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Akash NG Missile को क्यों कहा जा रहा है “पुअर मैंस पैट्रियट”! कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले ड्रोन को भी करेगी ढेर

आकाश-एनजी मिसाइल का डिजाइन पहले के मुकाबले ज्यादा हल्का और स्लीक बनाया गया है। इसका मतलब है कि मिसाइल का आकार और वजन दोनों कम किए गए हैं, जिससे इसकी तैनाती और ऑपरेशन आसान हो गया है...

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📍नई दिल्ली | 25 Dec, 2025, 2:05 PM

Akash NG Missile: डीआरडीओ ने हाल ही में आकाश-न्यू जेनरेशन मिसाइल सिस्टम यानी आकाश-एनजी का सफल परीक्षण किया। इस परीक्षण के साथ ही आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे हो गए हैं। जिसके बाद भारतीय वायुसेना में इस आधुनिक सतह-से-हवा मिसाइल सिस्टम को शामिल करने का रास्ता साफ हो गया है। ट्रायल्स के दौरान आकाश-एनजी मिसाइल ने अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर उड़ रहे हवाई लक्ष्यों को सटीक तरीके से इंटरसेप्ट किया।

डीआरडीओ की तरफ जारी जानकारी के मुताबिक, इन परीक्षणों में मिसाइल सिस्टम को रियलिस्टिक वारटाइम कंडीशंस में परखा गया। इसमें लंबी दूरी पर ऊंचाई से आने वाले हवाई खतरे और सीमा के पास बहुत कम ऊंचाई पर उड़ रहे लक्ष्यों को भी सफलतापूर्वक नष्ट किया गया। यह ट्रायल्स ओडिशा के तट के पास इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में किए गए, जहां पूरी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच ट्रायल संपन्न हुआ।

आकाश मिसाइल की कहानी कई दशक पुरानी है। डीआरडीओ ने 1980 के दशक के अंत में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत आकाश मिसाइल के डेवलपमेंट का काम शुरू किया था। इस कार्यक्रम का नेतृत्व उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कर रहे थे। शुरुआती दौर में इस मिसाइल को एक शॉर्ट-टू-मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल के रूप में डेवलप किया गया, ताकि देश के संवेदनशील इलाकों और महत्वपूर्ण ठिकानों को हवाई हमलों से सुरक्षित रखा जा सके।

1990 और 2000 के दशक में आकाश मिसाइल के कई डेवलपमेंटल ट्रायल्स किए गए। इसके बाद भारतीय वायुसेना और भारतीय थलसेना ने इसके व्यापक यूजर ट्रायल्स किए। इन परीक्षणों में मिसाइल की रेंज, सटीकता और एक साथ कई लक्ष्यों को मार गिराने की क्षमता को परखा गया। सफल परीक्षणों के बाद वर्ष 2014 में आकाश मिसाइल को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया और इसके अगले वर्ष इसे भारतीय थलसेना में भी तैनात किया गया।

आकाश मिसाइल सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह एक साथ कई एरियल टारगेट्स को ग्रुप मोड या ऑटोनॉमस मोड में निशाना बना सके। इसमें इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स यानी ईसीसीएम की सुविधा दी गई, जिससे यह दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम को भी बेअसर कर सके। समय के साथ भारतीय वायुसेना और थलसेना ने आकाश मिसाइल की कई स्क्वाड्रन और रेजिमेंट तैयार कीं।

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हालांकि बदलते युद्ध के स्वरूप और नई तकनीकों के चलते डीआरडीओ ने आकाश मिसाइल के एक और आधुनिक वर्जन पर काम शुरू किया। जहां पुराने आकाश मिसाइल की ऑपरेशनल रेंज लगभग 27 से 30 किलोमीटर थी, वहीं, आकाश-एनजी की रेंज बढ़कर करीब 70 किलोमीटर तक पहुंच गई है। यह बदलाव देश के एयर डिफेंस के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

आकाश-एनजी मिसाइल का डिजाइन पहले के मुकाबले ज्यादा हल्का और स्लीक बनाया गया है। इसका मतलब है कि मिसाइल का आकार और वजन दोनों कम किए गए हैं, जिससे इसकी तैनाती और ऑपरेशन आसान हो गया है। इसके साथ ही इसका ग्राउंड सिस्टम फुटप्रिंट भी छोटा किया गया है, जिससे कम जगह में भी इसे तैनात किया जा सकता है।

इस नए मिसाइल सिस्टम में पूरी तरह स्वदेशी कु बैंड रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है। यह सीकर टारगेट को लास्ट फेज में खुद पहचान कर उस पर लॉक करता है। इसकी खूबी यह है कि यह सीकर लो रडार क्रॉस सेक्शन टारगेट्स जैसे ड्रोन्स, क्रूज मिसाइल्स को टर्मिनल फेज में लॉक कर सकता है। इसके साथ ही आकाश-एनजी में नया लॉन्चर, मल्टी-फंक्शन रडार और कमांड, कंट्रोल एवं कम्युनिकेशन सिस्टम शामिल किया गया है, जिससे पूरे सिस्टम की प्रतिक्रिया क्षमता और सटीकता बढ़ गई है। इसमें एईएसए मल्टी-फंक्शन रडार (MFR), इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग, 360° कवरेज, 20-70° एलिवेशन फीचर है। खास बात यह है कि रडार की मदद से एक बैटरी 10 टारगेट्स को एक साथ एंगेज कर सकती है।

आकाश-एनजी को कैनिस्टराइज्ड लॉन्चर सिस्टम के साथ डेवलप किया गया है। कैनिस्टराइज्ड सिस्टम का मतलब होता है कि मिसाइल को एक खास तरह के सील्ड कंटेनर में रखा जाता है। इससे मिसाइल को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत लॉन्च किया जा सकता है। इससे ट्रांसपोर्टेशन और स्टोरेज दोनों आसान होता है और मिसाइल की ऑपरेशनल रेडीनेस को बेहतर होती है।

डीआरडीओ के अधिकारियों के अनुसार, आकाश-एनजी को खासतौर पर भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह मिसाइल उन हवाई खतरों को रोकने में सक्षम है, जो तेज रफ्तार से उड़ते हैं और जिनका रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस बहुत कम होता है। कम आरसीएस वाले टारगेट्स को रडार पर पकड़ना कठिन होता है, लेकिन आकाश-एनजी को इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

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आकाश-एनजी के यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स से पहले इसके कई अहम फ्लाइट टेस्ट किए गए थे। इस मिसाइल का पहला परीक्षण 25 जनवरी 2021 को किया गया था, जिसमें इसकी बुनियादी क्षमताओं को परखा गया। इसके बाद मार्च और जुलाई 2021 में इसके और परीक्षण किए गए। जुलाई 2021 में एक्टिव सीकर से लैस मिसाइल ने एक हाई-स्पीड अनमैन्ड एरियल टारगेट को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया था।

जनवरी 2024 में आकाश-एनजी का एक और महत्वपूर्ण फ्लाइट टेस्ट किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने कम ऊंचाई पर तेज गति से उड़ रहे एक अनमैन्ड एरियल टारगेट को निशाना बनाया। इस सफलता के बाद इसके यूजर ट्रायल्स का रास्ता साफ हुआ। हालिया यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स में मिसाइल ने सभी प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स यानी पीएसक्यूआर को पूरा किया।

डीआरडीओ ने बताया कि इन ट्रायल्स में पूरे वेपन सिस्टम की कार्यक्षमता को परखा गया। इसमें मिसाइल, लॉन्चर, रडार और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम सभी शामिल थे। अलग-अलग प्रकार के हवाई खतरों के खिलाफ सिस्टम की प्रतिक्रिया और सटीकता को जांचा गया।

आकाश-एनजी प्रोजेक्ट को सितंबर 2016 में मंजूरी दी गई थी। यह मिसाइल सिस्टम एक क्लीन-शीट डिजाइन पर आधारित है, यानी इसे पुराने आकाश सिस्टम का संशोधित रूप नहीं बल्कि पूरी तरह नए सिरे से डिजाइन किया गया है। पुराने आकाश इंटरसेप्टर का बेस सोवियत काल की एसए-6 मिसाइल थी, जबकि आकाश-एनजी आधुनिक तकनीक पर आधारित है।

आकाश-एनजी में ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है। इस मोटर में दो अलग-अलग फेज में थ्रस्ट मिलता है, जिससे मिसाइल को बेहतर मैन्यूवर करने की क्षमता मिलती है। इसके साथ इसमें स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगाया गया है, जिसकी वजह से लक्ष्य की दूरी बढ़ने पर भी सटीकता बनी रहती है। साथ ही डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर मिड-फेज में “साइलेंट कोस्टिंग” करके हीट सिग्नेचर कम करता है, जिससे दुश्मन के इंफ्रारेंड सेंसर्स से बचने में मदद मिलती है।

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डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का पहला पल्स (बूस्ट फेज) लॉन्च के 5-10 सेकंड में फुल थ्रस्ट देता है, जिससे मिसाइल की रफ्तार मैक 2.5+ तक पहुंच जाती है। फिर मोटर ऑफ हो जाती है और मिसाइल बैलिस्टिक ग्लाइड पर जाती है। वहीं कोस्टिंग फेज में स्पीड मेंटेन रहती है लेकिन एग्जॉस्ट प्लूम और हीट कम होती है। आखिरी 10-15 किमी पर दूसरा पल्स एक्टिवेट होता है, जो टर्मिनल मैन्यूवरिंग के लिए हाई एनर्जी देता है जिसमें तेज टर्न्स, हाई-जी पुल-अप किए जा सकते हैं।

इस डिजाइन से न सिर्फ रेंज बढ़ती है बल्कि एंटी-सैचुरेशन अटैक कैपेबिलिटी भी बूस्ट होती है। सैचुरेशन अटैक में अगर दुश्मन 10-20 ड्रोन्स/क्रूज मिसाइल्स एक साथ भेजता है, ताकि डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड किया जा सके। लेकिन आकाश-एनजी की कोस्टिंग फेज में कम हीट/आईआर सिग्नेचर से दुश्मन के इंफ्रा-रेड सर्च एंड ट्रैक सेंसर्स को मिसाइल देर से डिटेक्ट होती है– इससे बैटरी के रडार को प्रायरिटी तय करने में ज्यादा वक्त मिलता है।

कु बैंड आरएफ सीकर के साथ मिलकर यह फीचर “होम-ऑन-जैम” मोड को सपोर्ट करता है। अगर दुश्मन जैमिंग करता है, तो मिसाइल जैम सिग्नल पर ही लॉक कर लेती है। डुअल-पल्स की एनर्जी सेविंग से टर्मिनल फेज में सीकर के लिए ज्यादा पावर बचती है, जो जैमिंग में भी एक्यूरेट रहता है।

इसलिए आकाश एनजी को “पुअर मैंस पैट्रियट” भी कहा जा रहा है। जो न केवल सस्ता है बल्कि चीन और पाकिस्तान की हूथी स्टाइल ड्रोन स्वार्म स्ट्रैटेजी के खिलाफ भी बेहद असरदार हैं। ऑपरेशन सिंदूर में जैसे पुराने आकाश सिस्टम ने कई पाकिस्तानी ड्रोन मार गिराए थे, वहीं, आकाश एनजी वर्जन एलएसी पर चीन के हाई-स्पीड यूएवी जैसे डब्ल्यूजे-700) के लिए काल साबित होगा।

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  • Akash NG Missile को क्यों कहा जा रहा है "पुअर मैंस पैट्रियट"! कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले ड्रोन को भी करेगी ढेर

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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