़ व्यवस्था के तहत मिलते हैं वाहन

सेना की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक अभी तक, लेबनान में तैनात 900 भारतीय जवान स्वीडन निर्मित सिसु वाहनों का उपयोग करते थे। यह वाहन संयुक्त राष्ट्र के ड्राई लीज़ व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराए जाते हैं, जहां यूएन इक्विपमेंट्स और व्हीकल्स देता है, और बाकी देश अपने जवान वहां तैनात करते हैं। लेकिन अब, स्वदेशी क्विक रिएक्शन फोर्स (QRF) वाहन भारतीय जवानों को इंस्टेंट रिएक्ट करने और ऑपरेशनल क्षमता में और मजबूती प्रदान करेंगे।

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

टाटा मोटर्स के बनाए ये QRF वाहन सुरक्षा और मोबिल्टी के मामले में काफी एडवांस हैं। इन वाहनों को खासतौर पर खतरों का सामना करने के लिए सैनिकों को तेजी से तैनात करने, पेट्रोलिंग करने, और मानवीय मदद प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये वाहन न केवल जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, बल्कि उनके मिशन की उपयोगिता को भी बढ़ाएंगे।

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टाटा मोटर्स द्वारा बनाए गए 62 वाहनों का यह बेड़ा पिछले साल समुद्री मार्ग के जरिए लेबनान भेजा गया था और अब इन्हें सेना दिवस के अवसर पर औपचारिक रूप से जवानों को सौंपा जाएग। इसमें हाई मोबिलिटी ट्रूप कैरियर व्हीकल्स, यूटिलिटी व्हीकल्स (1 टन और 2.5 टन), मीडियम और लाइट एम्बुलेंस, फ्यूल बोसर्स, और रिकवरी व्हीकल्स शामिल हैं।

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

भेजे गए 62 स्वदेशी वाहनों में शामिल हैं:

  • हाई मोबिलिटी ट्रूप कैरिज वाहन
  • 1 टन और 2.5 टन यूटिलिटी वाहन
  • मध्यम और हल्के एंबुलेंस
  • फ्यूल बोवर्स
  • रिकवरी वाहन

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से भारत ने शांति प्रयासों में 287,000 से अधिक सैनिकों का योगदान दिया है। अब तक, लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में तैनात भारतीय सैनिक उन वाहनों का इस्तेमाल कर रहे थे, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अन्य देशों से उपलब्ध कराए जाते थे। लेकिन अब, मेड-इन-इंडिया वाहनों के शामिल होने से भारतीय बटालियन स्वदेशी और मजबूत प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो सकेगी। यह कदम न केवल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की उभरती रक्षा निर्माण क्षमताओं और इसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।