📍नई दिल्ली | 14 Dec, 2025, 7:38 PM
Indian Army RVC Corps Day: भारतीय सेना की सबसे पुरानी इंडियन आर्मी रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स को आज 247 साल पूरे हो गए। आरवीसी ने रविवार को अपना 247वां कॉर्प्स डे मनाया। लगभग 250 साल पहले आरवीसी की शुरुआत वर्ष 1779 में बंगाल में स्थापित स्टड डिपार्टमेंट के रूप में हुई थी। जिसके बाद 14 दिसंबर 1920 को आधिकारिक रूप से आर्मी वेटरीनरी कॉर्प्स बना। कई पुनर्गठन के बाद वर्ष 1960 में औपचारिक रूप से रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स (आरवीसी) का स्वरूप मिला। वर्ष 1989 में इस कॉर्प्स को प्रेसिडेंट्स कलर्स से सम्मानित किया गया था।
आरवीसी का आदर्श वाक्य “पशु सेवा अस्माकम धर्मः” है, जिसका अर्थ है पशुओं की सेवा ही हमारा कर्तव्य है। यह कॉर्प्स सेना के लिए घोड़े, खच्चर और आर्मी डॉग्स के प्रजनन, पालन, प्रशिक्षण और सप्लाई का काम करता है। इन पशुओं को देशभर की एनिमल होल्डिंग यूनिट्स में तैनात किया जाता है, जहां वे सेना के अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारतीय सेना की रिमाउंट एंड वेटरनरी कॉर्प्स को अक्सर “साइलेंट वारियर्स” की रीढ़ कहा जाता है। पहले और दूसरे विश्व युद्ध सहित स्वतंत्रता के बाद हुए सभी प्रमुख सैन्य अभियानों में आरवीसी ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। दुर्गम और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में, जहां वाहन या हेलीकॉप्टर नहीं पहुंच पाते, वहां खच्चर आज भी रसद आपूर्ति का सबसे भरोसेमंद साधन बने हुए हैं।
वहीं, कारगिल युद्ध के दौरान आरवीसी की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में रही। कारगिल की बर्फीली और ऊंची चोटियों पर, जहां वाहन या हेलीकॉप्टर पहुंचना संभव नहीं था, वहीं आरवीसी के खच्चरों ने मोर्चा संभाला। ये खच्चर 18 से 19 हजार फीट की ऊंचाई तक गोला-बारूद, राशन और हथियार ढोते रहे। ऑक्सीजन की कमी, जमा देने वाली ठंड और दुश्मन की गोलीबारी के बीच इन पैक एनिमल्स ने भारतीय सैनिकों के लिए सप्लाई लाइन को जिंदा रखा। आज भी सियाचिन और लद्दाख जैसे इलाकों में खच्चर सेना की लॉजिस्टिक्स का भरोसेमंद साधन बने हुए हैं।
आतंकवाद विरोधी अभियानों में आर्मी डॉग्स की बहादुरी भी किसी सैनिक से कम नहीं रही है। 2022 में बारामूला ऑपरेशन के दौरान दो साल का बेल्जियन मालिनॉइस डॉग एक्सेल आगे भेजा गया। उसके शरीर पर कैमरा लगाया गया था, ताकि आतंकियों की सटीक लोकेशन मिल सके। एक्सेल ने छिपे आतंकियों का पता लगा लिया, जिससे जवान सुरक्षित आगे बढ़ सके, लेकिन इसी दौरान वह शहीद हो गया।
इसी तरह 2023 में कोकेरनाग एनकाउंटर के दौरान छह साल की लैब्राडोर केंट को आगे भेजा गया। केंट ने छिपे आतंकियों पर हमला कर अपने हैंडलर और अन्य जवानों की जान बचाई। ऑपरेशन के दौरान केंट शहीद हो गई।
आरवीसी के इतिहास में ऐसी कई पुरानी लेकिन यादगार कहानियां दर्ज हैं। 1990 के दशक में कश्मीर में तैनात आर्मी डॉग रेक्स ने गोलीबारी के बीच तीन किलोमीटर तक एक घायल आतंकी को ट्रैक किया था। वहीं 1965 में भूटान में हुए एक हमले के बाद आर्मी डॉग एलेक्स ने ग्रेनेड से उठी गंध को पकड़कर जंगल में कई किलोमीटर तक दौड़ते हुए हमलावर को ढूंढ निकाला था। इस साहसिक कार्रवाई के लिए भूटान के राजा ने एलेक्स को विशेष इनाम दिया था।
वहीं, आरवीसी के खच्चरों में भी कई ऐसे नाम हैं जो सेना के इतिहास में दर्ज हैं। पेडोंगी नाम का खच्चर करीब 30 साल तक फॉरवर्ड एरिया में सेवा करता रहा। उसकी लंबी सेवा और योगदान के सम्मान में दिल्ली कैंट में एक ऑफिसर्स मेस उसके नाम पर रखा गया है।
आर्मी डॉग्स को आठ खास स्किल्स में ट्रेन किया जाता है, जिनमें काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म ऑपरेशंस शामिल हैं। एक्सेल, जूम, मानसी, केंट और फैंटम जैसे कई डॉग्स ने अदम्य साहस दिखाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी है।
आरवीसी आधुनिक भारत की जरूरतों के अनुरूप भी लगातार आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2023 से इसमें महिला अधिकारियों की भर्ती शुरू की गई, और अब तक सात महिला अधिकारी कमीशन प्राप्त कर चुकी हैं। इनमें से एक अधिकारी का चयन सेना की पहली वीमेन स्काईडाइविंग टीम के लिए भी हुआ है।
कोविड-19 महामारी के दौरान आरवीसी ने आरटी-पीसीआर टेस्टिंग, मेडिकल सपोर्ट और केयर फैसिलिटी में भी अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा यह कॉर्प्स वन हेल्थ और जूनोटिक डिजीज मैनेजमेंट के लिए राष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करता है।
आज आरवीसी अपने रिटायर्ड सैन्य कुत्तों और जानवरों का भी पूरा सम्मान करता है। मेरठ स्थित आरवीसी सेंटर में रिटायर्ड डॉग्स के लिए विशेष देखभाल की व्यवस्था है, जहां उन्हें सम्मानजनक जीवन दिया जाता है। वहीं मेरठ में ही देश का पहला एनिमल वॉर मेमोरियल तैयार किया जा रहा है, जहां 300 से ज्यादा आर्मी डॉग्स और खच्चरों के नाम दर्ज किए जाएंगे।

