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रक्षा मंत्री ने बेंगलुरु में BEL की मिसाइल इंटीग्रेशन सुविधा का किया उद्घाटन, आकाश की दो रेजिमेंट्स को दिखाई हरी झंडी

BEL Missile Integration Facility

BEL Missile Integration Facility: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 16 फरवरी को बेंगलुरु स्थित भारत इलैक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल में आकाश मिसाइल की तीसरी और चौथी रेजिमेंट के कॉम्बैट सिस्टम्स को हरी झंडी दिखाई। साथ ही, नई मिसाइल इंटीग्रेशन सुविधा का उद्घाटन के साथ माउंटेन फायर कंट्रोल रडार का औपचारिक अनावरण भी किया।। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान स्वदेशी एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन सिस्टम्स ने जिस तरह से खतरों का पता लगाा कर उन्हें निष्क्रिय किया, उसने यह साबित कर दिया कि भारत की घरेलू तकनीक किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम है।

BEL Missile Integration Facility: क्या है मिसाइल इंटीग्रेशन सुविधा?

नई मिसाइल इंटीग्रेशन सुविधा का मकसद अलग-अलग सिस्टम्स और सब-सिस्टम्स को इंटीग्रेट करके कॉम्बैट प्लेटफॉर्म बनाना है। यहां मिसाइल, रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम और कंट्रोल यूनिट्स को जोड़कर फाइनल ऑपरेशनल सिस्टम तैयार किया जाएगा। इससे प्रोडक्शन की रफ्तार बढ़ेगी और क्वालिटी कंट्रोल भी बेहतर होगा।

आकाश तीसरी और चौथी रेजिमेंट के कॉम्बैट सिस्टम्स को रवाना किया जाना भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। वहीं माउंटेन फायर कंट्रोल रडार खास तौर पर पहाड़ी इलाकों में दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और मिसाइल सिस्टम को सटीक दिशा देने के लिए तैयार किया गया है। (BEL Missile Integration Facility)

स्वदेशी तकनीक पर जोर

दौरे के दौरान रक्षा मंत्री को बीईएल द्वारा विकसित एडवांस स्वदेशी डिफेंस टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी दी गई। इसमें एआई आधारित सॉल्यूशंस, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, एवियोनिक्स, नेवल प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स और टैंक इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि बीईएल ने नेटवर्क-सेंट्रिक ऑपरेशन्स को मजबूत किया है। इंटीग्रेटेड सिस्टम, रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और डिसीजन सपोर्ट क्षमता ने हमारी कॉम्बैट इफेक्टिवनेस को नए स्तर पर पहुंचाया है। (BEL Missile Integration Facility)

इसके अलावा उन्हें बीईएल में चल रहे रिसर्च एंड डेवलपमेंट कार्यों की भी जानकारी दी गई। इनमें क्विक रिएक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट मार्क-2, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, प्रोजेक्ट कुशा (एमआर सैम/एलआर सैम), काउंटर ड्रोन सिस्टम और नेवल वेपन कंट्रोल सिस्टम जैसे प्रमुख कार्यक्रम शामिल हैं।

इन पहलों से जमीन, हवा और समुद्र- तीनों क्षेत्रों में ऑपरेशनल तैयारी मजबूत हो रही है और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम हो रही है। (BEL Missile Integration Facility)

BEL Missile Integration Facility

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वदेशी एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन सिस्टम्स ने खतरों को प्रभावी तरीके से निष्क्रिय किया। एआई आधारित थ्रेट प्रिडिक्शन, अर्ली वार्निंग और रिस्पॉन्स मैकेनिज्म ने सैनिकों का भरोसा बढ़ाया है।

उन्होंने कहा कि जब जीत स्वदेशी हथियारों और तकनीक से मिलती है, तो देश का आत्मविश्वास भी दोगुना हो जाता है। (BEL Missile Integration Facility)

BEL Missile Integration Facility

एआई और क्वांटम कंप्यूटिंग पर जोर

रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि एआई और क्वांटम कंप्यूटिंग अब भविष्य की बातें नहीं रह गई हैं। रियल-टाइम डिसीजन मेकिंग, ऑटोनॉमस सिस्टम, साइबर डिफेंस और प्रिसीजन ऑपरेशन्स में इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

उन्होंने बीईएल, अन्य डिफेंस पीएसयू और इंडस्ट्री पार्टनर्स से अपील की कि तकनीकी दौड़ में आगे रहने के लिए लगातार इनोवेशन पर काम करना होगा। स्टार्ट-अप्स, इंडस्ट्री और एकेडेमिया के साथ मिलकर तेज प्रोडक्ट डेवलपमेंट पर जोर देने की जरूरत है। (BEL Missile Integration Facility)

दौरे के दौरान रक्षा मंत्री ने स्टार्ट-अप्स और युवा वैज्ञानिकों से बातचीत की। उन्होंने उन्हें ज्यादा से ज्यादा एडवांस स्वदेशी तकनीक विकसित करने के लिए प्रेरित किया।

रक्षा मंत्री ने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए घरेलू उद्योग को टेक्नोलॉजी रेस में आगे रहना होगा। क्रॉस-डिसिप्लिनरी कोलैबोरेशन, इनोवेशन और रैपिड प्रोटोटाइपिंग के जरिए वर्ल्ड-क्लास प्रोडक्ट तैयार करने होंगे। (BEL Missile Integration Facility)

AI Summit 2026 में भारतीय सेना ने दिखाई टेक्नोलॉजी की ताकत, शोकेस किए खास 12 ड्यूल-यूज एआई सिस्टम्स

Indian Army AI Summit 2026

AI Summit 2026: नई दिल्ली के भारत मंडपम में 16 से 20 फरवरी तक आयोजित इंडिया एआई इंपैक्ट समिट 2026 में इस बार भारतीय सेना का स्टॉल खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह समिट देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते प्रभाव और उसके भविष्य पर केंद्रित है। 30 से ज्यादा देशों की भागीदारी, सैकड़ों प्रदर्शकों और अलग-अलग थीम पवेलियन के बीच सेना ने यह साफ संदेश दिया है कि वह तेजी से डेटा-सेंट्रिक और एआई-एनेबल्ड फोर्स बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

भारतीय सेना ने यहां 12 स्वदेशी एआई एप्लीकेशन पेश की हैं। खास बात यह है कि ये सिस्टम केवल डिफेंस जरूरतों के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के काम भी आ सकते हैं। इसे ही ड्यूल-यूज टेक्नोलॉजी कहा जाता है, यानी एक ही तकनीक का इस्तेमाल सेना और सिविल सेक्टर दोनों में किया जा सकता है।

AI Summit 2026: ट्रेनिंग से लेकर परीक्षा तक: एआई एग्जामिनर

सेना ने “एआई एग्जामिनर” नाम का एक ऑटोमेटेड इवैल्यूएशन सिस्टम बनाया है। यह किसी भी लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम में जोड़ा जा सकता है। यह खुद सवाल तैयार कर सकता है, जवाबों का विश्लेषण करता है, अंक देता है और ट्रेनीज को फीडबैक भी देता है। सेना में इसका इस्तेमाल सैनिकों की ट्रेनिंग, भाषा कौशल और रणनीतिक अभ्यास के मूल्यांकन में हो सकता है। स्कूल, कॉलेज और ऑनलाइन कोर्स प्लेटफॉर्म भी इसे अपना सकते हैं, जिससे शिक्षकों का समय बचेगा और छात्रों को तुरंत परिणाम मिलेगा।

सैम-यूएन: मिशन प्लानिंग में करेगा मदद

“सैम-यूएन” यानी सिचुएशनल अवेयरनेस मॉड्यूल फॉर यूएन ऑपरेशन्स एक वेब-आधारित प्लेटफॉर्म है। यह जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस, स्ट्रक्चर्ड रिपोर्टिंग और एआई एनालिटिक्स को जोड़कर रियल-टाइम स्थिति की जानकारी देता है। सेना इसे मिशन प्लानिंग और मॉनिटरिंग में इस्तेमाल कर सकती है। वहीं, डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर और स्मार्ट सिटी कंट्रोल रूम भी इससे बाढ़, ट्रैफिक या आपदा की स्थिति को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

एकम: सुरक्षित एआई प्लेटफॉर्म

एकम- एक एयर-गैप्ड क्लाउड प्लेटफॉर्म है, यानी यह इंटरनेट से अलग सुरक्षित वातावरण में काम करता है। इसमें एआई चैट, डॉक्यूमेंट और प्रेजेंटेशन तैयार करना, मल्टीलिंग्वल ट्रांसलेशन, समराइजेशन जैसी सुविधाएं हैं। सेना के लिए यह सुरक्षित कम्युनिकेशन और डेटा सॉवरेंटी की सुविधा देता है। सरकारी दफ्तर और कॉर्पोरेट सेक्टर भी इसे अपना सकते हैं, जहां डेटा सुरक्षा सबसे अहम होता है।

प्रक्षेपण: मौसम और आपदा की भविष्यवाणी

“प्रक्षेपण” एक एआई-ड्रिवन मिलिटरी क्लाइमेटोलॉजी और डिजास्टर प्रिडिक्शन सिस्टम है। यह लैंडस्लाइड, बाढ़ और हिमस्खलन की संभावना 3 से 7 दिन पहले बता सकता है। सीमा क्षेत्रों में तैनात सैनिकों के लिए यह बेहद उपयोगी है। साथ ही, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानर और सीमावर्ती गांवों को भी इससे समय रहते चेतावनी मिल सकती है।

सुरक्षा के लिए फेस रिकग्निशन: एक्सफेस

एक्सफेस- एक एआई बेस्ड फेशियल रिकग्निशन सिस्टम है। यह फोटो और वीडियो के जरिए पहचान और सत्यापन करता है। सेना इसे इंस्टॉलेशन सुरक्षा और निगरानी में इस्तेमाल कर सकती है। एयरपोर्ट सुरक्षा, कानून प्रवर्तन एजेंसियां और लापता लोगों की पहचान में भी यह मददगार हो सकता है।

नभ दृष्टि: मोबाइल से रियल-टाइम रिपोर्टिंग

“नभ दृष्टि” एक मोबाइल-इनेबल्ड टेलीमेट्री सिस्टम है। यह लोकेशन डेटा, तस्वीरें और समय की जानकारी कैप्चर कर एआई बैकएंड के जरिए प्रोसेस करता है। इससे ऑपरेशनल क्षेत्रों में तेज रिपोर्टिंग और कॉर्डिनेशन संभव है। आम नागरिक भी आपदा की स्थिति में इससे रिपोर्ट भेज सकते हैं।

ड्राइवर की थकान का चलेगा पता

लंबी दूरी की ड्राइविंग के दौरान नींद या थकान से हादसे होते हैं। सेना का “ड्राइवर फटीग डिटेक्शन” डिवाइस रियल-टाइम में ड्राइवर की आंखों और चेहरे के भावों को पहचान कर अलर्ट देता है। सेना के वाहनों के अलावा ट्रक और बस ड्राइवरों के लिए भी यह उपयोगी साबित हो सकता है।

एआई-इन-अ-बॉक्स

यह एक पोर्टेबल एज कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म है, जो इंटरनेट के बिना भी एआई मॉडल चला सकता है। दूरदराज या क्लासिफाइड इलाकों में सेना के लिए यह उपयोगी है। ग्रामीण अस्पताल, औद्योगिक स्थल और आपदा प्रभावित क्षेत्र भी इसका लाभ उठा सकते हैं।

व्हीकल ट्रैकिंग और लॉजिस्टिक्स

एआई आधारित व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम जीपीएस टेलीमेट्री और एनालिटिक्स के जरिए फ्लीट मॉनिटरिंग करता है। सेना में कन्वॉय मॉनिटरिंग और सप्लाई चेन प्रबंधन में यह मदद करता है। कमर्शियल लॉजिस्टिक्स कंपनियां भी इससे ईंधन बचत और बेहतर रूट प्लानिंग कर सकती हैं।

डीपफेक डिटेक्शन और साइबर सुरक्षा

आज के दौर में फर्जी वीडियो और साइबर हमले बड़ी चुनौती हैं। सेना ने डीपफेक वीडियो डिटेक्शन सिस्टम और मशीन लर्निंग आधारित वेब एप्लिकेशन फायरवॉल भी पेश किया है। ये सिस्टम सिंथेटिक मीडिया पहचान सकते हैं और एसक्यूएल इंजेक्शन या एक्सएसएस जैसे साइबर हमलों को रोक सकते हैं। बैंकिंग, हेल्थकेयर और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी इनका उपयोग कर सकते हैं।

मोबाइल सिक्योरिटी सिस्टम

प्रोएक्टिव मोबाइल सिक्योरिटी सिस्टम मोबाइल डिवाइस में असामान्य गतिविधि और मालवेयर को पहचानता है। इससे ऑपरेशनल कम्युनिकेशन सुरक्षित रहता है। इंस्टीट्यूशनल साइबर सिक्युरिटी स्ट्रक्चर में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारत एआई समिट 2026 के लिए भारतीय सेना ने जिस तरह से तैयारी की है, वह दिखाती है कि सेना डिफेंस और सिविल दोनों क्षेत्रों में एआई का जिम्मेदार और आत्मनिर्भर मॉडल तैयार कर रहाी है। इन स्वदेशी सिस्टम्स के जरिए सेना न केवल अपनी तैयारी मजबूत कर रही है, बल्कि सिविल प्रोटेक्शन, डिजास्टर रेजिलिएंस और डिजिटल सिक्योरिटी को भी नया बूस्ट मिल रहा है।

GTRE पहुंचे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, स्वदेशी मिलिट्री गैस टर्बाइन इंजन प्रोजेक्ट का लिया जायजा

Indigenous Aero Engine
Defence Minister Rajnath Singh Visited DRDO, Gas Turbine Research Establishment (GTRE) facility in Bengaluru and reviewed the status of ongoing projects relating to indigenous military gas turbine engine development.

Indigenous Aero Engine: ऐसे समय में जब दुनिया भर में रक्षा तकनीक को लेकर कंपीटीशन तेज हो गया है और सप्लाई चेन में अनिश्चित हो रही हैं, भारत अपनी रणनीतिक तकनीकों को स्वदेशी बनाने पर जोर दे रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सोमवार को बेंगलुरु में डीआरडीओ की गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट यानी जीटीआरई का दौरा किया। यह दौरा खास तौर पर सैन्य एयरो इंजन डेवलपमेंट की प्रगति की समीक्षा और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Indigenous Aero Engine)

Indigenous Aero Engine: जीटीआरई: स्वदेशी एयरो इंजन का केंद्र

जीटीआरई, डीआरडीओ की वह प्रमुख प्रयोगशाला है जहां सैन्य गैस टरबाइन इंजन पर रिसर्च और डेवलपमेंट का काम होता है। दशकों से यहां स्वदेशी एयरो इंजन बनाने की कोशिशें चल रही हैं। कावेरी इंजन प्रोजेक्ट इसी लैब का सबसे चर्चित और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद भारत को विदेशी इंजनों पर निर्भरता को खत्म करना है।

दौरे के दौरान रक्षा मंत्री ने चल रहे सभी स्वदेशी सैन्य गैस टरबाइन इंजन प्रोजेक्ट्स की विस्तार से समीक्षा की। वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने उन्हें बताया कि किन-किन चरणों पर काम चल रहा है, भारतीय इंडस्ट्री और अकादमिक संस्थानों के साथ किस तरह सहयोग हो रहा है, और रक्षा बलों को किस तरह तकनीकी सपोर्ट दिया जा रहा है।

इस दौरान रक्षा मंत्री एक खास प्रदर्शनी भी देखने पहुंचे, जिसमें स्वदेशी इंजनों और उनके अलग-अलग पार्ट्स को दिखाया गया था। यह प्रदर्शनी इस बात का संकेत थी कि भारत अब केवल असेंबली तक सीमित नहीं है, बल्कि जटिल तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। (Indigenous Aero Engine)

कावेरी इंजन का अहम परीक्षण

इस दौरान उन्होंने कावेरी इंजन का फुल आफ्टरबर्नर टेस्ट भी देखा। कावेरी इंजन पर 1980 और 1990 के दशक से काम चल रहा है। इसे शुरू में एलसीए तेजस के लिए तैयार किया जा रहा था, लेकिन थ्रस्ट और हाई टेम्परेचर मैटेरियल जैसी तकनीकी चुनौतियों के चलते इसमें देरी हुई। अब इसका ड्राई वेरिएंट बिना आफ्टरबर्नर के डेवलप किया जा रहा है, जिसे भविष्य में घटक यूसीएवी यानी अनमैन्ड कॉम्बैट एरियल व्हीकल में इस्तेमाल किया जा सकता है। रक्षा मंत्रालय ने 2026 में ड्राई कावेरी के सर्टिफिकेशन का लक्ष्य रखा है। इस टेस्ट को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। (Indigenous Aero Engine)

एयरो इंजन में आत्मनिर्भरता की जरूरत

रक्षा मंत्री ने वैज्ञानिकों से बातचीत में कहा कि आज के बदलते भू-राजनीतिक माहौल में एयरो इंजन टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि दुनिया में सप्लाई चेन बदल रही हैं और जिन देशों के पास अपनी महत्वपूर्ण तकनीक होगी, वही सुरक्षित और मजबूत रहेंगे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सरकार एयरो इंजन डेवलपमेंट को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत अब एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में हमें सिर्फ पांचवीं पीढ़ी के इंजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि छठी पीढ़ी की तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और नए मैटेरियल्स पर भी तुरंत काम शुरू करना होगा। (Indigenous Aero Engine)

समय सीमा कम करने की अपील

रक्षा मंत्री ने एयरो इंजन डेवलपमेंट को बेहद जटिल प्रक्रिया बताया। इसमें थर्मोडायनामिक्स, मैटेरियल साइंस, फ्लूड मेकैनिक्स और एडवांस्ड मैकेनिकल इंजीनियरिंग जैसी कई शाखाएं जुड़ी होती हैं। उन्होंने कहा कि विकसित देशों को ऐसे इंजन बनाने में 25 से 30 साल लग जाते हैं, लेकिन भारत को अपनी रणनीतिक जरूरतों के चलते समय कम करना होगा। उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा कि हमें मान लेना चाहिए कि 20 साल बीत चुके हैं और अब हमारे पास केवल 5 से 7 साल बचे हैं। (Indigenous Aero Engine)

ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया। उनके अनुसार इस ऑपरेशन में कम्युनिकेशन सिस्टम, सर्विलांस इक्विपमेंट और अटैक वेपन्स जैसे कई सिस्टम स्वदेशी थे। इससे सैनिकों का मनोबल बढ़ा और देशवासी भी गौरवान्वित हुए। उन्होंने कहा कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए हमें विश्व स्तरीय स्वदेशी सिस्टम तैयार करने होंगे।

रक्षा मंत्री ने यूनाइटेड किंगडम के साथ चल रही जॉइंट स्टडी और फ्रांस के साथ नेशनल एयरो इंजन मिशन के तहत शुरू हुई प्रक्रिया की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि इन सहयोगों से भारत को नई तकनीक समझने और पुराने अनुभवों से सीखने का मौका मिलेगा।

उन्होंने यह भी बताया कि एयरो इंजन टेक्नोलॉजी का फायदा सिर्फ रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। जीटीआरई हाई टेम्परेचर कॉम्पोजिट्स बना रहा है, जिनका उपयोग सिविल एविएशन, पावर जेनरेशन और स्पेस सेक्टर में भी हो सकता है। भारत तेजी से बढ़ता सिविल एविएशन मार्केट है और आज रक्षा क्षेत्र में हुई प्रगति कल आर्थिक विकास में योगदान दे सकती है।

इस मौके पर डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत और जीटीआरई के वरिष्ठ वैज्ञानिक भी मौजूद रहे। यह दौरा इस बात का संकेत है कि भारत अब एयरो इंजन जैसी जटिल और रणनीतिक तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है। (Indigenous Aero Engine)

IFR-Milan 2026: विशाखापत्तनम में खुला मिलन विलेज, 70 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं हो रहीं शामिल

IFR-Milan 2026

IFR-Milan 2026: विशाखापत्तनम इन दिनों अंतरराष्ट्रीय समुद्री गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। दुनिया की कई नौसेनाएं यहां एक साथ जुटी हैं, क्योंकि भारतीय नौसेना का प्रमुख बहुपक्षीय अभ्यास मिलन 2026 शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में 15 फरवरी को ईस्टर्न नेवल कमांड परिसर में “मिलन विलेज” का उद्घाटन किया गया। यह जगह खास तौर पर अलग-अलग देशों से आए नौसैनिकों और मेहमानों के लिए बनाई गई है, ताकि वे एक-दूसरे को बेहतर तरीके से जान सकें।

इस कार्यक्रम का उद्घाटन वाइस एडमिरल संजय भल्ला ने किया। उन्होंने गांव जैसी इस खास व्यवस्था का दौरा किया और विदेशी नौसैनिकों से बातचीत भी की। मिलन विलेज को इस तरह तैयार किया गया है कि यहां 70 से अधिक देशों से आए प्रतिनिधि और नौसैनिक एक दोस्ताना माहौल में एक-दूसरे से जुड़ सकें।

इस विलेज की सबसे बड़ी खासियत इसका सांस्कृतिक स्वरूप है। यहां भारत की विविध परंपराओं और विरासत की झलक देखने को मिल रही है। लाइव सिंगिंग परफॉर्मेंस, पारंपरिक लोक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं। इन कार्यक्रमों के जरिए विदेशी मेहमानों को भारत की कला और संस्कृति से रूबरू कराया जा रहा है।

मिलन विलेज में नौसेना से जुड़े स्मृति चिन्हों के स्टॉल भी लगाए गए हैं। इसके अलावा देशभर के हस्तशिल्प और हैंडलूम उत्पाद यहां प्रदर्शित किए गए हैं। आगंतुकों के लिए अलग-अलग राज्यों के स्वादिष्ट भारतीय व्यंजन भी उपलब्ध हैं, जिससे उन्हें भारत के विविध स्वाद का अनुभव हो सके।

वाइस एडमिरल संजय भल्ला ने अपने संबोधन में कहा कि मिलन विलेज भाईचारे और सांस्कृतिक जुड़ाव की भावना को दर्शाता है, जो प्रोफेशनल नेवल कोआपरेशन को और मजबूत करता है। उन्होंने यह भी बताया कि विशाखापत्तनम में एक के बाद एक इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026, मिलन 2026 और इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (आईओएनएस) जैसे आयोजन होना भारत की समुद्री पहुंच और सहयोग की बड़ी मिसाल है।

यह विलेज केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि आपसी भरोसा और दोस्ती बढ़ाने का माध्यम है। जब अलग-अलग देशों के सैनिक साथ बैठते हैं, बात करते हैं और एक-दूसरे की संस्कृति को समझते हैं, तो भविष्य में साथ काम करना और आसान हो जाता है।

मिलन 2026 का आयोजन 15 से 25 फरवरी तक चलेगा। इस दौरान समुद्र में भी संयुक्त अभ्यास होंगे, जिनमें पनडुब्बी रोधी अभ्यास, हवाई सुरक्षा, खोज और बचाव अभियान जैसे कई ऑपरेशन शामिल हैं।

‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ से ग्लोबल डिप्लोमैट तक, कैसे IFR-Milan 2026 से भारतीय नौसेना लिख रही है मैरीटाइम डिप्लोमेसी की नई कहानी

IFR-MILAN 2026 Indian Navy

IFR-Milan 2026: हिंद महासागर में जब कोई जहाज मुसीबत में फंसता है, तो कई बार सबसे पहले जो नाम याद आता है, वह है भारतीय नौसेना। बीते कुछ सालों में समुद्र में हुई कई घटनाओं ने यह साबित किया है कि अब भारतीय नौसेना केवल अपने तटों की सुरक्षा नहीं करती बल्कि वह समुद्री कूटनीति यानी मैरिटाइम डिप्लोमेसी का वैश्विक साझेदार भी बन चुकी है।

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 और एक्सरसाइज मिलन इसी बदलती सोच की झलक हैं। इंडियन नेवी आज “फर्स्ट रिस्पॉन्डर” यानी संकट के समय सबसे पहले पहुंचने वाली ताकत भी है और “लास्टिंग एलाय” यानी भरोसेमंद साझेदार भी। (IFR-Milan 2026)

IFR-Milan 2026: कैसे भारत ने मैरिटाइम डिप्लोमेसी को किया मजबूत

जनवरी 2025 में अंडमान सागर में जब एक मलेशियाई झंडे वाला सेलिंग वेसल, जिस पर चीनी क्रू सवार था, उसका ईंधन खत्म हो गया। इस संकट की घड़ी में भारतीय नौसेना सहारा बनी और अपने वॉरशिप आईएनएस किर्च के जरिए मुश्किल हालात में करीब 1,000 लीटर फ्यूल ट्रांसफर किया, ताकि वह जहाज सुरक्षित बंदरगाह तक पहुंच सके।

लेकिन यह केवल एक लॉजिस्टिक ऑपरेशन नहीं था, बल्कि मैरीटाइम डिप्लोमेसी का एक बड़ा उदाहरण था। जून 2025 में केरल तट के पास एमवी वान हाई 503 नामक जहाज में आग लग गई। हालात बेहद मुश्किल थे। आईएनएस गरुड़ से सीकिंग हेलीकॉप्टर ने रेस्क्यू टीम को सीधे जलते जहाज पर उतारा। बाद में चीन के दूतावास के प्रवक्ता ने सोशल मीडिया पर इंडियन नेवी और मुंबई कोस्ट गार्ड का सार्वजनिक तौर पर धन्यवाद किया। (IFR-Milan 2026)

चक्रवात दित्वाह में भारत बना श्रीलंका का पहला सहारा

भारत की मैरीटाइम डिप्लोमेसी का एक शानदार उदाहरण पिछले साल नवंबर में देखने को मिला। नवंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में हिंद महासागर में एक शक्तिशाली तूफान धीरे-धीरे श्रीलंका की ओर बढ़ रहा था। 27 से 29 नवंबर के बीच इस चक्रवात दित्वाह ने श्रीलंका में लैंडफॉल किया। कुछ ही घंटों में तेज हवाओं, मूसलाधार बारिश और समुद्री लहरों ने हालात बिगाड़ दिए। इससे 600 से अधिक मौतें हुईं, हजारों लोग बेघर हुए, और सड़कें, पुल तथा अन्य कनेक्टिविटी पूरी तरह प्रभावित हो गई। श्रीलंका सरकार ने तत्काल मदद की अपील की, और भारत ने फर्स्ट रिस्पॉन्डर के तौर पर तुरंत कार्रवाई की।

भारतीय नौसेना ने तुरंत ऑपरेशन सागर बंधु शुरू किया। चक्रवात के लैंडफॉल के दिन ही भारतीय नौसेना के दो जहाज आईएनएस विक्रांत और आईएनएस उदयगिरी जो उस दिन श्रीलंका नेवी के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के चलते कोलंबो में मौजूद थे। इन जहाजों को तुरंत राहत कार्य के लिए टास्क किया गया। 28 नवंबर को ही 9.5 टन इमरजेंसी ड्राई रेशन श्रीलंकाई अधिकारियों को सौंपा गया। विक्रांत ने अपने हेलीकॉप्टर और संसाधनों से शुरुआती बचाव और सप्लाई में मदद की। (IFR–Milan 2026)

इसके बाद भारतीय सेना ने अतिरिक्त जहाजों की तैनाती करते हुए आईएनएस सुकन्या और आईएनएस घड़ियाल के साथ तीन लैंडिंग क्राफ्ट यूटिलिटी को तैनात किया गया। ये तमिलनाडु से 1,000 टन से अधिक राहत सामग्री लेकर कोलंबो और त्रिंकोमाली पहुंचे। इस दौरान नौसेना के जहाजों ने 1,000 टन से ज्यादा राहत सामग्री (ड्राई रेशन्स, टेंट, टार्पॉलिन, हाइजीन किट्स, कपड़े, वॉटर प्यूरीफिकेशन किट्स, दवाइयां, सर्जिकल इक्विपमेंट और स्पेशलाइज्ड इक्विपमेंट) पहुंचाई। इसके बाद श्रीलंका नेवी ने इस साल जनवरी में आईएनएस विक्रांत और आईएनएस उदयगिरी समेत 8 जहाजों को सम्मानित किया, क्योंकि वे सबसे पहले राहत में शामिल हुए थे। (IFR–Milan 2026)

IFC-IOR जो कभी सोता नहीं

गुरुग्राम स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर– इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) इस नई समुद्री सोच का केंद्र है। दिसंबर 2018 में स्थापित यह सेंटर हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है। यहां 15 से अधिक देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर तैनात हैं। 57 से ज्यादा मैरिटाइम सिक्योरिटी कंस्ट्रक्ट और 25 पार्टनर देश इसके साथ जुड़े हैं।

इसका काम है समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना, संदिग्ध मूवमेंट की जानकारी साझा करना और संकट के समय तुरंत प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना। यही वजह है कि हिंद महासागर में कोई भी डिस्ट्रेस सिग्नल अनसुना नहीं रहता और यह सिर्फ एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साझा जवाबदेही है। भारतीय नौसेना खुद को एक “कोलैबोरेटिव हब” के तौर पर में स्थापित कर चुकी है। (IFR–Milan 2026)

‘सागर’ विजन से ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ तक

2016 के बाद से भारत की समुद्री कूटनीति का आधार रहा है सागर विजन (सिक्युरिटी एंड ग्रोथ फोर ऑल इन द रीजन)। इसका मकसद है क्षेत्र में सभी देशों की सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करना।

मालदीव के जल संकट में राहत पहुंचाना हो, श्रीलंका में चक्रवात के बाद ऑपरेशन सागर बंधु चलाना हो या मोजाम्बिक को फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट देना, भारत ने बार-बार साबित किया है कि वह संकट की घड़ी में सबसे पहले पहुंचने वाला देश है। वियतनाम को आईएनएस किर्पान उपहार में देना सिर्फ सैन्य मदद नहीं, बल्कि रणनीतिक भरोसे का प्रतीक था। (IFR–Milan 2026)

सागर से महासागर विजन तक

MAHASAGAR यानी म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन भारत की मैरीटाइम डिप्लोमेसी का नया और बड़ा विजन है। जिसका एलान पीएम नरेंद्र मोदी ने 12 मार्च 2025 को मॉरीशस की यात्रा के दौरान किया था। खास बात यह है कि इसी जगह पर 2015 में उन्होंने SAGAR विजन की शुरुआत की थी।

जहां सागर का फोकस मुख्य रूप से हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और सहयोग पर था। लेकिन बदलते वैशिक हालात को देखते हुए भारत ने इसे और व्यापक रूप दिया, जिसे महासागर कहा गया। इसका उद्देश्य सिर्फ समुद्री सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास, तकनीकी सहयोग और पर्यावरणीय संतुलन को भी साथ लेकर चलना है।

प्रधानमंत्री ने इसे “ग्लोबल साउथ” यानी एशिया, अफ्रीका, कैरेबियन और पैसिफिक के विकासशील देशों के लिए एक विजन बताया। इसके तहत भारत इन देशों के साथ व्यापार बढ़ाने, क्षमता निर्माण, सस्ती ऋण सुविधा, अनुदान और तकनीकी सहायता देने पर जोर देगा। साथ ही समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, समुद्री निगरानी और संयुक्त अभ्यास जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ेगा। (IFR–Milan 2026)

मॉरीशस के साथ समझौते में ईईजेड सुरक्षा, पुलिस अकादमी और मैरिटाइम इंफॉर्मेशन सेंटर जैसे कदम शामिल रहे। यह दिखाता है कि भारत सिर्फ सुरक्षा साझेदार नहीं, बल्कि विकास सहयोगी भी बनना चाहता है। (IFR–Milan 2026)

इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026: केवल परेड नहीं, बल्कि ताकत का संदेश

अक्सर लोग फ्लीट रिव्यू को सिर्फ जहाजों की परेड समझ लेते हैं। लेकिन यह मैरीटाइम डिप्लोमेसी का बड़ा प्लेटफॉर्म है। भारत का पहला प्रेसिडेंशियल फ्लीट रिव्यू 1953 में हुआ था, जब राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 33 जहाजों का निरीक्षण किया। उस समय भारतीय नाविक पहली बार अपने राष्ट्राध्यक्ष को सलामी दे रहे थे। आज यह सफर आज दर्जनों देशों की भागीदारी तक पहुंच चुका है।

2001 में मुंबई में पहला इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू हुआ, जिसमें 20 विदेशी नौसेनाएं शामिल हुईं। 2016 में विशाखापत्तनम में आयोजित आईएफआर में लगभग 50 देशों की भागीदारी रही और करीब 100 जहाज शामिल हुए। यह संकेत था कि भारत अब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। (IFR–Milan 2026)

वहीं आईएफआर 2026 इसी परंपरा को आगे बढ़ाएगा। 15 से 25 फरवरी तक विशाखापत्तनम एक ऐतिहासिक समुद्री आयोजन का केंद्र बनने जा रहा है। इस दौरान यहां तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम एक साथ आयोजित हो रहे हैं, जिनमें इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026, एक्सरसाइज मिलन 2026 और इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (आईओएनएस) के नौसेना प्रमुखों का 9वां सम्मेलन है। इन तीनों आयोजनों को मिलाकर “मैरीटाइम कन्वर्जेंस 2026” या “विजाग ट्रिफेक्टा” कहा जा रहा है। यह भारतीय नौसेना की अब तक की सबसे बड़ी समुद्री कूटनीतिक पहल मानी जा रही है। (IFR–Milan 2026)

यह पूरा आयोजन भारत के महासागर विजन के तहत किया जा रहा है। “यूनाइटेड थ्रू ओशन्स” थीम के तहत दुनिया की नौसेनाएं एक मंच पर आ रही हैं, जहां सुरक्षा, सहयोग, क्षमता निर्माण और टिकाऊ विकास पर चर्चा और अभ्यास होंगे। कुल 72 देशों की भागीदारी तय हुई है। 71 युद्धपोतों की मौजूदगी के साथ यह आयोजन वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती समुद्री भूमिका को दिखाएगा। अमेरिका, रूस, जापान, जर्मनी, फिलीपींस, यूएई, ईरान, दक्षिण अफ्रीका, घाना, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका जैसे देशों के जहाज इसमें शामिल हो रहे हैं। पहली बार जर्मनी, फिलीपींस और यूएई के युद्धपोत भी भाग ले रहे हैं। (IFR–Milan 2026)

इन आयोजनों में सबसे प्रमुख है 18 फरवरी को होने वाला इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू। इस दिन तीनों सेनाओं की कमांडर इन चीफ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समुद्र में खड़े जहाजों की समीक्षा करेंगी। वे आईएनएस सुमेधा पर सवार होकर प्रेसीडेंशियल याच्ट के रूप में फ्लीट का निरीक्षण करेंगी। कुल 71 जहाज छह कतारों में खड़े होंगे। इनमें आईएनएस विक्रांत जैसे स्वदेशी विमानवाहक पोत, विशाखापत्तनम श्रेणी के डेस्ट्रॉयर, नीलगिरि श्रेणी के स्टेल्थ फ्रिगेट और अरनाला श्रेणी के एंटी सबमरीन वॉरशिप शामिल रहेंगे। (IFR–Milan 2026)

एक्सरसाइज मिलन 2026: दुनिया की नौसेनाओं का महासागर में संगम

विशाखापत्तनम में ही 19 फरवरी को भारतीय नौसेना का प्रमुख मल्टीलेटरल नौसैनिक अभ्यास एक्सरसाइज मिलन 2026 का आयोजन होगा। यह मिलन का 13वां संस्करण है और 1995 से हर दो साल में आयोजित होता रहा है। इस बार यह आयोजन इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 और इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (आईओएनएस) के साथ होगा। तीनों कार्यक्रम मिलकर “मैरिटाइम कन्वर्जेंस 2026” का रूप ले रहे हैं। (IFR–Milan 2026)

इस बार इसकी थीम है – “कैमराडरी, कोऑपरेशन, कोलैबोरेशन”, यानी भाईचारा, सहयोग और साझा काम। इस बार 65 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं भाग ले रही हैं। 19 से अधिक विदेशी युद्धपोत विशाखापत्तनम पहुंच रहे हैं। अमेरिका, रूस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, यूएई, श्रीलंका जैसे कई देश इसमें शामिल होंगे। यह अब तक का सबसे बड़ा एडिशन माना जा रहा है।

एक्सरसाइज मिलन 2026 को दो हिस्सों हार्बर फेज और सी फेज में बांटा गया है। हार्बर फेज 19 फरवरी से शुरू होगा और तट पर आयोजित किया जाएगा। इसका मकसद आपसी भरोसा बढ़ाना और विचारों का आदान-प्रदान करना है। इसमें मिलन विलेज बनाया जाएगा, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, हस्तशिल्प स्टॉल और फूड फेस्टिवल होंगे। (IFR–Milan 2026)

समुद्री सुरक्षा, ड्रोन खतरे, साइबर सुरक्षा, आपदा राहत और समुद्री डकैती जैसे विषयों पर सेमिनार और विशेषज्ञ बैठकें होंगी। यह चरण नौसेनाओं के बीच विश्वास और समझ को मजबूत करेगा।

वहीं, 21 से 25 फरवरी के बीच बंगाल की खाड़ी में मिलन अभ्यास का सबसे अहम और चुनौतीपूर्ण हिस्सा आयोजित होगा, जिसे सी फेज कहा जाता है। यही वह चरण है जहां अलग-अलग देशों की नौसेनाएं समुद्र में उतरकर वास्तविक परिस्थितियों जैसी स्थितियों में संयुक्त ऑपरेशन का अभ्यास करेंगी। (IFR–Milan 2026)

इस दौरान युद्धपोत, पनडुब्बियां, नौसैनिक हेलीकॉप्टर और विशेष बल एक साथ काम करेंगे। पनडुब्बी रोधी युद्ध अभ्यास में समुद्र के नीचे छिपी पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने की रणनीति पर काम किया जाएगा। हवाई रक्षा अभ्यास के तहत दुश्मन के हवाई हमलों से जहाजों की सुरक्षा की ट्रेनिंग दी जाएगी।

सर्च एंड रेस्क्यू मिशन के जरिए समुद्र में फंसे लोगों को बचाने की प्रक्रिया का अभ्यास होगा, जबकि एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन में समुद्री डकैती से निपटने की संयुक्त कार्रवाई दिखाई जाएगी। इसके अलावा ड्रोन और अन्य असिमेट्रिक खतरे, यानी छोटे लेकिन खतरनाक हमलों से बचाव की विशेष ट्रेनिंग भी दी जाएगी। आपदा राहत सिमुलेशन के माध्यम से तूफान या समुद्री दुर्घटना जैसी परिस्थितियों में राहत और सहायता पहुंचाने का अभ्यास किया जाएगा।

इस पूरे चरण का मुख्य उद्देश्य अलग-अलग देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना है, ताकि जरूरत पड़ने पर वे एकजुट होकर तेजी और प्रभावी तरीके से कार्रवाई कर सकें। यही इंटरऑपरेबिलिटी समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाती है। (IFR–Milan 2026)

क्यों है यह महत्वपूर्ण?

एक्सरसाइज मिलन 2026 केवल सैन्य अभ्यास नहीं है, बल्कि मैरीटाइम डिप्लोमेसी का बड़ा मंच है। इससे भारत की भूमिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में मजबूत होती है। यह आयोजन दिखाता है कि भारत समुद्र को प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि सहयोग का क्षेत्र मानता है। मिलन 2026 भाईचारे से शुरू होकर साझा सुरक्षा तक पहुंचने की एक बड़ी पहल है।

सीधे शब्दों में कहें, तो अगर आईएफआर समुद्र में खड़े जहाजों के जरिए शांति और भरोसे का संदेश देता है, तो मिलन एक्सरसाइज उसी भरोसे को समुद्र में मिलकर अभ्यास करके मजबूत करती है। यानी कि आईएफआर शांत माहौल में दोस्त बनाता है, जबकि मिलन एक्सरसाइज समुद्र में साथ काम करके उस दोस्ती को व्यवहार में साबित करती है। (IFR–Milan 2026)

114 राफेल डील की आहट के बीच फ्रांस से नई डिफेंस पार्टनरशिप, अब भारत में बनेगी HAMMER मिसाइल!

HAMMER Missile India France

HAMMER Missile India France: फ्रांस से होने वाली 114 राफेल डील की आहट के बीच फ्रेंच रक्षा मंत्री कैथरीन वॉट्रिन 17 फरवरी को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात करेंगी। दोनों देशों के रक्षा मंत्री बेंगलुरु में छठे भारत-फ्रांस एनुअल डिफेंस डॉयलॉग की सह-अध्यक्षता करेंगे। इस बैठक में न केवल एक अहम रक्षा सहयोग समझौते को अगले दस साल के लिए बढ़ाने की तैयारी है, बल्कि हैमर मिसाइल के संयुक्त निर्माण को लेकर समझौता ज्ञापन पर दस्तखत होने की उम्मीद है। यह फैसला भारत की सैन्य ताकत और रक्षा उत्पादन क्षमता दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

HAMMER Missile India France: दस साल के लिए बढ़ सकता है रक्षा समझौता

कैथरीन वॉट्रिन अक्टूबर 2025 में फ्रांस की रक्षा मंत्री बनी थीं। यह उनकी भारत की पहली आधिकारिक यात्रा है। उनकी इस यात्रा के दौरान दोनों देश मौजूदा रक्षा सहयोग समझौते को फिर से दस वर्षों के लिए बढ़ाने पर सहमत हो सकते हैं। इसका मतलब यह है कि टेक्नोलॉजी, ट्रेनिंग, जॉइंट एक्सरसाइज, सैन्य उद्योग और रणनीतिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों में सहयोग पहले से अधिक मजबूत होगा।

रक्षा मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इस बैठक में दोनों देशों के रक्षा संबंधों के भविष्य की दिशा तय की जाएगी। दोनों देश रक्षा उत्पादन, तकनीकी साझेदारी और मिलिटरी कॉर्डिनेशन और मजबूत करने की योजना पर काम कर रहे हैं। (HAMMER Missile India France)

हैमर मिसाइल का भारत में निर्माण

बैठक में हैमर मिसाइल के जॉइंट प्रोडक्शन को लेकर भी एमओयू पर दस्तखत हो सकते हैं। हैमर, यानी हाईली एजाइल मॉड्यूलर म्यूनिशन एक्सटेंडेड रेंज, एक प्रिसिजन गाइडेड एयर-टू-ग्राउंड हथियार है। यानी यह जमीन पर मौजूद लक्ष्यों को बेहद सटीक तरीके से निशाना बना सकता है। इसकी मारक क्षमता लगभग 70 किलोमीटर तक है। यह पहले से ही भारतीय वायुसेना के राफेल लड़ाकू विमानों में इंटीग्रेटेड है और ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर इसका निर्माण भारत में शुरू होता है, तो इससे आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में जरूरत पड़ने पर इसकी उपलब्धता आसान होगी।

यह मिसाइल खास तौर पर मजबूत और सुरक्षित ठिकानों पर हमला करने के लिए बनाई गई है। पहाड़ी इलाकों जैसे कठिन भूभाग में भी यह प्रभावी मानी जाती है। 36 राफेल विमानों की खरीद में यह हथियार शामिल नहीं था, लेकिन बाद में आपात खरीद प्रक्रिया के तहत इसे शामिल किया गया। अब अगर इसका निर्माण भारत में संयुक्त रूप से होता है, तो यह आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम होगा। (HAMMER Missile India France)

114 राफेल विमानों की चर्चा भी तेज

इसके अलावा भारत 114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमान खरीदने पर भी विचार कर रहा है। हालांकि इस बैठक में इसका औपचारिक ऐलान नहीं है, लेकिन इसे लेकर चर्चा तेज है। अगर यह सौदा आगे बढ़ता है तो इनमें से 96 विमानों का निर्माण भारत में ही किया जा सकता है, जबकि बाकी फ्लाई अवे कंडीशन में भारत आएंगे।

फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन इस परियोजना में अहम भूमिका निभा सकती है। इसके अलावा इंजन निर्माता सफरान पहले से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ जॉइंट वेंचर में हेलीकॉप्टर इंजन बना रही है। (HAMMER Missile India France)

टाटा एयरबस की हेलीकॉप्टर असेंबली लाइन

बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों कर्नाटक के वेमगल में टाटा एयरबस की एच-125 लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर फाइनल असेंबली लाइन का वर्चुअल उद्घाटन करेंगे। यह परियोजना भी मेक इन इंडिया पहल के तहत आगे बढ़ाई जा रही है।

एच-125 हल्का उपयोगी हेलीकॉप्टर है, जिसका इस्तेमाल नागरिक और सुरक्षा दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। भारत में इसकी अंतिम असेंबली लाइन शुरू होना मेक इन इंडिया पहल के तहत एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (HAMMER Missile India France)

सैन्य अधिकारियों की परस्पर तैनाती

बैठक में भारतीय सेना और फ्रांसीसी थल सेना के बीच अधिकारियों की परस्पर तैनाती की घोषणा भी हो सकती है। इसका उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच आपसी समझ, प्रशिक्षण और सामरिक तालमेल बेहतर बनाना है। इससे प्रशिक्षण और सामरिक अनुभव साझा करने में मदद मिलेगी। (HAMMER Missile India France)

लंबे समय से मजबूत रिश्ते

भारत और फ्रांस के संबंधों में रक्षा संबंध हमेशा से मजबूत रहे हैं। 2023 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस के बैस्टिल डे परेड में मुख्य अतिथि थे। इसके बाद 2024 में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बने। जिसके बाद दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत हुए।

दोनों देश नियमित रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास भी करते हैं। थल सेना के साथ शक्ति अभ्यास, नौसेना के साथ वरुण अभ्यास और वायुसेना के साथ गरुड़ अभ्यास आयोजित किए जाते हैं। इन अभ्यासों से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल और जॉइंट ऑपरेशनल कैपेबिलिटी मजबूत होती है।

हाल ही में भारत-यूरोपीय संघ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी समझौता भी हुआ है। इससे यूरोपीय देशों के साथ सामूहिक सहयोग बढ़ाने का रास्ता खुला है। फ्रांस इस दिशा में भारत का प्रमुख साझेदार है। (HAMMER Missile India France)

406 करोड़ की लागत से मेरठ से होगी पाकिस्तान-चीन सीमा की निगरानी! पहला ड्रोन एयरबेस बनाने के पीछे यह है वजह

Meerut Drone Airbase

Meerut Drone Airbase: रक्षा मंत्रालय ने मेरठ में देश का पहला डेडिकेटेड ड्रोन एयरबेस बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। यह एयरबेस खास तौर पर ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट यानी आरपीए के लिए तैयार किया जाएगा। इसका मकसद सेना की निगरानी और स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत बनाना है। इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय के तहत काम काम करने वाले बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ को दी गई है। (Meerut Drone Airbase)

Meerut Drone Airbase: 406 करोड़ रुपये की लागत

यह परियोजना करीब 406 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होगी। मेरठ के किला रोड इलाके में लगभग 900 एकड़ जमीन पर यह बेस बनाया जाएगा। इसे आधुनिक सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है, ताकि हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस यानी HALE कैटेगरी के ड्रोन यहां से ऑपरेट किए जा सकें। ऐसे ड्रोन लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और कई घंटों तक आसमान में रहकर निगरानी कर सकते हैं। (Meerut Drone Airbase)

2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे

इस एयरबेस का सबसे अहम हिस्सा होगा 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे। यह रनवे सिर्फ ड्रोन के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे सी-295 और सी-130 जैसे विमानों के लिए भी इस्तेमाल होगा। रनवे पर आईसीएओ कैट-2 मानक की लाइटिंग और नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, ताकि कम विजिबिलिटी यानी धुंध या खराब मौसम में भी सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग हो सके। (Meerut Drone Airbase)

हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन

बेस पर दो बड़े हैंगर बनाए जाएंगे, जिनका आकार 60 गुणा 50 मीटर होगा। इन हैंगरों में ड्रोन की मेंटेनेंस, मरम्मत और तेजी से तैनाती की सुविधा होगी। अनुमान है कि यह बेस हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन संभाल सकेगा। यानी औसतन रोजाना चार ड्रोन उड़ानें यहां से ऑपरेट की जा सकेंगी। यह अनमैन्ड सिस्टम्स के लिए एक स्ट्रैटेजिक नर्व सेंटर बनेगा। (Meerut Drone Airbase)

क्यों किया ड्रोन बेस बनाने का फैसला

सूत्रों का कहना है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। इसके पीछे ऑपरेशन सिंदूर को बड़ी वजह माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था। उस दौरान ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। ड्रोन ने सटीक हमलों (प्रिसिजन टारगेटिंग) और निगरानी (सर्विलांस) में अहम भूमिका निभाई। इस अनुभव से सेना को यह समझ आया कि भविष्य का युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा, बल्कि अनमैन्ड सिस्टम यानी बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म की भूमिका और बढ़ेगी। (Meerut Drone Airbase)

एक वरिष्ठ सेना अधिकारी के मुताबिक, पाकिस्तान और चीन की तरफ से ड्रोन से जुड़े खतरे लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह लंबे समय तक लगातार काम करने वाले यूएवी (बिना पायलट वाले विमान) ऑपरेशन नेटवर्क तैयार करे। अगर ड्रोन के लिए अलग से एक समर्पित बेस होगा, तो सैनिकों की ट्रेनिंग, ड्रोन की मेंटेनेंस और उन्हें जरूरत के समय तुरंत तैनात करना आसान हो जाएगा। उनका कहना है कि भविष्य का डिफेंस सिस्टम डेटा पर आधारित और बिना पायलट वाले सिस्टम पर टिक होगा। उनके अनुसार, ऐसी तैयारी से भारत की ताकत इतनी बढ़ेगी कि दुश्मन देशों के लिए यह बड़ी चिंता की वजह बन जाएगी।

वह कहते हैं, मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन दुश्मन के इलाके में बिना सैनिकों को खतरे में डाले निगरानी कर सकते हैं। रीयल टाइम इंटेलिजेंस यानी तुरंत जानकारी उपलब्ध कराते हैं। लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सटीक हमले (प्रिसिजन टारगेटिंग) भी कर सकते हैं। ऐसे में एक समर्पित ड्रोन एयरबेस की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। (Meerut Drone Airbase)

प्रोजेक्ट के लिए क्यों चुना मेरठ को

मेरठ को इस प्रोजेक्ट के लिए चुनने के पीछे कई रणनीतिक वजहें हैं। सबसे पहले इसकी भौगोलिक स्थिति की बात करें यह दिल्ली के करीब 70 किमी दूर है और उत्तर भारत के केंद्र में स्थित है। यहां से पश्चिमी सीमा यानी पाकिस्तान बॉर्डर और उत्तरी सीमा यानी चीन की ओर निगरानी करना आसान होगा। यह आतंकी घुसपैठ या सैन्य गतिविधियों को तुरंत डिटेक्ट करने में मदद करेगा। यहां से ड्रोन आसानी से पंजाब, राजस्थान और जम्मू क्षेत्र की ओर तैनात किए जा सकते हैं। उत्तरी सीमा की निगरानी के लिए भी यह बेहतरीन जगह है।

दूसरा कारण है यहां का मौजूदा मिलिटरी और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर है। मेरठ के पास हिंडन एयरबेस है, जो भारतीय वायुसेना का महत्वपूर्ण अड्डा है। इससे सपोर्ट और तालमेल आसान होगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का हिस्सा होने के कारण यहां रक्षा से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। (Meerut Drone Airbase)

वहीं तीसरी सबसे बड़ी वजह है कि मेरठ में सेना का बड़ा ईएमई (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर) वर्कशॉप है। भारतीय सेना के ईएमई कोर के तहत देशभर में आठ आर्मी बेस वर्कशॉप हैं। इनमें से 515 आर्मी बेस वर्कशॉप का मुख्यालय मेरठ में है। इसके साथ 510 आर्मी बेस वर्कशॉप भी यहीं काम करती है। बेस वर्कशॉप ग्रुप का हेडक्वार्टर भी मेरठ में है, जो बाकी वर्कशॉप्स को कॉर्डिनेट करता है।

मेरठ की 510 बेस वर्कशॉप में एयर डिफेंस सिस्टम, गाइडेड मिसाइल, शिल्का और क्वाड्रेट जैसे हथियार सिस्टम, मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर और भारी सैन्य वाहनों की मरम्मत और ओवरहॉलिंग होती है। ईएमई का मुख्य काम इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल उपकरणों की मरम्मत, मेंटेनेंस और स्वदेशीकरण करना है। पिछले कुछ सालों में यहां यूएवी यानी बिना पायलट वाले विमानों के स्पेयर पार्ट्स भी बनाए और टेस्ट किए जा चुके हैं। हाल में आयोजित ड्रोन शक्ति (ईगल ऑन आर्म) के तहत ड्रोन की मरम्मत और सपोर्ट का पूरा सिस्टम ईएमई वर्कशॉप्स पर बेस्ड है, जिसमें मेरठ की भूमिका अहम है। (Meerut Drone Airbase)

85 महीने में पूरा होगा प्रोजेक्ट

इस प्रोजेक्ट की कुल अवधि 85 महीने तय की गई है। इसमें सात महीने प्री-अवार्ड प्लानिंग के लिए, 18 महीने कंस्ट्रक्शन कार्य के लिए और इसके बाद मेंटेनेंस व निगरानी की अवधि शामिल है। बीआरओ ने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी के लिए ई-टेंडर भी जारी कर दिया है।

इस प्रोजेक्ट को बीआरओ के प्रोजेक्ट शिवालिक के चीफ इंजीनियर लीड करेंगे। एक बार पूरा होने पर, यह भारतीय सेना के लिए बॉर्डर रीजन पर निगरानी का हॉक आई बनेगा।

सूत्रों का कहना है कि यहां मौसम काफी सपोर्टिव है। अन्य जगहों जैसे जम्मू या लद्दाख की तुलना में, मेरठ कम रिस्की और स्केलेबल है। इसलिए यह जगह एक स्ट्रैटेजिक एविएशन हब बनाई जा सकती है, जो पूरे नॉर्थ इंडिया को कवर करेगी। (Meerut Drone Airbase)

ऑस्ट्रेलिया जाएंगे भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को देंगे मजबूती

Army Chief Australia Visit
Lieutenant General Simon Stuart, Chief of the Australian Army, welcomed by Indian Army Chief General Upendra Dwivedi (File Photo)

Army Chief Australia Visit: भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ऑस्ट्रेलिया के आधिकारिक दौरे पर रवाना हो रहे हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते हालात और बढ़ती रणनीतिक चुनौतियों के बीच दोनों देश अपने सैन्य संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश में हैं।

Army Chief Australia Visit: रिश्ते को और मजबूत करने की तैयारी

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मिलिटरी-टू-मिलिटरी सहयोग को और गहरा करना है। खास तौर पर ट्रेनिंग, जॉइंट एक्सरसाइज, प्रोफेशनल एक्सचेंज और क्षमता निर्माण जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। दोनों देश पहले से ही कई सैन्य अभ्यासों और रणनीतिक संवादों के जरिए एक-दूसरे के करीब आए हैं। अब इस रिश्ते को और मजबूत करने की तैयारी है। (Army Chief Australia Visit)

इस दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस फोर्सेज के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। बातचीत का मुख्य फोकस सेना-से-सेना सहयोग बढ़ाने पर रहेगा। इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग, प्रोफेशनल एक्सचेंज और क्षमता निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। दोनों देश पहले से ही कई जॉइंट एक्सरसाइज में हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें “ऑस्ट्राहिंद” एक्सरसाइज भी शामिल है। इस अभ्यास में दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे के साथ मिलकर काउंटर-टेरर ऑपरेशन, शहरी युद्ध और सामरिक ड्रिल का अभ्यास करते हैं। 2026 में इसका अगला संस्करण भारत में आयोजित किया जाना है। (Army Chief Australia Visit)

जनरल द्विवेदी अपने दौरे की शुरुआत सिडनी से करेंगे। वहां वे ऑस्ट्रेलियन डिफेंस फोर्सेज के फोर्सेज कमांड, स्पेशल ऑपरेशंस कमांड और सेकंड डिवीजन के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। सेकंड डिवीजन के सैनिक भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाले द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास “ऑस्ट्राहिंद” में भाग लेते हैं। यह अभ्यास हर साल बारी-बारी से दोनों देशों में आयोजित किया जाता है। 2026 में इसका अगला संस्करण भारत में होना तय है। माना जा रहा है कि इस दौरे के दौरान आने वाले संस्करण की तैयारियों पर भी चर्चा होगी। (Army Chief Australia Visit)

सिडनी के बाद सेना प्रमुख कैनबरा जाएंगे। वहां उनका औपचारिक स्वागत और गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा। इसके बाद उनकी मुलाकात ऑस्ट्रेलियाई सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल साइमन स्टुअर्ट से होगी। खास बात यह है कि दोनों अधिकारी अमेरिका के यूएस आर्मी वॉर कॉलेज के 2015 बैच के पूर्व छात्र रहे हैं। इससे उनके बीच प्रोफेशनल समझ पहले से मौजूद है। मुलाकात के दौरान दोनों देशों के सैन्य संबंधों, आधुनिकीकरण और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से बातचीत होगी। (Army Chief Australia Visit)

कैनबरा में ऑस्ट्रेलियन डिफेंस फोर्सेज मुख्यालय में एक राउंड टेबल चर्चा भी आयोजित की जाएगी। इसमें रक्षा सहयोग, आधुनिक तकनीक, भविष्य के युद्ध की तैयारी और मल्टी डोमेन ऑपरेशन जैसे विषय शामिल रहेंगे। आज के समय में युद्ध केवल जमीन पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि हवा, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष तक फैला हुआ है। ऐसे में दोनों देशों के लिए एक-दूसरे के अनुभव और रणनीति को समझना जरूरी माना जा रहा है। (Army Chief Australia Visit)

सेना प्रमुख ऑस्ट्रेलियन डिफेंस कॉलेज और ऑस्ट्रेलियन कमांड एंड स्टाफ कॉलेज भी जाएंगे, जहां वे अधिकारियों को संबोधित करेंगे। इसके अलावा वे चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज और डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस के सचिव से भी मुलाकात करेंगे। जॉइंट ऑपरेशंस कमांड मुख्यालय का दौरा कर वे ऑस्ट्रेलिया के इंटीग्रेटेड और मल्टी डोमेन ऑपरेशन सिस्टम के बारे में जानकारी लेंगे। आज के समय में युद्ध केवल जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि हवा, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष तक फैल चुका है। ऐसे में दोनों देशों के लिए एक-दूसरे के अनुभव साझा करना महत्वपूर्ण है।

अपने दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ऑस्ट्रेलियन वॉर मेमोरियल पर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि भी देंगे। यह कदम दोनों देशों के बीच सैन्य परंपराओं और बलिदान की साझा विरासत को सम्मान देने का प्रतीक है। वे ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय रक्षा पूर्व सैनिकों से भी मुलाकात करेंगे। इससे भारतीय सशस्त्र बलों और पूर्व सैनिकों के बीच संबंध और मजबूत होंगे। (Army Chief Australia Visit)

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। दोनों देश क्वाड समूह का हिस्सा हैं और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर जोर देते हैं। समुद्री सुरक्षा, संयुक्त अभ्यास और आपसी सूचना साझेदारी जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा है। हालांकि यह दौरा सैन्य स्तर पर भरोसा और तालमेल बढ़ाने के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

हाल ही में 2025 में दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच संवाद हुआ था, जिसमें समुद्री सुरक्षा, सूचना साझा करना और आपसी सहयोग बढ़ाने जैसे मुद्दों पर सहमति बनी थी। उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के रूप में इस दौरे को देखा जा रहा है। (Army Chief Australia Visit)

पिछले साल ऑस्ट्रेलियाई सेना प्रमुख आए थे भारत

इससे पहले 11 अगस्त 2025 ऑस्ट्रेलियाई सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल साइमन स्टुअर्ट चार दिन की आधिकारिक यात्रा पर भारत आए थे। उनकी यह यात्रा 11 से 14 अगस्त तक चली। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करना था। दोनों देशों के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग बढ़ रहा है। इसी दिशा में जनरल स्टुअर्ट और जनरल द्विवेदी के बीच विस्तार से बातचीत हुई थी। चर्चा में मिलिटरी-टू-मिलिटरी कॉपरेशन, आधुनिकीकरण, संयुक्त सैन्य अभ्यास, ट्रेनिंग और क्षमता निर्माण जैसे विषय शामिल रहे। (Army Chief Australia Visit)

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाला संयुक्त सैन्य अभ्यास “ऑस्ट्राहिंद” भी बातचीत का अहम हिस्सा रहा। अपनी यात्रा के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल स्टुअर्ट ने आगरा में 50 (इंडिपेंडेंट) पैराशूट ब्रिगेड का भी दौरा किया था। इससे उन्हें भारतीय सेना की ऑपरेशनल तैयारियों और क्षमताओं को करीब से देखने का अवसर मिला थ। खास बात यह है कि यह दौरा पारस्परिक था। (Army Chief Australia Visit)

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच “ऑस्ट्राहिंद” अभ्यास 2022 से शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियान, सामरिक अभ्यास और आपसी तालमेल बढ़ाना है। हर साल इस अभ्यास का स्तर और दायरा बढ़ाया जा रहा है। इसके अलावा भारत ने 2025 में “टैलिस्मन सेबर” नामक बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में भी हिस्सा लिया था, जिसकी अगली कड़ी 2027 में प्रस्तावित है। (Army Chief Australia Visit)

जनरल द्विवेदी ने पिछले कुछ महीनों में जापान, नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात और श्रीलंका जैसे देशों का भी दौरा किया है। इन सभी यात्राओं का उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना रहा है। ऑस्ट्रेलिया का यह दौरा भी उसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने भरोसेमंद साझेदारों के साथ मिलकर काम करना चाहता है। (Army Chief Australia Visit)

चीन सीमा से 300 किमी दूर भारत की नई एयरस्ट्रिप रणनीति, जानें डुअल फ्रंट वार को देखते हुए कितनी है जरूरी

Assam Emergency Landing Facility

Assam Emergency Landing Facility: जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के डिब्रूगढ़ जिले के मोरान इलाके में बने नए इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी पर भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से उतरकर इसे एक्टिव कर दिया। यह भारत की रक्षा तैयारी और बुनियादी ढांचे की सोच में आए बड़े बदलाव का संकेत था। अब देश के कुछ चुनिंदा नेशनल हाईवे सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर लड़ाकू और ट्रांसपोर्ट विमानों के लिए भी रनवे का काम कर सकते हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

मोरान में बना यह इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी यानी ईएलएफ पूर्वोत्तर भारत का पहला ऐसा हाईवे एयरस्ट्रिप है। यह नेशनल हाईवे-37 पर लगभग 4.2 किलोमीटर लंबा सीधा और मजबूत बनाया गया हिस्सा है। यह इलाका चीन सीमा से करीब 300 किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए रणनीतिक रूप से भी काफी अहम माना जा रहा है। (Assam Emergency Landing Facility)

Assam Emergency Landing Facility: आखिर हाईवे पर एयरस्ट्रिप की जरूरत क्यों?

युद्ध की स्थिति में दुश्मन की पहली नजर अक्सर एयरबेस पर होती है। अगर किसी कारण से स्थायी एयरबेस को नुकसान पहुंचता है या वे अस्थायी रूप से इस्तेमाल के लायक नहीं रहते, तो वायुसेना को वैकल्पिक रनवे की जरूरत पड़ती है। ऐसे में हाईवे पर बने ये इमरजेंसी लैंडिंग स्ट्रिप बहुत काम आते हैं।

इसके अलावा, अगर किसी विमान में उड़ान के दौरान तकनीकी खराबी आ जाए या ईंधन कम हो जाए और वह अपने बेस तक न पहुंच सके, तो वह इन हाईवे रनवे पर सुरक्षित उतर सकता है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप या चक्रवात के समय भी इनका इस्तेमाल राहत और बचाव कार्यों के लिए किया जा सकता है। (Assam Emergency Landing Facility)

मोरान एयरस्ट्रिप की क्या हैं खूबियां

प्रधानमंत्री के पहुंचने से पहले राफेल और सुखोई-30 जैसे फाइटर जेट्स ने यहां लैंडिंग कर अपनी क्षमता दिखाई। बाद में सी-130जे सुपर हरक्यूलिस जैसे भारी ट्रांसपोर्ट विमान ने भी सुरक्षित लैंडिंग की। इसके बाद एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर ‘ध्रुव’ ने कैजुअल्टी इवैक्यूएशन ड्रिल का प्रदर्शन किया।

सी-130जे एक चार इंजन वाला टर्बोप्रॉप विमान है, जिसका अधिकतम वजन लगभग 74,000 किलोग्राम तक हो सकता है। इतने भारी विमान का हाईवे पर उतरना यह दिखाता है कि इस स्ट्रिप को खास इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। (Assam Emergency Landing Facility)

कैसे बनाए जाते हैं ये इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी?

इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी कोई साधारण सड़क का हिस्सा नहीं होता। इसके लिए हाईवे का एक सीधा और लंबा हिस्सा चुना जाता है, जो आमतौर पर चार किलोमीटर से ज्यादा लंबा होता है।

इस हिस्से को खास तरीके से मजबूत किया जाता है ताकि वह तेज रफ्तार और भारी विमानों का भार सह सके। सड़क की सतह को हाई स्ट्रेंथ पेवमेंट से तैयार किया जाता है। दोनों ओर फेंसिंग और बैरियर लगाए जाते हैं ताकि ऑपरेशन के दौरान कोई वाहन, जानवर या आम लोग रनवे पर न आ सकें।

सड़क के बीच में सामान्य हाईवे की तरह डिवाइडर नहीं होता, क्योंकि विमान को एक सीधा और खुला रनवे चाहिए। इसके अलावा रनवे की तरह मार्किंग भी की जाती है, जिससे पायलट को लैंडिंग और टेकऑफ में आसानी हो। (Assam Emergency Landing Facility)

देशभर में कितनी ऐसी स्ट्रिप्स हैं?

रक्षा मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, भारतीय वायुसेना ने देशभर में 28 स्थानों की पहचान की है, जहां इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी बनाई जानी है या बनाई जा चुकी है।

इनमें असम में 5, पश्चिम बंगाल में 4, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात में 3-3, तमिलनाडु, बिहार, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में 2-2, जबकि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 1-1 स्थान शामिल हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र में 2021 में देश की पहली ऐसी हाईवे एयरस्ट्रिप का उद्घाटन किया गया था। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और अन्य एक्सप्रेसवे पर भी फाइटर जेट्स की लैंडिंग का अभ्यास हो चुका है। आंध्र प्रदेश के अड्डंकी में भी हाल ही में ऐसी सुविधा सक्रिय की गई थी। (Assam Emergency Landing Facility)

सिर्फ सेना के लिए नहीं हैं ये एयरस्ट्रिप्स

हालांकि इनका मुख्य उद्देश्य सैन्य जरूरतों को पूरा करना है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल नागरिक विमानों के लिए भी किया जा सकता है। अगर किसी पैसेंजर विमान में आपात स्थिति बन जाए, तो वह भी यहां उतर सकता है। मेडिकल इवैक्यूएशन या किसी विशेष टीम और उपकरण को तुरंत पहुंचाने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है। (Assam Emergency Landing Facility)

दुनिया में भी है यह व्यवस्था

हाईवे को एयरस्ट्रिप के रूप में इस्तेमाल करने का विचार नया नहीं है। शीत युद्ध के दौर में यूरोप के कई देशों ने इस मॉडल को अपनाया था। फिनलैंड, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, जर्मनी और पोलैंड जैसे देशों में डुअल यूज हाईवे आम बात है। एशिया में भी कई देश इस प्रयोग को अपना चुके हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

रणनीतिक सोच में बदलाव

मोरान में बना यह नया इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं है। यह भारत की रक्षा नीति में उस सोच को दिखाता है, जिसमें नागरिक बुनियादी ढांचे को सैन्य जरूरतों के साथ जोड़ा जा रहा है।

इसे डुअल यूज इंफ्रास्ट्रक्चर कहा जाता है, यानी एक ही ढांचा सामान्य समय में आम लोगों के लिए और संकट के समय में सेना के लिए काम आता है। इससे अलग से बड़े खर्च की जरूरत भी कम पड़ती है और तैयारियां भी मजबूत रहती हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

असम में बने इस नए एयरस्ट्रिप से खास तौर पर पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता बढ़ेगी। सीमा के पास स्थित इलाकों में मिलिटरी इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना आज की जरूरत है। स्पष्ट है कि आने वाले समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे और इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी देखने को मिल सकते हैं। (Assam Emergency Landing Facility)

असम में हाईवे पर उतरा सुपर हरक्यूलिस सी-130जे, पीएम ने क्यों चुना यही विमान? जानिए पूरी रणनीति

C-130J Super Hercules India

C-130J Super Hercules India: चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा से तकरीबन 300 किमी दूर असम के डिब्रूगढ़ जिले के मोरान इलाके में नेशनल हाईवे-37 पर बनी 4.2 किलोमीटर लंबी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी अब आधिकारिक रूप से सक्रिय हो गई है। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहली ऐसी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है, जो सीधे हाईवे पर तैयार की गई है। इसे नेशनल हाईवे-2 पर मोरान बाईपास के पास बनाया गया है। जरूरत पड़ने पर यहां फाइटर जेट और ट्रांसपोर्ट विमान सुरक्षित रूप से उतर और उड़ान भर सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से यहां उतरकर इस एयर स्ट्रिप का उद्घाटन किया। सवाल उठता है कि इतने बड़े और अहम कार्यक्रम के लिए यही विमान क्यों चुना गया? (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India: क्या है सी-130जे सुपर हरक्यूलिस?

शनिवार को प्रधानमंत्री विशेष विमान से चाबुआ एयरफील्ड से उड़ान भरकर सीधे इस नई एयर स्ट्रिप पर उतरे। उनके विमान की लैंडिंग के साथ ही यह सुविधा आधिकारिक रूप से शुरू हो गई। प्रधानमंत्री के पहुंचने से पहले भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने यहां अभ्यास किया। पहले राफेल और सुखोई-30 ने लैंडिंग कर अपनी क्षमता दिखाई। इसके बाद सी-130जे ने रनवे को छुआ। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के दौरान फाइटर और ट्रांसपोर्ट विमानों ने टेकऑफ और लैंडिंग ड्रिल का प्रदर्शन किया।

सुखोई विमानों ने फ्लाई-पास्ट किया, फिर ओवरशूट करते हुए रनवे के ऊपर से दोबारा गुजरे और तीसरे विमान ने लैंडिंग की। राफेल ने भी इसी तरह अपनी ऑपरेशनल कैपेबिलिटी दिखाई। बाद में एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान भी यहां रनवे पर उतरा। लेकिन सबसे खास सी-130जे की लैंडिंग रही। (C-130J Super Hercules India)

सी-130जे एक आधुनिक टैक्टिकल एयरलिफ्टर है। इसे अमेरिका की कंपनी लॉकहीड मार्टिन बनाती है। भारत ने इसके कुल 12 विमान खरीदे हैं। यह विमान सैनिकों, हथियारों, राहत सामग्री और विशेष बलों को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में सक्षम है। पहले छह विमान वर्ष 2008 में लिए गए थे और उसके बाद 2011 से 2019 के बीच छह और शामिल किए गए। आज ये सभी विमान उत्तर प्रदेश के हिंडन एयरबेस से ऑपरेट होते हैं और कई अहम अभियानों का हिस्सा रह चुके हैं। लेकिन इसे सिर्फ माल ढोने वाला विमान समझना भूल होगी। यह एक बहुउद्देश्यीय यानी मल्टी-रोल विमान है। (C-130J Super Hercules India)

कठिन इलाकों में काम करने की क्षमता

इसकी सबसे बड़ी है इसका कठिन इलाकों में काम करने की क्षमता। भारत का भूगोल बहुत विविध है। एक तरफ ऊंचे हिमालयी क्षेत्र हैं, दूसरी तरफ रेगिस्तान और समुद्री द्वीप। लद्दाख और अरुणाचल जैसे इलाकों में छोटे और ऊंचाई पर बने रनवे हैं। ऐसे स्थानों पर सामान्य विमान पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। लेकिन सी-130जे कम लंबाई वाले और कच्चे रनवे पर भी उतर सकता है। दौलत बेग ओल्डी जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे एयरस्ट्रिप पर भी इस विमान ने सफल लैंडिंग की है। गर्म और ऊंचाई वाले इलाकों में भी इसका प्रदर्शन बेहतर रहता है, जहां दूसरे विमानों की क्षमता आधी रह जाती है। (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India

स्पेशल ऑपरेशन के लिए है बेहद काम का

सी-130जे को भारतीय स्पेशल फोर्सेस की जरूरतों को ध्यान में रखकर खरीदा गया था। भारतीय विशेष बलों को ऐसे विमान की जरूरत थी जो चुपचाप, कम ऊंचाई पर और रात में भी सटीक उड़ान भर सके। इसमें इंफ्रारेड डिटेक्शन सिस्टम, नाइट विजन गॉगल्स के साथ काम करने की क्षमता, कम रोशनी में उतरने की सुविधा और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा प्रणाली जैसी आधुनिक तकनीकें हैं।

यह दुश्मन की नजर से बचकर सैनिकों को किसी भी इलाके में उतार सकता है और जरूरत पड़ने पर तेजी से निकाल भी सकता है। इसलिए यह स्पेशल ऑपरेशन के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। (C-130J Super Hercules India)

C-130J Super Hercules India

आपदा के समय है सबसे भरोसेमंद

सी-130जे केवल ट्रांसपोर्ट विमान नहीं है। यह पैराड्रॉप कर सकता है, राहत सामग्री गिरा सकता है, सर्च एंड रेस्क्यू मिशन कर सकता है, और जरूरत पड़ने पर निगरानी मिशन भी पूरा कर सकता है। जरूरत पड़ने पर हवाई ईंधन भरने की सुविधा के साथ लंबी दूरी तक उड़ सकता है। खोज और बचाव अभियान, प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत सामग्री पहुंचाना, घायलों को निकालना और निगरानी जैसे कई काम यह एक ही प्लेटफॉर्म से कर सकता है। 2011 में सिक्किम में आए भूकंप और बाद में उत्तराखंड की बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान इस विमान ने राहत कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी।

यह मेडिकल इवैक्यूएशन यानी घायल लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने में भी सक्षम है। बड़े केबिन और मजबूत इंजन के कारण यह भारी उपकरण भी ले जा सकता है। (C-130J Super Hercules India)

कई देशों की वायुसेनाएं करती हैं इसका इस्तेमाल

भारतीय वायुसेना ने इसे अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में परखा है। हिमालय, रेगिस्तान और समुद्री क्षेत्रों में इसकी उड़ान और लैंडिंग का परीक्षण किया गया। इन सभी जगहों पर यह भरोसेमंद साबित हुआ। इसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों की वायुसेनाएं भी इसी विमान का इस्तेमाल करती हैं। इससे संयुक्त अभ्यास के दौरान तालमेल बेहतर होता है।

सी-130जे की विश्वसनीयता भी इसकी बड़ी ताकत है। अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स कार्यक्रम के तहत इसकी खरीद समय पर और तय लागत में पूरी हुई। शुरुआती छह विमानों के अच्छे प्रदर्शन के बाद भारत ने छह और खरीदने का फैसला किया। (C-130J Super Hercules India)

रणनीतिक और कूटनीतिक कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे। यह भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग का एक बड़ा कदम था। कई दशकों बाद दोनों देशों के बीच इतना बड़ा रक्षा सौदा हुआ। भारत ने अपने सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए इसमें स्वदेशी तकनीकों को भी जोड़ा और जरूरत के अनुसार बदलाव किए। भविष्य में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इसके कुछ हिस्सों के निर्माण की संभावना भी जताई गई है।

सी-130जे की खासियत यह है कि यह रणनीतिक और सामरिक दोनों स्तर पर उपयोगी है। चीन सीमा के पास ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिक और उपकरण पहुंचाने हों या किसी आपदा में तुरंत राहत पहुंचानी हो, यह विमान हर परिस्थिति में काम आता है। इसकी गति, विश्वसनीयता और बहुउपयोगिता इसे भारतीय वायुसेना के सबसे अहम विमानों में से एक बनाती है। (C-130J Super Hercules India)

पूर्वोत्तर में इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी क्यों जरूरी?

युद्ध की स्थिति में दुश्मन सबसे पहले एयरबेस को निशाना बनाता है। अगर मुख्य रनवे क्षतिग्रस्त हो जाएं, तो वैकल्पिक रनवे जरूरी होते हैं। देश में कई जगहों पर ऐसी सुविधाएं बनाने की योजना है। असम में बनी यह पहली इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी है।

असम की यह एयर स्ट्रिप रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र संवेदनशील इलाका है और यहां तेज सैन्य तैनाती की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी सुविधाएं सेना को तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करती हैं। आपात स्थिति में विमान सीधे हाईवे पर उतरकर सैनिकों, राहत सामग्री या उपकरणों की आपूर्ति कर सकते हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर क्षेत्र बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भी प्रभावित रहता है। ऐसे में यदि सामान्य एयरपोर्ट तक पहुंच संभव न हो, तो यह एयर स्ट्रिप राहत अभियान के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। (C-130J Super Hercules India)

और कहां इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी बनाने की है तैयारी

संसद में दी गई जानकारी के अनुसार भारतीय वायुसेना ने देश के अलग-अलग राज्यों में कुल 28 स्थानों की पहचान की है, जहां ऐसी सुविधा बनाई जानी है। इनमें असम में 5, पश्चिम बंगाल में 4, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात में 3-3, तमिलनाडु, बिहार, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में 2-2, जबकि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 1-1 स्थान शामिल हैं।

इनमें से कई स्थानों पर काम पूरा हो चुका है और कुछ जगहों पर अभ्यास भी किए जा चुके हैं। इससे पहले राजस्थान के बाड़मेर में 2021 में पहली इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी सक्रिय की गई थी।

दिल्ली-आगरा एक्सप्रेसवे और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर भी पहले वायुसेना अभ्यास कर चुकी है। आंध्र प्रदेश के अड्डंकी में भी ऐसी सुविधा हाल ही में शुरू की गई थी। (C-130J Super Hercules India)