Home Blog Page 120

Taliban Internal Rift: तालिबान में आंतरिक कलह गहराई; पिछले 40 दिनों से ‘लापता’ है सिराजुद्दीन हक्कानी, पाकिस्तान पर उठ रहीं उंगलियां

Taliban Internal Rift: Sirajuddin Haqqani 'Missing' for 40 Days, Pakistan's Role Under Question

Taliban Internal Rift: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में अंदरूनी कलह तेजी से बढ़ती जा रही है। तालिबान सरकार के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के 40 दिनों से लापता रहने की खबरें सामने आ रही हैं। सिराजुद्दीन हक्कानी 22 जनवरी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए रवाना हुए थे और अब तक अफगानिस्तान नहीं लौटे हैं। उनकी गैरमौजूदगी के चलते इस्लामी शासन के भीतर गहरे मतभेदों की खबरें तेज हो गई हैं।

Taliban Internal Rift: Sirajuddin Haqqani 'Missing' for 40 Days, Pakistan's Role Under Question

Taliban Internal Rift: स्तानिकजई भी दुबई में

सूत्रों के मुताबिक, हक्कानी और तालिबान सुप्रीम लीडर हैबतुल्लाह अखुंदजादा के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। 20 जनवरी को तालिबान के उप-विदेश मंत्री अब्बास स्तानिकजई ने सार्वजनिक तौर पर अखुंदजादा की नीतियों की आलोचना की थी, जिससे अंदरूनी विवाद खुलकर सामने आ गया था। जिसके बाद हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने स्तानिकजई की गिरफ्तारी के आदेश जारी कर दिए, जिसके बाद उन्हें दुबई भागना पड़ा।

Taliban Internal Rift: तालिबान में दो धड़े – कंधार गुट बनाम हक्कानी नेटवर्क

सूत्रों के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की यह गैरमौजूदगी केवल एक विदेश यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि तालिबान के भीतर उभरते गंभीर सत्ता संघर्ष का संकेत साफ नजर आ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि कंधार गुट और हक्कानी नेटवर्क के बीच तनाव इन दिनों चरम पर है। तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्ला अखुंदजादा की अगुवाई वाला कंधार गुट पाकिस्तान के प्रभाव के खिलाफ है, जबकि हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान का करीबी सहयोगी माना जाता है। वहीं, स्तानिकजई का यह बयान ऐसे समय आया, जब हक्कानी पाकिस्तान समर्थित समूह के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सिराजुद्दीन हक्कानी की विदेश यात्रा भी पाकिस्तान के समर्थन से हुई थी, जिससे कंधार गुट नाराज है।

Taliban Internal Rift: कंधार से काबुल पहुंचे भारी संख्या में लड़ाके

तालिबान की अंदरूनी फूट तब और गहरी हो गई, जब अखुंदजादा ने काबुल के कई महत्वपूर्ण इलाकों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अपने वफादार लड़ाकों को तैनात कर दिया। इनमें बाला हिसार किला और काबुल इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे प्रमुख इलाके शामिल हैं, जो पहले हक्कानी नेटवर्क के निगरानी में थे।

Taliban-India Relations: क्या अफगानिस्तान में फिर से खुलेगा भारतीय दूतावास? तालिबान संग रिश्ते सुधारने की कूटनीतिक कोशिश या मजबूरी?

सूत्रों के अनुसार, बीते एक सप्ताह में कंधार से बड़ी संख्या में तालिबानी लड़ाके काबुल पहुंचे हैं। इन लड़ाकों ने एयरपोर्ट और वहां के सुरक्षा चेकप्वाइंट्स पर तैनात हक्कानी नेटवर्क के लड़ाकों को हटा दिय। एक एयरपोर्ट कर्मचारी ने बताया कि काबुल में अब चारों तरफ हथियारों से लैस तालिबानी लड़ाके ही नजर आ रहे हैं। कंधार से आए लड़ाकों ने सुरक्षा चौकियों का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया है और अब शहर के विभिन्न हिस्सों में गश्त कर रहे हैं।

Taliban Internal Rift: हक्कानी को भगाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ?

हक्कानी नेटवर्क के पाकिस्तान से गहरे संबंध हैं और कयास लगाए जा रहे हैं कि पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की UAE और सऊदी अरब की यात्रा पाकिस्तान की सहमति से हुई थी, लेकिन इससे तालिबान के कंधार गुट में नाराजगी बढ़ गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हक्कानी लंबे समय तक अफगानिस्तान से बाहर रहते हैं, तो इससे तालिबान के भीतर सत्ता संतुलन पूरी तरह से बदल सकता है। अखुंदजादा के वफादार लड़ाकों की काबुल में तैनाती यह संकेत देती है कि कंधार गुट अब तालिबान सरकार पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

तालिबान का भविष्य अधऱ में?

सूत्रों ने बताया कि कंधार गुट के लड़ाकों के काबुल में आने के बाद अब शहर में तनाव बढ़ गया है। बाला हिसार किला और हवाई अड्डे पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कहा जा रहा है कि तालिबान के गुटों के बीच संघर्ष और तेज हो सकता है। कंधार और काबुल के सूत्रों का कहना है कि अखुंदजादा ने यह रणनीति हक्कानी नेटवर्क की ताकत को सीमित करने के लिए बनाई है। पहले, हक्कानी नेटवर्क का इन इलाकों में प्रभाव था, लेकिन अब यह कंधार गुट के हाथों में जाता दिख रहा है।

Lt Col Habib Zahir: बेनकाब हुआ पाकिस्तान का झूठ, 2017 में जिस कर्नल के नेपाल से किडनैप का भारत पर लगाया था आरोप, क्वेटा में मारी गोली

वहीं, तालिबान के अंदर बढ़ती गुटबाजी उसके शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अफगानिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और पाकिस्तान के बढ़ते दखल से जूझ रहा है, ऐसे में तालिबान के दो बड़े गुटों के बीच सत्ता की लड़ाई देश में और अस्थिरता को जन्म दे सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सिराजुद्दीन हक्कानी अफगानिस्तान लौटते हैं या नहीं, और अगर लौटते हैं तो क्या तालिबान के भीतर यह विवाद और गहराएगा?

LCA Tejas में लगाया स्वदेशी ऑक्सीजन जनरेटिंग सिस्टम, सफल रहा हाई-एल्टीट्यूड ट्रायल

LCA Tejas Successfully Tests Indigenous Oxygen Generating System in High-Altitude Trials

LCA Tejas: भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी तकनीक में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। बेंगलुरु स्थित डीआरडीओ की डिफेंस बायो-इंजीनियरिंग एंड इलेक्ट्रो मेडिकल लेबोरेटरी (DEBEL) ने स्वदेशी रूप से विकसित ऑन-बोर्ड ऑक्सीजन जनरेटिंग सिस्टम (OBOGS) आधारित इंटीग्रेटेड लाइफ सपोर्ट सिस्टम (ILSS) का सफल हाई एल्टीट्यूड ट्रायल किया है। यह ट्रायल 4 मार्च 2025 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) के एलसीए-प्रोटोटाइप व्हीकल-3 (PV-3) विमान पर किया गया।

LCA Tejas Successfully Tests Indigenous Oxygen Generating System in High-Altitude Trials

LCA Tejas: क्या है यह नई तकनीक?

अब तक लड़ाकू विमानों में पायलट कन्वेंशनल लिक्विड ऑक्सीजन सिलिंडर्स का इस्तेमाल करते थे। लेकिन यह नई टेक्नोलॉजी पारंपरिक तरल ऑक्सीजन सिलेंडर सिस्टम को पूरी तरह से खत्म कर देगा। OBOGS बेस्ड यह नया सिस्टम फ्लाइट के दौरान रियल टाइम ऑक्सीजन पैदा करती है, जिससे विमान की ऑक्सीजन पर निर्भरता और पायलटों की कार्यक्षमता में जबरदस्त इजाफा होता है। साथ ही इससे लंबे समय तक हाई एल्टीट्यूड पर उड़ान भरना भी संभव होगा।

इस ट्रायल के दौरान ILSS को 50,000 फीट की ऊंचाई तक और उच्च-जी (High-G) गतियों में जांचा गया। इस दौरान ऑक्सीजन की कंसन्ट्रेशन्स, डिमांड ब्रीदिंग सिस्टम, 100% ऑक्सीजन की उपलब्धता, एरोबेटिक मूवमेंट्स और Anti-G Valve की कार्यक्षमता की पूरी जांच की गई। उड़ान परीक्षणों में ILSS ने सभी जरूरी मानकों जैसे टैक्सिंग, टेकऑफ, क्रूज़िंग, जी-टर्न और लैंडिंग को सफलतापूर्वक पूरा किया।

LCA Tejas: भारतीय वायुसेना के लिए गेम-चेंजर

OBOGS आधारित ILSS सिस्टम में 10 लाइन रिप्लेसेबल यूनिट्स (LRU) शामिल हैं, जिसमें लो-प्रेशर ब्रीदिंग रेगुलेटर, ब्रीदिंग ऑक्सीजन सिस्टम (BOS), इमरजेंसी ऑक्सीजन सिस्टम, ऑक्सीजन सेंसर, एंटी-जी वॉल्व जैसी कई महत्वपूर्ण इकाइयां शामिल हैं। इस सिस्टम के आने से भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान अधिक समय तक हवा में रह सकते हैं, जिससे मिशन की क्षमता में बढ़ोतरी होगी।

भारतीय वायुसेना के लिए यह नई तकनीक एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। पारंपरिक तरीकों की तुलना में OBOGS अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद है क्योंकि यह विमान के अंदर ही रियल टइम ऑक्सीजन पैदा करता है। इसके कारण पायलटों को लंबी उड़ानों में अधिक सहूलियत मिलेगी और वॉर मिशंस में उनकी परफॉरमेंस बढ़ेगी।

इसके अलावा, यह टेक्नोलॉजी एयरक्राफ्ट मैंटेनेंस में भी मददगार होगी। तरल ऑक्सीजन सिलेंडरों की जरूरत खत्म होने से विमानों का ऑपरेशन अधिक आसान होगा। इससे भारतीय वायुसेना को अपने लड़ाकू विमान बेड़े की ऑपरेशनल रेडीनेस को बेहतर बनाए रखने में मदद मिलेगी।

ILSS का निर्माण Larsen & Toubro (L&T) ने DRDO के साथ मिलकर Development cum Production Partner के रूप में किया है। इस प्रणाली में 90% स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है।

किन जहाजों में होगी इस्तेमाल?

यह एडवांस टेक्नोलॉजी न केवल तेजस बल्कि अन्य विमानों जैसे MiG-29K के लिए भी कस्टमाइज्ड की जा सकती है। इससे भारत के पुराने विमानों को भी नई टेक्नोलॉजी से लैस किया जा सकता है, जिससे लड़ाकू विमानों की क्षमता और सुरक्षा में वृद्धि होगी।

इस तकनीक के डेवलपमेंट और ट्रायल में डीआरडीओ, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड, एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी, सेंटर फॉर मिलिट्री ऐरवॉर्थीनेस एंड सर्टिफिकेशन, नेशनल फ्लाइट टेस्ट सेंटर और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ एयरोनॉटिकल क्वालिटी एश्योरेंस ने अहम भूमिका निभाई है।

LCA Tejas Delay: क्या भारत में अब निजी कंपनियां बनाएंगी फाइटर जेट? राजनाथ सिंह को सौंपी रिपोर्ट, क्या होगा HAL का रोल?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर DRDO, IAF, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और निजी क्षेत्र के भागीदारों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। DRDO के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफलता पर टीम की सराहना की और इसे भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत करने वाला कदम बताया।

Ukraine Military Aid: यूक्रेन को सैन्य मदद रोकने के ट्रंप के फैसले के क्या हैं मायने? क्या रूस से लड़ाई जारी रख सकेगा कीव? पढ़ें Explainer

Ukraine Military Aid: Will Kyiv Survive Without US Support? Trump's Decision Explained

Ukraine Military Aid: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगाने का फैसला लिया है, जिससे अमेरिका और यूक्रेन के बीच संबंधों में तनाव बढ़ता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि जब तक यूक्रेन शांति वार्ता के लिए तैयार नहीं होता, तब तक अमेरिका से किसी भी प्रकार की सैन्य मदद नहीं दी जाएगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब यूक्रेन लगातार रूस के खिलाफ सैन्य समर्थन बढ़ाने की मांग कर रहा था।

Ukraine Military Aid: Will Kyiv Survive Without US Support? Trump's Decision Explained

Ukraine Military Aid: यूक्रेन का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी रहा है अमेरिका

फरवरी 2022 में रूस के आक्रमण के बाद से अमेरिका यूक्रेन का सबसे बड़ा सैन्य सहयोगी रहा है। अब तक अमेरिका ने यूक्रेन को 86 अरब डॉलर की सैन्य सहायता प्रदान करने की प्रतिबद्धता जताई थी, जिसमें से 46 अरब डॉलर राष्ट्रपति की विशेष अधिकार योजना (PDA), 33 अरब डॉलर यूक्रेन सुरक्षा सहायता पहल (USAI) और 7 अरब डॉलर फॉरेन मिलिट्री फंडिंग (FMF) के तहत दिए जाने थे। इन पैसों का उपयोग मिसाइल, टैंक, हेलिकॉप्टर, रक्षा प्रणाली और अन्य सैन्य उपकरणों की खरीद के लिए किया जाता रहा है। लेकिन अब इस सहायता को रोकने का निर्णय अमेरिका की विदेश नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

Ukraine Military Aid: यूक्रेन को क्यों रोकी गई अमेरिकी सैन्य सहायता?

ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के पीछे मुख्य वजह जेलेंस्की की हालिया टिप्पणियां मानी जा रही हैं। जेलेंस्की ने हाल ही में कहा था कि “यूक्रेन युद्ध का अंत अभी बहुत दूर है।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि जेलेंस्की युद्ध को तभी खत्म करना चाहते हैं, जब तक अमेरिका उन्हें समर्थन देता रहेगा। इसके बाद ट्रंप ने यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद पर रोक लगाने की घोषणा की।

Ukraine Nuclear Weapons: अगर आज यूक्रेन के पास होते परमाणु हथियार, तो ना ही ट्रंप जेलेंस्की की बेज्जती करते और ना ही रूस की हमले की हिम्मत होती?

व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक कि यूक्रेन यह साबित नहीं कर देता कि वह रूस के साथ शांति वार्ता के लिए प्रतिबद्ध है।

इससे पहले 28 फरवरी को व्हाइट हाउस में हुई एक बैठक में ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वांस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने जेलेंस्की पर अमेरिकी मदद के लिए पर्याप्त आभार न जताने का आरोप लगाया था। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिका अब यूक्रेन की नीति में बदलाव देखना चाहता है और चाहता है कि कीव जल्द से जल्द रूस के साथ शांति वार्ता करे।

Ukraine Military Aid: यूक्रेन पर क्या होगा असर?

यूक्रेन को रूस से मिल रही लगातार चुनौती के बीच अमेरिकी सैन्य मदद पर रोक लगना उसके लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। लेकिन इस सैन्य सहायता में से ज्यादातर रकम अब तक खर्च नहीं हुई थी। Center for Strategic and International Studies (CSIS) के अनुसार, अब तक केवल 20.2 अरब डॉलर की मदद ही यूक्रेन तक पहुंची थी। बाकी 34.2 अरब डॉलर की मदद को लेकर अमेरिकी सरकार ने अनुबंध किए थे, लेकिन वह अभी तक लागू नहीं हुए थे। अब ट्रंप के फैसले के बाद इन अनुबंधों पर भी संकट मंडरा रहा है।

यूक्रेन के प्रधानमंत्री डेनिस शमिहाल के अनुसार, यूक्रेन के पास अब भी सैन्य उत्पादन की क्षमता है, लेकिन वह अपनी कुल आवश्यकताओं का केवल 40% ही खुद से बना सकता है। बाकी 30% अमेरिका और 30% यूरोप से आता है। अमेरिकी मदद के बिना, यूक्रेन के लिए रूस के बढ़ते हमलों को रोक पाना मुश्किल हो सकता है। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिना अमेरिकी सहायता के यूक्रेन केवल 2 से 4 महीने तक रूस के खिलाफ मजबूती से खड़ा रह सकता है। इसके बाद रूस को आगे बढ़ने का मौका मिल सकता है।

सैन्य विशेषज्ञ मार्क कैंसियन के अनुसार, अगर अमेरिका से मिलिट्री सप्लाई नहीं होती है, तो यूक्रेनी सेना दो से चार महीनों में कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका की सैन्य सहायता बंद होने से रूस को युद्ध में निर्णायक बढ़त मिल सकती है।

Ukraine Military Aid: क्या यूरोप भर सकता है अमेरिका की जगह?

यूरोप अब तक यूक्रेन को अमेरिका के बराबर ही सैन्य मदद देता आया है। लेकिन अगर अमेरिका की मदद पूरी तरह से बंद हो जाती है तो यूरोपीय देशों को अपने सैन्य खर्च में भारी इजाफा करना होगा। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश पहले ही सुरक्षा गारंटी देने की बात कर रहे हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने 1.6 अरब पाउंड (2 अरब डॉलर) की सहायता की घोषणा की, जिसमें यूक्रेन को 5,000 एयर डिफेंस मिसाइलें मिलेंगी।

US NATO Exit: अगर NATO और संयुक्त राष्ट्र से हटा अमेरिका तो क्या होगा? क्या चीन और रूस का गुलाम बन जाएगा यूरोप? पढ़ें Explainer

यूरोपीय देश अब रूसी सेंट्रल बैंक की जब्त संपत्तियों से यूक्रेन को मदद देने पर विचार कर रहे हैं। अमेरिका और यूरोप ने रूस के 300 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त कर रखी है, जिसे यूक्रेन को देने की मांग तेज हो रही है। पोलैंड, एस्टोनिया, लिथुआनिया और लातविया जैसे देश इस कदम का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

Ukraine Military Aid: क्या ट्रंप के फैसले से अमेरिका की राजनीति बदलेगी?

ट्रंप के इस फैसले की अमेरिका में डेमोक्रेट नेताओं ने कड़ी आलोचना की है। पेंसिल्वेनिया से डेमोक्रेटिक कांग्रेस सदस्य ब्रेंडन बॉयल ने इसे ‘खतरनाक’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा’ बताया है। वहीं, डेमोक्रेटिक सांसद डैन गोल्डमैन ने ट्रंप के इस कदम को यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के खिलाफ एक और ब्लैकमेलिंग प्रयास बताया।

ट्रंप पहले भी NATO और यूरोपीय सहयोगियों से अमेरिका के ज्यादा योगदान पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने पहले भी संकेत दिए थे कि अमेरिका को अब वैश्विक सुरक्षा मुद्दों में अपनी भूमिका कम करनी चाहिए। लेकिन उनके इस कदम से अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी नाराज हो सकते हैं और रूस को इससे सीधा फायदा हो सकता है।

क्या यूक्रेन लड़ाई जारी रख सकता है?

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की मदद के बिना यूक्रेन की लड़ाई लंबे समय तक जारी रह पाना मुश्किल होगा। हालांकि, जेलेंस्की को अभी भी उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूक्रेन के संबंध सिर्फ मदद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक रणनीतिक साझेदारी है। लेकिन हकीकत यह है कि बिना अमेरिकी मदद के यूक्रेन को अपने सैन्य संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ेगा और रूस के खिलाफ उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।

वहीं, यूक्रेन के पास युद्ध जारी रखने के कुछ सीमित विकल्प हैं। पहला, वे यूरोपीय देशों से ज्यादा मदद की मांग कर सकते हैं। जिसके तहत जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश अपनी सैन्य आपूर्ति बढ़ा सकते हैं, लेकिन इससे तुरंत कोई राहत नहीं मिलेगी। दूसरा विकल्प है कि यूक्रेन अपने सैन्य उत्पादन को बढ़ा सकता है। यूक्रेन ने हाल ही में ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया है, लेकिन इसी रफ्तार काफी धीमी है। वहीं, तीसरा विकल्प शांति वार्ता का है। रूस पहले ही शांति वार्ता का संकेत दे चुका है, लेकिन यूक्रेन को डर है कि इससे उसे अधिक क्षेत्रीय नुकसान हो सकता है।

वहीं, ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से वैश्विक सुरक्षा संतुलन बदल सकता है। अगर यूरोप अमेरिका की कमी पूरी नहीं कर पाता, तो रूस के लिए यूक्रेन में अपनी पकड़ मजबूत करना आसान हो जाएगा। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप अपने फैसले पर कायम रहते हैं या फिर अमेरिकी कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इसमें बदलाव करते हैं।

Who is Anastasia Lavrina: कश्मीर पर प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पाकिस्तान ने चुनी ‘जहर बुझी कन्या’! अजरबैजान की इस पत्रकार को बनाया कैंपेनर!

Who is Anastasia Lavrina? Pakistan’s New Propaganda Tool on Kashmir!

Who is Anastasia Lavrina: पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) और अज़रबैजान की पत्रकार अनास्तासिया लावरीना (Anastasia Lavrina) को लेकर एक नई चर्चा सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तान ने कश्मीर पर अपने प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने के लिए लावरीना को एक लॉबिस्ट और कैंपेनर के तौर पर शामिल किया है।

Who is Anastasia Lavrina? Pakistan’s New Propaganda Tool on Kashmir!

Anastasia Lavrina: पाकिस्तान-अजरबैजान गठजोड़

पाकिस्तान और अज़रबैजान के बीच हाल के वर्षों में संबंध काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने रणनीतिक रूप से एक-दूसरे का समर्थन किया है। पाकिस्तान ने नागोर्नो-काराबाख के संघर्ष में अजरबैजान का समर्थन किया था, जबकि अजरबैजान ने खुले तौर पर कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया है।

इसके अलावा, दोनों देशों ने रक्षा, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में करीब 2 बिलियन डॉलर के निवेश समझौतों पर दस्तखत किए हैं। ऐसे में यह गठजोड़ केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक और सैन्य सहयोग में भी गहराई तक जुड़ा हुआ है।

भारत और आर्मेनिया के संबंधों से चिढ़े अजरबैजान और पाकिस्तान

विश्लेषकों का मानना है कि भारत और आर्मेनिया के बढ़ते रक्षा और कूटनीतिक संबंध अज़रबैजान को रास नहीं आ रहे हैं। हाल के वर्षों में, भारत ने आर्मेनिया को एडवांस विपेंस की सप्लाई की है, जिसमें स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, स्वाति रडार और अन्य रक्षा उपकरण शामिल हैं। यह सहयोग अज़रबैजान के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि वह आर्मेनिया के साथ दशकों से विवादित नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र को लेकर संघर्षरत रहा है।

इसी के चलते अजरबैजान पाकिस्तान के साथ अपनी रक्षा साझेदारी को और मजबूत कर रहा है, ताकि वह भारत-आर्मेनिया गठबंधन का जवाब दे सके। अजरबैजान ने पाकिस्तान से JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों की खरीद की पुष्टि की है, जिसे चीन और पाकिस्तान ने मिलकर बनाया है। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच संयुक्त रक्षा उत्पादन और सैन्य सहयोग बढ़ाने की भी योजना है।

Anastasia Lavrina: अजरबैजान को JF-17 बेच रहा पाकिस्तान

हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में बाकू में आयोजित पाकिस्तान-अज़रबैजान बिजनेस फोरम में हिस्सा लिया था। वहीं पाकिस्तान जल्द ही अजरबैजान को उसका पहला JF-17 थंडर लड़ाकू विमान सौंपने वाला है। पिछले साल 25 सितंबर 2024 को अजरबैजान के राष्ट्रपति को पाकिस्तान ने अपने JF-17C (ब्लॉक III) लड़ाकू विमानों का डेमो दिखाया था। अज़रबैजान पहले ही पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स के साथ JF-17C फाइटर जेट्स की खरीद को लेकर 1.6 बिलियन डॉलर की डील पर हस्ताक्षर कर चुका है। इस डील में गोला-बारूद की सप्लाई और पायलट ट्रेनिंग भी शामिल है।

Who is Anastasia Lavrina? Pakistan’s New Propaganda Tool on Kashmir!

कौन हैं Anastasia Lavrina?

अनास्तासिया लावरीना एक अज़रबैजानी पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति पर अपनी राय रखने के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने CBC TV पर कई राजनीतिक कार्यक्रम होस्ट किए हैं और Institute for Development and Diplomacy में रिसर्च भी की है। इसके अलावा, उन्होंने अजरबैजान और पाकिस्तान के बीच मजबूत होते संबंधों पर भी खुलकर बात की है। लेकिन हाल ही में वह कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के समर्थन को लेकर सुर्खियों में आ गई हैं।

Pakistan Army: कंगाल पाकिस्तान की सेना के जवानों और अफसरों की कितनी है सैलरी? जान कर चौंक जाएंगे

क्या यह पाकिस्तान की मीडिया रणनीति का हिस्सा है?

लावरीना ने कई बार कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की आधिकारिक नीति का समर्थन किया है। वह पाकिस्तान के नैरेटिव को खुलेआम प्रमोट करती हैं और भारत के रुख के विपरीत बयान देती रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह सब सिर्फ उनकी व्यक्तिगत राय है या फिर पाकिस्तान के प्रचार अभियान का हिस्सा? हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पाकिस्तान ने अपनी बात को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने के लिए किसी विदेशी पत्रकार या विश्लेषक का इस्तेमाल किया हो। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR), जो उसकी मीडिया रणनीति और इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर को संभालती है, लंबे समय से ऐसे विदेशी चेहरों को अपने नैरेटिव को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती रही है। पिछले कुछ वर्षों में ISPR ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लॉबिंग और प्रचार अभियानों पर भारी खर्च किया है।

हालांकि, इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं है कि अनास्तासिया लावरीना को आधिकारिक रूप से ISPR ने हायर किया है। लेकिन उनके विचारों और पाकिस्तान समर्थित मीडिया संगठनों में उनकी बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए इस बात की संभावना व्यक्त की जा रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लावरीना का प्रचार अभियान अजरबैजान के अपने भू-राजनीतिक उद्देश्यों से भी जुड़ा हुआ है। अज़रबैजान अपने पड़ोसी देश अर्मेनिया के साथ नागोर्नो-काराबाख विवाद में उलझा हुआ है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन जुटाने के लिए पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि लावरीना पहले अर्मेनिया के खिलाफ दुष्प्रचार करने में विफल रही थीं और अब पाकिस्तान के कश्मीर प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं।

US NATO Exit: अगर NATO और संयुक्त राष्ट्र से हटा अमेरिका तो क्या होगा? क्या चीन और रूस का गुलाम बन जाएगा यूरोप? पढ़ें Explainer

US NATO Exit: What If America Quits NATO and UN? Global Impact Explained!

US NATO Exit: अमेरिका में नाटो (NATO) और संयुक्त राष्ट्र (UN) से बाहर निकलने की चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन में डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी’ के प्रमुख की भूमिका निभा रहे टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने अमेरिका के नाटो से बाहर निकलने का समर्थन किया है। मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर इस मुद्दे पर एक पोस्ट का समर्थन करते हुए लिखा, “I agree” यानी “मैं सहमत हूं।”

US NATO Exit: What If America Quits NATO and UN? Global Impact Explained!

मस्क के इस बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। ट्रंप प्रशासन में भी कुछ रिपब्लिकन नेता पहले से ही नाटो को “शीत युद्ध की विरासत” बताते हुए इसे छोड़ने की मांग कर रहे हैं। इनमें प्रमुख नाम सीनेटर माइक ली का है, जिन्होंने नाटो को अमेरिका के लिए “घाटे का सौदा” करार दिया है। वहीं, ट्रंप ने भी अपने पहले कार्यकाल के दौरान नाटो की आलोचना की थी और यूरोपीय देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डाला था।

US NATO Exit: अमेरिका के नाटो छोड़ने की चर्चा क्यों हो रही है?

नाटो (North Atlantic Treaty Organization) एक मिलिट्री अलायन्स है, जो मुख्य रूप से यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। अमेरिका इस संगठन का सबसे बड़ा सदस्य है और इसका प्रमुख आर्थिक और सैन्य योगदान देता है। हालांकि, कुछ रिपब्लिकन नेता और ट्रंप प्रशासन के कुछ अधिकारी इसे अमेरिका के लिए अनावश्यक बोझ मानते हैं।

सीनेटर माइक ली ने कहा कि “नाटो यूरोप के लिए एक बेहतरीन सौदा है, लेकिन अमेरिका के लिए एक महंगा समझौता।” उनका मानना है कि अमेरिका को अपनी सुरक्षा नीति पर अधिक ध्यान देना चाहिए और नाटो की जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहिए।

Ukraine-US Minerals Deal: क्या जेलेन्स्की के जरिए चीन को साध रहे हैं ट्रंप? दुर्लभ खनिज भंडार हासिल करने के पीछे यह है खेल

एलन मस्क की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब यूक्रेन युद्ध के चलते नाटो की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अमेरिका अब तक यूक्रेन को भारी सैन्य मदद दे चुका है, लेकिन कुछ रिपब्लिकन नेताओं का मानना है कि यह अमेरिकी करदाताओं के लिए बोझ बनता जा रहा है।

US NATO Exit: क्या अमेरिका वास्तव में नाटो से बाहर निकल सकता है?

हालांकि, अमेरिका के लिए नाटो छोड़ना आसान नहीं होगा। 2023 में, अमेरिकी सीनेट ने एक कानून पारित किया, जिसमें यह तय किया गया कि नाटो से बाहर निकलने का निर्णय केवल राष्ट्रपति अकेले नहीं ले सकते। इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी या सीनेट में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप यदि दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं, तो वह कानूनी रूप से नाटो से बाहर न निकलकर इसकी भूमिका को कमजोर कर सकते हैं। इसका मतलब यह होगा कि अमेरिका सैन्य गठबंधन में बना रहेगा, लेकिन वह अपनी भागीदारी को सीमित कर सकता है।

US NATO Exit: नाटो से बाहर निकलना यूरोप के लिए बड़ा झटका

यूक्रेन युद्ध के बीच NATO अमेरिका की मदद से रूस के खिलाफ एकजुट बना हुआ है। लेकिन अगर अमेरिका इस सैन्य गठबंधन से बाहर निकलता है, तो यह वैश्विक सुरक्षा को लेकर एक बड़ा झटका होगा। NATO यूरोपीय देशों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, खासकर रूस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए। कई यूरोपीय नेता पहले ही ट्रंप प्रशासन की इस नीति को लेकर चिंता जता चुके हैं।

Ukraine Nuclear Weapons: अगर आज यूक्रेन के पास होते परमाणु हथियार, तो ना ही ट्रंप जेलेंस्की की बेज्जती करते और ना ही रूस की हमले की हिम्मत होती?

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के NATO छोड़ने से यूरोप में सैन्य संतुलन बिगड़ सकता है और रूस को यूक्रेन या अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों में और आक्रामक कदम उठाने का मौका मिल सकता है। NATO में अमेरिका की अहम भूमिका रही है, लेकिन अगर वह हटता है तो यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा नीति में भारी बदलाव करना पड़ेगा।

US NATO Exit: क्या अमेरिका संयुक्त राष्ट्र से भी हट सकता है?

नाटो के अलावा, अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र (UN) से बाहर निकलने की चर्चा भी हो रही है। कुछ रिपब्लिकन नेता UN को “तानाशाहों का मंच” करार देते हुए इससे अलग होने की मांग कर चुके हैं। अमेरिकी सीनेटर थॉमस मैसी ने हाल ही में कहा था कि “संयुक्त राष्ट्र अब अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमले करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।”

संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलने का मतलब यह होगा कि अमेरिका वैश्विक राजनीति में अपनी पकड़ खो सकता है। अगर अमेरिका UN से बाहर निकलता है, तो इसका सीधा असर ग्लोबल डिप्लोमेसी पर पड़ेगा। अमेरिका UN को सबसे ज्यादा फंड देने वाले देशों में शामिल है और इसका सबसे ज्यादा प्रभाव सुरक्षा परिषद (Security Council) में रहता है। UN से बाहर निकलने का मतलब यह होगा कि अमेरिका अपनी वैश्विक भूमिका को कम कर रहा है, जिससे चीन और रूस को अधिक ताकत मिल सकती है। वहीं इससे संगठन की फंडिंग पर गहरा असर पड़ेगा।

अगर अमेरिका नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलता है तो क्या होगा?

अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकलता है, तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव यूरोप पर पड़ेगा। यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा और रूस जैसी ताकतों के खिलाफ उनका बचाव कमजोर हो सकता है।

इसके अलावा, इस फैसले से पूरी दुनिया में अमेरिका की स्थिति भी कमजोर होगी। अगर अमेरिका संयुक्त राष्ट्र से भी बाहर निकलता है, तो इसका सीधा फायदा चीन और रूस को मिलेगा। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संयुक्त राष्ट्र के भीतर चीन की भूमिका बढ़ जाएगी और वैश्विक राजनीति में अमेरिका का प्रभाव कम हो जाएगा।

विशेषज्ञ जेम्स गोल्डगियर के अनुसार, “अगर अमेरिका नाटो से बाहर निकलता है, तो इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा। यह एक बड़ी वैश्विक अस्थिरता पैदा करेगा।”

US NATO Exit: क्या NATO और UN छोड़ पाएगा अमेरिका?

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के लिए NATO और UN छोड़ना इतना आसान नहीं होगा। खासकर UN के मामले में, क्योंकि UN चार्टर में यह साफ लिखा है कि कोई भी सदस्य देश स्वेच्छा से बाहर नहीं निकल सकता जब तक कोई और पक्ष इसका उल्लंघन नहीं करता। इतिहास में सिर्फ एक बार इंडोनेशिया ने 1965-66 में UN छोड़ा था, लेकिन बाद में वह बिना किसी विशेष प्रक्रिया के वापस आ गया। अगर अमेरिका NATO छोड़ने का फैसला करता है, तो इससे यूरोप में सैन्य शक्ति का संतुलन बिगड़ जाएगा। अमेरिका की यह नीति ‘अमेरिका फर्स्ट’ का हिस्सा तो हो सकती है, लेकिन यह उसे वैश्विक मामलों से अलग-थलग कर सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप की नाटो और UN पर क्या राय है?

ट्रंप पहले से ही नाटो की आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने 2019 में कहा था कि “मुझे नाटो से कोई मतलब नहीं है।” उनके अनुसार, यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए और अमेरिका को इन देशों की रक्षा करने के लिए अपने संसाधन बर्बाद नहीं करने चाहिए।

Trump-Zelenskyy Clash: ट्रंप-ज़ेलेंस्की विवाद के बाद अमेरिका और यूरोप के बीच दरार, यूक्रेन के समर्थन में उतरे पश्चिमी देश

2020 में, ट्रंप ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन से कहा था कि “अगर यूरोप पर हमला होता है, तो अमेरिका आपकी मदद के लिए नहीं आएगा।” उन्होंने यह भी कहा था कि “नाटो अब खत्म हो चुका है और अमेरिका इसे छोड़ने वाला है।”

हालांकि, उनके दोबारा राष्ट्रपति बनने के बावजूद, अमेरिका का नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलना कानूनी और राजनीतिक रूप से जटिल होगा।

US NATO Exit: क्या अमेरिका वास्तव में अलग हो सकता है?

अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और यदि वह नाटो या संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलता है, तो इससे वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, यह इतना आसान नहीं होगा। अमेरिका में कई राजनीतिक और कानूनी बाधाएं हैं, जो इसे रोक सकती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और उनके समर्थक भले ही नाटो और संयुक्त राष्ट्र से बाहर निकलने की धमकी दें, लेकिन वास्तव में ऐसा करना मुश्किल होगा।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के विशेषज्ञ स्कॉट एंडरसन के अनुसार, “कांग्रेस के पास राष्ट्रपति के फैसले को अदालत में चुनौती देने का अधिकार है। अगर ट्रंप नाटो से बाहर निकलने का फैसला करते हैं, तो उन्हें कांग्रेस के साथ लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी।”

अमेरिकी जनता की राय क्या है?

अमेरिका में कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि अधिकांश अमेरिकी नागरिक नाटो और संयुक्त राष्ट्र में बने रहने का समर्थन करते हैं। पिछले साल किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 68 फीसदी अमेरिकी नागरिक नाटो में अमेरिका की भागीदारी को आवश्यक मानते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मामले में भी, अधिकांश अमेरिकी मानते हैं कि अमेरिका को वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए।

New Chinese Settlement: पैंगोंग पर चीन ने बसाई नई बस्ती! सड़कें, बिजली और नई इमारतें बना कर LAC के पास क्या साजिश रच रहा है ड्रैगन?

New Chinese Settlement Near Pangong: Roads, Power, and Buildings What’s China Plan Near LAC?

New Chinese Settlement: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी गतिरोध के बीच बड़ा खुलासाा हुआ है। नई जारी सैटेलााइट तस्वीरों के मुताबिक लद्दाख के पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर चीन ने एक नई बस्ती तैयार कर ली है। सैटेलाइट इमेजरी से पता चला है कि इस इलाके में तकरीबन 91 नई इमारतें बनाई गई हैं। ये नई इमारतें न केवल आधुनिक हैं, बल्कि इन पर मौसम की मार का भी कोई असर नहीं पड़ता है। हालांकि यह नई बस्ती 1962 से चीन के कब्जे वाले क्षेत्र में स्थित है।

New Chinese Settlement Near Pangong: Roads, Power, and Buildings What’s China Plan Near LAC?

New Chinese Settlement: रेचिन ला पोस्ट से 20 किलोमीटर की दूर है नई बस्ती

यह नई चीनी बस्ती लइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल से लगभग 7 किलोमीटर पूर्व में स्थित है और रेचिन ला पोस्ट से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। यह वही इलाका है, जहां 2020 में भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनातनी शुरू हुई थी। इस इलाके में पहले से ही एक चीनी पुल मौजूद था, जो पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिणी किनारों को जोड़ता था। सैटेलाइट इमेजरी के अनुसार, इस क्षेत्र में पक्की सड़कें, बिजली के ट्रांसफार्मर, स्ट्रीट लाइट्स और एक प्रशासनिक केंद्र जैसी सुविधाएं हैं। इसके अलावा, यहां एक सीमेंट प्लांट भी एक्टिव है, जिससे पता लगता है कि इस इलाके में निर्माण कार्य अभी भी जारी है।

New Chinese Settlement: अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहती है चीनी सेना

भारतीय सेना ने इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बस्ती LAC से दूर है और किसी भी सीमा समझौते का उल्लंघन नहीं करती है। सेना के अनुसार, “स्पैंगगुर झील के उत्तर-पूर्वी किनारे पर यह नया चीनी निर्माण संभवतः एक सीमा बस्ती हो सकती है। यह स्थान वास्तविक नियंत्रण रेखा से दूर स्थित है और किसी भी मौजूदा समझौते का उल्लंघन नहीं करता है।”

China Radar: भारत के मिसाइल कार्यक्रम पर नजर रखने के लिए चीन ने लगाया पावरफुल रडार, 5,000 किलोमीटर तक है रेंज

हालांकि, सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर बना कर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) इस इलाके में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहती है। इससे PLA को तैनाती में आसानी होगी और उसका रेस्पॉन्स टाइम बढ़ जाएगा। उनका कहना है कि इस तरह की बस्ती का इस्तेमाल दोहरे उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, एक ओर स्थानीय चरवाहों को बसाने के लिए, तो दूसरी ओर सैनिकों को रणनीतिक रूप से तैनात करने के लिए।

New Chinese Settlement Near Pangong: Roads, Power, and Buildings What’s China Plan Near LAC?
Image Source: @detresfa_

New Chinese Settlement: नया निर्माण वास्तविकता को बदलने का प्रयास

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा भी मानते हैं कि नई बस्ती चीन की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह LAC के पास बुनियादी ढांचा तैयार करके अपनी सेना की तैनाती को मजबूत कर रहा है। वहीं, लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ (रिटायर्ड) का कहना है कि यह निर्माण पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर पहले से मौजूद स्ट्रक्चर की तरह ही है और इसका मुख्य उद्देश्य PLA की लॉजिस्टिक्स क्षमता को बढ़ाना है। वह कहते हैं कि चीन पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिण में पीएलए की मौजूदगी को स्थायी बनाना चाहता है।

China on LAC: पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर चीन की बड़ी तैयारी; चीनी सेना के लिए बना रहा किला, रखेगा बड़े हथियारों का जखीरा

सैटेलाइट इमेजरी एनालिस्ट डेमियन सायमॉन के अनुसार, यह नया निर्माण वास्तविकता को बदलने का प्रयास है और 2020 से पहले की स्थिति को और अधिक जटिल बना रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के निर्माण से चीनी सेना के लिए सालभर निगरानी और तैनाती की सुविधा आसान हो जाती है, जिससे उनकी प्रतिक्रिया क्षमता काफी बढ़ जाती है।

भारत का ‘वाइब्रेंट विलेज’ प्रोग्राम

भारत ने भी चीन की इस रणनीति का जवाब देने के लिए ‘वाइब्रेंट विलेज’ योजना की शुरुआत की है। 2022 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्यत चीन से सटी सीमाओं पर बसे गांवों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका को बेहतर बनाना है। इस योजना के तहत 2022-26 के दौरान 4,800 करोड़ रुपये की लागत से अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में 2,967 गांवों को विकसित किया जाएगा। पहले चरण में 663 गांवों को चुना गया है।

इस योजना का उद्देश्य न केवल चीन की रणनीतिक बस्तियों का जवाब देना है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को बेहतर सुविधाएं प्रदान कर पलायन को रोकना और सुरक्षा को मजबूत करना भी है। इस पहल के तहत ऑल-वेदर रोड, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत और पर्यटन को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जा रहा है, ताकि सीमाई इलाकों में आबादी बनी रहे और चीन के अतिक्रमण की संभावनाएं कम हो सकें।

चीन ने 38,000 वर्ग किमी इलाके पर किया कब्जा

भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दिसंबर 2024 में संसद को बताया था कि चीन 38,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र (अक्साई चिन) पर अवैध कब्जा कर चुका है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र को चीन को सौंप दिया था, जिस पर वह 1948 से काबिज है।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को हल करने के लिए कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए विभिन्न समझौते हुए हैं, लेकिन चीन की ओर से बार-बार किए जाने वाले अतिक्रमण और तेजी से किए जा रहे निर्माण कार्यों से तनाव बढ़ता जा रहा है।

IAF Fighter Jet Shortage: भारतीय वायुसेना को नहीं चाहिए रूसी Su-57E या अमेरिकी F-35 फाइटर जेट! स्वदेशी MRFA और AMCA पर है फोकस

India Defence Upgrade
Defence Minister Rajnath Singh

IAF Fighter Jet Shortage: लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही भारतीय वायुसेना को अपनी युद्धक क्षमता बनाए रखने के लिए तेज़ी से नए विमान शामिल करने की जरूरत है। हाल ही में, रक्षा मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय समिति ने एक रिपोर्ट पेश की है, जिसमें भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए कई सिफारिशें की गई हैं। यह रिपोर्ट उस समय आई है जब भारतीय वायुसेना प्रमुख, एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुलकर इस बात पर चिंता जताई थी कि लड़ाकू विमानों की संख्या तेजी से घट रही है और इसे पूरा करने के लिए हर साल 35-40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत होगी।

IAF Fighter Jet Shortage: Indian Air Force Rejects Russian Su-57E and US F-35, Focuses on Indigenous MRFA and AMCA

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को “सशक्त समिति” (Empowered Committee for Capability Enhancement of IAF) की रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना की जरूरतों की पूरी समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि वायुसेना की मौजूदा ताकत को बनाए रखना है और भविष्य की जरूरतों को पूरा करना है, तो स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी है। फिलहाल, वायुसेना के पास केवल 30 स्क्वाड्रन हैं, जबकि यह संख्या 42 होनी चाहिए। यह कमी भारतीय वायुसेना की युद्धक क्षमता को प्रभावित कर सकती है, खासकर तब जब भारत चीन और पाकिस्तान जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।

IAF Fighter Jet Shortage: 2030 तक कई पुराने विमान होंगे रिटायर

भारतीय वायुसेना की बड़ी चुनौती है कि 2030 तक उसे कई पुराने विमानों को सेवा से बाहर करना होगा, जिनमें मिग-21, मिग-29 और मिराज-2000 शामिल हैं। इन विमानों की जगह नए विमानों को शामिल करने के लिए हर साल कम से कम 40 नए विमान चाहिए, लेकिन मौजूदा प्रोडक्शन रफ्तार बेहद कम है। यही वजह है कि वायुसेना और रक्षा मंत्रालय अब निजी क्षेत्र को शामिल करने पर विचार कर रहे हैं। वायुसेना सूत्रों का कहना है कि टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में शामिल किया जा सकता है।

IAF Fighter Jet Shortage: भारतीय वायुसेना नहीं चाहती Su-57E या अमेरिकी F-35

रक्षा मंत्री को सौंपी इस रिपोर्ट में खासतौर पर यह स्पष्ट किया गया है कि भारतीय वायुसेना रूस के Su-57E या अमेरिकी F-35 जैसे विदेशी फाइटर जेट्स को शामिल करने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह से स्वदेशी पांचवी पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम पर फोकस कर रही है। इसके अलावा, MRFA (Multi-Role Fighter Aircraft) प्रोग्राम के तहत 114 फाइटर जेट्स की खरीद को लेकर भी चर्चा चल रही है, ताकि IAF की स्क्वाड्रन क्षमता को बढ़ाया जा सके। हालांकि, यह प्रोग्राम 2018 से ही लटका हुआ है, और अब इसे जल्द से जल्द आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

 LCA Tejas Delay: क्या भारत में अब निजी कंपनियां बनाएंगी फाइटर जेट? राजनाथ सिंह को सौंपी रिपोर्ट, क्या होगा HAL का रोल?

IAF Fighter Jet Shortage: दोनों जेट्स IAF की प्राथमिकताओं में नहीं

हाल के एयरो इंडिया 2025 एयर शो में रूस के Su-57E और अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमानों को पेश किया गया, जिससे यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि भारत इनमें से किसी एक को प्राथमिकता दे सकता है। लेकिन भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कर दिया कि यह दोनों जेट्स IAF की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हैं। रूस के Su-57E को ठुकराने की वजह यह है कि यह विमान अभी तक पूरी तरह डेवलप नहीं हुआ है और इसके कई तकनीकी पहलू अभी भी अधूरे हैं। इसकी स्टील्थ तकनीक और अन्य क्षमताएं चीन के J-20 स्टील्थ फाइटर के मुकाबले कमजोर मानी जा रही हैं। इसके अलावा रूस की मौजूदा आर्थिक और सैन्य हालात के चलते इसके प्रोडक्शन और डिलीवरी में देरी हो सकती है। वहीं अमेरिका के F-35 को ठुकराने की वजह यह है कि यह एक नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर जेट है, जिसके ऑपरेशन के लिए अमेरिका की पूरी निगरानी बनी रहेगी। इससे भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। अमेरिका के कई अलायंस देशों को यह विमान देने के बावजूद, इसके तकनीकी अपग्रेड और सपोर्ट सिस्टम में अमेरिका का कंट्रोल रहता है।

IAF Fighter Jet Shortage: चीन के J-35 स्टील्थ फाइटर को टक्कर देगा AMCA

भारतीय वायुसेना का मानना है कि AMCA भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक उद्देश्यों के लिए बेहद जरूरी है। इस प्रोजेक्ट के तहत स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट डेवलप किया जाएगा, जो चीन और पाकिस्तान की वायुसेनाओं को टक्कर देने में सक्षम होगा। AMCA की जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि चीन ने पहले ही J-20 स्टील्थ फाइटर को तैनात कर दिया है और जल्द ही J-35A को अपनी नौसेना में शामिल करने की तैयारी कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान को भी J-35 स्टील्थ फाइटर सौंपने की संभावना जताई जा रही है।

HAL के पास काम का बेहद लोड

भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की उत्पादन दर बेहद धीमी है। वर्तमान में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स हैं, जिनमें तेजस Mk-1A, तेजस Mk-2, HTT-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट और AMCA स्टील्थ फाइटर का डेवलपमेंट शामिल है। HAL की सीमित उत्पादन क्षमता को देखते हुए भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय अब निजी क्षेत्र को इस प्रक्रिया में शामिल करने की योजना बना रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि HAL अकेले इतने बड़े ऑर्डर्स को पूरा नहीं कर सकता, इसलिए प्राइवेट कंपनियों को भी तेजस Mk-2 के उत्पादन में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

Defence Ministry IAF: भारतीय वायुसेना की कमियों को दूर करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बनाई उच्चस्तरीय समिति

ये प्राइवेट कंपनियां हो सकती हैं शामिल

रक्षा मंत्रालय ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स (TASL), लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को संभावित भागीदार माना है। इन कंपनियों के पास पहले से ही एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव है और सरकार चाहती है कि वे HAL के साथ मिलकर तेजस Mk-2 और अन्य विमानों का प्रोडक्शन करें। अगर HAL और निजी कंपनियों की साझेदारी सफल होती है, तो भारत अगले 10 वर्षों में एक शक्तिशाली वायुसेना बना सकता है।

तेजस MK-1A के प्रोडक्शन में देरी

तेजस MK-1A कार्यक्रम में देरी की मुख्य वजहों में से एक अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा F-404 इंजन की आपूर्ति में देरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने उठाया था। भारत सरकार इस समस्या को हल करने के लिए अमेरिका के साथ लगातार संपर्क में है, ताकि इन इंजनों की डिलीवरी में तेजी लाई जा सके।

भारतीय वायुसेना ने पहले ही 48,000 करोड़ रुपये की लागत वाले 83 तेजस MK-1A विमान खरीदने का ऑर्डर दे चुकी है। अब सरकार 97 और तेजस MK-1A विमान खरीदने पर विचार कर रही है, जिसकी अनुमानित लागत 67,000 करोड़ रुपये होगी। साथ ही, तेजस MK-2 पर भी काम तेजी से चल रहा है। यह विमान मिग-29 और मिराज-2000 जैसे पुराने विमानों की जगह लेगा। HAL की उत्पादन दर फिलहाल 16-20 विमान सालाना है, लेकिन इसे बढ़ाने की जरूरत है। निजी कंपनियों की भागीदारी इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकती है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि कम से कम 60 तेजस Mk-1A विमान निजी क्षेत्र द्वारा बनाए जाएं, ताकि HAL अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं, जैसे कि AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) और TEDBF (Twin Engine Deck Based Fighter) पर फोकस कर सके।

LCA Tejas Delay: क्या भारत में अब निजी कंपनियां बनाएंगी फाइटर जेट? राजनाथ सिंह को सौंपी रिपोर्ट, क्या होगा HAL का रोल?

LCA Tejas Delay: Will Private Companies Now Build Fighter Jets in India? Report Submitted to Rajnath Singh – What’s HAL’s Role?

LCA Tejas Delay: भारतीय वायुसेना (IAF) की युद्धक क्षमताओं को मजबूत करने और स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने “सशक्त समिति” (Empowered Committee for Capability Enhancement of IAF) की रिपोर्ट सोमवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सौंप दी। यह रिपोर्ट वायुसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए शार्ट टर्म, मीडियम टर्म एंड लॉन्ग टर्म सिफारिशें पेश की गई हैं। जिससे भारतीय वायुसेना को अत्याधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जा सके।

LCA Tejas Delay: Will Private Companies Now Build Fighter Jets in India? Report Submitted to Rajnath Singh – What’s HAL’s Role?

LCA Tejas Delay: निजी क्षेत्र की भागीदारी को बताया जरूरी

इस रिपोर्ट का मुख्य फोकस ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल को और तेज करना है, जिसमें रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSUs) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी जरूरी बताया गया है। रक्षा मंत्री ने इस रिपोर्ट की सराहना करते हुए सिफारिशों को समयबद्ध तरीके से लागू करने के निर्देश दिए हैं।

LCA Tejas Mk-1A Delay: तेजस की डिलीवरी में देरी पर एक्टिव हुई सरकार, क्या प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए अपनाया जाएगा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल?

इस समिति का गठन रक्षा मंत्री के निर्देश पर किया गया था, ताकि भारतीय वायुसेना की सभी ऑपरेशनल जरूरतों की व्यापक समीक्षा की जा सके। रक्षा सचिव की अध्यक्षता वाली इस समिति में वायुसेना के उपप्रमुख, रक्षा उत्पादन सचिव, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव, DRDO के अध्यक्ष और DG एक्वीजीशन को सदस्य के रूप में शामिल किया गया था।

LCA Tejas Delay: तेजस MkII प्रोजेक्ट में निजी क्षेत्र की एंट्री?

भारतीय वायुसेना अपने लड़ाकू विमानों के मॉर्डनाइजेशन को लेकर बड़े फैसले ले रही है। जिसके चलते वायुसेना तेजस MkII प्रोग्राम को रफ्तार देने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी की भी बात कर रही है। इस प्रोजेक्ट के तहत वायुसेना इस लड़ाकू विमान के विकास में लगभग 10,000 करोड़ रुपये की लागत का 30 फीसदी खुद वहन कर रही है।

IAF ने पहले ही 120 तेजस MkII विमानों की खरीद की बात कही है, जो 2034-35 से पुराने मिराज-2000 और MiG-29UPG विमानों को रिप्लेस करेंगे। अब वायुसेना इसके अतिरिक्त 180 और तेजस MkII विमानों की खरीद पर विचार कर रही है, जिससे कुल संख्या 300 हो सकती है। यदि रक्षा मंत्रालय (MoD) निजी क्षेत्र की भागीदारी को मंजूरी देता है, तो यह भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र के लिए एक बड़ा बदलाव होगा।

LCA Tejas Delay: Will Private Companies Now Build Fighter Jets in India? Report Submitted to Rajnath Singh – What’s HAL’s Role?

LCA Tejas Delay: प्राइवेट कंपनियां बनाएं 60 तेजस MkII

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) तेजस MkI और MkIA वेरिएंट का प्रोडक्शन कर रहा है, लेकिन वह सालाना केवल 16-20 विमान ही बना सकता है। ऐसे में, तेजस MkII के लिए HAL के अलावा एक और प्रोडक्शन लाइन की जरूरत महसूस की जा रही है, जिसका जिम्मा किसी निजी कंपनी के पास हो। वायुसेना चाहती है कि निजी कंपनियों को भी इसमें शामिल किया जाए ताकि तेजस MkII की डिलीवरी समय पर हो सके।

LCA Tejas Mk1A को लेकर IAF प्रमुख ने सुनाई फिर खरी-खरी, HAL से क्यों नाखुश है वायुसेना? आप भी सुनें

वायुसेना सूत्रों का कहना है कि कम से कम 60 तेजस MkII विमानों का निर्माण निजी कंपनियों द्वारा किया जाएगा। इसके लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL), लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों को संभावित साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। इन कंपनियों के पास आधुनिक प्रोडक्शन फैसिलिटी और कैपिटल इन्वेस्टमेंट की क्षमता है, जिससे तेजस MkII के प्रोडक्शन में तेजी आ सकती है।

क्या निजी कंपनियों की होगी एंट्री?

यदि रक्षा मंत्रालय (MoD) इस योजना को मंजूरी देता है, तो कुल 300 तेजस MkII विमानों की खरीद पर 75,000-90,000 हजार करोड़ (250-300 करोड़ रुपये प्रति विमान) खर्च हो सकते हैं। वायुसेना ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय से हरी झंडी मांगी है, जिससे HAL और निजी कंपनियां मिलकर एक हाइब्रिड प्रोडक्शन मॉडल पर काम कर सकें। इस नए ढांचे में HAL डिजाइन, प्रोटोटाइप और शुरुआती प्रोडक्शन पर फोकस करेगा। जबकि निजी कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन, निर्यात और सप्लाई चेन को बेहतर बनाने का काम करेंगी।

डेवलपमेंट फेज में है तेजस MkII

तेजस MkII प्रोजेक्ट अभी भी डेवलपमेंट फेज में है। इसके अभी इंजन इंटीग्रेशन, एवियोनिक्स टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन का काम चल रहा है। तेजस MkII की पहली उड़ान 2026 में होने की उम्मीद है, लेकिन अगर किसी वजह से देरी होती है, तो 2034-35 तक इसकी डिलीवरी भी प्रभावित हो सकती है। वहीं इस फैसले से HAL का बोझ कम होगा। जबकि HAL अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं, जैसे AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) और TEDBF (Twin Engine Deck Based Fighter) पर फोकस कर सकेगा।

PLA Spy Vessels: जब भी भारत करता है कोई मिसाइल टेस्ट, तो जासूसी करने पहुंच जाता है चीन, फिर मंडरा रहे हैं उसके ये जहाज

PLA Spy Vessels: China’s Surveillance Ships Lurk Again as India Conducts Missile Tests!

PLA Spy Vessels: चीन एक बार फिर भारतीय महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region- IOR) में अपनी मौजूदगी को मजबूत कर रहा है। हाल ही में चीन के अगली पीढ़ी के डीप-सी रिसर्च वेसल Dong Fang Hong 03 (डोंग फांग हॉन्ग 03) फरवरी 2025 के आखिर में भारतीय महासागर में एंट्री की। वहीं इस जहाज के आने से पहले, इसी महीने चीन के एक और सर्वे जहाज Xiang Yang Hong 01 (शियांग यांग हॉन्ग 01) की भी एंट्री हो चुकी थी। ये दोनों जहाज मरीन रिसर्च के नाम पर महासागर की गहराइयों का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल भारत की खुफिया जासूसी के लिए किया जा रहा है।

PLA Spy Vessels: China’s Surveillance Ships Lurk Again as India Conducts Missile Tests!

चीन का “साइलेंट” रिसर्च वेसल Dong Fang Hong 03: कितना खतरनाक?

Dong Fang Hong 03 को दुनिया का सबसे मॉर्डन और साइलेंट रिसर्च वेसल कहा जाता है। इसे 2019 में चाइना ओशन यूनिवर्सिटी (Qingdao) को सौंपा गया था और यह 103 मीटर लंबा, 5,000 टन वजनी जहाज है। इसमें इलेक्ट्रिक आज़ीमथ थ्रस्टर टेक्नोलॉजी लगी है, जिसकी मदद से यह बिना ज्यादा शोरगुल किए चुपचाप अपने काम को अंजाम दे सकता है।

इसकी खासियतें इसे सिर्फ एक रिसर्च वेसल नहीं बल्कि एक चलता-फिरता अंडरवाटर इंटेलिजेंस हब बनाती हैं। यह जहाज 100 लोगों के क्रू को ले जा सकता है। यह शिप मरीन इकोलॉजी, माइक्रोबियल जेनेटिक्स और समुद्री खनिजों पर रिसर्च करने में सक्षम है। इसमें एडवांस इक्विपमेंट्स लगे हैं जो समुद्र के नीचे 10,000 मीटर गहराई तक काम कर सकते हैं और मानव रहित पनडुब्बी वाहनों (UUVs) को तैनात कर सकते हैं। यह चीन की PLA (People’s Liberation Army) की रणनीति का हिस्सा है।

Xiang Yang Hong 01: भारत के डिफेंस ट्रायल्स पर रखता है नजर?

इससे पहले 4,500 टन वजनी Xiang Yang Hong 01 सर्वे शिप भी इसी इलाके में एंट्री कर चुका है। यह जहाज चीन के स्टेट ओशनिक एडमिनिस्ट्रेशन (SOA) के तहत काम करता है और इसे सैटेलाइट ट्रैकिंग, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, और समुद्र के नीचे के नक्शे तैयार करने में महारत हासिल है।

मार्च 2024 में यह जहाज भारत के अग्नि-5 MIRV मिसाइल टेस्ट के दौरान बंगाल की खाड़ी में मौजूद था। इसकी मौजूदगी से संदेह पैदा हुआ कि यह भारत के मिसाइल और पनडुब्बी परीक्षणों की जानकारी इकट्ठा कर रहा था। यह पोत समुद्र की गहराई को मापने, पानी की धारा और ध्वनि की रफ्तार की निगरानी करने में सक्षम है। ये सभी डेटा किसी भी देश के पनडुब्बी ऑपरेशन, सोनार परफॉर्मेंस और मिसाइल ट्रैकिंग को बेहतर बना सकते हैं।

Chinese Spy Vessels: हिंद महासागर में फिर बढ़ीं चीन की गतिविधियां, मछली पकड़ने के बहाने इस तरह हो रही भारतीय नौसेना की जासूसी?

वहीीं, फरवरी 2025 में इसके दोबारा भारतीय महासागर क्षेत्र में एक्टिव होने से चीन की रणनीति पर फिर से संदेह गहराने लगे हैं। इस बार इसकी गतिविधियां अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और मलक्का जलडमरूमध्य के पास देखी गई हैं, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। सूत्रों का कहना है कि चीन भारतीय महासागर क्षेत्र सीबेड मैपिंग और जलधाराओं का विस्तृत डेटा इकट्ठा कर रहा है, जो पनडुब्बी युद्ध (Submarine Warfare) और हाइड्रोएकॉस्टिक सर्विलांस के लिए अहम हो सकता है।

PLA Spy Vessels: China’s Surveillance Ships Lurk Again as India Conducts Missile Tests!
Image Source: @detresfa_

PLA Spy Vessels: सर्तक है भारतीय नौसेना

भारतीय नौसेना पहले से ही P-8I Poseidon मेरीटाइम पैट्रोल एयरक्राफ्ट और वॉरशिप्स के जरिए इन जहाजों की गतिविधियों पर नजर रख रही है। खासकर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, मलक्का जलडमरूमध्य और बंगाल की खाड़ी में इनकी हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जा रही है। खास बात यह है कि चीन के ये जहाज भारत के महत्वपूर्ण डिफेंस ट्रायल्स के दौरान या उसके आसपास दिखाई देते हैं।

खुफिया सूत्रों के अनुसार, चीन की “Maritime Civil-Military Fusion Strategy” इन जहाजों के असल उद्देश्य को लेकर संदेह पैदा करती है। चीन की नौसेना अक्सर वैज्ञानिक अनुसंधान को “कवर” के रूप में इस्तेमाल करती है ताकि वह सामरिक महत्व के क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ा सके।

Galwan Clash: गलवान हिंसा में जख्मी PLA कमांडर को चीन ने दिया बड़ा सम्मान, क्या भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने की है बड़ी तैयारी?

जनवरी 2025 में, जब भारतीय नौसेना ने INS अरिहंत से K-4 SLBM मिसाइल का सफल परीक्षण किया, उसके तुरंत बाद चीन के रिसर्च वेसल इस इलाके में दिखाई दिए। यह कोई पहला मौका नहीं था। 2024 में जब चीन के एक अन्य शोध पोत Xiang Yang Hong 03 ने मालदीव में डॉक किया था, तब भारत और मालदीव के संबंधों में तनाव था। चीन के ये जहाज अक्सर भारतीय विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के पास या भारत के मिसाइल परीक्षण स्थलों के नजदीक नजर आते हैं।

PLA Spy Vessels: चीन की “साइलेंट” रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के रिसर्च वेसल्स केवल वैज्ञानिक उद्देश्यों तक सीमित नहीं हैं। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि PLA नौसेना इन जहाजों द्वारा एकत्रित डेटा का इस्तेमाल भारत की समुद्री रणनीतियों को कमजोर करने के लिए कर सकती है। भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों ने इसे चीन की “दोहरी उपयोग” (Dual Use) रणनीति करार दिया है, जिसमें वैज्ञानिक शोध और सैन्य उद्देश्यों को मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के ये शोध पोत भारत की नौसेना के पनडुब्बी मार्गों, समुद्र की गहराई, और सोनार सिस्टम की प्रभावशीलता का अध्ययन करने में लगे हैं। इन जहाजों द्वारा एकत्रित डेटा चीन को भविष्य में पनडुब्बी युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक जासूसी और मिसाइल ट्रैकिंग में बढ़त दिला सकता है।

PLA Spy Vessels: भारत की जवाबी तैयारी

वहीं, भारत भी अपनी सामुद्रिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठा रहा है। Aero India 2025 में भारत ने नई ड्रोन और UGV (Unmanned Ground Vehicles) टेक्नोलॉजी को पेश किया, जो समुद्री निगरानी को और बेहतर बनाएंगी। इसके अलावा, भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और फ्रांस जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ अपने समुद्री सहयोग को भी मजबूत किया है। हाल ही में QUAD और IOR देशों के बीच नेवी एक्सरसाइज को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि चीन की संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।

Galwan Clash: गलवान हिंसा में जख्मी PLA कमांडर को चीन ने दिया बड़ा सम्मान, क्या भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने की है बड़ी तैयारी?

Galwan Clash: China Honors Injured PLA Commander – A New Propaganda Move Against India?

Galwan Clash: चीन ने गलवान घाटी हिंसा के दौरान घायल हुए पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के कमांडर क्यूई फाबाओ (Qi Fabao) को विशेष सम्मान से नवाजा है। उन्हें चीनी पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस (CPPCC) के ‘आउटस्टैंडिंग परफॉर्मेंस अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान चीन में उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने सरकारी एजेंडा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो।

Galwan Clash: China Honors Injured PLA Commander – A New Propaganda Move Against India?

Galwan Clash: क्यों दिया गया क्यूई फाबाओ को यह सम्मान?

15 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच भीषण हिंसक संघर्ष हुआ था। इस झड़प में चीन के भी लगभग 50 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे, हालांकि चीन ने इस पर हमेशा चुप्पी बनाए रखी। वहीं भारत ने आधिकारिक रूप से 20 सैनिकों के बलिदान की पुष्टि की थी। इस संघर्ष में क्यूई फाबाओ भी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। फाबाओ उस समय PLA की एक रेजिमेंट के कमांडर थे।

चीन की सरकारी मीडिया के अनुसार, क्यूई फाबाओ ने ‘सीमा की रक्षा’ करने में बहादुरी दिखाई थी, और इसीलिए उन्हें 2021 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) की केंद्रीय समिति द्वारा “हीरो रेजिमेंटल कमांडर फॉर डिफेंडिंग द बॉर्डर” की उपाधि दी गई थी। उन्हें बाद में ‘जुलाई 1 मेडल’ भी प्रदान किया गया था, जो CPC के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक है।

China Radar: भारत के मिसाइल कार्यक्रम पर नजर रखने के लिए चीन ने लगाया पावरफुल रडार, 5,000 किलोमीटर तक है रेंज

अब, 2024 में, क्यूई को CPPCC की ओर से ‘आउटस्टैंडिंग परफॉर्मेंस’ अवार्ड से सम्मानित किया गया है। यह दिखाता है कि चीन, गलवान संघर्ष की घटना को अपने राजनीतिक और प्रचार तंत्र में एक प्रमुख हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

गलवान संघर्ष को राजनीतिक हथियार बना रहा चीन

क्यूई फाबाओ को सम्मानित किया जाना सिर्फ एक सैन्य फैसला नहीं, बल्कि चीन की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) अक्सर अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस तरह के सम्मान समारोह आयोजित करती है।

गलवान संघर्ष में चीन की छवि अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर हुई थी। चीन के लिए यह जरूरी था कि वह अपनी जनता को यह संदेश दे कि उसने इस संघर्ष में कोई कमजोरी नहीं दिखाई थी। यही कारण है कि चीन, गलवान घाटी की लड़ाई को अपने लिए एक ‘प्रचार अवसर’ के तौर में देख रहा है और इसके जरिये वह अपनी आक्रामक राष्ट्रवादी नीतियों को और मजबूत करना चाहता है।

चीन की सरकारी मीडिया गलवान संघर्ष की पूरी कहानी को एकतरफा ढंग से पेश कर रही है। सरकारी चैनल CCTV की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय सेना ने ‘समझौते का उल्लंघन’ किया और चीनी सैनिकों पर हमला किया। हालांकि, भारत की ओर से इस दावे का बार-बार खंडन किया गया है और साफ किया गया है कि गलवान में चीन ने घुसपैठ कर भारतीय सीमा में निर्माण कार्य करने की कोशिश की थी, जिससे झड़प शुरू हुई।

Galwan Clash: क्यूई फाबाओ को राजनीति में लाने की रणनीति?

जनवरी 2023 में, ची फाबाओ को CPPCC के 14वें राष्ट्रीय समिति का सदस्य घोषित किया गया। CPPCC चीन की एक राजनीतिक सलाहकार संस्था है, जिसमें सरकार समर्थक व्यक्ति शामिल होते हैं। उन्हें एक ‘विशेष अतिथि’ के रूप में इस संस्था में जगह दी गई। इसका उद्देश्य चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों को लागू करने में सहायता करना और जनता में पार्टी की छवि को मजबूत करना है।

India-China Border: सर्दियों में भी LAC पर जारी हैं चीन की नापाक सैन्य गतिविधियां, सैटेलाइट तस्वीरों में हुआ ये बड़ा खुलासा

इस साल चीन की संसद की बैठक ‘टू सेशन्स’ (Two Sessions) के दौरान, ची फाबाओ की तस्वीरें और वीडियो चीनी सरकारी मीडिया पर खूब दिखाईं गई थीं। CCTV मिलिट्री चैनल ने उनके सिर पर दिख रहे निशान को प्रमुखता से दिखाया, ताकि इसे चीनी जनता के लिए एक ‘बलिदान’ और ‘देशभक्ति’ के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जा सके। 2024 के ‘टू सेशंस’ (चीनी संसद के सालाना सम्मेलन) के दौरान, उन्हें कई मंचों पर देखा गया, जहां उन्होंने चीन की ‘सीमा सुरक्षा’ और ‘राष्ट्रवादी नीतियों’ को लेकर भाषण दिए।

युद्ध नायकों के जरिये भड़का रहा है राष्ट्रवादी भावनाएं?

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में, चीन लगातार राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रहा है। PLA के सैनिकों को “राष्ट्र की ताकत” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, और इसके जरिये देश की जनता को यह संदेश दिया जा रहा है कि चीन को सैन्य रूप से मजबूत रहना चाहिए।

क्यूई फाबाओ जैसे सैन्य अधिकारियों को प्रचारित करना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। चीन इससे पहले भी अपने ‘युद्ध नायकों’ को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर चुका है। उदाहरण के लिए, कोरियाई युद्ध (1950-53) के दौरान शामिल चीनी सैनिकों को भी लंबे समय तक प्रचार माध्यमों में नायक के रूप में पेश किया गया था।

गलवान संघर्ष की सच्चाई और चीन का दोहरा रवैया

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर कई बार तनाव देखने को मिला है। हालांकि, गलवान संघर्ष 45 वर्षों में पहली ऐसी घटना थी, जिसमें सैनिकों की जान गई। इस संघर्ष में भारत के 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे, लेकिन चीन ने काफी समय तक अपने हताहतों की संख्या को छुपाए रखा।

2021 में, चीन ने स्वीकार किया कि उसके चार सैनिक इस संघर्ष में मारे गए थे। लेकिन कई रिपोर्ट्स और सैटेलाइट इमेजरी विश्लेषण बताते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। वहीं चीन का मीडिया यह दावा करता है कि गलवान हिंसा के दौरान भारतीय सैनिकों ने चीनी सीमा में घुसपैठ की और टेंट लगाए, जिसके बाद ची फाबाओ बातचीत करने गए। लेकिन भारतीय सेना ने समझौते का पालन नहीं किया और हिंसा भड़क गई। यह दावा पूरी तरह से चीन का सरकारी प्रोपेगेंडा है, क्योंकि भारत ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि गलवान में संघर्ष चीन द्वारा की गई घुसपैठ और सीमा उल्लंघन का नतीजा था।

इस हिंसा के बाद, भारत ने चीन के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाए और चीनी ऐप्स पर बैन लगा दिया। इसके अलावा, भारतीय सेना ने भी LAC पर अपनी तैनाती को मजबूत किया और चीन को कड़ा जवाब दिया।

Galwan Clash: क्या यह चीन की नई प्रचार रणनीति है?

विशेषज्ञों का मानना है कि ची फाबाओ को बार-बार सम्मानित करना चीन की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। चीन इस तरह से अपने नागरिकों के बीच भारत के खिलाफ एक नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले भी चीन अपने सैनिकों को ‘गुमनाम नायक’ बताकर प्रचारित करता रहा है। लेकिन असलियत यह है कि चीन गलवान संघर्ष के दौरान अपने नुकसान को छिपाने में लगा रहा और जब अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा, तो उसने सिर्फ 4 सैनिकों की मौत स्वीकार की। चीनी सरकार अब ची फाबाओ को एक ‘राष्ट्रवादी प्रतीक’ के रूप में प्रस्तुत कर रही है, ताकि जनता का ध्यान घरेलू आर्थिक संकट और अन्य आंतरिक मुद्दों से हटाया जा सके।

जबकि भारत इस पूरे मामले को संतुलित दृष्टिकोण से देख रहा है। भारत की ओर से गलवान संघर्ष को लेकर कोई आक्रामक प्रचार अभियान नहीं चलाया गया, बल्कि कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर जवाब दिया गया।