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Operation Sarp Vinash: 22 साल पहले में जम्मू की पहाड़ियों में चला था ऐतिहासिक मिलिट्री ऑपरेशन, अब लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने अपनी किताब में खोले राज

Operation Sarp Vinash: Lt Gen H.S. Lidder’s Book Revisits the Historic Counter-Terror Operation in Poonch
Operation Sarp Vinash: Lt Gen H.S. Lidder’s Book Revisits the Historic Counter-Terror Operation in Poonch

Operation Sarp Vinash Book launch: इस साल सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खात्मे के लिए ऑपरेशन सर्प विनााश 2.0 चलाया था। लेकिन जम्मू–कश्मीर में आज से 22 साल पहले चलाए ऑपरेशन सर्प विनाश के बारे में कम ही लोग जानते हैं। उस ऑपरेशन जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के नेटवर्क को समूल नष्ट कर दिया था।

लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एचएस लिड्डर ने Operation Sarp Vinash Book launch अपनी नई किताब  “ऑपरेशन सर्प विनाश” में उस ऐतिहासिक सैन्य ऑपरेशन के बारे में विस्तार से बताया है। इस किताब में भारतीय सेना द्वारा 2003–04 में जम्मू-पुंछ के इलाकों में चलाए गए ऐतिहासिक आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के कई अहम पहलुओं को पहली बार विस्तार से पेश किया है।

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लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) हरदेव सिंह लिड्डर ने बताया कि इस ऑपरेशन की योजना, क्रियान्वयन और परिणाम को समझे बिना आज की सुरक्षा चुनौतियों का आकलन अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन भारतीय सेना के इतिहास में एक मील का पत्थर था, क्योंकि यह एक ऐसा अभियान था, जिसमें आतंकवादियों को उनके मजबूत बिलों से बाहर निकालकर आतंकवाद के फन को कुचला गया।

बताई ऑपरेशन की अंदरूनी रणनीति

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने बताया कि ऑपरेशन की योजना बेहद सावधानी से बनाई गई थी और इसका लक्ष्य आतंकवादियों को भागने का कोई रास्ता नहीं देना था। उन्होंने कहा कि आतंकियों की रणनीति हमेशा शूट एंड रन की होती है। इसे खत्म करने के लिए सेना ने ऑपरेशन को इस तरह डिजाइन किया कि आतंकवादी चारों ओर से घिर जाएं।

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने कहा कि ऑपरेशन से पहले ही इलाके को चारों तरफ से कवर कर लिया गया था। उन्होंने 15 कोर के कमांडर को बताया था कि आतंकवादी भागने की कोशिश करेंगे, इसलिए सभी संभावित रास्तों को जाल की तरह बंद कर दिया गया।

जब आतंकवादी भागने लगे, तो 18 आतंकी घेराबंदी में मारे गए। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसा निर्णायक मोड़ था जिसने उस समय जम्मू-पुंछ क्षेत्र में आतंकवाद की रीढ़ तोड़ दी। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के दौरान लॉन्चर, आर्टिलरी, और हेलिकॉप्टर जैसे सभी संसाधन तैयार रखे गए थे ताकि किसी भी स्थिति से निपटा जा सके। इस अभियान में सेना ने अपनी रणनीतिक और सामरिक क्षमता का प्रदर्शन किया।

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने किताब में बताया है कि यह ऑपरेशन केवल आतंकियों की संख्या घटाने के लिए नहीं था, बल्कि उनके ठिकानों को स्थायी रूप से खत्म करने के लिए था। जब तक आतंकियों के सुरक्षित बेस मौजूद रहते हैं, तब तक आतंकवाद खत्म नहीं किया जा सकता। सेना ने इन बेसों को खत्म कर आतंकवाद की जड़ पर चोट की।

Operation Sarp Vinash: Lt Gen H.S. Lidder’s Book Revisits the Historic Counter-Terror Operation in Poonch
Operation Sarp Vinash: Author Lt Gen H.S. Lidder and Co-Author Jaishree

को-ऑथर जयश्री ने बताई किताब लिखने की वजह – Operation Sarp Vinash Book launch

किताब की को-ऑथर जयश्री ने भी इस मौके पर अपने अनुभव साझा किए। जयश्री ने कहा कि 2023 के अंत में उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर से लंबी बातचीत की थी, जिसमें उन्होंने ऑपरेशन सर्प विनाश के विवरण साझा किए। इसके बाद उन्होंने इस ऑपरेशन के इतिहास को दस्तावेज के रूप में सामने लाने का फैसला लिया।

जयश्री ने बताया कि उनके लिए जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों के नाम और भूगोल शुरू में अनजान थे। लेकिन ऑपरेशन में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों और सैनिकों की मदद से वे इस अभियान के हर चरण को समझ पाईं। उन्होंने कहा कि यह किताब उन लोगों के लिए है जो यह जानना चाहते हैं कि भारतीय सेना ने किस तरह कठिन परिस्थितियों में एक बड़े आतंकी गढ़ को ध्वस्त किया।

लोग पूछते थे “कितने आतंकवादी मारे गए”

बुक लॉन्च में लेफ्टिनेंट जनरल रमन धवन ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उस समय ऑपरेशन के दौरान उन पर काफी दबाव था और मीडिया में भी इसे लेकर खूब चर्चा हुई थी। कई वरिष्ठ अधिकारी इस ऑपरेशन को समझ नहीं पा रहे थे, क्योंकि उस दौर में आतंकवाद विरोधी अभियानों को सिर्फ “कितने आतंकवादी मारे गए” के आंकड़ों से आंका जाता था।

उन्होंने कहा कि 2001 से 2003 के बीच पुंछ-राजौरी क्षेत्र में हालात बेहद गंभीर थे। पहाड़ों और जंगलों से भरे इस इलाके में आतंकवादी 5,000 से 7,000 फीट की ऊंचाई पर बने अपने ठिकानों से सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों को निशाना बनाते थे। हर महीने औसतन 35-45 आतंकवादी मारे जाते थे, लेकिन इसके साथ ही 10-12 सुरक्षाकर्मी भी शहीद होते थे। कई बार जवानों और अधिकारियों को हर दूसरे दिन अपने साथियों की अंत्येष्टि में शामिल होना पड़ता था।

हिलकाका में चलाया था ऑपरेशन सर्प विनाश

उन्होंने बताया कि साल 2001 से लेकर 2003 के बीच जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधियों में भारी बढ़ोतरी हुई थी। विशेष रूप से पुंछ-राजौरी के हिलकाका इलाकों में स्थिति बेहद गंभीर थी। पाकिस्तान से प्रशिक्षित आतंकवादी नियंत्रण रेखा पार कर इस घने जंगल और पहाड़ी क्षेत्र में आसानी से छिप जाते थे। इस इलाके की ऊंचाई 5,000 से 7,000 फीट तक थी।

हिलकाका का इलाका घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और बिना सड़कों वाला क्षेत्र था। नियंत्रण रेखा से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इन पहाड़ियों में आतंकवादी को प्राकृतिक गुफाएं और अस्थायी ‘धोक’ को अपना ठिकाना बनाते थे। गुर्जर-बकरवाल जनजातियां हर साल गर्मियों में यहां मवेशी चराने आती थीं और सर्दियों में खाली छोड़ जाती थीं। आतंकवादी इन्हीं खाली ‘धोक’ पर कब्जा कर लेते थे और सालों तक बिना रुकावट के गतिविधियां चलाते रहे। यह क्षेत्र इतना सुरक्षित माना जाता था कि आतंकवादी स्थानीय लोगों के साथ क्रिकेट तक खेलते थे।

रोमियो फोर्स और 163 इन्फैंट्री ब्रिगेड ने बनाई रणनीति

आतंकवाद को खत्म करने के लिए सेना ने मल्टी डायमेंशनल रणनीति अपनाई। ऑपरेशन की प्लानिंग गुप्त रखी गई। चार वरिष्ठ अधिकारियों तक ही रणनीति सीमित रही ताकि आतंकियों को भनक न लगे। पहाड़ियों में फिश नेट की तरह घेराबंदी कर आतंकियों को भागने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा गया। इस ऑपरेशन को नाम दिया गया ‘ऑपरेशन सर्प विनाश’। इसमें दो कोर श्रीनगर स्थित 15 कोर और नागरोटा स्थित 16 कोर ने मिलकर अभियान चलाया।

16 कोर की रिजर्व फॉर्मेशन 163 इन्फेंट्री ब्रिगेड को इलाके में भेजा गया। 9 पैरा कमांडो पहले से इलाके में सक्रिय थे और उन्होंने नई टुकड़ियों को रात के समय गाइड कर ऑपरेशन शुरू कराया। साथ ही वायुसेना की मदद से हेलिपैड और सप्लाई बेस बनाये गये ताकि दुर्गम क्षेत्रों में रसद और घायल सैनिकों को निकाला जा सके। स्थानीय गुर्जर-बकरवाल समुदाय से भी खुफिया जानकारी जुटाई गई।

सबसे अहम भूमिका 9 पैरा कमांडो की थी, जो पहले से इलाके में सक्रिय थे और इलाके से भलीभांति परिचित थे। इन कमांडो को गाइड बनाकर 163 इन्फेंट्री ब्रिगेड को रात के समय तीन दिशाओं से इलाके में उतारा गया। उद्देश्य था आतंकियों को चारों तरफ से घेरकर उनके ठिकानों पर सर्च एंड डिस्ट्रॉय अभियान चलाना।

65 आतंकवादियों को मार गिराया

सर्दियों के बाद मार्च के आखिरी सप्ताह में सेना की टुकड़ियां हिलकाका और आसपास के इलाकों में दाखिल हुईं। ऑपरेशन की प्लानिंग इस तरह से थी कि आतंकवादी भाग न सकें। वहीं, आतंकवादी भागने की कोशिश में 15 कोर की घात में फंस गए।

लगभग एक महीने तक चले इस ऑपरेशन में सेना ने 65 आतंकवादियों को मार गिराया, तीन को जिंदा पकड़ा और भारी मात्रा में युद्ध सामग्री बरामद की। इस दौरान पांच सैनिक शहीद हुए। आतंकियों के ठिकाने पूरी तरह नष्ट कर दिए गए और हिलकाका क्षेत्र को दोबारा भारत के नियंत्रण में सुरक्षित कर लिया गया और सुरक्षा बलों ने ऊंचाई वाले इलाकों में स्थायी चौकियां स्थापित कर दीं।

इस ऑपरेशन की खासियत यह थी कि इसे लिखित ऑपरेशन ऑर्डर के तहत, हेलिकॉप्टरों और मल्टी-डायरेक्शनल रणनीति के साथ अंजाम दिया गया। आमतौर पर आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन इतने बड़े पैमाने पर नहीं होते, लेकिन यह अभियान उस दृष्टि से ऐतिहासिक था। हिलकाका का इलाका ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों, घने जंगलों और सीमित रास्तों वाला था। कोई पक्की सड़कें नहीं थीं, जिससे सेना को पैदल और हवाई रास्तों से ऑपरेशन चलाना पड़ा। दुश्मन की नज़रों से बचकर रात में पहाड़ियों पर चढ़ाई करना सैनिकों के लिए बड़ी चुनौती थी। फिर भी भारतीय सेना ने बिना हिचके ऑपरेशन को अंजाम दिया।

ऑपरेशन सर्प विनाश की अहमियत

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने कहा कि सैकड़ों ऑपरेशन होते हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर, इतनी सफलता के साथ आतंकवाद विरोधी अभियान कम ही हुए हैं। इस ऑपरेशन को सैन्य अकादमियों में अध्ययन के लिए एक ‘स्टडी केस’ के रूप में लिया जाना चाहिए।

वहीं, लेफ्टिनेंट जनरल धवन ने बताया कि हिलकाका को खत्म कर सेना ने पाकिस्तान के संभावित युद्धकालीन रणनीतिक खतरे को भी समाप्त कर दिया। अगर वह क्षेत्र आतंकियों के हाथ में रहता, तो किसी भी संघर्ष की स्थिति में पाकिस्तान की घुसपैठ को बड़ी सामरिक बढ़त मिल सकती थी।

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IAF Chief on Operation Sindoor: वायुसेना प्रमुख बोले- पाकिस्तान का नैरेटिव ‘मनोहर कहानियों’ जैसा, ऑपरेशन सिंदूर में गिराए एफ-16 और जेएफ-17 समेत 10 फाइटर जेट

IAF Chief on Operation Sindoor
Photo: Raksha Samachar

IAF Chief on Operation Sindoor: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने वायुसेना दिवस से पहले आयोजित सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान और ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कई खुलासे किए। उन्होंने बताया कि मई में हुई झड़पों के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 10 से अधिक फाइटर जेट गिराए, जिनमें अमेरिका निर्मित एफ-16 और चीन-पाकिस्तान के बनाए जेएफ-17 भी शामिल थे।

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उन्होंने पाकिस्तान के दावों को खारिज करते हुए कहा कि “उनकी बातें मनोहर कहानियों जैसी हैं।” एयर चीफ ने बताया कि भारतीय वायुसेना ने 300 किलोमीटर अंदर जाकर पाकिस्तान के एयरबेस, राडार, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर और लड़ाकू विमानों को सटीक हमलों में निशाना बनाया। यह भारतीय वायुसेना का अब तक का सबसे लंबा “किल” माना जा रहा है।

पाकिस्तान का झूठा नैरेटिव- “मनोहर कहानियों” जैसा

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दावा किया था कि उन्होंने भारत के 7 फाइटर जेट गिराए। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए एयर चीफ मार्शल सिंह ने व्यंग्य में कहा, “अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने हमारे 15 विमान गिराए हैं, तो उम्मीद है अगली बार जब वे लड़ाई में आएंगे, तो 15 कम विमान लेकर आएंगे।”

ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान की तरफ से किए जा रहे दावों पर एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि पाकिस्तान की जो नैरेटिव फैलाया जा रहा है वह “मनोहर कहानियों जैसा” है, जिनका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयरबेस, एयर डिफेंस और कमांड सेंटरों को स्ट्राइक्स में निशाना बनाया।

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना की जबरदस्त स्ट्राइक -IAF Chief on Operation Sindoor

22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए 6 और 7 मई की दरमियानी रात ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। यह 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद सबसे बड़ा सैन्य अभियान था।

इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने बिना एलओसी या इंटरनेशनल बॉर्डर पार किए पाकिस्तान की सीमा के अंदर 300 किलोमीटर तक अंदर जाकर रडार स्टेशन, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, रनवे और हैंगर को निशाना बनाया।

एयर चीफ ने बताया कि इस अभियान में चार रडार साइट, दो कमांड कंट्रोल सेंटर, दो रनवे और तीन बड़े हैंगर को भारी नुकसान पहुंचा। एक सी-130 श्रेणी का विमान और पांच एफ-16 व जेएफ-17 वर्ग के लड़ाकू विमान भी नष्ट कर दिए गए।

उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तरों पर पाकिस्तान के लिए झटका था और अंततः उन्हें 10 मई को सीजफायर के लिए भारत से अनुरोध करना पड़ा।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने बताया कि भारतीय वायुसेना ने हवा में 4 से 5 फाइटर जेट मार गिराए। इनमें अमेरिकी एफ-16 और जेएफ-17 श्रेणी के लड़ाकू विमान थे। इसके अलावा, एक लॉन्ग रेंज स्ट्राइक में पाकिस्तान का एक अवॉक्स या सिग्निफिकेंट इंटेलिजेंस एयरक्राफ्ट भी ध्वस्त हुआ।

IAF Chief on Operation Sindoor

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने एक बार फिर दिखा दिया कि भारतीय वायुसेना किसी भी चुनौती का जवाब निर्णायक और सटीक तरीके से दे सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिंदूर का मकसद आतंकवाद के खिलाफ सर्जिकल और सीमित कार्रवाई करना था, न कि व्यापक युद्ध को भड़काना।

स्वदेशी हथियारों और नई तकनीक पर फोकस

प्रेस कॉन्फ्रेंस में एयर चीफ ने भारत की आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि तेजस एमके1ए, एएमसीए (AMCA), आकाश-NG, एस्ट्रा मिसाइल, नए रडार सिस्टम्स और एयरबॉर्न वॉर्निंग सिस्टम्स पर तेजी से काम हो रहा है।

उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना घरेलू उद्योगों, एमएसएमई सेक्टर और स्टार्टअप्स को रक्षा उत्पादन में बढ़ावा दे रही है। स्वदेशी हथियार प्रणालियों के जरिए न सिर्फ आयात पर निर्भरता घटाई जाएगी बल्कि भारत को रक्षा निर्यातक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

एयर चीफ ने कहा कि भारत भविष्य के लिए फिफ्थ जनरेशन और उससे आगे की टेक्नोलॉजी को अपनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। एएमसीए प्रोग्राम पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और इसकी पहली उड़ान परीक्षण इस दशक के अंत तक होने की उम्मीद है। और 2035 तक इसे ऑपरेशनल करने का लक्ष्य है। इस बार निजी उद्योगों को भी प्रोजेक्ट में शामिल किया गया है जिससे प्रगति तेज होने की उम्मीद है।

वहीं, राफेल और एस-400 को लेकर उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना किसी भी वेपन सिस्टम के सिलेक्शन में अपनी दीर्घकालिक जरूरतों और ऑपरेशनल क्षमता को प्राथमिकता देती है। राफेल जैसे विमानों को शामिल करना आसान है क्योंकि इनकी ट्रेनिंग और मेंटेनेंस सिस्टम पहले से मौजूद है। एयर चीफ ने कहा कि 114 रफाल विमान भारत के लिए एक संभावित विकल्प हैं। पहले के अनुभव और तैयारियों के कारण राफेल को शामिल करना आसान होगा। जो भी कंपनी भारत में मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रस्ताव देगी, उस पर विचार किया जाएगा।

IAF Chief on Operation Sindoor
Photo: Raksha Samachar

बढ़ेगी अनमैन्ड सिस्टम की जरूरत

एयर चीफ ने कहा कि भविष्य में अनमैन्ड सिस्टम (UAV/UCAV) की भूमिका और बढ़ेगी। हालांकि, उन्होंने साफ कहा कि मैन और मशीन का कॉन्बिनेशन ही निर्णायक रहेगा। अनमैन्ड सिस्टम कुछ मिशनों में अहम भूमिका निभाएंगे, लेकिन मैन सिस्टम को पूरी तरह रिप्लेस नहीं करेंगे।

भारतीय वायुसेना इस क्षेत्र में स्वदेशी प्रोजेक्ट्स और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के साथ तेज़ी से काम कर रही है। डीआरडीओ के कई प्रोजेक्ट्स इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं।

एयर चीफ ने बताया कि 2047 तक का एक रोडमैप तैयार किया गया है जिसमें वायुसेना को मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस के लिए सक्षम बनाया जा रहा है। तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को औपचारिक ढांचा देने पर काम हो रहा है ताकि किसी भी ऑपरेशन में सामूहिक ताकत का प्रभावी इस्तेमाल हो सके।

उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्ध में साइबर, स्पेस और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर की भूमिका अहम होगी और भारतीय वायुसेना इस दिशा में पूरी तैयारी कर रही है।

बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट की कमी से ट्रेनिंग पर असर?

एयर चीफ ने माना कि बेसिक ट्रेनर विमानों में सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण देरी हुई है। हालांकि, वायुसेना ने अपनी ट्रेनिंग संरचना को पुनर्गठित किया है ताकि कम प्लेटफॉर्म होने के बावजूद पायलटों की ट्रेनिंग प्रभावित न हो। वहीं, नए विमान के आने से यह समस्या हल हो जाएगी।

वहीं सुखोई-30 के अपग्रेड को लेकर उन्होंने कहा कि एक विस्तृत अध्ययन के आधार पर वायुसेना का प्रॉस्पेक्टिव प्लान तैयार किया गया है। इसमें न केवल प्लेटफॉर्म अपग्रेड, बल्कि नए रडार, सरफेस-टू-एयर सिस्टम, ट्रेनिंग और मानव संसाधन सुधार शामिल हैं। वहीं अधिकांश सुखोई-30 बेड़े का 70–75% अपग्रेड किया जाएगा।

किए कई अंतरराष्ट्रीय अभ्यास

एयर चीफ ने बताया कि पिछले एक साल में भारत ने अमेरिका, फ्रांस, ग्रीस, सिंगापुर, मिस्र जैसे देशों के साथ कई बड़े सैन्य अभ्यास किए हैं। IAF Chief on Operation Sindoor इन अभ्यासों में इन देशों ने भारतीय वायुसेना की पेशेवर क्षमता और सटीकता की तारीफ की। उन्होंने कहा कि इन अभ्यासों से न केवल इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ती है बल्कि भारत की एयर पावर की वैश्विक विश्वसनीयता भी मजबूत होती है।

Rajnath Singh Shastra Puja: दशहरा पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की पाकिस्तान को चेतावनी, सर क्रीक सेक्टर में न करे कोई दुस्साहस

Rajnath Singh Shastra Puja

Rajnath Singh Shastra Puja: विजयादशमी के अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुजरात के भुज मिलिट्री स्टेशन पर शस्त्र पूजन किया और भारतीय सशस्त्र बलों के शौर्य को नमन किया। इस मौके पर उन्होंने पाकिस्तान पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम की पोल खोलकर रख दी और यह साबित कर दिया कि भारत किसी भी परिस्थिति में निर्णायक जवाब देने में सक्षम है।

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राजनाथ सिंह ने कहा कि पाकिस्तान ने लेह से लेकर सर क्रीक सेक्टर तक भारत की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश की थी, लेकिन भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने रिकॉर्ड समय में ऑपरेशन चलाकर न केवल पाकिस्तान की मंशा को नाकाम किया बल्कि उसकी एयर डिफेंस की कमजोरी भी दुनिया के सामने ला कर रख दी।

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सर क्रीक सेक्टर को लेकर दी चेतावनी

रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान को चेताते हुए कहा कि वह लगातार सर क्रीक सेक्टर में विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहा है और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा बातचीत के जरिए समाधान की कोशिश की है लेकिन पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आता।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर पाकिस्तान ने सर क्रीक सेक्टर में कोई दुस्साहस किया तो उसका जवाब इतना कड़ा होगा कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएंगे। 1965 में भारतीय सेना लाहौर तक पहुंची थी और पाकिस्तान को याद रखना चाहिए कि 2025 में क्रीक से कराची का रास्ता भी जाता है।”

जॉइंटनेस से मिली ऑपरेशन सिंदूर में सफलता

राजनाथ सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता भारतीय सेनाओं की जॉइंटनेस और सामंजस्य का परिणाम है। इस ऑपरेशन में थल सेना, वायु सेना और नौसेना ने मिलकर रणनीतिक कौशल और साहस का परिचय दिया। उन्होंने सैनिकों और अधिकारियों को बधाई देते हुए कहा कि भारत की सेनाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे हर चुनौती का सामना कर सकती हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ने संयम का परिचय दिया क्योंकि यह ऑपरेशन आतंकवाद के खिलाफ था, न कि युद्ध छेड़ने के लिए। सभी सैन्य उद्देश्यों को सफलतापूर्वक हासिल किया गया और आतंक के खिलाफ भारत का संकल्प अडिग है।

विजयादशमी पर शस्त्र पूजन के महत्व पर बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि भारत की सभ्यता का प्रतीक है। किसान हल की पूजा करता है, विद्यार्थी किताबों की पूजा करता है और सैनिक अपने हथियारों की पूजा करता है।

राजनाथ सिंह ने कहा, “ज्ञान बिना शक्ति असुरक्षित है और शक्ति बिना ज्ञान अराजकता लाती है। शास्त्र (ज्ञान) और शस्त्र (हथियार) का संतुलन ही हमारी सभ्यता को अमर और अजेय बनाता है।”

आत्मनिर्भर भारत का विजन

रक्षा मंत्री ने बताया कि भारत आज आत्मनिर्भर भारत के विजन के तहत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बन रहा है। भारत अब न केवल अपने हथियार बना रहा है बल्कि उन्हें निर्यात भी कर रहा है। उन्होंने कहा कि आज भारतीय सैनिक मिशन एरिया में पूरी तरह स्वदेशी उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं।

रक्षा मंत्री ने तीनों सेनाओं की संयुक्तता की सराहना की और कहा कि वे भारत की सुरक्षा के तीन मजबूत स्तंभ हैं। उन्होंने हाल ही में की गई एक्सरसाइज वरुणास्त्र का भी जिक्र किया, जिसमें तीनों सेनाओं की संयुक्त क्षमता और तैयारी को दिखाया गया।

नई चुनौतियों का किया जिक्र

अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की सीमाओं पर हमेशा चुनौतियां रही हैं, लेकिन अब वे और जटिल हो गई हैं। आज बाहरी आक्रमण के साथ-साथ आतंकवाद, साइबर युद्ध और सूचना युद्ध भी बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। उन्होंने सैनिकों से हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने की अपील की।

महात्मा गांधी को किया याद

रक्षा मंत्री ने विजयादशमी और महात्मा गांधी जयंती पर देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि यह पर्व हमें सिखाता है कि बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों न लगे, अंततः अच्छाई ही जीतती है। शस्त्र पूजन भारत के राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा है और यह हमारे सामूहिक बल और स्वतंत्रता का सम्मान है।

महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने कहा कि गांधीजी ने केवल आत्मबल के सहारे सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को झुकने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा कि आज हमारे सैनिकों के पास मनोबल भी है और हथियार भी, इसलिए कोई चुनौती उनके सामने टिक नहीं सकती।

इस मौके पर रक्षा मंत्री ने सर क्रीक सेक्टर में टाइडल इंडिपेंडेंट बर्थिंग फैसिलिटी और जॉइंट कंट्रोल सेंटर का वर्चुअल उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि ये सुविधाएं तटीय सुरक्षा, संयुक्त ऑपरेशनल क्षमता और किसी भी खतरे का तेजी से जवाब देने में मददगार साबित होंगी।

वहीं, इस मौके पर चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी, साउदर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ, 12 कॉर्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आदित्य विक्रम सिंह राठी और एयर फोर्स स्टेशन भुज के एयर कमोडोर केपीएस धाम भी मौजूद थे।

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विश्वेश नेगी ने साफ शब्दों में कहा कि भारत की स्थिति वर्षों से बिल्कुल स्पष्ट है। भारतीय सैनिक केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बाद ही किसी शांति मिशन का हिस्सा बनते हैं। उन्होंने कहा कि भारत के लिए वैधता का मतलब यही है कि शांति सेना संयुक्त राष्ट्र के झंडे के नीचे काम करे।

उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा हालात में यूक्रेन और गाजा जैसे संघर्ष वाले क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना भेजे जाने की संभावना बेहद कम है। कारण यह है कि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में शामिल देशों के बीच आम सहमति बन पाना लगभग असंभव है।

51 मिशनों में भारत ने 182 से ज्यादा जवान खोए

लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर ने भी भारत की स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा, “हम केवल संयुक्त राष्ट्र के झंडे के नीचे ही काम करते हैं, क्योंकि हमें वैधता की अहमियत समझ आती है।” उन्होंने बताया कि भारत दुनिया के सबसे बड़े शांति सैनिक भेजने वाले देशों में से एक है और पिछले 75 सालों में 50 से अधिक मिशनों में 2,90,000 से ज्यादा भारतीय सैनिक और पुलिस कर्मियों ने हिस्सा लिया है। वहीं 51 मिशनों में भारत ने 182 से ज्यादा जवान खोए भी हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह नीति भारत की विदेश नीति का अभिन्न हिस्सा है और इसका पालन हर हाल में किया जाएगा।

India UN Peacekeeping Policy: New Delhi rules out troop deployment in Ukraine, Gaza without UN mandate
LT GEN RAKESH KAPOOR, AVSM, VSM, DCOAS (IS&T)

यूएन से बाहर किसी भी शांति सेना का हिस्सा नहीं बनेगा भारत

India UN Peacekeeping Policy के तहत  वहीं, मीडिया के इस सवाल पर कि क्या भारत भविष्य में यूक्रेन युद्ध या गाजा युद्ध में सैनिक भेज सकता है। इस पर कपूर ने कहा कि यह सवाल जायज है क्योंकि आज की दुनिया में युद्धों की प्रकृति बदल चुकी है। पहले संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिक केवल सीजफायर लाइन पर निगरानी करते थे। लेकिन अब युद्धों का स्वरूप बदल गया गए हैं, जिसमें नॉन स्टेट एलिमेंट्स, एनजीओ और नई टेक्नोलॉजी शामिल हो गई हैं।

उन्होंने साफ कहा कि भारत कभी भी संयुक्त राष्ट्र से बाहर किसी भी शांति सेना का हिस्सा नहीं बनेगा। केवल यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल के चार्टर के चैप्टर 6 और चैप्टर 7 के तहत आने वाले मिशनों में ही भारतीय सैनिक तैनात होंगे।

कपूर ने यह भी स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा स्ट्रक्चर और सुरक्षा परिषद की राजनीति को देखते हुए, यूक्रेन या गाजा जैसे इलाकों में शांति सेना भेजना लगभग असंभव है।

बता दें कि इजरायल के राजदूत नाओर गिलोन अजार ने कहा था कि गाजा में तुरंत तैनात की जाने वाली इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (ISF) में भारत की भागीदारी का फैसला पूरी तरह नई दिल्ली पर निर्भर है। उन्होंने कहा, भारत स्वयं तय करेगा कि वह ऐसी किसी बहुराष्ट्रीय ताकत का हिस्सा बनेगा या नहीं। इजरायल की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब गाजा संकट को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बनाए रखने के लिए संभावित सैन्य बल की चर्चा चल रही है। भारत पहले ही साफ कर चुका है कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव वाले मिशनों में ही सैनिक भेजेगा।

India UN Peacekeeping Policy: New Delhi rules out troop deployment in Ukraine, Gaza without UN mandate

भारत ने पहली महिला पुलिस यूनिट की तैनात

भारत की भूमिका संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में हमेशा महत्वपूर्ण रही है। 1948 में कांगो से लेकर हाल के अफ्रीका और पश्चिम एशिया के मिशनों तक, भारतीय सैनिकों ने शांति स्थापित करने और बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।

2007 में भारत ने लाइबेरिया में पहली बार पूरी तरह महिला पुलिस यूनिट तैनात कर इतिहास रचा। इसके बाद से भारतीय सेना और अन्य बल हर मिशन में महिला एंगेजमेंट टीम्स भेज रहे हैं, जो सीधे तौर पर संघर्षग्रस्त इलाकों की स्थानीय आबादी, खासकर महिलाओं से संवाद करती हैं और बच्चों से बातचीत कर शांति की प्रक्रिया को मजबूत करती हैं।

उन्होंने बताया कि संघर्ष के समय सबसे अधिक प्रभावित होने वाला वर्ग महिलाएं ही होती हैं। ऐसे में जब हमारी महिला टीमें उनसे जुड़ती हैं, तो वे उनकी समस्याओं को बेहतर तरीके से समझ पाती हैं। साथ ही, स्थानीय महिलाओं को यह भी प्रेरणा मिलती है कि वे भी समाज में सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं।

महिलाओं की भागीदारी की भागीदारी 20 फीसदी तक

भारतीय सेना के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र ने शांति मिशनों में महिलाओं की भागीदारी के लिए लक्ष्य तय किए हैं। आज की स्थिति में, अलग-अलग रोल में भारतीय योगदान लगभग 20 फीसदी तक पहुंच चुका है, खासकर स्टाफ ऑफिसर और ऑब्जर्वर स्तर पर। हालांकि, महिला कंटिंजेंट्स की संख्या बढ़ाने की दिशा में और काम किया जा रहा है।

India UN Peacekeeping Policy के तहत कपूर ने कहा कि भारत शांति मिशनों में महिला मनोवैज्ञानिक काउंसलर भी भेज रहा है। उनका काम युद्ध या संघर्ष से प्रभावित परिवारों, खासकर महिलाओं और बच्चों की मानसिक स्थिति को संभालना है। मानसिक स्वास्थ्य और वेल-बीइंग पर भारतीय योगदान संयुक्त राष्ट्र के लिए एक नया मानदंड बना रहा है।

30 देशों सैन्य प्रमुख लेंगे हिस्सा, चीन-पाक नहीं शामिल

भारत 14 से 16 अक्टूबर तक नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सैनिक भेजने वाले देशों (Troop Contributing Countries – TCCs) के आर्मी चीफ्स का सम्मेलन आयोजित करेगा। इसमें 30 से अधिक देशों के सैन्य प्रमुख और वरिष्ठ अधिकारी हिस्सा लेंगे।

India UN Peacekeeping Policy सम्मेलन में अल्जीरिया, आर्मेनिया, बांग्लादेश, भूटान, ब्राज़ील, बुरुंडी, कंबोडिया, कोट डी आईवोर, इथियोपिया, फिजी, फ्रांस, घाना, इंडोनेशिया, कजाखस्तान, केन्या, किर्गिस्तान, मेडागास्कर, मलेशिया, मंगोलिया, मोरक्को, नेपाल, नाइजीरिया, रवांडा, सेनेगल, श्रीलंका, तंजानिया, युगांडा, उरुग्वे, वियतनाम और इटली जैसे देश शामिल होंगे। हालांकि अहम बात यह है कि पाकिस्तान और चीन को इस सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया है।

स्वदेशी डिफेंस इक्विपमेंट्स शोकेस करेगा भारत

राकेश कपूर ने कहा कि पहले के समय भारत को इक्विपमेंट्स लीज पर लेने पड़ते थे, लेकिन अब सभी भारतीय कंटिंजेंट्स पूरी तरह स्वदेशी उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं, सम्मेलन के दौरान भारत अपने स्वदेशी डिफेंस इक्विपमेंट्स को भी शोकेस करेगा, जो शांति मिशनों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल कपूर ने बताया कि आज भारतीय कंटिंजेंट्स लगभग 1600 तरह के स्वदेशी उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इनमें प्रोटेक्टेड व्हीकल्स, नाइट विजन डिवाइस और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल इक्विपमेंट्स शामिल हैं। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय इक्विपमेंट्स के शानदार परफॉरमेंस ने कई देशों का ध्यान भी खींचा है और कई देशों ने इन्हें खरीदने में रुचि दिखाई है।

यूएन शांति मिशनों में भारत का ग्रीन एनर्जी पर जोर

लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर ने बताया कि भारतीय सेना संयुक्त राष्ट्र मिशनों में डिजिटाइजेशन को भी प्राथमिकता दे रही है। भारत ने ‘युनिट अवेयर प्रोग्राम’ लॉन्च किया है जो बेहतर सिचुएशनल अवेयरनेस प्रदान करता है। इसके अलावा, भारतीय सेना अपने घरेलू स्तर पर विकसित डिजिटाइजेशन सॉल्यूशंस भी साझा करने के लिए तैयार है।

उन्होंने बताया कि भारत अपने सैनिकों को साइबर सुरक्षा, नई एनक्रिप्शन तकनीक और मिनिएचराइज्ड उपकरणों से लैस कर रहा है। इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल डिवाइस और थर्मल इमेजिंग जैसे संसाधन अब भारतीय सैनिकों के पास मौजूद हैं ताकि वे हर परिस्थिति में काम कर सकें।

उन्होंने बताया कि संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भारत ग्रीन एनर्जी पर भी जोर दे रहा है। भारतीय सेना ने बताया कि एक बड़े ग्रीन एनर्जी प्लांट की स्थापना की जा रही है, जो संभवतः किसी मिशन एरिया में भारत द्वारा लगाया जाने वाला सबसे बड़ा प्रोजेक्ट होगा।

लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर के मुताबिक भारतीय सेना का मानना है कि सतत शांति केवल तब संभव है जब समाज के हर वर्ग को साथ लिया जाए। महिलाओं को शामिल करना, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना, इंडिजिनस तकनीक का इस्तेमाल और डिजिटाइजेशन की दिशा में काम करना, ये सभी कदम इसी सोच का हिस्सा हैं।

India UN Peacekeeping Policy has once again been reiterated, with New Delhi making it clear that Indian troops will only be deployed under a clear United Nations Security Council (UNSC) mandate and strictly under the UN flag. Dismissing the possibility of sending soldiers to conflict zones like Ukraine or Gaza without UN approval, Lt Gen Rakesh Kapoor and MEA official Vishwesh Negi emphasized India’s long-standing position. From October 14–16, New Delhi will host the UNTCC Chiefs Conclave with military leaders from 30 nations, excluding Pakistan and China. India will also showcase its indigenous defence equipment used in UN missions.

Lashkar-e-Taiba in KPK: ऑपरेशन सिंदूर के बाद लश्कर ने बदला आतंकी ठिकाना, ISI की मदद से खैबर पख्तूनख्वा से ऑपरेट करेगा ‘जान-ए-फिदाई’

Lashkar-e-Taiba in KPK
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa

Lashkar-e-Taiba in KPK: भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी आतंकी संगठनों ने अपने ठिकाने बदलने शुरू कर दिए हैं। पहले यह कैंप पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर पीओके और पंजाब में चलते थे, लेकिन अब इन्हें खैबर पख्तूनख्वा यानी केपीके में शिफ्ट किया जा रहा है। इटेंलिजेंस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य-प्रायोजित और संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा अब केपीके लोअर दिर जिले में नया ट्रेनिंग और रेजिडेंशियल सेंटर बना रहा है और Lashkar-e-Taiba in KPK का मुद्दा लगातार चर्चा का टॉपिक बन गया है।

Lashkar-e-Taiba in KPK
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under
Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa

New Terror Outfit: दुनिया को धोखा देने के लिए पाकिस्तान ने कश्मीर में खड़ा किया नया आतंकी संगठन! एक दिन में बदला प्रवक्ता

मरकज जिहाद-ए-अक्सा है नया ठिकाना

22 सितंबर 2025 को सामने आई तस्वीरों और वीडियोज से पुष्टि हुई कि लश्कर-ए-तैयबा लोअर दिर के कुम्बन मैदान इलाके में लगभग 4,643 वर्ग फुट भूमि पर नया सेंटर बना रहा है। इसे मरकज जिहाद-ए-अक्सा नाम दिया गया है। यह जगह अफगान सीमा से महज 47 किलोमीटर दूर है। जुलाई 2025 से निर्माण शुरू हुआ और सितंबर तक इसकी पहली मंजिल का फ्रेम तैयार हो चुका है। आरसीसी छत डालने का काम भी तेजी से चल रहा है।

Lashkar-e-Taiba in KPK
Visual shows steady flow of materials and labor, consistent with a deliberate plan to reconstitute

Relocation of terror camps: ऑपरेशन सिंदूर के बाद जैश-हिजबुल के ठिकाने पीओके से खैबर पख्तूनख्वा हुए शिफ्ट, 25 सितंबर को पेशावर में बड़ी भर्ती की तैयारी में आतंकी

धार्मिक संस्थानों के सहारे आतंकी ढांचा

Lashkar-e-Taiba in KPK हमेशा से धार्मिक संस्थानों की आड़ में अपने आतंकी ठिकाने बनाता रहा है। नया ट्रेनिंग भी इसके पास बनी जामिया अहले सुन्नत मस्जिद के बगल में बनाया जा रहा है। इस रणनीति का उद्देश्य आतंकियों की आवाजाही और भर्ती को धार्मिक गतिविधियों की आड़ में छिपाना है।

Lashkar-e-Taiba in KPK

वहीं, खास बात यह है कि लोअर दिर में लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन के नए निर्माणाधीन कैंपों के बीच की दूरी केवल 4 किलोमीटर है, जिससे अंदेशा लगाया जा रहा है कि दोनों आतंकी संगठन आपसी तेलमेल के जरिए आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं।

आतंकी नेताओं को मिली जिम्मेदारियां

नए कैंप की कमान कुख्यात आतंकी नसर जावेद को दी गई है, जो 2006 हैदराबाद बम धमाके का सह-साजिशकर्ता रहा है। वह 2004 से 2015 तक पीओके के दुलई प्रशिक्षण कैंप को चलाता था और वर्तमान में लश्कर की फंडिंग संस्था खिदमत-ए-खल्क से जुड़ा है। इसके अलावा मुहम्मद यासीन उर्फ बिलाल भाई को जिहादी विचारधारा सिखाने की जिम्मेदारी मिली है, जबकि हथियारों की ट्रेनिंग अनसुल्लाह खान देख रहा है, जिसे 2016 में गरही हबीबुल्लाह कैंप में ट्रेनिंग दी गई थी।

Lashkar-e-Taiba in KPK

दाऊरा-ए-खास और दाऊरा-ए-लश्कर की तैयारी

एक बार यह ठिकाना तैयार हो जाने पर यहां दो मुख्य ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएंगे – दाऊरा-ए-खास और दाऊरा-ए-लश्कर। यह केंद्र लश्कर के जान-ए-फिदाई फिदायीन यूनिट का नया ठिकाना बनेगा। पहले यह यूनिट भिम्बर-बर्नाला स्थित मरकज अहले हदीस से चलती थी, जिसे 7 मई को भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ध्वस्त कर दिया था।

Lashkar-e-Taiba in KPK

इंटेलिजेंस सूत्र बताते हैं कि इस पूरी शिफ्टिंग के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का स्पेशल ऑपरेशंस डायरेक्टरेट है। इसके जरिए आतंकियों की गतिविधियों को भारतीय निगरानी से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही हिजबुल मुजाहिद्दीन और जैश-ए-मोहम्मद ने भी अपने नए ठिकाने केपीके में शिफ्ट कर लिए हैं।

दिसंबर 2025 तक पूरा होने की उम्मीद

सूत्रों ने बताया कि लश्कर-ए-तैयबा के नए ट्रेनिंग सेंटर का काम दिसंबर 2025 तक पूरा होने की उम्मीद है, आने वाले समय में बड़े स्तर का खतरा बन सकता है। अभी यह निर्माणाधीन है, लेकिन पहले से ही इसे भर्ती, कट्टरपंथ फैलाने और बड़े पैमाने पर आतंकी प्रशिक्षण का नया अड्डा माना जाने लगा है। खास बात यह है कि इसके बगल में बन रहा मरकज़ जामिया अहले सुन्नत अभी केवल 80 फीसदी ही तैयार हुआ है, लेकिन उसे अधूरा छोड़कर लश्कर-ए-तैयबा ने अपनी पूरी ताकत, संसाधन और पैसा जिहाद-ए-अक्सा ट्रेनिंग सेंटर बनाने में झोंक दिया है।

Lashkar-e-Taiba in KPK

पाकिस्तानी सेना ने टीटीपी पर चलाई क्लीनअप ड्राइव

लोअर दिर ऐतिहासिक रूप से भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों का गढ़ रहा है, जहां अल-बदर जैसे संगठन सक्रिय रहे। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर से पहले यहां लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन की कोई मौजूदगी नहीं थी। अल-बदर के अलावा, यह इलाका लंबे समय तक तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का मजबूत ऑपरेशनल बेस रहा। हालांकि, दोनों संगठनों की विचारधारा में फर्क है। टीटीपी देवबंदी सोच रखता है और पाकिस्तान विरोधी है, जबकि लश्कर अहले हदीस विचारधारा को मानता है और पाकिस्तान समर्थक है। इसी वजह से लोअर दिर में टीटीपी के आतंकियों ने लश्कर कमांडरों की कई बार टारगेटेड हत्याएं कीं।

साल 2011 में, जब लश्कर ने यहां अस्थायी ट्रेनिंग सेंटर बनाया, तो टीटीपी ने एक आत्मघाती हमला किया। यह हमला एक लश्कर कमांडर के जनाजे में हुआ था, जिसमें 20 लोगों की मौत हो गई। माना जाता है कि लश्कर की गतिविधियों को सुरक्षित रखने और ट्रेनिंग बिना बाधा जारी रखने के लिए पाकिस्तानी सेना ने जून 2025 में लोअर दिर में एक “क्लीनअप ड्राइव” शुरू की। इसमें टीटीपी के आतंकियों को निशाना बनाया गया। इस अभियान में दो दर्जन से ज्यादा टीटीपी आतंकी मारे गए और इसके बाद सिर्फ एक महीने के भीतर लश्कर ने अपना नया आतंकी केंद्र बनाना शुरू कर दिया।

केपीके में पाक सेना कर रही हमले

पाकिस्तानी सेना और एयरफोर्स ने जून 2025 से अब तक केपीके में 40 से अधिक नागरिकों की हत्या की है। आधिकारिक बयान में कहा गया कि ये अभियान “टेरर-फ्री” करने के लिए हैं, लेकिन असल में इसका उद्देश्य पाकिस्तान विरोधी आतंकियों को खत्म करना और भारत विरोधी संगठनों को सुरक्षित माहौल देना है।

पाकिस्तान की यह दस साल से चली आ रही नीति को वहां के मुख्यमंत्री अली अमीन गांधापुर ने अगस्त 2025 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद स्वीकार किया था। खास बात यह है कि पाकिस्तान जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद-रोधी अभियान के लिए मदद मांगता है, तो मिली हुई राशि का बड़ा हिस्सा आम नागरिकों की हत्या या फिर सरकार-विरोधी आतंकियों को खत्म करने में लगा देता है। इससे नतीजा यह निकलता है कि सरकार-समर्थित आतंकी संगठनों के लिए सुरक्षित माहौल तैयार हो जाता है।

लोअर दिर में लश्कर का यह नया प्रशिक्षण केंद्र दिसंबर 2025 तक तैयार हो सकता है। यह न केवल भर्ती और वैचारिक ब्रेनवॉश का केंद्र बनेगा बल्कि हथियारों और बड़े ऑपरेशनों की ट्रेनिंग भी यहां दी जाएगी। आशंका है कि अब आगे इसी सेंटर के जरिए भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को चलाने की कोशिशें की जाएंगी

 

MiG-21 Last Sortie: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने इस तरह दी मिग-21 को विदाई, सौंपा फॉर्म-700 डॉक्यूमेंट

MiG-21 Last Sortie

MiG-21 Last Sortie: भारतीय वायुसेना के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मिग-21 लड़ाकू विमानों ने आखिरकार शुक्रवार को औपचारिक विदाई दे दी गई। इस मौके को और यादगार बनाने के लिए भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद ‘बादल 3’ कॉल साइन के साथ मिग-21 की आखिरी सॉर्टी यानी उड़ान भरी। उनके साथ स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्माने भी उड़ान भरी। दोनों ने इससे पहले पिछले महीने राजस्थान के नाल एयरबेस पर मिग-21 बाइसन पर सोलो कॉम्बैट सॉर्टी की थी। उस फॉर्मेशन की अगुवाई स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्मा ने की थी।

MiG-21 retirement: 62 साल बाद ‘बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स’ को मिली सम्मानजनक विदाई, रक्षा मंत्री बोले- साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था मिग-21

यह उड़ान सिर्फ एक सैन्य परंपरा का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह उस पूरे दौर को सलाम थी, जिसने भारत की हवाई शक्ति को दशकों तक मजबूती दी। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने MiG-21 का नेतृत्व करते हुए जो फ्लाईपास्ट किया, मिग-21 के प्रति अपनी गहरी आस्था और सम्मान को प्रदर्शित किया।

चंडीगढ़ एयरबेस पर हुए इस समारोह में एक बेहद प्रतीकात्मक फ्लाईपास्ट किया गया। इसमें MiG-21 बाइसन और स्वदेशी एलसीए तेजस ने साथ उड़ान भरी। यह दृश्य पुराने और नए युग का मिलन थास जहां सोवियत दौर का ‘बाइसन’ अपने कंधों पर गौरव का इतिहास लिए विदा हो रहा था और स्वदेशी तेजस भविष्य की दिशा दिखा रहा था।

इसके बाद छह मिग-21 विमानों ने अपनी अंतिम उड़ान पूरी की और रक्षा मंत्री, सेना प्रमुखों और सभी वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में औपचारिक रूप से अलविदा कह दिया गया।

इस विदाई कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी मौजूद थे। रक्षा मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि मिग-21 भारतीय वायुसेना का “बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स” रहा है और इसकी भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता और MiG-21 Last Sortie यादगार है।

समारोह के दौरान एयरफोर्स के अफसरों और 28 स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर ने फॉर्म-700 डॉक्यूमेंट वायुसेना प्रमुख को सौंपा। यह दस्तावेज किसी विमान की आधिकारिक सेवा समाप्ति का प्रतीक माना जाता है।

विदाई को यादगार बनाने के लिए रक्षा मंत्री ने एक विशेष डाक टिकट और डे कवर भी जारी किया। इसे भारतीय वायुसेना के लंबे और गौरवशाली इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

इस कार्यक्रम में सिर्फ उड़ान ही नहीं, बल्कि वायुसेना की कई विशेष टीमों ने अपने कौशल का प्रदर्शन भी किया। आकाश गंगा स्काईडाइविंग टीम ने शानदार छलांग लगाई, जबकि एयर वारियर ड्रिल टीम ने सटीक और अनुशासित मूवमेंट्स के जरिए दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इसके अलावा सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम ने आकाश में खास प्रस्तुति की। समारोह के दौरान जगुआर और MiG-21 विमानों ने मिलकर एक प्रतीकात्मक फ्लाईपास्ट भी किया, जिसने 1971 और कारगिल जैसे ऐतिहासिक अभियानों की याद ताजा कर दी और अब  MiG-21 Last Sortie को सब देख रहे है।

मिग-21 भारतीय वायुसेना में 1963 से शामिल हुआ और तब से अब तक इसने हर बड़े युद्ध और ऑपरेशन में अपनी क्षमता साबित की। चाहे वह 1971 का युद्ध हो, कारगिल संघर्ष हो या 2019 का बालाकोट एयरस्ट्राइक, इस विमान ने हमेशा भारतीय तिरंगे को गर्व से ऊंचा रखा।

वर्षों तक इसे लगातार अपग्रेड किया गया और इसका बाइसन वैरिएंट वायुसेना के लिए सबसे विश्वसनीय इंटरसेप्टर साबित हुआ। लेकिन तकनीकी विकास और नए विमानों के आने के बाद अब MiG-21 Last Sortie सम्मानजनक विदाई दी गई है।

MiG-21 retirement: 62 साल बाद ‘बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स’ को मिली सम्मानजनक विदाई, रक्षा मंत्री बोले- साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था मिग-21

MiG-21 retirement

MiG-21 retirement: भारतीय वायुसेना का सबसे पुराना और भरोसेमंद लड़ाकू विमान मिग-21 अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। 62 साल तक आसमान में भारतीय तिरंगे की शान बढ़ाने वाले इस विमान को शुक्रवार को औपचारिक रूप से विदाई दी गई। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे “बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स” कहते हुए श्रद्धांजलि दी और कहा कि इसने हर भूमिका में भारतीय वायुसेना का सिर ऊंचा किया और पीढ़ियों के पायलटों को तैयार किया।

MiG-21 into UAVs?: चीन ने अपने पुराने जे-6 विमानों को बना दिया ड्रोन, तो मिग-21 को लेकर सरकार को क्या है दिक्कत, क्या है आपकी राय?

MiG-21 की आखिरी पीढ़ी बाइसन को चंडीगढ़ एयरबेस पर 28 स्कवॉड्रन पर आखिरी विदाई दी गई। मिग-21 के विदाई समारोह में राजनाथ सिंह ने भावुक शब्दों में कहा कि मिग-21 पर सवार होकर पीढ़ियों के पायलटों ने उड़ान सीखी, कठिन परिस्थितियों में जीत हासिल की। उन्होंने कहा कि यही वह प्लेटफॉर्म था जिसने भारतीय वायुसेना की रणनीति को दशकों तक दिशा दी। उन्होंने कहा, “मिग-21 केवल एक विमान नहीं था, बल्कि साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था। इसी विमान ने हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया और आज हम एलसीए तेजस और एएमसीए जैसे स्वदेशी विमानों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।”

रक्षा मंत्री ने कहा, कोई भी ऐतिहासिक मिशन हो, हर बार मिग-21 ने तिरंगे का सम्मान किया। इसलिए यह विदाई, हमारी सामूहिक स्मृतियों का भी है, हमारे राष्ट्रीय गौरव का भी है, और उस यात्रा का भी है, जिसमें साहस, बलिदान और उत्कृष्टता की कहानी लिखी गई है

MiG-21 की कहानी 1963 में भारतीय वायुसेना में इसके शामिल होने से शुरू होती है। सोवियत मूल के इस विमान को भारत ने समय-समय पर अपग्रेड किया और आखिरी वैरिएंट को मिग-21 बाइसन के नाम से जाना गया। यह दुनिया में सबसे ज्यादा बनाए गए लड़ाकू विमानों में शामिल है। करीब 11,500 मिग-21 तैयार किए गए थे, जिनमें से लगभग 850 ने भारत की वायुसेना की सेवा की।

रक्षा मंत्री राजनाथ ने कहा, 62 साल की लंबी यात्रा में मिग-21 ने भारत के लगभग हर बड़े युद्ध और अभियान में अपनी ताकत दिखाई। 1971 के भारत-पाक युद्ध में इसने ढाका के गवर्नर हाउस पर हमला किया और भारत की जीत सुनिश्चित की। कारगिल युद्ध 1999 में यह दुर्गम पहाड़ी इलाकों में दुश्मन की चौकियों पर सटीक हमलों के लिए इस्तेमाल हुआ। बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 में भी इसकी मौजूदगी रही, जब विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान ने इसी विमान से पाकिस्तान के एफ-16 को मार गिराया और इतिहास रचा। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर 2025 में भी इस विमान को अग्रिम मोर्चे पर तैनात किया गया था, जहां इसने भारतीय पायलटों को हवाई बढ़त दिलाई।

इस दौरान MiG-21 को लगातार अपग्रेड भी किया गया। रक्षा मंत्री ने समारोह में साफ किया कि सेवा में बने रहे विमान अधिकतम 40 साल पुराने थे, जो कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक सामान्य उम्र है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने इसे हमेशा तकनीकी रूप से प्रासंगिक बनाए रखने के लिए आधुनिक राडार, एवियोनिक्स और बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल जैसी क्षमताओं से लैस किया। इन्हीं अपग्रेड्स की वजह से इसे “बाइसन” कहा जाने लगा। वहीं, मिग-21 को भारतीय वायुसेना में कई नामों से पुकारा गया, त्रिशूल, विक्रम, बादल और बाइसन। हर नाम इसकी क्षमताओं और बदलाव की एक नई कहानी कहता है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, भारतीय वायुसेना के लिए यह विमान केवल एक फाइटर जेट नहीं बल्कि “ट्रेनिंग स्कूल” था, जिसने हजारों पायलटों को तैयार किया। और इस जहाज ट्रेनिंग लेकर बाद में सुखोई-30I और राफेल जैसे आधुनिक विमानों को उड़ाने में भी सक्षम बने। राजनाथ सिंह ने कहा कि आज हमारे जो भी कुशल पायलट हैं, उनकी नींव मिग-21 पर रखी गई थी। यही वजह है कि यह विमान भारतीय वायुसेना के इतिहास में अमर रहेगा।

शुक्रवार को जब MiG-21 ने अपनी आखिरी ऑपरेशनल उड़ान भरी, तो भारतीय वायुसेना का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया। विदाई समारोह में वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी, पूर्व पायलट और एचएएल के इंजीनियर मौजूद थे, जिन्होंने इस एतिहासिक पल को अपनी आंखों से देखा।

एचएएल की भूमिका को भी विशेष रूप से सराहा गया। लगातार मरम्मत और अपग्रेड की वजह से यह विमान छह दशक तक हवा में मजबूती से खड़ा रहा। राजनाथ सिंह ने एचएएल के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की मेहनत को सलाम करते हुए कहा कि उनकी कोशिशों ने ही इस विमान को इतना लंबा जीवन दिया।

विदाई के इस मौके पर राजनाथ सिंह ने कहा कि इस विमान को अलविदा कहना केवल एक सैन्य परंपरा नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यता और विरासत का हिस्सा है। मिग-21 अब भले ही सक्रिय सेवा से बाहर हो गया हो, लेकिन इसके साहस और योगदान की गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी।

Pinaka MBRL: ड्रोन या FPV अटैक से बचाने के लिए सेना ने पिनाका रॉकेट लॉन्चर पर लगाया यह खास ‘जुगाड़’, ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठाया यह कदम

Pinaka MBRL Cope Cage
Pinaka MBRL Cope Cage

Pinaka MBRL: भारतीय सेना पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को ड्रोन खतरों से सुरक्षित रखने के लिए एक नया कदम उठाया है। अब इन रॉकेट लॉन्चरों पर कोप केज लगाया जा रहा है। हाल ही में इसकी एक फोटो सामने आई जिसमें पिनाका सिस्टम के ऊपर कोप केज लगा हुआ है। सेना ने यह कदम रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्धों से मिली सीख के बाद उठाया है। जहां ड्रोन ने पारंपरिक भारी हथियारों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसे बड़े पैमाने पर अपनाना शुरू किया है। हालांकि इस ऑपरेशन में पिनाका का इस्तेमाल नहीं हुआ था।

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पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर जिसे डीआरडीओ ने बनाया है। यह सिस्टम 90 किमी तक की मारक क्षमता वाली मिसाइलें दाग सकता है। वहीं, आधुनिक युद्ध में छोटे, सस्ते और तेजी से तैनात होने वाले ड्रोन यानी यूएवी और एफपीवी फर्स्ट पर्सन व्यू टाइप ड्रोन से बड़े हथियारों बड़ा नुकसान देखने को मिल रहा है। इन चुनौतियों के देखते हुए भारतीय सेना ने पिनाका और अन्य आर्टिलरी सिस्टम पर ‘कोप केज’ लगाने का फैसला किया है।

कोप केज एक सस्ता और सरल जुगाड़ है, जो टैंक, रॉकेट लॉन्चर, और अन्य सैन्य उपकरणों के ऊपरी हिस्से पर लगाया जाता है। यह जालीदार स्ट्रक्चर ड्रोन से गिराए गए विस्फोटकों, लॉयटरिंग म्यूनिशन (जैसे कामिकेज़ ड्रोन), और टॉप-अटैक एंटी-टैंक मिसाइलों को रोकने में मदद करता है। यह हथियारों को सीधे टकराने से पहले विस्फोट को ट्रिगर करता है, जिससे नुकसान कम होता है और चालक दल सुरक्षित रहते हैं। भारत में इसे स्वदेशी रूप से बनाया जा रहा है, जो लागत को और कम करता है। भारतीय सेना ने यह तकनीक यूक्रेन-रशिया युद्ध और इजराइल-हमास संघर्ष से मिली सीख के बाद अपनाई है, क्योंकि इन संघर्षों में कोप-स्टाइल प्रोटेक्शन ने कई मौकों पर बड़े नुकसान होने से बचाया है।

भारतीय सेनाओं ने 2023 से कोप केज का इस्तेमाल शुरू किया और ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसकी तैनाती में तेजी देखी गई है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि कोप केज को पहले कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्म्स पर आजमाया गया, फिर बड़े पैमाने पर रोल-आउट किया गया। पिनाका बैटरियों, मोबाइल रॉकेट सिस्टम, कुछ बख्तरबंद वाहनों और लॉजिस्टिक्स काफिलों पर यह स्ट्रक्चर लगाया जा रहा है ताकि सीमाओं पर होने वाले ड्रोन हमलों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।

एक बड़े फायदे के तौर पर कोप केज को सस्ता और फटाफट लगाये जाने वाला सिस्टम माना जा रहा है। इसे मौजूदा वाहनों और सिस्टम पर बिना किसी बड़े मैकेनिकल परिवर्तन के लगाया जा सकता है, जिससे लागत और समय दोनों बचते हैं। सैनिक कारवाईयों में कम-लागत जुगाड़ों की जरूरत उस समय देखने को मिली जब सस्ते ड्रोनों ने महंगे हथियारों को भी निशाना बनाना शुरू किया।

क्यों लगाया पिनाका पर?

ऑपरेशन सिंदूर में पिनाका का सीधा इस्तेमाल तो नहीं हुआ। हां, अग्रिम मोर्चों पर यह सिस्टम तैनात जरूर किया गया था और उसे रिजर्व में रखा गया था ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत काम में लिया जा सके। रक्षा सूत्रों का कहना है कि अगर पिनाका को सक्रिय रूप से उपयोग में लाया जाता तो विरोधी को मौजूदा नुकसान से कहीं ज्यादा झेलना पड़ता। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान को इसका अंदेशा लग गया था, इसीलिए उसने पिनाका की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए निगरानी ड्रोन भेजे थे, जिन्हें भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया।

पिनाका फील्ड में तेज प्लट-आउट और शूट-एंड-स्कूट कैपेबिलिटी देता है। सूत्रों के मुताबिक, 2025 तक पिनाका की कुछ रेजिमेंटें ऑपरेशनल हैं और आगे बढ़ते हुए और बैटरियां तैनात की जा रही हैं। फिलहाल पिनाका की 6 रेजिमेंट ऑपरेशनल हैं, जो कुल 18 बैटरी बनाती हैं। वहीं, 2025 के अंत तक 8 रेजिमेंट (24 बैटरी) और 2026 के मध्य तक 10 रेजिमेंट (30 बैटरी) ऑपरेशनल करने की योजना है। वहीं, पिनाका पर कोप केज लगाने का फैसला उन्हीं रेजिमेंट्स और बैटरी के ऑपरेशनल सुरक्षा स्तर को और बढ़ाने के मकसद से लिया गया है।

पिनाका की एक बैटरी में छह लॉन्चर होते हैं और हर लॉन्चर में बारह रॉकेट लगे रहते हैं, यानी कुल मिलाकर एक बैटरी में 72 रॉकेट होते हैं। सूत्रों के अनुसार 72 रॉकेट लगभग 44 सेकंड में फायर किए जा सकते हैं। एक पूरी बैटरी की कटिंग-पॉवर लगभग 0.8 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को प्रभावी ढंग से तबाह कर सकती है और इसके जरिए एक बार में लगभग 7.2 टन विस्फोटक टारगेट को निशाना बना सकता है।

किन हथियारों पर हो रहा इस्तेमाल

भारतीय सेना ने कोप केज को विभिन्न बख्तरबंद वाहनों, आर्टिलरी सिस्टम, और लॉजिस्टिक इक्विपमेंट्स पर तैनात किया है। भारतीय सेना का मुख्य युद्धक टैंक टी-90 भीष्म अब टॉप-अटैक प्रोटेक्शन केज (TAPC) से लैस है। यह टरेट के ऊपर लगाया गया है ताकि ड्रोन और मिसाइल हमलों से ऊपरी कवच की रक्षा हो सके। इसकी शुरुआत 2023 में पश्चिमी कमांड (पाकिस्तान सीमा) पर हुई।

Pinaka MBRL Cope Cage
T-90 Tank with Cope Cage

वहीं, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री यूनिट्स में इस्तेमाल होने वाला बीएमपी-2 सरथ इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल (IFV) भी अब कोप केज से लैस है। 2025 में पहली बार इसकी पूरी फ्लीट पर यह जाली लगाई गई, ताकि FPV (फर्स्ट-पर्सन व्यू) ड्रोन्स से होने वाले हमलों से बचा जा सके।

इसके अलावा बीएम-21 रॉकेट लॉन्चर जो वज्र कोर का हिस्सा है। 2025 में इस पर कोप केज लगाए गए ताकि ड्रोन हमलों से लॉन्चर और क्रू की सुरक्षा हो।

साथ ही, लंबी दूरी के बीएम-30 स्मर्च रॉकेट लॉन्चर को भी 2025 में कोप केज से अपग्रेड किया गया है। यह आर्टिलरी रेजिमेंट्स में तैनात है और टॉप-अटैक ड्रोंस से बचाव के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। यह सिस्टम 90 किमी तक मार कर सकता है।

105 एमएम इंडियन फील्ड गन पर भी अगस्त 2025 से कोप केज लगाया गया है। यह आर्टिलरी गन क्रू और ब्रेच एरिया को एफपीवी ड्रोंस और लॉयटरिंग म्यूनिशन से बचाता है।

इसके अलावा सीमा पर लॉजिस्टिक सप्लाई के लिए इस्तेमाल होने वाले अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रकों पर 16 फीट×9 फीट का वायर मेश केज लगाया गया। जून 2025 से यह बॉर्डर कन्वॉय में ड्रोन हमलों से सामान की सुरक्षा करता है।

हाल के मिलिट्री अभ्यासों में कोप केज वाले प्लेटफ़ॉर्म ने अच्छा प्रदर्शन दिखाया है। सैनिकों और इकाइयों से मिले फीडबैक में यह बात सामने आई कि यह उपाय कारगर है। फील्ड-इंस्पेक्शन्स और रन-ऑफ-ऑपरेशन टेस्ट के बाद कर्नल स्तर के कमांडरों ने इसे सीमाओं पर तैनात करने की सिफारिशें दी हैं। साथ ही टेक्निकल प्रयोगशालाओं में इसके डिजाइन में सुधार के सुझाव भी उठाए जा रहे हैं ताकि वजन कम करके और अधिक असरदार बनाया जा सके।

MiG-21 into UAVs?: चीन ने अपने पुराने जे-6 विमानों को बना दिया ड्रोन, तो मिग-21 को लेकर सरकार को क्या है दिक्कत, क्या है आपकी राय?

MiG-21 into UAVs?
Should the IAF Convert Retired MiG-21 Bison Fighters into UAVs

MiG-21 into UAVs?: भारतीय वायुसेना 26 सितंबर को 62 साल बाद अपने बाकी बचे 27 मिग-21 बाइसन लगभग दो स्क्वाड्रन को रिटायर कर देगी। यह फैसला इसलिए लेना पड़ा क्योंकि यह विमान अब पुराना हो चुका है और तकनीकी सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता। 1963 से 2025 तक लगभग 463 मिग-21 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं और 200 से अधिक पायलट इन हादसों में मारे गए। जिसके चलते वायुसेना की छवि और ऑपरेशनल सेफ्टी दोनों पर सवाल उठने लगे।

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वहीं कुछ लोगों का कहना है कि क्या इन विमानों को कबाड़ में बदलने की बजाय इन्हें यूएवी या ड्रोन में बदला जा सकता है? क्योंकि चीन ने भी अपने पुराने जे-6 विमानों को कबाड़ की बजाय ड्रोन में बदला है। हाल ही में चीन ने इन्हें शोकेस भी किया है। कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन्हें ड्रोन में तब्दील कर दिया जाए तो यह भारत की युद्ध क्षमता में कई गुना बढ़ोतरी कर सकता है।

MiG-21 into UAVs?: 1963 में भारतीय वायुसेना में हुए थे शामिल

MiG-21 सोवियत युग का सुपरसोनिक फाइटर जेट है, जिसे 1963 में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। इसके बाद से यह भारत की एयर पावर की रीढ़ बना रहा। इस विमान ने 1971 के भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध और बालाकोट एयर स्ट्राइक में अहम भूमिका निभाई। 2000 के दशक की शुरुआत में इसके बाइसन वेरिएंट को आधुनिक एवियोनिक्स और रडार से लैस करके अपग्रेड भी किया गया, ताकि इसकी आयु और युद्ध क्षमता बढ़ाई जा सके। लेकिन 2025 तक आते-आते यह विमान तकनीकी रूप से इतना पुराना हो चुका है कि इसके पार्ट्स मिलना भी मुश्किल है, मेंटेनेंस का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है और लगातार हो रहे हादसों ने इसके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

क्या UAV में बदला जा सकता है मिग-21?

जानकारों का कहना है कि इन विमानों को सीधे स्क्रैप करने की बजाय इन्हें ड्रोन प्लेटफॉर्म में बदला जा सकता है। इस ट्रांसफॉर्मेशन से कई तरह की विकल्प खुलेंगे। सबसे पहले इन्हें टारगेट ड्रोन में बदला जा सकता है। इसका मतलब है कि वायुसेना के पायलट और मिसाइल सिस्टम इनका इस्तेमाल अभ्यास और परीक्षण में कर सकते हैं। मैक-2 की रफ्तार से उड़ने वाला मिग-21 अगर दुश्मन के इलाके में घुस जाए तो उसे असली विमान जैसा लगेगा। वहीं, नए मिसाइल सिस्टम जैसे आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और एक्सआरएसएएम के ट्रायल्स के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।

वहीं, दूसरी संभावना है कि इन्हें डिकॉय ड्रोन बनाया जाए। यानी इन्हें इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरणों से लैस करके दुश्मन के रडार सिस्टम को कन्फ्यूज करने में लगाया जाए। इससे दूसरे मानव-संचालित विमानों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

तीसरा, इन्हें कम्युनिकेशन रिले के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। मॉडर्न कम्यूनिकेशन सिस्टम को लगाकर यह दुर्गम इलाकों में हवाई कम्युनिकेशन नोड की तरह काम कर सकते हैं।

इसके अलावा, इन्हें खुफिया निगरानी कामों में भी लगाया जा सकता है। ये हाई एल्टीट्यूड इलाकों में बेहतर तरीके से उड़ान भर सकते हैं, इनकी ये क्षमता इन्हें लंबी दूरी के जासूसी मिशनों के लिए उपयोगी बनाती है।

वहीं, इन्हें कामिकाजे ड्रोन यानी आत्मघाती ड्रोन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जो विस्फोटक से लैस होकर दुश्मन के ठिकानों पर एकतरफा हमला कर सकते हैं।

MiG-21 into UAVs?
Should the IAF Convert Retired MiG-21 Bison Fighters into UAVs?

क्या हैं तकनीकी चुनौतियां

हालांकि, MiG-21 को यूएवी में बदलना उतना आसान नहीं है जितना सुनने में लगता है। इसे लेकर हमने एयरफोर्स के कई अधिकारियों से बात की। उन्हें यह आइडिया तो सुहाता है, लेकिन वह कहते हैं कि इनके साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका स्ट्रक्चर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बहुत पुराना है। इन्हें लेटेस्ट रिमोट-कंट्रोल और ऑटोनॉमस फ्लइट सिस्टम से जोड़ना बेहद मुश्किल होगा। साथ ही यह बेहद खर्चीला भी होगा। उनका कहना है कि दशकों तक इस्तेमाल होने के कारण इनका एयरफ्रेम कमजोर हो चुका है। ऐसे में इसे लंबे समय तक ड्रोन के तौर पर ऑपरेट करना जोखिम भरा हो सकता है।

वहीं, बड़ी चुनौती बजट को लेकर है। भारत पहले ही राफेल, तेजस एमके 1ए और एमके 2 जैसे नए जहाजों पर अरबों रुपये खर्च कर रहा है। ऐसे में पुराने विमानों को ड्रोन में बदलने का खर्च अलग पड़ेगा, जिसका असर रक्षा बजट पर नकारात्मक पड़ सकता है।

अमेरिका और चीन कर चुके हैं ऐसा

हालांकि यह आइडिया नया नहीं है। अमेरिका ने अपने एफ-16 विमानों को क्यूएफ-16 टारगेट ड्रोन में बदला है, जिन्हें मिसाइल परीक्षणों में इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, इजराइल ने भी अपने पुराने एफ-4 फैंटम विमानों को ड्रोन बनाया था।

वहीं, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स ने हाल ही में अपने जे-6 फाइटर जेट्स को ड्रोन में बदला है। 1950 और 1960 के दशक में बने ये विमान, जो कभी सोवियत मिग-19 पर आधारित थे, अब पूरी तरह से यूएवी में बदल दिए गए हैं।

हाल ही में चांगचुन एयर शो 2025 में पहली बार जे-6डब्ल्यू ड्रोन को शोकेस किया गया था। यह वही विमान है जिसे कभी चीन ने हजारों की संख्या में बनाया था, लेकिन अब इसे ड्रोन के तौर पर जंग के लिए तैयार किया जा रहा है।

चीन ने बनाया स्वार्म अटैक का बेड़ा

चीन ने भी अपने पुराने जे-6 और जे-7 विमानों को ड्रोन और यूसीएवी में बदलने का काम किया है। इन विमानों को स्वार्म अटैक के लिए तैयार किया गया है। अनुमान है कि चीन ने सैकड़ों पुराने विमानों को इस तरह अपग्रेड किए है, जिन्हें ताइवान के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

जे-6 चीन का दूसरा पीढ़ी का सुपरसोनिक लड़ाकू विमान था। इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 1.3 थी और यह 700 किलोमीटर की रेंज तक उड़ सकता था। 1960 से लेकर 1980 के दशक तक चीन ने इनकी हजारों यूनिट बनाई। लेकिन जब जे-10, जे-11 और जे-20 जैसे आधुनिक विमान आए, तो यह मॉडल पुराना हो गया।

हालांकि, चीन ने इन विमानों को पूरी तरह कबाड़ नहीं किया। बीते दो दशकों में इन्हें सुरक्षित रूप से एयरबेस पर रखा गया और अब बड़ी संख्या में इन्हें ड्रोन में बदला जा रहा है।

कैसे किया ट्रांसफॉर्मेशन?

ड्रोन ट्रांसफॉर्मेशन की प्रक्रिया में सबसे पहले पायलट से जुड़ी सभी चीजें हटा दी गईं। कॉकपिट, कैनन, सहायक ईंधन टैंक और इजेक्शन सीट को निकाल दिया गया। इसके बाद इन विमानों को आधुनिक ऑटोपायलट सिस्टम, टेर्रेन-मैचिंग नेविगेशन, और अटोनॉमस फ्लाइट कंट्रोल से लैस किया गया।

इसके अलावा, नए वेपन स्टेशन जोड़े गए, ताकि ये विमानों की तरह हथियार ले जा सकें। कुछ विमानों को कामिकाजे ड्रोन के तौर पर तैयार किया गया है, जो एकतरफा हमलों में इस्तेमाल होंगे।

चीन का उद्देश्य ताइवान पर दबाव बनाना है। जे-6 ड्रोन बड़े पैमाने पर स्वॉर्म अटैक में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। जब सैकड़ों पुराने जे-6 ड्रोन एक साथ उड़ान भरेंगे, तो ताइवान के एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ेगा।

यह ड्रोन ताइवान के रडार और मिसाइल रक्षा सिस्टम को भ्रमित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ताइवान इन ड्रोन को रोकने के लिए महंगे पैट्रियॉट मिसाइल इंटरसेप्टर्स का इस्तेमाल करेगा, तो उसका स्टॉक जल्दी खत्म हो जाएगा। इसके बाद चीन के आधुनिक जे-20 और जे-35 लड़ाकू विमान आसानी से हमला कर सकेंगे।

एट्रिशन वारफेयर टेक्निक

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि चीन के पास लगभग 3,000 पुराने जे-6 विमान अब भी स्टोरेज में हैं। इनमें से सैकड़ों पहले ही ड्रोन में बदले जा चुके हैं। हालांकि जे-6 ड्रोन आधुनिक विमानों की तुलना में धीमे और पुराने हैं, लेकिन इनकी खासियत यह है कि ये सस्ते और बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। यही कारण है कि इन्हें एट्रिशन वारफेयर यानी थकाऊ युद्ध की रणनीति में इस्तेमाल किया जाएगा। इनकी मदद से चीन दुश्मन को अपने एयर डिफेंस सिस्टम को लगातार इस्तेमाल करने पर मजबूर करेगा।

एचएएल और बीईएल मिलकर कर सकते हैं ट्रांसफॉर्मेशन

वहीं, भारत में इस ट्रांसफॉर्मेशन को एचएएल और बीईएल मिलकर कर सकते हैं। एचएएल को MiG-21 के मैंटेनेंस का दशकों का अनुभव है, जबकि बीईएल की विशेषज्ञता राडार और टेलिमेट्री सिस्टम में है। डीआरडीओ इस प्रोजेक्ट का तकनीकी नेतृत्व कर सकता है।

जानकारों के अनुसार, एक मिग-21 को टारगेट ड्रोन में बदलने की लागत लगभग 5 से 10 करोड़ रुपये होगी। वहीं, अगर इन्हें UCAV यानी कॉम्बैट ड्रोन में बदला जाए तो लागत 50 से 100 करोड़ रुपये तक जा सकती है। इसके मुकाबले एक नए एमक्यू-9बी जैसे ड्रोन की कीमत कई सौ करोड़ रुपये है।

कर सकते हैं मिसाइलों की टेस्टिंग

वहीं, भारत अभी नई पीढ़ी की एयर डिफेंस मिसाइलों डेवलप कर रहा है। इनमें आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और एक्सआरएसएएम शामिल हैं। इन मिसाइलों को टेस्ट करने के लिए ऐसे टारगेट्स की जरूरत होती है जो तेज गति से उड़ने वाले दुश्मन विमानों जैसी चुनौती पेश कर सकें।

मैक-2 की रफ्तार और 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ने की क्षमता वाले मिग-21 बाइसन इस काम के लिए बिल्कुल उपयुक्त हैं। जब इन्हें ड्रोन में बदला जाएगा तो ये रीयल टाइम वॉर जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जिससे मिसाइलों की सही क्षमता का पता लगाया जा सकेगा।

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने तुर्की के बायरकटार टीबी2 जैसे ड्रोन का इस्तेमाल किया था। वहीं, चीन बड़े पैमाने पर पुराने विमानों को ड्रोन में बदलकर उन्हें स्वॉर्म अटैक्स के लिए तैयार कर रहा है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह ऐसे प्रयोग करे जिससे उसकी ड्रोन और एयर डिफेंस क्षमता दोनों मजबूत हों। मिग-21 को ड्रोन में बदलना इस दिशा में एक ब्रिज कैपेबिलिटी साबित हो सकता है, जब तक कि डीआरडीओ के तापस और घातक जैसे प्रोजेक्ट पूरी तरह से ऑपरेशनल न हो जाएं।

97 LCA Mk1A Deal: रक्षा मंत्रालय ने किया 97 तेजस LCA Mk1A के लिए HAL के साथ करार, 2027-28 से शुरू होगी डिलीवरी

97 LCA Mk1A Deal

97 LCA Mk1A Deal: रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ 97 एलसीए एमके1ए (LCA Mk1A) विमान की खरीद के लिए 62,370 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत किए हैं। इन विमानों में 68 लड़ाकू और 29 ट्विन-सीटर शामिल हैं।

इस डील के मुताबिक इन विमानों की डिलीवरी 2027-28 से शुरू होगी और अगले छह सालों में पूरी की जाएगी। इस बीच एचएएल अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम करेगा, ताकि वायुसेना की ज़रूरतें समय पर पूरी हो सकें।

नए कॉन्ट्रैक्ट के तहत एचएएल को यह सुनिश्चित करना होगा कि विमानों में 64 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया जाए। इसके लिए 67 अतिरिक्त स्वदेशी आइटम जोड़े गए हैं, जो पहले जनवरी 2021 में हुए कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा नहीं थे।

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तेजस एमके1ए अपने पुराने वैरिएंट के मुकाबले में काफी एडवांस है। इसमें उत्तम एईएसए (Active Electronically Scanned Array) रडार भी लगाया जाएगा। इसके साथ स्वयम् रक्षा कवच (Swayam Raksha Kavach) और कंट्रोल सरफेस एक्ट्यूएटर्स जैसी स्वदेशी सिस्टम भी इसमें लगाए जाएंगे।

उत्तम एईएसए रडार दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को दूर से ही ट्रैक करने में सक्षम है और मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट की सुविधा देता है। गैलियम आर्सेनाइड बेस्ड यह रडार 150 किलोमीटर से दूर से ही ट्रैक कर सकता है और 50 से अधिक टारगेट्स को 100 किलोमीटर से अधिक दूरी पर ट्रैक कर सकता है। वहीं एलसीए एमके2 में एडवांस गैलियम नाइट्राइड रडार लगाया जाएगा, जो 180-200 किलोमीटर की रेंज तक ट्रैक कर सकताा है।

वहीं, स्वयम् रक्षा कवच मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और काउंटरमेजर्स से लैस है, जो विमान को दुश्मन की मिसाइल से बचाने में मदद करता है।

इस प्रोजेक्ट में करीब 105 भारतीय कंपनियां शामिल होंगी, जो विभिन्न कंपोनेंट्स और इक्विपमेंट्स बनाएंगी। इस वजह से अगले छह साल तक हर साल लगभग 11,750 सीधी और अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी। यह भारतीय एयरोस्पेस सेक्टर को नई ऊर्जा देगा और निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी रक्षा निर्माण में बड़ा योगदान करने का अवसर मिलेगा।

वहीं यह कॉन्ट्रैक्ट रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 की ‘बॉय (India-IDDM)’ कैटेगरी के अंतर्गत किया गया है। इस श्रेणी का उद्देश्य है कि रक्षा जरूरतों के लिए अधिक से अधिक स्वदेशी उत्पाद तैयार किए जाएं। आईडीडीएम (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) कैटेगरी में आने वाले उत्पाद पूरी तरह भारत में डिजाइन और विकसित होते हैं।

97 LCA Mk1A Deal

यह डील इसलिए भी अहम है क्योंकि 26 सितंबर के बाद जब मिग-21 रिटायर हो जाएंगे तो भारतीय वायुसेना के पास केवल 29 स्क्वाड्रन ही रह जाएंगे। वहीं पाकिस्तान के पास वर्तमान में लगभग 25 लड़ाकू स्क्वॉड्रन हैं और वह चीन से 40 जे-35ए पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हासिल करने की तैयारी कर रहा है। चीन पहले से ही भारत से कई गुना अधिक फाइटर जेट, बॉम्बर और फोर्स-मल्टीप्लायर ऑपरेट कर रहा है। ऐसे में भारतीय वायुसेना के लिए नए लड़ाकू विमानों की जरूरत और भी अहम हो जाती है।

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया कि भारतीय वायुसेना को नई तकनीकों और बड़ी संख्या में लड़ाकू विमानों की जरूरत है। उस दौरान पाकिस्तान ने चीन के बने जे-10 विमानों का इस्तेमाल किया था, जो पीएल-15 जैसे 200 किलोमीटर रेंज वाले बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस थे। वायुसेना की इंटरनल रिव्यू रिपोर्ट में कहा गया है कि दो फ्रंच मोर्चों को देखते हुए भारत को 50 से ज्यादा अधिक स्क्वॉड्रन और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी से लैस विमानों की तुरंत जरूरत है।

वहीं, वायुसेना की जरूरतों को देखते हुए एलसीए तेजस का डेवलपमेंट और प्रोडक्शन बेहद धीमी रफ्तार से चल रहा है। 2021 में 83 तेजस एमके1ए विमानों के लिए 46,898 करोड़ रुपये की डील हुई थी। लेकिन अभी तक भारतीय वायुसेना को पहला विमान भी नहीं मिला। हालांकि, एचएएल का दावा है कि अक्टूबर 2025 में शुरुआती दो विमान वायुसेना की डिलीवरी कर देगा।

इसमें अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक की बड़ी भूमिका है, जिसने अगस्त 2021 में 5,375 करोड़ रुपये की सौदे के तहत 99 जीई-एफ404 टर्बोफैन इंजन देने का करार किया था। अब तक तीन इंजन भारत पहुंच चुके हैं और साल के अंत तक सात और आने की उम्मीद है। आने वाले सालों में हर साल 20 इंजन दिए जाएंगे। नए 97 विमानों के लिए एएचएल को 113 और इंजन खरीदने होंगे, जिसकी लागत करीब 1 अरब डॉलर होगी।

एचएएल ने भरोसा दिलाया है कि वह धीरे-धीरे उत्पादन दर को बढ़ाकर हर साल 20 विमान बनाएगा और फिर इसे 24 से 30 विमानों तक ले जाएगा। इसके लिए नासिक में तीसरी प्रोडक्शन लाइन शुरू की जा चुकी है, जो बेंगलुरु की दो मौजूदा लाइनों के साथ मिलकर काम करेगी। इसके अलावा निजी क्षेत्र की कंपनियों की सप्लाई चेन भी एचएएल को मदद करेगी।

वहीं, भारतीय वायुसेना इन विमानों को डिलीवरी तभी करेगी जब एस्ट्रा वीवीआर मिसाइल, शॉर्ट-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल और लेजर-गाइडेड बम जैसे हथियारों के फायरिंग ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे हो जाएंगे। इसके अलावा इजरायली एल्टा ELM-2052 रडार और फायर कंट्रोल सिस्टम का इंटीग्रेशन भी पूरी तरह से सर्टिफाइड होना जरूरी है।