📍नई दिल्ली | 31 Mar, 2026, 1:26 PM
Armed Forces Tribunal pending cases: देश की अदालतों की तरह सैनिकों और पूर्व सैनिकों को न्याय देने के लिए बनाया गया आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) भी केसों के बोझ तले दबा है। यहां पेंडिंग मामलों की संख्या हजारों में पहुंच गई है और कई जगहों पर जरूरी पद खाली होने के चलते मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है।
रक्षा मंत्रालय ने 30 मार्च को राज्यसभा में जानकारी दी कि पिछले पांच साल में एएफटी के सामने कुल 44,622 मामले आए। इनमें से 33,525 मामलों का निपटारा हो चुका है, लेकिन अभी भी 11,097 मामले लंबित हैं। यह कुल मामलों का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।
Armed Forces Tribunal pending cases: क्या है आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल
आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल की स्थापना साल 2007 में एक विशेष कानून के तहत की गई थी। इसका मकसद था कि सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े मामलों का जल्दी और विशेषज्ञ तरीके से निपटारा हो सके।
यह ट्रिब्यूनल उन मामलों को सुनता है जो सैनिकों की भर्ती, नियुक्ति, प्रमोशन, पेंशन, सेवा शर्तों और अनुशासन से जुड़े होते हैं। इसके अलावा कोर्ट मार्शल के फैसलों के खिलाफ अपील भी यहीं की जाती है।
पहले ऐसे मामलों के लिए सैनिकों को हाई कोर्ट या अन्य सिविल अदालतों का सहारा लेना पड़ता था, जहां मामलों में काफी समय लग जाता था। इसी वजह से एएफटी को बनाया गया था ताकि न्याय जल्दी मिल सके।
पांच साल में बढ़े मामलों के आंकड़े
रक्षा मंत्रालय के अनुसार 2021 से लेकर जनवरी 2026 तक लगातार मामले दर्ज होते रहे। इस दौरान कुल 44,622 केस दाखिल हुए। इनमें से 33,525 मामलों का निपटारा किया गया, लेकिन 11,097 मामले अभी भी बाकी हैं। इसका मतलब यह है कि हर चार में से एक मामला अभी भी पेंडिंग है।
साल के हिसाब से देखें तो पेंडिंग केसों की संख्या में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। 2021 में 3,431 मामले लंबित थे। इसके बाद 2023 में यह संख्या घटकर 534 रह गई थी।
लेकिन इसके बाद फिर बढ़ोतरी हुई और 2025 में लंबित मामलों की संख्या 2,795 तक पहुंच गई। 2026 के शुरुआती महीनों में 406 मामले पेंडिंग बताए गए हैं, हालांकि यह शुरुआत के महीनों का ही आंकड़ा है।
अलग-अलग बेंच में खाली पद बड़ी वजह
एएफटी की सबसे बड़ी समस्या अलग-अलग बेंच में खाली पदों की है। कई रीजनल बेंच पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं क्योंकि वहां जरूरी सदस्य मौजूद नहीं हैं। श्रीनगर, जबलपुर और गुवाहाटी बेंच में दो-दो पद खाली हैं। इसके अलावा चंडीगढ़, लखनऊ, कोच्चि, चेन्नई और कोलकाता जैसी बेंचों में भी स्टाफ की कमी है।
इसके उलट नई दिल्ली की प्रिंसिपल बेंच पूरी तरह से भरी हुई है, जहां चेयरपर्सन सहित सभी पद मौजूद हैं। एएफटी में दो तरह के सदस्य होते हैं, न्यायिक सदस्य और प्रशासनिक सदस्य। न्यायिक सदस्य आमतौर पर हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं, जबकि प्रशासनिक सदस्य सेना के वरिष्ठ अधिकारी होते हैं। जब इन पदों में कमी होती है तो मामलों की सुनवाई धीमी पड़ जाती है।
सुनवाई में देरी का असर
केस की सुनवाई समय पर न होने से इसका सीधा असर सैनिकों और उनके परिवारों पर पड़ता है। अधिकतर मामले पेंशन, प्रमोशन, मेडिकल बोर्ड, सेवा शर्तों और कोर्ट मार्शल से जुड़े होते हैं। कई बार सैनिक या उनके परिवार सालों तक फैसले का इंतजार करते रहते हैं। कई मामलों खासकर पेंशन से जुड़े केसों में यह देरी आर्थिक परेशानी भी पैदा करती है। पूर्व सैनिकों के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि रिटायरमेंट के बाद उनकी आय का मुख्य स्रोत पेंशन ही होता है।
देशभर में फैली हैं एएफटी की बेंच
एएफटी की बेंच देश के अलग-अलग हिस्सों में बनाई गई हैं, ताकि सैनिकों को अपने इलाके में ही न्याय मिल सके।
उत्तर भारत में चंडीगढ़ और लखनऊ, पूर्वोत्तर में गुवाहाटी, दक्षिण में चेन्नई और कोच्चि, मध्य भारत में जबलपुर और जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर जैसी जगहों पर बेंच काम करती हैं। इन बेंचों का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि सैनिक देश के अलग-अलग और दूरदराज इलाकों में तैनात रहते हैं। अगर इन बेंचों में स्टाफ की कमी रहती है, तो वहां के सैनिकों को ज्यादा परेशानी होती है।
सरकार ने मानी कमी, लेकिन समयसीमा नहीं बताई
रक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा में यह स्वीकार किया कि कई बेंच में स्टाफ की कमी है और इससे काम प्रभावित हो रहा है। हालांकि, मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि इन खाली पदों को कब तक भरा जाएगा। यही वजह है कि यह मुद्दा अब चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
लगातार बढ़ रहा काम का दबाव
एएफटी पर काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है। हर साल नए मामले दर्ज हो रहे हैं और पुराने मामलों का निपटारा भी करना होता है। हालांकि ट्रिब्यूनल ने बड़ी संख्या में मामलों को निपटाया है, लेकिन फिर भी पेंडिंग मामलों की संख्या काफी ज्यादा बनी हुई है। इससे साफ है कि मौजूदा संसाधनों के साथ सभी मामलों को समय पर निपटाना आसान नहीं है।

