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Scorpene MoU: भारत-ब्राजील की बड़ी साझेदारी, स्कॉर्पीन पनडुब्बियों पर हुआ ऐसा समझौता जिससे उड़ेगी चीन की नींद

Scorpene MoU
MDL has joined the Indian Navy and Brazilian Navy in signing a trilateral MoU for structured exchange of information on maintenance of Scorpène-class submarines and other military ships.

Scorpene MoU: भारत और ब्राजील ने स्कॉर्पीन-क्लास पनडुब्बियों के रखरखाव और तकनीकी सहयोग को बढ़ाने के लिए एक समझौते पर दस्तखत किए हैं। मंगलवार को दोनों देशों की नौसेनाओं और भारत के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के बीच एक महत्वपूर्ण मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर दस्तखत किए गए। यह समझौता ब्राजील की यात्रा पर गए भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी की मौजूदगी में हुआ।

भारतीय नौसेना के मुताबिक, यह एमओयू स्कॉर्पीन-क्लास सबमरीन और अन्य नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स के मेंटेनेंस को लेकर हैं। इसके अलावा, इस समझौते में लाइफ-साइकिल सपोर्ट, तकनीकी सहयोग और ट्रेनिंग सुविधाएं भी शामिल हैं। नौसेना ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों की रक्षा कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच सहयोग बढ़ाएगा।

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स्कॉर्पीन-क्लास पनडुब्बियां अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन हैं, जिन्हें फ्रांस की नेवल ग्रुप के साथ साझेदारी में भारत ने प्रोजेक्ट-75 के तहत डेवलप किया है। भारत के पास फिलहाल छह कलवरी-क्लास पनडुब्बियां हैं, जबकि ब्राजील भी अपनी रियाचुएलो-क्लास स्कॉर्पीन सबमरीन ऑपरेट करता है।

नौसेना ने बताया कि यह एमओयू मेंटेनेंस, लॉजिस्टिक्स और ट्रेनिंग में अनुभव साझा करने और दोनों देशों की सबमरीन सपोर्ट कैपेबिलिटी बढ़ाने में मदद करेगा। इससे लंबे समय तक सबमरीन को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से ऑपरेट किया जा सकेगा। भारत के लिए यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भविष्य में भारत में पूरी तरह से स्वदेशी सबमरीन बनाई जा सकेंगी।

एडमिरल दिनेश त्रिपाठी 9 से 12 दिसंबर तक ब्राजील के दौरे पर हैं। इस दौरान वह ब्राजील के रक्षा मंत्री होजे मुसियो, ब्राजीलियन आर्म्ड फोर्सेज के चीफ ऑफ जॉइंट स्टाफ एडमिरल रेनेटो फ्रीरे और ब्राजीलियन नौसेना प्रमुख एडमिरल मार्कोस ओल्सेन से मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में दोनों देशों के समुद्री सहयोग, ऑपरेशनल लिंक और संयुक्त ट्रेनिंग जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।

नौसेना के अनुसार यह यात्रा भारत-ब्राजील सामरिक साझेदारी को मजबूत बनाएगी। दोनों देश हिंद महासागर और दक्षिण अटलांटिक क्षेत्रों में समुद्री सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं। स्कॉर्पीन सबमरीन इस सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, क्योंकि इनका डिजाइन और तकनीक दोनों देशों के लिए समान है।

एमडीएल भारत का प्रमुख शिपयार्ड है, जिसने मुंबई में सभी छह स्कॉर्पीन-क्लास पनडुब्बियों का निर्माण किया है। ब्राजील ने भी भारत की ओर से डेवलप मेंटेनेंस सिस्टम में रुचि दिखाई है। यह समझौता तकनीकी अनुभवों के आपसी आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा और दोनों देशों को बेहतर और अधिक सुरक्षित सबमरीन ऑपरेशन में मदद करेगा।

भारतीय नौसेना ने कहा कि यह समझौता रिसर्च एंड डेवलपमेंट में भी नए अवसर खोलेगा। खासकर स्कॉर्पीन सबमरीन के लिए नए अपग्रेड, वेपन सिस्टम और आधुनिक तकनीकों पर संयुक्त काम होने की संभावना बढ़ेगी।

भारत और ब्राजील पहले से ही रक्षा क्षेत्र में करीबी सहयोग रखते हैं। इसी साल अक्टूबर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ब्राजील के उपराष्ट्रपति जेराल्डो अल्कमिन से मुलाकात की थी। उस बैठक में दोनों देशों ने रक्षा निर्माण, को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन पर मिलकर काम करने की सहमति जताई थी।

ब्राजील के साथ यह समझौता भारत की टैगलाइन आत्मनिर्भर भारत को भी मजबूत करेगा। स्कॉर्पीन-क्लास सबमरीन का मेंटेनेंस अब भारत और ब्राजील दोनों देशों में घरेलू स्तर पर किया जा सकेगा। इससे लागत कम होगी और तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

IAF Tri-lateral Aerial Exercise: गुजरात तट पर शुरू होने जा रही है भारत-फ्रांस-UAE की ट्राई-लेटरल एयर एक्सरसाइज, कराची के पास बढ़ी हलचल

IAF Tri-lateral Aerial Exercise- Desert Knight exercise
Desert Knight exercise

IAF Tri-lateral Aerial Exercise: भारत का गुजरात तट इस हफ्ते खासा सक्रिय रहने वाला है। भारतीय वायुसेना के अहम बेस नलिया और जामनगर अगले दो दिनों तक एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय एयर एक्सरसाइज के गवाह बनेंगे। 10 दिसंबर से शुरू होने वाली इस ट्राई-लेटरल एयर एक्सरसाइज में भारत, फ्रांस और संयुक्त अरब अमीरात की वायु सेनाएं हिस्सा ले रही हैं। यह अभ्यास अरब सागर के ऊपर, गुजरात तट से दूर और कराची के कुछ सौ किलोमीटर दक्षिण में आयोजित होगा।

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फ्रांस और यूएई के लड़ाकू विमान इस अभ्यास के लिए यूएई स्थित अल-धाफ्रा एयर फोर्स बेस से उड़ान भरेंगे। यह वही बेस है जहां इस साल की शुरुआत में भारतीय वायुसेना ने एक्सरसाइज डेजर्ट फ्लैग में हिस्सा लेते हुए अपने लड़ाकू विमानों को तैनात किया था। अभ्यास के लिए एक नोटम (नोटिस टू एयर मेन) भी जारी किया गया है, जिसमें अरब सागर के उस एयरस्पेस को चिन्हित किया गया है जहां ये सैन्य गतिविधियां होंगी।

पिछले साल भी इन्हीं तीन देशों के बीच इसी प्रारूप में एक अभ्यास आयोजित हुआ था, जिसका नाम एक्सरसाइज डेजर्ट नाइट था। इस फॉर्मेट की शुरुआत 2021 में हुई थी, जब फ्रांस और भारत ने मिलकर जोधपुर एयर बेस से पहला द्विपक्षीय अभ्यास शुरू किया था। बाद में यूएई इसमें शामिल हुआ और यह तीन देशों का संयुक्त अभ्यास बन गया।

इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों की वायु सेनाओं के बीच सिनर्जी और इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाना है, ताकि युद्ध की स्थिति में एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ सकें और साथ काम कर सकें। पायलटों और ग्राउंड क्रू के बीच ऑपरेशनल एक्सपीरियंस, नई रणनीतियों और बेस्ट प्रैक्टिसेज का आदान-प्रदान भी इस एक्सरसाइज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारतीय वायुसेना की एयर डिप्लोमेसी दुनिया भर में फैले कई बड़े एयर एक्सरसाइज से मजबूत होती है। फ्रांस के साथ गरुड़, ब्रिटेन के साथ इंद्रधनुष, ओमान के साथ ईस्टर्न ब्रिज, अमेरिका के साथ रेड फ्लैग-अलास्का, रूस के साथ इंद्रा, थाईलैंड के साथ सियाम भारत, ग्रीस के साथ इनिओचोस, मिस्र के साथ ब्राइट स्टार, और ऑस्ट्रेलिया के साथ पिच ब्लैक, ये सभी एक्सरसाइज भारत की सैन्य विशेषज्ञता, भरोसेमंद साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी को मजबूत करते हैं।

गुजरात तट पर होने वाली यह ट्राई लेटरल एक्सरसाइज भारत की रणनीतिक तैयारी और क्षेत्रीय सहयोग की एक और अहम कड़ी माना जा रही है।

Landmine crisis: दुनिया भर में 12 करोड़ से ज्यादा बारूदी सुरंगें, 2024 में 1114.82 वर्ग किमी जमीन प्रभावित और 1,05,604 लैंडमाइन की नष्ट

Landmine crisis- Maj Gen Ajay Seth, VSM (Retd), Chairman IIFOMAS Board
Maj Gen Ajay Seth, VSM (Retd), Chairman IIFOMAS Board

Landmine crisis: लैंडमाइन मॉनिटर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में 1114.82 वर्ग किमी जमीन बारूदी सुरंग से प्रभावित हुई और 1,05,604 बारूदी सुरंगों को खोजकर सुरक्षित रूप से नष्ट किया गया। यह आंकड़े चौंकने वाले हैं। दुनिया के कई हिस्सों में बारूदी सुरंग और युद्ध के विस्फोटक अवशेष आज भी लाखों लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हैं। जंग खत्म हो जाने के बाद भी यह खतरा सालों तक बरकरार रहता है और लंबे समय तक आम नागरिकों, बच्चों, किसानों और लौटने वाले विस्थापित परिवारों की जिंदगी को प्रभावित करता है।

मंगलवार को राजधानी दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित दूसरी सालाना इंडिया इंटरनेशनल फोरम ऑन माइन एक्शन एंड सेफ्टी (IIFOMAS) सिम्पोजियम 2025 में बारूदी सुरंगों से जुड़े खतरों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि लैंडमाइन यानी बारूदी सुरंगें हटाने का काम अब राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, समावेशी विकास और दीर्घकालिक स्थिरता का अहम हिस्सा बन चुका है। सिंपोजियम में देश-विदेश से आए अधिकारियों ने बताया कि बारूदी सुरंगों से से भरे इलाके सालों वर्षों तक लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हैं और युद्ध खत्म होने के बाद भी मौतें जारी रहती हैं।

Landmine crisis- CDS Gen Anil Chauhan
CDS Gen Anil Chauhan

Landmine crisis: सीडीएस बोले- माइन एक्शन एक नैतिक मिशन

भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने वर्चुअल संबोधित करते हुए कहा कि माइन एक्शन केवल तकनीकी काम नहीं, बल्कि एक नैतिक मिशन है। उन्होंने कहा, “जब एक माइन हटती है, तो एक जिंदगी बचती है; जब एक हेक्टेयर जमीन साफ होती है, तो एक समुदाय फिर से बस सकता है।”

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सीडीएस ने कहा कि इस मिशन में डिफेंस प्रोफेशनल्स, वेटरंस, ह्यूमैनिटेरियन वर्कर्स, पॉलिसी मेकर्स, इंडस्ट्री लीडर्स और एकेडमिक्स सभी की साझेदारी जरूरी है, क्योंकि माइन एक्शन सीधे मानवीय सुरक्षा और सामाजिक पुनर्निर्माण से जुड़ा हुआ है।

Landmine crisis: दुनिया भर में 12 करोड़ से ज्यादा लैंडमाइन

IIFOMAS बोर्ड के चेयरमैन रिटायर्ड मेजर जनरल अजय सेठ ने बताया कि दुनिया के लगभग 90 देशों में 80 से 120 मिलियन (8 से 12 करोड़) लैंडमाइन फैली हुई हैं। इन लैंडमाइनों ने ऐसे बड़े क्षेत्र को दूषित कर दिया है जहां लोग खेती या घर बनाने तो दूर, सुरक्षित तरीके से चल भी नहीं सकते। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में लगभग 35 फीसदी जमीन लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं हो पाई। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2023 में अफगानिस्तान के उसके 29 प्रांतों में से केवल दो ही बारूदी सुरंगों से मुक्त माने जाते हैं। जबकि कंबोडिया में गृहयुद्ध के बाद जमीन का बड़ा हिस्सा बरसों तक बेकार पड़ा रहा।

उन्होंने बताया कि IIFOMAS का पूरा नाम है India International Forum on Mine Action and Safety। यह होराइजन ग्रुप का एक हिस्सा है। होराइजन ग्रुप कई देशों में बारूदी सुरंगों को साफ करने का काम करता रहा है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने साल 2024 में यह थिंक टैंक शुरू किया। पिछला साल पहला सिम्पोजियम था और इस साल दूसरा सिम्पोजियम हो रहा है।

दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लैंडमाइन की समस्या

मेजर जनरल अजय सेठ के मुताबिक IIFOMAS का मुख्य उद्देश्य है कि लोगों को बारूदी सुरंगों के खतरे के बारे में जागरूक किया जाए। आज दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लैंडमाइन की समस्या है। हर एक लैंडमाइन हादसा किसी की जिंदगी पूरी तरह बदल देता है। सबसे दुखद बात यह है कि 2024 की लैंडमाइन रिपोर्ट बताती है कि लैंडमाइन से होने वाले कुल हादसों में करीब 40 फीसदी बच्चे होते हैं। इसलिए भारत की जिम्मेदारी है कि वह खासकर दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों की मदद करे जहां यह समस्या गंभीर है। हमें उनकी मदद करके डिमाइनिंग यानी सुरंगों को साफ करने के प्रयास बढ़ाने चाहिए।

माइन क्लीयरेंस बहुत जोखिम भरा काम

वहीं IIFOMAS के संस्थापक और डायरेक्टर जनरल कर्नल (सेवानिवृत्त) नवनीत एमपी मित्तल ने बताया कि गाजा में लगभग 7500 से 10,000 मिलियन मीट्रिक टन मलबा पड़ा है, जिसे तभी हटाया जा सकता है जब पूरा इलाका सुरक्षित घोषित हो। उन्होंने कहा कि बारूदी सुरंगें हटाना सिर्फ तकनीकी काम नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी, जमीन, घर, रोजगार और सामाजिक ढांचे को वापस खड़ा करने का काम है। जब जमीन सुरक्षित होती है, तभी लोग खेती कर सकते हैं, सड़कें बन सकती हैं और बच्चे स्कूल जा सकते हैं।

Landmine crisis- Col Navneet MP Mittal (Retd), Founder and Director General IIFOMAS
Col Navneet MP Mittal (Retd), Founder and Director General IIFOMAS

कर्नल मित्तल के मुताबिक, “माइन क्लीयरेंस बहुत जोखिम भरा, धीमा और महंगा काम है, लेकिन यह जरूरी है, क्योंकि इसके बिना कोई समाज युद्ध के बाद सामान्य जीवन में लौट नहीं सकता।”

उन्होंने बताया कि युद्ध क्षेत्र में जहां बिना फटे विस्फोटक होते हैं, वहां एक अकेला डिमाइनर (लैंडमाइन हटाने वाला व्यक्ति) एक दिन में 10 से 200 वर्ग मीटर जमीन ही साफ कर पाता है। जहां मशीनें लगती हैं, वहां रफ्तार बढ़कर 5,000 से 20,000 वर्ग मीटर प्रतिदिन तक हो जाती है। जबकि डॉग्स यानी खोजी कुत्ते 1000 से 1500 वर्ग मीटर प्रतिदिन तक सूंघकर खतरे पहचान सकते हैं। वहीं, रैट्स लगभग 400 वर्ग मीटर प्रतिदिन खोज पाते हैं।

इसके बाद असली प्रक्रिया शुरू होती है बारूदी सुरंग की पहचान करना, उसे सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय करना और जमीन को पूरी तरह साफ घोषित करना। यही वजह है कि माइन क्लीयरेंस बेहद धीमा और जोखिम भरा है।

लैंडमाइन बनाने की लागत 3 डॉलर, हटाने का खर्च 2000 डॉलर तक

कर्नल मित्तल ने कहा, “एक लैंडमाइन बनाने में करीब 3 डॉलर लगते हैं, लेकिन उसे हटाने में 1000 से 2000 डॉलर तक खर्च होता है। और दुनिया के आंकड़ों के मुताबिक हर 5000 लैंडमाइन साफ करते समय एक व्यक्ति की जान जाती है।”

आज दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लाखों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र लैंडमाइन और विस्फोटक अवशेषों से भरा पड़ा है। इन्हें हटाने में अरबों डॉलर लगते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय फंडिंग इतनी नहीं है। पिछले दस सालों में फंडिंग लगभग 700–800 मिलियन डॉलर प्रति वर्ष ही रही है, जबकि जरूरत इसका कई गुना है।

उन्होंने बताया कि सिर्फ गाजा में माइन एक्शन के लिए 1 बिलियन डॉलर की जरूरत है। वहीं, यूक्रेन में यह आंकड़ा 20–30 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। (Landmine crisis)

‘250 साल लगेंगे लेबनान को साफ करने में’

पूर्व राजनयिक दिनकर श्रीवास्तव ने बताया कि लेबनान में जितना इलाका लैंडमाइनों से भरा है, उसे मौजूदा रफ्तार से साफ करने में 250 साल लगेंगे। उन्होंने कहा कि 2022 में केवल 25,000 वर्गमीटर जमीन साफ हो पाई थी।

उन्होंने बताया कि यूएन माइन एक्शन सर्विस की फंडिंग 7 साल में 125 मिलियन डॉलर से घटकर 46 मिलियन डॉलर रह गई है। उन्होंने यह भी बताया कि 2024 में 68 फीसदी माइन पीड़ित नागरिक थे। उन्होंने अपने अफ्रीका मिशन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी बच्चे, किसान और मजदूर माइन के शिकार हो जाते हैं।

श्रीलंका ने लगभग 1 करोड़ लैंडमाइन हटाईं

कार्यक्रम में शामिल श्रीलंका की हाई कमिश्नर महिशिनी कॉलोन ने बताया कि उनके देश ने 2009 से अब तक लगभग 99 लाख लैंडमाइन हटाईं और 1.5 मिलियन अनएक्सप्लोडेड आर्डनेंस (UXO) नष्ट किए। इससे माइन हादसों में 99% कमी आई है, वहीं 2002 में 252 मौतों से घटकर 2024 में सिर्फ 3 तक रह गया। (Landmine crisis)

Landmine crisis- H.E. Ms. Mahishini Colonne, Sri Lankan High Commissioner
H.E. Ms. Mahishini Colonne, Sri Lankan High Commissioner

उन्होंने कहा कि इतने बड़े ऑपरेशन ने 9.17 लाख से ज्यादा लोगों को उनके घर लौटने, खेती शुरू करने और जीवन को फिर से पटरी पर लाने में मदद की। श्रीलंका ने 2017 में एंटी-पर्सनल माइन बैन कन्वेंशन को अपनाकर अपनी मानवीय प्रतिबद्धता मजबूत की।

लेकिन उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि 2024 के बाद से अंतरराष्ट्रीय सहायता 45 फीसदी गिर गई है, जिससे डी-माइनिंग कार्य बाधित हो रहा है। अभी भी 23 वर्ग किलोमीटर संदिग्ध क्षेत्र साफ होना बाकी है।

भारत में IEDs का बदलता खतरा- डिप्टी एनएसए पंकज सिंह की बड़ी चेतावनी

रिटायर्ड आईपीएस और वर्तमान में डिप्टी एनएसए पंकज सिंह ने बताया कि भारत में आईईडी यानी इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस समय के साथ बहुत खतरनाक और चालाक तरीके से बदलते गए हैं। शुरुआत 1985 में दिल्ली में बने साधारण ट्रांजिस्टर बम से शुरू हुई, लेकिन ये तकनीक अब प्रेशर कुकर, साइकिल, खिलौने, डॉल और कई सामान्य चीजों में छिपाई जाने लगी। जयपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद में ऐसे बमों से भारी तबाही मचाई हुई। (Landmine crisis)

Landmine crisis- Deputy NSA Pankaj Singh
Deputy NSA Pankaj Singh

उन्होंने कहा कि आईईडी बनाने में इस्तेमाल होने वाला सामान जैसे कमर्शियल एक्सप्लोसिव, फर्टिलाइजर, जेलटिन स्टिक्स और डेटोनेटर अक्सर खनन क्षेत्रों, पुलिस या रक्षा डिपो से चोरी किए जाते हैं। कुछ सामान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पर उपलब्ध है।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने मृत सीआरपीएफ जवानों के शरीर के अंदर विस्फोटक भरकर सिल दिया था, ताकि पोस्ट-मॉर्टम के दौरान धमाका हो सके। अब तो ड्रोन से भी मैग्नेटिक आईईडी गिराए जा रहे हैं, जैसा जम्मू एयरपोर्ट पर देखने को मिला थ। पुलवामा हमला और कोच्चि व बेंगलुरु के ब्लास्ट भी इसी तरह की घटनाएं थीं। वहीं, ड्रोन अब 100 किलो तक का वजन ले जाकर हथियार पहुंचा सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ड्रोन और एआई से जुड़ी नई तकनीकें भविष्य में इस खतरे को और बढ़ा सकती हैं। (Landmine crisis)

बड़ी चुनौती: बजट घटा रहे देश

मेजर जनरल अजय सेठ का कहना है कि कि इस काम में सबसे बड़ी चुनौती है फंडिंग, यानी पैसों की कमी। पहले अमेरिका, जापान, जर्मनी और कई यूरोपीय देश इस काम के लिए बहुत मदद करते थे। लेकिन अब लगभग सभी देशों ने इस क्षेत्र में अपना बजट घटा दिया है। इस वजह से डिमाइनिंग प्रोजेक्ट प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी चुनौती है मैनपावर, यानी लोगों की कमी। लैंडमाइन हटाने का काम बहुत मेहनत और बड़ी टीमों की जरूरत वाला काम है। इसके लिए विशेष ट्रेनिंग वाली टीमों का होना जरूरी है। जबकि तीसरी चुनौती है तकनीक। जिस तरह बारूदी सुरंगों की तकनीक लगातार बदल रही है, उसी तरह उन्हें खोजने और हटाने की तकनीक भी आधुनिक होनी चाहिए। नई मशीनों, सेंसर्स और सिस्टम की जरूरत बढ़ती जा रही है। (Landmine crisis)

भारत सरकार से की यह अपील

उन्होंने भारत सरकार से तीन महत्वपूर्ण अपीलें रखीं। जिसमें भारत को मानवीय लैंडमाइन एक्शन को अपनी ग्लोबल डिप्लोमैटिक पहल बनाना चाहिए। इस काम के लिए बजट और प्रबंधन को स्कूल, सड़क, और स्वास्थ्य सेवाओं की तरह महत्वपूर्ण मानकर आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही, भारत को यूएन से मान्यता प्राप्त ट्रेनिंग, उपकरण ट्रांसफर, और क्षेत्रीय क्षमता निर्माण केंद्रों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि प्रभावित देश स्वयं यह काम सुरक्षित तरीके से कर सकें। (Landmine crisis)

India Air Defence System: दिल्ली की सुरक्षा करेगा स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम, सरकार कर रही बड़ी तैयारी

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India Air Defence System: भारत ने दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सुरक्षा को और मजबूत करने की बड़ी तैयारी की है। रक्षा मंत्रालय अब स्वदेशी इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम (IADWS) तैनात करने की तैयारी कर रहा है। यह नया सिस्टम मिसाइल, ड्रोन, तेजी से आने वाले हवाई खतरों और दुश्मन के एयरक्राफ्ट से दिल्ली की रक्षा करेगा। यह पूरा सिस्टम स्वदेशी होगा और देश की सुरक्षा जरूरतों के अनुसार बनाया जा रहा है।

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एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक यह मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल (QRSAM), वैरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS) पर बेस्ड होगा। ये मिसाइलें अलग-अलग दूरी पर आने वाले हवाई खतरों को रोकने के लिए बनाई गई हैं। इससे राजधानी के महत्वपूर्ण इलाकों पर दुश्मन के हमलों की संभावना काफी कम हो जाएगी।

यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ हवाई हमले की कोशिश की थी। उसी घटना के बाद दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण शहरों की सुरक्षा को और मजबूत करने पर जोर दिया गया था। पहले भारत अमेरिकी सिस्टम नेशनल एडवांस्ड सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम-II (NASAMS-II) लगाने पर विचार कर रहा था, जो वाशिंगटन डीसी और व्हाइट हाउस की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होता है। दोनों देशों के बीच बातचीत भी शुरू हुई थी, लेकिन अमेरिकी सिस्टम की कीमत बहुत अधिक होने के कारण भारत ने इस तरफ कदम नहीं बढ़ाया।

वहीं स्वदेशी सिस्टम की तैनाती की जिम्मेदारी भारतीय वायु सेना संभालेगी। वहीं, सिस्टम के डेवलपमेंट और इंटीग्रेशन का काम डीआरडीओ करेगा। डीआरडीओ पहले ही प्रोजेक्ट कुशा के तहत QRSAM, मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल और कई अन्य मॉडर्न एयर डिफेंस सिस्टम बना चुका है। अब यही टेक्नोलॉजी दिल्ली की सुरक्षा में भी इस्तेमाल की जाएगी।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस सिस्टम को तैयार करने के लिए नेटवर्किंग और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम बेहद महत्वपूर्ण होंगे। इन सिस्टम्स की मदद से आने वाले खतरों को तुरंत पहचाना जाएगा और समय पर मिसाइल दागकर उन्हें रोका जा सकेगा। यह पूरा नेटवर्क दिल्ली और उसके आसपास की हवाई सुरक्षा को एक साथ जोड़कर काम करेगा।

भारत इस समय रूस से बाकी बचे एस-400 सुदर्शन मिसाइल सिस्टम की दो और स्क्वाड्रन लेने की प्रक्रिया में है। इसके अलावा रूस ने भारत को एस-500 सिस्टम पर भी प्रस्ताव दिया है। लेकिन दिल्ली की सुरक्षा के लिए जो रास्ता चुना गया है, वह पूरी तरह स्वदेशी है और आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती देगा।

China Genetic Data Threat: क्या चीन बना रहा है सुपर सोल्जर? दुनिया भर से DNA क्यों जुटा रही चीनी कंपनी, अमेरिकी एजेंसियों ने दी ये बड़ी चेतावनी

China Genetic Data Threat
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China Genetic Data Threat: अमेरिका ने चीन की जीनोमिक्स कंपनी बीजीआई को लेकर एक बड़ी चेतावनी जारी की है। अमेरिकी सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी के शीर्ष सदस्य और डेमोक्रेट नेता मार्क वॉर्नर ने कहा है कि चीन की यह कंपनी दुनिया भर से इंसानों का जेनिटिक डेटा जुटा रही है, जिसका इस्तेमाल कई तरह के संवेदनशील और खतरनाक कामों में किया जा सकता है। वॉर्नर ने कहा कि यह मुद्दा आने वाले वर्षों में हुवावे से भी बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

मार्क वॉर्नर ने यह बयान सीएनबीसी सीएफओ काउंसिल समिट में दिया। उन्होंने कहा कि बीजीआई की पहुंच इतनी जबरदस्त है कि दुनिया के कई देशों की जनसंख्या का डीएनए डेटा उसके पास जमा हो चुका है। अमेरिकी एजेंसियों के अनुसार, बीजीआई दुनिया की सबसे बड़ी जीनोमिक्स लैब्स में से एक है, जो अस्पतालों, दवा कंपनियों और कई देशों की सरकारों के साथ मिलकर डीएनए से जुड़े काम करती है।

China Tibet airbases: चीन तिब्बत में बना रहा 16 नए एयरबेस, क्या हाई-एल्टीट्यूड वॉरफेयर की तैयारी कर रहा है ड्रैगन

China Genetic Data Threat: दुनिया भर में फैला बीजीआई

बीजीआई को पहले बीजिंग जीनोमिक्स इंस्टीट्यूट कहा जाता था, चीन की राष्ट्रीय जीनोमिक्स परियोजनाओं का हिस्सा रहा है। बाद में इसने डीएनए सीक्वेंसिंग, प्रीनेटल टेस्टिंग, कैंसर स्क्रीनिंग और बड़े पैमाने पर पॉपुलेशन जेनेटिक एनालिसिस जैसे कई सेक्टर्स में वैश्विक स्तर पर काम बढ़ाया। रिपोर्ट के अनुसार, बीजीआई ने कई देशों में राष्ट्रीय जेनिटिक डेटाबेस बनाने में मदद की और कोविड-19 के समय कई जगह टेस्टिंग लैब्स भी तैयार की थीं।

अमेरिकी खुफिया अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की सर्विसेज के जरिए कंपनी ने बहुत बड़ी मात्रा में इंसानी डीएनए जुटा लिया है। एक वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, जेनिटिक डेटा सिर्फ मेडिकल जानकारी नहीं है। जब यह बड़ी मात्रा में इकट्ठा होता है, तो यह एक “रणनीतिक संसाधन” बन जाता है।

डीएनए आर्म्स रेस की चेतावनी

अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि दुनिया एक तरह की डीएनए आर्म्स रेस में प्रवेश कर रही है। जेनिटिक डेटा से किसी व्यक्ति की नस्ल, बीमारी की संभावना, शारीरिक बनावट, और पारिवारिक रिश्तों तक का पता लगाया जा सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से इसे बड़े पैमाने पर सर्विलांस, ट्रैकिंग, और लंबे समय तक बायोलॉजिकल रिसर्च में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

वॉर्नर ने कहा, “वे दुनिया भर का डीएनए इकट्ठा कर रहे हैं। इंसानों पर इस तरह का प्रयोग और बौद्धिक संपदा की चोरी दोनों ही चिंता का विषय हैं।”

अमेरिकी कांग्रेस की जांच रिपोर्टों में दावा किया गया है कि बीजीआई के चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी सेना से गहरे संबंध हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन में व्यापारिक डेटा और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं होता, इसलिए कंपनियों का डेटा सीधे राज्य के काम में भी इस्तेमाल हो सकता है।

क्या ‘सुपर सोल्जर’ पर काम कर रहा है चीन?

सबसे गंभीर चिंता इस बात को लेकर है कि चीन कहीं जेनिटिक डेटा का इस्तेमाल जेनेटिकली एनहैन्स्ड सोल्जर्स, यानी बेहतर क्षमता वाले सैनिक बनाने में न कर रहा हो। अमेरिकी अधिकारियों ने पहले भी कहा है कि चीन ने ह्यूमन परफॉर्मेंस एनहैंसमेंट और मिलिटरी बायोटेक्नोलॉजी पर रिसर्च की है।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय खुफिया निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने 2020 में एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन की सेना ने मानव क्षमताओं को बढ़ाने वाले जीनोमिक रिसर्च में रुचि दिखाई है। मार्क वॉर्नर ने इसी मुद्दे को दोहराते हुए कहा, “यह वाकई डराने वाला है।”

हुवावे की तरह दोहराई जा रही कहानी

मार्क वॉर्नर ने कहा कि कुछ साल पहले तक अमेरिका में बहुत कम लोग जानते थे कि हुवावे कौन है। लेकिन धीरे-धीरे हुआवे ने दुनिया के टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर में गहरी पैठ बना ली। बाद में इसे प्रतिबंधित करना मुश्किल हो गया।

वॉर्नर ने चेतावनी दी कि बीजीआई भी उसी रास्ते पर चल रही है। कंपनी को चीनी सरकार का पूरा समर्थन मिला हुआ है और वह दुनिया भर में तेजी से विस्तार कर रही है।

साल 2023 में अमेरिका ने बीजीआई की कई सहायक कंपनियों को ट्रेड ब्लैकलिस्ट में डाला था। इससे उन्हें अमेरिकी तकनीक तक पहुंचने में रोक लग गई। अमेरिकी सांसद अब बायोसिक्योर एक्ट पास करने की कोशिश कर रहे हैं, जो चीन की बायोटेक कंपनियों को अमेरिका में काम करने से रोक देगा।

वहीं जो अमेरिकी अस्पतालों और शोध संस्थान बीजीआई की तकनीक पर निर्भर हैं, उन पर भी दबाव बढ़ गया है।

बीजीआई ने एसोसिटेड प्रेस को दिए बयान में कहा कि यह बिल “गलत आधार पर तैयार किया गया है” और कंपनी अमेरिकी नागरिकों के निजी डेटा तक पहुंच नहीं रखती।

क्यों पीछे रह गईं अमेरिकी खुफिया एजेंसियां?

मार्क वॉर्नर ने कहा कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने इस क्षेत्र में देर से ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका की इंटेलिजेंस अब भी सरकारों और सेनाओं पर केंद्रित है, जबकि असली खतरा अब कमर्शियल टेक्नोलॉजी सेक्टर्स जैसे जैसे एआई, बायोटेक, और सेमीकंडक्टर्स में छिपा है।

उन्होंने कहा कि चीन की कंपनियों को समझने के लिए अधिक एडवांस तरीकों से मॉनिटरिंग की जरूरत है। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे चीन की चिप कंपनी एसएमआईसी ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद छह नैनोमीटर चिप बना ली, जिससे अमेरिकी अधिकारी चौंक गए।

अंतरराष्ट्रीय गठबंधन भी हुआ कमजोर

वॉर्नर ने कहा कि चीन पर निगरानी रखने के लिए अमेरिका को अपने सहयोगी देशों के साथ घनिष्ठ संबंध रखने की जरूरत है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह भरोसा कमजोर हुआ है। फाइव आइज एलायंस के कुछ देशों ने कहा है कि वे अब अमेरिका के साथ खुफिया जानकारी साझा करने में संकोच कर रहे हैं।

वॉर्नर ने कहा कि तकनीकी विकास में सिर्फ मशीनें बनाना ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानक तय करना भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। चीन अब कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है और वहां अपने इंजीनियर भेज रहा है, जिससे वह वैश्विक नियम बनाने में प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने कहा, “सवाल यह है कि दुनिया का नेतृत्व कौन करेगा हम या चीन?”

9 JAT Battle of Chhamb: Untold Bravery That Stopped Pakistan’s Advance in 1971

9 JAT Battle of Chhamb
Brig RA Singh, VSM (Retd)

9 JAT Battle of Chhamb: 9 JAT was mobilised in September 1971 as part of 68 Infantry Brigade, moving from Khrew in Jammu & Kashmir to the Akhnoor sector. The battalion was earmarked to participate in the planned offensive of 10 Infantry Division against Pakistan. The unit concentrated in the general area of Akhnoor for coordination and intensive training. All commanders, down to platoon level, were tasked to carry out reconnaissance of Pakistani Border Outposts such as Bokan and Dalla, almost 30 kilometres inside enemy territory from Chhamb, wearing BSF uniforms to avoid detection. The battalion also undertook extensive infantry–tank cooperation training at Jaurian with 9 Deccan Horse. By the end of this preparation, 9 JAT stood fully ready as part of the Corps Reserve to avenge the loss of Chhamb suffered in 1965.

Shift from Offensive to Defensive After Pakistan’s Airstrikes

However, the situation changed dramatically on 3 December 1971 when Pakistan launched pre-emptive airstrikes on Indian airbases. The 10 Infantry Division’s operational posture had to shift instantly from offensive to defensive, even though formations were still positioned in their original areas. 9 JAT was ordered to move urgently to the Pallanwala sector to occupy defences on the eastern bank of the River Manawar Tawi. No one from the unit had seen this area before, but the battalion moved without hesitation, finding its own routes and organising defences as required.

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Challenging March Toward Pallanwala Under Enemy Shelling

On 4 December, while 9 JAT advanced on foot along the Akhnoor–Pallanwala axis towards its new defensive positions, it encountered troops of 191 Infantry Brigade withdrawing rapidly after being forced to abandon their defences across the Manawar Tawi within just three days. The sight of withdrawing troops, pursued closely by the advancing enemy, could easily have shaken the morale of the fresh 9 JAT soldiers moving up to take their place. To make matters worse, a few Pakistani artillery Observation Posts infiltrated along with the withdrawing troops and began directing accurate artillery fire on the advancing 9 JAT columns.

9 JAT Battle of Chhamb
Brig RA Singh, VSM (Retd)

Taking Up Defences in Completely Unfamiliar Terrain

Despite these challenges, the battalion reached Pallanwala in excellent shape and high spirits. With intense enemy shelling and no prepared defences, the Battalion Headquarters occupied bathing cubicles near a village well outside a local school. Company commanders were briefed quickly about their areas of responsibility on the eastern bank of the river, a completely unfamiliar terrain for the unit.

Hastily Prepared Positions Without Armour or Artillery Support

The companies hurriedly occupied defensive positions along the riverbank. The area was covered with ten-foot-high sarkanda grass and dotted with marshy patches. For administrative practicality, platoon localities were placed around fifty metres behind the riverline, even though this meant limited observation and weak fields of fire. There were no mines or defensive stores, and the defences had to be prepared hastily within four to five days. The battalion did not have tank support or even artillery OPs. It was responsible for guarding the Raipur and Darh crossings-both considered the most likely routes for enemy armour-without any external support.

Having shifted recently from Modified ‘M’ to Modified ‘P’ scale, the battalion had managed to collect only six recoilless guns from Mumbai, and there had been no opportunity for proper conversion training for the detachments before deployment on the Manawar Tawi defences.

Pakistani Assault Begins at Raipur and Darh Crossings

The anticipated Pakistani assault came at 0100 hours on 10 December, launched by 111 Brigade of 23 Pakistani Infantry Division, supported by 28 Cavalry. The enemy struck opposite the Raipur and Darh crossings, targeting the two forward companies of 9 JAT as well as the depth company. The Pakistani armour overran these companies in the opening phase of the assault.

A Fierce Infantry-Versus-Tank Battle in the Dark

In the absence of Indian armour support, the engagement turned into a pure infantry-versus-tank battle. Some 9 JAT jawans attempted to climb onto the attacking tanks, while others engaged them with their SLR rifles, fighting to the last. Yet the soldiers of 9 JAT held their trenches and refused to abandon their positions.

Heavy Casualties but Unbroken Courage of 9 JAT

The infantry assault that followed was repulsed despite the battalion’s severe defensive disadvantages. Heavy casualties were inflicted on the enemy. But 9 JAT also suffered grievous losses: three officers, three JCOs, and seventy-six ORs were killed, with an equal number wounded. By the next day, the battalion had lost two rifle companies completely, including their company commanders.

Holding the Line and Enabling the Division’s Counterattack

Even with such heavy losses, 9 JAT held its ground. The battered companies maintained their positions, forming the critical firm base that later enabled the 10 Infantry Division’s counterattack to retake lost ground.

Enemy Withdrawal After Leadership Loss and Boggy Terrain

A stroke of fortune favoured the battalion: the boggy terrain around the Darh and Raipur crossings restricted the movement of Pakistani tanks, preventing them from exploiting their gains. Additionally, the GOC of the attacking 23 Infantry Division was killed in a helicopter crash on 10 December, leading to confusion and a slowdown in the enemy advance. The Pakistani forces eventually withdrew west of the river before the Indian counterattack.

Unrecognised Bravery Despite Turning the Tide of Battle

Although the enemy enjoyed numerical superiority and geographical advantage, they failed to break the 9 JAT defences. Repeated attacks were repelled by the steadfast courage of the battalion. It was the leadership, determination, and exceptional valour of the officers and men that stopped multiple waves of enemy assaults and ensured the unit held its ground in honour of its regiment, its comrades, and the nation.

Unfortunately, this exceptional courage did not receive due recognition. Since 9 JAT was part of the Corps Reserve, and because the formation faced overall setbacks-including the loss of Chhamb for the second time-its role was overlooked.

9 JAT’s Annual Tribute to Its Martyrs of Chhamb 1971

Every year on 10 December, 9 JAT pays homage to its martyrs of the Battle of Chhamb. The unit continues its effort to secure rightful recognition for its decisive role in halting the enemy’s advance towards Akhnoor at a tremendous cost.

(Author Brig RA Singh, VSM (Retd) served as the Adjutant of 9 JAT during the Battle of Chhamb, 1971.)

Discover the untold story of courage in the 1971 Battle of Chhamb. Read the full account here.

Indian Army bio-diesel: अब बॉयो डीजल से चलेंगी सेना की गाड़ियां, फ्यूल सप्लाई चेन में किया शामिल

Indian Army bio-diesel

Indian Army bio-diesel: भारतीय सेना ने आज अपनी ईंधन सप्लाई चेन में बायो-डीजल को आधिकारिक रूप से शामिल कर दिया। नई दिल्ली में हुए समारोह में सेना के उप सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह ने बायो-डीजल की पहली खेप को फ्लैग-इन किया। आर्मी सर्विस कॉर्प्स के 265वें कॉर्प्स डे पर बॉयो-डीजल को शामिल करने की पहल की गई।

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इस पहल के साथ सेना ने ग्रीन एनर्जी की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। बायो-डीजल को सप्लाई चेन में शामिल करने का फैसला भारत सरकार की नेशनल बायोफ्यूल पॉलिसी से जुड़े लक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया गया है। सेना का कहना है कि इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा और ईंधन पर निर्भरता का दायरा भी बढ़ेगा।

उल्लेखनीय है कि सेना ने 1 दिसंबर से ई-20 पेट्रोल (E-20 Petrol) का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। ऐसे में बायो-डीजल का इस्तेमाल सेना की “ग्रीन मोबिलिटी” पहल को और आगे बढ़ाता है। इस मौके पर सेना की सप्लाई और ट्रांसपोर्ट शाखा के वरिष्ठ अधिकारी और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के मार्केटिंग डायरेक्टर शुभंकर सेन भी मौजूद थे।

Indian Army bio-diesel

समारोह में उप सेनाध्यक्ष ने बीपीसीएल के सहयोग की सराहना करते हुए कहा कि सेना को बड़ी संख्या में वाहनों का संचालन करना पड़ता है। ऐसे में सस्टेनेबल ईंधन का उपयोग पर्यावरण और ऊर्जा दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह पहल सेना के लॉजिस्टिक्स सिस्टम में साफ ऊर्जा को बढ़ावा देने का मजबूत उदाहरण है।

सेना लगातार ऐसे कदम उठा रही है जो राष्ट्र निर्माण और पर्यावरण संरक्षण दोनों को आगे बढ़ाते हैं। बायो-डीजल को सप्लाई चेन में शामिल करना इसी दिशा में एक अहम प्रयास है, जो दिखाता है कि सेना केवल सुरक्षा ही नहीं बल्कि जिम्मेदार संसाधन प्रबंधन पर भी समान ध्यान देती है।

Operation Sagar Bandhu: भारतीय नौसेना ने 1000 टन राहत सामग्री के साथ श्रीलंका भेजे चार और युद्धपोत, राष्ट्रपति दिसानायके ने की तारीफ

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Operation Sagar Bandhu: श्रीलंका में आए भीषण दित्वाह चक्रवात के बाद राहत और बचाव कार्यों को मजबूत करने के लिए भारत ने बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता अभियान शुरू किया है। इसी क्रम में भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन सागर बंधु के तहत चार और युद्धपोत श्रीलंका की ओर रवाना किए हैं। इन जहाजों में आईएनएस घड़ियाल, एलसीयू 54, एलसीयू 51 और एलसीयू 57 शामिल हैं, जो लगभग 1000 टन मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ) सामग्री लेकर श्रीलंका पहुंचे या पहुंच रहे हैं।

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भारतीय नौसेना द्वारा भेजे गए तीन एलसीयू जहाज एलसीयू 54, एलसीयू 51 और एलसीयू 57 7 दिसंबर की सुबह कोलंबो पहुंचे और राहत सामग्री श्रीलंकाई अधिकारियों को सौंपी। वहीं आईएनएस घड़ियाल भी त्रिंकोमाली पहुंच चुका है। राहत सामग्री में रेडी-टू-ईट भोजन, कपड़े, दवाइयां, तिरपाल, स्वच्छता किट और अन्य जरूरी सामान शामिल हैं। इनमें तमिलनाडु से दान की गई सामग्री का बड़ा हिस्सा भी शामिल है। (Operation Sagar Bandhu)

Operation Sagar Bandhu: चक्रवात ‘दित्वाह’ से त्रस्त श्रीलंका और तमिलनाडु में फंसे लोगों की मदद में जुटी भारतीय वायुसेना, शुरू किया ऑपरेशन सागर बंधु

ऑपरेशन सागर बंधु की शुरुआत तब हुई जब चक्रवात से श्रीलंका के कई जिलों में भारी नुकसान हुआ। कई जगह घर बह गए, सड़कें टूट गईं और हजारों लोग बेघर हो गए। राहत पहुंचाने के लिए भारतीय नौसेना पहले ही कई जहाज भेज चुकी है। (Operation Sagar Bandhu)

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इससे पहले भारतीय नौसेना के आईएनएस विक्रांत, आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस सुकन्या ने कोलंबो और त्रिंकोमाली में राहत सामग्री पहुंचाने के साथ-साथ हेली-बोर्न सर्च एंड रेस्क्यू में सक्रिय भूमिका निभाई। आईएनएस विक्रांत और आईएनएस उदयगिरि श्रीलंका नौसेना के 75वें स्थापना वर्ष पर आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू-2025 में भाग लेने के लिए पहले से कोलंबो में मौजूद थे। चक्रवात दित्वाह से भारी नुकसान की सूचना मिलते ही दोनों जहाजों को तुरंत राहत अभियान में लगा दिया गया। (Operation Sagar Bandhu)

भारतीय नौसेना के हेलीकॉप्टरों ने बाढ़ और भूस्खलन से घाटी में फंसे लोगों का हवाई सर्वे किया और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। इस दौरान कई नागरिकों की सफलतापूर्वक जान बचाई गई। नौसेना ने स्थानीय प्रशासन को आवश्यक खाद्य सामग्री, पानी, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान सौंपा, ताकि राहत तेजी से प्रभावित इलाकों तक पहुंच सके। (Operation Sagar Bandhu)

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वहीं, राहत कार्यों को और मजबूत करने के लिए भारतीय नौसेना ने आईएनएस सुकन्या को 1 दिसंबर को त्रिंकोमाली भेजा। जहाज पर जरूरी दवाइयां, टेंट, स्वच्छता सामग्री और आपातकालीन खाद्य पैकेट लदे थे। उसी दिन से भारतीय वायुसेना ने भी राहत अभियान को रफ्तार दी। वायुसेना के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस ने 12 टन राहत सामग्री कोलंबो पहुंचाई, जबकि आईएल-76 विमान से 80 एनडीआरएफ जवान, उनके उपकरण और 9 टन अतिरिक्त सामग्री श्रीलंका भेजी गई। एमआई-17 हेलीकॉप्टरों ने कठिन इलाकों में फंसे लोगों तक सहायता पहुंचाई। (Operation Sagar Bandhu)

भारतीय सेना की इंजीनियरिंग टीमों ने भी श्रीलंकाई सेना के साथ मिलकर राहत कार्यों में योगदान दिया। किलिनोच्ची जिले में क्षतिग्रस्त पुलों और सड़कों की मरम्मत शुरू की गई, जिससे आपूर्ति मार्ग फिर से सुचारू हो सकें। सेना की भीष्म मोबाइल मेडिकल यूनिट्स ने दूरदराज के इलाकों में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई। (Operation Sagar Bandhu)

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भारत के इस राहत अभियान की श्रीलंका ने खुलकर सराहना की है। श्रीलंकाई सांसद नमाल राजपक्षे ने भारतीय उच्चायुक्त संतोष झा से मुलाकात कर भारत के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने कहा कि “भारत हमेशा मुश्किल समय में पहला सहारा बनकर खड़ा होता है।”

operation sagar bandhu

ऑपरेशन सागर बंधु न सिर्फ भारत–श्रीलंका संबंधों की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की फर्स्ट रिस्पॉन्डर की भूमिका को भी साबित करता है। यह मिशन भारत की नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी और महासागर विजन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य पड़ोसी देशों को संकट के समय तुरंत सहायता उपलब्ध कराना है। (Operation Sagar Bandhu)

Ban Lifted on Defence Firms: सरकार ने ब्लैकलिस्टेड विदेशी डिफेंस कंपनियों से हटाने शुरू किए प्रतिबंध! यह है वजह

Defence Ministry bans six firms for 3 more years, stresses transparency

Ban Lifted on Defence Firms: भारत सरकार ने कई साल से प्रतिबंधित चल रही इटली की रक्षा कंपनी लियोनार्डो पर लगा बैन हटा दिया है। यह फैसला रक्षा मंत्रालय की उस अपडेटेड लिस्ट के बाद सामने आया, जिसमें बताया गया कि अब कंपनी भारत के साथ दोबारा काम कर सकती है। यह बैन 2013-14 में वीवीआईपी हेलीकॉप्टर मामले कथित भ्रष्टाचार को लेकर लगाया गया था। उस समय कंपनी पर रिश्वत देने के आरोप लगे थे और भारत ने उसके साथ सभी रक्षा सौदे रद्द कर दिए थे।

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सूत्रों के अनुसार, लियोनार्डो पर लगा पुराना प्रतिबंध अब खत्म कर दिया गया है, लेकिन कंपनी भारत से पुराने किसी भी कॉन्ट्रैक्ट को लेकर वित्तीय दावा नहीं कर सकती। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि कंपनी पर चल रही जांच जारी रहेगी। बैन हटाने का मतलब केवल इतना है कि अब वह भारत के नए रक्षा प्रोजेक्ट्स में हिस्सा ले सकेगी।

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि बैन हटाने के साथ ही एक अहम कदम और उठाया गया है। मंत्रालय ने एक नई कमिटी बनाई है, जिसका नेतृत्व डायरेक्टर-जनरल (अक्विजीशन) ए. अनबरासु कर रहे हैं। यह कमिटी उन सभी अन्य विदेशी रक्षा कंपनियों पर लगे बैन की समीक्षा करेगी, जिन पर साल 2009 के ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड रिश्वतकांड के बाद रोक लगा दी गई थी। यह पहली बार है जब सरकार सभी कंपनियों के मामलों को एक साथ देखकर नई नीति बनाने जा रही है।

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इन प्रतिबंधित कंपनियों में राइनमेटल, एसटी किनेटिक्स, रोल्स-रॉयस और कई अन्य प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। इनमें से कई फर्मों ने आधिकारिक रूप से भारत से बैन हटाने की गुजारिश भी की है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, पुराना प्रतिबंध हटने से भारतीय सेनाओं को उपकरण खरीदने में ज्यादा विकल्प मिलेंगे और एक ही कंपनी पर निर्भरता कम होगी।

हालांकि सिंगापुर की रक्षा कंपनी एसटी किनेटिक्स ने भारत सरकार से अपनी 13 साल पुरानी पाबंदी हटाने की औपचारिक अपील की है। यह कंपनी लंबे समय से भारतीय रक्षा खरीद में भाग नहीं ले पा रही है। कंपनी ने हाल ही में रक्षा मंत्रालय को पत्र भेजकर कहा कि यह रोक अब अपनी अवधि पूरी कर चुकी है और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पर इसका गलत असर पड़ रहा है।

एसटी किनेटिक्स पर वर्ष 2012 में रोक लगाई गई थी। यह रोक 2009 के ओएफबी रिश्वत मामले से जुड़ी थी, जिसमें कई विदेशी कंपनियों पर जांच की वजह से खरीद प्रतिबंध लगाया गया था। शुरुआती 10 साल की पाबंदी 2022 में खत्म हो गई थी, लेकिन अप्रैल 2025 में इसे तीन साल और बढ़ा दिया गया, जिससे कंपनी भारत के किसी भी रक्षा टेंडर, जॉइंट वेंचर या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में शामिल नहीं हो पा रही है।

कंपनी का कहना है कि उस मामले में उसके खिलाफ कभी कोई आधिकारिक आरोप तय नहीं हुआ और न ही भारत सरकार के साथ उसकी कोई रक्षा डील हुई थी। एसटी किनेटिक्स ने दिल्ली हाई कोर्ट में भी कई बार अपील की थी, जहां रक्षा मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया था कि कंपनी “ब्लैकलिस्टेड” नहीं, बल्कि “टेम्परेरी होल्ड” पर है। इससे दोनों पक्षों के बीच मामला सालों तक उलझा रहा।

हाल ही में भारत और सिंगापुर के बीच हुई बैठक में एडवांस आर्टिलरी सिस्टम और अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स पर सहयोग की संभावना पर बात हुई थी। ऐसे में सिंगापुर ने फिर से अनुरोध किया कि पाबंदी हटे, ताकि दोनों देशों के बीच रक्षा उत्पादन पर काम आगे बढ़ सके। इससे पहले इस साल अप्रैल में रक्षा मंत्रालय ने छह कंपनियों, जिनमें एसटी किनेटिक्स भी शामिल है, पर लगी मौजूदा रोक तीन साल और बढ़ा दी है। मंत्रालय के आदेश में कहा गया है कि सभी विभाग इस फैसले का सख्ती से पालन करें।

पूर्व प्रतिबंधों होने ते चलते कई मामलों में सेना को जरूरी स्पेयर पार्ट्स और उपकरण आसानी से नहीं मिल पा रहे थे, क्योंकि कई तकनीकें उन्हीं कंपनियों के पास थीं, जिन पर बैन लगा था। यही वजह है कि सरकार अब एक नई नीति बनाने के पक्ष में है, जिससे रक्षा उत्पादन और खरीद दोनों में तेजी आए। सूत्र कहते हैं कि अगर सभी मामलों की समीक्षा होने के बाद जरूरी सुधार किए जाते हैं, तो इससे “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती मिलेगी, क्योंकि विदेशी कंपनियाँ भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर उत्पादन कर सकेंगी।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लियोनार्डो पर लगा बैन हटना एक बड़ा संकेत है कि भारत अब पुराने विवादों को पीछे छोड़कर रक्षा सहयोग को नए तरीके से आगे बढ़ाना चाहता है। हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि सुरक्षा और पारदर्शिता के नियम पहले की तरह ही सख्त रहेंगे।

इन कंपनियों के defence stocks में बड़ी गिरावट; 30 फीसदी तक टूटे इन चार टॉप डिफेंस कंपनियों के शेयर

Indian defence stocks

Indian Defence Stocks: देश के रक्षा क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में तेजी से वृद्धि हुई है, लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी डिफेंस कंपनियों के शेयर हाल के दिनों में काफी गिरावट दिखा रहे हैं। चार प्रमुख डिफेंस स्टॉक्स अपने हाई लेवल से 30% तक नीचे आ चुके हैं। शेयर बाजार की इस कमजोरी ने निवेशकों का ध्यान फिर से इन कंपनियों की वास्तविक स्थिति और उनके बिजनेस परफॉर्मेंस की ओर खींचा है।

FIIs defence stocks: विदेशी निवेशकों की डिफेंस शेयरों में क्यो घट रही दिलचस्पी? इन कंपनियों में घटाई हिस्सेदारी

सबसे ज्यादा चर्चा मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (Mazagon Dock Shipbuilders – MDL) की है। यह भारतीय नौसेना के लिए डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और सबमरीन बनाने वाली सरकारी कंपनी है। सितंबर 2025 तक कंपनी के पास लगभग 27,415 करोड़ रुपये का मजबूत ऑर्डर बुक है। इसके बावजूद शेयर अपने 52 हफ्ते के अपने उच्चतम स्तर से करीब 30 फीसदी गिर चुका है। कंपनी की मार्जिन में गिरावट आई है क्योंकि कोस्ट गार्ड और MPV प्रोजेक्ट्स पर भारी प्रावधान करना पड़ा। (Indian Defence Stocks)

दूसरी कंपनी गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) भी अपने हाई से लगभग 29% नीचे है। यह कंपनी भारतीय नौसेना के लिए एडवांस वॉरशिप, पी-17 अल्फा फ्रिगेट, एंटी-सबमरीन शैलो वाटर क्राफ्ट और रिसर्च वेसल बनाती है। सितंबर 2025 तक GRSE के पास 20,200 करोड़ रुपये का ऑर्डर बुक है, और कंपनी ने इस साल मजबूत रेवेन्यू और मुनाफा दर्ज किया है। (Indian Defence Stocks)

तीसरी कंपनी जेन टेक्नोलॉजीज (Zen Technologies) है, जो ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम, सिम्युलेटर और रोबोटिक्स जैसी टेक्नोलॉजी बनाती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसके उपकरणों की मांग बढ़ी थी, लेकिन नियमित ऑर्डर में देरी से इसकी आय में गिरावट हुई और शेयर अपने 52 हफ्ते के अपने उच्चतम स्तर से 45 फीसदी नीचे पहुंच गया है। (Indian Defence Stocks)

चौथी कंपनी पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज (Paras Defence) है। यह कंपनी ऑप्टिक्स, ओप्ट्रॉनिक्स, रॉकेट मोटर ट्यूब, कमांड कंसोल और स्पेस इक्विपमेंट बनाती है। बेहतर रेवेन्यू के बावजूद शेयर लगभग 26 फीसदी टूट गया है। (Indian Defence Stocks)