Parliamentary Defence Panel: रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने आज बेंगलुरु में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का दौरा किया। दस सदस्यों वाली इस समिति की अगुवाई लोकसभा सांसद राधा मोहन सिंह ने की। अपने इस दौरे में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की हेलिकॉप्टर डिवीजन, LCA तेजस डिवीजन और एअरक्राफ्ट डिवीजन का जायजा लिया। इससे पहले जुलाई में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने भी बेंगलुरु में एचएलएल की फैसिलिटीज का दौरा किया था।
एचएएल से मिली जानकारी के मुताबिक कंपनी ने समिति को अपनी आधुनिकीकरण योजनाओं और स्वदेशी परियोजनाओं में हो रही प्रगति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान एचएएल में बन ररहे स्वदेशी विमानों और हेलिकॉप्टरों ने हवाई करतब भी दिखाए। जिसमें एलसीए तेजस Mk 1A, हिंदुस्तान टर्बो ट्रेनर-40, हिंदुस्तान जेट ट्रेनर ‘यशस’ और हॉक-आई जैसे विमानों ने हिस्सा लिया। इसके साथ ही, ध्रुव एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर और लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर ने भी अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया।
इस समिति को एचएएल की आधुनिकरण योजनाओं और स्वदेशीकरण से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं की जानकारी दी गई। एचएएल के अधिकारियों ने बताया कि आने वाले समय में कंपनी न केवल भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा कर रही है बल्कि निर्यात के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
🚨 Parliamentary Defence Panel visits HAL Bengaluru 🚨
The Parliamentary Standing Committee on Defence, led by Chairman Radha Mohan Singh, visited HAL facilities in Bengaluru today.
👨✈️ The 10-member panel was welcomed by HAL CMD Dr. D.K. Sunil and senior officials.
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इससे पहले, 9 जुलाई 2025 को, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने बेंगलुरु में एचएएल की सुविधाओं का दौरा किया था। उन्होंने अपने दौरे की शुरुआत एचएएल के विमान अनुसंधान और डिजाइन केंद्र में LCA Mk-2 हैंगर से की थी। इसके बाद उन्होंने तेजस Mk-1A के असेंबली हैंगर और एयरोस्पेस डिवीजन का जायजा लिया था। इस दौरान उन्हें तेजस Mk-1A के उत्पादन की प्रगति के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई थी। एचएएल ने उन्हें छह Mk-1A फाइटर जेट और दो Mk-1 ट्रेनर जेट भी दिखाए थे, जो जल्द ही भारतीय वायुसेना को सौंपे जाएंगे।
Photo: HAL
डॉ. मिश्रा को एचएएल ने तेजस Mk-2 और एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) जैसी परियोजनाओं की जानकारी ली थी। उन्होंने ‘प्रचंड’ लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर, लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, ध्रुव ALH और HTT-40 ट्रेनर विमान के प्रोटोटाइप भी देखे थे। इसके अलावा, उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े GSLV MkIII और PSLV रॉकेट्स के असेंबली शॉप्स का दौरा करने के साथ गगनयान मिशन के लिए एचएएल के सिस्टम्स और इंटीग्रेटेड क्रायोजेनिक इंजन निर्माण सुविधा का निरीक्षण किया। उनके इस दौरे को इस बात से जोड़ा जा रहा था कि प्रधानमंत्री कार्यालय एचएएल के कार्यों और भारत के रक्षा व अंतरिक्ष क्षेत्र की प्रगति पर पैनी नजर रख रहा है।
AMCA jet engine: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने घोषणा की है कि भारत और फ्रांस मिलकर देश के पहले स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के लिए स्वदेशी जेट इंजन तैयार करेंगे और उसका निर्माण भी भारत में ही करेंगे। यह साझेदारी फ्रांस की एयरोस्पेस कंपनी सफरान (Safran) के साथ होगी। उन्होंने कहा कि भारत अब विमान इंजन के निर्माण में भी आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है।
रक्षा मंत्री ने नई दिल्ली में आयोजित ईटी वर्ल्ड लीडर्स फोरम को संबोधित करते हुए कहा, “हमने अपने लड़ाकू विमान के इंजन को भारत में ही बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। हम फ्रांस की कंपनी सफरान के साथ मिलकर जल्द ही इंजन निर्माण का काम शुरू करने जा रहे हैं।” इस परियोजना को भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत बनाने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
AMCA jet engine: फ्रांस के साथ तकनीकी सहयोग
सफरान दुनियाभर में एडवांस जेट इंजनों की मैन्युफैक्चरिंग के लिए जानी जाती है। कंपनी राफेल लड़ाकू विमान के लिए M88 इंजन बना चुकी है, जिसका इस्तेमाल भारतीय वायुसेना भी कर रही है। भारत और फ्रांस के बीच यह नया सहयोग इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट रिसर्च और देश में निर्माण को शामिल करेगा। हालांकि AMCA के लिए तैयार किया जा रहा इंजन अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित होगा, जिसमें स्टील्थ क्षमता, सुपरसोनिक क्रूज और हाई मोबिलिटी जैसी खूबियां होंगी। हालांकि इंजन के टेक्निकल स्पेसिफिकेशंस को सार्वजनिक नहीं किया गया है।
अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय सभ्यता वैश्विक व्यवस्था को प्रभुत्व की होड़ के रूप में नहीं, बल्कि सम्मान और समानता पर आधारित साझा यात्रा के रूप में देखती है। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत केवल शक्ति प्रदर्शन में नहीं, बल्कि देखभाल और सहयोग की क्षमता में निहित है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की रक्षा नीति संकीर्ण हितों पर आधारित नहीं है, बल्कि वैश्विक कल्याण की भावना पर आधारित है।
AMCA jet engine: सफरान ने भारत में बनाई एमआरओ सुविधा
सफरान पहले से ही भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। कंपनी ने हैदराबाद में एक मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा स्थापित की है, जो भारतीय और विदेशी एयरलाइंस के लिए LEAP-1A और LEAP-1B इंजनों का रखरखाव करती है। इसके अलावा, सफरान और एचएएल ने बेंगलुरु में एक संयुक्त उद्यम के तहत हेलीकॉप्टर और लड़ाकू विमानों के लिए इंजन पार्ट्स का निर्माण शुरू किया है।
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AMCA jet engine: पाकिस्तान को दिया करारा जवाब
रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख के हालिया बयान पर भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, जिसमें मुनीर ने भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना स्पोर्ट्स कार और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की तुलना ट्रक से की थी। उन्होंने कहा कि यह केवल मजाक नहीं बल्कि स्वीकारोक्ति है कि भारत ने सही नीतियों और दृष्टिकोण से प्रगति की है जबकि पाकिस्तान अपनी असफलताओं में फंसा रहा।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की समृद्धि के साथ-साथ उसकी रक्षा क्षमता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करने की प्रतिबद्धता भी उतनी ही मजबूत है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने पहले ही भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति को दिखा दिया है और पाकिस्तान के मन में भारत की ताकत को लेकर कोई गलतफहमी पनपने नहीं दी जाएगी।
AMCA jet engine: रक्षा उत्पादन और निर्यात में बड़ी छलांग
राजनाथ सिंह ने बताया कि पिछले एक दशक में भारत के रक्षा निर्यात में 35 गुना वृद्धि हुई है। वर्ष 2013-14 में जहां यह मात्र 686 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। आज भारत लगभग 100 देशों को डिफेंस इक्विपमेंट्स निर्यात कर रहा है।
सरकार ने 2025 में रक्षा निर्यात का लक्ष्य 30,000 करोड़ रुपये और 2029 तक 50,000 करोड़ रुपये तय किया है। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन भी 2014 के 40,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और वर्तमान वित्तीय वर्ष में यह लगभग 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।
AMCA jet engine: आत्मनिर्भरता के लिए नई सूची
रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत ने अब तक 509 प्लेटफॉर्म, सिस्टम और हथियारों को शामिल करते हुए पांच सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची जारी की हैं। इन सभी का निर्माण अब भारत में ही किया जाएगा। इसके अलावा रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs) ने 5,000 से अधिक महत्वपूर्ण उपकरणों और कलपुर्जों की अपनी स्वदेशीकरण सूची भी जारी की है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार ने रक्षा पूंजीगत खरीद बजट का 75% भारतीय कंपनियों के लिए रिजर्व कर दिया है।
तेजस के मिल रहे लगातार ऑर्डर
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि कंपनी को हाल ही में 97 तेजस लड़ाकू विमानों के लिए 66,000 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। इसके अलावा पहले से ही 83 तेजस विमानों का 48,000 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया गया था। उन्होंने कहा कि तेजस भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं का शानदार उदाहरण है।
बन रहे डिफेंस कॉरिडोर
रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में यह भी बताया कि भारत ने रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बन रहे डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स का जिक्र किया, जो निवेश को आकर्षित कर रहे हैं और रक्षा क्षेत्र के लिए विकास का इंजन बन रहे हैं। इसके अलावा, सरकार ने रक्षा क्षेत्र में FDI सीमा 74% (ऑटोमैटिक रूट) और 100% (गवर्नमेंट रूट) तक बढ़ा दी है और DRDO की तकनीक ट्रांसफर भी मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही है।
उन्होंने बताया कि स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के जरिए निजी कंपनियों को लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक और पनडुब्बी बनाने का मौका दिया जा रहा है। स्टार्टअप्स और एमएसएमई को प्रोत्साहित करने के लिए iDEX (Innovations for Defence Excellence) जैसी योजनाओं की शुरुआत की गई है।
रक्षा बजट में बड़ा इजाफा
रक्षा मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का रक्षा बजट 2013-14 के 2.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 6.22 लाख करोड़ रुपये हो गया है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसमें और बढ़ोतरी की गई है ताकि सेना को और आधुनिक बनाया जा सके।
विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश का न्योता
राजनाथ सिंह ने कहा कि आज दुनिया की बड़ी रक्षा कंपनियों के पास भारत में निवेश करने और यहां रक्षा उपकरण बनाने का बेहतरीन अवसर है। उन्होंने एयरबस और टाटा एयरोस्पेस के सहयोग से बन रहे C295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा कि भारत का “हमारा मेक इन इंडिया केवल भारत तक सीमित नहीं है। जब आप भारत में बनाएंगे, तो आप पूरी दुनिया के लिए बनाएंगे।
भारत की तीन बड़ी ताकतें
रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि भारत आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाएगा। इसके पीछे उन्होंने तीन कारण गिनाए- भारत की सभ्यतागत मूल्य, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और युवा जनसंख्या।
उन्होंने बताया कि भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरे स्थान की ओर बढ़ रहा है। पिछले दशक में भारत का निर्यात 76% बढ़ा है और घरेलू मांग वैश्विक चुनौतियों के बावजूद मजबूत बनी हुई है।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत की 65% से अधिक आबादी 35 साल से कम उम्र की है और देश में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, जिसमें 100 से अधिक यूनिकॉर्न शामिल हैं।
Speedy Justice for Armed Forces: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम सर्कुलर जारी करते हुए निर्देश दिया है कि राजधानी की सभी अदालतें भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और पैरामिलिट्री बलों से जुड़े मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दें। यह आदेश हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल अरुण भारद्वाज की ओर से जारी किया गया है।
सर्कुलर में कहा गया है कि संसद ने पहले से ही सशस्त्र बलों की जिम्मेदारियों को देखते हुए विभिन्न कानूनों में विशेष प्रावधान किए हैं। इनमें आर्मी एक्ट 1950 की धारा 32, नेवी एक्ट 1957 की धारा 24 और एयर फोर्स एक्ट 1950 की धारा 32 शामिल हैं। इन प्रावधानों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आर्मी, नेवी और एयरफोर्स से जुड़े मामलों की सुनवाई तेजी से हो सके।
इसके अलावा, भारतीय सैनिक (विवाद) अधिनियम 1925, जिसे 19 नवंबर 2018 को संशोधित किया गया था, भी इस विशेष सुरक्षा का आधार है। इस अधिनियम के तहत भारतीय सैनिकों को सिविल और राजस्व मामलों की सुनवाई में प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान है।
दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों और आदेशों के वॉल्यूम-1 में भी स्पष्ट किया गया है कि सैन्य सेवा से जुड़े व्यक्तियों के खिलाफ या उनके पक्ष में दायर मुकदमों को प्राथमिकता दी जाए। विशेष रूप से अध्याय 6 के अंतर्गत आने वाले प्रावधान इस बात पर जोर देते हैं कि सेना और वायुसेना से जुड़े विवादों को तेजी से निपटाया जाए।
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 21, 2025
इस आदेश के अनुसार, दिल्ली के सभी सिविल और राजस्व अदालतों को यह निर्देश दिया गया है कि वे आर्मी, नेवी और एयरफोर्स से जुड़े मुकदमों और आपराधिक मामलों को प्राथमिकता से लें। साथ ही, कोर्ट को यह भी कहा गया है कि पैरामिलिट्री बलों के मामलों की जल्दी सुनवाई और अंतिम निपटारा सुनिश्चित किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश के इस आदेश की प्रतियां दिल्ली की सभी जिला और सत्र अदालतों के प्रधान न्यायाधीशों को भेज दी गई हैं। इनमें तिहाड़ कोर्ट, रोहिणी कोर्ट, साकेत कोर्ट, द्वारका कोर्ट, कड़कड़डूमा कोर्ट, पटियाला हाउस कोर्ट और शाहदरा कोर्ट शामिल हैं।
सर्कुलर के साथ यह भी निर्देश दिया गया है कि अदालतें इस तरह के मामलों की जल्दी सुनवाई और अंतिम निर्णय की व्यवस्था करें ताकि वर्दीधारी बलों को अनावश्यक देरी से राहत मिल सके।
Pinaka Rocket System: डीआरडीओ पिनाका रॉकेट सिस्टम (Pinaka Rocket System) का लॉन्ग रेंज वेरियंट तैयार कर रहा है। पुणे स्थित आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ARDE) के निदेशक डॉ. ए. राजू ने एक विशेष साक्षात्कार में इसकी पुष्टि की। उन्होंने बताया कि 120 किलोमीटर तक मार करने वाला पिनाका वेरिएंट तैयार हो चुका है, जबकि 300 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाले नए वेरियंट पर काम जारी है।
Pinaka Rocket System: भारत का स्वदेशी मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम
पिनाका रॉकेट सिस्टम को भारतीय सेना में रूसी BM-21 ग्रैड और स्मर्च सिस्टम के विकल्प के रूप में शामिल किया गया। यह 8×8 टाट्रा ट्रक पर लगाया जाता है और महज 44 सेकंड में 12 रॉकेट दाग सकता है। इसकी तेज जवाबी क्षमता और सटीकता की वजह से यह युद्ध के दौरान दुश्मन की महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम है।
प्रत्येक लॉन्चर में दो पॉड होते हैं, और हर पॉड में छह ट्यूब लगी होती हैं। इसे फायर कंट्रोल कंप्यूटर (FCC), लॉन्चर कंप्यूटर (LC) या मैन्युअल रूप से चलाया जा सकता है। निशाना साधने के लिए इसमें ऑटोमैटिक गन एलाइनमेंट एंड प्वाइंटिंग सिस्टम (AGAPS) या डायल साइट का उपयोग होता है।
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इस सिस्टम का उत्पादन कई भारतीय कंपनियों के जरिए किया जा रहा है। यंत्र इंडिया लिमिटेड, सोलर इंडस्ट्रीज लिमिटेड, इकनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड और म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड रॉकेट बनाती हैं। वहीं लार्सन एंड टुब्रो और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लॉन्चर का निर्माण करते हैं, जबकि बीईएमएल (BEML) ट्रक उपलब्ध कराती है।
Pinaka Rocket System: कारगिल युद्ध का हीरो
पिनाका का पहला उपयोग 1999 के कारगिल युद्ध में किया गया था। ऊंचाई वाले इलाकों में दुश्मन की चौकियों को ध्वस्त करने में इसकी भूमिका बेहद अहम रही। बोफोर्स तोपों के साथ मिलकर पिनाका ने दुश्मन के ठिकानों को तबाह कर भारतीय सेना को निर्णायक बढ़त दिलाई।
फिलहाल पिनाका के तीन वेरिएंट भारतीय सेना में मौजूद हैं। पिनाका Mk-I जिसकी मारक क्षमता 37.5 किलोमीटर है। इसके बाद एन्हांस्ड पिनाका जो 50 किलोमीटर तक मार कर सकता है। तीसरा वेरिएंट है गाइडेड पिनाका जिसकी मारक क्षमता 75 किलोमीटर है।
Power Unleashed! 🚀
Meet the Pinaka Missile Launcher – India's indigenous, multi-barrel rocket launcher system designed to dominate the battlefield. Developed by DRDO, Pinaka delivers precision strikes with a range of up to 75 km, making it a formidable weapon in modern warfare.… pic.twitter.com/B52iehKZjT
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गाइडेड पिनाका को 2024 में भारतीय सेना में शामिल किया गया। परीक्षण के दौरान इसकी सटीकता (Circular Error Probable) केवल 2 से 3 मीटर रही, जबकि सेना की जरूरत 40 मीटर तक थी। डॉ. राजू के अनुसार, “यह लगभग एक क्रूज मिसाइल की तरह काम करता है।”
Pinaka Rocket System: नए वेरिएंट्स की तैयारी
वहीं, डीआरडीओ अब पिनाका को और लंबी दूरी तक सक्षम बनाने की दिशा में काम कर रहा है। डॉ. राजू ने बताया कि 120 किलोमीटर रेंज वाला वेरिएंट पूरा हो चुका है। इसके अलावा, 300 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाला पिनाका भी तैयार किया जा रहा है, जो अमेरिकी आर्मी के टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम (ATACMS) के बराबर होगा।
थलसेना, नौसेना और वायुसेना के लिए अलग संस्करण
डीआरडीओ पिनाका के ऐसे वेरिएंट भी तैयार कर रहा है, जिन्हें भारतीय नौसेना और वायुसेना के लिए इस्तेमाल किया जा सके। नौसेना के लिए विशेष संस्करण पर काम चल रहा है, वहीं वायुसेना के लिए एयर-लॉन्च्ड वेरिएंट पर विचार किया जा रहा है। इन नए संस्करणों को पिनाका Mk-3 और Mk-4 के नाम से जाना जाएगा।
Pinaka Rocket System: डिजाइन में बदलाव
ARDE के अनुसार, पिनाका के लॉन्चर प्लेटफॉर्म में बदलाव नहीं किया जाएगा। नया बदलाव केवल रॉकेट्स के डिजाइन में होगा ताकि उन्हें लंबी दूरी तक मारक क्षमता दी जा सके और अलग-अलग सेनाओं की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जा सके।
पिनाका का विकास 1980 के दशक में शुरू हुआ और 1999 के कारगिल युद्ध में इसके प्रदर्शन ने इसे भारतीय सेना का भरोसेमंद हथियार बना दिया। पिछले दो दशकों में डीआरडीओ ने लगातार इसकी रेंज और सटीकता को बढ़ाने पर काम किया है। गाइडेड वेरिएंट के बाद अब इसकी क्षमता बैलिस्टिक मिसाइल और क्रूज मिसाइल जैसी कैटेगरी तक पहुंच रही है।
HC judgement paramilitary:पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि पैरामिलिट्री फोर्सेज जैसे सीआरपीएफ, बीएसएफ और सीआईएसएफ से सेवानिवृत्त कर्मियों को एक्स-सर्विसमैन (ESM) की श्रेणी में शामिल करने का फैसला अदालत का नहीं बल्कि राज्य सरकार की नीति का विषय है। अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह से राज्य सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में कोई निर्णय लेती है या नहीं।
हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को दिए गए अपने आदेश में कहा, “यह अदालत यह तय नहीं कर सकती कि पैरामिलिट्री फोर्सेज के सेवानिवृत्त अधिकारियों को एक्स-सर्विसमैन की परिभाषा में शामिल किया जाए या नहीं। यह एक नीतिगत मामला है और राज्य को ही इसका फैसला करना है।”
यह आदेश न्यायमूर्ति जगमोहन बंसल ने उस याचिका को निपटाते हुए पारित किया, जो पंजाब के फाजिल्का निवासी मक्खन सिंह ने दायर की थी। मक्खन सिंह सीआरपीएफ से रिटायर होने के बाद पंजाब पुलिस में कांस्टेबल (ड्राइवर) के पद के लिए आवेदन किया था। लेकिन उन्हें एक्स-सर्विसमैन कोटे के तहत नियुक्ति नहीं मिली। इस पर उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर कर पंजाब सरकार को निर्देश देने की मांग की थी कि उन्हें ईएसएम श्रेणी में माना जाए और पुलिस में नियुक्ति दी जाए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने 11 फरवरी 1981 को दिए गए एक फैसले (अखिलेश प्रसाद बनाम यूनियन टेरिटरी ऑफ मिजोरम) में सीआरपीएफ को सशस्त्र बल घोषित किया था। उस फैसले के तहत सीआरपीएफ को “आर्म्ड फोर्सेज ऑफ द यूनियन” की श्रेणी में रखा गया था। इसलिए, पैरामिलिट्री बलों के कर्मियों को भी एक्स-सर्विसमैन का दर्जा मिलना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस पर कोई सीधा आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मामला नीतिगत है और इसमें हस्तक्षेप करना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। साथ ही, पंजाब सरकार को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता के इस प्रतिनिधित्व पर विचार करे और उचित निर्णय ले।
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार छह माह के भीतर इस विषय पर कोई उपयुक्त आदेश पारित कर सकती है। इस तरह, याचिका का निस्तारण करते हुए अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि पैरामिलिट्री बलों को पूर्व सैनिक का दर्जा देने का सवाल अदालत के नहीं बल्कि सरकार के पाले में है।
इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में यदि सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ जैसे अर्धसैनिक बलों को पूर्व सैनिक की श्रेणी में शामिल करना है तो इसके लिए राज्य सरकार को नीतिगत फैसला लेना होगा। वहीं, पूर्व सैनिक संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि देश की सुरक्षा में समान भूमिका निभाने वाले पैरामिलिट्री बलों को भी सेना की तरह एक्स-सर्विसमैन का दर्जा मिले।
Agni-5 IRBM: भारत ने 20 अगस्त 2025 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल स्टैंडर्ड्स को सफलतापूर्वक पूरा किया। इस मिसाइल को डीआरडीओ ने बनाया है। यह मिसाइल जमीन से जमीन पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी रेंज 5000 किलोमीटर से अधिक है।
यह परीक्षण खास इसलिए है क्योंकि यह पिछले साल मार्च 2024 में मिशन दिव्यास्त्र के तहत मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) टेक्नोलॉजी के साथ अग्नि-5 के पहले सफल परीक्षण के बाद हुआ। इस तकनीक ने भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल कर दिया, जिनके पास एक मिसाइल से कई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता है। लेकिन MIRV तकनीक क्या है? सरकार अब अग्नि-5 को इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) क्यों कह रही है, जबकि पहले इसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) कहा जाता था? आइए, इसे सरल भाषा में समझते हैं।
भारत सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को IRBM की श्रेणी में रखा है। 20 अगस्त को सरकार की तरफ से जारी हुई प्रेस रिलीज में भी अग्नि-5 को IRBM कहा गया है। इस बदलाव के कई रणनीतिक मायने हैं। सबसे बड़ा कारण यह हो सकता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को डिफेंसिव राष्ट्र के रूप में दिखाना चाहता है और ICBM का टैग सीधे परमाणु महाशक्तियों की लीग में रख देता है।
रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि इस परीक्षण ने मिसाइल के सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल मापदंडों को सफलतापूर्वक मान्य किया। यह परीक्षण स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) की निगरानी में हुआ, जो भारत के एटोमिक वेपंस डिलीवरी सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मिसाइल इतनी तेज है कि लॉन्च होने के बाद इसे रोकना लगभग नामुमकिन है। एक बार टारगेट सेट कर देने के बाद यह अपने लक्ष्य को नष्ट किए बिना नहीं रुकती।
Agni-5 IRBM: कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस
अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को 1983 में शुरू हुए इंटीग्रेटेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) के तहत विकसित किया गया है। यह मिसाइल 50 टन वजनी और 17 मीटर लंबी है, जिसकी मोटाई करीब 2 मीटर है। यह 1,500 किलोग्राम तक के हथियार ले जा सकती है और जमीन से जमीन पर मार करने में सक्षम है। इसकी रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से 24 गुना तेज है, यानी यह मैक 24 की रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है। इसकी खासियत यह है कि इसे सड़क पर आसानी से ले जाया जा सकता है, क्योंकि यह कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस है। इसका मतलब है कि मिसाइल को एक विशेष कंटेनर में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है, जिससे इसे तैनात करना और छिपाना आसान हो जाता है।
🚀 BREAKING: India successfully test-fires Agni-5 Intermediate Range Ballistic Missile from Chandipur, Odisha.
✅ Launch validated all operational & technical parameters, confirms MoD.
🎯 Conducted under Strategic Forces Command.#Agni5#MissileTest#IndianDefencepic.twitter.com/VFn9Q3i9Qy
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Agni-5 IRBM: IRBM वर्सेस ICBM
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) का पहला परीक्षण 2012 में हुआ था, और तब से इसकी कई बार टेस्टिंग हो चुकी है। पहले इसे ICBM कहा जाता था, क्योंकि इसकी रेंज 5,000 किमी से अधिक थी, इसकी जद में चीन के ज्यादातर शहर खासतौर पर उत्तरी और पूर्वी हिस्से आते हैं। लेकिन अब सरकार इसे IRBM के रूप में पेश कर रही है। IRBM यानी इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 3,000 से 5,500 किलोमीटर तक होती है, जबकि ICBM यानी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 5,500 किलोमीटर से अधिक होती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वजन कम करने के बाद अग्नि-5 की वास्तविक रेंज 7,000 किमी तक हो सकती है। 2022 में DRDO ने मिसाइल का वजन 20 फीसदी तक कम करने का दावा किया था, जिससे इसकी रेंज बढ़कर 7,000 किमी से अधिक हो सकती है। फिर भी, सरकार इसे आधिकारिक तौर पर IRBM ही कह रही है।
Agni-5 IRBM: अग्नि-5 में MIRV टेक्नोलॉजी
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) में MIRV टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गयाा है। MIRV का मतलब है मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल। यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसमें एक मिसाइल कई परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक हथियार को अलग-अलग लक्ष्य पर निशाना साधने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। ये लक्ष्य सैकड़ों किलोमीटर दूर हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक अग्नि-5 मिसाइल तीन से चार परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक को अलग-अलग रफ्तार और दिशा में छोड़ा जा सकता है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिसाइल 10-12 हथियार भी ले जा सकती है। इस तकनीक की खासियत यह है कि यह दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम्स को भी चकमा दे सकती है। MIRV-लैस मिसाइलें डिकॉय यानी नकली हथियार भी ले जा सकती हैं, जो दुश्मन के रडार को भ्रमित करते हैं, जिससे असली हथियार को रोका जाना मुश्किल हो जाता है।
Agni-5 IRBM: क्यों जरूरी है MIRV क्षमता
MIRV तकनीक को विकसित करना आसान नहीं है। इसके लिए हथियारों का छोटा साइज (मिनिएचराइजेशन), हल्के वजन के री-एंट्री व्हीकल, और सटीक नेविगेशन सिस्टम की जरूरत होती है। अग्नि-5 में स्वदेशी एवियोनिक्स सिस्टम और ज्यादा सटीकता वाले सेंसर पैकेज लगाए गए हैं, ताकि हथियार अपने टारगेट पर हिट करे। इस तकनीक का पहला सफल परीक्षण 11 मार्च 2024 को मिशन दिव्यास्त्र के तहत हुआ, जिसे DRDO ने ओडिशा के डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्च किया था। इस परीक्षण की निगरानी विभिन्न टेलीमेट्री और रडार स्टेशनों ने की, और मिसाइल ने सभी निर्धारित मापदंडों को पूरा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO के वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि की सराहना की।
यह तकनीक भारत की रक्षा रणनीति में क्यों महत्वपूर्ण है? भारत की परमाणु नीति ‘नो-फर्स्ट-यूज’ (पहले हमला न करना) और क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस पर आधारित है। इसका मतलब है कि भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर कोई देश भारत पर परमाणु हमला करता है, तो भारत इसका करारा जवाब देगा। MIRV तकनीक इस जवाबी क्षमता को बढ़ाती है, क्योंकि एक मिसाइल कई लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। चीन के पास पहले से ही हांगकी (HQ-19) जैसा मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, MIRV तकनीक भारत को सामरिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। चीन ने अपनी कुछ DF-5 मिसाइलों में MIRV तकनीक लगाई है।
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) को खासतौर पर चीन से मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। भारत की दूसरी मिसाइलें, जैसे अग्नि-1, अग्नि-2, और अग्नि-3, मुख्य रूप से पाकिस्तान से मिल रहे खतरे को देखते हुए बनाई गई थीं। लेकिन अग्नि-5 की रेंज इसे पूरे एशिया, विशेष रूप से चीन के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों, और यूरोप के कुछ हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। मिसाइल के पहले चरण को अग्नि-3 से लिया गया है, जबकि दूसरे और तीसरे चरण को हल्का करने के लिए कंपोजिट सामग्री का उपयोग किया गया है। MIRV से यह मुश्किल हो जाता है क्योंकि दुश्मन को पता नहीं चलता कि असली वारहेड कौन सा है और किस दिशा में जाएगा। कई डमी वॉरहेड्स के साथ असली वारहेड्स को भी छोड़ा जाता है। इससे दुश्मन का सुरक्षा कवच टूट सकता है।
जारी किया था नोटम
20 अगस्त 2025 के परीक्षण के लिए पहले ही बंगाल की खाड़ी में नोटम (नोटिस टू एयरमैन) भी जारी किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत विमानन और समुद्री यातायात को सूचित करता है। इस परीक्षण की निगरानी भारतीय नौसेना के जहाजों और DRDO के वैज्ञानिकों ने की, जो दक्षिणी हिंद महासागर में कई जगहों पर तैनात थे।
पांच देशों के पास है MIRV तकनीक
MIRV तकनीक की शुरुआत 1960 के दशक में अमेरिका ने की थी, जब उसने 1970 में मिनटमैन-III मिसाइल और 1971 में पॉसाइडन मिसाइल में इस तकनीक का उपयोग किया। आज अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, और यूके के पास यह तकनीक है। पाकिस्तान ने भी 2017 में अपनी अबाबील मिसाइल में MIRV तकनीक का परीक्षण किया था, हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।
अग्नि-5 के नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम में रिंग लेजर जायरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर का उपयोग किया गया है। मिसाइल का निर्माण कार्बन कंपोजिट सामग्री से किया गया है, जो इसे हल्का बनाता है और वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान उच्च तापमान को सहन करने में सक्षम बनाता है। सूत्र बताते हैं कि अग्नि-5 में एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता से भी लैस है। 2019 में मिशन शक्ति के तहत भारत ने 300 किमी की ऊंचाई पर एक उपग्रह को नष्ट करके अपनी ASAT क्षमता दिखाई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नि-5 को 800 किमी की ऊंचाई तक पहुंचने में सक्षम बनाया जा सकता है, जिससे यह उपग्रहों को नष्ट करने में भी उपयोगी हो सकता है।
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) भारत की परमाणु त्रिकोणीय क्षमता का भी हिस्सा है, जिसमें जमीन, हवा, और समुद्र से परमाणु हथियार दागने की क्षमता शामिल है। भारत ने 2018 में INS अरिहंत पनडुब्बी के पहले डिटरेंस गश्त के साथ इस ट्राइंगल को पूरा किया था। यह मिसाइल भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को भी मजबूत करती है, यानी अगर भारत पर परमाणु हमला होता है, तो जवाबी हमला और भी ज्यादा असरदार हो सकता है।
Member of the Political Bureau of the CPC Central Committee Wang Yi and India’s National Security Adviser Ajit Doval held the 24th Round of Talks Between the Special Representatives of China and India on the Boundary Question in New Delhi. (Photo- MEA)
General Level Mechanism: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत का सिलसिला पिछले कई सालों से जारी है। 19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों चीन के विदेश मंत्री वांग यी और भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के बीच 24वीं वार्ता हुई। इस दौरान दोनों देशों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, व्यापार बढ़ाने और आपसी विश्वास को मजबूत करने के लिए कई अहम फैसले लिए गए। लेकिन इस बार 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के बाद जो सहमति सामने आई है, वह पहले से अलग और महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस बैठक में पहली बार भारत और चीन ने पूर्वी और मध्य सेक्टर में भी “जनरल लेवल मैकेनिज्म” (General Level Mechanism) बनाने का फैसला लिया है। लेकिन यह मैकेनिज्म क्या है? यह पहले से मौजूद SHMC और WMCC से कैसे अलग है? आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।
दरअसल यह मैकेनिज्म (General Level Mechanism) सैन्य स्तर पर होने वाली कोर कमांडर स्तर की बैठकें हैं। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद जब एलएसी (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई थी, तब पहली बार कोर कमांडर स्तर पर बैठकों का सिलसिला शुरू किया गया। इसका मकसद यह था कि दोनों देशों की सेनाओं के सीनियर अफसर सीधे बातचीत कर सकें और किसी भी विवाद या गतिरोध को बातचीत से सुलझाने का रास्ता निकाल सकें। 2020 में गलवान के बाद दोनों देशों ने फैसला किया कि छोटे स्तर के अधिकारियों की बजाय कोर कमांडर स्तर पर बातचीत होगी ताकि बड़े विवादों को जल्दी सुलझाया जा सके। भारतीय सेना की 14वीं कोर, जो पूर्वी लद्दाख की जिम्मेदारी देखती है, इस मैकेनिज्म का हिस्सा रही है।
Pakistan Terror Funding: पाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद डिजिटल वॉलेट्स ईजीपैसा और सादापे के जरिए जुटा रहा 391 करोड़ रुपये। ऑपरेशन सिंदूर के बाद 313 नए मरकज बनाने की साजिश। जानें कैसे FATF की नजरों से बच रहा है यह आतंकी नेटवर्क।https://t.co/wxnkfArwO6#PakistanTerrorNetwork…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 20, 2025
अब यह व्यवस्था सिर्फ पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के इलाकों में भी लागू होगी। इसका मतलब यह है कि भविष्य में अगर किसी भी तरह की टकराव की स्थिति पूर्वी या मध्य सेक्टर में पैदा होती है, तो उसे भी कोर कमांडर स्तर पर सुलझाने की कोशिश होगी।
कहां-कहां है तनाव और क्या है मौजूदा स्थिति
भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर विवाद तीन प्रमुख इलाकों पश्चिमी, मध्य, और पूर्वी में फैला है। इन इलाकों में दोनों देशों की अलग-अलग दावेदारी और एलएसी की अस्पष्ट के चलते बार-बार तनाव पैदा होता है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का आधार एलएसी है, जो दोनों देशों के बीच एक अस्थायी सीमा रेखा है। इस रेखा की कोई औपचारिक परिभाषा नहीं है, और दोनों देश इसे अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। इसी के चलते दोनों देशों के सैनिकों की गश्त के दौरान टकराव आम है। एलएसी को तीन क्षेत्रों में बांटा गया है, पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख और अक्साई चिन), मध्य क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड), और पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश)।
पश्चिमी क्षेत्र, यानी लद्दाख और अक्साई चिन, इस विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। भारत का दावा है कि 1865 में बनाई गई जॉनसन लाइन के अनुसार अक्साई चिन लद्दाख का हिस्सा है। यह इलाका करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर का है और भारत इसे अपना मानता है। दूसरी ओर, चीन 1899 की मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड लाइन को मानता है, जिसके अनुसार अक्साई चिन उसके शिनजियांग प्रांत का हिस्सा है। हकीकत यह है कि 1950 के दशक से अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण है। उसने यहां G219 राजमार्ग बनाया, जो उसके शिनजियांग और तिब्बत क्षेत्र को जोड़ता है।
मध्य क्षेत्र, यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सीमा विवाद अपेक्षाकृत कम है। यह एलएसी का सबसे छोटा हिस्सा है, जहां बाराहोती और नेलांग घाटी को लेकर विवाद है। इन इलाकों पर भारत का नियंत्रण है, लेकिन दोनों देशों की सेनाएं समय-समय पर गश्त करती हैं। इस क्षेत्र में तनाव लद्दाख या अरुणाचल की तुलना में कम हैं। फिर भी, छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने के लिए स्थानीय स्तर पर बातचीत होती रहती है।
पूर्वी क्षेत्र, यानी अरुणाचल प्रदेश की बात करें, तो यहां लद्दाख के बाद सबसे ज्यादा तनाव है। भारत 1914 की शिमला संधि में बनी मैकमोहन लाइन को मान्यता देता है, जिसके अनुसार अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। यह क्षेत्र करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है और भारत इसे अपना पूर्ण राज्य मानता है। लेकिन चीन इस रेखा को “साम्राज्यवादी” बताकर खारिज करता है और अरुणाचल को “दक्षिण तिब्बत” के रूप में दावा करता है। यहां दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती हैं, और कई बार टकराव की स्थिति बनती है। अरुणाचल में भारत ने सैन्य और बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है, जबकि चीन ने भी अपनी तरफ सैन्य ठिकानों और सड़कों का जाल बिछाया है।
External Affairs Minister S Jaishankar emphasized that maintaining peace and tranquility along the India-China border is fundamental to improving bilateral relations (Photo: MEA)
क्या है SHMC?
भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए पहले से दो सिस्टम काम कर रहे हैं। पहला है SHMC यानी सीनियर हाईएस्ट मिलिट्री कमांडर लेवल मीटिंग, जिसे साधारण भाषा में कोर कमांडर स्तर की बैठक कहा जाता है। यह व्यवस्था 2020 में गलवान झड़प के बाद शुरू हुई थी। 2020 से पहले एलएसी पर विवाद सुलझाने के लिए कर्नल या ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी बातचीत करते थे। लेकिन गलवान के बाद यह साफ हो गया कि बड़े विवादों को सुलझाने के लिए उच्च स्तर की बातचीत जरूरी है। इसलिए SHMC बनाया गया, जिसमें कोर कमांडर शामिल होते हैं। नया जनरल लेवल मैकेनिज्म SHMC का ही विस्तार है, लेकिन अब इसे पूरे LAC पर लागू किया जाएगा, न कि सिर्फ पूर्वी लद्दाख में।
WMCC के बारे में जानें?
वहीं, WMCC यानी मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स। यह एक डिप्लोमैटिक-मिलिट्री स्ट्रक्चर है, जिसमें दोनों देशों के विदेश मंत्रालय और सेना के अधिकारी शामिल होते हैं। WMCC की शुरुआत 2012 में हुई थी और इसका मकसद सीमा प्रबंधन के लिए नियमित संवाद बनाए रखना है। 1960 में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश हुईं, लेकिन बातचीत नाकाम रही। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनाया गया। 1993 और 1996 में एलएसी पर शांति बनाए रखने के लिए समझौते हुए। 2003 में स्पेशल रिप्रजेंटेटिव सिस्टम शुरू हुआ, और 2005 में सीमा विवाद के हल के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों पर दस्तखत हुए। 2012 में WMCC बनाया गया, जो डिप्लोमैटिक लेवल पर बॉर्ड मैनेजमेंट का काम करता है। WMCC में सीमा से जुड़े बड़े नीतिगत फैसले लिए जाते हैं, जैसे कि तनाव कम करने की रणनीति बनाना या सीमा पर व्यापार और सहयोग बढ़ाने के तरीके तलाशना।
24वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता में WMCC के तहत दो नए समूह बनाने का फैसला हुआ। पहला है एक्सपर्ट ग्रुप, जो सीमा पर परिसीमन यानी बॉर्डर डिलिमिटेशन की संभावनाओं पर काम करेगा। दूसरा है वर्किंग ग्रुप, जो बॉर्डर मैनेजमेंट को और प्रभावी बनाने के लिए रणनीतियां तैयार करेगा। ये दोनों समूह WMCC के तहत काम करेंगे और डिप्लोमैटिक लेवल पर सीमा विवाद को सुलझाने में मदद करेंगे।
क्या SHMC का विस्तार है General Level Mechanism
हालांकि यह बात सही कि इतने मैकेनिज्म होने के बावजूद अभी तक एलएसी का कोई अंतिम परिसीमन या सीमा निर्धारण नहीं हुआ है। लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि भारत और चीन के बीच यह नया जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism) एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। सही मायने में कहा जाए तो जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism) दरअसल SHMC का ही विस्तार है, जो मिलिट्री लेवल पर काम करता है, और अब इसे पूर्वी और मध्य सेक्टर तक विस्तारित किया जा रहा है।यह न सिर्फ सैन्य अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत को बढ़ाएगा, बल्कि इससे तनावपूर्ण स्थितियों का समाधान तेजी से निकाला जा सकेगा। जबकि WMCC डिप्लोमैटिक लेवल स्तर पर सीमा विवाद को सुलझाने का काम करता है। दोनों सिस्टम एक-दूसरे के पूरक हैं और मिलकर सीमा पर तनाव कम करने में मदद करेंगे।
बता दें कि सिक्किम में भारतीय सेना की जिम्मेदारी 33 कोर के पास है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में 3 कोर और 4 कोर तैनात हैं। इन दोनों सेक्टरों में जनरल-लेवल मैकेनिज्म का उद्देश्य यह है कि अगर सीमा पर कोई विवाद पैदा होता है और वह जूनियर अफसरों की बातचीत से हल नहीं हो पाता, तो उसे कोर कमांडर स्तर की बातचीत में सुलझाने की कोशिश की जाए। पूर्वी लद्दाख के अनुभवों से यह साफ हुआ है कि सीनियर मिलिट्री कमांडर स्तर की वार्ताओं ने ही गतिरोध कम करने का रास्ता बनाया। यही वजह है कि भारत और चीन दोनों के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स ने जनरल लेवल मैकेनिज्म को लेकर सहमति जताई।
वार्ता में बनी और भी सहमतियां
19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की इस बैठक में दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन और सीमा विवाद को लेकर कुल दस बिंदुओं पर सहमति जताई। जिसमें तीन पारंपरिक व्यापारिक बाजारों को फिर से खोलने का फैसला हुआ। ये बाजार हैं रेनक्विंगगांग-चांगगु, पुलान-गुंजी और जिउबा-नामग्या। ये ट्रेडिंग पॉइंट्स एलएसी के पास हैं और इनके खुलने से दोनों देशों के बीच व्यापार और आपसी संपर्क बढ़ेगा। साथ ही, दोनों देशों ने सीधी उड़ान सेवाएं शुरू करने और पर्यटकों, कारोबारियों और मीडिया के लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने पर सहमति जताई। वहीं, खास बात यह रही कि विशेष प्रतिनिधि वार्ता में दोनों देशों ने 2026 में चीन में 25वें दौर की वार्ता आयोजित करने पर भी सहमति जताई।
सीमा पार नदियों पर सहयोग भी एक अहम मुद्दा रहा। भारत ने यार्लंग त्सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे विशाल बांध को लेकर चिंता जताई। इस बांध का असर भारत के निचले तटवर्ती राज्यों पर पड़ सकता है। चीन ने आपात स्थिति में हाइड्रोलॉजिकल डाटा साझा करने का वादा किया, जो मानवीय आधार पर लिया गया फैसला है। दोनों देशों ने इस मुद्दे पर पहले से मौजूद एक्सपर्ट लेवल सिस्टम को और मजबूत करने का फैसला किया।
वहीं, आतंकवाद का मुद्दा भी इस बैठक में उठा। भारत ने सीमा पार आतंकवाद सहित हर तरह के आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का एक मूल उद्देश्य आतंकवाद से लड़ना है। भारत ने चीन से इस दिशा में और सहयोग की उम्मीद जताई।
Pakistan Terror Funding: पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने एक बार फिर दुनिया की आंखों में धूल झोंकने की तैयारी कर रहा है। इस बार उसने वैश्विक निगरानी से बचने के लिए डिजिटल हवाला का सहारा लिया है। भारतीय खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, जैश ने आतंकियों के लिए डिजिटल वॉलेट्स ईजी पैसा (Easy Paisa) और सादापे (Sadapay) के जरिए 391 करोड़ रुपये (3.91 अरब पाकिस्तानी रुपये) जुटाने का अभियान शुरू किया है। यह अभियान भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद शुरू हुआ, जिसमें जैश के मुख्यालय मारकज सुभानअल्लाह सहित आतंकियों के चार अन्य ट्रेनिंग कैंप नष्ट किए थे। इनमें मरकज बिलाल, मरकज अब्बास, महमोना जया और सरगल ट्रेनिंग कैंप शामिल थे।
खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, 2019 में, पाकिस्तान ने FATF की ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने के लिए दावा किया था कि उसने जैश-ए-मोहम्मद (Pakistan Terror Funding) की गतिविधियों पर रोक लगाई है। उसने जैश के मारकज को सरकारी नियंत्रण में लेने, संगठन के प्रमुख मसूद अजहर, उनके भाई रऊफ असगर और सबसे छोटे भाई तल्हा अल सैफ के बैंक खातों की निगरानी करने का वादा किया था। साथ ही, नकद लेनदेन, जानवरों की खाल से होने वाली आय और अन्य फंड जुटाने के तरीकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जिसके बाद 2022 में FATF ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से हटा दिया। लेकिन अब पाकिस्तान ने इन प्रतिबंधों को चकमा देने के लिए एक नया तरीका अपनाया है।
Pakistan Terror Funding: ईजीपैसा और सादापे का इस्तेमाल
खुफिया सूत्रों ने बताया कि जैश ने अब पारंपरिक बैंक खातों के बजाय डिजिटल वॉलेट्स (Pakistan Terror Funding) जैसे ईजीपैसा और सादापे का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ये डिजिटल वॉलेट्स मसूद अजहर के परिवार के सदस्यों के नाम पर ऑपरेट किए जा रहे हैं। इस तरह, पाकिस्तान ने केवल बैंक खातों का विवरण दिखाकर FATF को यह झूठा दावा किया कि जैश का फंडिंग नेटवर्क खत्म हो गया है। भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार, जैश ने इस डिजिटल हवाला नेटवर्क के जरिए हर साल 80-90 करोड़ रुपये (PKR 800-900 मिलियन) जुटाए हैं, जिनमें से 80 फीसदी फंड डिजिटल वॉलेट्स के माध्यम से आता है।
🧵 Thread: Pakistan’s Digital Hawala – How JeM Raised PKR 3.91 Billion
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🚨 Despite global scrutiny, Jaish-e-Mohammed (JeM) has shifted to digital terror financing.
A massive PKR 3.91-billion fundraising network now runs through Pakistani e-wallets like EasyPaisa & SadaPay. 💸… pic.twitter.com/J1YREUybs7
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 20, 2025
7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसमें जैश के मुख्यालय मारकज सुभानअल्लाह को भी निशाना बनाया गया। इसके साथ ही चार अन्य प्रशिक्षण शिविर – मारकज बिलाल, मारकज अब्बास, महमूना जोया और सरगल प्रशिक्षण शिविरों पर मिसाइलें गिराई गईं। इस हमले में 14 आतंकवादी मारे गए, जिनमें मसूद अजहर का साला जमीक अहमद, उसका भतीजा हमजा जमीक और रऊफ असगर का बेटा हुजैफा असगर शामिल थे। हुजैफा खैबर पख्तूनख्वा में जैश की भर्ती का प्रमुख था। इस हमले ने जैश के आतंकी ढांचे को तगड़ा झटका मिला।
इन हमलों के बाद पाकिस्तान सरकार ने इन ढांचों के पुनर्निर्माण की घोषणा की, लेकिन साथ ही जैश ने 313 नए मरकज बनाने का ऑनलाइन अभियान शुरू कर दिया। इसके तहत 3.91 अरब पाकिस्तानी रुपये (करीब 391 करोड़ रुपये भारतीय मूल्य) का एक ऑनलाइन अभियान (Pakistan Terror Funding) शुरू किया। इस अभियान को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक और व्हाट्सएप चैनलों के जरिए बढ़ावा दिया जा रहा है। जैश के कमांडरों और प्रॉक्सी खातों ने मसूद अजहर के नाम से पोस्टर, वीडियो और पत्र साझा किए हैं, जिसमें समर्थकों से प्रत्येक मरकज के लिए 1.25 करोड़ रुपये दान करने की अपील की गई है। पाकिस्तान और विदेशों में समर्थकों से कुल 391 करोड़ रुपये की मांग की गई है। जांच में एक रसीद की कॉपी भी मिली है, जो इस मेगा-फंडरेजिंग अभियान का हिस्सा है।
जांच से पता चला कि यह राशि कई डिजिटल वॉलेट्स (Pakistan Terror Funding) के जरिए जुटाई जा रही है। एक सादापे खाता मसूद अजहर के भाई तल्हा अल सैफ (तल्हा गुलजार) के नाम पर है, जो पाकिस्तानी मोबाइल नंबर +92 3025xxxx56 से जुड़ा है। यह नंबर जैश के हरिपुर जिला कमांडर आफताब अहमद के नाम पर रजिस्टर्ड है, जिसका सीएनआईसी नंबर 133020376995 खाला बट्ट टाउनशिप, हरिपुर में जैश के शिविर के पते पर है। एक अन्य फंडरेजिंग चैनल ईजीपैसा वॉलेट के जरिए ऑपरेट हो रहा है, जो मसूद अजहर के बेटे अब्दुल्ला अजहर (अब्दुल्ला खान) द्वारा चलाया जा रहा है और मोबाइल नंबर +92 33xxxx4937 से जुड़ा है।
Talha Saif Donation Appeal 15 August 2025: सुनें ये ऑडियो
खैबर पख्तूनख्वा में, जैश के कमांडर सैयद सफदर शाह भी एक ईजीपैसा वॉलेट के जरिए मरकज के लिए दान (Pakistan Terror Funding) जुटा रहे हैं, जो मोबाइल नंबर +92 344147xxxx और सीएनआईसी 4250142079691 से जुड़ा है। यह रजिस्ट्रेशन मेलवारा पोस्ट ऑफिस, ओघी, मस्नेहरा जिले के पास है। इन तीन खातों के अलावा, 250 से अधिक ईजीपैसा वॉलेट्स का इस्तेमाल जैश के 391 करोड़ रुपये के फंडरेजिंग अभियान के लिए किया जा रहा है। इसके साथ ही, जैश ने अपने प्रचार चैनल एमएसटीडी ऑफिशियल के जरिए तल्हा अल सैफ का एक ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी किया है, जिसमें उन्होंने समर्थकों से प्रति व्यक्ति 21,000 रुपये दान करने की अपील की। यह भाषण 15 अगस्त को मरकज उस्मान-ओ-अली में एक सभा में दिया गया था।
जैश के मरकज को इस्लाम में पवित्र धार्मिक कार्य माना जाता है, लेकिन जैश इनका इस्तेमाल आतंकियों को ट्रेनिंग देने और उनके रहने-ठहरने के लिए करता है। ऑपरेशन सिंदूर में नष्ट किया गया मरकज सुभानअल्लाह न केवल जैश का मुख्यालय था, बल्कि हथियारों की ट्रेनिंग का भी सेंटर था। इस हमले में मारे गए आतंकवादियों में मसूद अजहर के रिश्तेदार भी शामिल थे। मरकज सुभानअल्लाह से सिर्फ 6 किलोमीटर दूर मरकज उस्मान-ओ-अली है, जहां मसूद अजहर का परिवार हमले के बाद से रह रहा है। 10 मई को बहावलपुर के एक सांसद ने घायल परिवार के सदस्यों से मुलाकात की, और 21 मई को लश्कर-ए-तैय्यबा के कार्यकर्ताओं ने भी इस मरकज का दौरा किया था।
इसी तरह, मुजफ्फराबाद में मरकज बिलाल और कोटली में मरकज अब्बास भी आतंकियों के ट्रेनिंग सेंटर रहे हैं। इन पर भारतीय हमलों में आतंकवादी हसन और वकास मारे गए। जैश का सीनियर कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी, जो भारत में वांछित है, वर्तमान में खैबर पख्तूनख्वा के दार समंद में मरकज तमीम दारी में रह रहा है। कराची में, जैश का मरकज इफ्ता 1.5 एकड़ में फैला है, जहां मौलवी छोटे बच्चों का ब्रेनवॉश करते हैं। यह जैश का प्रकाशन और प्रचार केंद्र भी है, जो मसूद अजहर और उनके भाइयों के दैनिक पत्र और भाषण प्रॉक्सी सोशल मीडिया खातों के जरिए जारी करता है। जैश का आधिकारिक सोशल मीडिया पेज एक महिला रोजिना (सीएनआईसी 4220176122374) के नाम पर रजिस्टर्ड नंबर +92 316xxxxx66 से जुड़ा है, जिसका पता मरकज इफ्ता के पास है।
भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार, जैश वर्तमान में 2,000 से अधिक डिजिटल वॉलेट्स (Pakistan Terror Funding) ऑपरेट कर रहा है, जो न केवल मरकज के लिए दान जुटा रहे हैं, बल्कि गाजा की मदद के बहाने फंड भी इकट्ठा कर रहे हैं। एक ऐसा गाजा से जुड़ा वॉलेट खालिद अहमद के नाम पर रजिस्टर्ड है, लेकिन इसे मसूद अजहर का बेटा हम्माद अजहर ऑपरेट करता है, जो नंबर +92xxxx195206 से जुड़ा है। जानकारों का कहना है कि ईजीपैसा और सादापे बैंकिंग नेटवर्क से बाहर काम करते हैं और एजेंटों के माध्यम से वॉलेट-टू-वॉलेट और वॉलेट-टू-कैश ट्रांसफर की अनुमति देते हैं, जिससे FATF की निगरानी लगभग असंभव हो जाती है।
जांच में यह भी पता चला कि मसूद अजहर का परिवार एक समय में 7-8 मोबाइल वॉलेट्स का इस्तेमाल करता है और हर 3-4 महीने में इन्हें बदल देता है। बड़े फंड कोर वॉलेट्स में जमा होते हैं, फिर छोटी राशियों में 10-15 वॉलेट्स (Pakistan Terror Funding) में बांट दिए जाते हैं, जिससे नकद निकासी या ऑनलाइन ट्रांसफर आसान हो जाता है। जैश हर महीने कम से कम 30 नए वॉलेट्स एक्टिव करता है ताकि सोर्स का पता न लगाया जा सके। इन फंड्स का इस्तेमाल हथियारों की खरीद, कैंपों को चलाने, प्रचार, मसूद अजहर के परिवार के लिए लक्जरी वाहन और सामान खरीदने में किया जाता है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।
शुक्रवार की चंदा वसूली
ऑनलाइन दान के अलावा, जैश के कमांडर हर शुक्रवार को मस्जिदों में नकद दान भी जुटाते हैं, जो प्रतिबंध के बावजूद जारी है। खैबर पख्तूनख्वा से प्राप्त एक वीडियो में जैश के कमांडर वसीम चौहान उर्फ वसीम खान उर्फ अकबर को शुक्रवार की नमाज के बाद नकद गिनते हुए देखा गया। यह दान कथित तौर पर गाजा के लिए था, लेकिन इसे जैश की गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
जैश का अल रहमत ट्रस्ट भी सक्रिय है, जो संगठन के फंड का 6-7 फीसदी (लगभग 10 करोड़ रुपये सालाना) योगदान देता है। जांच में पता चला कि अल रहमत ट्रस्ट के लिए दान बहावलपुर में नेशनल बैंक के खाते (खाता नंबर 105XX9) में घुलाम मुर्तजा के नाम पर जमा किए जा रहे हैं। इस ट्रस्ट को मसूद अजहर, तल्हा अल सैफ और अन्य लोग ऑपरेट करते हैं, जिनमें बहावलपुर के मोहम्मद इस्माइल (सीएनआईसी 312014281511), लाहौर के मोहम्मद फारूक (सीएनआईसी 3620165338575), चित्राल के फजल-उर-रहमान (सीएनआईसी 1520197787885) और कराची के रेहान अब्दुल रज्जाक (सीएनआईसी 4210119138007) शामिल हैं। पोस्टरों में कहा गया है कि यह दान जिहाद के लिए है।
जैश हर साल डिजिटल वॉलेट्स, बैंक ट्रांसफर और नकद के जरिए 100 करोड़ रुपये से अधिक जुटाता है, जिसमें से 50 फीसदी हथियारों की खरीद पर खर्च होता है। जैश का दावा है कि प्रत्येक मरकज की लागत 1.25 करोड़ रुपये है, लेकिन अनुमान के अनुसार, मरकज बिलाल जैसे छोटे केंद्र की लागत केवल 40-50 लाख रुपये है। बड़े मरकज, जैसे सुभानअल्लाह या उस्मान-ओ-अली, की लागत लगभग 10 करोड़ रुपये हो सकती है। अगर 3 बड़े मरकज और 310 छोटे मरकज बनाए जाते हैं, तो कुल लागत लगभग 123 करोड़ रुपये होगी, जिससे हथियार खरीद के लिए एक बड़ी रकम बचेगी।
जैश के हमास और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के साथ संबंध और नेतृत्व की बैठकों को देखते हुए, विशेषज्ञों का मानना है कि इस बची हुई रकम का इस्तेमाल एडवांस हथियारों, जैसे हमास द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हमले ड्रोन या TTP द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले क्वाडकॉप्टर की खरीद के लिए किया जा सकता है। यह भी ज्ञात है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई जैश को ब्लैक मार्केट से सस्ते हथियार उपलब्ध कराने में मदद करती है। वर्तमान में, जैश के पास मशीन गन, रॉकेट लांचर और मोर्टार जैसे हथियार हैं। इस 391 करोड़ रुपये के अभियान से उसके पास हथियार को बड़ा जखीरा तैयार हो सकता है।
जैश के 313 मरकज बनाने के पीछे दो मुख्य मकसद हैं। पहला, लश्कर-ए-तैय्यबा के विशाल मरकज नेटवर्क की नकल करना, ताकि ट्रेनिंग सेंटरों को अलग-अलग किया जाए और भविष्य में ऑपरेशन सिंदूर जैसे भारतीय हमलों का असर कम हो। दूसरा, मसूद अजहर और उनके परिवार के लिए सुरक्षित और आलीशान ठिकाने बनाना, ताकि उनकी मौजूदगी से इनकार किया जा सके। इस योजना के तहत, 3-4 बड़े मरकज सुरक्षित ठिकानों के रूप में काम करेंगे, मध्यम आकार के केंद्र प्रशिक्षण शिविर होंगे, और बाकी रसद का काम संभालेंगे। यह नेटवर्क जैश को पूरे पाकिस्तान में संचालन करने की अनुमति देगा, जबकि पाकिस्तान सरकार मसूद अजहर की मौजूदगी से इनकार करती रहेगी।
भारतीय खुफिया एजेंसियां इस डिजिटल नेटवर्क पर नजर रख रही हैं। रक्षा विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त कर्नल अनिमेष सिंह का कहना है कि अगर यह नेटवर्क बन गया, तो जैश की गतिविधियां और आसान हो जाएंगी, जबकि भारत के लिए चुनौतियां बढ़ जाएंगी।
Lt Gen Vipul Singhal in middle. (Photo: Raksha Samachar)
Ran Samwad-2025: भारतीय सेना 26-27 अगस्त 2025 को मध्य प्रदेश के महू में ट्रार्ई सर्विसेज की एक सेमिनार ‘रण संवाद’ (Ran Samwad-2025) आयोजित करने जा रही है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद बड़े स्तर पर आयोजित हो रही यह पहली सेमिनार है। जिसमें वॉर, वॉरफेयर और वॉरफाइटिंग पर चर्चा होगी। इस सेमिनार में इस पर भी चर्चा की जाएगी कि कैसे टेक्नोलॉजी, युद्ध की प्रकृति और स्वरूप में बदलाव ला रही है। इस सेमिनार में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों के साथ-साथ 15-18 देशों के डिफेंस अताशे, एकेडमिक्स, पॉलिसी मेकर और वॉर एक्सपर्ट्स हिस्सा लेंगे। यह सेमिनार अब सालाना आयोजित होगी और तीनों सेनाएं बारी-बारी से इसकी मेजबानी करेंगी।
इस सेमिनार के बारे में जानकारी देते हुए डिप्टी चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड स्टाफ (डॉक्टराइन, आर्गनाइजेशन और ट्रेनिंग) लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंहल ने बताया कि मध्य प्रदेश के महू में स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में भारतीय सेना 26-27 अगस्त 2025 को एक ऐतिहासिक सेमिनार आयोजित करने जा रही है, जो युद्ध की बदलती दुनिया और तकनीक के असर पर केंद्रित होगी। उन्होंने कहा कि आज के समय में तकनीक को नजरअंदाज करना, ऐसा है कि जैसे पुराने नक्शों के साथ भविष्य के युद्ध लड़ना।
उन्होंने बताया कि टेक्नोलॉजी, युद्ध की प्रकृति और स्वरूप में बदलाव ला रही है। इसका सीधा असर युद्ध के संचालन योजना, रणनीति और तौर-तरीकों पर पड़ रहा है। इस परिवर्तन पर चर्चा करने के लिए, पहली बार तीनों सेनाओं का संयुक्त सेमिनार ‘रण संवाद – कन्वर्सेशन ऑन वार, वॉरफेयर और वॉरफाइटिंग’ 26-27 अगस्त को आर्मी वॉर कॉलेज, महू में आयोजित किया जा रहा है। इस सेमिनार में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों के साथ-साथ 15 से 18 देशों के डिफेंस अताशे भी लेंगे।
🚨 युद्ध अब बंदूक से नहीं, टेक्नोलॉजी से लड़े जाएंगे! थलसेना, वायुसेना और नौसेना ‘Ran Samwad 2025’ में करेंगी खुल कर चर्चा 🔹 कैसे AI, ड्रोन स्वॉर्म, साइबर अटैक और स्पेस वॉरफेयर बदल रहे हैं जंग का चेहरा?🔹 क्या सेना भविष्य के युद्धों के लिए तैयार है? https://t.co/zN2TWLQzEZ…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 28, 2025
लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंहल ने कहा कि तकनीक युद्ध को बदल रही है और इसे रोकना असंभव है। उन्होंने इतिहास के उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे घोड़ों और घुड़सवार सेना ने युद्ध को बदला, फिर टैंकों ने ट्रेंच वॉरफेयर को मोबाइल वॉरफेयर और खाड़ी युद्ध में फाइटर जेट्स के इस्तेमाल ने सभी को सकते में डाल दिया। वैसे ही अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अनमैन्ड सिस्टम युद्ध को नया रूप दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर हम आज इस अवसर को चूक गए, तो हम हमेशा के लिए पीछे रह जाएंगे।
लेफ्टिनेंट जनरल विपुल सिंहल ने कहा कि यह सेमिनार बाकियों से अलग है। उन्होंने बताया कि आमतौर पर सेमिनारों में शिक्षाविद, विद्वान और थिंक टैंक बोलते हैं, जबकि मिलिट्री अफसर दर्शक बनकर बैठते हैं। लेकिन इस सेमिनार में ऐसे सैन्य अधिकारी जो युद्ध में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, यानी वही लोग जिनका मुख्य कार्य लड़ना और देश की रक्षा करना है, वे अपने एक्सपीरियंस साझा करेंगे। उन्होंने बताया कि इस सेमिनार में राजनीति या ज्योपॉलिटिक्स जैसे मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी। बल्कि इसमें टेक्नोलॉजी को कैसे ट्रेनिंग, स्ट्रेटजी और ऑपरेशन में कैसे शामिल किया जाए, इस पर चर्चा होगी। ताकि भारतीय सेना तकनीकी प्रगति का अधिकतम फायदा उठा सके।
लेफ्टिनेंट जनरल सिंहल के मुताबिक, रण संवाद-2025 में रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव, डीआरडीओ सचिव, पूर्व सैनिक, तीनों सेनाओं के अधिकारी, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, रक्षा विशेषज्ञ, शैक्षणिक शोधकर्ता, उद्योग प्रतिनिधि और विदेशी डिफेंस अताशे शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि रण संवाद के फ्यूचर एडिशंस में मित्र देशों के वक्ताओं को भी आमंत्रित किया जाएगा ताकि विचारों और अनुभवों का आदान-प्रदान हो सके। उन्होंने कहा कि भारत को भविष्य के युद्ध की रणनीतिक बहस में अग्रणी भूमिका निभाने की ज़रूरत है। प्राचीन काल में हम विश्वगुरु थे और हमें वह स्थान फिर से हासिल करना होगा।
97 LCA Mark 1A fighter jets: भारत ने मंगलवार को 62,000 करोड़ रुपये की बड़ी रक्षा डील को मंजूरी दी, जिसके तहत भारतीय वायुसेना को 97 स्वदेशी एलसीए (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) मार्क 1ए लड़ाकू विमान मिलेंगे। यह निर्णय एक उच्च-स्तरीय बैठक में लिया गया। रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों ने बताया कि यह सौदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम है।
सरकार पहले ही 83 एलसीए मार्क 1ए विमानों का ऑर्डर 48,000 करोड़ रुपये में दे चुकी है। यह नया सौदा वायुसेना के पुराने मिग-21 विमानों की जगह लेगा, जिन्हें आने वाले हफ्तों में चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है।
Indian Air Force Saves Life with Urgent Airlift ✈️ Responding to an emergency, an IAF C-130J aircraft evacuated a critically injured Thai national from Leh to Delhi this afternoon. Despite adverse weather, the mission was executed with utmost professionalism, delivering timely… pic.twitter.com/AXfmrngmzP
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 19, 2025
एलसीए तेजस कार्यक्रम लंबे समय से भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन की रीढ़ माना जाता रहा है। इससे न केवल वायुसेना की क्षमताएं बढ़ेंगी, बल्कि छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों को भी बड़ा फायदा होगा, जो देशभर में रक्षा क्षेत्र से जुड़े उपकरण और पुर्जे सप्लाई करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार HAL और स्वदेशी रक्षा उद्योग को मजबूत करने पर जोर देते रहे हैं। उन्होंने खुद तेजस ट्रेनर विमान में उड़ान भरकर यह संदेश दिया था कि भारत अब अपने दम पर आधुनिक लड़ाकू विमान बना सकता है। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली उड़ान थी किसी कॉम्बैट एयरक्राफ्ट में।
नए एलसीए मार्क 1ए विमानों में शुरुआती 40 एलसीए की तुलना में ज्यादा एडवांस रडार और एवियोनिक्स (फ्लाइट और कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम) लगाए जाएंगे। इन विमानों में 65 प्रतिशत से ज्यादा उपकरण और पुर्जे भारत में ही बनाए जाएंगे।
यह कार्यक्रम आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का प्रतीक है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सौदा भारत की एयरोस्पेस इंडस्ट्री को और मजबूत करेगा और विदेशी आयात पर निर्भरता कम करेगा।
पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने स्पेन में पहली बार इस योजना की जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था कि भारत अब अपने स्वदेशी विमान कार्यक्रम को और बड़े पैमाने पर आगे ले जाने की तैयारी कर रहा है।
इसके अलावा, HAL को भविष्य में 200 से अधिक एलसीए मार्क 2 और पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के सौदे भी मिलने की संभावना है।
बता दें कि कई दशकों से भारतीय वायुसेना की रीढ़ रहे मिग-21 विमानों को आखिरकार हटाने का फैसला हो चुका है। इन विमानों को ‘फ्लाइंग कॉफिन’ भी कहा जाता रहा है क्योंकि इनमें कई हादसे हुए। नए एलसीए विमान इनकी जगह लेंगे और वायुसेना को आधुनिक और सुरक्षित बेड़ा देंगे।