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Tejas Mk1 Fighters: IAF ने पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा पर तैनात किए तेजस लड़ाकू विमान, MiG-21 को अब नहीं मिलेगी लाइफलाइन!

HAL Tejas Mk1A Engine Delivery: HAL receives fourth GE-F404-IN20 engine, moves closer to IAF handover
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Tejas Mk1 Fighters: भारतीय वायु सेना (IAF) ने पाकिस्तान के साथ अपनी पश्चिमी सीमा पर एयर डिफेंस क्षमता को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। IAF ने अपने फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस (FOC) तेजस Mk1 लड़ाकू विमानों को तैनात किया है। यह कदम पुराने हो चुके MiG-21 विमानों की धीरे-धीरे भारतीय वायुसेना से फेज आउट होने की प्रक्रिया के चलते लिया गया है, जिसके तहत 2026 तक MiG-21 विमानों को पूरी तरह से बाहर कर दिया जाएगा।

Tejas Mk1 Fighters: IAF Deploys Tejas on Western Border, MiG-21 Out
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हाल ही में IAF ने तेजस Mk1 FOC फाइटर जेट्स को अपनी दक्षिणी वायु सेना ठिकानों (सुलुर) से पाकिस्तान से सटे वेस्टर्न बॉर्डर पर तैनात किया है। तेजस Mk1 FOC संस्करण अब राफेल डर्बी और वायमपल R-77 (AA-12 एडर) जैसी एडवांस एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस हैं। इन्हें खासकर जमनगर एयरफोर्स स्टेशन पर तैनात किया गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, राजस्थान के बीकानेर स्थित नाल एयरबेस, जहां वर्तमान में मिग-21 का आखिरी ऑपरेशन स्क्वाड्रन तैनात है, उसे जुलाई 2024 में पहले तेजस स्क्वाड्रन बनाया जाना था। लेकिन तेजस की सप्लाई में देरी से इस योजना के क्रियान्वयन में देरी हो रही है। अपग्रेडेड तेजस Mk1A में Active Electronically Scanned Array (AESA) रडार जैसे उपकरण शामिल हैं। इसे मार्च 2025 तक IAF में औपचारिक रूप से शामिल किए जाने की उम्मीद है। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने इन विमानों की कम से कम चार यूनिट्स की सप्लाई का वादा किया है।

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तेजस विमानों की तैनाती MiG-21 विमानों के बाहर होने के साथ ही रणनीतिक तौर पर की गई है, ताकि एयर डिफेंस कवरेज में कोई कमी न हो। तेजस अब उन कई ऑपरेशननल्स रोल्स को निभाएगा, जो पहले MiG-21 विमानों के पास थीं। तेजस Mk1 विमानों की पश्चिमी सीमा पर तैनाती न केवल युद्ध मिशनों में मदद करेगी, बल्कि यह एक प्रतिरोधक का भी काम करेगी।

Tejas Mk1 Fighters: IAF Deploys Tejas on Western Border, MiG-21 Out

इससे पहले खबरें आई थीं कि मिग-21 को और सेवा विस्तार दिया जा सकता है। पहले मिग-21 बायसन को 2025 तक पूरी तरह से वापस लिए जाने की डेडलाइन तय की गई थी। लेकिन अब यह डेडलाइन और आगे खिसक सकती है। भारतीय वायु सेना के सूत्रों ने बताया कि स्वदेशी तेजस एमके1ए फाइटर जेट्स के उत्पादन में देरी के चलते मिग-21 बायसन की फेज आउट करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा निर्मित तेजस एमके1ए, जो अत्याधुनिक तकनीक और मल्टीरोल क्षमताओं से लैस है, मिग-21 का स्थान लेने के लिए तैयार है। परंतु इंजन सप्लाई की समस्या के कारण इसका उत्पादन समयसीमा से पीछे चल रहा है।

1964 में भारत के पहले सुपरसोनिक फाइटर जेट के रूप में शामिल किए गए मिग-21 ने दक्षिण एशिया में हवाई युद्ध के तौर-तरीकों को बदल दिया। 1971 के भारत-पाक युद्ध में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बांग्लादेश के गठन में योगदान दिया। 1999 के कारगिल युद्ध और 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक में इसकी मौजूदगी ने इसे भारत के सैन्य इतिहास का अभिन्न हिस्सा बना दिया।

हालांकि, मिग-21 का इतिहास विवादों से भी अछूता नहीं रहा। इसे “फ्लाइंग कॉफिन” का नाम इसलिए दिया गया क्योंकि इसके फ्लाइट ऑपरेशन के दौरान 400 से अधिक दुर्घटनाएं हुईं, जिसमें कई पायलटों ने अपनी जान गंवाई। बावजूद इसके, मिग-21 की क्षमता और इसकी रणनीतिक उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।

Tejas Mk1 Fighters: वायुसेना की मौजूदा जरूरत

वर्तमान में भारतीय वायुसेना में मिग-21 बायसन के दो स्क्वाड्रन हैं, जिनमें कुल 31 विमान शामिल हैं। जबकि वायुसेना को कुल 42 स्क्वाड्रन जरूरत है, लेकिन फिलहाल यह आंकड़ा केवल 30 के करीब है। ऐसे में तेजस एमके1ए जैसे अत्याधुनिक विमानों की तैनाती बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

मिग-21 बायसन को सेवा विस्तार देने का मतलब यह है कि भारतीय वायुसेना को अपनी ऑपरेशनल कैपेबिलिटी बनाए रखने के लिए अभी भी पुराने विमानों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “मिग-21 ने वर्षों तक हमारी वायुसेना की रीढ़ की हड्डी के रूप में काम किया है। हालांकि अब समय आ गया है कि इसे आराम दिया जाए और अत्याधुनिक विमानों को उसकी जगह दी जाए।”

1971 India-Pakistan War: शिमला समझौते में इंदिरा गांधी ने चली थी तुरुप की चाल! कैसे गिड़गिड़ाए थे जुल्फिकार अली भुट्टो

1971 India-Pakistan War: How Indira Gandhi Outmaneuvered Bhutto at Shimla

1971 India-Pakistan War: भारत ने 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीत लिया था, लेकिन एक बड़ा मौका खो दिया था, जो भविष्य में कश्मीर मुद्दे को सुलझा सकता था। यह कहानी दिसंबर 1971 से शुरू होती है जब भारत और पाकिस्तान के बीच तीसरा युद्ध हुआ था। युद्ध के बाद, भारत के पास 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदी थे और पाकिस्तान के 5000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा था। इस पृष्ठभूमि में, भारत और पाकिस्तान ने 1972 में शिमला में मिलने का फैसला किया ताकि भविष्य के बारे में फैसला लिया जा सके। भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो से मुलाकात की और भारत की मांगों से अवगत कराया।

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1971 India-Pakistan War: भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक समझौता

अंरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और पत्रकार शशांक मट्टू बताते हैं कि इंदिरा गांधी जानती थीं कि शांति वार्ता में भारत मजबूत स्थिति में है। उन्होंने कश्मीर मुद्दे को हल करने के लिए दोनों देशों को अंतिम समझौते पर पहुंचने के लिए दबाव डाला। गांधी ने यह प्रस्ताव रखा कि भारत-पाकिस्तान के बीच जो संघर्ष विराम रेखा थी, उसे अंतर्राष्ट्रीय सीमा बना दिया जाए। इसका मतलब था कि दोनों पक्ष अपने कब्जे वाले कश्मीर के इलाकों को रखेंगे और विवाद को समाप्त कर देंगे।

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भारत की योजना थी कि कश्मीर का समाधान हो जाने के बाद, पाकिस्तान की जमीन वापस की जाए और युद्धबंदी रिहा किए जाएं। इस समझौते के जरिए भारत यह चाहता था कि दोनों देशों के रिश्ते अच्छे हों और दुश्मनी समाप्त हो।

1971 India-Pakistan War: कश्मीर पर समझौते से इंकार

लेकिन जुल्फिकार अली भुट्टो भारत की मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं थे। शिमला सम्मेलन में भारत की तरफ से मौजूद भारतीय राजनयिक केएन बक्शी के मुताबिक भुट्टो ने अपने पुराने आक्रामक रुख के बावजूद भारतीय अधिकारियों से कहा कि वह भारत-पाकिस्तान के संबंधों को सुधारने के लिए तैयार हैं।

भुट्टो ने भारत से यह आग्रह किया कि वह उन्हें “राजनयिक कौशल” दिखाने का मौका दे और एक ऐसी डील पेंश करें, जिसे वह अपनी जनता के बीच स्वीकार कर सकें। भुट्टो ने यह भी कहा कि अगर वह भारत की कश्मीर पर मांगों को स्वीकार कर लेते हैं, तो पाकिस्तान में उनका समर्थन समाप्त हो जाएगा और पाकिस्तान में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।

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शशांक मट्टू के मुताबिक, यह हालात शिमला सम्मेलन को विफल करने की तरफ बढ़ रहे थी, लेकिन फिर अचानक चीजें बदल गईं। केएन बक्शी के मुताबिक, भुट्टो ने इंदिरा गांधी से एक आखिरी बार मुलाकात की और भारत से कश्मीर पर समझौता करने का अनुरोध किया। गांधी ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया और शिमला समझौता 2 जुलाई 1972 को हस्ताक्षरित हुआ।

इस समझौते में भारत और पाकिस्तान ने कश्मीर विवाद को द्विपक्षीय आधार पर हल करने का निर्णय लिया। इसका मतलब था कि इस मुद्दे पर किसी बाहरी हस्तक्षेप (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन या संयुक्त राष्ट्र) की आवश्यकता नहीं होगी। दोनों देशों ने यह तय किया कि संघर्ष विराम रेखा (LoC) को एक नई अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार किया जाएगा।

इसके अलावा, दोनों देशों ने राजनयिक संबंध बहाल करने, युद्धबंदियों को वापस करने और पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र को भारत को लौटाने पर सहमति जताई। साथ ही, दोनों देशों ने एक-दूसरे के खिलाफ दुष्प्रचार खत्म करने पर भी सहमति जताई।

शिमला समझौते की विफलता, भुट्टो ने मोड़ा मुंह

भारत ने शिमला समझौते के जरिए पाकिस्तान को शांति का पैगाम देने की उम्मीद जताई थी, लेकिन यह कुछ समय बाद टूट गई। भुट्टो ने पाकिस्तान के नेताओं के दबाव में आकर शिमला समझौते पर दी गई अपनी प्रतिबद्धताओं से मुंह मोड़ लिया। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अपने आक्रामक प्रचार को फिर से शुरू कर दिया और राजनयिक संबंधों को फिर से स्थापित करने में भी सालों लग गए।

यहां तक कि सबसे महत्वपूर्ण समझौते, यानी कश्मीर विवाद पर द्विपक्षीय समाधान और LoC को अंतर्राष्ट्रीय सीमा में बदलने के मुद्दे पर पाकिस्तान ने समझौता का पालन नहीं किया। भुट्टो ने इंदिरा गांधी को यह भरोसा दिलाया था कि वह धीरे-धीरे पाकिस्तान में आम राय को बदलेंगे और कश्मीर पर भारत के साथ एक समझौते पर पहुंचेंगे। हालांकि, भुट्टो ने धीरे-धीरे अपनी वायदों से मुंह मोड़ लिया और कश्मीर विवाद फिर से एक बड़ा मुद्दा बन गया।

इस समझौते के बाद कई लेखकों ने कहा कि गांधी ने भुट्टो के साथ एक अनौपचारिक रूप से सहमति जताई थी कि संघर्ष विराम रेखा (LoC) को eventually अंतर्राष्ट्रीय सीमा में बदल दिया जाएगा, लेकिन पाकिस्तान ने इस समझौते पर अपनी प्रतिबद्धता से मुंह मोड़ लिया।

क्या भारत ने सही फैसला लिया?

भारतीय दृष्टिकोण से, शिमला समझौते को लेकर बहुत से आलोचनाएं की गई हैं। कुछ लोगों का मानना है कि भारत के पास शिमला में मजबूत स्थिति थी। भारत के पास पाकिस्तान के युद्धबंदी और उसके कब्जे वाले क्षेत्रों का कब्जा था। यदि भारत ने कश्मीर मुद्दे पर एक अंतिम समझौते को मजबूती से लागू किया होता, तो पाकिस्तान को मजबूर होकर यह स्वीकार करना पड़ता और कश्मीर विवाद का समाधान हो जाता।

हालांकि, कुछ इतिहासकारों का कहना है कि भुट्टो कश्मीर पर कोई समझौता स्वीकार नहीं कर सकते थे। इतिहासकार श्रीनाथ राघवन का कहना है कि अगर भारत ने कश्मीर पर समझौता थोप दिया होता, तो पाकिस्तान की सेना भुट्टो को सत्ता से हटा देती। वहीं, एबेंसडर टीसीए राघवन शिमला में भारत के रुख का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान की ज़मीन और 93,000 युद्ध बंदियों को अनिश्चितकाल तक दबाव के रूप में रखना संभव नहीं था। वे चेतावनी देते हैं कि इस तरह की नीति से अमेरिकी हस्तक्षेप हो सकता था। 50 साल बाद भी शिमला समझौता एक विवादित मुद्दा है।

SLINEX 2024: विशाखापत्तनम में शुरू हुआ भारत-श्रीलंका नौसैनिक अभ्यास, समुद्री आतंकवाद का मिल करेंगे मुकाबला

SLINEX 2024: India-Sri Lanka Naval Exercise Begins in Visakhapatnam

SLINEX 2024: भारत और श्रीलंका के बीच द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास SLINEX 2024 (Sri Lanka-India Exercise) का आयोजन 17 से 20 दिसंबर 2024 के बीच विशाखापत्तनम में किया जा रहा है। यह अभ्यास पूर्वी नौसेना कमान (Eastern Naval Command) के तत्वावधान में आयोजित होगा। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करना है। यह अभ्यास ऐसे समय में हो रहा है, जब श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायक भारत के दौरे पर हैं। बता दें कि 17-19 दिसंबर के बीच भारत ने इस क्षेत्र में 800 किमी लंबा नोटाम (Notice to Airmen) भी जारी किया हुआ है।

SLINEX 2024: India-Sri Lanka Naval Exercise Begins in Visakhapatnam

SLINEX 2024: दो चरणों में होगा आयोजन

इस बार SLINEX का आयोजन दो चरणों में किया जाएगा:

  1. हार्बर फेज़ (17-18 दिसंबर): इस चरण में बंदरगाह पर नौसैनिक इकाइयों के बीच पेशेवर और सामाजिक संवाद होंगे।
  2. सी फेज़ (19-20 दिसंबर): समुद्र में संयुक्त सैन्य अभ्यास किए जाएंगे, जिनमें विशेष बलों के संचालन, गन फायरिंग, नेविगेशन अभ्यास, संचार ड्रिल्स, हेलीकॉप्टर संचालन, और सीमैनशिप गतिविधियां शामिल हैं।

अभ्यास में भाग लेने वाली इकाइयां

इस अभ्यास में भारत और श्रीलंका की नौसेनाएं अपनी श्रेष्ठतम इकाइयों के साथ भाग लेंगी:

  • भारत से:
    • INS सुमित्रा – पूर्वी बेड़े का एक नौसैनिक ऑफशोर गश्ती पोत।
    • विशेष बलों (Special Forces) की टीम।
  • श्रीलंका से:
    • SLNS सायुरा – एक ऑफशोर गश्ती पोत, जिस पर विशेष बलों की टीम तैनात होगी।

अभ्यास का महत्व और उद्देश्य

SLINEX की शुरुआत 2005 में हुई थी और तब से यह भारत और श्रीलंका के बीच मजबूत समुद्री सहयोग का प्रतीक बन चुका है। इस अभ्यास का उद्देश्य दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच आपसी समझ को बढ़ाना, सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं को साझा करना और समुद्र में आपसी संचालन क्षमता (Interoperability) को और सशक्त बनाना है।

हर साल इस अभ्यास का दायरा बढ़ता जा रहा है। इस वर्ष का SLINEX 2024 न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच गहरे कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी उजागर करता है। अभ्यास में भाग लेने वाली इकाइयां अपने अनुभवों और तकनीकों को साझा करेंगी, जिससे एक सुरक्षित और नियम-आधारित समुद्री वातावरण को बढ़ावा मिलेगा।

संयुक्त अभ्यास और गतिविधियां

सी फेज़ के दौरान की जाने वाली प्रमुख गतिविधियों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • विशेष बलों के संयुक्त अभ्यास: इसमें आतंकवाद निरोधक संचालन और समुद्री कमांडो ट्रेनिंग पर जोर दिया जाएगा।
  • गन फायरिंग: युद्धाभ्यास के दौरान गनफायरिंग का प्रदर्शन किया जाएगा।
  • संचार और नेविगेशन अभ्यास: आधुनिक समुद्री संचार और नेविगेशन तकनीकों को साझा किया जाएगा।
  • हेलीकॉप्टर संचालन: हवाई और समुद्री सुरक्षा के लिए हेलीकॉप्टरों का समन्वय और संचालन।

भारत और श्रीलंका के रिश्ते और समुद्री सहयोग

भारत और श्रीलंका के बीच भौगोलिक निकटता और सांस्कृतिक समानताओं के कारण लंबे समय से दोस्ताना रिश्ते हैं। SLINEX के जरिए दोनों देशों की नौसेनाएं मिलकर समुद्री सुरक्षा चुनौतियों का सामना करती हैं और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में योगदान देती हैं।

इस बार का SLINEX, विशाखापत्तनम जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान पर आयोजित हो रहा है, जो पूर्वी नौसेना कमान का मुख्यालय है। यह स्थान भारत के समुद्री हितों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है और भारतीय नौसेना के लिए पूर्वी हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का एक मंच है।

SLINEX 2024 इस बात का भी उदाहरण है कि कैसे भारत अपनी “पड़ोसी पहले” (Neighbourhood First) नीति के तहत अपने पड़ोसी देशों के साथ सामरिक और सुरक्षा सहयोग को प्राथमिकता देता है।

बढ़ेगा विश्वास और सहयोग

SLINEX का उद्देश्य सिर्फ सैन्य अभ्यास तक सीमित नहीं है। यह दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ाने का एक बड़ा मंच भी है। यह अभ्यास क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा में योगदान देने के साथ-साथ समुद्री आतंकवाद, मानव तस्करी और अवैध मछली पकड़ने जैसे खतरों से निपटने के लिए रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करता है।

इस अभ्यास का उद्घाटन समारोह 17 दिसंबर 2024 को आयोजित किया जाएगा, जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समारोह द्विपक्षीय सहयोग की भावना को दर्शाएगा और SLINEX 2024 की औपचारिक शुरुआत करेगा।

SLINEX 2024 से भारत और श्रीलंका की नौसेनाओं को नई चुनौतियों का सामना करने और आधुनिक समुद्री युद्ध के तरीकों को समझने का अवसर मिलेगा। यह अभ्यास न केवल सुरक्षा की दृष्टि से बल्कि दोनों देशों के लिए आर्थिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

India-Azerbaijan: अजरबैजान खरीदना चाहता था ‘लो क्वॉलिटी’ भारतीय हथियार, लेकिन दोस्त आर्मेनिया को देखते हुए भारत ने दिया ये जवाब

India-Azerbaijan: Baku sought Indian weapons, India prioritized Armenia ties

India-Azerbaijan: भारत और अज़रबैजान के संबंधों में हाल ही में एक दिलचस्प मोड़ आया है। अज़रबैजान का अपने पड़ोसी और प्रतिद्वंद्वी देश आर्मेनिया के साथ लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। वहीं सूत्रों के मुताबिक हाल ही में अजरबैजान ने मध्य पूर्व के एक दोस्ताना देश के जरिए भारत को हथियार बेचने का प्रस्ताव दिया। लेकिन भारत ने अजरबैजान की इस पेशकश पर ध्यान नहीं दिया और उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। बता दें कि भारत की तरफ से आर्मेनिया को हथियार बेचे जाने के बाद अजरबैजान सार्वजनिक तौर पर भारतीय हथियारों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए आलोचना की थी, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि ये हथियार सैन्य संतुलन पर कोई खास असर नहीं डालते और अजरबैजान आसानी से इनका मुकाबला कर सकता है।

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India-Azerbaijan: भारत का स्पष्ट रुख

सूत्रों के मुताबिक, अज़रबैजान ने सीधे तौर पर भारत से यह प्रस्ताव नहीं रखा। इसके बजाय, एक तीसरे मित्र देश के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि अगर भारत अपने स्वदेशी हथियारों को निर्यात करने के लिए एक दीर्घकालिक साझेदार की तलाश में है, तो वह अज़रबैजान को सहयोगी बना सकता है। अजरबैजान ने विशेष रूप से भारतीय निर्मित तोपों और गोलों में रुचि दिखाई है। यह रुचि पाकिस्तान से JF-17 ब्लॉक III फाइटर जेट्स की हालिया खरीदारी के बावजूद आई है।

हालांकि, भारत ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और स्पष्ट कर दिया कि उसके द्विपक्षीय संबंधों और प्राथमिकताओं को तय करने में किसी तीसरे देश की भूमिका नहीं हो सकती।

India-Azerbaijan: आर्मेनिया के साथ भारत के मजबूत रक्षा संबंध

आर्मेनिया ने हाल के वर्षों में अपने सशस्त्र बलों को मजबूत करने के लिए भारत से बड़ी मात्रा में हथियार और रक्षा प्रणालियां खरीदी हैं। इनमें रॉकेट लॉन्चर, तोपखाने, गोला-बारूद, स्नाइपर राइफलें और एंटी-टैंक मिसाइलें शामिल हैं।

सूत्रों के अनुसार, आर्मेनिया भारत से एस्ट्रा मिसाइलें खरीदने की संभावना पर भी विचार कर रहा है ताकि अपने सुखोई एसयू-30 लड़ाकू विमान बेड़े को मजबूत किया जा सके।

भारत के लिए आर्मेनिया सिर्फ एक रक्षा साझेदार नहीं है, बल्कि इसे क्षेत्र में एक राजनीतिक सहयोगी भी माना जाता है। आर्मेनिया ने जम्मू-कश्मीर पर भारत के रुख का हमेशा समर्थन किया है, जिससे दोनों देशों के संबंध और मजबूत हुए हैं।

अजरबैजान के तुर्किये और पाकिस्तान से गहरे रिश्ते

इसके विपरीत, अज़रबैजान तुर्किये और पाकिस्तान के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के लिए जाना जाता है। 2017 से, इन तीन देशों ने अपने त्रिपक्षीय सहयोग को गहरा करने के प्रयास किए हैं। हाल ही में 2023 में, अज़रबैजान ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का भी समर्थन किया।

वहीं अजरबैजान अपनी रक्षा जरूरतों के लिए तुर्की और इज़राइल पर निर्भर किया है, जहां तुर्की एडवांस ड्रोन और UAV तकनीक देता है तो इज़राइल विभिन्न प्रकार के हथियार प्रणाली आपूर्ति करता है। हालांकि, हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों, जिसमें इज़राइल का गाजा में उलझना जिसके चलते हथियारों के निर्यात में कमी आना, जैसी वजहों ने अजरबैजान को सैन्य उपकरणों की खरीदारी के लिए दूसरे बाजार की तरफ रुख करने के लिए मजबूर कया है।

नागोर्नो-कराबाख विवाद

अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच संघर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद शुरू हुआ। नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र में रहने वाले जातीय आर्मेनियाई लोगों ने खुद को “आर्टसाख गणराज्य” घोषित किया, जिसे दुनिया के किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी, यहां तक कि खुद आर्मेनिया ने भी नहीं।

इस विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच दो बड़े युद्ध हो चुके हैं। 2020 के संघर्ष में अज़रबैजान ने तुर्किये से खरीदे गए ड्रोन और अन्य अत्याधुनिक हथियारों का जमकर इस्तेमाल किया। सितंबर 2023 में, अज़रबैजान ने एक सैन्य अभियान के जरिए नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र पर फिर से कब्जा कर लिया।

आर्थिक और व्यापारिक संबंध: अज़रबैजान बनाम आर्मेनिया

राजनीतिक और कूटनीतिक संबंधों के इतर, अज़रबैजान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार है। 2023 में, दोनों देशों के बीच व्यापार 1.435 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो दक्षिण काकेशस क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा आर्थिक संबंध है।

भारत अज़रबैजान का सातवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और अज़रबैजान के कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है। भारतीय तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) की सहायक कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (OVL) ने हाल ही में अज़रबैजान के तेल क्षेत्रों और पाइपलाइनों में अपना निवेश बढ़ाया है।

इसके विपरीत, 2023 में भारत और आर्मेनिया के बीच व्यापार मात्र 134 मिलियन डॉलर था, जो अज़रबैजान के साथ व्यापार की तुलना में दसवें हिस्से के करीब है।

अज़रबैजान में भारतीय पर्यटकों की बढ़ती संख्या

अज़रबैजान भारतीय पर्यटकों के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य बन गया है। 2023 में, लगभग 1,17,000 भारतीयों ने अज़रबैजान का दौरा किया। 2024 के पहले 10 महीनों में यह संख्या बढ़कर 2,01,000 हो गई।

इस बढ़ती लोकप्रियता के पीछे वीजा नियमों में ढील और भारत से अज़रबैजान के लिए सीधी उड़ानों की उपलब्धता है। वर्तमान में, दिल्ली और मुंबई से बाकू के लिए हर हफ्ते 14 सीधी उड़ानें संचालित होती हैं। इसके विपरीत, भारत और आर्मेनिया के बीच कोई सीधी उड़ान उपलब्ध नहीं है।

भारत ने अज़रबैजान के हथियार खरीदने के प्रस्ताव को नजरअंदाज कर यह संदेश दिया है कि वह अपनी विदेश नीति और रक्षा साझेदारियों को लेकर सतर्क और स्वतंत्र है। आर्मेनिया के साथ भारत के बढ़ते संबंध न केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित हैं, बल्कि यह एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी की ओर भी इशारा करते हैं। फ्रांस और ग्रीस जैसे देशों के साथ आर्मेनिया का सहयोग भारत के लिए क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

IMA Passing Out Parade: आर्मी मेस का ‘रसोइया’ बना सेना में अफसर, धोबी के बेटे ने लिखी संघर्ष की अनूठी कहानी

IMA Passing Out Parade: Army Mess Cook and Washerman Son become Officer
Lt Rahul Verma and Lt Raman Saxena

IMA Passing Out Parade: इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) के पासिंग आउट परेड में चमचमाते बूट और मेडलों के पीछे कई प्रेरक कहानियां भी छुपी हुती हैं। ये कहानियां उन मेधावी छात्रों की होती हैं, जो बेहद गरीब तबके से उठ कर अपनी मेहनत और समघर्ष के बल पर यहां तक पहुंचे हैं। इस बार भी इस समारोह में ऐसी कई संघर्ष गाथाएं थीं। इनमें से दो युवा अधिकारी, लेफ्टिनेंट राहुल वर्मा और लेफ्टिनेंट रमन सक्सेना की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

IMA Passing Out Parade: Army Mess Cook and Washerman Son become Officer
Lt Rahul Verma and Lt Raman Saxena

IMA Passing Out Parade: कुक से अफसर तक का सफर

आगरा के रमन सक्सेना की कहानी बेहद प्रेरणादायक है। रमन का भारतीय सेना में भर्ती होने का रास्ता किसी भी अन्य अधिकारी से बिल्कुल अलग था। उनका सफर एक होटल के रसोईघर से शुरू हुआ था। 2007 में होटल मैनेजमेंट की डिग्री लेने के बाद, रमन ने होटल में रसोइये के तौर पर काम करना शुरू किया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 2014 में उन्हें इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) में जनरल कैडेट्स (GC) मेस में रसोइये (कुक) के तौर पर नियुक्ति मिली। यहीं पर उनकी जिंदगी का अहम मोड़ आया।

रमन बताते हैं, “जब मैं होटल में काम कर रहा था, तब मेरे पिता ने मुझे भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया।” उसी दौरान, रमन ने पहली बार सेना में अफसर बनने का सपना देखा। उन्हें मेस में खाने परोसते हुए वहां के गेस्ट और अफसरों को देख कर एक नई प्रेरणा मिली। वे कहते हैं, “यह मुझे बहुत प्रेरित करता था। मैंने तय किया कि मुझे एक दिन उनमें से एक बनना है।”

हालांकि, रमन का सफर इतना भी आसान नहीं था। उन्होंने पहले दो प्रयासों में वे ये परीक्षा पास नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी कोशिश जारी रखी। “स्पेशल कमीशन ऑफिसर (SCO) स्कीम के तहत जूनियर कमीशन अधिकारियों को 28 से 35 साल की उम्र में अफसर बनने का अवसर मिलता है,” रमन बताते हैं। “34 साल की उम्र में, मैंने तीसरे प्रयास में सफलता हासिल की।”

रमन की सफलता के पीछे उनके पिता, जो एक सेवानिवृत्त कैप्टन रहे हैं, का सपोर्ट था। उन्होंने 30 साल तक सेना में सेवा दी थी। इसके अलावा, उनके वरिष्ठ अधिकारी कर्नल विक्रम सिंह का मार्गदर्शन भी बहुत महत्वपूर्ण था। कर्नल विक्रम सिंह ने हमेशा रमन को अपने सपने को पूरा करने के लिए सही दिशा दिखाई।

IMA Passing Out Parade: धोबी के बेटे से अफसर बनने तक का संघर्ष

दूसरी तरफ, राजस्थान के कोटा जिले के राहुल वर्मा की कहानी भी उतनी ही प्रेरणादायक है। राहुल के पिता धोबी व्यवसाय से जुड़े हैं। उनका बचपन घर के उस छोटे से कोने में बीता, जहां कपड़े प्रेस किए जाते थे। वहीं से उन्होंने अपनी मेहनत और संघर्ष से अपने सपनों को पंख दिए। उनके पिता हमेशा उन्हें यह कहते थे, “तुम ऐसा पेशा चुनो, जिससे सम्मान मिले।” राहुल के लिए, यह शब्द उनके जीवन का मूल मंत्र बने।

राहुल बताते हैं, “मेरे पिता मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। वह हमेशा कहते थे कि अब यह जरूरी नहीं कि केवल राजा का बेटा ही राजा बने, बल्कि मेहनत करने वाला कोई भी व्यक्ति शिखर तक पहुंच सकता है।” उनके पिता के इन शब्दों ने राहुल को अपने सपनों की ओर आगे बढ़ने की शक्ति दी।

राहुल ने घर की परिस्थितियों के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रखी। “मैं रात को एक बल्ब की हल्की सी रोशनी में पढ़ाई करता था,” राहुल बताते हैं। घर में पैसे की कमी और अन्य कठिनाइयों के बावजूद राहुल ने अपनी मेहनत और लगन से इस मुश्किल सफर को पार किया।

दोनों की प्रेरक यात्रा

रमन सक्सेना और राहुल वर्मा दोनों ही उस जगह खड़े थे, जहां पहुंचना हर युवा का सपना होता है — भारतीय सेना में अफसर बनना। लेकिन इन दोनों के लिए यह यात्रा आसान नहीं थी। एक तरफ रमन ने होटल मैनेजमेंट की डिग्री लेकर सेना के कैटरिंग विभाग में काम करते हुए अपनी मंजिल पाई, वहीं दूसरी तरफ राहुल ने अपने पिता की प्रेरणा से उस छोटे से कमरे में अपने सपनों को पंख दिए, जहां कपड़े प्रेस किए जाते थे।

इन दोनों की कहानियाँ यह साबित करती हैं कि अगर मेहनत और समर्पण से किसी काम को किया जाए, तो किसी भी मुश्किल रास्ते से सफलता प्राप्त की जा सकती है। रमन और राहुल की मेहनत ही उनके सपनों को साकार करने का कारण बनी।

IMA Passing Out Parade: 100 रुपये रोज कमाने वाले दैनिक मजदूर के बेटे ने लिखी सफलता की कहानी, भारतीय सेना में अफसर बना काबिलन

IMA Passing Out Parade: Daily Wage Labourer's Son Lt Kabilan V Becomes Indian Army Officer
Lt Kabilan V

IMA Passing Out Parade: भारतीय सैन्य अकादमी के पासिंग आउट परेड हर बार संघर्ष की कहानियों से भरपूर होती है। जहां परेड में इस बार गर्व से भरे हुए परिवारों और सैनिकों के कदमों की गूंज सुनाई दे रही थी, तो परेड में एक कहानी ऐसी थी, जो हर किसी के दिल को छू गई। यह कहानी है लेफ्टिनेंट काबिलन वी (Lt Kabilan V) की, जो तमिलनाडु के एक छोटे से गांव से हैं और जिन्होंने भारतीय सेना में अफसर बनने का सपना साकार किया।

IMA Passing Out Parade: Daily Wage Labourer's Son Lt Kabilan V Becomes Indian Army Officer
Lt Kabilan V

काबिलन के पिता वेटरिसेल्वम पी, जो एक दैनिक मजदूर के तौर पर काम करके रोजाना 100 रुपये ही कमा पाते थे। लेकिन अब वे व्हीलचेयर पर हैं। तीन महीने पहले एक भारी काम करते समय आए स्ट्रोक के कारण उनका शरीर आंशिक रूप से लकवाग्रस्त हो गया था। उनके चेहरे पर गर्व और खुशी की चमक साफ दिखाई दे रही थी। उनके पास पनमैयम्मल की एक तस्वीर रखी थी, जो काबिलन की मां की थी, जिनका तीन साल पहले कैंसर और कोविड-19 के कारण निधन हो गया था।

काबिलन की यात्रा बेहद कठिन रही है। “मैं कई बार असफल हुआ,” उन्होंने कहा, और उनके चेहरे पर जो मुस्कान थी, उससे यह एहसास हुआ कि उन असफलताओं को उन्होंने अपने संघर्ष से जीत लिया था। “मुझे सेना में जाना था, और मैंने वह किया। यह सिर्फ मेरी व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि उन सभी की सफलता है जो भारतीय सेना में शामिल होने का सपना देखते हैं। अगर एक ऐसा व्यक्ति, जो एक दैनिक मजदूर का बेटा है, 100 रुपये रोज कमाता था, वह यह कर सकता है, तो कोई भी इसे कर सकता है।”

काबिलन का जन्म तमिलनाडु के मेलुर गांव में हुआ था। उन्होंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की और फिर अन्ना विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की। बचपन से ही काबिलन का सपना था कि वह भारतीय सेना में जाएं, लेकिन हर बार वह असफल होते गए। उन्होंने एनसीसी से लेकर ग्रेजुएट एंट्री तक के हर रास्ते पर आवेदन किया, लेकिन हर बार उनका सपना अधूरा रह गया। फिर भी, काबिलन हार नहीं माने और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे।

“साहस मुझे प्रेरित करता है,” काबिलन ने अपनी यात्रा को इस शब्दों में समेटा। उनका साहस ही था, जिसने उन्हें उनके सपने को पूरा करने की दिशा दी। लेकिन साहस ही उनकी एकमात्र ताकत नहीं था। काबिलन ने अपनी मां के निधन के बाद अपने परिवार की जिम्मेदारी ली। उनका छोटा भाई सिविल सेवा की तैयारी कर रहा था और उनके पिता की सेहत भी गिर रही थी। ऐसे में काबिलन ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ एक कठिन नौकरी भी की। वह राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) के डेल्टा स्क्वाड में जलनाविक पर्यवेक्षक के रूप में काम करते थे।

काबिलन के मार्गदर्शक, सब लेफ्टिनेंट (रिटायर्ड) सुगल ईसान का कहना है, “उन्हें अपने परिवार का पालन-पोषण करते हुए अपने सपने को भी पूरा करना था।” “चेन्नई और कन्याकुमारी में आई बाढ़ के दौरान, काबिलन हमारे बचाव दल का हिस्सा थे। उन्होंने अन्य स्वयंसेवकों के साथ मिलकर लगभग 200 जानों को बचाया।”

काम और पढ़ाई की दोहरी जिम्मेदारी का बोझ काबिलन पर बहुत भारी हो सकता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। “मैं सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक काम करता था, और फिर शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक, सेना में भर्ती परीक्षा की तैयारी करता था,” उन्होंने कहा। उनका यह संघर्ष और बलिदान आखिरकार रंग लाया। आज उनके कंधे पर पैरा रेजिमेंट का चिन्ह है, जो उनके अगले चरण की शुरुआत का प्रतीक है। “सीखो, असफल हो, और फिर बेहतर असफल हो, तुम्हें सफलता मिलेगी। तुम्हारी दृढ़ता और समर्पण ही सफलता के दरवाजे तक पहुंचाएंगे,” काबिलन ने कहा।

काबिलन की यह कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो मानते हैं कि जीवन में परिस्थितियां या सामाजिक स्थिति मायने रखती हैं। काबिलन ने यह साबित कर दिया कि अगर किसी के पास सच्ची मेहनत और समर्पण हो, तो कोई भी मुश्किल रास्ता कठिन नहीं होता।

NSA China Visit: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल जाएंगे चीन, LAC पर सीमा विवाद सुलझाने के लिए अहम वार्ता

NSA China Visit: Ajit Doval to Visit China for Key LAC Border Talks

NSA China Visit: भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोवाल 17-18 दिसंबर को चीन का दौरा करेंगे, जहां वे चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ विशेष प्रतिनिधि स्तर (SR) की महत्वपूर्ण वार्ता करेंगे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य भारत-चीन सीमा पर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) को लेकर चल रही तनावपूर्ण स्थिति को सुलझाना है। यह बैठक भारत-चीन के बीच SR स्तर की वार्ता फिर से शुरू होने की शुरुआत है, जिसकी सहमति प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कज़ान बैठक के दौरान हुई थी। यह वार्ता 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद पहली बार हो रही है, और पिछले पांच वर्षों में पहली ऐसी बैठक होगी।

NSA China Visit: Ajit Doval to Visit China for Key LAC Border Talks

अजीत डोवाल का यह दौरा चीन और भारत के बीच LAC पर सीमा की स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि इससे पहले अक्टूबर में दोनों देशों के बीच पैट्रोलिंग और सीमा पर प्रबंधन के लिए एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत, दोनों देशों ने LAC पर शांति बनाए रखने के लिए कुछ नए कदम उठाने पर सहमति जताई थी।

NSA China Visit: 2020 से लगातार बढ़ रहा था तनाव

भारत और चीन के बीच LAC पर तनाव 2020 से बढ़ने लगा था, जब चीन की सेना ने पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी थीं। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें कई सैनिकों की जान गई थी। गलवान घाटी में हुई इस घटना के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई और सीमा पर सैन्य गतिरोध गहरा गया।

2019 में आखिरी बार विशेष प्रतिनिधि स्तर पर वार्ता हुई थी, जब अजीत डोवाल ने भारतीय पक्ष का नेतृत्व किया था और वांग यी ने चीनी पक्ष का। उस समय दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर सहमति बनी थी, लेकिन इसके बाद सीमा पर तनाव बढ़ने लगा था।

विशेष प्रतिनिधि वार्ता का उद्देश्य

इस बार की विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता का मुख्य उद्देश्य LAC की सीमाओं को और स्पष्ट करना है। सूत्रों के अनुसार, यह वार्ता LAC पर वर्तमान स्थिति के विस्तार और साफ-साफ पहचान पर केंद्रित होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दोनों देशों के सैनिकों के बीच किसी भी तरह की गलतफहमी या टकराव की स्थिति न बने। इसके अलावा, बातचीत का लक्ष्य भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एक स्थिर और दीर्घकालिक समाधान ढूंढना भी है।

यह बैठक दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य करने और विश्वास बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके परिणामस्वरूप, दोनों देशों के उच्च अधिकारियों के बीच अगले कोर कमांडर-स्तरीय बैठक की तारीख तय हो सकती है, जो सीमा पर पैट्रोलिंग और बफर जोन के मुद्दों पर केंद्रित होगी।

भारत-चीन के बीच बढ़ी कूटनीतिक बातचीत

इससे पहले, 3 दिसंबर को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यह बयान दिया था कि भारत चीन के साथ द्विपक्षीय संवादों के माध्यम से सीमा विवाद को हल करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि भारत चाहता है कि दोनों देशों के बीच एक ऐसा समझौता हो, जो न्यायपूर्ण, उचित और आपसी स्वीकृति पर आधारित हो। भारत ने यह भी साफ किया है कि वह किसी भी स्थिति में सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए चीन के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।

भारत और चीन के बीच 2020 से अब तक कई सैन्य और कूटनीतिक प्रयास किए गए हैं, ताकि LAC पर तनाव को कम किया जा सके। इनमें दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों की बैठकों के अलावा, विभिन्न स्तरों पर कूटनीतिक वार्ताएं भी शामिल हैं। अब, अजीत डोवाल का यह आगामी दौरा दोनों देशों के लिए सीमा विवाद के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर है।

आने वाले समय में क्या हो सकता है?

विशेष प्रतिनिधि वार्ता के बाद, दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक बातचीत का एक नया दौर शुरू हो सकता है। इस बातचीत में न केवल सीमा पर विवादों को हल करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास को फिर से स्थापित करने की भी कोशिश की जाएगी। इसके अलावा, यह वार्ता चीन और भारत के रिश्तों में एक नया अध्याय लिखने का मौका भी हो सकती है।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए यह वार्ता एक महत्वपूर्ण अवसर है, क्योंकि इससे दोनों देशों के रिश्तों में सुधार हो सकता है और सीमा पर शांति बनी रह सकती है। यह वार्ता भारतीय सैनिकों और नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को और मजबूती मिलेगी।

1971 War Surrender Painting: रक्षा समाचार की खबर का असर! ‘गायब’ हुई पेंटिंग को मिली नई जगह, अब यहां देख सकेंगे लोग

1971 War Surrender Painting: News Impact! Gets New Placement at Manekshaw Centre

1971 War Surrender Painting: हाल ही में भारतीय सेना के प्रमुख जनरल की ऑफिस के बैकग्राउंड से एक ऐतिहासिक पेंटिंग जो 1971 की जंग में पाकिस्तान सेना के सरेंडर की थी, उसे हटा लिया गया था। रक्षा समाचार डॉट कॉम ने इस मुद्दे को मुरजोर से उठाया था। लेकिन अब बड़ी खबर सामने आई है। पूर्व सैन्य अधिकारियों और रक्षा समाचार.कॉम के सवाल उठाने के बाद 16 दिसंबर को विजय दिवस के मौके पर उस एतिहासिक पेंटिंग को नई जगह मिल गई है। उस पेंटिंग को अब मानेकशॉ सेंटर में लगाया गया है। यह सेंटर 1971 की जंग के हीरो फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के नाम पर समर्पित है। बता दें कि यह तस्वीर भारतीय सेना की एक बड़ी एतिहासिक जीत की याद दिलाती रही है, जब 93 हजार से ज्यादा पाकिस्तान सेना ने पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश के ढाका में भारतीय सेना के सामने बिना शर्त समर्पण किया था।

1971 War Surrender Painting: News Impact! Gets New Placement at Manekshaw Centre

इस घटना ने सभी का ध्यान उस समय खींचा था, जब सेना प्रमुख समेत तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने नेपाली सेना के आर्मी चीफ से मुलाकात की थी, जो इन दिनों 14 दिसंबर तक भारत दौरे पर थे। उस समय यह तस्वीर दीवार से नादारद दिखी और उसके जगह एक दूसरे फोटो लगी थी। यह चित्र 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान की सेना के समर्पण के दौरान लिया गया था, जो भारतीय सेना की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी जाती है।

1971 War Surrender Painting: News Impact! Gets New Placement at Manekshaw Centre

1971 War Surrender Painting: सेना के पूर्व अधिकारियों ने जताई थी गहरी चिंता

बता दें कि तस्वीर हटाने के फैसले को लेकर सेना की तरफ से कोई पूर्व जानकारी साझा नहीं की गई थी। जिसके बाद रक्षा विशेषज्ञों औऱ सेना के पूर्व अधिकारियों ने गहरी चिंता जताई थी। कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि इस चित्र को हटाने के पीछे कोई विशेष विचारधारा हो सकती है, जो भारतीय सेना के ऐतिहासिक और सैन्य गौरव को नकारने की कोशिश कर रही है। बता दें कि 9 दिसंबर तक यह फोटो सेना प्रमुख के दफ्तर की दीवार पर मौजूद थी, जिसमें वे उस दिन भारतीय मिलिट्री हिस्ट्री पर किताबें लिखने वाले कुछ लेखकों से मिले थे। उसके बाद Indian Army ADGPI की तरफ से एक्स अकाउंट पर 13 दिसंबर को दो फोटो शेयर की गईं, जिसमें यह बताने की कोशिश की गई कि दोनों फोटो अभी भी सेना अध्यक्ष के ऑफिस में हैं।

1971 War Surrender Painting: News Impact! Gets New Placement at Manekshaw Centre

Indian Army: सेना प्रमुख के दफ्तर की दीवार से गायब हुई यह एतिहासिक फोटो, पूर्व अफसर बोले- क्या भारतीय सेना की गौरवमयी जीत की अनदेखी कर रही सरकार?

क्या लिखा है पोस्ट में

वहीं आज जब पूरा राष्ट्र 1971 की जंग में भारत की जीत को लेकर मनाए जाने वाले कार्यक्रम विजय दिवस को सेलिब्रेट कर रहा है, तो इस वर्ष इस गौरवशाली दिन को और खास बनाने के लिए, भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों और जवानों ने मानेकशॉ सेंटर, नई दिल्ली में 1971 युद्ध के सरेंडर की ऐतिहासिक पेंटिंग को एक प्रतिष्ठित स्थान पर स्थापित किया है। सेना की तरफ से जारी पोस्ट में इसकी जानकारी दी गई है।

विजय दिवस के मौके पर, जनरल उपेन्द्र द्विवेदी COAS और  AWWA की प्रेसिडेंट सुनीता द्विवेदी के साथ , 1971 की आत्मसमर्पण पेंटिंग को उसके सबसे उपयुक्त स्थान, मानेकशॉ सेंटर में स्थापित किया। यह सेंटर 1971 युद्ध के आर्किटेक्ट और नायक, फील्ड मार्शल सम मानेकशॉ के नाम पर है। इस अवसर पर भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी और सेवानिवृत्त अधिकारी उपस्थित थे।

यह पेंटिंग भारतीय सशस्त्र बलों की सबसे बड़ी सैन्य जीतों में से एक का प्रतीक है और भारत की न्याय और मानवता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। मानेकशॉ सेंटर में इसे प्रतिष्ठापित करने के बाद, यहां आने वाले गणमान्य व्यक्तियों और दर्शकों को इसका दर्शन करने का अवसर मिलेगा।

Indian Army: Historic Photo Disappears from Army Chief's Office Wall, Former Officers Question if Government is Overlooking Indian Army's Glorious Victory

किसने बनाई है नई पेंटिंग

सेना के सूत्रों ने कहा कि नई पेंटिंग, ‘कर्म क्षेत्र– कर्मों का क्षेत्र’, जिसे 28 मद्रास रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने बनाई है। इस पेंटिंग में सेना को एक “धर्म के रक्षक” के रूप में दर्शाया गया है, जो केवल राष्ट्र का रक्षक नहीं बल्कि न्याय की रक्षा और देश के मूल्यों की सुरक्षा के लिए लड़ती है। यह पेंटिंग बताती है कि सेना तकनीकी रूप से कितनी एडवांस हो गई है। पेंटिंग बर्फ से ढकी पहाड़ियां पृष्ठभूमि में दिख रही हैं, दाएं ओर पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील और बाएं ओर गरुड़ा और श्री कृष्ण की रथ, साथ ही चाणक्य और आधुनिक उपकरण जैसे टैंक, ऑल-टेरेन व्हीकल्स, इन्फैंट्री व्हीकल्स, पेट्रोल बोट्स, स्वदेशी लाइट कॉम्बेट हेलीकॉप्टर्स और एच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर्स दिखाए गए हैं।

Indian Army: Historic Photo Disappears from Army Chief's Office Wall, Former Officers Question if Government is Overlooking Indian Army's Glorious Victory

1971 युद्ध की अहमियत

दूसरी तरफ, एयर वाइस मार्शल (रिटायर्ड) मनमोहन बहादुर ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि 1971 का युद्ध भारत के रक्षा इतिहास में सबसे बड़ी जीत थी। उन्होंने यह भी कहा कि यह युद्ध भारत के एकीकृत राष्ट्र के रूप में पहली सैन्य विजय का प्रतीक है, और इस चित्र को हटाना भारतीय सेना की इस महान उपलब्धि को नजरअंदाज करना है। उनका कहना था कि यह चित्र कई देशों के सैन्य प्रमुखों और गणमान्य व्यक्तियों के लिए भारत की सामरिक ताकत और उसकी सफलता का प्रतीक था।

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1971 की समर्पण तस्वीर का महत्व

भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग ने कहा कि यह चित्र पिछले 1000 सालों में भारत की पहली बड़ी सैन्य विजय का प्रतीक था। यह न केवल सैन्य दृष्टिकोण से बल्कि भारतीय एकता और शक्ति का प्रतीक भी था। उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग इस चित्र को हटाने का कारण बने हैं, वे भारतीय सेना के गौरव को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं, और इस कदम के पीछे एक विशेष विचारधारा काम कर रही है जो भारत के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास को बढ़ावा देती है।

Indian Army: Historic Photo Disappears from Army Chief's Office Wall, Former Officers Question if Government is Overlooking Indian Army's Glorious Victory

बताया- बदलाव समय की जरूरत

इस मुद्दे पर रिटायर्ड पश्चिमी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल कमलजीत सिंह ने भी अपनी राय दी थी। उनका कहना था कि बिना पूरे हालात को देखे इस चित्र पर टिप्पणी करना सही नहीं होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि बदलाव समय की जरूरत है और आने वाली पीढ़ियों को इसे समझने और उनका दृष्टिकोण बदलने का अवसर देना चाहिए। उनका यह भी मानना ​​है कि यह मामला राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है और इससे आगे बढ़ने की जरूरत है।

विजय दिवस के मौके पर भारतीय सेना द्वारा इस ऐतिहासिक पेंटिंग को मानेकशॉ सेंटर में स्थापित करना भारतीय सेना के इतिहास और गौरव को सम्मानित करने का एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पेंटिंग न केवल भारतीय सेना की महानता का प्रतीक है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को हमारे सैन्य इतिहास और उपलब्धियों से परिचित कराएगी।

1971 India-Pakistan War: जब एक बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोया था पाकिस्तानी जनरल, रावलपिंडी और याह्या खान पर फोड़ा था सरेंडर का ठीकरा

1971 India-Pakistan War: When a Pakistani General Broke Down Like a Child, Blamed Rawalpindi and Yahya Khan for the Surrender

1971 India-Pakistan War: 16 दिसंबर 1971, भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिन, जब पाकिस्तान सेना ने ढाका में भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया। यह दिन केवल एक सैन्य जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सेना की अद्वितीय रणनीति, साहस और नेतृत्व की मिसाल है। इस दिन को याद करते हुए, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की बातों को भुलाया नहीं जा सकता, जिनके कुशल नेतृत्व ने भारत को इस गौरवशाली विजय तक पहुंचाया। यह कहानी सिद्दीक़ सालिक (Siddiq Salik) की किताब “विटनेस टू सरेंडर” (Witness to Surrender) से ली गई है, जो उस समय की परिस्थितियों और तनाव को बयां करती है।

1971 India-Pakistan War: When a Pakistani General Broke Down Like a Child, Blamed Rawalpindi and Yahya Khan for the Surrender

1971 India-Pakistan War: सरेंडर से पहले का माहौल

16 दिसंबर से कुछ दिन पहले, ढाका के गवर्नमेंट हाउस में गवर्नर मलिक, जनरल नियाजी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी एक कमरे में बैठे हुए थे। माहौल भारी था और बातचीत बहुत कम हो रही थी। हर थोड़ी देर में चुप्पी पूरे कमरे पर छा जाती। गवर्नर मलिक ही ज्यादातर बोल रहे थे, वह भी बहुत सामान्य बातें। उन्होंने कहा, “परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। अच्छे दिन बुरे दिनों में बदल सकते हैं और बुरे दिन भी अच्छे हो सकते हैं। एक जनरल के करियर में भी उतार-चढ़ाव आते हैं। कभी उसे सफलता गौरवान्वित करती है तो कभी हार उसके आत्मसम्मान को तोड़ देती है।”

जैसे ही गवर्नर मलिक ने यह बात खत्म की, जनरल नियाजी की बड़ी कद-काठी वाला शरीर कांप उठा। उन्होंने अपने हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया और एक बच्चे की तरह रोने लगे। गवर्नर ने सांत्वना देते हुए उनका हाथ पकड़कर कहा, “जनरल साहब, एक कमांडर की जिंदगी में कठिन दिन आते हैं। लेकिन हिम्मत मत हारिए। ऊपर वाला महान है।”

‘साहिब रो रहे हैं’

इसी बीच, एक बंगाली वेटर कॉफी और स्नैक्स की ट्रे लेकर कमरे में आया। लेकिन उसे तुरंत डांटकर बाहर भगा दिया गया। जैसे ही वह बाहर निकला, उसने बाकी बंगालियों से कहा, “साहिब अंदर रो रहे हैं।” यह बात पाकिस्तानी गवर्नर के मिलिट्री सेक्रेटरी ने सुन ली और उसने वेटर को चुप रहने को कहा।

यह घटना एक तरह से उस युद्ध की सच्चाई का सबसे स्पष्ट और दर्दनाक विवरण थी। गवर्नर मलिक ने फिर जनरल नियाजी से कहा, “स्थिति खराब है। मुझे लगता है कि हमें राष्ट्रपति को संदेश भेजकर युद्धविराम की व्यवस्था करने को कहना चाहिए।”

जनरल नियाजी ने चुप्पी के बाद कमजोर स्वर में कहा, “मैं आदेश मानूंगा।” लेकिन इस प्रस्ताव पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई।

1971 India-Pakistan War: When a Pakistani General Broke Down Like a Child, Blamed Rawalpindi and Yahya Khan for the Surrender

नियाजी की टूटती उम्मीदें

इसके बाद जनरल नियाजी अपने मुख्यालय लौटे और खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया। तीन दिनों तक उन्होंने किसी से मुलाकात नहीं की। उस दौरान, लेखक सिद्दीक़ सालिक ने 8/9 दिसंबर की रात को उनसे मिलने की कोशिश की। जब वह कमरे में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि जनरल नियाजी अपनी बांह पर सिर टिकाए हुए थे। उनका चेहरा किसी को दिखाई नहीं दे रहा था।

जनरल नियाजी ने उस बातचीत के दौरान एक ही बात कही, “सालिक, अपने भाग्य को धन्यवाद दो कि तुम आज जनरल नहीं हो।” उनकी आवाज में दर्द और असहायता झलक रही थी। यह वह समय था जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान को चारों ओर से घेर लिया था। नियाजी का आत्मविश्वास पूरी तरह से टूट चुका था।

चैप्टर 23: ढाका पर कब्जा और आत्मसमर्पण का दिन

16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तानी सेना के खाकी वर्दी की जगह भारतीय सेना की हरी वर्दी ने ले ली। बंगाली लोग चुपचाप किनारे खड़े होकर यह नजारा देख रहे थे। शायद उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि इतने बड़े बदलाव के बाद उनका भविष्य कैसा होगा।

ढाका के आत्मसमर्पण के बाद, सिद्दीक़ सालिक ने फोर्ट विलियम, कोलकाता में जनरल नियाजी से बातचीत की। इस दौरान नियाजी ने अपनी नाराजगी और गुस्से को खुलकर व्यक्त किया। उन्होंने अपनी असफलताओं के लिए कोई पछतावा नहीं दिखाया। बल्कि उन्होंने पूरे घटनाक्रम का जिम्मेदार जनरल याह्या खान को ठहराया।

‘कुर्बानी का कोई मतलब नहीं था’

जब सिद्दीक़ सालिक ने उनसे पूछा कि वह ढाका को बचाने के लिए और प्रयास क्यों नहीं कर सके, तो नियाजी का जवाब था, “इससे क्या होता? और ज्यादा मौतें होतीं। ढाका की नालियां जाम हो जातीं। लाशें सड़कों पर पड़ी रहतीं। और अंत में नतीजा यही रहता। मैं 90,000 कैदियों को वेस्ट पाकिस्तान लेकर जाऊंगा, न कि 90,000 विधवाओं और लाखों अनाथों को वहां छोड़कर। यह कुर्बानी बेकार होती।”

जनरल नियाजी की यह स्वीकारोक्ति युद्ध के परिणाम और पाकिस्तान के टूटने की कहानी को साफ बयां करती है। यह ऐतिहासिक दिन भारत के साहस, रणनीति और मानवता के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की वह महान बात आज भी प्रेरणा देती है: “अगर कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, या तो वह झूठ बोल रहा है या फिर वह एक गोरखा है।”

1971 India-Pakistan War: When a Pakistani General Broke Down Like a Child, Blamed Rawalpindi and Yahya Khan for the Surrender

आत्मसमर्पण का दिन

16 दिसंबर 1971 को, भारतीय सेना के नेतृत्व में लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने ढाका में पाकिस्तान सेना को आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया। यह भारतीय सेना की अद्भुत योजना और बहादुरी का परिणाम था। इस विजय ने न केवल बांग्लादेश को आज़ादी दिलाई, बल्कि भारतीय सेना के इतिहास में यह दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया।

सिद्दीक सालिक, जो कि युद्ध के दौरान पाकिस्तान सेना के अधिकारी थे, ने अपनी किताब “विटनेस टू सरेंडर” में इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि किस तरह पाकिस्तान सेना के अधिकारी आत्मसमर्पण से पहले टूट चुके थे। सालिक ने लिखा कि जब वे जनरल नियाज़ी से युद्ध के बारे में बात कर रहे थे, तो नियाज़ी ने अपनी असफलताओं के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं ठहराया, बल्कि रावलपिंडी और याह्या खान को दोषी ठहराया।

सैम मानेकशॉ का कुशल नेतृत्व

इस युद्ध में भारतीय सेना के प्रमुख फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का नेतृत्व भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। उनके कुशल नेतृत्व और स्पष्ट रणनीति ने भारतीय सेना को एकजुट रखा और दुश्मन को घुटनों पर ला दिया। मानेकशॉ ने अपने सैनिकों का मनोबल ऊंचा रखा और हर कदम पर सही निर्णय लिया।

16 दिसंबर 1971 को, जब नियाज़ी ने आत्मसमर्पण किया, तो यह केवल एक कागज़ पर दस्तखत नहीं थे, बल्कि यह भारत की ताकत, भारतीय सेना की बहादुरी और सैम मानेकशॉ के नेतृत्व का प्रमाण था।

Combat Training: समुद्री लुटेरों को मजा चखाने के लिए बड़ी तैयारी कर रही भारतीय नौसेना, बनाने जा रही है यह खतरनाक कॉम्बैट ट्रैनिंग सेंटर

Indian Navy to Build Advanced Combat Training Centre in Karwar

Combat Training: भारतीय नौसेना ने कर्नाटक के समुद्र तटीय शहर कारवार में एक अत्याधुनिक कॉम्बैट ट्रेनिंग सेंटर (सीटीसी) बनाने की तैयारी कर ररही है। यह ट्रेनिंग सेंटर विशेष रूप से नौसेना के जवानों, मार्कोस कमांडो और मित्र देशों की स्पेशल फोर्सेज को आतंकवाद और समुद्री लुटेरों से निपटने के लिए ट्रेनिंग देने के लिए तैयार किया जाएगा।

Indian Navy to Build Advanced Combat Training Centre in Karwar

Combat Training: 75 एकड़ भूमि पर होगा निर्माण

यह केंद्र 75 एकड़ भूमि पर बनाया जाएगा , जो आधुनिक सुविधाओंसे लैस होगा। यह भारतीय नौसेना की स्पेशवल फोर्सेज की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए एक बड़ा कदम है। इस ट्रेनिंग सेंटर में ऐसे उपकरण और सुविधाएं होंगी, जो असली जिंदगी में होती हैं।

क्या-क्या होगा Combat Training सेंटर में?

इस अत्याधुनिक ट्रेनिंग सेंटर में कई खास सुविधाएं होंगी, जो इसे भारत का सबसे एडवांस ट्रेनिंग सेंटर बनाएंगी।

  1. थ्री-स्टोरी मल्टीलेवल किल हाउस

यह तीन मंजिला इमारत होगी, जिसमें होटल लॉबी, कमरे, कॉन्फ्रेंस हॉल, कार्यालय, जहाज के उपकरण और रहने की जगह जैसे कई स्ट्रक्चर बनाए जाएंगे। इसमें स्नाइपर हथियारों सहित विभिन्न हथियारों से फायरिंग के लिए बैलिस्टिक सुरक्षा भी होगी। इसके अलावा, बंधकों को छुड़ाने जैसे हालात के दौरान पैदा होने वाली परिस्थितयों में भी अभ्यास करने की सुविधा होगी।

  1. मैरिटाइम वर्कअप स्टेशन

इसमें ऑयल रिग का नकली मॉडल, जहाज का मॉडल, विभिन्न समुद्री परिस्थितियों को दिखाने के लिए वेव जनरेशन पूल और ऑब्स्टेकल-कम-जंगल फायरिंग रेंज शामिल होगी। ऑयल रिग मॉडल को असली ऑयल रिग प्लेटफॉर्म के पैमाने पर तैयार किया जाएगा, जिसमें जैकेट डेक, मेन डेक, लिविंग क्वार्टर और टॉप डेक (हेलीपैड) जैसे स्ट्रक्चर होंगे।

  1. मिलिट्री ऑपरेशंस इन अर्बन टेरेन कॉम्प्लेक्स

यह एक आधुनिक ट्रेनिंग फैसिलिटी होगी, जो शहरी क्षेत्रों में मिलिट्री ऑपरेशनों के लिए तैयार की जाएगी। इसमें दो कंपाउंड होंगे—एक शहरी सेटअप और दूसरा ग्रामीण सेटअप।

  • शहरी सेटअप: यह एक छोटे शहर या कस्बे जैसा होगा, जिसमें कम से कम 10 बहुमंजिला इमारतें और 50 कमरे होंगे। इसमें अस्पताल, पुलिस स्टेशन, रेडियो स्टेशन, फैक्ट्री, बैंक, होटल, सिनेमा हॉल, स्कूल, गोदाम और प्रशासनिक भवन शामिल होंगे। इन इमारतों पर हेलीकॉप्टर से स्लिदरिंग और रैपलिंग जैसे विशेष अभियानों का अभ्यास किया जा सकेगा।
  • ग्रामीण सेटअप: यह एक भारतीय गांव का नक्शा होगा, जिसमें गोशाला, मंदिर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, मिट्टी के घर, फसल भंडारण सुविधा और एक खुला मैदान या हेलीपैड होगा। यह सेटअप विशेष हेलीकॉप्टर अभियान के लिए तैयार किया जाएगा।

MARCOS कमांडो और मित्र देशों की स्पेशल फोर्सेज की ट्रेनिंग

यह ट्रेनिंग सेंटर विशेष रूप से भारतीय नौसेना के मार्कोस कमांडो के लिए तैयार किया जा रहा है, जो आतंकवाद विरोधी अभियानों में विशेषज्ञ हैं। इसके अलावा, इसे मित्र देशों के विशेष बलों को प्रशिक्षित करने और नए उपकरणों के परीक्षण के लिए भी उपयोग किया जाएगा।

इस सेंटर में अत्याधुनिक सिमुलेटर और मॉड्यूलर बिल्डिंग्स होंगी, जो वास्तविक परिस्थितियों का अनुभव कराएंगी। नौसेना के दस्तावेजों के अनुसार, यह परियोजना नई चुनौतियों से निपटने के लिए विशेष बलों को तैयार करने में मददगार साबित होगी। भारतीय नौसेना ने इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए एक सलाहकार को शामिल किया है। यह ट्रेनिंग सेंटर भारत की समुद्री सुरक्षा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा। स्पेशल फोर्सेज की क्षमताओं को बढ़ाकर, यह केंद्र आतंकवाद और समुद्री लुटेरों के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।