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Ukraine Nuclear Weapons: अगर आज यूक्रेन के पास होते परमाणु हथियार, तो ना ही ट्रंप जेलेंस्की की बेज्जती करते और ना ही रूस की हमले की हिम्मत होती?

Ukraine Nuclear Weapons: Would Russia Dare to Attack and Trump Humiliate Zelensky if Kyiv Had Nukes?

Ukraine Nuclear Weapons: यूक्रेन कभी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा परमाणु शक्ति संपन्न देश था। लेकिन 1994 में एक ऐतिहासिक समझौते के तहत उसने अपने सारे परमाणु हथियार छोड़ दिए। बदले में अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने उसकी संप्रभुता और सुरक्षा की गारंटी दी। लेकिन क्या हुआ? रूस ने 2014 में क्राइमिया पर कब्जा कर लिया और 2022 में पूरे यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया। और अब, जब यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की की वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अपमानजनक गरमागरम बहस हुई है, तो यह सवाल उठता है कि अगर यूक्रेन के पास आज परमाणु हथियार होते, तो क्या उसे यह अपमान सहना पड़ता? यह सवाल भी उठ रहा है कि यूक्रेन भी उत्तर कोरिया की तरह एक ‘परमाणु सुरक्षा कवच’ का लाभ उठाकर अपनी संप्रभुता की रक्षा कर सकता था, क्योंकि अमेरिका और पश्चिमी देशों की गारंटी खोखली साबित हो रही है।

Ukraine Nuclear Weapons: Would Russia Dare to Attack and Trump Humiliate Zelensky if Kyiv Had Nukes?

Ukraine Nuclear Weapons: यूक्रेन के पास कितना बड़ा था परमाणु भंडार?

सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन को सोवियत सैन्य संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा मिला, जिसमें लगभग 5,000 परमाणु हथियार भी शामिल थे। इन हथियारों में इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) और स्ट्रैटेजिक बॉम्बर फाइटर जेट शामिल थे। इनमें कई लंबी दूरी की मिसाइलें भी शामिल थीं, जो 10 हजार किमी तक थर्मोन्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने में सक्षम थीं। यानी तकनीकी रूप से, यूक्रेन अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा परमाणु शक्ति संपन्न देश बन सकता था।

लेकिन इस ताकत का पूरा कंट्रोल पूरी तरह उसके हाथ में नहीं था। इन मिसाइलों को लॉन्च करने के लिए आवश्यक कोड और कमांड सिस्टम रूस के पास थे। यानी, यूक्रेन के पास परमाणु हथियार तो थे, लेकिन उनका उपयोग करने की स्वतंत्रता नहीं थी।

इस स्थिति में अमेरिका और पश्चिमी देशों ने यूक्रेन पर परमाणु हथियार छोड़ने का दबाव बनाया। बदले में 1994 में “बुडापेस्ट मेमोरेंडम” पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में रूस, अमेरिका और ब्रिटेन ने यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी दी। लेकिन यह गारंटी कितनी खोखली साबित हुई, यह आज पूरी दुनिया देख रही है।

जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ, तो यूक्रेन के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा परमाणु शस्त्रागार था। इस शस्त्रागार में शामिल थे:

  • 5,000 से अधिक परमाणु हथियार
  • 1,900 सामरिक परमाणु हथियार (जिनका इस्तेमाल युद्ध में किया जा सकता था)
  • 176 अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM)
  • 44 स्ट्रैटेजिक बॉम्बर फाइटर, जो अमेरिका और रूस तक मार करने की क्षमता रखते थे।

Ukraine Nuclear Weapons: क्या था बुडापेस्ट मेमोरेंडम?

बुडापेस्ट मेमोरेंडम (Budapest Memorandum) 1994 में अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और यूक्रेन के बीच हुआ एक सुरक्षा समझौता था, जिसके तहत यूक्रेन ने अपने सभी परमाणु हथियार छोड़ने का फैसला किया। बदले में, इन महाशक्तियों ने यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने की गारंटी दी। लेकिन 2014 में रूस द्वारा क्राइमिया पर कब्जा और 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद यह संधि पूरी तरह से निष्क्रिय हो गई।

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5 दिसंबर 1994 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में यह समझौता हुआ, जिसे बुडापेस्ट मेमोरेंडम ऑन सिक्योरिटी एश्योरेंस (Budapest Memorandum on Security Assurances) कहा जाता है। यह समझौता मुख्य रूप से तीन पूर्व सोवियत देशों—यूक्रेन, कजाकिस्तान और बेलारूस के साथ किया गया था।

इस समझौते के तहत यूक्रेन ने अपने सभी परमाणु हथियार रूस को सौंप दिए। वहीं, रूस, अमेरिका और ब्रिटेन ने यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने की गारंटी दी। तीनों देशों ने यह भी वादा किया कि वे यूक्रेन के खिलाफ कभी भी सैन्य बल का उपयोग नहीं करेंगे। वहीं, अगर यूक्रेन पर कोई हमला होता है, तो ये तीनों देश तुरंत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में इसे उठाएंगे और कार्रवाई करेंगे। साथ ही, यूक्रेन को यह आश्वासन दिया गया कि उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान किया जाएगा।

Ukraine Nuclear Weapons: क्यों फेल हुआ बुडापेस्ट मेमोरेंडम?

इस समझौते के तहत रूस ने यूक्रेन की सीमाओं की रक्षा करने का वादा किया था। लेकिन 2014 में रूस ने क्राइमिया पर कब्जा कर लिया और 2022 में उसने पूरे यूक्रेन पर हमला कर दिया। 2014 में, जब रूस ने अचानक क्राइमिया पर कब्जा कर लिया, जिससे यह संधि पूरी तरह से बेकार साबित हो गई। यूक्रेन ने जब सुरक्षा की मांग की, तो अमेरिका और ब्रिटेन ने सैन्य सहायता देने से मना कर दिया। रूस ने खुद ही इस समझौते को “Null and Void” (अमान्य) घोषित कर दिया। वहीं ऐसा ही कुछ 2022 में भी हुआ, जब यूक्रेन ने पश्चिमी देशों से मदद की उम्मीद की थी, लेकिन नाटो (NATO) ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अमेरिका और यूरोप ने सिर्फ हथियार और आर्थिक मदद दी, लेकिन सीधे जंग में शामिल नहीं हुए।

क्या वाकई यूक्रेन को परमाणु हथियार रखने चाहिए थे?

कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार रखे होते, तो रूस उस पर हमला करने की हिम्मत नहीं करता। 1993 में अमेरिकी प्रोफेसर जॉन मीरशाइमर ने भविष्यवाणी की थी कि अगर यूक्रेन ने परमाणु हथियार छोड़ दिए, तो रूस एक दिन उस पर कब्जा करने की कोशिश करेगा। उनकी यह भविष्यवाणी 2014 और 2022 में सच साबित हुई।

वहीं, अगर यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियार रखे होते, तो रूस पर यह खतरा बना रहता कि अगर उसने हमला किया, तो उसे परमाणु प्रतिक्रिया झेलनी पड़ सकती है। यही वजह है कि रूस ने कभी नाटो के किसी देश पर हमला नहीं किया, क्योंकि नाटो परमाणु हथियारों से लैस है। जबकि उत्तर कोरिया भी अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करता है। अगर यूक्रेन के पास भी परमाणु हथियार होते, तो शायद वह भी इसी नीति का पालन करता।

वहीं, यूक्रेन ने परमाणु हथियार छोड़ने के बदले पश्चिमी देशों की सुरक्षा पर भरोसा किया था। लेकिन जब 2014 में रूस ने क्राइमिया पर कब्जा किया, तब अमेरिका और ब्रिटेन ने सिर्फ बयानबाजी की, कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इससे यह स्पष्ट हो गया कि यूक्रेन ने एक बड़ी गलती कर दी थी। अमेरिकी कूटनीतिज्ञ स्टीवन पीफर ने इसे एक “सामूहिक विफलता” कहा, क्योंकि पश्चिमी देश यूक्रेन की सुरक्षा की गारंटी देने में नाकाम रहे। वहीं, 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर हमला किया, तब भी नाटो (NATO) ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इससे साफ पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय संधियां केवल कागजी होती हैं, जिन पर बड़े देश जब चाहें, पैर रख सकते हैं।

परमाणु हथियार और न्यूक्लियर डिटरेंस: मिलती है सुरक्षा की गारंटी?

भले ही आज ये समय में परमाणु हथियार को इस्तेमाल बेहद मुश्किल है। लेकिन ये हथियार चलाने से ज्यादा डराने के काम आते हैं। परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) आधुनिक युद्ध और वैश्विक शक्ति संतुलन का सबसे बड़ा आधार बन चुके हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, तब दुनिया ने पहली बार इसकी विनाशकारी ताकत देखी। इसके बाद से ही कई देशों ने इसे डिटरेंस (निवारक) हथियार के रूप में अपनाया, ताकि वे किसी भी दुश्मन देश के आक्रमण से बच सकें।

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न्यूक्लियर डिटरेंस (Nuclear Deterrence) का मतलब है कि अगर एक देश के पास परमाणु हथियार हैं, तो दूसरा देश उस पर हमला करने से पहले सौ बार सोचेगा। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक रणनीति है, जो यह संकेत देती है कि हमला करने वाले देश को भी भारी नुकसान झेलना पड़ेगा। यह रणनीति अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों ने अपनाई और इसे “Mutually Assured Destruction (MAD)” कहा जाने लगा।

उदाहरण के तौर पर कोल़्ड वॉर के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ दोनों देशों के पास इतने परमाणु हथियार थे कि अगर एक देश हमला करता, तो दूसरा भी जवाबी हमला कर सकता था। इससे कोई भी देश पहला कदम उठाने से डरता था। भारत-पाकिस्तान दोनों देशों के पास परमाणु हथियार होने के कारण दोनों में सीधा युद्ध नहीं हुआ। यहां तक कि कारगिल युद्ध में भी पाकिस्तान ने परमाणु धमकी दी थी, लेकिन डिटरेंस के चलते भारत पर बड़ा हमला नहीं हुआ। वहीं, उत्तर कोरिया की बात करें, तो अमेरिका और उसके सहयोगी उत्तर कोरिया पर हमला करने से बचते हैं, क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार हैं।

Ukraine Nuclear Weapons: क्या न्यूक्लियर डिटरेंस हमेशा काम करता है?

न्यूक्लियर डिटरेंस की रणनीति हमेशा सफल नहीं होती। अगर एक देश को लगे कि वह जल्द ही हमला नहीं करेगा तो उसकी परमाणु क्षमता नष्ट कर दी जाएगी, तो वह पहले हमला कर सकता है। इसे “First Strike Doctrine” कहा जाता है। वहीं, अगर कोई देश परमाणु हमले के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है, तो उसके पास कोई सुरक्षा नहीं होती।

भारत ने 1974 में अपना पहला परमाणु परीक्षण (Smiling Buddha) किया और 1998 में पूरी तरह से परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन गया। लेकिन भारत की नीति “No First Use” (NFU) यानी पहले हमला नहीं करने की है। इसका मतलब यह है कि भारत परमाणु हथियार तभी इस्तेमाल करेगा जब उस पर पहले हमला होगा। जबकि लेकिन पाकिस्तान की नीति इससे अलग है। पाकिस्तान पहले परमाणु हमला करने की धमकी देता है। उसकी रणनीति “Tactical Nuclear Weapons” यानी छोटे परमाणु हथियारों पर निर्भर करती है।

ट्रंप-जेलेंस्की विवाद और यूरोप की परमाणु नीति पर क्या होगा असर

हाल ही में वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच तीखी बहस हुई। इस बहस ने यूरोप को सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर अमेरिका यूक्रेन से मुंह मोड़ लेता है, तो क्या यूरोप को अपनी रक्षा के लिए परमाणु विकल्प तलाशने की जरूरत है?

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि यूरोप को अपनी स्वतंत्र रक्षा नीति अपनानी चाहिए और अगर जरूरत पड़े तो यूरोपीय परमाणु शक्ति डेवलप करने पर भी विचार किया जाना चाहिए। फ्रांस और ब्रिटेन के पास पहले से ही परमाणु हथियार हैं, लेकिन जर्मनी जैसे देश भी अब इस बहस में शामिल हो रहे हैं।

मैक्रों ने साफ कहा है कि अगर अमेरिका ने रूस के साथ कोई समझौता किया और यूरोप को बातचीत से बाहर रखा, तो यह नाटो गठबंधन के लिए बड़ा झटका होगा। इससे यह संकेत मिलता है कि यूरोपीय देश अब अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपनी रक्षा रणनीति पर फिर से विचार कर सकते हैं।

हालांकि, इस पर भी विवाद है। फ्रांस की विपक्षी नेता मरीन ले पेन ने स्पष्ट कहा कि फ्रांस की परमाणु सुरक्षा “केवल फ्रांस के लिए है” और इसे किसी अन्य देश के साथ साझा नहीं किया जाना चाहिए। फ्रांस के रक्षा मंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने भी कहा कि फ्रांस की परमाणु नीति पूरी तरह से राष्ट्रपति के नियंत्रण में रहेगी।

Ukraine Nuclear Weapons: यूक्रेन में परमाणु हथियारों की फंडिंग शुरू

यूक्रेन के लोगों में इस मुद्दे पर कितनी नाराजगी है, यह हाल ही में सामने आई एक दिलचस्प घटना से साफ होता है। यूक्रेन के एक बैंक “मोनोबैंक” के सह-संस्थापक सेरही होरोखोवस्की ने मज़ाक में एक क्राउडफंडिंग पेज बनाया, जिसमें लिखा था कि वह “यूक्रेन के लिए परमाणु हथियार बनाने के लिए फंड इकट्ठा कर रहे हैं।”

उन्होंने सोचा था कि यह सिर्फ एक मज़ाक रहेगा, लेकिन सिर्फ कुछ घंटों में इस अभियान में लाखों डॉलर जमा हो गए। यह दिखाता है कि यूक्रेन के लोग अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और वे यह मानते हैं कि उनके पास परमाणु हथियार होने चाहिए।

बाद में उन्होंने इस पैसे को ड्रोन और मानवीय मदद के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया, लेकिन इस घटना ने एक गहरी सच्चाई उजागर कर दी कि यूक्रेन के लोग अब सिर्फ पश्चिमी देशों की गारंटी पर भरोसा नहीं कर सकते।

क्या यूक्रेन फिर से परमाणु शक्ति बनने की सोच सकता है?

यूक्रेन ने अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है कि वह फिर से परमाणु हथियार बनाना चाहता है। लेकिन जिस तरह से रूस उसकी संप्रभुता को बार-बार चुनौती दे रहा है, और जिस तरह से अमेरिका की नीतियां अनिश्चित होती जा रही हैं, उसे देखते हुए यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या यूक्रेन को अपने परमाणु कार्यक्रम पर दोबारा विचार करना चाहिए?

अब सवाल यह उठता है कि अगर यूक्रेन फिर से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ता है, तो क्या पश्चिमी देश उसका समर्थन करेंगे, या फिर उस पर प्रतिबंध लगाएंगे?

यह सवाल न केवल यूक्रेन के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। अगर भविष्य में छोटे देश यह महसूस करते हैं कि सुरक्षा संधियां केवल कागजों पर होती हैं, और बड़े देश जब चाहें, उन्हें तोड़ सकते हैं, तो शायद कई अन्य देश भी अपने परमाणु कार्यक्रम शुरू करने के बारे में सोचने लगेंगे।

हालांकि यूक्रेन ने 1994 में अपने परमाणु हथियार छोड़कर एक ऐतिहासिक मिसाल पेश की थी। लेकिन रूस की आक्रामकता ने यह दिखा दिया कि सिर्फ अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। आज, जब यूक्रेन की संप्रभुता खतरे में है और पश्चिमी देशों की गारंटी खोखली साबित हो रही है, तब यह सवाल उठना लाज़मी है क्या यूक्रेन को अपने परमाणु हथियार छोड़ने का फैसला करना चाहिए था? और अगर आज उसके पास ये हथियार होते, तो क्या रूस हमला करने की हिम्मत करता?

HAL LUH: क्या भारतीय सेना को समय पर मिल सकेंगे लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर? या तलाशने होंगे ‘दूसरे’ विकल्प

HAL LUH: Will the Indian Army Get Light Utility Helicopters on Time or Be Forced to Explore 'Other' Options?

HAL LUH: भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने शुक्रवार को सेना मुख्यालय में एक उच्च-स्तरीय बैठक की, जिसमें लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) प्रोजेक्ट में हो रही देरी पर चर्चा की गई। सेना की योजना है कि पुराने पड़ चुके चेतक और चीता हेलीकॉप्टरों की जगह LUH को भारतीय सेना के बेड़े में शामिल किया जाए। बैठक में इस बात पर फोकस किया गया कि क्या हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) के उत्पादन में तेजी ला सकता है या फिर सेना को विकल्पों की और देखना होगा।

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Cheetah और Chetak हेलीकॉप्टरों की उम्र पूरी

भारतीय सेना के पास वर्तमान में 130 से अधिक चेतक और चीता हेलीकॉप्टर हैं। ये हेलीकॉप्टर ऊंचाई वाले इलाकों और दुर्गम क्षेत्रों में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। ये हेलीकॉप्टर अपनी निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर चुके हैं। लेकिन अब इनकी मेंटेनेंस मुश्किल होती जा रही है और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। इस वजह से सेना के पास अब विकल्प हैं कि या तो इन हेलीकॉप्टरों के सर्विस लाइफ को जबरदस्ती बढ़ाया जाए या फिर तत्काल नई खरीद की प्रक्रिया अपनाई जाए।

इन पुराने पड़ चुके हेलीकॉप्टरों की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, पुरानी तकनीक वाले हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल जारी रखना काफी जोखिम भरा है, क्योंकि इन्हें ऑपरेट करना बेहद खतरा भरा है। सेना को जल्द से जल्द एक भरोसेमंद हल्के हेलीकॉप्टर की जरूरत है, जिससे उसकी ऑपरेशनल क्षमताओं में कोई कमी न आए।

इन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों की तैनाती, घायलों को निकालने, निगरानी मिशनों और राशन सप्लाई के लिए किया जाता है। लेकिन बढ़ती तकनीकी चुनौतियों और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण सेना अब इन्हें बनाए रखना मुश्किल पा रही है। इसी वजह से भारतीय सेना जल्द से जल्द इनके बदले नए हेलीकॉप्टरों की तैनाती चाहती है।

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LUH परियोजना में क्यों हो रही देरी?

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बनाए लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) को सेना की जरूरतों के अनुसार बनाया गया है। यह 3 टन वजनी एक इंजन वाला हेलीकॉप्टर है, जिसे ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी सर्विस सीलिंग 6.5 किमी है और यह 260 किमी/घंटे की अधिकतम रफ्तार से उड़ान भर सकता है। यह ग्लास कॉकपिट, क्रैश-रेसिस्टेंट फ्यूल टैंक और दूसरी आधुनिक सुविधाओं से लैस है।

हालांकि, 2020 में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सफल परीक्षण और 2021 में इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (IOC) मिलने के बावजूद, ऑटोपायलट सिस्टम में आई दिक्कतों के चलते से इसकी डिलीवरी में देरी हो रही है। अब तक, अनुमान था कि इसकी डिलीवरी 2024 तक शुरू हो जाएगी, लेकिन ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब इसे कम से कम 2025 के मध्य तक टाला जा सकता है।

ध्रुव हेलीकॉप्टर हादसों ने घटाया सेना का भरोसा

भारतीय सेना की हेलीकॉप्टर जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन HAL की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। ध्रुव हेलीकॉप्टर बेड़े को हाल ही में कई दुर्घटनाओं के बाद ग्राउंडेड कर दिया गया था। 2023 में कई दुर्घटनाओं के बाद, 5 जनवरी 2025 को हुए एक और हादसे के बाद HAL पर भरोसा कम हुआ है। हालांकि, LUH को अब तक इस तरह की दुर्घटनाओं का सामना नहीं करना पड़ा है, लेकिन सेना सतर्क बनी हुई है।

यहां तक कि पिछले महीने फरवरी में Aero India 2025 में, भारतीय सेना के टॉप अधिकारियों ने LUH की डेमो फ्लाइट में बैठने से इनकार कर दिया था। इसके बजाय, उन्होंने इसे केवल ग्राउंड टेस्टिंग के जरिए जांचा। लेकिन एयरफोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने इसकी डेमो फ्लाइट ली थी और एचएएल पर भरोसा जताया था।

सेना के सामने क्या हैं विकल्प

पहला विकल्प यह है कि HAL को एलयूएच के प्रोडक्शन में तेजी लाने को कहा जाए ताकि जल्द से जल्द जरूरी हेलीकॉप्टर सेना को उपलब्ध कराए जा सकें। इसके लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने और जरूरी रिसोर्सेज देने पर जोर दिया जा सकता है।

दूसरा विकल्प हेलीकॉप्टरों की लीजिंग का है। यदि LUH की मैन्युफैक्चरिंग में और देरी होती है, तो सेना अस्थायी रूप से निजी कंपनियों या अंतरराष्ट्रीय निर्माताओं से हेलीकॉप्टर किराए पर लेने पर विचार कर सकती है। इससे तत्काल जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा और सेना के अभियानों में कोई रुकावट नहीं आएगी।

तीसरा विकल्प Cheetah और Chetak हेलीकॉप्टरों का सीमित अपग्रेड हो सकता है। सेना इन पुराने हेलीकॉप्टरों के कुछ हिस्सों को अपग्रेड कर उनकी कार्यक्षमता को बनाए रखने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, यह एक अस्थायी समाधान ही होगा क्योंकि ये हेलीकॉप्टर अपनी टेक्निकल एज पूरी कर चुके हैं और इनका लंबे समय तक सर्विस में बने रहना संभव नहीं होगा।

भारतीय सेना के लिए क्यों LUH क्यों है जरूरी?

भारतीय सेना ऊंचाई वाले क्षेत्रों जैसे लद्दाख, सियाचिन और उत्तर-पूर्वी भारत में तैनात रहती है, जहां पारंपरिक हेलीकॉप्टरों का ऑपरेशन मुश्किल हो जाता है। LUH को विशेष रूप से इन क्षेत्रों में सैनिकों की तैनाती, निगरानी, आपातकालीन चिकित्सा निकासी (MEDEVAC) और रसद आपूर्ति के लिए तैयार किया गया है। अगर इसका उत्पादन और तैनाती में देरी होती है, तो यह भारत की ऑपरेशनल तैयारियों पर असर डाल सकता है, खासकर जब भारत को दो मोर्चों पाकिस्तान और चीन से खतरे का सामना करना पड़ रहा है।

क्या विदेशी हेलीकॉप्टर हो सकते हैं विकल्प?

अगर HAL समय पर LUH की डिलीवरी देने में फेल होता है, तो भारतीय सेना को मजबूरन विदेशी हेलीकॉप्टरों का रुख करना पड़ सकता है। भारत के पास पहले से ही अमेरिकी अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर हैं, लेकिन छोटे और हल्के हेलीकॉप्टरों के लिए अन्य देशों से मदद लेने की जरूरत पड़ सकती है। फ्रांस, अमेरिका और रूस जैसे देशों से भारत हल्के हेलीकॉप्टर खरीद सकता है, लेकिन इससे आत्मनिर्भर भारत अभियान को झटका लग सकता है, क्योंकि भारत स्वदेशी उत्पादन पर अधिक जोर दे रहा है।

दूसरी तरफ रक्षा मंत्रालय (MoD) को भी यह तय करना होगा कि क्या LUH के अतिरिक्त 200 से ज्यादा हेलीकॉप्टरों का निर्माण निजी क्षेत्र को दिया जाए या HAL को ही पूरा ऑर्डर मिले। अगले कुछ महीनों में इस संकट के हल होने की उम्मीद है, लेकिन अगर यह और बढ़ता है, तो सेना को अन्य विकल्पों की तलाश करनी होगी।

Ukraine-US Minerals Deal: क्या जेलेन्स्की के जरिए चीन को साध रहे हैं ट्रंप? दुर्लभ खनिज भंडार हासिल करने के पीछे यह है खेल

Ukraine-US Minerals Deal: Race for Rare Earth Reserves, Is Trump Countering China Through Zelenskyy

Ukraine-US Minerals Deal: यूक्रेन और अमेरिका के बीच दुर्लभ खनिजों और ऊर्जा संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर संभावित समझौता फिलहाल टल गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की के बीच वॉशिंगटन में हुई तीखी बहस के बाद दोनों देशों के बीच इस समझौते को लेकर जारी बातचीत टल गई है। ट्रंप ने यूक्रेन को दी गई अमेरिकी सैन्य मदद को लेकर जेलेन्स्की की कृतज्ञता पर सवाल उठाए, जिसके बाद जेलेन्स्की समय से पहले बैठक छोड़कर निकल गए।

Ukraine-US Minerals Deal: Race for Rare Earth Reserves, Is Trump Countering China Through Zelenskyy

इस समझौते के तहत अमेरिका को यूक्रेन के खनिज संसाधनों तक पहुंच मिलने वाली थी। हालांकि, ट्रंप ने यह स्पष्ट किया था कि यह सौदा अमेरिकी टैक्सपेयर्स को यूक्रेन को दी गई सैन्य सहायता की भरपाई करने में मदद करेगा। दोनों देशों ने समझौते की प्रारंभिक शर्तों पर सहमति जता दी थी, लेकिन वॉशिंगटन में हुए विवाद के बाद इस पर अंतिम हस्ताक्षर नहीं हो सके।

Ukraine-US Minerals Deal: यूक्रेन में मिलते हैं ये रेयर अर्थ एलिमेंट्स

समझौते के मसौदे के मुताबिक अमेरिका को यूक्रेन के विशाल दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ मेटल्स) और ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच मिलती, जिससे यूक्रेन को आर्थिक पुनर्निर्माण में मदद मिलती। यूक्रेन यूरोप में सबसे अधिक दुर्लभ खनिज (Rare Earth Elements – REE) भंडार वाले देशों में से एक है। इसकी धरती में 22 ऐसे खनिज मौजूद हैं, जिन्हें यूरोपीय संघ ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना है। इनमें लिथियम, टाइटेनियम, ग्रेफाइट, ज़िरकोनियम जैसे खनिज शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, अंतरिक्ष और नवीकरणीय ऊर्जा में किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 तक यूक्रेन के दुर्लभ खनिज वैश्विक आपूर्ति का लगभग 5 फीसदी थे। खासतौर पर लिथियम, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी निर्माण में आवश्यक है, उसके 5,00,000 टन अज्ञात भंडार यूक्रेन में मौजूद हैं, जो इसे यूरोप के सबसे बड़े लिथियम उत्पादकों में शामिल कर सकता है। इसके अलावा यूक्रेन दुनिया के टाइटेनियम उत्पादन का 7 फीसदी हिस्सा रखता है, जिसका इस्तेमाल डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री में किया जाता है।

रूस के कब्जे वाले इलाकों में 40 फीसदी मेटल रिसोर्सेज

रूस ने 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण किया, अब तक देश के लगभग 20 फीसदी इलाके पर कब्जा कर चुका है, जिसमें खनिज संपदा से भरपूर लुहान्स्क, दोनेत्स्क, ज़ापोरिज़्ज़िया, डोनबास और खार्किव क्षेत्र शामिल हैं। इन इलाकों में यूक्रेन के 40 फीसदी मेटल रिसोर्सेज स्थित हैं, जो अब रूसी नियंत्रण में हैं। डोनबास में स्थित “शेवचेंको लिथियम फील्ड” को यूक्रेन का सबसे बड़ा लिथियम भंडार माना जाता है।

यूक्रेन सरकार का मानना है कि युद्ध के चलते न केवल आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि हाई-टेक एंड डिफेंस सेक्टर को होने वाली ग्लोबल सप्लाई चेन भी प्रभावित हुई है।

Ukraine-US Minerals Deal: समझौते की प्रमुख शर्तें

ट्रंप प्रशासन ने एक रिकंस्ट्रक्शन इन्वेस्टमेंट फंड (Reconstruction Investment Fund) बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसमें यूक्रेन अपने खनिज संसाधनों से उत्पन्न राजस्व का 50 फीसदी योगदान करेगा। इसका उपयोग युद्ध से प्रभावित यूक्रेन के पुनर्निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास में किया जाएगा। हालांकि, बाकी 50 फीसदी का नियंत्रण किसके पास रहेगा और अमेरिका इसमें कितना प्रभाव डालेगा, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।

राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि अमेरिका को यूक्रेनी खनिज संसाधनों से $500 बिलियन (43.605 लाख करोड़ रुपये) की संभावित आय का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि युद्ध के दौरान दिए गए अमेरिकी सैन्य और वित्तीय सहायता की भरपाई हो सके। हालांकि, इस दावे पर ज़ेलेंस्की ने विरोध जताया है।

यूक्रेन को अब तक अमेरिका से कितनी सहायता मिली?

अमेरिका और यूक्रेन के बीच सहायता राशि को लेकर विवाद जारी है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने यूक्रेन को 350 बिलियन डॉलर (30,615 अरब रुपये) से अधिक की मदद दी है, जबकि यूक्रेन का कहना है कि वास्तविक सहायता इससे कहीं कम है।

कील इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड इकोनॉमी के अनुसार, अमेरिका ने यूक्रेन को अब तक 118 बिलियन डॉलर की सहायता प्रदान की है, जबकि अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार यह आंकड़ा 183 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। जिसमें यूक्रेन की सैन्य आपूर्ति को फिर से शुरू करने की लागत भी शामिल है।

Ukraine-US Minerals Deal: 20,000 खनिज खदानें

युद्ध से पहले, यूक्रेन में कुल 20,000 खनिज खदानें थीं, जिनमें से 8,700 खनिज भंडारों की पुष्टि हो चुकी हैं। देश में मौजूद 120 महत्वपूर्ण खनिजों में से 117 खनिज पाए जाते हैं, जिससे यह खनिज संपदा के मामले में विश्व के शीर्ष देशों में शामिल होता है।

रूस के कब्जे में यूक्रेन का वह हिस्सा है जहां अधिकांश दुर्लभ खनिज मौजूद हैं। इन क्षेत्रों में मौजूद टाइटेनियम, निकेल, कोयला, लौह अयस्क और यूरेनियम भंडार पर रूस का नियंत्रण है, जिससे वह ग्लोबल मिनरल सप्लाई पर खासा असर डाल सकता है। कहा जाता है कि रूस का लुहान्स्क और दोनेत्स्क पर कब्जा करने की एक प्रमुख वजह वहां मौजूद दुर्लभ खनिज और धातु संसाधन भी है।

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यूक्रेन सरकार के अनुसार, इन खनिज संसाधनों की अनुमानित कीमत ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, लेकिन युद्ध के चलते यूक्रेन इनका पूरी तरह दोहन नहीं कर पा रहा है।

  • लुहान्स्क और दोनेत्स्क: लिथियम, कोयला और दुर्लभ धातुओं के बड़े भंडार
  • ज़ापोरिज़िया और निप्रोपेत्रोवस्क: लौह अयस्क, मैंगनीज और टाइटेनियम
  • खार्किव और पोल्टावा: गैस और तेल के महत्वपूर्ण भंडार

दुनिया में दुर्लभ खनिजों के सबसे बड़े भंडार

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, 2025 तक निम्नलिखित देशों के पास सबसे बड़े दुर्लभ खनिज भंडार हैं:

  • चीन – 44 मिलियन मीट्रिक टन (ग्लोबल सप्लाई का 70% कंट्रोल)
  • ब्राजील – 21 मिलियन मीट्रिक टन
  • भारत – 6.9 मिलियन मीट्रिक टन
  • ऑस्ट्रेलिया – 5.7 मिलियन मीट्रिक टन
  • रूस – 3.8 मिलियन मीट्रिक टन
  • वियतनाम – 3.5 मिलियन मीट्रिक टन
  • अमेरिका – 1.9 मिलियन मीट्रिक टन
  • ग्रीनलैंड – 1.5 मिलियन मीट्रिक टन
  • तंजानिया – 890,000 मीट्रिक टन
  • दक्षिण अफ्रीका – 860,000 मीट्रिक टन
  • कनाडा – 830,000 मीट्रिक टन

चीन और रूस के दुर्लभ खनिज बाजार पर कंट्रोल चाहता है अमेरिका

यदि अमेरिका और यूक्रेन के बीच समझौता होता है, तो यह ग्लोबल मिनरल सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है। वहीं, अगर यूक्रेन अपने खनिज संसाधनों का सही तरीके से दोहन कर पाया, तो वह यूरोप की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन सकता है। लेकिन युद्ध के हालात और रूस के कब्जे के चलते इसमें अभी लंबा वक्त लग सकता है। अमेरिका और यूक्रेन के बीच प्रस्तावित समझौता सफल होता है, तो इससे यूक्रेन को आर्थिक पुनर्निर्माण में मदद मिलेगी।

हालांकि, इस समझौते को लेकर यूक्रेन में भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन को अपने संसाधनों पर पूरी संप्रभुता बनाए रखनी चाहिए और इसे बाहरी दबाव में नहीं बेचना चाहिए।

दूसरी ओर, अमेरिका इस डील को अपनी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान रहा है, जिससे वह चीन और रूस के दुर्लभ खनिज बाजार पर कंट्रोल हासिल कर सके। हालांकि अगले कुछ महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या अमेरिका और यूक्रेन के बीच इस समझौता असलियत में तब्दील होता है, या फिर यह भू-राजनीतिक विवादों का एक और शिकार बन जाएगा। लेकिन यह निश्चित है कि यूक्रेन के खनिज संसाधन न केवल इसके आर्थिक भविष्य के लिए बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे।

Opinion: क्या अब ‘नो रिटर्न पॉइंट’ पर पहुंच चुका है मणिपुर? या फिर शांति और विकास की नई सुबह की उम्मीद बाकी है?

MANIPUR: THE CRISIS, CAUSES and REMEDIES written by Lt Gen Pradeep C Nair
Lt Gen Pradeep C Nair (Retd), Ex DG Assam Rifles

Manipur: मणिपुर पिछले कुछ समय से हिंसा, राजनीतिक अस्थिरता और जातीय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। जहां एक ओर घाटी में बसे मैतेई समुदाय और पहाड़ों में रहने वाले कुकी-नागा जनजातियों के बीच अविश्वास बढ़ा है, जहां दोनों पक्ष अपनी-अपनी कहानी पेश कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सुरक्षा बलों और सरकार के प्रयासों के बावजूद स्थायी समाधान की कोई स्पष्ट राह नहीं दिख रही। इस संघर्ष ने न केवल राज्य को बल्कि पूरे उत्तर-पूर्व क्षेत्र को अस्थिरता की तरफ धकेल दिया है। आम जनता उलझन में है कि वास्तविकता क्या है और इसका समाधान कैसे निकलेगा।

MANIPUR: THE CRISIS, CAUSES and REMEDIES written by Lt Gen Pradeep C Nair
Lt Gen Pradeep C Nair (Retd), Ex DG Assam Rifles

हालांकि, पिछले कुछ महीनों में बड़े पैमाने पर हिंसा की घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन जमीनी हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। हाल ही में राज्यपाल बदले गए हैं, जिनका प्रशासनिक अनुभव और क्षेत्र की गहरी समझ, संकट को हल करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। सौभाग्य से, बीते कुछ महीनों से हिंसा की घटनाएं कम हुई हैं और एक अनुभवी राज्यपाल की नियुक्ति से प्रशासनिक मोर्चे पर स्थिरता की उम्मीद जगी है।

कैसे बढ़ता गया Manipur का संकट?

हालांकि, यह संकट एक दिन में नहीं उपजा। इसकी जड़ें कई सालों से चले आ रहे सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक असंतुलन में छिपी हुई हैं। 3 मई 2023 को भड़की हिंसा के पीछे मणिपुर हाई कोर्ट का 27 मार्च 2023 का आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन यह सिर्फ वह चिंगारी थी, जिसने घाटी और पहाड़ों में रहने वाले समुदायों के बीच पहले से दबी हुई असहमति और अविश्वास की आग को भड़का दिया।

2015 में पारित तीन विवादास्पद विधेयक

2015 में जब मणिपुर विधानसभा ने तीन विधेयकों को पारित किया था, मणिपुर पीपुल्स प्रोटेक्शन बिल, लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफॉर्म्स (7वां संशोधन) बिल, और शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट (2nd संशोधन) बिल। ये विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं पा सके, लेकिन इनकी स्वीकृति को पहाड़ियों में रहने वाले नागा और कुकी समुदायों ने अपने अधिकारों के खिलाफ माना। इसके परिणामस्वरूप, अगस्त 2015 में हुई हिंसा में एक मैतेई युवक और नौ कुकी नागरिकों की मौत हो गई। कुकी समुदाय ने इन मृतकों के शव 632 दिनों तक अंतिम संस्कार के लिए रोककर विरोध प्रदर्शन किया।

इस घटना के बाद दोनों समुदायों में अविश्वास बढ़ता गया। हालांकि 2017 में सरकार और जनजातीय संगठनों के बीच समझौते के बाद इन शवों का अंतिम संस्कार हुआ। लेकिन इस संघर्ष की चिंगारी बुझी नहीं, बल्कि समय के साथ और भड़कती गई।

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3 मई 2023 को विरोध प्रदर्शन

2023 में जब राज्य सरकार ने आरक्षित वनों, संरक्षित क्षेत्रों और अतिक्रमण को लेकर सर्वेक्षण किया, तब आदिवासी संगठन इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (ITLF) ने इसके विरोध में बयान जारी किया। मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश के बाद, सेना और असम राइफल्स को यह अंदेशा था कि राज्य में तनाव बढ़ सकता है। इसके बाद 3 मई 2023 को विरोध प्रदर्शन हिंसा में तब्दील हो गया। इंफाल, चुराचांदपुर, बिष्णुपुर, मोरेह और कांगपोकपी जैसे इलाकों में भीषण झड़पें हुईं।

जब हिंसा नियंत्रण से बाहर हो गई, तो हालात को संभालने के लिए भारतीय सेना और असम राइफल्स की तैनाती की गई। दोनों समुदायों के लोग बड़ी संख्या में पलायन करने लगे। सेना और असम राइफल्स ने तुरंत कार्रवाई करते हुए हिंसा को नियंत्रित करने, गांवों को जलने से रोकने, फंसे हुए नागरिकों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और घायलों को चिकित्सा सहायता देने जैसे अहम कार्य किए। हालांकि, उन्हें भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ब्लॉकेड, स्थानीय विरोध, और दोनों समुदायों के उग्रवादी गुटों की गतिविधियों ने शांति स्थापना की प्रक्रिया को जटिल बना दिया।

असम राइफल्स पर लगाए आरोप

हालांकि, सुरक्षा बलों, विशेष रूप से असम राइफल्स पर एकतरफा कार्रवाई करने के आरोप भी लगे। कुकी समुदाय का मानना था कि सेना मैतेई का पक्ष ले रही है, जबकि मैतेई समुदाय का आरोप था कि सुरक्षा बल कुकी जनजातियों के समर्थन में कार्य कर रहे हैं। लेकिन यह आरोप न सिर्फ आधारहीन थे, बल्कि असम राइफल्स के इतिहास को भी अनदेखा करने वाले थे। सच्चाई यह है कि असम राइफल्स और भारतीय सेना को उत्तर-पूर्व में तैनात हुए लगभग 190 साल हो चुके हैं। उन्होंने हमेशा क्षेत्र में शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बावजूद इसके, मणिपुर में बढ़ते अविश्वास ने सुरक्षा बलों के लिए हालात मुश्किल बना दिए हैं।

1956 से असम राइफल्स उग्रवाद विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है और इसने राज्य में आतंकवाद को काबू में लाने में अहम योगदान दिया है। यह आरोप कि सुरक्षा बल किसी एक पक्ष के प्रति झुकाव रखते हैं, सैन्य अनुशासन और उनके कार्यप्रणाली के खिलाफ जाता है।

समस्या का अगली पीढ़ी पर मनोवैज्ञानिक असर

इस संकट का सबसे गहरा प्रभाव मणिपुर की युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। यह हिंसा सिर्फ वर्तमान तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी इस संघर्ष को अपनी कहानियों में संजोए रखेंगी, जिससे राज्य में ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है। यदि दोनों समुदायों के लोग इसे इतिहास की एक कड़वी गलती मानकर आगे बढ़ने का संकल्प लें, तो ही यह जख्म भरा जा सकता है।

Manipur में कैसे खत्म होगी आपसी कटुता

इसके लिए बुजुर्गों, सामाजिक संगठनों, महिला समूहों और युवाओं को आगे आकर शांति की पहल करनी होगी। अनंत संघर्ष कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं होता। इस संकट का स्थायी समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि राजनीतिक पहल और सामुदायिक संवाद के माध्यम से ही संभव है। सभी पक्षों को यह समझने की आवश्यकता है कि अंतहीन हिंसा किसी भी पक्ष के लिए लाभदायक नहीं है। इसके लिए,

  • संविधान के अनुच्छेद 371C के तहत जनजातीय समुदायों को दिए गए विशेष अधिकारों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, ताकि मैतेई और पहाड़ी जनजातियों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
  • सरकार को सभी पक्षों को बातचीत के लिए एक मंच प्रदान करना होगा, ताकि वे अपनी समस्याओं को खुले रूप में रख सकें और समाधान की ओर बढ़ सकें।
  • रोजगार और विकास कार्यक्रमों पर ध्यान दिया जाए, ताकि युवाओं को हिंसा से दूर रखा जा सके और वे एक सकारात्मक भविष्य की ओर बढ़ सकें।

चीन और म्यांमार की भूमिका और मुक्त आवाजाही व्यवस्था (FMR)

उत्तर-पूर्व भारत की स्थिति केवल आंतरिक संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगती है, जहां चीन समर्थित विद्रोही गुट सक्रिय हैं। यह संदेह जताया जा रहा है कि चीन और अन्य बाहरी ताकतें मणिपुर में अस्थिरता बनाए रखने में अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभा रही हैं।

इसके अलावा मणिपुर और म्यांमार की सीमा पर अवैध हथियार और नशीली दवाओं की तस्करी बढ़ रही है। हाल ही में भारतीय तटरक्षक बल ने 36,000 करोड़ रुपये की नशीली दवाओं को जब्त किया, जो म्यांमार से आ रही थीं। इससे साफ है कि मणिपुर संकट केवल जातीय हिंसा तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें संगठित अपराध और अंतरराष्ट्रीय तस्करी भी शामिल है।

भारत सरकार ने म्यांमार से लगी सीमा पर ‘फ्री मूवमेंट रेजीम’ (FMR) को समाप्त करने और सीमा पर बाड़ लगाने की योजना बनाई है। यह कदम सुरक्षा की दृष्टि से जरूरी है, क्योंकि इस व्यवस्था का उपयोग उग्रवादियों और अपराधियों द्वारा गलत तरीके से किया जा रहा था।

हालांकि, इस फैसले को लेकर स्थानीय लोगों में चिंता है कि इससे भारत-म्यांमार के लोगों के सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध प्रभावित होंगे। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह बाड़ आंशिक होगी और केवल चिन्हित प्रवेश और निकासी बिंदुओं से ही आवाजाही होगी।

AFSPA की वापसी और राजनीतिक विवाद

मणिपुर के छह जिलों में AFSPA (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) फिर से लागू किया गया है। यह निर्णय विवादास्पद रहा, लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि जब AFSPA हटाया गया था, तब यह मानकर हटाया गया था कि हालात नियंत्रण में रहेंगे। चूंकि स्थिति बिगड़ चुकी है, इसलिए इसे वापस लाना अपरिहार्य हो गया था।

मीडिया की भूमिका और प्रोपेगेंडा का खेल

मणिपुर संकट में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस पक्षपाती रिपोर्टिंग कर रहे हैं, जिससे हिंसा को और बढ़ावा मिल रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी झूठी खबरें और भ्रामक तस्वीरें साझा की जा रही हैं, जिससे हालात और बिगड़ते जा रहे हैं।

मीडिया को जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी होगी और समाज को जोड़ने वाली सकारात्मक खबरें भी सामने लानी होंगी। दोनों समुदायों में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां लोगों ने एक-दूसरे की मदद की है।

क्या मणिपुर अब एक ‘नो रिटर्न पॉइंट’ पर पहुंच चुका है?

अब राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है और उम्मीद है कि इससे प्रशासन को अधिक प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर मिलेगा। अब सेना और सुरक्षा बलों को शांति बहाल करने और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने का अधिक स्वतंत्र अधिकार मिलेगा। लेकिन असली समाधान सिर्फ सरकार या सुरक्षा बलों के हाथ में नहीं है। मणिपुर के नागरिकों को भी समझना होगा कि हिंसा से कुछ हासिल नहीं होगा। उन्हें अपने समाज की समृद्धि और भविष्य के लिए आगे बढ़ने का रास्ता चुनना होगा।

राज्यपाल की नई भूमिका से उम्मीद है कि जातीय तटस्थता बनी रहेगी और राहत सामग्री का न्यायपूर्ण वितरण होगा। राष्ट्रपति शासन के तहत प्रशासनिक फैसले तेज़ी से लिए जाएंगे, जिससे मणिपुर में धीरे-धीरे स्थिरता लौट सकती है।

मणिपुर संकट को हल करने के लिए स्थानीय समुदायों, सरकार और आम जनता-सभी को मिलकर काम करना होगा। यह केवल एक राज्य का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे उत्तर-पूर्व भारत की स्थिरता और भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” की सफलता से जुड़ा हुआ है। अगर सही दिशा में प्रयास किए गए, तो यह संभव है कि मणिपुर एक बार फिर शांति और विकास की राह पर लौट आए। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हिंसा के बजाय संवाद और सहयोग को प्राथमिकता दी जाए।

यदि हम वास्तव में मणिपुर को संकट से निकालना चाहते हैं, तो हमें नफरत से बाहर निकलकर शांति, संवाद और विकास के रास्ते पर चलना होगा। यही एकमात्र समाधान है, जिससे यह खूबसूरत राज्य अपने पुराने गौरव को फिर से प्राप्त कर सकता है।

लेखक लेफ्टिनेंट जनरल प्रदीप चंद्रन नायर (रिटायर्ड) भारतीय सेना की असम राइफल्स के महानिदेशक रह चुके हैं। वे अति विशिष्ट सेवा पदक (Ati Vishisht Seva Medal) से सम्मानित हो चुके हैं। वे उत्तर-पूर्व भारत में अपने व्यापक सैन्य अनुभव और कुशल नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने मणिपुर में एक ब्रिगेड की कमान संभालते हुए युद्ध सेवा पदक (Yudh Seva Medal) प्राप्त किया था। इसके अलावा, उन्हें तीन बार थलसेना प्रमुख प्रशस्ति पत्र (Chief of Army Staff Commendation Card) से भी सम्मानित किया गया है। लेफ्टिनेंट जनरल नायर ने अपने सैन्य करियर के दौरान असम में 18 सिख बटालियन की कमान संभाली, मणिपुर में ब्रिगेड कमांडर के रूप में सेवाएं दीं, और हाल ही में नागालैंड में असम राइफल्स के महानिरीक्षक (Inspector General of Assam Rifles) के रूप में कार्य किया। उनकी रणनीतिक सोच, नेतृत्व क्षमता और जमीनी अनुभव ने उत्तर-पूर्व में आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Trump-Zelenskyy Clash: ट्रंप-ज़ेलेंस्की विवाद के बाद अमेरिका और यूरोप के बीच दरार, यूक्रेन के समर्थन में उतरे पश्चिमी देश

Trump-Zelenskyy Clash Deepens US-Europe Rift, West Backs Ukraine

Trump-Zelenskyy Clash: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की के बीच व्हाइट हाउस में हुई तीखी बहस ने अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच पहले से बढ़ रही खाई को और गहरा कर दिया है। इस अप्रत्याशित टकराव के बाद यूरोप और पश्चिमी देशों ने ज़ेलेंस्की के प्रति एकजुटता दिखाई, जबकि व्हाइट हाउस ने “अमेरिका फर्स्ट” नीति को आगे बढ़ाते हुए ट्रंप के रुख का बचाव किया।

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Trump-Zelenskyy Clash: व्हाइट हाउस में ट्रंप-ज़ेलेंस्की की तीखी बहस

28 फरवरी 2025 को व्हाइट हाउस में शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की के बीच एक बैठक हुई, जो अप्रत्याशित रूप से एक तीखी बहस में बदल गई। इस दौरान ट्रंप ने ज़ेलेंस्की पर आरोप लगाया कि वह अमेरिका की मदद को हल्के में ले रहे हैं और पर्याप्त आभार नहीं जता रहे। ट्रंप ने कहा, “आप लाखों लोगों की ज़िंदगियों से खेल रहे हैं। आप तीसरे विश्व युद्ध के साथ जुआ खेल रहे हैं, और यह अमेरिका के प्रति बहुत ही असम्मानजनक है।” इस पर ज़ेलेंस्की ने जवाब देते हुए कहा कि “हम अपनी ज़मीन पर किसी हत्यारे (रूस) से समझौता नहीं करेंगे।”

इस घटना के बाद, ज़ेलेंस्की ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर लिखा, “अमेरिका का समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद। यूक्रेन न्यायसंगत और स्थायी शांति के लिए काम कर रहा है।” लेकिन ट्रंप ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि ज़ेलेंस्की “शांति के लिए तैयार नहीं हैं” और जब तक वे अमेरिका का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक वे व्हाइट हाउस में स्वागत योग्य नहीं होंगे।

Trump-Zelenskyy Clash: यूरोप का यूक्रेन का समर्थन

इस विवाद के बाद यूरोपीय देशों ने ज़ेलेंस्की के प्रति आभार व्यक्त किया। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने लिखा, “आपकी गरिमा यूक्रेनी लोगों की वीरता को सम्मानित करती है। आप अकेले नहीं हैं।” फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रूस को स्पष्ट रूप से “आक्रांता” और यूक्रेन को “पीड़ित” बताया, जबकि जर्मनी के संभावित अगले चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने लिखा, “हम यूक्रेन के साथ खड़े हैं और हमेशा खड़े रहेंगे।”

Taliban-India Relations: क्या अफगानिस्तान में फिर से खुलेगा भारतीय दूतावास? तालिबान संग रिश्ते सुधारने की कूटनीतिक कोशिश या मजबूरी?

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने ट्रंप और ज़ेलेंस्की दोनों से बात करने के बाद कहा कि वह जल्द ही यूरोपीय नेताओं की एक बैठक बुलाएंगे ताकि यूक्रेन के समर्थन को और मज़बूत किया जा सके। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, जो ट्रंप की समर्थक मानी जाती हैं, ने अमेरिका और यूरोप के बीच एक आपातकालीन बैठक की मांग की। उन्होंने कहा, “हमारे सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं, विशेष रूप से यूक्रेन को लेकर। हमें बिना किसी देरी के अमेरिका और यूरोप के नेताओं के साथ एक बैठक करनी चाहिए।”

Trump-Zelenskyy Clash: अमेरिका में ट्रंप के रुख की आलोचना

व्हाइट हाउस ने एक आधिकारिक बयान जारी कर ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस की “अमेरिका फर्स्ट” नीति का समर्थन किया। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका के लिए जो कदम उठाए हैं, वे किसी भी पूर्व राष्ट्रपति से कहीं अधिक साहसिक हैं।” वहीं, ट्रंप समर्थक और अमेरिकी गृह सुरक्षा मंत्री क्रिस्टी नोएम ने लिखा, “हम अमेरिका का अपमान सहन नहीं करेंगे। अमेरिका वापस आ गया है!”

हालांकि, ट्रंप के इस रुख की अमेरिका में भी आलोचना हुई। अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य राजा कृष्णमूर्ति ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप और उपराष्ट्रपति वांस ने ज़ेलेंस्की के साथ जिस तरह का व्यवहार किया, वह अपमानजनक था। अमेरिकी जनता यूक्रेन के साथ खड़ी है, भले ही हमारा राष्ट्रपति रूस और क्रेमलिन से नज़दीकी बढ़ाने की कोशिश कर रहा हो।” उन्होंने ट्रंप पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पक्ष में झुकने का आरोप लगाया।

रूस ने ट्रंप के बयान का स्वागत किया

रूस ने इस घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इसे यूक्रेन के लिए “झटका” बताया। रूस की सुरक्षा परिषद के उपप्रमुख दिमित्री मेदवेदेव ने ट्रंप के रवैये की सराहना की और ज़ेलेंस्की पर हमला बोलते हुए कहा, “अमेरिका ने पहली बार ज़ेलेंस्की को उसकी जगह दिखाई है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन का नेतृत्व तीसरे विश्व युद्ध के साथ जुआ खेल रहा है और उन्हें सबक सिखाने की जरूरत है। जबकि रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने ज़ेलेंस्की को “झूठा” और “धोखेबाज” बताते हुए कहा कि ट्रंप ने “संयम” का परिचय दिया।

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अमेरिका-यूरोप के संबंधों में दरार

इसके विपरीत, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने लिखा, “यूक्रेन के लोगों की लड़ाई लोकतंत्र, स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए है, और हम उनके साथ खड़े रहेंगे।” ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा, “यूक्रेन का संघर्ष सिर्फ उसकी आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों की रक्षा के लिए भी है।”

वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज़ ने इस मामले पर अमेरिका को चेतावनी दी कि यदि वह यूक्रेन को समर्थन देना बंद करता है, तो इससे यूरोप की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

Trump-Zelenskyy Clash: यूक्रेन ने फिर मांगा समर्थन

इस पूरे घटनाक्रम के बाद ज़ेलेंस्की ने एक बार फिर अमेरिका से मदद की अपील की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “धन्यवाद अमेरिका, आपके समर्थन के लिए धन्यवाद। यूक्रेन को एक निष्पक्ष और स्थायी शांति की आवश्यकता है, और हम उसी के लिए काम कर रहे हैं।”

नाटो देशों की बढ़ी चिंता

इस घटना के बाद नाटो देशों ने यूक्रेन को समर्थन जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। लिथुआनिया के राष्ट्रपति गितानास नाउसिडा ने कहा, “यूक्रेन, तुम कभी अकेले नहीं चलोगे।” स्वीडन, फिनलैंड, पोलैंड, लातविया और नॉर्वे के नेताओं ने भी यूक्रेन के साथ अपनी प्रतिबद्धता जताई।

इस विवाद के बाद, कई यूरोपीय नेताओं ने खुले तौर पर कहा कि अब उन्हें “स्वतंत्र नेतृत्व” की ज़रूरत है। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास ने कहा, “स्पष्ट है कि दुनिया को एक नए नेता की ज़रूरत है।” फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने यूक्रेन की मदद के लिए एक अलग सैन्य गठबंधन बनाने की संभावना पर भी चर्चा शुरू कर दी है।

क्या ट्रंप यूक्रेन के लिए अमेरिकी मदद कम करेंगे?

व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन आने वाले महीनों में यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य सहायता की समीक्षा कर सकता है। ट्रंप पहले ही कई बार कह चुके हैं कि अमेरिका “यूक्रेन के युद्ध में फंसा नहीं रह सकता” और यूरोप को ज़्यादा ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।

अगर ट्रंप ने अमेरिका की सहायता में कटौती की, तो इससे यूक्रेन के लिए बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी कांग्रेस के दोनों दलों में कई नेता यूक्रेन के समर्थन में हैं और इस पर अंतिम फैसला अमेरिकी संसद के हाथ में रहेगा।

वहीं, ट्रंप के इस फैसले से न केवल यूक्रेन के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, बल्कि इससे रूस को भी रणनीतिक फायदा मिल सकता है। हालांकि, यूरोप ने यह संकेत दिया है कि वह बिना अमेरिका के भी यूक्रेन का समर्थन जारी रखेगा।

IAF Chief बोले- भारतीय वायुसेना को हर साल चाहिए 35-40 नए फाइटर जेट, निजी क्षेत्र की भागीदारी पर दिया जोर

IAF Chief: Indian Air Force Needs 35-40 New Fighter Jets Annually, Stresses Private Sector Involvement

IAF Chief: भारतीय वायुसेना को अपनी युद्ध क्षमता को बनाए रखने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए हर साल कम से कम 35-40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। यह मांग वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान रखी। उन्होंने कहा कि मौजूदा बेड़े में मौजूद अंतर को भरने और अगले कुछ वर्षों में चरणबद्ध तरीके से सेवा से बाहर हो रहे मिराज, मिग-29 और जगुआर जैसे पुराने लड़ाकू विमानों की भरपाई करने के लिए यह बेहद जरूरी है।

IAF Chief: Indian Air Force Needs 35-40 New Fighter Jets Annually, Stresses Private Sector Involvement

IAF Chief: वायुसेना की जरूरतें और मौजूदा चुनौतियां

एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने इस मौके पर कहा, “हमें हर साल दो स्क्वाड्रन जोड़ने की जरूरत है, यानी 35-40 नए विमान चाहिए। इस क्षमता को रातों-रात तैयार नहीं किया जा सकता।” वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास केवल 31 स्क्वाड्रन हैं, जबकि पाकिस्तान और चीन जैसे दो मोर्चों पर संभावित युद्ध के लिए कुल 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है। ऐसे में नए विमानों की संख्या बढ़ाना वायुसेना के लिए एक प्राथमिकता बन गया है।

अभी वायुसेना मिराज-2000, मिग-29 और जगुआर जैसे लड़ाकू विमानों का उपयोग कर रही है, जो 1980 के दशक में शामिल किए गए थे। इन विमानों की संख्या लगभग 250 है और इन्हें विस्तारित लाइफ-साइकिल के तहत ऑपरेट किया जा रहा है। लेकिन 2029-30 के बाद इन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाने की योजना है। ऐसे में नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का तेजी से निर्माण जरूरी हो गया है।

तेजस की उत्पादन क्षमता पर उठे सवाल

वायुसेना प्रमुख ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा निर्मित तेजस लड़ाकू विमानों को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा, “HAL ने अगले साल 24 तेजस मार्क-1A विमानों के उत्पादन का वादा किया है, और मैं इससे खुश हूं। लेकिन हमें और अधिक विमानों की आवश्यकता है।” उन्होंने HAL द्वारा तेजस के उत्पादन में देरी पर भी चिंता व्यक्त की। दरअसल, HAL को 83 तेजस मार्क-1A विमानों की आपूर्ति करनी है, लेकिन इसका उत्पादन तय समय से पीछे चल रहा है।

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IAF Chief ने प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को बताया जरूरी

वायुसेना प्रमुख ने साफ संकेत दिए कि लड़ाकू विमानों के उत्पादन में निजी क्षेत्र को शामिल किए बिना जरूरी संख्या को पूरा कर पाना मुश्किल होगा। उन्होंने टाटा-एयरबस द्वारा निर्मित C-295 ट्रांसपोर्ट विमान का उदाहरण देते हुए कहा कि निजी क्षेत्र की भागीदारी से 12-18 विमानों का अतिरिक्त प्रोडक्शन संभव हो सकता है।

उन्होंने कहा, “मैं यह वचन ले सकता हूं कि मैं विदेशी लड़ाकू विमान नहीं खरीदूंगा, लेकिन हमारे पास संख्या की भारी कमी है। वादा किए गए विमानों की डिलीवरी धीमी है, और इस अंतर को भरने के लिए हमें अन्य विकल्पों पर भी विचार करना होगा।”

इससे पहले, एयरो इंडिया 2025 में भी वायुसेना प्रमुख ने तेजस मार्क-1A के उत्पादन की गति को लेकर चिंता जताई थी और इसे तेज करने की जरूरत बताई थी।

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2024 के बाद वायुसेना की रणनीति

भविष्य की योजनाओं को लेकर एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि 2047 तक भारतीय वायुसेना को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और अत्याधुनिक बनाना प्राथमिकता होगी। उन्होंने बताया कि भविष्य में वायुसेना का ढांचा मौजूदा बेड़े से बहुत अलग नहीं होगा, लेकिन तकनीक में बड़ा बदलाव आएगा। उन्होंने कहा, “हमें डेटा ट्रांसफर और लक्ष्यों को वास्तविक समय में सभी प्लेटफार्मों तक पहुंचाने में सक्षम होना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा कि इससे हमें भविष्य में ऑटोमेशन और जल्दी फैसला लेने की क्षमता बढ़ेगी। वायुसेना आकार में भी बड़ी होगी और तकनीक के मामले में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होगी।

क्या रक्षा मंत्रालय बढ़ाएगा निजी क्षेत्र की भागीदारी?

रक्षा मंत्रालय पहले ही एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर चुका है, जो लड़ाकू विमानों के धीमे उत्पादन की समस्या पर समाधान सुझाएगी। इसमें निजी क्षेत्र को अधिक भागीदारी देने का विकल्प भी शामिल है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी कंपनियों को लड़ाकू विमानों के निर्माण में शामिल किया जाता है, तो प्रोडक्शन में तेजी आ सकती है और वायुसेना की जरूरतों को समय पर पूरा किया जा सकता है।

वायुसेना के बेड़े में क्या होंगे बदलाव?

वर्तमान में भारतीय वायुसेना की प्राथमिकता स्वदेशी तकनीक को अपनाने की है। एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा, “अगर हमें कोई घरेलू तकनीक मिलती है जो विदेशी प्लेटफार्मों की 90% क्षमता तक पहुंचती है, तो मैं उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हूं। हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।”

विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस मार्क-1A और भविष्य के AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) जैसे स्वदेशी विमान वायुसेना की रीढ़ बन सकते हैं। लेकिन इसकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र का सहयोग जरूरी होगा।

Air Defence: ड्रोन हमलों से निपटने की बड़ी तैयारी, भारतीय सेना के एयर डिफेंस को मिलेगा हाई-टेक अपग्रेड

Air Defence: Indian Army Gears Up for High-Tech Upgrade to Counter Drone Threats

Air Defence: भारतीय सेना ने सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के सहयोग से पुणे में एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया, जिसका विषय था “मॉर्डन वारफेयर्स में एयर डिफेंस: सीख और भविष्य की क्षमताएं”। इस कार्यक्रम में सेना के टॉप अफसर, डिफेंस एक्सपर्ट और पॉलिसी मेकर्स शामिल हुए। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना के एयर डिफेंस सिस्टम को और अधिक मजबूत बनाना था, जिससे उभरते खतरों, विशेष रूप से ड्रोन हमलों और एडवांस मिसाइलों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।

Air Defence: Indian Army Gears Up for High-Tech Upgrade to Counter Drone Threats

Air Defence: बढ़ रहा ड्रोन और हवाई खतरा 

मॉर्डन वारफेयरों में ड्रोन का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। ये अब केवल निगरानी और टोही तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सटीक हमलों, इलेक्ट्रॉनिक जासूसी और सुसाइड मिशनों में भी इनका इस्तेमाल किया जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और हाल ही में गाजा संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वॉर्म ड्रोन (Drone Swarms) और लंबी दूरी की मिसाइलें युद्ध के परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकती हैं। भारतीय सेना के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह अपनी एयर रक्षा क्षमताओं को इस नई वास्तविकता के अनुरूप ढाले।

Air Defence: रूस-यूक्रेन युद्ध से भारत के लिए सबक

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने यह दिखाया कि मॉर्डन वारफेयर में एयर डिफेंस सिस्टम कितना महत्वपूर्ण होता है। यूक्रेन ने अपने S-300, पैट्रियट, NASAMS, IRIS-T और SAMP-T जैसे एडवांस डिफेंस सिस्टम्स का इस्तेमाल करके रूसी हमलों को काफी हद तक विफल किया। दूसरी ओर, रूस की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare – EW) तकनीक ने यूक्रेनी ड्रोन हमलों को बेअसर कर दिया।

Air Defence: Indian Army Gears Up for High-Tech Upgrade to Counter Drone Threats

इस युद्ध से यह भी स्पष्ट हुआ कि पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम अब काफी नहीं हैं। फाइबर-कंट्रोल (OFC) FPV ड्रोन जैसी नई तकनीकों ने पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम को भी बेअसर करना शुरू कर दिया है। भारत के लिए यह जरूरी है कि वह इन तकनीकों से सीखते हुए अपने डिफेंस सिस्टम को लगातार अपग्रेड करे।

Air Defence: भारतीय सेना की नई रणनीति

भारतीय सेना मल्टी-लेयरड डिफेंस सिस्टम विकसित कर रही है, इसमें लंबी, मध्यम और छोटी दूरी के डिफेंस सिस्टम शामिल हैं, जो विभिन्न दूरी पर खतरों का पता लगाकर उन्हें नष्ट कर सकेंगे। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) तकनीक का उपयोग कर दुश्मन के ड्रोन को जैमिंग और सिग्नल इंटरफेरेंस के माध्यम से बेअसर किया जा रहा है। इसके अलावा, बेहतर कमांड और कंट्रोल सिस्टम के माध्यम से हवाई क्षेत्र की निगरानी को मजबूत किया जा रहा है ताकि तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सके।

इसमें ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस (GBAD) और एंटी ड्रोन (C-UAS) क्षमताओं का व्यापक इस्तेमाल किया जाएगा। ताकि ड्रोन और मिसाइल खतरों से बचा जा सके। एंटी ड्रोन (C-UAS) क्षमताओं को सभी मिलिट्री ऑपरेशंस में शामिल करना आवश्यक है। इसके साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) और जैमिंग टेक्नोलॉजी एयर डिफेंस में एक निर्णायक भूमिका निभाएगी। भविष्य के युद्धों में स्वॉर्म ड्रोन, पैदल सेना, तोपखाने और वायु सेना के साथ मिलकर काम करेंगे, जिससे पारंपरिक युद्ध रणनीतियों में बड़ा बदलाव आएगा।

Army Air Defence: ड्रोन अटैक से निपटने के लिए स्मार्ट बन रही भारतीय सेना, सॉफ्ट किल और हार्ड किल सिस्टम से ढेर होंगे दुश्मन के Drone

सेना इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) और जैमिंग तकनीक को भी एडवांस करने पर काम कर रही है। यह तकनीक दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों के नेविगेशन और कम्यूनिकेशन को जाम कर सकती है, जिससे हमलों को रोका जा सकता है। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बेस्ड सर्विलांस सिस्टम और मशीन लर्निंग तकनीकों का उपयोग करके ड्रोन गतिविधियों की पहचान और ट्रैकिंग को और तेज किया जा रहा है।

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स्वदेशी डिफेंस सिस्टम

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत, भारत एयर डिफेंस और एंटी ड्रोन सिस्टम डेवलप करने पर तेजी से काम कर रहा है। आर्मी डिजाइन ब्यूरो (ADB) स्टार्टअप्स और डिफेंस कंपनियों के साथ मिलकर अगली पीढ़ी की एंटी-ड्रोन तकनीक, हाइब्रिड C-UAS सिस्टम (Counter-Unmanned Aerial System) और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का सामना करने की टेक्नोलॉजी डेवलप कर रहा है।

Xploder UGV: भारतीय सेना की सभी यूनिट्स को मिलेगा यह स्वदेशी रोबोट! आतंकवादियों के लिए है खतरे की घंटी!

Xploder UGV: Indian Army New Indigenous Robot, A Nightmare for Terrorists!

Xploder UGV: भारतीय सेना ने अपनी ऑपरेशनल कैपेबिलिटीज और इंप्रूव करने के लिए स्वदेशी रूप से विकसित किए गए ‘Xploder’ नामक अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल (UGV) को शामिल करने का फैसला लिया है। इस रोबोटिक व्हीकल को भारतीय सेना के 7 इंजीनियर रेजिमेंट के मेजर राजप्रसाद ने डेवलप किया है। Xploder UGV को उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सेक्टरों में आतंकवाद और घुसपैठ के खिलाफ ऑपरेशंस में इस्तेमाल किया जाएगा।

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Xploder UGV: भारतीय सेना के मेजर ने किया है तैयार

मेजर राजप्रसाद के बनाए इस स्वदेशी मानवरहित ग्राउंड व्हीकल को पिछले दो सालों में कड़े परीक्षणों से गुजरना पड़ा है। अब यह सेना की सभी जरूरतों को पूरा करने के बाद बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए तैयार है। एक निजी भारतीय डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी इसे बनाएगी और आने वाले महीनों में सैकड़ों यूनिट्स भारतीय सेना की इंफैंट्री, स्पेशल फोर्सेज और इंजीनियरिंग कोर में शामिल की जाएंगी।

मेजर राजप्रसाद ने बताया, “हमने दशकों से IED की चुनौती का सामना किया है। इसे हल करने के लिए मैंने इस तकनीक पर काम करना शुरू किया। Xploder सैनिकों की जान बचाने के साथ-साथ अभियान की प्रभावशीलता को भी बढ़ाएगा।”

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‘Xploder’ को खासतौर पर आतंकवाद विरोधी अभियानों और विस्फोटक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) को निष्क्रिय करने के लिए बनाया गया है। सालों से, आतंकवादी संगठनों के आईईडी हमलों में कई भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई है। इस खतरे को देखते हुए, मेजर राजप्रसाद ने इस समस्या का हल खोजने का फैसला लिया और सेना की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत ‘Xploder’ को बनाया।

इस UGV का ट्रायल राजस्थान के रेगिस्तान, जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर के घने जंगलों में किया गया है। ट्रायल्स के दौरान इसकी क्षमताओं को लगातार बेहतर बनाया गया और सेना के फील्ड कर्मियों से प्राप्त सुझावों के आधार पर इसमें कई महत्वपूर्ण सुधार भी किए गए।

मेजर राजप्रसाद का कहना है, “हमने इसे एक मल्टिफंक्शनल प्लेटफॉर्म के तौर पर डेवलप किया है। यह दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने से लेकर आपदा राहत कार्यों तक कई भूमिकाएं निभा सकता है।”

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Xploder UGV की खूबियां

500 किलोग्राम से कम वजन वाला यह रोबोटिक वाहन कई कामों को अंजाम दे सकता है, जिनमें शामिल हैं: बिना मानव हस्तक्षेप के निगरानी और टोही अभियान, विस्फोटक उपकरणों को निष्क्रिय करना, आतंकवादियों के ठिकानों पर बम गिराना, ‘कामिकाज़े मिशन’ के माध्यम से दुश्मन ठिकानों को नष्ट करना औऱ आपदा राहत कार्यों में मदद करना, जैसे भूकंप या बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री पहुंचाना शामिल है।

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‘Xploder’ में उच्च-रिज़ॉल्यूशन कैमरे और अत्याधुनिक सेंसर लगे हैं, जिससे इसे रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट किया जा सकता है और सैनिकों की जान का भी जोखिम नहीं रहता। इस व्हीकल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे 1 किलोमीटर से भी अधिक दूरी से कंट्रोल किया जा सकता है।

मॉर्डन वॉरफेयर में मिलेगा फायदा

भारतीय सेना लगातार खुद को मॉर्डनाइज कर रही है। चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच Xploder का शामिल होना ग्राउंड ऑपरेशन में भारतीय सेना को बढ़त देगा। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और HNLC द्वारा IED का बढ़ता उपयोग एक प्रमुख चिंता का विषय रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, Xploder की रिमोट ऑपरेशन क्षमता 1 किलोमीटर से अधिक है, जिससे सैनिक दूर से ही खतरों को खत्म कर सकते हैं। इसमें हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरा और रोबोटिक आर्म्स हैं, जो IED को निष्क्रिय करने या लक्षित हमलों के लिए विस्फोटक पहुंचाने में सक्षम बनाते हैं।

आतंकवाद प्रभावित इलाकों में मजबूत होगा सुरक्षा ढांचा

भारत के जम्मू-कश्मीर, मणिपुर और असम जैसे क्षेत्रों में आतंकी गतिविधियों के कारण सुरक्षा बलों को लगातार आईईडी हमलों का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार, 2020 से 2022 के बीच 50 से अधिक आईईडी विस्फोट की घटनाएं सामने आई थीं, जिनमें कई सैनिक शहीद हुए थे। ‘Xploder’ के आने से अब सैनिकों को सीधे तौर पर इन खतरों का सामना नहीं करना पड़ेगा और वे दूर से ही विस्फोटकों को निष्क्रिय कर सकेंगे। इसके अलावा, यह UGV आतंकवादियों के ठिकानों पर विस्फोटक उपकरण गिराकर पहले से ही उनके हमलों को नाकाम कर सकता है।

मेजर राजप्रसाद के अनुसार, “पहले सैनिकों को आईईडी निष्क्रिय करने के लिए खुद मौके पर जाना पड़ता था, जिससे उनकी जान को खतरा होता था। अब ‘Xploder’ इस काम को पूरी सुरक्षा के साथ कर सकता है। परीक्षणों में यह पाया गया कि यह कठिन से कठिन इलाकों में भी काम कर सकता है।” यह रोबोटिक व्हीकल न केवल नियंत्रण रेखा (LoC) और भारत-म्यांमार सीमा पर निगरानी करने में मदद करेगा, बल्कि घने जंगलों में छिपे आतंकवादियों के खिलाफ भी प्रभावी साबित होगा।

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जल्द सेना में होगी तैनाती

Xploder उन तीन नई तकनीकों में से एक है, जिन्हें सेना ने अगले छह महीनों में शामिल करने की मंजूरी दी है। अन्य दो तकनीकों में “विद्युत रक्षक” नामक IoT-सक्षम जनरेटर मॉनिटरिंग सिस्टम और “अग्निअस्त्र” नामक मल्टी टारगेट रिमोट डिटोनेशन डिवाइस शामिल हैं। अगस्त 2024 में उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजसुब्रमणि की मौजूदगी में इन दोनों तकनीकों के बड़े पैमाने पर उत्पादन का रास्ता साफ किया गया था।

इसके अलावा, मेजर राजप्रसाद की पहले से ही विकसित “WEDC” (वायरलेस इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेशन सिस्टम) 2023 से भारतीय सेना में सेवा दे रही है।

भारतीय सेना की इस नई तकनीक का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान और चीन अपनी अलग रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। पाकिस्तान हाल ही में तुर्की के बायराकतार TB2 और विंग लूंग II जैसे हवाई ड्रोन पर फोकस कर रहा है। दूसरी ओर, चीन ने भारत-चीन सीमा पर टाइप 15 हल्के टैंक तैनात किए हैं। लेकिन ‘Xploder’ इन खतरों के खिलाफ भारतीय सेना को जमीनी स्तर पर एक बड़ा सामरिक लाभ प्रदान करेगा।

आपदा प्रबंधन में भी करेगा मदद

Xploder केवल सैन्य अभियानों के लिए ही नहीं बल्कि आपदा प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह बाढ़ और भूकंप प्रभावित इलाकों में मलबे के बीच से गुजरकर राहत सामग्री पहुंचाने और क्षति का आकलन करने में सक्षम होगा। बाढ़ और भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में यह रोबोट रेस्क्यू ऑपरेशन को अधिक प्रभावी बना सकता है। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कई उपयोगकर्ताओं ने इसे भारतीय सेना के लिए गेम-चेंजर बताया है।

Lt Col Habib Zahir: बेनकाब हुआ पाकिस्तान का झूठ, 2017 में जिस कर्नल के नेपाल से किडनैप का भारत पर लगाया था आरोप, क्वेटा में मारी गोली

Lt Col Habib Zahir: Pakistan's Lie Exposed! Officer Allegedly Kidnapped by India in 2017 Shot Dead in Quetta
Lt Col Habib Zahir

Lt Col Habib Zahir: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के एजेंट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) हबीब जहीर का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पाकिस्तानी सेना के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल हबीब जहीर को क्वेटा में अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी। हबीब 2017 में नेपाल से रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे। पाकिस्तान ने 2017 में उनके नेपाल से गायब होने के लिए भारत की खुफिया एजेंसी RAW को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन अब 8 साल बाद क्वेटा में उनकी हत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या पाकिस्तान ने अपने ही झूठ को छुपाने के लिए हबीब जहीर को मार डाला? या फिर यह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के “क्लीनअप ऑपरेशन” का हिस्सा था?

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Lt Col Habib Zahir: 2017 में नेपाल से लापता, अब क्वेटा में हत्या

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला क्वेटा की जेल रोड पर हुआ, जहां मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उन्हें निशाना बनाया। इस घटना ने पाकिस्तान के पुराने दावों को एक बार फिर संदेह के घेरे में ला दिया है, जिसमें उसने भारत पर कर्नल हबीब के अपहरण का आरोप लगाया था। 6 अप्रैल 2017 को पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी कर्नल हबीब जहीर नेपाल के लुंबिनी क्षेत्र में अचानक लापता हो गए थे। पाकिस्तान सरकार ने उस समय भारत की खुफिया एजेंसी RAW पर आरोप लगाया था कि उसने उन्हें अगवा कर लिया। पाकिस्तानी के पूर्व विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ उस दौरान ने बयान जारी कर कहा था कि एक जांच रिपोर्ट के अनुसार तीन भारतीय नागरिकों ने कर्नल हबीब का अपहरण किया और यह का अपहरण भारतीय एजेंसियों की साजिश हो सकता है।

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क्या पाकिस्तान ने खुद गढ़ी थी अपहरण की कहानी?

हालांकि, इस दावे के समर्थन में पाकिस्तान कोई ठोस सबूत नहीं दे सका। उस समय पाकिस्तान ने दावा किया था कि हबीब जहीर एक फर्जी नौकरी के झांसे में नेपाल गए थे। LinkedIn और UN की जॉब साइट पर अपना बायोडाटा डालने के बाद, उन्हें मार्क थॉम्पसन नामक व्यक्ति का ईमेल/कॉल आया, जिसने नेपाल में वाइस प्रेसिडेंट पद के लिए इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। हबीब को ओमान एयरलाइंस का टिकट भेजा गया और वे पाकिस्तान से होकर काठमांडू पहुंचे। काठमांडू एयरपोर्ट पर उतरने के बाद वह बुद्धा एयर से लुंबिनी पहुंचे, जो भारत की सीमा से केवल 5 किलोमीटर दूर है। वहीं से उनका मोबाइल अचानक बंद हो गया और वे रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। उनकी आखिरी मोबाइल लोकेशन भारत-नेपाल सीमा से 5 किलोमीटर दूर दर्ज की गई थी।

Lt Col Habib Zahir: कैसे बेनकाब हुआ पाकिस्तान का झूठ?

लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) हबीब ज़हूर (जिन्हें मोहम्मद हबीब ज़हिर भी कहा जाता है) के 6 अप्रैल 2017 को नेपाल में गायब होने के बाद, पाकिस्तान ने भारत पर उनके अपहरण का आरोप लगाया और कहा कि RAW ने उन्हें पकड़ लिया है। इस दावे को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान ने कहा कि कर्नल हबीब को भारत लाकर कुलभूषण जाधव की रिहाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

लेकिन जब नेपाल पुलिस और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इस मामले की जांच शुरू की, तो पता चला कि जिस वेबसाइट से उन्हें नौकरी का ऑफर मिला था, वह नेपाल में बनी थी और बाद में डिलीट कर दी गई। साथ ही, मार्क थॉम्पसन नाम का व्यक्ति और जिस ब्रिटिश मोबाइल नंबर से हबीब को संपर्क किया गया था, वह इंटरनेट प्रोटोकॉल नंबर था। यह पूरी स्क्रिप्ट किसी हॉलीवुड फिल्म की तरह तैयार की गई थी। यहां तक कि हबीब के परिवार ने संयुक्त राष्ट्र (UN) वर्किंग ग्रुप ऑन एनफोर्स्ड इनवॉलंटरी डिसअपीयरेंस (Enforced Involuntary Disappearances) से संपर्क किया था और इस मामले की जांच की मांग की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।

सूत्रों का कहना है कि लेफ्टिनेंट कर्नल हबीब ज़हूर शुरू से ISI के लिए काम करते थे। हबीब ने 2014 में सेना से रिटायरमेंट के बाद कुछ समय ISI के अंडरकवर एजेंट के रूप में काम किया था। हबीब एक खास मिशन पर नेपाल गए थे। उन्होंने विदेश यात्रा के लिए ISI से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) भी लिया था, जो 31 मार्च 2017 को ISI के लेफ़्टिनेंट कर्नल आतिफ़ अनवर डार के हस्ताक्षर से जारी हुआ। लेकिन जब नेपाल में हबीब से संपर्क टूट गया, तो ISI ने उनसे पल्ला झाड़ लिया। ताकि वह पकड़े जाने की सूरत में जिम्मेदारी से इनकार कर सके।

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क्वेटा में हत्या के पीछे ISI का हाथ?

अब जब कर्नल हबीब को पाकिस्तान के ही प्रांत क्वेटा में गोली मार दी गई है, तो सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान सरकार इस मामले की जांच करेगी? या फिर यह मामला भी पाकिस्तान की सेना और ISI के आंतरिक सत्ता संघर्ष का हिस्सा है?

रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड कर्नल संदीप प्रभाकर सवाल करते हैं, अगर कर्नल हबीब जिंदा थे, तो उन्होंने 8 साल तक पाकिस्तान को क्यों नहीं बताया? उनका मानना है कि यह मामला खुद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की ही साजिश हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ISI उन ऑपरेटिव्स को ठिकाने लगाती है, जो अब उसके लिए खतरा बन जाते हैं। 2021 से, कई पूर्व पाकिस्तानी खुफिया अधिकारी और सेना से जुड़े लोग संदिग्ध परिस्थितियों में मारे गए हैं। हो सकता है कि कर्नल हबीब भी इस “क्लीनअप ऑपरेशन” का शिकार बने हों।

उन्होंने खुलासा करते हुए कहा कि 2010 में दो पूर्व ISI अधिकारी कर्नल इमाम (सुल्तान आमिर) और स्क्वाड्रन लीडर खालिद ख़्वाजा पाकिस्तान के कबायली इलाके से लापता हो गए थे और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। वे कभी तालिबान के करीबी रहे थे और एक डॉक्यूमेंट्री बनाने गए थे, जब “अनजान लोगों” ने उनका अपहरण कर लिया। इस अपहरण के लिए शक की सुई तालिबान के साथ-साथ ISI पर भी गई थी​। वहीं, हाल ही में, 2024 में पूर्व ISI प्रमुख फ़ैज़ हमीद की गिरफ़्तारी ने दिखाया कि सेना और आईएसआई कैसे अपने लोगों पर भी शिकंजा कस सकती है। फैज को मिलिट्री रूल्स तोड़ने के मामले में हिरासत में लिया गया​ था।

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क्या पाकिस्तान अपनी ही खुफिया के खिलाफ जांच करेगा?

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में सेना और खुफिया एजेंसी ISI के बीच कई मामलों में टकराव की खबरें आती रहती हैं। कई बार यह आरोप भी लगते रहे हैं कि ISI अपने पुराने एजेंट्स को ठिकाने लगा देती है, जो सरकार और सेना के लिए राजनीतिक रूप से खतरनाक साबित हो सकते हैं। वह कहते हैं कि क्वेटा में हुई कर्नल हबीब की हत्या इसी पैटर्न का हिस्सा लगती है। अगर इस हत्या के पीछे ISI का हाथ है, तो यह पाकिस्तान के लिए बड़ी बदनामी हो सकती है। कर्नल प्रभाकर के मुताबिक क्या पाकिस्तान इस हत्या की जांच करेगा? अगर वह जांच करता है तो क्या वह अपनी ही एजेंसी के खिलाफ जांच करने की हिमाकत दिखाएगा। क्योंकि अगर यह साबित होता है कि कर्नल हबीब पाकिस्तान में ही मौजूद थे और ISI ने ही उन्हें खत्म किया, तो पाकिस्तान सरकार की साख पर और दाग लग जाएगा। वह कहते हैं कि यह मामला पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। क्योंकि अगर पाकिस्तान इस हत्या की निष्पक्ष जांच करता है, तो इसके तार ISI और सेना से जुड़ सकते हैं। अगर वह इस मामले को दबाने की कोशिश करता है, तो इसका मतलब होगा कि ISI अपने ही ऑपरेटिव्स को खत्म कर रही है और सरकार इससे अनजान नहीं है।

वहीं, यह घटना पाकिस्तान के लिए बेहद शर्मनाक साबित हो सकती है। अगर यह वही कर्नल हबीब हैं, जिन्हें पाकिस्तान ने भारत द्वारा अपहरण किया हुआ बताया था, तो यह साबित करता है कि पाकिस्तान ने अपने ही अधिकारी की कहानी को भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा के रूप में इस्तेमाल किया था।

LUH Vs H125M Helicopter: क्या भारतीय सेना की पसंद बनेगा HAL का लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर, या फ्रांस का H125M मार ले जाएगा बाजी? क्या होगा मेक इन इंडिया का?

LUH vs H125M Helicopter: Will HAL’s Light Utility Helicopter Be India’s Choice or Will France’s H125M Steal the Deal? What About Make in India?

LUH Vs H125M Helicopter: भारतीय सेना के हेलीकॉप्टर बेड़े में शामिल मौजूदा दशकों पुराने चेतक और चीता हेलीकॉप्टर काफी पुराने पड़ चुके हैं। सेना अपने एविएशन बेड़े को आधुनिक बनाने की कोशिशों में जुटी हुई है। एविएशन बेड़े को अपग्रेड करने की योजना के तहत भारतीय सेना को निगरानी और टोही मिशनों को अंजाम देने के लिए तकरीबन 400 नए हेलिकॉप्टरों की जरूरत है। ताकि भारतीय सेना के ऑपरेशन कैपेबिलिटी में सुधार किया जा सके। इसके लिए भारतीय सेना के सामने दो बड़े दावेदार हैं, पहला हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का बनाया लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) और दूसरा फ्रांसीसी एयरोस्पेस कंपनी एयरबस का बनाया H125M हेलीकॉप्टर। 28 फरवरी को इसी के सिलसिले में आर्मी हेडक्वॉर्टर में एक अहम बैठक होने वाली है, जिसमें बेहतर विकल्प पर अंतिम मुहर लगाई जा सकती है। बता दें कि सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी इन दिनों फ्रांस के दौरे पर हैं, जहां वे एयरबस के अधिकारियों से भी मिले हैं।

LUH vs H125M Helicopter: Will HAL’s Light Utility Helicopter Be India’s Choice or Will France’s H125M Steal the Deal? What About Make in India?

LUH Vs H125M Helicopter: फ्रांस यात्रा पर हैं जनरल उपेंद्र द्विवेदी

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी 24 से 27 फरवरी तक फ्रांस यात्रा पर हैं। यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की समिट में हिस्सा लेने 10-12 फरवरी 2025 को फ्रांस गए थे। जहां वे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से भी मिले थे। इस दौरान फ्रांस को पिनाका हथियार बेचने और 36 मरीन राफेल के अलावा 3 स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की खरीद को लेकर बातचीत हुई। हालांकि उस दौरान एयरबस H125M हेलीकॉप्टर डील को लेकर तो कोई बातचीत नहीं हुई, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि एयरबस H125M हेलीकॉप्टर सेना के लिए बड़े विकल्प के तौर पर उभर सकता है।

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LUH Vs H125M: कौन होगा सेना की पहली पसंद?

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बनाए LUH को भारतीय सेना के लिए उपयुक्त माना जा रहा है, लेकिन कुछ हालिया हादसों ने इस प्रोजेक्ट के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। जनवरी 2025 में गुजरात में एक एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ध्रुव की दुर्घटना के बाद HAL के हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा पर सवाल उठ गए। इस घटना के बाद 300 से अधिक ALH हेलीकॉप्टरों को अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया गया था। LUH को सेना की जरूरतों के मुताबिक डिज़ाइन किया गया है और यह खास तौर पर से हाई एल्टीट्यूड इलाकों जैसे लद्दाख और सियाचिन में ऑपरेशन के लिए उपयुक्त माना जा रहा है।

वहीं, पिछले दिनो बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया 2025 में, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के LUH को डेमो फ्लाइट में तो शामिल किया गया, लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और उत्तरी कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एम.वी. सुचिंद्र कुमार को सिंगल-इंजन हेलिकॉप्टर में सुरक्षा चिंताओं के चलते डेमो फ्लाइट में न उड़ने की सलाह दी गई थी। जबकि दूसरी तरफ, भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने LUH में उड़ान भरकर स्वदेशी हेलीकॉप्टर में अपना भरोसा जताया। उन्होंने फ्लाइट के एक्सपीरियंस और हेलीकॉप्टर की परफॉरमेंस पर भी संतोष व्यक्त किया।

LUH Vs H125M Helicopter: एयरो इंडिया में दोनों हुए शामिल

हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के लिए चैलेंज बढ़ते जा रहे हैं। एयरो इंडिया 2024 के दौरान एयरफोर्स स्टेशन, येलहंका में सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने जहां लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) की क्षमताओं का जायजा लिया था, तो वे एयरबस H125 के पवेलियन में भी गए थे, जहां उन्होंने इस टोही हेलीकॉप्टर में काफी दिलचस्पी दिखाई थी। उस दौरान भारतीय सेना के आधिकारिक ट्विटर हेंडल ADGPI ने भी इस दौरे को लेकर ट्वीट किया था। जिसमें लिखा था, “एयरोइंडिया 2025: स्वदेशी विमानन क्षमताओं को मजबूत करना। जनरल उपेंद्र द्विवेदी सीओएएस को एयरो इंडिया 2025 के अपने दौरे के दौरान आज एयरफोर्स स्टेशन, येलहंका में लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) और H125 टोही श्रेणी के हेलीकॉप्टरों के बारे में जानकारी दी गई। LUH एक अत्याधुनिक स्वदेशी बहु-भूमिका वाला हेलीकॉप्टर है जिसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने भारत की रोटरी-विंग क्षमताओं को बढ़ाने के लिए विकसित किया है। H125, टाटा और एयरबस के बीच एक संयुक्त उद्यम है जो एक टोही श्रेणी का हेलीकॉप्टर है जो आत्मनिर्भरभारत के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो रक्षा में भारत की आत्मनिर्भरता को मजबूत करता है।”

जनरल उपेंद्र द्विवेदी गए एयरबस फैसिलिटी

वहीं इसी महीने अपने फ्रांस दौरे के दौरान सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने फ्रांस स्थित एयरबस फैसिलिटी का भी दौरा किया, जहां उन्हें H125M हेलिकॉप्टर के बारे में जानकारी दी गई। H125M वही हेलिकॉप्टर है जिसे पहले Eurocopter AS550C3 Fennec के रूप में जाना जाता था, और यह भारतीय सेना के रैकी एंव सर्विलांस हेलिकॉप्टर (RSH) प्रोग्राम में एक प्रमुख दावेदार है। भारतीय सेना के आधिकारिक ट्विटर हेंडल ADGPI के ट्वीट में लिखा गया, “जनरल उपेंद्र द्विवेदी, सीओएएस ने मार्सिले में एयरबस फैसिलिटी का दौरा किया, जहां उन्हें अत्याधुनिक विमानन प्रौद्योगिकी, रक्षा प्रणालियों और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के बारे में जानकारी दी गई, जिसमें एयरबस ने अग्रणी भूमिका निभाई है। यह यात्रा ऑपरेशनल कैपेबिलिटीज को बढ़ाने और रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए ग्लोबल एयरोस्पेस इनोवेशंस का लाभ उठाने के लिए भारतीय सेना की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है, विशेष रूप से रोटरी विंग विमानन में।”

सेना के इस बयान से चौंके रक्षा विशेषज्ञ

सेना के इस बयान से कई रक्षा विशेषज्ञ चौंक गए। क्योंकि यह बयान ऐसे समय में आया जब LUH अपने फाइनल टेस्टिंग फेज में था। रक्षा मामलों के जानकार आदित्य कृष्ण मेनन कहते हैं, “भारतीय सेना और वायुसेना के लिए हल्के यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) प्रोजेक्ट अब निर्णायक मोड़ पर है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के लिए जरूरी है कि वह LUH में मौजूद सभी खामियों को जल्द से जल्द दूर करे और एक स्पष्ट, व्यावहारिक समयसीमा तय करे ताकि भारतीय सेना और वायुसेना को इसकी तैनाती में कोई संदेह न रहे। सेना और वायुसेना को इस समय केवल अल्पकालिक समाधान के रूप में चार्टर्ड हेलीकॉप्टर सेवाओं या लीज पर लिए गए हेलीकॉप्टरों की जरूरत हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से विदेशी हेलीकॉप्टरों की खरीद एक सही रणनीति नहीं होगी। भारतीय डिफेंस पॉलिसी का फोकस “आत्मनिर्भर भारत” पर है, और LUH इस लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।”

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HAL के सामने हैं कई चुनौतियां, विदेशी कंपनियों से कैसे करेगी मुकाबला

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता साबित करने की है। ALH ध्रुव हादसों के बाद सुरक्षा मानकों को लेकर सेना का भरोसा जीतना जरूरी है। LUH के ट्रायल में कुछ कंपनियों ने हल्के वाइब्रेशन (कंपन) की शिकायत की थी। HAL ने दावा किया है कि LUH में हल्के वाइब्रेशन जैसी छोटी-मोटी तकनीकी समस्याओं को हल कर लिया गया है और जल्द ही यह हेलीकॉप्टर ट्रायल्स में पास होकर सेना में शामिल होने के लिए तैयार हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सेना और सरकार इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए जल्द मंजूरी देगी या नहीं?

अगर LUH को सेना में जल्दी स्वीकृति नहीं मिलती है, तो इससे सेना के पुराने चेतक और चीता हेलीकॉप्टरों को बदलने की प्रक्रिया में देरी होगी। ये हेलीकॉप्टर पहले ही तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं, इनके लिए स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल हो रहा है और इनकी उड़ान सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है।

टाटा के साथ मिल कर हेलीकॉप्टर बनाएगी एयरबस

इस बीच, विदेशी कंपनियां भी भारतीय सेना के हल्के हेलीकॉप्टरों की इस दौड़ में शामिल हो चुकी हैं। फ्रांसीसी एयरोस्पेस कंपनी एयरबस ने ने टाटा ग्रुप के साथ मिलकर भारत में H125 हेलीकॉप्टर के लिए फाइनल असेंबली लाइन (FAL) तैयार का एलान किया है। टाटा समूह की सहायक कंपनी टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (टीएएसएल) एयरबस हेलीकॉप्टर्स के साथ मिलकर यह फैसिलिटी बना रही है। एफएएल भारत के लिए अपनी सिविल रेंज से एयरबस के सबसे अधिक बिकने वाले एच125 हेलीकॉप्टर का उत्पादन करेगा तथा कुछ पड़ोसी देशों को निर्यात करेगा। एच125 एक हल्का सिविल हेलीकॉप्टर है जो छह लोगों को ले जा सकता है।

रूसी हेलीकॉप्टर कामोव Ka-226T की वापसी?

एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, रूस का कामोव Ka-226T हेलीकॉप्टर भारतीय सेना की सूची में दोबारा शामिल हो सकता है। 2015 में इस हेलीकॉप्टर को 200 यूनिट्स के लिए चुना गया था, लेकिन भारत-रूस जॉइंट प्रोडक्शन स्कीम पर सहमति नहीं बन पाई और यह प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया। हालांकि, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की हालिया मास्को यात्रा के बाद इस प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने की संभावनाएं जताई जा रही हैं।

भारतीय सेना को करीब 400 हल्के हेलीकॉप्टरों की जरूरत है, जिनमें से 187 LUH के लिए आरक्षित किए गए हैं, जबकि बाकी 200 हेलीकॉप्टर विदेशी सप्लायर्स के लिए ओपन टेंडर के तहत खरीदे जाएंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सेना Ka-226T को फिर से प्राथमिकता देती है या LUH को भारतीय सेना में जगह मिलती है।

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सेना की नई रणनीति: चार्टर्ड हेलीकॉप्टर सेवाओं पर जोर

LUH और अन्य विदेशी हेलीकॉप्टरों की देरी के चलते सेना को अपने ऑपरेशनल गैप को भरने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं। सेना की नॉर्दन कमान ने कुछ इलाकों में चार्टर्ड हेलीकॉप्टर सेवाएं शुरू कर दी हैं। यह फैसला सेना के भविष्य की प्रोक्योरमेंट पॉलिसीज को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि इससे सरकार और सेना को फौरी तौर पर हेलीकॉप्टरों की कमी को पूरा करने में मदद मिल रही है।

सेना के लिए हेलीकॉप्टरों का महत्व

भारतीय सेना के हेलीकॉप्टर बेड़े का मॉर्डनाइजेशन केवल एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक जरूरत भी है। लद्दाख, सियाचिन, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर सिक्किम जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में सैन्य अभियानों के लिए हल्के हेलीकॉप्टरों चाहिए। वर्तमान में सेना के पास तीन प्रमुख एयर ब्रिगेड हैं— लेह, मिसामारी और जोधपुर। सेना के पास इस समय लगभग 190 चेतक, चीता और चीतल हेलीकॉप्टर, 145 ALH ध्रुव और 75 रुद्र (ALH-WSI) हेलीकॉप्टर हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश पुराने हो चुके हैं और सेना को अत्याधुनिक, बेहतर परफॉरमेंस वाले हेलीकॉप्टरों की जरूरत है।

इसके अलावा, हेलीकॉप्टर आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी अहम भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के इलाकों में आतंकवाद रोधी अभियानों में हेलीकॉप्टर बेहद कारगर साबित होते हैं। इसके अलावा, आपदा राहत अभियानों, सैनिकों की तैनाती और चिकित्सा निकासी (Casualty Evacuation – CASEVAC) में भी इनका इस्तेमाल होता है।

क्या LUH बनेगा भारतीय सेना की पहली पसंद?

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के लिए यह समय बेहद अहम है। सेना फरवरी के अंत में एक हाई लेवल मीटिंग करने जा रही है, जिसमें यह तय किया जाएगा कि LUH को कब तक और कितनी संख्या में सर्विस में शामिल किया जाएगा। यदि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को संतुष्ट करने में सफल होता है, तो यह परियोजना पूरी तरह से भारतीय बन सकती है और देश की आत्मनिर्भरता नीति को और मजबूती मिलेगी।

LUH क्यों है भारत के लिए अहम?

विशेषज्ञों के मुताबिक, LUH का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे विशेष रूप से भारतीय सेना की जरूरतों के हिसाब से डिजाइन किया गया है। यह हेलीकॉप्टर 6,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर भी प्रभावी तरीके से काम कर सकता है, जो लद्दाख, सियाचिन और अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों के लिए जरूरी है। इसके अलावा, इसका हल्का फ्रेम और शक्तिशाली शक्ति-1यू इंजन दुर्गम इलाकों में आसानी से उड़ान भर सकता है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय निर्माताओं का प्रभाव बढ़ता गया और HAL ने ट्रायल्स जल्द पूरा नहीं किए, तो सेना H125 जैसे विदेशी विकल्पों की ओर बढ़ सकती है। वहीं, विदेशी हेलीकॉप्टरों की खरीद से भारत का आत्मनिर्भरता अभियान कमजोर हो सकता है। विदेशी हेलीकॉप्टरों की मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड्स पूरी तरह से बाहरी सप्लायर्स पर निर्भर रहते हैं, जबकि LUH के साथ ऐसी समस्या नहीं होगी।