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MiG-21 Variants History: मिग-21 इंटरसेप्टर से कैसे बना “रनवे बस्टर”, जानिए हर वैरिएंट की कहानी, 4th जनरेशन फाइटर जेट्स को दे सकता था मात

MiG-21 Variants History India

MiG-21 Variants History: भारतीय वायुसेना का इतिहास कई ऐसे लड़ाकू विमानों से भरा है, जिन्होंने दशकों तक आसमान में भारत की ताकत का परचम लहराया। लेकिन जब भी इस गौरवशाली सफर की चर्चा होती है, तो मिग-21 का नाम सबसे पहले आता है। लगभग छह दशक तक यह जेट भारतीय वायुसेना की रीढ़ बना रहा।

MiG-21 Memories: मिग-21 के कॉकपिट में रूसी भाषा और बिना ट्रेनर जेट के कैसे ली थी पायलटों ने ट्रेनिंग, रूस ने क्यों की थी चीन की तरफदारी!

1963 में जब पहला मिग-21 भारत आया, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह विमान आने वाले कई दशकों तक देश की हवाई सुरक्षा का अहम हिस्सा बना रहेगा। 1965 के युद्ध से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, 1999 के कारगिल युद्ध और 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक तक, MiG-21 ने बार-बार अपनी ताकत साबित की।

अब जब यह विमान 2025 में इतिहास बनने जा रहा है, तो आइए विस्तार से जानते हैं भारत में मिग-21 के सभी वैरिएंट्स का सफर।

MiG-21 Variants History India
MiG-21PF

MiG-21 Variants History: मिग-21PF (Type 76): भारत का पहला इंटरसेप्टर

1960 के दशक में भारतीय वायुसेना को मिग-21PF मिला, जिसे टाइप 76 भी कहा जाता है। यह मूल रूप से एक इंटरसेप्टर विमान था, जिसका काम दुश्मन के विमानों को रोकना और गिराना था। इसमें R1L AI रडार और टेल श्यूट लगाया गया था। इसमें ‘PF’ का मतलब रूसी में “Perekhvatchik Forsirovanny” था, यानी “बूस्टेड इंजन वाला इंटरसेप्टर”। इसमें ट्यूमांस्की R-11F-300 टर्बोजेट इंजन, जो 5,740 किग्रा थ्रस्ट (आफ्टरबर्नर के साथ) देता था। इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 2.05 (2,230 किमी/घंटा) थी। इसमें 30एमएम की NR-30 कैनन, हवा-से-हवा मिसाइलें, जैसे K-13 (AA-2 Atoll) और हवा-से-जमीन पर मार करने वाले हथियार लगे थे। भारत ने इन विमानों को सीधे सोवियत संघ से आयात किया था।

भारतीय वायुसेना की 28 स्क्वॉड्रन ने इस वैरिएंट से शुरुआत की। बाद में इन्हें अपग्रेड करके टाइप 77 स्क्वॉड्रनों में शामिल किया गया। यह वह दौर था, जब भारत सुपरसोनिक जेट युग में प्रवेश कर रहा था और मिग-21PF ने इस सफर की शुरुआत की।

MiG-21 Variants History: मिग-21R: “फाइटर रेक्की”

मिग-21R को “फाइटर रेक्की” (Fighter Reconnaissance) के रूप में जाना जाता था। यह एक ऐसा वेरिएंट है जिसने टोही मिशनों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें ‘R’ का अर्थ रूसी भाषा में “Razvedchik” यानी रेकनाइसेंस था।

मिग-21R को खासतौर पर हवाई टोही मिशनों के लिए डिजाइन किया गया था। यह विमान मिग-21PF और PFM मॉडल्स पर आधारित था, लेकिन इसमें एडवांस कैमरे, सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) सेंसर, और बाहरी रेकनाइसेंस पॉड्स जोड़े गए थे। यह न केवल टोह लेने में माहिर था, बल्कि जरूरत पड़ने पर लड़ाकू भूमिका भी निभा सकता था।

इसमें ट्यूमांस्की R-11F2S-300 टर्बोजेट लगा था, जो 6,175 किग्रा थ्रस्ट देता था। वहीं, इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 2.05 (2,230 किमी/घंटा) थी। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इसने सीमा क्षेत्रों की निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने में अहम योगदान दिया। इसके बाहरी पॉड्स में लगे पैनोरमिक और ओब्लिक कैमरों ने युद्ध के दौरान खुफिया जानकारियां जुटाईं थीं।

मिग-21FL (Type 77): भारत का वर्कहॉर्स

MiG-21FL यानी टाइप 77, भारतीय वायुसेना का पहला वैरिएंट था, जिसे भारत में ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने बनाया। इसमें R11F-300 इंजन और RP-21 रडार लगाया गया था। FL का मतलब था “Forsazh” (आफ्टरबर्नर) और “Lokator” (रडार) यानी “बूस्टेड लाइट” वेरिएंट। इसमें ट्यूमांस्की R-11F2S-300 टर्बोजेट इंजन, जो 6,175 किग्रा थ्रस्ट (आफ्टरबर्नर के साथ) देता था। इसकी टॉप स्पीड मैक 2.05 (2,230 किमी/घंटा) थी।

MiG-21 Variants History India
MiG-21FL

1966 से 1973 के बीच रूस से 38 और HAL द्वारा 197 जेट बनाए गए। यह पहला वैरिएंट था, जिसने सिर्फ इंटरसेप्शन नहीं, बल्कि ग्राउंड अटैक मिशनों में भी अपनी ताकत साबित की।

1971 के युद्ध में मिग-21FL ने पाकिस्तान के एयरबेस और रनवे पर हमला किया, जिससे इसे “रनवे बस्टर्स” का नाम मिला। इसने पाकिस्तानी F-86, F-104 स्टारफाइटर और F-6 को भी मार गिराया।

मिग-21M (Type 96): मल्टीरोल फाइटर

MiG-21 M यानी टाइप 96 को मल्टीरोल एयरक्राफ्ट कहा जाता था। क्योंकि यह सिर्फ ऊंचाई पर ही नहीं बल्कि लो और मिड एल्टीट्यूड पर भी काम कर सकता था। ‘M’ का मतलब रूसी में “Modernizirovanny” था, यानी “आधुनिकीकरण”। यह विमान भारतीय वायु सेना की रीढ़ रहा और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने इसे स्वदेशी रूप से निर्मित किया था।

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MiG-21M

इसमें RP-21M रडार, GSh-23L कैनन और R-3S इंफ्रारेड सीकर मिसाइलें लगी थीं। साथ ही यह एडवांस नेविगेशन सिस्टम, रेडियो कम्युनिकेशन, और IFF (Identification Friend or Foe) सिस्टम से भी लैस था।

मिग-21M ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने हवाई युद्ध में पाकिस्तानी विमानों को चुनौती दी और जमीनी ठिकानों पर हमले किए। मिग-21M ने पाकिस्तान के कई एयरबेस और रनवे तबाह किए।

मिग-21Bis (Type 75): सबसे ताकतवर वैरिएंट

MiG-21 Bis, यानी टाइप 75, को मिग-21 का सबसे एडवांस और आधुनिक वैरिएंट माना गया। ‘Bis’ रूसी में “दूसरा” या “संशोधित” कहा जाता था, जिससे पता लगता था कि यह एडवांस फीचर्स वाला फाइटर जेट था। इसमें RP-22 Sapfir-21 रडार लगा था, जो हवाई और जमीनी लक्ष्यों को ट्रैक करने में सक्षम था, और मिग-21M की तुलना में अधिक पावरफुल था।

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MiG-21Bis

इसमें R25-300 टर्बोजेट इंजन था, जो 7,100 किग्रा थ्रस्ट (आफ्टरबर्नर के साथ) देता था। जिससे इसे डॉगफाइट में जबरदस्त ताकत मिली। इसमें R-60M मिसाइलें भी थीं, जिससे यह चौथी पीढ़ी के पश्चिमी फाइटर्स का सामना कर सकता था। इसे बड़े पैमाने पर भारत में बनाया गया और यह 1970 से 1990 के दशक तक भारतीय वायुसेना का मुख्य वर्कहॉर्स रहा। मिग-21Bis ने 1999 के कारगिल युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और जमीनी ठिकानों पर सटीक हमले किए। इसकी चुस्ती और तेज रफ्तार ने इसे हाई एल्टीट्यूड इलाकों के लिए मुफीद बनाया। मिग-21Bis का इस्तेमाल पायलट ट्रेनिंग और टैक्टिकल ऑपरेशन्स में भी किया गया। हर आपातकालीन स्थिति में सबसे पहले इसी वैरिएंट को स्क्रैम्बल किया जाता था।

मिग-21 Bison: अपग्रेडेड योद्धा

1996 में भारत ने 125 MiG-21 Bis को अपग्रेड करने का फैसला लिया। इनमें से 123 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड नासिक फैक्ट्री में 2001 से 2008 के बीच अपग्रेड किया गया और उन्हें नया नाम मिला – मिग-21 बाइसन। इस अपग्रेड के तहत एयरफ्रेम को नया जीवन दिया गया। नई कैनोपी, मल्टीफंक्शन डिस्प्ले, हेड-अप डिस्प्ले, ऑटोपायलट, GPS, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और फाजोट्रॉन कोप्यो (Kopyo) रडार लगाया गया। फाजोट्रॉन कोप्यो मल्टी-मोड रडार था, जो हवाई और जमीनी टारगेट्स को 57 किमी तक ट्रैक कर सकता था। यह चौथी पीढ़ी के विमानों का भी मुकाबला कर सकता था।

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MiG-21 Bison

यह रडार एक साथ आठ टारगेट ट्रैक कर सकता था और दो को एंगेज कर सकता था। इसके साथ R-27, R-77 और R-73 जैसी एयर-टू-एयर मिसाइलें और KAB-500Kr लेजर-गाइडेड बम भी शामिल किए गए। इसमें मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले और हेड-अप डिस्प्ले, एडवांस नेविगेशन सिस्टम, जैसे GPS और INS, इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर और रडार वॉर्निंग रिसीवर, IFF सिस्टम और डेटा लिंक जैसे फीचर थे।

2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद हुई हवाई लड़ाई में विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने इसी मिग-21 बाइसन से पाकिस्तान के आधुनिक F-16 को मार गिराकर इतिहास रचा था।

Artillery in Kargil War: कौन है ‘द्रास का गुस्सैल सांड’? मेजर जनरल लखविंदर सिंह की किताब ने खोले कई राज, आर्टिलरी कैसे बनी कारगिल युद्ध में “गॉड ऑफ वॉर”

Artillary in Kargil War
Artillery’s Thunder: The Untold Kargil Story” by Maj. Gen. Lakhwinder Singh (Retd)

Artillery in Kargil War: कारगिल युद्ध की जब भी चर्चा होती है, तो कहानियां अक्सर जवानों की वीरता के इर्द-गिर्द आकर सिमट जाती हैं। लेकिन इस युद्ध में जितनी बहादुरी सैनिकों ने दिखाई तो वहीं मशीनों के योगदान को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की आर्टिलरी की गूंज ने भी दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। उस दौरान कारगिल युद्ध में 8 माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड की कमान संभालने वाले (उस समय ब्रिगेडियर) रिटायर्ड मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने अपनी नई किताब ‘आर्टिलरीज थंडर: द अनटोल्ड कारगिल स्टोरी’ के मौके पर आर्टिलरी यानी तोपखाने के किस्सों को साझा किया है।

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Artillery’s Thunder: The Untold Kargil Story में उन्होंने बताया है कि किस तरह तोपों की गरज ने युद्ध का पासा पलट दिया था। कैसे भारी संख्या में दागे गए गोलों ने दुश्मन के बंकरों को चकनाचूर करते हुए इन्फैंट्री के आगे बढ़ने का रास्ता साफ किया था। 

Artillery in Kargil War: ‘एनरेज्ड बुल ऑफ द्रास’

रिटायर्ड मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने कारगिल युद्ध के दौरान 8 माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड की कमान संभाली थी। कारगिल में अपनी वीरता और नेतृत्व क्षमता और अपनी आक्रामक रणनीति के चलते उन्हें Enraged bull of Drass यानी ‘द्रास का गुस्सैल सांड’ जैसा उपनाम भी मिला था। उन्होंने बोफोर्स एफएच-77बी हॉवित्जर तोपों का इस्तेमाल करके तोलोलिंग और टाइगर हिल जैसी चोटियों को वापस जीतने में अहम भूमिका निभाई थी। इस योगदान के लिए उन्हें युद्ध सेवा मेडल से भी सम्मानित किया गया था।

Major general Lakhwinder Singh
Major general Lakhwinder Singh

उन्होंने युद्ध के दौरान 100 से अधिक बोफोर्स हॉवित्जर गनों को एक साथ इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई। उनका कहना था, “सौ तोपों से एक साथ 3,000 किलो स्टील और विस्फोटक गिराना ऐसा था जैसे दुश्मन पर बिजली गिर गई हो। मात्र आधे घंटे में एक लाख किलो विस्फोटक दागकर हमने दुश्मन की पोजिशनें तबाह कर दीं।”

Artillery in Kargil War: तोपों से बदले युद्ध के हालात

मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने बताया कि युद्ध की शुरुआत में 8 माउंटेन डिवीजन के पास केवल 6-7 फायर यूनिट या छह आर्टिलरी की बैटरियां उपलब्ध थीं। तोलोलिंग पर कब्जे की शुरुआती कोशिशों में इन्फैंट्री को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ा। कई प्रयास असफल रहे क्योंकि दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था और भारतीय सैनिक नीचे से चढ़ाई कर रहे थे। लेकिन जब एक साथ 155 एमएम वाली 108 तोपों ने गोलाबारी शुरू की तो हालात बदल गए। मेजर जनरल सिंह ने कहा, “युद्ध का रुख तभी बदला जब हमारी तोपों ने दुश्मन की पोजिशन पर सीधी मार की।” उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की रणनीति का भी उल्लेख किया, जिसमें आर्टिलरी को कभी-कभी रायफल की तरह सीधे निशानेबाजी के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

पाकिस्तानी बोले- बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है

मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने बताया, “असल में, इन्फैंट्री और आर्टिलरी के सामने पाकिस्तानियों के पास कोई जवाब नहीं था। दोनों ने गजब का काम किया। आर्टिलरी का असर इतना जबरदस्त था कि पहाड़ों पर पाकिस्तानी चिल्लाते थे– हमें बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है। वो इतने डरे हुए थे कि अपनी पोजिशन छोड़ना ही बेहतर समझते थे।” उन्होंने बताया कि सबसे पहले ये तोलोलिंग में ऐसा हुआ था। जब हमने वहां फायरिंग की तो हमें इंटरसेप्ट में यही आवाजें सुनाई दीं। और फिर हर ऊंचाई पर जहां भी हम गए, वही हालात थे, हर जगह पाकिस्तानी यही चिल्ला रहे थे।“

Artillery in Kargil War: सैनिक तोपों को करते थे सलाम

युद्ध के दौरान तकरीबन 2.9 लाख तोपों के गोले दागे गए। इन गोलाबारियों ने न सिर्फ भारतीय सैनिकों के हौसले को बढ़ाया बल्कि पाकिस्तानी सैनिकों को भी हतोत्साहित कर दिया। कई बार ऐसा हुआ कि जब पैदल सेना मोर्चे से लौटती थी, तो वे तोपों को सलामी देते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इन तोपों ने उनकी जान बचाई।

Artillery in Kargil War: पत्नी ने दी किताब लिखने की प्रेरणा

मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने कहा, कारगिल वॉर पर बहुत किताबें आई हैं, लेकिन कई पहलू अभी तक सामने नहीं आए थे। मैंने सोचा जितना हो सके खुलकर और ईमानदारी से वो सच लिखूं जो जरूरी था। इसी वजह से इसका नाम रखा The Untold Story।” उन्होंने कहा, “असल में मेरी पत्नी ने बार-बार कहा कि मुझे लिखना चाहिए। मैं हिचकिचा रहा था, लेकिन मेरे दिमाग में बहुत सारी बातें थीं, जो लोगों तक पहुंचनी चाहिए थीं। फिर मैंने कलम उठाई और लिखना शुरू किया। मुझे लगता है, यह किताब लोगों के लिए दिलचस्प होगी।”

Artillery in Kargil War: पॉइंट 5140 को मिला था “गन हिल” नाम

मेजर जनरल सिंह ने कहा कि आर्टिलरी को महज सपोर्टिंग आर्म नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, कारगिल में यह साफ हो गया कि आर्टिलरी युद्ध का निर्णायक हथियार है और इसे स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। शायद इसीलिए आर्टिलरी को “गॉड ऑफ वॉर” भी कहा जाता है। वहीं इन्फैंट्री को “क्वीन” और आर्मर्ड कोर “किंग ऑफ वॉर” कहा जाता है।

द्रास-मश्कोह में 6 नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री उस समय प्वाइंट 5140 (16,864 फीट) पर थी। यह वही जगह थी जहां से गनों के इस्तेमाल से पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा गया था। जिसके बाद 30 जुलाई को द्रास सेक्टर के पॉइंट 5140 को औपचारिक रूप से “गन हिल” नाम दिया गया था, ताकि आर्टिलरी के योगदान को हमेशा याद रखा जा सके।

कारगिल युद्ध के बाद प्वाइंट 5140 का नाम गन हिल रखने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। हालांकि आर्टिलरी ने न केवल पॉइंट 5140 बल्कि तोलोलिंग, पॉइंट 4700, थ्री पिंपल्स, टाइगर हिल और पॉइंट 4875 (जिसे बत्रा टॉप भी कहा जाता है) जैसी चोटियों पर मौजूद पाकिस्तानी बंकरों को बरबाद करने में अहम भूमिका निभाई थी। युद्ध के बाद तत्कालीन 8 माउंटेन डिवीजन के आर्टिलरी कमांडर लखविंदर सिंह किसी एक जगह को “गन हिल” नाम रखने का प्रस्ताव गंभीरता से दिया था। उन्होंने यह बात तत्कालीन डायरेक्टोरेट ऑफ आर्टिलरी से यह बात कही थी। जिसके बाद तत्कालीन 15वीं कोर के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल कृष्ण पाल युद्ध के बाद प्वाइंट 4875 का नाम गन हिल रखने पर सहमत हुए थे। लेकिन उसे पहले से ही बत्रा टॉप के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके बाद प्वाइंट 5140 का नाम गन हिल रखा गया था। लेफ्टिनेंट जनरल पाल ने ही तत्कालीन ब्रिगेडियर लखविंदर सिंह को द्रास में नियुक्त किया था। बता दें कि युद्ध की शुरुआत में मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने ही युद्ध को भारतीय सेना के पक्ष में बदलने के लिए चार बोफोर्स रेजिमेंटों को द्रास में भेजने का प्रस्ताव रखा था।

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MiG-21 Memories: मिग-21 के कॉकपिट में रूसी भाषा और बिना ट्रेनर जेट के कैसे ली थी पायलटों ने ट्रेनिंग, रूस ने क्यों की थी चीन की तरफदारी!

MiG-21 Memories

MiG-21 Memories: भारतीय वायुसेना का इतिहास कई महत्वपूर्ण पड़ावों से भरा हुआ है, लेकिन उसमें मिग-21 का आना और इसकी शुरुआती ट्रेनिंग का दौर सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। मिग-21, जो दुनिया का सबसे ज्यादा बनाया गया सुपरसोनिक फाइटर है, भारत में 1960 के दशक की शुरुआत में आया और छह दशकों से ज्यादा समय तक भारतीय आसमान का प्रहरी बना रहा। यह मिग-21एफ-13 वेरिएंट था, जिसे औपचारिक रूप से 1964 में वायुसेना में शामिल किया गया।

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MiG-21 Memories: 1962 युद्ध के बाद किया था फैसला

चीन के साथ 1962 के युद्ध के तुरंत बाद भारत ने सोवियत संघ से मिग-21 खरीदने का फैसला किया। उस समय यह विमान तकनीकी रूप से एडवांस था और इसके आने के बाद ही भारत की सुपरसोनिक युग में एंट्री हुई। 1963 में पहली बार छह MiG-21 विमान भारत पहुंचे। इन्हें बॉम्बे (अब मुंबई) से चंडीगढ़ लाकर रूसी इंजीनियरों ने असेंबल किया और इन्हें नंबर 28 स्क्वाड्रन में शामिल किया गया। इस स्क्वाड्रन ने खुद को “फर्स्ट सुपरसोनिक्स” नाम दिया।

इन विमानों में पहला जहाज BC 816 टेल नंबर वाला था, जिसे देखकर भारतीय पायलट हैरान रह गए। उनके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के विमानों पर उड़ान भर रहे थे।

MiG-21 Memories: सोवियत संघ में भारतीय पायलटों की ट्रेनिंग

भारतीय पायलटों का पहला बैच 1962 में सोवियत संघ भेजा गया। इसमें आठ पायलट शामिल थे स्क्वाड्रन लीडर दिलबाग सिंह, एसके मेहरा, वोल्लेन, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एके मुखर्जी, डेनजिल कीलर, एचएस गिल, लाडू सेन और सबसे जूनियर ब्रजेश धर जयाल। इनमें से कई आगे चलकर भारतीय वायुसेना प्रमुख और एयर मार्शल बने।

सोवियत संघ में ट्रेनिंग आसान नहीं थी। भारतीय पायलटों को सुपरसोनिक विमान उड़ाने का कोई अनुभव नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि MiG-21 का कोई ट्रेनर वर्जन उपलब्ध नहीं था। पायलटों को पहले पुराने सबसोनिक मिग-15 और मिग-17 पर उड़ान भरनी पड़ी और फिर सीधे मिग-21 में बैठकर अकेले उड़ना पड़ा।

इसके अलावा, कॉकपिट की हर चीज रूसी भाषा में थी और सभी डायल मीटर और किलोमीटर में बने थे, जबकि भारतीय पायलट फीट और माइल्स में काम करने के आदी थे। इस वजह से शुरुआती दिनों में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

MiG-21 Memories: रूस ने रोक दी थी ट्रेनिंग

फ्लाइट लेफ्टिनेंट ब्रजेश धर जयाल याद करते हैं कि सब कुछ बिल्कुल नया था। रूसी ट्रेनर भी शुरुआती दिनों में ज्यादा मददगार नहीं थे। पायलटों को लगता था कि रूस भारत को अपने कीमती विमान देने में हिचक रहा है। रूसी भाषा न समझ पाने की वजह से कॉकपिट में बैठकर हर बटन और डायल को समझना उनके लिए एक कठिन परीक्षा जैसा था।

MiG-21 Bison Retirement: संस्थानों में मिग-21 के लिए मची होड़, स्टेटिक डिस्प्ले की जबरदस्त मांग और 5-6 साल का इंतजार!

एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) दिलबाग सिंह ने अपनी किताब On the Wings of Destiny में लिखा है कि उस समय रूस और चीन के संबंध काफी अच्छे थे। जब चीन ने भारत पर हमला किया तो रूस में ट्रेनिंग कर रहे भारतीय पायलटों से कई बार पूछा गया, “तुम चीन से क्यों लड़ रहे हो? वे तो कम्युनिस्ट हैं।” इस वजह से कुछ समय के लिए ट्रेनिंग रोक भी दी गई थी। बाद में राजनीतिक स्तर पर फैसला होने के बाद ही ट्रेनिंग दोबारा शुरू हो सकी।

MiG-21 Memories: सब कुछ नया और चौंकाने वाला

एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) एवाई टिपनिस ने याद किया कि जब उन्होंने पहली बार मिग-21 देखा तो वे दंग रह गए। उनका कहना था, “रूसी कॉकपिट, मीट्रिक डायल, सुपरसोनिक स्पीड, कोई ट्रेनर नहीं, न सिम्युलेटर। सब कुछ नया और चौंकाने वाला था।”

MiG-21 की लैंडिंग और टेकऑफ वेस्टर्न विमानों से बिल्कुल अलग थी। इसकी एप्रोच और क्लाइंबिंग ऐंगल पश्चिमी विमानों की तुलना में तीन गुना ज्यादा था। हेलमेट वाइजर में हीटिंग सिस्टम था, जो रूस की ठंड के लिए बनाया गया था, लेकिन भारत की गर्मी में पायलटों के सिर पसीने से भीग जाते थे। हाइड्रोलिक ब्रेक्स की जगह न्यूमैटिक ब्रेक्स थे, जिससे पायलटों को शुरू में असहजता महसूस हुई।

MiG-21 Memories: दो 1963 में ही हो गए थे दुर्घटनाग्रस्त

शुरुआती दौर में मिग-21 का ऑपरेशन आसान नहीं था। पहले छह विमानों में से दो 1963 में दुर्घटनाग्रस्त हो गए। इन्हें वोल्लेन और मुखर्जी उड़ा रहे थे। केवल चार विमान ही सुरक्षित बचे। टिपनिस का कहना है कि यह हादसे तकनीकी चुनौतियों और प्रशिक्षण की कमी की वजह से हुए।

लेकिन भारतीय वायुसेना ने हार नहीं मानी। जल्द ही छह और विमान आए। यह टाइप-76 FL वर्जन था, जिसमें नया रडार, आफ्टरबर्नर और दो एयर-टू-एयर मिसाइलें लगी थीं। यह भारतीय पायलटों के लिए बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे सिर्फ कैनन से फायर करने के आदी थे।

MiG-21 Memories: धीरे-धीरे बढ़ी मिग-21 की संख्या

1965 तक भारतीय वायुसेना में मिग-21 का इस्तेमाल बढ़ने लगा था। इसे हाई-एल्टीट्यूड इंटरसेप्टर की तरह डिजाइन किया गया था, लेकिन भारतीय पायलटों ने इसे कई और भूमिकाओं में ढाल लिया। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद, धीरे-धीरे मिग-21 भारतीय वायुसेना की रीढ़ बनता चला गया।

एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) टिपनिस कहते हैं कि हालांकि शुरू में कॉकपिट ने पायलटों को आत्मविश्वास नहीं दिया, लेकिन समय के साथ यह विमान उनके दिल के बेहद करीब हो गया। “मैंने जब पहली बार अंबाला में इस विमान को देखा, तो इसकी डेल्टा विंग और नोज कोन ने मुझे मोहित कर लिया। मुझे लगा कि यह सिर्फ मेरा है। यह एक खतरनाक खूबसूरती थी, जैसे कोई वैम्प।”

MiG-21 Memories: 1966 में दो ट्रेनर जेट

भारतीय पायलटों की सबसे बड़ी मांग थी कि उन्हें ट्रेनिंग के लिए मिग-21 का ट्रेनर वर्जन दिया जाए। आखिरकार 1966 में रूस ने दो ट्रेनर विमान भारत भेजे। यह नई पीढ़ी के पायलटों के लिए राहत की बात थी। इसी साल मिग-21 ने पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में फ्लाईपास्ट किया। उस दिन भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया कि अब वह सुपरसोनिक फाइटर जेट्स से लैस है। टिपनिस ने 1966 में पहली बार मिग-21 से एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल फायर की थी। यह उस समय एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि मिग-21 को शुरू में केवल इंटरसेप्टर माना जाता था।

IAF Inflatable Decoys: भारतीय वायुसेना क्यों खरीद रही हवा से फुलाने वाले S-400 एयर डिफेंस सिस्टम? ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को दिया था चकमा

IAF Inflatable Decoys: Indian Air Force to Procure 400 Decoys After Successful Use in Operation Sindoor

IAF Inflatable Decoys: भारतीय वायुसेना अपनी वॉर स्ट्रेटेजी में लगातार बदलाव कर रही है। वायुसेना ने हाल ही में 400 इन्फ्लेटेबल डिकॉय खरीदने का फैसला किया है। हवा से फुलाने वाले ये डिकॉय असली फाइटर जेट और S-400 ट्रायंफ एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हथियारों की हूबहू नकल हैं। इसका मकसद दुश्मन देशों को भ्रम में रख कर अपने असली एसेट्स की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह खरीद इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने डिकॉय टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दिया था।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने WhatsApp नहीं किया था इस्तेमाल, अपनाया था ये खास स्वदेशी फोन

IAF Inflatable Decoys: ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए थे डिकॉय

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया। इस जवाबी कार्रवाई में वायुसेना ने कई नई रणनीतियों का इस्तेमाल किया। इनमें सबसे अहम था डिकॉय सिस्टम। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने पहली बार बड़े पैमाने पर डिकॉय सिस्टम का इस्तेमाल किया।

शुरुआती चरण में डिकॉय ड्रोन, डमी जेट्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर पेलोड्स को उड़ाए थे, जिससे पाकिस्तानी रडार कवरेज सैचुरेटेड हो कर कन्फ्यूज हो गया। ये ड्रोन दुश्मन की रडार स्क्रीन पर असली लड़ाकू विमान जैसे दिख रहे थे। इससे उनका एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिव हो गया और उन्होंने समय से पहले मिसाइलें दाग दीं। जिसके चलते इसी प्रक्रिया ने उनकी लोकेशन का पता भारतीय वायुसेना को दे दिया।

असल में पाकिस्तान ने चीनी HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम को एक नई जगह पर तैनात कर दिया था, जिसका भारत को पता नहीं था। डमी जेट विमानों के जरिए भारत को HQ-9 एडी की नई लोकेशन का पता लग गया। जिससे भारत को रडार व एयर डिफेंस सिस्टम पर हमला करने में मदद मिली। इसके बाद भारतीय वायुसेना ने इजरायल निर्मित हारोप लूटरिंग म्यूनिशंस और ब्रह्मोस मिसाइलों से इन लक्ष्यों पर हमला किया।

वायुसेना ने इसके लिए पायलटलेस टारगेट एयरक्राफ्ट (PTA) का इस्तेमाल किया। इन्हें इस तरह तैयार किया गया था कि वे पाकिस्तानी रडार पर Su-30 और MiG-29 जैसे फाइटर जेट्स दिखाई दें। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम भ्रमित हो गए और असली हमले से पहले ही पाकिस्तान की एयर डिफेंस की लोकेशन पता लग गई।

IAF Inflatable Decoys: राफेल पर लगाया था ये खास ‘चकमा’ सिस्टम

इस ऑपरेशन में राफेल फाइटर जेट्स पर लगे X-Guard सिस्टम ने भी अहम भूमिका निभाई। यह एक AI-पावर्ड टोअड डिकॉय (AI-powered Towed Decoy) था, जिसका वजन लगभग 30 किलो होता है। यह सिस्टम दुश्मन की PL-15E एयर-टू-एयर मिसाइलों और J-10C फाइटर जेट्स को चकमा देने में कामयाब रहा। X-Guard दुश्मन के रडार सिग्नल को कॉपी कर देता है, जिससे दुश्मन को लगता है कि उसने असली जेट को निशाना बनाया है। इस दौरान असली राफेल सुरक्षित रहते हुए अपने मिशन को अंजाम देते रहे और आतंकियों के ठिकानों को टरगेट बनाते रहे।

IAF Inflatable Decoys: ब्रह्मोस हमलों से पहले उड़ाए डमी एयरक्राफ्ट

सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों के हमले से पहले भी डमी एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया था। डिकॉय के इस्तेमाल से पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम बार-बार एक्टिव होता रहा। जब उनके रडार ने भारतीय विमानों को आते देखा, तो उन्होंने HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया। लेकिन वास्तव में वे डमी टारगेट थे।

9-10 मई 2025 की रात भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 12 में से 11 बड़े एयरबेस पर हमले किए। इन हमलों में लगभग 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी गईं। इसके साथ ही स्कैल्प, रैम्पेज और क्रिस्टल मेज जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें भी इस्तेमाल हुईं।

इन हमलों का मकसद पाकिस्तानी वायुसेना को पूरी तरह नष्ट करना नहीं था, बल्कि उनके एयरबेस को निष्क्रिय करना और उनकी विमान तैनाती क्षमता को सीमित करना था।

इन हमलों में पाकिस्तान ने न केवल अपने एयरबेस का बड़ा हिस्सा खोया, बल्कि खबरों के मुताबिक एक AWACS (Airborne Warning and Control System) विमान और कई लंबे समय तक उड़ान भरने वाले UAV भी नष्ट हुए।

IAF Inflatable Decoys: 400 नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय

अब भारतीय वायुसेना 400 नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय खरीदने जा रही है। ये डिकॉय न केवल फाइटर जेट्स बल्कि S-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम की भी हूबहू नकल कर सकते हैं। इससे दुश्मन की इंटेलिजेंस सर्विलांस और ड्रोन जासूसी नेटवर्क को चकमा दिया जा सकेगा। इससे दुश्मन वास्तविक और डमी टारगेट्स में फर्क नहीं कर पाएगा, जिससे अहम हथियार की सुरक्षा में इजाफा होगा।

भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ये डिकॉय सर्विलांस या स्ट्राइक मिशन्स के दौरान दुश्मन के लिए वास्तविक और नकली एसेट्स के बीच अंतर करना मुश्किल बना देंगे। इससे दुश्मन की रडार प्रणाली कन्फ्यूज होगी और वास्तविक मिलिट्री एसेट्स की सुरक्षा बढ़ेगी।

रिटायर्ड कर्नल अनिल राणा के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध केवल गोलियों और मिसाइलों से नहीं जीता जाता, बल्कि दुश्मन को धोखे में रखना (Deception Tactics) भी अहम रणनीति है। ऑपरेशन सिंदूर में हमने डिकॉय का इस्तेमाल करके भारत ने न केवल पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को नाकाम किया, बल्कि अपने विमानों और पायलटों को भी सुरक्षित रखा।

उनका कहना है कि S-400 जैसे दिखने वाले ये नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय भारत की सैन्य क्षमताओं में बढ़ोतरी करेंगे। इनके इस्तेमाल से भारत अपने एयर डिफेंस को और मजबूत कर सकेगा और भविष्य में होने वाली जंगों में दुश्मनों को चकमा देने में मदद मिलेगी।

MiG-21 Bison Retirement: संस्थानों में मिग-21 के लिए मची होड़, स्टेटिक डिस्प्ले की जबरदस्त मांग और 5-6 साल का इंतजार!

IAF MiG-21 Bison Retirement After 62 Years: Legacy, Last Flight and What Comes Next
Mig 21 at Kargil War Memorial (Photo: Raksha samachar)

MiG-21 Bison Retirement: भारतीय वायुसेना का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 बाइसन (MiG-21 Bison) अब इतिहास बनने जा रहा है। 62 साल की सेवा के बाद 26 सितंबर 2025 को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित विशेष समारोह में इन विमानों को औपचारिक रूप से रिटायर कर दिया जाएगा। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एयरफोर्स के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 अपने पुराने अंदाज में उड़ान भरते दिखेंगे और उन्हें स्वदेशी तेजस फाइटर जेट एस्कॉर्ट करेंगे। इसके बाद भारतीय वायुसेना के बेड़े में मिग-21 का नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो जाएगा।

MiG-21 retirement India: 63 सालों की सेवा के बाद 26 सितंबर को रिटायर होगा मिकोयान-गुरेविच-21, त्रिशूल से लेकर तलवार तक मिले कई नाम

MiG-21 Bison Retirement: इस तरह होगी आखिरी उड़ान

समारोह के दौरान मिग-21 बाइसन पुराने अंदाज में बेस एयर डिफेंस सेंटर (BADC) कॉम्बैट ड्रिल करते दिखाई देंगे। इस ड्रिल में पायलट दिखाएंगे कि 60 साल पहले किस तरह एयरबेस की सुरक्षा के लिए मिग-21 को हवा में तैनात किया जाता था और रेडियो के जरिए उन्हें कंट्रोल किया जाता था। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 बाइसन स्क्वॉड्रन को स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान एस्कॉर्ट करेंगे। जैसे ही यह फॉर्मेशन मुख्य मंच के सामने पहुंचेगी, मिग-21 विमान तेजी से ऊंचाई की ओर उड़ान भरेंगे और फिर आसमान में ओझल हो जाएंगे।

MiG-21 Bison Retirement: रिटायरमेंट के बाद क्या होगा?

सूत्रों ने रक्षा समाचार डॉट कॉम को बताया कि भारतीय वायुसेना ने तय किया है कि इन विमानों को स्मारक के रूप में देशभर में लगाया जाएगा। रिटायरमेंट के बाद कई सरकारी संस्थान, विश्वविद्यालय और स्कूल इन विमानों को स्टैटिक डिस्प्ले के तौर पर लगाने के लिए आवेदन कर चुके हैं। वहीं, सरकारी संस्थानों को विमान मुफ्त में दिए जाएंगे, जबकि निजी संस्थानों को इसके लिए लगभग 30 से 40 लाख रुपये खर्च करने होंगे। वहीं स्वायत्त संस्थानों के लिए यह रकम कम होगी।

IAF MiG-21 Bison Retirement After 62 Years: Legacy, Last Flight and What Comes Next
Mig 21 at Kargil War Memorial (Photo: Raksha samachar)

MiG-21 Bison Retirement: 5-6 साल का इंतजार

सूत्रों ने यह भी बताया कि रिटायर हो जाने के बाद इन्हें देने के लिए कैटेगरी बनाई जााएगी। लेकिन इन जेट्स को पाने के लिए संस्थानों को 5-6 साल का इंतजार करना होगा, क्योंकि वेटिंग लिस्ट लंबी है। भारतीय वायुसेना सभी आवेदनों की स्क्रूटनी करेगी और प्राथमिकता के आधार पर जेट का आवंटन करेगी।

सूत्रों ने बताया कि कुछ जेट्स को भारतीय वायुसेना अपने म्यूजियम में भी रखेगी, जहां आम लोग इन्हें करीब से देख सकेंगे। इन विमानों का स्टैटिक डिस्प्ले युवाओं में साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स (STEM) की पढ़ाई के प्रति उत्सुकता बढ़ाएगा और उन्हें मिलिट्री हिस्ट्री से जोड़ने का काम करेगा। बता दें कि मिग-21 सहित अन्य रिटायर्ड विमानों को पहले भी वायुसेना संग्रहालय (दिल्ली), एचएएल संग्रहालय (बेंगलुरु), और विभिन्न सैन्य अड्डों पर प्रदर्शित किया गया है। दिल्ली के पालम वायुसेना स्टेशन पर मिग-21 को भी प्रदर्शन के लिए रखा गया है।

MiG-21 Bison Retirement: मेंटेनेस करनी है जरूरी

सूत्रों का कहना है कि किसी भी संस्थान को जेट देने से पहले उसके सभी अहम पार्ट्स, जिसमें एवियोनिक्स, संवेदनशील उपकरण और इंजन जैसे जरूरी पार्ट्स को निकाल लिया जाएगा। संस्थानों को केवल एयरफ्रेम ही दिया जाएगा। साथ ही अच्छी कंडीशंस वाले जेट्स को ही आवंटित किया जाएगाा। वहीं सस्थानों को डिस्प्ले के लिए दिए जाने वाले गए मिग-21 का नियमित रखरखाव करना भी आवश्यक होगाा, जिसमें सफाई, पेंटिंग, और जंग-रोधी उपचार शामिल हैं।

MiG-21 Bison Retirement: अपनी मर्जी से नहीं कर सकते कोई कलर

वहीं, इसके लिए शहर की म्यूनिसिपिलिटी की परमिशन की भी जरूरी होती है, क्योंकि राष्ट्रीय धरोहर होने के नाते इसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी उन्ही की होती है। वे उस संबंधित संस्थान के साथ इसके मेंटेनेंस में सहयोग करते हैं औऱ समय-समय पर जांच करते हैं। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायु सेना का रिपेयर एंड सॉल्वेज यूनिट (RSU) इसमें उनकी मदद करता है। इनके मेंटेनेंस के लिए पूरे डेकोरम का पालन करना होता है। वहीं, संस्थान इन्हें अपनी मर्जी से कोई भी कलर नहीं कर सकता है। बल्कि ऑरिजनल कलर और राष्ट्रीय झंडा बनाना जरूरी होता है।

MiG-21 Bison Retirement: छह दशक तक की देश की सेवा

भारत-चीन युद्ध के बाद मिग-21 को 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। यह भारत का पहला सुपरसोनिक फाइटर जेट था और जल्द ही इसे वायुसेना की रीढ़ माना जाने लगा। इसे सोवियत संघ के मिकोयान-गुरेविच डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया था और भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने लाइसेंस लेकर इसका निर्माण किया।

भारत ने 850 से अधिक मिग-21 विमान उड़ाए और इनकी 24 फाइटर स्क्वॉड्रन और 4 ट्रेनिंग यूनिट्स तैयार कीं। आने वाले वर्षों में भारत दुनिया का सबसे बड़ा मिग-21 ऑपरेटर बन गया।

MiG-21 Bison Retirement: बची हैं बस दो स्क्वॉड्रन

मिग-21 की आखिरी दो स्क्वॉड्रन नाल एयरबेस पर मौजूद हैं। इन्हें “नंबर प्लेटिंग” के जरिए फ्रीज कर दिया जाएगा और इन्हीं स्क्वॉड्रन नंबरों पर अब स्वदेशी तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमान शामिल होंगे। नंबर 3 स्क्वॉड्रन “कोबरा” और नंबर 23 स्क्वॉड्रन “पैंथर्स” की लेगेसी अब तेजस के साथ जुड़ जाएगी। इन दोनों स्क्वॉड्रन में लगभग 27-28 मिग ही मौजूद हैं।

तेजस की पहली डिलीवरी भी इन्हीं स्क्वॉड्रन में होगी। दिलचस्प बात यह है कि मिग-21 बाइसन का पहला अपग्रेड भी नंबर 3 स्क्वॉड्रन में ही शामिल हुआ था और अब तेजस मार्क-1A भी वहीं से अपनी उड़ान शुरू करेगा।

26 सितंबर को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित समारोह में वायुसेना के सभी रिटायर्ड और मौजूदा पायलटों को आमंत्रित किया गया है, जिन्होंने मिग-21 उड़ाया है। आसमान में आकाश गंगा डिस्प्ले टीम का प्रदर्शन होगा और मिग-21 बाइसन का अंतिम फ्लाइपास्ट आयोजित किया जाएगा। इसके बाद स्क्वॉड्रन की चाबी रक्षा मंत्री को सौंपी जाएगी और औपचारिक रूप से मिग-21 वायुसेना से विदा लेगा।

Samudra Pradakshina: इतिहास रचने निकली तीनों सेनाओं की 10 महिला अफसर, स्वदेशी नौका IASV त्रिवेणी से लगाएंगी दुनिया का चक्कर

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से एक ऐतिहासिक अभियान को हरी झंडी दिखाई। यह अभियान दुनिया का पहला ट्राई-सर्विसेज महिला नौकायन अभियान है, जिसे ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ नाम दिया गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ को वर्चुअल माध्यम से हरी झंडी दिखाई। इस अभियान पर 10 महिला सैन्य अधिकारी स्वदेशी नौका त्रिवेणी पर सवार होकर निकलीं हैं, जो अगले 9 महीनों में दुनिया की पूरी परिक्रमा करेंगी।

यह दुनिया का पहला ट्राई सर्विसेज (थल, जल और वायु सेना) महिला परिक्रमा नौकायन अभियान है। इससे पहले इसी वर्ष मई 2025 में “नाविका सागर परिक्रमा-II” अभियान भी पूरा हुआ, जिसमें दो बहादुर नौसेना अधिकारी लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ए ने डबल-हैंडेड मोड में दुनिया की परिक्रमा कर भारत का परचम लहराया।

Navika Sagar Parikrama II: इंडियन नेवी की दो महिला अफसरों ने रचा इतिहास, पूरी की विश्व परिक्रमा, 29 को गोवा में होगा भव्य स्वागत

Samudra Pradakshina: नारी शक्ति और आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक

रक्षा मंत्री ने साउथ ब्लॉक से अपने संबोधन में कहा कि ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ केवल समुद्री यात्रा भर नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना और अनुशासन का अभियान है। उन्होंने कहा कि इस नौकायन यात्रा में 10 महिला अधिकारी नौ महीने तक समुद्र की लहरों से जूझते हुए दुनिया की परिक्रमा करेंगी। इस दौरान वे चुनौतियों का सामना करेंगी, लेकिन उनका दृढ़ निश्चय अंधकार को चीरते हुए विजय की ओर अग्रसर होगा। रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में इस अभियान को न केवल एक नौकायन यात्रा बल्कि “आध्यात्मिक साधना और अनुशासन की परख” बताया। उन्होंने कहा कि हमारी अधिकारी अनेक चुनौतियों का सामना करेंगी, लेकिन उनका दृढ़ संकल्प अंधेरे को चीरकर उजाला लेकर आएगा।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

इस यात्रा में 10 महिला अधिकारी स्वदेशी रूप से निर्मित भारतीय सेना नौकायन पोत त्रिवेणी (IASV Triveni) पर सवार होकर लगभग 26,000 समुद्री मील की दूरी तय करेंगी। यह पोत पुडुचेरी में बना 50 फुट लंबा यॉट है, जिसे आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बताया गया है।

Samudra Pradakshina: दो बार पार करेंगी भूमध्य रेखा

दल पूर्वी मार्ग से यात्रा करेगा और नौ महीने के दौरान भूमध्य रेखा (Equator) दो बार पार करनी होगी। दुनिया के तीन बड़े अंतरीपों लीउविन, हॉर्न और गुड होप का चक्कर लगाएंगी। यह यात्रा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा के बंदरगाहों को छूते हुए मई 2026 में मुंबई लौटेगी। इस दौरान अभियान दल अटलांटिक, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर सहित सभी बड़े महासागरों से गुजरेगा। सबसे कठिन चरण दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच दक्षिणी महासागर और ड्रेक पैसेज से गुजरना होगा, जहां विशाल लहरें, बर्फीली हवाएं और अप्रत्याशित तूफान नाविक कौशल की अंतिम परीक्षा माने जाते हैं।

इस अभियान के दौरान दल चार अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों फ्रेमेंटल (ऑस्ट्रेलिया), लिटलटन (न्यूजीलैंड), पोर्ट स्टेनली (कनाडा) और केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका) का दौरा करेगा। इन यात्राओं में भारतीय संस्कृति और सैन्य शक्ति का परिचय कराया जाएगा।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: अभियान दल की कमान है इनके हाथ

अभियान दल की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल अनुजा वरुडकर संभाल रही हैं, जबकि स्क्वाड्रन लीडर श्रद्धा पी राजू उप-अभियान नेता हैं। टीम में मेजर करमजीत कौर, मेजर ओमिता दलवी, कैप्टन प्राजक्ता पी निकम, कैप्टन दौली बुटोला, लेफ्टिनेंट कमांडर प्रियंका गुसाईं, विंग कमांडर विभा सिंह, स्क्वाड्रन लीडर अरुवी जयदेव और स्क्वाड्रन लीडर वैशाली भंडारी शामिल हैं।

इस दल ने पिछले तीन सालों में कठिन ट्रेनिंग ली है। शुरुआत छोटे जहाजों पर ऑफशोर अभियानों से हुई और फिर अक्टूबर 2024 में अधिग्रहित त्रिवेणी यॉट पर अभ्यास किया गया। इस वर्ष की शुरुआत में उन्होंने मुंबई से सेशेल्स तक एक अंतरराष्ट्रीय परीक्षण अभियान भी सफलतापूर्वक पूरा किया।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: भारत में बनी है IASV त्रिवेणी

पुडुचेरी में निर्मित 50 फुट लंबा पोत IASV त्रिवेणी में अत्याधुनिक नेविगेशन और सुरक्षा तकनीक लगाई गई है। यह अभियान वर्ल्ड सेलिंग स्पीड रिकॉर्ड काउंसिल के सभी मानकों का पालन करेगा। इसके अनुसार, सभी देशांतरों और भूमध्य रेखा को पार करना और बिना नहरों या मशीनरी की मदद के केवल पाल के सहारे 21,600 समुद्री मील से अधिक दूरी तय करनी होगी।

यात्रा के दौरान दल राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के साथ मिलकर वैज्ञानिक अनुसंधान भी करेगा। इसमें सूक्ष्म प्लास्टिक का अध्ययन, समुद्री जीवन का डॉक्यूमेंटेशन और महासागरों के स्वास्थ्य पर जागरूकता अभियान शामिल हैं।

नाविका सागर परिक्रमा (2017-18)

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह से नौका के जरिए पूरी दुनिया की यात्रा की गई हो। इससे पहले 2017 में भी भारतीय नौसेना ने नाविका सागर परिक्रमा मिशन शुरू किया था। यह मिशन पूरी तरह महिला दल द्वारा संचालित था और 1 अप्रैल 2017 को मुंबई से रवाना हुआ।

दल ने 254 दिनों में लगभग 29,000 नॉटिकल मील की दूरी तय की और 20 देशों के 14 बंदरगाहों पर रुका। इस यात्रा में लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी के नेतृत्व में छह महिला अधिकारियों ने आईएनएसवी तारिणी पर सवार होकर तूफानों, ऊंची लहरों और कठिन मौसम का सामना किया। यह पहली बार था जब भारतीय महिला अधिकारियों ने विश्व परिक्रमा पूरी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी वापसी पर स्वागत किया। इस मिशन को नारी शक्ति पुरस्कार और अन्य सम्मान भी मिले।

नाविका सागर परिक्रमा-II (2024-25)

वहीं, पहले मिशन की सफलता के बाद भारतीय नौसेना ने दिसंबर 2024 में नाविका सागर परिक्रमा-II की शुरुआत की। दो महिला नौसेना अधिकारियों लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ए ने INSV तारिणी दुनिया की परिक्रमा पूरी की। यह भारत का पहला सफल प्रयास था, जिसमें किसी दल ने डबल-हैंडेड मोड में परिक्रमा पूरी की।

यह यात्रा 2 अक्टूबर 2024 को गोवा से शुरू हुई थी और लगभग आठ महीने चली। इस दौरान INSV तारिणी ने 25,600 नॉटिकल मील की दूरी तय की। अभियान के दौरान दल ने चार बड़े अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों फ्रेमेंटल (ऑस्ट्रेलिया), लिटलटन (न्यूजीलैंड), पोर्ट स्टेनली (फॉकलैंड द्वीप) और केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) पर कॉल किया।

यह यात्रा बेहद कठिन रही। दक्षिणी महासागर और ड्रेक पैसेज जैसे खतरनाक जलक्षेत्र पार करते समय दल को तूफानों, खतरनाक ऊंची लहरों और बर्फीली हवाओं का सामना करना पड़ा। लंबी अवधि तक अकेलेपन और थकान से भी जूझना पड़ा। लेकिन इन दोनों अधिकारियों ने अपनी मानसिक और शारीरिक शक्ति से हर चुनौती को पार किया।

कैप्टन दिलीप डोंडे ने अकेले लगाया दुनिया का चक्कर

2009-10 में कैप्टन दिलीप डोंडे ने भारतीय नौसेना के लिए अकेले नाव से विश्व की परिक्रमा पूरी की। उनकी यह यात्रा न केवल भारत के समुद्री इतिहास में एक मील का पत्थर थी, बल्कि यह भी साबित करती थी कि भारतीय नाविक वैश्विक स्तर पर असाधारण साहस और कौशल का प्रदर्शन कर सकते हैं। डोंडे ने अपनी नौका, आईएनएसवी म्हादेई पर, चार महासागरों को पार करते हुए लगभग 21,600 समुद्री मील की दूरी तय की। इस दौरान उन्होंने तूफानों, तकनीकी चुनौतियों और अकेलेपन का सामना किया।

कमांडर अभिलाष टॉमी ने बनाया रिकॉर्ड

2012-13 में कमांडर अभिलाष टॉमी ने दुनिया की परिक्रमा करता हुए बड़ी उपलब्धि हासिल की। उन्होंने बिना रुके और बिना किसी बाहरी सहायता के विश्व की परिक्रमा पूरी की, जो भारत के लिए पहली बार था। टॉमी ने भी आईएनएसवी म्हादेई पर 150 दिनों में 23,000 समुद्री मील की यात्रा पूरी की। उनकी यह यात्रा न केवल तकनीकी रूप से कठिन थी, बल्कि इसमें मानसिक और शारीरिक चुनौतियां भी थीं।

1969 में सर रॉबिन नॉक्स-जॉनस्टन ने रचा इतिहास

1969 में सर रॉबिन नॉक्स-जॉनस्टन ने इतिहास रचते हुए दुनिया के पहले व्यक्ति बने जिन्होंने बिना रुके और बिना मदद के एकल नौकायन से विश्व की परिक्रमा पूरी की। उनकी नौका सुहैली पर उन्होंने 312 दिन में 30,000 समुद्री मील की यात्रा पूरी की। इस दौरान उन्होंने तूफानों, उपकरण खराबी और अकेलेपन जैसी चुनौतियों का सामना किया। यह उपलब्धि संडे टाइम्स गोल्डन ग्लोब रेस का हिस्सा थी, जिसमें वे एकमात्र प्रतिभागी थे जो दौड़ पूरी कर सके। उनकी इस साहसिक यात्रा ने समुद्री नौकायन में नया रिकॉर्ड बनाया और दुनियाभर में नाविकों को प्रेरित किया।

Safran-DRDO Jet Engine India: डीआरडीओ और फ्रांस की सफरान मिल कर बनाएंगे AMCA का इंजन, लेकिन क्या वाकई होगा 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर?

Safran-DRDO Jet Engine India Deal for AMCA, 100% Technology Transfer

Safran-DRDO Jet Engine India: भारत ने अपने पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का जेट इंजन बनाने के लिए फ्रांस की कंपनी के साथ समझौता किया है। यह समझौता भारत के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन और फ्रांस की सफरान के बीच हुआ है। इस समझौते के तहत भारत को पहली बार पूर्ण रूप से जेट इंजन की टेक्नोलॉजी मिलेगी। यह भारत का पहला 100 फीसदी स्वदेशी जेट इंजन होगा जिसे यहीं बनाया जाएगा। वहीं, यह साझेदारी भारत को उस कैटेगरी में ला सकती है, जहां आज तक केवल कुछ ही देश हैं, जिनके पास अपने लड़ाकू विमानों के लिए पूर्ण इंजन बनाने की क्षमता है।

AMCA jet engine: भारत-फ्रांस मिलकर बनाएंगे पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी इंजन, राजनाथ सिंह किया बड़ा एलान, राफेल बनाने वाली कंपनी सफरान के साथ होगी साझेदारी

खास बात यह होगी कि पहली बार देश को जेट इंजन बनाने की पूरी तकनीक यानी 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिलने की संभावना है। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी सफरान (Safran) और भारत की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन की विंग गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE) मिलकर एक नया हाई-थ्रस्ट जेट इंजन डेवलप करेंगे, जो भविष्य के भारतीय लड़ाकू विमान एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) को पावर देगा।

Safran-DRDO Jet Engine India: 100% ToT की पेशकश

इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि फ्रांस ने भारत को 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण क्रिस्टल ब्लेड टेक्नोलॉजी (Crystal Blade Technology) भी शामिल है। यह टेक्नोलॉजी जेट इंजन का सबसे संवेदनशील और अत्याधुनिक हिस्सा है। सामान्यत: कोई भी देश इसे साझा नहीं करता।

क्रिस्टल ब्लेड्स खास धातुओं सुपर-अलॉय से बनाए जाते हैं और उन्हें इस तरह से ढाला जाता है कि वे बेहद उच्च तापमान और दबाव में भी बिना टूटे लंबे समय तक काम कर सकें। यह तकनीक इंजन की विश्वसनीयता, कार्यक्षमता और लाइफ साइकिल को बढ़ाती है। अब तक यह तकनीक केवल कुछ ही देशों के पास थी। डीआरडीओ के पास भी इस दिशा में रिसर्च मौजूद है, लेकिन हाई-थ्रस्ट फाइटर इंजन के स्तर पर इसे आकार देना एक बहुत बड़ी चुनौती रही है।

Safran-DRDO Jet Engine India: AMCA के लिए गेम चेंजर इंजन

इस नए इंजन का इस्तेमाल भारतीय वायुसेना के AMCA प्रोग्राम में होगा, जो एक डबल-इंजन स्टील्थ मल्टी-रोल फाइटर विमान होगा। यह नया इंजन 120 किलो न्यूटन (KN) की क्षमता वाला होगा और भविष्य में इसे 140 KN तक अपग्रेड किया जा सकेगा। इससे भारत का AMCA, जो 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ मल्टी-रोल फाइटर जेट है, पूरी तरह स्वदेशी इंजन पर उड़ सकेगा।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि यह परियोजना लगभग 12 साल में पूरी होगी, जिसमें 9 प्रोटोटाइप इंजन तैयार किए जाएंगे। इसके बाद इन्हें टेस्टिंग और प्रोडक्शन की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा। इंजन को भारत में ही भारतीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के तहत डेवलप किया जाएगा और सफरान अपनी पूरी तकनीक भारत को सौंपेगा। इस विमान के निर्माण में निजी क्षेत्र भी शामिल होगा, जिसमें टाटा ग्रुप, एल एंड टी और अडानी डिफेंस जैसी कंपनियां भी शामिल होंगी।

Safran-DRDO Jet Engine India: पीएम मोदी ने किया था एलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में लाल किले के प्राचीर से जेट इंजन के स्वदेशी विकास पर जोर दिया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी संकेत दिए थे कि भारत जल्द ही लड़ाकू विमानों के इंजन विकसित करने का कार्य शुरू करेगा। इस समझौते को अमलीजामा पहनाने में पिछले दो साल से काम चल रहा था, लेकिन अब मोदी सरकार ने डीआरडीओ को प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है जिसे शीर्ष स्तर पर हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।

Safran-DRDO Jet Engine India: फेल हुआ कावेरी

हालांकि भारत पहले भी जेट इंजन बनाने की कोशिश कर चुका है। डीआरडीओ के कावेरी इंजन (Kaveri Engine Project) पर सालों तक काम हुआ लेकिन यह परियोजना कभी सफल नहीं हो पाई। इसका मुख्य कारण था उच्च तापमान सहन करने की तकनीक की कमी। अब फ्रांस की मदद से भारत को यह तकनीक मिलेगी और वह अपनी विफलताओं को पीछे छोड़कर भविष्य की दिशा में बड़ा कदम रख सकेगा।

Safran-DRDO Jet Engine India: कौन-कौन से देश बना पाए अपने इंजन

यह कदम भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज दुनिया में सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ही ऐसे देश हैं जिनके पास अपने लड़ाकू विमानों के लिए इंजन बनाने की क्षमता है। चीन अभी भी रूस के इंजन या उनकी नकल (रिवर्स इंजीनियरिंग) पर निर्भर है।

वर्तमान में भारत अपने लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी कंपनी जीई से इंजन आयात कर रहा है। तेजस लड़ाकू विमानों के लिए 212 F-404 इंजन मंगाए गए हैं और जल्द ही 113 और इंजनों के लिए समझौता होने वाला है। इसके अलावा भारत GE F-414 इंजन भी ले रहा है, लेकिन इसमें तकनीक ट्रांसफर केवल 80 फीसदी तक सीमित है।

Safran-DRDO Jet Engine India: फ्रांस भरोसेमंद साझेदार

सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी प्रस्तावों अक्सर कई शर्तें होती हैं। जो कई बार स्ट्रैटेजिक तौर पर नुकसानदेह होती हैं और भारत की संप्रभुता के साथ समझौता नहीं किया दा सकता। इसके उलट, फ्रांस भारत का भरोसेमंद साझेदार रहा है। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भी फ्रांस ने भारत पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था और भारतीय मिसाइलों के लिए अत्याधुनिक INGPS सिस्टम और मिराज 2000 विमानों के लिए आवश्यक पार्ट्स की सप्लाई जारी रखी थी। यही कारण है कि भारत इस बार फ्रांस पर भरोसा कर रहा है।

Safran-DRDO Jet Engine India: भारतीय वायुसेना के पास 36 राफेल विमान

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास 36 राफेल विमान हैं, जिन्हें 73 KN M-88 स्नेमा इंजन पावर देता है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि भारत दसॉ एविएशन से 114 और मल्टी-रोल फाइटर भारत में बनाने पर विचार कर रहा है। वहीं,
सफरान और डीआरडीओ के 120-140 KN का इंजन आने वाले दशकों में भारतीय वायुसेना के सबसे अहम प्लेटफॉर्म को पावर देगा। इसके जरिए वायुसेना न सिर्फ AMCA बल्कि नौसेना के ट्विन-इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) को भी मजबूती दे सकेगी।

रूस ने भी नहीं दी थी पूरी टेक्नोलॉजी

कई देशों ने भारत को जेट इंजन तकनीक साझा करने या लाइसेंस प्राप्त उत्पादन की अनुमति तो दी, लेकिन कभी भी 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश नहीं की। रूस ने सुखोई Su-30 MKI के लिए AL-31FP इंजन की टेक्नोलॉजी का आंशिक तौर पर ट्रांसफर की थी। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को कोरापुट, ओडिशा में इन इंजनों के उत्पादन का लाइसेंस मिला था। हालांकि, यह केवल असेंबली और कुछ हिस्सों तक सीमित रहा, जबकि डिजाइन, मैटेरियल साइंस और सिंगल-क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड जैसी कोर टेकनोलॉजी रूस ने अपने पास रखी थी।

इससे पहले फ्रांस की सफरान ने मिराज 2000 के लिए Snecma M53 इंजन की कुछ तकनीकी जानकारी और मेंटेनेंस सपोर्ट दिया था। हालांकि, यह भी पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं था, बल्कि ऑपरेशनल और मेंटेनेंस स्तर तक सीमित था।

वहीं, ब्रिटेन ने भी 1960 और 70 के दशक में रोल्स-रॉयस इंजनों की टेक्नोलॉजी भारत के साथ साझा की थी। उस समय HS-748 और जगुआर विमानों के लिए Adour इंजन का लाइसेंस प्राप्त निर्माण हुआ। लेकिन यहां भी टेक्नोलॉजी केवल प्रोडक्शन और मेंटेनेंस तक सीमित रही, जबकि इंजन डिजाइन और कोर टेक्नोलॉजी पूरी तरह से भारत को नहीं मिली थी।

अमेरिका ने भारत को लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एलसीए तेजस के लिए GE F404 इंजन दिया। बाद में F414 इंजन के लिए करीब 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की गई, जो एलसीए Mk2 और AMCA के लिए प्रस्तावित हैं। लेकिन इसमें भी थर्मल कोटिंग और ब्लेड मशीनिंग जैसी कुछ अहम तकनीकें साझा नहीं की गईं हैं।

बाकी देशों को भी नहीं मिली टेक्नोलॉजी

जेट इंजन की पूरी टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर डिफेंस सेक्टर का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। दुनिया में अब तक ऐसे बहुत ही कम उदाहरण सामने आए हैं जहां किसी देश ने किसी अन्य देश को जेट इंजन की पूरी टेक्नोलॉजी डिजाइन, मैटेरियल साइंस, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रायल्स समेत पूरी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की हो। यही वजह है कि भारत को हाल ही में फ्रांस से मिली 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश को दुनियाभर में एक अपवाद के तौर पर देखा जा रहा है।

इतिहास पर नजर डालें तो चीन और रूस का उदाहरण सबसे प्रमुख हैं। रूस ने चीन को सुखोई Su-27 और Su-30 विमानों के लिए AL-31F इंजन की सप्लाई की थी और साथ ही लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन की अनुमति भी दी थी। चीन की शेनयांग कंपनी ने इन इंजनों का स्थानीय निर्माण शुरू किया और बाद में इन्हीं के आधार पर WS-10 ताइहांग इंजन डेवलप किया। हालांकि, रूस ने चीन को इंजन के कोर डिजाइन और सिंगल-क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड जैसी महत्वपूर्ण तकनीक नहीं दी। चीन ने रिवर्स इंजीनियरिंग और अपनी रिसर्च के जरिए यह क्षमता हासिल की, लेकिन रूस ने उस पर टेक्नोलॉजी की नकल करने का आरोप भी लगाया था।

दूसरा उदाहरण अमेरिका और जापान का है। अमेरिका ने जापान को F-15J और F-2 लड़ाकू विमानों के लिए प्रैट एंड व्हिटनी F100 और GE F110 इंजनों का लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन करने की इजाजत दी थी। जापान की कंपनी IHI ने इन इंजनों का निर्माण किया। हालांकि, यहां भी मामला आंशिक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तक सीमित रहा। इंजन असेंबली और कुछ सिस्टम के निर्माण की अनुमति तो मिली, लेकिन कोर डिजाइन और एडवांस मेटल अलॉयज और कोटिंग्स की टेक्नोलॉजी साझा नहीं की गई। जापान ने बाद में XF9-1 नामक स्वदेशी इंजन बनाने की कोशिश भी की थी।

दक्षिण कोरिया का अनुभव भी अलग नहीं रहा। अमेरिका ने वहां T-50 गोल्डन ईगल ट्रेनर विमान के लिए GE F404 इंजन की लाइसेंस प्राप्त निर्माण तकनीक दी। सैमसंग टेकविन (जो अब हनवा एयरोस्पेस है) ने इन इंजनों का निर्माण किया। लेकिन कोर डिजाइन और एडवांस टेक्नोलॉजी वहां भी साझा नहीं की गई। नतीजा यह रहा कि दक्षिण कोरिया अभी भी एडवांस जेट इंजनों के लिए अमेरिका पर निर्भर है।

फ्रांस ने भी अपने राफेल विमानों में इस्तेमाल होने वाले Snecma M88 इंजन की पूरी तकनीक किसी भी देश के साथ साझा नहीं की। यूएई और कतर जैसे सहयोगी देशों के साथ केवल ऑपरेशनल सपोर्ट और मेंटेनेंस स्तर का सहयोग किया गया, लेकिन पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं की।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक किसी भी देश ने जेट इंजन की सौ फीसदी तकनीक किसी अन्य देश को नहीं दी। कारण साफ है कि यह तकनीक न सिर्फ सैन्य बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। इसे साझा करने से किसी देश का तकनीकी वर्चस्व और प्रतिस्पर्धी लाभ कमजोर हो सकता है। यही वजह है कि ज़्यादातर मामलों में केवल आंशिक ट्रांसफर, लाइसेंस प्राप्त उत्पादन या मेंटेनेंस स्तर की जानकारी ही साझा की जाती है।

चीन जैसे देशों ने रिवर्स इंजीनियरिंग और स्वदेशी अनुसंधान के जरिए अपनी क्षमता बढ़ाई, लेकिन यह भी पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का उदाहरण नहीं माना जा सकता। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अब भी अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। फ्रांस और रूस ने भी कोर डिजाइन और मटेरियल साइंस की जानकारी साझा करने से हमेशा परहेज किया है।

भारत के लिए फ्रांस की सफरान कंपनी का AMCA प्रोजेक्ट के तहत 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रस्ताव इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह दुनिया के उन चुनिंदा मामलों में शामिल होगा जहां एक देश को इंजन डिजाइन, मैटेरियल साइंस, निर्माण और परीक्षण तक की पूरी जानकारी मिलेगी।

Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत? बालेन शाह और सुदन गुरुंग का भारत विरोधी एजेंडा

Nepal Regime Change: Nepal GenZ Protest Balen Shah, US Role & Regime Change, Donald Lu Connection Explained
Donald Lu, Sudan Gurang and Balen Shah

Nepal Regime Change: नेपाल की राजधानी काठमांडू की सड़कों पर जमकर हिंसा हुई है। संसद भवन जलकर खाक हो गया है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को इस्तीफा देना पड़ा है। देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी अब सेना के हाथों में है। यह सब कुछ एक ऐसे आंदोलन के बाद हुआ है जिसे ‘जेन जेड’ यानी युवाओं का आंदोलन बताया जा रहा था। लेकिन अब इस आंदोलन के पीछे छिपे हाथों और अंतरराष्ट्रीय साजिश के सबूत सामने आ रहे हैं।

Nepal Politics: नेपाल में क्यों लगे योगी आदित्यनाथ के पोस्टर? क्या खुल रहा है राजशाही की वापसी का रास्ता? नेपाली सेना प्रमुख के बयान से बढ़ी बैचेनी

Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 5 सितंबर 2025 को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था, “लगता है हमने भारत और रूस को सबसे गहरे, सबसे काले चीन के हवाले कर दिया है। काश वे साथ में लंबा और समृद्ध भविष्य रखें!” यह बयान उस समय आया जब नेपाल में जेनजेड आंदोलन तेज हो रहा था। ट्रंप के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने एक सुनियोजित संकेत के रूप में देखा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान नेपाल में हो रहे उथल-पुथल से सीधे जुड़ा हुआ है। ट्रंप ने जानबूझकर भारत, रूस और चीन के बीच बढ़ते सहयोग पर चिंता व्यक्त की थी। नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित एक रणनीतिक तौर महत्वपूर्ण देश है। एक अस्थिर नेपाल भारत और चीन दोनों के लिए सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकता है। ट्रंप के इस बयान के अगले ही दिन नेपाल में हिंसक प्रदर्शन तेज हो गए थे, जिससे सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है जिसमें वह दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं।

Nepal Regime Change: आंदोलन का मास्टरमाइंड?

वहीं, इस पूरे प्रदर्शन के पीछे दो चेहरे सबसे आगे नजर आए। पहला है काठमांडू के मेयर बालेन शाह और दूसरा है एक गैर-सरकारी संगठन ‘हामी नेपाल’ के संस्थापक सुदन गुरुंग। ये दोनों ही शख्सियतें अचानक से चर्चा में आई हैं। बालेन शाह को प्रदर्शनकारी अगला प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं तो सुदन गुरुंग को इस आंदोलन का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है।

35 वर्षीय बालेन मई 2022 से काठमांडू के 15वें मेयर है। उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के यह पद संभालने वाले पहले व्यक्ति बने। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए इस आंदोलन को समर्थन दिया। उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर युवाओं को सरकार के खिलाफ उतरने के लिए उकसाया। उनके इस पोस्ट के बाद ही नेपाल के सात से ज्यादा शहरों में युवा सड़कों पर उतर आए। शुरुआत सोशल मीडिया ऐप पर बैन के विरोध में हुई थी, लेकिन जल्द ही यह प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया।

Nepal Regime Change: अमेरिका से बालेन का कनेक्शन

बालेन शाह का अमेरिका से सीधा कनेक्शन भी सामने आया है। वह अमेरिकी राजदूत डीन आर थॉम्पसन से कई बार मिल चुके हैं। साल 2022 में हुई उनकी पहली मुलाकात की तस्वीरें खुद अमेरिकी राजदूत ने सोशल मीडिया पर साझा की थीं। साल 2023 में अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ ने बालेन शाह को दुनिया के टॉप 100 उभरते हुए नेताओं की सूची में शामिल किया था। इसके अलावा ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे प्रकाशनों में भी उन पर लेख छप चुके हैं।

Nepal Regime Change: कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा

शिक्षा से इंजीनियर बालेन ने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की है और उनका भारत से सीधा संबंध रहा है। उन्होंने कर्नाटक की विश्वेश्वरय्या टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। बालेन शाह के भारत-विरोधी रुख पर भी चर्चा हो रही है। साल 2023 में बालेंद्र शाह ने भारत की नई संसद भवन में ‘अखंड भारत’ के नक्शे के जवाब में अपने कार्यालय में अपने कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया। इस नक्शे में उन्होंने भारत के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के कुछ हिस्सों को नेपाल का अंग बताया।

साल 2023 में उन्होंने प्रभास की फिल्म ‘आदिपुरुष’ में एक संवाद का विरोध करते हुए नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारतीय बॉलीवुड फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी दी थी। उनका तर्क था कि फिल्म में यह संवाद कि ‘सीता भारत की बेटी हैं’ नेपाल की सांस्कृतिक संप्रभुता का उल्लंघन है। हालांकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें यह प्रतिबंध हटाना पड़ा था। उन्होंने नेपाली संस्थानों पर “भारतीय गुलाम” होने का आरोप लगाया। वे नेपाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं, इसलिए उन्हें आमतौर पर भारत-समर्थक नहीं माना जाता।

Nepal Regime Change: सुदन गुरुंग की फंडिंग का खुलासा

दूसरी तरफ सुदन गुरुंग हैं, जो ‘हामी नेपाल’ नाम के एनजीओ का नेतृत्व करते हैं। इसी एनजीओ ने नेपाल में युवाओं को इकट्ठा करने और प्रदर्शन करने का काम किया। सुदन गुरुंग ने इंस्टाग्राम पर ‘हाउ टू प्रोटेस्ट’ यानी ‘कैसे प्रदर्शन करें’ नाम से वीडियो शेयर किए और युवाओं को भड़काया। उनके एनजीओ को कोका-कोला, वाइबर और गोल्डस्टार जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से बीस करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं और इस फंडिंग ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या यह आंदोलन वास्तव में युवाओं का उबााल था या इसे अंतरराष्ट्रीय ताकतों द्वारा प्रायोजित किया गया था।

लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि संगठन को विवादास्पद व्यवसायियों का भी खुला समर्थन मिला। इनमें दीपक भट्टा जैसे अंतरराष्ट्रीय हथियार डीलर शामिल हैं, जिन पर इतालवी कंपनी के साथ बंदूक खरीद सौदे में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इसी तरह शंकर ग्रुप से जुड़े साहिल अग्रवाल भी इस संगठन को फंड कर रहे हैं, जिन पर COVID-19 महामारी के दौरान ब्लैक मार्केट में थर्मामीटर गन बेचने के आरोप में गिरफ्तारी तक हुई थी।

इन सबके अलावा, ‘हामी नेपाल’ को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से जुड़े फंड भी मिले हैं। सीआईए द्वारा स्थापित मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सांदुक रूत जैसे लोग इस संगठन को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि USAID और NED (नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी) जैसी अमेरिकी एजेंसियों से भी अप्रत्यक्ष फंडिंग के स्पष्ट संकेत मिले हैं। इन एजेंसियों ने “लोकतंत्र को बढ़ावा देने” और “युवा सशक्तिकरण” के नाम पर इस संगठन को भारी मात्रा में धन उपलब्ध कराया है।

Nepal Regime Change: भारत विरोधी है गुरुंग?

सुदन गुरुंग का एनजीओ पहले भी भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा है। साल 2025 की शुरुआत में जब भारत के ओडिशा में एक नेपाली छात्रा की मौत हुई थी, तब ‘हामी नेपाल’ ने नेपाल में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम किया था। उन्होंने भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन किए और भारत सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक नारेबाजी की।

Nepal Regime Change: पेट्रोल बम बनाने के तरीके बताए

नेपाल की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को जमीन पर उतारने और हिंसा भड़काने का काम डिस्कोर्ड और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर किया गया। इन ग्रुप्स में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से कहा गया कि वे ‘हत्यारा सरकार’ लिखी हुई डीपी लगाएं। नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को ‘शार्प शूटर’ बताकर शेयर किया गया। इन ग्रुप चैट में हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं।

डोनाल्ड लू का नेपाल कनेक्शन

इस पूरे घटनाक्रम में एक और नाम चर्चा में है, वह है अमेरिकी राजदूत डोनाल्ड लू का। डोनाल्ड लू अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण एशियाई मामलों के सहायक मंत्री हैं। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वह दक्षिण एशिया के देशों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सरकार बदलवाने की साजिश में शामिल हैं। पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने में भी उनकी भूमिका की बात कही जाती है।

डोनाल्ड लू ने पिछले साल दिसंबर में नेपाल का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने नेपाल सरकार के साथ एमसीसी (मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन) समझौते को आगे बढ़ाया था। यह समझौता नेपाल में लंबे समय से विवादों में रहा है। आलोचकों का मानना है कि यह समझौता नेपाल की संप्रभुता के खिलाफ है।

नेपाल में हुए इन हिंसक प्रदर्शनों ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। नेपाल भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। नेपाल में अशांति का सीधा असर भारत की सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल में शांति बहाली की अपील की है। उन्होंने कहा कि नेपाल की स्थिरता और शांति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

नेपाली सेना ने अब देश में कर्फ्यू लगा दिया है और स्थिति को नियंत्रण में लाने का प्रयास कर रही है। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल ने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। हालांकि, अभी तक स्थिति पूरी तरह से शांत नहीं हुई है। नेपाल के इतिहास में यह एक अहम मोड़ है, जहां युवाओं के आंदोलन ने एक सरकार को गिरा दिया, लेकिन इसके पीछे की अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

Nepal crisis: क्या नेपाल हिंसा के पीछे है अमेरिका-आईएसआई का हाथ, बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से क्या है कनेक्शन?

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India

Nepal crisis: काठमांडू और नेपाल के कई हिस्सों में हाल ही में भड़की हिंसा ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। सोशल मीडिया बैन के बाद फैले विरोध-प्रदर्शन में 19 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, जिसके बाद नेपाल सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। हालात अभी भी बेकाबू हैं औऱ वहां सेना ने मोर्चा संभाल लिया है। इन विरोध-प्रदर्शनों के चलते केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। कई राजनीतिक दलों के कई सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है। वहीं, भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ऐसे हालात का फायदा आतंकी संगठन और पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस उठा सकती है। सूत्रों का कहना है कि जैसे बांग्लादेश में छात्र आंदोलन हुआ वैसा ही कुछ नेपाल में देखने को मिल रहा है।

India-Bangladesh relations: बांग्लादेश में तेजी से पकड़ बना रहे चीन-पाकिस्तान, विदेश मामलों की संसदीय समिति ने जताई चिंता

Nepal crisis: अमेरिका, आईएसआई का हाथ? बांग्लादेश से कनेक्शन

नेपाल में भारी हिंसा हो रही है। युवा, खासकर जेन जेड, सोशल मीडिया बैन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। 3 सितंबर को सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप जैसे 26 प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा दिया, जिसे युवाओं ने अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया। प्रदर्शनकारियों ने संसद पर कब्जा करने की कोशिश की, पीएम केपी शर्मा ओली के घर पर आग लगाई। खुफिया सूत्रों का कहना है कि अमेरिका की सीआईए ने ‘रंग क्रांति’ की साजिश रची। नेपाल भारत-चीन के बीच है, अमेरिका वहां अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। हाल ही में बांग्लादेश में छात्र आंदोलन से शेख हसीना की सरकार गिरी। उसके पीछे भी अमेरिकी की डीप स्टेट का हाथ था। 2024 में बांग्लादेश में कोटा सिस्टम के खिलाफ छात्रों ने विरोध किया था। इससे हसीना सरकार गिरी। दोनों जगह युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से संगठित हुए। वहीं, इससे पहले श्रीलंका 2022 में भी ऐसा हो चुका है।

एजेंसियों का कहना है कि नेपाल अब पाकिस्तान के नए प्रॉक्सी वॉरफ्रंट में बदल सकता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान, धार्मिक और सांस्कृतिक रास्तों का इस्तेमाल कर भारत के हितों को कमजोर करने की कोशिश में है।

भारतीय एजेंसियों का मानना है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन ने भी पाकिस्तान की रणनीति को ताकत दी है। शेख हसीना के जाने और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े मोहम्मद यूनुस के सलाहकार बनने के बाद आईएसआई को खुली छूट मिल रही है। यही वजह है कि नेपाल और बांग्लादेश में इस्लामिक नेटवर्क तेजी से फैल रहे हैं।

Nepal crisis: रज्जाक मस्जिद का विवाद

मुख्य चिंता का केंद्र है सुनसरी जिले के बिराटनगर के पास इनरावा में बन रही रज्जाक मस्जिद। यह मस्जिद बांग्लादेश की एक एनजीओ, अलहाज शमसुल हक फाउंडेशन के जरिए बनाई जा रही है। जुलाई 2025 में इस मस्जिद की नींव रखी गई थी। भारतीय एजेंसियों का मानना है कि इस धार्मिक ढांचे की आड़ में आईएसआई गुप्त ठिकाने तैयार कर सकती है, जिसका इस्तेमाल जासूसी, कट्टरपंथ और आतंकी गतिविधियों के लिए किया जाएगा।

Nepal crisis: धार्मिक ढांचों का इस्तेमाल

खुफिया सूत्रों के अनुसार आईएसआई पहले भी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे इलाकों में मस्जिदों, मदरसों और सांस्कृतिक केंद्रों को अपनी गुप्त गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर चुकी है। ये जगहें देखने में धार्मिक लगती हैं, लेकिन वास्तव में वहां से जासूसी, फंडिंग और वैचारिक ब्रेनवॉशिंग जैसे काम होते हैं। अब वही रणनीति नेपाल में अपनाई जा रही है।

Nepal crisis: जनसांख्यिकीय बदलाव की कोशिश

भारत के विदेश मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि नेपाल जैसे हिंदू-बहुल देश में जानबूझकर कट्टरपंथी तत्वों को बसाने की कोशिश हो रही है। इसे “डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग” बताया जा रहा है, जिसके जरिए नेपाल की धार्मिक संरचना को बदला जा रहा है और भारत की सीमाओं को अस्थिर करने की साजिश रची जा रही है।

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India

Nepal crisis: नेपाल रूट से भारत में घुसपैठ की साजिश

भारत की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से कहती रही हैं कि नेपाल का 1,751 किलोमीटर लंबा खुला बॉर्डर आतंकियों और तस्करों के लिए आसान रास्ता है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे आतंकी संगठन नेपाल की ढिलाई का फायदा उठाकर भारत में घुसपैठ की कोशिश करते रहे हैं। हाल ही में नेपाल के राष्ट्रपति के सलाहकार सुनील बहादुर ठाकपा ने भी एक सेमिनार में इसी खतरे की तरफ इशारा किया।

भारत की सुरक्षा एजेंसियों को जानकारी मिली है कि पाकिस्तान की आईएसआई ने नेपाल के जरिए भारत में आतंकियों को भेजने की नई रणनीति बनाई है। चूंकि भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बेहद सख्त है, इसलिए आईएसआई अब नेपाल रूट पर ध्यान केंद्रित कर रही है। नेपाल और भारत के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जिसे आतंकियों, ड्रग माफिया और हथियार तस्करों ने पहले भी इस्तेमाल किया है।

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India
KP Sharma Oli Resigned

Nepal crisis: खालिस्तान और जैश ए मोहम्मद के आतंकियों की एंट्री

खुफिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हाल ही में जैश-ए-मोहम्मद आतंकियों ने नेपाल से भारत में घुसपैठ की कोशिश की। इसके अलावा आईएसआई खालिस्तान समर्थक तत्वों को भी इसी रास्ते से भेजने की तैयारी में है। पंजाब सीमा से घुसपैठ में लगातार नाकाम रहने के बाद पाकिस्तान अब नेपाल सीमा का सहारा ले रहा है।

Nepal crisis: बिहार और यूपी में लैंडिंग प्वाइंट

नेपाल रूट से आने वाले आतंकियों और तस्करों का लैंडिंग प्वाइंट अक्सर बिहार और उत्तर प्रदेश होता है। इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी यासीन भटकल जैसे लोगों ने भी इस सीमा का इस्तेमाल हथियार और गोला-बारूद लाने और भारत से बाहर भागने के लिए किया था। दरभंगा जैसे शहर इन आतंकियों के लिए ऑपरेशनल बेस बन चुके थे।

Nepal crisis: नेपाल सरकार की चेतावनी

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी एक प्रेस रिलीज जारी कर पुष्टि की है कि हाल के विरोध-प्रदर्शनों में बाहरी ताकतों का हाथ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, काठमांडू के दरबार स्क्वायर में सीआईए फंडिंग के जरिए आईएसआई, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े लोगों की गुप्त बैठक हुई थी। इसी बैठक में नेपाल में अस्थिरता फैलाने और भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजना बनी।

नेपाल सरकार ने साफ किया है कि उसकी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा और वह अपने भूभाग का इस्तेमाल विदेशी खुफिया एजेंसियों या आतंकी संगठनों को नहीं करने देगी।

पाकिस्तान-तुर्की और इस्लामिक नेटवर्क का खेल

विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल अब आईएसआई और तुर्की समर्थित इस्लामिक नेटवर्क के निशाने पर है। तुर्की से जुड़े संगठनों के जरिए नेपाल में मदरसा और मस्जिद बनाने की कोशिशें तेज हुई हैं। रिपोर्ट्स में सामने आया कि कुछ विदेशी संगठन नेपाल में अनाथ बच्चों और गरीब परिवारों के बच्चों को धार्मिक शिक्षा के नाम पर कट्टरपंथी शिक्षा दे रहे हैं। इसके लिए तुर्की और खाड़ी देशों से करोड़ों रुपए की फंडिंग हो रही है।

हाल ही में सुनसरी जिले के इनरावा में बांग्लादेश स्थित अल्हाज शमसुल हक फाउंडेशन ने मस्जिद की नींव रखी। इस मस्जिद को दावत-ए-इस्लाम का केंद्र बताया जा रहा है। यह गतिविधियां नेपाल की पारंपरिक धार्मिक सहिष्णुता के लिए खतरे की घंटी हैं।

भारत के लिए बढ़ता खतरा

नेपाल में इस्लामिक संगठनों की गतिविधियां सीधे भारत की सुरक्षा पर असर डाल सकती हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पहले से ही कई आतंकी नेटवर्क सक्रिय हैं। अगर नेपाल में आईएसआई और इस्लामिक संगठनों की जड़ें गहरी हो गईं, तो भारत में आतंकियों की घुसपैठ और आसान हो जाएगी।

2008 के कुख्यात IC-814 हाईजैक के पटकथा भी काठमांडू में ही लिखी गई थी। भारतीय खुफिया एजेंसियां पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि नेपाल में आतंकी नेटवर्क बनने की स्थिति में भारत को नई चुनौती झेलनी पड़ सकती है।

आईएसआई का नया जासूसी नेटवर्क

फरवरी 2025 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नेपाली नागरिक अंसारुल मियां अंसारी को गिरफ्तार किया। जांच में पता चला कि वह 2008 से आईएसआई के लिए जासूसी कर रहा था। उसके पास से गुप्त सेना दस्तावेज, लैपटॉप, प्रिंटर और संवेदनशील डेटा बरामद हुआ। वह पाकिस्तान के हैंडलरों से व्हाट्सएप और कॉल के जरिए निर्देश लेता था।

अंसारी नेपाल से भारत आकर यहां तैनात नेटवर्क के जरिए गोपनीय जानकारी पाकिस्तान तक भेजता था। उसके नेटवर्क में झारखंड निवासी अखलाक आजम और दिल्ली स्थित कुछ स्थानीय सहयोगी भी शामिल थे। यह नेटवर्क वेस्ट एशिया, नेपाल और भारत के बीच फैला हुआ था।

सीमा पर कड़ी चौकसी

भारत-नेपाल सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने हालात को देखते हुए चौकसी बढ़ा दी है। बारीकी से चेकिंग की जा रही है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। नेपाल पुलिस और भारतीय एजेंसियां भी समय-समय पर संयुक्त गश्त करती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही नेपाल सीमा पर सुरक्षा और कड़ी कर दी गई थी। खुफिया इनपुट्स मिलने के बाद कई बार तलाशी अभियान चलाए गए।

Eastern Ladakh LAC Update: इस साल सर्दियों में भी LAC पर डटे रहेंगे भारतीय सैनिक, चीन से ‘विश्वास’ बहाली तक किसी बदलाव के पक्ष में नहीं है भारतीय सेना

LAC geo-tagging
File Photo

Eastern Ladakh LAC Update: एससीओ समिट में पीएम मोदी और चीना राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत के बाद भी पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय सेना की तैनाती में कोई बदलाव नहीं किया गया है। दोनों नेताओं के बीच तियानजिन में हालिया मुलाकात के बाद भी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा हालात में भी सीमा पर कोई कमी नहीं की जाएगी। वहीं सीमा पर विंटर डिप्लॉयमेंट पहले की तरह जारी रहेगा यानी सर्दियों में भी बॉर्डर पर से सैनिकों की संख्या में कोई कटौती नहीं की जाएगी। जैसा पिछले साल था वैसा ही इस बार भी रहेगा।

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Eastern Ladakh LAC Update: सीमा पर तैनाती की स्थिति

सेना के भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि चीनी सेना भी उतने ही सैनिक और हथियारबंद यूनिट्स लेकर सीमा पर मौजूद है। ऐसे में भारत की तैनाती भी संतुलन बनाए रखने के लिए समान स्तर पर की गई है। पिछले साल 21 अक्टूबर को एलएसी पर पेट्रोलिंग बहाल होने के बाद से हालात शांतिपू्र्ण हैं। जिसके बाद डेपसांग और डेमचोक इलाके में डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

बता दें कि सर्दियों की शुरूआत होने वाली है, जिसके बाद हाई एल्टीट्यूड इलाकों में बर्फ जमने से रास्ते बंद हो जाएंगे और पेट्रोलिंग सीमित हो जाएगी। जिसके चलते सेना का फोकस सप्लाई लाइनों को बनाए रखने पर है। पूर्वी लद्दाख में अप्रैल 2020 के बाद चीन की भारी तैनाती के जवाब में भारत ने भी अतिरिक्त सैनिक, तोपें, टैंक, रॉकेट लॉन्चर, हेलिकॉप्टर और यूएवी तैनात किए थे। हालांकि हालात अब स्थिर हैं लेकिन अप्रैल 2020 से पहले जैसी सामान्य स्थिति अभी तक बहाल नहीं हुई है।

Eastern Ladakh LAC Update: थ्री-डी प्रस्ताव पर काम होना बाकी

भारत ने सीमा पर तनाव कम करने के लिए तीन-चरण में प्रस्ताव रखा है जिसे ‘थ्री-डी’ कहा जा रहा है। इसमें पहला ‘डी’ यानी डिसएंगेजमेंट (सैनिकों को फेस टू फेस डिप्लॉयमेंट से पीछे हटाना) पिछले साल अक्टूबर में पूरा हो गया था। लेकिन दूसरा चरण डी-एस्केलेशन (तनाव घटाना) और तीसरा डी-इंडक्शन (अतिरिक्त सैनिकों को स्थायी ठिकानों पर लौटाना) अब भी पूरा नहीं हुआ है और चीन के साथ बातचीत में इस पर कोई प्रगति नहीं हुई है। जबकि ये दोनों प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक सीमा पर सामान्य हालात नहीं बने रह सकते।

पिछले तीन महीनों में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर दोनों अपने-अपने चीनी समकक्षों से इस मुद्दे पर बातचीत कर चुके हैं। 19 अगस्त को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी की दिल्ली में स्पेशल रिप्रजेंटेटिव स्तर की मुलाकात हुई थी, जिसके बाद दोनों पक्षों ने एक साझा दस्तावेज भी जारी किया था जिसमें बॉर्डर मैनेजमेंट को लेकर बातचीत हुई थी। इसमें बॉर्डर मैनेजमेंट पर सहमति बनाने के लिए वर्किंग ग्रुप के गठन की बात कही थी, जिसमें WMCC के तहत एक वर्किंग ग्रुप बनाया जाएगा, ताकि सीमा पर प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित हो सके और शांति व स्थिरता बनी रहे।

इसके अलावा जनरल लेवल मैकेनिज्म को लेकर बातचीत हुई थी, जो अभी वेस्टर्न सेक्टर (पश्चिमी क्षेत्र) में है, उसके अलावा ईस्टर्न (पूर्वी), मिडल (मध्य) और अन्य सेक्टरों में भी जनरल लेवल मैकेनिज्म बनाया जाएगा। इसका मकसद है कि जमीनी स्तर पर जल्दी और सीधे तौर पर समन्वय हो सके। इसमें कमांडर स्तर के बीच सीधी बातचीत होगी।

साथ ही डिप्लोमैटिक और मिलिट्री लेवल मैकेनिज्म पर दोनों पक्षों ने यह तय किया था कि मौजूदा कूटनीतिक और मिलिट्री चैनलों का इस्तेमाल करते हुए बॉर्डर मैनेजमेंट के लिए कदम उठाए जाएंगे। इसका उद्देश्य है तनाव को कम करना (de-escalation) और उसी फ्रेमवर्क के भीतर काम करना, जिस पर पहले सहमति बनी थी।

वहीं, 31 अगस्त को तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी। इस दौरान मोदी ने स्पष्ट कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता जरूरी है ताकि द्विपक्षीय संबंधों का विकास सुचारू रूप से हो सके। बैठक के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए मौजूदा मैकेनिज्म का इस्तेमाल किया जाएगा और बड़े रिश्तों में किसी तरह की बाधा नहीं आने दी जाएगी।

Eastern Ladakh LAC Update: पीएलए की तैनाती क्यों है चिंता की बात

वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, चीन की कई ‘कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड्स’ कुछ इलाकों से पीछे हटी हैं, लेकिन कई ब्रिगेड्स अब भी एलएसी पर अग्रिम मोर्चे पर तैनात हैं। एक ब्रिगेड में करीब 4500 से 5000 सैनिक होते हैं जिनके पास टैंक, आर्मर्ड व्हीकल, आर्टिलरी और सरफेस टू एयर मिसाइलें होती हैं। यही वजह है कि भारतीय सेना अपनी तैनाती कम नहीं करना चाहती।

वहीं, डी-इंडक्शन यानी अतिरिक्त सैनिकों की स्थायी ठिकानों पर वापसी अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि जब तक चीन पूरी तरह पीछे नहीं हटता और विश्वास बहाली के ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक भारतीय तैनाती में कोई ढील नहीं दी जाएगी।

Eastern Ladakh LAC Update: नए जनरल-लेवल मैकेनिज्म की व्यवस्था

दोनों देशों ने अब एलएसी के अलग-अलग सेक्टरों के लिए नए जनरल-लेवल मैकेनिज्म बनाने पर सहमति जताई है। पश्चिमी सेक्टर (लद्दाख) में भारतीय 14 कॉर्प्स कमांडर और चीनी साउथ शिनजियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट चीफ पहले से बातचीत कर रहे हैं। अब मध्य सेक्टर (उत्तराखंड, हिमाचल) और पूर्वी सेक्टर (सिक्किम, अरुणाचल) के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था की जाएगी। भारत की तरफ से इसमें बरेली स्थित उत्तर भारत एरिया और नगालैंड-आसाम स्थित 3 और 4 कॉर्प्स शामिल हो सकते हैं।

Eastern Ladakh LAC Update: कई इलाकों में पेट्रोलिंग राइट्स नहीं  

पूर्वी लद्दाख में अब भी कई ऐसे इलाकों में भारतीय सेना की पैट्रोलिंग के अधिकार पूरी तरह बहाल नहीं हुए हैं। गलवान, पैंगोंग त्सो झील का उत्तरी किनारा, कैलाश रेंज और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में बफर जोन बनाए गए हैं, जिनकी चौड़ाई 3 किलोमीटर से 10 किलोमीटर तक है। यह बफर जोन भारतीय इलाकों में ही बने हैं।