📍नई दिल्ली | 27 Oct, 2025, 9:24 PM
Mid-air Refuelling Aircraft Deal: भारतीय वायुसेना अपने पुराने रिफ्यूलिंग विमानों की जगह नए और आधुनिक टैंकर विमान खरीदने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, लगभग 8,000 करोड़ रुपये की यह बड़ी डिफेंस डील अब इजरायल की सरकारी कंपनी इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज को मिल सकती है। पिछले 15 सालों में भारतीय वायुसेना ने कई बार मिड-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर खरीदने की कोशिश की, लेकिन हर बार यह योजना अधर में रह गई।
न्यूज एजेंसी एनआई की रिपोर्ट के अनुसार, इस डील के तहत वायुसेना के लिए छह नए मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान खरीदे जाएंगे, जिन्हें इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज पुराने बोइंग 767 पैसेंजर प्लेनों को अपग्रेड करके बनाएगी। इन विमानों का इस्तेमाल हवा में ही लड़ाकू विमानों को ईंधन भरने के लिए किया जाएगा।
Mid-air Refuelling Aircraft Deal: डील जल्द हो सकती है फाइनल
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि इस बोली में कई विदेशी कंपनियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज ही वायुसेना की शर्तों को पूरा कर सकी। इस डील में खास तौर पर 3 से 30 फीसदी तक स्वदेशी हिस्सेदारी की जरूरी शर्त रखी गई थी, जिसे कंपनी ने मान लिया।
रूस और यूरोप की कंपनियां भी इस बोली में शामिल थीं, लेकिन वे निर्धारित मानकों और ऑफसेट नियमों को पूरा नहीं कर सकीं। अब रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के बाद इस सौदे को अंतिम रूप दिए जा सकता है।
कैसे होंगे नए टैंकर विमान
यह छह विमान बोइंग 767 कमर्शियल एयरक्राफ्ट के पुराने मॉडलों से बनाए जाएंगे। इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज इन्हें पूरी तरह से बदलकर एरियल टैंकर में बदल देगी, जो हवा में ही दूसरे लड़ाकू या ट्रांसपोर्ट विमानों में ईंधन भर सकेंगे। सूत्रों के अनुसार, इन विमानों की कीमत और उनका ऑपरेशनल खर्च अन्य देशों के समान टैंकर विमानों की तुलना में काफी कम होगा।
ये टैंकर वायुसेना के राफेल, सुखोई-30, तेजस, और नेवी के मिग-29के जैसे विमानों को हवा में ईंधन देने में मदद करेंगे। इसके अलावा, ये विमान लंबी दूरी की उड़ान और हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस में उपयोगी साबित होंगे।
वायुसेना के पास फिलहाल कितने हैं टैंकर
वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास 6 रूसी Il-78 टैंकर विमान हैं, जो आगरा बेस पर तैनात हैं। इन्हें 2003 से 2004 के बीच खरीदा गया था। ये टैंकर फाइटर जेट्स और ट्रांसपोर्ट विमानों को सपोर्ट करते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इनकी सर्विसेबिलिटी पर सवाल उठे हैं। कई बार तकनीकी खराबी और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण ये विमान लंबे समय तक ग्राउंडेड रहे हैं।
वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “नई पीढ़ी के लड़ाकू विमान जैसे राफेल और तेजस को लंबे ऑपरेशंस के लिए मिड-एयर रिफ्यूलिंग की जरूरत होती है। फिलहाल हमारे पास पर्याप्त टैंकर नहीं हैं, इसलिए इस डील से क्षमता में बड़ा सुधार आएगा।”
यह डील लगभग 950 मिलियन अमेरिका डॉलर (लगभग 8,000 करोड़ रुपये) की है। इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज द्वारा कन्वर्ट किए गए ये विमान 2026 से डिलीवर होने शुरू होंगे और अगले दो से तीन वर्षों में सभी छह विमान भारतीय वायुसेना को मिल जाएंगे।
डील के तहत इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज को भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी में काम करना होगा, ताकि इसमें स्वदेशी कंटेंट बढ़ाया जा सके। इसके लिए हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और अन्य भारतीय एयरोस्पेस कंपनियां सहयोग करेंगी।
2007 में एयरबस की ए330 एमआरटीटी को चुना गया था, लेकिन इवैल्यूएशन में विवाद और जांच के चलते वह डील रद्द कर दी गई। 2016 से 2020 के बीच रूस और यूरोप की कंपनियों से बातचीत भी चली, परंतु इंडिजिनस कंटेंट और मेंटेनेंस लागत पर सहमति नहीं बन सकी।
2024 में फिर से नया प्रस्ताव लाया गया, जिसके लिए इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज के नाम पर अंतिम मुहर लग सकती है। इस डील को रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की मंजूरी मिलते ही लागू किया जाएगा।
भारत और इजरायल के बीच कई सालों से मजबूत रक्षा सहयोग रहा है। इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज पहले से ही भारत को हेरोन ड्रोन, स्पायडर मिसाइल सिस्टम और रडार तकनीक उपलब्ध करा चुकी है।
क्यों जरूरी है मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान
मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान आधुनिक वायुसेनाओं के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” माने जाते हैं। इनके होने से फाइटर जेट्स हवा में ही ईंधन भर सकते हैं, जिससे उनकी रेंज और मिशन समय बढ़ जाता है। भारतीय वायुसेना के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का भौगोलिक विस्तार बहुत बड़ा है और उसे पश्चिम से लेकर पूर्वी सीमाओं तक तेजी से जवाब देने की जरूरत होती है।
नई डील से वायुसेना की ऑपरेशनल रीच और स्ट्रैटेजिक फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ेगी। इससे भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी लंबी दूरी के अभियानों को ऑपरेट कर सकेगा।

