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MAITREE-XIV and Siyom Prahar: नॉर्थ ईस्ट में भारतीय सेना की दो बड़ी एक्सरसाइज; मैत्री-XIV और ड्रोन अभ्यास सियोम प्रहार से ऑपरेशनल तैयारियों को नई मजबूती

India Military Exercises Maitree-XIV and Siyom Prahar
Maitree-XIV

MAITREE-XIV and Siyom Prahar: भारत के पूर्वोत्तर इलाके में मेघालय के उमरोई में भारतीय सेना और रॉयल थाई आर्मी का संयुक्त अभ्यास मैत्री-XIV (Maitree-XIV) चल रहा है। वहीं दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना ने सियोम प्रहार (Siyom Prahar) अभ्यास के जरिए बैटलफील्ड में ड्रोन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की नई स्ट्रैटेजी का ट्रायल किया है। ये दोनों एक्सरसाइज भारत की बढ़ती सैन्य तैयारियों और रणनीतिक दृष्टिकोण का उदाहरण पेश करती हैं।

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मेघालय में चल रही Maitree-XIV अभ्यास भारत और थाईलैंड की सेनाओं के बीच चल रहा है, जो 14 सितंबर तक जारी रहेगा और इसमें दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे की कार्यशैली, तकनीक और अनुभव साझा कर रहे हैं। इस एक्सरसाइज का मुख्य उद्देश्य इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी तालमेल को बढ़ाना और संयुक्त ऑपरेशनों की क्षमता को और मजबूत करना है।

इस अभ्यास में सैनिकों ने कॉम्बैट कंडीशनिंग के जरिए शारीरिक क्षमता और युद्धक तैयारी को बढ़ाने पर फोकस किया। साथ ही, भारतीय सेना की इन्फैंट्री बटालियन के हथियारों और उपकरणों से परिचित कराने के लिए ओरिएंटेशन कराया गया। क्लोज कॉम्बैट यानी नजदीकी लड़ाई की तकनीकों को विशेष मार्शल आर्ट्स ट्रेनिंग से और प्रभावी बनाया गया।

अभ्यास के दौरान सेमी-शहरी इलाके में कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन और आतंकवादियों को खत्म करने के लिए सर्च एंड डेस्ट्रॉय मिशन भी कराए गए। इसके अलावा, एडवांस फायरिंग प्रैक्टिस में सैनिकों ने एंबिडेक्स्ट्रस यानी दोनों हाथों से फायरिंग करने की क्षमता और सटीक स्नाइपर ट्रेनिंग का प्रदर्शन किया। हाई-रिस्क मिशनों के लिए स्लिदरिंग ड्रिल्स का अभ्यास कराया गया, जिससे सैनिक तेजी से किसी क्षेत्र में उतर सकें और दुश्मन पर तुरंत कार्रवाई कर सकें।

इसके अलावा बस इंटरवेंशन और होस्टेज रेस्क्यू (बंधक मुक्ति) के हालात को भी अभ्यास का हिस्सा बनाया गया। कमरे में घुसकर खतरे को खत्म करने और सुरक्षित क्षेत्र बनाने के लिए रूम इंटरवेंशन ड्रिल्स का आयोजन किया गया। इसके साथ ही, सैनिकों ने रॉक क्राफ्ट ट्रेनिंग के जरिए कठिन इलाकों में चढ़ाई भी की। जंगल में जिंदा रहने के लिए सरवाइवल ड्रिल्स कराए गए, ताकि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी ऑपरेशन सफलतापूर्वक चलाए जा सकें।

सिर्फ कॉम्बैट ट्रेनिंग ही नहीं, बल्कि स्पोर्ट्स और टीम बिल्डिंग गतिविधियों को भी अभ्यास का हिस्सा बनाया गया। इनसे दोनों देशों की सेनाओं के बीच भाईचारा और आपसी विश्वास मजबूत हुआ। Maitree-XIV ने दिखा दिया कि भारतीय सेना और रॉयल थाई आर्मी संयुक्त रूप से किसी भी परिस्थिति में प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं।

एक्सरसाइज सियोम प्रहार

वहीं, दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश में 8 से 10 सितंबर के बीच आयोजित एक्सरसाइज सियोम प्रहार ने भारतीय सेना के भविष्य के बैटल फील्ड की झलक दिखाई। इस अभ्यास का मकसद युद्ध में ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल की रणनीतियों को परखना था। इसे रिटल टाइम वॉर जैसी परिस्थितियों में आयोजित किया गया और इसमें ड्रोन को टैक्टिकल और ऑपरेशनल दोनों स्तरों पर तैनात किया गया।

ड्रोन का इस्तेमाल निरंतर निगरानी, दुश्मन की स्थिति की जानकारी जुटाने, टारगेट हासिल करने और सटीक हमले करने के लिए किया गया। इस अभ्यास ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन सिर्फ एक सहायक उपकरण नहीं बल्कि युद्ध की दिशा बदलने वाला निर्णायक हथियार साबित हो सकते हैं।

India Military Exercises Maitree-XIV and Siyom Prahar
Exercises Siyom Prahar

इस अभ्यास का मुख्य फोकस नए टैक्टिक्स, टेक्नीक और प्रोसिजर्स यानी TTPs डेवलप करना था। इसमें ड्रोन से मिलने वाली जानकारी को पारंपरिक हथियारों और तोपखाने की मारक क्षमता के साथ जोड़ने के तरीकों को परखा गया। इससे जॉइंट टारगेटिंग की प्रक्रिया और तेज निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत किया गया।

सियोम प्रहार ने यह भी साबित किया कि युद्ध के मैदान में परंपरागत हथियारों और नई तकनीकों के बीच तालमेल जरूरी है। भारतीय सेना ने ड्रोन तकनीक और पारंपरिक युद्धक कौशल को एक साथ मिलाकर यह दिखाया कि भविष्य की लड़ाई में कैसे तकनीक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

इस अभ्यास में ड्रोन की लॉक-ऑन क्षमता, गाइडेंस सटीकता, उड़ान स्थिरता और आर्मर पेनेट्रेशन जैसी खूबियों को अलग-अलग परिस्थितियों में परखा गया। रेगिस्तानी धूल, उच्च तापमान और दुर्गम इलाकों जैसी चुनौतियों में भी इनके प्रदर्शन को जांचा गया।

भारतीय सेना ने इस अभ्यास के जरिए यह भी संदेश दिया कि वह लगातार इनोवेशन कर रही है और आने वाले समय की चुनौतियों के लिए तैयार है। अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स यानी ड्रोन को पारंपरिक युद्धक रणनीतियों के साथ मिलाकर सेना ने दिखाया कि भविष्य के युद्ध में तकनीक ही सफलता की कुंजी होगी।

Zorawar Tank ATGM Test: भारत का जोरावर टैंक पहली बार फायर करेगा स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल, रेगिस्तान में होगा बड़ा टेस्ट

Zorawar Tank ATGM Test drdo-lt

Zorawar Tank ATGM Test: भारत अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और लार्सन एंड टुब्रो राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में जोरावर लाइट टैंक से स्वदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) का ट्रायल करने की तैयारी कर रहे हैं। यह ट्रायल्स न सिर्फ मिसाइल की मारक क्षमता को परखने के लिए होगा, बल्कि इससे यह भी पता लगेगा कि जोरावर टैंक की हथियार प्रणाली और मिसाइल इंटीग्रेशन सही से काम कर रही है या नहीं।

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इस ट्रायल को बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रायल्स जोरावर लाइट टैंक की रीयल वॉर कंडीशंस में क्षमता को साबित करेगा और भारतीय सेना की जरूरतों के मुताबिक इसे और प्रभावी बनाएगा। इस ट्रायल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें मिसाइल को जोरावर टैंक के फायर-कंट्रोल सिस्टम के साथ इंटीग्रेट किया जाएगा।

जोरावर लाइट टैंक को खासतौर पर उन इलाकों के लिए तैयार किया गया है जहां भारी टैंक तैनात करना मुश्किल है। पूर्वी लद्दाख जैसे ऊंचाई और नदी-नालों वाले इलाकों में इस्तेमाल के लिए हल्के लेकिन ताकतवर टैंक की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। डीआरडीओ की इकाई कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (CVRDE) और एलएंडटी का बनाया यह टैंक “मेक-वन” कैटेगरी के तहत बनाया गया है और इसका वजन लगभग 25 टन है।

इस टैंक में 105 मिमी की कॉकरिल गन लगी है, जिसमें अत्याधुनिक फायर-कंट्रोल और स्टेबिलाइजेशन सिस्टम मौजूद हैं। अब इसमें स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल ATGM को शामिल करने से इसकी युद्ध क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। यह मिसाइल दुश्मन के भारी बख्तरबंद वाहनों और टैंकों को भी मार गिराएगी।

इस परीक्षण में मिसाइल के सीकर लॉक-ऑन समय, गाइडेंस एक्यूरेसी, उड़ान स्थिरता और कवच भेदने की क्षमता का परीक्षण किया जाएगा। रेगिस्तानी धूल और ऊंचे तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में ATGM के प्रदर्शन को परखना भी इस ट्रायल का अहम हिस्सा होगा। इसके अलावा, यह भी देखा जाएगा कि टैंक का फायर-कंट्रोल सिस्टम मिसाइल के साथ कितनी सहजता से काम करता है।

जोरावर लाइट टैंक को पूर्वी लद्दाख के इलाकों में तैनाती के लिए डिजाइन किया गया है। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव की स्थिति में हल्के लेकिन ताकतवर टैंकों की जरूरत लगातार बनी रहती है। भारी टैंक को इन इलाकों में ऑपरेट करने में दिक्कत आती है। जबकि जोरावर जैसे लाइट टैंक ऊंचाई और मुश्किल इलाकों में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।

GE-404 Engine: तेजस एमके-1ए फाइटर जेट के लिए एचएएल को मिला तीसरा GE-404 इंजन, चौथा इस महीने पहुंचेगा भारत

HAL receives 3rd GE-404 engine for Tejas Mk-1A
Photo by HAL

GE-404 Engine: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक से तीसरे GE-404 इंजन की सप्लाई हो गई है। यह इंजन एलसीए (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) तेजस मार्क-1A कार्यक्रम का अहम हिस्सा है। वहीं, चौथा इंजन इसी महीने भारत पहुंचने की उम्मीद है।

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यह डिलीवरी ऐसे समय में हुई है जब भारतीय वायुसेना को तेजस विमानों की जरूरत सबसे ज्यादा है। वायुसेना पहले ही 83 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दे चुकी है और सरकार ने हाल ही में 97 और विमानों की खरीद को मंजूरी दी है। कुल मिलाकर अब 180 स्वदेशी लड़ाकू विमानों का रास्ता साफ हो चुका है। इन विमानों को समय पर तैयार करने के लिए इंजन की सप्लाई बेहद अहम मानी जा रही है।

एचएएल को इस वित्त वर्ष के आखिर तक 12 जीई-404 (GE-404 Engine) इंजन मिलने हैं। इन इंजनों का इस्तेमाल भारतीय वायुसेना के तेजस बेड़े में होगा। अभी तक तीन इंजन एचएएल को मिल चुके हैं और चौथा इंजन जल्द ही डिलीवर होगा। इसके बाद आने वाले महीनों में इंजन सप्लाई और तेज होने की उम्मीद है।

तेजस एमके-1ए की डिलीवरी में पहले ही बहुत देरी हो चुकी है। इस देरी की मुख्य वजह सप्लाई चेन की दिक्कतें और इंजन की उपलब्धता रही। मार्च 2025 में जीई ने पहला इंजन एचएएल को सौंपा था। इसके बाद से धीरे-धीरे इंजन भारत पहुंच रहे हैं। लेकिन उत्पादन लक्ष्य को पूरा करने के लिए समय पर सप्लाई अनिवार्य है।

सूत्रों के मुताबिक एचएएल की योजना 2026-27 तक हर साल 30 तेजस विमान बनाने की है। अभी उत्पादन दर इससे काफी कम है। इंजन सप्लाई सुचारू होने के बाद ही इस लक्ष्य तक पहुंचना संभव होगा।

तेजस एमके-1ए को लेकर भारतीय वायुसेना में काफी उम्मीदें हैं। यह विमान लेटेस्ट एवियोनिक्स, मल्टी-रोल कैपेबिलिटी और स्वदेशी हथियार प्रणालियों से लैस है। इसमें डीआरडीओ की बनाई अस्त्रा मिसाइल, रुद्रम मिसाइल और अन्य स्वदेशी हथियारों को इंटीग्रेट किया जा रहा है। इससे वायुसेना की “बियॉन्ड विजुअल रेंज” क्षमता और दुश्मन के एयर डिफेंस पर हावी होने की क्षमता और बढ़ जाएगी।

सितंबर के आखिर में वायुसेना से मिग-21 की अंतिम दो स्क्वाड्रन रिटायर हो जाएंगी। ऐसे में तेजस एमके-1ए को जल्दी से जल्दी इंडक्शन करना बेहद जरूरी है। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह पहले ही कह चुके हैं कि फोर्स को हर साल 35 से 40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। अभी वायुसेना के पास केवल 31 स्क्वाड्रन हैं और मिग-21 की विदाई के बाद यह संख्या 29 रह जाएगी। जबकि “सैंक्शनड स्ट्रेंथ” 42 स्क्वाड्रन मानी जाती है।

तेजस एमके-1ए की देरी से वायुसेना की “नंबर गैप” समस्या और गंभीर हो रही है। हालांकि, अक्टूबर तक वायुसेना को दो तेजस एमके-1ए विमानों की डिलीवरी होने की संभावना है। एचएएल का कहना है कि इसी महीने इन विमानों के फायरिंग ट्रायल पूरे कर लिए जाएंगे, जिनमें अस्त्रा, ASRAAM और लेजर गाइडेड बम शामिल होंगे। सफल परीक्षणों के बाद विमान वायुसेना को सौंप दिए जाएंगे।

इसी बीच एचएएल और जीई के बीच 113 अतिरिक्त इंजनों की खरीद का एक और सौदा लगभग तैयार है। यह सौदा हाल ही में मंजूर किए गए 97 नए तेजस विमानों के लिए होगा। करीब 1 बिलियन डॉलर की यह डील भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगी।

तेजस एमके-1ए के अलावा एचएएल और जीई के बीच जीई-414 इंजन के संयुक्त उत्पादन पर भी बातचीत चल रही है। यह इंजन तेजस एमके-2 कार्यक्रम में इस्तेमाल होगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत को 80 फीसदी तक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में इस प्रोजेक्ट को “मेक इन इंडिया डिफेंस सेक्टर” की दिशा में बड़ा कदम बताया था।

तेजस एमके-1ए को वायुसेना में शामिल करने का सबसे बड़ा मकसद पुराने मिग-21 विमानों को रिप्लेस करना है। 1960 के दशक से सेवा में रहे मिग-21 अब रिटायरमेंट की कगार पर हैं। उनकी जगह तेजस एमके-1ए को मिलनी है। इंजन सप्लाई और उत्पादन क्षमता बढ़ने से यह प्रक्रिया तेज होगी।

Safran-DRDO Jet Engine India: डीआरडीओ और फ्रांस की सफरान मिल कर बनाएंगे AMCA का इंजन, लेकिन क्या वाकई होगा 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर?

Safran-DRDO Jet Engine India Deal for AMCA, 100% Technology Transfer

Safran-DRDO Jet Engine India: भारत ने अपने पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का जेट इंजन बनाने के लिए फ्रांस की कंपनी के साथ समझौता किया है। यह समझौता भारत के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन और फ्रांस की सफरान के बीच हुआ है। इस समझौते के तहत भारत को पहली बार पूर्ण रूप से जेट इंजन की टेक्नोलॉजी मिलेगी। यह भारत का पहला 100 फीसदी स्वदेशी जेट इंजन होगा जिसे यहीं बनाया जाएगा। वहीं, यह साझेदारी भारत को उस कैटेगरी में ला सकती है, जहां आज तक केवल कुछ ही देश हैं, जिनके पास अपने लड़ाकू विमानों के लिए पूर्ण इंजन बनाने की क्षमता है।

AMCA jet engine: भारत-फ्रांस मिलकर बनाएंगे पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी इंजन, राजनाथ सिंह किया बड़ा एलान, राफेल बनाने वाली कंपनी सफरान के साथ होगी साझेदारी

खास बात यह होगी कि पहली बार देश को जेट इंजन बनाने की पूरी तकनीक यानी 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिलने की संभावना है। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी सफरान (Safran) और भारत की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन की विंग गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE) मिलकर एक नया हाई-थ्रस्ट जेट इंजन डेवलप करेंगे, जो भविष्य के भारतीय लड़ाकू विमान एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) को पावर देगा।

Safran-DRDO Jet Engine India: 100% ToT की पेशकश

इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि फ्रांस ने भारत को 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण क्रिस्टल ब्लेड टेक्नोलॉजी (Crystal Blade Technology) भी शामिल है। यह टेक्नोलॉजी जेट इंजन का सबसे संवेदनशील और अत्याधुनिक हिस्सा है। सामान्यत: कोई भी देश इसे साझा नहीं करता।

क्रिस्टल ब्लेड्स खास धातुओं सुपर-अलॉय से बनाए जाते हैं और उन्हें इस तरह से ढाला जाता है कि वे बेहद उच्च तापमान और दबाव में भी बिना टूटे लंबे समय तक काम कर सकें। यह तकनीक इंजन की विश्वसनीयता, कार्यक्षमता और लाइफ साइकिल को बढ़ाती है। अब तक यह तकनीक केवल कुछ ही देशों के पास थी। डीआरडीओ के पास भी इस दिशा में रिसर्च मौजूद है, लेकिन हाई-थ्रस्ट फाइटर इंजन के स्तर पर इसे आकार देना एक बहुत बड़ी चुनौती रही है।

Safran-DRDO Jet Engine India: AMCA के लिए गेम चेंजर इंजन

इस नए इंजन का इस्तेमाल भारतीय वायुसेना के AMCA प्रोग्राम में होगा, जो एक डबल-इंजन स्टील्थ मल्टी-रोल फाइटर विमान होगा। यह नया इंजन 120 किलो न्यूटन (KN) की क्षमता वाला होगा और भविष्य में इसे 140 KN तक अपग्रेड किया जा सकेगा। इससे भारत का AMCA, जो 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ मल्टी-रोल फाइटर जेट है, पूरी तरह स्वदेशी इंजन पर उड़ सकेगा।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि यह परियोजना लगभग 12 साल में पूरी होगी, जिसमें 9 प्रोटोटाइप इंजन तैयार किए जाएंगे। इसके बाद इन्हें टेस्टिंग और प्रोडक्शन की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा। इंजन को भारत में ही भारतीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के तहत डेवलप किया जाएगा और सफरान अपनी पूरी तकनीक भारत को सौंपेगा। इस विमान के निर्माण में निजी क्षेत्र भी शामिल होगा, जिसमें टाटा ग्रुप, एल एंड टी और अडानी डिफेंस जैसी कंपनियां भी शामिल होंगी।

Safran-DRDO Jet Engine India: पीएम मोदी ने किया था एलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में लाल किले के प्राचीर से जेट इंजन के स्वदेशी विकास पर जोर दिया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी संकेत दिए थे कि भारत जल्द ही लड़ाकू विमानों के इंजन विकसित करने का कार्य शुरू करेगा। इस समझौते को अमलीजामा पहनाने में पिछले दो साल से काम चल रहा था, लेकिन अब मोदी सरकार ने डीआरडीओ को प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है जिसे शीर्ष स्तर पर हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।

Safran-DRDO Jet Engine India: फेल हुआ कावेरी

हालांकि भारत पहले भी जेट इंजन बनाने की कोशिश कर चुका है। डीआरडीओ के कावेरी इंजन (Kaveri Engine Project) पर सालों तक काम हुआ लेकिन यह परियोजना कभी सफल नहीं हो पाई। इसका मुख्य कारण था उच्च तापमान सहन करने की तकनीक की कमी। अब फ्रांस की मदद से भारत को यह तकनीक मिलेगी और वह अपनी विफलताओं को पीछे छोड़कर भविष्य की दिशा में बड़ा कदम रख सकेगा।

Safran-DRDO Jet Engine India: कौन-कौन से देश बना पाए अपने इंजन

यह कदम भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज दुनिया में सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ही ऐसे देश हैं जिनके पास अपने लड़ाकू विमानों के लिए इंजन बनाने की क्षमता है। चीन अभी भी रूस के इंजन या उनकी नकल (रिवर्स इंजीनियरिंग) पर निर्भर है।

वर्तमान में भारत अपने लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी कंपनी जीई से इंजन आयात कर रहा है। तेजस लड़ाकू विमानों के लिए 212 F-404 इंजन मंगाए गए हैं और जल्द ही 113 और इंजनों के लिए समझौता होने वाला है। इसके अलावा भारत GE F-414 इंजन भी ले रहा है, लेकिन इसमें तकनीक ट्रांसफर केवल 80 फीसदी तक सीमित है।

Safran-DRDO Jet Engine India: फ्रांस भरोसेमंद साझेदार

सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी प्रस्तावों अक्सर कई शर्तें होती हैं। जो कई बार स्ट्रैटेजिक तौर पर नुकसानदेह होती हैं और भारत की संप्रभुता के साथ समझौता नहीं किया दा सकता। इसके उलट, फ्रांस भारत का भरोसेमंद साझेदार रहा है। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भी फ्रांस ने भारत पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था और भारतीय मिसाइलों के लिए अत्याधुनिक INGPS सिस्टम और मिराज 2000 विमानों के लिए आवश्यक पार्ट्स की सप्लाई जारी रखी थी। यही कारण है कि भारत इस बार फ्रांस पर भरोसा कर रहा है।

Safran-DRDO Jet Engine India: भारतीय वायुसेना के पास 36 राफेल विमान

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास 36 राफेल विमान हैं, जिन्हें 73 KN M-88 स्नेमा इंजन पावर देता है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि भारत दसॉ एविएशन से 114 और मल्टी-रोल फाइटर भारत में बनाने पर विचार कर रहा है। वहीं,
सफरान और डीआरडीओ के 120-140 KN का इंजन आने वाले दशकों में भारतीय वायुसेना के सबसे अहम प्लेटफॉर्म को पावर देगा। इसके जरिए वायुसेना न सिर्फ AMCA बल्कि नौसेना के ट्विन-इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) को भी मजबूती दे सकेगी।

रूस ने भी नहीं दी थी पूरी टेक्नोलॉजी

कई देशों ने भारत को जेट इंजन तकनीक साझा करने या लाइसेंस प्राप्त उत्पादन की अनुमति तो दी, लेकिन कभी भी 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश नहीं की। रूस ने सुखोई Su-30 MKI के लिए AL-31FP इंजन की टेक्नोलॉजी का आंशिक तौर पर ट्रांसफर की थी। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को कोरापुट, ओडिशा में इन इंजनों के उत्पादन का लाइसेंस मिला था। हालांकि, यह केवल असेंबली और कुछ हिस्सों तक सीमित रहा, जबकि डिजाइन, मैटेरियल साइंस और सिंगल-क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड जैसी कोर टेकनोलॉजी रूस ने अपने पास रखी थी।

इससे पहले फ्रांस की सफरान ने मिराज 2000 के लिए Snecma M53 इंजन की कुछ तकनीकी जानकारी और मेंटेनेंस सपोर्ट दिया था। हालांकि, यह भी पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं था, बल्कि ऑपरेशनल और मेंटेनेंस स्तर तक सीमित था।

वहीं, ब्रिटेन ने भी 1960 और 70 के दशक में रोल्स-रॉयस इंजनों की टेक्नोलॉजी भारत के साथ साझा की थी। उस समय HS-748 और जगुआर विमानों के लिए Adour इंजन का लाइसेंस प्राप्त निर्माण हुआ। लेकिन यहां भी टेक्नोलॉजी केवल प्रोडक्शन और मेंटेनेंस तक सीमित रही, जबकि इंजन डिजाइन और कोर टेक्नोलॉजी पूरी तरह से भारत को नहीं मिली थी।

अमेरिका ने भारत को लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एलसीए तेजस के लिए GE F404 इंजन दिया। बाद में F414 इंजन के लिए करीब 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की गई, जो एलसीए Mk2 और AMCA के लिए प्रस्तावित हैं। लेकिन इसमें भी थर्मल कोटिंग और ब्लेड मशीनिंग जैसी कुछ अहम तकनीकें साझा नहीं की गईं हैं।

बाकी देशों को भी नहीं मिली टेक्नोलॉजी

जेट इंजन की पूरी टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर डिफेंस सेक्टर का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। दुनिया में अब तक ऐसे बहुत ही कम उदाहरण सामने आए हैं जहां किसी देश ने किसी अन्य देश को जेट इंजन की पूरी टेक्नोलॉजी डिजाइन, मैटेरियल साइंस, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रायल्स समेत पूरी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की हो। यही वजह है कि भारत को हाल ही में फ्रांस से मिली 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश को दुनियाभर में एक अपवाद के तौर पर देखा जा रहा है।

इतिहास पर नजर डालें तो चीन और रूस का उदाहरण सबसे प्रमुख हैं। रूस ने चीन को सुखोई Su-27 और Su-30 विमानों के लिए AL-31F इंजन की सप्लाई की थी और साथ ही लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन की अनुमति भी दी थी। चीन की शेनयांग कंपनी ने इन इंजनों का स्थानीय निर्माण शुरू किया और बाद में इन्हीं के आधार पर WS-10 ताइहांग इंजन डेवलप किया। हालांकि, रूस ने चीन को इंजन के कोर डिजाइन और सिंगल-क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड जैसी महत्वपूर्ण तकनीक नहीं दी। चीन ने रिवर्स इंजीनियरिंग और अपनी रिसर्च के जरिए यह क्षमता हासिल की, लेकिन रूस ने उस पर टेक्नोलॉजी की नकल करने का आरोप भी लगाया था।

दूसरा उदाहरण अमेरिका और जापान का है। अमेरिका ने जापान को F-15J और F-2 लड़ाकू विमानों के लिए प्रैट एंड व्हिटनी F100 और GE F110 इंजनों का लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन करने की इजाजत दी थी। जापान की कंपनी IHI ने इन इंजनों का निर्माण किया। हालांकि, यहां भी मामला आंशिक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तक सीमित रहा। इंजन असेंबली और कुछ सिस्टम के निर्माण की अनुमति तो मिली, लेकिन कोर डिजाइन और एडवांस मेटल अलॉयज और कोटिंग्स की टेक्नोलॉजी साझा नहीं की गई। जापान ने बाद में XF9-1 नामक स्वदेशी इंजन बनाने की कोशिश भी की थी।

दक्षिण कोरिया का अनुभव भी अलग नहीं रहा। अमेरिका ने वहां T-50 गोल्डन ईगल ट्रेनर विमान के लिए GE F404 इंजन की लाइसेंस प्राप्त निर्माण तकनीक दी। सैमसंग टेकविन (जो अब हनवा एयरोस्पेस है) ने इन इंजनों का निर्माण किया। लेकिन कोर डिजाइन और एडवांस टेक्नोलॉजी वहां भी साझा नहीं की गई। नतीजा यह रहा कि दक्षिण कोरिया अभी भी एडवांस जेट इंजनों के लिए अमेरिका पर निर्भर है।

फ्रांस ने भी अपने राफेल विमानों में इस्तेमाल होने वाले Snecma M88 इंजन की पूरी तकनीक किसी भी देश के साथ साझा नहीं की। यूएई और कतर जैसे सहयोगी देशों के साथ केवल ऑपरेशनल सपोर्ट और मेंटेनेंस स्तर का सहयोग किया गया, लेकिन पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं की।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक किसी भी देश ने जेट इंजन की सौ फीसदी तकनीक किसी अन्य देश को नहीं दी। कारण साफ है कि यह तकनीक न सिर्फ सैन्य बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। इसे साझा करने से किसी देश का तकनीकी वर्चस्व और प्रतिस्पर्धी लाभ कमजोर हो सकता है। यही वजह है कि ज़्यादातर मामलों में केवल आंशिक ट्रांसफर, लाइसेंस प्राप्त उत्पादन या मेंटेनेंस स्तर की जानकारी ही साझा की जाती है।

चीन जैसे देशों ने रिवर्स इंजीनियरिंग और स्वदेशी अनुसंधान के जरिए अपनी क्षमता बढ़ाई, लेकिन यह भी पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का उदाहरण नहीं माना जा सकता। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अब भी अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। फ्रांस और रूस ने भी कोर डिजाइन और मटेरियल साइंस की जानकारी साझा करने से हमेशा परहेज किया है।

भारत के लिए फ्रांस की सफरान कंपनी का AMCA प्रोजेक्ट के तहत 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रस्ताव इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह दुनिया के उन चुनिंदा मामलों में शामिल होगा जहां एक देश को इंजन डिजाइन, मैटेरियल साइंस, निर्माण और परीक्षण तक की पूरी जानकारी मिलेगी।

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Indian Army Drone Warrior
Indian Army Drone Warrior

Tethered Surveillance Drones: पाकिस्तान के खिलाफ हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सेना की रणनीतिक सोच को नई दिशा दी है। इस ऑपरेशन में दोनों देशों की सेनाओं ने बड़ी संख्या में UAV ड्रोनों का इस्तेमाल किया। अब भारतीय सेना ने फैसला किया है कि वह करीब 5000 टेदर्ड ड्रोन सिस्टम खरीदेगी। इन ड्रोन का इस्तेमाल मैदानों, रेगिस्तानों और ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में निगरानी के लिए किया जाएगा।

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सेना ने हाल ही में इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इनफॉरमेशन (RFI) जारी की है। इसमें साफ कहा गया है कि 5000 ड्रोन सिस्टम्स की सप्लाई 24 महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए। सेना की आवश्यकताओं के मुताबिक, ये ड्रोन सिस्टम दिन-रात के अलावा सभी तरह के मौसम में काम करने में सक्षम होने चाहिए। इन्हें 75 प्रतिशत तक की नमी, 35 किमी/घंटा की हवा की रफ्तार और 500 मीटर तक की दृश्यता वाले माहौल के साथ ही हल्की बारिश और बर्फबारी में भी ऑपरेशनल रहना होगा।

क्या हैं Tethered Surveillance Drones?

टेदर्ड ड्रोन यानी बंधा हुआ ड्रोन सिस्टम एक ऐसा निगरानी उपकरण है, जिसमें ड्रोन को जमीन पर स्थित एक टेदर स्टेशन (Ground-based Tether Station) से जोड़ा जाता है। इससे ड्रोन लंबे समय तक हवा में रहकर टारगेट पर नजर रख सकता है। जरूरत पड़ने पर ये ड्रोन अनटेदर्ड मोड (बिना रस्सी/केबल) में भी उड़ सकता है। इस स्थिति में यह और ऊंचाई तक जाकर इलाके की निगरानी करता है और इंटेलिजेंस इनपुट को कन्फर्म करता है।

भारतीय सेना ने साफ किया है कि ये ड्रोन मेक-इन-इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत बनाए जाएंगे। सेना का कहना है कि इनसे महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास निरंतर निगरानी और जानकारी इकट्ठा करने की क्षमता बढ़ेगी। खासकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ये सेना की आंख और कान बनेंगे।

Tethered Surveillance Drones: क्या हों खूबियां

सेना की तरफ से जारी RFI के अनुसार इन ड्रोन का डिजाइन मॉड्यूलर होना चाहिए। इसका मतलब है कि भविष्य में नई टेक्नोलॉजी आने पर इन ड्रोन को बिना इसके स्ट्रक्चर में बदलाव किए अपग्रेड किया जा सकेगा। यह सेना के लिए बेहद फायदेमंद होगा क्योंकि समय के साथ बदलती जरूरतों और आधुनिक टेक्नोलॉजी के हिसाब से इन्हें लगातार अपग्रेड किया जा सकेगा।

इन ड्रोन की उड़ान क्षमता भी खास है। टेदर्ड मोड में ये कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई तक हवा में स्थिर रहकर निगरानी कर सकेंगे। वहीं, अनटेदर्ड मोड में यह 1000 मीटर यानी लगभग 1 किलोमीटर या उससे भी ज्यादा ऊंचाई तक उड़ान भर पाएंगे। इससे सेना को जमीन से दूर तक की तस्वीर साफ मिल सकेगी।

समय की क्षमता की बात करें तो टेदर्ड मोड में ये ड्रोन लगातार 9 घंटे तक आसमान में बने रह सकते हैं। वहीं, अनटेदर्ड मोड में भी ये कम से कम 60 मिनट तक निगरानी करने में सक्षम होंगे। इतनी देर तक हवा में बने रहने से सेना को दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने में मदद मिलेगी।

इन ड्रोन की एक और अहम बात यह है कि इन्हें ऑपरेट करने के लिए किसी बड़े स्टाफ की जरूरत नहीं होगी। सिर्फ एक ऑपरेटर इन्हें कंट्रोल कर सकता है। साथ ही, इनका मिशन रेंज भी जबरदस्त है। अनटेदर्ड मोड में ये ड्रोन 10 किलोमीटर तक एक तरफ जाकर निगरानी कर सकते हैं, जो सेना के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।

ये ड्रोन -10 डिग्री से लेकर 45–50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होंगे। ऊंचाई वाले इलाकों में, जहां मौसम बेहद कठिन होता है, वहां भी इनका इस्तेमाल संभव होगा।

Tethered Surveillance Drones: इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से सुरक्षा

सेना ने खास तौर पर यह भी कहा है कि ड्रोन में काउंटर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर कैपेबिलिटी होनी चाहिए। यानी दुश्मन अगर ड्रोन को हैक करने या उसकी लोकेशन ब्लॉक करने की कोशिश करे, तो ये सिस्टम उसे नाकाम कर सके। इसके साथ ही ये जीपीएस, सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम और डिजिटल मैप्स के साथ कॉम्पैटिबल होने चाहिए।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने यह महसूस किया कि दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखने के लिए ज्यादा एडवांस और लंबे समय तक चलने वाले ड्रोन जरूरी हैं। पाकिस्तान ने भी उस समय अपने यूएवी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। इसके बाद सेना ने तय किया कि भविष्य की लड़ाइयों में लगातार निगरानी को प्राथमिकता दी जाएगी।

Tethered Surveillance Drones: कब तक मिलेंगे ड्रोन?

RFI के अनुसार, जो भी कंपनियां इन ड्रोन को बनाकर सेना को सप्लाई करना चाहती हैं, उन्हें 2 नवंबर 2025 तक अपने प्रस्ताव जमा करने होंगे। सेना चाहती है कि अगले दो सालों के भीतर ये सभी 5000 सिस्टम्स उसकी यूनिट्स तक पहुंच जाएं।

Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत? बालेन शाह और सुदन गुरुंग का भारत विरोधी एजेंडा

Nepal Regime Change: Nepal GenZ Protest Balen Shah, US Role & Regime Change, Donald Lu Connection Explained
Donald Lu, Sudan Gurang and Balen Shah

Nepal Regime Change: नेपाल की राजधानी काठमांडू की सड़कों पर जमकर हिंसा हुई है। संसद भवन जलकर खाक हो गया है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को इस्तीफा देना पड़ा है। देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी अब सेना के हाथों में है। यह सब कुछ एक ऐसे आंदोलन के बाद हुआ है जिसे ‘जेन जेड’ यानी युवाओं का आंदोलन बताया जा रहा था। लेकिन अब इस आंदोलन के पीछे छिपे हाथों और अंतरराष्ट्रीय साजिश के सबूत सामने आ रहे हैं।

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Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 5 सितंबर 2025 को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था, “लगता है हमने भारत और रूस को सबसे गहरे, सबसे काले चीन के हवाले कर दिया है। काश वे साथ में लंबा और समृद्ध भविष्य रखें!” यह बयान उस समय आया जब नेपाल में जेनजेड आंदोलन तेज हो रहा था। ट्रंप के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने एक सुनियोजित संकेत के रूप में देखा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान नेपाल में हो रहे उथल-पुथल से सीधे जुड़ा हुआ है। ट्रंप ने जानबूझकर भारत, रूस और चीन के बीच बढ़ते सहयोग पर चिंता व्यक्त की थी। नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित एक रणनीतिक तौर महत्वपूर्ण देश है। एक अस्थिर नेपाल भारत और चीन दोनों के लिए सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकता है। ट्रंप के इस बयान के अगले ही दिन नेपाल में हिंसक प्रदर्शन तेज हो गए थे, जिससे सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है जिसमें वह दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं।

Nepal Regime Change: आंदोलन का मास्टरमाइंड?

वहीं, इस पूरे प्रदर्शन के पीछे दो चेहरे सबसे आगे नजर आए। पहला है काठमांडू के मेयर बालेन शाह और दूसरा है एक गैर-सरकारी संगठन ‘हामी नेपाल’ के संस्थापक सुदन गुरुंग। ये दोनों ही शख्सियतें अचानक से चर्चा में आई हैं। बालेन शाह को प्रदर्शनकारी अगला प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं तो सुदन गुरुंग को इस आंदोलन का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है।

35 वर्षीय बालेन मई 2022 से काठमांडू के 15वें मेयर है। उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के यह पद संभालने वाले पहले व्यक्ति बने। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए इस आंदोलन को समर्थन दिया। उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर युवाओं को सरकार के खिलाफ उतरने के लिए उकसाया। उनके इस पोस्ट के बाद ही नेपाल के सात से ज्यादा शहरों में युवा सड़कों पर उतर आए। शुरुआत सोशल मीडिया ऐप पर बैन के विरोध में हुई थी, लेकिन जल्द ही यह प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया।

Nepal Regime Change: अमेरिका से बालेन का कनेक्शन

बालेन शाह का अमेरिका से सीधा कनेक्शन भी सामने आया है। वह अमेरिकी राजदूत डीन आर थॉम्पसन से कई बार मिल चुके हैं। साल 2022 में हुई उनकी पहली मुलाकात की तस्वीरें खुद अमेरिकी राजदूत ने सोशल मीडिया पर साझा की थीं। साल 2023 में अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ ने बालेन शाह को दुनिया के टॉप 100 उभरते हुए नेताओं की सूची में शामिल किया था। इसके अलावा ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे प्रकाशनों में भी उन पर लेख छप चुके हैं।

Nepal Regime Change: कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा

शिक्षा से इंजीनियर बालेन ने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की है और उनका भारत से सीधा संबंध रहा है। उन्होंने कर्नाटक की विश्वेश्वरय्या टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। बालेन शाह के भारत-विरोधी रुख पर भी चर्चा हो रही है। साल 2023 में बालेंद्र शाह ने भारत की नई संसद भवन में ‘अखंड भारत’ के नक्शे के जवाब में अपने कार्यालय में अपने कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया। इस नक्शे में उन्होंने भारत के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के कुछ हिस्सों को नेपाल का अंग बताया।

साल 2023 में उन्होंने प्रभास की फिल्म ‘आदिपुरुष’ में एक संवाद का विरोध करते हुए नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारतीय बॉलीवुड फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी दी थी। उनका तर्क था कि फिल्म में यह संवाद कि ‘सीता भारत की बेटी हैं’ नेपाल की सांस्कृतिक संप्रभुता का उल्लंघन है। हालांकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें यह प्रतिबंध हटाना पड़ा था। उन्होंने नेपाली संस्थानों पर “भारतीय गुलाम” होने का आरोप लगाया। वे नेपाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं, इसलिए उन्हें आमतौर पर भारत-समर्थक नहीं माना जाता।

Nepal Regime Change: सुदन गुरुंग की फंडिंग का खुलासा

दूसरी तरफ सुदन गुरुंग हैं, जो ‘हामी नेपाल’ नाम के एनजीओ का नेतृत्व करते हैं। इसी एनजीओ ने नेपाल में युवाओं को इकट्ठा करने और प्रदर्शन करने का काम किया। सुदन गुरुंग ने इंस्टाग्राम पर ‘हाउ टू प्रोटेस्ट’ यानी ‘कैसे प्रदर्शन करें’ नाम से वीडियो शेयर किए और युवाओं को भड़काया। उनके एनजीओ को कोका-कोला, वाइबर और गोल्डस्टार जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से बीस करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं और इस फंडिंग ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या यह आंदोलन वास्तव में युवाओं का उबााल था या इसे अंतरराष्ट्रीय ताकतों द्वारा प्रायोजित किया गया था।

लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि संगठन को विवादास्पद व्यवसायियों का भी खुला समर्थन मिला। इनमें दीपक भट्टा जैसे अंतरराष्ट्रीय हथियार डीलर शामिल हैं, जिन पर इतालवी कंपनी के साथ बंदूक खरीद सौदे में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इसी तरह शंकर ग्रुप से जुड़े साहिल अग्रवाल भी इस संगठन को फंड कर रहे हैं, जिन पर COVID-19 महामारी के दौरान ब्लैक मार्केट में थर्मामीटर गन बेचने के आरोप में गिरफ्तारी तक हुई थी।

इन सबके अलावा, ‘हामी नेपाल’ को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से जुड़े फंड भी मिले हैं। सीआईए द्वारा स्थापित मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सांदुक रूत जैसे लोग इस संगठन को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि USAID और NED (नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी) जैसी अमेरिकी एजेंसियों से भी अप्रत्यक्ष फंडिंग के स्पष्ट संकेत मिले हैं। इन एजेंसियों ने “लोकतंत्र को बढ़ावा देने” और “युवा सशक्तिकरण” के नाम पर इस संगठन को भारी मात्रा में धन उपलब्ध कराया है।

Nepal Regime Change: भारत विरोधी है गुरुंग?

सुदन गुरुंग का एनजीओ पहले भी भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा है। साल 2025 की शुरुआत में जब भारत के ओडिशा में एक नेपाली छात्रा की मौत हुई थी, तब ‘हामी नेपाल’ ने नेपाल में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम किया था। उन्होंने भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन किए और भारत सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक नारेबाजी की।

Nepal Regime Change: पेट्रोल बम बनाने के तरीके बताए

नेपाल की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को जमीन पर उतारने और हिंसा भड़काने का काम डिस्कोर्ड और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर किया गया। इन ग्रुप्स में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से कहा गया कि वे ‘हत्यारा सरकार’ लिखी हुई डीपी लगाएं। नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को ‘शार्प शूटर’ बताकर शेयर किया गया। इन ग्रुप चैट में हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं।

डोनाल्ड लू का नेपाल कनेक्शन

इस पूरे घटनाक्रम में एक और नाम चर्चा में है, वह है अमेरिकी राजदूत डोनाल्ड लू का। डोनाल्ड लू अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण एशियाई मामलों के सहायक मंत्री हैं। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वह दक्षिण एशिया के देशों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सरकार बदलवाने की साजिश में शामिल हैं। पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने में भी उनकी भूमिका की बात कही जाती है।

डोनाल्ड लू ने पिछले साल दिसंबर में नेपाल का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने नेपाल सरकार के साथ एमसीसी (मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन) समझौते को आगे बढ़ाया था। यह समझौता नेपाल में लंबे समय से विवादों में रहा है। आलोचकों का मानना है कि यह समझौता नेपाल की संप्रभुता के खिलाफ है।

नेपाल में हुए इन हिंसक प्रदर्शनों ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। नेपाल भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। नेपाल में अशांति का सीधा असर भारत की सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल में शांति बहाली की अपील की है। उन्होंने कहा कि नेपाल की स्थिरता और शांति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

नेपाली सेना ने अब देश में कर्फ्यू लगा दिया है और स्थिति को नियंत्रण में लाने का प्रयास कर रही है। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल ने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। हालांकि, अभी तक स्थिति पूरी तरह से शांत नहीं हुई है। नेपाल के इतिहास में यह एक अहम मोड़ है, जहां युवाओं के आंदोलन ने एक सरकार को गिरा दिया, लेकिन इसके पीछे की अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने WhatsApp नहीं किया था इस्तेमाल, अपनाया था ये खास स्वदेशी फोन

SAMBHAV Phone Operation Sindoor

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ किए गए ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार पूरी तरह से अपनी स्वदेशी मोबाइल तकनीक SAMBHAV (Secure Army Mobile Bharat Version) का इस्तेमाल किया। यह खुलासा खुद सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने किया। उन्होंने कहा कि अब सेना इस सिस्टम को और अपग्रेड करने की तैयारी कर रही है।

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SAMBHAV Phone Operation Sindoor: WhatsApp और विदेशी ऐप्स पर लगी रोक

जनरल द्विवेदी ने ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन के 52वें नेशनल मैनेजमेंट कन्वेंशन में बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने व्हाट्सएप या अन्य विदेशी कम्युनिकेशन ऐप्स का इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय पूरी तरह से SAMBHAV फोन पर भरोसा किया गया, जो सेना के लिए सुरक्षित कमांड और कम्युनिकेशन चैनल साबित हुआ।

उन्होंने कहा, “हम स्पाइरल डेवलपमेंट ऑफ इक्विपमेंट के लिए तैयार हैं। संभव फोन ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हुआ। हम व्हाट्सएप और दूसरे ऐप्स पर निर्भर नहीं थे। अब इसे और अपग्रेड किया जा रहा है।”

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: व्होल-ऑफ-नेशन अप्रोच

जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर को केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी समन्वय का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा, “इस ऑपरेशन में सैनिकों से लेकर वैज्ञानिकों, कमांडरों से लेकर नीति निर्माताओं तक सभी का योगदान था। जरूरी कदम पहले से उठाए गए। इसे ‘व्होल-ऑफ-नेशन अप्रोच’ कहा जा सकता है।”

ऑपरेशन सिंदूर 6-7 मई की रात को तब शुरू हुआ जब 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान गई थी। भारतीय सेना ने 7 से 10 मई तक पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी कैंपों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस दौरान 9 आतंकी कैंप ध्वस्त किए गए और 13 से अधिक पाकिस्तानी एयरबेस व मिलिट्री इंस्टॉलेशन पर हमले किए गए।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: क्या है संभव फोन

संभव को जनवरी 2024 में औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया था। इसे आत्मनिर्भर भारत के तहत डेवलप किया गया था। इसका मकसद था सेना के लिए एक ऐसा मोबाइल सिस्टम देना, जो पूरी तरह से सुरक्षित, एन्क्रिप्टेड और नेटवर्क एग्नोस्टिक हो।

यह 5G तकनीक पर आधारित है और इसमें मल्टी-लेयर्ड एन्क्रिप्शन है। इससे अधिकारी चलते-फिरते भी सुरक्षित रूप से बातचीत कर सकते हैं और जरूरी दस्तावेज, फोटो व वीडियो साझा कर सकते हैं।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: व्हाट्सएप का भारतीय विकल्प: M-Sigma

संभव फोन में एक खास एप्लिकेशन है M-Sigma, जिसे व्हाट्सएप का भारतीय विकल्प कहा जा सकता है। यह सुरक्षित मैसेजिंग और डाक्यूमेंट शेयरिंग के लिए बनाया गया है। M-Sigma के जरिए अधिकारी फोटो, वीडियो, और संवेदनशील दस्तावेज बिना किसी लीक के साझा कर सकते हैं।

एक रक्षा अधिकारी ने बताया, “मोबाइल नेटवर्क अक्सर ईव्सड्रॉपिंग (जासूसी) के खतरे में रहते हैं। ऐसे में सेना को संभव जैसे सुरक्षित मोबाइल इकोसिस्टम की जरूरत थी, ताकि सैनिक और अधिकारी किसी भी स्थिति में बिना रिस्क के बातचीत कर सकें।”

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: 30,000 से ज्यादा डिवाइस सेना को मिले

संभव परियोजना की शुरुआत पिछले साल हुई थी। अब तक लगभग 30,000 डिवाइस सेना के अधिकारियों को दिए जा चुके हैं। इन्हें खासतौर पर युद्ध क्षेत्र और सीक्रेट बातचीत के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस सिस्टम को भारतीय उद्योग और शिक्षण संस्थानों की मदद से डेवलप किया गया है। इसमें इंडिजिनस पब्लिक सेल्युलर नेटवर्क का इस्तेमाल होता है।

चीन से बातचीत में भी इस्तेमाल

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, संभव फोन का इस्तेमाल सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर में ही नहीं, बल्कि चीन के साथ सैन्य वार्ता में भी किया गया। अक्टूबर 2024 की आखिरी राउंड की मीटिंग में भारतीय अधिकारियों ने इसी सुरक्षित हैंडसेट से संवाद किया।

इससे यह साफ है कि संभव अब केवल सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं, बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक बातचीत में भी अहम भूमिका निभा रहा है।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि भारतीय सेना अब तकनीक को लगातार अपग्रेड करने पर जोर दे रही है। उनका कहना था –
“आज अगर हमें 100 किलोमीटर तक मार करने वाला हथियार चाहिए, तो कल हमें 300 किलोमीटर तक का हथियार चाहिए। इसी तरह कम्युनिकेशन भी है, जैसे-जैसे दुश्मन तकनीक बढ़ाएगा, हमें भी उससे एक कदम आगे रहना होगा।”

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Army Chief on Op Sindoor: Army Chief on Control of Land in War
File Photo: Indian Army

Army Chief on Op Sindoor: भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक कार्यक्रम में कहा कि भारत के लिए किसी भी जंग का नतीजा अंततः जमीन पर कब्जे से ही तय होगा। उन्होंने कहा कि “कंट्रोल ऑफ लैंड विल बी करेंसी ऑफ विक्ट्री” यानी जमीन पर नियंत्रण ही जीत की असली मुद्रा है। उन्होंने कहा कि युद्ध का नतीजा केवल गोलाबारी से तय नहीं होता, बल्कि जमीन पर कब्जा करने से तय होता है।

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उन्होंने स्पष्ट किया कि वायुसेना और नौसेना दुश्मन की तबाही पर ध्यान देती हैं, लेकिन सेना का काम जमीन को दुश्मन से खाली कराकर कब्जा करना होता है। भारत के संदर्भ में जहां चीन, पाकिस्तान और आतंरिक विद्रोह की चुनौतियां एक साथ मौजूद हैं, वहां थलसेना की भूमिका निर्णायक है।

Army Chief on Op Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र

जनरल द्विवेदी ने अपने संबोधन में हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने दिखाया कि जंग कितनी अप्रत्याशित हो सकती है। कई लोग मान रहे थे कि यह लंबे समय तक चलेगा, लेकिन यह महज चार दिन में समाप्त हो गया। उन्होंने इसकी तुलना रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इराक युद्ध से की।

उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध को शुरुआत में दस दिन का माना गया था, लेकिन वह सालों से चल रहा है। वहीं ईरान-इराक युद्ध दस साल तक चला। इस अनुभव से सीख मिलती है कि युद्ध का समय तय नहीं किया जा सकता।

Army Chief on Op Sindoor: लो-कॉस्ट, हाई-टेक्नोलॉजी का महत्व

आर्मी चीफ ने कहा कि आज के युद्ध में लो-कॉस्ट हाई-टेक्नोलॉजी यानी कम लागत वाली आधुनिक तकनीक बड़े दुश्मन को भी मात दे सकती है। ड्रोन, स्मार्ट वेपन और डिजिटल नेटवर्किंग के कारण छोटे देश भी बड़े प्रतिद्वंद्वी को चुनौती दे पा रहे हैं।

उन्होंने “डेविड एंड गोलियथ” के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि सस्ती और असरदार तकनीक के सहारे किसी भी बड़ी ताकत को रोका जा सकता है।

Army Chief on Op Sindoor: यूनियन वॉर बुक गोपनीय गाइडलाइन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सरकार ने यूनियन वॉर बुक का इस्तेमाल औपचारिक रूप से नहीं किया, लेकिन इसके सभी पहलुओं को अपनाया गया। यह 200 पन्नों की गोपनीय गाइडलाइन है, जिसमें आपातकालीन स्थिति में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की भूमिका तय की जाती है।

द्विवेदी ने कहा कि यह ऑपरेशन “होल ऑफ नेशन अप्रोच” का उदाहरण था। इसमें सैनिकों से लेकर वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और सरकारी संस्थानों तक, सभी ने मिलकर काम किया।

Army Chief on Op Sindoor: आधुनिक युद्ध का बदलता चेहरा

आर्मी चीफ ने कहा कि आज युद्ध की कोई निश्चित सीमा नहीं रह गई है। साइबर हमले, ड्रोन और मिसाइलें कहीं भी गिर सकती हैं। ऑपरेशन सिंदूर, रूस-यूक्रेन और ईरान-इजराइल संघर्ष इसका उदाहरण हैं।

उन्होंने कहा कि अब फोर्स विजुअलाइजेशन, फोर्स प्रोटेक्शन और फोर्स अप्लीकेशन – इन तीनों पर ध्यान देना जरूरी है। यानी सेना को पहले से स्थिति का आकलन करना, दुश्मन के हमले को झेलना और फिर जवाबी कार्रवाई करनी होगी।

Army Chief on Op Sindoor: हथियारों की रेंज बढ़ाने पर जोर

जनरल द्विवेदी ने कहा कि सेना को अपने हथियारों की रेंज लगातार बढ़ानी होगी। उन्होंने बताया कि लोइटरिंग म्यूनिशंस की रेंज 100-150 किलोमीटर से बढ़ाकर 750 किलोमीटर तक करनी होगी। इसी तरह मिसाइलों और रॉकेट्स की क्षमता भी बढ़ानी होगी।

उन्होंने कहा कि दुश्मन भी लगातार तकनीक विकसित कर रहा है, इसलिए भारत को भी उससे एक कदम आगे रहना होगा। यही वजह है कि आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) पर जोर दिया जा रहा है।

उद्योग और सेना का साझेदारी मॉडल

आर्मी चीफ ने कहा कि सेना अकेले तकनीक को नहीं संभाल सकती। इसके लिए एकेडेमिया, इंडस्ट्री और मिलिट्री – तीनों का तालमेल जरूरी है। उन्होंने कहा कि 2025 से 2035 तक हर साल रक्षा खर्च लगभग 3 लाख करोड़ रुपये होगा और इसमें हर साल 10 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। यह घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त है।

भारत की 2.5 फ्रंट चुनौती

द्विवेदी ने कहा कि भारत को टू एंड हाफ फ्रंट यानी चीन, पाकिस्तान और आतंरिक विद्रोह से एक साथ निपटना होता है। ऐसे में जमीन पर नियंत्रण कायम रखना ही असली जीत है। उन्होंने हाल ही में अमेरिका और रूस के बीच अलास्का में हुई बातचीत का हवाला दिया, जहां दोनों देशों ने युद्ध रोकने के लिए यह तय किया कि किसके पास कितनी जमीन रहेगी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान की गई कार्रवाई

7 मई को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। यह कार्रवाई 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद की गई थी, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर बमबारी की। नौ आतंकी कैंपों को ध्वस्त किया गया और लगभग 100 आतंकियों को मार गिराया गया। इसके अलावा पाकिस्तान के 13 सैन्य ठिकानों और एयरबेस को भी निशाना बनाया गया था।

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Nepal crisis: काठमांडू और नेपाल के कई हिस्सों में हाल ही में भड़की हिंसा ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। सोशल मीडिया बैन के बाद फैले विरोध-प्रदर्शन में 19 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, जिसके बाद नेपाल सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। हालात अभी भी बेकाबू हैं औऱ वहां सेना ने मोर्चा संभाल लिया है। इन विरोध-प्रदर्शनों के चलते केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। कई राजनीतिक दलों के कई सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है। वहीं, भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ऐसे हालात का फायदा आतंकी संगठन और पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस उठा सकती है। सूत्रों का कहना है कि जैसे बांग्लादेश में छात्र आंदोलन हुआ वैसा ही कुछ नेपाल में देखने को मिल रहा है।

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Nepal crisis: अमेरिका, आईएसआई का हाथ? बांग्लादेश से कनेक्शन

नेपाल में भारी हिंसा हो रही है। युवा, खासकर जेन जेड, सोशल मीडिया बैन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। 3 सितंबर को सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप जैसे 26 प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा दिया, जिसे युवाओं ने अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया। प्रदर्शनकारियों ने संसद पर कब्जा करने की कोशिश की, पीएम केपी शर्मा ओली के घर पर आग लगाई। खुफिया सूत्रों का कहना है कि अमेरिका की सीआईए ने ‘रंग क्रांति’ की साजिश रची। नेपाल भारत-चीन के बीच है, अमेरिका वहां अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। हाल ही में बांग्लादेश में छात्र आंदोलन से शेख हसीना की सरकार गिरी। उसके पीछे भी अमेरिकी की डीप स्टेट का हाथ था। 2024 में बांग्लादेश में कोटा सिस्टम के खिलाफ छात्रों ने विरोध किया था। इससे हसीना सरकार गिरी। दोनों जगह युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से संगठित हुए। वहीं, इससे पहले श्रीलंका 2022 में भी ऐसा हो चुका है।

एजेंसियों का कहना है कि नेपाल अब पाकिस्तान के नए प्रॉक्सी वॉरफ्रंट में बदल सकता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान, धार्मिक और सांस्कृतिक रास्तों का इस्तेमाल कर भारत के हितों को कमजोर करने की कोशिश में है।

भारतीय एजेंसियों का मानना है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन ने भी पाकिस्तान की रणनीति को ताकत दी है। शेख हसीना के जाने और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े मोहम्मद यूनुस के सलाहकार बनने के बाद आईएसआई को खुली छूट मिल रही है। यही वजह है कि नेपाल और बांग्लादेश में इस्लामिक नेटवर्क तेजी से फैल रहे हैं।

Nepal crisis: रज्जाक मस्जिद का विवाद

मुख्य चिंता का केंद्र है सुनसरी जिले के बिराटनगर के पास इनरावा में बन रही रज्जाक मस्जिद। यह मस्जिद बांग्लादेश की एक एनजीओ, अलहाज शमसुल हक फाउंडेशन के जरिए बनाई जा रही है। जुलाई 2025 में इस मस्जिद की नींव रखी गई थी। भारतीय एजेंसियों का मानना है कि इस धार्मिक ढांचे की आड़ में आईएसआई गुप्त ठिकाने तैयार कर सकती है, जिसका इस्तेमाल जासूसी, कट्टरपंथ और आतंकी गतिविधियों के लिए किया जाएगा।

Nepal crisis: धार्मिक ढांचों का इस्तेमाल

खुफिया सूत्रों के अनुसार आईएसआई पहले भी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे इलाकों में मस्जिदों, मदरसों और सांस्कृतिक केंद्रों को अपनी गुप्त गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर चुकी है। ये जगहें देखने में धार्मिक लगती हैं, लेकिन वास्तव में वहां से जासूसी, फंडिंग और वैचारिक ब्रेनवॉशिंग जैसे काम होते हैं। अब वही रणनीति नेपाल में अपनाई जा रही है।

Nepal crisis: जनसांख्यिकीय बदलाव की कोशिश

भारत के विदेश मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि नेपाल जैसे हिंदू-बहुल देश में जानबूझकर कट्टरपंथी तत्वों को बसाने की कोशिश हो रही है। इसे “डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग” बताया जा रहा है, जिसके जरिए नेपाल की धार्मिक संरचना को बदला जा रहा है और भारत की सीमाओं को अस्थिर करने की साजिश रची जा रही है।

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India

Nepal crisis: नेपाल रूट से भारत में घुसपैठ की साजिश

भारत की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से कहती रही हैं कि नेपाल का 1,751 किलोमीटर लंबा खुला बॉर्डर आतंकियों और तस्करों के लिए आसान रास्ता है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे आतंकी संगठन नेपाल की ढिलाई का फायदा उठाकर भारत में घुसपैठ की कोशिश करते रहे हैं। हाल ही में नेपाल के राष्ट्रपति के सलाहकार सुनील बहादुर ठाकपा ने भी एक सेमिनार में इसी खतरे की तरफ इशारा किया।

भारत की सुरक्षा एजेंसियों को जानकारी मिली है कि पाकिस्तान की आईएसआई ने नेपाल के जरिए भारत में आतंकियों को भेजने की नई रणनीति बनाई है। चूंकि भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बेहद सख्त है, इसलिए आईएसआई अब नेपाल रूट पर ध्यान केंद्रित कर रही है। नेपाल और भारत के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जिसे आतंकियों, ड्रग माफिया और हथियार तस्करों ने पहले भी इस्तेमाल किया है।

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India
KP Sharma Oli Resigned

Nepal crisis: खालिस्तान और जैश ए मोहम्मद के आतंकियों की एंट्री

खुफिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हाल ही में जैश-ए-मोहम्मद आतंकियों ने नेपाल से भारत में घुसपैठ की कोशिश की। इसके अलावा आईएसआई खालिस्तान समर्थक तत्वों को भी इसी रास्ते से भेजने की तैयारी में है। पंजाब सीमा से घुसपैठ में लगातार नाकाम रहने के बाद पाकिस्तान अब नेपाल सीमा का सहारा ले रहा है।

Nepal crisis: बिहार और यूपी में लैंडिंग प्वाइंट

नेपाल रूट से आने वाले आतंकियों और तस्करों का लैंडिंग प्वाइंट अक्सर बिहार और उत्तर प्रदेश होता है। इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी यासीन भटकल जैसे लोगों ने भी इस सीमा का इस्तेमाल हथियार और गोला-बारूद लाने और भारत से बाहर भागने के लिए किया था। दरभंगा जैसे शहर इन आतंकियों के लिए ऑपरेशनल बेस बन चुके थे।

Nepal crisis: नेपाल सरकार की चेतावनी

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी एक प्रेस रिलीज जारी कर पुष्टि की है कि हाल के विरोध-प्रदर्शनों में बाहरी ताकतों का हाथ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, काठमांडू के दरबार स्क्वायर में सीआईए फंडिंग के जरिए आईएसआई, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े लोगों की गुप्त बैठक हुई थी। इसी बैठक में नेपाल में अस्थिरता फैलाने और भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजना बनी।

नेपाल सरकार ने साफ किया है कि उसकी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा और वह अपने भूभाग का इस्तेमाल विदेशी खुफिया एजेंसियों या आतंकी संगठनों को नहीं करने देगी।

पाकिस्तान-तुर्की और इस्लामिक नेटवर्क का खेल

विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल अब आईएसआई और तुर्की समर्थित इस्लामिक नेटवर्क के निशाने पर है। तुर्की से जुड़े संगठनों के जरिए नेपाल में मदरसा और मस्जिद बनाने की कोशिशें तेज हुई हैं। रिपोर्ट्स में सामने आया कि कुछ विदेशी संगठन नेपाल में अनाथ बच्चों और गरीब परिवारों के बच्चों को धार्मिक शिक्षा के नाम पर कट्टरपंथी शिक्षा दे रहे हैं। इसके लिए तुर्की और खाड़ी देशों से करोड़ों रुपए की फंडिंग हो रही है।

हाल ही में सुनसरी जिले के इनरावा में बांग्लादेश स्थित अल्हाज शमसुल हक फाउंडेशन ने मस्जिद की नींव रखी। इस मस्जिद को दावत-ए-इस्लाम का केंद्र बताया जा रहा है। यह गतिविधियां नेपाल की पारंपरिक धार्मिक सहिष्णुता के लिए खतरे की घंटी हैं।

भारत के लिए बढ़ता खतरा

नेपाल में इस्लामिक संगठनों की गतिविधियां सीधे भारत की सुरक्षा पर असर डाल सकती हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पहले से ही कई आतंकी नेटवर्क सक्रिय हैं। अगर नेपाल में आईएसआई और इस्लामिक संगठनों की जड़ें गहरी हो गईं, तो भारत में आतंकियों की घुसपैठ और आसान हो जाएगी।

2008 के कुख्यात IC-814 हाईजैक के पटकथा भी काठमांडू में ही लिखी गई थी। भारतीय खुफिया एजेंसियां पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि नेपाल में आतंकी नेटवर्क बनने की स्थिति में भारत को नई चुनौती झेलनी पड़ सकती है।

आईएसआई का नया जासूसी नेटवर्क

फरवरी 2025 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नेपाली नागरिक अंसारुल मियां अंसारी को गिरफ्तार किया। जांच में पता चला कि वह 2008 से आईएसआई के लिए जासूसी कर रहा था। उसके पास से गुप्त सेना दस्तावेज, लैपटॉप, प्रिंटर और संवेदनशील डेटा बरामद हुआ। वह पाकिस्तान के हैंडलरों से व्हाट्सएप और कॉल के जरिए निर्देश लेता था।

अंसारी नेपाल से भारत आकर यहां तैनात नेटवर्क के जरिए गोपनीय जानकारी पाकिस्तान तक भेजता था। उसके नेटवर्क में झारखंड निवासी अखलाक आजम और दिल्ली स्थित कुछ स्थानीय सहयोगी भी शामिल थे। यह नेटवर्क वेस्ट एशिया, नेपाल और भारत के बीच फैला हुआ था।

सीमा पर कड़ी चौकसी

भारत-नेपाल सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने हालात को देखते हुए चौकसी बढ़ा दी है। बारीकी से चेकिंग की जा रही है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। नेपाल पुलिस और भारतीय एजेंसियां भी समय-समय पर संयुक्त गश्त करती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही नेपाल सीमा पर सुरक्षा और कड़ी कर दी गई थी। खुफिया इनपुट्स मिलने के बाद कई बार तलाशी अभियान चलाए गए।

Ka-226T helicopter deal: रूस ने अपने कामोव हेलीकॉप्टर को लेकर भारत को ऑफर की बड़ी डील! पुतिन के भारत दौरे के दौरान लग सकती है मुहर!

Ka-226T helicopter deal India Russia
File Photo

Ka-226T helicopter deal: भारत और रूस के बीच लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े के-226टी (Kamov Ka-226) यूटिलिटी हेलिकॉप्टर सौदे को फिर से जिंदा करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि इस साल दिसंबर में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान इस पर बातचीत की जा सकती है।

सूत्रों का कहना है कि इस बार रूस ने इस प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने के लिए नई पेशकश की है। मॉस्को अब इस हेलिकॉप्टर को अपने स्वदेशी वीके-650वी (VK-650V) इंजन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पैकेज के साथ भारत को देने की तैयारी में है।

Indian Army Helicopter Fleet: पुराने हेलीकॉप्टर बेड़े को बदलेगी भारतीय सेना, शामिल करेगी 250 नए चॉपर, ये कॉप्टर हैं रेस में

Ka-226T helicopter deal: क्यों अहम है यह सौदा?

भारत के पास अभी भी बड़ी संख्या में पुराने चीता और चेतक हेलिकॉप्टर हैं, जो कई दशक से सेवा में हैं। ये हेलिकॉप्टर ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन अब इन्हें तुरंत बदलने की जरूरत महसूस की जा रही है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए 2015 में भारत और रूस के बीच इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (IGA) हुआ था। इसके तहत 200 के-226टी हेलिकॉप्टर बनाने का फैसला हुआ। इसमें से 60 हेलिकॉप्टर रूस से सीधे फ्लाई-अवे कंडीशन में आने थे, जबकि 140 हेलिकॉप्टर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की तुमकुर फैक्ट्री में बनाए जाने थे।

Ka-226T helicopter deal: क्यों अटका यह प्रोजेक्ट?

साल 2022 में यह प्रोजेक्ट अचानक ठप हो गया। इसके पीछे जो वजह बताई जाती है वह है फ्रांस के सफरान कंपनी के एरियस 2G1 इंजन की सप्लाई पर रोक। यूरोपीय यूनियन ने रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते इन इंजनों की सप्लाई बंद कर दी था।

इसके अलावा भारत और रूस के बीच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्वदेशीकरण की शर्तों पर भी सहमति नहीं बन पाई। इसी बीच एचएएल ने अपना खुद का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) डेवलप करना शुरू कर दिया।

हालांकि भारतीय सेना और वायुसेना को 400 से ज्यादा नए हेलिकॉप्टरों की जरूरत है। हाल ही में एयरबस हेलीकॉप्टर्स ने अपने H125 हेलीकॉप्टर के मेन फ्यूजलाज (ढांचा) को बनाने के लिए महिंद्रा एयरोस्ट्रक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ साझेदारी भी की है। एचएएल का LUH औऱ एयरबस के H125 हेलीकॉप्टर को इस साल एरो इंडिया में भी शोकेस किया गया था।

ये हेलीकॉप्टर हैं रेस में

सेना को भी पुराने बेड़े को बदलने के लिए लगभग 250 नए हेलीकॉप्टर्स की जरूरत है। सेना के लिए प्रस्तावित मुख्य हेलिकॉप्टरों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, रूस का कामोव-226T, और एयरबस H125 शामिल हैं। वहीं, कामोव-226T एक डबल इंजन वाला हेलीकॉप्टर है, जो अपनी सेफ्टी और मॉड्यूलर डिजाइन के लिए जाना जाता है। इसके अलावा एमडी हेलिकॉप्टर्स MD 530F ला रही है। साथ ही, मुंबई की मैक्स एयरोस्पेस Bell 407Xi मॉडल लेकर उतरी है, जिसे ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने के लिए बेहतरीन माना जाता है।

जारी किए दो बड़े RFI

रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में दो बड़े रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी किए हैं, जिनके तहत कुल 276 नए हेलिकॉप्टर खरीदे जाएंगे। इनका इस्तेमाल भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड द्वारा किया जाएगा।

पहला रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन अगस्त महीने की शुरुआत में जारी हुआ है। इसमें 200 रिकॉनिसेंस एंड सर्विलांस हेलिकॉप्टर (RSH) की जरूरत बताई गई है। इनमें से 120 हेलिकॉप्टर सेना और 80 वायुसेना को मिलेंगे। ये हेलिकॉप्टर सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी, सैनिकों की त्वरित तैनाती और दुर्गम इलाकों में छोटे लेकिन अहम ऑपरेशनों के लिए उपयोग होंगे।

दूसरा RFI 22 अगस्त को जारी किया गया, जिसमें 76 नेवल यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (NUH) शामिल हैं। इनमें से 51 हेलिकॉप्टर नौसेना और 25 कोस्ट गार्ड को मिलेंगे। इनका प्रयोग समुद्री निगरानी और तटीय सुरक्षा मजबूत करने के लिए होगा।

दोनों ही खरीद प्रक्रियाओं में मेक इन इंडिया पहल को प्राथमिकता दी गई है। इसका अर्थ है कि हेलीकॉप्टरों का उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण अधिकतम स्तर पर भारत में ही होगा। RSH के लिए कंपनियों को 18 अक्टूबर तक प्रस्ताव भेजने का समय दिया गया है और 2026 की शुरुआत में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी होगा। इसके बाद 2027 के मध्य तक कॉन्ट्रैक्ट साइन होने और 2028 से डिलीवरी शुरू होने की संभावना है।

Ka-226T helicopter deal: रूस ने बनाया नया VK-650V इंजन

इंजन की समस्या को हल करने के लिए रूस की यूनाइटेड इंजन कॉर्पोरेशन ने VK-650V टर्बोशाफ्ट इंजन डेवलप किया है। इस इंजन के ट्रायल्स भी पूरे हो चुके हैं और इसे 2025 की शुरुआत में सर्टिफिकेशन भी मिल चुका है।

VK-650V इंजन 650 से 750 हॉर्सपावर तक की ताकत देता है और इसे खासतौर पर गर्म और ऊंचाई वाले इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल (FADEC) सिस्टम लगा है, जिससे यह कम ईंधन की खपत करता है। वीके-650वी इंजन को खासतौर पर 4 टन तक वजन वाले मल्टी-पर्पज हेलिकॉप्टरों के लिए बनाया गया है। यह फ्रेंच Safran Arrius 2G1 इंजन और Pratt & Whitney PW 207K जैसे विदेशी इंजनों का विकल्प बनेगा।

रूस ने भारत को यह प्रस्ताव दिया है कि फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत भविष्य में इस इंजन की असेंबली और निर्माण भारत में भी किया जा सकता है।

Ka-226T helicopter deal: हेलीकॉप्टर की खूबियां

कामोव-226T हेलिकॉप्टर अपने खास को-एक्सियल रोटर डिजाइन की वजह से चर्चा में है। इसमें टेल रोटर नहीं होता, जिससे यह हेलिकॉप्टर ज्यादा कॉम्पैक्ट और हवा के तेज झोंकों में भी स्थिर रहता है। साथ ही, संकरी घाटियों जैसे इलाकों में भी सुरक्षित रूप से ऑपरेट कर सकता है।

इसका मॉड्यूलर डिजाइन इसे मल्टीपर्पज बनाता है। यानी इसके केबिन को तुरंत बदलकर अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल सैनिकों और सामान की ढुलाई, मेडिकल इवैक्यूएशन, टोही मिशन और आपदा राहत जैसे कार्यों में किया जा सकता है। हेलिकॉप्टर का अधिकतम टेकऑफ वेट लगभग 3.8-4 टन है और इसमें 6 लोग (2 पायलट और 4 यात्री) बैठ सकते हैं।

HAL और रूस का जॉइंट वेंचर

इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए एचएएल और रूस की कंपनियों ने मिलकर एक जॉइंट वेंचर इंडो-रशियन हेलीकॉप्टर्स लिमिटेड (IRHL) बनाया था। भारत सरकार ने इसे मेक इन इंडिया प्रोग्राम का हिस्सा मानते हुए मंजूरी दी थी।

अगर नया प्रस्ताव मंजूर होता है तो एएचएल की भूमिका और भी अहम होगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सौदा उसी तरह का मॉडल बन सकता है जैसा एएचएल पहले ही सुखोई-30MKI फाइटर जेट के इंजन AL-31FP के लिए अपनाता आ रहा है।