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AMCA indigenous engine: स्वदेशी फाइटर जेट के लिए इंजन की जंग; रोल्स-रॉयस या साफरान? अब फैसला DRDO के हाथ में

AMCA Indigenous Engine: DRDO to Decide Between Rolls-Royce and Safran for India’s Stealth Fighter Jet Project
Image Source: HAL

AMCA indigenous engine: भारत सरकार ने स्वदेशी फाइटर जेट इंजन विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वह फ्रांस की साफरान (Safran) कंपनी या ब्रिटेन की रोल्स-रॉयस (Rolls-Royce) के साथ मिलकर अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए इंजन तकनीक का सह-विकास करे।

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यह फैसला उस समय आया है जब भारत अपने 5.5वीं पीढ़ी के ट्विन-इंजन स्टील्थ लड़ाकू विमान AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) के विकास में तेजी लाना चाहता है। इस परियोजना में स्वदेशी इंजन विकसित करना एक बड़ी चुनौती रही है, जिसे अब हल करने की कोशिश हो रही है।

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AMCA indigenous engine: इंजन बना ‘बॉटलनेक’ 

भारत के रक्षा क्षेत्र में इंजन तकनीक लंबे समय से एक कमजोर कड़ी रही है। AMCA जैसे उच्च तकनीक वाले विमान में अत्याधुनिक इंजन की आवश्यकता होती है जो सुपरसोनिक गति और स्टील्थ क्षमता के लिए उपयुक्त हो। लेकिन अब तक भारत पूरी तरह से विदेशी इंजन निर्माताओं पर निर्भर रहा है।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, “इंजन एक बाधा बन चुका है। यह एक रणनीतिक फैसला है, जिसे अब लेना जरूरी हो गया है।”

Rolls-Royce और Safran में कड़ा मुकाबला

दोनों कंपनियों रोल्स-रॉयस और साफरान ने DRDO के बेंगलुरु स्थित गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE) के साथ सहयोग करने का प्रस्ताव दिया है। सरकार को जल्द ही DRDO से कैबिनेट नोट प्राप्त होगा, जिसके बाद औपचारिक निर्णय लिया जाएगा।

दोनों कंपनियां तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) साझा करने पर भी सहमत हैं। यानी जो तकनीक विकसित होगी, वह भारत की होगी और उसे दूसरे देशों को बेचा भी जा सकेगा।

क्या है AMCA इंजन की जरूरत?

AMCA के लिए जो नया इंजन विकसित होना है, उसमें 110–130 किलो न्यूटन की थ्रस्ट क्षमता होनी चाहिए। यह विमान की सुपरसोनिक रफ्तार, स्टील्थ क्षमता और हथियार ले जाने की क्षमता के लिए जरूरी है। फिलहाल पहले प्रोटोटाइप और Mk-1 संस्करण में अमेरिका का GE F414 इंजन लगाया जा रहा है। लेकिन भारत का लक्ष्य है कि Mk-2 संस्करण में स्वदेशी इंजन लगाया जाए।

डिलीवरी में देरी से बढ़ी चिंता

Tejas Mk-1A फाइटर जेट के लिए GE द्वारा आपूर्ति किए गए F404 इंजन की डिलीवरी में हुई देरी से सरकार को यह अहसास हुआ कि विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता खतरनाक हो सकती है। अमेरिका की कंपनियां कोविड के बाद से आपूर्ति श्रृंखला में समस्याओं से जूझ रही हैं, जिसका असर भारत की रक्षा परियोजनाओं पर भी पड़ा है।

एक अधिकारी ने कहा, “जैसे हमने मरीन इंजनों के लिए देश में निर्माण शुरू किया है, वैसे ही विमान इंजन के लिए भी आत्मनिर्भरता जरूरी है।”

Kirloskar मॉडल की तरह लोकल सप्लाई चेन बनाने की तैयारी

सरकार का विचार है कि जैसे कि किर्लोस्कर मरीन इंजनों के लिए स्वदेशी क्षमता विकसित कर रहा है, वैसे ही विमान इंजनों के लिए भी एक लोकल सप्लाई चेन तैयार की जाए। इससे भविष्य में किसी विदेशी निर्भरता से बचा जा सकेगा।

Aeronautical Development Agency (ADA) ने इच्छुक कंपनियों से सूचना (Request for Information – RFI) भी जारी कर दी है और प्रारंभिक दौर की बातचीत शुरू हो चुकी है।

Safran और Rolls-Royce के प्रस्तावों में क्या अंतर?

फ्रांसीसी कंपनी साफरान ने राफेल फाइटर जेट के M88 इंजन से जुड़ी तकनीक को आधार बनाकर नया इंजन डिजाइन करने की बात की है। साथ ही राफेल डील के तहत मिले ऑफसेट लाभों का उपयोग करके स्वदेशी ‘कावेरी इंजन प्रोग्राम’ को भी पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव दिया है।

वहीं, ब्रिटिश कंपनी रोल्स-रॉयस ने ट्रांसपोर्ट और नागरिक विमानों में उपयोग के लिए कई हाई थ्रस्ट इंजन प्लेटफॉर्म साझा करने की बात की है। वह भारत के लिए खासतौर पर एक नए सैन्य इंजन प्लेटफॉर्म पर काम करना चाहती है।

भारत की दीर्घकालिक योजना क्या है?

सरकार का उद्देश्य केवल AMCA के लिए इंजन बनाना नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक दृष्टिकोण से स्वदेशी इंजन निर्माण प्रणाली विकसित करना है। यही वजह है कि अब F-35 और Su-57 जैसे विदेशी फाइटर जेट्स की खरीद की भी योजना बनाई जा रही है ताकि तत्काल जरूरतें पूरी की जा सकें। खासकर पाकिस्तान द्वारा J-10C जैसे नए फाइटर विमान खरीदने के बाद भारत को अपनी ताकत और बढ़ानी पड़ी है।

अमेरिकी विकल्प पर संदेह

अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन के प्रस्ताव में कई समस्याएं हैं। उसमें ‘एंड-यूज मॉनिटरिंग’ जैसे सख्त प्रावधान हैं, जो भारत की सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिहाज से उपयुक्त नहीं माने जा रहे। इसके अलावा, भारतीय वायुसेना के पास पहले से ही फ्रांस, रूस और स्वदेशी विमानों का मिश्रण है, जिसमें Su-30MKI, राफेल, मिराज 2000 और तेजस Mk1A शामिल हैं। अमेरिकी विमानों के साथ इनकी इंटरऑपरेबिलिटी (आपसी तालमेल) एक चुनौती बन सकती है।

AWACS और रिफ्यूलर जैसे दूसरे उपकरणों पर भी फोकस

सरकार अब केवल इंजन ही नहीं, बल्कि एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (AWACS) और मिड-एयर रिफ्यूलर जैसी क्षमताओं पर भी ध्यान दे रही है। इनकी खरीद के लिए भी रक्षा मंत्रालय ने प्रस्ताव (RFI) मंगाए हैं।

Nistar DSV: पनडुब्बियों का संकटमोचक ‘निस्तार’ जल्द होगा भारतीय नौसेना में शामिल, शिप में है ऑपरेशन थिएटर और ICU के साथ पूरा अस्पताल

Nistar DSV: Indian Navy to Induct Indigenous Submarine Rescue Ship with Onboard Hospital, OT, and ICU

Nistar DSV: भारतीय नौसेना में अब एक और ताकतवर जहाज शामिल होने जा रहा है। इसका नाम है – ‘निस्तार’ (Nistar)। यह पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से बना पहला डाइविंग सपोर्ट वेसल (Diving Support Vessel) है, जिसे 18 जुलाई 2025 को विशाखापट्टनम के नौसेना डॉकयार्ड में एक भव्य समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में नौसेना में शामिल किया जाएगा। इस जहाज को विशाखापट्टनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने डिजाइन और तैयार किया है। कमीशन होने के बाद, निस्तार पूर्वी नौसेना कमान (ईस्टर्न नेवल कमांड) में शामिल होगा और गहरे समुद्र में डाइविंग और सबमरीन रेस्क्यू अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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Nistar DSV: क्यों रखा निस्तार नाम?

‘निस्तार’ नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है मुक्ति, बचाव, या उद्धार। वहीं इस जहाज का मुख्य काम यही है, गहरे समुद्र में बचाव कार्यों को अंजाम देना। इससे पहले, 1969 में भारतीय नौसेना ने पूर्व सोवियत संघ (USSR) से एक सबमरीन रेस्क्यू वेसल खरीदा था, जिसका नाम भी निस्तार था। 1971 में कमीशन हुए उस जहाज ने दो दशकों तक नौसेना के गोताखोरी (डाइविंग) और पनडुब्बी बचाव अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

नया निस्तार उस पुरानी विरासत को आगे बढ़ा रहा है। इसका आदर्श वाक्य (मोटो) ‘सुरक्षिता यथार्थता शौर्यम’ है, जिसका अर्थ है ‘सटीकता और बहादुरी के साथ उद्धार’।

क्या है डाइविंग सपोर्ट वेसल ‘निस्तार’?

‘निस्तार’ एक ऐसा शिप है, जिसे गहरे समुद्र में डाइविंग और पनडुब्बी बचाव अभियान के लिए बनाया गया है। यह जहाज खासतौर पर ऐसे मिशनों के लिए तैयार किया गया है, जहां नौसेना को समुद्र के भीतर बहुत गहराई तक जाकर काम करना होता है। जैसे पनडुब्बी में फंसे हुए क्रू को बचाना, डूबे हुए जहाज के हिस्सों की तलाश करना या दुश्मन की गतिविधियों की निगरानी करना।

Nistar DSV: Indian Navy to Induct Indigenous Submarine Rescue Ship with Onboard Hospital, OT, and ICU

दो महीने तक समुद्र में रह सकता है निस्तार

निस्तार एक अत्याधुनिक (स्टेट-ऑफ-द-आर्ट) शिप है। जिसकी लंबाई लगभग 118 मीटर है, और इसका वजन (डिस्प्लेसमेंट) करीब 10,000 टन है। यह शिप 60 दिनों से अधिक समय तक समुद्र में रह सकता है, जिससे यह लंबे समय मिशनों को अंजाम दे सकता है। निस्तार में डायनामिक पोजिशनिंग सिस्टम है। यह सिस्टम शिप को गहरे समुद्र में बेहद सटीकता के साथ अपनी जगह बनाए रखता है, जो गोताखोरी और बचाव कार्यों के लिए जरूरी है। निस्तार में एयर और सैचुरेशन डाइविंग सिस्टम्स हैं। यह 300 मीटर की गहराई तक सैचुरेशन डाइविंग और 75 मीटर तक साइड डाइविंग स्टेज के जरिए मिशन को अंजाम दे सकता है।

निस्तार में बना एक पूरा अस्पताल

निस्तार में रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स (ROVs) हैं, जो 1,000 मीटर की गहराई तक गोताखोरों की निगरानी और बचाव कार्यों में मदद करते हैं। इसमें समुद्र तल की मैपिंग और मलबे की खोज करने के लिए साइड स्कैन सोनार सिस्टम दिया गया है। आपात स्थिति में पनडुब्बी में फंसे कर्मियों को बचाने के लिए इसमें डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (DSRV) लगाया गया है। वहीं, जब बचाव अभियान के दौरान बचााए गए लोगों के इलाज की भी इसमें सुविधा है। शिप में ऑपरेशन थिएटर, गहन चिकित्सा इकाई (ICU), आठ बिस्तरों वाला अस्पताल, और हाइपरबेरिक मेडिकल सुविधाएं (हाइपरबेरिक चैंबर) हैं। ये सुविधाएं बचाव कार्यों के दौरान घायलों के इलाज के लिए जरूरी हैं। निस्तार हेलीकॉप्टरों के लिए स्टेज-थ्रू ऑपरेशन्स की सुविधा देता है, जिससे हवाई मदद मिलती है। इसमें 15 टन सबसी क्रेन लगाई गई है, जो भारी सामान को समुद्र से उठाने और बचाव कार्यों में मदद करती है।

नौसेना के पूर्वी कमान में होगा शामिल

‘निस्तार’ को भारतीय नौसेना के पूर्वी नौसेना कमान (ईस्टर्न नेवल कमांड) के बेड़े (फ्लीट) में शामिल किया किया जाएगा, जो भारत के पूर्वी समुद्री सीमा की सुरक्षा का जिम्मा संभालती है। निस्तार के आने से अंडमान-निकोबार और बंगाल की खाड़ी में नौसेना की मौजूदगी और अधिक मजबूत होगी।

निस्तार का प्रतीक चिन्ह है खास

निस्तार का प्रतीक चिह्न (क्रेस्ट) भी इसकी भूमिका और महत्व को दर्शाता है। इसमें एक लंगर (एंकर) है, जो मैरिटाइम डोमिनेंस और स्टैबिलिटी का प्रतीक है। लंगर के चारों ओर एक डॉल्फिन है, जो नाविकों की दोस्त और अच्छे मौसम का मैसेंजर मानी जाती है।

Nistar DSV: Indian Navy to Induct Indigenous Submarine Rescue Ship with Onboard Hospital, OT, and ICU

‘निस्तार’ पूरी तरह से भारतीय डिजाइन पर बेस्ड है और इसका निर्माण 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री से किया गया है। निस्तार का निर्माण हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है, जो भारत के सबसे पुराने शिपयार्ड्स में से एक है। इस जहाज के निर्माण में 120 से ज्यादा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) ने योगदान दिया है। जो भारत की रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।

हिंदुस्तान शिपयार्ड ने निस्तार को डिज़ाइन और निर्माण के दौरान भारतीय रजिस्टर ऑफ शिपिंग के सख्त नियमों का पालन किया। इससे पोत की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित हुई। नौसेना के एक अधिकारी ने कहा, “निस्तार भारत के शिपबिल्डिंग उद्योग की क्षमता का प्रतीक है। यह पोत न केवल हमारी नौसेना को मजबूत करेगा, बल्कि यह दुनिया को दिखाएगा कि भारत स्वदेशी रक्षा उत्पादन में कितना आगे बढ़ चुका है।”

OP JAL RAHAT 2: हिमाचल से लेकर पूर्वोत्तर तक भारतीय सेना बनी ‘मसीहा’, बाढ़ में फंसी जिंदगियों के बीच उम्मीद बने जवान

OP Jal Rahat 2: Indian Army Emerges as Lifesaver from Himachal to Northeast, Rescuing Lives Amid Devastating Floods
PIC SOURCE: Indian Army

OP JAL RAHAT 2: हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों में हाल ही में भारी बारिश और बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। मकान ढह गए, सड़कें बह गईं, और कई गांव दुनिया से कट गए। इस संकट की घड़ी में भारतीय सेना ने अपनी मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) अभियानों के जरिए लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरी है। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले और पूर्वोत्तर के नगालैंड, असम, और मणिपुर में सेना के जवान दिन-रात राहत कार्यों में जुटे हैं। ‘ऑपरेशन जल राहत-2’ के तहत सेना ने जिस त्वरित और सुनियोजित ढंग से सहायता और बचाव कार्यों को अंजाम दिया है, उसने एक बार फिर साबित किया कि सेना सिर्फ युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि आपदा की हर परिस्थिति में देशवासियों की रक्षा के लिए तत्पर रहती है।

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OP JAL RAHAT 2: हिमाचल प्रदेश के मंडी में सेना का राहत अभियान

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में जून 2025 के आखिरी हफ्ते से शुरू हुई मूसलाधार बारिश ने कई इलाकों को तहस-नहस कर दिया। थुनाग, बगस्याद, और पंडोह जैसे क्षेत्रों में बादल फटने, बाढ़, और भूस्खलन ने भारी नुकसान पहुंचाया। सड़कें, पुल, और बिजली आपूर्ति ठप हो गई। कई गांव पूरी तरह कट गए। इस आपदा में भारतीय सेना ने नागरिक प्रशासन के साथ मिलकर राहत कार्य शुरू किए।

दूरदराज के इलाकों में राहत कार्यों के साथ दी फर्स्ट एड

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में आई भीषण बाढ़ के बाद राज्य प्रशासन की अपील पर भारतीय सेना ने मानवीय सहायता और आपदा राहत (Humanitarian Assistance and Disaster Relief – HADR) अभियान की शुरुआत की। 6 जुलाई से भारतीय सेना ने मंडी जिले में अपने राहत कॉलम तैनात किए। थुनाग, बगस्याद, और पंडोह जैसे क्षेत्रों में सेना ने कई महत्वपूर्ण काम किए। सबसे पहले, सेना ने बगस्याद से थुनाग तक एक महत्वपूर्ण खच्चर पथ (मूल ट्रैक) को खोलने का काम किया। यह रास्ता भारी बारिश और मलबे की वजह से बंद हो गया था। इस रास्ते के खुलने से जरूरी सामान, जैसे राशन और दवाइयां, प्रभावित गांवों तक पहुंचाई जा सकीं।

OP Jal Rahat 2: Indian Army Emerges as Lifesaver from Himachal to Northeast, Rescuing Lives Amid Devastating Floods
PIC SOURCE: Indian Army

थुनाग में सेना ने घायल और बीमार लोगों को प्राथमिक उपचार (First Aid) मुहैया कराया और जरूरतमंद परिवारों तक राशन किट पहुंचाई। 7 जुलाई को देगी, 8 जुलाई को रुशद, और 9 जुलाई को चपड़ जैसे दूरदराज के गांवों तक राहत सामग्री पहुंचाई गई। इन गांवों तक सड़कें पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं, लेकिन सेना ने नागरिक प्रशासन के साथ मिलकर हेलीकॉप्टर और पैदल मार्गों के जरिए मदद पहुंचाई। बाढ़ प्रभावित गांवों तक राहत सामग्री पहुंचाना एक बड़ा कार्य था, जिसे सेना ने एसडीआरएफ (राज्य आपदा मोचन बल), एनडीआरएफ (राष्ट्रीय आपदा मोचन बल) और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर पूरा किया।

थुनाग जैसे कुछ इलाकों में मोबाइल नेटवर्क की पहुंच सीमित थी। इसके बावजूद, सेना ने ISAT फोन, RS STARSV, और HX सिस्टम जैसे सैटेलाइट संचार (सैटलाइट कम्युनिकेशन) का इस्तेमाल कर नागरिक प्रशासन के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। इससे राहत कार्यों में समन्वय बना रहा और हर जरूरतमंद तक मदद पहुंचाने में आसानी हुई।

मंडी के उपायुक्त अपूर्व देवगन ने कहा, “भूगोल की वजह से राहत कार्य चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन सेना, SDRF, और NDRF की टीमें 24 घंटे काम कर रही हैं।” सेना ने न केवल रास्ते खोले, बल्कि लोगों में भरोसा भी जगाया। स्थानीय लोग सेना के जवानों को देखकर राहत महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि कोई उनके साथ खड़ा है।

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PIC SOURCE: Indian Army

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखु ने किया थुनाग का दौरा

10 जुलाई को हिमाचल प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखु थुनाग का दौरा किया। जहां उन्होंने राहत कार्यों का जायजा लिया और प्रभावित लोगों से मिले। साथ ही सेना की राहत कार्यों में जुटी टीम से भी उन्होंने मुलाकात की। इसके अलावा, भारतीय सेना के ब्रिगेड कमांडर भी मंडी में हैं, जहां उन्होंने राहत कॉलमों के साथ बातचीत की और कार्यों की प्रगति की समीक्षा की। मुख्यमंत्री और मंडी के उपायुक्त (डिप्टी कमिश्नर) के साथ एक बैठक भी होगी, जिसमें राहत कार्यों को और तेज करने की रणनीति बनाई जाएगी।

हिमाचल में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखु ने राहत कार्यों को युद्धस्तर पर चलाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने बगस्याद में राहत शिविर का दौरा किया और प्रभावित परिवारों से मुलाकात की।

पूर्वोत्तर में ऑपरेशन जल राहत-2 शुरू

हिमाचल के साथ-साथ, भारतीय सेना ने पूर्वोत्तर राज्यों नगालैंड, असम, और मणिपुर में भी बाढ़ राहत अभियान शुरू किया है। इसे ‘ऑपरेशन जल राहत 2’ नाम दिया गया है। भारी बारिश और नदियों के उफान ने इन राज्यों में कई इलाकों को जलमग्न कर दिया। भारतीय सेना ने मुख्यालय इंस्पेक्टर जनरल असम राइफल्स (नॉर्थ) के नेतृत्व में नागरिक प्रशासन के साथ मिलकर राहत कार्य शुरू किए। सेना की टीमें न केवल राहत सामग्री बांट रही हैं, बल्कि मलबा हटाने, रास्ते बनाने, और चिकित्सा शिविर लगाने जैसे काम भी कर रही हैं।

नगालैंड के दिमापुर में इंजीनियर टास्क फोर्स तैनात

नगालैंड के दिमापुर जिले में सिंग्रिजन कॉलोनी बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुई। 10 जुलाई 2025 को दिमापुर के उपायुक्त ने भारतीय सेना से तत्काल मदद मांगी। रातोंरात 160 किलोमीटर का सफर तय कर सिंग्रिजन कॉलोनी में मदद पहुंचाई गई। सेना ने तुरंत एक इंजीनियर टास्क फोर्स (ETF) को तैनात किया। इस टीम ने सिंग्रिजन कॉलोनी में फंसे लोगों को निकालने और राहत सामग्री पहुंचाने का काम शुरू किया। हालांकि, बाद में उपायुक्त ने मौखिक रूप से सेना की तैनाती वापस लेने की बात कही, लेकिन सेना अब भी तैयार है। असम राइफल्स में बाढ़ राहत नियंत्रण केंद्र (फ्लड रिलीफ कंट्रोल सेंटर) स्थापित किया गया है, जो किसी भी आपात स्थिति के लिए संसाधन तैयार रखे हुए है।

OP Jal Rahat 2: Indian Army Emerges as Lifesaver from Himachal to Northeast, Rescuing Lives Amid Devastating Floods
PIC SOURCE: Indian Army

असम में धनसिरी नदी उफान पर

ऊपरी असम के गोलाघाट जिले में धनसिरी नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी। हालांकि, अब पानी का स्तर कम हो रहा है, लेकिन सेना हालात पर नजर रखे हुए है। अगर जरूरत पड़ी, तो तुरंत राहत कॉलम भेजे जाएंगे।

मणिपुर में नंबोल नदी ने मचाई तबाही

मणिपुर के इम्फाल पश्चिम और बिष्णुपुर जिलों में नंबोल नदी के उफान ने भारी तबाही मचाई। पानी का स्तर अब कम होने लगा है, लेकिन सेना अभी भी राहत कार्यों में जुटी है। नागरिक प्रशासन के साथ मिलकर सेना ने फंसे हुए लोगों को निकाला और जरूरी सामान बांटा। सेना और स्थानीय प्रशासन मिलकर लगातार राहत अभियान चला रहे हैं। गांवों से पानी धीरे-धीरे उतर रहा है, लेकिन कई जगहों पर हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं।

राहत कार्यों के आंकड़े

10 जुलाई 2025 तक, भारतीय सेना ने पूर्वोत्तर में निम्नलिखित राहत कार्य किए:

  • 40 राहत कॉलम तैनात किए गए, जिनमें 24 मुख्य और 16 रिजर्व कॉलम शामिल हैं।
  • 3,820 लोग बचाए गए।
  • 1,361 राशन पैकेट बांटे गए।
  • 2,095 लोगों को चिकित्सा सहायता दी गई।
  • 15,421 पानी की बोतलें बांटी गईं।

MacGregor Memorial Medal 2024: भारतीय सेना के जांबाज पर्वतारोही कर्नल जामवाल को मिला प्रतिष्ठित ‘मैकग्रेगर मेडल’, सीडीएस जनरल चौहान ने किया सम्मानित

MacGregor Memorial Medal 2024: Indian Army’s Col Ranveer Jamwal Honoured by CDS Gen Anil Chauhan

MacGregor Memorial Medal 2024: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड एडवेंचर स्पोर्ट्स (NIMAS) के निदेशक और भारतीय सेना के बहादुर अफसर कर्नल रणबीर सिंह जामवाल को 2024 के लिए प्रतिष्ठित मैकग्रेगर मेडल से सम्मानित किया गया है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने उन्हें यह मेडल प्रदान किया। यह सम्मान उन्हें न केवल असाधारण कठिन पर्वतारोहण अभियानों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए दिया गया, बल्कि भारतीय सेना की सामरिक तैयारियों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए भी मिला है। कर्नल रणबीर सिंह जामवाल की अगुवाई में ‘हर शिखर तिरंगा’ मिशन ने भारत के 28 राज्यों के सबसे ऊंचे पर्वत शिखरों पर तिरंगा फहराने का एतिहासिक कार्य पूरा किया, जिसका समापन विश्व की तीसरी और देश की सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा (8,586 मीटर) पर पर्वतारोहण अभियान के साथ समाप्त हुआ। बता दें कि कर्नल जामवाल वही व्यक्ति हैं, जिनकी अगुवाई में भारतीय सेना ने 2020 में गलवान के बाद चीन को धता बताते हुए कैलाश रेंज की ब्लैक टॉप, हेलमेट टॉप, गुरंग हिल और मगर हिल चोटियों पर कब्जा किया था और चीन को बातचीत की टेबल पर आने के लिए मजबूर किया था।

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MacGregor Memorial Medal 2024: क्या है मैकग्रेगर मेमोरियल मेडल?

मैकग्रेगर मेडल भारत में सैन्य साहसिकता और खोज के क्षेत्र में सबसे सम्मानित पुरस्कारों में से एक है। इसकी शुरुआत 1888 में मेजर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ मैकग्रेगर की स्मृति में हुई थी, जो यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया (USI) के संस्थापक थे। यह मेडल उन सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में मिलिट्री एक्सप्लोरेशन या एक्स्ट्रीम एडवेंचर में असाधारण योगदान दिया हो। चाहे वह ऊंचे पर्वत हों, दुर्गम जंगल हों, या सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र, यह पुरस्कार उन लोगों को सम्मानित करता है जो अपनी जान जोखिम में डालकर देश की सेवा करते हैं।

‘हर शिखर तिरंगा’: एक एतिहासिक मिशन

कर्नल रणवीर सिंह जामवाल की अगुवाई में ‘हर शिखर तिरंगा’ मिशन ने भारत के इतिहास में एक अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया। इस मिशन का उद्देश्य भारत के 28 राज्यों के सबसे ऊंचे पर्वत शिखरों पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराना था। इस मिशन का समापन कंचनजंगा की चढ़ाई के साथ हुआ, जो न केवल भारत की सबसे ऊंची, बल्कि विश्व की तीसरी सबसे ऊंची चोटी भी है। कंचनजंगा की चढ़ाई अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती थी। इस पर्वत की ऊंचाई 8,586 मीटर है, और यह अपनी खतरनाक ढलानों, अप्रत्याशित मौसम और तकनीकी कठिनाइयों के लिए जाना जाता है।

MacGregor Memorial Medal 2024: Indian Army’s Col Ranveer Jamwal Honoured by CDS Gen Anil Chauhan

कर्नल जामवाल ने NIMAS की पांच सदस्यीय टीम का नेतृत्व किया, और इस अभियान में टीम के सभी पांच सदस्य चोटी तक पहुंचने में सफल रहे। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि मई के मौसम में कंचनजंगा पर 100% शिखर सफलता हासिल करने वाली यह एकमात्र भारतीय टीम थी। इस मिशन ने न केवल भारत के साहसिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा, बल्कि यह देश की एकता और अखंडता का भी प्रतीक बना। कर्नल जामवाल ने कहा, “जम्मू ने मुझे ताकत दी, प्रकृति के प्रति प्रेम सिखाया और मुश्किलों का सामना करने का जज्बा दिया। कंचनजंगा की यह सफलता उतनी ही जम्मू-कश्मीर की है, जितनी पूरे भारत की।” बता दें कि कर्नल आरएस जामवाल जम्मू और कश्मीर से आते हैं और उन्हें भारत का सबसे अनुभवी पर्वतारोही माना जाता है।

पैंगॉन्ग के हीरो- सीमा पर चीन को धकेला था पीछे!

कर्नल जामवाल की बहादुरी सिर्फ माउंटेनियरिंग तक ही सीमित नहीं है। 2020 में गलवान के बाद 29-30 अगस्त को पैंगॉन्ग झील इलाके में पास ब्लैक टॉप, हेलमेट टॉप, गुरंग हिल और मगर हिल जैसी टैक्टिकल चोटियों पर भारतीय सेना की तैनाती में उनकी बड़ी भूमिका रही। ये सभी चोटियां कैलाश रेंज में आती हैं। कर्नल जामवाल के नेतृत्व में भारतीय सेना की एक टीम ने इन चोटियों पर कब्जा कर लिया। क्योंकि यहां से चीन की गतिविधियों पर सीधे नजर रखी जा सकती थी। इन इलाकों में 18,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई, माइनस 15 डिग्री तापमान, कम ऑक्सीजन और दुश्मन की मौजूदगी जैसी चुनौतियों के बीच उन्होंने भारतीय सेना को चोटी तक पहुंचाया। उन्हें और उनकी टीम को दिन में सिर्फ 2 घंटे की नींद मिलती थी जबकि 20-20 घंटे की चौकसी करनी पड़ती थी।

29-30 अगस्त की रात को उनकी चौकसी के कारण भारतीय सेना ने चीन की किसी भी संभावित हरकत का मुकाबला किया। इस मिशन ने लद्दाख में भारत की स्थिति को मजबूत किया, और अब स्पांगुर गैप, रीजुंग पास और रेकिंग पास जैसे क्षेत्रों में सेना की पकड़ मजबूत हो गई है। इसके चलते चीन के सैन्य शिविर अब भारत की निगरानी में हैं। वहीं, जब भारत ने इन चोटियों पर कब्जा किया तो चीन को मजबूरन बातचीत की टेबल पर आना पड़ा।

सातों महाद्वीप की चोटियों पर लहराया तिरंगा

कर्नल जामवाल अकेले ऐसे भारतीय पर्वतारोही भी हैं जिन्होंने ‘सेवन समिट्स’ यानी सातों महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटियों पर सफल चढ़ाई की है। इनमें माउंट एवरेस्ट (एशिया), माउंट एकोंकागुआ (दक्षिण अमेरिका), माउंट मैककिनली (उत्तरी अमेरिका), माउंट एल्ब्रस (यूरोप), माउंट किलिमंजारो (अफ्रीका), माउंट कार्स्टेन्स पिरामिड (ऑस्ट्रेलिया) और माउंट विन्सन (अंटार्कटिका) शामिल हैं। 2019 में, उन्होंने अंटार्कटिका के माउंट विंसन (लगभग 5,000 मीटर) पर चढ़ाई की थी।

तेनजिंग नॉरगे पुरस्कार से सम्मानित

कर्नल जामवाल जाट रेजिमेंट में एक जवान के रूप में सेना में शामिल हुए थे। वे हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर स्कूल के इंस्ट्रक्टर भी रह चुके हैं, जहां सियाचिन और लद्दाख की पोस्टिंग से पहले जवानों को कठिन परिस्थितियों में युद्ध के लिए तैयार किया जाता है। कर्नल जामवाल को पर्वतारोहण में उनकी उपलब्धियों के लिए 2013 में तेनजिंग नॉरगे राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया था। इसके अलावा उन्हें राज्य पुरस्कार, आईएमएफ (इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन) गोल्ड मेडल और कई अन्य सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।

भूकंप में चलाया रेस्क्यू ऑपरेशन

अप्रैल 2015 में जब नेपाल में विनाशकारी भूकंप आया था, तब कर्नल जामवाल एवरेस्ट बेस कैंप में थे। इस आपदा में 22 पर्वतारोहियों और शेरपाओं की जान चली गई थी, लेकिन उनकी टीम सुरक्षित रही। बाद में उन्होंने वहां रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया और कई लोगों की जान बचाई।

फ्रॉस्ट बाइट में खोई थी एक ऊंगली

2009 में उत्तराखंड के माउंट माना पर चढ़ाई के दौरान कर्नल जामवाल 7 घंटे तक 23,000 फीट की ऊंचाई पर बर्फीले तूफान में फंसे रहे थे। इस दौरान उन्हें फ्रॉस्ट बाइट हो गया था और उन्होंने अपनी एक ऊंगली खो दी थी। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

Jaguar Fighter Crash: पूरी दुनिया में केवल भारतीय वायुसेना ही ऑपरेट कर रही है जगुआर, दुर्घटनाग्रस्त जेट अपग्रेड प्रोग्राम का रहा है हिस्सा!

Jaguar Fighter Crash: IAF Only Operator Worldwide, Crashed Jet Was Part of Upgrade Program

Jaguar Fighter Crash: 9 जुलाई 2025 को राजस्थान के चूरू जिले में भारतीय वायुसेना (IAF) का एक जगुआर ट्रेनर विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह हादसा दोपहर करीब 1:25 बजे भानुड़ा गांव के पास एक खेत में हुआ, जिसमें विमान पर सवार दोनों पायलटों की मौत हो गई। यह इस साल जगुआर विमानों से जुड़ा तीसरा हादसा है, जिसके बाद भारतीय वायुसेना के पुराने हो चुके विमानों की लाइफ साइकिल और इनके मैंटेनेंस को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वहीं वायुसेना सूत्रों का कहना है कि क्रैश हुआ जगुआर DARIN-II अपग्रेडेड फाइटर जेट था।

HAL ALH Crash: ध्रुव हेलीकॉप्टर हादसे पर HAL की सफाई, सोशल मीडिया पर फैली झूठी खबरों को बताया भ्रामक और एकतरफा

भारतीय वायुसेना के मुताबिक, यह जगुआर ट्रेनर जेट सूरतगढ़ एयरबेस से नियमित प्रशिक्षण उड़ान पर था। दोपहर करीब 1:25 बजे, राजस्थान के चुरू जिले के भानुदा गांव (रतनगढ़ तहसील) में यह ट्रेनर जेट दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे की वजह तकनीकी खराबी बताई जा रही है। साथ ही वायुसेना ने दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इंक्वायरी गठित कर दी है। चुरु प्रशासन का कहनाा है कि हादसे के तुरंत बाद पुलिस और प्रशासन की टीमें मौके पर पहुंचीं। बचाव और राहत कार्य शुरू किए गए, लेकिन विमान के मलबे में दोनों पायलटों के शव क्षत-विक्षत हालत में मिले। हालांकि किसी भी नागरिक संपत्ति को नुकसान नहीं हुआ है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पायलटों ने विमान को आबादी वाले इलाके से दूर ले जाकर लोगों की जान बचाने की कोशिश की।

Jaguar Fighter Crash: इस साल जगुआर का तीसरा हादसा

2025 में जगुआर विमानों से जुड़ा यह तीसरा हादसा है। इससे पहले 7 मार्च को हरियाणा के पंचकूला में एक जगुआर विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, जिसमें पायलट सुरक्षित बाहर निकल गया था। इसके बाद 2 अप्रैल को गुजरात के जामनगर के पास एक अन्य जगुआर विमान क्रैश हुआ, जिसमें पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट सिद्धार्थ यादव की मौत हो गई थी। सिद्धार्थ ने भी विमान को आबादी से दूर ले जाकर कई लोगों की जान बचाई थी। जबकि दूसरा पायलट घायल हो गया था।

केवल भारतीय वायुसेना ही कर रही है ऑपरेट

SEPECAT Jaguar एक ट्विन-इंजन, ग्राउंड-अटैक फाइटर-बॉम्बर विमान है, जिसे ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर बनाया था। यह विमान भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का अहम हिस्सा है और इसका इस्तेमाल डीप पेनेट्रेशन स्ट्राइक मिशनों के लिए किया जाता है। भारतीय वायुसेना में इसे “शमशेर” (न्याय की तलवार) के नाम से जाना जाता है। इसकी डीप स्ट्राइक क्षमता और कम ऊंचाई पर उड़ान भरने के चलते इसी काफी वाहवाही भी मिली है। इसका ‘लो-लो-लो कॉम्बैट रेडियस ऑफ एक्शन’ 650 किलोमीटर है।

भारतीय वायुसेना ने 1979 में ब्रिटेन से 40 जगुआर सीधे खरीदे थे, जबकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने तकनीकी हस्तांतरण समझौते के तहत और 100 विमान भारत में बनाए। इस तरह 2008 तक कुल मिलाकर 160 जगुआर विमान वायुसेना के बेड़े में शामिल हो गए। वहीं, अप्रैल 2025 तक, भारतीय वायुसेना के पास 115 जगुआर विमान बचे हैं, जिनमें से 83 उड़ाने की हालात में हैं। इस समय जगुआर की छह स्क्वाड्रन (अंबाला, जामनगर, गोरखपुर, भुज, और सूरतगढ़) में हैं, जबकि इनमें से 30 ट्रेनर वेरिएंट हैं।

वहीं, भारतीय वायुसेना ही पूरी दुनिया में इस विमान की एकमात्र ऑपरेटर है। ब्रिटेन ने अपने जगुआर विमानों को 2007 तक रिटायर कर दिया था, जबकि फ्रांस ने 2005 में ही इनका ऑपरेशन बंद कर दिया था। ओमान, इक्वाडोर और नाइजीरिया जैसे अन्य देशों ने भी काफी पहले ही इन्हें सर्विस से बाहर कर दिया

भारत ने खरीदे थे पुराने स्पेयर पार्ट्स

2018 में, भारत ने फ्रांस, ओमान, और यूके से 31 डीकमीशन किए गए जगुआर एयरफ्रेम और स्पेयर पार्ट्स हासिल किए थे, ताकि बेड़े को कुछ और सालों तक चालू रखा जा सके। जगुआर विमानों की दुर्घटनाओं की वजहों में तकनीकी खराबी (जैसे अंडरपॉवर्ड रोल्स-रॉयस टर्बोमेका Adour Mk811 इंजन), पुराने एयरफ्रेम, और मैंटेनेंस को लेकर सवाल उठाए गए हैं। भारतीय वायुसेना ने इनके इंजनों को हनीवेल के F125-IN टर्बोफैन इंजनों से बदलने की योजना बनाई थी, जो 30% ज्यादा थ्रस्ट देता। लेकिन 2019 में ज्यादा लागत के चलते इसे रद्द कर दिया गया। Adour इंजन को सपोर्ट करने वाली कंपनी रॉल्स-रॉयस ने साफ कर दिया है कि वह केवल 2035 तक ही इन इंजनों के लिए मेंटेनेंस सपोर्ट देगी। सूत्रों का कहना है कि प्रत्येक विमान के लिए 190 करोड़ रुपये और एचएएल को अमेंडमेंट, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन के लिए अतिरिक्त 20 करोड़ रुपये की जरूरत थी।

DARIN अपग्रेड प्रोग्राम

वहीं, समय के साथ आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने और इसकी ऑपरेशनल लाइफ को लंबा करने के लिए जगुआर में तीन बड़े अपग्रेड भी किए गए। जैगुआर को DARIN (Display Attack Ranging Inertial Navigation) प्रोग्राम के तहत अपग्रेड किया गया।

पहला अपग्रेड DARIN-I 1980 के दशक में मिला। 1982 से HAL द्वारा बनाए गए सभी जगुआर विमानों में DARIN सिस्टम लगाया गया। इनमें नया नेविगेशन/अटैक सिस्टम जोड़ा। जिसके बाद कम ऊंचाई पर यह सटीक हमला करने में माहिर हो गया। जिसके बाद जैगुआर दुश्मन की डिफेंस लाइन को भेदने में माहिर हो गया। यह पहला बड़ा अपग्रेड था, जिसने जैगुआर की नेविगेशन और विपन डिलिवरी कैपेसिटी को एडवांस बनाया।

DARIN II

पहले अपग्रेड के बाद 1990 के दशक के अंत से 2000 के दशक की शुरुआत तक DARIN II अपग्रेड चला। जिसमें एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) सूट, रडार वार्निंग रिसीवर्स (RWR), और नए हथियारों को इंटीग्रेट किया गया। साथ ही, ऑटोपायलट, नए डिस्प्ले, और HOTAS (Hands On Throttle And Stick) सिस्टम ने पायलटों के लिए विमान को कंट्रोल करना आसान बनाया। साथ ही, समुद्री हमले की क्षमता के लिए कुछ विमानों में सी ईगल और हार्पून जैसी एंटी-शिप मिसाइलें भी शामिल की गईं। इसका नतीजा था पूरी तरह से स्वदेशी DARIN-II, विमान को रनवे के टचडाउन पॉइंट तक अंधेरे में भी गाइडेंस देता है।

एक रिटायर्ड जगुआर पायलट कहते हैं, “अंबाला की जानी-मानी सर्दियों की धुंध में, जब आप अपना हाथ भी न देख पाएं, तब भी जगुआर आसानी से लैंड और टेकऑफ कर रहा था।”

Jaguar Fighter Crash: IAF Only Operator Worldwide, Crashed Jet Was Part of Upgrade Program

DARIN III

वहीं, 2011 में DARIN III अपग्रेड शुरू हुआ। भारतीय वायुसेना के डिप्टी चीफ, एयर मार्शल आरकेएस भदौरिया ने एचएएल बेंगलुरु में DARIN-III से लैस एक जगुआर उड़ाया और उसके बाद उन्होंने इस अपग्रेडेड सिस्टम को “इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस” दे दी। यह अपग्रेड जगुआर को 21वीं सदी का सुपर फाइटर यानी आधुनिक युद्ध का योद्धा बनाने की कोशिश थी। इसमें ग्लास कॉकपिट, नया मिशन कंप्यूटर, इजरायली EL/M-2052 AESA रडार, और GPS-बेस्ड नेविगेशन सिस्टम शामिल हुए। इस अपग्रेड से जगुआर को दुश्मन के इलाके में बेहद सटीक बमबारी करने की क्षमता मिली। वहीं, न्यू जेनरेशन लेजर गाइडेड बम (NGLGBs), अमेरिका से 2010 में खरीदा गया Textron CBU-105 सेंसर फ्यूज्ड वेपन, रुद्रम-1, AIM-9 साइडविंदर, और ASRAAM जैसे हथियारों ने इसे मल्टीरोल फाइटर बनाया। सेंसर फ्यूज्ड वेपन टैंकों को नष्ट करने में माहिर है। यह हथियार हवा में कई “स्मार्ट बमलेट्स” में विभाजित हो जाता है, जो स्वचालित रूप से टैंक को खोजकर उसके टरेट (ऊपरी भाग) को भेदते हैं।

2031-32 तक बने रहेंगे सर्विस में

सूत्रों का कहना है कि 2025 तक, 50-60 जगुआर इस स्टैंडर्ड तक अपग्रेड हो चुके हैं, और यह प्रोसेस अभी जारी है। DARIN-II से लैस लगभग 60 जगुआर उसी सिस्टम के साथ काम करते रहेंगे, जबकि बाकी 60 विमान जो अभी भी पुराने DARIN सिस्टम से लैस हैं, उन्हें अब DARIN-III में अपग्रेड किया जाएगा। इस अपग्रेड के बाद जगुआर 2031-32 तक सर्विस में बने रहेंगे। हालांकि IAF के 30 ट्रेनर वेरिएंट में से सभी को DARIN III अपग्रेड नहीं मिला। सूत्रों का कहना है कि ट्रेनर जेट्स मुख्यतः ट्रेनिंग के लिए हैं, अक्सर पुराने स्टैंडर्ड्स पर ही रहते हैं।

Indigenous Fighter Jet: पीएम मोदी के प्रधान सचिव पहुंचे HAL, स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजना पर पैनी नजर रख रहा है प्रधानमंत्री कार्यालय

Indigenous Fighter Jet Project: PM’s Principal Secretary Visits HAL, PMO Closely Monitoring

Indigenous Fighter Jet: भारत ने अगले 20 सालों में 500 से अधिक स्वदेशी फाइटर जेट बनाने की योजना पर काम कर रहा है। लेकिन इस सपने को साकार करने के लिए एक बड़ी चुनौती सामने खड़ी है वह है एक दमदार इंजन। जो भारत के पास नहीं है। इस के चलते भारत को विदेशी कंपनियों खासकर अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक (GE) कंपनी परपर निर्भर रहना पड़ रहा है। हाल ही में, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने बेंगलुरु में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का दौरा किया। इस दौरे ने भारत के स्वदेशी विमान कार्यक्रम और इंजन सप्लाई की चुनौतियों को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।

डॉ. पीके मिश्रा ने अपने दौरे की शुरुआत बेंगलुरु में एचएएल के ARDC (एयरक्राफ्ट रिसर्च एंड डिज़ाइन सेंटर) में LCA Mk-2 हैंगर से की। इसके बाद उन्होंने तेजस Mk-1A के असेंबली हैंगर और एयरोस्पेस डिवीजन का जायजा लिया। इस दौरान उन्हें तेजस Mk-1A के प्रोडक्शन स्टेटस के बारे में विस्तार से बताया गया। इस दौरान उन्हें एचएएल ने छह Mk-1A फाइटर जेट और दो Mk-1 ट्रेनर जेट को भी प्रदर्शित किया, जिनका निर्माण अभी जारी है। एचएएल के अधिकारियों ने उन्हें भविष्य की योजनाओं, जैसे तेजस Mk-2 और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के बारे में भी जानकारी दी।

इसके अलावा, प्रधान सचिव मिश्रा ने उन्होंने ‘प्रचंड’ (लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर), लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH), ध्रुव (ALH) और HTT-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट के प्रोटोटाइप भी देखे। उन्होंने GSLV MkIII और PSLV रॉकेट्स के असेंबली शॉप्स का भी दौरा किया, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का हिस्सा हैं। साथ ही, गगनयान मिशन के लिए एचएएल के सिस्टम्स और इंटीग्रेटेड क्रायोजेनिक इंजन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी को भी देखा। उनका यह इस बात का संकेत है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) एचएएल के कामकाज और भारत के रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र की प्रगति पर करीबी नजर रख रहा है।

Indigenous Fighter Jet: दो चुनौतियां हैं भारत के सामने

भारत का स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम दो मुख्य चुनौतियों का सामना कर रहा है। पहली, जनरल इलेक्ट्रिक से F404 इंजनों की सप्लाई में देरी। दूसरी, भारत में F414 इंजन के जॉइंट प्रोडक्शन के लिए अमेरिकी सरकार से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मंजूरी। ये दोनों इंजन भारत के तेजस कार्यक्रम के लिए बेहद जरूरी हैं। F414 इंजन, F404 से 35 फीसदी ज्यादा ताकतवर है और इसे तेजस Mk-2, नौसेना के विमानों, और AMCA के शुरुआती वर्जन में इस्तेमाल किया जाना है।

इस साल 12 इंजन सप्लाई

भारत ने 2021 में एचएएल और जनरल इलेक्ट्रिक के बीच 716 मिलियन डॉलर का करार किया था, जिसके तहत 99 F404 इंजनों की सप्लाई होनी थी। ये इंजन तेजस Mk-1A विमानों के लिए हैं, जिनका प्रोडक्शन एचएएल को दो चरणों में करना है, पहले चरण में 83 विमान और दूसरे में 97 विमान। एग्रीमेंट के मुताबिक, अप्रैल 2023 से हर साल 16 इंजनों की सप्लाई शुरू होनी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जनरल इलेक्ट्रिक ने अब नई समय-सीमा दी है कि इस साल 12 इंजन और अगले साल 20 इंजन सप्लााई किए जााएंगे। इस देरी के चलते तेजस Mk-1A की डिलीवरी में भी दिक्कत हो रही है। पहले चरण के 83 विमानों की डिलीवरी मार्च 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक शुरू नहीं हो सकी।

Indigenous Fighter Jet Project: PM’s Principal Secretary Visits HAL, PMO Closely Monitoring
Image Source: HAL

अभी तक भारत और अमेरिका के बीच मिलिट्री पार्टनरशिप अब तक खरीददार-विक्रेता के रिश्ते तक सीमित रही है। पिछले डेढ़ दशक में भारत ने अमेरिका से लगभग 20 बिलियन डॉलर के मिलिट्री इक्विपमेंट्स खरीदे हैं, लेकिन विमान, ड्रोन या हेलीकॉप्टर जैसे बड़े उपकरणों के लिए कोई टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं हुआ। अब F414 इंजन के जॉइंट प्रोडक्शन का प्रस्ताव इस साझेदारी की पहली बड़ी परीक्षा है।

जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की मुलाकात के दौरान इस जॉइंट प्रोडक्शन की घोषणा हुई थी। लेकिन डेढ़ साल बाद भी इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में अपने अमेरिकी समकक्ष रक्षा सचिव पीट हेग्सेथ से फोन पर बात की थी। उन्होंने F404 इंजनों की तेज सप्लाई और F414 इंजन के जॉइंट प्रोडक्शन के लिए जल्द समझौते की बात कही। इसकी वजह है कि सरकार जल्द से जल्द विमानों की शॉर्टेज को पूरा करना चाहती है। क्योंकि इन इंजनों की देरी भारत के स्वदेशी विमान कार्यक्रम तय समय से कााफी पीछे चल रहा है।

42 स्क्वाड्रन की जरूरत

भारतीय वायुसेना (IAF) के पास इस समय 31 स्क्वाड्रन (प्रत्येक में 16-18 विमान) हैं, जबकि पाकिस्तान और चीन से दोहरे खतरे का सामना करने के लिए उन्हें कम से कम 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है। विमानों की यह शॉर्टेज तुरंत पूरी होनी चाहिए, और इसके लिए इंजनों की सप्लाई और भी जरूरी है। तेजस Mk-1A, Mk-2 और AMCA जैसे प्रोजेक्ट्स भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़े कदम हैं, लेकिन इंजन की कमी इनकी रफ्तार को धीमा कर रही है।

हेलीकॉप्टर इंजन बनाने में सफलता

भारत ने हेलीकॉप्टर इंजन बनाने में कुछ सफलता हासिल की है। फ्रांस की कंपनी सैफरान के साथ मिलकर भारत हेलीकॉप्टर इंजन बना रहा है। इसके अलावा, सुखोई 30-MKI विमानों में इस्तेमाल होने वाले AL-31F इंजनों के प्रोडक्शन का लाइसेंस भी भारत के पास है। लेकिन फाइटर जेट्स के लिए ताकतवर जेट इंजन बनाने की तकनीक अभी भारत के पास नहीं है। F414 इंजन के जॉइंट प्रोडक्शन से भारत को न केवल तकनीकी ज्ञान मिलेगा, बल्कि यह भविष्य में पूरी तरह स्वदेशी इंजन बनाने की दिशा में भी एक कदम होगा।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है, “हमारा प्रयास है कि फैसले जल्दी लिए जाएं ताकि हम भारत में ही बड़े इंजनों का निर्माण शुरू कर सकें।” यह लेकिन यह प्रक्रिया आसान नहीं है। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए अमेरिकी सरकार की मंजूरी, जनरल इलेक्ट्रिक की व्यावसायिक प्राथमिकताएं, और भारत में प्रोडक्शन की क्षमता जैसे कई मुद्दों को हल करना होगा।

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बता दें, एचएएल तेजस, ध्रुव, LCH, LUH जैसे प्रोजेक्ट्स के अलावा, यह गगनयान मिशन और इसरो के रॉकेट प्रोग्राम में भी योगदान दे रहा है। डॉ. मिश्रा के दौरे के दौरान एचएएल ने भविष्य के मल्टी-स्टेकहोल्डर प्रोग्राम्स को लीड करने के अपने वादे को दोहराया। एचएएल AMCA जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में अहम भूमिका निभाने को तैयार है। लेकिन इंजन सप्लाई की अनिश्चितता एचएएल के सामने भी चुनौती खड़ी कर रही है।

Def Secy on Fighter Jet: भारत खरीदेगा मित्रदेशों से 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट, रूस ने दिया Su-57 और Su-35M का बड़ा ऑफर, जुलाई के आखिर तक आएंगे तीन अपाचे

Defence Secretary on Fighter Jets: India May Import 5th-Gen Jets from Allies; Russia Offers Su-57 & Su-35M, 3 Apache Helicopters to Arrive by July-End

Def Secy on Fighter Jet: रक्षा सचिव आरके सिंह का कहना है कि भारत अपनी वायुसेना की ताकत को और मजबूत बनाने के लिए मित्र देशों से पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की खरीद पर गंभीरता से विचार कर रहा है। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में रक्षा सचिव आरके सिंह ने कहा कि यह कदम अल्पकालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उठाया जा सकता है। सिंह ने यह भी बताया कि भारत और अमेरिका इस साल के अंत में अपने 10 साल पुराने डिफेंस एग्रीमेंट को रिन्यू करेंगे। इसके अलावा, रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि इस महीने अमेरिका से तीन और अपाचे हेलीकॉप्टर भारत को मिलने वाले हैं। वहीं, रक्षा सूत्रों का कहना है कि रूस ने भारत को एक खास डील ऑफर की है। इसमें सुखोई Su-57 स्टेल्थ फाइटर और Su-35M फाइटर जेट शामिल हैं।

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Def Secy on Fighter Jet: Su-57 और Su-35M की पेशकश

रूस ने भारत के साथ अपनी रक्षा साझेदारी को और मजबूत करने के लिए एक डील ऑफर की है। इस सौदे में रूस की सरकारी कंपनी रोस्टेक और सुखोई ने भारत को सुखोई Su-57E स्टेल्थ फाइटर जेट की पूरी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की है। जिसके बाद ये विमान हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के नासिक प्लांट में बनाए जा सकते हैं। यह वही प्लांट है, जहां अब तक 220 से अधिक Su-30MKI जेट्स बनाए जा चुके हैं। इसके अलावा, भारतीय वायुसेना के मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) टेंडर के तहत 114 Su-35M जेट्स की सीधी सप्लाई का भी ऑफर है।

रूस के इस ऑफर में पहले चरण में भारत को 20 से 30 Su-57E स्टेल्थ फाइटर जेट तैयार हालत में दिए जाएंगे। इसके बाद, अगले तीन से चार साल में इन विमानों का निर्माण भारत में शुरू होगा। इस योजना के तहत 2030 तक भारतीय वायुसेना में 60 से 70 अत्याधुनिक स्टेल्थ फाइटर शामिल हो सकते हैं। Su-35M जेट्स को MRFA टेंडर के तहत सीधे सप्लाई किया जाएगा। इस जेट का सिस्टम Su-30MKI से काफी मिलता-जुलता है, जिससे पायलटों और कर्मचारियों को अतिरिक्त ट्रेनिंग की कम जरूरत पड़ेगी।

इस सौदे में नए और एडवांस इंजन, जैसे AL-41F1S और इजडेलिये 177S (Izdeliye 177S) भी शामिल हैं। ये इंजन Su-30MKI को अपग्रेड करने में भी इस्तेमाल होंगे। जिससे उनकी लाइफ साइकिल 2055 तक बढ़ जाएगी।

Su-57E की खासियतें

Su-57E रूस का सबसे एडवांस स्टेल्थ फाइटर जेट है। इसके एक्सपोर्ट वर्जन में भारत को पूरा सॉफ्टवेयर कोड और 40-60% लोकल मैन्युफैक्चरिंग की अनुमति दी जाएगी। इससे भारत अपनी मिसाइलें, जैसे एस्ट्रा बीवीआर (बियॉन्ड विजुअल रेंज), रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल, और विरुपाक्ष AESA रडार, इस जेट में लगा सकेगा। साथ ही, रूस भारत को स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने में भी मदद करेगा।

सस्ता और दमदार है Su-35M

Su-35M एक 4.5 पीढ़ी का एयर सुपीरियरिटी फाइटर जेट है, जो राफेल, F/A-18 सुपर हॉर्नेट और F-21 जैसे जेट्स से मुकाबला करता है। भारतीय वायुसेना के पास अभी 31 स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 है। रूस का दावा है कि Su-35M और Su-30MKI में 70-80% तकनीकी समानताएं हैं, जिससे इसे भारतीय वायुसेना में शामिल करना आसान होगा। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में Su-30MKI ने ब्रह्मोस मिसाइल से पाकिस्तानी वायुसेना के ठिकानों पर हमला कर अपनी हवाई क्षमता साबित की थी।

Su-35M की कीमत 65 से 80 मिलियन डॉलर प्रति जेट है, जो राफेल (120 मिलियन डॉलर) और F-35A (80-100 मिलियन डॉलर) से काफी कम है। इस जेट में R-37M हाइपरसोनिक मिसाइल (400 किमी रेंज) और K-77M बीवीआर मिसाइल जैसे एडवांस हथियार लगाए जा सकते हैं। ये हथियार पाकिस्तान के J-10C या J-35 जेट्स पर भी भारी पड़ेंगे।

CAATSA का है खतरा

हालांकि, इस सौदे में कुछ चुनौतियां भी हैं। अमेरिका का CAATSA (काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट) कानून भारत पर प्रतिबंध लगा सकता है, जैसा कि S-400 मिसाइल सिस्टम की खरीद के दौरान हुआ था। इसके अलावा, रूस से पुराने पुर्जों की सप्लाई में देरी की समस्या भी रही है। फिर भी, यूक्रेन युद्ध के कारण रूस ने Su-35M का प्रोडक्शन दोगुना कर दिया है, जिससे भारत को हर साल बड़ी संख्या में ये जेट्स मिल सकते हैं। अगले दो से तीन साल में 36 से 40 जेट्स के साथ दो स्क्वाड्रन तैनात किए जा सकते हैं।

राफेल की तुलना में कहां ठहरता है Su-35M

भारतीय वायुसेना के पास पहले से 36 राफेल जेट्स हैं। हालांकि, राफेल महंगा है, जबकि Su-35M सस्ता है। Su-35M में लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों जेट्स की अपनी-अपनी खूबियां हैं।

बात करें स्टेल्थ टेक्नोलॉजी की, तो Su-57E को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह दुश्मन के रडार की पकड़ से बच सके। इसके साथ ही यह जेट सुपरसोनिक स्पीड, यानी ध्वनि से भी तेज गति से उड़ान भर सकता है। इस जेट की अगली खासियत है इसका एडवांस विपन सिस्टम, जो लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगा सकता है। इसमें हाइपरसोनिक मिसाइलें और BVR मिसाइलें भी शामिल की जा सकती हैं। इतना ही नहीं, Su-57E और Su-35M दोनों में ही मल्टी-रोल क्षमता है, ये जेट हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के मिशनों को अंजाम दे सकते हैं। ये जेट्स इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम से लैस हैं, जो दुश्मन के रडार और कम्यूनिकेशन सिस्टम को जाम कर सकते हैं।

इस महीने के आखिर तक आएंगे अपाचे

रक्षा सचिव आरके सिंह ने बताया कि इस महीने अमेरिका से तीन और अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टर भारतीय सेना को मिलेंगे। पिछले 15 महीनों से डिलीवरी में लगातार देरी हो रही है। भारतीय सेना ने अमेरिका के साथ छह अपाचे AH-64E हेलिकॉप्टर की डील 2020 में साइन की थी। शुरुआत में इनमें से तीन हेलिकॉप्टर मई या जून 2024 तक मिलने की उम्मीद थी। लेकिन सप्लाई चेन में आई दिक्कतों की वजह से डिलीवरी टल गई।

भारतीय वाायुसेना ने 2015 में सरकार-से-सरकार डील के तहत 39 अपाचे हेलिकॉप्टर खरीदने की योजना बनाई थी, जिसमें से 2020 तक 22 भारतीय वायुसेना (IAF) को मिल चुके हैं। इनकी पहली खेप पठानकोट और दूसरी जोरहट में तैनात की गई है। भारतीय सेना पहले ही मार्च 2024 में जोधपुर के नागतलाव बेस में अपनी पहली अपाचे रोटरी विंग एयरक्राफ्ट स्क्वॉड्रन तैयार कर चुका है। पायलट और ग्राउंड स्टाफ को ट्रेनिंग भी दे दी गई है, लेकिन हेलिकॉप्टर न मिलने से स्क्वॉड्रन अभी तक सक्रिय नहीं हो सका।

अपाचे AH-64E हेलिकॉप्टर को दुनिया का सबसे एडवांस मल्टी-रोल कॉम्बैट हेलिकॉप्टर माना जाता है। बोइंग के मुताबिक, यह एक मिनट से कम समय में 128 स्टेशनरी टारगेट्स को पहचान सकता है और 16 को एक साथ निशाना बना सकता है। इसे ‘टैंक किलर’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह दुश्मन के टैंकों को नष्ट करने में माहिर है। यह हेलिकॉप्टर चार ब्लेड, दो टर्बोशाफ्ट इंजन, नोज-माउंटेड सेंसर सिस्टम और लेजर, इंफ्रारेड तकनीक से लैस है, जिससे यह रात में भी टारगेट को ट्रैक और अटैक कर सकता है। इसमें हेलफायर मिसाइल्स, 70 मिमी रॉकेट्स और 30 मिमी ऑटोमैटिक कैनन हैं, जो 1200 हाई-एक्सप्लोसिव राउंड फायर कर सकते हैं।

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AMCA प्रोग्राम पर जल्द दस्तखत

रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि AMCA सौदे पर अगले तीन से छह महीनों में दस्तखत होने की उम्मीद है। AMCA का प्रोटोटाइप तैयार होने में 10 साल लग सकते हैं। यह भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान होगा, जिसे रूस से मिलने वाली तकनीक से और मजबूती मिलेगी।

Def Secy on Op Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने नहीं खोए राफेल फाइटर जेट, रक्षा सचिव ने कहा- कैप्टन का बयान ‘पूरी तरह गलत’

Defence Secretary on Operation Sindoor: India Did Not Lose Rafale Jets, Says Captain’s Claim 'Absolutely Incorrect'
defence secretary rk singh (Image: PIB)

Def Secy on Op Sindoor: रक्षा सचिव आरके सिंह ने सोमवार को स्पष्ट किया कि यह कहना “पूरी तरह गलत” है कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपने राफेल लड़ाकू विमानों को खोया। उन्होंने यह भी साफ किया कि भारतीय सशस्त्र बलों को युद्ध के दौरान पूरी छूट दी गई थी, और उन पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं था।

सीएनबीसी-टीवी18 को दिए एक विशेष साक्षात्कार में रक्षा सचिव ने कहा, “आपने राफेल विमानों को बहुवचन में इस्तेमाल किया है, मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि यह बिल्कुल गलत है। पाकिस्तान को भारत की तुलना में कई गुना ज्यादा नुकसान हुआ है। हालांकि, उन्होंने भारत को हुए नुकसान के बारे में सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया।

रक्षा सचिव ने यह भी जोर देकर कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं था। उन्होंने कहा, “हमारी सेना को युद्ध में पूरी छूट दी गई थी, और उन पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं था। रक्षा सचिव का यह बयान उस विवाद के जवाब में आया है, जो हाल ही में इंडोनेशिया में भारतीय रक्षा अताशे के बयान के बाद शुरू हुआ था।

क्या कहा था डिफेंस अताशे ने

यह विवाद तब शुरू हुआ जब इंडोनेशिया में भारतीय डिफेंस अताशे कैप्टन शिव कुमार के एक कथित बयान का वीडियो सामने आया। यह वीडियो 29 जून को वायरल हुआ, जिसमें कैप्टन शिव कुमार ने 10 जून को एक प्रोग्राम में कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के शुरुआती चरण में भारतीय वायुसेना को कुछ विमान खोने पड़े। उन्होंने दावा किया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व ने यह निर्देश दिया था कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमला नहीं करना है, बल्कि केवल आतंकवादी ठिकानों को ही निशाना बनाना है।

कैप्टन शिव कुमार ने कहा था, “हमें कुछ विमान खोने पड़े और ऐसा केवल इसलिए हुआ क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व ने हमें सैन्य ठिकानों या उनके एय़र डिफेंस सिस्टम पर हमला न करने का दबाव डाला था।” कैप्टन शिव कुमार का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं थीं। कुछ विशेषज्ञों ने सरकार पर सवाल उठाए था कि क्या सेना को पूरी छूट नहीं दी गई थी। वहीं, कुछ ने कैप्टन के बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार देते हुए कहा था कि इससे सेना का मनोबल कम हो सकता है।

Def Secy on Op Sindoor: रक्षा सचिव ने बयान को किया खारिज

रक्षा सचिव आरके सिंह ने कैप्टन शिव कुमार के बयान को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सिंदूर में अपने राफेल विमानों को नहीं खोया। उन्होंने यह भी साफ किया कि सेना को अपनी रणनीति तय करने और कार्रवाई करने की पूरी आजादी थी। “हमारी सेना ने ऑपरेशन को पूरी तरह से प्रोफेशनल तरीके से अंजाम दिया। यह कहना कि हमें सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमला करने से रोका गया था, गलत है।”

रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान को भारत की तुलना में कहीं ज्यादा नुकसान हुआ। “पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाना पड़ा। हमने 100 से ज्यादा आतंकवादियों को ढेर किया। उन्होंने कहा, यह ऑपरेशन आतंकवाद के खिलाफ हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”

बता दें कि भारत ने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। यह ऑपरेशन पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में शुरू किया गया था। इस हमले में कई निर्दोष नागरिकों की जान गई थी, जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाकों में आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने का फैसला किया। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए, जिसके बाद चार दिनों तक दोनों देश आमने-सामने थे।

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ये झड़पें 10 मई को तब खत्म हुईं, जब दोनों पक्षों ने डीजीएमओ के जरिए हमले रोकने पर सहमति जताई। इस ऑपरेशन को भारत ने आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत कदम बताया, जबकि पाकिस्तान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला करार दिया। ऑपरेशन के दौरान भारतीय सेना ने दावा किया कि उसने आतंकवादी ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया और कई आतंकवादियों को मार गिराया।

IAF UAV Squadron: ड्रोन युद्ध की तैयारी में भारतीय वायुसेना! अगले 5 साल में 50 लड़ाकू ड्रोन यूनिट्स तैनात करने की तैयारी

IAF UAV Squadron: Indian Air Force Gears Up for Drone Warfare, Plans to Deploy 50 Combat Drone Units in Next 5 Years

IAF UAV Squadron: भारतीय वायुसेना (IAF) ने भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसके लिए वायुसेना ने एक खास योजना तैयार की है और इस योजना को अमली जामा भी पहनाना शुरू कर दिया है। इस “अनमैन्ड फोर्स प्लान” (Unmanned Force Plan) के तहत अगले तीन से पांच साल में छोटे, मध्यम और बड़े आकार के 30 से 50 अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV) यानी ड्रोन शामिल होंगे। इन ड्रोनों को विशेष रूप से लड़ाकू अभियानों में इस्तेमाल किया जाएगा। यह योजना मौजूदा युद्धों में ड्रोनों की बढ़ती अहमियत को देखते हुए बनाई गई है, ताकि भारतीय वायुसेना आधुनिक युद्ध की चुनौतियों का सामना कर सके।

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IAF UAV Squadron: क्यों जरूरी है अनमैन्ड फोर्स प्लान?

आज दुनिया भर में युद्ध का तरीका बदल रहा है। आज युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों और सैनिकों तक सीमित नहीं रह गया है। आज की सेनाएं युद्ध के मैदान में इंसानी जान को जोखिम में डालने से बचना चाहती हैं। तकनीक का इस्तेमाल कर दुश्मन पर हमला करना ही आज की जरूरत है। ड्रोन और रोबोट तकनीक ने जंग के मैदान को पूरी तरह बदल दिया है। अमेरिका, चीन और यूक्रेन जैसे देश इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां यूक्रेन ने दुनिया की पहली अनमैन्ड सिस्टम फोर्स (Unmanned Systems Force) बनाई। इस सेना ने ड्रोनों और रोबोट हथियारों के दम पर रूस के खिलाफ जंग में मजबूत स्थिति बनाई। भारतीय वायुसेना ने भी इन बदलावों से सबक लेते हुए ड्रोनों का एक मजबूत बेड़ा तैयार करने की योजना बनाई है।

IAF UAV Squadron: Indian Air Force Gears Up for Drone Warfare, Plans to Deploy 50 Combat Drone Units in Next 5 Years
IAF celebrated its 92nd anniversary at Air Force Station Tambaram, Chennai. The ceremonial parade was reviewed by the Chief of the Air Staff, Air Chief Marshal AP Singh…

वायुसेना के एयर कमोडोर (ऑपरेशन) संदीप सिंह ने नई दिल्ली में फिक्की के एक सेमिनार ‘हथियारबंद ड्रोन: अवसर और चुनौतियां’ में बताया, “हमने 2013 में ही अनमैन्ड फोर्स प्लान पर काम करना शुरू कर दिया था। अब अगले तीन से पांच साल में हम 30 से 50 ड्रोन यूनिट्स तैयार करेंगे, जिनमें छोटे, मध्यम और बड़े ड्रोन शामिल होंगे।”

MALE और HALE UAVs होंगे IAF के अगली पीढ़ी के हथियार

वायुसेना ने अपने स्ट्रक्चर्ड यूएवी रोडमैप यानी अनमैन्ड फोर्स प्लान को दो हिस्सों में बांटा है। इनमें शॉर्ट टर्म और मिड टर्म लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इस योजना का मकसद ड्रोनों को युद्ध में अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार करना है, जैसे दुश्मन के ठिकानों की जासूसी, हमला करना, और सुरक्षा करना शामिल है।

शॉर्ट टर्म प्लान में मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने वाले यानी मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ड एंड्यूरेंस (MALE UAVs) यूएवी शामिल हैं। ये ड्रोन 10,000 से 30,000 फीट की ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सकते हैं। ये निगरानी, टोही और अन्य रणनीतिक कार्यों के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे।

वहीं, मिड टर्म प्लान में HALE UAVs (High Altitude Long Endurance) उच्च ऊंचाई और अधिक रेंज वाले ड्रोन शामिल किए जाएंगे, जो 30,000 फीट से ऊपर उड़ान भर सकते हैं और इनमें लंबी दूरी तक दुश्मन के इलाके में जाकर मिशन अंजाम देने की क्षमता होगी।

अपने लॉन्ग टर्म प्लान के बारे में बात करते हुए उन्होंने वायुसेना भविष्य में ऐसे ड्रोन डेवलप करना चाहती है, जो GPS-रहित या इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे मुश्किल हालात में भी काम कर सकें। साथ ही, काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर भी काम होगा, जो दुश्मन के ड्रोनों को नाकाम कर सके।

भटिंडा में खुला यूएवी ट्रेनिंग स्कूल

वायु सेना ने अनमैन्ड इकोसिस्टम को जल्द से जल्द अडॉप्ट करने के लिए पंजाब के भटिंडा में अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स स्कूल (Unmanned Aerial Systems School) शुरू किया है। यह स्कूल रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर ध्यान देगा। साथ ही, यह शिक्षा जगत और उद्योगों के साथ मिलकर काम करेगा। स्कूल में ड्रोन के लिए टेस्ट रेंज भी उपलब्ध होगी, जिससे उद्योगों को नई टेक्नोलॉजी डेवलप करने में मदद मिलेगी। एयर कमोडोर सिंह ने कहा कि यह स्कूल सभी क्षेत्रों में काम करेगा। यह न केवल ड्रोन तकनीक को बेहतर बनाएगा, बल्कि उद्योगों को उनके लक्ष्य हासिल करने में भी सहायता देगा।

प्राइवेट सेक्टर को न्योता

वायु सेना ने अपनी जरूरतों को स्पष्ट करते हुए उद्योगों को सहयोग के लिए आमंत्रित किया है। सिंह ने बताया कि वायु सेना को ऐसे ड्रोन चाहिए, जो बेस से दूर जाकर दुश्मन के इलाके में गहराई तक पहुंच सकें। आज के युद्ध क्षेत्र में मुकाबला पारंपरिक तरीके से नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) और GPS जैमिंग जैसी तकनीकों के बीच हो रहा है। इसलिए वायुसेना ऐसे काउंटर-यूएवी सिस्टम चाहती है, जो GPS के बिना भी दिशा पहचान सकें, फ्रीक्वेंसी हॉपिंग (बार-बार सिग्नल बदलने) करने वाले दुश्मन ड्रोन को बेअसर कर सकें और घुस कर दुश्मन के इलाके में मिशन को अंजाम दे सकें।

उन्होंने कहा कि वायु सेना चाहती है कि ये ड्रोन कहीं से भी ऑपरेट हो सकें और इन्हें चलाने के लिए कम से कम ह्यूमन रिसोर्सेज की जरूरत पड़े। इससे न केवल लागत होगी, बल्कि युद्ध के दौरान तेजी से फैसले लेने में भी मदद मिलेगी।

नौसेना ने शुरू की थी पहल

इससे पहले भारतीय नौसेना ने अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स के लिए सबसे पहले कदम उठाया था। रिटायर्ड कमोडोर अरुण गोलाया ने बताया कि नौसेना ने 2021 में अपना ‘अनमैन्ड रोडमैप’ तैयार किया था। इसका नॉन क्लासिफाइड हिस्सा 2022 में स्वावलंबन सेमिनार के दौरान उद्योगों के साथ साझा किया गया था। इस रोडमैप में नौसेना ने समुद्री निगरानी, पनडुब्बी रोधी युद्ध और अन्य कार्यों के लिए ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स की खरीद और विकास की योजना बनाई थी। गोलाया ने कहा, “वायु सेना ने अब अपनी योजना सामने रखी है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय थल सेना ने भी ऐसी कोई योजना बनाई है या यह अभी सार्वजनिक नहीं की गई है?” उन्होंने यह भी कहा कि खरीद योजनाओं को सार्वजनिक करना उद्योगों के लिए फायदेमंद है। इससे उन्हें पता चलता है कि कहां और कितना निवेश करना है।

संयुक्त योजना बनाने की जरूरत

कमोडोर गोलाया ने सुझाव दिया कि इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के तहत तीनों सेनाओं की संयुक्त योजना बनाना फायदेमंद हो सकता है। इससे न केवल संसाधनों का बेहतर इस्सेमाल होगा, बल्कि ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स का डेवलपमेंट भी तेजी से होगा। एक संयुक्त योजना से सेवाओं के बीच तालमेल बढ़ेगा और डुप्लिकेसी कम होगी।

26th Kargil Vijay Diwas: शौर्य को सलाम करने महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात में कारगिल शहीदों के घर पहुंची सेना, बलिदान को किया नमन

26th Kargil Vijay Diwas: Indian Army Visits Homes of Martyrs in Maharashtra, Delhi & Gujarat to Honour Their Sacrifice
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26th Kargil Vijay Diwas: 26वें कारगिल विजय दिवस की स्मृति में भारतीय सेना ने एक अनूठी और मानवीय पहल करते हुए देशभर में विशेष आउटरीच कार्यक्रम “शौर्य को सलाम, बलिदान को नमन” चला रही है। इस कार्यक्रम के तहत सेना के अधिकारी और जवान उन परिवारों तक पहुंचे, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में अपनों को खोया था। इन परिवारों को न सिर्फ सेना की ओर से एक विशेष स्मृति चिन्ह दिया गया, बल्कि एक व्यक्तिगत धन्यवाद पत्र भी सौंपा गया। इस अभियान का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि देना नहीं था, बल्कि यह दिखाने के लिए भी थी कि भारतीय सेना अपने वीरों और उनके परिवारों के साथ हर कदम पर खड़ी है।

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महाराष्ट्र के कई शहरों मुंबई, सतारा, सांगली, अहिल्या नगर, बीड, और सोलापुर में भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के शहीदों को याद किया। सेना के खास तौर पर चुने गए जवानों ने शहीदों के घरों तक जाकर उनके परिवारों को सम्मानित किया। इस दौरान परिवारों को स्मृति चिन्ह और भारतीय सेना की ओर से एक धन्यवाद पत्र भी दिया गया, जिसमें उनके प्रियजनों की वीरता और बलिदान को याद किया गया।

26th Kargil Vijay Diwas: Indian Army Visits Homes of Martyrs in Maharashtra, Delhi & Gujarat to Honour Their Sacrifice
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इस अभियान के दौरान सेना के अधिकारियों ने कैप्टन हनीफ-उद-दीन (वीर चक्र, 11 राजपुताना राइफल्स) के मुंबई स्थित घर पहुंचकर परिवार को सम्मानित किया। उनकी मां हुमा बेगम ने कहा कि यह उनके लिए बेहद गर्व का पल है। उन्होंने बताया कि कैप्टन हनीफ की शहादत देश के लिए थी, और सेना इस कदम उनकी याद ताजा हो गई।

इसी तरह सतारा में 110 इंजीनियर रेजिमेंट के सूबेदार कृष्णन नारायण के परिवार से मिलकर सेना ने उनकी बहादुरी की कहानी सुनाई। उनके भाई ने कहा, “सेना का हमारे घर आना और भाई को याद करना हमें बहुत सुकून देता है।” वहीं, सांगली में 7 मराठा के हवलदार सुरेश गणपति और 5 पैरा (स्पेशल फोर्स) के पैराट्रूपर महादेव नानदेव पाटिल के परिवारों को सम्मानित किया गया। उनकी परिवारों ने सेना के इस प्रयास को दिल से सराहा और कहा कि यह सम्मान उनकी शहादत को और खास बनाता है। बीड में 18 गढ़वाल राइफल्स के राइफलमैन सनप सुभाष के घर पर सेना ने उनकी वीरता की कहानी साझा की। उनके पिता ने कहा कि यह सम्मान उनके परिवार के लिए गर्व का पल है। सोलापुर में 108 इंजीनियर रेजिमेंट के सैपर देशमुख सुरेश का परिवार इस दौरान भावुक हो गया। इसके अलावा अहिल्या नगर में भी सेना ने शहीदों के परिवारों से मुलाकात की और उनकी वीरता को याद किया।

दिल्ली-एनसीआर में भी शहीदों के घर पहुंची सेना

दिल्ली-एनसीआर में भी भारतीय सेना ने कारगिल शहीदों को याद किया। सेना के जवान शहीदों के घरों तक गए और उनके परिवारों को स्मृति चिन्ह व सम्मान पत्र भेंट किए।

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सेना के अधिकारी पालम में 18 ग्रेनेडियर्स के मेजर आर.एस. अधिकारी (महावीर चक्र) के परिवार से मिले और उनकी वीरता को सलाम किया। वसुंधरा एन्क्लेव में 17 जाट रेजिमेंट के कैप्टन अनुज नैयर (महावीर चक्र) के घर पर सेना ने उनकी शहादत की कहानी सुनाई। द्वारका में मेजर सीबी द्विवेदी (सेना मेडल, 315 फील्ड रेजिमेंट), लांस नायक मंगत सिंह (मेनशन इन डिस्पैचेस, 18 गढ़वाल राइफल्स), हवलदार ताम बहादुर छेत्री (सेना मेडल, 1 नागा), राइफलमैन अनुसूया प्रसाद (वीर चक्र, 18 गढ़वाल राइफल्स), पंजाबी बाग में कैप्टन अमित वर्मा (9 महार), नोएडा में कैप्टन कनाड भट्टाचार्य (सेना मेडल, 8 सिख) और मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) में लांस नायक बचन सिंह (2 राजपुताना राइफल्स) के घर पहुंचे।

इन सभी स्थानों पर भारतीय सेना ने न सिर्फ स्मृति चिन्ह और पत्र सौंपे, बल्कि हर परिवार के समक्ष शहीद की कहानी और वीरता को सुनाकर भावनात्मक माहौल बना दिया। कई परिवारों की आंखें नम हो गईं, पर चेहरे पर गर्व स्पष्ट दिख रहा था।

गुजरात में कारगिल शहीदों को किया नमन

गुजरात के खेड़ा, आर्योली, पंचमहल, और जामनगर में भी सेना ने कारगिल शहीदों को श्रद्धांजलि दी। सेना के जवान शहीदों के घरों तक गए और उनके परिवारों को स्मृति चिन्ह व सम्मान पत्र भेंट किए। गुजरात के खेड़ा, अरावली, पंचमहल और जामनगर जिलों में सेना के अधिकारियों ने स्थानीय शहीदों के परिवारों से मिलकर उन्हें सम्मानित किया।

26th Kargil Vijay Diwas: Indian Army Visits Homes of Martyrs in Maharashtra, Delhi & Gujarat to Honour Their Sacrifice
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खेड़ा में 12 महार रेजिमेंट के सिपाही दिनेश भाई भोंगी, अरावली में हवलदार कांती भाई कटवाल, जामनगर में 141 फील्ड रेजिमेंट के गनर रमेश कुमार जोगल और पंचमहल में 12 महार के सिपाही बल्ला भाई बारिया के घर जाकर उन्हें भारतीय सेना की ओर से विशेष स्मृति चिन्ह और सम्मान पत्र सौंपा गया।

इन मुलाकातों में सेना अधिकारियों ने शहीदों के बलिदान की पूरी कहानी सुनाई। जिसे परिवार वालों ने गर्व के साथ सुना, और कहा कि उन्हें खुशी है कि इतने सालों बाद भी देश उनकी कुर्बानी को याद कर रहा है।

इस आउटरीच कार्यक्रम का मकसद कारगिल युद्ध के शहीदों को श्रद्धांजलि देना और उनके परिवारों को यह दिखाना था कि सेना उनके साथ हर कदम पर है। सेना ने साफ किया कि यह सम्मान समारोह सिर्फ औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरा संदेश है कि शहीदों की वीरता और उनके परिवारों का बलिदान देश के लिए अमूल्य है।

Kargil Vijay Diwas 2025: इस साल कारगिल दिवस की थीम है “शौर्य को सलाम, बलिदान को नमन, 545 शहीदों के घर पहुंचेगी सेना

1999 का कारगिल युद्ध भारत के लिए एक ऐतिहासिक जीत थी, जिसमें भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ा। इस युद्ध में सैकड़ों सैनिकों ने अपनी जान दी, और उनके बलिदान ने देश को एकजुट किया। हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है, और इस बार 26वें साल में यह आउटरीच कार्यक्रम खास था। सेना ने न केवल शहीदों को याद किया, बल्कि उनके परिवारों को यह भरोसा भी दिलाया कि वे अकेले नहीं हैं।