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Artillery in Kargil War: कौन है ‘द्रास का गुस्सैल सांड’? मेजर जनरल लखविंदर सिंह की किताब ने खोले कई राज, आर्टिलरी कैसे बनी कारगिल युद्ध में “गॉड ऑफ वॉर”

Artillary in Kargil War
Artillery’s Thunder: The Untold Kargil Story” by Maj. Gen. Lakhwinder Singh (Retd)

Artillery in Kargil War: कारगिल युद्ध की जब भी चर्चा होती है, तो कहानियां अक्सर जवानों की वीरता के इर्द-गिर्द आकर सिमट जाती हैं। लेकिन इस युद्ध में जितनी बहादुरी सैनिकों ने दिखाई तो वहीं मशीनों के योगदान को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की आर्टिलरी की गूंज ने भी दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। उस दौरान कारगिल युद्ध में 8 माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड की कमान संभालने वाले (उस समय ब्रिगेडियर) रिटायर्ड मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने अपनी नई किताब ‘आर्टिलरीज थंडर: द अनटोल्ड कारगिल स्टोरी’ के मौके पर आर्टिलरी यानी तोपखाने के किस्सों को साझा किया है।

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Artillery’s Thunder: The Untold Kargil Story में उन्होंने बताया है कि किस तरह तोपों की गरज ने युद्ध का पासा पलट दिया था। कैसे भारी संख्या में दागे गए गोलों ने दुश्मन के बंकरों को चकनाचूर करते हुए इन्फैंट्री के आगे बढ़ने का रास्ता साफ किया था। 

Artillery in Kargil War: ‘एनरेज्ड बुल ऑफ द्रास’

रिटायर्ड मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने कारगिल युद्ध के दौरान 8 माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड की कमान संभाली थी। कारगिल में अपनी वीरता और नेतृत्व क्षमता और अपनी आक्रामक रणनीति के चलते उन्हें Enraged bull of Drass यानी ‘द्रास का गुस्सैल सांड’ जैसा उपनाम भी मिला था। उन्होंने बोफोर्स एफएच-77बी हॉवित्जर तोपों का इस्तेमाल करके तोलोलिंग और टाइगर हिल जैसी चोटियों को वापस जीतने में अहम भूमिका निभाई थी। इस योगदान के लिए उन्हें युद्ध सेवा मेडल से भी सम्मानित किया गया था।

Major general Lakhwinder Singh
Major general Lakhwinder Singh

उन्होंने युद्ध के दौरान 100 से अधिक बोफोर्स हॉवित्जर गनों को एक साथ इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई। उनका कहना था, “सौ तोपों से एक साथ 3,000 किलो स्टील और विस्फोटक गिराना ऐसा था जैसे दुश्मन पर बिजली गिर गई हो। मात्र आधे घंटे में एक लाख किलो विस्फोटक दागकर हमने दुश्मन की पोजिशनें तबाह कर दीं।”

Artillery in Kargil War: तोपों से बदले युद्ध के हालात

मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने बताया कि युद्ध की शुरुआत में 8 माउंटेन डिवीजन के पास केवल 6-7 फायर यूनिट या छह आर्टिलरी की बैटरियां उपलब्ध थीं। तोलोलिंग पर कब्जे की शुरुआती कोशिशों में इन्फैंट्री को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ा। कई प्रयास असफल रहे क्योंकि दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था और भारतीय सैनिक नीचे से चढ़ाई कर रहे थे। लेकिन जब एक साथ 155 एमएम वाली 108 तोपों ने गोलाबारी शुरू की तो हालात बदल गए। मेजर जनरल सिंह ने कहा, “युद्ध का रुख तभी बदला जब हमारी तोपों ने दुश्मन की पोजिशन पर सीधी मार की।” उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की रणनीति का भी उल्लेख किया, जिसमें आर्टिलरी को कभी-कभी रायफल की तरह सीधे निशानेबाजी के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

पाकिस्तानी बोले- बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है

मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने बताया, “असल में, इन्फैंट्री और आर्टिलरी के सामने पाकिस्तानियों के पास कोई जवाब नहीं था। दोनों ने गजब का काम किया। आर्टिलरी का असर इतना जबरदस्त था कि पहाड़ों पर पाकिस्तानी चिल्लाते थे– हमें बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है। वो इतने डरे हुए थे कि अपनी पोजिशन छोड़ना ही बेहतर समझते थे।” उन्होंने बताया कि सबसे पहले ये तोलोलिंग में ऐसा हुआ था। जब हमने वहां फायरिंग की तो हमें इंटरसेप्ट में यही आवाजें सुनाई दीं। और फिर हर ऊंचाई पर जहां भी हम गए, वही हालात थे, हर जगह पाकिस्तानी यही चिल्ला रहे थे।“

Artillery in Kargil War: सैनिक तोपों को करते थे सलाम

युद्ध के दौरान तकरीबन 2.9 लाख तोपों के गोले दागे गए। इन गोलाबारियों ने न सिर्फ भारतीय सैनिकों के हौसले को बढ़ाया बल्कि पाकिस्तानी सैनिकों को भी हतोत्साहित कर दिया। कई बार ऐसा हुआ कि जब पैदल सेना मोर्चे से लौटती थी, तो वे तोपों को सलामी देते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इन तोपों ने उनकी जान बचाई।

Artillery in Kargil War: पत्नी ने दी किताब लिखने की प्रेरणा

मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने कहा, कारगिल वॉर पर बहुत किताबें आई हैं, लेकिन कई पहलू अभी तक सामने नहीं आए थे। मैंने सोचा जितना हो सके खुलकर और ईमानदारी से वो सच लिखूं जो जरूरी था। इसी वजह से इसका नाम रखा The Untold Story।” उन्होंने कहा, “असल में मेरी पत्नी ने बार-बार कहा कि मुझे लिखना चाहिए। मैं हिचकिचा रहा था, लेकिन मेरे दिमाग में बहुत सारी बातें थीं, जो लोगों तक पहुंचनी चाहिए थीं। फिर मैंने कलम उठाई और लिखना शुरू किया। मुझे लगता है, यह किताब लोगों के लिए दिलचस्प होगी।”

Artillery in Kargil War: पॉइंट 5140 को मिला था “गन हिल” नाम

मेजर जनरल सिंह ने कहा कि आर्टिलरी को महज सपोर्टिंग आर्म नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, कारगिल में यह साफ हो गया कि आर्टिलरी युद्ध का निर्णायक हथियार है और इसे स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। शायद इसीलिए आर्टिलरी को “गॉड ऑफ वॉर” भी कहा जाता है। वहीं इन्फैंट्री को “क्वीन” और आर्मर्ड कोर “किंग ऑफ वॉर” कहा जाता है।

द्रास-मश्कोह में 6 नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री उस समय प्वाइंट 5140 (16,864 फीट) पर थी। यह वही जगह थी जहां से गनों के इस्तेमाल से पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा गया था। जिसके बाद 30 जुलाई को द्रास सेक्टर के पॉइंट 5140 को औपचारिक रूप से “गन हिल” नाम दिया गया था, ताकि आर्टिलरी के योगदान को हमेशा याद रखा जा सके।

कारगिल युद्ध के बाद प्वाइंट 5140 का नाम गन हिल रखने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। हालांकि आर्टिलरी ने न केवल पॉइंट 5140 बल्कि तोलोलिंग, पॉइंट 4700, थ्री पिंपल्स, टाइगर हिल और पॉइंट 4875 (जिसे बत्रा टॉप भी कहा जाता है) जैसी चोटियों पर मौजूद पाकिस्तानी बंकरों को बरबाद करने में अहम भूमिका निभाई थी। युद्ध के बाद तत्कालीन 8 माउंटेन डिवीजन के आर्टिलरी कमांडर लखविंदर सिंह किसी एक जगह को “गन हिल” नाम रखने का प्रस्ताव गंभीरता से दिया था। उन्होंने यह बात तत्कालीन डायरेक्टोरेट ऑफ आर्टिलरी से यह बात कही थी। जिसके बाद तत्कालीन 15वीं कोर के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल कृष्ण पाल युद्ध के बाद प्वाइंट 4875 का नाम गन हिल रखने पर सहमत हुए थे। लेकिन उसे पहले से ही बत्रा टॉप के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके बाद प्वाइंट 5140 का नाम गन हिल रखा गया था। लेफ्टिनेंट जनरल पाल ने ही तत्कालीन ब्रिगेडियर लखविंदर सिंह को द्रास में नियुक्त किया था। बता दें कि युद्ध की शुरुआत में मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने ही युद्ध को भारतीय सेना के पक्ष में बदलने के लिए चार बोफोर्स रेजिमेंटों को द्रास में भेजने का प्रस्ताव रखा था।

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Disability Pension: रक्षा मंत्रालय के नए डिसेबिलिटी पेंशन नियमों पर छिड़ा विवाद, पूर्व सैनिक बोले- क्या पेंशन में भारी कटौती की तैयारी कर रही सरकार?

Disability Pension
File Photo

Disability Pension: रक्षा मंत्रालय की तरफ से सितंबर 2023 में लागू किए गए नए डिसेबिलिटी पेंशन नियमों को लेकर विवाद छिड़ गया है। 21 सितंबर 2023 को जारी इन नियमों का नाम दिया गया है, “Entitlement Rules for Casualty Pension and Disability Compensation Awards to Armed Forces Personnel, 2023”। ये नियम सभी पुराने प्रावधानों की जगह ले चुके हैं और अब विकलांगता पेंशन को इम्पेयरमेंट रिलीफ कहा जाएगा।

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सैनिकों और पूर्व सैनिकों के अनुसार, इसके बदलाव से उनके अधिकारों और लंबे समय तक की गई सेवाओं पर असर पड़ सकता है। साथ ही, उन्हें यह भी आशंक है कि इन नियमों से पेंशन में भारी कटौती हो सकती है।

Disability Pension: नए नियमों में क्या है प्रावधान

नए प्रावधान के अनुसार अब सैनिकों की विकलांगता का प्रतिशत तय किया जाएगा और उसी हिसाब से पेंशन का निर्धारण होगा। पहले यह व्यवस्था काफी सुविधाजनक थी, लेकिन अब “डिसेबिलिटी एलिमेंट” को पूरी तरह से हटा दिया गया है और उसकी जगह “इम्पेयरमेंट रिलीफ” लागू किया गया है।

इस बदलाव का असर खासकर उन जवानों और अधिकारियों पर पड़ेगा, जिनकी सेहत नौकरी में रहने के दौरान बिगड़ती है। हालांकि पहली बार इन नियमों में लाइफस्टाइल बीमारियों जैसे हाइपरटेंशन और टाइप-2 डायबिटीज को शामिल किया गया है। लेकिन इनका फायदा सिर्फ उन सैनिकों को मिलेगा, जिन्होंने हाई एल्टीट्यूड वाले इलाकों या बेहद कठिन हालात में ड्यूटी करते हुए यह बीमारी झेली हो।

पहले तक सभी हृदय रोग और स्ट्रेस से जुड़ी बीमारियां सेना की नौकरी से जुड़ी मानी जाती थीं, लेकिन अब यह प्रावधान सीमित कर दिया गया है।

Disability Pension: कैडेट्स और ऑफिसर ट्रेनिंग पर भी असर

नए नियमों में कैडेट्स और ऑफिसर ट्रेनिंग कर रहे उम्मीदवारों को भी फायदों से वंचित कर दिया गया है। अब उन्हें सिर्फ एक्स-ग्रेशिया भुगतान मिलेगा। सैनिक संगठनों का कहना है कि यह फैसला अनुचित है क्योंकि कैडेट्स भी कठिन ट्रेनिंग और दबाव का सामना करते हैं।

Disability Pension: सीएजी रिपोर्ट बनी आधार

मार्च 2023 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक-सीएजी की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि हर साल रिटायर होने वाले लगभग 36-40 फीसदी अफसरों को डिसेबिलिटी पेंशन मिलती है, जबकि केवल 15-18 फीसदी जवानों को यह लाभ मिलता है।

सेना के अनुसार, यह अंतर स्वाभाविक है क्योंकि जवान कम उम्र में रिटायर हो जाते हैं और अपेक्षाकृत स्वस्थ रहते हैं। दूसरी ओर, अधिकारी 54 से 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं, जब लंबे समय की सेवा और मानसिक दबाव उनकी सेहत पर असर डालता है। इसके आधार पर एक इंटर-सर्विस पैनल बनाया गया, जिसकी अध्यक्षता आर्मी के एडजुटेंट जनरल ने की थी।

Disability Pension: पूर्व सैनिकों की नाराजगी

ऑल इंडिया एक्स-सर्विसमेन वेलफेयर एसोसिएशन ने रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर इन नियमों को वापस लेने की मांग की है। संगठन का कहना है कि नए नियम सैनिकों की वास्तविक चुनौतियों को नजरअंदाज करते हैं और “इनवैलिडेशन” की परिभाषा को बदलकर इसे पिछड़ा हुआ कदम बना दिया गया है। संगठन ने कहा कि अब इनवैलिड पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 साल की सेवा पूरी करनी होगी।

संस्था ने कहा कि पहले हृदय रोग जैसे सभी मामले सर्विस स्ट्रेस से जुड़े माने जाते थे, लेकिन अब इन्हें सिर्फ ऊंचाई वाले इलाकों से जोड़ा गया है। जबकि तनाव और दबाव सैनिक चाहे जहां भी तैनात हों, हर समय झेलते हैं।

अदालत का फैसला और सरकार की हार

दिल्ली हाई कोर्ट ने जुलाई 2023 में रक्षा मंत्रालय की उन 300 याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें विकलांगता पेंशन को लेकर सैनिकों के खिलाफ अपील की गई थी।

न्यायमूर्ति नवीन चावला और शालिंदर कौर की बेंच ने कहा कि विकलांगता पेंशन का उद्देश्य उन सैनिकों की मदद करना है, जिन्होंने ड्यूटी के दौरान बीमारी या चोट झेली है। अदालत का स्पष्ट मत था कि यह पेंशन सैनिकों का अधिकार है और इसे छीनना न्याय के खिलाफ है।

सैनिकों के हालात की अनदेखी

संस्था का कहना है कि रक्षा मंत्रालय ने नए नियम बनाते समय सैनिकों की जमीनी वास्तविकताओं पर ध्यान नहीं दिया। भारतीय सैनिक ऊंचे ग्लेशियर से लेकर रेगिस्तान और घने जंगलों तक हर तरह की भौगोलिक परिस्थितियों में तैनात रहते हैं।

उनकी जिंदगी हमेशा खतरे में होती है कभी सीमा पर, कभी आतंकी इलाकों में और कभी आंतरिक सुरक्षा ड्यूटी पर। हमेशा हाई-अलर्ट पर रहना उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। साथ ही, सैनिकों को सिर्फ भौगोलिक कठिनाइयां ही नहीं झेलनी पड़तीं, बल्कि परिवार की चिंता भी उनकी सेहत पर असर डालती है। लंबे समय तक पोस्टिंग के कारण परिवार से दूर रहना, बच्चों और पत्नी की देखभाल न कर पाना, और हर पल हमले का खतरा, यह सब मिलकर सैनिकों की सेहत बिगाड़ देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाइपरटेंशन, दिल की बीमारियां और मानसिक तनाव इन्हीं हालात की देन हैं।

वर्तमान नियमों को लेकर विशेषज्ञों और पूर्व सैनिकों का कहना है कि रक्षा मंत्रालय को संवेदनशीलता दिखाते हुए सैनिकों के मनोबल का ख्याल रखना चाहिए। सैनिक हर वक्त आदेश मानकर सीमा से लेकर शांति क्षेत्रों तक कहीं भी सेवा के लिए तैयार रहते हैं।

पूर्व सैनिकों का कहना है कि सरकार उन्हें मुकदमों में उलझाकर और पेंशन घटाकर उनका मनोबल गिरा रही है। उनका तर्क है कि जो सैनिक अपने प्राणों की परवाह किए बिना ड्यूटी करता है, उसे ऐसी नीतियों से नहीं बल्कि संवेदनशील फैसलों से समर्थन मिलना चाहिए।

MiG-21 Memories: मिग-21 के कॉकपिट में रूसी भाषा और बिना ट्रेनर जेट के कैसे ली थी पायलटों ने ट्रेनिंग, रूस ने क्यों की थी चीन की तरफदारी!

MiG-21 Memories

MiG-21 Memories: भारतीय वायुसेना का इतिहास कई महत्वपूर्ण पड़ावों से भरा हुआ है, लेकिन उसमें मिग-21 का आना और इसकी शुरुआती ट्रेनिंग का दौर सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। मिग-21, जो दुनिया का सबसे ज्यादा बनाया गया सुपरसोनिक फाइटर है, भारत में 1960 के दशक की शुरुआत में आया और छह दशकों से ज्यादा समय तक भारतीय आसमान का प्रहरी बना रहा। यह मिग-21एफ-13 वेरिएंट था, जिसे औपचारिक रूप से 1964 में वायुसेना में शामिल किया गया।

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MiG-21 Memories: 1962 युद्ध के बाद किया था फैसला

चीन के साथ 1962 के युद्ध के तुरंत बाद भारत ने सोवियत संघ से मिग-21 खरीदने का फैसला किया। उस समय यह विमान तकनीकी रूप से एडवांस था और इसके आने के बाद ही भारत की सुपरसोनिक युग में एंट्री हुई। 1963 में पहली बार छह MiG-21 विमान भारत पहुंचे। इन्हें बॉम्बे (अब मुंबई) से चंडीगढ़ लाकर रूसी इंजीनियरों ने असेंबल किया और इन्हें नंबर 28 स्क्वाड्रन में शामिल किया गया। इस स्क्वाड्रन ने खुद को “फर्स्ट सुपरसोनिक्स” नाम दिया।

इन विमानों में पहला जहाज BC 816 टेल नंबर वाला था, जिसे देखकर भारतीय पायलट हैरान रह गए। उनके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के विमानों पर उड़ान भर रहे थे।

MiG-21 Memories: सोवियत संघ में भारतीय पायलटों की ट्रेनिंग

भारतीय पायलटों का पहला बैच 1962 में सोवियत संघ भेजा गया। इसमें आठ पायलट शामिल थे स्क्वाड्रन लीडर दिलबाग सिंह, एसके मेहरा, वोल्लेन, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एके मुखर्जी, डेनजिल कीलर, एचएस गिल, लाडू सेन और सबसे जूनियर ब्रजेश धर जयाल। इनमें से कई आगे चलकर भारतीय वायुसेना प्रमुख और एयर मार्शल बने।

सोवियत संघ में ट्रेनिंग आसान नहीं थी। भारतीय पायलटों को सुपरसोनिक विमान उड़ाने का कोई अनुभव नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि MiG-21 का कोई ट्रेनर वर्जन उपलब्ध नहीं था। पायलटों को पहले पुराने सबसोनिक मिग-15 और मिग-17 पर उड़ान भरनी पड़ी और फिर सीधे मिग-21 में बैठकर अकेले उड़ना पड़ा।

इसके अलावा, कॉकपिट की हर चीज रूसी भाषा में थी और सभी डायल मीटर और किलोमीटर में बने थे, जबकि भारतीय पायलट फीट और माइल्स में काम करने के आदी थे। इस वजह से शुरुआती दिनों में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

MiG-21 Memories: रूस ने रोक दी थी ट्रेनिंग

फ्लाइट लेफ्टिनेंट ब्रजेश धर जयाल याद करते हैं कि सब कुछ बिल्कुल नया था। रूसी ट्रेनर भी शुरुआती दिनों में ज्यादा मददगार नहीं थे। पायलटों को लगता था कि रूस भारत को अपने कीमती विमान देने में हिचक रहा है। रूसी भाषा न समझ पाने की वजह से कॉकपिट में बैठकर हर बटन और डायल को समझना उनके लिए एक कठिन परीक्षा जैसा था।

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एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) दिलबाग सिंह ने अपनी किताब On the Wings of Destiny में लिखा है कि उस समय रूस और चीन के संबंध काफी अच्छे थे। जब चीन ने भारत पर हमला किया तो रूस में ट्रेनिंग कर रहे भारतीय पायलटों से कई बार पूछा गया, “तुम चीन से क्यों लड़ रहे हो? वे तो कम्युनिस्ट हैं।” इस वजह से कुछ समय के लिए ट्रेनिंग रोक भी दी गई थी। बाद में राजनीतिक स्तर पर फैसला होने के बाद ही ट्रेनिंग दोबारा शुरू हो सकी।

MiG-21 Memories: सब कुछ नया और चौंकाने वाला

एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) एवाई टिपनिस ने याद किया कि जब उन्होंने पहली बार मिग-21 देखा तो वे दंग रह गए। उनका कहना था, “रूसी कॉकपिट, मीट्रिक डायल, सुपरसोनिक स्पीड, कोई ट्रेनर नहीं, न सिम्युलेटर। सब कुछ नया और चौंकाने वाला था।”

MiG-21 की लैंडिंग और टेकऑफ वेस्टर्न विमानों से बिल्कुल अलग थी। इसकी एप्रोच और क्लाइंबिंग ऐंगल पश्चिमी विमानों की तुलना में तीन गुना ज्यादा था। हेलमेट वाइजर में हीटिंग सिस्टम था, जो रूस की ठंड के लिए बनाया गया था, लेकिन भारत की गर्मी में पायलटों के सिर पसीने से भीग जाते थे। हाइड्रोलिक ब्रेक्स की जगह न्यूमैटिक ब्रेक्स थे, जिससे पायलटों को शुरू में असहजता महसूस हुई।

MiG-21 Memories: दो 1963 में ही हो गए थे दुर्घटनाग्रस्त

शुरुआती दौर में मिग-21 का ऑपरेशन आसान नहीं था। पहले छह विमानों में से दो 1963 में दुर्घटनाग्रस्त हो गए। इन्हें वोल्लेन और मुखर्जी उड़ा रहे थे। केवल चार विमान ही सुरक्षित बचे। टिपनिस का कहना है कि यह हादसे तकनीकी चुनौतियों और प्रशिक्षण की कमी की वजह से हुए।

लेकिन भारतीय वायुसेना ने हार नहीं मानी। जल्द ही छह और विमान आए। यह टाइप-76 FL वर्जन था, जिसमें नया रडार, आफ्टरबर्नर और दो एयर-टू-एयर मिसाइलें लगी थीं। यह भारतीय पायलटों के लिए बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे सिर्फ कैनन से फायर करने के आदी थे।

MiG-21 Memories: धीरे-धीरे बढ़ी मिग-21 की संख्या

1965 तक भारतीय वायुसेना में मिग-21 का इस्तेमाल बढ़ने लगा था। इसे हाई-एल्टीट्यूड इंटरसेप्टर की तरह डिजाइन किया गया था, लेकिन भारतीय पायलटों ने इसे कई और भूमिकाओं में ढाल लिया। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद, धीरे-धीरे मिग-21 भारतीय वायुसेना की रीढ़ बनता चला गया।

एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) टिपनिस कहते हैं कि हालांकि शुरू में कॉकपिट ने पायलटों को आत्मविश्वास नहीं दिया, लेकिन समय के साथ यह विमान उनके दिल के बेहद करीब हो गया। “मैंने जब पहली बार अंबाला में इस विमान को देखा, तो इसकी डेल्टा विंग और नोज कोन ने मुझे मोहित कर लिया। मुझे लगा कि यह सिर्फ मेरा है। यह एक खतरनाक खूबसूरती थी, जैसे कोई वैम्प।”

MiG-21 Memories: 1966 में दो ट्रेनर जेट

भारतीय पायलटों की सबसे बड़ी मांग थी कि उन्हें ट्रेनिंग के लिए मिग-21 का ट्रेनर वर्जन दिया जाए। आखिरकार 1966 में रूस ने दो ट्रेनर विमान भारत भेजे। यह नई पीढ़ी के पायलटों के लिए राहत की बात थी। इसी साल मिग-21 ने पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में फ्लाईपास्ट किया। उस दिन भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया कि अब वह सुपरसोनिक फाइटर जेट्स से लैस है। टिपनिस ने 1966 में पहली बार मिग-21 से एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल फायर की थी। यह उस समय एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि मिग-21 को शुरू में केवल इंटरसेप्टर माना जाता था।

IAF Inflatable Decoys: भारतीय वायुसेना क्यों खरीद रही हवा से फुलाने वाले S-400 एयर डिफेंस सिस्टम? ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को दिया था चकमा

IAF Inflatable Decoys: Indian Air Force to Procure 400 Decoys After Successful Use in Operation Sindoor

IAF Inflatable Decoys: भारतीय वायुसेना अपनी वॉर स्ट्रेटेजी में लगातार बदलाव कर रही है। वायुसेना ने हाल ही में 400 इन्फ्लेटेबल डिकॉय खरीदने का फैसला किया है। हवा से फुलाने वाले ये डिकॉय असली फाइटर जेट और S-400 ट्रायंफ एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हथियारों की हूबहू नकल हैं। इसका मकसद दुश्मन देशों को भ्रम में रख कर अपने असली एसेट्स की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह खरीद इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने डिकॉय टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दिया था।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने WhatsApp नहीं किया था इस्तेमाल, अपनाया था ये खास स्वदेशी फोन

IAF Inflatable Decoys: ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए थे डिकॉय

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया। इस जवाबी कार्रवाई में वायुसेना ने कई नई रणनीतियों का इस्तेमाल किया। इनमें सबसे अहम था डिकॉय सिस्टम। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने पहली बार बड़े पैमाने पर डिकॉय सिस्टम का इस्तेमाल किया।

शुरुआती चरण में डिकॉय ड्रोन, डमी जेट्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर पेलोड्स को उड़ाए थे, जिससे पाकिस्तानी रडार कवरेज सैचुरेटेड हो कर कन्फ्यूज हो गया। ये ड्रोन दुश्मन की रडार स्क्रीन पर असली लड़ाकू विमान जैसे दिख रहे थे। इससे उनका एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिव हो गया और उन्होंने समय से पहले मिसाइलें दाग दीं। जिसके चलते इसी प्रक्रिया ने उनकी लोकेशन का पता भारतीय वायुसेना को दे दिया।

असल में पाकिस्तान ने चीनी HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम को एक नई जगह पर तैनात कर दिया था, जिसका भारत को पता नहीं था। डमी जेट विमानों के जरिए भारत को HQ-9 एडी की नई लोकेशन का पता लग गया। जिससे भारत को रडार व एयर डिफेंस सिस्टम पर हमला करने में मदद मिली। इसके बाद भारतीय वायुसेना ने इजरायल निर्मित हारोप लूटरिंग म्यूनिशंस और ब्रह्मोस मिसाइलों से इन लक्ष्यों पर हमला किया।

वायुसेना ने इसके लिए पायलटलेस टारगेट एयरक्राफ्ट (PTA) का इस्तेमाल किया। इन्हें इस तरह तैयार किया गया था कि वे पाकिस्तानी रडार पर Su-30 और MiG-29 जैसे फाइटर जेट्स दिखाई दें। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम भ्रमित हो गए और असली हमले से पहले ही पाकिस्तान की एयर डिफेंस की लोकेशन पता लग गई।

IAF Inflatable Decoys: राफेल पर लगाया था ये खास ‘चकमा’ सिस्टम

इस ऑपरेशन में राफेल फाइटर जेट्स पर लगे X-Guard सिस्टम ने भी अहम भूमिका निभाई। यह एक AI-पावर्ड टोअड डिकॉय (AI-powered Towed Decoy) था, जिसका वजन लगभग 30 किलो होता है। यह सिस्टम दुश्मन की PL-15E एयर-टू-एयर मिसाइलों और J-10C फाइटर जेट्स को चकमा देने में कामयाब रहा। X-Guard दुश्मन के रडार सिग्नल को कॉपी कर देता है, जिससे दुश्मन को लगता है कि उसने असली जेट को निशाना बनाया है। इस दौरान असली राफेल सुरक्षित रहते हुए अपने मिशन को अंजाम देते रहे और आतंकियों के ठिकानों को टरगेट बनाते रहे।

IAF Inflatable Decoys: ब्रह्मोस हमलों से पहले उड़ाए डमी एयरक्राफ्ट

सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों के हमले से पहले भी डमी एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया था। डिकॉय के इस्तेमाल से पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम बार-बार एक्टिव होता रहा। जब उनके रडार ने भारतीय विमानों को आते देखा, तो उन्होंने HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया। लेकिन वास्तव में वे डमी टारगेट थे।

9-10 मई 2025 की रात भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 12 में से 11 बड़े एयरबेस पर हमले किए। इन हमलों में लगभग 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी गईं। इसके साथ ही स्कैल्प, रैम्पेज और क्रिस्टल मेज जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें भी इस्तेमाल हुईं।

इन हमलों का मकसद पाकिस्तानी वायुसेना को पूरी तरह नष्ट करना नहीं था, बल्कि उनके एयरबेस को निष्क्रिय करना और उनकी विमान तैनाती क्षमता को सीमित करना था।

इन हमलों में पाकिस्तान ने न केवल अपने एयरबेस का बड़ा हिस्सा खोया, बल्कि खबरों के मुताबिक एक AWACS (Airborne Warning and Control System) विमान और कई लंबे समय तक उड़ान भरने वाले UAV भी नष्ट हुए।

IAF Inflatable Decoys: 400 नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय

अब भारतीय वायुसेना 400 नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय खरीदने जा रही है। ये डिकॉय न केवल फाइटर जेट्स बल्कि S-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम की भी हूबहू नकल कर सकते हैं। इससे दुश्मन की इंटेलिजेंस सर्विलांस और ड्रोन जासूसी नेटवर्क को चकमा दिया जा सकेगा। इससे दुश्मन वास्तविक और डमी टारगेट्स में फर्क नहीं कर पाएगा, जिससे अहम हथियार की सुरक्षा में इजाफा होगा।

भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ये डिकॉय सर्विलांस या स्ट्राइक मिशन्स के दौरान दुश्मन के लिए वास्तविक और नकली एसेट्स के बीच अंतर करना मुश्किल बना देंगे। इससे दुश्मन की रडार प्रणाली कन्फ्यूज होगी और वास्तविक मिलिट्री एसेट्स की सुरक्षा बढ़ेगी।

रिटायर्ड कर्नल अनिल राणा के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध केवल गोलियों और मिसाइलों से नहीं जीता जाता, बल्कि दुश्मन को धोखे में रखना (Deception Tactics) भी अहम रणनीति है। ऑपरेशन सिंदूर में हमने डिकॉय का इस्तेमाल करके भारत ने न केवल पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को नाकाम किया, बल्कि अपने विमानों और पायलटों को भी सुरक्षित रखा।

उनका कहना है कि S-400 जैसे दिखने वाले ये नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय भारत की सैन्य क्षमताओं में बढ़ोतरी करेंगे। इनके इस्तेमाल से भारत अपने एयर डिफेंस को और मजबूत कर सकेगा और भविष्य में होने वाली जंगों में दुश्मनों को चकमा देने में मदद मिलेगी।

Made in India Rafale Jets: वायुसेना को चाहिए 114 ‘मेक इन इंडिया’ राफेल जेट्स, रक्षा मंत्रालय को भेजा प्रस्ताव, 2 लाख करोड़ रुपये की है डील

Rafale Fighter Jets in India: Defence Ministry Begins Talks on IAF Proposal for 114 'Made in India' Aircraft

Made in India Rafale Jets: भारतीय वायु सेना ने एक बड़ा कदम उठाते हुए 114 राफेल फाइटर जेट की खरीद का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को सौंपा है। इस प्रस्ताव के तहत 114 ‘मेड इन इंडिया’ राफेल फाइटर जेट्स खरीदे जाने हैं। ये विमान फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन (Dassault Aviation) भारतीय एयरोस्पेस कंपनियों के साथ मिल कर भारत में ही बनाएगी। इस प्रस्ताव की अनुमानित लागत 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा माना जा रहा है।

MRFA Rafale Deal: क्या मेक इन इंडिया होगा राफेल? 114 मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट की डील पर भी जल्द लग सकती है मुहर

Made in India Rafale Jets: रक्षा मंत्रालय में चर्चा शुरू

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, वायुसेना द्वारा तैयार किया गया स्टेटमेंट ऑफ केस (SoC) कुछ दिन पहले मंत्रालय को मिला है। अब यह प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय के डिफेंस फाइनेंस के पास समीक्षा के लिए गया हुआ है। आगे चलकर यह प्रस्ताव डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड (DPB) के पास जाएगा और उसके बाद अंतिम फैसला डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) में लिया जाएगा।

Made in India Rafale Jets: भारत के लिए सबसे बड़ी डील

अगर यह डील मंजूर होती है, तो यह भारत सरकार का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा। इस डील के बाद भारतीय वायुसेना के पास कुल 176 राफेल फाइटर जेट हो जाएंगे। फिलहाल वायुसेना के पास 36 राफेल विमान पहले से हैं, जिन्हें गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट समझौते के तहत खरीदा गया था। वहीं, भारतीय नौसेना ने भी 26 राफेल विमान का ऑर्डर दिया है।

Made in India Rafale Jets: ऑपरेशन सिंदूर में राफाल का प्रदर्शन

यह प्रस्ताव उस समय आया है, जब हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल फाइटर जेट ने पाकिस्तान के खिलाफ शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट (Spectra Electronic Warfare Suite) की मदद से चीनी PL-15 एयर-टू-एयर मिसाइलों को पूरी तरह मात दी। इसने वायुसेना की क्षमता को और मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।

लगााए जाएंगे नए हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें

भारत में बनने वाले राफाल विमानों को और भी ताकतवर शक्तिशाली बनाने की योजना है। इनमें मौजूदा स्कैल्प (Scalp) एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल से भी लंबी दूरी की मिसाइलों को जोड़ा जाएगा। स्कैल्प का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों और मिलिट्री ठिकानों को निशाना बनाने में भी किया गया था।

Made in India Rafale Jets: 60 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री

इस डील की सबसे खास बात यह है कि इसमें 60 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री शामिल होगी। यह भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान और घरेलू रक्षा उत्पादन को नई गति देगा। भारतीय कंपनियां इस निर्माण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

Made in India Rafale Jets: मेंटेनेंस हब भी भारत में

फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल (MRO) फैसिलिटी भी लगाएगी। यह हब हैदराबाद में बनाया जाएगा, जहां राफेल जेट्स में इस्तेमाल होने वाले M-88 इंजन की मरम्मत और रखरखाव का काम किया जाएगा। दसॉ ने इसके लिए पहले से ही भारत में एक कंपनी बना ली है। माना जा रहा है कि टाटा जैसी प्रमुख भारतीय एयरोस्पेस कंपनियां इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगी।

भारतीय वायुसेना को इस समय लड़ाकू विमानों की तत्काल जरूरत है। मौजूदा सुरक्षा परिदृश्य और पड़ोसी देशों से बढ़ते खतरे को देखते हुए वायुसेना का लक्ष्य अपनी स्क्वॉड्रन क्षमता को 42 तक बढ़ाना है। फिलहाल वायुसेना 31 स्क्वॉड्रन के साथ काम कर रही है।

180 LCA मार्क-1A तेजस विमानों के ऑर्डर

भारत पहले ही 180 LCA मार्क-1A तेजस विमानों का ऑर्डर दे चुका है। इसके अलावा, 2035 के बाद बड़ी संख्या में स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट भी शामिल करने की योजना है।

राफेल जेट्स को भारत ने पहली बार 2016 में खरीदा था और 2020 में इन्हें औपचारिक रूप से वायुसेना में शामिल किया गया। यह विमान अपनी रफ्तार, हथियारों और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स के चलते दुनिया के बेहतरीन मल्टीरोल फाइटर जेट्स में गिने जाते हैं।

भारतीय नौसेना और वायुसेना दोनों के लिए लाभ

नई डील केवल भारतीय वायुसेना के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना के लिए भी अहम साबित होगी। नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर पर तैनात होने वाले ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) विमानों में भी इस डील से तैयार नई टेक्नोलॉजी का फायदा मिलेगा। भारतीय नौसेना ने पहले ही 26 राफेल M का ऑर्डर दिया है, जिन्हें INS विक्रांत और भविष्य के विमानवाहक पोत पर तैनात किया जाएगा।

क्यों चुना फ्रांस को

भारत ने राफेल प्रोजेक्ट के लिए फ्रांस को इसलिए चुना है क्योंकि फ्रांस ने अतीत में कई मौकों पर भारत का साथ दिया है। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद जब दुनिया के कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे, तब फ्रांस ने न केवल प्रतिबंध लगाने से इंकार किया, बल्कि मिराज-2000 फाइटर जेट्स और मिसाइल तकनीक के लिए सहयोग जारी रखा।

आज भी फ्रांस, भारत को एडवांस INGPS सिस्टम और मिराज 2000 विमानों के लिए स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराता है। यही वजह है कि राफेल के निर्माण और रखरखाव में फ्रांस, भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार माना जा रहा है।

INS Aravali: नेवी चीफ ने बताया गुरुग्राम में क्यों बनाया नौसेना का नया नेवल बेस, पीएम मोदी के ‘महासागर’ विजन को मिलेगी मजबूती

INS Aravali Commissioned: Indian Navy’s New Naval Base in Gurugram Enhances Maritime Security
Chief Naval Staff Admiral Dinesh Tripathi

INS Aravali: भारतीय नौसेना ने शुक्रवार को गुरुग्राम में अपना नया नेवल बेस INS अरावली कमीशन कर दिया। इस एतिहासिक समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे, उन्होंने इस बेस को नौसेना में शामिल करने की घोषणा की। समारोह के दौरान नौसेना प्रमुख को 50 सदस्यीय गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।

INS Aravali Commissioned: भारतीय नौसेना को मिला गुरुग्राम में नया नेवल बेस, समंदर की हर हरकत पर रहेगी नजर

एडमिरल दिनेश ने कहा कि INS अरावली भारतीय नौसेना को मजबूत प्रशासनिक और लॉजिस्टिक सपोर्ट प्रदान करेगा। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे नौसेना का आकार और उसकी तकनीकी क्षमता बढ़ रही है, वैसे ही इस प्रकार के आधुनिक बेस की जरूरत भी महसूस की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह नया बेस केवल टेक्नोलॉजी का सेंटर नहीं होगा, बल्कि सहयोग का ऐसा हब बनेगा, जो भारत और उसके साझेदार देशों को जोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘महासागर विजन’ (Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions-MAHASAGAR) को आगे बढ़ाएगा।

INS Aravali Commissioned: Indian Navy’s New Naval Base in Gurugram Enhances Maritime Security

नौसेना प्रमुख ने कहा कि INS अरावली भारत की भूमिका को हिंद महासागर क्षेत्र में “प्रिफर्ड सिक्योरिटी पार्टनर” के रूप में और मजबूत करेगा। उन्होंने बेस के कमांडिंग ऑफिसर और पूरी कमीशनिंग टीम को बधाई दी और उनसे नौसेना के मूल्यों कर्तव्य, सम्मान और साहस को निभाने का आह्वान किया।

INS Aravali का महत्व

INS अरावली का नाम गुरुग्राम में स्थित अरावली पर्वतमाला से प्रेरित है। यह बेस भारतीय नौसेना की इनफॉरमेशन और कम्यूनिकेशन युनिट को सपोर्ट करेगा। ये यूनिट्स भारत और नौसेना की कमांड, कंट्रोल और मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) फ्रेमवर्क में अहम भूमिका निभाती हैं। इस बेस का आदर्श वाक्य है – ‘सामुद्रिकसुरक्षायाः सहयोगं’ यानी ‘सहयोग के जरिए समुद्री सुरक्षा। इसका उद्देश्य है नौसेना की यूनिट्स, MDA सेंटर्स और सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करना और समुद्री सुरक्षा को और मजबूत करना।

क्रेस्ट है बेहद खास

INS अरावली का क्रेस्ट भी खास है। इसमें अरावली श्रृंखला की पर्वत छवि है जो दृढ़ता और शक्ति का प्रतीक है। इसके साथ उगता हुआ सूरज दर्शाया गया है जो अनंत सतर्कता, ऊर्जा और आधुनिक तकनीकी क्षमताओं का प्रतीक है। यह क्रेस्ट नौसेना की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है जिसके तहत वह भारत के समुद्री हितों की रक्षा के लिए हर पल तैयार रहती है।

हिंद महासागर और सामरिक महत्व

हिंद महासागर क्षेत्र दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। यहां से दुनिया के लगभग एक-तिहाई बड़े कार्गो जहाज, आधे कंटेनर शिप और दो-तिहाई तेल के जहाज गुजरते हैं। इस कारण यह क्षेत्र व्यापार और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। INS अरावली इसी रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।

INS Aravali Commissioned: Indian Navy’s New Naval Base in Gurugram Enhances Maritime Security

IFC-IOR: अंतरराष्ट्रीय सहयोग का केंद्र

INS अरावली में मौजूद इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर – इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) की स्थापना 2018 में की गई थी। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और मित्र देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान करना है। यहां 25 देशों के 43 मल्टीनैशनल सेंटर से लाइव फीड प्राप्त होती है।

अब तक इस सेंटर ने 28 देशों के साथ 76 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संपर्क स्थापित किए हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, जापान और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर्स (ILO) भी शामिल हैं।

IMAC की पैनी नजर

इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) को भारतीय नौसेना का नर्व सेंटर माना जाता है। यहां विशाल स्क्रीन पर समुद्र में हो रही हर गतिविधि को लाइव देखा जा सकता है। IMAC में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिसिस तकनीक का इस्तेमाल होता है। यह कुछ ही सेकंड में बता देता है कि समुद्र में कितने जहाज हैं, वे कहां से आए हैं, कहां जा रहे हैं और उनकी गतिविधियां सामान्य हैं या संदिग्ध।

हर जहाज का रजिस्ट्रेशन नंबर, क्रू और कार्गो की जानकारी इस सिस्टम में उपलब्ध होती है। अगर कोई जहाज झूठा सिग्नल भेजकर स्पूफिंग करने की कोशिश करता है, तो IMAC उसे तुरंत पकड़ लेता है। भारत की 7,600 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा पर लगभग 90 तटीय रडार स्टेशन स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा, 89 ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम समुद्र की लगातार निगरानी करते हैं। यहां तक कि 20 मीटर से छोटी नावों को भी ट्रैक करने के लिए ट्रांसपोडर सिस्टम लगाया गया है। देशभर की करीब 2.20 लाख मछली पकड़ने वाली नावें इस सिस्टम से जुड़ी हुई हैं।

लाइव रिपोर्टिंग और सुरक्षा नेटवर्क

INS अरावली से भारतीय नौसेना अपने चार प्रमुख जॉइंट ऑपरेशन सेंटर मुंबई, कोच्चि, विशाखापट्टनम और पोर्ट ब्लेयर  से जुड़ी रहती है। यहां से हर जहाज और नाव की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती है। अब 20 मीटर से छोटी मछली पकड़ने वाली नावों के ट्रांसपोडर भी सैटेलाइट के जरिए डेटा भेजेंगे, जिसे IMAC में देखा जा सकेगा। इससे निगरानी क्षमता और भी बढ़ जाएगी।

INS Aravali Commissioned: भारतीय नौसेना को मिला गुरुग्राम में नया नेवल बेस, समंदर की हर हरकत पर रहेगी नजर

INS Aravali Commissioned: Navy’s New Base in Delhi NCR to Strengthen Maritime Domain Awareness
Photo: Indian Navy

INS Aravali Commissioned: भारतीय नौसेना ने शुक्रवार को दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम में नया नेवल बेस INS अरावली कमिशन किया। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी की मौजूदगी में आयोजित इस समारोह ने नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को और मजबूत किया। अरावली पर्वत श्रृंखला के नाम पर रखे गए इस बेस का क्रेस्ट पर्वत और उगते सूरज के प्रतीक से सजा है, जो अटल शक्ति और सतत सतर्कता का प्रतिनिधित्व करता है। इसका ध्येय वाक्य है सामुद्रिकसुरक्षायाः सहयोगं”, यानी सहयोग के माध्यम से समुद्री सुरक्षा।

Ran Samwad 2025 में वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने बताया, ऑपरेशन सिंदूर में INS विक्रांत पर तैनात थे 15 मिग-29 फाइटर जेट, ये 9 ट्रेंड्स तय करेंगे भविष्य के युद्धों की बिसात

हिंद महासागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री क्षेत्रों में से एक है। यहां से दुनिया के लगभग एक-तिहाई बड़े कार्गो जहाज, आधे कंटेनर शिप और दो-तिहाई तेल के जहाज गुजरते हैं। इस कारण यह क्षेत्र न केवल व्यापारिक बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। INS अरावली इसी रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।

INS Aravali Commissioned: गुरुग्राम से समंदर की निगरानी

गुरुग्राम स्थित इस बेस का मुख्य काम भारतीय नौसेना के विभिन्न इनफॉरमेशन और कम्यूनिकेशंस सेंटर्स को सपोर्ट करना है। यहां से मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) को बढ़ावा मिलेगा, जो भारत और मित्र देशों की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है।

इस बेस में दो प्रमुख केंद्र हैं इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) और इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर- इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR)। दोनों मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में गुजरने वाले जहाजों पर निगरानी रखते हैं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत पहचान कर कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं।

IFC-IOR: अंतरराष्ट्रीय सहयोग का केंद्र

INS अरावली में मौजूद IFC-IOR की स्थापना 2018 में हुई थी। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और मित्र देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान करना है। यहां 25 देशों के 43 मल्टीनैशनल सेंटर की लाइव फीड उपलब्ध होती है। इस सेंटर ने 28 देशों के साथ 76 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संपर्क स्थापित किए हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, जापान और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर्स (ILO) भी शामिल हैं।

INS Aravali Commissioned: समुद्री सुरक्षा के नए मानक

INS अरावली न केवल भारतीय नौसेना बल्कि पूरी दुनिया के लिए समुद्री सुरक्षा का नया केंद्र बनेगा। यहां से समुद्री डकैती, आतंकवाद, तस्करी, अवैध मछली पकड़ने और मानव तस्करी जैसी चुनौतियों से निपटने में सहयोग मिलेगा।

IFC-IOR का काम है, मित्र देशों को समय रहते चेतावनी देना, सूचनाओं को साझा करना और किसी भी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना।

INS Aravali Commissioned: IMAC की पैनी नजर

इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) को भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी का नर्व सेंटर माना जाता है। इसके मॉनिटरिंग रूम में लगी विशाल स्क्रीन पर समुद्र में होने वाली हर गतिविधि लाइव दिखाई देती है। यह स्क्रीन केवल जहाजों की आवाजाही ही नहीं, बल्कि संभावित खतरों और असामान्य गतिविधियों का भी तुरंत संकेत देती है।

IMAC में इस्तेमाल हो रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिसिस तकनीक इसे और भी ताकतवर बनाती है। कुछ ही सेकंड में यह सिस्टम बता देता है कि समुद्र में कितने जहाज मौजूद हैं, वे कहां से आए हैं, कहां जा रहे हैं और उनकी गतिविधियां सामान्य हैं या संदिग्ध। इससे भारतीय नौसेना को समुद्री सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बड़ी मदद मिलती है।

हर जहाज का रजिस्ट्रेशन नंबर, उसमें मौजूद क्रू की जानकारी और कार्गो का पूरा विवरण इस सिस्टम में तुरंत उपलब्ध हो जाता है। अगर कोई जहाज झूठा सिग्नल भेजकर या स्पूफिंग के जरिए अपनी असली पहचान छिपाने की कोशिश करता है, तो IMAC उसे तुरंत पकड़ लेता है।

भारत की 7,600 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा पर लगभग 90 तटीय रडार स्टेशन स्थापित किए गए हैं, जो लगातार निगरानी रखते हैं। इसके अलावा, 89 ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम समुद्र के हर हिस्से पर नजर रखते हैं और वास्तविक समय में सूचना उपलब्ध कराते हैं।

सिर्फ बड़े जहाज ही नहीं, बल्कि 20 मीटर से छोटी नौकाओं को भी ट्रैक करने के लिए ट्रांसपोडर सिस्टम लगाया गया है। देशभर में करीब 2.20 लाख से अधिक मछली पकड़ने वाली छोटी नावें इन ट्रांसपोडर से जुड़ी हुई हैं। इनके जरिए भी लगातार सिग्नल मिलते हैं, जो सैटेलाइट से होकर सीधे IMAC तक पहुंचते हैं।

इस तरह, IMAC के पास मौजूद यह एडवांस तकनीक भारतीय समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा को अभेद्य बनाती है। चाहे तटीय निगरानी हो, जहाजों की मूवमेंट पर नजर रखना हो या किसी भी संदिग्ध गतिविधि का तुरंत पता लगाना हो, यह सेंटर हर पल सक्रिय रहता है।

समुद्री गतिविधियों पर लाइव रिपोर्टिंग

INS अरावली से भारतीय नौसेना अपने चार प्रमुख जॉइंट ऑपरेशन सेंटर मुंबई, कोच्चि, विशाखापट्टनम और पोर्ट ब्लेयर से लगातार जुड़ी रहती है। यहां से हर जहाज और नाव की गतिविधि पर नजर रखी जाती है। खास बात यह है कि अब 20 मीटर से छोटी मछली पकड़ने वाली नावों पर लगाए गए ट्रांसपोडर भी सैटेलाइट के जरिए डेटा भेजेंगे, जिसे IMAC में देखा जा सकेगा।

सूत्रों ने बताया कि INS अरावली की स्थापना भारत के बढ़ते सामरिक महत्व और वैश्विक दृष्टिकोण को भी दर्शाती है। यह सिर्फ एक नेवल बेस नहीं बल्कि भारत की “सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी” का भी हिस्सा है। यहां से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की नौसैनिक क्षमताओं और सहयोग की भावना को मजबूत किया जाएगा।

Lt Kashish Methwani: मिस इंडिया से भारतीय सेना में अफसर बनीं कशिश मेथवानी, फोटो में देखें ब्यूटी क्वीन से लेफ्टिनेंट तक का सफर

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: एक तरफ रैंप पर चलती चमक-धमक, स्पॉटलाइट और सिर पर सजे ताज की शान तो दूसरी तरफ खाकी वर्दी, अनुशासन और देश की रक्षा का संकल्प। पुणे की रहने वाली कशिश मेथवानी ने दोनों ही दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। 2023 में मिस इंटरनेशनल इंडिया का ताज जीतने वाली कशिश ने 2024 में भारतीय सेना की लेफ्टिनेंट बनकर दिखा दिया कि नारी शक्ति किसी एक राह तक सीमित नहीं होती।

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मिस इंटरनेशनल इंडिया 2023 का खिताब जीतने वाली काशिश मेथवानी अब एक नई पहचान के साथ सामने आई हैं। वह अब भारतीय सेना की अधिकारी हैं और लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त हो चुकी हैं। 6 सितंबर 2024 को उन्होंने चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में अपनी पासिंग आउट परेड पूरी की और सेना में शामिल हो गईं।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: “मैंने या-या नहीं, बल्कि और-और चुना”

कशिश ने अपने एक TEDx टॉक में कहा था, “मैं या-या (either/or) की बजाय और-और चाहती थी। मैं मिस इंडिया भी बनना चाहती थी, वैज्ञानिक भी और ऑफिसर भी। मैं एक क्षेत्र नहीं चुनना चाहती थी। मुझे सबकुछ करना था और उसमें उत्कृष्टता हासिल करनी थी।” यही सोच उन्हें भीड़ से अलग करती है।

Lt Kashish Methwani: पढ़ाई से मॉडलिंग तक का सफर

कशिश मेथवानी ने सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की पढ़ाई की और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) बेंगलुरु से न्यूरोसाइंस में न्यूरोसाइंस में थीसिस लिखी है। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने मॉडलिंग में भी अपना नाम कमाया और 2023 में मिस इंटरनेशनल इंडिया का खिताब जीतकर देशभर में सुर्खियां बटोरीं।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: सेना की वर्दी पहनने का सपना

2024 में कशिश ने कॉम्बाइंड डिफेंस सर्विसेज परीक्षा पास की और पूरे देश में ऑल इंडिया रैंक 2 हासिल की। इसके बाद उन्होंने चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में ट्रेनिंग शुरू की। 6 सितंबर 2024 को उनकी पासिंग आउट परेड हुई और वे आर्मी एयर डिफेंस (AAD) ब्रांच में लेफ्टिनेंट बनीं।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: बचपन से ही सबकुछ करने की चाह

कशिश की मां शोभा मेथवानी, जो आर्मी पब्लिक स्कूल घोरपड़ी में टीचर हैं, कहती हैं—“आम तौर पर माता-पिता बच्चों को प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन हमारे यहां उल्टा था। कशिश खुद कहती थी कि मुझे हर प्रतियोगिता में भाग लेना है। उसे कभी परिणाम की चिंता नहीं होती थी।”

Lt Kashish Methwani: बहुमुखी प्रतिभा की मिसाल

24 वर्षीय काशिश ने अपने छोटे से जीवन में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। वह सिर्फ एक मॉडल या आर्मी ऑफिसर नहीं हैं। वे नेशनल लेवल पिस्टल शूटर और बास्केटबॉल खिलाड़ी भी रह चुकी हैं। इसके अलावा वे तबला बजाने और भरतनाट्यम नृत्य करने में भी निपुण हैं। इतनी कम उम्र में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में खुद को साबित किया।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

समाज सेवा में भी आगे

कशिश ने “क्रिटिकल कॉज” नामक एनजीओ की स्थापना की, जो प्लाज्मा और अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाने का काम करता है। महामारी के दौर में उनकी इस पहल ने कई लोगों की मदद की।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का ऑफर ठुकराया

हारवर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी के लिए सिलेक्ट होने के बावजूद उन्होंने भारतीय सेना को चुना। उन्होंने ब्यूटी क्वीन की ग्लैमर्स दुनिया को छोड़कर सैनिक की वर्दी को चुना।

कशिश पहली ऐसी महिला हैं, जिन्होंने अपने परिवार से सेना में कदम रखा। उनके पिता डॉ. गुरमुख दास मेथवानी रक्षा मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल क्वालिटी एश्योरेंस (DGQA) में वैज्ञानिक रहे हैं और वहां से डायरेक्टर पद से रिटायर हुए। उनकी मां शोभा आर्मी पब्लिक स्कूल में पढ़ाती हैं।

कशिश की लंबी जुल्फें अब नहीं हैं। उनकी जगह अब बाल छोटे हैं और चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता है। ताज से लेकर टोपी और अब आर्मी की बेरेट कैप तक, उनका सफर यह बताता है कि कशिश मेथवानी जैसी महिलाएं नई पीढ़ी के लिए रोल मॉडल हैं।

MiG-21 Bison Retirement: संस्थानों में मिग-21 के लिए मची होड़, स्टेटिक डिस्प्ले की जबरदस्त मांग और 5-6 साल का इंतजार!

IAF MiG-21 Bison Retirement After 62 Years: Legacy, Last Flight and What Comes Next
Mig 21 at Kargil War Memorial (Photo: Raksha samachar)

MiG-21 Bison Retirement: भारतीय वायुसेना का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 बाइसन (MiG-21 Bison) अब इतिहास बनने जा रहा है। 62 साल की सेवा के बाद 26 सितंबर 2025 को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित विशेष समारोह में इन विमानों को औपचारिक रूप से रिटायर कर दिया जाएगा। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एयरफोर्स के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 अपने पुराने अंदाज में उड़ान भरते दिखेंगे और उन्हें स्वदेशी तेजस फाइटर जेट एस्कॉर्ट करेंगे। इसके बाद भारतीय वायुसेना के बेड़े में मिग-21 का नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो जाएगा।

MiG-21 retirement India: 63 सालों की सेवा के बाद 26 सितंबर को रिटायर होगा मिकोयान-गुरेविच-21, त्रिशूल से लेकर तलवार तक मिले कई नाम

MiG-21 Bison Retirement: इस तरह होगी आखिरी उड़ान

समारोह के दौरान मिग-21 बाइसन पुराने अंदाज में बेस एयर डिफेंस सेंटर (BADC) कॉम्बैट ड्रिल करते दिखाई देंगे। इस ड्रिल में पायलट दिखाएंगे कि 60 साल पहले किस तरह एयरबेस की सुरक्षा के लिए मिग-21 को हवा में तैनात किया जाता था और रेडियो के जरिए उन्हें कंट्रोल किया जाता था। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 बाइसन स्क्वॉड्रन को स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान एस्कॉर्ट करेंगे। जैसे ही यह फॉर्मेशन मुख्य मंच के सामने पहुंचेगी, मिग-21 विमान तेजी से ऊंचाई की ओर उड़ान भरेंगे और फिर आसमान में ओझल हो जाएंगे।

MiG-21 Bison Retirement: रिटायरमेंट के बाद क्या होगा?

सूत्रों ने रक्षा समाचार डॉट कॉम को बताया कि भारतीय वायुसेना ने तय किया है कि इन विमानों को स्मारक के रूप में देशभर में लगाया जाएगा। रिटायरमेंट के बाद कई सरकारी संस्थान, विश्वविद्यालय और स्कूल इन विमानों को स्टैटिक डिस्प्ले के तौर पर लगाने के लिए आवेदन कर चुके हैं। वहीं, सरकारी संस्थानों को विमान मुफ्त में दिए जाएंगे, जबकि निजी संस्थानों को इसके लिए लगभग 30 से 40 लाख रुपये खर्च करने होंगे। वहीं स्वायत्त संस्थानों के लिए यह रकम कम होगी।

IAF MiG-21 Bison Retirement After 62 Years: Legacy, Last Flight and What Comes Next
Mig 21 at Kargil War Memorial (Photo: Raksha samachar)

MiG-21 Bison Retirement: 5-6 साल का इंतजार

सूत्रों ने यह भी बताया कि रिटायर हो जाने के बाद इन्हें देने के लिए कैटेगरी बनाई जााएगी। लेकिन इन जेट्स को पाने के लिए संस्थानों को 5-6 साल का इंतजार करना होगा, क्योंकि वेटिंग लिस्ट लंबी है। भारतीय वायुसेना सभी आवेदनों की स्क्रूटनी करेगी और प्राथमिकता के आधार पर जेट का आवंटन करेगी।

सूत्रों ने बताया कि कुछ जेट्स को भारतीय वायुसेना अपने म्यूजियम में भी रखेगी, जहां आम लोग इन्हें करीब से देख सकेंगे। इन विमानों का स्टैटिक डिस्प्ले युवाओं में साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स (STEM) की पढ़ाई के प्रति उत्सुकता बढ़ाएगा और उन्हें मिलिट्री हिस्ट्री से जोड़ने का काम करेगा। बता दें कि मिग-21 सहित अन्य रिटायर्ड विमानों को पहले भी वायुसेना संग्रहालय (दिल्ली), एचएएल संग्रहालय (बेंगलुरु), और विभिन्न सैन्य अड्डों पर प्रदर्शित किया गया है। दिल्ली के पालम वायुसेना स्टेशन पर मिग-21 को भी प्रदर्शन के लिए रखा गया है।

MiG-21 Bison Retirement: मेंटेनेस करनी है जरूरी

सूत्रों का कहना है कि किसी भी संस्थान को जेट देने से पहले उसके सभी अहम पार्ट्स, जिसमें एवियोनिक्स, संवेदनशील उपकरण और इंजन जैसे जरूरी पार्ट्स को निकाल लिया जाएगा। संस्थानों को केवल एयरफ्रेम ही दिया जाएगा। साथ ही अच्छी कंडीशंस वाले जेट्स को ही आवंटित किया जाएगाा। वहीं सस्थानों को डिस्प्ले के लिए दिए जाने वाले गए मिग-21 का नियमित रखरखाव करना भी आवश्यक होगाा, जिसमें सफाई, पेंटिंग, और जंग-रोधी उपचार शामिल हैं।

MiG-21 Bison Retirement: अपनी मर्जी से नहीं कर सकते कोई कलर

वहीं, इसके लिए शहर की म्यूनिसिपिलिटी की परमिशन की भी जरूरी होती है, क्योंकि राष्ट्रीय धरोहर होने के नाते इसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी उन्ही की होती है। वे उस संबंधित संस्थान के साथ इसके मेंटेनेंस में सहयोग करते हैं औऱ समय-समय पर जांच करते हैं। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायु सेना का रिपेयर एंड सॉल्वेज यूनिट (RSU) इसमें उनकी मदद करता है। इनके मेंटेनेंस के लिए पूरे डेकोरम का पालन करना होता है। वहीं, संस्थान इन्हें अपनी मर्जी से कोई भी कलर नहीं कर सकता है। बल्कि ऑरिजनल कलर और राष्ट्रीय झंडा बनाना जरूरी होता है।

MiG-21 Bison Retirement: छह दशक तक की देश की सेवा

भारत-चीन युद्ध के बाद मिग-21 को 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। यह भारत का पहला सुपरसोनिक फाइटर जेट था और जल्द ही इसे वायुसेना की रीढ़ माना जाने लगा। इसे सोवियत संघ के मिकोयान-गुरेविच डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया था और भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने लाइसेंस लेकर इसका निर्माण किया।

भारत ने 850 से अधिक मिग-21 विमान उड़ाए और इनकी 24 फाइटर स्क्वॉड्रन और 4 ट्रेनिंग यूनिट्स तैयार कीं। आने वाले वर्षों में भारत दुनिया का सबसे बड़ा मिग-21 ऑपरेटर बन गया।

MiG-21 Bison Retirement: बची हैं बस दो स्क्वॉड्रन

मिग-21 की आखिरी दो स्क्वॉड्रन नाल एयरबेस पर मौजूद हैं। इन्हें “नंबर प्लेटिंग” के जरिए फ्रीज कर दिया जाएगा और इन्हीं स्क्वॉड्रन नंबरों पर अब स्वदेशी तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमान शामिल होंगे। नंबर 3 स्क्वॉड्रन “कोबरा” और नंबर 23 स्क्वॉड्रन “पैंथर्स” की लेगेसी अब तेजस के साथ जुड़ जाएगी। इन दोनों स्क्वॉड्रन में लगभग 27-28 मिग ही मौजूद हैं।

तेजस की पहली डिलीवरी भी इन्हीं स्क्वॉड्रन में होगी। दिलचस्प बात यह है कि मिग-21 बाइसन का पहला अपग्रेड भी नंबर 3 स्क्वॉड्रन में ही शामिल हुआ था और अब तेजस मार्क-1A भी वहीं से अपनी उड़ान शुरू करेगा।

26 सितंबर को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित समारोह में वायुसेना के सभी रिटायर्ड और मौजूदा पायलटों को आमंत्रित किया गया है, जिन्होंने मिग-21 उड़ाया है। आसमान में आकाश गंगा डिस्प्ले टीम का प्रदर्शन होगा और मिग-21 बाइसन का अंतिम फ्लाइपास्ट आयोजित किया जाएगा। इसके बाद स्क्वॉड्रन की चाबी रक्षा मंत्री को सौंपी जाएगी और औपचारिक रूप से मिग-21 वायुसेना से विदा लेगा।

Samudra Pradakshina: इतिहास रचने निकली तीनों सेनाओं की 10 महिला अफसर, स्वदेशी नौका IASV त्रिवेणी से लगाएंगी दुनिया का चक्कर

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से एक ऐतिहासिक अभियान को हरी झंडी दिखाई। यह अभियान दुनिया का पहला ट्राई-सर्विसेज महिला नौकायन अभियान है, जिसे ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ नाम दिया गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ को वर्चुअल माध्यम से हरी झंडी दिखाई। इस अभियान पर 10 महिला सैन्य अधिकारी स्वदेशी नौका त्रिवेणी पर सवार होकर निकलीं हैं, जो अगले 9 महीनों में दुनिया की पूरी परिक्रमा करेंगी।

यह दुनिया का पहला ट्राई सर्विसेज (थल, जल और वायु सेना) महिला परिक्रमा नौकायन अभियान है। इससे पहले इसी वर्ष मई 2025 में “नाविका सागर परिक्रमा-II” अभियान भी पूरा हुआ, जिसमें दो बहादुर नौसेना अधिकारी लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ए ने डबल-हैंडेड मोड में दुनिया की परिक्रमा कर भारत का परचम लहराया।

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Samudra Pradakshina: नारी शक्ति और आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक

रक्षा मंत्री ने साउथ ब्लॉक से अपने संबोधन में कहा कि ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ केवल समुद्री यात्रा भर नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना और अनुशासन का अभियान है। उन्होंने कहा कि इस नौकायन यात्रा में 10 महिला अधिकारी नौ महीने तक समुद्र की लहरों से जूझते हुए दुनिया की परिक्रमा करेंगी। इस दौरान वे चुनौतियों का सामना करेंगी, लेकिन उनका दृढ़ निश्चय अंधकार को चीरते हुए विजय की ओर अग्रसर होगा। रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में इस अभियान को न केवल एक नौकायन यात्रा बल्कि “आध्यात्मिक साधना और अनुशासन की परख” बताया। उन्होंने कहा कि हमारी अधिकारी अनेक चुनौतियों का सामना करेंगी, लेकिन उनका दृढ़ संकल्प अंधेरे को चीरकर उजाला लेकर आएगा।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

इस यात्रा में 10 महिला अधिकारी स्वदेशी रूप से निर्मित भारतीय सेना नौकायन पोत त्रिवेणी (IASV Triveni) पर सवार होकर लगभग 26,000 समुद्री मील की दूरी तय करेंगी। यह पोत पुडुचेरी में बना 50 फुट लंबा यॉट है, जिसे आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बताया गया है।

Samudra Pradakshina: दो बार पार करेंगी भूमध्य रेखा

दल पूर्वी मार्ग से यात्रा करेगा और नौ महीने के दौरान भूमध्य रेखा (Equator) दो बार पार करनी होगी। दुनिया के तीन बड़े अंतरीपों लीउविन, हॉर्न और गुड होप का चक्कर लगाएंगी। यह यात्रा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा के बंदरगाहों को छूते हुए मई 2026 में मुंबई लौटेगी। इस दौरान अभियान दल अटलांटिक, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर सहित सभी बड़े महासागरों से गुजरेगा। सबसे कठिन चरण दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच दक्षिणी महासागर और ड्रेक पैसेज से गुजरना होगा, जहां विशाल लहरें, बर्फीली हवाएं और अप्रत्याशित तूफान नाविक कौशल की अंतिम परीक्षा माने जाते हैं।

इस अभियान के दौरान दल चार अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों फ्रेमेंटल (ऑस्ट्रेलिया), लिटलटन (न्यूजीलैंड), पोर्ट स्टेनली (कनाडा) और केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका) का दौरा करेगा। इन यात्राओं में भारतीय संस्कृति और सैन्य शक्ति का परिचय कराया जाएगा।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: अभियान दल की कमान है इनके हाथ

अभियान दल की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल अनुजा वरुडकर संभाल रही हैं, जबकि स्क्वाड्रन लीडर श्रद्धा पी राजू उप-अभियान नेता हैं। टीम में मेजर करमजीत कौर, मेजर ओमिता दलवी, कैप्टन प्राजक्ता पी निकम, कैप्टन दौली बुटोला, लेफ्टिनेंट कमांडर प्रियंका गुसाईं, विंग कमांडर विभा सिंह, स्क्वाड्रन लीडर अरुवी जयदेव और स्क्वाड्रन लीडर वैशाली भंडारी शामिल हैं।

इस दल ने पिछले तीन सालों में कठिन ट्रेनिंग ली है। शुरुआत छोटे जहाजों पर ऑफशोर अभियानों से हुई और फिर अक्टूबर 2024 में अधिग्रहित त्रिवेणी यॉट पर अभ्यास किया गया। इस वर्ष की शुरुआत में उन्होंने मुंबई से सेशेल्स तक एक अंतरराष्ट्रीय परीक्षण अभियान भी सफलतापूर्वक पूरा किया।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: भारत में बनी है IASV त्रिवेणी

पुडुचेरी में निर्मित 50 फुट लंबा पोत IASV त्रिवेणी में अत्याधुनिक नेविगेशन और सुरक्षा तकनीक लगाई गई है। यह अभियान वर्ल्ड सेलिंग स्पीड रिकॉर्ड काउंसिल के सभी मानकों का पालन करेगा। इसके अनुसार, सभी देशांतरों और भूमध्य रेखा को पार करना और बिना नहरों या मशीनरी की मदद के केवल पाल के सहारे 21,600 समुद्री मील से अधिक दूरी तय करनी होगी।

यात्रा के दौरान दल राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के साथ मिलकर वैज्ञानिक अनुसंधान भी करेगा। इसमें सूक्ष्म प्लास्टिक का अध्ययन, समुद्री जीवन का डॉक्यूमेंटेशन और महासागरों के स्वास्थ्य पर जागरूकता अभियान शामिल हैं।

नाविका सागर परिक्रमा (2017-18)

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह से नौका के जरिए पूरी दुनिया की यात्रा की गई हो। इससे पहले 2017 में भी भारतीय नौसेना ने नाविका सागर परिक्रमा मिशन शुरू किया था। यह मिशन पूरी तरह महिला दल द्वारा संचालित था और 1 अप्रैल 2017 को मुंबई से रवाना हुआ।

दल ने 254 दिनों में लगभग 29,000 नॉटिकल मील की दूरी तय की और 20 देशों के 14 बंदरगाहों पर रुका। इस यात्रा में लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी के नेतृत्व में छह महिला अधिकारियों ने आईएनएसवी तारिणी पर सवार होकर तूफानों, ऊंची लहरों और कठिन मौसम का सामना किया। यह पहली बार था जब भारतीय महिला अधिकारियों ने विश्व परिक्रमा पूरी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी वापसी पर स्वागत किया। इस मिशन को नारी शक्ति पुरस्कार और अन्य सम्मान भी मिले।

नाविका सागर परिक्रमा-II (2024-25)

वहीं, पहले मिशन की सफलता के बाद भारतीय नौसेना ने दिसंबर 2024 में नाविका सागर परिक्रमा-II की शुरुआत की। दो महिला नौसेना अधिकारियों लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ए ने INSV तारिणी दुनिया की परिक्रमा पूरी की। यह भारत का पहला सफल प्रयास था, जिसमें किसी दल ने डबल-हैंडेड मोड में परिक्रमा पूरी की।

यह यात्रा 2 अक्टूबर 2024 को गोवा से शुरू हुई थी और लगभग आठ महीने चली। इस दौरान INSV तारिणी ने 25,600 नॉटिकल मील की दूरी तय की। अभियान के दौरान दल ने चार बड़े अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों फ्रेमेंटल (ऑस्ट्रेलिया), लिटलटन (न्यूजीलैंड), पोर्ट स्टेनली (फॉकलैंड द्वीप) और केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) पर कॉल किया।

यह यात्रा बेहद कठिन रही। दक्षिणी महासागर और ड्रेक पैसेज जैसे खतरनाक जलक्षेत्र पार करते समय दल को तूफानों, खतरनाक ऊंची लहरों और बर्फीली हवाओं का सामना करना पड़ा। लंबी अवधि तक अकेलेपन और थकान से भी जूझना पड़ा। लेकिन इन दोनों अधिकारियों ने अपनी मानसिक और शारीरिक शक्ति से हर चुनौती को पार किया।

कैप्टन दिलीप डोंडे ने अकेले लगाया दुनिया का चक्कर

2009-10 में कैप्टन दिलीप डोंडे ने भारतीय नौसेना के लिए अकेले नाव से विश्व की परिक्रमा पूरी की। उनकी यह यात्रा न केवल भारत के समुद्री इतिहास में एक मील का पत्थर थी, बल्कि यह भी साबित करती थी कि भारतीय नाविक वैश्विक स्तर पर असाधारण साहस और कौशल का प्रदर्शन कर सकते हैं। डोंडे ने अपनी नौका, आईएनएसवी म्हादेई पर, चार महासागरों को पार करते हुए लगभग 21,600 समुद्री मील की दूरी तय की। इस दौरान उन्होंने तूफानों, तकनीकी चुनौतियों और अकेलेपन का सामना किया।

कमांडर अभिलाष टॉमी ने बनाया रिकॉर्ड

2012-13 में कमांडर अभिलाष टॉमी ने दुनिया की परिक्रमा करता हुए बड़ी उपलब्धि हासिल की। उन्होंने बिना रुके और बिना किसी बाहरी सहायता के विश्व की परिक्रमा पूरी की, जो भारत के लिए पहली बार था। टॉमी ने भी आईएनएसवी म्हादेई पर 150 दिनों में 23,000 समुद्री मील की यात्रा पूरी की। उनकी यह यात्रा न केवल तकनीकी रूप से कठिन थी, बल्कि इसमें मानसिक और शारीरिक चुनौतियां भी थीं।

1969 में सर रॉबिन नॉक्स-जॉनस्टन ने रचा इतिहास

1969 में सर रॉबिन नॉक्स-जॉनस्टन ने इतिहास रचते हुए दुनिया के पहले व्यक्ति बने जिन्होंने बिना रुके और बिना मदद के एकल नौकायन से विश्व की परिक्रमा पूरी की। उनकी नौका सुहैली पर उन्होंने 312 दिन में 30,000 समुद्री मील की यात्रा पूरी की। इस दौरान उन्होंने तूफानों, उपकरण खराबी और अकेलेपन जैसी चुनौतियों का सामना किया। यह उपलब्धि संडे टाइम्स गोल्डन ग्लोब रेस का हिस्सा थी, जिसमें वे एकमात्र प्रतिभागी थे जो दौड़ पूरी कर सके। उनकी इस साहसिक यात्रा ने समुद्री नौकायन में नया रिकॉर्ड बनाया और दुनियाभर में नाविकों को प्रेरित किया।