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Explainer Bhargavastra: महाभारत काल का यह हथियार अब भारतीय सेनाओं की बनेगा ‘रीढ़’, दुश्मन के ड्रोनों का होगा सर्वनाश

explainer bhargavastra counter drone system

Explainer Bhargavastra: भारत ने हाल ही में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। महाभारत के प्रसिद्ध दिव्यास्त्रों से प्रेरणा लेते हुए भारत ने अत्याधुनिक काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित किया है, जिसे भार्गवास्त्र नाम दिया गया है। भार्गवास्त्र का नाम महर्षि परशुराम द्वारा उपयोग किए गए शक्तिशाली दिव्यास्त्र से लिया गया है। महाभारत में वर्णित दिव्यास्त्रों में से एक, भार्गवास्त्र, अपनी अद्वितीय शक्ति और विनाशकारी क्षमताओं के लिए प्रसिद्ध है। यह नया भार्गवास्त्र न केवल देश के डिफेंस सिस्टम को मजबूत करेगा, बल्कि फ्यूचर वारफेयर में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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भार्गवास्त्र को सोलर ग्रुप और इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड (EEL) ने मिल कर डेवलप किया है। यह एक माइक्रो-मिसाइल आधारित काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जिसे दुश्मन के ड्रोन्स और स्वार्म ड्रोन्स (झुंड में उड़ने वाले ड्रोन्स) को पहचानने और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। हाल के युद्धों में स्वार्म ड्रोन्स बड़े खतरे के रूप में उभरे हैं।

Explainer Bhargavastra: कैसा है भार्गवास्त्र?

भार्गवास्त्र एक मल्टी-लेयर काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जो माइक्रो-मिसाइल तकनीक पर बेस्ड है। यह सिस्टम दुश्मन के छोटे और स्वार्म ड्रोन्स को पहचानने और नष्ट करने में सक्षम है। इसकी खासियत यह है कि यह 6 किलोमीटर की दूरी तक ड्रोन का पता लगा सकता है और 64 माइक्रो-मिसाइलों को एक साथ फायर करने की क्षमता रखता है। इसकी सॉफ्ट-किल तकनीक ड्रोन के नेविगेशन और कम्यूनिकेशन सिस्टम को जाम कर देती है, जबकि हार्ड-किल सिस्टम ड्रोन को पूरी तरह से बरबाद कर देता है।

यह सिस्टम 5,000 मीटर तक की ऊंचाई पर भी तैनात किया जा सकता है, जिससे यह दुर्गम इलाकों में भी ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है। यह मोबाइल प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिससे इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिस्टम भारत के लिए एक बड़े रणनीतिक सुरक्षा उपाय के रूप में उभरेगा।

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Explainer Bhargavastra: कैसे काम करता है भार्गवास्त्र?

भार्गवास्त्र को दुश्मन के ड्रोन और अन्य हवाई खतरों को पहचानने और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह पूरी तरह से ऑटोमैटिक सिस्टम है, यानी कि इसे किसी मनुष्य द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाता है। जब कोई ड्रोन इसकी रडार सीमा में आता है, तो यह तुरंत उसे पहचान लेता है। इसके बाद, यह तय करता है कि हार्ड-किल या सॉफ्ट-किल तकनीक का उपयोग करना है।

इसकी C4I कमांड और कंट्रोल प्रणाली रडार के माध्यम से 10 किलोमीटर तक बड़े UAVs और 6 किलोमीटर तक छोटे ड्रोन्स का पता लगा सकती है। इसके EO/IR सिस्टम (इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड) कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले लक्ष्यों को भी ट्रैक करने में सक्षम हैं। यह प्रणाली खासतौर पर स्वार्म ड्रोन का सामना करने के लिए तैयार की गई है, जो सामान्य जामिंग तकनीकों से बच सकते हैं। भार्गवास्त्र का मोबाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म एक समय में 16 मिसाइलों को कैरी कर सकता है, जिससे ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी में बढ़ोतरी होती है।

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भार्गवास्त्र का नाम महाभारत के महर्षि परशुराम के भार्गवास्त्र से लिया गया है। यह नाम इसके उद्देश्य को दर्शाता है, शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना। इस आधुनिक प्रणाली ने 12 और 13 जनवरी, 2025 को अपने पहले ट्रायल्स में शानदार प्रदर्शन किया। गंजम, ओडिशा के गोपालपुर सीवर्ड फायरिंग रेंज में इसे ट्रायल के लिए तैनात किया गया था। पहले परीक्षण में, 2,500 मीटर दूर और 400 मीटर की ऊंचाई पर एक इलेक्ट्रॉनिक टारगेट पर मिसाइल ने सटीक निशाना लगाया। दूसरे परीक्षण में, एक चलते हुए इलेक्ट्रॉनिक UAV मिमिक को सफलतापूर्वक नष्ट किया।

क्या यह भारत का आयरन डोम है?  

भार्गवास्त्र को कई विशेषज्ञ भारत का आयरन डोम बता ररहे हैं। आयरन डोम इजरायल का प्रसिद्ध रक्षा प्रणाली है, जो मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में सक्षम है। भार्गवास्त्र भी इसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है और इसे स्वदेशी तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है।

आधुनिक युद्ध में भार्गवास्त्र है जरूरी

आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन का उपयोग तेजी से बढ़ा है। हाल के वर्षों में अजरबैजान-आर्मेनिया और यूक्रेन-रूस जैसे युद्धों में ड्रोन तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई है। स्वार्म ड्रोन का उपयोग करते हुए दुश्मन बड़ी संख्या में हमले कर सकते हैं, जिन्हें रोकने के लिए पारंपरिक डिफेंस सिस्टम काफी नहीं हैं। हर साल 100,000 से ज़्यादा ड्रोन तैनात किए जाते हैं, जिनका मुकाबला अक्सर महंगी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से किया जाता है। भार्गवस्त्र दुश्मन के यूएवी को बेअसर करने के लिए एक किफायती और प्रभावी विकल्प प्रदान करता है।

भार्गवास्त्र इस चुनौती का समाधान प्रदान करता है। यह तकनीक दुश्मन के ड्रोन्स को कम लागत और उच्च दक्षता के साथ नष्ट कर सकती है। इसकी मोबाइल और स्वचालित क्षमताएं इसे किसी भी युद्धक्षेत्र के लिए उपयुक्त बनाती हैं। क्योंकि ड्रोन्स का बढ़ता इस्तेमाल भविष्य के युद्धक्षेत्र की वास्तविकता है। ऐसे में भार्गवास्त्र जैसे सिस्टम भारत की सुरक्षा को न केवल मजबूत बनाएंगे, बल्कि यह भारतीय सेनाओं को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करेंगे।

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Republic Day 2025: LCA Tejas, ALH to Miss Flypast, May Disappoint Spectators

Republic Day 2025: 26 जनवरी 2025 को भारत अपना 76वां गणतंत्र दिवस (Republic Day 2025) मनाने जा रहा है। हर साल की तरह इस बार भी राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहा जाता है, पर भव्य परेड का आयोजन होगा। परेड में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की ताकत और संस्कृति की झलक दिखाई जाएगी। हालांकि, इस बार कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जो चर्चा का विषय बने हुए हैं।

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इस साल की परेड में भारतीय वायुसेना और तीनों सेनाओं के कुल 40 विमान हिस्सा लेंगे। इनमें 22 फाइटर जेट्स, 11 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और 7 हेलीकॉप्टर्स शामिल होंगे। इसके अलावा, भारतीय तटरक्षक बल के तीन डोर्नियर एयरक्राफ्ट भी हिस्सा लेंगे, जो “रक्षक” फॉर्मेशन का प्रदर्शन करेंगे। यह फ्लाईपास्ट देश की ताकत और तकनीकी क्षमता को दिखाता है, जिसे हर साल लाखों लोग टीवी और सोशल मीडिया पर देखते हैं।

Republic Day 2025: क्या दिखेगा, क्या नहीं

इस बार की परेड में भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान LCA तेजस और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और रुद्र नजर नहीं आएंगे। तेजस को शामिल न करने का फैसला भारतीय वायुसेना की नीतियों के तहत लिया गया है, जिसमें सिंगल-इंजन जेट्स को गणतंत्र दिवस की परेड में उड़ान भरने से रोका गया है। इसके साथ ही, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का पूरा बेड़ा हालिया दुर्घटनाओं के बाद फ्लाइट सेफ्टी जांच के लिए ग्राउंड किया गया है। एएलएच ध्रुव और रूद्र ने 15 दिसंबर को हुई सेना दिवस परेड में भी हिस्सा नहीं लिया था।

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Republic Day 2025: भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की कोई अलग झांकी नहीं

इस बार भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की कोई अलग झांकी नहीं होगी। इसके बजाय, एक त्रि-सेवा झांकी (Tri-Service Tableau) प्रस्तुत की जाएगी, जिसमें तीनों सेनाओं के संयुक्त शक्ति और समन्वय को दर्शाया जाएगा। इससे पहले हर साल तीनों सेनाओं की अलग-अलग झांकियां परेड का हिस्सा होती थीं, जो उनके स्पेशल ऑपरेशंस और तकनीकी क्षमताओं की झलक देती थीं।

हालांकि, परेड में अलग-अलग सेनाओं की झांकियां न होने से कुछ लोगों को कमी महसूस हो सकती है। पिछले सालों में, इन झांकियों ने भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के विशेष अभियानों और उपलब्धियों को दर्शाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

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भारतीय वायुसेना ने इस बार गणतंत्र दिवस परेड में अपनी नीति में बदलाव करते हुए सिंगल इंजन वाले विमानों को फ्लाईपास्ट से अलग रखने का फैसला किया है। तेजस जैसे अत्याधुनिक विमान की अनुपस्थिति का कारण भी यही है। ALH हेलीकॉप्टरों की अनुपस्थिति उनके हालिया सुरक्षा निरीक्षण और ग्राउंडिंग के कारण है, जो उनकी तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।

Republic Day 2025: कर्तव्य पथ पर हवाई ताकत का प्रदर्शन

इस बार परेड में कुल 40 विमानों का फ्लाईपास्ट किया जाएगा। इनमें फाइटर जेट्स, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स शामिल हैं। राजपथ के ऊपर आसमान में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान जैसे राफेल, सुखोई-30MKI और जगुआर जैसे विमान अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगे। यह फ्लाईपास्ट भारतीय वायुसेना की ताकत और क्षमता को प्रदर्शित करेगा।

फ्लाईपास्ट में इस बार भारतीय तटरक्षक बल के तीन डोर्नियर विमान भी हिस्सा लेंगे। ये विमान “रक्षक” फॉर्मेशन में उड़ान भरेंगे, जो समुद्री सुरक्षा में तटरक्षक बल की भूमिका को दर्शाएंगे।

Indian Navy MRSAM: भारतीय नौसेना को मिलेगी स्वदेशी मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलों की ताकत, रक्षा मंत्रालय और BDL के बीच हुआ 2,960 करोड़ रुपये का समझौता

Indian Navy MRSAM: Rs 2,960 Crore Deal Inked Between MoD and BDL for Indigenous Missiles

Indian Navy MRSAM: भारतीय रक्षा मंत्रालय (MoD) ने आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। मंत्रालय ने भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के साथ लगभग 2,960 करोड़ रुपये के समझौते पर दस्तखत किए हैं। इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल्स (MRSAM) की आपूर्ति की जाएगी। यह करार 16 जनवरी, 2025 को रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में नई दिल्ली में हुआ।

Indian Navy MRSAM: Rs 2,960 Crore Deal Inked Between MoD and BDL for Indigenous Missiles

यह मिसाइल सिस्टम भारतीय नौसेना के कई युद्धपोतों पर स्टैंडर्ड फिट किया जाएगा और भविष्य में आने वाले अधिकांश जहाजों पर भी इसका इस्तेमाल होगा। इस समझौते को भारतीय रक्षा क्षेत्र की ताकत बढ़ाने और एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी के स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

Indian Navy MRSAM: रक्षा मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि MRSAM सिस्टम ‘बाय (इंडियन)’ श्रेणी के तहत खरीदा जाएगा। इसका अर्थ है कि अधिकांश सामग्री और प्रौद्योगिकी स्वदेशी होगी। इस परियोजना से रक्षा उद्योग, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), में लगभग 3.5 लाख मानव-दिवस (मैनडेज़) का रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।

MRSAM सिस्टम को नौसेना के युद्धपोतों की वायु रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह मिसाइल सिस्टम दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों को प्रभावी ढंग से रोकने और नष्ट करने में सक्षम है। भारतीय नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि यह प्रणाली युद्धपोतों की सुरक्षा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी और ऑपरेशनल क्षमता में सुधार करेगी।

यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने का एक और उदाहरण है। सरकार का उद्देश्य उन्नत तकनीक और स्वदेशी विकास के जरिए भारत को रक्षा उत्पादक देशों की श्रेणी में अग्रणी बनाना है। BDL की भूमिका इस योजना में अहम है, क्योंकि कंपनी ने कई अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियां विकसित की हैं जो भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना की जरूरतों को पूरा करती हैं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत के रक्षा उद्योग के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया है। MRSAM सिस्टम की सप्लाई से न केवल नौसेना को मजबूती मिलेगी, बल्कि यह परियोजना स्वदेशी अनुसंधान और विकास के लिए भी एक प्रेरणा बनेगी। इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले उपकरण और प्रौद्योगिकी भारतीय कंपनियों द्वारा प्रदान की जाएंगी, जिससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

इस समझौते के तहत BDL मिसाइलों की सप्लाई के साथ-साथ उनके रखरखाव और समर्थन के लिए भी जिम्मेदार होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि MRSAM का स्वदेशी उत्पादन भारत की युद्धक क्षमताओं को न केवल वर्तमान में बल्कि भविष्य में भी मजबूत करेगा।

रक्षा क्षेत्र में यह कदम भारत के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस समझौते से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक उत्पादक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

Indian Navy MRSAM: क्या है मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (MRSAM)?

मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (MRSAM) भारतीय नौसेना के लिए एक अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली है, जिसे दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह प्रणाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के सहयोग से स्वदेशी रूप से विकसित की गई है।

  • MRSAM 70 किलोमीटर तक की रेंज में दुश्मन के विमानों, मिसाइलों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन जैसे हवाई खतरों को प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकती है।
  • यह प्रणाली आधुनिक रडार, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, और सक्रिय इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार से लैस है।
  • MRSAM का रेस्पॉन्स टाइम बेहद तेज़ है, जो इसे अचानक होने वाले खतरों को तुरंत रोकने में सक्षम बनाता है।
  • यह मिसाइल पूरी तरह से भारत में डिजाइन और विकसित की गई है।
  • यह प्रणाली एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक और नष्ट करने की क्षमता रखती है।
  • MRSAM एक स्मार्ट लॉन्च यूनिट से लैस है, जो इसे तेजी से तैनात और पुनः लोड करने में सक्षम बनाती है।
  • MRSAM उच्च सटीकता के साथ लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम है, जिससे यह दुश्मन के किसी भी हवाई खतरे का प्रभावी जवाब दे सकती है।
  • यह मिसाइल सिस्टम नौसेना के जहाजों पर आसानी से फिट किया जा सकता है और समुद्री युद्ध की विभिन्न परिस्थितियों में ऑपरेट करने में सक्षम है।

ALH Dhruv Crash: भारतीय सेना के इस वर्कहॉर्स को लेकर आर्मी चीफ ने कही ये बड़ी बात, पांच साल में हो चुके हैं 15 क्रैश

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ALH Dhruv Crash: भारतीय सेना के स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन अटैक हेलीकॉप्टर रुद्र पर हाल के हादसों के बाद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सेना दिवस परेड में इन हेलीकॉप्टरों की गैरमौजूदगी ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भरोसा दिलाते हुए कहा है कि ALH ध्रुव भारतीय सेना का ‘वर्कहॉर्स’ है और रहेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन हेलीकॉप्टरों की फ्लाइंग सेफ्टी सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता है।

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जनरल द्विवेदी ने पुणे में आयोजित 77वें सेना दिवस परेड के मौके पर कहा, “ध्रुव हेलीकॉप्टर ने 2023-24 में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी है। इस दौरान केवल एक बार तकनीकी गड़बड़ी हुई। यह हेलीकॉप्टर कठिन इलाकों में 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक काम कर रहा है। हमें इस प्लेटफॉर्म पर 100% भरोसा है।”

ALH Dhruv Crash: सेना दिवस परेड में नहीं शामिल हुआ ध्रुव

हालांकि, सेना दिवस परेड में ALH और रुद्र हेलीकॉप्टरों का शामिल न होना कई सवाल खड़े करता है। सेना दिवस परेड में चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों ने हिस्सा लिया था। आर्मर्ड फोर्सेज ने हाल ही में इन हेलीकॉप्टरों की उड़ानों पर रोक लगा दी थी, क्योंकि 5 जनवरी को गुजरात के पोरबंदर में तटरक्षक बल का एक ALH ध्रुव दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में दो पायलट और एक एयरक्रू गोताखोर की जान चली गई थी।

रिपब्लिक डे परेड में नहीं होंगे शामिल!

गणतंत्र दिवस के फ्लाईपास्ट में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के हेलीकॉप्टर हिस्सा लेते हैं, लेकिन इस बार ध्रुव हेलीकॉप्टरों की भागीदारी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अधिकारियों के अनुसार, तटरक्षक बल के तीन ALH हेलीकॉप्टर फ्लाईपास्ट का हिस्सा बनने वाले थे, लेकिन हाल की दुर्घटनाओं के चलते इन्हें शामिल करने पर संशय है। ऐसी अटकलें हैं कि उनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं। फिलहाल, गणतंत्र दिवस पर ध्रुव हेलीकॉप्टरों के शामिल होने को लेकर किसी भी आधिकारिक बयान का इंतजार किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव हेलीकॉप्टर पर सवाल उठे हैं। पिछले पांच वर्षों में ALH ध्रुव से जुड़ी 15 से अधिक दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। 2023 में ही कई बार इन हेलीकॉप्टरों की उड़ान रोककर गहन जांच की गई थी। हाल के हादसों ने एक बार फिर इनकी सुरक्षा और डिजाइन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु भेजा

पोरबंदर हादसे के बाद तटरक्षक बल और सेना ने अपने ALH बेड़े को अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया है। इसके तहत सभी हेलीकॉप्टरों के ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स और रोटर हब सहित अन्य उपकरणों की जांच की जा रही है। दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु ले जाया गया है, जहां HAL इसके ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स और रोटर हब की गहन जांच कर रहा है। इस प्रक्रिया में दो सप्ताह तक का समय लग सकता है। विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं दोबारा न हों।

ALH ध्रुव, जिसे HAL द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है, भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का एक प्रमुख उदाहरण है। यह हेलीकॉप्टर भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और तटरक्षक बल के अलावा सीमा सुरक्षा बल और अन्य नागरिक एजेंसियों द्वारा भी उपयोग में लिया जाता है। वर्तमान में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के पास लगभग 330 ALH ध्रुव और 90 से अधिक रुद्र हेलीकॉप्टर हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल और अन्य सिविल एजेंसियां भी एएलएच का उपयोग करती हैं। इस सभी हेलीकॉप्टरों को फिलहाल निरीक्षण और फ्लाइट सेफ्टी चेक के लिए खड़ा कर दिया गया है।

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हालांकि, इन हेलीकॉप्टरों के हाल में हुए हादसों से इनकी विश्वसनीयता को झटका मिला है। 2023 में, ALH बेड़े में इस्तेमाल होने वाले बूस्टर कंट्रोल रॉड्स की डिजाइन की समीक्षा की गई थी। ये रॉड्स हेलीकॉप्टर की उड़ान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। HAL ने पुराने एल्युमिनियम रॉड्स को स्टील के नए रॉड्स से बदलने का काम किया था। इसके बावजूद हादसों का सिलसिला जारी रहा है।

पोरबंदर हादसे से पहले भी सितंबर 2024 में एक तटरक्षक बल यानी कोस्टगार्ड का एक ALH ध्रुव दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। उस समय की गई जांच में कई सुरक्षा खामियां सामने आईं थीं। यह हादसा अरब सागर में हुआ था और इसमें भी तीन लोगों की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद HAL ने मुख्य ड्राइव शाफ्ट, टेल रोटर असेंबली और अन्य उपकरणों की स्ट्रक्चरल सेफ्टी पर फोकस किया था।

सेना और HAL दोनों ने आश्वासन दिया है कि इस बार की जांच में सुरक्षा मानकों को और मजबूत किया जाएगा। जांच पूरी होने के बाद ही इन हेलीकॉप्टरों को दोबारा उड़ान भरने की अनुमति दी जाएगी। सेना का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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हालांकि, इन सभी प्रयासों के बावजूद ALH ध्रुव और रुद्र हेलीकॉप्टर इस साल गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा बन पाएंगे या नहीं, इस पर अब भी संशय बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, यदि जांच समय पर पूरी नहीं हुई तो इनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं।

ALH ध्रुव भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है। यह कठिन से कठिन इलाकों में काम करने में सक्षम है और इसे भारतीय सेनाओं के “वर्कहॉर्स” के रूप में देखा जाता है। हालांकि, लगातार हो रही दुर्घटनाओं ने इसकी छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सेना प्रमुख ने कहा, “छोटी गड़बड़ियां”

सेना प्रमुख का कहना है कि दुनिया के अन्य हेलीकॉप्टरों के साथ भी हादसे होते हैं। उन्होंने इसे “छोटी गड़बड़ियां” बताया, जो किसी भी आधुनिक तकनीक के साथ हो सकती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ALH ध्रुव की बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं का कारण इसके डिजाइन में कुछ मूलभूत खामियां हो सकती हैं, जिन्हें तुरंत सुधारने की जरूरत है।

सेना, वायुसेना और तटरक्षक बल द्वारा ALH हेलीकॉप्टरों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। आगे की जांच और सुधारों से यह साफ होगा कि यह प्लेटफॉर्म भविष्य में कितनी विश्वसनीयता के साथ काम कर सकेगा।

Siachen 5G Network: सेना की ‘फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स’ ने रचा इतिहास, दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन में अब जवानों को मिलेगा 5जी इंटरनेट

Siachen 5G Network: Fire and Fury Corps Makes History, Brings 5G to the World’s Highest Battlefield

Siachen 5G Network: सियाचिन ग्लेशियर, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है, अब 5G कनेक्टिविटी से लैस हो गया है। रिलायंस जियो ने इस दुर्गम क्षेत्र में अपनी 4G और 5G सेवाएं शुरू कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। सेना दिवस के मौके पर इसका एलान किया गया।

Siachen 5G Network: Fire and Fury Corps Makes History, Brings 5G to the World’s Highest Battlefield

सियाचिन ग्लेशियर कराकोरम रेंज में 16,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, और दुनिया के सबसे दुर्गम और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। यहां का तापमान -50°C तक गिर सकता है और बर्फीले तूफान आम बात हैं। इन कठोर परिस्थितियों में भी जियो ने 5G मोबाइल टॉवर स्थापित करके भारतीय सेना के जवानों को बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई है।

Siachen 5G Network: कैसे हुआ यह संभव?

रिलायंस जियो ने भारतीय सेना की ‘फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स’ के साथ मिलकर इस मुश्किल काम को अंजाम दिया है। सेना के फायर एंड फ्यूरी सिग्नलर्स और सियाचिन वारियर्स ने जियो की टीम के साथ मिलकर उत्तरी ग्लेशियर पर पहला 5G मोबाइल टॉवर स्थापित किया।

जियो के उपकरणों को कठिन इलाकों और ठंडे मौसम में एयरलिफ्ट कर फ्रंट पोस्ट तक पहुंचाया गया। सेना ने रसद प्रबंधन और उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए इस चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा किया। जियो ने अपनी स्वदेशी फुल-स्टैक 5G टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। इसके तहत प्लग-एंड-प्ले प्री-कॉन्फिगर्ड उपकरणों को लगाया गया है, ताकि ग्लेशियर के कठिन वातावरण में भी यह बेहतर ढंग से काम कर सके।

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इस प्रोजेक्ट के तहत 5G मोबाइल टॉवर उत्तरी ग्लेशियर पर एक अग्रिम चौकी पर लगाया गया है। सेना और जियो की संयुक्त टीम ने अत्यधिक दुर्गम इलाके और बर्फीले मौसम के बावजूद इस टॉवर को सफलतापूर्वक स्थापित किया।

रिलायंस जियो ने इस उपलब्धि को टेलीकॉम उद्योग में एक नई ऊंचाई के रूप में बताया। रिलायंस जियो का दावा है कि वह सियाचिन ग्लेशियर में 4G और 5G सेवाएं देने वाला पहला टेलीकॉम ऑपरेटर है। कंपनी के एक बयान में कहा गया, “सियाचिन ग्लेशियर पर 5G सेवाएं शुरू करके जियो ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह न केवल तकनीकी प्रगति का प्रतीक है, बल्कि हमारी सेना के जवानों के प्रति सम्मान और समर्थन का भी एक उदाहरण है।”

रिलायंस जियो के एक अधिकारी ने कहा, “यह प्रोजेक्ट हमारे सैनिकों की वीरता और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह कदम सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्रों में सैनिकों की ऑपरेशनल क्षमताओं को बढ़ाएगा।”

इस पहल के जरिए जियो ने लेह-लद्दाख क्षेत्र में अपनी नेटवर्क पहुंच को और मजबूत किया है। कंपनी पहले ही इस क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में 4G सेवाएं प्रदान कर रही थी।

सेना बोली- हमारे बहादुर सैनिकों को समर्पित

भारतीय सेना ने इस उपलब्धि को “अदम्य साहस और तकनीकी दक्षता” का प्रतीक बताया। सेना ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यह उपलब्धि हमारे बहादुर सैनिकों को समर्पित है, जो कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में देश की रक्षा करते हैं। इतनी ऊंचाई पर टावर लगाना न केवल तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था, बल्कि अत्यधिक कठोर मौसम में इसे पूरा करना भी साहसिक कार्य था।”

सैनिकों के लिए क्यों जरूरी है यह सेवा?

सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात भारतीय सेना के जवान कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करते हैं। बर्फीली हवाओं, अत्यधिक ठंड और दुर्गम इलाकों में सैनिकों को अक्सर डिजिटल कनेक्टिविटी की कमी का सामना करना पड़ता है।
वहीं, सैनिक अब अपनी यूनिट्स और मुख्यालय से लगातार संपर्क में रह सकेंगे। इसके अलावा रियल-टाइम डेटा ट्रांसफर और निगरानी और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान में आसानी होगी। साथ ही, सैनिकों को अपने परिवारों से जुड़े रहने का अवसर मिलेगा, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होगा। इस नेटवर्क के जरिए सैनिकों को न केवल बेहतर संचार सुविधा मिलेगी, बल्कि आपातकालीन स्थितियों में मदद भी जल्दी मिलेगी।

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2024 के अंत तक 42 से ज्यादा लगाए टावर

सिर्फ सियाचिन ही नहीं, लद्दाख के अन्य दुर्गम क्षेत्रों में भी 4G नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने भारती एयरटेल के साथ मिलकर 2024 के अंत तक 42 नए 4G टावर स्थापित किए थे। ये टावर कारगिल, देमचोक, दौलत बेग ओल्डी (DBO), गलवान और पैंगोंग झील जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में लगाए गए हैं। इससे पहले, नवंबर 2024 तक केवल 20 टावर ही लगाए गए थे। लेकिन सेना और एयरटेल के संयुक्त प्रयासों से इस संख्या को मात्र डेढ़ महीने में दोगुना कर दिया गया।

सियाचिन और लद्दाख में इन परियोजनाओं को सफल बनाने के पीछे भारतीय सेना का महत्वपूर्ण योगदान है। सेना ने इन दुर्गम इलाकों में रसद पहुंचाने, उपकरणों को एयरलिफ्ट करने और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय करने में अग्रणी भूमिका निभाई। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस परियोजना को “राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक” बताया। उन्होंने कहा कि लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में डिजिटल कनेक्टिविटी केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सीमावर्ती क्षेत्रों में संचार नेटवर्क मजबूत होने से भारतीय सेना की ऑपरेशनल क्षमता में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, यह दुश्मन के किसी भी दावे का स्पष्ट जवाब भी है कि ये क्षेत्र भारतीय संप्रभुता के अभिन्न अंग हैं।

उन्होंने बताया कि सैनिकों और स्थानीय नागरिकों दोनों के लिए यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो रही है। पहले जहां सैनिकों के लिए अपने परिवारों से संपर्क साधना एक बड़ी चुनौती थी, अब वे इन 4G और 5G सेवाओं की मदद से वीडियो कॉल और अन्य डिजिटल सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा, स्थानीय समुदाय, जो अब तक डिजिटल सुविधाओं से अछूते थे, अब शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के नए अवसरों से जुड़ रहे हैं।

Drishti-10 Drone: पोरबंदर के पास समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हुआ अडानी डिफेंस का बनाया ये खास ड्रोन, ‘मेक इन इंडिया’ पर उठ रहे सवाल

Drishti-10 Drone Crashes Near Porbandar, Raises Questions on 'Make in India'

Drishti-10 Drone: गुजरात के पोरबंदर के पास सोमवार को एक इजरायली मूल का भारी-भरकम मिलिट्री ड्रोन ‘दृष्टि-10’ (Drishti-10 Drone) ट्रायल के दौरान समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह ड्रोन भारत में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस द्वारा इजरायली कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के लाइसेंस के तहत तैयार किया गया था। सूत्रों ने बताया कि ड्रोन को पोरबंदर नेवल एयर एन्क्लेव से ऑपरेट किया जा रहा था। यह ड्रोन ट्रायल के अंतिम चरण में था और इसे अभी भारतीय नौसेना को सौंपा जाना बाकी था। हादसे के बाद ड्रोन को समुद्र से निकाल लिया गया है, और तकनीकी विशेषज्ञ दुर्घटना के कारणों की जांच कर रहे हैं।

Drishti-10 Drone Crashes Near Porbandar, Raises Questions on 'Make in India'

सूत्रों का कहना है कि चूंकि ड्रोन नौसेना को अभी तक आधिकारिक रूप से सौंपा नहीं गया था, इसलिए इस दुर्घटना से नौसेना पर कोई फाइनेंशियल घाटा नहीं हुआ है।

क्या है Drishti-10 Drone की खूबी

दृष्टि-10 ड्रोन इजरायली हर्मीस 900 स्टारलाइनर पर आधारित है और इसे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। यह ड्रोन लंबी दूरी की खुफिया जानकारी, निगरानी, और लक्ष्यों की पहचान जैसे महत्वपूर्ण मिशनों के लिए तैयार किया गया है। दृष्टि-10 की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी उड़ान क्षमता है। यह ड्रोन 36 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है, जिससे यह सीमा पर लंबे समय तक निगरानी और गश्त कर सकता है। इसके अलावा, यह 30,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ सकता है, जिसके चलते यह ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में भी बखूबी काम करता है।

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इस ड्रोन की पेलोड क्षमता 450 किलोग्राम तक है, और इस पर हथियार और उपकरण लादे जा सकते हैं। यह सैटकॉम तकनीक से लैस है, ताकि दूरदराज वाले इलाकों में भी यह काम कर सकता है। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर लगे हैं, जिससे यह दिन और रात दोनों समय प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।

2023 में, भारतीय सेना और नौसेना ने आपातकालीन खरीद प्रावधानों के तहत ऐसे दो-दो ड्रोन का ऑर्डर दिया था। इनमें से पहला ड्रोन जनवरी 2023 में नौसेना को सौंपा गया था, जबकि दूसरा ड्रोन जून में सेना को डिलीवर किया गया।
सोमवार को दुर्घटनाग्रस्त हुआ ड्रोन नौसेना को दिया जाना था।

भारतीय सेनाओं को वर्तमान में लगभग 150 नए मध्यम ऊंचाई और लंबी उड़ान क्षमता वाले ड्रोन (MALE) की आवश्यकता है। ये ड्रोन इजरायली सर्चर और हेरोन मार्क-1 और मार्क-2 जैसे ड्रोन की जगह लेंगे, जो लंबे समय से भारतीय सेनाओं द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

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अमेरिकी MQ-9B प्रीडेटर की खरीद

भारत ने अक्टूबर 2024 में अमेरिका के साथ 31 एडवांस MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन की खरीद के लिए 32,350 करोड़ रुपये के एक ऐतिहासिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते को भारतीय सेनाओं की क्षमताओं को मजबूत करने और आधुनिक तकनीक से लैस करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा था।

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समझौते के तहत, भारतीय नौसेना को 15 MQ-9B सी गार्जियन ड्रोन मिलेंगे, जो समुद्री निगरानी और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा, भारतीय सेना और वायुसेना को 8-8 स्काई गार्जियन ड्रोन सौंपे जाएंगे। ये ड्रोन एडवांस सेंसर, हेलफायर मिसाइल, और GBU-39B प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस होंगे।

MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन को ज्यादा ऊंचाई और लंबी दूरी की उड़ान के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह 30 घंटे से अधिक समय तक संचालन करने और खतरों का सटीकता से पता लगाने में सक्षम है। इस समझौते से भारत की समुद्री और हवाई सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी और देश की सैन्य शक्ति को एक नई दिशा मिलेगी।

सी गार्डियन ड्रोन हो चुका है दुर्घटनाग्रस्त

हाालंकि ऐसा नहीं है कि केवल दृष्टि-10 के साथ ही दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। इससे पहले पिछले साल चेन्नई के पास बंगाल की खाड़ी में एक सी गार्डियन ड्रोन दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह ड्रोन अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स से भारतीय नौसेना ने लीज पर लिया था और अरक्कोणम स्थित नौसेना के वायु स्टेशन आईएनएस राजाली से ऑपरेट हो रहा था। 2020 में, नौसेना ने एक साल की अवधि के लिए दो MQ-9B सी गार्डियन ड्रोन लीज पर लिए थे।

Frontline Naval Ships: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई में INS सूरत, INS नीलगिरी और INS वाघशीर को राष्ट्र को किया समर्पित

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

Frontline Naval Ships: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 जनवरी 2025 को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में आयोजित एक भव्य समारोह में भारतीय नौसेना के तीन प्रमुख युद्धपोत – INS सूरत, INS नीलगिरी, और INS वाघशीर – को राष्ट्र को समर्पित किए। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता को सलाम करते हुए कहा कि यह दिन भारत के समृद्ध समुद्री इतिहास और आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार्यक्रम को भारतीय नौसेना की अद्भुत क्षमताओं और भारत की बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक बताया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहली बार एक विध्वंसक (डिस्ट्रॉयर), एक फ्रिगेट, और एक पनडुब्बी को एक साथ कमीशन किया गया है।

प्रधानमंत्री ने नौसेना की सराहना करते हुए कहा कि यह तीनों युद्धपोत मेक इन इंडिया के तहत निर्मित किए गए हैं, जो भारत की आत्मनिर्भरता और रक्षा क्षेत्र में बढ़ते कौशल का प्रमाण है। उन्होंने इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए भारतीय नौसेना और निर्माण में शामिल सभी स्टेकहोल्डर्स को बधाई दी।

प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम में कहा, “आज का कार्यक्रम हमारे गौरवशाली अतीत और उज्ज्वल भविष्य को जोड़ने का प्रतीक है। भारत का समुद्री इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है, और आज का यह अवसर उसी परंपरा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।”

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

Frontline Naval Ships:  INS सूरत, INS नीलगिरी और INS वाघशीर की खूबियां

INS सूरत प्रोजेक्ट 15बी के तहत निर्मित चौथा और अंतिम गाइडेड मिसाइल विध्वंसक है। इसे दुनिया के सबसे उन्नत विध्वंसकों में से एक माना जाता है। यह 75% स्वदेशी सामग्री से निर्मित है और अत्याधुनिक हथियारों और सेंसर सिस्टम से सुसज्जित है।

INS नीलगिरी, प्रोजेक्ट 17ए के तहत निर्मित पहला स्टील्थ फ्रिगेट, भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया गया है। इसमें उच्च स्तरीय स्टील्थ, समुद्री रक्षा और लंबे समय तक समुद्री परिचालन की क्षमता है।

INS वाघशीर, प्रोजेक्ट 75 स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजना का छठा और अंतिम मॉडल है। इसे फ्रांस के नेवल ग्रुप के सहयोग से बनाया गया है। यह पनडुब्बी आधुनिक तकनीकों और गुप्त संचालन क्षमताओं से लैस है।

भारत की समुद्री शक्ति का बढ़ता प्रभाव

प्रधानमंत्री ने भारत की बढ़ती समुद्री ताकत पर जोर देते हुए कहा कि आज भारत को ग्लोबल साउथ में एक भरोसेमंद और जिम्मेदार भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा से खुले, सुरक्षित, समावेशी और समृद्ध इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का समर्थक रहा है।

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

उन्होंने SAGAR (Security And Growth for All in the Region) के विजन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत तटीय देशों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, उन्होंने भारतीय नौसेना के कार्यों की सराहना की, जिसने हाल ही में भारतीय महासागर क्षेत्र में कई मानवीय मिशनों और आपदा राहत कार्यों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत आज केवल अपनी रक्षा के लिए नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी समर्पित है। हमारी नौसेना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का विश्वास अर्जित किया है, और आज का यह कार्यक्रम इस विश्वास को और मजबूत करेगा।”

मेक इन इंडिया का असर

प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में हो रहे सुधारों और उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भारत ने हाल ही में 1.25 लाख करोड़ रुपये का रक्षा उत्पादन किया है और 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है।

उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना ने पिछले एक दशक में 33 जहाजों और सात पनडुब्बियों को अपने बेड़े में शामिल किया है, जिनमें से 39 जहाज भारतीय शिपयार्ड में निर्मित हुए हैं। उन्होंने INS विक्रांत और INS अरिघात जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्वदेशी निर्माण भारत की तकनीकी दक्षता और क्षमता को दर्शाता है।

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प्रधानमंत्री ने कहा, “मेक इन इंडिया पहल न केवल भारतीय सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ा रही है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है।”

उन्होंने भारतीय नौसेना के शिपबिल्डिंग पारिस्थितिकी तंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में वर्तमान में 60 बड़े जहाज निर्माणाधीन हैं, जिनकी अनुमानित लागत ₹1.5 लाख करोड़ है।

PM Modi Dedicates INS Surat, INS Nilgiri, and INS Vaghsheer to the Nation in Mumbai

समुद्री व्यापार और आर्थिक सहयोग पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के तेजी से बढ़ते समुद्री व्यापार और आर्थिक सहयोग पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय महासागर क्षेत्र में 95% व्यापारिक गतिविधियां होती हैं, जिससे इस क्षेत्र में एक मजबूत भारतीय नौसेना की जरूरत और बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि वधावन पोर्ट जैसे बड़े परियोजनाओं से न केवल समुद्री व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि हजारों रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

इस कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि INS सूरत, INS नीलगिरी और INS वाघशीर की कमीशनिंग केवल नौसेना की ताकत नहीं, बल्कि पूरे देश की ताकत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना को आधुनिक और स्वदेशी तकनीकों से लैस करना सरकार की प्राथमिकता है।

इस मौके पर महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और कई अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। रक्षा क्षेत्र में भारत की प्रगति को देखते हुए, यह कार्यक्रम भारतीय सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में दर्ज हो गया।

Robotic Mules: सेना दिवस परेड के बाद अब रिपब्लिक डे परेड में कर्तव्य पथ पर सेना के जवानों संग कदमताल करते दिखेंगे ये रोबोटिक खच्चर

Robotic Mules: Can They Replace the Emotional Bond Veterans Shared with Army Mules?

Robotic Mules: 77वें सेना दिवस परेड में भारतीय सेना के ‘रोबोटिक खच्चरों’ (Robotic Mules) ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। बुधवार को पुणे में आयोजित इस परेड में इन अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। यह मशीनी खच्चर न केवल सेना के ऑपरेशंस को मजबूती देंगी, बल्कि भारतीय सेना के भविष्य में तकनीकी क्रांति का प्रतीक भी बनेंगे। इन रोबोटिक खच्चरों को भारत-चीन सीमा एलएसी पर भी तैनात किया गया है।

Robotic Mules: Set to Dazzle at Republic Day Parade After Army Day Debut

ये रोबोटिक खच्चर दरअसल अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स (UGVs) हैं। इन्हें इस साल गणतंत्र दिवस परेड में भी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर प्रदर्शित किया जाएगा, जहां आम जनता इनकी क्षमताओं को नज़दीक से देख सकेगी।

भारतीय सेना ने पिछले साल 100 रोबोटिक खच्चरों को शामिल किया था, जिनका उद्देश्य ऊंचाई वाले इलाकों और चुनौतीपूर्ण भूभाग में रसद और निगरानी क्षमताओं को बढ़ाना है। इन्हें खासतौर पर उन इलाकों के लिए डिज़ाइन किया गया है, कठोर जहां मौसम और दुर्गम रास्तों के चलते आम उपकरणों के इस्तेमाल में दिक्कत होती है।

Robotic Mules की खूबियां

  • ये रोबोटिक खच्चर -40°C से +55°C तक के तापमान में भी काम कर सकते हैं।
  • ये खड़ी ढलानों और सीढ़ियों पर चढ़ने में सक्षम हैं।
  • प्रत्येक खच्चर 15 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकता है, जिसमें हथियार भी शामिल हैं।
  • इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स और इंफ्रारेड सेंसर से लैस, ये खच्चर आसपास की वस्तुओं और खतरों की पहचान कर सकते हैं।
  • युद्ध के दौरान घायल सैनिकों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में ये म्यूल्स मदद कर सकते हैं।

2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा विवाद के बाद भारतीय सेना ने अपनी ऑपरेशनल क्षमताओं को बढ़ाने के लिए तकनीकी सुधारों पर जोर दिया। सेना का लक्ष्य 2030 तक पशु परिवहन पर निर्भरता को 50-60% तक कम करना है। इन रोबोटिक खच्चरों का उपयोग इसी लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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रोबोटिक खच्चरों के निर्माता एयरोएआरसी के सीईओ अर्जुन अग्रवाल ने बताया, “ये म्यूल्स तीन साल तक बिना बड़ी मरम्मत के काम कर सकते हैं। ये खच्चर सभी प्रकार की बाधाओं को पार कर सकते हैं। यह पानी में जा सकते हैं, नदियों को पार कर सकते हैं, और 3D मैपिंग करने के लिए कैमरे और अन्य उपकरण ले जाने में सक्षम हैं।”

वहीं, जब दुश्मन की घुसपैठ होती है, तो यह खच्चर खतरे की पहचान करता है और कमांडर को जानकारी देता है। इससे जोखिम कम होता है और त्वरित कार्रवाई की जा सकती है।

खास बात यह है कि ये रोबोटिक म्यूल्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक से लैस हैं। ये ऑटोमैटिकली तौर पर काम कर सकते हैं और कमांड के आधार पर अपने आप निर्णय लेने में सक्षम हैं।

जहां भारतीय सेना रोबोटिक खच्चरों को अपनी क्षमताओं में शामिल कर रही है, वहीं चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) पहले से ही रोबोटिक कुत्तों का उपयोग कर रही है। यह दिखाता है कि भविष्य के युद्ध संचालन में तकनीकी उपकरण कितने महत्वपूर्ण होंने वाले हैं।

2030 तक का लक्ष्य

भारतीय सेना का उद्देश्य अपने ऑपरेशंस में स्वदेशी तकनीक और उपकरणों का उपयोग बढ़ाना है। ये रोबोटिक खच्चर न केवल दुर्गम इलाकों में सैनिकों का साथ देंगे, बल्कि सेना की रसद और निगरानी क्षमताओं को भी बेहतर बनाएंगे।

Dhruv choppers: सेना दिवस परेड में स्वदेशी ALH ध्रुव और रूद्र ने नहीं भरी उड़ान, रिपब्लिक डे पर भी फ्लाईपास्ट से हो सकते हैं बाहर

HAL on Dhruv ALH glitch Issued Statement army fleet check

Dhruv choppers: 26 जनवरी को होने वाले गणतंत्र दिवस समारोह में स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (एएलएच) और इसके आर्मर्ड वर्जन रुद्र के हिस्सा लेने पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हाल ही में 5 जनवरी को गुजरात के पोरबंदर में तटरक्षक बल का एक एएलएच दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसके बाद सेना और अन्य बलों ने जांच पूरी होने तक अपने पूरे एएलएच बेड़े की उड़ान पर रोक लगा दी थी।

Dhruv Choppers: Indigenous ALH and Rudra Skip Army Day Parade, May Miss Republic Day Flypast Too

इस दुर्घटना में दो पायलट और एक एयरक्रू गोताखोर की मौत हो गई थी, जिसके बाद इन हेलीकॉप्टरों की फ्लाइंग सेफ्टी को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। अधिकारियों के अनुसार, दुर्घटना के कारणों की जांच जारी है, और विस्तृत विश्लेषण के लिए दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के मलबे को बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के पास भेजा जा रहा है।

Dhruv Choppers: सेना दिवस परेड में नहीं दिखा ALH

एएलएच हेलीकॉप्टर बुधवार को पुणे में आयोजित हुई सेना दिवस परेड में भी शामिल नहीं हुए। सेना दिवस परेड गणतंत्र दिवस की तरह ही एक भव्य औपचारिक समारोह है। इसमें चेतक और चीता हेलीकॉप्टरों ने भी हिस्सा लिया, लेकिन एएलएच गायब दिखा। इस समारोह में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी मौजूद थे।

तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के पास कुल मिलाकर लगभग 330 एएलएच हैं, जबकि सेना और वायुसेना के पास 90 से अधिक रुद्र हेलीकॉप्टर हैं। जबकि कोस्ट गार्ड के पास 19 हेलीकॉप्टर हैं। सीमा सुरक्षा बल और अन्य सिविल एजेंसियां भी एएलएच का उपयोग करती हैं। इस सभी हेलीकॉप्टरों को फिलहाल निरीक्षण और फ्लाइट सेफ्टी चेक के लिए खड़ा कर दिया गया है।

Explainer ALH Dhurv Crash: क्यों बार-बार क्रैश हो रहा है ध्रुव एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर? आखिर हादसों को क्यों नहीं रोक पा रहा है HAL?

पिछले पांच सालों में एएलएच से जुड़ी करीब 15 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। हाल ही में सितंबर 2024 में पोरबंदर के पास एक और तटरक्षक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद तटरक्षक बल ने अपने पूरे बेड़े की जांच की थी।

उस समय जांच का फोकस मुख्य ड्राइव शाफ्ट, टेल रोटर असेंबली और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों की स्ट्रक्चरल सेफ्टी पर था। सेना ने 2023 में भी अपने ध्रुव हेलीकॉप्टरों को भी रोककर व्यापक जांच की थी, जिसमें बूस्टर कंट्रोल रॉड्स की डिजाइन की भी समीक्षा की गई थी।

ALH Dhruv Crash: जांच पूरी होने तक ध्रुव चॉपर के उड़ान भरने पर लगी रोक! 2023 में भी पूरे बेड़े को कर दिया था ग्राउंड

2023 में एएलएच हेलीकॉप्टरों के कमियों को दूर करने और उनमें सुधार के लिए एचएएल ने बड़ी पहल की थी। सभी एएलएच हेलीकॉप्टरों पर पुराने एल्युमिनियम बूस्टर कंट्रोल रॉड्स को स्टील रॉड्स से बदल दिया गया था। ये रॉड्स हेलीकॉप्टर की स्पीड को कंट्रोल करने में पायलटों की मदद करते हैं। रॉड्स की विफलता गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बन सकती है।

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बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थनेस एंड सर्टिफिकेशन (CEMILAC) ने अप्रैल 2023 में एएलएच हेलीकॉप्टरों की डिजाइन समीक्षा का आदेश दिया था। इसके तहत बूस्टर कंट्रोल रॉड्स की मजबूती बढ़ाने के लिए सुधार किए गए।

पोरबंदर दुर्घटना के बाद एचएएल ने हेलीकॉप्टर के ट्रांसमिशन सिस्टम, गियरबॉक्स, और रोटर हब सहित अन्य उपकरणों की व्यापक जांच शुरू की है। इसमें दो सप्ताह से अधिक समय लग सकता है। यदि कोई समस्या पाई जाती है, तो सुधारात्मक कदम उठाने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

गणतंत्र दिवस फ्लाईपास्ट में में तीनों सेनाओं और तटरक्षक बल के हेलीकॉप्टर हिस्सा लेते हैं, लेकिन इस बार इस पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, गणतंत्र दिवस परेड में ध्रुव हेलीकॉप्टरों के हिस्सा लेने को लेकर सभी ने चुप्पी साध रखी है। कहा जा रहा है कि उनकी जगह अन्य हेलीकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं। अधिकारियों ने बताया कि इस साल गणतंत्र दिवस के फ्लाईपास्ट में तीनों सेनाओं के हेलिकॉप्टरों के साथ तीन तट रक्षक ALH को भी हिस्सा लेना था।

एएलएच हेलीकॉप्टर को बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने डिजाइन किया है। लेकिन हाल की घटनाओं ने इसकी उड़ान सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं। सेना प्रमुख ने कहा है कि एविएशन सिक्योरिटी सर्वोच्च प्राथमिकता है। जब तक सभी जांच पूरी नहीं हो जातीं, तब तक इन हेलीकॉप्टरों की उड़ान पर रोक बनी रहेगी।

Explainer: क्या है आर्मी की ‘भारत रणभूमि दर्शन’ योजना? अब आम लोग भी जा सकेंगे सियाचिन, गलवान और डोकलाम, सेना देगी शौर्य पत्र

Explainer: What is the Army's 'Bharat Ranbhoomi Darshan' Initiative? Tourists to Visit Siachen, Galwan, and Doklam

Explainer Bharat Ranbhoomi Darshan: भारतीय सेना ने एक नई और अनोखी योजना शुरू करने का ऐलान किया है, जिसे ‘भारत रणभूमि दर्शन’ (Bharat RannBhoomi Darshan) नाम दिया गया है। इस पहल का उद्देश्य आम नागरिकों को उन ऐतिहासिक रणभूमियों तक पहुँचने का अवसर देना है, जहाँ भारतीय सैनिकों ने अपनी वीरता और बलिदान की मिसाल पेश की है। इस योजना की शुरुआत 15 जनवरी को आर्मी डे के अवसर पर होगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस दिन एक विशेष वेबसाइट लॉन्च करेंगे, जो इस योजना से जुड़ी जानकारी और बुकिंग सेवाएँ प्रदान करेगी।

Explainer: What is the Army's 'Bharat Ranbhoomi Darshan' Initiative? Tourists to Visit Siachen, Galwan, and Doklam

जा सकेंगे गलवान घाटी, डोकलाम

‘भारत रणभूमि दर्शन’ (Bharat RannBhoomi Darshan) योजना के तहत, आम लोग अब गलवान घाटी, डोकलाम, सियाचिन बेस कैंप, लिपुलेख दर्रा, बूमला और किबितु जैसे ऐतिहासिक और सामरिक महत्व वाले स्थलों की यात्रा कर सकेंगे। इन स्थानों को शौर्य गंतव्य के रूप में विकसित किया गया है। सेना का कहना है कि इन स्थलों पर जाकर टूरिस्ट न केवल इन इलाकों की भौगोलिक कठिनाइयों को समझ पाएंगे, बल्कि उन घटनाओं से भी रूबरू होंगे, जिनमें भारतीय जवानों ने अदम्य साहस दिखाया।

दिए जाएंगे शौर्य पत्र 

इस योजना के तहत टूरिस्टों को उनकी यात्राओं के आधार पर शौर्य पत्र प्रदान किए जाएंगे। ये पत्र तीन श्रेणियों में दिए जाएंगे: सिल्वर, गोल्ड और प्लैटिनम। इन पत्रों को इस आधार पर दिया जाएगा कि टूरिस्ट ने कितने शौर्य स्थलों का दौरा किया है। इससे लोगों को अधिक से अधिक स्थलों पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा और सेना के बलिदान को नज़दीक से जानने का मौका मिलेगा।

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योजना के तहत गलवान और डोकलाम जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। गलवान घाटी, जहां 2020 में भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों के साथ बहादुरी से सामना किया था, और डोकलाम, जहां 2017 में भारतीय जवानों ने चीन की हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दिया था, इन क्षेत्रों में अब टूरिस्टों को जाने की अनुमति दी जाएगी। इन स्थलों को देखने के दौरान टूरिस्टों को गाइडेड टूर की सुविधा दी जाएगी, जहां उन्हें इन इलाकों के ऐतिहासिक और सामरिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी मिलेगी।

भारत के गौरवशाली अतीत का अनुभव कर सकेंगे लोग

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने रक्षा समाचार डॉट कॉम के साथ खास बातचीत में इस योजना को सीमावर्ती इलाकों के विकास के लिए एक अहम कदम बताया। उन्होंने कहा कि इस पहल से न केवल इन क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय समुदायों को भी आर्थिक लाभ होगा। उनका कहना है कि जब सीमावर्ती इलाकों में टूरिस्टों की आवाजाही बढ़ती है और आर्थिक गतिविधियां मजबूत होती हैं, तो यह दुश्मन के उन दावों को कमजोर करता है जो वे इन क्षेत्रों पर करते हैं। सेना प्रमुख ने बताया कि ‘भारत रणभूमि दर्शन’ के माध्यम से देशवासी भारत के गौरवशाली अतीत का अनुभव कर सकेंगे।

इन ऐतिहासिक युद्धक्षेत्रों पर कदम रखते ही आप अदम्य साहस और बलिदान की कहानियों से जुड़ेंगे। ये पवित्र स्थल भारत की सैन्य विरासत का प्रतीक हैं, जो आपको इतिहास को फिर से जीने और हमारे नायकों का सम्मान करने का अवसर देते हैं।

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पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सेना और सरकार ने सीमावर्ती इलाकों के विकास के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनमें वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम भी शामिल है। इन योजनाओं का उद्देश्य सीमाओं पर भारत की उपस्थिति को मज़बूत करना है। ‘भारत रणभूमि दर्शन’ योजना उसी कड़ी का हिस्सा है।

इस योजना का एक और उद्देश्य युवाओं और आम नागरिकों को भारतीय सेना के बलिदान और वीरता से जोड़ना है। सेना का मानना है कि जब लोग इन स्थलों पर जाएँगे, तो वे न केवल देशभक्ति की भावना से भर जाएँगे, बल्कि भारतीय सेना के इतिहास और उनके द्वारा किए गए बलिदान को गहराई से समझ पाएँगे।

यह है वेबसाइट

योजना को लागू करने के लिए भारतीय सेना ने एक डेडिकेटेड वेबसाइट (www.bharatrannbhoomidarshan.gov.in) तैयार की है, जहां टूरिस्ट अपनी यात्रा की योजना बना सकेंगे। वेबसाइट के माध्यम से टूरिस्टों को सभी आवश्यक जानकारी, मार्गदर्शन और बुकिंग की सुविधा दी जाएगी। इसके अलावा, इन क्षेत्रों में स्थानीय गाइड और इंफ्रास्ट्रक्चर को भी विकसित किया जा रहा है, ताकि टूरिस्टों को सुरक्षित और यादगार अनुभव मिल सके।

भारतीय सेना की यह पहल न केवल सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास लाने का एक साधन है, बल्कि यह देशवासियों को अपनी सेना के बलिदान के प्रति जागरूक करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है। इस योजना से इन क्षेत्रों में पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, जो भारत की सीमाओं को और मजबूत बनाएगा।