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Shivaji Maharaj Statue row: 1971 की पेंटिंग के बाद पैंगोंग झील के किनारे लगे शिवाजी महाराज के स्टेच्यू को लेकर क्यों हो रहा है विवाद? जनरल जोरावर का नाम क्यों आया सामने

Shivaji Maharaj Statue at Pangong Sparks Row: Why General Zorawar's Name Emerges

Shivaji Maharaj Statue row: 28 दिसंबर को लद्दाख की पेंगोंग झील के किनारे भारतीय सेना ने छत्रपति शिवाजी महाराज की 30 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की, जिसके बाद सोशल मीडिया पर यूजर तरह-तरह के कमेंट्स करने लगे। इनमें न केवल स्थानीय लद्दाखी लोग शामिल थे, बल्कि रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों ने भी सेना के इस कदम पर सवाल उठाए। इस प्रतिमा को सेना ने चीन के साथ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के पास 14,300 फीट की ऊंचाई पर स्थापित किया है। कुछ यूजर्स का मानना है कि इस जगह पर डोगरा जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा अधिक उपयुक्त होती, जिन्होंने लद्दाख पर जीत हासिल की थी और तिब्बत में लड़ाई लड़ी थी। रक्षा समाचार डॉट कॉम ने सबसे पहले इस खबर को प्रकाशित किया था।

Shivaji Maharaj Statue at Pangong Sparks Row: Why General Zorawar's Name Emerges

शिवाजी महाराज की इस प्रतिमा का उद्घाटन भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कोर (14 कोर) के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने किया, जो मराठा लाइट इन्फैंट्री के कर्नल भी हैं। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि शिवाजी महाराज के साहस, रणनीति और न्याय के आदर्श आज के मिलिट्री ऑपरेशंस के लिए भी प्रासंगिक हैं। बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे हैं, और उनके पिता रिटायर्ड ब्रिगेडियर रहे हैं। दो बार शौर्य चक्र (1996, 2002) और सेना पदक से सम्मानित चुके हैं।

हालांकि, इस प्रतिमा की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि पेंगोंग झील पर शिवाजी महाराज की जगह जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा होनी चाहिए थी, जिन्होंने 1800 के दशक में लद्दाख और तिब्बत में अपनी वीरता दिखाई थी।

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Shivaji Maharaj Statue row:  स्थानीय काउंसलर ने जताई नाराजगी

पेंगोंग के नजदीक ही चुशुल इलाके के काउंसलर कोनचोक स्टैंजिन ने इस प्रतिमा को लेकर अपनी नाराज़गी जताई। उन्होंने ट्वीट किया,

“एक स्थानीय निवासी के रूप में, मुझे पेंगोंग पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा लगाने से आपत्ति है। यह बिना स्थानीय समुदायों की सहमति के स्थापित की गई है। हमें ऐसे प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो हमारी संस्कृति और पर्यावरण का सम्मान करें।”

वहीं स्टैनजिन के इस बयान ने राष्ट्रीय प्रतीकवाद और स्थानीय पहचान के बीच संतुलन पर व्यापक बहस छेड़ दी है।

राजनीतिक कार्यकर्ता और 2019 में लद्दाख से संसदीय उम्मीदवार रह चुके सज्जाद कारगिली ने कहा:

“लद्दाख में श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक प्रासंगिकता नहीं है। हम उनकी विरासत का सम्मान करते हैं, लेकिन ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को यहां थोपना गलत है। हम स्थानीय ऐतिहासिक शख्सियतों जैसे ख्री सुल्तान चो, अली शेर खान अंचेन और सेंगे नामग्याल की प्रतिमाएं लगाने का समर्थन करेंगे।”

सज्जाद ने यह भी कहा, “हालांकि, इन प्रतिमाओं को भी पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे पैंगोंग में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि ऐसे स्थानों को संरक्षित करने की आवश्यकता है।”

Shivaji Maharaj Statue at Pangong Sparks Row: Why General Zorawar's Name Emerges

Shivaji Maharaj Statue row: रिटायर्ड सैन्य अफसरों ने भी जताई आपत्ति

रिटायर्ड मेजर जनरल बीएस धनोआ ने कहा, “सशस्त्र बलों में किसी भी प्रतीक को राष्ट्रीय ध्वज और रेजिमेंटल ध्वज से ऊपर नहीं होना चाहिए। 14 कॉर्प्स में यह निर्णय क्यों लिया गया और इसे सोशल मीडिया पर प्रचारित क्यों किया गया?”

वहीं, रिटायर्ड कर्नल अनिल तलवार ने कहा, “सेना को अपने मुख्य मिशन और मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि ऐसे आयोजन करने चाहिए जो राष्ट्रीय रक्षा और एकता के व्यापक उद्देश्यों से संबंधित नहीं हैं।”

रक्षा विशेषज्ञ मन अमन सिंह चिन्ना ने लिखा, “डोगरा जनरल जोरावर सिंह, जिन्होंने लद्दाख पर विजय प्राप्त की और तिब्बत में युद्ध लड़ा, की प्रतिमा यहां अधिक उपयुक्त होती।”

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं

एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “पेंगोंग झील एक रणनीतिक स्थान है और इसे ऐसे नायक की प्रतिमा से सजाया जाना चाहिए, जिसका इस क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व हो। जनरल जोरावर सिंह ने तिब्बत तक जाकर मानसरोवर को आज़ाद कराया और लद्दाख को भारत का हिस्सा बनाया।

एक अन्य यूजर ने कहा, “शिवाजी महाराज का सम्मान है, लेकिन यह प्रतिमा उनकी कर्मभूमि से बहुत दूर है। जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा यहां ज्यादा प्रासंगिक होती।

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कौन थे जनरल जोरावर सिंह?

जनरल जोरावर सिंह को लद्दाख और तिब्बत पर विजय प्राप्त करने के लिए जाना जाता है। वह महाराजा रणजीत सिंह की सेना के एक महान सेनापति थे। उनके नेतृत्व में लद्दाख, तिब्बत और मानसरोवर पर विजय हासिल की गई, जो भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मेजर जनरल (रिटायर्ड) कुलदीप संधू ने कहा, “छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान नेता थे, लेकिन उनका लद्दाख से कोई ऐतिहासिक संबंध नहीं था। पेंगोंग झील पर जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा लगाई जाती तो ज्यादा बेहतर होता।”

कर्नल राजेंद्र भादुड़ी (सेवानिवृत्त) ने लिखा: “… पैंगोंग त्सो में शिवाजी के खिलाफ कुछ नहीं, बस इतना है कि वह अपनी कर्मभूमि से बहुत दूर हैं। जनरल जोरावर सिंह कहलूरिया की एक प्रतिमा उपयुक्त होती, जिन्होंने पश्चिमी तिब्बत के 500 मील से अधिक हिस्से पर विजय प्राप्त की थी।”

रिटायर्ड कर्नल संजय पांडे भी कहते हैं, “जोरावर सिंह पेंगोंग त्सो से होते हुए खुरनाक किले तक गए, मानसरोवर तक चौकियाँ स्थापित कीं। तिब्बत में लड़ते हुए उनकी मृत्यु हो गई। लेह किले को जोरावर किला कहा जाता है। वहां शिवाजी की प्रतिमा क्यों? मैं एक शुद्ध डोगरा यूनिट से महाराष्ट्रीयन हूं, महाराजा गुलाब सिंह की पहली यूनिट। श्रीनगर के लाल चौक में शिवाजी की एक और प्रतिमा क्यों नहीं? या द्रास में? या कारगिल में? जोरावर सिंह ने 180 साल पहले युद्ध लड़े थे, मौसम आज जैसा ही था। वह वहाँ होने के हकदार हैं।”

सोशल मीडिया पर एक इंजीनियर ने लिखा, “पैंगोंग त्सो वह जगह है, जिसके पास 1962 के नायक मेजर शैतान सिंह ने चीनियों से लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए थे। यही वह जगह है, जहां से जनरल जोरावर सिंह ने चीनी तिब्बत पर आक्रमण के लिए अपनी सेना के साथ मार्च किया था।”

रिटायर्ड कर्नल रोहित वत्स नाम का कहना है, “मैं छत्रपति शिवाजी महाराज का बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनकी प्रतिमा लगाने के लिए यह सही स्थान है। इस जगह के इतिहास को देखते हुए, जनरल जोरावर सिंह की प्रतिमा यहां लगाना अधिक उपयुक्त होता। उनकी निर्भीकता, सामरिक और रणनीतिक कौशल की वजह से ही लद्दाख आज भारत का हिस्सा है।”

क्या कहती है सेना?

डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, पैंगोंग झील के किनारे शिवाजी महाराज की प्रतिमा मराठा यूनिट के स्वैच्छिक योगदान से लगाई गई है। इस पर कोई पब्लिक फंड खर्च नहीं हुआ। उन्होंने बताया, “इन्फैंट्री (पैदल सेना) यूनिटों में अपनी यूनिट से संबंधित प्रतीक लगाने की लंबी परंपरा रही है। यह सैनिकों को प्रेरित करने के लिए किया जाता है।”

पैंगोंग झील का यह क्षेत्र मराठा यूनिट के तहत आता है, जो एक प्रतिबंधित क्षेत्र है। यहां की यूनिट के सैनिकों और पूर्व सैनिकों ने मिलकर स्वैच्छिक योगदान से यह प्रतिमा स्थापित की है।

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पेंगोंग झील का सामरिक महत्व

पेंगोंग झील भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का प्रमुख स्थान है। 2020 में सीमा विवाद के दौरान यह क्षेत्र सुर्खियों में था। हाल ही में, भारतीय सेना प्रमुख के लाउंज में पेंगोंग झील की पेंटिंग लगाई गई थी, इससे पहले वहां 1971 के पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण की एतिहासिक पेंटिंग लगी थी। लेकिन जब इसे हटाए जाने को लेकर विवाद बढ़ा तो 1971 की पेंटिंग को नई दिल्ली स्थित मानेकशॉ सेंटर में शिफ्ट कर दिया गया।

स्थानीय नायकों की अनदेखी?

एक सोशल मीडिया यूजर मनु खजूरिया ने लिखा, “शिवाजी महाराज के प्रति मेरी गहरी श्रद्धा है, लेकिन यह ऐसा है जैसे रायगढ़ किले पर डोगरा जनरल जोरावर सिंह की मूर्ति लगाई जाए। जनरल जोरावर सिंह और कर्नल मेहता बस्ती राम ने महाराजा गुलाब सिंह के नेतृत्व में लद्दाख पर विजय पाई और पश्चिमी तिब्बत में चीनी-तिब्बती सेना से युद्ध किया। डोगरा सेना, जो पर्वतीय युद्ध में माहिर थी, ने यहां अपना खून बहाया। यह समझ नहीं आता कि स्थानीय इतिहास और नायकों को क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।”

हिस्ट्री ऑफ़ राजपूताना नाम के एक अन्य सोशल मीडिया अकाउंट ने लिखा, “पैंगोंग एक रणनीतिक जगह है। इसे ऐसे व्यक्ति की प्रतिमा से सजाया जाना चाहिए, जिसका इस स्थान से ऐतिहासिक संबंध हो। जनरल जोरावर सिंह तिब्बत तक गए और सैकड़ों वर्षों बाद मानसरोवर को मुक्त कराया। लद्दाख आज भारत का हिस्सा है, यह उनकी वजह से है। हमें खुद को बेवकूफ बनाने की जरूरत नहीं है।”

सेना को मजबूत करने की पहल

पेंगोंग झील पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण सेना की उस व्यापक पहल का हिस्सा है, जिसमें लद्दाख क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने के प्रयास शामिल हैं। सेना द्वारा बेहतर बुनियादी ढांचा, निगरानी और सैनिकों की तैनाती की क्षमता को बढ़ाने के कदम उठाए गए हैं।

इस प्रतिमा को स्थापित करना एक रणनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है, जो भारतीय सेना की ताकत और सीमा की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, स्थानीय और राष्ट्रीय प्रतीकों के बीच संतुलन बनाना एक चुनौतीपूर्ण मुद्दा बनकर उभरा है।

पहले भी लग चुकी हैं शिवाजी की प्रतिमाएं:

नवंबर 2023 में जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में एलओसी के पास 10.5 फीट ऊंची शिवाजी की प्रतिमा का अनावरण किया था। यह प्रतिमा मुंबई से भेजी गई थी और 41 राष्ट्रीय राइफल्स (मराठा लाइट इन्फैंट्री) के मुख्यालय में लगाई गई।
दिसंबर 2022 में नेवी डे के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग में 35 फीट ऊंची शिवाजी की प्रतिमा का अनावरण किया था। हालांकि, यह प्रतिमा अगस्त 2023 में ढह गई।

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Karan Singh: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की ऐतिहासिक भूमिका और इसके हटने के बाद के प्रभावों पर चर्चा करते हुए, कश्मीर के महाराजा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. करण सिंह ने हाल ही में अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री के पॉडकास्ट कार्यक्रम “खरी बात”में उन्होंने अनुच्छेद 370 की जरूरत, इसके ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 एक समय में घाटी के लोगों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी था। उन्होंने उम्मीद जताई कि जम्मू-कश्मीर को जल्द ही पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी तकलीफ जताई कि हमें हमेशा भारत का मुकुट कहा जाता था। लेकिन आज हम हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से भी छोटा हो गए हैं। केंद्र शासित प्रदेश बन जाना कश्मीरी और डोगरा दोनों को आहत करता है।

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Karan Singh: अनुच्छेद 370 की जरूरत क्यों पड़ी?

डॉ. करण सिंह ने कहा, “जब अनुच्छेद 370 लाया गया, उस समय जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच एक संवैधानिक संबंध स्थापित करने की आवश्यकता थी। हमारे संविधान ने 1950 में आकार लिया, लेकिन 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद के दो वर्षों में यह स्पष्ट नहीं था कि राज्य का भारत के संविधान में क्या स्थान होगा। इसलिए, इसे एक अस्थाई प्रावधान के रूप में लाया गया।” इसका उद्देश्य था जम्मू-कश्मीर के लोगों को भारतीय संविधान के साथ जोड़ने का एक रास्ता देना, जबकि राज्य अपनी अलग पहचान बनाए रख सके।

उन्होंने कहा, “1947 में मेरे पिता महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद भी जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच संवैधानिक संबंध स्पष्ट नहीं थे। भारतीय संविधान 1950 में लागू हुआ और तब तक जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान लाना जरूरी था।”

डॉ. करण सिंह ने बताया कि उनके पिता महाराजा हरि सिंह ने 1927 में दो बड़े फैसले लिए थे। पहला, राज्य के बाहर के लोग कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते थे, और दूसरा, बाहरी लोग यहां नौकरी नहीं कर सकते थे।

उन्होंने कहा, “कश्मीर उस समय आर्थिक रूप से कमजोर था। अगर बाहरी लोग जमीन खरीद लेते या नौकरियां ले लेते, तो स्थानीय लोगों का हक पूरी तरह से खत्म हो जाता।” उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 370 इन्हीं अधिकारों की सुरक्षा के लिए जरूरी था।

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डॉ. सिंह ने इस साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। “यह जम्मू राज्य था, जिसमें कश्मीर, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्र शामिल थे। परंतु 1947 के युद्ध के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, और अक्साई चिन को चीन ने हड़प लिया।”

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उन्होंने कहा, “हमें हमेशा भारत का मुकुट कहा जाता था। लेकिन आज हम हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से भी छोटा हो गए हैं। केंद्र शासित प्रदेश बन जाना कश्मीरी और डोगरा दोनों को आहत करता है।”

उन्होंने आगे उम्मीद जताई कि जम्मू-कश्मीर को जल्द ही पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा। उन्होंने कहा, “सरकार ने चुनाव कराने की बात कही है और सुप्रीम कोर्ट में भी कहा है कि उचित समय पर राज्य का दर्जा वापस मिलेगा।”

Karan Singh: अनुच्छेद 370 हटने के बाद हालात

डॉ. सिंह ने कहा कि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद कई बदलाव हुए हैं। उन्होंने माना कि पत्थरबाजी और बंद जैसी घटनाएं बंद हो गई हैं, लेकिन आतंकवाद अभी भी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन स्थिति पहले से बेहतर है। । “आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई जारी है, लेकिन यह समस्या पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। पत्थरबाजी और बंद का दौर खत्म हो गया है।”

उन्होंने कहा कि आतंकवाद के लिए सीमा पार से आने वाले आतंकियों और स्थानीय आतंकियों दोनों की भूमिका है। उन्होंने कहा कि इस समस्या का हल बातचीत और सख्ती दोनों से निकाला जा सकता है।

बिना युद्ध के नहीं मिलेगा पीओके

पाकिस्तान के साथ संबंधों और पीओके पर भारत की स्थिति के बारे में डॉ. सिंह ने कहा, “संसद का संकल्प है कि पीओके को वापस लिया जाएगा, लेकिन यह बिना युद्ध के संभव नहीं है। पाकिस्तान के साथ बातचीत पर करण सिंह का मानना है कि भारत को किसी से बात करने से डरना नहीं चाहिए। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है, और पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध रखना जरूरी है। अगर बातचीत से समाधान निकले, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तान के साथ समाधान के करीब पहुंचा गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश, राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं।

गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों का चलन बढ़ा

डॉ. सिंह ने राजनीति के बदलते स्वरूप पर अपनी राय देते हुए कहा, “पहले राजनीतिक विरोध में भी गरिमा और मर्यादा थी। आजकल, गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों का चलन बढ़ गया है। यह हमारी संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।”

उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में चुनावों में धन का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। “पहले जहां विचारधारा और नेतृत्व पर जोर होता था, अब पैसे और जातिगत समीकरण हावी हो गए हैं। आज टिकट पाना करोड़ों रुपये का खेल हो गया है। इससे गरीब और ईमानदार व्यक्ति के लिए राजनीति में आना मुश्किल हो गया है।”

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देश में बढ़ते धार्मिक और राजनीतिक तनाव पर भी डॉ. करण सिंह ने चिंता जताई। उन्होंने कहा, “धर्म और जाति के नाम पर दुश्मनी बढ़ाना भारत की महान संस्कृति के खिलाफ है।” उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस रोक का समर्थन किया, जिसमें धार्मिक स्थलों को लेकर नए विवाद उठाने पर पाबंदी लगाई गई।

वन नेशन, वन इलेक्शन और यूसीसी पर विचार

वन नेशन, वन इलेक्शन पर डॉ. सिंह ने कहा, “यह एक दिलचस्प विचार है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में व्यावहारिक चुनौतियां हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इसे लागू करना आसान नहीं होगा।”

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर उन्होंने कहा, “भारत में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों की विविधता को देखते हुए, यह विषय बेहद संवेदनशील है। इसे लागू करने से पहले गहराई से विचार करना होगा।”

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संविधान और संशोधन की प्रक्रिया

डॉ. सिंह ने भारतीय संविधान की प्रशंसा करते हुए कहा, “हमारा संविधान एक मजबूत और विस्तृत दस्तावेज है, जिसे समय-समय पर संशोधित किया गया है। लेकिन संशोधन रचनात्मक होने चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए। संविधान में बदलाव से पहले इसके मूल ढांचे का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।”

नेहरू और वर्तमान राजनीति पर चर्चा

अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभव पर करण सिंह ने कहा कि राजनीति का धर्म ही उथल-पुथल है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य नेताओं के साथ अपने अनुभव साझा किए। जवाहरलाल नेहरू की आलोचना पर उन्होंने कहा, “नेहरू जी को सभी समस्याओं का जिम्मेदार ठहराना अनुचित है। उन्होंने देश को आजादी के बाद स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई। उनके योगदान को कम करके आंकना इतिहास के साथ अन्याय है।”

उनका कहना है कि राजनीति में आने वाले लोगों को वाणी में संयम और दृष्टिकोण में उदारता रखनी चाहिए। राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि यह देश और समाज की सेवा का माध्यम भी है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता की भी प्रशंसा की, लेकिन यह जोड़ा कि राजनीति में संवाद और सहिष्णुता की कमी चिंता का विषय है।

विदेश में हिंदुओं पर हमले

कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में हिंदू मंदिरों पर बढ़ते हमलों पर उन्होंने कहा, “यह बहुत चिंताजनक है। सरकार को इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए और अन्य देशों से इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग करनी चाहिए।”

दो पार्टी प्रणाली और छोटी पार्टियां

भारत में दो पार्टी प्रणाली की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “भारत में इतनी विविधता है कि दो पार्टी प्रणाली व्यावहारिक नहीं है। लेकिन छोटे राजनीतिक दल जो केवल पैसे और सत्ता के लिए बने हैं, उन्हें हटाया जाना चाहिए।”

Pangong Tso: सेना ने पूर्वी लद्दाख में 14,300 फीट की ऊंचाई पर लगाई छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा, दिया ये बड़ा संदेश

Pangong Tso: Shivaji Maharaj Statue Installed at 14,300 Ft in Eastern Ladakh
Credit- Indian Army

Pangong Tso: पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग त्सो झील के किनारे 14,300 फीट की ऊंचाई पर छत्रपति शिवाजी महाराज की एक भव्य प्रतिमा का अनावरण किया गया है। 26 दिसंबर 2024 को इस ऐतिहासिक प्रतिमा का उद्घाटन भारतीय सेना के फायर एंड फ्यूरी कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने किया। वह मराठा लाइट इन्फैंट्री के कर्नल भी हैं। सेना के इस प्रयास को ‘कर्म क्षेत्र’ थीम से जोड़ कर देखा जा रहा है, जिसमें सेना को एक “धर्म के रक्षक” के रूप में दिखाया गया है, जो केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं बल्कि न्याय की रक्षा और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ती है।

Pangong Tso: Shivaji Maharaj Statue Installed at 14,300 Ft in Eastern Ladakh
Credit- Indian Army

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व

श्री छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे शासक थे, जिन्होंने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की बल्कि न्याय और शासन के उच्च मानदंड स्थापित किए। इस प्रतिमा के अनावरण का उद्देश्य न केवल उनके जीवन और उपलब्धियों को याद करना है, बल्कि वर्तमान समय में उनके मूल्यों को बढ़ावा देना भी है। वहीं यह प्रतिमा साहस, न्याय और भारत के महान शासक की विरासत का प्रतीक है।

Pangong Tso: लगातार ऐसी पहल कर रही है भारतीय सेना

यह आयोजन भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के प्रयासों का हिस्सा है, जो लद्दाख क्षेत्र में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम कर रही है। इससे पहले इसी साल, पूर्वी लद्दाख के लुकुंग और चुशुल क्षेत्रों में भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं का अनावरण किया गया था। यह पहल न केवल क्षेत्र के सांस्कृतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करती है, बल्कि भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थायित्व और शांति को भी बढ़ावा देती है।

इसी साल जुलाई में भारत ने चीन के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन (साइकोप) या साइकोलॉजिकल ऑपरेशन शुरू करते हुए पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे दो हॉटस्पॉट-लुकुंग और चुशुल में भगवान बुद्ध की मूर्तियां स्थापित की थीं।

Buddha Statue at Lukung
Buddha Statue at Lukung

वहीं ये दोनों जगहें बेहद खास भी हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान लुकुंग और चुशुल, इन दोनों ही जगहों पर भीषण जंग हुई थी। भारतीय सैनिकों ने इन दोनों जगहों पर चीनियों को रोके रखा था। एक जुलाई को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास लुकुंग और चुशुल इलाकों में भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की मूर्तियों का अनावरण किया गया। लुकुंग पैंगोंग त्सो के उत्तर-पश्चिमी किनारे ‘फिंगर 4’ के पास है, जबकि चुशुल में मूर्ति स्पैंगगुर गैप के सामने है, जो दोनों सेनाओं का सीमा मीटिंग प्वॉइंट है। मोल्डो में चीनी गैरिसन वहां से लगभग 8 किमी दूर है।

सूत्रों ने बताया कि इसी तरह की दो और प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। इनमें से एक डेमचोक में स्थापित की जाएगी, जबकि दूसरी प्रतिमा के लिए अभी जगह का चयन नहीं किया गया है।

सेना के सूत्रों ने उस वक्त बताया था, “फायर एंड फ्यूरी कोर ने सीमावर्ती क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने, सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उन्नत करने और प्रमुख सीमावर्ती गांवों के आध्यात्मिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए लद्दाख के लोगों के साथ भारतीय सेना के लंबे सहयोग की स्मृति में लुकुंग और चुशुल के सीमावर्ती गांवों में ध्यान कॉर्नर्स को समर्पित किया है। यह पूर्वी लद्दाख के अग्रिम क्षेत्रों में एकजुटता को बढ़ावा देने, आध्यात्मिक मूल्यों और शाश्वत शांति को बनाए रखने के लिए वसुधैव कुटुम्बकम (दुनिया एक परिवार है) के सार को कायम रखने की पहल है।”

भगवान बुद्ध की मूर्तियों को “भूमिस्पर्श मुद्रा” में दिखाया गया है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूज़लेटर “महान बुद्ध की मुद्राएं: प्रतीकात्मक इशारे और मुद्राएं” में “भूमिस्पर्श मुद्रा” को “पृथ्वी को छूना” बताया गया है। इसमें आगे कहा गया है, “यह बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध के ज्ञानोदय का प्रतीक है, जब उन्होंने पृथ्वी देवी स्थावरा को अपने ज्ञानोदय की गवाही देने के लिए बुलाया था।”

सेना प्रमुख के कमरे में Pangong Tso की पेंटिंग

इससे पहले इसी महीने 16 दिसंबर को विजय दिवस से पहले सेना प्रमुख के कमरे से 1971 में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर वाली पेंटिंग हटा कर एक दूसरी पेंटिंग लगई गई थी। जिसकी काफी आलोचना भी हुई थी। बाद उस पेंटिंग को दिल्ली में मानेकशॉ सेंटर में स्थापित किया गया था। वहीं सेना प्रमुख के कमरे में लगााई गई नई पेंटिंग में पेंगोंग त्सो को दिखाया गया है। पेंटिंग बर्फ से ढकी पहाड़ियां पृष्ठभूमि में दिख रही हैं, दाएं ओर पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील और बाएं ओर गरुड़ा और श्री कृष्ण की रथ, साथ ही चाणक्य और आधुनिक उपकरण जैसे टैंक, ऑल-टेरेन व्हीकल्स, इन्फैंट्री व्हीकल्स, पेट्रोल बोट्स, स्वदेशी लाइट कॉम्बेट हेलीकॉप्टर्स और एच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर्स दिखाए गए हैं।

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नई पेंटिंग में माइथोलॉजिकल और फ्यूचरिस्टिक तत्वों का समावेश है। इसमें एक ऋषि, जिन्हें चाणक्य का रूप दिया गया है, आक्रोशित मुद्रा में आदेश देते हुए दिखाई देते हैं। उनके पीछे महाभारत का रथ, श्रीकृष्ण और अर्जुन का प्रतीक, और ऊपर गरुड़ जैसी संरचना नजर आती है।

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पेंटिंग के निचले हिस्से में आधुनिक सैन्य उपकरण जैसे T-90 टैंक, अपाचे हेलीकॉप्टर, ड्रोन और पैरा-कमांडो दर्शाए गए हैं। यह पेंटिंग भविष्य की सेना की तकनीकी क्षमताओं और आधुनिक युद्ध के लिए तैयार भारत का संदेश देने की कोशिश करती है।

सेना के सूत्रों ने कहा कि नई पेंटिंग, ‘कर्म क्षेत्र– कर्मों का क्षेत्र’, जिसे 28 मद्रास रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने बनाई है। इस पेंटिंग में सेना को एक “धर्म के रक्षक” के रूप में दर्शाया गया है, जो केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं बल्कि न्याय की रक्षा और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ती है।  यह पेंटिंग बताती है कि सेना तकनीकी रूप से कितनी एडवांस हो गई है।

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भारतीय सेना और भारत की सांस्कृतिक विरासत को मिलेगी मजबूती

सेना सूत्रों के मुताबिक भारत सरकार के वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम ने सीमावर्ती गांवों में तेजी से विकास किया है। अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के केरन सेक्टर जैसे क्षेत्रों में इस कार्यक्रम ने अच्छे परिणाम दिए हैं। यह पहल न केवल इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार कर रही है, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा दे रही है।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा और भगवान बुद्ध की मूर्तियों का अनावरण भारतीय सेना और भारत की सांस्कृतिक विरासत के बीच एक मजबूत संबंध को दर्शाता है। ये पहलें न केवल क्षेत्र में मनोबल बढ़ाने का काम करती हैं, बल्कि एकता, शांति और सांस्कृतिक मूल्यों को भी बढ़ावा देती हैं। यह प्रयास दिखाता है कि कैसे भारत अपनी सैन्य ताकत को सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जोड़कर एक सशक्त संदेश दे रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा और भगवान बुद्ध की मूर्तियां लद्दाख में न केवल मनोवैज्ञानिक ताकत का प्रतीक हैं, बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत की झलक भी प्रस्तुत करती हैं।

Trump Presidency 2.0: क्या ट्रंप 2.0 में ड्रग्स तस्करी की पाकिस्तानी साजिशों पर लगेगी लगाम? पाक सेना और ड्रग्स कार्टेल के राज खोलेगी ये किताब

Trump Presidency 2.0: Will Pakistani Drug Nexus Be Exposed?
"The Nukes, the Jihad, the Hawalas and Crystal Meth" Writer Iqbal Chand Malhotra

Trump Presidency 2.0: भले ही आज तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ है और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ अपने लड़ाकुओं को पाक-अफगान सीमा पर भेज रहा है। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब दोनों नशे के कारोबार में पूरी तरह से डूबे हुए थे और पूरी दुनिया को नशीले पदार्थों की सप्लाई कर रहे थे। जनवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रंप 2.0 शुरू होने से पहले, एक नई किताब ने अफगानिस्तान से नशीले पदार्थों की तस्करी पर अमेरिकी कार्रवाई और पाकिस्तानी सेना की साजिशों का पर्दाफाश किया है। इस किताब का नाम है ‘द न्यूक्स, द जिहाद, द हवाला और क्रिस्टल मेथ’ (‘The Nukes, the Jihad, the Hawalas and Crystal Meth’), जिसे लेखक इकबाल चंद मल्होत्रा ने लिखा है। किताब में खुलासा किया गया है कि कैसे पाकिस्तानी सेना ने तालिबान के साथ मिलकर क्रिस्टल मेथ की अवैध लैब को बचाने की साजिश रची, जबकि ट्रंप प्रशासन ने इन लैब्स को नष्ट करने का आदेश दिया था।

Trump Presidency 2.0: Will Pakistani Drug Nexus Be Exposed?
“The Nukes, the Jihad, the Hawalas and Crystal Meth” Writer Iqbal Chand Malhotra

Trump Presidency 2.0: अमेरिकी सेना का मिशन और पाकिस्तानी सेना की चालाकी

मल्होत्रा ने किताब में पेज संख्या 150 पर इस विषय पर एक चैप्टर भी लिखा है। ‘ऑपरेशन टेम्पेस्ट एंड द ट्रेचरी अराउंड नारकोटिक्स’ इसमें लिखा है कि पाकिस्तानी सेना ने क्रिस्टल मेथ लैब्स की सुरक्षा के लिए तालिबान को बचाने की कोशिश की, ताकि नशीले पदार्थों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार जारी रहे। इस दौरान, ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी वायुसेना (USAF) को इन लैब्स को नष्ट करने का आदेश दिया था। डायरेक्टोरेट एस की रणनीति यह थी कि तालिबान शहरों और उनके आसपास के इलाकों में अपनी गतिविधियों को तेज करे। इस रणनीति का उद्देश्य सुरक्षा बलों को ग्रामीण इलाकों से हटाकर शहरी इलाकों में केंद्रित करना था। ताकि तालिबान राजमार्गों पर कब्जा कर सके और शहरों को अलग-थलग कर सके। ताकि जनता में भय पैदा हो। लेकिन इस रणनीति की सफलता में एकमात्र बड़ा बाधा अमेरिकी वायुसेना (USAF) थी।”

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मल्होत्रा लिखते हैं कि ट्रंप ने अमेरिकी वायुसेना (USAF) को अफगानिस्तान के मादक पदार्थ उद्योग को निशाना बनाने का आदेश दिया था। “6 मई 2019 को, USAF ने “स्मार्ट म्यूनिशन” का इस्तेमाल करते हुए 68 मेथ लैब्स को बमबारी करके नष्ट कर दिया। ये सभी लैब्स फराह प्रांत के बक्वा जिले में स्थित थीं।”

Trump Presidency 2.0: एफेड्रा की खेती और नशीले पदार्थों का उत्पादन

किताब के अनुसार, 2018 से ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (DEA) ने देखा कि फराह और हेलमंद से व्यापारी पहाड़ियों के पास फसल खरीदने पहुंचते थे। “एपेड्रा की बढ़ती मांग ने इसके दाम 2017 से 2018 के बीच तीन गुना कर दिए। किसान एक दिन में 70 किलो एफेड्रा तक काट सकते थे, और गधों की मदद से वे प्रतिदिन $125 तक कमा सकते थे।”

किताब में यह भी कहा गया है कि एफेड्रा अफगानिस्तान के वारदक, गोर, हेलमंद, उरुज़गन और गजनी प्रांतों की पहाड़ियों में जंगली तौर पर उगता है। “गजनी के 15 गांवों से एक सीजन में लगभग 2,500 मीट्रिक टन फसल काटी जा सकती थी, जिससे 8 से 25 मीट्रिक टन मेथामफेटामिन तैयार किया जा सकता था।”

अमेरिकी कार्रवाई का असर और पाकिस्तानी सेना की चिंता

मल्होत्रा ने लिखा कि अमेरिकी वायुसेना के हमले के बाद नशीले पदार्थों का व्यापार अंडरग्राउंड हो गया। व्यापारियों ने खुले बाजार की जगह अपने घरों से कारोबार करना शुरू कर दिया। 2018 में बकवा बाजार में 450 ग्राम एफेड्रा की कीमत $284 थी। इस एफेड्रा से लगभग 12 किलो एफेड्रिन तैयार किया जा सकता था। इसके बाद एफेड्रिन को मेथ में बदलने के लिए केवल सामान्य रसायनों का उपयोग किया जाता है।

किताब में यह भी बताया गया है कि 2019 में अमेरिका में 1 किलो मेथ की कीमत $40,000 थी। “बकवा बाजार में तैयार 8 किलो मेथ की कीमत लगभग $2,500 थी, लेकिन अमेरिकी बाजार में इसकी कीमत $320,000 थी।”

मल्होत्रा बताते हैं कि 2019 तक अफगानिस्तान में मेथामफेटामिन की जब्ती 650 किलो तक पहुंच गई थी। “बक्वा जिले का अब्दुल वदूद बाज़ार एफेड्रा व्यापार का केंद्र था। 2018 में, 450 ग्राम एफेड्रा की कीमत $284 थी। इससे 12 किलो एफेड्रीन तैयार किया जा सकता था, जो 8 किलो 95% शुद्ध क्रिस्टल मेथ में बदल सकता था।”

डायरेक्टोरेट एस और नशीले पदार्थों का व्यापार

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के डायरेक्टरेट एस ने इस व्यापार को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। यह व्यापार तालिबान और मैक्सिकन ड्रग कार्टेल्स जैसे सिनालोआ और सीजेजीएनजी के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।

किताब में दावा किया गया है कि अमेरिकी हमलों के बावजूद नशीले पदार्थों का यह व्यापार जारी रहा। 2010 में जब पहली बार मेथ जब्त की गई, तो यह मात्रा केवल कुछ किलो थी। लेकिन 2018 तक यह बढ़कर 180 किलो हो गई। 2019 के पहले छह महीनों में यह मात्रा रिकॉर्ड 650 किलो तक पहुंच गई।

पाकिस्तानी सेना की साजिश

मल्होत्रा ने लिखा कि पाकिस्तानी सेना ने इस व्यापार को जारी रखने के लिए तालिबान और स्थानीय व्यापारियों को सुरक्षा मुहैया कराई। उन्होंने यह भी दावा किया कि आईएसआई ने नशीले पदार्थों की सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए। उन्होंने कहा कि “डायरेक्टरेट एस के लिए नशीले पदार्थों के व्यापार को बचाना इतना महत्वपूर्ण था कि इसने अपने पूरे नेटवर्क का इस्तेमाल किया।”

अफगानिस्तान का क्रिस्टल मेथ व्यापार और अमेरिकी रणनीति

मल्होत्रा ने यह भी बताया कि अफगानिस्तान में नशीले पदार्थों का व्यापार अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। ट्रंप प्रशासन ने इसे रोकने के लिए कई कदम उठाए, लेकिन पाकिस्तानी सेना और तालिबान की साजिशों के कारण इसमें पूरी सफलता नहीं मिली।

ट्रंप 2.0 में नशीले पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई का वादा

डोनाल्ड ट्रंप ने 2024 के चुनाव प्रचार में एक बार फिर से नशीले पदार्थों के व्यापार को खत्म करने का वादा किया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी दूसरी पारी में इस मुद्दे पर क्या कार्रवाई होती है। ‘द न्यूक्स, द जिहाद, द हवाला और क्रिस्टल मेथ’ नामक इस किताब ने पाकिस्तान की साजिशों और अमेरिकी रणनीतियों के बीच चल रहे Tug of War को बेहतरीन तरीके से उजागर किया है।

China-India Talks: बड़ा खुलासा! भारत-चीन वार्ता से पहले भाजपा के इस थिंकटैंक ने किया था बीजिंग का सीक्रेट दौरा, कूटनीतिक संबंधों की बहाली को लेकर की थी बात

China-India Talks: BJP Think Tank India Foundation Secret Beijing-lhasa Visit
A Delegation From India Foundation Visits Tibetan Parliament-in-Exile

China-India Talks: भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार और ट्रैक-2 की डिप्लोमेसी को फिर से शुरू करने के लिए देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के एक थिंक टैंक ने हाल ही में चीन का दौरा किया था। यह दौरा बिल्कुल गुपचुप किया गया था और किसी को इस दौरे की कानोंकान खबर तक नहीं लगी। यह दौरा देशों के नेताओं और विशेष प्रतिनिधियों डोभाल और वांग यी के बीच हुई बैठक से पहले हुआ था, जिसमें पूर्वी लद्दाख में तनाव को कम करने और डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को लेकर बातचीत की गई थी। इसके बाद ये प्रतिनिधिमंडल धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार के सदस्यों से भी मिला था।

China-India Talks: BJP Think Tank India Foundation Secret Beijing-lhasa Visit
A Delegation From India Foundation Visits Tibetan Parliament-in-Exile

China-India Talks: शंघाई और ल्हासा में संवाद

सूत्रों ने बताया कि भारत और चीन के बीच बढ़ते तनाव के बीच ट्रैक-2 डिप्लोमेसी को फिर से शुरू करने के लिए नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल हाल ही में चीन गया था। यह दौरा नवंबर के आखिर में हुआ था, जो पहले फुदान गया और बाद में वहां से ल्हासा। सूत्रों के मुताबिक इस दौरे का मकसद दोनों देशों के बीच संवाद को बढ़ावा देना और आपसी विश्वास बहाल करना था। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष और भाजपा नेता राम माधव के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल पहले शंघाई गया। यह यात्रा शंघाई के फ़ुदान विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर हुई, जिसके साथ इंडिया फाउंडेशन का नियमित संवाद होता है। इसके बाद, प्रतिनिधिमंडल ल्हासा (तिब्बत) पहुंचा, जिसका नेतृत्व इंडिया फाउंडेशन के निदेशक कैप्टन आलोक बंसल ने किया था।

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इंडिया फाउंडेशन के सूत्रों ने बताया, “यह दौरा डायलॉग ऑन चाइना-इंडिया रिलेशंस के दूसरे चरण का हिस्सा था। पहला चरण शंघाई के फ़ुदान विश्वविद्यालय में हुआ था। यह हर साल आयोजित होने वाला संवाद है। पिछले साल चीन से एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भारत आया था, और इस बार हमारी बारी थी।” उन्होंने यह भी कहा कि इस बार ल्हासा का दौरा भी संभव हो सका, हालांकि काशगर जाने की योजना पूरी नहीं हो पाई। इस प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ राजनयिक अशोक के. कंथा, पूर्व भारतीय राजदूत, थिंक टैंक से जुड़ी सोनू त्रिवेदी, सीनियर रिसर्च फेलो सिद्धार्थ सिंह शामिल थे।

वहीं, चीन के एक अखबार ने भी इस यात्रा की पुष्टि की। उसमें बताया गया, “हाल ही में इंडिया फाउंडेशन का एक थिंक टैंक प्रतिनिधिमंडल चीन आया और उन्होंने ल्हासा का दौरा भी किया।”

भारत लौटने के बाद, इंडिया फाउंडेशन के प्रतिनिधिमंडल ने धर्मशाला में तिब्बती निर्वासित सरकार (CTA) के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस बैठक का नेतृत्व पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने किया।

China-India Talks: भारत-चीन संबंधों में ऐसे हो सकता है सुधार

इंडिया फाउंडेशन के इस दौरे बाद फ़ुदान यूनिवर्सिटी के साउथ एशियन स्टडीज सेंटर के निदेशक झांग जियाडोंग ने चीनी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में लिखा कि भारत और चीन जैसे दो शक्तिशाली और महत्वपूर्ण देशों के बीच यह स्थिति चिंताजनक है।

उन्होंने कहा, “इन दोनों देशों के बीच आपसी समझ में अस्पष्टता और असमंजस की स्थिति बनी हुई है, जो केवल अधिक से अधिक सांस्कृतिक और आपसी संवाद के माध्यम से कम किया जा सकता है।” झांग जियाडोंग ने कहा कि इन दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और लोगों के बीच संपर्क अब भी बहुत सीमित है।

China-India Talks: सांस्कृतिक और आपसी संवाद की कमी

झांग जियाडोंग का मानना है कि हिमालयी सीमा पर लंबे समय तक तनाव और विवाद के चलते दोनों देशों के बीच संवाद की कमी और आपसी विश्वास में कमी आई है। यह स्थिति आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए बाधा बन रही है। झांग के अनुसार, “ट्रैक-2 डिप्लोमेसी” जैसे गैर-सरकारी संवादों के माध्यम से दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।

झांग ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अभी भी कमी है। 2019-2020 शैक्षणिक वर्ष के दौरान लगभग 20,000 भारतीय छात्र चीन में अध्ययन कर रहे थे। लेकिन गलवान घाटी संघर्ष के बाद यह संख्या लगभग शून्य तक पहुंच गई। 2021-2022 में यह संख्या 8,580 हो गई, जबकि 2023-2024 में घटकर 6,500 रह गई।

वहीं, भारत में पढ़ने वाले चीनी छात्रों की संख्या और भी कम है। 2020-2021 में यह संख्या 166 थी, जो 2023-2024 में केवल 25 रह गई।

कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसे कार्यक्रम फिर से शुरू हों

सीमा विवाद और कोविड-19 महामारी के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा अब तक बहाल नहीं हो पाई है। यह यात्रा हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक पवित्र तीर्थ यात्रा है, जिसमें वे तिब्बत के माउंट कैलाश और माप्हम युम्त्सो झील की परिक्रमा करते हैं।

झांग ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों को फिर से शुरू करने से दोनों देशों के बीच आपसी समझ और विश्वास को बढ़ावा मिलेगा।

ट्रैक-2 डायलॉग और भविष्य की दिशा

झांग ने कहा कि बीजिंग और नई दिल्ली दोनों ही रुकी हुई बातचीत को फिर से शुरू करने के प्रयास कर रहे हैं। नवंबर 2020 के बाद पहली बार भारत में ट्रैक-2 संवाद आयोजित किया गया था। लेकिन छात्रों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे अन्य आदान-प्रदान अभी भी अपेक्षाकृत धीमी गति से बहाल हो रहे हैं। झांग ने कहा कि चीन और भारत को इन क्षेत्रों में पिछड़ेपन को दूर करने के लिए तेजी से कदम उठाने चाहिए।

कोविड-19 महामारी के दौरान बंद हुई भारत-चीन के बीच सीधी उड़ानें अब भी बहाल नहीं हुई हैं। झांग के अनुसार, उड़ानों को फिर से शुरू करना दोनों देशों के बीच यात्रा और आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करेगा।

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तिब्बती निर्वासित संसद का दौरा

इंडिया फाउंडेशन के प्रतिनिधिमंडल ने 9 दिसंबर को धर्मशाला स्थित तिब्बती निर्वासित संसद का दौरा किया। उन्होंने संसद के अध्यक्ष खेनपो सोनम टेनफेल और उपाध्यक्ष डोलमा त्सेरिंग तेयखांग से मुलाकात की। इस प्रतिनिधिमंडल में सुरेश प्रभु, लेफ्टिनेंट जनरल अरुण कुमार सहनी,  शौर्य डोभाल, अशोक मलिक, प्रोफेसर सुनीना सिंह, कैप्टन आलोक बंसल, रामी देसाई, न्गावांग गामत्सो हार्डी और चित्रा शेखावत शामिल थे। इस बैठक में कहा गया कि CTA तिब्बतियों का वैध प्रतिनिधि है। तिब्बत की स्वतंत्रता और उसके पड़ोसी देशों के साथ ऐतिहासिक कूटनीतिक संबंधों और वन-चाइना नीति पर पुनर्विचार करने को लेकर बातचीत हुई।

भारत-चीन संबंधों में सुधार

इससे पहले 18 दिसंबर को भारत और चीन के बीच विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता की पुनः शुरुआत हुई। इस बैठक में दोनों देशों ने सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने समेत छह बिंदुओं पर सहमति जताई। इन बिंदुओं में कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, सीमा पार नदियों पर डाटा साझाकरण, और सीमा व्यापार का फिर से शुरू होना शामिल था।

इससे पहले, नवंबर में जी20 बैठक के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ब्राजील में अपने चीनी समकक्ष से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिति बहाल करने और अगले कदम उठाने पर सहमति जताई। वहीं, अक्टूबर में कज़ान, रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक ने संबंधों में सुधार नींव डाली थी।

मोदी ने शी जिनपिंग से कहा था, “हमारे संबंधों का आधार आपसी विश्वास, आपसी सम्मान और आपसी संवेदनशीलता होना चाहिए। आज हमें इन सभी मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने का अवसर मिला है। मुझे विश्वास है कि हमारी बातचीत रचनात्मक होगी।”

सीमा पर घटा तनाव

21 अक्टूबर को भारत और चीन ने पेट्रोलिंग पर सहमति जताई थी, जिसके तहत पूर्वी लद्दाख में देमचोक और देपसांग क्षेत्रों में नियंत्रण रेखा (LAC) पर गश्त की अनुमति दी गई। हाल ही में दोनों सेनाओं ने दीवाली के अवसर पर मिठाइयों का आदान-प्रदान भी किया। बता दें कि वर्तमान में, दोनों देशों के लगभग 1,00,000 सैनिक सीमा पर तैनात हैं। जून 2020 में गलवान संघर्ष के बाद भारत ने पूर्वी लद्दाख में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी थी, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे।

OROP Update: वन रैंक, वन पेंशन योजना पर आया बड़ा अपडेट, सेना मुख्यालय ने अतिरिक्त पेंशन और पेंशन कटौती पर दिया ये जवाब

Commutation of Pension: How the 15-year restoration period is under scrutiny, veterans seek reduction to 12 years
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OROP Update: भारतीय सेना के पेंशनरों और पूर्व सैनिकों के लिए वन रैंक वन पेंशन (OROP) योजना हमेशा से चर्चा में रही है। इस योजना के तहत समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले पेंशनरों को समान पेंशन मिलनी चाहिए। हाल ही में इंडियन एक्स-सर्विसेस लीग (IESL) के अध्यक्ष ब्रिगेडियर इंद्रमोहन सिंह (सेवानिवृत्त) ने OROP से जुड़ी विसंगतियों पर सवाल उठाए। उनके इन सवालों के जवाब में सेना मुख्यालय ने 12 दिसंबर 2024 को एक विस्तृत पत्र जारी किया।

OROP Update: Key Clarifications on Additional Pension and Deductions by Army HQ
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OROP की परिभाषा और विसंगतियां

ब्रिगेडियर सिंह ने OROP के तहत पेंशन निर्धारण के तरीके पर सवाल उठाए। सेना मुख्यालय ने जवाब में कहा कि OROP का उद्देश्य समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले पेंशनरों को समान पेंशन देना है, चाहे उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख कोई भी हो।

OROP Supreme Court: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया- इन रिटायर्ड कर्मियों को OROP के तहत नहीं मिलेगी बढ़ी हुई पेंशन!

हालांकि, सरकार ने 7 नवंबर 2015 को एक पत्र जारी कर पेंशन को औसत (average) के आधार पर तय करने की बात कही। यह फैसला OROP की मूल भावना से अलग था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2022 में इसे वैध ठहराया। इस बदलाव से OROP अब “वन रैंक, फाइव पेंशन” जैसी स्थिति में बदल गया है, जहां समान रैंक के पेंशनरों को अलग-अलग राशि मिल सकती है।

OROP-3: नई पेंशन दरें और संशोधन

OROP-3 का रिवीजन 1 जुलाई 2024 से लागू किया गया। इसके तहत कुल 121 पेंशन सूचियां जारी की गईं, जिनमें रैंक और सेवा अवधि के आधार पर नई पेंशन दरें दी गईं। सेना मुख्यालय के अनुसार, 01 जुलाई 2024 को इन आदेशों के अनुसार संशोधित पेंशन, 01 जुलाई 2024 को मौजूदा पेंशन/पारिवारिक पेंशन से कम होती है, पेंशन को पेंशनभोगी/पारिवारिक पेंशनभोगी के नुकसान के लिए संशोधित नहीं किया जाएगा। अगले OROP संशोधन 01 जुलाई 2029, 2034 और हर पांच साल बाद किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में कुल तीन बार पेंशन दरों में सुधार होगा। OROP के लाभ के अलावा वेतन का लाभ भी दिया जाएगा। इस योजना के तहत पेंशन में कमीशन भी दिया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत अगले 10 वर्षों में पेंशनरों को तीन बार पेंशन में बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा।

One Rank One Pension: OROP-3 में पेंशन विसंगतियों से नाराज हैं सेवानिवृत्त सैन्य कर्मी, 401 JCOs ने रक्षा मंत्रालय और नेवी चीफ को भेजा कानूनी नोटिस

OROP Update: 80 वर्ष की आयु पर अतिरिक्त पेंशन

OROP के तहत, 80 वर्ष की आयु पूरी करने पर पेंशन में मूल पेंशन का 20 फीसदी अतिरिक्त दिया जाता है। यह लाभ 85, 90, 95 और 100 वर्ष की आयु पर क्रमशः 30%, 40%, 50% और 100% तक बढ़ जाता है।

हालांकि, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 79 वर्ष पूरे होने पर ही अतिरिक्त पेंशन देने का आदेश दिया था। इस पर रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय न्यायालय विशेष है और इसके लिए केंद्रीय स्तर पर नीति तय की जाएगी। पेंशन संबंधी मामलों के नोडल विभाग होने के नाते इस मामले को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग और पेंशनभोगी कल्याण विभाग के साथ विचार-विमर्श के लिए भेजा गया है। रक्षा मंत्रालय ने यह भी सूचित किया है कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की टिप्पणी प्राप्त होने के बाद ही इस मामले पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

OROP Update: पेंशन कटौती

पेंशन के कम्यूटेड मूल्य की कटौती 15 वर्षों के बाद बहाल की जाती है। यह नीति सुप्रीम कोर्ट के 1986 के फैसले पर आधारित है। वर्तमान में इसे 12 वर्षों में बहाल करने का कोई प्रावधान नहीं है।

12 वर्षों के बाद पेंशन के कम्यूटेड मूल्य को बहाल करने की याचिका के आधार पर, एएफटी (पीबी) नई दिल्ली ने 24 जुलाई 2024 के अपने आदेश के माध्यम से निर्देश दिया था कि 12 वर्षों के बाद पेंशन की वसूली पर रोक लगाई जाए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 12 वर्षों के बाद पेंशन कटौती को बहाल करने के एक आदेश पर रोक लगा दी है। रक्षा मंत्रालय इस पर उचित कार्रवाई के लिए विचार कर रहा है।

स्पर्श (SPARSH) प्रणाली: पेंशन वितरण में पारदर्शिता

वहीं, स्पर्श को लेकर सेना मुख्यालय ने जवाब दिया कि स्पर्श प्रणाली को अगस्त 2021 में लागू किया गया, ताकि पेंशन वितरण को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जा सके। हालांकि, शुरुआती चरण में तकनीकी समस्याओं के कारण पेंशनभोगियों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सेना मुख्यालय ने बताया कि इन समस्याओं के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं। जैसे स्पर्श की दिक्कतों को दूर करने के लिए टीसीएस की एक टीम पीसीडीए (पी) कार्यालय में तैनात की गई है। रक्षा मंत्रालय, सीजीडीए और टीसीएस के साथ लगातार नियमित समीक्षा बैठकें हो रही हैं। वहीं, मेरठ और चेन्नई में स्पर्श संबंधित मामलों के समाधान के लिए समस्या समाधान केंद्र बनाए गए हैं।

OROP की समीक्षा प्रक्रिया और चुनौतियां

OROP को लेकर सरकार और पेंशनरों के बीच लगातार चर्चा और असहमति बनी रहती है। पेंशनरों का कहना है कि OROP के तहत सभी को समान लाभ मिलना चाहिए, जबकि सरकार का दृष्टिकोण औसत (average) आधारित है।

OROP को लागू करने में मुख्य चुनौती इसके वित्तीय बोझ की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि OROP को मूल रूप में लागू किया जाता है, तो इससे सरकार पर भारी वित्तीय दबाव पड़ेगा।

Bangladesh Terrorism: बांग्लादेश के बंदरगाह से 70 प्रशिक्षित पाकिस्तानी आतंकवादी हुए लापता! ‘हिट एंड रन’ हमलों की साजिश का हुआ खुलासा

Bangladesh Terrorism: 70 Pakistani Terrorists Vanish in Bangladesh; 'Hit-and-Run' Plot Exposed
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Bangladesh Terrorism: जनवरी 2025 में ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पहले ही पाकिस्तान चाहता है कि बांग्लादेश को आतंकवाद का गढ़ बना कर उसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए। क्योंकि उसे पता है कि जैसे ही अमेरिका की सत्ता में डॉनल्ड ट्रंप की वापसी होगी, वैसे ही बांग्लादेश में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और वह चाह कर भी बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति में कुछ ज्यादा हासिल नहीं कर पाएगा। इसलिए उससे पहले ही पाकिस्तान की कोशिश है कि बांग्लादेश को आतंकवाद का अड्डा बना दिया जाए, जिसका बाद में इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जाए। हाल ही में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। पाकिस्तान ने एक मालवाहक जहाज से 70 से ज्यादा प्रशिक्षित आतंकियों को बांग्लादेश भेजा था और ये सभी आतंकी कुछ देर बाद ही रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। खुफिया सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान, रोहिंग्या शरणार्थियों का इस्तेमाल कर बांग्लादेश में जमात-उल-मुजाहिदीन (JMB) को सक्रिय करने की कोशिशों में भी जुटा है।

Bangladesh Terrorism: 70 Pakistani Terrorists Vanish in Bangladesh; 'Hit-and-Run' Plot Exposed
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खुफिया सूत्रों ने बताया कि 13 नवंबर को कराची से आए एक कार्गो जहाज से 70 “अज्ञात पाकिस्तानी नागरिक” चटगांव बंदरगाह उतारे गए। ये सभी व्यक्ति कुछ ही घंटों में बिना किसी दस्तावेज़ और ट्रेस के गायब हो गए। इस घटना ने न केवल बांग्लादेश के सुरक्षा अधिकारियों, बल्कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को भी चिंतित कर दिया है।

Bangladesh Terrorism: चीनी नाम और पनामा का झंडा

इस जहाज का नाम “युआन जियांग फा झान” था, जो एक चीनी नाम है, और यह पनामा के झंडे के नीचे संचालित हो रहा था। इस जहाज पर 70 “अनजान पाकिस्तानी नागरिक” मौजूद थे, जिनकी मौजूदगी के बारे में न तो बांग्लादेशी सुरक्षा अधिकारियों को पहले से कोई जानकारी दी गई थी और न ही पोर्ट अधिकारियों को।

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Bangladesh Terrorism: पाकिस्तानी मिशन का हाथ

सूत्रों के अनुसार, इन पाकिस्तानी नागरिकों को बांग्लादेश में पाकिस्तानी मिशन के आदेश के बाद गायब किया गया। बांग्लादेशी कस्टम अधिकारियों ने जब इन लोगों से उनके यात्रा दस्तावेज और पहचान पूछने का प्रयास किया, तो उन्हें एक प्रभावशाली सलाहकार के आदेश पर तुरंत दूसरी जगह पर स्थानांतरित कर दिया गया। यह सलाहकार नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस से जुड़े बताए जाते हैं।

सूत्रों ने बताया कि जहाज पर मौजूद सामग्री को पाकिस्तानी कर्मियों की निगरानी में उतारा गया, और बांग्लादेशी अधिकारियों को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी गई।

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आतंकवादी संगठन और आईएसआई का हाथ

खुफिया सूत्रों के अनुसार, गायब हुए पाकिस्तानी नागरिक विभिन्न आतंकवादी संगठनों से जुड़े हुए थे। उन्हें पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) की देखरेख में प्रशिक्षित किया गया था। इन आतंकवादियों को खासतौर पर भारत में प्रवेश करने और वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए बांग्लादेश भेजा गया है।

रोहिंग्या का आतंकवाद में इस्तेमाल

सूत्र बताते हैं कि पाकिस्तान अब रोहिंग्या मुसलमानों का इस्तेमाल करके जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) को सक्रिय करने की योजना बना रहा है। खासकर उत्तर बांग्लादेश में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी (BJI) के माध्यम से इस साजिश को अंजाम देने की तैयारी है।

इस जहाज के जरिए कराची से चटगांव तक भेजे गए हथियार और आरडीएक्स का उपयोग उत्तर बांग्लादेश में ट्रेनिंग शिविर स्थापित करने के लिए किया जा सकता है। यह भी संभावना जताई जा रही है कि इन सामग्रियों का इस्तेमाल बांग्लादेश और भारत में बड़े आतंकवादी हमलों के लिए किया जाएगा।

सूत्रों ने यह भी बताया कि पाकिस्तान की आईएसआई ने बांग्लादेश के चटगांव डिवीजन के बंदरबन जिले के नाइकोंगछड़ी में रोहिंग्याओं को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, त्रिपुरा से सटे ब्राह्मणबरिया जिले और मेघालय की सीमा से सटे सिलहट जिले के खादिमनगर नेशनल पार्क के अंदर इस्लामी आतंकी समूहों को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

पत्रकारों और पूर्व एनएसजी अधिकारी को निशाना बनाने की साजिश

खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, अंसारुल बांग्ला टीम के सदस्य भारत में आरएसएस और हिंदू नेताओं, पत्रकारों और सुरक्षा कर्मियों को निशाना बनाकर सीमा-पार “हिट एंड रन” हमलों की योजना बना रहे हैं। लक्ष्यों में पूर्व एनएसजी अधिकारी और रिपब्लिक टीवी, ज़ी न्यूज़, और आज तक के पत्रकार शामिल बताए गए हैं।

इसके अलावा, एबीटी और जेएमबी (जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश) की सेल्स, एक्यूआईएस (अल-कायदा इन इंडियन सबकांटिनेंट) के निर्देश पर, मंदिरों, चर्चों, होटलों और औद्योगिक परियोजनाओं पर हमलों की तैयारी कर रहे हैं। इनमें अदानी समूह की परियोजनाएं भी शामिल हैं। रोहिंग्या जिहादियों की भारत में घुसपैठ इस खतरे को और बढ़ा रही है, जिसमें आईएसआई इन नेटवर्क्स का इस्तेमाल करके क्षेत्रीय अस्थिरता के अपने एजेंडे को लागू कर रहा है।

बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी शिविर कट्टरपंथ के केंद्र बन गए हैं। खुफिया सूत्रों के अनुसार, एक्यूआईएस और आईएसआई के ऑपरेटिव इन शिविरों से सक्रिय रूप से भर्ती कर रहे हैं, रोहिंग्या जिहादियों को हथियार और वित्तीय मदद भी दे रहे हैं। इन समूहों पर आरोप है कि वे अराकान आर्मी पर हमले करके क्षेत्र पर फिर से नियंत्रण स्थापित करने की योजना बना रहे हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस घटना से बेहद चिंतित हैं। चटगांव से इन प्रशिक्षित आतंकवादियों का गायब होना, और उनका बिना किसी कागजात के बांग्लादेश में प्रवेश करना, भारत के लिए एक गंभीर सुरक्षा खतरा बन सकता है।पाकिस्तान के आतंकी संगठन अब नए तरीके अपनाकर दक्षिण एशिया में अशांति फैलाने की योजना बना रहे हैं। आतंकवादियों को बांग्लादेश में सक्रिय करके और वहां से भारत में भेजकर, पाकिस्तान भारत की सुरक्षा को चुनौती देना चाहता है।

UPDIC: तालों के लिए प्रसिद्ध अलीगढ़ में अब बनेंगे टैंकों के लिए गोला-बारूद और हथियार, बना भारत का डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब

UPDIC: Aligarh Turns Hub for Tank Ammo and Weapons Manufacturing in India
Invest UP CEO Abhishek Prakash

UPDIC: उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (UPDIC) ने रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ी प्रगति की है। उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (यूपीडीआईसी) ने देश की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को मजबूती देने के लिए छह प्रमुख नोड्स—कानपुर, झांसी, लखनऊ, अलीगढ़, आगरा और चित्रकूट बनाए हैं। इनमें से, अलीगढ़ नोड अब 3421 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों के साथ एक प्रमुख रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है।

UPDIC: Aligarh Turns Hub for Tank Ammo and Weapons Manufacturing in India
Invest UP CEO Abhishek Prakash

UPDIC: डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में अलीगढ़ की महत्वपूर्ण भूमिका

अलीगढ़ में 86.87 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया है, जिसमें से 64.01 हेक्टेयर भूमि विभिन्न रक्षा कंपनियों को आवंटित की जा चुकी है। यह स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

इस क्षेत्र ने कई बड़ी रक्षा कंपनियों को आकर्षित किया है, जो आधुनिक तकनीक और उपकरणों के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं। एंकर रिसर्च लैब्स जैसी कंपनियां ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सेंसर और रेडियो डायरेक्शन फाइंडर जैसे एडवांस सिस्टम का उत्पादन कर रही हैं।

UPDIC: कानपुर बना उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर का हब, मिले 12,800 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव
एंकर रिसर्च लैब्स: यह कंपनी 550 करोड़ रुपये के निवेश से ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सेंसर, रेडियो डायरेक्शन फाइंडर और परीक्षण परिसर का निर्माण कर रही है। यह परियोजना आधुनिक तकनीक और स्वदेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है।
एमीटेक इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड: यह अग्रणी कंपनी 330 करोड़ रुपये के निवेश से इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, सैटेलाइट स्पेसपोर्ट और टैक्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम का उत्पादन कर रही है। कंपनी ने उत्पादन शुरू कर दिया है और यह रक्षा क्षेत्र में बड़ा योगदान दे रही है।
ओशो कॉर्प ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड: इस कंपनी ने 250 करोड़ रुपये का निवेश कर एडवांस टेक सॉल्यूशन यूनिट स्थापित की है। यह यूनिट आधुनिक रक्षा तकनीक और समाधान प्रदान करने के लिए काम कर रही है।
प्रशांत एंटरप्राइजेज: 200 करोड़ रुपये के निवेश से यह कंपनी मीडियम-कैलिबर गोला-बारूद के लिए उपकरणों और शैल का निर्माण करेगी।
एसएमपीपी प्राइवेट लिमिटेड: यह कंपनी टैंक और तोप के गोला-बारूद के उत्पादन के लिए 200 करोड़ रुपये का निवेश करेगी।
त्रिवेणी इंजीनियरिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड: यह कंपनी प्रोपल्शन गियरबॉक्स और सहायक पावर गैस टर्बाइन के निर्माण के लिए 200 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है।
एक्सपो मशीन टूल्स प्राइवेट लिमिटेड: 100 करोड़ रुपये के निवेश के साथ यह कंपनी कार्बन कंपोजिट, सिरेमिक मैट्रिक्स कंपोजिट और मिसाइल तथा लड़ाकू विमान के लिए घटकों का निर्माण कर रही है।
जय साईं अनु ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड: यह कंपनी 100 करोड़ रुपये के निवेश के साथ एक प्रिसिशन कंपोनेंट निर्माण इकाई स्थापित कर रही है।

UPDIC: Aligarh Turns Hub for Tank Ammo and Weapons Manufacturing in India

UPDIC: अन्य प्रस्तावित परियोजनाएं

होराइजन एयरोस्पेस (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड: यह कंपनी फाइटर एयरक्राफ्ट सस्टेनमेंट सेंटर और सबसिस्टम निर्माण के लिए 150 करोड़ रुपये का निवेश करेगी।
सक्सेना मरीन टेक प्राइवेट लिमिटेड: यह कंपनी युद्धपोत और वाहनों के निर्माण के लिए 150 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है।
सिंडिकेट इनोवेशन इंटरनेशनल लिमिटेड: यह कंपनी छोटे हथियारों और गोला-बारूद के निर्माण के लिए 150 करोड़ रुपये का निवेश करेगी।
स्पाइसजेट प्राइवेट लिमिटेड: यह कंपनी 125 करोड़ रुपये के निवेश से एक रक्षा रखरखाव, मरम्मत और संचालन (एमआरओ) इकाई स्थापित करने की योजना बना रही है।

इन्वेस्ट यूपी के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर अभिषेक प्रकाश ने कहा, “अलीगढ़ उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और शैक्षणिक केंद्र है। यह उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे (यूपीडीआईसी) में एक प्रमुख नोड के रूप में उभर रहा है।”

उन्होंने आगे कहा, “अलीगढ़ की सफलता, क्षेत्र की अपार क्षमता को दर्शाती है। अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे और अनुकूल व्यावसायिक माहौल ने इस नोड को मजबूत किया है। 3,421 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव और प्रमुख कंपनियों के संचालन ने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास पहचान दी है।”

UPDIC: यूपी डिफेंस कॉरिडोर की विशेषताएं

यूपीडीआईसी की स्थापना आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत की गई थी। इसका उद्देश्य रक्षा उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। कानपुर, झांसी, लखनऊ, अलीगढ़, आगरा और चित्रकूट जैसे नोड्स ने अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाई हैं, लेकिन अलीगढ़ का प्रदर्शन इसे सबसे अलग बनाता है। अलीगढ़ की सफलता ने अन्य नोड्स के लिए एक प्रेरणा का काम किया है। आधुनिक तकनीक, कुशल मानव संसाधन और अनुकूल नीति माहौल ने अलीगढ़ को देश का एक अग्रणी रक्षा उत्पादन केंद्र बना दिया है।

अलीगढ़ में हो रहे रक्षा निवेश से न केवल क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि यह भारत की रक्षा क्षमता को भी मजबूत कर रहा है। यह कदम उत्तर प्रदेश को देश का रक्षा विनिर्माण हब बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रहा है।

यूपी सरकार की अहम भूमिका

यूपी सरकार का “विकसित भारत” विज़न इस डिफेंस कॉरिडोर परियोजना का मूल आधार है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में राज्य सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कई पहलें की हैं। राज्य सरकार ने औद्योगिक नीति में सुधार करते हुए न केवल भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को तेज किया, बल्कि उद्योगों के लिए टैक्स लाभ और बिजली सब्सिडी जैसी सुविधाएं भी प्रदान की हैं।

वहीं भारत सरकार के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत अलीगढ़ नोड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रक्षा उत्पादन के लिए स्वदेशीकरण पर जोर देकर, यह नोड न केवल भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत कर रहा है, बल्कि आयात पर निर्भरता भी कम कर रहा है। अलीगढ़ नोड में स्थापित हो रही नई औद्योगिक इकाइयों से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के बड़े अवसर खुल रहे हैं। कंपनियां न केवल विशेषज्ञों को रोजगार दे रही हैं, बल्कि स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम के जरिए स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित भी कर रही हैं।

Abdul Rehman Makki: मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड मक्की की हार्ट अटैक से हुई मौत, डायबिटीज का चल रहा था इलाज

Abdul Rehman Makki: Mumbai Attack Mastermind Dies of Heart Attack Amid Diabetes Treatment
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Abdul Rehman Makki: मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड और प्रतिबंधित संगठन जमात-उद-दावा (JuD) का डिप्टी चीफ हाफिज अब्दुल रहमान मक्की की शुक्रवार को लाहौर में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। मक्की लश्कर-ए-तैयबा का शीर्ष नेता और कमांडर था और भारत में हुईं आतंकवादी गतिविधियों में उसकी सक्रिय भूमिका थी।

Abdul Rehman Makki: Mumbai Attack Mastermind Dies of Heart Attack Amid Diabetes Treatment
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Abdul Rehman Makki: मुंबई हमलों का षड्यंत्रकारी

मक्की आतंकी हाफिज सईद का करीबी था और 2008 में मुंबई हमलों की योजना बनाने में शामिल रहा था। इन हमलों में 166 लोगों की मौत हुई थी। मक्की का नाम कई बड़े आतंकी हमलों की साजिशों में भी सामने आया था।

मक्की, जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद का बहनोई था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मक्की को आतंकवाद से संबंधित गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित किया गया था। जमात-उद-दावा के एक अधिकारी ने बताया कि मक्की पिछले कुछ दिनों से बीमार था और उसे लाहौर के एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया था। उसका डायबिटीज का इलाज चल रहा था और आज सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत हो गई।

China in Pakistan: पाकिस्तान में CEPC प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा को लेकर चीन कर रहा बड़ी तैयारी, अपने नागरिकों पर हमले रोकने के लिए तैनात करेगा चीनी सैनिक

2020 में, एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने मक्की को आतंकवाद के फंडिंग  के आरोप में छह महीने की सजा सुनाई थी। इसके बाद से वह लो प्रोफाइल हो गया था और सार्वजनिक तौर पर ज्यादा सक्रिय नहीं था।

हालांकि, मक्की की आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा में सक्रिय नेतृत्व और संगठनात्मक भूमिका बनी रही। उसकी गतिविधियों के चलते पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच दबाव का माहौल बना रहा।

2023 में, संयुक्त राष्ट्र ने मक्की को एक वैश्विक आतंकवादी घोषित किया, जिसके तहत उसकी संपत्तियां फ्रीज कर दी गईं थी, और यात्रा पर प्रतिबंध लगाया गया था।  और हथियारों पर प्रतिबंध लागू किया गया। यह कार्रवाई उनके आतंकवादी नेटवर्क को कमजोर करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।

पाकिस्तान मुताहिदा मुस्लिम लीग (PMML) ने मक्की को “पाकिस्तान की विचारधारा का समर्थक” बताया।

Abdul Rehman Makki: भारत में कई आतंकी हमलों में हाथ

अब्दुल रहमान मक्की का नाम भारत में कई बड़े आतंकी हमलों से जुड़ा हुआ है। 2000 में लाल किले पर हुए हमले की साजिश में भी मक्की का हाथ माना जाता है। इसके अलावा, रामपुर आतंकी हमला, 2018 में श्रीनगर में हुए अटैक और बारामूला के हमलों में भी मक्की की भूमिका थी।

30 मई 2018 को बारामूला में हुए आतंकी हमले में तीन निर्दोष नागरिकों की जान गई थी। वहीं, श्रीनगर में एक अन्य हमले के दौरान वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी और उनके दो सहयोगियों की हत्या कर दी गई थी। ये सभी हमले लश्कर-ए-तैयबा द्वारा अंजाम दिए गए थे, जिसमें मक्की की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

गौरतलब है कि लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक और मक्की का साला हाफिज सईद है, जिसने इन आतंकी गतिविधियों को संचालित करने में अहम भूमिका निभाई। मक्की लंबे समय तक लश्कर-ए-तैयबा का हिस्सा था और भारत में आतंक फैलाने के लिए सक्रिय रहा। ये घटनाएं उसकी आतंकी गतिविधियों और योजनाओं की स्पष्ट तस्वीर पेश करती हैं।

पाकिस्तान की आतंकवाद नीति पर सवाल

मक्की जैसे आतंकवादी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई और उसकी मौत से यह सवाल उठता है कि पाकिस्तान अपनी आतंकवाद नीति में कितना गंभीर है। मक्की पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद, उसका संगठन जमात-उद-दावा और उससे जुड़े समूह खुले तौर पर काम करते रहे।

China on LAC: पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर चीन की बड़ी तैयारी; चीनी सेना के लिए बना रहा ‘किला’, रखेगा बड़े हथियारों का जखीरा

China on LAC: China Expands Underground Facility Near India Amid Border Tensions

China on LAC: सीमा विवाद को लेकर चीन और भारत के बीच डिसएंगेजमेंट प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद, लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से सटे इलाकों में चीन की गतिविधियां जारी हैं। चीन ने एलएसी से 60 किलोमीटर दूर अपने इलाके में गतिविधियों को तेज कर दिया है। सैटेलाइट इमेजरी के मुताबिक, चीन यहां अंडरग्राउंड फैसिलिटी का विस्तार कर रहा है। इस फैसिलिटी को बनााने का मकसद चीनी सेना (PLA) को रणनीतिक बढ़त देना और अपनी क्षमताओं को बढ़ाना बताया जा रहा है। इससे पहले जो सैटेलाइट इमेज सामने आई थीं, उसमें चीन पैंगोंग झील के पास फिंगर-4 से आगे बड़े स्तर पर निर्माण कार्यों को अंजाम दे रहा है।

China on LAC: China Expands Underground Facility Near India Amid Border Tensions
Credit: Damien Symon

हाल ही में जारी कई सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि पूर्वी लद्दाख की सीमा पर चीन अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने में जुटा हुआ है। चीन ने भारत-चीन सीमा के पास पहले से मौजूद अंडरग्राउंड सुविधा का बड़े पैमाने पर विस्तार करना शुरू कर दिया है। यह साइट 2015-16 में बनाई गई थी, लेकिन अब इसे और मजबूत और बड़ा किया जा रहा है। माना जा रहा है कि यह चीन की सैन्य रणनीति और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए तैयार की जा रही है।

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China on LAC: सैटेलाइट इमेज में क्या दिखा?

सैटेलाइट इमेजरी में पूर्वी लद्दाख के पास स्थित इस अंडरग्राउंड सुविधा में नई सुरंगों और इमारतों का निर्माण साफ नजर आ रहा है। यह फैसिलिटी भारत के डेमचोक क्षेत्र से लगभग 60 किलोमीटर दूर नागरी में स्थित है। इसमें कई प्री-एग्जिस्टिंग पोर्टल और सपोर्ट बिल्डिंग्स को जोड़कर और बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किय जा रहा है।

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विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्ट्रक्चर चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के लिए एक सुरक्षित स्थान यानी किले के रूप में तैयार किया जा रहा है। यहां हथियारों और सैन्य उपकरणों को सुरक्षित रखने और आवश्यकतानुसार उपयोग करने के लिए सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि यह निर्माण कार्य तेज गति से हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम चीन की सैन्य रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह विवादित क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।

  • मल्टीपल पोर्टल्स: साइट पर कई प्री-एग्जिस्टिंग पोर्टल्स हैं, जिन्हें और ज्यादा मजबूत किया जा रहा है।
  • नई सुरंगें: सैटेलाइट इमेजरी में नए पोर्टल्स का निर्माण दिखा है, जो अंडरग्राउंड गतिविधियों को आसान बना सकते हैं।
  • सपोर्ट बिल्डिंग्स: साइट पर सपोर्ट बिल्डिंग्स और कंस्ट्रक्शन साइट साफ नजर आ रही हैं, जो इसके लॉजिस्टिक्स को संभालने में मदद करेंगी।

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LAC पर क्या हो रहा है?

हालांकि, 2021 में पेंगोंग त्सो क्षेत्र में समझौते के बाद, कई फ्रिक्शन पॉइंट्स से सैनिकों को वापस बुलाया गया। हाल ही में डेपसांग और डेमचोक में भी सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी हुई। भारत ने उम्मीद जताई थी कि इससे सीमा पर स्थायी शांति स्थापित होगी। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संसद में कहा था, “हमारी प्राथमिकता थी कि टकराव वाले इलाकों से सैनिक हटाए जाएं। यह काम पूरा हो चुका है। अब अगली प्राथमिकता है सीमा पर सेना की तैनाती को कम करना।”

हालांकि, चीन की गतिविधियां दिखाती हैं कि वह पीछे हटने के बावजूद अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटा है।

India-China: पैंगोंग झील में चीन की बड़ी कारस्तानी! डिसइंगेजमेंट और वार्ता के बावजूद फिंगर-4 के आगे जारी है निर्माण कार्य

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Source: Damien Symon

China on LAC: पेंगोंग त्सो झील के पास गतिविधियां

पेंगोंग त्सो झील के उत्तरी किनारे पर चीन तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। सैटेलाइट इमेज में नई इमारतें और हेलिपैड के साथ सड़कों और पुलों का निर्माण देखा गया है। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा माना जाता है, लेकिन 1959-62 के बीच चीन ने इस पर कब्जा जमा लिया था।

रक्षा विशेषज्ञ कर्नल (सेवानिवृत्त) अजय रैना ने कहा, “चीन अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। भारत अभी भी सिरिजाप और खुर्नाक को अपना मानता है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थिति बदल चुकी है।”

सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है कि सिरिजाप और खुरनाक क्षेत्र में चीन तेजी से निर्माण कर रहा है। सिरिजाप में अस्थायी ढांचों की जगह अब बड़े और स्थायी निर्माण हो चुके हैं। खुरनाक किले में पुराने ढांचों को तोड़कर नई दीवारें और सड़कों का निर्माण किया गया है।

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देपसांग में बनाया नया ठिकाना

सैटेलाइट इमेजरी से यह भी सामने आया है कि देपसांग के पीछे की स्थिति में चीनी सेना ने नए ठिकानों का निर्माण किया है। यह स्थान चिप चाप नदी के पास स्थित है। नई सुविधाओं में बड़े पैमाने पर सैन्य शिविर और हेलिपैड शामिल हैं। यह निर्माण चीन की सेना के दक्षिणी शिंजियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट द्वारा किया जा रहा है।

देपसांग क्षेत्र में PLA ने अपने पुराने स्थान से 3 किलोमीटर पीछे हटकर नया शिविर बनाया है। यह शिविर चिप चप नदी से 7 किलोमीटर दक्षिण में है। सैटेलाइट तस्वीरों से यह भी पता चला है कि PLA ने एक और शिविर लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थापित किया है।

भारत-चीन वार्ता: NSA अजीत डोभाल की बैठक

हाल ही में बीजिंग में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बैठक हुई। इसमें NSA अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भाग लिया। बैठक में सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने की बात कही गई, ताकि दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य हो सकें। विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया, “दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखना भारत-चीन संबंधों के सामान्य विकास के लिए महत्वपूर्ण है।”

चीन की रणनीतिक तैयारियां

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह निर्माण कार्य उसकी “स्लामी स्लाइसिंग” रणनीति का हिस्सा है। यह रणनीति छोटे-छोटे कदमों के जरिए विवादित क्षेत्रों पर कब्जा करने की कोशिश है। देपसांग और पेंगोंग त्सो के आसपास की गतिविधियां इस बात का संकेत हैं कि चीन अपनी सैन्य उपस्थिति को और मजबूत करने के प्रयास में है।