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Army Personnel Salary Attachment: सैन्य कर्मियों की सैलरी को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र सरकार की अनुमति है जरूरी

Liberalised Family Pension
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Army Personnel Salary Attachment: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि सेना कर्मियों की सैलरी को धारा 125 सीआरपीसी (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144) के तहत भरण-पोषण के बकाए को वसूलने के लिए अटैच नहीं किया जा सकता, क्योंकि केवल केंद्र सरकार को ही इस प्रकार की कटौती करने का अधिकार है।

Army Personnel Salary Attachment: High Court Rules Only Central Government Authorized for Deductions

न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बरार ने अपने आदेश में कहा कि सेना अधिनियम के तहत सेना कर्मियों को व्यापक अधिकार और सुरक्षा प्रदान की गई है, ताकि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के अपने कर्तव्यों को बिना किसी बाहरी वित्तीय बाधा के प्रभावी ढंग से निभा सकें।

Army Personnel Salary Attachment: क्या है मामला?

यह फैसला एक याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। फैमिली कोर्ट ने सेना कर्मी की सैलरी से 4,10,000 रुपये की कटौती का आदेश दिया था, ताकि भरण-पोषण का बकाया वसूल किया जा सके।

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याचिकाकर्ता के वकील मदन लाल सैनी ने तर्क दिया कि सेना अधिनियम (आर्मी एक्ट 1950) के तहत बिना केंद्र सरकार की स्वीकृति के इस प्रकार की कटौती नहीं की जा सकती।

सेना अधिनियम के तहत अधिकार और सुरक्षा

न्यायालय ने कहा कि सेना अधिनियम (आर्मी एक्ट 1950) की धारा 25 और 91 के तहत सेना कर्मियों की सैलरी और भत्तों से कटौती केवल केंद्र सरकार की अनुमति से ही संभव है। इसके अलावा, धारा 28 यह सुनिश्चित करती है कि सेना कर्मियों की सैलरी अटैच नहीं की जा सकती।

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न्यायालय ने यह भी कहा कि सेना कर्मियों को दिए गए अधिकार और विशेषाधिकार अन्य कानूनों के तहत उनके पास मौजूद किसी भी अधिकार या विशेषाधिकार को कम नहीं करते, बल्कि यह उनके लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करते हैं।

न्यायालय ने सेना अधिनियम की निम्नलिखित धाराओं का हवाला दिया:

  • धारा 25 और 91: ये धाराएं जवानों के वेतन और भत्तों से कटौती के नियम तय करती हैं।
  • धारा 28: इस धारा के तहत जवानों के वेतन और भत्तों को जब्ती से सुरक्षा प्रदान की गई है।
  • धारा 33: यह धारा स्पष्ट करती है कि जवानों को दिए गए अधिकार अन्य कानूनों के तहत दिए गए अधिकारों के पूरक हैं।

Army Personnel Salary Attachment: न्यायालय का निर्णय

न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बरार ने कहा, “निचली अदालत द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार सेना कर्मी की सैलरी को अटैच नहीं किया जा सकता। भरण-पोषण के लिए तय 10,000 रुपये की कटौती के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य है।”

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई सिविल कोर्ट भरण-पोषण का आदेश देती है, तो लाभार्थी केंद्र सरकार से अनुरोध कर सकता है कि सेना अधिनियम की धारा 91(i) के तहत आवश्यक कटौती की जाए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सेना कर्मियों को उनके कार्यों में बाधा पहुंचाने से बचाने के लिए यह विशेष संरक्षण दिया गया है। सेना कर्मियों को अपनी सैलरी और भत्तों पर निर्भर रहना पड़ता है, और इस प्रकार की कटौती उनके कर्तव्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

वहीं, उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता की अपील स्वीकार कर ली। साथ ही, जवाबदेही तय करते हुए यह निर्देश दिया कि भरण-पोषण के आदेश को लागू करने के लिए उत्तरदाता केंद्र सरकार से संपर्क कर सकता है।

क्या है धारा 125 सीआरपीसी?

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144) के तहत पत्नी, बच्चे और माता-पिता को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है। इसमें विशेष रूप से यह प्रावधान है कि यदि परिवार के लिए आवश्यक धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता, तो इसे अदालत द्वारा लागू कराया जा सकता है।

सेना कर्मियों के लिए क्या है खास?

सेना कर्मियों को उनके संवैधानिक अधिकारों और विशेषाधिकारों के तहत यह सुनिश्चित किया गया है कि उनके वेतन और भत्तों की कटौती केवल केंद्र सरकार की स्वीकृति से ही हो सकती है। यह कदम यह सुनिश्चित करता है कि सेना कर्मी अपनी सेवा और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति पूरी तरह से समर्पित रह सकें।

न्यायालय के फैसले का महत्व

इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि सेना कर्मियों के वेतन और भत्तों को लेकर केंद्र सरकार का विशेष अधिकार है। यह फैसला न केवल सेना कर्मियों के अधिकारों को सुरक्षित रखता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि सिविल अदालतें इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे हस्तक्षेप न करें।

Tashi Namgyal: नहीं रहे करगिल जंग के गुमनाम हीरो ताशी नामग्याल, जिन्होंने सबसे पहले दी थी पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की खबर

Tashi Namgyal: Unsung Hero of Kargil War Who First Alerted India About Pakistani Intrusion Passes Away

Tashi Namgyal: करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान की घुसपैठ का सबसे पहले पता लगाने वाले बटालिक सेक्टर के गारकन गांव के बहादुर चरवाहे ताशी नामग्याल का निधन गुरुवार को हो गया। लद्दाख की आर्यन घाटी के नाम से मशहूर इस अनजान नायक ने भारतीय सेना को समय रहते चेतावनी दी, जिससे 1999 के करगिल युद्ध में भारत की जीत सुनिश्चित हुई और अनगिनत सैनिकों की जान बच सकी। इसी साल उनसे मेरी (हरेंद्र चौधरी) करगिल के 25 साल समारोह में मुलाकात हुई थी। जिसमें वे सरकार से काफी खिन्न भी नजर आ रहे थे। उनका कहना था कि सरकार से उन्हें कोई पहचान या सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। यहां तक कि सरकार ने उनकी गरीबी को देखते हुए उन्हें कोई सम्मान राशि भी नहीं दी।

Tashi Namgyal: Unsung Hero of Kargil War Who First Alerted India About Pakistani Intrusion Passes Away

1999 में दिया था सबसे बड़ा अलर्ट

लेखक से बातचीत करते हुए उन्होंने बताया था कि उस समय उनकी उम्र 35 साल थी। भारतीय सेना को घुसपैठ के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, तो 2 मई को वे जानवरों (याक) की देखभाल और उन्हें चराने के लिए गरखुन नाला (धारा) पर गए थे। वे दौड़ते हुए वापस आए और उन्होंने वहां बर्फ में कुछ निशान देखे। यह बहुत असामान्य था क्योंकि कोई भी वहां नहीं जाता था।

Tashi Namgyal: Unsung Hero of Kargil War Who First Alerted India About Pakistani Intrusion Passes Away
लेखक के साथ ताशी नामग्याल

उनके भाई मोरुप त्सेरिंग ने दूरबीन उठाई और वे जुबार हिल पर एक नाले के पास पहुंचे। वे कहते हैं, “हम सलवार-कमीज़ पहने छह से सात लोगों को साफ़-साफ़ पहचान सकते थे। हमें यकीन नहीं था कि वे भारतीय सेना से नहीं थे।”

उन्होंने तुरंत निकटतम सेना पोस्ट जाकर इसकी सूचना दी। इससे पहले भी 1997 में उन्होंने याल्डोर क्षेत्र में पाकिस्तान सेनी के गश्ती दल की गतिविधियों की जानकारी दी थी, लेकिन तब किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। इस बार भी, उनकी बात को पहले नकारा गया, लेकिन उनका साहस और धैर्य अंततः रंग लाया और आखिरकार सरकार को उनका बात माननी पड़ी।

सेना को कैसे मिला सबूत

उन्होंने बताया था कि गरखुन गांव के पास एक चौकी पर मौजूद बारा साहब को इस बारे में जानकारी दी। एक दिन बाद, एक लेफ्टिनेंट और कुछ सैनिक त्सेरिंग और ताशी के साथ गए ताकि वे खुद देख सकें कि दोनों किस बारे में बात कर रहे थे।

वे कहते हैं, “जब हम करीब पांच किलोमीटर ऊपर गरखुन नाला पहुंचे, तो हमें घुसपैठिए दिखाई दिए। हम वापस आए और मुझसे पूछा गया कि क्या नाले तक पहुंचने का कोई और रास्ता है। मैं उन्हें दाह नाला ले गया।” वहां भी घुसपैठियों की भरमार थी और वहां अच्छी तरह से बनाए गए बंकर और बहुत सारा गोला-बारूद था।

जब सेना के अधिकारियों ने उनके दावों की जांच की, तो उन्हें पता चला कि पाकिस्तानी सेना वास्तव में इलाके में सक्रिय थे। गरखुन नाले और दाह नाले में घुसपैठियों ने बंकर और गोला-बारूद का बड़ा जखीरा जमा कर रखा था। ताशी ने सेना को दुर्गम रास्तों की जानकारी दी और घुसपैठियों की स्थिति का सटीक विवरण दिया।

मेरा पुराना इंटरव्यू

गुमनाम नायक का योगदान

करगिल युद्ध के दौरान, ताशी ने सेना के लिए कुली के रूप में काम किया और रसद और हथियार पहुंचाने में मदद की। उनकी बहादुरी और योगदान ने न केवल भारतीय सेना को समय पर तैयारी का मौका दिया, बल्कि दुश्मन की साजिशों को भी विफल किया।

सम्मान के बदले उपेक्षा

ताशी नामग्याल जैसे नायकों को वह पहचान और सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। ताशी ने मुलाकात के दौरान बताया था, “हमने सेना के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन आज भी हम गुमनाम हैं। हमें आज भी पूछताछ का सामना करना पड़ता है। मेरा भाई आज भी मजदूरी करता है। क्या आपको लगता है कि हमें कभी हमारे काम का इनाम मिलेगा?”

सभी सच्चे नायकों की तरह, वे भी गुमनाम ही ररहे। उनकी गरीबी भरी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। उनके हाथ और कपड़े अभी भी धूल से सने थे, क्योंकि जब वह भेड़ और याक चराने के अलावा किसी और की जमीन पर काम करते हैं तो अपनी आजीविका चलाते हैं। उन्होंने बताया था कि वे और उनके भाई ताशी नामग्याल कारगिल के बटालिक क्षेत्र के गरखुन गांव में हीरो हैं, लेकिन इसके अलावा उनकी जिंदगी में कुछ भी नहीं बदला है।

सादगी में बीता जीवन

ताशी नामग्याल ने अपना जीवन बेहद सादगी से बिताया। उनके अद्वितीय योगदान के बावजूद, उन्होंने कभी कोई बड़ा दावा नहीं किया और देशभक्ति को अपने जीवन का आधार बनाया।

करगिल के गुमनाम नायकों को कब मिलेगा हक?

ताशी और मोरुप जैसे नायकों की कहानियां यह सवाल उठाती हैं कि क्या हमारे देश में गुमनाम नायकों को उनका हक मिल पाता है? जब हम करगिल की विजय का जश्न मनाते हैं, तो हमें उन अनजान और निस्वार्थ नायकों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा की।

ताशी नामग्याल का निधन देश के लिए एक बड़ी क्षति है। उनका योगदान हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके जीवन ने यह सिखाया कि असली नायक वह होता है, जो बिना किसी प्रशंसा की अपेक्षा के अपना कर्तव्य निभाता है।

General Bipin Rawat Death: कैसे हुई थी सीडीएस रावत की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत? संसदीय समिति की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

CDS General Bipin Rawat Death: Parliamentary report reveals key findings on helicopter crash!

General Bipin Rawat Death: 8 दिसंबर 2021 को तमिलनाडु के कुन्नूर में एक भीषण हेलिकॉप्टर दुर्घटना में भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत और 12 अन्य सैन्य अधिकारियों की दुखद मृत्यु हो गई। तीन साल बाद, संसद में पेश की गई रक्षा पर स्थायी समिति की रिपोर्ट ने इस दुर्घटना का कारण “मानवीय त्रुटि (एयरक्रू)” को बताया है। बता दें कि इससे एक दिन पहले ही भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद के सामने रखी गई अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) के पायलट प्रशिक्षण में गंभीर खामियों को उजागर किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि हेलिकॉप्टर पायलटों को Mi-17 V5 जैसे पुराने हेलिकॉप्टरों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स की कमी है।

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General Bipin Rawat Death: क्या कहा संसद में पेश रिपोर्ट ने?

हाल ही में संसद में रक्षा मामलों की स्थायी समिति ने इस हादसे पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह हादसा “मानवीय भूल” (Human Error – Aircrew) की वजह से हुआ। रिपोर्ट में बताया गया कि 2017 से 2022 तक के ‘तेरहवें रक्षा योजना काल’ के दौरान भारतीय वायुसेना में कुल 34 हादसे हुए। इनमें से नौ हादसे केवल 2021-22 के वित्तीय वर्ष में हुए, और जनरल रावत का हेलिकॉप्टर क्रैश इन्हीं में से एक था।

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यह पहली बार नहीं है जब “मानवीय भूल” को हादसे का कारण बताया गया हो। 2022 में भी जांच टीम ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में इसी निष्कर्ष की ओर इशारा किया था।

General Bipin Rawat Death: क्या हुआ था उस दिन?

8 दिसंबर 2021 की सुबह, जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी और 12 अन्य अधिकारी Mi-17 V5 हेलिकॉप्टर में सवार होकर सुलूर एयरबेस से वेलिंगटन स्थित डिफेंस स्टाफ सर्विस कॉलेज के लिए निकले थे। वेलिंगटन पहुंचने से कुछ ही मिनट पहले हेलिकॉप्टर पहाड़ियों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

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इस हादसे में जनरल रावत, उनकी पत्नी और 11 अन्य अधिकारियों की तुरंत मौत हो गई। ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह, जो कि शौर्य चक्र विजेता थे, इस हादसे में जीवित बचे लेकिन गंभीर रूप से झुलसने के कारण कुछ दिनों बाद उनका भी निधन हो गया।

जांच टीम की रिपोर्ट में क्या आया सामने?

प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई कि मौसम में अचानक आए बदलाव के कारण हेलिकॉप्टर बादलों में प्रवेश कर गया। इससे पायलट दिशाभ्रम का शिकार हो गए और हेलिकॉप्टर “Controlled Flight Into Terrain” (CFIT) का शिकार हो गया।

हालांकि, “मानवीय त्रुटि” का ठीकरा फोड़ने से यह सवाल उठता है कि क्या पायलट को पर्याप्त जानकारी और सहायता दी गई थी? क्या विमानन प्रणाली इतनी मजबूत थी कि ऐसे हालातों से निपट सके?

जांच टीम ने फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर का विश्लेषण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची। इसके साथ ही टीम ने सभी गवाहों से पूछताछ भी की।

रिपोर्ट में हेलिकॉप्टर के संचालन और रखरखाव पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्या पायलट को ऐसे हालातों से निपटने का समुचित प्रशिक्षण दिया गया था? क्या हेलिकॉप्टर में लगे उपकरण खराब थे, जो मौसम के बदलाव को पायलट को सही समय पर चेतावनी नहीं दे सके? क्या वायुसेना के सुरक्षा प्रोटोकॉल इस हद तक प्रभावी हैं कि इस तरह की त्रासदी को रोका जा सके?

बता दें कि 2022 में सूत्रों ने बताया था कि पायलट की गलती हेलिकॉप्टर दुर्घटना की मुख्य वजह हो सकती है, जिसमें CDS जनरल बिपिन रावत की मृत्यु हुई। अब, संसदीय समिति की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि दुर्घटना का कारण “मानवीय त्रुटि” थी।

हादसे के बाद ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह को गंभीर रूप से जलने की स्थिति में वेलिंगटन से बेंगलुरु के एक सैन्य अस्पताल में ले जाया गया, जहां उन्हें लाइफ सपोर्ट पर रखा गया। दुर्भाग्यवश, उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका और वह एक सप्ताह बाद शहीद हो गए।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस रिपोर्ट को हल्के में नहीं लेना चाहिए। हादसे के पीछे की खामियों को दूर करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों।

क्या कहा था CAG ने अपनी रिपोर्ट में?

भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद के सामने रखी गई अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) के पायलट प्रशिक्षण में गंभीर खामियों को उजागर किया था। रिपोर्ट में वायुसेना के ‘स्टेज-1’ प्रशिक्षण में इस्तेमाल हो रहे Pilatus PC-7 Mk-II विमान की खामियों को भी बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 64 विमानों में से 16 (25%) में 2013 से 2021 के बीच 38 बार इंजन ऑयल लीक की घटनाएं दर्ज की गईं।

सथ ही, CAG की रिपोर्ट में ‘स्टेज-2’ और ‘स्टेज-3’ पायलट ट्रेनिंग में पुरानी तकनीक और उपकरणों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट में कहा गया कि हेलिकॉप्टर पायलटों को Mi-17 V5 जैसे पुराने हेलिकॉप्टरों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स की कमी है, जिसके कारण ऑपरेशनल यूनिट्स को अतिरिक्त प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है। वहीं, ट्रांसपोर्ट पायलटों को डॉर्नियर-228 जैसे पुराने विमानों पर प्रशिक्षित किया जा रहा है। इन विमानों में आधुनिक कॉकपिट की सुविधाएं नहीं हैं।

CAG ने वर्चुअल रियलिटी (VR) सिमुलेटर और फ्लाइंग ट्रेनिंग डिवाइस (FTD) की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए। कहा, ये सिमुलेटर केवल प्रोसिजरल ट्रेनिंग देते हैं और रियल टाइम फ्लाइट एक्सपीरियंस का अहसास नहीं कराते।

India-China: पैंगोंग झील में चीन की बड़ी कारस्तानी! डिसइंगेजमेंट और वार्ता के बावजूद फिंगर-4 के आगे जारी है निर्माण कार्य

India-China: Despite Disengagement, China Continues Construction Beyond Finger-4 at Pangong Lake
Source: Damien Symon

India-China: पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग झील के इलाके में चीन की तरफ निर्माण गतिविधियों के जारी रहने की नई सैटेलाइट तस्वीरें सामने आई हैं। चीन ने 21 अक्तूबर को हुए डिसइंगेजमेंट और कई दौर की वार्ताओं के बावजूद बफर ज़ोन से आगे के इलाकों में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। इन तस्वीरों से पता चलता है कि फिंगर-4 (फॉक्सहोल पॉइंट) से आगे के क्षेत्रों में, जो अब एक बफर ज़ोन के अंतर्गत आते हैं, चीन ने बड़ी निर्माण गतिविधियां शुरू कर दी हैं। इसमें सिरिजाप और रिमुचांग जैसे क्षेत्रों में पेट्रोल बोट बेस का विस्तार करते हुए देखा गया है।

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Source: Damien Symon

India-China: क्या कहती हैं सैटेलाइट तस्वीरें?

14 दिसंबर 2024 को ली गई सैटेलाइट तस्वीरों से यह पता चलता है कि चीन सिरिजाप और रिमुचांग पेट्रोल बोट बेस के पास नए निर्माण कार्य कर रहा है। सिरिजाप क्षेत्र में कई नई इमारतें निर्माणाधीन हैं और झील के किनारे पर नए निर्माण की संभावना दिखाई दे रही है। रिमुचांग बेस पर भी नए निर्माण कार्य की तस्वीर साफ तौर पर दिखाई दे रही है।

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इसके अलावा, खुरनाक फोर्ट के पास एक पुराने निर्माण स्थल को बड़े हेलीपैड में बदलने की पुष्टि हुई है। पैंगोंग ब्रिज, जो झील के उत्तर और दक्षिण किनारों को जोड़ता है, के पास भी चीन की गतिविधियां बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं।

India-China: डिसइंगेजमेंट के बाद भी चीन का खेल जारी

पिछले साल भारत और चीन के बीच हुए डिसइंगेजमेंट समझौते में दोनों देशों ने फिंगर-4 और अन्य विवादित क्षेत्रों में सैन्य बलों को पीछे हटाने और बफर ज़ोन बनाने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य था कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनाई जा सके। लेकिन नई तस्वीरें बताती हैं कि चीन ने समझौते का सम्मान नहीं कर रहा है, बल्कि अपनी सैन्य गतिविधियों को बफर ज़ोन के आगे बढ़ा रहा है।

India-China: बसा रहा है बस्ती

इससे पहले इस साल 21 अक्तूबर को भारत-चीन डिसइंगेजमेंट समौते से पहले 14 अक्तूबर को भी सैटेलाइट तस्वीरों में खुलासा हुआ था कि चीन पैंगॉन्ग झील के उत्तरी तट पर एक बड़ी बस्ती का निर्माण कर रहा है। यह नई गतिविधि भारत और चीन के बीच 2020 के संघर्ष बिंदुओं से लगभग 38 किलोमीटर पूर्व में हो रही है। अमेरिकी कंपनी मैक्सार टेक्नोलॉजीज द्वारा अक्टूबर 2024 में कैप्चर की गई सैटेलाइट तस्वीरों से पता चल था कि झील के पास करीब 17 हेक्टेयर क्षेत्र में चीन ने तेजी से निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में निर्माण और मिट्टी हटाने वाली मशीनरी सक्रिय है।

India-China Disengagement: चीन का दोहरा रवैया, बातचीत में सहमति लेकिन LAC पर सैनिकों का जमावड़ा

चीन ने इस क्षेत्र में हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के लिए 150 मीटर लंबी आयताकार पट्टी का निर्माण भी किया है। यह निर्माण अप्रैल 2024 में शुरू हुआ था। माना जा रहा था कि यह बस्ती चीन के लिए एक “एड-हॉक फॉरवर्ड बेस” के रूप में काम कर सकती है। इससे चीनी सेना के लिए रेस्पॉन्स टाइम में कमी आएगी।

बुधवार को हुई थी विशेष प्रतिनिधि वार्ता

इससे पहले बुधवार 18 दिसंबर को बीजिंग में हुई भारत-चीन सीमा वार्ता में दोनों पक्षों ने “छह बिंदुओं पर सहमति” बनाई है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने 23वें विशेष प्रतिनिधि (SR) स्तर की वार्ता में निम्नलिखित छह बिंदुओं पर सहमति व्यक्त की। यह 23वीं विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता थी, जो पांच साल के अंतराल के बाद आयोजित की गई। पिछली बार 2019 में यह बैठक भारत में हुई थी।

पेंटागन की रिपोर्ट में खुलासा, LAC पर है चीनी सैनिकों का जमावड़ा

अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की हाल ही में जारी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) अब भी LAC पर अपने बड़े सैन्य जमावड़े और बुनियादी ढांचे को बनाए हुए है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “2020 के संघर्ष के बाद से PLA ने अपनी तैनाती या सैनिकों की संख्या में कोई कमी नहीं की है और LAC के साथ कई ब्रिगेड स्तर की तैनाती के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी लद्दाख के डेपसांग और डेमचोक में सैनिकों के पीछे हटने के बावजूद PLA ने लगभग 1.2 लाख सैनिक, टैंक, हॉवित्जर, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और अन्य भारी हथियार LAC पर तैनात किए हुए हैं।

LAC के तीन प्रमुख सेक्टरों—पश्चिमी (लद्दाख), मध्य (उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश), और पूर्वी (सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश)—में PLA के 20 से अधिक कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड्स (CABs) मौजूद हैं। सूत्रों के अनुसार, “कुछ CABs वापस जा चुके हैं, लेकिन अधिकांश अभी भी वहीं तैनात हैं।”

Sukhoi-30: अब सुखोई-30 भी चला LCA तेजस की राह पर! सुस्त HAL ने 12 SU-30 की डिलीवरी को भी लटकाया! आत्मनिर्भरता पर उठे सवाल

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Sukhoi-30: भारत के स्वदेशी हल्के फाइटर जेट तेजस के इंजन की डिलीवरी में हो रही देरी से पहले ही भारतीय एयरफोर्स फाइटर स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। वहीं अब सुखोई-30 को लेकर भी भारतीय वायुसेना को बड़ा झटका लगा है। सूत्रों के मुताबिक सरकारी विमान निर्माता कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) अब भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए नए सुखोई-30 विमानों की डिलीवरी अप्रैल 2027 में शुरू करेगी। रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में 12 सुखोई-30 विमानों के लिए HAL के साथ 13,500 करोड़ रुपये के अनुबंध पर दस्तखत किए थे। लेकिन डिलीवरी की समयसीमा और देरी पर अब सवाल उठ रहे हैं।

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वहीं, इन विमानों की डिलीवरी में होने वाली देरी ने सरकार की आत्मनिर्भर भारत योजना और रक्षा उत्पादन में स्वदेशीकरण की दिशा में उसके प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Sukhoi-30: क्यों हो रही है देरी?

सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इस कॉन्ट्रैक्ट को “देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने वाला” बताया गया है। लेकिन असलियत में, HAL के नासिक स्थित उत्पादन केंद्र को फिर से एक्टिव करने और उत्पादन प्रक्रिया शुरू करने में लंबा वक्त लगने वाला है। सूत्रों के अनुसार, पहला सुखोई विमान 2027 में रोल आउट होगा, जबकि आखिरी विमान 2029 तक तैयार होगा। HAL के एक अधिकारी ने बताया, “तैयारी अब शुरू हो रही है। अधिकांश स्ट्रक्चरल हिस्सा और कंपोनेंट्स स्थानीय विक्रेताओं द्वारा निर्मित और सप्लाई किए जाएंगे। जबकि कुछ सामान रूस से आयात किया जाएगा।” जबकि ओडिशा के कोरापुट में AL-31FP इंजनों का निर्माण किया जाएगा, लेकिन इसमें भी समय लगेगा। बता दें कि HAL ने नासिक स्थित अपने सुखोई उत्पादन लाइन को दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया है। यह वही लाइन है जहां पहले भी MIG और सुखोई जैसे लड़ाकू विमान बनाए गए थे।

LCA Tejas: भारत के स्वदेशी फाइटर जेट तेजस के प्रोडक्शन में तेजी लाने पर जोर, संसदीय समिति ने रक्षा मंत्रालय को दिए निर्देश

Sukhoi-30 की देरी से होगी ऑपरेशनल क्षमता प्रभावित

IAF पहले ही 260 सुखोई-30 विमानों का बेड़ा संचालित करता है। जिनमें से 50 रूस से आए थे और बाकी HAL द्वारा भारत में बनाए गए थे। ये 12 अतिरिक्त विमान उन विमानों की भरपाई के लिए हैं, जो दुर्घटनाओं में खो गए। लेकिन देरी के कारण वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमताओं पर असर पड़ सकता है।

IAF के लिए सुखोई-30 विमान का महत्व किसी से छिपा नहीं है। लेकिन 2027 तक पहले विमान की डिलीवरी और 2029 तक अंतिम विमान के तैयार होने का मतलब है कि वायुसेना को मौजूदा संसाधनों के साथ काम करना होगा।

स्वदेशीकरण पर बड़े दावे, लेकिन हकीकत क्या है?

HAL ने दावा किया है कि सुखोई-30 विमानों में 62.6 फीसदी स्वदेशी सामग्री होगी। लेकिन महत्वपूर्ण हिस्से और सामग्री अभी भी रूस से आयात किए जाएंगे। इससे पहले सितंबर 2024 में, रक्षा मंत्रालय ने HAL के साथ 26,000 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था, जिसके तहत 240 सुखोई-30 विमानों के लिए इंजन तैयार किए जाएंगे। इन इंजनों का उत्पादन उड़ीसा के कोरापुट संयंत्र में किया जाएगा। लेकिन यहां भी, कच्चे माल का आयात रूस से होगा।

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बता दें कि HAL भारतीय वायुसेना के सुखोई बेड़े को अपग्रेड करने की योजना बना रहा है, जिसमें स्वदेशी “उत्तम रडार” और अन्य आधुनिक उपकरण लगाए जाएंगे। इस पर लगभग 65,000 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है।

सरकार की योजनाओं पर सवाल

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा उत्पादन के दावों और वास्तविकता में बड़ा अंतर है। HAL को सुखोई-30 विमानों का उत्पादन शुरू करने में चार साल का समय लग रहा है, जो कि सरकार की बातों के विपरीत है। विशेषज्ञ सवाल उठ रहे हैं कि जब भारत “मेक इन इंडिया” पर जोर दे रहा है, तो जरूरी कंपोनेंट्स और कच्चे माल के लिए अब भी रूस पर निर्भर क्यों है।

रिपोर्ट के अनुसार, अर्मेनिया जैसे देशों ने भारत से सुखोई-30 विमानों को अपग्रेड करने में मदद मांगी है। लेकिन अगर HAL को अपने उत्पादन में ही चार साल लग रहे हैं, तो भारत की अंतरराष्ट्रीय सहयोग क्षमताओं पर भी सवाल खड़े होते हैं।

विशेषज्ञों ने इस देरी को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है, “जब सरकार आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, तो HAL जैसे संस्थानों को समय पर डिलीवरी और उत्पादन में सक्षम बनाना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम अभी भी रूस और अन्य देशों पर निर्भर हैं। यह किस प्रकार की आत्मनिर्भरता है?”

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि IAF की जरूरतों को पूरा करने में देरी से देश की सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा।

क्या वायुसेना की जरूरतों को पूरा कर पाएगा HAL?

IAF के 12 नए सुखोई-30 विमानों का अनुबंध उन विमानों की भरपाई के लिए है जो हादसों का शिकार हुए हैं। लेकिन यह केवल शुरुआत है। वायुसेना को वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता है। वहीं 2027 से डिलीवरी शुरू होने से वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमताओं पर सीधा असर पड़ेगा।  वइसके अलावा पुराने सुखोई विमानों को अपग्रेड करने का काम भी अभी शुरुआती चरण में है, जिसमें कई साल लग सकते हैं।

क्या हैं विकल्प?

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को HAL जैसे संस्थानों को अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम करने की आवश्यकता है। निजी कंपनियों को बड़े पैमाने पर रक्षा उत्पादन में शामिल करना एक संभावित समाधान हो सकता है। साथ ही, तकनीकी हस्तांतरण और विदेशी सहयोग के माध्यम से उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

India-China Talks: क्या है 2005 का समझौता जिस पर चीन है अटका? और भारत को क्यों नहीं है स्वीकार

India-China Talks: What is the 2005 Agreement China Sticks To, and Why India Disagrees?

India-China Talks: चीन ने हाल ही में बीजिंग में हुई 23वीं भारत-चीन विशेष प्रतिनिधि वार्ता के बाद दावा किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए “छह बिंदुओं पर सहमति” बनाई है। चीन ने इस वार्ता में 2005 के समझौते का हवाला दिया, जिसमें सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करने की बात की गई थी।

India-China Talks: What is the 2005 Agreement China Sticks To, and Why India Disagrees?

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने चीन के इस दावे का कोई उल्लेख नहीं किया। भारतीय बयान में “छह बिंदुओं पर सहमति” का जिक्र नहीं किया गया।

India-China Talks: चीन का दावा और भारत की चुप्पी

चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने सीमा विवाद का “उचित समाधान” खोजने के लिए 2005 के राजनीतिक मार्गदर्शक सिद्धांतों के तहत बातचीत जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है।

हालांकि, भारतीय सूत्रों का कहना है कि 2005 के समझौते का बार-बार उल्लेख करना चीन की रणनीति है, क्योंकि इसमें सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करने की बात कही गई थी, जिसे भारत स्वीकार नहीं कर रहा है।

India-China talks: चीन का दावा ‘छह बिंदुओं पर बनी सहमति’, लेकिन भारत ने साधी चुप्पी!, जानें कहां फंसा है पेंच

2005 का समझौता: क्या कहता है?

2005 में दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता हुआ था। यह समझौता भारत और चीन के बीच दीर्घकालिक साझेदारी को बढ़ाने और सीमा विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने के लिए किया गया था।

समझौते के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  1. सीमा विवाद को शांतिपूर्ण और मित्रतापूर्ण बातचीत के माध्यम से हल किया जाएगा।
  2. सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित नहीं करने दिया जाएगा।
  3. दोनों पक्ष सीमा के अंतिम समाधान तक वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) का सम्मान करेंगे।
  4. सीमा का निर्धारण प्राकृतिक भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर किया जाएगा, जो दोनों पक्षों द्वारा सहमति से तय किया जाएगा।
  5. समझौते के तहत, दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए काम करेंगे।

चीन के 2005 समझौते की ओर लौटने की वजह

सूत्रों के अनुसार, चीन ने 2005 के समझौते का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि यह सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करने की बात करता है। चीन हाल के वर्षों में इस पर जोर दे रहा है, लेकिन भारत ने इसे स्वीकार नहीं किया है।

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि 2020 के पहले की स्थिति बहाल किए बिना द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते। इसका अर्थ है कि जब तक चीन अग्रिम क्षेत्रों से अपने सैनिक वापस नहीं बुलाता, तब तक संबंधों में प्रगति संभव नहीं।

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India-China Talks: समझौते का उल्लंघन और विवाद

2005 के बाद चीन ने कई बार इस समझौते का उल्लंघन किया। रक्षा और सुरक्षा से जुड़े भारतीय सूत्रों का कहना है कि प्रत्येक चीनी घुसपैठ, भले ही वह अस्थायी हो, इस समझौते का उल्लंघन थी।

2013 के देपसांग विवाद, 2017 के डोकलाम गतिरोध और 2020 के गलवान संघर्ष में चीनी घुसपैठ को इस समझौते के उल्लंघन के रूप में देखा गया।

सीमा पर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता

समझौते में यह भी कहा गया कि अंतिम सीमा समाधान होने तक, दोनों पक्षों को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) का सम्मान और पालन करना चाहिए।

समझौते के तहत दोनों देशों के बीच 1993 और 1996 के समझौतों के आधार पर सीमा क्षेत्रों में विश्वास निर्माण उपायों को लागू करने और LAC की स्पष्टता सुनिश्चित करने का प्रावधान था।

अक्साई चिन और अरुणाचल पर मतभेद

समझौते में कहा गया था कि दोनों पक्ष सीमा विवाद का “पैकेज समाधान” खोजने के लिए अपने-अपने रुख में बदलाव करेंगे। भारत अक्साई चिन पर दावा करता है, जबकि चीन अरुणाचल प्रदेश, विशेष रूप से तवांग क्षेत्र, पर अपना अधिकार जताता है।

भारतीय पक्ष ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि चीन को 2020 से पहले की स्थिति में वापस जाना चाहिए, जबकि चीन सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों से अलग करना चाहता है।

चीन की  बुनियादी ढांचे पर आपत्ति

भारतीय रणनीति के तहत 2009 से पूर्वी लद्दाख में बुनियादी ढांचे का निर्माण तेज किया गया। यह गति मोदी सरकार के कार्यकाल में और बढ़ी। चीन इसे 2005 के समझौते का उल्लंघन मानता है।

समझौते में कहा गया कि जब तक सीमा का अंतिम समाधान नहीं हो जाता, दोनों पक्षों को LAC का सम्मान करना चाहिए और शांति बनाए रखनी चाहिए।

नए विवाद की शुरुआत?

हालिया वार्ता में चीन ने 2005 के समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों पक्षों को सीमा विवाद पर “उचित समाधान” खोजने के लिए आपसी समझ और समायोजन करना चाहिए।

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में इन दावों का कोई जिक्र नहीं था, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या दोनों देशों के बीच सहमति वास्तव में बनी है या नहीं।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चल रहा है। 2005 का समझौता इस विवाद को सुलझाने का एक आधार हो सकता था, लेकिन दोनों पक्षों के अलग-अलग दृष्टिकोण और दावों ने इसे और जटिल बना दिया है।

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India-China Talks: China Claims ‘Six-Point Consensus’, India Silent!

India-China talks: चीन ने दावा किया है कि 18 दिसंबर को बीजिंग में हुई भारत-चीन सीमा वार्ता में दोनों पक्षों ने “छह बिंदुओं पर सहमति” बनाई है। चीन के अनुसार, यह सहमति 2005 के मार्गदर्शक सिद्धांतों के आधार पर सीमा विवाद के “स्वीकार्य समाधान” की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने अपने बयान में इस कथित सहमति का कोई उल्लेख नहीं किया।

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India-China talks: चीन का बयान- छह बिंदुओं पर सहमति

चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने 23वें विशेष प्रतिनिधि (SR) स्तर की वार्ता में निम्नलिखित छह बिंदुओं पर सहमति व्यक्त की:

  1. दोनों पक्षों ने सीमा विवाद पर अब तक हुई प्रगति का सकारात्मक मूल्यांकन किया और तय किया कि समाधान के लिए कार्य जारी रहेगा।
  2. दोनों पक्ष 2005 के राजनीतिक मार्गदर्शक सिद्धांतों के तहत निष्पक्ष और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
  3. सीमा प्रबंधन और नियंत्रण नियमों को और बेहतर बनाने, विश्वास निर्माण उपायों को मजबूत करने और सीमा पर स्थायी शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने पर सहमति।
  4. सीमा पार सहयोग और तीर्थयात्राओं को फिर से शुरू करने, नदियों पर सहयोग बढ़ाने और नाथू ला पास पर व्यापार को बढ़ावा देने पर चर्चा।
  5. विशेष प्रतिनिधियों की बैठक तंत्र को मजबूत करने और कूटनीतिक व सैन्य समन्वय को बढ़ावा देने पर सहमति।
  6. अगली विशेष प्रतिनिधि बैठक भारत में आयोजित करने और इसकी तारीख राजनयिक चैनलों के माध्यम से तय करने पर सहमति।

India-China Talks: China Claims ‘Six-Point Consensus’, India Silent!

India-China talks: भारत का रुख- अस्पष्टता बरकरार

भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया, “विशेष प्रतिनिधियों ने सीमा प्रश्न के समाधान के लिए एक निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य ढांचे की तलाश करते हुए समग्र द्विपक्षीय संबंधों के राजनीतिक दृष्टिकोण को बनाए रखने के महत्व को दोहराया।”

भारतीय विदेश मंत्रालय ने चीन के दावे का खंडन नहीं किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि चीनी बयान कोई संयुक्त घोषणा नहीं है। मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा कि संयुक्त बयान तभी जारी किया जाता है जब दोनों पक्ष सभी बिंदुओं पर सहमत होते हैं।

India-China Talks: China Claims ‘Six-Point Consensus’, India Silent!

पांच साल बाद बातचीत

यह 23वीं विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता थी, जो पांच साल के अंतराल के बाद आयोजित की गई। पिछली बार 2019 में यह बैठक भारत में हुई थी।

India-China Disengagement: चीन का दोहरा रवैया, बातचीत में सहमति लेकिन LAC पर सैनिकों का जमावड़ा

इस बार की वार्ता में चीनी पक्ष ने ‘सीमा प्रश्न को द्विपक्षीय संबंधों में उचित स्थान पर रखने’ और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को खोलने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, इस ‘उचित स्थान’ का क्या अर्थ है, इस पर भारतीय बयान में विस्तार से कुछ नहीं कहा गया।

पिछले कदम और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की वार्ता

21 अक्टूबर 2024 को, दोनों देशों ने सीमा के विवादित बिंदुओं पर सैन्य बलों को अलग करने पर सहमति जताई थी। इसके बाद रूस के कज़ान शहर में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई।

इस बैठक में दोनों नेताओं ने विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत को फिर से शुरू करने और द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने पर सहमति जताई।

डोभाल और चीनी उपराष्ट्रपति की मुलाकात

इस वार्ता के बाद अजीत डोभाल ने चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग से भी मुलाकात की। इस बैठक में भी द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा हुई।

2005 का समझौता

चीन ने 2005 के राजनीतिक मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लेख किया है, लेकिन इस समझौते के विशिष्ट बिंदुओं को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है। विशेषज्ञ इसे भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदर्भ मानते हैं।

क्या भारत-चीन संबंध सुधरेंगे?

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और द्विपक्षीय संबंधों में तनाव को कम करने की कोशिशें जारी हैं। हालांकि, दोनों पक्षों के बयान में अंतर और चीनी दावों पर भारत की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। दोनों देशों ने बातचीत के जरिए समाधान की ओर बढ़ने की बात कही है, लेकिन बयानों में अंतर और चीनी दावों पर भारत की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या यह वार्ता भारत-चीन सीमा विवाद को हल करने में एक बड़ा कदम साबित होगी, यह देखना बाकी है।

India-China Disengagement: चीन का दोहरा रवैया, बातचीत में सहमति लेकिन LAC पर सैनिकों का जमावड़ा

India-China Disengagement: Pentagon Report Flags PLA Troop Build-Up on LAC
NSA Ajit Doval and Wang Yi

India-China Disengagement: एक तरफ जहां भारत औऱ चीन के बीच विशेष प्रतिनिधि वार्ता में भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने को लेकर सहमति बन रही हैं, तो दूसरी तरफ चीन अभी भी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर डटा हुआ है औऱ लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है। चीन ने जून 2020 में गलवान घाटी में हुए टकराव के बाद से भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अपनी सैन्य उपस्थिति में कोई कटौती नहीं की है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) अब भी LAC पर अपने बड़े सैन्य जमावड़े और बुनियादी ढांचे को बनाए हुए है।

India-China Disengagement: Pentagon Report Flags PLA Troop Build-Up on LAC
NSA Ajit Doval and Wang Yi

बुधवार को बीजिंग में भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों ने सीमा विवाद सुलझाने और सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने पर सहमति व्यक्त की है। जहां भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भाग लिया। यह 2003 के बाद 23वीं विशेष प्रतिनिधि स्तर की बैठक थी और दिसंबर 2019 के बाद पहली बैठक थी। इस दौरान दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने और सीमा विवाद के लिए उचित और स्वीकार्य समाधान खोजने पर जोर दिया।

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बैठक में यह सहमति बनी कि भारत-चीन संबंध स्थिर और मैत्रीपूर्ण बनाए रखने की आवश्यकता है। बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की। कैलाश मानसरोवर यात्रा, सीमा पार नदियों का डाटा साझा करने और सीमा व्यापार जैसे मुद्दों पर भी बातचीत हुई। अजीत डोभाल ने वांग यी को अगली बैठक के लिए भारत आने का निमंत्रण दिया।

 

India-China Disengagement: Pentagon Report Flags PLA Troop Build-Up on LAC
Pentagan Report

India-China Disengagement: LAC पर चीन की रणनीतिक तैयारी

वहीं, पेंटागन की तरफ से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि “2020 के संघर्ष के बाद से PLA ने अपनी तैनाती या सैनिकों की संख्या में कोई कमी नहीं की है और LAC के साथ कई ब्रिगेड स्तर की तैनाती के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी लद्दाख के डेपसांग और डेमचोक में सैनिकों के पीछे हटने के बावजूद PLA ने लगभग 1.2 लाख सैनिक, टैंक, हॉवित्जर, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और अन्य भारी हथियार LAC पर तैनात किए हुए हैं।

LAC के तीन प्रमुख सेक्टरों—पश्चिमी (लद्दाख), मध्य (उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश), और पूर्वी (सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश)—में PLA के 20 से अधिक कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड्स (CABs) मौजूद हैं। सूत्रों के अनुसार, “कुछ CABs वापस जा चुके हैं, लेकिन अधिकांश अभी भी वहीं तैनात हैं।”

India-China Disengagement: Pentagon Report Flags PLA Troop Build-Up on LAC

India-China Disengagement: भारत-चीन सीमा पर तनाव जारी

पेंटागन की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के वेस्टर्न थिएटर कमांड का प्राथमिक फोकस भारत के साथ सीमा को सुरक्षित करने पर है। “भारत और चीन के बीच सीमा रेखा को लेकर अलग-अलग धारणा ने कई टकराव, बल निर्माण और सैन्य ढांचे के निर्माण को बढ़ावा दिया है,” रिपोर्ट में उल्लेख किया गया।

चीन की वैश्विक सैन्य शक्ति में वृद्धि

हालांकि रिपोर्ट में भारत-चीन सीमा पर केवल संक्षेप में चर्चा की गई है, लेकिन यह चीन की समग्र सैन्य क्षमताओं पर विस्तार से प्रकाश डालती है।

  • चीन ने वैश्विक सैन्य शक्ति प्रदर्शित करने के लिए अपनी क्षमताओं को तेजी से बढ़ाया है, भले ही उसकी अर्थव्यवस्था में गिरावट और भ्रष्टाचार घोटालों का सामना करना पड़ा हो।
  • PLA ने “सैन्य दबाव और प्रलोभन” के जरिए अपने लक्ष्य हासिल करने की बढ़ती इच्छा दिखाई है और वैश्विक भूमिका पर जोर दिया है।

परमाणु क्षमताओं में तेजी से विस्तार

चीन ने अपने परमाणु बल को भी तेजी से आधुनिक और विस्तृत किया है।

  • वर्तमान में चीन के पास 600 से अधिक ऑपरेशनल परमाणु हथियार हैं, और 2035 तक यह संख्या 1,000 से अधिक हो जाएगी।
  • चीन प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइलों से लेकर अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) तक के विकल्प विकसित कर रहा है।

स्पेस और साइबर वॉरफेयर में चीन की बढ़त

रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ऐसी क्षमताओं का विकास कर रहा है, जिससे वह अन्य देशों की अंतरिक्ष तक पहुंच और वहां संचालन को रोक सके। इसमें एंटी-सैटेलाइट मिसाइलें, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और लेजर जैसे डायरेक्टेड एनर्जी सिस्टम शामिल हैं।

  • PLA ने सभी युद्धक्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को आधुनिक बनाने और दक्षता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
  • चीन ने एंटी-सैटेलाइट मिसाइलें, सह-कक्षीय उपग्रह, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, और लेजर जैसी तकनीकों पर काम किया है।
  • PLA ने भूमि, वायु, समुद्र, परमाणु, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और साइबर संचालन के सभी डोमेन में अपनी क्षमताओं को आधुनिक बनाने पर जोर दिया है।

चीन की नौसेना: सबसे बड़ी ताकत

रिपोर्ट के अनुसार, चीन के पास पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है, जिसमें 370 से अधिक युद्धपोत और पनडुब्बियां शामिल हैं। इनमें से 140 से अधिक प्रमुख सतह युद्धपोत हैं।

भारत के लिए चुनौती और तैयारी की जरूरत

पेंटागन की रिपोर्ट और क्षेत्रीय विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की सैन्य गतिविधियां भारत के लिए एक गंभीर सुरक्षा चुनौती हैं। गलवान संघर्ष के बाद से LAC पर चीन का जमावड़ा, भारी हथियारों की तैनाती, और सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का निर्माण भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक संकेत हैं।

क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी सैन्य तैयारी और निगरानी तंत्र को और मजबूत करना होगा। चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और LAC पर जारी तनाव भारत के लिए भविष्य में रणनीतिक और कूटनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।

IAF Pilots Training: भारतीय वायुसेना के पायलट ट्रेनिंग प्रोग्राम में खामियां; सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा

IAF Pilots Training: CAG Flags Deficiencies in Indian Air Force Pilot Training

IAF Pilots Training: भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद के सामने रखी गई अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) के पायलट प्रशिक्षण में गंभीर खामियों को उजागर किया है। 2016-2021 के दौरान किए गए परफॉरमेंस ऑडिट में यह सामने आया कि पुराने इक्विपमेंट्स और बेसिक ट्रेनर एय़रक्राफ्ट्स की समस्याएं वायुसेना के ट्रेनिंग प्रोग्राम में दिक्कतें पैदा कर रही हैं।

IAF Pilots Training: CAG Flags Deficiencies in Indian Air Force Pilot Training

IAF Pilots Training: बेसिक ट्रेनर एय़रक्राफ्ट्स में तकनीकी खामियां

रिपोर्ट में वायुसेना के ‘स्टेज-1’ प्रशिक्षण में इस्तेमाल हो रहे Pilatus PC-7 Mk-II विमान की खामियों को बी बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक

  • 64 विमानों में से 16 (25%) में 2013 से 2021 के बीच 38 बार इंजन ऑयल लीक की घटनाएं दर्ज की गईं।
  • इस मुद्दे को वायुसेना ने विमान निर्माता कंपनी के साथ उठाया है। अगस्त 2023 तक यह मामला जांच के दायरे में है।

IAF Pilots Training: मॉडर्न ट्रेनिंग में कमी

CAG की रिपोर्ट में ‘स्टेज-2’ और ‘स्टेज-3’ पायलट ट्रेनिंग में पुरानी तकनीक और उपकरणों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए।

  • हेलिकॉप्टर पायलट: हेलिकॉप्टर पायलटों को Mi-17 V5 जैसे पुराने हेलिकॉप्टरों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स की कमी है, जिसके कारण ऑपरेशनल यूनिट्स को अतिरिक्त प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है।
  • ट्रांसपोर्ट पायलट: ट्रांसपोर्ट पायलटों को डॉर्नियर-228 जैसे पुराने विमानों पर प्रशिक्षित किया जा रहा है। इन विमानों में आधुनिक कॉकपिट की सुविधाएं नहीं हैं।

सिमुलेटर बेस्ड ट्रेनिंग में कमियां

CAG ने वर्चुअल रियलिटी (VR) सिमुलेटर और फ्लाइंग ट्रेनिंग डिवाइस (FTD) की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए।

  • ये सिमुलेटर केवल प्रोसिजरल ट्रेनिंग देते हैं और रियल टाइम फ्लाइट एक्सपीरियंस का अहसास नहीं कराते।

पायलटों की भारी कमी

रिपोर्ट में वायुसेना में पायलटों की कमी को भी एक बड़ी समस्या बताया गया।

  • 2015 में वायुसेना ने 486 पायलटों की कमी का अनुमान लगाया था।
  • 2016-2021 के बीच हर साल 222 प्रशिक्षु पायलटों की योजना थी, लेकिन वास्तविक भर्ती इससे कम रही।
  • 2021 तक यह कमी बढ़कर 596 पायलटों तक पहुंच गई।

आधुनिकीकरण योजनाओं में देरी का प्रभाव

रिपोर्ट में वायुसेना की आधुनिकीकरण योजनाओं में देरी को भी एक प्रमुख कारण बताया गया।

  • आधुनिक प्रशिक्षण उपकरणों और विमानों की कमी के कारण पायलटों को प्रशिक्षण में अतिरिक्त समय और प्रयास की जरूरत होती है।

ट्रेनिंग में सुधार की जरूरत

CAG ने अपनी रिपोर्ट में वायुसेना को प्रशिक्षण कार्यक्रमों और उपकरणों के आधुनिकीकरण की सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया कि उन्नत तकनीक और आधुनिक प्रशिक्षण मॉडल अपनाने से पायलटों की दक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस रिपोर्ट से वायुसेना को अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इससे न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान होगा, बल्कि वायुसेना भविष्य की जरूरतों के लिए भी तैयार होगी।

Indian Army AI Incubation Centre: बेंगलुरु में शुरू हुआ भारतीय सेना का एआई इनक्यूबेशन सेंटर; रक्षा क्षेत्र में तकनीकी क्रांति की नई शुरुआत

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Indian Army AI Incubation Centre: भारतीय सेना ने बेंगलुरु में भारतीय सेना एआई इनक्यूबेशन सेंटर (IAAIIC) का उद्घाटन किया है। यह कदम सेना के तकनीकी उन्नति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ (COAS), जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस सेंटर का वर्चुअल उद्घाटन किया, जो भारतीय सेना की नई तकनीकों को अपनाने और अपने कर्मियों को एआई से लैस करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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सेना की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक यह इनक्यूबेशन सेंटर सेना की तकनीकी प्रगति के दृष्टिकोण के साथ जुड़ा हुआ है, जिसका उद्देश्य परिचालन क्षमताओं को बढ़ाना, एक AI-तैयार बल तैयार करना, और आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना है। यह सेंटर भारतीय सेना के लिए डेटा-आधारित समाधानों को विकसित करेगा, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया, ऑपरेशनल दक्षता, और AI-आधारित युद्ध की तैयारी में सुधार होगा। इस केंद्र की स्थापना भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के सहयोग से की जा रही है, जो इसकी आधारभूत संरचना और आईटी समर्थन प्रदान करेगा।

Indian Army AI Incubation Centre: तकनीकी उन्नति की ओर कदम

IAAIIC का उद्घाटन भारतीय सेना के तकनीकी विकास की दृष्टि के साथ जुड़ा है। इसका उद्देश्य परिचालन क्षमता को बढ़ाना, एआई-तैयार सेना का निर्माण करना और आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयार रहना है। यह सेंटर डेटा-आधारित समाधान विकसित करेगा, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया, परिचालन दक्षता और एआई-आधारित युद्ध के लिए तैयारी में सुधार होगा।

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भारतीय सेना और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड का सहयोग

यह सेंटर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के सहयोग से स्थापित किया गया है। BEL इस सेंटर को आईटी सपोर्ट और बुनियादी ढांचा प्रदान करेगा। वहीं, इस सेंटर को भारतीय सेना के कर्मियों द्वारा संचालित किया जाएगा।

IAAIIC अकादमिक संस्थानों, स्टार्टअप्स, उद्योग जगत के नेताओं और डोमेन विशेषज्ञों के लिए एक मंच के रूप में काम करेगा, जहां सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वदेशी एआई समाधान विकसित किए जाएंगे।

यह सेंटर कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस, उन्नत निगरानी, निर्णय समर्थन प्रणाली और स्वायत्त प्लेटफॉर्म में एआई के अनुप्रयोगों का पता लगाएगा। सेंटर में सीडैक (C-DAC) का 1-पेटाफ्लॉप सुपरकंप्यूटर मौजूद होगा, जो एआई मॉडलिंग और प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह से सक्षम है।

साथ ही, यह सेंटर स्थानीय प्रतिभा को निखारने और विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम करेगा। IAAIIC भारत के रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा और सेना के लिए एआई विशेषज्ञों की एक नई पीढ़ी तैयार करेगा।

IAAIIC का उद्देश्य भारतीय सेना को बहु-डोमेन युद्ध के लिए तैयार करना है, जिससे इसे रक्षा तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी बनाया जा सके।

AI और सेना का भविष्य

भारतीय सेना ने “डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन” (परिवर्तन का दशक) के तहत उन्नत तकनीकों को अपनाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। IAAIIC इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो न केवल सेना की सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि इसे अत्याधुनिक तकनीकी क्षमताओं के साथ सशक्त बनाएगा।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में, भारतीय सेना का यह कदम यह दर्शाता है कि वह न केवल आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है। यह केंद्र भारत के आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में एक बड़ी छलांग है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर देश की रक्षा क्षमताओं को भी प्रदर्शित करेगा।

आत्मनिर्भर भारत की ओर एक कदम

यह केंद्र राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बैठाते हुए आत्मनिर्भर भारत के विचार को प्रोत्साहित करता है। IAAIIC के माध्यम से, भारत की रक्षा क्षमताओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने और सैन्य एआई अनुप्रयोगों में नवाचार और उत्कृष्टता के नए मानदंड स्थापित करने का लक्ष्य है।