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India-Russia Strategic Partnership: नई चुनौतियों में भी काम आएगी पुरानी दोस्ती, अब सिर्फ खरीदारी नहीं, साथ मिलकर बनाएंगे हथियार

India-Russia Strategic Partnership

India-Russia Strategic Partnership: भारत और रूस के छह दशक पुराने रक्षा संबंधों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 23वीं वार्षिक शिखर बैठक के बाद एक संयुक्त बयान जारी किया। दोनों देशों ने तय किया है कि अब रक्षा सहयोग का नया आधार को-रिसर्च, को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन होगा। यह कदम भारत के ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भरता पहल को मजबूती देने के लिए उठाया गया है। दोनों पक्षों ने “स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को और मजबूत करने पर सहमति जताई है।

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संयुक्त बयान में कहा गया कि साल 2000 में घोषित स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को इस साल 25 वर्ष पूरे हो गए हैं और दोनों नेताओं ने पारस्परिक विश्वास व राष्ट्रीय हितों के सम्मान का फिर से उल्लेख किया। बयान में दोनों पक्षों ने बताया कि द्विपक्षीय संबंध समय की कसौटी पर खरे रहे हैं और जियोपॉलिटिकल अस्थिरता के बावजूद यह रिश्ता मजबूत बना हुआ है। बयान में दोनों देशों ने सभी स्तरों पर बढ़ते संपर्कों और उच्चस्तरीय दौरों को संतोषजनक बताया। (India-Russia Strategic Partnership)

India-Russia Strategic Partnership: फोकस जॉइंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर

भारत और रूस का रक्षा सहयोग दशकों पुराना है। पहले भारत रूस से हथियार खरीदता था। लेकिन अब यह रिश्ता बदल रहा है। जॉइंट स्टेटमेंट में साफ लिखा है कि भारत की आत्मनिर्भर पहल को देखते हुए अब फोकस जॉइंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट (साथ मिलकर नई टेक्नोलॉजी बनाना), को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन यानी साथ मिलकर हथियार बनाने पर है। (India-Russia Strategic Partnership)

जॉइंट स्टेटमेंट में दोनों देशों के बीच हुई 22वीं इंडिया-रशिया इंटर-गवर्नमेंटल कमिशन ऑन मिलिटरी एंड मिलिटरी-टेक्निकल को-ऑपरेशन (RIGC-M&MTC) बैठक का हवाला देते हुए कहा गया कि भारत में रूसी हथियारों के स्पेयर पार्ट्स, कंपोनेंट्स और मेंटेनेंस का प्रोडक्शन होगा। मेक इन इंडिया के तहत यह किया जाएगा। साथ ही, भारतीय सेनाओं की जरूरत पूरी करने के साथ-साथ तीसरे देशों को एक्सपोर्ट भी किया जाएगा। इसके साथ ही जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज इंद्रा जारी रखने पर भी सहमति जताई गई। (India-Russia Strategic Partnership)

अब सिर्फ खरीदारी नहीं, साथ मिलकर बनाएंगे हथियार

दोनों देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि भारत की आत्मनिर्भरता जरूरतों को देखते हुए रक्षा साझेदारी को इस दिशा में बढ़ायाजा रहा है, ताकि एडवांस टेक्नोलॉजी और मॉडर्न डिफेंस सिस्टम्स भारत में ही डेवलप और मैन्युफैक्चर किए जा सकें।

यह बदलाव भविष्य की कई डिफेंस प्रोजेक्ट्स के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान, एयरो-इंजन, समुद्री इंजन, रडार और मिसाइल सिस्टम्स शामिल हैं, जिनकी जरूरत आने वाले सालों में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को होगी। रूस के पास इन सेक्टर्स में पहले से ही एडवांस टेक्नोलॉजी है जिनमें एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम और पांचवीं पीढ़ी का सुखोई-57 लड़ाकू विमान शामिल हैं। (India-Russia Strategic Partnership)

फिलहाल ब्रह्मोस मिसाइल ही भारत-रूस की सबसे प्रमुख संयुक्त परियोजना है। हालांकि, इसका मूल डिजाइन सोवियत काल के याखोंट मिसाइल से लिया गया था, जिसे भारत ने अपनाकर आगे डेवलप किया है।

करीब दस साल पहले भारत ने रूस के साथ पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को संयुक्त रूप से डेवलप करने की परियोजना से खुद को अलग कर लिया था। दो वर्ष पहले दोनों देशों ने भारत में एके-203 राइफल बनाने के लिए जॉइंट प्रोडक्शन शुरू किया, हालांकि इसका डिजाइन रूस में ही डेवलप हुआ था।

भारत में कई रूसी प्लेटफॉर्म जैसे सुखोई-30 एमकेआई, टी-90 टैंक और मिग-21 लाइसेंस के तहत बनाए जाते हैं, लेकिन उनके डिजाइन और महत्वपूर्ण तकनीक अब भी रूस के पास ही है।

मोदी-पुतिन वार्ता में दोनों देशों ने सैन्य सहयोग को और बढ़ाने का फैसला किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते रूसी हथियारों के स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता को हल करने के लिए अब भारत में ही इनके जॉइंट प्रोडक्शन पर सहमति बनी है। (India-Russia Strategic Partnership)

संयुक्त बयान के अनुसार, “दोनों पक्षों ने सहमति जताई कि रूस में बने हथियारों और उपकरणों के मेंटेनेंस के लिए जरूरी स्पेयर पार्ट्स, कंपोनेंट्स और अन्य मैटेरियल्स का उत्पादन भारत में संयुक्त रूप से किया जाएगा।”

यह उत्पादन ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और जॉइंट वेंचर्स के जरिए किया जाएगा। इसके साथ ही, ऐसे उपकरणों को दोस्ताना देशों को निर्यात करने की भी संभावना रहेगी।

वार्ता में भारत–रूस इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन ऑन मिलिटरी एंड मिलिटरी टेक्निकल कोऑपरेशन की 22वीं बैठक के नतीजों का भी स्वागत किया गया, जिसमें कई महत्वपूर्ण सहमति बनी थी। (India-Russia Strategic Partnership)

India-Russia Strategic Partnership: यूएनएससी में भारत को सपोर्ट

बयान में आतंकवाद विरोधी सहयोग पर दोनों पक्षों ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों देशों ने हालिया आतंकवादी घटनाओं की कड़ी निंदा की और संयुक्त रूप से यूएन में सूचिबद्ध आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सहयोग बढ़ाने तथा टेररिज्म फाइनेंसिंग और पारंपरिक तथा डिजिटल माध्यमों से रेडिकलाइजेशन को रोकने पर सहमति व्यक्त की।

बहु-पक्षीय मंचों में भी सहयोग पर दोनों ने विचार साझा किया। संयुक्त बयान में जी20, ब्रिक्स, एससीओ और संयुक्त राष्ट्र के तहत सहयोग को आगे बढ़ाने का संकल्प है। दोनों पक्ष यूएनएससी में सुधार, बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति प्रतिबद्धता पर भी सहमत दिखे। रूस ने भारत के यूएनएससी के नियमित सदस्य के रूप में शामिल होने के समर्थन की बात दोहराई। (India-Russia Strategic Partnership)

क्यों है यह समिट इतनी महत्वपूर्ण?

दुनिया में दो खेमे बन रहे हैं– एक अमेरिका का, दूसरा रूस-चीन का। भारत दोनों से अच्छे संबंध रखता है। यह समिट दिखाता है कि भारत अपनी राह खुद बनाता है। डिफेंस में नई पार्टनरशिप से भारत मजबूत बनेगा, रूस को भी सपोर्ट मिलेगा। जियोपॉलिटिक्स में यह संदेश है कि पुरानी दोस्ती नई चुनौतियों में भी काम आएगी। (India-Russia Strategic Partnership)

Sapperscout RP 2.0: भारतीय सेना के मेजर राजप्रसाद ने तैयार किया भारत का पहला मल्टी-यूटिलिटी यूजीवी, Innoyodha-2025 में किया शोकेस

Sapperscout RP 2.0

Sapperscout RP 2.0: भारतीय सेना के 7 इंजीनियर रेजिमेंट के मेजर राजप्रसाद आरएस ने देश का पहला स्वदेशी मल्टी-यूटिलिटी अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल (यूजीवी) तैयार किया है। इस यूजीवी का नाम सैपरस्काउट आरपी 2.0 है। इस व्हीकल को इनोयोद्धा-2025 में शोकेस किया गया, जहां कोर कमांडर इन चीफ के समक्ष मेजर राजप्रसाद ने इसका डेमोंस्ट्रेशन दिया। इस आयोजन में चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल उपेन्द्र द्विवेदी भी उपस्थित रहे।

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मेजर राजप्रसाद के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि यह उनका बनाया 12वां मिलिटरी इनोवेशन है। इनमें से चार इनोवेशन पिछले दो वर्षों में भारतीय सेना में शामिल भी किए जा चुके हैं। जिनमें विद्युत रक्षक (IoT आधारित जनरेटर मॉनिटरिंग सिस्टम) और अग्निअस्त्र (मल्टी-टारगेट पोर्टेबल डेटोनेशन सिस्टम) शामिल हैं।

राजधानी दिल्ली में शुक्रवार को मानेकशॉ सेंटर में सर्विस लेवल इनोवेशन कंपटीशन का आयोजन किया गया था। सैपरस्काउंट यूजीवी में माइन डिटेक्शन, सर्विलांस और रिकॉन्सेंस, पेलोड कैरिज, व्हीकल-बेस्ड माइन-स्कैटरिंग और कैजुअल्टी इवैक्यूएशन जैसी खूबियां हैं।

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सैपरस्काउट आरपी 2.0 एक मल्टी-रोल अनमैन्ड ग्राउंड सिस्टम है, जिसे बिना किसी जवान को खतरे में डाले कई महत्वपूर्ण मिशन पूरे करने के लिए बनाया गया है। यह एक ऑल-टेरेन प्लैटफॉर्म है, यानी रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ और ऊंचाई वाले इलाकों में आसानी से चल सकता है। सैपरस्काउट छह पहियों वाला, अलग-अलग ड्राइव सिस्टम और आर्टिकुलेटेड सस्पेंशन के साथ आता है, जिससे यह ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र में भी स्टैबिलिटी बनाए रखता है।

इस व्हीकल में एन्वायर्नमेंटल सेंसिंग और ऑब्स्टेकल डिटेक्शन की भी सुविधा है, जिसे कॉमन-यूएएस सिस्टम जैसे अलग-अलग पेलोड्स इंस्टॉल करने के लिए मॉड्यूलर बनाया गया है। यूजीवी की मदद से टारगेट को दूर से एंगेज करने, सीमावर्ती इलाकों में फ्लैंक प्रोटेक्शन, गोला-बारूद और ईंधन की सप्लाई, साथ ही काउंटर-अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम ग्रिड बनाना काफी आसान हो जाएगा। साथ ही, यह हाई-एल्टीट्यूड रीजन और रेगिस्तान जैसे कठिन इलाकों में भी सेना की बड़ी जरूरतों को पूरी करेगा।

मेजर राजप्रसाद ने बताया कि सैपरस्काउट 2.0 भारत का पहलाा इन-हाउस यूजीवी है, जिसे कई कामों के लिए तैयार किया गया है। सैपरस्काउट का इस्तेमाल उपयोग मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग यानी मैन-यूजीवी टीमिंग में किया जा सकता है। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह मैकेनाइज्ड और ग्राउंड फोर्सेज खतरनाक जगहों में बिना मानव जोखिम के मिशन पूरे कर सकेंगी। डेमो में व्हीकल ने अलग-अलग इलाकों में अपने सेंसर्स और नेविगेशन सिस्टम से सफल परफॉर्मेंस दिखाई। इस दौरान एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी और अन्य इंडस्ट्री पार्टनर्स भी मौजूद थे। मेजर राजप्रसाद ने बताया कि व्हीकल की टेस्टिंग विभिन्न भौगोलिक इलाकों में की गई जहां इसे थर्मल, रेन और रोकी मोड में परखा गया।

India Russia defence projects: पुतिन की यात्रा के दौरान इन डील्स पर लग सकती है अंतिम मुहर, तीसरी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन पर भी चल रही बातचीत

India Russia defence projects-
Prime Minister of India Narendra Modi welcomed Russian President Vladimir Putin (Photo: X/@narendramodi)

India Russia defence projects: भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने के लिए इस सप्ताह होने वाली उच्च स्तरीय बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट्स पर चर्चा होने जा रही है। इन प्रोजेक्ट्स में भारतीय वायुसेना के सु-30एमकेआई लड़ाकू विमानों का दूसरा बड़ा ओवरहॉल, लंबी दूरी तक वार करने वाली आर-37 एयर-टू-एयर मिसाइल, एस-400 और एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम, चक्र-III एसएसएन सबमरीन और ब्रह्मोस एनजी जैसी नई मिसाइलों का डेवलपमेंट शामिल है। ये चर्चाएं ऐसे समय हो रही हैं जब भारत और रूस दोनों अपने रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

India Russia defence projects: सुखोई-30 लड़ाकू विमानों का दूसरा ओवरहॉल

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, सुखोई-30 लड़ाकू विमानों का दूसरा ओवरहॉल भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है। इस ओवरहॉल का उद्देश्य इन विमानों की क्षमता को आधुनिक बनाना है। भारत के पास ऐसे कुल 272 सु-30एमकेआई लड़ाकू विमान हैं, जिनमें से लगभग 100 विमानों को रूस के साथ साझेदारी में अपग्रेड किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट भारतीय एजेंसियों द्वारा किए जा रहे 84 विमानों के स्वदेशी अपग्रेड से अलग होगा। सु-30एमकेआई भारतीय वायुसेना की रीढ़ माने जाते हैं, इसलिए उनकी आधुनिक क्षमता बनाए रखना बेहद जरूरी है। (India Russia defence projects)

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आर-37 एयर-टू-एयर मिसाइल

इसी सूची में आर-37 एयर-टू-एयर मिसाइल भी शामिल है। यह मिसाइल 200 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी तक मार कर सकती है। सूत्रों के अनुसार भारत 300 से अधिक आर-37 मिसाइलें खरीदने पर विचार कर रहा है, जिससे वायुसेना की क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी। यह मिसाइलें चीन और पाकिस्तान की ओर से ऑपरेट किए जा रहे लंबी दूरी की मिसाइलों से मुकाबले की क्षमता देती हैं। इस मिसाइल की रेंज और सटीकता से एयर-डॉमिनेंस में बढ़ोतरी मिलती है। (India Russia defence projects)

एस-400/एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम

इसके अलावा रूस के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की चर्चा भी पुतिन की यात्रा के दौरान प्रमुख मुद्दों में शामिल है। भारत-रूस समझौते के तहत भारत को कुल पांच एस-400 स्क्वाड्रन मिलने हैं, जिनमें से तीन पहले ही भारत को मिल चुके हैं। बाकी दो स्क्वाड्रन अगले वित्त वर्ष तक मिल जाएंगे। एस-400 ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर में अपनी उपयोगिता को साबित किया है। भारत इसकी 280 से अधिक मिसाइलों का ऑर्डर भी देने की तैयारी कर रहा है। (India Russia defence projects)

इसी के साथ एस-500 सिस्टम पर बातचीत शुरू होने की भी संभावना है। एस-500 अभी रूस का सबसे आधुनिक एयर और मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, जिसे हाइपरसोनिक खतरों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। भारत ने इससे जुड़ी तकनीक और सहयोग में रुचि दिखाई है।

VSHORADS पर भी चर्चा

बैठक में वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस प्रणाली (VSHORADS) पर भी चर्चा हो सकती है। भारत पहले ही कुछ सिस्टम्स खरीद चुका है और अब नई जरूरतों के आधार पर और यूनिट्स लेने पर विचार कर रहा है। इन प्रणालियों का उपयोग हेलीकॉप्टर, ड्रोन, कम-ऊंचाई वाले हवाई खतरों को रोकने के लिए किया जाता है। (India Russia defence projects)

ब्रह्मोस एनजी भी शामिल

इसके अलावा बातचीत के एजेंडे ब्रह्मोस मिसाइल का नया वेरिएंट ब्रह्मोस एनजी भी शामिल होगा। ब्रह्मोस एनजी मौजूदा ब्रह्मोस से हल्की और छोटी मिसाइल है, जिसे सुखोई-30 सहित लगभग हर लड़ाकू विमान पर लगाया जा सकेगा। सूत्र बताते हैं कि यह मिसाइल 400 किलोमीटर से अधिक दूरी तक निशाना साध सकेगी, और इससे भारतीय वायुसेना की स्ट्राइक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। लंबी दूरी वाली ब्रह्मोस मिसाइल के अपग्रेड वर्जन पर भी चर्चा जारी है, जो मौजूदा क्षमता से तीन गुना ज्यादा दूरी तक हमला करने में सक्षम होंगे। (India Russia defence projects)

चक्र-III की लीज पर चर्चा

इसी यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच तीसरी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन (SSN) के लीज समझौते पर भी चर्चा हो रही है। चक्र-III नाम की यह अकुला-क्लास सबमरीन लगभग 3 अरब डॉलर की लागत से भारत को दी जा रही है। यह 2025 तक भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल हो सकती है। सबमरीन को इंडियन कम्यूनिकेशन सिस्टम और सेंसर से लैस किया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि भारत चक्र-II की लीज अवधि भी बढ़ाने पर विचार कर रहा है, क्योंकि नई सबमरीन आने में समय लगेगा। (India Russia defence projects)

India Russia defence projects
Prime Minister of India Narendra Modi welcomed Russian President Vladimir Putin (Photo: X/@narendramodi)

रूस के साथ अगर इन प्रोजेक्ट की डील होती है, तो इससे न केवल भारत की सैन्य क्षमता बढ़ेगी, बल्कि दोनों देशों की लंबी साझेदारी को भी मजबूती मिलेगी। रूस, पहले से ही भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक रक्षा साझेदार है, वहीं, इस यात्रा के साथ फिर से भारत के लिए केंद्रीय भूमिका निभाता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच हाइपरसोनिक मिसाइल, एयर-टू-एयर मिसाइल और पनडुब्बी तकनीक पर भी गहरी बातचीत चल रही है।

भारत और रूस के बीच यह रक्षा सहयोग दोनों देशों के लिए बेहद अहम है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक तनाव, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां और नई तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। पुतिन की इस यात्रा से पहले की गई तैयारियों और बैठकों से संकेत मिलता है कि आने वाले समय में भारत-रूस रक्षा साझेदारी और गहरी होगी। (India Russia defence projects)

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India Russia RELOS agreement

India Russia RELOS agreement: इस साल की शुरुआत में भारत और रूस के बीच एक अहम सैन्य समझौते RELOS पर दस्तखत हुए थे। वहीं रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान रूस की संसद ड्यूमा ने इस समझौते को हरी झंडी दे दी है। इस समझौते का नाम रिकॉप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट है, जो एक विशेष सैन्य समझौता है। यह समझौता फरवरी 2025 में मॉस्को में किया गया था। वहीं ड्यूमा की मंजूरी के बाद यह समझौता आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते की सबसे बड़ी खास बात यह है कि भारत और रूस एक-दूसरे के मिलिट्री बेस और लॉजिस्टिक फैसिलिटीज का इस्तेमाल कर सकेंगे।

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यह समझौता भारत को आर्कटिक क्षेत्र में रूस के सैन्य ठिकानों तक पहुंच देता है, जबकि रूस को भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण इंडियन ओशन रीजन यानी IOR में एंट्री और सपोर्ट की सुविधा मिलेगी। यह सहयोग दोनों देशों की रणनीतिक पहुंच को बड़ा विस्तार देता है।

क्या है India Russia RELOS agreement?

समझौते के मुताबिक, भारत और रूस एक समय में 5 वॉरशिप, 10 विमान और 3000 सैनिक तक एक-दूसरे के इलाकों में तैनात कर सकते हैं। यह समझौता 5 सालों के लिए होगा, जिसे आपसी सहमति से बढ़ाया भी जा सकता है। यह पहली बार है कि किसी सैन्य समझौते में विदेशी धरती पर सैनिकों की इतनी बड़ी संख्या तैनाती करने सुविधा मिलेगी।

इस समझौते के बाद भारतीय नौसेना को रूस के उत्तरी क्षेत्र, विशेषकर आर्कटिक के पास स्थित मुरमान्स्क और सेवेरोमॉर्स्क जैसे अत्यंत रणनीतिक बंदरगाहों तक पहुंच मिल सकेगी। आर्कटिक क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक बनने की दिशा की ओर अग्रसर है, जहां रूस और चीन दोनों अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं।

रूस की ओर से भी इस समझौते से बड़ा लाभ होगा। अब रूसी नौसेना को भारतीय क्षेत्र में ईंधन, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स, राशन और अन्य जरूरी सपोर्ट आसानी से मिल सकेगा। इससे रूस हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को बेहतर तरीके से बनाए रख सकेगा। भारतीय नौसेना की लॉजिस्टिक सुविधाओं के इस्तेमाल से रूस को इस इलाके में मदद मिलेगी।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों भारत की यात्रा पर हैं और ड्यूमा द्वारा इस समझौते को मंजूरी देना दोनों देशों के बीच मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का संकेत माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रूस के रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलोउसॉव नई दिल्ली में होने वाली अंतर-सरकारी बैठक में इस समझौते की आधिकारिक रूप से समीक्षा करेंगे।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, राजनाथ सिंह और आंद्रेई बेलोउसव दिल्ली में 22वें इंडिया-रशिया इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन फॉर मिलिट्री एंड मिलिट्री-टेक्निकल कोऑपरेशन की सह-अध्यक्षता करने वाले हैं। दोनों मंत्री सीमाओं, सैनिक सहयोग और चल रहे मिलिटरी-टेक्निकल प्रोजेक्टों को लेकर विस्तृत समीक्षा करेंगे। रक्षा मंत्रालय ने यह भी बताया कि बेलोउसव राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए पुष्पचक्र अर्पित करेंगे।

रेलोस समझौते की खास बात यह है कि यह समझौता युद्धकाल और सामान्य समय दोनों में लागू होगा। इसके तहत सैन्य जहाजों और विमानों को ईंधन भरने, भोजन, स्पेयर पार्ट्स, रिप्लेनिशमेंट और बेस में रुकने की सुविधा मिलेगी। यह भारत और रूस दोनों की सेनाओं को लंबी दूरी तक मिशन करने में मदद करेगा।

भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपनी दावेदारी बढ़ा रहा है। ऐसे समय में भारत को रूस के आर्कटिक मिलिट्री स्ट्रक्चर तक पहुंच मिलने से उसे वैश्विक स्तर पर नई रणनीतिक शक्ति मिलती है। इसी तरह रूस के लिए हिंद महासागर में भारत एक मजबूत और विश्वसनीय साझेदार बनकर उभर रहा है।

लेमोआ और रेलोस दोनों में क्या है अंतर

भारत इससे पहले अमेरिका के साथ लेमोआ (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट) कर चुका है, जिसके तहत भारत अमेरिकी मिलिट्री बेसों का लॉजिस्टिक इस्तेमाल कर सकता है। लेमोआ में सैनिक तैनाती की संख्या तय नहीं की जाती, जबकि रूस के साथ रेलोस में संख्या का स्पष्ट प्रावधान है। दोनों समझौतों का उद्देश्य लॉजिस्टिक सहयोग बढ़ाकर सैन्य ऑपरेशनों को आसान बनाना है।

हालांकि लेमोआ की तरह रेलोस भी कॉस्ट-रीइम्बर्सेबल यानी भुगतान आधारित व्यवस्था है, लेकिन रेलोस में कई बार गुड्स-एक्सचेंज या बार्टर की सुविधा भी संभव है। भारतीय नौसेना लंबे समय से उत्तरी समुद्री मार्ग की निगरानी और व्यावहारिक पहुंच चाहती थी, जो अब संभव हो सकेगी।

भारतीय नौसेना के सूत्रों का कहना है, यह समझौता भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” पॉलिसी का मजबूत उदाहरण है। भारत अब दोनों महाशक्तियों अमेरिका और रूस के साथ लॉजिस्टिक समझौते रखता है, जिससे उसकी समुद्री पहुंच दुनिया के हर दिशा में बढ़ जाती है।

भारत और रूस की सेनाएं पहले से संयुक्त अभ्यास और तकनीकी सहयोग करती रही हैं। अब रेलोस के तहत यह सहयोग और सरल हो जाएगा, क्योंकि जहाजों और विमानों को मेंटेनेंस, ईंधन और अन्य सपोर्ट तुरंत मिल सकेगा। विशेष रूप से समुद्री मिशनों, आपदा राहत अभियानों में इसका बड़ा फायदा मिलेगा।

रूस के साथ यह समझौता बढ़ते वैश्विक तनावों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इक्विपमेंट्स, बेस और सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल कर पाएंगी, जिससे उनकी ऑपरेशनल क्षमता और बढ़ जाएगी। भारतीय नौसेना का कहना है कि इससे मिशन की लागत भी कम होगी और समय भी बचेगा।

रूस के विदेश मामलों की समिति के उपाध्यक्ष व्याचेस्लाव निकोनोव ने पुष्टि की कि समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे के लॉजिस्टिक नेटवर्क का आसानी से इस्तेमाल कर पाएंगे।

DRDO Rocket Sled Test: डीआरडीओ ने किया फाइटर जेट के एस्केप सिस्टम का टेस्ट, कुछ ही देशों में है यह सुविधा

DRDO Rocket Sled Test
DRDO Rocket Sled Test

DRDO Rocket Sled Test: डीआरडीओ ने फाइटर एयरक्राफ्ट के एस्केप सिस्टम का हाई-स्पीड डायनामिक टेस्ट सफलतापूर्वक पूरा किया है। यह टेस्ट चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) के रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड फैसिलिटी में किया गया। यह वही जगह है जहां बेहद तेज रफ्तार पर असली उड़ान जैसी स्थितियों को कंट्रोल तरीके से सिम्युलेट किया जाता है।

DRDO Defence manufacturing: डीआरडीओ ने 25 फीसदी रक्षा शोध बजट निजी सेक्टर के लिए खोला, ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी को भी बनाया आसान

टेस्ट का मुख्य उद्देश्य यह जांचना था कि किसी आपातकाल में फाइटर जेट की कैनोपी सेवरेंस यानी कॉकपिट के शीशे का कटना, इजेक्शन सीक्वेंसिंग यानी सीट के बाहर निकलने का समय, और एयरक्रू रिकवरी यानी पायलट की सुरक्षित निकासी सबकुछ सही ढंग से काम करता है या नहीं। (DRDO Rocket Sled Test)

इस हाई-स्पीड टेस्ट में एलसीए तेजस के फोरबॉडी को एक ड्यूल-स्लेड सिस्टम पर फिट किया गया। इसके नीचे कई सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट मोटर्स लगाई गईं, जिनकी फेज्ड फायरिंग से स्लेड को तेज रफ्तार दी गई। इस दौरान एक इंस्ट्रूमेंटेड एंथ्रोपोमॉर्फिक टेस्ट डमी का इस्तेमाल किया गया, जो असली पायलट के शरीर पर लगने वाले झटके, दबाव और स्पीड को रिकॉर्ड करती है। पूरा परीक्षण ऑनबोर्ड कैमरों और ग्राउंड बेस्ड सिस्टम से रिकॉर्ड किया गया। (DRDO Rocket Sled Test)

डीआरडीओ ने यह टेस्ट एडीए, एचएएल और इंडियन एयर फोर्स के साथ मिलकर किया। यह टेस्ट इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि डायनामिक इजेक्शन टेस्ट दुनिया के सिर्फ कुछ देशों में किया जाता है। इस तरह के टेस्ट असली उड़ान जैसी मुश्किल परिस्थितियों में सिस्टम की क्षमता को प्रमाणित करते हैं। (DRDO Rocket Sled Test)

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता पर डीआरडीओ और सभी सहयोगी संगठनों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत की आत्मनिर्भर रक्षा तकनीक की बड़ी छलांग है। डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने भी टीम की सराहना की और कहा कि यह उपलब्धि पायलट सुरक्षा सिस्टम की मजबूती को साबित करती है। (DRDO Rocket Sled Test)

वहीं, इस टेस्ट ने एक बार फिर दिखा दिया कि भारत अब फाइटर एयरक्राफ्ट से जुड़ी कॉम्प्लेक्स टेक्नीक्स की टेस्टिंग भी खुद करने में सक्षम है। इससे भारतीय लड़ाकू विमानों खासकर तेजस और आने वाले नए फाइटर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा क्षमता और मजबूत होगी। (DRDO Rocket Sled Test)

Indian Maritime Doctrine 2025: भारतीय नौसेना ने जारी की नई मैरीटाइम डॉक्ट्रिन, पहली बार “नो-वार, नो-पीस” की अलग कैटेगरी

Indian Maritime Doctrine 2025
Indian Maritime Doctrine 2025

Indian Maritime Doctrine 2025: भारतीय नौसेना ने 2 दिसंबर को अपनी नई इंडियन मैरीटाइम डॉक्ट्रिन 2025 जारी की। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने नौसेना दिवस से पहले आयोजित वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह दस्तावेज जारी किया। यह डॉक्ट्रिन 2004 में पहली बार तैयार हुआ था, जिसे 2009 और 2015 में अपडेट किया गया। अब 2025 का संस्करण भारत के बदलते समुद्री माहौल और रणनीतिक सोच को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह आधुनिक रूप में सामने आया है।

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नया मैरीटाइम डॉक्ट्रिन (Indian Maritime Doctrine 2025) नौसेना के लिए एक तरह की “गाइड बुक” है, जो यह समझाती है कि नौसेना क्या करती है, क्यों करती है और भविष्य में कैसे काम करेगी। यह पूरे कॉन्फ्लिक्ट स्पेक्ट्रम शांतिपूर्ण समय से लेकर संघर्ष की स्थिति तक नौसेना की भूमिकाओं को स्पष्ट करता है। इसमें भारत के समुद्री हितों को सुरक्षित रखने के लिए अपनाई जाने वाली रणनीति, ऑपरेशन और तकनीक के दिशा-निर्देश हैं।

डॉक्ट्रिन (Indian Maritime Doctrine 2025) में कहा गया है कि बीते एक दशक में भारत का समुद्री माहौल काफी बदल चुका है। हिंद महासागर क्षेत्र में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और नई तकनीकों के चलते सुरक्षा की चुनौतियां भी ज्यादा जटिल हो गई हैं। इसी वजह से नए डॉक्ट्रिन में भारत के बड़े विजन विकसित भारत 2047 को मुख्य आधार बनाया गया है। यह डॉक्ट्रिन सरकार की प्रमुख योजनाओं जैसे सागरमाला, पीएम गति शक्ति, मैरीटाइम इंडिया विजन 2030, मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 और महासागर विजन से भी जुड़ा हुआ है।

नई डॉक्ट्रिन (Indian Maritime Doctrine 2025) की सबसे खास बात यह है कि इसमें पहली बार “नो-वार, नो-पीस” को एक अलग कैटेगरी के तौर में शामिल किया गया है। यह वह स्थिति होती है जब देश युद्ध में नहीं होता, लेकिन तनाव या धमकी की स्थिति बनी रहती है। यह आज के समय की सबसे आम स्थिति है, जिसमें ग्रे-जोन, हाइब्रिड वॉरफेयर और अनियमित युद्ध जैसी चुनौतियां शामिल हैं। नौसेना अब इन परिस्थितियों के लिए भी औपचारिक रूप से तैयार होगी।

इसके अलावा डॉक्ट्रिन (Indian Maritime Doctrine 2025) में बताया गया है कि समुद्री सुरक्षा अब केवल समुद्र तक सीमित नहीं है। नई रणनीति में स्पेस, साइबर और कॉग्निटिव डोमेन को भी महत्वपूर्ण माना गया है। नौसेना अब अनक्रूड सिस्टम्स, ऑटोनॉमस प्लेटफॉर्म्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और क्वांटम तकनीक जैसी आधुनिक क्षमताओं को तेजी से अपनाएगी।

डॉक्ट्रिन का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा “ज्वाइंटनेस” है। इसमें कहा गया है कि सेना, नौसेना और वायुसेना अब भविष्य के ऑपरेशंस में और अधिक इंचटीग्रेटेड तरीके से काम करेंगे। यह नया स्ट्रक्चर ट्राई सर्विसेज जॉइंट डॉक्ट्रिन्स (Indian Maritime Doctrine 2025) के अनुरूप होगा, जिससे तीनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ेगी और ऑपरेशनल असर बेहतर होगा।

इंडियन मैरीटाइम डॉक्ट्रिन 2025 (Indian Maritime Doctrine 2025) का उद्देश्य भारत को समुद्री शक्ति के रूप में मजबूत स्थापित करना है। यह भारतीय नौसेना की प्राथमिकताएं भी स्पष्ट हैं, समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा, राष्ट्र के आर्थिक हितों की रक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करना शामिल है। डॉक्ट्रिन यह संदेश देती है कि समुद्र भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का मुख्य स्तंभ है और भारत अब एक “मैरीटाइम-कॉन्शस” राष्ट्र बनेगा।

डॉक्ट्रिन (Indian Maritime Doctrine 2025) यह भी बताती है कि नौसेना को रणनीति के अनुरूप अपनी क्षमताओं का विकास करना है। इसमें जहाजों, सबमरीनों, एयर असेट्स और नए तकनीकी प्लेटफॉर्म्स की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत भविष्य की किसी भी समुद्री चुनौती का सामना प्रभावी और समयबद्ध तरीके से कर सके।

Rafale M India Navy: 2029 से नौसेना को मिलेंगे पहले चार राफेल-एम, एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत पर होंगे तैनात

Rafale M India Navy

Rafale M India Navy: भारतीय नौसेना के लिए आने वाले साल बेहद अहम साबित होने वाले हैं। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने बताया कि भारत को राफेल-एम (Rafale-Marine) फाइटर जेट की पहली खेप साल 2029 से मिलने लगेगी। उन्होंने यह बाात नौसेना दिवस 2025 से पहले आयोजित सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही। इस घोषणा के बाद भारत की कैरियर-बेस्ड एयर पावर को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं, क्योंकि नौसेना लंबे समय से एक आधुनिक मल्टी-रोल नेवी फाइटर जेट का इंतजार कर रही थी।

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एडमिरल त्रिपाठी ने बताया कि फ्रांस के साथ हुई इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट के तहत नौसेना को कुल 26 राफेल-एम मिलेंगे। इनमें 22 सिंगल-सीटर और 4 ट्विन-सीटर शामिल हैं। यह सौदा लगभग 64,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें ट्रेनिंग, सिम्युलेटर, एडवांस्ड वेपंस पैकेज, मेंटेनेंस सपोर्ट और परफॉर्मेंस-बेस्ड लॉजिस्टिक्स जैसी सुविधाएं जोड़ी गई हैं। नौसेना प्रमुख ने कहा कि “हम उम्मीद करते हैं कि 2029 तक चार राफेल-एम हमारे बेड़े का हिस्सा बन जाएंगे।” (Rafale M India Navy)

राफेल-एम के आने से भारत के दोनों एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत पर अब पूरी क्षमता के साथ आधुनिक फाइटर तैनात किए जा सकेंगे। नौसेना वर्तमान में मिग-29के फाइटर का इस्तेमाल करती है, लेकिन यह बेड़ा धीरे-धीरे अपनी उम्र और तकनीकी सीमाओं को पार कर चुका है। मिग-29के की तुलना में राफेल-एम अधिक आधुनिक, भरोसेमंद और मल्टीफंक्शनल कैपेबिलिटीज वाला जेट है। (Rafale M India Navy)

राफेल-एम को बोइंग F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट के विकल्प के तौर पर चुना गया था, जो मल्टी-रोल कैरियर बॉर्न फाइटर्स (MRCBF) प्रोग्राम के तहत इवैल्यूएशन के बाद फाइनल किया गया था। राफेल-एम नेवल वेरिएंट में मजबूत अंडरकैरिज और एक्सटेंडेड नोज है, जो कैरियर ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। भारतीय वायुसेना में पहले से ही 36 राफेल जेट्स इस्तेमाल हो रहे हैं औऱ राफेल मरीन में 80 फीसदी से अधिक समानताएं हैं, जिससे इसके मेंटेनेंस में आसानी होगी। (Rafale M India Navy)

एडमिरल त्रिपाठी ने बताया कि राफेल-एम इसलिए भी खरीदे गए हैं क्योंकि स्वदेशी ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड फाइटर (TEDBF) अभी डेवलपमेंट के चरण में है। उम्मीद है कि यह विमान 2032 या 2033 तक सेवा में आएगा। इसलिए TEDBF आने तक राफेल-एम नौसेना के फाइटर डेक को मजबूत बनाए रखेगा और समुद्री अभियानों में निरंतर मारक क्षमता को सुनिश्चित करेगा। (Rafale M India Navy)

राफेल-एम एक ऐसा फाइटर जेट है, जिसे विशेष रूप से समुद्री परिस्थितियों में ऑपरेट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें एईएसए रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, बियोंड विजुअल रेंज मिसाइलें, कैरियर-लैंडिंग हुक सिस्टम, और हाई-थ्रस्ट इंजन जैसी क्षमताएं हैं। इससे यह विमान लंबी दूरी तक टारगेट पर हमला कर सकता है और खराब मौसम में भी बेहतर काम करता है। फ्रांस की नौसेना इसका इस्तेमाल लंबे समय से कर रही है। (Rafale M India Navy)

राफेल-एम के आने से नौसेना की स्ट्राइक कैपेबिलिटी, सर्वाइवेबिलिटी, और रिएक्शन टाइम में बड़ा सुधार होगा। दो एयरक्राफ्ट कैरियर पर राफेल-एम की तैनाती से भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में किसी भी चुनौती का तेजी से सामना कर सकेगी। चीन के बढ़ते नौसैनिक प्रभाव और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Rafale M India Navy)

India Navy Operation Sindoor: नौसेना का बड़ा खुलासा! नेवी की हमले की तैयारियों से घबराया था पाक, तभी मांगा ‘सीजफायर’

India Navy Operation Sindoor
Navy threat of offensive action key to Pak's ceasefire plea: Vice Admiral Swaminathan on Op Sindoor

India Navy Operation Sindoor: भारतीय नौसेना के वेस्टर्न नेवल कमांड के प्रमुख वाइस एडमिरल के. स्वामीनाथन ने बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना की आक्रामक तैयारियों ने पाकिस्तान पर ऐसा दबाव बनाया कि उसे सीजफायर की मांग करनी पड़ी। वाइस एडमिरल स्वामीनाथन मीडिया से बातचीत में बताया कि नौसेना की इस कार्रवाई ने हालात बदल दिए और पाकिस्तान पीछे हटने पर मजबूर हुआ।

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ऑपरेशन सिंदूर इस साल 6-7 मई को शुरू किया गया था। यह ऑपरेशन पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में था, जिसमें अप्रैल में 26 लोगों की जान गई थी। भारत ने इसके बाद पाकिस्तान और पीओके में मौजूद आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया।

वाइस एडमिरल स्वामीनाथन ने बताया कि इस ऑपरेशन में नौसेना ने 30 से ज्यादा जहाज और सबमरीन को बहुत कम समय में तैयार कर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया की किसी भी नौसेना के लिए इतना बड़ा फ्लीट सिर्फ चार से छह दिन में ऑपरेशनल करना बहुत बड़ी बात है। इस दौरान भारतीय नौसेना के फ्रंटलाइन वॉरशिप्स मकरान तट के पास तैनात किए गए थे। इन जहाजों को आईएनएस विक्रांत कैरियर बैटल ग्रुप का सुरक्षा कवर मिला हुआ था।

उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना की यह तैयारियां इतनी मजबूत थीं कि पाकिस्तान अपनी नौसेना को अपने तट से दूर नहीं भेज सका। पाकिस्तान को आशंका थी कि भारतीय नौसेना किसी भी समय हमला कर सकती है। वाइस एडमिरल स्वामीनाथन के अनुसार, “हमारी ऑफेंसिव तैनाती और हथियार परीक्षणों ने पाकिस्तान नौसेना को अपने तट के करीब रहने पर मजबूर कर दिया। इस दबाव के बाद ही पाकिस्तान सीजफायर के लिए मजबूर हुआ।”

उन्होंने बताया कि नौसेना बड़ा हमला करने की स्थिति में थी। कुछ फाइटर एयरक्राफ्ट भी टेक-ऑफ कर चुके थे। भारतीय वायुसेना ने सीमा के पार स्ट्राइक्स कीं, और अगर हालात और बिगड़ते, तो नौसेना भी हमले के लिए समुद्र में आगे बढ़ जाती।

वाइस एडमिरल स्वामीनाथन ने यह भी बताया कि इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान और तुर्की के बीच संभावित सहयोग दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना को पहले से अंदेशा था कि चीन और पाकिस्तान के साथ-साथ तुर्की भी किसी स्तर पर सहयोग कर सकता है। ऑपरेशन के दौरान एक तुर्की नेवी का जहाज पाकिस्तान में मौजूद था, जिसे भारत पहले से एक “स्पॉइलर फैक्टर” के तौर पर देख रहा था।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का श्रेय पॉलिटिकल-मिलिट्री सिनर्जी को दिया। उनके मुताबिक, केंद्र सरकार और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बहुत मजबूत था। हर स्तर पर जानकारी साझा की जा रही थी, और सभी जानते थे कि कौन-सा कदम कब उठना है।

भारत और पाकिस्तान ने 10 मई को जमीन, समुद्र और हवा में सभी तरह की गोलीबारी और सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनाई थी। यह फैसला चार दिनों तक ड्रोन और मिसाइल स्ट्राइक्स के बाद लिया गया, जब दोनों देश लगभग युद्ध की स्थिति में पहुंच चुके थे।

India SSBN Aridhaman: भारतीय नौसेना में जल्द शामिल होगी तीसरी न्यूक्लियर सबमरीन, एडवांस लॉन्ग रेंज मिसाइलों से होगी लैस

India SSBN Aridhaman
CNS Admiral Dinesh K Tripathi on Navy Day 2025 Presser

India SSBN Aridhaman: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने पुष्टि की है कि भारत की नई न्यूक्लियर बैलिस्टिक सबमरीन आईएनएस अरिधमन बहुत जल्द नौसेना में शामिल की जाएगी। उन्होंने यह एलान भारतीय नौसेना दिवस 2025 से ठीक दो दिन पहले किया।

India SSBN Aridhaman: अरिधमन इस सीरीज की तीसरी पनडुब्बी

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि स्वदेश में बनाई गई यह पनडुब्बी देश की न्यूक्लियर डिटरेंस यानी प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूती देगी। उन्होंने इसे भारत के रणनीतिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। इससे पहले 29 अगस्त 2024 में स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड ने दूसरी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) आईएनएस अरिघात को विशाखापट्टनम में कमीशन किया था। अब अरिधमन इस सीरीज की तीसरी पनडुब्बी होगी।

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आईएनएस अरिधमन को भारत की तीसरी एसएसबीएन है, जो आईएनएस अरिहंत और आीएनएस अरिघात की की तुलना में आकार में बड़ी और क्षमता में अधिक ताकतवर है। इसके बड़े आकार की वजह से इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली न्यूक्लियर-टिप्ड मिसाइलें ले जाने की क्षमता और बढ़ जाती है। इससे भारत की समुद्र आधारित न्यूक्लियर स्ट्राइक क्षमता पहले से कहीं अधिक ताकतवर हो जाएगी।

अरिधमन में एडवांस मिसाइलें लगाने की तैयारी

आईएनएस अरिघात में के-4 मिसाइलें लगाई जा सकती हैं, जिनकी रेंज लगभग 3,000 किलोमीटर है। आईएनएस अरिहंत के पास के-15 मिसाइलें हैं, जिनकी रेंज 750 किलोमीटर मानी जाती है। अरिधमन में और भी एडवांस मिसाइलें लगाने की तैयारी है, जिससे यह पनडुब्बी गहरे समुद्र से लंबी दूरी तक वार करने में सक्षम होगी। सूत्रों के मुताबिक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के साथ जारी तनाव के बीच अरिधमन भारत के लिए एक भरोसेमंद रणनीतिक प्रतिरोधक भूमिका निभाएगी।

नो फर्स्ट यूज नीति

भारत की एसएसबीएन सीरीज देश की नो फर्स्ट यूज नीति का एक प्रमुख स्तंभ है। एनएफयू का मतलब है कि भारत पहले न्यूक्लियर हमला नहीं करेगा, लेकिन यदि कोई देश भारत पर हमला करता है तो भारत मजबूत सेकंड-स्ट्राइक यानी जवाबी न्यूक्लियर हमला करने में सक्षम रहेगा। ऐसी स्थिति में एसएसबीएन की भूमिका सबसे अहम होती है, क्योंकि ये पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र में छिपी रह सकती हैं और किसी भी हमले के बाद सुरक्षित रहकर जवाबी स्ट्राइक कर सकती हैं।

यह पनडुब्बियां समुद्र की सतह से सैकड़ों मीटर नीचे, बिना किसी बाहरी संपर्क के, कई दिनों तक छिपी रह सकती हैं। इसी कारण इन्हें किसी देश के न्यूक्लियर ट्रायड (लैंड-एयर-सी क्षमता) का सबसे सुरक्षित हिस्सा माना जाता है। अरिहंत-क्लास की ये एसएसबीएन भारत को यह भरोसा देती हैं कि किसी भी संकट की स्थिति में देश की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर नहीं पड़ेगी।

चीन के पास छह जिन-क्लास एसएसबीएन

भारत की एसएसबीएन क्षमता की तुलना अगर चीन से की जाए तो चीन के पास अभी छह जिन-क्लास एसएसबीएन हैं, जिनमें जेएल-3 मिसाइलें लगाई जाती हैं। इन जेएल-3 मिसाइलों की रेंज करीब 10,000 किलोमीटर मानी जाती है। चीन के पास छह न्यूक्लियर अटैक सबमरीन (एसएसएन) भी हैं। वहीं अमेरिका के पास 14 ओहियो-क्लास एसएसबीएन और 53 एसएसएन हैं। भारत अभी एसएसबीएन निर्माण के शुरुआती लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में है।

आईएनएस अरिधमन का निर्माण भारत की स्वदेशी क्षमता का प्रतीक है। यह पनडुब्बी विशाखापट्टनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में तैयार की गई है। इसमें न्यूक्लियर पावर प्लांट, एडवांस्ड सोनार सिस्टम, नेविगेशन टेक्नोलॉजी और स्टील्थ फीचर्स शामिल हैं, जो इसे किसी भी दुश्मन की निगरानी से लगभग अदृश्य बना देती हैं। नौसेना अधिकारियों के अनुसार, इस पनडुब्बी का पूरा फोकस भारत की समुद्री सुरक्षा को और मजबूत करना है।

एसएसबीएन प्रोजेक्ट से मिलीं कई सीखें

भारत के एसएसबीएन प्रोजेक्ट का उद्देश्य समंदर से न्यूक्लियर स्ट्राइक क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित करना है। आईएनएस अरिहंत की पहली ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट से लेकर अरिघात तक भारत ने कई तकनीकी सीखें हासिल कीं। अरिधमन में इन सभी अनुभवों को और बेहतर स्तर पर लागू किया गया है। यह एसएसबीएन लंबी दूरी, ज्यादा हथियार ले जाने की क्षमता और हाई लेवल के स्टील्थ के साथ समुद्र में एक मजबूत सैन्य उपस्थिति देगी।

विशेषज्ञ बताते हैं कि यह कदम ईस्ट चाइना सी, साउथ चाइना सी और इंडियन ओशन रीजन में बनने वाले सुरक्षा दबावों के बीच बेहद महत्वपूर्ण है। चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों और उसकी एसएसबीएन क्षमता को देखते हुए भारत का यह कदम रणनीतिक रूप से बहुत मायने रखता है।

आईएनएस वाघशीर सबमरीन इस साल साल हुई शामिल

भारतीय नौसेना चीफ एडमिरल दिनेश ने बताया कि पिछले एक साल में नौसेना ने अपनी ताकत में काफी बढ़ोतरी की है। उन्होंने बताया कि नौसेना ने कई अहम युद्धपोतों को अपने बेड़े में शामिल किया है, जिससे भारत की समुद्री निगरानी, सुरक्षा और स्ट्राइक क्षमता पहले से अधिक मजबूत हुई है। एडमिरल त्रिपाठी के अनुसार, जनवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईएनएस वाघशीर को कमीशन किया था। यह पनडुब्बी स्कॉर्पीन क्लास का हिस्सा है और आधुनिक हथियारों तथा एडवांस तकनीक से लैस है।

एक साल में एक पनडुब्बी समेत 13 नए युद्धपोत नौसेना का हिस्सा

इसके साथ ही नौसेना ने आईएनएस उदयगिरी को भी बेड़े में शामिल किया। यह खास जहाज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया गया 100वां स्वदेशी युद्धपोत है। नौसेना के अनुसार, इस उपलब्धि ने भारत की स्वदेशी युद्धपोत निर्माण क्षमता को एक नई पहचान दी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी बताया गया कि पिछले एक साल में एक पनडुब्बी समेत कुल 13 नए युद्धपोत नौसेना का हिस्सा बने हैं। इन नए जहाजों के शामिल होने से समुद्र में भारत की मौजूदगी और मॉनिटरिंग क्षमता काफी बढ़ गई है। नौसेना के अधिकारी मानते हैं कि इनसे संवेदनशील समुद्री इलाकों में लगातार निगरानी रखना आसान होगा और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी।

पनडुब्बियों में महिलाओं को जगह

प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का भी जिक्र किया गया। एडमिरल त्रिपाठी ने बताया कि नौसेना अब पनडुब्बियों में महिलाओं को शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। पहले भारत में महिला अधिकारियों को पनडुब्बियों में जगह नहीं दी जाती थी, लेकिन अब यह नीति बदली जा रही है। नौसेना चीफ ने कहा कि जल्द ही महिलाएं भी पनडुब्बी अधिकारी के रूप में सेवा दे सकेंगी। इसे नौसेना में एक बड़ा सामाजिक और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे युवा महिलाओं के लिए समुद्री रक्षा क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे और नौसेना में विविधता व प्रतिनिधित्व और मजबूत होगा।

साइबर हमलों, ड्रोन-आधारित खतरों से निपटने की तैयारी

एडमिरल त्रिपाठी ने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना बदलते वैश्विक माहौल में हर चुनौती का सामना करने के लिए खुद को लगातार तैयार कर रही है। उन्होंने बताया कि नौसेना साइबर हमलों, ड्रोन-आधारित खतरों और समुद्री घुसपैठ जैसे नए खतरों से निपटने के लिए अपनी ऑपरेशनल रेडिनेस को और बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, मजबूत प्रशिक्षण और नए प्लेटफॉर्म नौसेना की क्षमता को और ऊंचाई दे रहे हैं।

Indian Army BrahMos Test: भारतीय सेना ने किया बंगाल की खाड़ी में ब्रह्मोस का टेस्ट, सफलतापूर्वक पूरा किया लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन स्ट्राइक मिशन

Indian Army BrahMos Test
Indian Army BrahMos Test

Indian Army BrahMos Test: भारतीय सेना ने सोमवार 1 दिसंबर को अंडमान एंड निकोबार द्वीप समूह के निकट एक टेस्ट रेंज से बंगाल की खाड़ी में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफलतापूर्वक टेस्ट किया। यह लॉन्च साउदर्न कमांड की ब्रह्मोस यूनिट और ट्राइ-सर्विसेज अंडमान और निकोबार कमांड के जॉइंट आपरेशन में किया गया। इस टेस्ट के तहत मिसाइल ने एक निर्धारित लक्ष्य पर लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन स्ट्राइक को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया।

यह परीक्षण उस समय किया गया जब भारतीय सेना लगातार अपनी प्रिसिजन स्ट्राइक यानी बेहद सटीक हमले की क्षमता को आधुनिक बना रही है। ब्रह्मोस मिसाइल दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है।

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सेना की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक, मिसाइल ने उड़ान भरने के बाद तय किए गए टारगेट को टर्मिनल फेज में तेजी के साथ बिल्कुल सटीक हिट किया। इस दौरान मिसाइल ने अपनी दिशा, स्थिरता और गति को बहुत अच्छे से बनाए रखा। इस परीक्षण का उद्देश्य यह देखना था कि मिसाइल वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में कैसे काम करती है और क्या वह अपने लक्ष्य को सही समय और सही दिशा में मार सकती है।

आज की लॉन्चिंग में मिसाइल को मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च किया गया। टेस्ट रेंज में मौजूद सभी तकनीकी टीमों ने पहले मिसाइल की जांच की, उसके सेंसर और गाइडेंस सिस्टम को एक्टिव किया और फिर सिक्योरिटी क्लीयरेंस मिलने के बाद लॉन्च की अनुमति दी गई। समुद्र और आसमान में नोटम भी जारी किए गए थे ताकि टेस्ट के दौरान कोई जहाज या विमान उस इलाके में न हो।

इस परीक्षण में मिसाइल के एडवांस्ड गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम को भी परखा गया। ये सिस्टम मिसाइल को उसके रास्ते पर बनाए रखते हैं और आखिरी क्षण में उसे लक्ष्य पर सही तरीके से ले जाते हैं। सेना का कहना है कि मिसाइल ने सभी तय मानकों को पूरा किया और परीक्षण पूरी तरह सफल रहा।

मिशन के सफल होने के बाद साउदर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने टीम की सराहना की। उन्होंने कहा, “यह देश की लंबी दूरी की हमलावर क्षमता को मजबूत करने वाला बड़ा कदम है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सफलता भारतीय वैज्ञानिकों और भारतीय सेना की उस क्षमता को दिखाती है, जो आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की ओर निरंतर काम कर रही है।”

इस परीक्षण का एक खास महत्व यह भी है कि इसमें मिसाइल ने एक सिमुलेटेड बैटल कंडीशन यानी युद्ध जैसी स्थिति में उड़ान भरी। परीक्षण में मिसाइल की स्थिरता, उसकी हाई-स्पीड, लक्ष्य ढूंढने की क्षमता और रडार से बचने की क्षमता को भी जांचा गया। यह सब कुछ रियल टाइम कॉम्बैट कंडीशंस की तरह डिजाइन किया गया था।

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस के संयुक्त उद्यम ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने डेवलप किया है। ब्रह्मोस नाम दो नदियों भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मॉस्कवा के शुरुआती अक्षरों से बनाया गया है। इस मिसाइल की सबसे बड़ी ताकत इसकी तेज रफ्तार, प्रिसिजन अटैक और हर मौसम में इस्तेमाल करने की क्षमता है। यह मिसाइल किसी भी समय, दिन या रात, दोनों में दागी जा सकती है।

ब्रह्मोस मिसाइल की मौजूदा रेंज लगभग 450 किलोमीटर तक है, जबकि इसका एक्सटेंडेड वर्जन 800 किलोमीटर तक मार कर सकता है। यह मिसाइल 200 से 300 किलो तक का वारहेड लेकर जा सकती है और इसकी रफ्तार ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना अधिक यानी मैक 2.8 से मैक 3 के आसपास है। यही रफ्तार इसे दुश्मन के एयर डिफेंस से बचाते हुए टारगेट तक पहुंचने में मदद करती है।

भारतीय सेना में ब्रह्मोस 2007 से शामिल है और अब यह थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों का हिस्सा बन चुकी है। यह मिसाइल दुश्मन के शिप्स, सैन्य ठिकानों, कमांड सेंटर्स और रनवे जैसे हाई-वैल्यू टारगेट्स को नष्ट करने में सक्षम है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी भारत ने पाकिस्तान के कई एयर स्ट्रिप्स को बरबाद करने में ब्रह्मोस ने अहम भूमिका निभाई थी।

ब्रह्मोस को कई प्लेटफॉर्म्स से लॉन्च किया जा सकता है, इनमें लैंड-बेस्ड मोबाइल लॉन्चर, एयर-लॉन्च और शिप-लॉन्च शामिल हैं। वहां आज का यह परीक्षण लैंड-आधारित मोबाइल यूनिट से किया गया। सूत्रों ने बताया कि मिसाइल का फ्लाइट-प्रोफाइल लो-लेवल फ्लाइट पर आधारित था ताकि यह रडार डिटेक्शन में कम दिखाई दे।

2025 तक भारतीय सेना कुल पांच रेजिमेंट्स पूरी तरह से ऑपरेशनल हैं। मार्च 2025 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने दो नई ब्रह्मोस रेजिमेंटों को मंजूरी दी थी। इन दोनों में 800 किलोमीटर तक मार करने वाली ब्रह्मोस-ईआर मिसाइलें शामिल होंगी। इन रेजिमेंट्स के लिए लगभग बीस हजार करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट मंजूर हुआ था। इसके साथ ही अप्रैल और मई 2025 में सेना और वायुसेना के लिए लगभग 250 ब्रह्मोस मिसाइलों की खरीद को भी आगे बढ़ाया गया। वहीं इन नई मिसाइलों का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना को मिलेगा।