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Pakistan Nuclear Test: ट्रंप का दावा- पाकिस्तान और चीन कर रहे गुप्त परमाणु परीक्षण, भारत में चिंता बढ़ी

Pakistan Nuclear Test
Pakistan Nuclear Test: Trump alleges Pakistan and China conducting secret nuclear tests, raises alarm for India

Pakistan Nuclear Test: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि पाकिस्तान और चीन गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण कर रहे हैं। ट्रंप के इस बयान के बाद भारत में सुरक्षा हलकों में हलचल मच गई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका भी अब परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करेगा क्योंकि कई देश छिपकर परीक्षण कर रहे हैं।

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ट्रंप ने यह बयान सीबीएस न्यूज के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘60 मिनट्स’ में दिए गए एक इंटरव्यू में दिया। इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जहाँ अमेरिका पिछले तीन दशकों से परमाणु परीक्षण नहीं कर रहा है, वहीं पाकिस्तान, चीन, रूस और उत्तर कोरिया भूमिगत परीक्षण कर रहे हैं ताकि दुनिया को इसकी जानकारी न हो।

Pakistan Nuclear Test: ट्रंप बोले– पाकिस्तान कर रहा है भूमिगत परीक्षण

ट्रंप ने कहा, “हम भी अब परमाणु परीक्षण करेंगे क्योंकि बाकी देश कर रहे हैं। निश्चित रूप से उत्तर कोरिया कर रहा है, और पाकिस्तान भी। वे भूमिगत परीक्षण करते हैं ताकि किसी को पता न चले। आपको बस धरती में हल्का कंपन महसूस होता है।” यह पहली बार है जब किसी मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान पर गुप्त परमाणु परीक्षण करने का सीधा आरोप लगाया है।

ट्रंप ने कहा कि इन परीक्षणों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं होता, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणाली से बचने के लिए दूरदराज इलाकों में किए जाते हैं। उनके इस बयान को उस आदेश से जोड़ा जा रहा है जिसमें उन्होंने अमेरिकी सेना को 33 साल बाद फिर से परमाणु परीक्षण शुरू करने की मंजूरी दी है।

Pakistan Nuclear Test: भारत के लिए दो मोर्चों पर चुनौती

भारत के संदर्भ में यह बयान काफी चिंता पैदा करने वाला है, क्योंकि भारत के पाकिस्तान और चीन दोनों से तनावपूर्ण संबंध हैं। अगर दोनों देश वाकई परमाणु हथियारों का परीक्षण कर रहे हैं, तो भारत के सामने दो मोर्चों पर खतरा खड़ा हो सकता है।

ट्रंप ने इंटरव्यू के दौरान भारत-पाकिस्तान के मई 2025 में हुए संघर्ष का भी उल्लेख किया। उन्होंने फिर से दावा किया कि भारत और पाकिस्तान उस समय परमाणु युद्ध के बेहद करीब पहुंच गए थे और उन्होंने व्यक्तिगत हस्तक्षेप से इस संकट को टाल दिया।

ट्रंप ने कहा, “भारत पाकिस्तान के साथ परमाणु युद्ध के कगार पर था। अगर मैं बीच में न आता, तो लाखों लोग मारे जाते।” उन्होंने दावा किया कि उन्होंने दोनों देशों को चेतावनी दी थी कि अगर वे युद्ध नहीं रोकते, तो अमेरिका उनके साथ व्यापार बंद कर देगा। हालांकि, भारत ने ट्रंप के इस दावे को कई बार खारिज किया है।

दुनिया में परमाणु परीक्षणों की निगरानी सीटीबीटी (कॉम्प्रीहेंसिव न्यूक्लियर-टेस्ट-बैन ट्रीटी) के तहत की जाती है, जो भूकंपीय तरंगों के माध्यम से भूमिगत विस्फोटों का पता लगाती है। लेकिन ट्रंप का कहना है कि कुछ देश इतने गुप्त तरीके से परीक्षण करते हैं कि यह प्रणाली भी उन्हें पकड़ नहीं पाती।

पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से 1998 में चगाई परीक्षण (Chagai Tests) के बाद कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों में उसके परमाणु कार्यक्रम के विस्तार का जिक्र किया गया है। वहीं, चीन ने भी पिछले कुछ वर्षों में अपने परमाणु बंकर और परीक्षण स्थलों का आधुनिकीकरण किया है।

ट्रंप का दावा तथ्यों से कोसों दूर

अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परमाणु परीक्षण वाले बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ट्रंप का दावा तथ्यों से कोसों दूर है और अमेरिका पहले से ही गैर-विस्फोटक परीक्षण कर रहा है।

चेलानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि रूस ने आखिरी बार 1990, चीन ने 1996, उत्तर कोरिया ने 2017 और पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया था। ट्रंप ने इन देशों का नाम लेते हुए कहा था कि अमेरिका भी “बराबर आधार” पर परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करेगा।

डॉ. चेलानी ने कहा कि ट्रंप अक्सर तथ्यों की अनदेखी करते हैं। उन्होंने बताया कि ट्रंप के इस बयान को उनके ही ऊर्जा सचिव ने खारिज कर दिया है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि अमेरिका जो परीक्षण करेगा, वे “नॉन-क्रिटिकल एक्सप्लोजन होंगे, जिन्हें तकनीकी रूप से सब-क्रिटिकल टेस्ट कहा जाता है।

इन परीक्षणों में परमाणु विस्फोट नहीं होता, बल्कि परमाणु सामग्री के व्यवहार को समझने के लिए सीमित वैज्ञानिक प्रयोग किए जाते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुराने परमाणु हथियार समय के साथ सुरक्षित और भरोसेमंद बने रहें।

1992 से अमेरिका कर रहा है सब-क्रिटिकल परीक्षण

वास्तविकता यह है कि अमेरिका 1992 में परमाणु विस्फोटक परीक्षणों को रोक चुका है। तब से वह लगातार सब-क्रिटिकल न्यूक्लियर टेस्ट कर रहा है। इन परीक्षणों में विस्फोट नहीं होता, बल्कि विशेष परिस्थितियों में परमाणु सामग्री की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाता है।

डॉ. चेलानी ने कहा कि ट्रंप का यह बयान सिर्फ एक खाली दिखावा था, जिसका मकसद अपनी “मजबूत छवि” पेश करना था। उन्होंने लिखा कि “अमेरिका दशकों से यही परीक्षण कर रहा है, इसलिए ट्रंप का आदेश नया कदम नहीं बल्कि पुराना अभ्यास दोहराने जैसा है।”

भारत की नीति “नो-फर्स्ट-यूज”

भारत ने 1998 में पोखरण-2 परीक्षणों के बाद “नो-फर्स्ट-यूज” नीति अपनाई थी, यानी भारत पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा। भारत अब तक कोई नया परीक्षण नहीं कर चुका है।

सीपरी (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट) की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास फिलहाल लगभग 180 परमाणु हथियार हैं। पाकिस्तान के पास करीब 170 और चीन के पास लगभग 600 परमाणु हथियार हैं। पेंटागन की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक चीन 2030 तक 1,000 से अधिक ऑपरेशनल हथियार तैनात कर सकता है।

भारत की चिंता इस बात को लेकर है कि अगर उसके दोनों पड़ोसी गुप्त रूप से परीक्षण कर रहे हैं, तो यह उसके लिए सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है। भारत ने सीटीबीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं, लेकिन परीक्षण की स्थिति में अमेरिका के साथ 2005 के न्यूक्लियर डील पर असर पड़ सकता है।

ट्रंप के इस बयान ने दक्षिण एशिया में परमाणु प्रतिस्पर्धा को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। भारत, पाकिस्तान और चीन पहले से ही मिसाइल और परमाणु तकनीक के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक, भारत ने कई कैनिस्टराइज्ड मिसाइलें डेवलप की हैं, जो एक साथ कई हथियार ले जा सकती हैं। वहीं पाकिस्तान ने शाहीन-तीन और अब्दाली जैसी मिसाइलों का परीक्षण किया है। चीन एफओबीएस यानी फ्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम जैसी नई तकनीक पर काम कर रहा है, जो लंबी दूरी से परमाणु हमले की क्षमता रखती है।

ट्रंप के इस दावे ने वैज्ञानिक और राजनीतिक दोनों हलकों में बहस छेड़ दी है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की आंतरिक राजनीति से जुड़ा है और इसका मकसद रक्षा नीति में बदलाव को सही ठहराना है। वहीं, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर संकेत है।

भारत में रक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि यह दावा “जागने की घंटी” है, क्योंकि अगर पाकिस्तान और चीन वास्तव में गुप्त परीक्षण कर रहे हैं, तो इससे भारत की सुरक्षा रणनीति पर असर पड़ सकता है।

Exercise Poorvi Prachand Prahar: अरुणाचल प्रदेश में चीन से सटी सीमा पर तीनों सेनाएं करेंगी एक्सरसाइज, मेचुका की पहाड़ियों में ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ शुरू

Exercise Poorvi Prachand Prahar
Exercise Poorvi Prachand Prahar

Exercise Poorvi Prachand Prahar: एक तरफ जहां पश्चिमी मोर्चे पर ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज त्रिशूल चल रही है, तो वहीं पूर्वी मोर्चे पर चीन से सटे उत्तरी अरुणाचल प्रदेश की दुर्गम पहाड़ियों में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर एक बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास करने जा रही हैं। इस अभ्यास का नाम ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ रखा गया है। यह एक्सरसाइज ईस्टर्न कमांड आयोजित कर रही है। यह अभ्यास नवंबर 2025 से शुरू हुआ है और इसका उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाना और ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन की तैयारी को परखना है।

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यह अभ्यास मेचुका क्षेत्र में आयोजित किया जा रहा है, जो चीन की सीमा के पास बेहद संवेदनशील इलाका है। इस अभ्यास में सेना की स्पेशल फोर्सेस, ड्रोन सिस्टम, सटीक मारक हथियार और नेटवर्क-आधारित कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम का प्रयोग किया जा रहा है। यह अभ्यास 15 नवंबर तक चलेगा।

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ का मुख्य उद्देश्य थलसेना, वायुसेना और नौसेना के बीच तालमेल को मजबूत करना है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तीनों सेनाएं एक साथ संयुक्त रूप से कार्रवाई कर सकें। इस संयुक्त युद्धाभ्यास में जमीनी, हवाई और समुद्री मोर्चों पर एक साथ अभियान चलाने की क्षमता को परखा जा रहा है।

अभ्यास के दौरान ऊंचे पहाड़ों और कठिन इलाकों में ऑपरेशन किए जाएंगे। ड्रोन सर्विलांस के जरिए दुश्मन की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाएगी और सटीक स्ट्राइक सिस्टम के जरिए से टारगेट को निशाना बनाने का अभ्यास होगा। स्पेशल फोर्सेज के जवान भी ऊंचाई वाले इलाकों में छिपकर ऑपरेशन करने की रणनीतियों का प्रदर्शन करेंगे।

अभ्यास में भारतीय सेनाएं नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर का भी अभ्यास करेंगी। भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना एक साझा कमांड सेंटर से जुड़े रहेंगे। यह सिस्टम सुनिश्चित करेगा कि हर कार्रवाई रियल-टाइम में मॉनिटर और नियंत्रित की जा सके।

अभ्यास में ड्रोन सिस्टम, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कमांड मॉड्यूल और सटीक हथियार प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाएगा। यह अभ्यास दिखाएगा कि सभी तकनीकों के जरिए भारतीय सेनाएं आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

मेचुका का इलाका समुद्र तल से लगभग 6,000 फीट की ऊंचाई पर है। यहां मौसम बेहद ठंडा रहता है औऱ इलाका बेहद दुर्गम है। ऐसे में तीनों सेनाओं का संयुक्त अभ्यास यह दिखाएगा है कि भारतीय सेनाएं हर भौगोलिक परिस्थिति में अभियान चलाने में सक्षम हैं।

रक्षा जनसंपर्क अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र रावत ने बताया कि ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ अभ्यास भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि इस अभ्यास का उद्देश्य सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाना, कमांड-कंट्रोल सिस्टम के असर की जांच करना और युद्ध के हालात तुरंत प्रतिक्रिया देना है।

रावत ने कहा कि इस अभ्यास की खास बात यह है कि यह पूरी तरह से ऊंचाई वाले इलाकों में आयोजित किया जा रहा है और इसमें स्पेशल फोर्सेज, ड्रोन सिस्टम और सटीक हथियारों का एक साथ इस्तेमाल हो रहा है।

इससे पहले भारतीय सेनाएं ‘भाला प्रहार’ (2023) और ‘पूर्वी प्रहार’ (2024) जैसे संयुक्त अभ्यास कर चुकी हैं। ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ उसी सीरीज का अगला कदम है, जिसका उद्देश्य तीनों सेनाओं की संयुक्त युद्धक क्षमता को और मजबूत बनाना है।

Indian Army Rescues Bear in Siachen: कनस्तर में फंस गया था भालू के बच्चे का सिर, सियाचिन में भारतीय सेना ने ऐसे बचाया, देखें वीडियो

Indian Army Rescues Bear in Siachen
Indian Army Rescues Bear in Siachen

Indian Army Rescues Bear in Siachen: सियाचिन ग्लेशियर में तैनात भारतीय सेना के जवानों ने एक ऐसा काम किया, जिसने पूरे देश का दिल जीत लिया। यहां बर्फ से ढके इलाकों में सेना के जवानों ने एक हिमालयी भूरे भालू के बच्चे को बचाकर इंसानियत की मिसाल पेश की। इस छोटे भालू का सिर टिन के कनस्तर में फंस गया था, जिससे वह कई दिनों तक भूखा-प्यासा बर्फीले इलाके में भटकता रहा। जब सेना के जवानों ने उसे देखा, तो उन्होंने तुरंत रेस्क्यू करने का फैसला लिया।

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सेना की इस पोस्ट पर तैनात जवानों ने बताया कि यह भालू और उसकी मां अक्सर उनकी पोस्ट के पास आते थे। जवान उन्हें खाना भी दिया करते थे। लेकिन कुछ दिनों से यह भालू दिखाई नहीं दे रहा था। एक दिन गश्त के दौरान एक जवान ने देखा कि छोटा भालू कनस्तर में सिर फंसाए इधर-उधर भाग रहा है। वह न तो कुछ देख पा रहा था और न ही ठीक से सांस ले पा रहा था। यह देखकर जवानों ने तुरंत कार्रवाई की और अपने अधिकारी को इसकी जानकारी दी। हालांकि ये वीडियो कब का है इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। इंटरनेट पर रिवर्स सर्च में ये वीडियो पिछले साल दिसंबर का बताया जा रहा है।

Indian Army Rescues Bear in Siachen: कंपनी कमांडर ने खुद की पहल

सेना की उस पोस्ट के कंपनी कमांडर ने बिना देर किए छह जवानों के साथ खुद रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। बर्फ के क्रेवास से बचाते हुए रस्सियों की मदद से भालू को धीरे-धीरे सुरक्षित जगह लाया गया। यह इलाका कर्निस कहलाता है, जो बर्फ का झूलता हुआ हिस्सा होता है और किसी भी वक्त टूट सकता है। कंपनी कमांडर ने खतरा उठाते हुए घुटनों के बल रेंगकर भालू के पास पहुंचे और उसे धीरे से खींचकर सुरक्षित स्थान पर लाए। इसके बाद टिन के कनस्तर को सावधानी से काटकर हटाया गया ताकि भालू को कोई चोट न लगे।

इस पूरी प्रक्रिया में लगभग सर्जरी जैसी सटीकता बरती गई ताकि उसके कान या गर्दन को कोई नुकसान न पहुंचे। कनस्तर हटाने के बाद जवानों ने उसे खाना और पानी दिया। जब भालू को छोड़ा गया, तो वह कुछ घंटों तक वहीं रुककर जवानों को देखता रहा, मानो धन्यवाद कह रहा हो।

Indian Army Rescues Bear in Siachen: ‘बहादुर’ बना पोस्ट का हिस्सा

रेस्क्यू के बाद जवानों ने इस भालू का नाम अपनी कंपनी के नाम पर “बहादुर” रखा। अब यह ‘बहादुर’ समय-समय पर उस पोस्ट पर लौटकर आता है। जवान बताते हैं कि जब भी कोई उसका नाम पुकारता है, तो वह कहीं से अचानक दिखाई देता है। सैनिक उसे खाना देते हैं और पोस्ट के सैनिक कुत्तों को भी बांधकर रखते हैं ताकि ‘बहादुर’ बिना डर वहां आ सके।

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा और सबसे ठंडा युद्धक्षेत्र है, जहां तापमान कई बार माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। ऐसे कठिन हालात में भी भारतीय सैनिक न केवल देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, बल्कि इंसानियत और करुणा का भी उदाहरण पेश करते हैं।

इस घटना को सेना के एक अधिकारी (X/@mgnayak5) ने सोशल मीडिया पर साझा किया। उन्होंने लिखा, “यह भालू और उसकी मां पहले रात में आते थे। धीरे-धीरे उनका हम पर भरोसा बढ़ा और वे दिन में भी आने लगे। एक दिन जब भालू दिखाई नहीं दिया, तो हमें चिंता हुई। बाद में पता चला कि उसका सिर कनस्तर में फंसा है। हमने उसे बचाया, और अब वह हमारी पोस्ट का हिस्सा बन गया है।”

जैसे ही यह कहानी सोशल मीडिया पर सामने आई, लोगों ने भारतीय सेना की सराहना की। कई यूजर्स ने इसे “दिल को छू लेने वाली कहानी” बताया। लोगों ने लिखा कि भारतीय सैनिक न केवल सीमाओं की रक्षा करते हैं, बल्कि वे हर जीव के प्रति संवेदनशील हैं।

यह घटना साबित करती है कि भारतीय सेना सिर्फ युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि मानवता के हर मोर्चे पर भी सबसे आगे है। सियाचिन जैसी कठिन जगह पर तैनात ये जवान देश की सुरक्षा के साथ-साथ प्रकृति और जीवों के प्रति करुणा का असली उदाहरण हैं।

Pakistan Navy Chief Dhaka Visit: 1971 के बाद बंगाल में खाड़ी में दिखेगी पाकिस्तानी नौसेना? जनरल मिर्जा के बाद ढाका दौरे पर पाक नेवी चीफ

Pakistan Navy Chief Dhaka Visit
Pakistan Navy Chief Dhaka Visit

Pakistan Navy Chief Dhaka Visit: पाकिस्तानी सेना के जनरल साहिर शमशाद मिर्जा के बाद अब पाकिस्तानी नौसेना प्रमुख एडमिरल नवेद अशरफ 8 नवंबर से चार दिनों के लिए बांग्लादेश की राजधानी ढाका का दौरा करने जा रहे हैं। जहां वे बांग्लादेश आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज-जमान, नेवी चीफ एडमिरल मोहम्मद नाजमुल हसन, और एयर फोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल हसन महमूद खान से मिलेंगे।

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यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब पाकिस्तान के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमैन जनरल साहिर शमशाद मिर्जा ने हाल ही में ढाका में बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस से मुलाकात की थी। माना जा रहा है कि एडमिरल अशरफ का यह दौरा पाकिस्तान और बांग्लादेश नेवी के बीच जॉइंट एक्सरसाइज को लेकर किया जा रहा है।

इस दौरे के दौरान यह भी संभावना है कि पाकिस्तान नौसेना एक युद्धपोत को बंगाल की खाड़ी में भेज सकती है। यह 1971 के बाद पहली बार होगा जब कोई पाकिस्तानी नौसैनिक जहाज बंगाल की खाड़ी में दिखाई देगा।

Pakistan Navy Chief Dhaka Visit: लगातार हो रही हैं मुलाकातें

पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच सैन्य संबंधों में तेजी आई है। अगस्त 2025 में पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री भी ढाका दौरे पर गए थे। वहीं फरवरी 2025 में बांग्लादेश नौसेना प्रमुख ने पाकिस्तान का दौरा किया था, जहां अमन-2025 नेवल एक्सरसाइज को लेकर बात हुई थी।

इन मुलाकातों से यह संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देशों के बीच संबंध अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि रक्षा और सुरक्षा के स्तर पर भी गहरा रहे हैं। इसके अलावा दोनों देशों के अधिकारी और सेना के प्रतिनिधि जॉइंट ट्रेनिंग प्रोग्राम और रणनीतिक चर्चाओं में भी हिस्सा ले रहे हैं।

1971 के युद्ध की पृष्ठभूमि के बावजूद रिश्तों में नया मोड़

1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) ने मुक्ति बाहिनी के नेतृत्व में स्वतंत्रता प्राप्त की थी। उस युद्ध में भारतीय सेनाओं ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता में अहम भूमिका निभाई थी और 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी के सामने आत्मसमर्पण किया था।

आज, 54 वर्षों बाद, वही बांग्लादेश अब पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव बांग्लादेश में शेख हसीना के राजनीतिक सत्ता परिवर्तन और नई विदेश नीति के झुकाव का परिणाम है।

ढाका और रावलपिंडी में एक-दूसरे के प्रतिनिधि

दिलचस्प बात यह है कि जब एडमिरल नवेद अशरफ ढाका में होंगे, उसी समय बांग्लादेश सेना का एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान के रावलपिंडी में होगा। यह प्रतिनिधिमंडल पहली बार आयोजित होने वाली आर्मी स्टाफ टॉक्स में हिस्सा लेगा।
इसके अलावा, दोनों देशों की सेनाएं 2026 में पहली जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज आयोजित करने की तैयारी में हैं।

बांग्लादेश और पाकिस्तान की नजदीकी पर भारत की नजर

भारत की नजर इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह दौरा भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर डाल सकता है, खासकर जब दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा और आतंकवाद पर सहयोग की अहम भूमिका है।

कुछ भारतीय विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान अब दक्षिण एशिया में नई कूटनीतिक रणनीति अपना रहा है, जिसमें बांग्लादेश को केंद्र में रखकर भारत की सीमाओं के इर्द-गिर्द प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि भारत ने इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में इसे “सिक्योरिटी अलर्ट” और “डिप्लोमैटिक टेंशन” के रूप में देखा जा रहा है।

वहीं इस दौरे से यह भी संकेत मिल रहे कि दक्षिण एशिया में सैन्य समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। जहां पहले पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच दशकों तक कोई सैन्य संपर्क नहीं था, वहीं अब दोनों देशों की सेनाओं के बीच बार-बार मुलाकातें और संयुक्त योजनाएं बढ़ रही हैं।

यह सब ऐसे समय पर हो रहा है जब भारत, अमेरिका और जापान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग को मजबूत कर रहे हैं और चीन भी क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ा रहा है।

MALE RPAS: 30 हजार करोड़ रुपये के इस ऑर्डर के लिए भारतीय कंपनियों में मची होड़, विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी की चल रही रेस

MALE RPAS: Drishti-10 Drone
Drishti-10 Drone

MALE RPAS: पांच अगस्त को रक्षा मंत्रालय की ने डिफेंस एक्विजेशन काउंसिल (डीएसी) ने तीनों सेनाओं के लिए 87 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस यानी मेल रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम के लिए 30 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर को मंजूरी दी थी। जिसके बाद 30 हजार करोड़ रुपये के इस मेगा ऑर्डर के लिए भारतीय कंपनियों ने कमर कस ली है। तमाम भारतीय कंपनियां इस ऑर्डर की शर्तों को पूरा करने के लिए विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी कर रही हैं। इन ड्रोनों का इस्तेमाल निगरानी और हमले दोनों के लिए किया जाएगा।

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MALE RPAS: क्या होंते हैं मेल ड्रोन

मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम ऐसे ड्रोन होते हैं जो मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकते हैं और ये कई तरह के पेलोड व हथियार ले जाने में सक्षम होते हैं। इनका उपयोग 24×7 सर्विलांस, प्रिसिजन स्ट्राइक और कोवर्ट ऑपरेशंस में किया जा सकता है। आधुनिक युद्ध में ये ड्रोन “आई-इन-द-स्काई” की भूमिका निभाते हैं और जमीनी व समुद्री ऑपरेशनों को रियल-टाइम खुफिया और स्ट्राइक सपोर्ट देते हैं। इन ड्रोन की तैनाती से सीमाओँ की निगरानी में मजबूती आएगी और यह नेटवर्क-सेन्ट्रिक बैटल सिस्टम में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

इन ड्रोन्स की सबसे बड़ी खासियत है कि ये लगातार 24 से 30 घंटे तक उड़ान भर सकते हैं। इनकी ऑपरेटिंग ऊंचाई 30,000 से 35,000 फीट तक होती है, जिससे ये दुश्मन की नजरों से दूर रहकर भी निगरानी और टोही कर सकते हैं। साथ ही ये ड्रोन एक ही उड़ान में 1,000 से 2,000 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकते हैं। इसका मतलब है कि वे एक ही मिशन में बड़े क्षेत्र जैसे लद्दाख, अरुणाचल या अरब सागर तक की निगरानी कर सकते हैं।

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इसके अलावा ये न सिर्फ निगरानी बल्कि हमले में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनमें मल्टी-स्पेक्ट्रल सेंसर, हाई-रेजोल्यूशन कैमरे, रडार सिस्टम और प्रिसिजन स्ट्राइक वेपन्स लगाए जा सकते हैं। ये एमक्यू-9 प्रीडेटर की तरह मिसाइल और लाइट बम ले जा सकते हैं, जिससे ये सटीक निशाने पर हमला कर सकते हैं।

MALE RPAS: पेश कर रहीं मॉडिफाइड ड्रोन

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, भारतीय सेनाओं के लिए कुल 87 मेल यूएवी की खरीद की जाएगी। इन टेंडरों को भारतीय कंपनियों के लिए ही खोला जाएगा ताकि देश में एक मजबूत यूएवी मैन्युफैक्चरिंग इकोससिस्टम तैयार हो सके। लेकिन चुनौती यह है कि विदेशी कंपनियां पहले से ही तैयार प्रोडक्ट्स को भारतीय जरूरतों के हिसाब से मॉडिफाइड करके पेश कर रही हैं, जबकि भारतीय कंपनियों को कम समय में स्वदेशी डिजाइन तैयार करना होगा।

MALE RPAS: इजरायल और अमेरिकी कंपनियां दौड़ में

इस सौदे के लिए कई विदेशी कंपनियां ने भारतीय कंपनियों के साथ करार किया है। इनमें इजरायल की एल्बिट सिस्टम्स और अमेरिका की जनरल एटोमिक्स प्रमुख हैं। ये कंपनियां ऐसे ड्रोन पेश करेंगी, जो पहले से ही अन्य देशों की सेनाओं में इस्तेमाल हो रहे हैं। इन्हें भारतीय जरूरतों के मुताबिक मॉडिफाइड किया जाएगा, जबकि भारतीय कंपनियां देश में प्रोडक्शन फैसिलिटी तैयार करेंगी और कम से कम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल करेंगी।

वहीं, अगर कोई भारतीय कंपनी तय समय सीमा में छह महीने के अंदर ट्रायल के लिए पूरी तरह से स्वदेशी ड्रोन पेश नहीं कर पाती है, तो रक्षा मंत्रालय विदेशी डिजाइन वाले ड्रोन्स को भी शामिल कर सकता है। माना जा रहा है कि अगले छह महीनों में ट्रायल शुरू हो जाएंगे।

सूत्रों का कहना है कि इनकी डिलीवरी 2027 से 2029 के बीच शुरू होने की संभावना है। सेना को सबसे ज्यादा यूनिट्स मिलेंगी, जबकि नौसेना और वायुसेना को क्रमशः निगरानी और स्ट्राइक ऑपरेशनों के लिए तैनात किया जाएगा।

MALE RPAS: दो कंपनियों को मिलेगा फायदा

रक्षा मंत्रालय ने यह भी तय किया है कि इस इतने बड़े कॉन्ट्रैक्ट का फायदा केवल एक नहीं, बल्कि दो कंपनियों को मिलेगा। 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक के इस सौदे को दो हिस्सों में बांटा जाएगा। सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी को 64 फीसदी और दूसरे स्थान पर रहने वाली कंपनी को 36 फीसदी ऑर्डर दिया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि भारत में दो ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग लाइन्स तैयार करना है ताकि जरूरत पड़ने पर उत्पादन तेजी से बढ़ाया जा सके। बिडर कंपनियों को 10 साल का मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट भी दिया जाएगा।

MALE RPAS: भारत में बनेगा इंजन और एयरोस्ट्रक्चर

टेंडर की शर्तों के मुताबिक, कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ड्रोन का मुख्य ढांचा यानी एयरोस्ट्रक्चर भारत में ही तैयार हो। इंजन भी देश में असेंबल और टेस्ट किया जाएगा। साथ ही इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड और सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम के कई घटक भारत में ही बनने चाहिए। इन नियमों का उद्देश्य सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाना और भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को आत्मनिर्भर करना है। इसके अलावा, नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम भी भारतीय तकनीक से इंटीग्रेट किए जाएंगे।

MALE RPAS: मेल ड्रोन परियोजना से जुड़ी प्रमुख भारतीय कंपनियां

इस टेंडर के लिए भारत की कई बड़ी कंपनियों ने विदेशी साझेदारों के साथ करार किए हैं। लार्सन एंड टर्बो ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटोमिक्स के साथ समझौता किया है, जिसके तहत एमक्यू-सीरीज यूएवी भारत में बनााए जाएंगे। यह समझौता पिछले महीने अक्टूबर की आखिर में हुआ। माना दा रहा है कि लार्सन एंड टर्बो प्रमुख बोली लगाने वाली कंपनी होगी।

वहीं, भारत फोर्ज ने फ्रांस की तर्गिस गेलार्ड कंपनी के साथ आरोक ड्रोन बनाने के लिए करार किया है। यह एक घातक मेल यूएवी होगा, जो भारतीय सेना की जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा रहा है।

अदाणी डिफेंस ने इजरायली एल्बिट सिस्टम्स के साथ मिलकर दृष्टि 10 स्टारलाइनर ड्रोन बनाया है, जो हर्मेस 900 प्लेटफॉर्म पर बेस्ड है। यह पहले से भारतीय सेना और नौसेना में शामिल हो चुका है और इसमें लगभग 70 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। वहीं, टाटा एडवांस सिस्टम्स भी इसमें रूचि दिखा रही है और उसने पहला जेट पॉवर्ड मेल यूएवी बनाया है। हालांकि टाटा एडवांस सिस्टम्स ने स्वतंत्र रूप से भी मेल यूएवी तैयार किया है, लेकिन इसमें उसने कई अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की सहयोग भी लिया है।

Pakistan navy drills: एक्सरसाइज ‘त्रिशूल’ से उड़ी पाकिस्तान की नींद, जहां भारतीय सेनाएं कर रहीं अभ्यास, वहीं पाक नेवी भी करेगी ड्रिल

Pakistan navy drills

Pakistan navy drills: भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर अरब सागर में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा से राजस्थान और गुजरात के सटे इलाकों में चल रही तीनों सेनाओं की एक्सरसाइज त्रिशूल के बाद पाकिस्तान ने भी नेवी ड्रिल करने का एलान किया है। यह ड्रिल 2 नवंबर से 5 नवंबर तक चलेगी। खास बात यह है कि यह ड्रिल ऐसे समुद्री इलाके में की जा रही है, जिसके पास पहले से ही एक्सरसाइज त्रिशूल भी चल रही है।

Exercise Trishul: 12 दिन तक चैन की नींद नहीं सो पाएगा पाकिस्तान, भारत ने सर क्रीक के पास शुरू की ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज

भारत ने 30 अक्टूबर से पश्चिमी सेक्टर राजस्थान, गुजरात और अरब सागर में ‘त्रिशूल’ नाम से संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया था। इसमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना हिस्सा ले रही हैं। पाकिस्तान की तरफ से इस एलान के बाद दोनों देशों की नौसेनाओं और एयर ट्रैफिक एजेंसियों ने सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है, ताकि किसी दुर्घटना या टकराव की स्थिति से बचा जा सके।

Pakistan navy drills: 2 से 5 नवंबर तक पाक नेवी ड्रिल

पाकिस्तान के हाइड्रोग्राफर विभाग ने शनिवार को एक शिपिंग वार्निंग जारी की। इसके अनुसार, पाकिस्तान की नौसेना 2 से 5 नवंबर तक उत्तरी अरब सागर में लाइव फायरिंग अभ्यास करेगी। इस क्षेत्र का आकार लगभग 6,000 वर्ग किलोमीटर है। इसमें सतह और पनडुब्बी दोनों तरह के हथियारों से अभ्यास होगा। नोटिस में कहा गया कि “समुद्री जहाज इस इलाके से दूर रहें।”

यह वही इलाका है जहां भारत की तीनों सेनाएं मिलकर बड़े स्तर ‘त्रिशूल’ अभ्यास कर रही हैं। भारत ने 30 अक्टूबर से पश्चिमी सेक्टर, यानी राजस्थान, गुजरात और अरब सागर में यह एक्सरसाइज शुरू की थी।

Pakistan navy drills: दोनों इलाकों में ज्योग्राफिकल ओवरलैप

जियो-इंटेलिजेंस रिसर्चर डेमियन साइमोन ने एक्स पर लिखा कि पाकिस्तान ने उसी क्षेत्र के लिए शिपिंग वॉर्निंग जारी की है, जहां भारत ने पहले से एयरस्पेस रिजर्व किया हुआ है। उन्होंने कहा कि “हालांकि दोनों इलाकों में ज्योग्राफिकल ओवरलैप है, लेकिन दोनों देशों के बीच कॉर्डिनेशन की संभावना अधिक है, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।”

उन्होंने कहा कि इस बात की बहुत संभावना है कि पाकिस्तान यह नेवल ड्रिल एक्सक्लूसिव इकॉनमिक जोन में करे, जो 200 समुद्री मील तक फैला होता है और जहां तटवर्ती देश को प्राकृतिक संसाधनों पर विशेष अधिकार होते हैं। वहीं, भारत अपने एयर स्पेस में इस एक्सरसाइज को अंजाम दे।

सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि दोनों देशों की नौसेनाएं अपने अभ्यास क्षेत्रों की जानकारी पहले से साझा करती हैं, ताकि गलतफहमी या आकस्मिक टकराव से बचा जा सके।

Pakistan navy drills: ‘त्रिशूल’ में 25 वॉरशिप

‘त्रिशूल’ को भारत की अब तक की सबसे बड़ी ट्राई-सर्विसेज एक्सरसाइज माना जा रहा है। इसमें लगभग 25 वॉरशिप, 40 विमान, टैंक, आर्टिलरी गन, मिसाइल सिस्टम और हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे हैं। यह अभ्यास ऑपरेशन सिंदूर के छह महीने बाद हो रहा है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, इस बार का अभ्यास भारत की ऑपरेशनल रेडीनेस और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को परखने के लिए किया जा रहा है।

भारतीय नौसेना के ऑपरेशन डॉयरेक्टर वाइस एडमिरल एएन प्रमोद ने बताया कि “इस अभ्यास का मकसद तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाना और समुद्र, वायु और थल क्षेत्रों में संयुक्त संचालन की क्षमता को परखना है।” उन्होंने कहा कि “इस दौरान एंफीबियस ऑपरेशंस का भी अभ्यास किया जाएगा, जिसके लिए आईएनएस जलश्व और दूसरे नेवी प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।” उन्होंने आगे बताया कि इस अभ्यास में साइबर और स्पेस डोमेन को भी शामिल किया गया है।

Pakistan navy drills: सर क्रीक के पास अभ्यास

भारत के ‘त्रिशूल’ अभ्यास का हिस्सा सर क्रीक तक फैला हुआ है। यह 96 किलोमीटर लंबा समुद्री इलाका गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रांत को अलग करता है। दोनों देशों के बीच यह क्षेत्र कई वर्षों से विवाद की वजह रहा है। 2 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सिर क्रीक में पाकिस्तान की गतिविधियों को लेकर सख्त चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर पाकिस्तान ने किसी तरह की शरारत की तो जवाब “इतना कड़ा होगा कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएंगे।”

पाकिस्तान हाल के महीनों में सिर क्रीक और कराची के पास अपने नौसैनिक ठिकानों को मजबूत कर रहा है। इसने क्षेत्र में नए रडार स्टेशन और फॉरवर्ड पोस्ट भी एक्टिव किए हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी निगरानी

मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारतीय नौसेना ने अरब सागर में अपनी निगरानी बढ़ा दी है। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में आतंकी और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। तब से भारत की वेस्टर्न नेवल कमांड और एयरफोर्स की साउथ वेस्टर्न कमांड मिलकर समुद्री सीमा की लगातार निगरानी कर रही हैं। वहीं, भारतीय खुफिया एजेंसियां भी इस समय अरब सागर क्षेत्र में होने वाली सभी सैन्य गतिविधियों पर करीब से नजर रख रही हैं।

AQIS Terror India: दक्षिण भारत में बड़े हमले की साजिश रह रहा है अल-कायदा! ऑनलाइन रैडिकलाइजेशन को बना रहा हथियार

AQIS Terror India
AQIS lone wolf call: Al-Qaeda urges individual terror strikes in India; Pune engineer arrested, agencies on high alert

AQIS Terror India: महाराष्ट्र एंटी-टेरोरिज्म स्क्वाड ने पुणे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को गिरफ्तार किया, जिसके पास से हथियारों और विस्फोटकों की तस्वीरें बरामद हुईं। जिसके बाद भारत की सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह चौकन्नी हो गईं। एजेंसी सूत्रों का कहना है कि अल-कायदा इन द सब-कॉन्टिनेंट यानी एक्यूआईएस देश में आतंकी हमलों की योजना बना रहा है। 37 साल का इंजीनियर जुबैर हंगरगेकर भी एक्यूआईएस के ऑनलाइन प्रोपेगैंडा से प्रभावित था।

ISI in Bangladesh: आसिम मुनीर की अगुवाई में भारत के दो मोर्चों पर हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी कर रहा पाकिस्तान! अलर्ट पर एजेंसियां

यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग में इस्लामिक एंड मिडल ईस्ट स्टडीज डिपार्टमेंट में सीनियर रिसर्चर मोहम्मद सिनन सियेच कहते हैं कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद के फिर से सिर उठाने की आहट मिल रही है। अल-कायदा इन द सब-कॉन्टिनेंट ने भारत में अपनी गतिविधियों को फिर से बढ़ाने की रणनीति शुरू कर दी है। एक्यूआईएस भारत के कश्मीर और पूर्वी राज्यों पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा के अलावा दक्षिण भारत में अपने नेटवर्क को मजबूत करने की योजना बना रहा है।

AQIS Terror India:2014 में बना था AQIS, भारत को बताया था ‘मुख्य निशाना’

एक्यूआईएस की स्थापना वर्ष 2014 में अल-कायदा सेंट्रल ने अफगानिस्तान में की थी। इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया में सक्रिय छोटे-छोटे जिहादी संगठनों को एक मंच पर लाना था। यह वह समय था जब इस्लामिक स्टेट ने इराक और सीरिया में ‘खिलाफत’ का एलान कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। एक्यूआईएस को इस नए खतरे का जवाब देने के लिए अल-कायदा का “क्षेत्रीय चेहरा” बताया गया।

एजेंसी सूत्रों का कहना है कि संगठन ने तब यह दावा किया था कि वह जम्मू-कश्मीर को “मुक्त कराने” के लिए काम करेगा। एक्यूआईएस के पहले प्रमुख के तौर पर उत्तर प्रदेश के संभल जिले के रहने वाले असीम उमर को नियुक्त किया था। शुरुआती सालों संगठन ने उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बिहार में अपने नेटवर्क बनाने की कोशिश की, लेकिन भारतीय खुफिया एजेंसियों की सतर्कता के चलते इसके कई मॉड्यूल नाकाम रहे। इसी के चलते संगठन ने अब रणनीति बदलते हुए “लोन वुल्फ” यानी अकेले हमला करने का तरीका अपनाया है।

AQIS Terror India: भारत में पकड़ नहीं बना पाया एक्यूआईएस

मोहम्मद सिनन सियेच के मुताबिक कश्मीर एक्यूआईएस की रणनीति का मुख्य केंद्र है। साल 1996 में ओसामा बिन लादेन ने पहली बार कश्मीर का नाम लिया था। 2014 और 2016 में संगठन ने फिर से कश्मीरी युवाओं को “जिहाद” के लिए भड़काने की कोशिश की। 2017 में कश्मीर के उग्रवादी नेता जाकिर मूसा ने हिजबुल मुजाहिद्दीन छोड़कर एक्यूआईएस का दामन थाम लिया था और “अंसार गजवत-उल-हिंद” संगठन बनाया था। मई 2019 को सुरक्षा बलों ने जाकिर मूसा समेत अबू दुजाना को भी मार गिराया था।

जिसके बाद एक्यूआईएस कमजोर पड़ने लगा। 2014 से अब तक यह भारत में किसी बड़े हमले को अंजाम नहीं दे सका। हाल में संगठन ने अपनी रणनीति बदलते हुए कहा है कि केवल “बदले” की कार्रवाई करेगा। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि अल-कायदा और आईएसआईएस दोनों की भारत में सीमित पहुंच है। भारतीय मुस्लिम समुदाय की पारिवारिक और सामाजिक संरचना, प्रमुख मदरसों का चरमपंथ विरोधी रवैया और खुफिया एजेंसियों की सख्ती के चलते यह संगठन भारत में पकड़ नहीं बना पाया।

लेकिन महाराष्ट्र एटीएस ने जिस तरह से पुणे के कोंधवा इलाके से सॉफ्टवेयर इंजीनियर जुबैर हंगरगेकर को हिरासत में लिया है, उसके बाद अंदेशा लगाया जा रहा है कि यह संगठन भारत में फिर से अपनी पकड़ बनाने की तैयारियों में जुट गया है। जुबैर एक मल्टीनेशनल कंपनी में डेटाबेस डेवलपर के तौर पर काम करता था। एटीएस ने शुरुआती जांच में पाया कि संदिग्ध ने इंटरनेट पर एक्यूआईएस की सामग्री देखी और उससे प्रभावित होकर कट्टर रुख अपना लिया औऱ जिहाद के रास्ते पर चल दिया। उसके पास से मिली तस्वीरों में वह एक एक-47 राइफल पकड़े हुए है और उसके पास कुछ बम बनाने के डॉक्यूमेंट्स भी मिले हैं। साथ ही एटीएस ने मौके से कई लैपटॉप और मोबाइल फोन भी जब्त किए हैं, जिनकी फॉरेंसिक जांच जारी है। उसकी गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या वह किसी बड़े नेटवर्क से जुड़ा था या अकेले ही काम कर रहा था।

AQIS Terror India: ‘लोन वुल्फ’ मॉडल क्यों है खतरनाक

अल-कायदा का यह नया तरीका इस्लामिक स्टेट की रणनीति से मिलता-जुलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे हमले ‘इन्वेस्टमेंट-फ्री’ यानी बहुत कम संसाधनों में किए जा सकते हैं और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पकड़े जाने का खतरा भी बेहद कम होता है। एक्यूआईएस के संदेशों में कहा गया है कि भारत में रहने वाले “विचारधारा से प्रेरित लोग” अपने स्तर पर हमले करें। इन अपीलों का प्रसार एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया चैनलों के जरिए किया जा रहा है।

AQIS Terror India: बांग्लादेश में अस्थिरता से मिला मौका

रिसर्चर मोहम्मद सिनन सियेच के मुताबिक एक्यूआईएस अब पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश सीमा से लगे इलाकों में अपने पैर पसार रहा है। अंसारुल्लाह बंगला टीम, जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश और हरकत-उल-जिहाद-इस्लामी जैसे बांग्लादेशी संगठन पहले ही पश्चिम बंगाल के सीमांत जिलों में अपनी पैठ बना चुके हैं।

AQIS Terror India: लड़ाकों को दी है खास ट्रेनिंग

बेंघाजी: नो द एनीमी की लेखिका सराह एडम्स के मुताबिक एक्यूआईएस दो साल से अफगानिस्तान में अपने लड़ाकों को खास ट्रेनिंग दे रहा है। यह ट्रेनिंग इस्लामिक आर्मी नामक सहयोगी संगठन के साथ मिलकर दी गई है। उनका भी दावा है कि एक्यूआईएस भारत में एक बड़े हमले की तैयारी में है और “लोन वुल्फ” का आह्वान केवल एक स्मोकस्क्रीन (धोखे का तरीका) हो सकता है ताकि भारत की एजेंसियां छोटे मामलों में उलझी रहें।

उनका कहना है कि अमेरिकी थिंक टैंकों की रिपोर्टों में कहा गया है कि इस कथित बड़े हमले की योजना अल-कायदा के नेता हमजा बिन लादेन की मंजूरी से तैयार किया जा रहा है और इसमें दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों को निशाना बनाए जाने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने कुछ खुफिया रिपोर्ट्स के हवाले से कहा है कि अफगानिस्तान के कुछ कैंपों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और कुछ भारतीय नागरिकों की भर्तियां हो रही हैं।

AQIS Terror India: सुरक्षा एजेंसियों ने बढ़ाई निगरानी

खुफिया एजेंसियों और राज्य पुलिस ने देशभर में ऑनलाइन रैडिकलाइजेशन पर निगरानी बढ़ा दी है। खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, एन्क्रिप्टेड चैट ऐप्स और फंडिंग ट्रांजेक्शन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा रही है। साथ ही पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में भी निगरानी बढ़ाई है। एनएसए की निगरानी में सुरक्षा एजेंसियां इंटर-एजेंसी कॉर्डिनेशन को मजबूत कर रही हैं।

सूत्रों ने बताया कि भारत की नीति अब केवल डिफेंसिव नहीं है, बल्कि प्रोएक्टिव इंटेलिजेंस पर फोकस है, यानी संदिग्ध नेटवर्कों को पहले ही पहचानकर कार्रवाई करना। हाल के महीनों में असम, गुजरात, जम्मू-कश्मीर और केरल में कई संदिग्ध मॉड्यूलों को पकड़ा गया है।

सूत्रों का कहना है कि एक्यूआईएस का अकेले हमला करने का यह कदम बेहद खतरनाक है क्योंकि यह किसी दूसरे संगठन से बिल्कुल अलग है। अब हम एक ऐसे खतरे का सामना कर रहे हैं जिसमें एक व्यक्ति भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।” उन्होंने कहा कि लोन वुल्फ मॉडल का इस्तेमाल कई देशों में हुआ है और इसका असर रोकने के लिए साइबर निगरानी ही सबसे बड़ा हथियार है।

डिजिटल युग में आतंकवाद का रूप भी लगातार बदल रहा है। एक्यूआईएस जैसे संगठन अब सोशल मीडिया, डार्क वेब और गेमिंग प्लेटफॉर्म तक का इस्तेमाल कर रहे हैं। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, एक्यूआईएस के कई प्रचारक उर्दू और हिंदी भाषा में ऑनलाइन लेक्चर पोस्ट कर रहे हैं, जिनका निशाना युवा हैं और उन्हें ‘वीडियो प्रोपेगैंडा’ के जरिए उकसाया जा रहा है। सरकारी एजेंसियों ने अब कंटेंट मॉनिटरिंग यूनिट्स को सक्रिय किया है, जो 24 घंटे ऐसे चैनलों पर नजर रख रही हैं।

ISI in Bangladesh: आसिम मुनीर की अगुवाई में भारत के दो मोर्चों पर हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी कर रहा पाकिस्तान! अलर्ट पर एजेंसियां

ISI in Bangladesh
General Sahir Shamshad Mirza with Chief Adviser Professor Muhammad Yunus

ISI in Bangladesh: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई अब बांग्लादेश में अपना नेटवर्क तेजी से फैला रही है। इसका उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल की खाड़ी पर नजर रखना है। हाल ही में जनरल शमशाद मिर्जा के नेतृत्व में पाकिस्तान के कुछ मिलिट्री अफसर ढाका पहुंचे थे, जिसमें आईएसआई के कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

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सूत्रों के अनुसार, इस टीम ने बांग्लादेश की नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस और डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस के टॉप अफसरों के साथ कई दौर की मुलाकातें कीं। इन बैठकों में भारत के पूर्वोत्तर इलाकों और सीमाई इलाकों की गतिविधियों की निगरानी के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच संयुक्त खुफिया तंत्र बनाने पर चर्चा हुई।

ISI in Bangladesh: इन इलाकों पर पकड़ बढ़ाने की तैयारी

रिपोर्टों के मुताबिक, आईएसआई कॉक्स बाजार, उखिया, टेकनाफ, मौलवीबाजार, हबिगंज और शेरपुर जैसे रणनीतिक इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की योजना बना रही है। ये सभी इलाके भारत-बांग्लादेश सीमा और बंगाल की खाड़ी के नजदीक हैं, जो खुफिया गतिविधियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।

सूत्रों के अनुसार, शेख हसीना के शासनकाल (2009 से 2024) के दौरान आईएसआई को बांग्लादेश में काम करने में दिक्कत हो रही थी। उस दौरान बांग्लादेश सरकार के साथ भारत के मजबूत संबंध थे, जिसके चलते आईएसआई की गतिविधियों पर अंकुश लगा रहा।

हालांकि, अगस्त 2024 में आईएसआई ने बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े छात्र संगठनों का इस्तेमाल कर शेख हसीना सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी। रिपोर्टों में कहा गया है कि आईएसआई अब उन पुराने नेटवर्क को फिर से सक्रिय करना चाहती है, जो पाकिस्तान की आजादी से पहले पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में मौजूद थे।

इस साल जनवरी में आईएसआई के वरिष्ठ अधिकारियों का एक और दल ढाका गया था। उस दौरे के दौरान बांग्लादेश की सेना के कुछ अधिकारियों के साथ भी चर्चा हुई थी, जिसमें आईएसआई नेटवर्क को भारत की पूर्वी और उत्तर-पूर्वी सीमा के नजदीक बढ़ाने की योजना पर बात हुई।

जानकारों का कहना है कि बांग्लादेश में आईएसआई की बढ़ती सक्रियता भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इसका सीधा असर पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इन क्षेत्रों में पहले से ही उग्रवादी गतिविधियां और सीमा पार तस्करी की समस्या मौजूद है।

ISI in Bangladesh: साजिश का हिस्सा हैं प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस

सूत्रों का कहना है कि बांग्लादेश के अंतरिम प्रमुख प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस भी इस साजिश का हिस्सा हैं। पाकिस्तान के जनरल साहिर शमशाद मिर्जा के दौरे के दौरान यूनुस ने उन्हें एक ऐसी किताब उपहार में दी, जिसके कवर पर बने नक्शे जैसी आकृति में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बांग्लादेश का हिस्सा दिखाया गया है। बताया गया है कि यह किताब ‘आर्ट ऑफ ट्रायम्फ: बांग्लादेश्स न्यू डॉन 2024 में जुलाई शहीद स्मृति फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित की गई थी। इसमें जुलाई 2024 में हुए उस छात्र आंदोलन की ग्रैफिटी शामिल हैं, जिसके बाद शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटना पड़ा था।

यूनुस ने इस किताब को पहले भी सितंबर 2024 में जस्टिन ट्रूडो और जेन गुडॉल को संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान उपहार में दिया था। लेकिन पाकिस्तान के जनरल मिर्जा के साथ मुलाकात की उनकी एक्स (X) पोस्ट ने विवाद को हवा दे दी। इस पोस्ट में यूनुस को किताब देते हुए देखा जा सकता है, जिसके कवर पर यह विवादित नक्शा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

कूटनीतिक हलकों में यह घटना इसलिए भी संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि यूनुस ने पिछले कुछ महीनों में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को लेकर कई बार विवादास्पद बयान दिए हैं। अप्रैल में चीन दौरे के दौरान यूनुस ने कहा था कि बांग्लादेश “महासागर का एकमात्र संरक्षक” है और भारत का पूर्वोत्तर “लैंडलॉक्ड” इलाका है, जो समुद्री पहुंच के लिए ढाका पर निर्भर है। उन्होंने नेपाल, भूटान और भारत के सात उत्तरपूर्वी राज्यों को जोड़ने की बात कही थी।

बता दें कि इंटरिम गवर्नमेंट के चीफ एडवाइजर मुहम्मद यूनुस ने 16 अक्टूबर को घोषणा की कि चुनाव 2026 के अप्रैल के पहले हाफ (1 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच) किसी भी दिन होंगे।

ISI in Bangladesh: लगातार भारत के खिलाफ बोल रहे हैं जनरल मिर्जा

इसी महीने की शुरुआत में इस्लामाबाद में हुए सिंपोजियम 2025 में जनरल मिर्जा ने भारत पर निशाना साधते हुए कहा था कि “भारत की सेना राजनीति में शामिल है और भारत की राजनीति सैन्यीकरण की ओर बढ़ रही है।” उन्होंने यह भी कहा था कि इससे दक्षिण एशिया में परमाणु जोखिम बढ़ गया है।

मिर्जा ने इससे पहले शांगरी-ला डायलॉग में भी भारत के खिलाफ बयान दिया था और कश्मीर मुद्दे पर “तीसरे पक्ष की मध्यस्थता” की मांग की थी, जो भारत की लंबे समय से चली आ रही नीति के खिलाफ है।

पिछले साल दिसंबर में यूनुस के सलाहकार महफूज आलम ने फेसबुक पर लिखा था कि “हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी तक का इलाका सांस्कृतिक रूप से एक है और एक ‘कटे-फटे बंगाल’ से असली आजादी अधूरी है।” इस बयान पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था, जिसके बाद पोस्ट हटा दिया गया।

ISI in Bangladesh: भारत के पूर्वी मोर्चे पर नया खतरा

पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का फोकस इस बार कश्मीर नहीं, बल्कि भारत का पूर्वी इलाका और बांग्लादेश के जरिए नया मोर्चा खोलने पर है। कुछ समय पहले ब्रिटिश मैगजीन द इकॉनॉमिस्ट को दिए एक इंटरव्यू में पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा था, “अगर भविष्य में संघर्ष हुआ तो हम पूर्व से शुरू करेंगे।” यह बयान साफ संकेत देता है कि पाकिस्तान भारत के पूर्वोत्तर को लेकर नई रणनीति बना रहा है।

कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान अब बांग्लादेश को “ईस्टर्न फ्रंट” के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है, ताकि भारत को दो मोर्चों पश्चिम में कश्मीर और पूर्व में पूर्वोत्तर भारत पर उलझाया जा सके। रिपोर्टों के अनुसार, चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स और भारत की सीमा से सटे इलाकों में हथियार तस्करी, कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियां और ऑपरेटिव्स की आवाजाही बढ़ी है।

सूत्रों का कहना है कि मुनीर का प्लान यह है कि बांग्लादेश या उसकी सीमा का इस्तेमाल कर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में अस्थिरता पैदा की जाए। इन इलाकों की भौगोलिक और सांस्कृतिक समानताएं, सीमित सुरक्षा तंत्र और खुले बॉर्डर पाकिस्तान को फायदा पहुंचा सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि यह सिर्फ एक सैन्य योजना नहीं, बल्कि एक हाइब्रिड वॉरफेयर रणनीति है, जिसमें साइबर ऑपरेशन्स, दुष्प्रचार, और स्थानीय असंतोष को भड़काने जैसे तरीके शामिल हैं।

वहीं, भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस संभावित पूर्वी खतरे को गंभीरता से लिया है। असम, मेघालय और त्रिपुरा में निगरानी बढ़ा दी गई है। सैन्य खुफिया और सीमा सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। साथ ही भारत ने आसियान और खाड़ी देशों के साथ राजनयिक बातचीत तेज कर दी है ताकि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समर्थन न मिल सके।

विशेषज्ञों के मुताबिक, मुनीर की यह नीति पाकिस्तान के लिए जोखिम भरी हो सकती है, लेकिन यह संकेत भी देती है कि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है।

Indian Navy Satellite Launch: इसरो कल लॉन्च करेगा नौसेना का सबसे भारी सैटेलाइट, ‘बाहुबली’ में है 150 हाथियों जितना वजन

Indian Navy Satellite Launch

Indian Navy Satellite Launch: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो रविवार को अपना सबसे भारी रॉकेट ‘बाहुबली’ लॉन्च करने जा रहा है। यह रॉकेट भारतीय नौसेना के लिए खास तौर पर तैयार किए गए कम्यूनिकेशन सैटेलाइट सीएमएस-03 को अंतरिक्ष में स्थापित करेगा। इस सैटेलाइट का उद्देश्य नौसेना के जहाजों और बेस को सिक्योर कम्यूनिकेशन नेटवर्क से जोड़ना है, ताकि समुद्री सुरक्षा और निगरानी को और मजबूत किया जा सके।

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यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से रविवार शाम 5:26 बजे किया जाएगा। यह लॉन्च व्हीकल मार्क-3 यानी एलवीएम-3 रॉकेट का आठवां मिशन होगा। इसरो का यह भारी रॉकेट अब तक 100 फीसदी सफल रहा है और 2023 में इसी ने चंद्रयान-3 को चांद तक पहुंचाया था।

43.5 मीटर ऊंचा यह रॉकेट लगभग 15 मंजिला इमारत के बराबर है और इसका वजन 642 टन है, जो करीब 150 एशियाई हाथियों के वजन के बराबर माना जाता है। इस बार रॉकेट अपने साथ जो सैटेलाइट ले जा रहा है, वह भारत का अब तक का सबसे भारी कम्युनिकेशन सैटेलाइट है। इसका वजन करीब 4,400 किलोग्राम है और यह जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा।

यह नया सैटेलाइट जीसैट-7 या रुक्मिणी सैटेलाइट की जगह लेगा, जो 2013 से नौसेना की सेवा कर रहा है। सीएमएस-03 सैटेलाइट की खासियत यह है कि यह कई फ्रीक्वेंसी बैंड्स में काम करता है और भारत के तटीय क्षेत्रों से 2,000 किलोमीटर तक फैले नौसैनिक संसाधनों को एक साथ जोड़ सकता है।

इस मिशन में इस्तेमाल होने वाला हर एलवीएम-3 रॉकेट लगभग 500 करोड़ रुपये का होता है। इस 16 मिनट की उड़ान के दौरान रॉकेट में भारत में विकसित किया गया क्रायोजेनिक इंजन इस्तेमाल किया जाएगा। इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तकनीक भारत की अंतरिक्ष आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी उपलब्धि है।

इस सैटेलाइट का सैन्य महत्व भी बेहद अहम है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना ने रुक्मिणी सैटेलाइट की मदद से पाकिस्तान की नौसेना पर नजर रखी थी और नेटवर्क सेंट्रिक ऑपरेशंस के जरिए अपनी बढ़त बनाई थी। अब नया सैटेलाइट सीएमएस-03 उस क्षमता को और अधिक आधुनिक और तेज बनाएगा।

यह भी उल्लेखनीय है कि यही ‘बाहुबली’ रॉकेट भविष्य में भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ को भी अंतरिक्ष में ले जाएगा। इसके लिए रॉकेट का ह्यूमन रेटेड वर्जन तैयार किया जा रहा है।

Vayu Samanvay-II: पाकिस्तान से सटे रेगिस्तान में भारतीय सेना ने की बड़ी ड्रोन और काउंटर-ड्रोन एक्सरसाइज, देखें वीडियो

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar

Vayu Samanvay-II: भारतीय सेना ने बड़े स्तर का ड्रोन और काउंटर-ड्रोन एक्सरसाइज वायु समन्वय–II का आयोजन किया। यह अभ्यास 28 से 29 अक्टूबर के बीच रेगिस्तानी इलाके में आयोजित किया गयाा था। इस एक्सरसाइज का आयोजन भारतीय सेना की दक्षिणी कमान ने किया था। अभ्यास में ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशंस में इस्तेमाल की गई ड्रोन तकनीकों की क्षमता को भी परखा गया।

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दो दिन तक चले इस अभ्यास का उद्देश्य भारतीय सेना की नई पीढ़ी की युद्ध प्रणाली की तैयारियों को परखना था। इसमें एरियल और ग्राउंड एसेट्स को इंटीग्रेट करके मल्टी-डोमेन कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स के माध्यम से विभिन्न ऑपरेशनल यूनिट्स को जोड़ा गया। यह पूरा अभ्यास इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और मुश्किल परिस्थितियों में किया गया, जिससे यह एक्सरसाइज और ज्यादा वास्तविक और चुनौतीपूर्ण बन गई।

इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य ड्रोन और काउंटर-ड्रोन अभियानों (यानि दुश्मन के ड्रोन को पहचानना और रोकना) के लिए नई तकनीकों और तरीकों को परखना था, ताकि भारतीय सेना उभरते हवाई खतरों का बेहतर तरीके से सामना कर सके। रेगिस्तान के कठिन मौसम और इलाके ने सैनिकों को असली हालात में अभ्यास करने का मौका दिया। इसमें जमीन और हवा से हेलिकॉप्टर, ड्रोन, और अन्य आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल कर सेना ने दिखाया कि वे मिलकर युद्ध को लड़ सकते हैं और एक-दूसरे को सपोर्ट कर सकते हैं।

वायु समन्वय–II ने भारतीय सेना की अलग-अलग शाखाओं के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त काम करने की क्षमता को दिखाया। इस दौरान सैनिकों ने “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत देश में बनी तकनीकों का इस्तेमाल किया। “स्वावलंबनेन विजयः, नवोन्मेषे जयः” के मंत्र को साकार करते हुए यह अभ्यास भारत की रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम है।

Vayu Samanvay-II

दक्षिणी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने इस अभ्यास की सफलता की प्रशंसा करते हुए कहा कि वायु समन्वय–II से मिली सीखें सेना में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन प्रणालियों को और तेजी से डेवलप करने में मदद करेंगी।

भारतीय सेना के अनुसार, यह अभ्यास आधुनिक तकनीक को अपनाने और मल्टी डोमेन वॉरफेयर की तैयारी को मजबूत करने के लिए किया गया। इस अभ्यास में विभिन्न प्रकार के स्वदेशी ड्रोन, आर्टिलरी, इलेक्ट्रॉनिक फ्यूज, और काउंटर-ड्रोन इक्विपमेंट का प्रदर्शन हुआ, जिसे भारतीय उद्योग और सेना के सहयोग से डेवलप किया गया है।