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Indian Army IKIGAI: जापानी दर्शन अब सेना की रणनीति में! सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने दिया नया इकीगाई मंत्र

Ikigai meaning and Indian Army IKIGAI framework
Army Chief General Upendra Dwivedi

Indian Army IKIGAI: आजकल “इकीगाई” (IKIGAI) शब्द काफी चर्चा में है। यह शब्द आम लोगों के जीवन दर्शन से लेकर मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स तक सुनाई दे रहा है। जापान से निकला यह कॉन्सेप्ट अब भारत में भी चर्चा का विषय बन गया है, खासकर तब जब भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इकीगाई से जुड़ा एक नया फ्रेमवर्क पेश किया। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि इकीगाई क्या है और इसका सेना से क्या संबंध है।

Indian Army IKIGAI: इकीगाई का यह है मतलब

इकीगाई एक जापानी शब्द है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। “इकी” का मतलब होता है जीवन और “गाई” का अर्थ होता है कारण या मूल्य। यानी इकीगाई का सीधा अर्थ है जीवन जीने का कारण। इसे आसान भाषा में समझें तो यह वह वजह है, जिसके लिए कोई व्यक्ति हर सुबह उठता है और अपने दिन की शुरुआत करता है।

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जापान में इकीगाई को बहुत साधारण तरीके से देखा जाता है। वहां इसे किसी बड़े लक्ष्य या ऊंचे पद से नहीं जोड़ा जाता। यह रोजमर्रा की छोटी-छोटी खुशियों से जुड़ा होता है, जैसे परिवार के साथ समय बिताना, पसंद का काम करना, बागवानी, संगीत या समाज के लिए कुछ करना। जापान के ओकिनावा इलाके में लोग लंबी और संतुलित जिंदगी जीते हैं और इसके पीछे इकीगाई को एक अहम वजह माना जाता है। (Indian Army IKIGAI)

Indian Army IKIGAI: पश्चिमी देशों के लिए यह है इकीगाई का अर्थ

वहीं, पश्चिमी देशों में इकीगाई को थोड़ा अलग तरीके से समझाया गया। वहां इसे चार सवालों के मेल के रूप में पेश किया गया। पहला, आपको क्या पसंद है। दूसरा, आप किस काम में अच्छे हैं। तीसरा, दुनिया को किस चीज की जरूरत है। और चौथा, किस काम से आप कमाई कर सकते हैं। इन चारों के बीच संतुलन को इकीगाई कहा गया। हालांकि जापान में इसका मूल अर्थ इससे कहीं ज्यादा सरल और निजी है। (Indian Army IKIGAI)

Indian Army IKIGAI: सेना प्रमुख ने पेश किया नया इकीगाई फ्रेमवर्क

इकीगाई केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं रहा। दिसंबर 2025 में जापान की मेजबानी में हुए लैंड फोर्सेस समिट के दौरान भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इसी विचार से प्रेरित होकर एक नया इकीगाई फ्रेमवर्क पेश किया। यह फ्रेमवर्क इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में थल सेनाओं के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित किया गया।

इस समिट में भारत के साथ-साथ जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस जैसे देशों के सेना प्रमुख और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा, रणनीतिक सहयोग और साझा चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसी मंच पर जनरल द्विवेदी ने बताया कि जैसे इकीगाई व्यक्ति को जीवन का उद्देश्य देता है, वैसे ही यह नया इकीगाई फ्रेमवर्क सेनाओं को साझा उद्देश्य के साथ काम करने की दिशा दिखाता है। (Indian Army IKIGAI)

सेना के संदर्भ में इकीगाई एक एक्रोनिम है, यानी हर अक्षर का एक अलग मतलब है। इसमें सेनाओं के बीच आपसी तालमेल, सूचना साझा करना, जॉइंट ट्रेनिंग, मानवीय सहायता, तकनीकी सहयोग, सुरक्षा साझेदारी और लॉजिस्टिक्स सहयोग जैसे पहलू शामिल हैं। इसका मकसद यह है कि अलग-अलग देशों की थल सेनाएं मिलकर क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखें। (Indian Army IKIGAI)

Ikigai meaning and Indian Army IKIGAI framework

IKIGAI फ्रेमवर्क के कंपोनेंट्स

I – Interoperability and Information Sharing: सेनाओं के बीच कंपैटिबिलिटी और इंटेलिजेंस शेयरिंग।
K – Knowledge and Professional Military Education: नॉलेज शेयरिंग और प्रोफेशनल ट्रेनिंग/एजुकेशन।
I – International Humanitarian Assistance and Disaster Relief (HADR): अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय मदद और डिजास्टर रिलीफ (जैसे भूकंप, बाढ़ में सहायता)।
G – Generative Technological Partnerships: उभरती टेक्नोलॉजी (जैसे AI, ड्रोन) में पार्टनरशिप।
A – Assurance for Security Partnerships: सिक्योरिटी पार्टनरशिप्स में विश्वास और गारंटी।
I – Integrated Logistics and Sustainment: इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और सपोर्ट सिस्टम (सप्लाई चेन मजबूत करना)।

जनरल द्विवेदी ने इस फ्रेमवर्क को तीन बुनियादी आधारों पर रखा। पहला, साझा चुनौतियों की पहचान। दूसरा, समान सिद्धांतों पर सहमति। और तीसरा, मिलकर ठोस कदम उठाना। यह विचार इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों के बीच सहयोग को मजबूत करने पर केंद्रित है।

क्वाड समूह के सदस्य देश शामिल

यह समिट इसलिए भी अहम मानी गई क्योंकि इसमें क्वाड समूह के सदस्य देशों की भागीदारी रही। क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इन देशों के बीच समुद्री और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर पहले से ही सहयोग चल रहा है। लैंड फोर्सेस समिट में हुई चर्चा ने थल सेनाओं के स्तर पर भी सहयोग को नई दिशा दी।

भारतीय सेना की ओर से यह संदेश साफ था कि भारत एक मुक्त, खुला और इन्क्लूसिव इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का समर्थन करता है। इसके लिए समान सोच वाले देशों के साथ मिलकर काम करना जरूरी है। इकीगाई फ्रेमवर्क इसी सहयोग को एक स्ट्रक्चर्ड रूप देता है। (Indian Army IKIGAI)

इकीगाई का मूल भाव है “उद्देश्य”

इस तरह देखा जाए तो इकीगाई का मूल भाव “उद्देश्य” है। व्यक्तिगत जीवन में यह खुशी और संतुलन देता है, जबकि सैन्य संदर्भ में यह सहयोग, साझा जिम्मेदारी और स्थिरता का रास्ता दिखाता है। जापान की संस्कृति से निकला यह विचार अब अंतरराष्ट्रीय सिक्योरिटी डॉयलॉग का हिस्सा बन चुका है।

इकीगाई आज केवल एक जीवन दर्शन नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाया जाने वाला एक ब्रॉड आइडिया बन गया है। चाहे आम इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी हो या देशों की सेनाओं के बीच रणनीतिक सहयोग, इकीगाई का अर्थ हर जगह उद्देश्य और संतुलन से जुड़ा हुआ है। (Indian Army IKIGAI)

Indian Coast Guard Operation: उत्तरी बंगाल की खाड़ी में बड़ी कार्रवाई, भारतीय EEZ में दो बांग्लादेशी मछली पकड़ने वाली नावें पकड़ी गईं

Indian Coast Guard Operation

Indian Coast Guard Operation: उत्तरी बंगाल की खाड़ी में भारतीय तटरक्षक बल यानी इंडियन कोस्ट गार्ड ने अवैध मछली पकड़ने के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। 16 दिसंबर को रूटीन सर्विलांस ऑपरेशन के दौरान कोस्ट गार्ड के जहाज ‘अनमोल’ ने भारतीय समुद्री सीमा के भीतर दो बांग्लादेशी मछली पकड़ने वाली नावों को पकड़ा। इन नावों के साथ कुल 35 क्रू मेंबर्स को हिरासत में लिया गया है।

पकड़ी गई बांग्लादेशी नावों के नाम सबिना-1 और रुपोशी सुल्ताना बताए गए हैं। सबिना-1 पर 11 जबकि रुपोशी सुल्ताना पर 24 क्रू मेंबर्स सवार थे। जांच के दौरान नावों पर सक्रिय फिशिंग गियर और करीब 500 किलोग्राम मछली बरामद की गई, जिससे साफ हुआ कि भारतीय एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) के भीतर अवैध रूप से मछली पकड़ी जा रही थी।

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यह कार्रवाई मैरीटाइम जोन्स ऑफ इंडिया (रेगुलेशन ऑफ फिशिंग बाय फॉरेन वेसल्स) एक्ट, 1981 के तहत की गई। इंडियन कोस्ट गार्ड ने पकड़ी गई दोनों नावों और क्रू मेंबर्स को 17 दिसंबर को फ्रेजरगंज, पश्चिम बंगाल की मरीन पुलिस को सौंप दिया, जहां आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है।

Indian Coast Guard Operation

इंडियन कोस्ट गार्ड के अनुसार, यह कार्रवाई भारत के समुद्री हितों की रक्षा और भारतीय मछुआरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में की गई है। पिछले तीन महीनों में कोस्ट गार्ड ने इसी तरह की कार्रवाइयों में आठ बांग्लादेशी नावों और 170 क्रू मेंबर्स को पकड़ा है।

तटरक्षक बल ने स्पष्ट किया है कि वह भारतीय समुद्री क्षेत्रों में लगातार निगरानी बनाए हुए है और समुद्री कानूनों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए ऐसे ऑपरेशन आगे भी जारी रहेंगे।

Russia Ukraine war: रूस-यूक्रेन युद्ध में गई बीकानेर के युवक की जान, स्टडी वीजा पर गया था अजय गोदारा

Bikaner youth killed in Russia-Ukraine war

Russia Ukraine war: राजस्थान के बीकानेर जिले के लूणकरणसर क्षेत्र से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। अरजनसर गांव निवासी अजय गोदारा की रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान मौत हो गई है। अजय बेहतर भविष्य की तलाश में स्टडी वीजा पर रूस गया था, लेकिन परिवार का आरोप है कि वहां उसे धोखे से सेना से जुड़ी गतिविधियों में झोंक दिया गया और युद्ध में भेज दिया गया।

अजय के निधन की सूचना मिलते ही पूरे गांव और आसपास के इलाके में शोक की लहर फैल गई। घर में मातम पसरा है और परिजन गहरे सदमे में हैं।

परिजनों के अनुसार, अजय गोदारा 28 नवंबर 2024 को पढ़ाई के उद्देश्य से रूस गया था। परिवार का कहना है कि रूस पहुंचने के बाद अजय को सुरक्षित काम और बेहतर कमाई का झांसा दिया गया। आरोप है कि उसे किचन से जुड़े काम और सामान्य ड्यूटी का भरोसा दिया गया था, लेकिन बाद में उसे सैन्य गतिविधियों से जोड़ दिया गया।

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कुछ समय बाद अजय को यह अहसास हुआ कि हालात बेहद खतरनाक हैं। उसने करीब चार महीने पहले दो वीडियो बनाकर भारत में अपने परिवार और प्रशासन से मदद की अपील की थी। इन वीडियो में अजय ने बताया था कि उसे तीन महीने की ट्रेनिंग का वादा किया गया था, लेकिन केवल चार दिन में ही उसे यूक्रेन सीमा के पास युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया।

वीडियो में अजय ने कहा था कि “कुछ और कहा गया था, कुछ और करवाया जा रहा है। यह हमारा आखिरी वीडियो भी हो सकता है।”

करीब एक सप्ताह पहले परिवार को ई-मेल के जरिए अजय की मौत की जानकारी मिली। इसके बाद से घर में कोहराम मचा हुआ है। मंगलवार को अजय का पार्थिव शरीर दिल्ली लाया गया, जहां से उसे उसके पैतृक गांव अरजनसर ले जाया गया ताकि अंतिम संस्कार किया जा सके।

अजय की मौत से पहले परिजनों ने उसकी सुरक्षा और भारत वापसी के लिए कई प्रयास किए थे। परिवार ने केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और कैबिनेट मंत्री सुमित गोदारा से भी मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन समय रहते कोई समाधान नहीं हो सका।

अरजनसर गांव और लूणकरणसर क्षेत्र में लोग अजय को एक शांत, मेहनती और सपनों से भरे युवक के तौर पर याद कर रहे हैं। ग्रामीणों और परिजनों ने केंद्र सरकार से इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि किन एजेंटों या नेटवर्क के जरिए भारतीय युवाओं को स्टडी वीजा के नाम पर रूस-यूक्रेन जंग में भेजा जा रहा है।

Air Force Commanders Conclave: रक्षा मंत्री बोले- ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कैसे वायु शक्ति बनी भारत की रणनीतिक ताकत

Air Force Commanders Conclave

Air Force Commanders Conclave: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने भारत की हाई-इम्पैक्ट और शॉर्ट-ड्यूरेशन ऑपरेशनल क्षमता को स्पष्ट रूप से साबित किया। उन्होंने यह बात आज ‘एयर फोर्स कमांडर्स’ कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना आधुनिक तकनीक से लैस है, तेजी और कुशलता से काम करने में सक्षम है और रणनीतिक फैसले लेने में पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी हुई है।

रक्षामंत्री ने कहा कि लगातार बदलते वैश्विक हालात के बीच भारतीय वायुसेना देश के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने वायुसेना की भविष्य-उन्मुख सोच और आधुनिक क्षमताओं की सराहना की।

राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वायुसेना की भूमिका का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस साहस, तेजी और सटीकता के साथ भारतीय वायुसेना ने आतंकवादी ठिकानों को नष्ट किया, वह देश की सैन्य तैयारी का स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके बाद पाकिस्तान की ओर से की गई गैर-जिम्मेदार प्रतिक्रिया को भी वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम ने प्रभावी ढंग से संभाला।

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उन्होंने जनता के भरोसे का जिक्र करते हुए कहा कि आमतौर पर दुश्मन के हमले के समय लोग डर जाते हैं, लेकिन जब पाकिस्तानी बलों ने भारतीय प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कोशिश की, तब देश के लोग शांत रहे और अपनी सामान्य दिनचर्या जारी रखी। यह भारतीय नागरिकों के सशस्त्र बलों और वायु रक्षा क्षमताओं पर भरोसे को दिखाता है।

रक्षामंत्री ने कमांडरों से कहा कि वे ऑपरेशन सिंदूर से सीख लें और भविष्य की हर चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार रहें। उन्होंने दुश्मन की आक्रामक और रक्षात्मक क्षमताओं को गहराई से समझने की जरूरत पर भी जोर दिया, ताकि रणनीतिक बढ़त बनी रहे।

Air Force Commanders Conclave

युद्ध की बदलती प्रकृति पर बात करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष, इजरायल-हमास युद्ध, बालाकोट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसी घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि आज के समय में एयर पावर निर्णायक शक्ति बन चुकी है। उन्होंने कहा कि वायु शक्ति केवल सामरिक साधन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक उपकरण है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वायु शक्ति की असली ताकत उसकी तेज रफ्तार, अचानक हमला करने की क्षमता और दुश्मन को झटका देने की शक्ति में है। वायुसेना देश के नेतृत्व को यह साफ संदेश देने में सक्षम है कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाया जाएगा। आज वायु शक्ति अपनी गति, दूर तक पहुंच और सटीक वार करने की क्षमता के कारण सैन्य ताकत को देश के राष्ट्रीय लक्ष्यों से जोड़ने का मजबूत साधन बन चुकी है।

रक्षामंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरणों के प्रभावी प्रदर्शन की सराहना की। उन्होंने दोहराया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार देश की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि 21वीं सदी का युद्ध सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं है। यह अब सोच, तकनीक और हालात के मुताबिक खुद को ढालने की क्षमता का भी युद्ध बन गया है। साइबर वारफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, सैटेलाइट आधारित निगरानी और स्पेस से जुड़ी क्षमताएं युद्ध के तरीके को तेजी से बदल रही हैं। अब सटीक हथियार, रियल-टाइम जानकारी और डेटा के आधार पर फैसले लेना आधुनिक संघर्षों में सफलता के लिए जरूरी हो गया है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि जो देश तकनीक, दूरदर्शी सोच और बदलते हालात के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता को संतुलित कर लेते हैं, वही वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ते हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि सुदर्शन चक्र, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने इस साल स्वतंत्रता दिवस पर की थी, आने वाले समय में राष्ट्रीय संपत्तियों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाएगा।

उन्होंने बताया कि स्वदेशी जेट इंजन का विकास अब एक राष्ट्रीय मिशन बन चुका है, और सरकार इसे सफल बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार निजी क्षेत्र, स्टार्ट-अप और एमएसएमई कंपनियों के साथ मिलकर रक्षा क्षेत्र के आधुनिकीकरण पर लगातार काम कर रही है।

रक्षामंत्री ने बताया कि आईडेक्स (iDEX) और अदिति जैसी पहलों के जरिए युवाओं को रक्षा निर्माण से जोड़ा जा रहा है। नवंबर 2025 तक आईडेक्स के तहत दिए गए 565 चैलेंज में से 672 विजेता सामने आए हैं, जिनमें वायुसेना से जुड़े 77 चैलेंज के 96 विजेता शामिल हैं। इससे साफ होता है कि रक्षा क्षेत्र में युवाओं की रुचि तेजी से बढ़ रही है।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को तीनों सेनाओं के बीच बेहतरीन तालमेल का उदाहरण बताया। उनके अनुसार थल, जल और वायु सेनाओं का आपसी समन्वय आज के दौर की बड़ी जरूरत है, जिससे देश की सुरक्षा और ज्यादा मजबूत होती है।

रक्षामंत्री ने भारतीय वायुसेना के ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस और डिजास्टर रिलीफ अभियानों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि देश के भीतर और विदेशों में प्राकृतिक आपदाओं के समय वायुसेना ने हमेशा अहम भूमिका निभाई है, जिससे आम लोगों का भरोसा और मजबूत हुआ है।

इस कॉन्क्लेव में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान और वायुसेना के वरिष्ठ कमांडर उपस्थित रहे। रक्षामंत्री का स्वागत एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने किया और उन्हें वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारी की जानकारी दी गई।

MH-60R 2nd Squadron: नौसेना के लिए “आंख, कान और पहले शिकारी” का काम करेगा रोमियो, INAS 335 Ospreys हुई कमीशन

MH-60R 2nd Squadron
MH-60R 2nd Squadron

MH-60R 2nd Squadron: भारतीय नौसेना के लिए आज का दिन बेहद खास रहा। गोवा स्थित आईएनएस हंसा में भारतीय नौसेना ने अपने सबसे आधुनिक समुद्री युद्धक हेलीकॉप्टर MH-60R “रोमियो” की दूसरी स्क्वाड्रन को औपचारिक रूप से कमीशन कर दिया। इस स्क्वाड्रन का नाम आईएनएएस 335 “ऑस्प्रेज” रखा गया है। इसके साथ ही नौसेना की समुद्री निगरानी, पनडुब्बी रोधी युद्ध और सतह पर मौजूद खतरों से निपटने की क्षमता को बड़ी मजबूती मिली है।

इस कमीशनिंग समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी विशेष रूप से मौजूद रहे। समारोह आईएनएस हंसा के एयर स्टेशन पर हुआ, जिसे पश्चिमी समुद्री तट पर नौसेना का प्रमुख एयर बेस माना जाता है। आज की कमीशनिंग को नौसेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

From Detection to Deterrence: MH-60R Seahawks Redefines Indian Navy’s ASW Doctrine

आईएनएएस 335 “ऑस्प्रेज” भारतीय नौसेना की दूसरी MH-60R स्क्वाड्रन है। इससे पहले मार्च 2024 में पहली स्क्वाड्रन आईएनएएस 334 “सीहॉक्स” को कोच्चि स्थित आईएनएस गरुड़ में कमीशन किया गया था। पहली स्क्वाड्रन उस समय बनी थी, जब शुरुआती MH-60R हेलीकॉप्टर भारत पहुंचे थे। अब दूसरी स्क्वाड्रन के पूरी तरह कमीशन होने से नौसेना की ऑपरेशनल ताकत में बड़ा इजाफा हुआ है।

MH-60R 2nd Squadron

आईएनएस हंसा इंडियन नेवल एविएशन का मुख्य बेस

आईएनएस हंसा में आईएनएएस 335 ‘ऑस्प्रेज’ स्क्वाड्रन की कमीशनिंग पर भारतीय नौसेना प्रमुख ने कहा कि आज नौसेना के लिए एक बेहद खुशी और गर्व का अवसर है। आईएनएस हंसा इंडियन नेवल एविएशन का मुख्य बेस है और यहीं से नौसेना की एयर पावर को मजबूती मिलती है।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी समुद्री तट पर एमएच-60आर (रोमियो) हेलिकॉप्टर की पहली पूरी तरह ऑपरेशनल स्क्वाड्रन का शामिल होना नौसेना के लिए एक मील का पत्थर है। यह कदम नौसेना की मल्टी-रोल और समुद्री युद्ध क्षमता को नई ऊंचाई देगा। नौसेना प्रमुख ने कहा कि यह मौका इसलिए भी खास है क्योंकि साल 2025 में इंडियन नेवल एविएशन को मंजूरी मिलने के 75 साल पूरे हो रहे हैं। इसी फैसले के बाद नौसेना को एक मल्टीडायमेन्शनल और ताकतवर समुद्री शक्ति बनाया।

इंडियन नेवल एविएशन की अहम भूमिका

उन्होंने इतिहास का जिक्र करते हुए बताया कि 64 साल पहले 17–18 दिसंबर 1971 की रात ऑपरेशन विजय की शुरुआत हुई थी, जब भारतीय नौसेना के जहाज गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराने के लिए आगे बढ़े थे। उस समय भी इंडियन नेवल एविएशन ने अहम भूमिका निभाई थी और आईएनएस विक्रांत का एयर विंग गोवा के पास तैनात था।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि आज का मैरीटाइम एनवॉयरमेंट पहले से कहीं ज्यादा जटिल और चुनौतीपूर्ण हो गया है। बदलती वैश्विक राजनीति, नई तकनीक और समुद्र में बढ़ते खतरों ने हालात को और कठिन बना दिया है। ऐसे समय में समुद्री सुरक्षा और मजबूत निगरानी बेहद जरूरी हो गई है।

उन्होंने प्रधानमंत्री के बयान का हवाला देते हुए कहा कि जब दुनिया के समुद्र अशांत होते हैं, तब दुनिया को एक स्थिर और मजबूत मार्गदर्शक की जरूरत होती है, और भारत उस भूमिका के लिए पूरी तरह तैयार है। रक्षा मंत्री के शब्दों को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक समृद्धि सीधे समुद्री सुरक्षा से जुड़ी हुई है, इसलिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा बहुत जरूरी है।

आईएनएस हंसा में पी-8आई एयरक्राफ्ट की दूसरी स्क्वाड्रन तैनात

नौसेना प्रमुख ने बताया कि भारतीय नौसेना लगातार अपनी क्षमताएं बढ़ा रही है। आईएनएस हंसा में पहले ही पी-8आई एयरक्राफ्ट की दूसरी स्क्वाड्रन तैनात की जा चुकी है। इसके साथ ही एमक्यू-9बी सी गार्डियन ड्रोन शामिल करने की प्रक्रिया भी चल रही है, जिससे समुद्री निगरानी और मजबूत होगी।

MH-60R 2nd Squadron

उन्होंने कहा कि नौसेना ने शिपबोर्न एविएशन पर भी खास ध्यान दिया है। राफेल-एम लड़ाकू विमानों की खरीद से समुद्र से दूर तक मार करने और एयर डिफेंस क्षमता मजबूत होगी। इनके साथ हेलिकॉप्टर और अनमैन्ड सिस्टम से नौसेना की निगरानी और जवाबी कार्रवाई की ताकत भी बढ़ी है।

कई सॉफ्टवेयर भारत में ही बने

एमएच-60आर हेलिकॉप्टर के बारे में उन्होंने कहा कि इसके आधुनिक सेंसर, एडवांस एवियोनिक्स और ताकतवर हथियार इसे एंटी-सबमरीन वारफेयर, समुद्री निगरानी और सर्च एंड रेस्क्यू के लिए बेहद कारगार बनाते हैं। यह हेलिकॉप्टर पहले ही ऑपरेशन सिंदूर, ट्रोपेक्स-25 और ट्राई-सर्विसेज एक्सरसाइज 2025 में अपनी क्षमता साबित कर चुका है।

उन्होंने यह भी बताया कि नौसेना इस हेलिकॉप्टर में स्वदेशी हथियार और सेंसर जोड़ने पर लगातार काम कर रही है। कई अहम सिस्टम, जैसे सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो, डेटा लिंक और डेप्थ चार्ज पूरी तरह भारत में बने हैं।

नौसेना प्रमुख ने आईएनएएस-335 की टीम की सराहना करते हुए कहा कि ‘ऑस्प्रे’ नाम तेज नजर, फुर्ती और सटीकता का प्रतीक है। उन्होंने भरोसा जताया कि यह स्क्वाड्रन समुद्री सुरक्षा को किसी भी चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देगी।

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एमएच-60आर है ऑल-वेदर हेलीकॉप्टर

आईएनएएस 335 के सीनियर पायलट लेफ्टिनेंट कमांडर प्रखर भार्गव ने कहा, “एमएच-60आर भारतीय नौसेना के पास मौजूद सबसे आधुनिक हेलीकॉप्टर है। यह एक ऑल-वेदर हेलीकॉप्टर है, जो दिन और रात, दोनों समय उड़ान भर सकता है। उन्होंने बताया कि इस हेलीकॉप्टर की बेहतर स्थिरता, लंबी उड़ान क्षमता और इसमें लगे आधुनिक हथियार और सेंसर इसे हर तरह के ऑपरेशनल माहौल के लिए बेहद असरदार बनाते हैं। चाहे एंटी-सबमरीन ऑपरेशन, समुद्री निगरानी या फिर सर्च एंड रेस्क्यू मिशन हों, एमएच-60आर हर भूमिका में पूरी तरह सक्षम है।”

लेफ्टिनेंट कमांडर प्रखर भार्गव के अनुसार, इस हेलीकॉप्टर की बहु-उपयोगी क्षमता और आधुनिक तकनीक भारतीय नौसेना को सबसे कठिन परिस्थितियों में भी किसी भी तरह का मिशन सफलतापूर्वक पूरा करने की ताकत देती है।

आईएनएएस 335 है “आंख, कान और पहला शिकारी”

वहीं, गोवा से आईएनएएस 335 के कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन धीरेंद्र बिष्ट ने कहा, “आईएनएएस 335 की कमीशनिंग के साथ भारतीय नौसेना की दूसरी एमएच-60आर स्क्वाड्रन औपचारिक रूप से शामिल हो गई है। उन्होंने बताया कि इससे नौसेना की समुद्री निगरानी, स्ट्राइक क्षमता और मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर ताकत में बड़ा इजाफा हुआ है। यह नौसेना के बेड़े के ऑपरेशंस और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक अहम उपलब्धि है।”

MH-60R 2nd squadron: 17 दिसंबर भारतीय नौसेना के लिए होगा बेहद खास, गोवा में कमीशन होगी रोमियो हेलीकॉप्टर्स की दूसरी स्क्वाड्रन

कैप्टन बिष्ट के अनुसार, यह स्क्वाड्रन नौसेना के बेड़े के लिए “आंख, कान और पहले शिकारी” की तरह काम करेगी। यह समुद्र में होने वाली गतिविधियों की रियल-टाइम जानकारी देगी, पानी के नीचे मौजूद खतरों से निपटने में मदद करेगी और पूरे तटीय समुद्री क्षेत्र में तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता प्रदान करेगी।

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बता दें कि नौसेना प्रमुख ने नेवी डे की प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही संकेत दे दिया था कि दिसंबर 2025 में गोवा में फुल स्क्वाड्रन कमीशन की जाएगी। नौसेना की योजना कुल तीन MH-60R स्क्वाड्रन बनाने की है, जिनमें से दो पश्चिमी बेड़े और एक पूर्वी बेड़े के लिए तैनात की जाएंगी। आज कमीशन हुई स्क्वाड्रन पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में नौसेना की क्षमताओं को और मजबूत करेगी।

सबसे आधुनिक मैरीटाइम कॉम्बैट हेलीकॉप्टर

MH-60R हेलीकॉप्टरों को दुनिया के सबसे आधुनिक मैरीटाइम कॉम्बैट हेलीकॉप्टर में गिना जाता है। इन्हें खास तौर पर एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, यानी पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। इसके साथ ही ये हेलीकॉप्टर सतह पर मौजूद दुश्मन जहाजों की पहचान और उन पर कार्रवाई करने में भी सक्षम हैं। यह एक ऑल-वेदर, मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर है, जो हर मौसम और हर हालात में ऑपरेशन कर सकता है।

MH-60R हेलीकॉप्टरों की खासियत इनके अत्याधुनिक सेंसर और सिस्टम हैं। इनमें डिपिंग सोनार, मल्टी-मोड मैरीटाइम रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम लगे होते हैं। डिपिंग सोनार की मदद से यह हेलीकॉप्टर समुद्र की गहराई में छिपी पनडुब्बियों का सटीक पता लगा सकता है। इसके साथ ही सोनाबॉय सिस्टम के जरिए बड़े समुद्री इलाके में अंडरवॉटर निगरानी की जा सकती है।

हथियारों की बात करें तो MH-60R हेलीकॉप्टर मार्क-54 लाइटवेट टॉरपीडो और हेलफायर एयर-टू-सर्फेस मिसाइल से लैस हैं। ये हथियार इन्हें दुश्मन पनडुब्बियों और जहाजों के खिलाफ बेहद प्रभावी बनाते हैं। जरूरत पड़ने पर यह हेलीकॉप्टर निगरानी से सीधे हमले की भूमिका में आ सकता है।

ये हेलीकॉप्टर भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर्स, डिस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स से ऑपरेट करते हैं। इसका मतलब है कि एक ही स्क्वाड्रन के हेलीकॉप्टर अलग-अलग युद्धपोतों पर तैनात रह सकते हैं। इससे समुद्र के बड़े इलाके में निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

भारतीय नौसेना ने साल 2020 में अमेरिका के साथ 24 MH-60R हेलीकॉप्टर खरीदने का समझौता किया था। इस सौदे की कुल कीमत करीब 2.4 अरब डॉलर थी। अब तक इनमें से 15 हेलीकॉप्टर भारत को मिल चुके हैं। बाकी हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी चरणबद्ध तरीके से हो रही है और सभी की आपूर्ति 2027 तक पूरी होने की उम्मीद है। कुछ हेलीकॉप्टर अभी अमेरिका में हैं, जहां भारतीय पायलट और तकनीकी कर्मियों को ट्रेनिंग दी जा रही है।

आज कमीशन हुई स्क्वाड्रन की तैनाती आईएनएस हंसा, गोवा से की गई है। यह बेस अरब सागर और पश्चिमी समुद्री क्षेत्र की निगरानी के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में विदेशी नौसैनिक गतिविधियों में बढ़ोतरी देखी गई है। ऐसे में MH-60R जैसे आधुनिक हेलीकॉप्टर नौसेना को हर गतिविधि पर नजर रखने में मदद करेंगे।

MH-60R हेलीकॉप्टर भारतीय नौसेना में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे पुराने सी किंग हेलीकॉप्टरों की जगह ले रहे हैं। सी किंग हेलीकॉप्टर कई दशकों तक नौसेना की रीढ़ रहे, लेकिन उम्र और तकनीक के कारण उनकी भूमिका सीमित होती जा रही थी। रोमियो हेलीकॉप्टरों के आने से पनडुब्बी रोधी क्षमता को नई मजबूती मिली है।

मेंटेनेंस और सपोर्ट के मोर्चे पर भी नौसेना ने तैयारी की है। भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में MH-60R हेलीकॉप्टरों के लिए करीब 7,995 करोड़ रुपये का फॉलो-ऑन सपोर्ट समझौता हुआ है। इसके तहत अगले पांच साल तक मेंटेनेंस, रिपेयर और स्पेयर सपोर्ट सुनिश्चित किया जाएगा। भारत में ही इंटरमीडिएट लेवल मेंटेनेंस फैसिलिटी स्थापित की जा रही है, जिससे हेलीकॉप्टरों की उपलब्धता और ऑपरेशनल रेडीनेस बनी रहेगी।

Defence PSUs Order Book: रक्षा उत्पादन में बड़ी छलांग, AVNL-MIL के दम पर नए डिफेंस पीएसयू का ऑर्डर 83,109 करोड़ रुपये के पार

Indian Defence PSUs Order Book

Defence PSUs Order Book: संसद में पेश रक्षा मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, देश के सात नए डिफेंस पीएसयू के पास इस समय कुल 83,109 करोड़ रुपये का ऑर्डर बुक है। यह आंकड़ा 1 अप्रैल 2025 तक का है। यह आंकड़े दिखाते हैं कि ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेटाइजेशन के बाद रक्षा उत्पादन क्षेत्र में स्थिरता और मांग दोनों बढ़ी हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, आर्मर्ड व्हीकल निगम लिमिटेड (AVNL) इस लिस्ट में सबसे आगे है। AVNL के पास 35,553 करोड़ रुपये के ऑर्डर हैं, जो टैंक, बख्तरबंद वाहन और अन्य आर्मर्ड सिस्टम से जुड़े हैं। इसके बाद म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL) के पास 28,939 करोड़ रुपये के ऑर्डर हैं। म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड भारतीय सेना के लिए गोला-बारूद और हथियारों के निर्माण में अहम भूमिका निभा रहा है। (Defence PSUs Order Book)

Defence Self-Reliance: डिफेंस प्रोडक्शन में रिकॉर्ड 174 फीसदी की बढ़ोतरी, 193 डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स में से 177 भारतीय कंपनियों को

तीसरे नंबर पर एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) है, जिसके पास 8,236 करोड़ रुपये का ऑर्डर बुक है। वहीं दूसरी ओर ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड (GIL) के पास सबसे कम 211 करोड़ रुपये के ऑर्डर हैं। समिति ने साफ किया है कि यह अंतर अलग-अलग कंपनियों के उत्पाद, क्षमता और बाजार की मांग के कारण है। (Defence PSUs Order Book)

रक्षा मामलों की स्थायी समिति ने कहा है कि 2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेटाइजेशन के बाद इन कंपनियों को वित्तीय और प्रशासनिक स्वतंत्रता मिली है। इसके चलते ये कंपनियां अब घरेलू ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपने उत्पादों की पेशकश कर पा रही हैं। रक्षा मंत्रालय ने समिति को बताया कि ये पीएसयू भारतीय सेना की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आर्टिलरी गन, गोला-बारूद और आर्मर्ड सिस्टम पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। (Defence PSUs Order Book)

सरकार ने इन नए पीएसयू के आधुनिकीकरण के लिए भी बड़ा निवेश किया है। एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स ने 2022 से 2027 के बीच 8,745 करोड़ रुपये की कैपिटल आउटले को मंजूरी दी है। इसमें से 7,251 करोड़ रुपये की राशि पहले ही जारी की जा चुकी है, जबकि बाकी राशि 2027 तक दी जाएगी। इस फंड का इस्तेमाल उत्पादन लाइन अपग्रेड, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार में किया जा रहा है। (Defence PSUs Order Book)

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि रक्षा आयात पर निर्भरता कम करने में लगातार प्रगति हो रही है। रक्षा उत्पादन विभाग की पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट में शामिल 762 आइटम्स में से 515 आइटम्स का स्वदेशी विकास इन पीएसयू ने कर लिया है। इसके अलावा 136 अन्य आइटम्स भी विकसित किए गए हैं, जो सूची में शामिल नहीं थे। (Defence PSUs Order Book)

डिफेंस पीएसयू के लिए निर्यात के मोर्चे पर भी स्थिति काफी मजबूत हुई है। जहां 2021-22 में निर्यात केवल 22.55 करोड़ रुपये था, वहीं 2023-24 में यह बढ़कर 1,976.51 करोड़ रुपये हो गया। 2024-25 के अस्थायी आंकड़ों के अनुसार निर्यात 3,545 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुका है। कुल मिलाकर इन कंपनियों का एक्सपोर्ट ऑर्डर बुक अब 8,500 करोड़ रुपये के पार है।

रक्षा मंत्रालय ने समिति को बताया है कि पीएसयू ने संभावित विदेशी बाजारों और उत्पादों की पहचान कर ली है। इसके लिए भारतीय दूतावासों, डिफेंस अताशे और विदेशी ओईएम कंपनियों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। समिति ने मंत्रालय से कहा है कि इन कंपनियों को लगातार रणनीतिक समर्थन देने की जरूरत है, ताकि वे सशस्त्र बलों की जरूरतों को समय पर और गुणवत्ता के साथ पूरा कर सकें। (Defence PSUs Order Book)

Defence Emergency Procurement: जानिए क्यों अधर में लटक सकते हैं अरबों के रक्षा सौदे? समझिए इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का क्या है पूरा खेल

Defence Emergency Procurement Extension: DAC Meeting

Defence Emergency Procurement: भारत सरकार के इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट प्रक्रिया की समयसीमा को खत्म हुए एक महीना होने वाला है। यह समयसीमा पिछले महीने 19 नवंबर समाप्त हो गई थी। अब रक्षा मंत्रालय इस समय सीमा को एक महीना और आगे बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसकी वजह यह है कि कई हथियार प्रणालियों और सैन्य उपकरणों से जुड़ी बातचीत अंतिम चरण में है, लेकिन समयसीमा समाप्त होने के चलते उन्हें पूरा नहीं किया जा सका।

रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों के अनुसार, अगर यह अवधि नहीं बढ़ाई जाती है, तो जिन सौदों पर बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, वे अधर में लटक सकते हैं। ऐसे में एक महीने का एक्सटेंशन देकर इन सौदों को कॉन्ट्रैक्ट के स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।

Defence Emergency Procurement: इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट क्या है और क्यों जरूरी है

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक विशेष प्रक्रिया है, जिसके तहत भारतीय सेनाओं को बेहद कम समय में हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरण खरीदने की अनुमति दी जाती है। सामान्य रक्षा सौदों में जहां दो से तीन साल तक का वक्त लग जाता है, वहीं इस प्रक्रिया के तहत छह महीने के भीतर डिलीवरी सुनिश्चित की जाती है।

इस प्रक्रिया में न तो लंबा टेंडर निकाला जाता है और न ही ट्रायल किए जाते हैं। आम तौर पर हर सौदे की सीमा 300 से 400 करोड़ रुपये के बीच होती है, ताकि जरूरत के समय तुरंत सैन्य क्षमता बढ़ाई जा सके।

Defence Emergency Procurement: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

पिछले कुछ सालों में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का इस्तेमाल कई बार किया गया है। पूर्वी लद्दाख के गलवान में चीनी सेना के साथ हुए टकराव के बाद भारत ने इस प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में हथियार और उपकरण खरीदे थे। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी इस प्रक्रिया को अपनाया गया।

मई 2025 में सरकार ने इस विशेष व्यवस्था के तहत करीब 40 हजार करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद को मंजूरी दी थी। इसका मकसद सेना की तत्काल ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना था, ताकि किसी भी हालात में तैयारियों में कमी न रहे। उस दौरान सेना को ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, एयर डिफेंस सिस्टम और गोला-बारूद की तत्काल जरूरत पड़ी थी, जिसे इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के जरिए पूरा किया गया। (Defence Emergency Procurement)

बता दें कि इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट पावर की वैलिडिटी पीरियड आमतौर पर 6 महीने दी जाती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद मई 2025 में दी गई पावर नवंबर 19, 2025 तक वैलिड थी। इसके तहत 40 दिनों के अंदर कॉन्ट्रैक्ट साइन करना अनिवार्य होता है। वहीं 1 साल के अंदर पूरी डिलीवरी होनी चाहिए। अगर 1 साल में डिलीवरी नहीं हुई, तो 2025 की नई पॉलिसी अपडेट के तहत कॉन्ट्रैक्ट फोरक्लोज यानी कैंसल किया जा सकता है। नवंबर 2025 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने सख्त चेतावनी दी थी कि अब इस नियम को सख्ती से लागू किया जाएगा, चाहे सप्लायर देसी हो या विदेशी। आमतौर पर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का उद्देश्य 3-6 महीने में डिलीवरी सुनिश्चित करना है, ताकि तत्काल ऑपरेशनल गैप भरा जाए। (Defence Emergency Procurement)

Defence Emergency Procurement: सबसे ज्यादा जोर ड्रोन सिस्टम की खरीद पर

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत सबसे ज्यादा जोर ड्रोन और ड्रोन से जुड़े सिस्टम पर दिया गया। इसमें निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले सर्विलांस ड्रोन शामिल हैं। इनमें हेरॉन मार्क-2 जैसे ड्रोन पहले ही खरीदे जा चुके हैं और इनकी संख्या बढ़ाने पर भी बातचीत हुई है। इसके साथ ही दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने वाले कामिकेजे ड्रोन यानी सुसाइड ड्रोन भी खरीदे गए हैं। नागास्त्र-1आर जैसे ड्रोन की बड़ी संख्या में खरीद इसी प्रक्रिया के तहत की गई।

Defence Emergency Procurement: लॉन्ग रेंज लोइटरिंग म्यूनिशन पर फोकस

ड्रोन के अलावा, सेना की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए लॉन्ग रेंज लोइटरिंग म्यूनिशन भी प्राथमिकता में रखे गए। इनमें हारॉप, हार्पी और स्काईस्ट्राइकर जैसे सिस्टम शामिल हैं, जो लंबे समय तक हवा में मंडराकर सही मौके पर टारगेट को निशाना बनाते हैं। इनके साथ-साथ आर्टिलरी, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल यूनिट्स के लिए जरूरी गोला-बारूद की खरीद भी की गई, ताकि किसी भी मोर्चे पर सप्लाई की कमी न हो। (Defence Emergency Procurement)

Emergency Defence Procurement Rules: आपातकालीन हथियार सौदों पर नई सख्ती, एक साल में डिलीवरी नहीं तो रद्द होगा कॉन्ट्रैक्ट

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के दौरान कुछ खास मिसाइल सिस्टम भी शामिल किए गए। रैंपेज मिसाइल पहले ही इस प्रक्रिया में खरीदी जा चुकी हैं और अब इनके और ऑर्डर देने तथा स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने पर भी काम चल रहा है। ड्रोन के खतरे को देखते हुए लो-लेवल रडार की खरीद भी अहम रही, जिनका इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन की पहचान के लिए किया जाता है। इस क्षेत्र में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को ऑर्डर दिए गए हैं।

टैंक और बख्तरबंद वाहनों से निपटने के लिए जैवेलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल भी इमरजेंसी खरीद का हिस्सा बनीं। इन्हें अमेरिका से तुरंत खरीदा गया, साथ ही इनके को-प्रोडक्शन को लेकर भी बातचीत चल रही है। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए गए एक्सकैलिबर 155 एमएम प्रिसिजन गाइडेड आर्टिलरी शेल की और खरीद पर भी विचार किया गया, क्योंकि इनकी सटीकता मैदान में साबित हो चुकी है। (Defence Emergency Procurement)

ड्रोन से बढ़ते खतरे को देखते हुए सेना ने इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम पर भी ध्यान दिया है। यह सिस्टम ड्रोन की पहचान करने और उन्हें निष्क्रिय करने में मदद करता है, जिससे संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा मजबूत होती है।

Defence Emergency Procurement: भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता

इन सभी खरीद में सरकार का जोर अधिक से अधिक भारतीय कंपनियों से सामान लेने पर रहा है। सोलर इंडस्ट्रीज, भारत डायनेमिक्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियों को बड़े ऑर्डर दिए गए हैं, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि, कुछ जरूरी सिस्टम ऐसे भी हैं, जिन्हें इमरजेंसी हालात में विदेश से मंगाना पड़ा।

Defence Procurement Manual-2025: अब चुटकियों में होगी रक्षा खरीद, नए डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल में कई पुरानी बाधाओं को किया दूर

नवंबर 2025 तक इन सौदों में से कई पर बातचीत चलती रही, लेकिन इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समयसीमा खत्म हो जाने के कारण सभी समझौते पूरे नहीं हो सके। (Defence Emergency Procurement)

फास्ट ट्रैक परचेज सिस्टम भी विकल्प

रक्षा मंत्रालय के सामने एक और विकल्प फास्ट ट्रैक परचेज का भी है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट से मिलती-जुलती है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। हालांकि, अभी इस विकल्प पर भी चर्चा चल रही है और कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

दिसंबर में हो सकती है डीएसी की अहम बैठक

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा बढ़ाने पर फैसला डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठक में लिया जा सकता है। यह बैठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होती है। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन शामिल होते हैं। (Defence Emergency Procurement)

Loitering munitions: भारत का पहला स्वदेशी लोइटरिंग म्यूनिशन नागास्त्र-1 भारतीय सेना में शामिल होने के लिए तैयार, अब लंबी रेंज वाले ड्रोन की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, डीएससी की इस साल की आखिरी बैठक 26 दिसंबर को होने की संभावना है। इसी बैठक में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के को बढ़ानेया फास्ट ट्रैक प्रक्रिया को अपनाने पर फैसला लिया जा सकता है।

स्वदेशी हथियारों पर सरकार का फोकस

हाल के महीनों में डीएसी ने जिन हथियारों को मंजूरी दी है, उनमें से अधिकतर पूरी तरह स्वदेशी या बड़े स्तर पर स्वदेशी सामान का इस्तेमाल हुआ है। यह सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल का हिस्सा है। हालांकि, कुछ बड़े सौदे अब भी विदेशी कंपनियों से जुड़े हैं, जिनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी प्रिडेटर ड्रोन की खरीद प्रमुख है। (Defence Emergency Procurement)

चल रही बातचीत को पूरा करने की जरूरत

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि अगर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा को थोड़ा और बढ़ाया जाता है, तो पहले से चल रही बातचीत को औपचारिक समझौतों में बदला जा सकता है। इससे सेना की तत्काल जरूरतें भी पूरी होंगी और खरीद प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कतें भी नहीं आएंगी।

उरी आतंकी हमले के बाद बढ़ा इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का इस्तेमाल

भारत में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट यानी आपातकालीन रक्षा खरीद की व्यवस्था का इस्तेमाल पिछले कुछ सालों में धीरे-धीरे बढ़ी है। साल 2014 से 2016 के बीच यह व्यवस्था बहुत सीमित थी और अधिकतर मामलों में खरीद सीधे रक्षा मंत्रालय के स्तर पर देखी जाती थी। उस समय सशस्त्र बलों को बड़े पैमाने पर विशेष खरीद अधिकार नहीं मिले थे।

लेकिन असल बदलाव साल 2016 के बाद आया। उरी आतंकी हमले के बाद सरकार ने सेना को विशेष वित्तीय शक्तियां दीं, ताकि जरूरत पड़ने पर हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरण जल्दी खरीदे जा सकें। इसके बाद इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक अहम प्रक्रिया बन गई।

साल 2014 से अक्टूबर 2016 के बीच भारतीय सेना ने इस व्यवस्था के तहत कुल 17 छोटे कॉन्ट्रैक्ट किए, जिनकी कुल कीमत करीब 400 करोड़ रुपये रही। उस समय खरीद का दायरा सीमित था और जरूरतें भी तुलनात्मक रूप से कम थीं। (Defence Emergency Procurement)

इसके बाद हालात तेजी से बदले। उरी के बाद, बालाकोट एयर स्ट्राइक, फिर लद्दाख में चीन के साथ सैन्य तनाव और बाद में ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के चलते सेना को तत्काल हथियारों और उपकरणों की जरूरत पड़ी। इसी दौर में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की कई ट्रांच यानी चरण शुरू किए गए।

अब तक ईपी के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये

पहली से तीसरी ट्रांच, जिन्हें आमतौर पर ईपी-1 से ईपी-3 कहा जाता है, मुख्य तौर पर से सेना से जुड़ी थीं। इन चरणों में लगभग 68 कॉन्ट्रैक्ट किए गए और कुल खर्च 6,500 से 7,000 करोड़ रुपये के आसपास रहा। इन खरीद में हथियार, गोला-बारूद, निगरानी उपकरण और अन्य जरूरी सैन्य सिस्टम शामिल थे। (Defence Emergency Procurement)

इसके बाद 2022-23 के आसपास ईपी-4 लागू हुई, उसमें इमरजेंसी खरीद का दायरा और बढ़ा। इस चरण में 70 से ज्यादा योजनाओं को मंजूरी दी गई और कुल राशि करीब 11,000 करोड़ रुपये रही। इस ट्रांच की खास बात यह थी कि इसमें ज्यादातर सामान स्वदेशी कंपनियों से खरीदा गया, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके।

इसके बाद एक और छोटी ट्रांच, जिसे ईपी-5 कहा गया, सामने आई। इसकी कुल राशि बहुत ज्यादा नहीं थी और अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक यह करीब 2,000 करोड़ रुपये के आसपास मानी जाती है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर काउंटर-टेरर ऑपरेशंस और तत्काल जरूरतों के लिए किया गया।

सबसे बड़ी और अहम ट्रांच साल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई। इसे आमतौर पर ईपी-6 कहा जा रहा है। इस चरण में सरकार ने करीब 40,000 करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद को मंजूरी दी। यह अब तक की सबसे बड़ी इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट ट्रांच मानी जा रही है। इसमें ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण शामिल हैं।

अगर 2014 से दिसंबर 2025 तक की सभी उपलब्ध रिपोर्ट्स को जोड़ा जाए, तो अनुमानित तौर पर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये के बीच बैठती है। अकेले सेना के लिए यह आंकड़ा अलग-अलग रिपोर्ट्स में 18,000 से 29,000 करोड़ रुपये के बीच बताया गया है। (Defence Emergency Procurement)

India-Russia Defence Cooperation: रूस दौरे पर गए प्रतिनिधिमंडल में नहीं थी कोई निजी कंपनी, रक्षा मंत्रालय ने मीडिया रिपोर्ट को बताया गलत

India-Russia Defence Cooperation
Raksha Mantri and his Russian counterpart co-chair 22nd India-Russia Inter-Governmental Commission on Military & Military Technical Cooperation in New Delhi

India-Russia Defence Cooperation: भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग से जुड़ी एक हालिया मीडिया रिपोर्ट को लेकर रक्षा मंत्रालय ने सफाई दी है। रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा प्रकाशित खबरें तथ्यहीन और गलत हैं। इन रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि अक्टूबर 2025 में रूस गए सरकारी प्रतिनिधिमंडल के साथ प्राइवेट डिफेंस इंडस्ट्री के प्रतिनिधि भी शामिल थे और उन्होंने रूसी पक्ष से बैठकें की थीं।

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अक्टूबर 2025 में हुआ यह दौरा पूरी तरह आधिकारिक था और इसमें केवल सरकारी अधिकारी तथा रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के प्रतिनिधि ही शामिल थे। किसी भी निजी कंपनी या निजी उद्योग के प्रतिनिधि को इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं किया गया था।

India Russia defence projects: पुतिन की यात्रा के दौरान इन डील्स पर लग सकती है अंतिम मुहर, तीसरी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन पर भी चल रही बातचीत

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह दौरा इंडिया-रूस इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन ऑन मिलिट्री एंड मिलिट्री टेक्निकल कोऑपरेशन (IRIGC-M&MTC) के तहत आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य भारत और रूस के बीच तीनों सेनाओं थलसेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े ट्रेडिशनल मिलिट्री को-ऑपरेशन को सिस्टमैटिक फ्रेमवर्क में आगे बढ़ाना है।

इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत वर्किंग ग्रुप ऑन मिलिट्री टेक्निकल कोऑपरेशन एंड डिफेंस इंडस्ट्री (IRWG-MTC&DI) का गठन किया गया है। यह वर्किंग ग्रुप हर साल भारत और रूस में बारी-बारी से बैठक करता है। वर्ष 2024 में इसकी 22वीं बैठक भारत में आयोजित हुई थी।

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस वर्किंग ग्रुप की 23वीं बैठक इस साल 25 से 29 अक्टूबर के बीच मॉस्को में आयोजित की गई थी। इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत की ओर से डिफेंस प्रोडक्शन सेक्रेटरी संजीव कुमार और रूस की ओर से फेडरल सर्विस फॉर मिलिट्री टेक्निकल को-ऑपरेशन के फर्स्ट डिप्टी डायरेक्टर आंद्रे ए बोयत्सोव ने की थी।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल में रक्षा मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस प्रोडक्शन, डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस, तीनों सेनाओं के अधिकारी और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के प्रतिनिधि शामिल थे। इनमें आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड, भारत डायनामिक्स लिमिटेड, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, गोवा शिपयार्ड लिमिटेड, म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां शामिल थीं।

रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा है कि किसी भी निजी रक्षा कंपनी का कोई प्रतिनिधि इस आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा नहीं था। मंत्रालय ने मीडिया रिपोर्ट में किए गए दावे को पूरी तरह खारिज किया है।

मंत्रालय ने इस बात पर भी स्पष्टीकरण दिया कि मीडिया का यह कहना कि रक्षा मंत्रालय ने इस खबर पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, सही नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि संवेदनशील और रणनीतिक विषयों पर तुरंत प्रतिक्रिया देना हमेशा संभव नहीं होता, खासकर तब जब रिपोर्ट प्रकाशित होने से ठीक पहले टिप्पणी मांगी जाए।

रक्षा मंत्रालय ने मीडिया से अपील की है कि भविष्य में ऐसी खबरें प्रकाशित करने से पहले कड़े फैक्ट-चेकिंग प्रोटोकॉल अपनाए जाएं, ताकि गलत और भ्रामक जानकारी फैलने से रोकी जा सके।

यह दौरा भारत-रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग का हिस्सा था, जिसमें सैन्य तकनीकी सहयोग, रक्षा उद्योग से जुड़े मुद्दों और दोनों देशों के बीच आपसी कॉर्डिनेशन पर चर्चा की गई। यह सहयोग गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट के स्तर पर तय किए गए सिस्टमैटिक फ्रेमवर्क के तहत हुआ।

रक्षा मंत्रालय ने दोहराया है कि भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग पूरी तरह संस्थागत प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाता है और इसमें पारदर्शिता तथा निर्धारित नियमों का पालन किया जाता है।

भारतीय सेना को मिले आखिरी तीन AH-64E Apache Helicopters, पाकिस्तान बॉर्डर पर ऑपरेशनल हुई स्क्वाड्रन

AH-64E Apache Helicopters
Indian Air Force’s First Batch Of 4 Number Of Apache Attack Helicopters (File Photo)

AH-64E Apache Helicopters: अमेरिका से खरीदे गए AH-64E अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर की डील के तहत बचे हुए आखिरी तीन हेलिकॉप्टर मंगलवार को औपचारिक तौर पर भारतीय सेना में शामिल हो गए। इसके साथ ही सेना की कुल छह अपाचे हेलिकॉप्टरों वाली स्क्वाड्रन अब पूरी तरह ऑपरेशनल हो गई है।

ये तीनों हेलिकॉप्टर पहले हिंडन एयरफोर्स स्टेशन, गाजियाबाद पर उतरे, जिसके बाद इन्हें भारतीय सेना में शामिल किया गया। सभी छह अपाचे हेलिकॉप्टर राजस्थान के जोधपुर स्थित 451 आर्मी एविएशन स्क्वाड्रन में तैनात किए जाएंगे।

छह AH-64E Apache Helicopters की स्क्वाड्रन हुई पूरी

भारतीय सेना ने फरवरी 2020 में अमेरिका के साथ लगभग 600 मिलियन डॉलर का समझौता किया था। इस डील के तहत सेना के लिए कुल छह अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर खरीदे गए थे। इन हेलिकॉप्टरों की पहली खेप पहले ही भारत पहुंच चुकी थी, जबकि अंतिम तीन हेलिकॉप्टर अब सेना में शामिल किए गए हैं।

Apache AH-64E Helicopters: भारतीय सेना की एविएशन कोर का दो साल का इंतजार खत्म! जल्द मिलने वाले हैं अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर

इन हेलिकॉप्टरों के शामिल होने के साथ ही सेना की डेडिकेटेड अपाचे स्क्वाड्रन पूरी तरह से ऑपरेशनल हो गई है। इस स्क्वाड्रन को खास तौर पर पश्चिमी सीमा पर ऑपरेशनल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मार्च 2024 में खड़ा किया गया था। (AH-64E Apache Helicopters)

पश्चिमी मोर्चे पर बढ़ी भारतीय सेना की ताकत

सभी छह अपाचे हेलिकॉप्टर जोधपुर में तैनात किए जा रहे हैं। यह इलाका पाकिस्तान से लगती पश्चिमी सीमा के लिहाज से रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। अपाचे हेलिकॉप्टरों की तैनाती से भारतीय सेना की स्ट्राइक, टोही और क्लोज एयर सपोर्ट क्षमता को बड़ी ताकत मिलेगी।

अपाचे को दुनिया के सबसे आधुनिक और घातक अटैक हेलिकॉप्टरों में गिना जाता है। यह हर मौसम और हर तरह के इलाके में ऑपरेशन करने में सक्षम है। (AH-64E Apache Helicopters)

AH-64E Apache Helicopters
AH-64E Apache Helicopters

क्या हैं AH-64E Apache Helicopters की खूबियां

अपाचे हेलिकॉप्टर अत्याधुनिक एवियोनिक्स, सेंसर और हथियार प्रणालियों से लैस है। इसमें हेलफायर लॉन्गबो मिसाइल, स्टिंगर एयर-टू-एयर मिसाइल, 30 मिलीमीटर चेन गन और एडवांस रॉकेट सिस्टम लगाए गए हैं। यह हेलिकॉप्टर दुश्मन के टैंकों, बख्तरबंद वाहनों और जमीनी ठिकानों को सटीक निशाना बना सकता है। (AH-64E Apache Helicopters)

डिलीवरी में हुई थी लंबी देरी

इन हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी अपने तय समय से काफी देर से हुई। मूल योजना के अनुसार इनकी सप्लाई मई 2024 में होनी थी, लेकिन ग्लोबल सप्लाई चेन में आई दिक्कतों के चलते इसमें करीब 15 महीने की देरी हो गई।

नवंबर 2025 में अपाचे हेलिकॉप्टरों को लेकर एक विशेष एंटोनोव एएन-124 कार्गो जहाज अमेरिका के एरिजोना स्थित मेसा गेटवे एयरपोर्ट से रवाना हुआ था। यह विमान ईंधन भरने के लिए इंग्लैंड उतरा, लेकिन तुर्किए की तरफ से ओवरफ्लाइट क्लीयरेंस न दिए जाने के चलते इसे लगभग एक हफ्ते तक वहीं रोका गया और बाद में वापस अमेरिका लौटना पड़ा। (AH-64E Apache Helicopters)

Apache Helicopter Delivery: तुर्किए ने दिखा दिया अपना रंग, भारत आने वाले तीन अपाचे हेलीकॉप्टरों का रोका रास्ता, वापस लौटे अमेरिका

वहीं, अपाचे हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी ऐसे समय पर पूरी हुई है, जब भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। जुलाई 2025 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के बीच हुई टेलीफोनिक बातचीत में भी इन हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी को लेकर चर्चा हुई थी। उस दौरान अमेरिका ने भारत को भरोसा दिया था कि बचे हुए अपाचे हेलिकॉप्टर जल्द सौंप दिए जाएंगे। (AH-64E Apache Helicopters)

अपाचे हेलिकॉप्टरों के शामिल होने से भारतीय सेना की आर्मी एविएशन ब्रांच को पहली बार डेडिकेटेड अटैक हेलिकॉप्टर स्क्वाड्रन मिल गई है, जो जमीनी बलों को सीधे हवाई समर्थन दे सकेगी।

भारतीय वायुसेना के पास भी हैं अपाचे

भारतीय वायुसेना पहले ही अपाचे हेलिकॉप्टरों को ऑपरेट कर रही है। वायुसेना ने 2015 में करीब 13,952 करोड़ रुपये की डील के तहत 22 अपाचे हेलिकॉप्टर खरीदे थे, जिन्हें 2019 और 2020 के बीच शामिल किया गया था। अब सेना और वायुसेना दोनों के पास यह अटैक हेलिकॉप्टर मौजूद होंगे। (AH-64E Apache Helicopters)

वहीं, अपाचे हेलिकॉप्टरों के अलावा भारतीय नौसेना भी अपनी ताकत बढ़ा रही है। नौसेना एमएच-60आर सीहॉक हेलिकॉप्टरों की नई स्क्वाड्रन को कमीशन करने की तैयारी में है, जो खास तौर पर एंटी-सबमरीन वॉरफेयर के लिए इस्तेमाल होते हैं।

वहीं देश में ही बने लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर (एलसीएच) प्रचंड को भी धीरे-धीरे सेना और वायुसेना में शामिल किया जा रहा है। इन सभी कोशिशों से भारत की रोटरी-विंग यानी हेलिकॉप्टर आधारित युद्ध क्षमता को मजबूती मिल रही है। (AH-64E Apache Helicopters)

पहला स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट DSC A20 नौसेना में शामिल, जानें क्या है इसकी खासियत?

Diving Support Craft DSC A20
Diving Support Craft DSC A20

भारतीय नौसेना ने मंगलवार को अपने पहले स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट DSC A20 को औपचारिक रूप से कमीशन कर लिया। यह समारोह केरल के नेवल बेस कोच्चि में आयोजित किया गया। DSC A20 उन पांच डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट में पहला है, जिन्हें देश में ही बनाया जा रहा है।

कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता वाइस एडमिरल समीर सक्सेना, फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, साउथर्न नेवल कमांड ने की। कार्यक्रम की मेजबानी वाइस एडमिरल संजय साधु, कंट्रोलर ऑफ वॉरशिप प्रोडक्शन एंड एक्विजिशन ने की। समारोह के दौरान नौसेना परंपराओं के अनुसार जहाज को सेवा में शामिल किया गया।

Diving Support Craft DSC A20
Diving Support Craft DSC A20

DSC A20 Diving Support Craft: भारतीय नौसेना को मिलेगा स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट, अंडरवाटर मिशनों में बढ़ेगी ताकत

DSC A20 को कोलकाता स्थित टिटागढ़ रेल सिस्टम्स लिमिटेड ने स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित किया है। इन पांच डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट रक्षा मंत्रालय और कंपनी के बीच 12 फरवरी 2021 को हुआ था। जहाज के डिजाइन फेज में इसका हाइड्रोडायनामिक एनालिसिस और मॉडल टेस्टिंग विशाखापट्टनम स्थित नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी में की गई थी।

Diving Support Craft DSC A20
Diving Support Craft DSC A20

यह जहाज इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग के नियमों के अनुसार बनाया गया है। DSC A20 एक कैटामरन-हल डिजाइन वाला जहाज है, जिसका वजन लगभग 390 टन है। इसमें आधुनिक डाइविंग इक्विपमेंट लगाए गए हैं, जो अंडरवाटर ऑपरेशंस के लिए जरूरी होते हैं।

Diving Support Craft DSC A20
Diving Support Craft DSC A20

भारतीय नौसेना के मुताबिक DSC A20 का इस्तेमाल अंडरवाटर रिपेयर, इंस्पेक्शन, हार्बर क्लियरेंस और कोस्टल एरिया में अहम डाइविंग मिशनों के लिए किया जाएगा। यह जहाज तटीय जलक्षेत्र में नौसेना की तकनीकी और ऑपरेशनल क्षमता को मजबूत करेगा।