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K9 Vajra-T Howitzers: लद्दाख से रेगिस्तान तक अब दुश्मन की नहीं है खैर, भारतीय सेना के पास आ रहे हैं 100 और K9 वज्र

K9 Vajra-T Howitzers: Indian Army to Get 100 More in $253M Hanwha-L-T Deal

K9 Vajra-T Howitzers: भारतीय सेना अपनी तोपखाना क्षमता (Artillary) को और अधिक घातक और आधुनिक बनाने जा रही है। भारतीय सेना के तोपखाने को आधुनिक बनाने के लिए दक्षिण कोरिया की कंपनी हान्वा एयरोस्पेस (Hanwha Aerospace) ने भारत की लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) के साथ 253 मिलियन डॉलर (लगभग 2100 करोड़ रुपये) का एक नया करार किया है। इस सौदे के तहत भारतीय सेना को 100 अतिरिक्त K9 वज्र-टी स्वचालित तोपें (सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर) मिलेंगी। हाल ही में नई दिल्ली स्थित कोरियाई दूतावास में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस समझौते पर दस्तखत किए गए।

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K9 Vajra-T Howitzers: पहले सौदे की सफलता के बाद दूसरा बड़ा ऑर्डर

नया सौदा पहले के उस ऑर्डर को देखते हुए किया गया है, जिसमें 2017 में 100 K9 वज्र तोपों का ऑर्डर दिया गया था। उस वक्त इस ऑर्डर की डिलीवरी तय समयसीमा से पहली ही कर दी गई थी। जिसके बाद नए ऑर्डर की नींव तैयार हुई। ये तोपें राजस्थान से लेकर लद्दाख तक के विभिन्न इलाकों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल की जा रही हैं। पहले बैच में 50% से अधिक स्वदेशी निर्माण हुआ था, लेकिन इस नए ऑर्डर के तहत भारत में 60% तक लोकलाइजेशन का लक्ष्य तय किया गया है। यानी भारत में बनने वाले इस बैच में अधिक घरेलू कंपनियां, विशेषकर MSME सेक्टर, भाग लेंगी।

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K9 Vajra-T Howitzers: सेना की आधुनिकता में मील का पत्थर

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने दिसंबर 2024 में K9 वज्र-T तोपों की खरीद के लिए L&T के साथ लगभग 7,628.70 करोड़ रुपये का करार किया था। जिसमें 155 मिमी/52 कैलिबर की K9 वज्र-टी तोपों को ‘बाय इंडियन’ श्रेणी के तहत खरीदने की बात थी। जिससे देश की रक्षा उत्पादन नीति ‘आत्मनिर्भर भारत’ को भी बल मिलेगा।

रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “K9 वज्र-T की खरीद से तोपखाना क्षमताओं में जबरदस्त सुधार होगा और सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस बढ़ेगी। यह तोप दुर्गम इलाकों में भी अपनी प्रभावी मारक क्षमता और गतिशीलता से अहम भूमिका निभाएगी।”

K9 Vajra-T Howitzers: सौदे की अहमियत और रक्षा साझेदारी

इस परियोजना से अगले चार सालों में नौ लाख से अधिक मानव-दिवसों का रोजगार पैदा होगा। साथ ही, इसमें कई भारतीय उद्योगों, खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की सक्रिय भागीदारी होगी। यह भारत के औद्योगिक विकास और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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K9 Vajra-T Howitzers: 2021 में 100वीं तोप सेना को सौंपी

भारतीय सेना पहले से ही 100 K9 वज्र-टी तोपों को ऑपरेट कर रही है। इनका पहला ऑर्डर 2017 में दिया गया था, जिसे एलएंडटी ने ग्लोबल कॉम्पिटिटिव बिडिंग और सक्सेसफुल फील्ड टेस्टिंग के बाद हासिल किया था। कंपनी ने तय समय से पहले इन तोपों की डिलीवरी पूरी की, और 2021 में 100वीं तोप सेना को सौंपी गई।

एलएंडटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अरुण रामचंदानी ने बताया कि “पहली खेप की तरह दूसरी खेप भी गुजरात के हजीरा स्थित हमारे आर्मर्ड सिस्टम्स कॉम्प्लेक्स (Armoured Systems Complex) में तैयार की जाएगी। खास बात यह है कि नई तोपों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों, जैसे लद्दाख, में बेहतर प्रदर्शन के लिए अपग्रेड शामिल होंगे।

वहीं, हान्वा एयरोस्पेस के सीईओ और प्रेसिडेंट जे-इल सन ने इस करार को दोनों देशों के बीच गहरे होते रक्षा संबंधों का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, “यह दूसरा ऑर्डर कोरिया और भारत के बीच बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। हम भारत की रक्षा क्षमताओं के लिए एक भरोसेमंद साथी बने रहेंगे और भारत के रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के सपने को पूरा करने में योगदान देंगे।”

K9 वज्र: भारतीय सेना की ताकत

ये तोपें शुरू में राजस्थान के भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात की गई थीं, लेकिन 2020 में लद्दाख में भारत-चीन तनाव के बाद इन्हें पूर्वी लद्दाख में भी तैनात किया गया। K9 वज्र-टी ने भारत के दुर्गम इलाकों में अपनी बेहतरीन क्षमता साबित की है।

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यह एक 155mm/52-कैलिबर ट्रैक्ड सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्जर है, जो लगभग 40 किलोमीटर से अधिक की दूरी तक गोलाबारी कर सकती है और 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है। यह बर्स्ट मोड में प्रति मिनट छह गोले और लंबे समय तक प्रति मिनट 2-3 गोले दाग सकती है।

यह तोप खासतौर पर उच्च हिमालयी इलाकों, जैसे लद्दाख, के लिए तैयार की गई है, जिसमें कोल्ड वेदर किट और मजबूत सस्पेंशन सिस्टम शामिल हैं।

  • वजन: करीब 50 टन
  • इंजन: 1,000 हॉर्सपावर का डीजल इंजन
  • गति: 67 किमी/घंटा तक
  • गोलाबारी की दर: 15 सेकंड में 3 राउंड (बर्स्ट मोड), 8 राउंड प्रति मिनट (अधिकतम)
  • क्रू मेंबर: 5

भारत ने 2015 में K9 को क्यों चुना:

भारतीय सेना के तोपखाने को आधुनिक बनाने की दिशा में एक अहम फैसला साल 2015 में लिया गया था, जब दक्षिण कोरिया की K9 वज्र ने फील्ड ट्रायल्स में रूस की 2S19 मस्ता-एस को पीछे छोड़ दिया।
2010 के दशक की शुरुआत में भारतीय सेना अपने पुराने तोपखाने को बदलने की कोशिश में थी। बोफोर्स तोप घोटाले के बाद से नए हथियारों की खरीद में देरी हो रही थी। उस वक्त सेना के पास मुख्य रूप से सोवियत-युग की तोपें थीं, जो आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थीं। खासकर ऊंचाई वाले इलाकों जैसे लद्दाख और सियाचिन में तेज, सटीक और गतिशील तोपों की जरूरत थी।
इसी दौरान रक्षा मंत्रालय ने 155 मिमी/52 कैलिबर की स्वचालित तोपों (सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर) की खरीद के लिए वैश्विक निविदा जारी की। इसमें कई देशों की कंपनियां शामिल हुईं, लेकिन अंतिम मुकाबला दक्षिण कोरिया की हान्वा डिफेंस की K9 थंडर और रूस की 2S19 मस्ता-एस के बीच हुआ।
2015 में इन दोनों तोपों का परीक्षण भारत के अलग-अलग इलाकों में किया गया। इसमें राजस्थान के रेगिस्तान, महाराष्ट्र के मैदान और हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र शामिल थे। इन परीक्षणों में कई मापदंडों पर ध्यान दिया गया:
  • मारक क्षमता: K9 की रेंज 40 किलोमीटर से ज्यादा थी, जबकि 2S19 की रेंज करीब 29-30 किलोमीटर तक सीमित थी।
  • फायरिंग रेट: K9 बर्स्ट मोड में 15 सेकंड में 3 गोले और प्रति मिनट 6-8 गोले दाग सकती थी, वहीं 2S19 की गति इससे कम थी।
  • मोबिलिटी: 50 टन वजनी K9 अपने 1000 हॉर्सपावर इंजन के साथ 67 किमी/घंटा की रफ्तार से चल सकती थी, जबकि 42 टन की 2S19 की गति 60 किमी/घंटा थी। ऊबड़-खाबड़ इलाकों में K9 का हाइड्रोन्यूमैटिक सस्पेंशन इसे बेहतर बनाता था।
  • सटीकता और ऑटोमेशन: K9 में एडवांस फायर कंट्रोल सिस्टम था, जो सटीक निशाना लगाने में मदद करता था। 2S19 में यह तकनीक कम थी।
के9 को चुनने के पीछे बड़ी बात यह भी थी कि हान्वा ने वादा किया था कि K9 का बड़ा हिस्सा भारत में तैयार होगा।

तोपखाने का आधुनिकीकरण

K9 वज्र-टी भारतीय सेना के आर्टिलरी मॉर्डनाइजेशन अभियान का अहम हिस्सा है। इसके तहत सेना कई 155 मिमी तोप प्रणालियों को शामिल कर रही है, जिनमें K9 वज्र, धनुष और शारंग शामिल हैं। इसके अलावा, उन्नत टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS), माउंटेड गन सिस्टम (MGS), और टोड गन सिस्टम (TGS) भी शामिल करने की प्रक्रिया में हैं।

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ATAGS एक स्वदेशी 155 मिमी/52 कैलिबर हॉवित्जर है, जिसे DRDO ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और भारत फोर्ज के साथ मिलकर बनाया है। सेना ने 114 धनुष तोपों का ऑर्डर भी दिया है, जो भारत की पहली स्वदेशी तोप है। इन्हें एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) ने बनाया है और 2026 तक इनकी डिलीवरी पूरी होने की उम्मीद है।

इसके साथ ही, भारत पिनाका मल्टी-रॉकेट लॉन्च सिस्टम (MRLS) में भी निवेश कर रहा है। इस साल फरवरी में 10,147 करोड़ रुपये के अनुबंधों पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें पिनाका के लिए विभिन्न गोला-बारूद शामिल हैं। पिनाका की मारक क्षमता मार्क-I के लिए 40 किमी, मार्क-II के लिए 60-75 किमी और गाइडेड पिनाका के लिए 75 किमी से अधिक है। इसके रेंज को 120 किमी और आगे 300 किमी तक बढ़ाने पर काम चल रहा है।

दक्षिण कोरिया की K9 थंडर

K9 थंडर एक 155 मिमी/52 कैलिबर स्वचालित तोप है, जिसे हान्वा एयरोस्पेस ने तैयार किया है। यह 48 गोले ले जा सकती है और प्रति मिनट छह गोले दागने में सक्षम है। 1999 में पेश होने के बाद से यह दक्षिण कोरिया के डिफेंस एक्सपोर्ट का अहम हिस्सा है और ग्लोबल आटोमेटिक केनन मार्केट में इसकी हिस्सेदारी 50% से अधिक है। पिछले साल तक 1400 से ज्यादा K9 इकाइयां विभिन्न देशों को डिलीवर की जा चुकी हैं या निर्यात के लिए तैयार हैं।

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दक्षिण कोरिया खुद इन तोपों की बड़ी संख्या का इस्तेमाल करता है, जो उत्तर कोरिया से अलग करने वाली डिमिलिटराइज्ड जोन (DMZ) पर तैनात हैं। K9 की खासियत इसका पहाड़ी इलाकों में काम करने की क्षमता है, इसमें एडवांस हाइड्रोन्यूमैटिक सस्पेंशन लगा है। इसे पांच सदस्यों का चालक दल ऑपरेट करता है। K9 थंडर को इस तरह से बनाया गया है कि इस परमाणु, जैविक और रासायनिक खतरों का कोई असर नहीं होता।

MRFA Rafale Deal: क्या ‘मेक इन इंडिया’ होगा राफेल? 114 मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट की डील पर भी जल्द लग सकती है मुहर

114 Rafale fighter jets

MRFA Rafale Deal: भारत और फ्रांस के बीच 114 मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) के लिए जल्द बातचीत शुरू होने की संभावना है। यह समझौता सरकार-से-सरकार (G2G) होगा। अगर यह सौदा अपने अंजाम तक पहुंचता है तो भारत में फाइटर जेट्स की लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के साथ-साथ वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। सूत्रों ने बताया कि इस एमआरएफए सौदे में राफेल लड़ाकू विमान शामिल होंगे। बता दें कि मोदी सरकार ने 2016 में फ्रांस से 36 विमान खरीदे थे।

MRFA Rafale Deal: Will Rafale Be Made in India? 114 Fighter Jet Pact Likely Soon

MRFA Rafale Deal: फाइनल असेंबली लाइन लगाएगी दसॉ एविएशन!

सूत्रों के अनुसार, इस संभावित डील में राफेल बनाने वाली कंपनी फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन (Dassault Aviation) की भूमिका प्रमुख होगी। कंपनी पहले ही भारत को 36 राफेल जेट की सप्लाई कर चुकी है। इस बार कंपनी ने भारत में एक फाइनल असेंबली लाइन लगाने पर सहमती जतााई है, बशर्ते उसे कम से कम 100 जेट्स का ऑर्डर मिले। कंपनी इसके लिए देश के एविएशन सेक्टर का अनुभव रखने वाली किसी प्रमुख रक्षा उद्योग कंपनी के साथ साझेदारी करेगी।

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यह डील दो हिस्सों में होगी। जिसमें कुछ विमान सीधे तैयार हालत में भारत आएंगे, जबकि बाकी विमानों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इस दौरान इसमें कई भारतीय कंपनियों से बड़े पैमाने पर कंपोनेंट्स और पार्ट्स की सोर्सिंग भी शामिल होगी। जिसका मतलब यह है कि भारत में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका और भी मजबूत होने जा रही है।

26 राफेल मरीन फाइटर जेट्स की खरीद पर मुहर

बता दें कि मंगलवार 08 अप्रैल को ही प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने 26 राफेल मरीन फाइटर जेट्स के लिए अब तक की सबसे बड़ी 7 अरब यूरो (63,000 करोड़) की डील को मंजरी दी है। यह डील भारतीय नौसेना के लिए है, और उम्मीद है कि इसे फ्रांसीसी रक्षा मंत्री सेबास्टियन लेकोर्नु की भारत दौरे के दौरान अमली जामा पहनाया जाएगा। हालांकि अभी तक दौरे की तारीख तय नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस डील पर बहुत जल्द मुहर लग सकती है। इसी दौरे के दौरान 114 फाइटर जेट्स की डील को लेकर औपचारिक बातचीत भी शुरू हो सकती है।

MRFA Rafale Deal: सिर्फ औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी

सूत्रों का कहना है कि यह डील एक सिंगल वेंडर के साथ होगी, क्योंकि हम पहले ही 36 राफेल खरीद चुके हैं और अब फ्रांस के साथ औपचारिक बातचीत शुरू करने वाले हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच इस डील को लेकर कई स्तरों पर बातचीत हो चुकी है और बुनियादी समझ बन चुकी है। अब सिर्फ औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं।

भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल केवल 31 स्क्वाड्रन हैं, जबकि यह संख्या 42.5 स्क्वाड्रन होनी चाहिए। यानी जरूरत के मुकाबले लगभग 25 फीसदी जहाजों की कमी है। ऐसे में वायुसेना लगातार सरकार से आग्रह कर रही है कि उसे नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तत्काल आवश्यकता है।

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इस साल फरवरी 2025 में एक प्रेस वार्ता में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा था कि वायुसेना को हर साल कम से कम 35-40 लड़ाकू विमानों की जरूरत है, और तकनीकी रूप से हम पीछे होते जा रहे हैं। उन्होंने यह भी जोर दिया था कि भारत को विदेशी कंपनियों के साथ देश के प्राइवेट सेक्टर को भी आगे लाना चाहिए, ताकि घरेलू स्तर पर फाइटर जेट्स का उत्पादन किया जा सके।

MRFA Rafale Deal: गर्वनमेंट-टू-गर्वनमेंट डील ज्यादा पारदर्शी!

वहीं, इस डील का एक बड़ा फायदा यह भी है कि भारत को “फ्लाई अवे” यानी तुरंत तैयार विमानों के साथ-साथ लोकल लेवल पर मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव मिलेगा। इससे न केवल भारतीय इंजीनियरिंग और एविएशन सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश की रणनीतिक आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। वहीं, इस तरह की गर्वनमेंट-टू-गर्वनमेंट डील ज्यादा पारदर्शी होती है और प्रक्रिया तेज चलती है। 2016 में जब 36 राफेल विमानों की डील हुई थी, वह भी G2G मॉडल पर आधारित थी। उस समय भी भारत को तत्काल जरूरत थी और डील को तेजी से आगे बढ़ाया गया था।

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MRFA Rafale Deal: नहीं होगा ओपन टेंडर!

वहीं, यह डील किसी टेंडर प्रक्रिया से होकर गुजरेगी या नहीं? इस पर सूत्रों का कहना है कि चूंकि भारत पहले ही राफेल जेट्स का इस्तेमाल कर रहा है और इसके इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेनिंग सिस्टम डेवलप हो चुके हैं, इसलिए यह डील “सिंगल वेंडर” के तहत की जाएगी। यानी इसमें कोई ओपन टेंडर या दूसरी कंपनियों के शामिल होने की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है।

Bagram Airbase Explainer: किसके कब्जे में है बगराम – अमेरिका, चीन या तालिबान? पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

Bagram Airbase Explainer: अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। यह वही एयरबेस है जहां अमेरिका ने बीस साल तक अपना सैन्य प्रभुत्व बनाए रखा और जहां से उसने तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान चलाए। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह एयरबेस फिर से अमेरिकी नियंत्रण में चला गया है? या जैसा कि कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है, यह अब चीन की निगरानी में है? या फिर तालिबान अब भी इस पर अपनी पकड़ बनाए हुए है?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

यह सवाल तब खड़ा हुआ जब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि तालिबान ने बगराम एयरबेस अमेरिका को सौंप दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वायु सेना के कई C-17 ग्लोबमास्टर विमान वहां उतरे, जिसमें सैन्य साजो-सामान और खुफिया अधिकारी मौजूद थे। इतना ही नहीं, इसमें CIA के डिप्टी चीफ माइकल एलिस के आने की भी खबर है। लेकिन तालिबान ने इन सभी खबरों को खारिज कर दिया है और इसे “प्रोपेगेंडा” बताया है। तालिबान ने कहा है कि बगराम पर उनका पूरा नियंत्रण है और इसे किसी भी विदेशी ताकत को सौंपने का कोई इरादा नहीं है।

Bagram Airbase Explainer: सोवियत संघ ने बनाया था बगराम एयरबेस

बगराम एयरबेस का इतिहास काफी पुराना और रोचक है। इसे 1950 के दशक में सोवियत संघ ने बनाया था और 1979 से 1989 तक सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान यह उनका प्रमुख सैन्य अड्डा रहा। बाद में, 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने अफगानिस्तान पर हमला किया, जिसके बाद बगराम अमेरिकी सेना का मुख्य केंद्र बन गया। यहां से अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ 20 साल तक अभियान चलाया गया। अपने चरम पर, 2012 में यहां 100,000 से अधिक सैनिक और ठेकेदार तैनात थे। इस एयरबेस में दो बड़े रनवे, विशाल हैंगर, एक अस्पताल और एक हिरासत केंद्र भी था, जिसे “ग्वांतानामो बे ऑफ अफगानिस्तान” भी कहा जाता था।

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यह एयरबेस अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बेहद महत्वपूर्ण है। यह अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से लगभग 40 मील उत्तर में परवान प्रांत में स्थित है और ईरान, चीन और मध्य एशियाई देशों की सीमाओं के करीब है। खास तौर पर, यह चीन के शिनजियांग क्षेत्र में मौजूद परमाणु सुविधाओं से केवल 400 मील दूर है, जिसके कारण इसकी भू-राजनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है।

Bagram Airbase Explainer: क्या हुआ था बगराम के साथ?

15 अगस्त 2021 को अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान को अलविदा कह दिया। इस दौरान बगराम एयरबेस को अफगान सेना के हवाले कर दिया गया, लेकिन तालिबान ने जल्द ही देश पर कब्जा कर लिया और यह उनके नियंत्रण में आ गया। उस समय अमेरिकी की काफी आलोचना हुई थी। अमेरिकी सैनिकों ने बिना स्थानीय सहयोगियों को सूचित किए बेस छोड़ दिया, जिसके बाद तालिबान ने इसे अपने कब्जे में ले लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वहां 7 अरब डॉलर से अधिक के सैन्य उपकरण भी छूट गए थे।

अब, लगभग चार साल बाद, इस महीने अप्रैल 2025 में कुछ चौंकाने वाली खबरें सामने आईं। अफगानिस्तान की खामा प्रेस ने 7 अप्रैल, 2025 को रिपोर्ट दी कि अमेरिकी वायुसेना के कई C-17 ग्लोबमास्टर III विमान बगराम पर उतरे हैं। इन विमानों में सैन्य वाहन, उपकरण और वरिष्ठ खुफिया अधिकारी शामिल थे, जिनमें CIA के उप-निदेशक माइकल एलिस का नाम भी लिया गया। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि तालिबान ने यह एयरबेस अमेरिका को हाई-टेक ऑपरेशंस के लिए सौंप दिया है।

हालांकि, तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इन दावों को “प्रोपेगैंडा” करार देते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा और किसी भी विदेशी सैन्य मौजूदगी की अनुमति नहीं दी जाएगी। तालिबान का कहना है कि बगराम उनके नियंत्रण में है और इसे अमेरिका को सौंपना “असंभव” है।

ट्रंप का दावा: बाइडेन की गलती से चीन का कब्जा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 8 अप्रैल, 2025 को रिपब्लिकन नेशनल कमेटी में दिए एक भाषण में बाइडन प्रशासन पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद बगराम असुरक्षित हो गया था, जिसका फायदा चीन ने उठाया। ट्रंप के मुताबिक, अगर वे सत्ता में होते, तो बगराम पर अमेरिका का नियंत्रण बना रहता, क्योंकि यह न केवल अफगानिस्तान के लिए, बल्कि चीन की परमाणु गतिविधियों की निगरानी के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसे “अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी आपदा” करार दिया और दावा किया कि अब यह एयरबेस प्रभावी रूप से चीन के नियंत्रण में है।

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हालांकि, ट्रंप के इस दावे का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। न तो अमेरिकी सरकार और न ही तालिबान ने इसकी पुष्टि की है कि बगराम पर चीन का कोई नियंत्रण है। इसके उलट, चीन के विदेश मंत्रालय ने मार्च 2025 में एक बयान में कहा था कि उनकी बगराम में कोई सैन्य महत्वाकांक्षा नहीं है, हालांकि चीन ने अफगान लिथियम और अन्य खनिज संसाधनों में निवेश करना शुरू किया है और तालिबान सरकार से दोस्ताना रिश्ते बना लिए हैं। ऐसे में यह आशंका बढ़ती जा रही है कि कहीं चीन इस एयरबेस का इस्तेमाल किसी प्रकार की निगरानी या सामरिक गतिविधि के लिए तो नहीं कर रहा।

Bagram Airbase Explainer: C-17 विमानों की लैंडिग की क्या है सच्चाई?

हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स और फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। क़तर से उड़ान भरने वाला एक अमेरिकी C-17 विमान हाल ही में पाकिस्तान के रास्ते बगराम एयरबेस पर उतरा। फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा ने भी इसकी पुष्टि की है कि एक C-17 विमान कतर के अल-उदेद बेस से पाकिस्तान के रास्ते बगराम पहुंचा। हालांकि यह कोई सामान्य घटना नहीं है। यदि वाकई ऐसा हुआ है तो यह या तो तालिबान और अमेरिका के बीच किसी गुप्त समझौते का संकेत है, या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी खुफिया मिशन हो सकता है।

C-17 ग्लोबमास्टर III विमान सिर्फ एक बड़ा कार्गो प्लेन नहीं है। बल्कि यह अमेरिकी वायुसेना की रीढ़ है। C-17 ग्लोबमास्टर III 170,900 पाउंड तक का भार ले जा सकता है और बिना ईंधन भरे 2,400 समुद्री मील तक उड़ान भर सकता है। यह विमान छोटे और खराब रनवे पर भी उतर सकता है। यह भारी सैन्य सामान, टैंक, ट्रक, ड्रोन और यहां तक कि हेलिकॉप्टर भी ले जाने में सक्षम है। यदि यह विमान वाकई बगराम पहुंचा है, तो सवाल उठता है — इसमें क्या लाया गया?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें एडवांस निगरानी उपकरण, ड्रोन (जैसे MQ-9 रीपर), और शायद खुफिया मिशन के लिए मोबाइल ऑपरेशन यूनिट्स हो सकते हैं। रीपर ड्रोन को खासतौर पर आतंकवादियों पर निगरानी और हमले के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसकी मौजूदगी अफगानिस्तान में फिर से अमेरिकी गतिविधियों की ओर इशारा कर सकती है।

माइकल एलिस की मौजूदगी के क्या हैं मायने?

सीआईए के डिप्टी डाइरेक्टर माइकल एलिस की अफगानिस्तान में मौजूदगी यदि सच है, तो इसका मतलब है कि कोई बड़ी खुफिया रणनीति पर काम चल रहा है। एलिस की विशेषज्ञता राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी कानूनों में है। संभव है कि उनका मिशन तालिबान के साथ किसी खुफिया साझेदारी को फिर से स्थापित करना हो, खासकर ISIS-K जैसे साझा दुश्मनों के खिलाफ।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह ISIS-K जैसे आतंकी समूहों पर नजर रखने के लिए हो सकता है, जो इन दिनों अफगानिस्तान में सक्रिय है और हाल ही में मॉस्को में एक हमले के लिए भी जिम्मेदार था। उनका कहना है कि तालिबान के पास सीमित संसाधन हैं, तो हो सकता है कि तालिबान ने उन पर कार्रवाई करने के लिए अमेरिका से मदद मांगी हो। उनका कहना है कि तालिबान के सामने कई चुनौतियां हैं – आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय मान्यता न मिलना और ISIS-K जैसे दुश्मन। विश्व बैंक के अनुसार, 2021 के बाद अफगानिस्तान की जीडीपी 30% तक सिकुड़ गई है। ऐसे में, तालिबान को अमेरिकी मदद की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए बगराम ईरान और चीन की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना हो सकता है।

पाकिस्तान से भी है तालिबान को चैलेंज

अंरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर रिजवान अहमद कहते हैं कि तालिबान इस वक्त आर्थिक और राजनयिक मोर्चे पर घिरा हुआ है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, विदेशी निवेश और सहायता लगभग ठप है, और दुनिया के ज़्यादातर देश आज भी तालिबान सरकार को मान्यता देने से हिचकिचा रहे हैं। ऐसे में अगर अमेरिका जैसा ताकतवर देश, जो कभी उनका सबसे बड़ा दुश्मन था, अब सहयोग की पहल करता है, तो तालिबान इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

वह कहते हैं कि पाकिस्तान, जो कभी तालिबान का सबसे मजबूत समर्थक था, उसने साल 2023 से अब तक पाकिस्तान ने 10 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थियों को वापस भेज दिया है। वहीं दूसरी ओर, रूस इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या तालिबान को अपनी आतंकी सूची से हटा दिया जाए। यानी तालिबान अब ऐसी स्थिति में है जहां उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है— भले वह सीमित और अस्थायी ही क्यों न हो।

प्रोफेसर रिजवान अहमद के मुताबिक ऐसे में अगर अमेरिका के साथ किसी सीमित समझौते के तहत बगराम एयरबेस को फिर से किसी रणनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने दिया जाता है, तो तालिबान के लिए यह एक सुरक्षा और कूटनीतिक बढ़त का सौदा हो सकता है। इससे उन्हें न सिर्फ क्षेत्रीय ताकतों के दबाव से राहत मिलेगी, बल्कि वैश्विक मान्यता की दिशा में एक छोटा लेकिन मजबूत कदम भी माना जाएगा।

अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति

वह कहते हैं कि अमेरिका अब “ओवर-द-होराइजन” रणनीति पर काम कर रहा है — यानी बिना जमीन पर सैनिक उतारे, किसी भी समय सटीक निशाना लगाने की क्षमता। जुलाई 2023 में कतर के एक अमेरिकी बेस से ड्रोन हमला कर सीरिया में अल-कायदा के एक टॉप कमांडर को मार गिराया गया था। जो अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति का हिस्सा था। ऐसे में अगर अमेरिका को बगराम जैसे ठिकाने का दोबारा इस्तेमाल करने का मौका मिलता है, तो वह न केवल अपनी सैन्य पहुंच मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्र में अपनी मौजूदगी भी दोबारा स्थापित कर सकता है — वो भी बिना ज़्यादा सैनिक भेजे।

वहीं बगराम एयरबेस अफगानिस्तान के केंद्र में है, ईरान की सीमा से महज 600 मील की दूरी पर, और चीन के उइगर इलाके (शिंजियांग) से भी पास है, जहां उसके न्यूक्लियर और मिलिट्री प्रोग्राम चल रहे हैं। यानि, अमेरिका को यहां से नज़र रखने और जरूरत पड़ने पर एक्शन ले सकता है।

वह कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने 2024 के चुनावी कैंपेन में बार-बार कहा कि बगराम को छोड़ना एक “ऐतिहासिक गलती” थी और यह चीन के मिसाइल बेस से बस एक घंटे की दूरी पर है। अब, ये दावा भले ही ज़रा बढ़ा-चढ़ाकर हो, लेकिन ट्रंप की बात में रणनीतिक सचाई जरूर है— बगराम की लोकेशन अमेरिका के लिए एक बड़ी ताकत बन सकती है।

‘डील विद द डेविल’ जैसा

प्रोफेसर रिजवान अहमद आगे कहते हैं कि और अगर वाकई ऐसा कुछ हो रहा है, तो ये एक ‘डील विद द डेविल’ जैसा ही है — तालिबान, जो कभी अमेरिका का दुश्मन था, अब शायद उसी के साथ कोई मौन समझौता कर रहा है। और अमेरिका, जिसने तालिबान के खिलाफ दो दशक तक लड़ाई लड़ी, अब उसी के भरोसे इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।

बगराम एयरबेस, जो कभी अमेरिकी शक्ति का प्रतीक था, अब शायद फिर से वैश्विक शतरंज की बिसात पर एक ‘क्वीन’ की तरह लौट रहा है। लेकिन इस बार चालें कहीं ज़्यादा खामोश, तेज और रणनीतिक हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक बात तो तय है कि अगर बगराम में अमेरिका वाकई फिर से सक्रिय हो रहा है, तो इसका असर सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा। ये पूरे मध्य एशिया, ईरान, चीन और रूस की सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

26 Rafale Marine Deal: INS विक्रांत को मिलेगी नई ताकत, भारत ने मंजूर की अब तक की सबसे बड़ी 63,000 करोड़ की राफेल मरीन जेट डील

26 Rafale Marine Deal: India Approves ₹63,000 Cr Contract to Boost INS Vikrant’s Combat Power

26 Rafale Marine Deal: कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने मंगलवार को भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन फाइटर जेट्स की खरीद को मंजूरी दे दी। ये अब तक की सबसे बड़ी फाइटर जेट डील है, जिसकी कीमत 63,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। ये सौदा फ्रांस के साथ सरकार-से-सरकार समझौते (G2G) के तहत होगा।

26 Rafale Marine Deal: India Approves ₹63,000 Cr Contract to Boost INS Vikrant’s Combat Power

26 Rafale Marine Deal: इस डील में क्या-क्या शामिल है?

इस सौदे के तहत नौसेना को 22 सिंगल-सीटर और 4 ट्विन-सीटर राफेल मरीन जेट्स मिलेंगे। सिर्फ विमान ही नहीं, बल्कि इस डील में फ्लीट मेंटेनेंस, लॉजिस्टिकल सपोर्ट, स्टाफ की ट्रेनिंग और भारत में प्रोडक्शन को बढ़ावा देने वाली ऑफसेट शर्तें भी शामिल हैं। यानी फ्रांस भारत में कुछ निवेश भी करेगा। वहीं, यानी यह डील सिर्फ एक सैन्य सौदा नहीं, बल्कि भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन नीति को भी मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा कदम भी है।

26 Rafale Marine Deal: इन जेट्स की डिलीवरी कब शुरू होगी?

सौदा साइन होने के करीब पांच साल बाद जेट्स की डिलीवरी शुरू होगी। जब ये विमान भारतीय नौसेना में शामिल होंगे, तब इन्हें सीधे भारत के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत INS विक्रांत पर तैनात किया जाएगा। फिलहाल INS विक्रांत से MiG-29K लड़ाकू विमान ऑपरेट हो रहे हैं, लेकिन राफेल मरीन के आने से इस एयरक्राफ्ट कैरियर की ताकत और अधिक बढ़ जाएगी।

गौरतलब है कि भारतीय वायुसेना पहले से ही 36 राफेल जेट्स ऑपरेट कर रही है, जो अंबाला और हासीमारा जैसे रणनीतिक एयरबेस पर तैनात हैं। लेकिन नौसेना के लिए जो राफेल मरीन जेट्स आ रहे हैं, वो थोड़े अलग हैं। इन्हें समुद्र में काम करने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है। मतलब, ये जहाज की छोटी जगह से उड़ान भरने-उतरने में माहिर हैं।

बडी-बडी एरियल रीफ्यूलिंग सिस्टम

इस डील का एक और खूबी है “बडी-बडी” एरियल रीफ्यूलिंग सिस्टम। इस तकनीक के जरिए एक राफेल जेट हवा में उड़ते हुए ही दूसरे राफेल विमान को ईंधन भर सकता है। लगभग 10 राफेल विमान इस सिस्टम से लैस होंगे, जो वायुसेना की फ्लेक्सिबिलिटी और तैयारियों को बेहतर बनाएगा। इससे लंबे मिशन पर जाने में आसानी होगी।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस डील में जमीन पर इस्तेमाल होने वाले इक्विपमेंट्स और सॉफ़्टवेयर अपग्रेड्स को भी शामिल किया गया है, जिससे वायुसेना के मौजूदा राफेल फ्लीट को और बेहतर बनाया जा सकेगा। वहीं नौसेना को अपने विमानवाहक पोतों पर कुछ विशेष उपकरण और सिस्टम इंस्टॉल करने होंगे, ताकि ये 4.5 जेनरेशन के राफेल मरीन जेट्स पूरी क्षमता के साथ संचालन कर सकें। अभी मिग-29K जेट्स INS विक्रमादित्य से उड़ते हैं, और वो अपनी जगह पर बने रहेंगे। लेकिन राफेल के आने से नौसेना को एक नई ताकत मिलेगी, जो समुद्र में भारत की पकड़ को और मजबूत करेगी।

स्वदेशी TEDBF पर फोकस

वहीं, भारतीय नौसेना अब सिर्फ विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भर नहीं रहना चाहती है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) देश का पहला पांचवीं पीढ़ी का स्वदेशी लड़ाकू विमान डेवलप कर रहा है, जिसे बाद में नेवल वर्जन में बदला जाएगा। यह विमान ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड फाइटर (TEDBF) होगा, जो भारतीय वायुसेना के लिए बनाए जा रहे एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का नौसैनिक रूप होगा। AMCA को एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) तैयार कर रही है।

इस दिशा में काम तेजी से चल रहा है और रक्षा मंत्रालय चाहता है कि आने वाले सालों में नौसेना भी स्वदेशी फाइटर जेट्स के सहारे अपनी ताकत में इजाफा करे। राफेल मरीन जेट्स अगले पांच-सात सालों में नौसेना का हिस्सा बन जाएंगे, और तब तक शायद TEDBF भी तैयार होने की राह पर होगा। ये दोहरी रणनीति भारत को समुद्र और आसमान दोनों में मजबूत बनाएगी। आईएनएस विक्रांत और भविष्य में आने वाले आईएनएस विशाल जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर्स के लिए ये स्वदेशी जेट्स एक स्थायी समाधान बन सकते हैं।

जहां तक फ्रांस के साथ इस डील की बात है, यह सिर्फ एक व्यावसायिक सौदा नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी का विस्तार भी है। भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग लगातार गहरा हो रहा है, राफेल इसका एक प्रमुख उदाहरण है। भारत ने राफेल के माध्यम से न सिर्फ आधुनिक तकनीक को अपनाया है, बल्कि इसके जरिए अपनी रक्षा कूटनीति को भी नई ऊंचाई दी है।

राफेल मरीन जेट्स को नौसेना में शामिल करना इसलिए भी अहम है, क्योंकि समुद्री सुरक्षा का महत्व अब पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता और वैश्विक रणनीतिक बदलावों को देखते हुए, भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी नौसैनिक ताक़त को अत्याधुनिक बनाकर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखे।

राफेल मरीन जेट्स में जो खूबिया हैं, जैसे एडवांस रडार सिस्टम, लंबी दूरी की मिसाइलें, लेटेस्ट एवियोनिक्स और मल्टी-रोल कैपेबिलिटी, वे भारतीय नौसेना को किसी भी चुनौती का मुकाबला करने में सक्षम बनाएंगी।

UAE Akash Missile Explainer: पैट्रियट, पैंटसिर और THAAD के बावजूद UAE को क्यों भा रहा है भारत का ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम?

Explainer: Why UAE Is Interested in India Akash Missile Despite Having THAAD, Patriot, and Pantsir Systems
Explainer: Why UAE Is Interested in India Akash Missile Despite Having THAAD, Patriot, and Pantsir Systems

UAE Akash Missile Explainer: भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम (Akash Missile) देने का ऑफर दिया है। यह पेशकश भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भारत यात्रा पर आए दुबई के क्राउन प्रिंस और UAE के डिप्टी पीएम शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम के बीच प्रतिनिधि-स्तरीय बैठक में की गई। इसके अलावा दोनों देश अब सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग एक्सचेंज, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त प्रोजेक्ट्स, रिसर्च और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे क्षेत्रों में भी हाथ मिलाने जा रहे हैं। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी भी 10-12 फरवरी 2025 को पेरिस और मार्सिले की यात्रा के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम बेचने का ऑफर दे चुके हैं।

UAE Akash Missile Explainer: Why UAE Is Interested in India Akash Missile Despite Having THAAD, Patriot, and Pantsir Systems

भारत ने ‘आकाश’ डिफेंस सिस्टम (Akash Missile) को स्वदेश में ही विकसित किया है। इसे डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने बनाया है और ये 96% से ज्यादा स्वदेशी है। यह सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और सबसोनिक क्रूज़ मिसाइलों को 25 किलोमीटर की दूरी तक इंटरसेप्ट कर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। यह न केवल युद्ध के दौरान सुरक्षा प्रदान करती है, बल्कि किसी भी आकस्मिक खतरे को समय रहते रोकने में भी मददगार है। इस प्रणाली को पूरी तरह से भारत में ही विकसित किया गया है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक ठोस कदम है।

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यह पेशकश उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत भारत अब ‘आकाश’, ‘पिनाका’ मल्टी-लॉन्च रॉकेट सिस्टम और ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल जैसे आधुनिक हथियारों को मित्र देशों को निर्यात करने में जुटा है। फिलीपींस को पहले ही ब्रह्मोस की तटीय बैटरियां निर्यात की जा चुकी हैं, और आर्मेनिया भारत से आकाश, पिनाका और 155 मिमी आर्टिलरी गन खरीदने वाला पहला विदेशी खरीदार देश बन चुका है। अब यूएई के साथ ये डील भारत के रक्षा निर्यात को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा।

UAE Akash Missile Explainer: अभी यूएई के पास कौन-कौन से हैं सिस्टम?

फिलहाल संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के पास कई तरह के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम है। यूएई के पास थाड (THAAD – Terminal High Altitude Area Defense) है। यूएई दुनिया का पहला देश है (अमेरिका के बाद) जिसके पास ये सिस्टम है। इसे अमेरिका से खरीदा गया और 2016 में तैनात किया गया था। इसकी रेंज 200 किलोमीटर तक है और ये लंबी दूरी के खतरों से निपटने में माहिर है। जनवरी 2022 में, यूएई ने इसका इस्तेमाल यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से दागी गई मिसाइलों को रोकने के लिए किया था, जो इसका पहला जंगी इस्तेमाल था। अभी यूएई के पास दो THAAD बैटरी हैं, और 2022 में अमेरिका ने 96 और मिसाइलों के साथ दो अतिरिक्त कंट्रोल स्टेशन देने की मंजूरी दी थी।

इसके अलावा यूएई के पास अमेरिकी पैट्रियट PAC-3 और GEM-T सिस्टम ङी है, जो मध्यम और छोटी दूरी की मिसाइलों, ड्रोन्स और हवाई हमलों से बचाता है। पैट्रियट का PAC-3 वेरिएंट बैलिस्टिक मिसाइलों को आखिरी चरण में रोकता है, जबकि GEM-T पुराने मॉडल का अपग्रेड है, जो हवाई जहाजों और क्रूज मिसाइलों के खिलाफ बेहतर काम करता है। यह सिस्टम अबू धाबी जैसे बड़े शहरों और अल-धफरा एयर बेस जैसे अहम ठिकानों की रक्षा करता है।

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इसके अलावा यूएई के पास रूसी पैंटसिर-एस1 (Pantsir-S1) सिस्टम भी है, जिसे यूएई ने 2000 में ऑर्डर किया था। 50 यूनिट्स की डिलीवरी 2009-2013 में पूरी हुई थी। पैंटसिर छोटी और मध्यम दूरी (20 किमी तक) के खतरों जैसे ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों को रोकता है। इसमें मिसाइलों के साथ-साथ ऑटोमैटिक तोपें भी हैं, जो इसे “पॉइंट डिफेंस” के लिए शानदार बनाती हैं। यूएई इसका इस्तेमाल खास जगहों, जैसे तेल संयंत्रों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा के लिए करता है।

साथ ही यूएई के पास MIM-23 हॉक पुराना अमेरिकी सिस्टम भी है, जो कम और मध्यम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई जहाजों और मिसाइलों को निशाना बनाता है। हालांकि ये अब पुराना हो चुका है, फिर भी यूएई के पास इसकी कुछ यूनिट्स हैं, जो बाकी सिस्टम्स के साथ मिलकर रक्षा को मजबूत करती हैं। यूएई इनका इस्तेमाल सपोर्टिंग रोल में करता है।

इसके अलावा उसके पास मध्यम दूरी का चेओंगुंग II (KM-SAM) सिस्टम भी है, जिसे यूएई ने 2022 में दक्षिण कोरिया से खरीदा था, जिसकी कीमत 3.5 बिलियन डॉलर थी। हालांकि ये अभी डिलीवरी के लिए तैयार हो रहा है। चेओंगुंग 40 किमी तक की रेंज में हवाई जहाज, क्रूज मिसाइलें और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक सकता है। यह रूस के S-400 जैसा है, और कम ऊंचाई के खतरों से निपटने में खास है। इसे यूएई के सुरक्षा में “लोअर-टियर” गैप को भरने के लिए लिया गया है, जहां THAAD और पैट्रियट कम प्रभावी हो सकते हैं।

वहीं, 2022 में हूती हमलों के बाद, यूएई ने इजराइल से स्पाइडर सिस्टम भी खरीदा था। ये मध्यम दूरी का सिस्टम है, जो ड्रोन, क्रूज मिसाइलों और हवाई जहाजों को निशाना बनाता है। इसकी रेंज 15-20 किमी है और ये मोबाइल है, यानी इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। ये खासकर ड्रोन हमलों से बचाव के लिए लिया गया। अब्राहम समझौते के बाद इजराइल और यूएई के रिश्ते बेहतर हुए हैं, जिसके चलते ये डील हुई थी।

UAE Akash Missile Explainer: क्यों चाहिए यूएई को आकाश मिसाइल सिस्टम?

दरअसल यूएई खाड़ी क्षेत्र में एक अहम देश है, जिसके पास ढेर सारा तेल, गैस और पैसा है। लेकिन इसके साथ ही इसके दुश्मन भी कम नहीं हैं। पिछले कुछ सालों में यमन के हूती विद्रोहियों ने यूएई पर कई बार ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। जनवरी 2022 में हूती मिसाइलों ने अबू धाबी को निशाना बनाया था, जिसमें तीन लोग मारे गए थे। इसके अलावा, ईरान की बढ़ती ताकत खासकर उसकी बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन भी यूएई के लिए चिंता का सबब है। ये खतरे छोटे-मोटे नहीं हैं, और यूएई को हर तरह के हवाई हमले से निपटने के लिए तैयार रहना पड़ता है।

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वहीं, थाड और पैट्रियट जैसे सिस्टम लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक सकते हैं। लेकिन हूती जैसे समूह जो सस्ते ड्रोन और छोटी रेंज की मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं, उनके खिलाफ इन बड़े सिस्टम का इस्तेमाल महंगा पड़ता है। एक थाड मिसाइल की कीमत करीब 1-2 मिलियन डॉलर होती है, जबकि हूती का ड्रोन या मिसाइल उससे कई गुना सस्ता। ऐसे में यूएई को एक ऐसा सिस्टम चाहिए, जो किफायती हो और छोटे-मध्यम दूरी के खतरों से भी निपट सके। जिसमें आकाश सिस्टम फिट बैठता है।

वहीं, आकाश (Akash Missile) की एक मिसाइल की कीमत 5 लाख डॉलर से भी कम है, जो पैट्रियट या थाड की तुलना में बहुत सस्ती है। खासकर ड्रोन जैसे सस्ते खतरों से निपटने के लिए यह यूएई के लिए ये किफायती ऑप्शन है। आकाश की रेंज भी 25-30 किमी तक है और ये छोटी और मध्यम दूरी के खतरों जैसे ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और क्रूज मिसाइलों पर सटीक निशाना साध सकता है। वहीं हूती हमलावर ज्यादातर ऐसे ही हथियार इस्तेमाल करते हैं।

इसके अलावा आकाश को ट्रक या ट्रैक वाले वाहनों पर आसानी से ले जाया जा सकता है। यूएई जैसे देश में, जहां तेल संयंत्र और शहर काफी दूर-दूर हैं, वहां आसानी से पहुंचाया जा सकता है। यूएई का रेगिस्तानी मौसम मुश्किल होता है, लेकिन आकाश हर हाल में काम करता है, जो इसे भरोसेमंद बनाता है।

इसके अलावा यूएई के पास THAAD और पैट्रियट जैसे सिस्टम लंबी दूरी और ऊंचाई के लिए हैं, जबकि पैंटसिर और स्पाइडर छोटी दूरी के लिए। लेकिन मध्यम दूरी (20-40 किमी) में एक गैप है। दक्षिण कोरिया का चेओंगुंग II (KM-SAM) इस गैप को भरने के लिए लिया गया है, जिसकी डिलीवरी में देरी है। लेकिन तब तक यूएई को एक तुरंत उपलब्ध सिस्टम चाहिए, और आकाश इस जरूरत को पूरा कर सकता है। साथ ही, आकाश की कीमत भी KM-SAM से कम है।

यूएई ज्यादातर अपने डिफेंस प्रोडक्ट्स अमेरिका, फ्रांस या यूरोपीय देशों से खरीदता रहा है। लेकिन 2022 के हूती हमलों के बाद उसे लगा कि अमेरिका का सपोर्ट उतना तेज नहीं था। बदले भू राजनीतिक समीकरणों के चलते अब यूएई चाहता है कि उसकी रक्षा आपूर्ति एक ही स्रोत पर निर्भर न रहे। वहीं, भारत और यूएई के बीच मजबूत होते रणनीतिक संबंधों को देखते हुए, यूएई को भरोसा है कि भारत से मिलने वाली टेक्नोलॉजी पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव या शर्त नहीं होगी, जैसा कि अक्सर अमेरिकी डिफेंस प्रोडक्ट्स खरीदने पर होता है।

दूसरी ओर, यूएई भी अब तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर खुद को एक आधुनिक, तकनीकी रूप से सक्षम और रणनीतिक रूप से मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में भारत जैसे देश के साथ रक्षा, तकनीक और उत्पादन के क्षेत्र में साझेदारी उसे नए अवसर प्रदान कर सकती है।

आकाश मिसाइल सिस्टम में किन देशों की है दिलचस्पी?

आकाश मिसाइल सिस्टम (Akash Missile) को लेकर कई देशों ने रूचि दिखाई है। इनमें आर्मेनिया पहला देश है जिसने आकाश सिस्टम को खरीदा। नवंबर 2024 तक एक बैटरी (चार लॉन्चर) की डिलीवरी हो चुकी है। करीब 6,000 करोड़ रुपये का ये सौदा भारत के रक्षा निर्यात में मील का पत्थर है।

फिलीपींस की नौसेना इसे अपने तटीय रक्षा सिस्टम में शामिल करने की योजना बना रही है। 2025 में 200 मिलियन डॉलर का ऑर्डर संभावित है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का करीबी दोस्त वियतनाम भी इसे खरीदने की सोच रहा है। ये क्षेत्र में चीन के खिलाफ संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।

इसके अलावा दिसंबर 2023 की रिपोर्ट्स के मुताबिक, दक्षिण अमेरिका का ब्राजील और अफ्रीका का मिस्र भी इस सिस्टम में रुचि दिखा रहे हैं। साथ ही, बेलारूस, मलेशिया, थाईलैंड और सूडान जैसे देशों ने भी अलग-अलग मौकों पर आकाश सिस्टम को लेकर बात की है। सूडान में 2022 के एक मिलिट्री प्रदर्शनी में इसे देखा भी गया था।

आकाश सिस्टम की खूबियां

आकाश मिसाइल सिस्टम 18 किलोमीटर की ऊंचाई तक 25 से 30 किलोमीटर की दूरी तक हवा में आने वाले खतरों को नष्ट कर सकता है। ये सिस्टम एक बार में चार टारगेट को निशाना बना सकता है। दिसंबर 2023 में हुए “अस्त्रशक्ति” अभ्यास में भारत ने दिखाया था कि एक ही फायरिंग यूनिट से चार टारगेट को ढेर किया जा सकता है। ये दुनिया में अपनी तरह का पहला प्रदर्शन था।

चाहे बारिश हो, धूप हो या कोहरा, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम हर मौसम में काम करता है। इसका रडार और मिसाइल सिस्टम हर मौसम में सटीक रहता है।

ये सिस्टम चलते-फिरते प्लेटफॉर्म पर काम करता है। सेना के लिए टी-72 टैंक चेसिस पर और वायुसेना के लिए ट्रक और ट्रेलर पर इसे लगाया जाता है। इससे इसे जल्दी कहीं भी ले जाया जा सकता है।

इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स (ECCM) हैं, यानी दुश्मन अगर रडार को जाम करने की कोशिश करे, तो भी ये काम करता रहेगा।

आकाश की कीमत दूसरे देशों के सिस्टम से 8-10 गुना कम है। मिसाल के तौर पर, अमेरिका का पैट्रियट सिस्टम इससे कहीं महंगा है, लेकिन आकाश की सटीकता और मोबिलिटी इसे खास बनाती है।

इसमें रॉकेट-रामजेट सिस्टम है, जो मिसाइल को टारगेट तक पूरी स्पीड से ले जाता है। जो ये इसे रूस के SA-6 जैसा बनाता है।

इसका “राजेंद्र” रडार सिस्टम 60 किलोमीटर तक ट्रैक कर सकता है और एक साथ 64 टारगेट को देख सकता है। ये 8 मिसाइलों को गाइड कर सकता है, वो भी चार अलग-अलग टारगेट की ओर।

पहली मिसाइल से टारगेट को हिट होने की संभावना 88% है, और दूसरी मिसाइल के साथ ये 99% तक पहुंच जाती है। यानी ये लगभग अचूक है।

भारत ने बनाया एडवांस आकाश-एनजी सिस्टम

भारत ने इसका आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) सिस्टम भी तैयार कर लिया है। आकाश-एनजी की शुरुआत 2010 के दशक में हुई, जब DRDO ने फैसला किया कि पुराने आकाश को और बेहतर करने की जरूरत है। इसे बनाने में भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) और टाटा पावर जैसे प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों ने भी सहयोग किया है। इसका पहला टेस्ट जुलाई 2021 में ओडिशा के चांदीपुर टेस्ट रेंज में हुआ था, जिसमें इसने एक ड्रोन पर सटीक निशाना साधा। इसके बाद जनवरी 2024 में एक और कामयाब टेस्ट हुआ, जिसमें इसने हाई-स्पीड टारगेट को ढेर कर दिया।

आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) 70-80 किलोमीटर तक मार कर सकता है। यानी दुश्मन को सीमा के पास आने से पहले ही रोक देगा। इसकी ऊंचाई सीमा भी 20-25 किलोमीटर तक है, जो इसे ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट के खिलाफ कारगर बनाती है। वहीं पुराने आकाश की तुलना में ये हल्का है। इसका वजन करीब 300 किलोग्राम है, जबकि पुराने सिस्टम का वजन 700 किलो है। ये 2.5 मैक की स्पीड (ध्वनि से ढाई गुना तेज) तक जा सकता है।

इसमें एक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) मल्टी-फंक्शन रडार लगा है। ये रडार 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक टारगेट को देख सकता है और एक साथ कई निशानों को ट्रैक कर सकता है। ये पुराने “राजेंद्र” रडार से कहीं एडवांस है।

आकाश-एनजी सिस्टम एक बार में कई दुश्मनों पर निशाना साध सकता है। इसका “सीकर” (मिसाइल का गाइडेंस सिस्टम) इतना सटीक है कि तेजी से बदलते टारगेट को भी मात दे सकता है। इसके अलावा बारिश, कोहरा या रात का अंधेरा आकाश-एनजी हर मौसम में काम करता है। इसका ऑल-वेदर सिस्टम इसे भरोसेमंद बनाता है।

डीआरडीओ की योजना है कि 2026 तक आकाश-एनजी को भारतीय वायुसेना में शामिल कर लिया जाए।

Stolen Honor: जिस बेटे ने देश की हिफाजत में दी जान, उसके नाम की सड़क का बोर्ड चुरा ले गए चोर!

Stolen Honor- Martyr’s Road Sign Missing in Faridabad, Family Seeks Justice

Stolen Honor: हरियाणा के फरीदाबाद में एक ऐसा वाकया सामने आया है, जिसने एक शहीद परिवार के जख्मों को फिर से हरा कर दिया। लेफ्टिनेंट कर्नल ऋषभ शर्मा, जिन्होंने देश की सीमा की रक्षा करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी, उनके नाम पर बनाई गई सड़क का साइनबोर्ड चोरी हो गया।

Stolen Honor- Martyr’s Road Sign Missing in Faridabad, Family Seeks Justice

Stolen Honor: आर्मी एविएशन कोर में पायलट थे लेफ्टिनेंट कर्नल ऋषभ शर्मा

लेफ्टिनेंट कर्नल ऋषभ शर्मा आर्मी एविएशन कोर में पायलट थे। 26 जनवरी 2021 को, गणतंत्र दिवस की नाइट पेट्रोलिंग के दौरान हेलिकॉप्टर मिशन पर थे। तकनीकी खराबी की वजह से उनका रुद्र हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अंतिम क्षणों में भी उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हेलिकॉप्टर गांव की आबादी से दूर गिरे, ताकी जमीन पर किसी की जान न जाए। उनके साथ मिशन में एक कैप्टन भी थे, जो हादसे में बाल-बाल बच गए, लेकिन ऋषभ देश के लिए शहीद हो गए।

उनके माता-पिता, डॉ. कल्पना और डॉ. राजिंदर शर्मा, और उनकी पत्नी राधा शर्मा ने सालों तक फरीदाबाद नगर निगम से गुहार लगाई कि उनके बेटे और पति की याद में एक सड़क का नाम रखा जाए। यह उनके लिए सिर्फ एक बोर्ड नहीं, बल्कि उस शहादत का सम्मान था, जो ऋषभ ने देश को दिया। कई कोशिशों और कई पत्र भेजने के बाद निगम के टालमटोल के बाद, आखिरकार 2024 की शुरुआत में इसकी मंजूरी मिली। लेकिन बोर्ड लगाने की प्रक्रिया में देरी होती रही। थक-हारकर परिवार ने खुद ही आगे बढ़कर यह कदम उठाया। 3 जुलाई 2024 को, लेफ्टिनेंट कर्नल ऋषभ के जन्मदिन पर परिवार ने अपनी जेब से पैसे खर्च कर और जरूरी अनुमति लेकर यह बोर्ड लगवाया। उनकी पत्नी राधा कहती हैं, “यह सम्मान तो सरकार को देना चाहिए था, लेकिन हमें खुद लड़ना पड़ा।”

लेकिन परिवार की खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी। कुछ दिन पहले जब वे उस सड़क से गुजरे, तो देखा कि बोर्ड गायब है। हैरानी की बात यह है कि यह जगह स्थानीय पुलिस स्टेशन से बस कुछ कदमों की दूरी पर थी। परिवार तुरंत पुलिस के पास पहुंचा, लेकिन वहां जो जवाब मिला, वो हैरान करने वाला था। पहले तो पुलिस ने कहा कि शायद कोई हादसा हुआ होगा और बोर्ड टूटकर हटा लिया गया होगा। लेकिन परिवार ने आसपास पूछताछ की और कोई सुराग नहीं मिला। जिसके बाद पुलिस ने माना कि स्टील का बना यह बोर्ड चोरी हो गया है। एक सब-इंस्पेक्टर को जांच के लिए लगाया गया, लेकिन अभी तक कोई सुराग नहीं मिला।

Stolen Honor- Martyr’s Road Sign Missing in Faridabad, Family Seeks Justice
Lt Col Rishubh Sharma

ऋषभ का नौ साल का बेटा, जो अपने पिता को अपना हीरो मानता है, इस घटना से बेहद दुखी है। परिवार का कहना है कि यह बोर्ड सिर्फ एक स्टील का टुकड़ा नहीं था, बल्कि उनके लिए ऋषभ की यादों का एक हिस्सा था। राधा पूछती हैं, “जो शख्स देश की हिफाजत करते हुए शहीद हुआ, क्या उसकी याद को भी चुराया जा सकता है? क्या हमारा सिस्टम इतना कमजोर है?”

वहीं, पुलिस का रवैया भी सवालों के घेरे में है। परिवार का कहना है कि जिस नाम पर गर्व होना चाहिए, उस नाम का सम्मान सार्वजनिक स्थान से इस तरह गायब हो जाना, वो भी बिना किसी जवाबदेही के, केवल चोरी नहीं बल्कि संवेदनहीनता दर्शाता है।

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एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “हम मामले की जांच कर रहे हैं, और एक सहायक सब-इंस्पेक्टर को इसकी जिम्मेदारी दी गई है।” उन्होंने यह भी वादा किया कि अगर बोर्ड नहीं मिला, तो वे इसे दोबारा लगवाने में मदद करेंगे। परिवार का कहना है कि पुलिस की ओर से अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

लेकिन यह मामला सिर्फ एक बोर्ड का चोरी का नहीं है। यह उस सम्मान की बात है, जो एक शहीद को मिलना चाहिए। लेफ्टिनेंट कर्नल ऋषभ शर्मा ने अपनी जान देकर देश की सेवा की, लेकिन एक शहीद की धरोहर को भी सुरक्षित रखना मुश्किल हो रहा है।

Rafale Assembly Line India: क्या अब भारत में बनेगा राफेल फाइटर जेट! 26 Rafale M के लिए अप्रैल में हो सकता है फ्रांस से सौदा, दसॉ को भारत से और ऑर्डर की उम्मीद!

Rafale Assembly Line India: Will Rafale Jets Be Made in India? Deal for 26 Rafale-M Expected in April!

Rafale Assembly Line India: भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत होता जा रहा है। राफेल लड़ाकू विमानों को लेकर दोनों देशों के बीच एक नई और महत्वपूर्ण डील लगभग तय हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत की नौसेना के लिए 26 राफेल एम (Rafale-M) लड़ाकू विमानों की डील करीब 7.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की होगी। इसके अलावा, फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन (Dassault Aviation) भारत में ही राफेल की फाइनल असेंबली लाइन (Final Assembly Line) खोलने की योजना बना रही है। इस कदम से भारत के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को मजबूती मिलेगी और भविष्य में राफेल विमानों का उत्पादन भारत में ही संभव हो सकता है।

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Rafale Assembly Line India: क्या कहा दसॉ एविएशन के सीईओ ने

L’Usine Nouvelle की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस की रक्षा कंपनी दसॉ एविएशन भारत में राफेल फाइटर जेट्स की फाइनल असेंबली लाइन शुरू करने पर विचार कर रही है। इसका मकसद भविष्य में मिलने वाले बड़े ऑर्डर्स को पूरा करना और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। दसॉ एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने कहा, “भारत बड़े ऑर्डर्स की तैयारी कर रहा है, और हम निश्चित रूप से भारत में एक फाइनल असेंबली लाइन खोलने पर विचार कर रहे हैं ताकि इस नए वर्कलोड को संभाल सकें।” दरअसल दसॉ की नजर भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोग्राम के तहत 114 फाइटर जेट्स की खरीद की जानी है। दसॉ को उम्मीद है कि उसे ये बड़ा ऑर्डर मिल सकता है।

दसॉ राफेल फाइटर जेट का प्रोडक्शन बढ़ाने की प्रक्रिया में है, जिसमें हर महीने दो विमानों से बढ़ाकर तीन विमान किया जा रहा है। कंपनी का लक्ष्य हर महीने चार विमान तक पहुंचना है, और भविष्य के ऑर्डरों को देखते हुए हर महीने पांच विमान बनने की भी योजना है।

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Rafale Assembly Line India: दसॉ को बनाने हैं 230 राफेल

दसॉ एविएशन को उम्मीद है कि उसे भारत से और ऑर्डर मिल सकते हैं। 2023 में 13 राफेल विमानों की डिलीवरी हुई, जो 2024 में बढ़कर 21 हो गई और 2025 के लिए लक्ष्य 25 है। दसॉ की ऑर्डर बुक में 230 राफेल शामिल हैं, जिसमें 164 एक्सपोर्ट के लिए और 56 फ्रेंच एयर एंड स्पेस फोर्स के लिए हैं। 2024 में, कंपनी ने 8.3 अरब यूरो (705.5 अरब भारतीय रुपये) के मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट मिले थे, जो कि 2023 में 6.5 अरब यूरो (552.5 अरब भारतीय रुपये) थे। इन कॉन्ट्रैक्ट में सर्बिया से 12 विमान और इंडोनेशिया से 18 विमान के ऑर्डर शामिल हैं। दसॉ के मिलिट्री एयरक्राफ्ट का कुल बैकलॉग, जिसमें राफेल और फाल्कन जेट शामिल हैं, 43.2 अरब यूरो (3672 अरब भारतीय रुपये) तक पहुंच गया है, जो 2023 में 38.5 अरब यूरो (3272.5 अरब भारतीय रुपये) था।

Rafale Assembly Line India: भारत के लिए क्यों अहम है यह डील

भारत ने 2016 में 36 राफेल विमान खरीदने का सौदा किया था, जिसकी डिलीवरी 2022 तक पूरी हो गई। अब भारतीय नौसेना को पुराने हो चुके मिग-29के (MiG-29K) लड़ाकू विमानों को बदलने के लिए नए और अत्याधुनिक राफेल एम (Rafale Marine) की जरूरत है। भारतीय नौसेना के MRCBF (Multi-Role Carrier-Borne Fighters) प्रोग्राम के तहत राफेल एम विमान भारत के दो प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर—आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) और आईएनएस विक्रमादित्य (INS Vikramaditya) पर तैनात किए जाएंगे।

भारतीय नौसेना वर्तमान में मिग-29के लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इन विमानों के साथ कई तकनीकी समस्याएं सामने आई हैं। इनमें से कई विमान तकनीकी खराबियों और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण लंबे समय तक ग्राउंडेड रहे हैं। इसके विपरीत, राफेल एम एक आधुनिक, मल्टीरोल लड़ाकू विमान है, जिसे कई देशों की नौसेनाएं पहले से ही इस्तेमाल कर रही हैं।

राफेल एम को खासतौर पर समुद्री अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। यह विमान कैटापल्ट असिस्टेड टेक-ऑफ और अरेस्टेड लैंडिंग की क्षमता रखता है, जिससे इसे एयरक्राफ्ट कैरियर पर ऑपरेशन में आसानी होती है। इसके अलावा, इसमें मजबूत लैंडिंग गियर और एयरफ्रेम होते हैं।

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भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों में अस्त्रा Mk1 मिसाइल को भी इंटीग्रेट किया है। इसके अलावा भारतीय वायुसेना ने हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी राफेल से उड़ान भरी है। ट्रायल के दौरान, राफेल ने 16.7 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद सिमुलेटेड टोही गुब्बारों को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया है।

इन खास फीचर्स से लैस है राफेल

4.5 पीढ़ी वाला मल्टीरोल फाइटरजेट राफेल एक अत्याधुनिक M88 टर्बोफैन ट्विन-इंजन, कनार्ड डेल्टा विंग, मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जिसे दसॉ एविएशन खासतौर पर एयर सुपीरियरिटी, डीप स्ट्राइक, टोही (रिकॉनेनेसेंस) और परमाणु हमलों जैसी क्षमताओं के लिए डिजाइन किया गया है। राफेल आधुनिकतम थेल्स RBE2 AESA रडार और SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस है, जो इसे दुश्मन आसानी से पकड़ नहीं पाता है। इसके अलावा, राफेल इज़रायली हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले सिस्टम, मेटियोर गाइडेड मिसाइलों और MICA एयर-टू-एयर मिसाइल, SCALP क्रूज मिसाइल (500 किलोमीटर दूर से निशाना) और Exocet एंटी-शिप मिसाइल जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस है। साथ ही उनमें 10 घंटे की डेटा स्टोरेज क्षमता वाला फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर, इन्फ्रारेड टार्गेट एक्विजिशन और ट्रैकिंग सिस्टम (जो रात या खराब मौसम में भी दुश्मन के लक्ष्यों का पता लगा सकता है), कोल्ड वेदर इंजन स्टार्टर (जो ठंडे मौसम में भी विमान के इंजन को सुचारू रूप से शुरू करता है) जैसे खास फीचर्स से भी लैस है।

राफेल की मैक्सिमम स्पीड 1.8 मैक, और कॉम्बैट रेंज 1,850 किलोमीटर है, और यह मैक 1.4 पर बिना आफ्टरबर्नर के लगातार सुपरक्रूज़ कर सकता है।

कब हो सकता है राफेल एम का सौदा

राफेल एम सौदे की आधिकारिक घोषणा अप्रैल 2025 में फ्रांस के रक्षा मंत्री की भारत यात्रा के दौरान होने की उम्मीद है। 7.6 बिलियन डॉलर (6.32 लाख करोड़ रुपये) के इस सौदे में 22 राफेल एम लड़ाकू विमान और टू सीटर 4 ट्रेनर वेरिएंट शामिल होंगे, जिनका इस्तेमाल वायुसेना और नौसेना के पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए किया जाएगा। इसके अलावा, भारत और फ्रांस संयुक्त रूप से एडवांस एवियोनिक्स और मिसाइल सिस्टम पर भी काम कर सकते हैं। यह विमान भारतीय नौसेना के मौजूदा MiG-29K बेड़े को बदलने के लिए खरीदे जा रहे हैं, जो INAS 300 व्हाइट टाइगर्स और INAS 303 ब्लैक पैंथर्स स्क्वाड्रन के तहत ऑपरेट होते हैं। वहीं नए राफेल एम फाइटर जेट्स की डिलीवरी 2029 से शुरू होगी। वहीं भारत में दसॉ एविएशन मेक इन इंडिया पॉलिसी के तहत राफेल असेंबली लाइन लगाएगी, इस नीति के तहत भारत में खरीदे गए 60% हथियारों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग की जानी जरूरी है।

चीन और पाकिस्तान हैं चुनौती 

राफेल M की तैनाती भारत के लिए बेहद स्ट्रैटेजिक एडवांटेज साबित होगी। खासकर जब चीन और पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटे हैं। चीन ने तीन एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात कर लिए हैं और 2035 तक पांच कैरियर बनाने की योजना बना रहा है। इन कैरियर्स पर J-15 फाइटर जेट्स तैनात हैं, लेकिन उनकी तकनीक राफेल के मुकाबले पुरानी मानी जाती है। वहीं, चीन का Fujian कैरियर (EMALS सिस्टम के साथ) भारतीय नौसेना के लिए नई चुनौती बन सकता है।

वहीं पाकिस्तान की बात करें, तो पाकिस्तान ने चीन से JF-17 थंडर और कुछ J-10C फाइटर्स खरीदे हैं। हालांकि, पाकिस्तान के पास कोई एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं है, जिससे वह भारतीय नौसेना के सामने काफी कमजोर है। वहीं, राफेल की Meteor मिसाइल क्षमता पाकिस्तान के किसी भी फाइटर जेट से काफी बेहतर है।

Syria clashes: सीरिया में अल्पसंख्यक शिया, अलावी और क्रिश्चियन क्यों हैं निशाने पर? असद सरकार के पतन के बाद क्यों मचा कोहराम? पढ़ें Explainer

Syria Clashes: Why Are Shia, Alawite, and Christians Targeted After Assad's Fall? Explained

Syria clashes: सीरिया एक बार फिर से हिंसा और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। बशर अल-असद के शासन के पतन के बाद से देश में जारी अस्थिरता ने अब एक खतरनाक मोड़ ले लिया है। हाल ही में लताकिया और टार्टूस जैसे तटीय क्षेत्रों में सरकार समर्थित सेनाओं और असद समर्थक विद्रोही गुटों के बीच हिंसक संघर्ष की खबरें सामने आई हैं। इस संघर्ष का केंद्र असद शासन के वफादार माने जाने वाले अलावी समुदाय के इलाके रहे, जिनके खिलाफ अब नए सत्ताधारी गुटों द्वारा हमले तेज हो गए हैं। इस खूनी हिंसा के बाद सीरिया के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

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Syria clashes: सीरिया का सत्ता परिवर्तन: क्यों बना संकट की जड़?

सीरिया में दशकों से सत्ता में रहे बशर अल-असद का शासन कुछ महीनों पहले समाप्त हो गया था। इस सत्ता परिवर्तन को लेकर दुनियाभर में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे लोकतंत्र की ओर एक कदम माना, जबकि कुछ ने चेतावनी दी थी कि इससे क्षेत्र में अस्थिरता और हिंसा बढ़ सकती है। असद शासन के पतन के बाद, हैयात तहरीर अल-शाम (HTS) जैसे समूहों ने सत्ता पर कब्जा जमाया। हालांकि, सत्ता परिवर्तन के बाद भी हिंसा का दौर नहीं थमा।

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तटीय इलाकों लताकिया-टार्टूस में क्यों छिड़ा संघर्ष?

सीरिया का लताकिया-टार्टस क्षेत्र भूमध्य सागर के किनारे स्थित है। लताकिया और टार्टूस सीरिया के प्रमुख तटीय शहर हैं, जहां अलावी समुदाय की संख्या अधिक है। यहां असद परिवार का गृहनगर अल-कर्दाहा भी स्थित है। जब बशर अल-असद का शासन गिरा, तो आशंका जताई गई थी कि अलावी समुदाय के खिलाफ बदले की कार्रवाई हो सकती है। यही कारण है कि असद समर्थकों ने अपने प्रभावशाली इलाकों से संघर्ष की शुरुआत की। बनियास शहर में तो सीरिया की सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी भी है, जहां पर भी आतंकवादी गुटों ने हमला करने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षाबलों ने इसे विफल कर दिया। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद इन इलाकों में असद समर्थकों और नई सरकार के समर्थकों के बीच टकराव शुरू हो गया। इसकी शुरुआत 6 मार्च को हुई, जब, सरकारी बलों और असद समर्थक गुटों के बीच झड़पें शुरू हुईं। इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या में आम नागरिक भी शामिल हैं।

कैसे हुई संघर्ष की शुरुआत?

6 मार्च को, सीरियाई सरकारी बलों ने लताकिया, बनियास, टार्टूस और जबलेह जैसे तटीय शहरों में सैन्य अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य उन “रेजिम रेमनेंट्स” यानी असद शासन के वफादारों के खिलाफ कार्रवाई करना था, जिन्होंने नए सत्ता-व्यवस्था को मानने से इनकार कर दिया था। इन इलाकों में पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद के समर्थक और उनके शासन से जुड़े सैन्य गुट सक्रिय बताए जा रहे हैं। 6 मार्च को असद समर्थक विद्रोही गुटों ने लताकिया के पास सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला किया। इस हमले में कम से कम 16 सुरक्षाकर्मी और रक्षा मंत्रालय के अधिकारी मारे गए। बताया जा रहा है कि ये हमला अचानक नहीं था, बल्कि पहले से ही इसकी योजना बनाई गई थी। इस हमले के बाद संघर्ष तेज हो गया और अन्य तटीय शहरों में भी हिंसा फैल गई।

सरकारी मीडिया के अनुसार, यह हमला पहला नहीं था, बल्कि पिछले तीन महीनों में ऐसे कई हमले हो चुके हैं। इस घटना के बाद सीरिया की अंतरिम सरकार ने कड़े कदम उठाते हुए सैन्य ऑपरेशन शुरू किया। लेकिन इस बीच, लताकिया और आसपास के इलाकों में हत्या, अपहरण, लूट और उत्पीड़न की घटनाओं में तेजी आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, नागरिकों को खुलेआम मारा जा रहा है, जिससे स्थानीय आबादी में भय का माहौल बना हुआ है और हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा।

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सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स (SOHR) की रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक लगभग 1,311 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से 830 आम नागरिक, 230 सुरक्षा कर्मी और 250 सशस्त्र लड़ाके शामिल हैं। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन घटनास्थल से मिल रही जानकारियां इसकी गंभीरता की पुष्टि करती हैं।

Syria clashes: अलावी समुदाय क्यों बना निशाना?

सत्ता परिवर्तन के बाद अलावी समुदाय को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। असद शासन में अलावी समुदाय को शासन का प्रमुख समर्थक माना जाता था। लेकिन अब, जब नई सरकार सत्ता में है, तो विद्रोही गुटों ने अलावी समुदाय के खिलाफ हिंसा तेज कर दी है।

लताकिया और टार्टूस जैसे शहरों में रहने वाले अलावी लोगों के घरों पर हमले हुए, कई लोगों को अगवा कर लिया गया और महिलाओं के साथ भी अत्याचार की खबरें सामने आई हैं। इसके अलावा, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि अलावी समुदाय के लोगों को उनके धर्म के आधार पर प्रताड़ित किया गया है।

Syria clashes: कौन लड़ रहा है किसके खिलाफ?

सरकारी सुरक्षा बलों ने असद शासन के वफादार माने जाने वाले पुराने सैन्य अधिकारियों के नेतृत्व में बने सशस्त्र गुटों से मोर्चा लिया है। इन गुटों को “मिलिट्री काउंसिल फॉर द लिबरेशन ऑफ सीरिया” के नाम से जाना जा रहा है।

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इस गुट का नेतृत्व असद की रिपब्लिकन गार्ड में शामिल रहे मेजर मुकदाद फतेहा और ब्रिगेडियर जनरल गियाथ सुलेमान डल्ला कर रहे हैं। इनका दावा है कि असद शासन के पतन के बाद अलावी समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। फतेहा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी कर “हयात तहरीर अल-शाम” (HTS) के खिलाफ ‘सीरिया के स्वतंत्रता संघर्ष’ की बात कही थी। इसके अलावा, ब्रिगेडियर जनरल गियाथ सुलैमान डल्ला ने भी अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा और ‘सीरिया की मुक्ति के लिए सैन्य परिषद’ के गठन की घोषणा की थी।

Syria clashes: नागरिकों की हालत बेहद खराब

तटीय इलाकों में रह रहे नागरिक भय के साए में जी रहे हैं। लताकिया के एक निवासी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हम बाहर नहीं निकलते, खिड़कियां तक नहीं खोलते। यहां कोई सुरक्षा नहीं है, अलावी समुदाय के लिए तो बिल्कुल नहीं।” इन इलाकों से खबरें आ रही हैं कि अलावी नागरिकों को उनके घरों से खींचकर फांसी पर चढ़ाया जा रहा है। महिलाओं को अस्पतालों से घसीट कर ले जाया जा रहा है और उनका सामूहिक नरसंहार किया जा रहा है। कई चश्मदीदों के अनुसार, बंदूकधारियों ने लोगों को उनके घरों से बाहर निकाला और सार्वजनिक रूप से उनका सिर कलम कर दिया।

इस हिंसा के चलते हजारों लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अलावी समुदाय के लोग डर के कारण शहरों से भाग रहे हैं, क्योंकि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। कुछ लोगों ने बताया कि उनके पड़ोसियों को जबरन घर से निकालकर अगवा किया गया। वहीं, कई लोगों को डर है कि हिंसा का अगला शिकार वे न बन जाएं।

अल्पसंख्यकों की स्थिति

सीरिया में अलावी, शिया और ईसाई समुदायों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादी संगठन अलावी समुदाय के बच्चों को सुन्नी बनाने की साजिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें इन समुदायों के खिलाफ हिंसा और हत्या को बढ़ावा देने वाले बयान देखे जा सकते हैं।

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सीरियाई सरकार की प्रतिक्रिया

सीरिया के अस्थायी राष्ट्रपति अहमद अल-शराआ ने इस संकट से निपटने के लिए दो समितियों का गठन किया है। पहली समिति मार्च 6 के हमलों की जांच करेगी, जबकि दूसरी समिति ‘सुप्रीम कमेटी फॉर सिविल पीस’ प्रभावित क्षेत्रों में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी। राष्ट्रपति अल-शराआ ने हाल ही में एक मस्जिद में संबोधन के दौरान कहा कि देश को एकजुट रखने और शांति बहाल करने के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है। उन्होंने हिंसा में शामिल दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका

सीरिया में बढ़ती हिंसा पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र ने सीरिया में हो रही हिंसा की निंदा की है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी सीरिया में जारी हिंसा पर चर्चा के लिए आपातकालीन बैठक बुलाई है। यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका और रूस ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है और सीरिया सरकार से हिंसा रोकने की अपील की है।

हालात हो सकते हैं बेकाबू

सत्ता परिवर्तन के बाद अलावी और शिया समुदायों के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर चिंता बढ़ गई है। अभी भी असद समर्थक गुट तटीय इलाकों में संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनके पास हथियारों की कमी है। जानकारों का मानना है कि अगर यही स्थिति रही, तो ईरान, इराक और हिजबुल्लाह जैसे गुट इन अल्पसंख्यकों को समर्थन देना शुरू कर सकते हैं।

इसके अलावा, ऐसी भी खबरें हैं कि कई अलावी नागरिक रूस के तारतूस में स्थित नौसैनिक अड्डे पर शरण लिए हुए हैं। अगर रूस या ईरान इन गुटों को हथियार और समर्थन देने लगते हैं, तो संघर्ष और तेज हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो यह हिंसा गृहयुद्ध का रूप ले सकती है। साथ ही, इससे पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सीरिया में शांति बहाली के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सख्त कदम उठाने होंगे। अमेरिका और रूस को एक साथ मिलकर संघर्षरत पक्षों पर दबाव बनाना चाहिए ताकि वे नागरिकों पर हमले बंद करें। इसके अलावा, मानवाधिकार संगठनों को भी इस संकट में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, ताकि हिंसा के शिकार लोगों को राहत पहुंचाई जा सके।

Pakistan Nuclear Test: पीओके पर भारत के दावों से डरा पाकिस्तान? क्या कर रहा है परमाणु परीक्षण की तैयारी? सैटेलाइट इमेज में हुआ बड़ा खुलासा!

Pakistan Nuclear Test: Triggered by India's POK Claims, Is Pakistan Planning a Nuclear Test?

Pakistan Nuclear Test: पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण स्थल चागाई को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। चगाई के पास हाल ही में नई गतिविधियां देखी गई हैं। अंदाजा लगाया जा रहा है कि पाकिस्तान कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, चागाई इलाके में एक सुरंग खोदी गई है, जिसके बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि क्या पाकिस्तान परमाणु परीक्षण की तैयारी कर रहा है? वहीं जानकारों का कहना है कि पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर जिस तरह से भारत की तरफ से दावे किए जा रहे हैं, उसे देखते हुए पाकिस्तान चेतावनी के तौर पर परमाणु परीक्षण जैसे बड़ा कदम उठा सकता है।

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Pakistan Nuclear Test: परमाणु परीक्षण के लिए बनाई नई सुरंग!

सैटेलाइज इमेज एक्सपर्ट रिटायर्ड कर्नल विनायक भट्ट के मुताबिक, उन्हें सैटेलाइट इमेज से जानकारी मिली है कि चागाई इलाके में एक नई सुरंग की खुदाई की गई है, जिसका आकार लगभग 8 मीटर x 8 मीटर बताया जा रहा है। यह सुरंग पहले से मौजूद परीक्षण स्थलों के नजदीक स्थित है, जिसके बाद से यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि पाकिस्तान ‘हॉट टेस्ट’ की तैयारी कर रहा है।

हालांकि, इन गतिविधियों की आधिकारिक तौर पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन सैटेलाइट और लोकल सोर्सेज के माध्यम से ये जानकारी सामने आई है।

पाकिस्तान की परमाणु नीति

पाकिस्तान की परमाणु नीति हमेशा से भारत के साथ शक्ति संतुलन पर केंद्रित रही है। नई सुरंग निर्माण की खबरें ऐसे समय में आई हैं जब दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंध हैं। मेरठ कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय मामलों और डिफेंस स्टडीज के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रिजवान का मानना है कि पाकिस्तान की यह गतिविधि भारत पर दबाव बनाने और बातचीत के लिए मजबूर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है। हालांकि, भारत ने हमेशा से परमाणु ब्लैकमेल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।

प्रोफेसर रिजवान के मुताबिक भारत को अपनी सुरक्षा नीति में सतर्कता बरतते हुए, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि वह इस प्रकार की उकसाने वाली गतिविधियों से बाज आए। इसके अलावा, भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि किसी भी संभावित खतरे का मुकाबला किया जा सके।

Pakistan Nuclear Test: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया

वहीं, पाकिस्तान की इन गतिविधियों पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजर है। यदि पाकिस्तान वास्तव में नए परमाणु परीक्षण की योजना बना रहा है, तो यह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) के उद्देश्यों के खिलाफ होगा। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए ताकि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति सुनिश्चित की जा सके।

Pakistan Nuclear Test: क्या पीओके पर भारत के दावे से चिढ़ा पाकिस्तान?

जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी रणनीति में परमाणु परीक्षण का सहारा लेकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को लेकर भारत की ओर से किए जा रहे मजबूत दावों और हालिया बयानों को देखते हुए, पाकिस्तान परमाणु परीक्षण जैसी उकसाऊ कार्रवाई कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारत को चेतावनी देने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति हो सकती है।

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विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान की ओर से परमाणु परीक्षण जैसी कोशिश क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाल सकती है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस पर गंभीरता से नजर रखनी चाहिए।

विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री ने कही थी ये बात

बता दें कि लंदन के चैथम हाउस थिंक टैंक में जयशंकर ने कहा था कि कश्मीर से जुड़े बहुत से मुद्दों का हल निकाल लिया गया है। अनुच्छेद 370 को हटाना उनमें से एक है। ​एस. जयशंकर ने पीओके को लेकर कहा कि पीओके को खाली करवाने के बाद कश्मीर का मसला हल हो जाएगा।

वहीं उसके बाद भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान हमें पीओके लौटाएगा। मुझे विश्वास है कि पीओके के लोग खुद ही भारत में विलय की मांग करेंगे। भारत की तेज आर्थिक प्रगति और बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा को देखकर पीओके के लोगों को एहसास हो रहा है कि उनका असली विकास भारत का हिस्सा बनने में ही है। पाकिस्तान को इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।”

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Pakistan Nuclear Test: पाकिस्तान में पीओके को लेकर मचा बवाल

पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक और विशेषज्ञ इसे भारत की ओर से ‘पीओके पर हमले की धमकी’ के तौर पर देख रहे हैं। वहीं, कुछ का मानना है कि यह बयान केवल एक राजनीतिक बयानबाजी है, जिसका उद्देश्य आंतरिक राजनीति को साधना हो सकता है। पाकिस्तान मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत की तरफ से पीओके को लेकर आए दिन दिए जा रहे बयानों से पाकिस्तान में चिंता बढ़ गई है। पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने और भारत को रोकने के लिए परमाणु परीक्षण जैसे बड़े कदम भी उठा सकता है।

पाकिस्तानी पत्रकार आरजू काजमी ने जब इस मुद्दे पर पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा से चर्चा की तो उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत की सरकार ने पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि पीओके पर भारत अब निर्णायक कार्रवाई कर सकता है? उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि भारत की आधिकारिक नीति इस तरह की है कि पाकिस्तान से बातचीत में पीओके को छोड़ने की मांग सीधे रखी जाएगी। जयशंकर का बयान गंभीर नहीं लगता। भाजपा ने हमेशा से पीओके को चुनावी मुद्दा बनाकर पेश किया है, लेकिन कभी इसे अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल नहीं किया।”

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चीमा ने आगे कहा, “इस बयान के जरिए भाजपा ने एक बार फिर मजबूत सरकार का संदेश देने की कोशिश की है। भाजपा का उद्देश्य जनता के बीच यह संदेश देना है कि केंद्र सरकार पीओके पर भी निर्णायक कदम उठाने की स्थिति में है।”

क्या भारत वाकई पीओके पर पर हमला करेगा? इस सवाल पर कमर चीमा ने कहा, “कश्मीर का इलाका भौगोलिक रूप से काफी कठिन है। पहाड़, नदियां और दुर्गम इलाके युद्ध को और मुश्किल बनाते हैं। पाकिस्तान भी एक सैन्य शक्ति है, ऐसे में भारत सीधे युद्ध का विकल्प नहीं चुनेगा। हालांकि, भारत ने बार-बार कहा है कि पीओके भारत का अभिन्न हिस्सा है।”

चीमा ने आगे कहा, “पाकिस्तान ने भी कई बार पीओके को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन इन दावों का परिणाम कभी सामने नहीं आया। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि भारत इस दिशा में कोई बड़ा सैन्य कदम उठाएगा। जयशंकर का बयान एक राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।”

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क्या है चागाई परीक्षण स्थल?

चागाई-1 पाकिस्तान का पहला सार्वजनिक परमाणु परीक्षण था, जो 28 मई 1998 को चागाई परीक्षण स्थल पर किया गया था। पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग ने उस दिन पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए थे। इन परीक्षणों के बाद पाकिस्तान ने खुद को एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, जिससे दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

वहीं, चागाई क्षेत्र में नई सुरंग निर्माण की खबरें पाकिस्तान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं की ओर इशारा कर रही हैं। यह गतिविधियां न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय हैं। ऐसे में, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सतर्क रहकर इन गतिविधियों पर निगरानी रखनी होगी और संबंधित पक्षों के साथ मिलकर स्थायी समाधान की दिशा में प्रयास करने होंगे।

Nepal Politics: नेपाल में क्यों लगे योगी आदित्यनाथ के पोस्टर? क्या खुल रहा है राजशाही की वापसी का रास्ता? नेपाली सेना प्रमुख के बयान से बढ़ी बैचेनी

Nepal Politics: Yogi Adityanath Posters Spark Raj Monarchy Debate, Army Chief's Statement Raises Tensions

Nepal Politics: हाल ही में नेपाल में एक ऐसी घटना घटी है, जिसने नेपाल के साथ-साथ भारत की सियासत में भी हलचल मचा दी है। रविवार को नेपाल की राजधानी काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत में रैली आयोजित हुई। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि इस रैली में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर लगाए गए और ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के नारे भी लगे। यह पोस्टर राष्ट्रवादी पार्टी ‘राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी’ (RPP) और अन्य हिंदू समर्थक संगठनों द्वारा पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत के लिए लगाए गए थे।

Nepal Politics: Yogi Adityanath Posters Spark Raj Monarchy Debate, Army Chief's Statement Raises Tensions

नेपाल के कई हिस्सों में राजशाही की वापसी और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग को लेकर रैलियां निकाली जा रही हैं। खास बात यह रही कि इन रैलियों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर भी नजर आए। काठमांडू में त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आयोजित एक बाइक रैली के दौरान योगी आदित्यनाथ के पोस्टर और बैनर देखे गए। यह रैली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) ने आयोजित की थी, जिसमें पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह का भव्य स्वागत किया गया। पोस्टर्स में योगी आदित्यनाथ को “हिंदू हृदय सम्राट” बताया गया था। यह उपाधि हिंदुत्व विचारधारा से जुड़े नेताओं को दी जाती है।

Nepal Politics: योगी आदित्यनाथ का नेपाल कनेक्शन

‘हिंदू हृदय सम्राट’ के नारों से सजी इन रैलियों में योगी आदित्यनाथ का जिक्र भी हुआ। योगी का नेपाल के साथ ऐतिहासिक रिश्ता है। दरअसल, योगी आदित्यनाथ का नेपाल के शाही परिवार से ऐतिहासिक संबंध रहा है। योगी आदित्यनाथ जिस गोरखनाथ मठ के महंत हैं, उसका नेपाल के शाही परिवार से एक धार्मिक रिश्ता रहा है। नेपाल में गोरखनाथ मठ का खास महत्व है और इसे नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा माना जाता है। नेपाल में शाह वंश का शासन 16वीं सदी से लेकर 2008 तक था, जब राजतंत्र को समाप्त कर गणतंत्र की स्थापना की गई थी।

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Nepal Politics: नेपाल में राजशाही की वापसी की बढ़ती मांग

नेपाल में इन दिनों राजशाही की वापसी को लेकर कई रैलियां हो रही हैं। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) ने हाल ही में काठमांडू में एक बाइक रैली का आयोजन किया, जिसमें भारी भीड़ ने हिस्सा लिया। रैली में ‘नारायणहिती खाली गर, हाम्रो राजा आउंदै छन्’ जैसे नारे लगे, जिसका अर्थ है – “नारायणहिटी खाली करो, हमारे राजा आ रहे हैं।”

नारायणहिती वही राजमहल है, जिसमें नेपाल के राजा निवास करते थे, लेकिन 2008 में गणतंत्र लागू होने के बाद इसे संग्रहालय में बदल दिया गया था। अब जब राजशाही की मांग फिर उठ रही है, तो नारायणहिती राजमहल एक बार फिर से चर्चा में आ गया है।

पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के समर्थकों का मानना है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी है और देश को बचाने के लिए राजशाही की वापसी जरूरी है। हालांकि, ज्ञानेंद्र ने अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई राजनीतिक बयान नहीं दिया है, लेकिन उनकी उपस्थिति और स्वागत ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है।

Nepal Politics: Yogi Adityanath Posters Spark Raj Monarchy Debate, Army Chief's Statement Raises Tensions
Nepal Army Chief

नेपाली सेना प्रमुख के बयान से बढ़ी बैचेनी

नेपाल के सेना प्रमुख ने हाल ही में एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि “नेपाल सेना, जनता की सेना है और अंततः जनता की इच्छाओं का पालन करेगी।” यह बयान नेपाल के मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेपाल में लोगों का एक बड़ा वर्ग मौजूदा सरकार से नाराज है और बदलाव की मांग कर रहा है। राजशाही समर्थक इस नाराजगी को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।

नेपाल में हाल ही में हुए कार्यक्रमों में भीड़ की उपस्थिति ने यह संकेत दिया है कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के प्रति सहानुभूति बढ़ रही है। नेपाल के ग्रामीण इलाकों और कुछ शहरों में भी लोगों ने राजशाही के समर्थन में रैलियां निकाली हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि एक बड़ा वर्ग मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट है।

Nepal Politics: क्यों हो रही राजशाही की वापसी की मांग?

नेपाल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए, भ्रष्टाचार, महंगाई और सत्ताधारी दलों के प्रति जनता का गुस्सा चरम पर है। लोग मौजूदा व्यवस्था से थक चुके हैं और राजतंत्र की वापसी को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के स्वागत में 4 लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतरे, जिसमें ‘राजा आओ, देश बचाओ’ जैसे नारे लगे।

राजशाही की वापसी की मांग करने वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के वरिष्ठ नेता रविंद्र मिश्रा ने कहा, “नेपाल में वर्तमान व्यवस्था से लोगों का मोहभंग हो गया है। जनता अब एक स्थिर और निष्पक्ष शासन चाहती है।” उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल में भारत विरोधी भावना भी बढ़ी है, जिसका समाधान केवल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों को मजबूत करके ही किया जा सकता है।

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क्या हैं राजशाही की संभावनाएं?

हालांकि नेपाल में राजशाही की वापसी के आसार फिलहाल कम ही नजर आते हैं। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर का मानना है कि मौजूदा असंतोष के बावजूद नेपाल में राजशाही की वापसी संभव नहीं है। उनका कहना है कि जनता मौजूदा व्यवस्था से नाराज जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे फिर से राजशाही की स्थापना चाहते हैं।

नेपाल के एक अन्य पत्रकार उमेश चौहान का भी यही मानना है कि राजशाही की वापसी का समर्थन करने वाले लोग सीमित संख्या में हैं। उन्होंने कहा कि लोग मौजूदा सरकार से जरूर नाराज हैं, लेकिन यह नाराजगी इतनी मजबूत नहीं है कि राजशाही की वापसी का आधार बन सके।

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भारत-नेपाल संबंधों पर क्या पड़ेगा असर

नेपाल में हो रहे इन सियासी बदलावों का असर भारत-नेपाल संबंधों पर भी पड़ सकता है। नेपाल हमेशा से भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत के उत्तर प्रदेश में गोरखनाथ मठ का नेपाल के राजघराने से ऐतिहासिक संबंध रहा है। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के पोस्टरों का नेपाल में दिखना, भारत-नेपाल संबंधों की दिशा में एक नया संकेत दे सकता है।

नेपाल में भारत विरोधी भावना को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। आरपीपी के नेताओं का मानना है कि मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में राजशाही समर्थक दल नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्षधर हैं, ताकि भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत किया जा सके।

मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) जीडी बक्शी कहते हैं, “नेपाल के पूर्व राजा ने हाल ही में देश का दौरा किया था और काठमांडू लौटने पर उनका स्वागत 4 लाख से अधिक नेपाली नागरिकों ने भव्य तरीके से किया। बीते महीने नेपाल के कई शहरों और कस्बों में राजा के समर्थन में दर्जनों मोटरसाइकिल रैलियां आयोजित की गईं। 2007 में, जब मैंने नेपाल में एनडीसी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था, तब से मैं कहता आ रहा हूं कि भारत ने नेपाल में माओवादियों को सत्ता में लाकर और दुनिया के एकमात्र हिंदू साम्राज्य को समाप्त करके एक गंभीर रणनीतिक भूल की है।”

वह आगे कहते हैं, आज नेपाल के लोग माओवादियों की भ्रष्ट और विफल नीतियों से तंग आ चुके हैं। वे किसी भी रूप में राजा की वापसी की कामना कर रहे हैं—चाहे वह संवैधानिक सम्राट के रूप में हो, सांस्कृतिक प्रमुख के रूप में या फिर किसी राजनीतिक दल के संरक्षक के रूप में। राजा नेपाली जनता के लिए भगवान विष्णु के प्रतीक हैं और नेपाल में फिर से एक हिंदू राज्य की स्थापना का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

वहीं रैली में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर दिखने पर मेजर जनरल बख्शी का कहना है, “नेपाल में हो रही रैलियों में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर दिखाई देना इस बात का संकेत है कि नेपाल की जनता हिंदू पहचान को फिर से मजबूत करने की इच्छा रखती है। जनता की इच्छा सर्वोपरि है, क्योंकि लोगों की आवाज ही भगवान की आवाज होती है।”

पहले हिंदू राष्ट्र था नेपाल

नेपाल का राजतंत्र समाप्त होने से पहले दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था। 2008 में गणतंत्र बनने के बाद इसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया गया। लेकिन अब एक वर्ग फिर से नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहा है। भारत में भी इस विचारधारा को समर्थन मिला है। 2006 में बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कि “नेपाल की मौलिक पहचान हिंदू राष्ट्र की है और इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए।” यही वजह है कि नेपाल में योगी आदित्यनाथ के पोस्टर लगने को सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों ही नजरिए से देखा जा रहा है।

क्या नेपाल फिर से हिंदू राष्ट्र बनेगा?

नेपाल में मौजूदा असंतोष का मुख्य कारण भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सुस्त आर्थिक विकास है। जनता को लगता है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इसका समाधान राजशाही में नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में है।

नेपाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए, राजतंत्र की वापसी और हिंदू राष्ट्र की स्थापना आसान नहीं है। हालांकि, जनता का बढ़ता असंतोष, राजनीतिक अस्थिरता और धार्मिक भावना इस विचार को समर्थन दे रही है। लेकिन क्या यह आंदोलन राजनीतिक सफलता में बदल पाएगा, यह देखना बाकी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है और इसका असर भारत-नेपाल संबंधों पर भी पड़ सकता है। साथ ही, चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि नेपाल की मौजूदा सरकार चीन के साथ मजबूत संबंध रखती है।