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Indian Space Strategy: भविष्य की जंग के लिए तैयार हो रहीं भारतीय सेनाएं, अंतरिक्ष से रखी जाएगी दुश्मनों पर नजर

Indian Space Strategy: Preparing for Future Wars, Keeping an Eye on Enemies
CDS Anil Chauhan

Indian Space Strategy: भारतीय सेनाएं अब भविष्य के युद्धों और चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी अंतरिक्ष आधारित क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। इस उद्देश्य के तहत भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना अंतरिक्ष में अपने संसाधनों और बुनियादी ढांचे का विस्तार करने की योजना बना रही हैं।

Indian Space Strategy: Preparing for Future Wars, Keeping an Eye on Enemies
CDS Anil Chauhan

इस महीने की शुरुआत में, रक्षा मंत्रालय में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (DMA) ने एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया था। इस बैठक में तीनों सेनाओं के प्रमुख, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख अधिकारी भी मौजूद थे।

Indian Space Strategy: अंतरिक्ष आधारित संसाधनों का विस्तार

इस प्रेजेंटेशन में बताया गया कि भारतीय सेना अब अपने अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों और ग्राउंड इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इसके तहत उपग्रहों की संख्या बढ़ाने और उनके संचालन के लिए ज़रूरी ग्राउंड इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने की योजना बनाई जा रही है। इसके तहत, डीएमए और डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA) पर नए ज़िम्मेदारियों को संभालने की योजना बनाई गई है।

हाल ही में, केंद्रीय कैबिनेट ने एक बड़े अंतरिक्ष सर्विलांस परियोजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत 52 उपग्रह लॉन्च किए जाएंगे। ये उपग्रह निगरानी, संचार, और अन्य सामरिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होंगे। इस परियोजना में सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों की भागीदारी होगी।

डिफेंस स्पेस एजेंसी का होगा विस्तार

डीएमए के नेतृत्व में काम करने वाली रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) को और अधिक मज़बूत बनाने की योजना है। इस एजेंसी की जिम्मेदारी न केवल अंतरिक्ष में नए संसाधन तैनात करने की है, बल्कि उन्हें हर प्रकार के खतरों से सुरक्षित रखना भी है।

इस परियोजना के अंतर्गत भारत की निगरानी क्षमताओं को विशेष रूप से चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और पाकिस्तान की सीमाओं पर मजबूत किया जाएगा। इसके लिए एजेंसी के कर्मचारियों की संख्या और कामकाज का दायरा बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

Indian Space Strategy: सैटेलाइट निगरानी से मजबूत होगा सुरक्षा कवच

भारत के पास पहले से ही कई उपग्रह हैं, जो निगरानी और संचार जैसे कार्यों में लगे हुए हैं। अब, नई योजना के तहत सैटेलाइट निगरानी को और बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे भारतीय सुरक्षा बलों को दुश्मनों की हर गतिविधि पर नजर रखने में मदद मिलेगी।

उपग्रहों की नई श्रृंखला के जरिए भारत न केवल अपनी सीमाओं पर निगरानी करेगा, बल्कि समुद्री क्षेत्रों, साइबर हमलों, और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में भी अपनी ताकत बढ़ाएगा।

CDS का अंतरिक्ष की अहमियत पर जोर

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने हाल ही में एक बयान में कहा कि अंतरिक्ष अब “भीड़भाड़ वाला, विवादित, प्रतिस्पर्धात्मक और वाणिज्यिक” क्षेत्र बन चुका है। उन्होंने सेना के नेतृत्व को इस क्षेत्र में राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करने के लिए नवाचार और अत्याधुनिक तकनीकों को विकसित करने पर जोर दिया।

सीडीएस ने यह भी कहा कि अंतरिक्ष युद्ध के लिए तैयार रहना अब समय की मांग है। उन्होंने सभी संबंधित विभागों और संगठनों से सहयोग करने और अत्याधुनिक प्रणालियों को विकसित करने का आह्वान किया।

52 उपग्रह लिखेंगे भारत की अंतरिक्ष में ताकत का नया अध्याय

कैबिनेट द्वारा स्वीकृत नई अंतरिक्ष निगरानी परियोजना के तहत 52 उपग्रह लॉन्च किए जाएंगे। ये उपग्रह निगरानी, संचार, और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्रों में भारत को और मजबूत बनाएंगे। यह परियोजना रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) की दिशा में एक बड़ा कदम है।

इन उपग्रहों के जरिए भारत चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की सीमाओं पर बेहतर नजर रख सकेगा। इसके अलावा, ये उपग्रह भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी एक नई पहचान देंगे, जहां अंतरिक्ष आधारित तकनीक और संसाधन भविष्य की कूटनीति और सुरक्षा का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं।

सरकारी और निजी क्षेत्र का सहयोग

इस परियोजना में निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। ISRO और DRDO के साथ मिलकर निजी क्षेत्र कटिंग एज टेक्नोलॉजी को डेवलप करने में मदद करेगा। इससे न केवल भारत की अंतरिक्ष क्षमता में वृद्धि होगी, बल्कि घरेलू उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्ध अंतरिक्ष आधारित तकनीकों पर निर्भर करेंगे। इसमें साइबर हमलों, उपग्रहों की निगरानी, और अंतरिक्ष से हमलों को शामिल किया जा सकता है। भारत, इन संभावित खतरों को ध्यान में रखते हुए, अपनी क्षमताओं को लगातार बढ़ा रहा है।

भारतीय सेना के इस कदम से यह साफ है कि भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में केवल एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक अग्रणी शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। यह पहल न केवल भारत को मजबूत बनाएगी, बल्कि इसे एक वैश्विक स्तर पर नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करेगी।

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China in Doklam: Will Indian Troops IMTRAT Retreat Like Maldives Amid PLA Build-up?
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China in Doklam: चीन और भारत के बीच सीमा विवादों का इतिहास लंबा और जटिल है। हाल ही में, चीन ने भूटान की सीमा में नई बस्तियां बसाकर एक बार फिर से क्षेत्रीय विवाद को तूल दे दिया है। खास बात यह है कि यह विवाद उस समय सामने आया है जब बीजिंग में आज स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की वार्ता होनी है। इस वार्ता में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजील डोवाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच मुलाकात होनी है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य भारत-चीन सीमा पर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) को लेकर चल रही तनावपूर्ण स्थिति को सुलझाना है। इस वार्ता की सहमति प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कज़ान बैठक के दौरान हुई थी। यह वार्ता 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद पहली बार हो रही है, और पिछले पांच वर्षों में पहली ऐसी बैठक होगी।

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China in Doklam: इस साल अक्तूबर में हुआ था खुलासा

हालांकि गांव बसाने को लेकर जो खुलासा हाल ही में हुआ है, वह नया नहीं है। इससे पहले इसी साल अक्टूबर 2024 में तिब्बती विश्लेषकों के नेटवर्क टरकोइस रूफ (Turquoise Roof) की तरफ से एक रिपोर्ट जारी हुई थी, जिसमें बताया गया था कि चीन ने भूटान की सीमा में 22 गांव बसा लिए हैं। चीन के इन 22 गांवों में से 19 पूर्ण रूप से रिहायशी गांव हैं, जबकि तीन कम बसावट वाले क्षेत्र हैं। इन्हें बाद में छोटे शहरों में बदला जाएगा। वहीं इन 22 गांवों में से सात में निर्माण कार्य शुरू होने का खुलासा 2023 की शुरुआत में हो गया था।

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इन गावों में 752 रिहायशी ब्लॉक बनाए गए हैं, जिनमें 2284 परिवारों को बसाने की योजना है। इसके अलावा, अधिकारियों, निर्माण कर्मियों, सीमा पुलिस और सैन्यकर्मियों समेत 7000 लोगों को इन गांवों में बसाया जा रहा है। इन गांवों को बनाने के लिए चीन ने भूटान का करीब 825 वर्ग किमी इलाका कब्जा किया है। वहीं, ये गांव काफी ढलान वाली इलाके और ऊंची घाटी वाले क्षेत्रों में बनाए गए हैं, जिसकी समुद्र से ऊंचाई 3832 मीटर तक है। चीन का बसाया सबसे ऊंचा गांव मेनचुमा समुद्री से करीब 4670 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

China in Doklam: डोकलाम का महत्व

सैटेलाइट डेटा के मुताबिक, इनमें से आठ गांव डोकलाम पठार के करीब 2020 के बाद से बनाए गए हैं। इन बस्तियों की रणनीतिक स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि ये भारत के “सिलीगुड़ी कॉरिडोर” के पास स्थित हैं। टरकोइस रूफ की रिपोर्ट के अनुसार, चीन भूटान पर दबाव डाल रहा है कि वह पूर्वोत्तर क्षेत्रों को अपने पास रखे और डोकलाम पठार चीन को सौंप दे। 1990 के दशक में चीन ने भूटान को ऐसा प्रस्ताव दिया था, लेकिन भूटान ने इसे खारिज कर दिया था। वहीं, चीन की इन गतिविधियों का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निगरानी और भूटान को चीन के प्रभाव से बचाने के लिए भारत को ठोस रणनीति अपनानी होगी। 2017 में भारत और चीन के बीच हुए डोकलाम गतिरोध के बाद से चीन ने अपनी निर्माण गतिविधियों को और तेज कर दिया है।

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पूर्व भारतीय राजदूत अशोक कंठा ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, “चीन की यह कार्रवाई 1998 में भूटान और चीन के बीच हुए शांति समझौते का उल्लंघन है। यह समझौता सीमा विवाद सुलझने तक यथास्थिति बनाए रखने की बात करता है।”

डोकलाम वही क्षेत्र है, जहां 2017 में भारत और चीन के बीच 73 दिनों का सैन्य गतिरोध हुआ था। भारत ने उस समय चीन को सड़क निर्माण से रोक दिया था, क्योंकि यह क्षेत्र भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है।

रिसर्चर रॉबर्ट बार्नेट ने कहा, “चीन ने डोकलाम और आसपास के क्षेत्रों में रणनीतिक दबाव बनाकर भूटान को भारत से दूर करने की कोशिश की है। भूटान, जो भारत की सुरक्षा चिंताओं को समझता है, अब इस विवाद को त्रिपक्षीय समाधान की दिशा में ले जाने की बात कर रहा है।”

भारत-भूटान संबंधों की परीक्षा

भूटान में भारत की सैन्य उपस्थिति, भारतीय सैन्य प्रशिक्षण दल (IMTRAT), 1963 से है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इन संबंधों को एक नई चुनौती दी है। रक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी ने कहा, “यदि भारत अपनी जमीन पर चीन के सैनिकों को हटाने में विफल रहा है, तो भूटान भारत से मदद की उम्मीद क्यों करेगा?” उनका कहा है कि चीन ने भूटान के 800 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। भारतीय सैन्य प्रशिक्षण दल (IMTRAT) यानी Indian Military Training Team भूटान की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए जिम्मेदार है, लेकिन अगर भारत अपनी ही जमीन से PLA को हटाने में असफल रहा है, तो भूटान भारत से मदद की उम्मीद क्यों करेगा? भूटान जल्द ही चीन के साथ अपना सीमा विवाद सुलझा लेगा, और हम IMTRAT को भूटान से वापस आते देखेंगे। यह 1963 से वहां तैनात है, लेकिन अब यह इतिहास बन सकता है।”

सीमा पर हालात और भारतीय प्रतिक्रिया

भारत और चीन के बीच अप्रैल 2020 से लद्दाख में सैन्य गतिरोध चल रहा है। हाल ही में, 21 अक्टूबर को दोनों देशों ने डेमचोक और डेपसांग जैसे विवादित क्षेत्रों से सेना हटाने पर सहमति जताई। इसके दो दिन बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मुलाकात की और सीमा विवाद पर चर्चा की।

हालांकि, रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने कहा, “24 अक्टूबर को मोदी-शी के बीच हुई बातचीत के बावजूद भारत-तिब्बत सीमा पर हालात सामान्य नहीं हैं। अभी भी 1,20,000 चीनी सैनिक लद्दाख से अरुणाचल तक तैनात हैं। इस सैन्य गतिरोध को समाप्त करने के लिए आज विशेष प्रतिनिधियों की बैठक हुई।

पूर्वी लद्दाख में भारतीय क्षेत्र पर बनाए गए बफर ज़ोन और नो-पैट्रोलिंग क्षेत्रों ने स्थिति को सामान्य करने की चुनौती को और जटिल बना दिया है। जब तक इन अस्थायी उपायों को समाप्त नहीं किया जाता और चीनी सैनिक कब्जाए गए क्षेत्रों से पीछे नहीं हटते, भारतीय सीमा बल अपने पारंपरिक गश्त क्षेत्रों में वापस नहीं जा पाएंगे।

चीन की बस्तियों का रणनीतिक मकसद

चीन की ओर से बनाई गई बस्तियां केवल स्थानीय लोगों के पुनर्वास के लिए नहीं हैं। ये बस्तियां सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और चीन की “तथ्य बदलने की नीति” का हिस्सा हैं।

अशोक कंठा ने कहा, “यह वही तरीका है, जैसा चीन ने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाकर अपनाया था। चीन धीरे-धीरे भौगोलिक तथ्यों को बदलकर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।”

भारत के लिए भविष्य की चुनौती

रिपोर्ट्स में कहा गया है कि भूटान अब चीन को थिंपू में दूतावास खोलने की अनुमति दे सकता है। यह कदम भूटान और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देगा।

रॉबर्ट बार्नेट ने कहा, “भविष्य में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और चीन में से कौन भूटान को अधिक लाभ पहुंचाकर अपने पक्ष में कर सकता है।”

चीन का बयान

चीन के भारत में राजदूत जू फेइहोंग ने कहा, “चीन भारत के साथ मतभेदों को ईमानदारी और सद्भावना के साथ सुलझाने और द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर और स्वस्थ दिशा में ले जाने के लिए काम करने को तैयार है।”

इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि चीन अपनी क्षेत्रीय शक्ति को बढ़ाने और अपने पड़ोसियों पर दबाव डालने की नीति जारी रखे हुए है। भारत के लिए यह समय है कि वह न केवल भूटान के साथ अपने संबंधों को मजबूत करे, बल्कि अपनी सीमा सुरक्षा और सामरिक योजनाओं को भी और सुदृढ़ बनाए।

SIPRI की रिपोर्ट में खुलासा, 2023 में दुनियाभर में बिके 52 लाख करोड़ रुपये के हथियार, 4.2 फीसदी की हुई बढ़ोतरी

SIPRI Report: Global Arms Sales Reach Rs 52 Lakh Crore in 2023, Rise by 4.2%

SIPRI: स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में वैश्विक हथियार बिक्री 52 लाख करोड़ रुपये (632 बिलियन डॉलर) तक पहुंच गई। यह आंकड़ा 2022 की तुलना में 4.2 फीसदी की वृद्धि को दर्शाता है। इस बढ़ोतरी का कारण दुनिया भर में बढ़ते युद्ध, क्षेत्रीय संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव हैं।

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SIPRI: वैश्विक संघर्ष और हथियारों की मांग

रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका में हथियार उत्पादन में भारी वृद्धि की है। इन क्षेत्रों की कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ा रही हैं ताकि रक्षा जरूरतों को पूरा किया जा सके।

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इसी तरह, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी तनाव बढ़ रहा है। शक्ति संतुलन और समुद्री विवादों के कारण एशियाई देशों ने अपने रक्षा आधुनिकीकरण को तेज कर दिया है। वहीं, मध्य पूर्व में अस्थिरता के चलते सैन्य खर्च लगातार बढ़ रहा है।

2022 और 2023 के बीच आंकड़ों में बड़ा बदलाव

SIPRI की रिपोर्ट में बताया गया कि 2023 में 73 कंपनियों ने अपनी आय में वृद्धि दर्ज की, जबकि 26 कंपनियों ने गिरावट की सूचना दी। इसके विपरीत, 2022 में 47 कंपनियों की आय बढ़ी थी और 53 कंपनियों की आय में गिरावट आई थी।

यह बदलाव दिखाता है कि वैश्विक रक्षा उद्योग ने सुरक्षा चिंताओं, बढ़ते रक्षा बजट और हथियारों की आपूर्ति की आपात जरूरत का लाभ उठाया है।

भारतीय रक्षा क्षेत्र: एक उभरती वैश्विक शक्ति

भारतीय रक्षा कंपनियों ने वैश्विक टॉप 100 में अपनी स्थिति मजबूत की है। यह भारत की आत्मनिर्भरता और रक्षा निर्यात के प्रति बढ़ती रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाता है।

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) जैसी कंपनियां सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अपनी रक्षा उत्पादन क्षमताओं को बढ़ा रही हैं।

रक्षा निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि

2023-24 में भारत का रक्षा निर्यात ₹21,083 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले वित्तीय वर्ष के ₹15,920 करोड़ से 32.5% अधिक है। सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग, स्वदेशी नवाचार, और भारतीय निर्मित उत्पादों जैसे लड़ाकू विमानों, ड्रोन और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स की वैश्विक मांग ने इस वृद्धि को संभव बनाया है।

स्वदेशी रक्षा उत्पादों का बढ़ता दबदबा

भारतीय निर्मित तेजस फाइटर जेट्स, ड्रोन्स, और अन्य रक्षा प्रणालियां अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं। ये उत्पाद न केवल आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि भारत को वैश्विक हथियार बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना रहे हैं।

जहां एक ओर हथियारों का उत्पादन और बिक्री आर्थिक दृष्टि से लाभकारी है, वहीं यह बढ़ते सैन्यीकरण और संघर्षों की चिंता को भी उजागर करता है। बढ़ते सैन्य खर्च देशों की सुरक्षा को मजबूत कर रहे हैं, लेकिन यह भू-राजनीतिक तनाव को और बढ़ाने का जोखिम भी पैदा कर रहे हैं।

दुनिया के लिए जटिल सुरक्षा स्थिति

वैश्विक हथियार बिक्री में 4.2% की वृद्धि यह दिखाती है कि दुनिया एक जटिल सुरक्षा माहौल का सामना कर रही है। भारत के लिए यह समय रक्षा क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने और वैश्विक बाजार में पहचान बनाने का महत्वपूर्ण अवसर है।

भारतीय रक्षा कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने उत्पादों के लिए मजबूत स्थान बना रही हैं। सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान और बढ़ते रक्षा बजट के साथ, भारत वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका को और प्रभावशाली बना सकता है।

INS Nirdeshak Survey Vessel:भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल हुआ INS निर्देशक, भारत की जल सीमाओं की सुरक्षा को मिलेगी मजबूती

INS Nirdeshak Survey Vessel Joins Indian Navy, Boosting Maritime Security and Strength

INS Nirdeshak: विशाखापत्तनम के नेवल डॉकयार्ड में बुधवार को भारतीय नौसेना के सर्वेक्षण पोत INS निर्देशक (INS Nirdeshak) को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। इस ऐतिहासिक मौके पर रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समारोह की मेजबानी पूर्वी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल राजेश पेंढरकर ने की। इस कार्यक्रम में नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) के प्रतिनिधि और अन्य विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति भी शामिल हुए।

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INS Nirdeshak: आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक

INS निर्देशक भारतीय नौसेना के सर्वेक्षण पोत (बड़े) परियोजना का दूसरा जहाज है, जिसे कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने बनाया है। इस पोत में 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है, जो रक्षा निर्माण में भारत की आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) के संकल्प को दर्शाता है।

INS निर्देशक का निर्माण भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिज़ाइन ब्यूरो की विशेषज्ञता और MSMEs, SAIL, और अन्य निजी उद्योग साझेदारों के सहयोग से किया गया है। यह पोत भारतीय नौसेना के डिज़ाइन और निर्माण कौशल का प्रमाण है।

INS निर्देशक भारतीय नौसेना के उस ऐतिहासिक पोत का पुनर्जन्म है, जिसने 32 वर्षों तक देश की सेवा की और 2014 में सेवामुक्त हो गया। नए निर्देशक को उस गौरवशाली परंपरा का सम्मान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह पोत अत्याधुनिक सुविधाओं और तकनीकी क्षमताओं से लैस है।

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बेहतर संचालन क्षमता और समुद्री ताकत

INS निर्देशक 25 दिनों तक समुद्र में लगातार काम कर सकता है। इसकी अधिकतम गति 18 नॉट्स से अधिक है। यह पोत आधुनिक हाइड्रोग्राफिक उपकरणों से सुसज्जित है, जो इसे समुद्र की गहराई और सतह की विस्तृत जानकारी इकट्ठा करने में सक्षम बनाता है।

यह पोत भारत की समुद्री ताकत को नई ऊंचाई प्रदान करेगा। इसकी उन्नत क्षमताएं न केवल सैन्य उद्देश्यों के लिए उपयोगी होंगी, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और वैज्ञानिक अन्वेषण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

सागर विज़न और भारतीय नौसेना का विस्तार

INS निर्देशक का जलावतरण भारतीय नौसेना के हाइड्रोग्राफिक बेड़े के आधुनिकीकरण की दिशा में एक अहम कदम है। यह भारत की “सागर” (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) दृष्टि को भी मजबूती देता है। इस दृष्टि के तहत भारत क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री विकास को प्राथमिकता देता है।

INS निर्देशक के शामिल होने से न केवल नौसेना की परिचालन क्षमता बढ़ेगी, बल्कि यह क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा में भी भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को मजबूत करेगा।

उन्नत तकनीक और स्वदेशी योगदान

INS निर्देशक में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो इसे समुद्री अनुसंधान और संचालन के लिए बेहतरीन बनाती है। पोत में हाई-टेक उपकरण लगे हैं, जो इसे समुद्र की सतह और गहराई का सटीक मानचित्र तैयार करने में सक्षम बनाते हैं।

इस पोत का निर्माण रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत के प्रयासों को भी दर्शाता है। GRSE और अन्य भारतीय उद्योगों ने मिलकर इसे तैयार किया है, जो भारत की स्वदेशी निर्माण क्षमता का प्रतीक है।

INS निर्देशक भारतीय नौसेना की उन योजनाओं का हिस्सा है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई हैं। यह पोत समुद्री सीमाओं की निगरानी, संसाधनों की खोज और सुरक्षा को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

LCA Tejas: भारत के स्वदेशी फाइटर जेट तेजस के प्रोडक्शन में तेजी लाने पर जोर, संसदीय समिति ने रक्षा मंत्रालय को दिए निर्देश

HAL Tejas Mk1A Engine Delivery: HAL receives fourth GE-F404-IN20 engine, moves closer to IAF handover
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LCA Tejas: भारतीय वायुसेना (IAF) की ताकत बढ़ाने और स्क्वाड्रन की कमी को पूरा करने के लिए, संसद की रक्षा पर स्थायी समिति ने रक्षा मंत्रालय (MoD) को निर्देश दिया है कि वह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को तेजस लड़ाकू विमानों के उत्पादन में तेजी लाने के लिए कहे। यह बात समिति के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद राधा मोहन सिंह की अध्यक्षता में संसद में पेश की गई रिपोर्ट में कही गई।

LCA Tejas: Parliamentary Panel Urges Faster Production to Boost IAF Strength
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LCA Tejas: वायुसेना की घटती ताकत पर चिंता

रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान और चीन के साथ संभावित दो-फ्रंट युद्ध की तैयारी के लिए 42 फाइटर स्क्वाड्रन की जरूरत है। हालांकि, वर्तमान में वायुसेना के पास केवल 31 सक्रिय स्क्वाड्रन हैं, जिनमें प्रत्येक में 16-18 लड़ाकू विमान होते हैं।

MiG-21: 1971 की जंग में अहम भूमिका निभाने वाले “उड़ते ताबूत” को मिली लाइफलाइन! वायुसेना अब क्यों नहीं करना चाहती रिटायर

समिति ने तेजस विमानों की देरी से डिलीवरी को लेकर भी चिंता जताई। HAL को 83 तेजस मार्क-1ए विमानों का ऑर्डर दिया गया था, जिसकी कुल लागत 48,000 करोड़ रुपये है। मार्च 2024 से इनकी डिलीवरी शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक एक भी विमान वायुसेना को नहीं सौंपा गया है।

HAL को LCA Tejas की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के निर्देश

HAL को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने का निर्देश दिया गया है। रक्षा मंत्रालय, जो HAL का प्रमुख हिस्सेदार है, ने समिति को आश्वस्त किया है कि इस मामले में जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।

रक्षा मंत्रालय ने यह भी बताया कि वायुसेना ने 97 अतिरिक्त तेजस मार्क-1ए विमानों को खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। रक्षा अधिग्रहण परिषद ने इन विमानों की खरीद को प्रारंभिक मंजूरी दे दी है और इसके लिए औपचारिक प्रस्ताव मांगे गए हैं।

पुराने विमानों के रिटायर होने से बढ़ी चुनौतियां

भारतीय वायुसेना के लिए एक और चुनौती पुराने विमानों का रिटायर होना है। अगले साल तक सोवियत-युग के दो मिग-21 स्क्वाड्रन को चरणबद्ध तरीके से रिटायर कर दिया जाएगा। इसके अलावा, 1980 के दशक में शामिल जगुआर, मिग-29 और मिराज 2000 के लगभग 250 विमानों को 2029-30 के बाद सेवानिवृत्त कर दिया जाएगा।

इन विमानों की रिटायरमेंट के बाद वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता पर असर पड़ सकता है। इसलिए तेजस जैसे स्वदेशी विमानों की तत्काल डिलीवरी और नए विमानों की खरीद वायुसेना की जरूरत बन गई है।

हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण और सुरक्षा उपाय

रक्षा मंत्रालय ने समिति को बताया कि वायुसेना के हवाई ठिकानों के आधुनिकीकरण के लिए “मॉडर्नाइजेशन ऑफ एयरफील्ड्स इंफ्रास्ट्रक्चर” (MAFI) प्रोग्राम के तहत 52 एयरफील्ड्स को अत्याधुनिक तकनीकों से लैस किया गया है।

इसके साथ ही, अग्रिम हवाई अड्डों पर नए और सुरक्षित एयरक्राफ्ट शेल्टर्स (हवाई ठिकानों के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर) बनाने का काम भी तेजी से चल रहा है, ताकि दुश्मन के हमलों से महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

तेजस लड़ाकू विमान भारत के आत्मनिर्भर अभियान का प्रतीक है। यह हल्का, मल्टी-रोल लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ देश की रक्षा उत्पादन क्षमता को भी आगे बढ़ाने में मदद कर रहा है।

हालांकि, HAL द्वारा डिलीवरी में हो रही देरी को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस परियोजना को तेज़ी से लागू करने के लिए न केवल HAL को बल्कि रक्षा मंत्रालय और भारतीय वायुसेना को भी समन्वय के साथ काम करना होगा।

समिति की सिफारिशें

समिति ने कहा कि रक्षा मंत्रालय को HAL के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तेजस विमानों का उत्पादन समयबद्ध तरीके से हो। साथ ही, स्क्वाड्रन की कमी को दूर करने के लिए अन्य वैकल्पिक उपायों पर भी विचार करना चाहिए।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस विमानों की त्वरित डिलीवरी और नई तकनीकों का उपयोग भारतीय वायुसेना को न केवल मजबूत बनाएगा, बल्कि चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ बढ़ते तनाव के बीच भारत की रक्षा तैयारियों को भी बेहतर करेगा।

Bioscope Photography Exhibition: वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बने सेना के ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह, प्रकृति की छिपी सुंदरता को कैमरे में किया कैद!

Bioscope Photography Exhibition: Brigadier Bikram Singh Captures Nature's Hidden Beauty!

Bioscope Photography Exhibition: प्रकृति की अद्भुत सुंदरता को फोटोग्राफी के माध्यम से प्रदर्शित करना न केवल एक कला है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण से जुड़ाव को और गहरा करता है। सेना में रहते हुए ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह ने न सिर्फ अपने फोटोग्राफी के हुनर को निखारा, बल्कि उसे नई पहचान भी दी। उन्होंने अपनी फोटो प्रदर्शनी “Bioscope” के माध्यम से प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया है। इस प्रदर्शनी में उन्होंने वन्यजीवों, लैंडस्केप, एरियल व्यूज और खूबसूरत फूलों की तस्वीरों के जरिए दर्शकों को प्रकृति के अदृश्य और अनदेखे पहलुओं से परिचित कराया।

Bioscope Photography Exhibition: Brigadier Bikram Singh Captures Nature's Hidden Beauty!

क्या खास है Bioscope Photography Exhibition में

“Bioscope” फोटो प्रदर्शनी का उद्देश्य न केवल कला के प्रेमियों को आकर्षित करना है, बल्कि यह उन सभी को जागरूक करना है जो प्रकृति और उसके संरक्षण में दिलचस्पी रखते हैं। प्रदर्शनी में प्रदर्शित तस्वीरें जंगलों के जंगली जानवरों से लेकर आकाश की छटा और फूलों के सौंदर्य तक का विस्तृत चित्रण करती हैं। हर तस्वीर में जीवन के किसी विशेष रूप का संदेश है, जो दर्शकों को एक नई दृष्टि से प्रकृति को देखने के लिए प्रेरित करती है।

ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह की खींची गई इन तस्वीरों में प्रकृति की विविधता और इसकी जटिलताओं का खामोशी से चित्रण किया गया है। चाहे वह जंगल में घूमते जंगली जानवर हों, आकाश में उड़ते पक्षी हों या फिर एक खिलता हुआ फूल, हर तस्वीर अपनी गहरी कहानी बयां करती है।

Bioscope Photography Exhibition: Brigadier Bikram Singh Captures Nature's Hidden Beauty!

प्रदर्शनी का उद्देश्य और संदेश

“Bioscope” प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य प्रकृति के प्रति जागरूकता फैलाना और इसे बचाने की आवश्यकता को समझाना है। प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्र यह दिखाते हैं कि प्रकृति और मनुष्य का संबंध कैसे एक दूसरे से गहरे जुड़ा हुआ है। हर तस्वीर यह संदेश देती है कि अगर हम प्रकृति का सम्मान करेंगे और उसकी रक्षा करेंगे, तो यही प्रकृति हमारे जीवन को और भी सुंदर और समृद्ध बनाएगी।

ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह का मानना है कि हम सभी का कर्तव्य है कि हम प्रकृति और उसके संसाधनों का संरक्षण करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी इस खूबसूरत दुनिया का अनुभव हो सके। उन्होंने अपनी फोटोग्राफी को माध्यम बनाकर इस संदेश को लोगों तक पहुंचाया है।

ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह का फोटोग्राफी सफर

ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो पिछले 32 वर्षों से सेवा दे रहे हैं। उनकी सेवाओं ने न केवल सेना में, बल्कि कई मानवीय मिशनों में भी उन्हें ख्याति दिलाई है। लेकिन सेना की सेवा के साथ-साथ, उनकी एक और खास पहचान वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर के तौर पर बन चुकी है। उन्होंने अपनी फोटोग्राफी में प्राकृतिक जीवन और पारिस्थितिकी को दर्शाते हुए एक नई दिशा दी है।

COVID-19 महामारी के दौरान, जब अधिकांश लोग अपने घरों में बंद थे, ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह ने अपने फोटोग्राफी कौशल को और भी निखारा। इसके बाद, उनकी फोटोग्राफी को और अधिक सजीव रूप में देखा गया और इसके परिणामस्वरूप उन्होंने कई प्रमुख प्रदर्शनी आयोजित की। “Bioscope” भी उसी प्रयास का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने प्रकृति के अद्भुत और अनदेखे पहलुओं को कैमरे के लेंस से कैद किया है।

Bioscope Photography Exhibition: Brigadier Bikram Singh Captures Nature's Hidden Beauty!

उनकी पत्नी सोनिया भी हैं काफी एक्टिव

ब्रिगेडियर बिक्रम सिंह की पत्नी सोनिया भी फोटोग्राफी के क्षेत्र में उनकी साझेदार हैं। दोनों मिलकर “Bison Shot” नामक ब्रांड के तहत फोटोग्राफी करते हैं, जिसमें उनका उद्देश्य वन्यजीवों और प्रकृति के संरक्षण को बढ़ावा देना है। उनका काम न केवल क़ला के प्रति प्रेम का प्रतीक है, बल्कि यह एक संदेश भी देता है कि प्रकृति और मनुष्य का एक मजबूत और स्थिर संबंध होना चाहिए।

“Bioscope” प्रदर्शनी केवल कला प्रेमियों के लिए नहीं है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो प्रकृति और उसके संरक्षण में रुचि रखते हैं। प्रदर्शनी में प्रदर्शित तस्वीरें न केवल सौंदर्य से भरपूर हैं, बल्कि यह संदेश देती हैं कि अगर हम प्रकृति का सही तरीके से सम्मान करेंगे, तो यह हमें हमेशा अपने अद्भुत रूपों से रूबरू कराती रहेगी।

यहां लगी है प्रदर्शनी

अगर आप भी वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी का शौक रखते हैं और प्रकृति के खूबसूरत रंगों को देखना चाहते हैं, तो आप इस प्रदर्शनी को देखने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, आर्ट गैलरी एनेक्सी, लोदी एस्टेट, नई दिल्ली-03 जा सकते हैं। यह प्रदर्शनी 15 से 21 नवंबर तक सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक है। आप bisonshot@gmail.com पर भी संपर्क कर सकते हैं।

Indian Army: महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में एक्सरसाइज के दौरान जवान की मौत, रूटीन आर्टिलरी डिप्लॉयमेंट ऑपरेशन्स के दौरान हुआ हादसा

Havildar (Gunner) Chandra Prakash Patel- Indian Army: Soldier dies during artillery exercise at Mahajan Range

Indian Army: राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज (MFFR) में एक दर्दनाक घटना में 199वीं मीडियम रेजिमेंट के हवलदार (गनर) चंद्र प्रकाश पटेल का निधन हो गया। यह हादसा 15 दिसंबर की रात को उस समय हुआ जब वह ऑर्टिलरी डिप्लॉयमेंट ट्रेनिंग के दौरान अपनी ड्यूटी कर रहे थे।

Havildar (Gunner) Chandra Prakash Patel- Indian Army: Soldier dies during artillery exercise at Mahajan Range

रक्षा अधिकारियों के अनुसार, 31 वर्षीय हवलदार चंद्र प्रकाश पटेल गन बैटरी में डिटैचमेंट कमांडर के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे थे। हादसा रात करीब 9:40 बजे तब हुआ जब पटेल एक आर्टिलरी गन को टोइंग वाहन से जोड़ रहे थे। इसी दौरान वाहन ने रैंप पर संतुलन खो दिया और पीछे की ओर फिसल गया, जिससे पटेल गंभीर रूप से घायल हो गए।

Indian Army: तत्काल इलाज के बावजूद नहीं बच सकी जान

घटना के तुरंत बाद हवलदार पटेल को सेना के एंबुलेंस के जरिए नजदीकी फील्ड अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। सेना ने घटना की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी का आदेश दिया है। चूंकि यह घटना एक ऑपरेशनल अभ्यास के दौरान हुई, इसलिए इसे “बैटल कैजुअल्टी” के रूप में दर्ज किया गया है।

13 साल की सेवा और अटूट समर्पण

हवलदार चंद्र प्रकाश पटेल का सेना में 13 साल का लंबा अनुभव था। अपने समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा के लिए वह अपने साथियों और अधिकारियों के बीच बेहद सम्मानित थे। वह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के नारायणपुर गांव के रहने वाले थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी और 3 साल का बेटा है।

डिटैचमेंट कमांडर के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका

सेना अधिकारियों ने बताया कि हवलदार पटेल की भूमिका अभ्यास के दौरान बेहद महत्वपूर्ण थी। डिटैचमेंट कमांडर के रूप में उनका काम आर्टिलरी गन और अन्य उपकरणों की सही तैनाती सुनिश्चित करना था। ऐसे प्रशिक्षण अभ्यास सेना की युद्ध-तैयारी का अहम हिस्सा होते हैं, जहां सैनिकों की जिम्मेदारी और कुशलता का परीक्षण होता है।

सेना ने जताया शोक

भारतीय सेना ने इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया है। सेना ने हवलदार पटेल के परिवार के प्रति संवेदनाएं प्रकट करते हुए कहा कि उनके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। सेना अधिकारियों ने यह भी बताया कि हवलदार पटेल जैसे समर्पित जवान ही देश की सीमाओं की सुरक्षा का मजबूत आधार हैं।

“हवलदार चंद्र प्रकाश पटेल की अकाल मृत्यु हमारे सैनिकों द्वारा अभ्यास और युद्ध-तैयारी के दौरान झेले जाने वाले कठिन संघर्षों की याद दिलाती है। उनका बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा,” एक वरिष्ठ रक्षा अधिकारी ने कहा।

परिवार को हर संभव मदद का आश्वासन

सेना और उनके यूनिट के अधिकारियों ने हवलदार पटेल के परिवार को हर संभव मदद और सहयोग का आश्वासन दिया है। उनके अंतिम संस्कार के लिए परिवार को सम्मानपूर्वक व्यवस्था की जाएगी और सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी।

सैन्य अभ्यास: युद्ध-तैयारी का एक अहम हिस्सा

राजस्थान का महाजन फील्ड फायरिंग रेंज भारतीय सेना के सबसे महत्वपूर्ण प्रशिक्षण क्षेत्रों में से एक है। यहां समय-समय पर विभिन्न प्रशिक्षण अभ्यास किए जाते हैं, ताकि सैनिकों को वास्तविक युद्ध परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किया जा सके। इन अभ्यासों में तोपों की तैनाती, फायरिंग अभ्यास और युद्ध रणनीति का परीक्षण किया जाता है।

लेकिन ऐसे कठिन अभ्यास जोखिमों से भी भरे होते हैं। चाहे तापमान की मार हो या भारी उपकरणों के साथ काम करना, सैनिक हमेशा चुनौतियों का सामना करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।

गांव और परिवार में शोक की लहर

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर स्थित उनके गांव नारायणपुर में जब इस घटना की खबर पहुंची, तो पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। गांववाले उनके साहस और बलिदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। उनके परिवार और करीबियों ने बताया कि हवलदार पटेल हमेशा से ही सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहते थे और उन्होंने अपने सपने को पूरा किया।

Exercise Himshakti: हाड़ कंपाने वाली ठंड में भारतीय सेना ने चीन सीमा पर दिखाई ताकत, -35 डिग्री तापमान में तोपों की गड़गड़ाहट से गूंजी LAC

Exercise Himshakti: Indian Army artillery firepower echoes at -35°C on LAC

Exercise Himshakti: लद्दाख में तैनात भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स (Fire and Fury Corps) ने चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जबरदस्त फायरपावर का प्रदर्शन कर पूरी दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया है। हाल ही में जारी एक वीडियो में भारतीय सेना के तोपों की गूंज बर्फ से ढके हिमालय की ऊंचाइयों पर सुनाई दी। यह सैन्य अभ्यास 14,500 फीट की ऊंचाई पर हुआ, जहां तापमान माइनस 35 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था।

Exercise Himshakti: Indian Army artillery firepower echoes at -35°C on LAC

इन कठिन परिस्थितियों में भी भारतीय तोपखाने के जवानों ने अपनी उत्कृष्ट निपुणता और अदम्य साहस का प्रदर्शन किया। इस अभ्यास ने भारतीय सेना के दृढ़ संकल्प और जज़्बे को पूरी दुनिया के सामने रख दिया। भारतीय जवानों की यह तैयारी देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए उनकी अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण है।

Exercise Himshakti का समय और संदर्भ

हिमशक्ति युद्धाभ्यास एक महत्वपूर्ण समय पर हुआ है, जब हाल ही में भारत और चीन के बीच डिसएंगेजमेंट समझौता हुआ है, जिसके तहत दोनों देशों ने देपसांग प्लेन्स और डेमचोक के दो प्रमुख विवादित क्षेत्रों से सैनिकों को पीछे हटाने पर सहमति जताई है। लंबे समय तक चले तनाव और विवाद के बाद यह समझौता सीमा पर शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

इस अभ्यास के जरिए भारतीय सेना ने साफ संदेश दिया है कि वह सिर्फ कूटनीति पर निर्भर नहीं है, बल्कि किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।

Exercise Himshakti: Indian Army artillery firepower echoes at -35°C on LAC

बर्फीले इलाकों में भारतीय सेना का हौसला

14,500 फीट की ऊंचाई पर दुर्लभ वायु दबाव और माइनस 35 डिग्री की जानलेवा ठंड के बीच तोपों की गड़गड़ाहट एक अनोखा नज़ारा था। भारतीय सेना के ‘टॉप गन गनर्स’ ने यह साबित किया कि चाहे मौसम कितना भी प्रतिकूल क्यों न हो, उनकी सटीक निशानेबाजी और मजबूत हौसले को कोई डिगा नहीं सकता।

फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स का यह प्रदर्शन बेहद हाई एल्टीट्यूड इलाके में किया, जहां सांस लेना भी मुश्किल होता है। लेकिन भारतीय सेना के जवानों ने दुर्गम परिस्थितियों में भी यह अभ्यास कर दिखाया कि देश की सुरक्षा के लिए वे हर चुनौती को पार करने में सक्षम हैं।

वहीं, इस सैन्य अभ्यास के जरिए भारत के रक्षा आधुनिकीकरण और तकनीकी सशक्तिकरण की झलक भी देखने को मिली। सेना ‘Year of Tech Absorption’ और ‘Tech Infused Future Ready’ जैसी पहलों के तहत अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रही है।

भारतीय सेना की यह तैयारी यह दिखाती है कि देश के सैनिक सालभर दुर्गम इलाकों में तैनात रहते हुए अपनी ऑपरेशनल रेडीनेस पर पूरा ध्यान देते हैं। चाहे वह तकनीकी साजो-सामान हो या अत्याधुनिक आर्टिलरी, सेना लगातार खुद को मजबूत और आधुनिक बना रही है।

राजनयिक वार्ता के बीच सख्त संदेश

इस अभ्यास का समय बेहद खास है, क्योंकि अगले दो दिनों में भारत और चीन के बीच बेहद अहम बातचीत होने जा रही है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल बीजिंग में चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात करेंगे। यह चर्चा विशेष प्रतिनिधि (SR) स्तर की वार्ता होगी, जो गलवान संघर्ष के बाद पांच साल में पहली बार हो रही है।

NSA China Visit: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल जाएंगे चीन, LAC पर सीमा विवाद सुलझाने के लिए अहम वार्ता

इस वार्ता का उद्देश्य LAC पर शांति और स्थिरता बहाल करने के लिए एक रोडमैप तैयार करना है। हालांकि, इस बीच भारतीय सेना का यह अभ्यास एक सख्त संदेश देता है कि भले ही बातचीत के जरिए शांति की कोशिशें जारी हैं, लेकिन देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए सेना पूरी तरह तैयार है।

फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स यानी 14 कोर भारतीय सेना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो लद्दाख जैसे दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात है। यह कॉर्प्स बेहद सटीक फायरपावर और मजबूत रणनीतियों के लिए जानी जाती है। चाहे -35 डिग्री की कड़ाके की ठंड हो या बर्फीली हवाओं का कहर, फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के जवान किसी भी परिस्थिति में अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभाते हैं।

सेना का अडिग संकल्प

भारतीय सेना का यह अभ्यास इस बात का प्रमाण है कि चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न हों, हमारे जवान देश की सुरक्षा में कोई समझौता नहीं करते। उन्होंने बर्फ की चादर से ढके लद्दाख में जिस सटीकता और ताकत का प्रदर्शन किया है, वह देशवासियों के मन में विश्वास और गर्व की भावना को और मजबूत करता है।

सेना का यह प्रदर्शन न सिर्फ भारत की रक्षा तैयारियों को दर्शाता है, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी देता है कि भारतीय सेना किसी भी चुनौती से निपटने के लिए हमेशा तैयार है।

Bangladesh Army Exercise: क्या बांग्लादेश कर रहा है युद्ध की तैयारी? पहले तुर्की से खरीदे Bayrakter UAV और अब पूरे देश में मिलिट्री एक्सरसाइज, क्या है वजह?

Bangladesh Army Exercise: Bayrakter UAV and Nationwide Military Drill, Why?

Bangladesh Army Exercise: बांग्लादेश में इन दिनों सैन्य गतिविधियां अचानक तेज हो गई हैं। देश भर में सैन्य अभ्यास और सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन तैनाती से यह सवाल उठ रहा है कि क्या बांग्लादेश अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है या किसी बड़े कदम की तैयारी में है। वहीं, बांग्लादेश सेना ने 17 दिसंबर 2024 से 9 जनवरी 2025 तक देशव्यापी “विंटर एक्सरसाइज” की योजना बनाई है। यह अभ्यास विभिन्न सैन्य डिवीजनों द्वारा उनके संबंधित इलाकों में आयोजित किया जाएगा। इसे सेना की Regular Annual Joint Training Process कहा जा रहा है, लेकिन इसकी व्यापकता और समय को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

Bangladesh Army Exercise: Bayrakter UAV and Nationwide Military Drill, Why?

Bangladesh Army exercise: दिखाया एयर डिफेंस प्लान

हाल ही में बांग्लादेश सेना ने अपने लेयर-बेस्ड एयर डिफेंस प्लान का प्रदर्शन किया। इसमें दिखाया कि शॉर्ट रेंज के लिए सेना रडार गाइडेड एयर डिफेंस गन और VSHORAD का इस्तेमाल करेगी, इसके बाद FM-90C SHORAD सिस्टम का प्रयोग किया जाएगा। मीडियम रेंज के लिए बांग्लादेश सेना FM-3000 और LY-80D SAM सिस्टम (रेंज 25-70 किमी) को शामिल करेगी। इसके अलावा, लॉन्ग रेंज के लिए FK-3 मिसाइल सिस्टम (रेंज 100 किमी) को तैनात किया जाएगा।

तुर्की से Bayraktar TB2 UAV की खरीद

बांग्लादेश ने हाल ही में तुर्की से Bayraktar TB2 ड्रोन खरीदे हैं और उन्हें पश्चिम बंगाल सीमा के पास तैनात किया है। यह ड्रोन मॉर्डन मिलिट्री ऑपरेशन्स में गेम चेंजर माना जाता है। ड्रोन तकनीक का यह उपयोग बांग्लादेश की सैन्य ताकत को न केवल उन्नत करता है, बल्कि क्षेत्रीय तनाव को भी बढ़ाता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश एयरफोर्स तुर्की के Bayraktar Akinchi UCAV को भी खरीदने पर विचार कर रही है। वर्तमान में बांग्लादेश एयरफोर्स के पास इटली से खरीदा गया Selex Falco Astore UAV भी है, लेकिन इसकी आक्रामक क्षमताएं सीमित हैं। Akinchi ड्रोन की तैनाती बांग्लादेश को बाहरी खतरों से अपने हवाई क्षेत्र की सुरक्षा करने में बड़ी मदद कर सकती है।

वहीं, पश्चिम बंगाल की सीमा के पास बांग्लादेश सशस्त्र बलों द्वारा तुर्की के बायरकटर टीबी2 ड्रोन (यूएवी) की तैनाती ने चिंता बढ़ा दी है। बांग्लादेश सशस्त्र बलों ने इस साल की शुरुआत में 12 बायरकटर टीबी2 ड्रोन में से छह हासिल किए। ये ड्रोन मुख्य रूप से खुफिया, निगरानी और टोही मिशनों के साथ-साथ हल्के हमले के लिए उपयोग किए जाते हैं। इन ड्रोन का उपयोग बांग्लादेश की रक्षा क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल सीमा के पास तैनात Bayraktar TB2 ड्रोन ने भारत में भी चिंता बढ़ा दी है। जबकि बांग्लादेश इन ड्रोन का उपयोग अपनी सुरक्षा और निगरानी के लिए करता है, लेकिन यह भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए चिंता की बात है। क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश का यह कदम भारत के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।

Bangladesh Army Exercise: Bayrakter UAV and Nationwide Military Drill, Why?

16 दिसंबर को विजय दिवस

16 दिसंबर का दिन भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। 1971 में इसी दिन भारतीय सेना ने ढाका में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर किया था। इस युद्ध ने बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जन्म दिया। 16 दिसंबर को बांग्लादेशी सेना ने अपनी आजादी का जश्न मनाया। इस जश्न को मनाने के लिए 1971 की जंग में शामिल हो चुके कुछ बांग्लादेशी सेना के वेटरंस भी भारतीय सेना की ईस्टर्न कमांड की तरफ से आयोजित समारोह में भी शामिल हुए।

लेकिन 54 साल बाद, बांग्लादेश एक नई चुनौती का सामना कर रहा है। प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद छोड़ने और देश छोड़कर जाने के लिए मजबूर किया गया है। इसके साथ ही, म्यांमार-बांग्लादेश सीमा पर तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है।

अराकान आर्मी का उभार और बांग्लादेश की सीमाओं पर संकट

वहीं, म्यांमार के विद्रोही गुट अराकान आर्मी (AA) ने बांग्लादेश के टेकनाफ क्षेत्र के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया है। यह इलाका न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों और सेंट मार्टिन द्वीप के करीब होने के कारण अत्यधिक संवेदनशील भी है।

स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, अराकान आर्मी और बांग्लादेशी बलों के बीच कई बार गोलीबारी हुई है। हालांकि, बांग्लादेश सरकार ने अब तक इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।

अराकान आर्मी की बढ़ती ताकत

अराकान आर्मी ने म्यांमार के रखाइन प्रांत के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया है और अब उनकी नजर बांग्लादेश की सीमा के सामरिक क्षेत्रों पर है। माना जा रहा है कि सेंट मार्टिन द्वीप और अन्य रणनीतिक इलाकों पर कब्जा करने के लिए अराकान आर्मी बांग्लादेश की कमजोर सीमाओं का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है।

मनीष झा की एक रिपोर्ट के अनुसार, अराकान आर्मी की रणनीति बेहद आक्रामक हो गई है। मोंगडॉ और अन्य क्षेत्रों में सफलता के बाद, वे अब बांग्लादेश की सीमाओं पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं।

क्या बांग्लादेश की सुरक्षा रणनीति पर्याप्त है?

बांग्लादेश का एयर डिफेंस सिस्टम और ड्रोन तकनीक का प्रदर्शन यह दिखाता है कि बांग्लादेश अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर है। लेकिन क्या यह अराकान आर्मी और अन्य खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त होगा? विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमावर्ती इलाकों में अराकान आर्मी की गतिविधियां और देश के भीतर सैन्य अभ्यास, दोनों बांग्लादेश की सुरक्षा नीति के अहम संकेतक हैं।

बांग्लादेश में जारी सैन्य गतिविधियां और सीमावर्ती तनाव इस ओर इशारा करते हैं कि देश एक अस्थिर दौर से गुजर रहा है। ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल और नई वायु रक्षा प्रणाली की तैनाती इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश अपनी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव कर रहा है।

(यह खबर अभी जारी है। रक्षा समाचार से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमारे साथ बने रहें।)

1971 War Surrender Painting: थम नहीं रहा है पेंटिंग की जगह बदलने पर विवाद, रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने सेना पर उठाए सवाल, कहा- मानेकशॉ सेंटर का बदलें नाम

1971 War Surrender Painting Controversy: News Impact! Gets New Placement at Manekshaw Centre

1971 War Surrender Painting: 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण की ऐतिहासिक तस्वीर को भारतीय सेना के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) लाउंज से हटाने का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। भले ही सेना ने 16 दिसंबर विजय दिवस के मौके पर इस एतिहासिक पेंटिंग को मानेकशॉ सेंटर में स्थापित कर दिया है, लेकिन इस फैसले पर वेटरंस अभी भी नाराज हैं। भारतीय पूर्व सेवा लीग (Indian Ex-Services League) के अध्यक्ष और रिटायर्ड ब्रिगेडियर इंद्र मोहन सिंह ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे न केवल इतिहास का अपमान बताया, बल्कि सेना के नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

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ब्रिगेडियर इंद्र मोहन सिंह ने 16 दिसंबर, 2024 को रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं के प्रमुखों को एक पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उनका कहना है कि यह तस्वीर केवल एक पेंटिंग नहीं है, बल्कि भारतीय सैन्य इतिहास का गौरवशाली प्रतीक है।

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1971 की पेंटिंग का ऐतिहासिक महत्व

1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को हराकर बांग्लादेश को आजाद कराया था। इस युद्ध के दौरान ढाका में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने पाकिस्तान के जनरल ए ए के नियाज़ी ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। यह तस्वीर उस ऐतिहासिक क्षणों को दर्शाती है, जो भारत के लिए गर्व के पल थे।

ब्रिगेडियर इंद्र मोहन सिंह ने इस तस्वीर को हटाने पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे “इतिहास को मिटाने की कोशिश” बताया। उन्होंने कहा, “द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली ऐसी जीत थी, जहां एक देश ने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण किया। इस तस्वीर को हटाना उन सैनिकों के बलिदान का अपमान है, जिन्होंने इस ऐतिहासिक विजय को संभव बनाया।”

नई पेंटिंग पर सवाल

तस्वीर को हटाकर, उसकी जगह एक नई पेंटिंग लगाने के फैसले को लेकर ब्रिगेडियर सिंह ने तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा, “नई पेंटिंग ऐसी लगती है जैसे किसी स्कूल स्तर की प्रतियोगिता में किसी बच्चे ने बनाई हो। इसमें पैंगोंग त्सो झील, पहाड़ और कुछ सैन्य हथियार और इक्विपमेंट्स दिखाए गए हैं। लेकिन इसका क्या महत्व है? हम तो फिंगर 4 से 8 तक अपने पेट्रोलिंग के अधिकार भी खो चुके हैं।”

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इसके अलावा, पेंटिंग में शामिल चाणक्य और महाभारत के रथ के चित्रण पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा, “सशस्त्र बलों में धर्म को लाने की कोशिश क्यों की जा रही है? हमारी सेना की ताकत उसकी धर्मनिरपेक्षता और एकता में है। क्या हम अपनी जड़ों को मिटाना चाहते हैं?”

‘फोटो को IESL को सौंपें’

ब्रिगेडियर सिंह ने यह भी सुझाव दिया कि हटाई गई 1971 की ऐतिहासिक तस्वीर को भारतीय पूर्व सेवा लीग (IESL) को भेंट कर दिया जाए। उन्होंने कहा, “हम इस तस्वीर को अपने मुख्यालय में सम्मानजनक स्थान देंगे। यह तस्वीर हमारे लिए केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि उन सैनिकों का स्मारक है, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।”

सेना के नेतृत्व पर निशाना

ब्रिगेडियर सिंह ने सेना के वर्तमान नेतृत्व पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “आज की पीढ़ी के सैन्य अधिकारी फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ जैसी ऊंचाई कभी नहीं छू पाएंगे।”

उन्होंने सेना के कुछ हालिया फैसलों और राजनीतिक नेताओं के वादों पर कटाक्ष करते हुए कहा, “हरियाणा चुनाव के दौरान हमारे वरिष्ठ नेताओं ने कहा था कि छह महीने के भीतर हम पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) को वापस ले लेंगे। लेकिन यह भी एक सपना ही रह जाएगा।”

वेटरंस की अनदेखी

भारतीय पूर्व सेवा लीग (IESL) के अध्यक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार और सेना के वरिष्ठ अधिकारी दिग्गज सैनिकों की चिंताओं को अनदेखा कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “इस साल तीन चीफ सेवानिवृत्त हुए, लेकिन किसी ने भी IESL या अन्य वेटरन संगठनों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया। यह हमारे लिए निराशाजनक है।”

रिटायर्ड ब्रिगेडियर सिंह ने अपने पत्र में यह भी कहा कि “फोटो-फिनिश” हमेशा प्रशंसा के योग्य होती है। उन्होंने लिखा, “चाहे वह जीत का क्षण हो या मामूली अंतर से हारने वाला पल, इतिहास को खत्म करना अक्षम्य है।”

1971 War Surrender Painting Controversy: News Impact! Gets New Placement at Manekshaw Centre

मानेकशॉ सेंटर का नाम बदलें

उन्होंने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के योगदान और उनकी प्रतिमा का उल्लेख करते हुए चुटकी ली, “अगर इतिहास को बदलना ही है, तो मानेकशॉ सेंटर का नाम बदलकर ‘चाणक्य सेंटर’ क्यों न कर दिया जाए? और उनकी प्रतिमा की जगह चाणक्य की मूर्ति लगा दी जाए।” ब्रिगेडियर इंद्र मोहन सिंह ने अपने पत्र के अंत में सेना और रक्षा मंत्रालय से कहा, “आपमें से कोई भी फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ जैसा कद कभी हासिल नहीं कर पाएगा।”

लगातार उठ रही है नाराजगी

विजय दिवस जैसे पवित्र दिन पर इस बदलाव को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। पूर्व सैन्य अधिकारी और 1971 के युद्ध के दिग्गज इस बदलाव को अनुचित मानते हैं। एडमिरल अरुण प्रकाश और जनरल एच.एस. पनाग जैसे अधिकारियों ने नई पेंटिंग को लेकर अपनी असहमति जाहिर की है। उनका कहना है कि यह बदलाव न केवल इतिहास की अनदेखी करता है बल्कि सैनिकों की कुर्बानी को भी कम करके आंकता है। इस बदलाव के समय को भी लेकर सवाल उठ रहे हैं। 16 दिसंबर, विजय दिवस, जब पूरी दुनिया भारतीय सेना की इस महान जीत को याद करती है, ऐसे समय में पेंटिंग बदलना कई लोगों के लिए असंवेदनशील कदम माना जा रहा है।

रक्षा समाचार डॉट ने उठाया था मुद्दा

रक्षा समाचार डॉट कॉम ने इस मुद्दे को मुरजोर से उठाया था। पूर्व सैन्य अधिकारियों और रक्षा समाचार.कॉम के सवाल उठाने के बाद 16 दिसंबर को विजय दिवस के मौके पर सेना ने उस एतिहासिक पेंटिंग को नई जगह स्थापित किया।

सेना ने अपनी पोस्ट में लिखा,  “विजय दिवस के मौके पर, जनरल उपेन्द्र द्विवेदी COAS और AWWA की प्रेसिडेंट सुनीता द्विवेदी के साथ , 1971 की आत्मसमर्पण पेंटिंग को उसके सबसे उपयुक्त स्थान, मानेकशॉ सेंटर में स्थापित किया। यह सेंटर 1971 युद्ध के आर्किटेक्ट और नायक, फील्ड मार्शल सम मानेकशॉ के नाम पर है। इस अवसर पर भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी और सेवानिवृत्त अधिकारी उपस्थित थे।”

“यह पेंटिंग भारतीय सशस्त्र बलों की सबसे बड़ी सैन्य जीतों में से एक का प्रतीक है और भारत की न्याय और मानवता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। मानेकशॉ सेंटर में इसे प्रतिष्ठापित करने के बाद, यहां आने वाले गणमान्य व्यक्तियों और दर्शकों को इसका दर्शन करने का अवसर मिलेगा।”

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किसने बनाई है नई पेंटिंग

सेना के सूत्रों ने कहा कि नई पेंटिंग, ‘कर्म क्षेत्र– कर्मों का क्षेत्र’, जिसे 28 मद्रास रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने बनाई है। इस पेंटिंग में सेना को एक “धर्म के रक्षक” के रूप में दर्शाया गया है, जो केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं बल्कि न्याय की रक्षा और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ती है। यह पेंटिंग बताती है कि सेना तकनीकी रूप से कितनी एडवांस हो गई है। पेंटिंग बर्फ से ढकी पहाड़ियां पृष्ठभूमि में दिख रही हैं, दाएं ओर पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील और बाएं ओर गरुड़ा और श्री कृष्ण की रथ, साथ ही चाणक्य और आधुनिक उपकरण जैसे टैंक, ऑल-टेरेन व्हीकल्स, इन्फैंट्री व्हीकल्स, पेट्रोल बोट्स, स्वदेशी लाइट कॉम्बेट हेलीकॉप्टर्स और एच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर्स दिखाए गए हैं।

वहीं, पुरानी पेंटिंग, जो सेना मुख्यालय के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के कार्यालय में प्रमुखता से लगाई गई थी, 1971 की युद्ध-विजय को दर्शाती थी। यह वही पेंटिंग है, जो 1971 की जीत भारतीय सेना की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धियों में से एक थी। इस युद्ध में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, जनरल अरोड़ा और उनके साथियों की रणनीतिक कुशलता ने एक नया इतिहास रच दिया। इस जीत ने न केवल पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांट दिया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि भारतीय सेना के जज्बे और नेतृत्व के सामने कोई टिक नहीं सकता।

नई पेंटिंग: फ्यूचरिस्टिक दृष्टिकोण या इतिहास से दूर?

हाल ही में, इस ऐतिहासिक पेंटिंग को हटा कर एक नई पेंटिंग लगाई गई है। नई पेंटिंग में माइथोलॉजिकल और फ्यूचरिस्टिक तत्वों का समावेश है। इसमें एक ऋषि, जिन्हें चाणक्य का रूप दिया गया है, आक्रोशित मुद्रा में आदेश देते हुए दिखाई देते हैं। उनके पीछे महाभारत का रथ, श्रीकृष्ण और अर्जुन का प्रतीक, और ऊपर गरुड़ जैसी संरचना नजर आती है।

पेंटिंग के निचले हिस्से में आधुनिक सैन्य उपकरण जैसे T-90 टैंक, अपाचे हेलीकॉप्टर, ड्रोन और पैरा-कमांडो दर्शाए गए हैं। यह पेंटिंग भविष्य की सेना की तकनीकी क्षमताओं और आधुनिक युद्ध के लिए तैयार भारत का संदेश देने की कोशिश करती है।