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India Showcases Missile Power: लद्दाख से ओडिशा तक मिसाइलों ने दिखाई ताकत, पृथ्वी-2, अग्नि-1 और आकाश प्राइम का हुआ सफल परीक्षण

India Showcases Missile Power: Successful Tests of Prithvi-2, Agni-1 & Akash Prime from Ladakh to Odisha
Successful trial of Akash Prime at High-Altitude

India Showcases Missile Power: भारत ने 16 और 17 जुलाई 2025 को रक्षा क्षेत्र में तीन बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत ने एक ही दिन में तीन अहम मिसाइल परीक्षण कर दुनियाभर को अपनी रणनीतिक और तकनीकी ताकत का परिचय दिया है। गुरुवार को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों पृथ्वी-2 और अग्नि-1 का सफल परीक्षण किया गया। वहीं बुधवार को लद्दाख के हाई एल्टीट्यूड इलाके में भारतीय सेना और डीआरडीओ ने आकाश प्राइम मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया।

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India Showcases Missile Power: पृथ्वी-2 और अग्नि-1 का सफल परीक्षण

पृथ्वी-2 और अग्नि-1 मिसाइलों का सफल परीक्षण 17 जुलाई 2025 को ओडिशा के चांदीपुर में इंटीग्रेटेड टेस्टिंग रेंज में किया गया। ये दोनों छोटी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जो भारत की सामरिक ताकत का अहम हिस्सा हैं। ये दोनों मिसाइलें परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (nuclear deterrence capability) को मजबूती देती हैं। दोनों मिसाइलों के परीक्षण स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड की निगरानी में किए गए। रक्षा मंत्रालय ने बयान में कहा कि दोनों मिसाइलों ने अपने-अपने ऑपरेशनल और तकनीकी मापदंडों को पूरी तरह सफलतापूर्वक पूरा किया।

पृथ्वी-2 एक कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जो सतह से सतह पर मार करती है और लगभग 350 किलोमीटर तक लक्ष्य भेद सकती है। यह मिसाइल तरल ईंधन (liquid fuel) से चलती है और अपने सटीक निशाने के लिए जानी जाती है।

वहीं, अग्नि-1, पृथ्वी-2 के मुकाबले थोड़ी लंबी दूरी की मिसाइल है, जिसकी मारक क्षमता लगभग 700 किलोमीटर तक है। यह ठोस ईंधन (solid fuel) से ऑपरेट होती है।

लद्दाख में ‘आकाश प्राइम’ का धमाका

दूसरी ओर, लद्दाख के कठिन और हाई एल्टीट्यूड इलाके में 16 जुलाई को ‘आकाश प्राइम’ मिसाइल का सफल परीक्षण हुआ। यह मिसाइल भारतीय सेना के लिए तैयार किए गए ‘आकाश’ एयर डिफेंस सिस्टम  का अपग्रेडेड वर्जन है। इसका परीक्षण 4,500 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर किया गया। लद्दाख के हाई एल्टीट्यूड इलाके में जहां मौसम बेहद चुनौतीपूर्ण रहता है और ऑक्सीजन की कमी और तेज हवाएं आम हैं, जो किसी भी विपन सिस्टम के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि अधिकांश एय़र डिफेंस सिस्टम इतनी ऊंचाई पर टेस्ट नहीं किए जाते।

यह सिस्टम 30-35 किलोमीटर की दूरी तक टारगेट को निशाना बना सकता है। और 18-20 किलोमीटर की ऊंचाई तक प्रभावी है। यह लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों, और ड्रोनों जैसे खतरों से निपटने में सक्षम है। आकाश प्राइम में रडार, कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम, और मिसाइल लॉन्चर एक साथ काम करते हैं, जिससे यह एक मल्टी लेयर्ड डिफेंस सिस्टम बन जाता है। इसके रडार को ‘राजेंद्र’ कहा जाता है, दो 360-डिग्री कवरेज प्रदान करता है और एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है।

लगाया स्वदेशी रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर

परीक्षण के दौरान आकाश प्राइम ने दो तेज रफ्तार से उड़ने वाले ड्रोन को सफलतापूर्वक मार गिराया। आकाश प्राइम में सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सुधार इसका स्वदेशी विकसित रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर (Radio Frequency Seeker) है, जो लक्ष्य की सटीक पहचान कर मिसाइल को गाइडेंस देता है। यह सीकर किसी भी एरियल टारगेट को ट्रैक करके उसी दिशा में मिसाइल को कंट्रोल करता है, जिससे मिसाइल सटीक निशाना लगाती है। अभी तक यह तकनीक पहले सिर्फ कुछ गिने-चुने देशों के पास थी।

सेना को जल्द सप्लाई की उम्मीद

इस सिस्टम का परीक्षण ‘फर्स्ट ऑफ प्रोडक्शन मॉडल फायरिंग ट्रायल’ के तहत किया गया, जिसका मकसद सेना को जल्द से जल्द इसकी सप्लाई सुनिश्चित करना है। इस परीक्षण में भारतीय सेना की आर्मी एयर डिफेंस यूनिट, डीआरडी, भारत डायनामिक्स लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और कई निजी रक्षा कंपनियों ने हिस्सा लिया। इन परीक्षणों के सफल होने के बाद अब इसे जल्द ही सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात किया जा सकेगा।

ऑपरेशनल फीडबैक से बनी और बेहतर

आकाश प्राइम को सेना द्वारा दिए गए ऑपरेशनल फीडबैक के आधार पर अपग्रेड किया गया है। इसका मतलब यह है कि सिस्टम को युद्ध के वास्तविक अनुभवों को ध्यान में रखते हुए संशोधित और बेहतर बनाया गया है। यही नहीं, यह सिस्टम अब ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी आसानी से काम कर सकता है, जो पहले के सिस्टम के लिए मुश्किल था।

ऑपरेशन सिंदूर में आकाश ने मनवाया था लोहा

यह उपलब्धि उस समय हासिल हुई है, जब कुछ ही समय पहले ही भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के हवाई हमलों को सफलतापूर्वक नाकाम किया था। उस समय भी आकाश मिसाइल सिस्टम की अहम भूमिका थी। उस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान द्वारा प्रयोग किए गए चीनी ड्रोन और तुर्की के हवाई प्लेटफॉर्म्स को भारतीय रक्षा प्रणाली ने रोकने में सफलता पाई थी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर भारतीय सेना, डीआरडीओ और इस परीक्षण में शामिल होने वाली कंपनियों को बधाई दी है। उन्होंने इसे हाई एल्टीट्यूड एयर डिफेंस यानी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हवाई सुरक्षा के लिए एक बड़ी छलांग बताया है।

वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ अध्यक्ष डॉ. समीर वी कामत ने कहा कि यह मिसाइल अब देश की महत्वपूर्ण वायु रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने इस सफलता के लिए सभी वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को धन्यवाद दिया।

IAF AWACS: भारत बनाएगा अपना एयरबोर्न राडार सिस्टम, हवा में ‘उड़ता राडार’ आसमान से दुश्मनों पर नजर रखेगा

IAF AWACS RFI
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IAF AWACS: भारतीय वायुसेना को और मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने हाल ही में 20,000 करोड़ रुपये की लागत वाली स्वदेशी AWACS (एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम) प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। इस परियोजना के तहत छह अत्याधुनिक ‘एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम’ यानी AWACS विमान तैयार किए जाएंगे। इन विमानों को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और स्वदेशी कंपनियों की मदद से एअरबस के A321 विमानों पर तैयार किया जाएगा।

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IAF AWACS: आसमान में उड़ता हुआ कंट्रोल रूम

AWACS यानी ‘एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम’ ऐसा विमान होता है, जो हवा में रहकर सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमानों, मिसाइलों, ड्रोनों, राडार और गतिविधियों को पहचान सकता है। अवाक्स टेक्नोलॉजी किसी भी देश के एयर डिफेंस सिस्टम का आधार होती है। यह उड़ता हुआ फ्लाइंग ऑपरेशंस कंट्रोल सेंटर की तरह काम करता है। यह न केवल युद्ध के समय हवाई और जमीनी खतरों का पता लगाता है, बल्कि एक उड़ते हुए कमांड सेंटर की तरह काम करता है, जो युद्धक विमानों और सैन्य अभियानों को दिशा-निर्देश देता है। इसकी खूबी यह है कि यह जमीन आधारित राडारों के मुकाबले कहीं अधिक तेजी से और व्यापक दायरे में निगरानी कर सकता है।

कितनी है परियोजना की लागत

सरकार ने इस परियोजना के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। इस परियोजना के तहत, भारतीय वायुसेना को छह बड़े AWACS विमान मिलेंगे, जो एयरबस A321 विमानों पर आधारित होंगे। यह पहली बार होगा जब किसी यूरोपीय विमान को इस तरह के सिस्टम के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। ये विमान पहले एयर इंडिया के बेड़े का हिस्सा थे और अब इन्हें सैन्य उपयोग के लिए तैयार किया जाएगा। इन विमानों में एक एंटीना सिस्टम और दूसरी एडवांस टेक्नोलॉजी को जोड़ा जाएगा, जिसमें डॉर्सल फिन (विमान के ऊपर लगा एक विशेष रडार फ्रेमवर्क) शामिल है, जो 360 डिग्री रडार कवरेज प्रदान करेगा। इन विमानों में लंबी दूरी तक निगरानी रखने वाली सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग राडार (AESA राडार), मिशन कंट्रोल सिस्टम, डेटा लिंक और कम्युनिकेशन जैमर जैसे अत्याधुनिक सिस्टम लगाए जाएंगे। यह प्रोजेक्ट तीन साल में पूरे होने की उम्मीद है और इसके लिए DRDO भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर काम करेगा।

परियोजना का नाम नेत्रा MkII

इस परियोजना को नेत्रा MkII के नाम से भी जाना जाता है। जो डीआरडीओ का यह प्रोजेक्ट भारत के मौजूदा नेत्रा और फाल्कन (Phalcon) सिस्टम से कई मायनों में एडवांस होगा। वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास तीन नेत्रा अवॉक्स विमान हैं, जो ब्राजील के Embraer ERJ-145 विमानों पर बने हैं और 240 डिग्री रडार कवरेज प्रदान करते हैं। इसके अलावा, तीन IL-76 फाल्कन अवॉक्स हैं, जो इजराइल और रूस के सहयोग से तैयार किए गए हैं। लेकिन इनमें तकनीकी दिक्कतें हैं। नेत्रा MkII इन कमियों को दूर करने के लिए डिजाइन किया गया है, जिसमें स्वदेशी AESA (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैनड ऐरे) रडार और मिशन कंट्रोल सिस्टम शामिल होंगे। यह रडार न केवल ज्यादा दूरी तक निगरानी करेगा, बल्कि अधिक सटीकता और तेजी से टारगेट को ट्रैक करने में सक्षम होगा।

योजना के तहत एयरबस A321 विमानों में विमान की छत पर एक विशेष प्रकार की ‘डॉर्सल फिन’ यानी लंबवत पंखी संरचना लगाई जाएगी, जिसके भीतर शक्तिशाली राडार सिस्टम फिट होगा। यह राडार 360 डिग्री यानी चारों दिशाओं में निगरानी कर सकेगा। इन विमानों को अब फ्रांस में मिलिट्री स्टैंडर्ड्स के मुताबिक मॉडिफाई किया जाएगा, जिसमें रडार और सेंसर सुइट्स को जोड़ने के लिए कई बदलाव किए जाएंगे। इनमें गैलियम नाइट्राइड (GaN)-आधारित AESA रडार शामिल होंगे, जो नेत्रा MkII को पहले के नेत्रा सिस्टम की तुलना में ज्यादा ताकतवर और प्रभावशाली होंगे।

डीआरडीओ ने इस परियोजना में स्वदेशी टेक्नोलॉजी पर विशेष जोर दिया है। AESA रडार, मिशन कंट्रोल सिस्टम, और अन्य जरूरी सामान पूरी तरह से भारत में तैयार किए जाएंगे। इसके लिए डीआरडीओ की सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS) और इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट इस्टैब्लिशमेंट (LRDE) जैसी प्रयोगशालाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वहीं, विमान पहले से ही एयर इंडिया से लिए गए हैं, इसलिए उनकी लागत अपेक्षाकृत कम (लगभग 1,100 करोड़ रुपये) होगी। बाकी राशि रडार, सेंसर, और दूसरे एडवांस सिस्ट्म के डेवलपमेंट और इंटीग्रेशन पर खर्च की जाएगी।

क्या था प्रोजेक्ट ऐरावत?

1980 के दशक में DRDO ने प्रोजेक्ट ऐरावत के तहत स्वदेशी AWACS बनाने की कोशिश की थी, लेकिन 1999 में एक प्रोटोटाइप विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद यह परियोजना रद्द हो गई थी। इस हादसे में चार वैज्ञानिकों सहित आठ लोग मारे गए थे, जिससे परियोजना को बड़ा झटका लगा। इसके बाद भारत ने इजराइल और रूस के सहयोग से फाल्कन AWACS खरीदे, लेकिन इनमें तकनीकी समस्याएं और रखरखाव की चुनौतियां सामने आईं।

ऐसे कितने अवॉक्स विमान हैं भारत के पास?

वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास तीन ‘फाल्कन’ अवॉक्स विमान हैं, जो इजरायल और रूस के सहयोग से बनाए गए थे और Ilyushin-76 विमान पर आधारित हैं। इसके अलावा डीआरडीओ के बनाए दो छोटे ‘नेत्रा’ विमान भी हैं, जो ब्राजील के EMB-145 प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं। ये विमानों ने 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक और उसके बाद की परिस्थितियों में अहम भूमिका निभाई थी।

10-18 अवॉक्स विमानों की जरूरत

भारतीय वायुसेना को अपने हवाई क्षेत्र की प्रभावी निगरानी के लिए कम से कम 10-18 अवॉक्स विमानों की जरूरत है। फिलहाल केवल पांच प्लेटफॉर्म (तीन फाल्कन और दो नेत्रा) उपलब्ध हैं, जो भारत के बड़े हवाई क्षेत्र और पाकिस्तान और चीन की तुलना में नाकाफी हैं। वहीं, पाकिस्तान के पास नौ साब 2000 एरियाई और चार ZDK03 कराकोरम ईगल अवॉक्स हैं, जो 24 घंटे निगरानी करते हैं। वहीं, चीन के पास 20 से अधिक अवॉक्स हैं। वहीं, नेत्रा MkII के 2029 तक ट्रायल शुरू होने और 2030 तक वायुसेना में शामिल होने की उम्मीद है।

खुलेंगे निर्यात के रास्ते

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट भारत को उस स्तर तक पहुंचा सकता है जहां वह भविष्य में अन्य मित्र देशों को ऐसे राडार सिस्टम निर्यात भी कर सके। विशेष रूप से दक्षिण एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में ऐसे तकनीक की मांग बढ़ रही है। विश्व में बहुत कम देशों के पास स्वदेशी AWACS विकसित करने की क्षमता है, और भारत के लिए इस सेक्टर में भरपूर मौका है।

Apache AH-64E Helicopters: भारतीय सेना की एविएशन कोर का दो साल का इंतजार खत्म! जल्द मिलने वाले हैं अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर

AH-64E Apache Helicopters
Indian Air Force’s First Batch Of 4 Number Of Apache Attack Helicopters (File Photo)

Apache AH-64E Helicopters: भारतीय सेना की एविएशन कोर (AAC) की ताकत में जल्द ही एक बड़ा इजाफा होने जा रहा है। दुनिया के सबसे आधुनिक और घातक अटैक हेलिकॉप्टरों में से एक, अपाचे AH-64E अगले हफ्ते भारतीय सेना में शामिल होने जा रहे हैं। ये हेलिकॉप्टर सेना की एविएशन कोर को सौंपे जाएंगे, जो पहले से पूरी तरह से तैयार है। सूत्रों के अनुसार, पहले तीन अपाचे हेलिकॉप्टर रविवार या सोमवार को भारत पहुंचेंगे। ये हेलिकॉप्टर पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा पर तैनात किए जाएंगे।

Apache AH-64E हेलीकॉप्टर की डिलीवरी में देरी; भारत कर रहा अभी तक इंतजार, मोरक्को को मिल चुके हैं हेलीकॉप्टर!

Apache AH-64E Helicopters: नगतलाव बेस पर तैनाती की तैयारियां

भारतीय सेना ने मार्च 2024 में जोधपुर के नजदीक नागतलाव में अपना पहला अपाचे स्क्वॉड्रन (451 आर्मी एविएशन स्क्वॉड्रन) तैयार किया था। ग्राउंड स्टाफ और पायलट्स की ट्रेनिंग भी पूरी हो चुकी है। हालांकि, सप्लाई चेन में दिक्कतों और दूसरी वजहों के चलते इन हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी में देरी हुई। अब, लगभग दो साल बाद, सेना का इंतजार खत्म होने जा रहा है। ये हेलिकॉप्टर रेगिस्तानी इलाकों में दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों (टैंकों) को निशाना बनाने में माहिर हैं और इन्हें “टैंक किलर” के नाम से भी जाना जाता है।

2020 में हुई थी डील, 2023 में मिलने थे हेलिकॉप्टर

भारत और अमेरिका के बीच 2020 में छह अपाचे हेलिकॉप्टरों की खरीद को लेकर समझौता हुआ था। यह डील अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले टर्म के दौरान भारत यात्रा के दौरान हुई थी। इससे पहले 2015 में भारतीय वायुसेना के लिए बोइंग कंपनी के साथ 22 AH-64E अपाचे हेलिकॉप्टरों की डील साइन हुई थी। वायुसेना को ये सभी 22 हेलिकॉप्टर जुलाई 2020 तक मिल चुके हैं। 2019 में पठानकोट एयरबेस (125 स्क्वॉड्रन, ग्लैडिएटर्स) पर पहले आठ हेलिकॉप्टर शामिल किए गए थे, जबकि बाकी हेलिकॉप्टरों की तैनाती असम के जोरहाट (137 स्क्वॉड्रन) में हुई। लद्दाख क्षेत्र में भी वायुसेना के अपाचे हेलिकॉप्टरों को तैनात किया गया था। हालांकि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इनकी ऑपरेशनल क्षमता को लेकर कुछ सवाल भी उठे हैं। लेकिन सेना के लिए खरीदे गए छह हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी कोविड महामारी और अन्य सप्लाई चेन में दिक्कतों के चलते बार-बार टलती रही।

अत्याधुनिक तकनीक से लैस है अपाचे

अपाचे AH-64E हेलिकॉप्टर को दुनिया के सबसे आधुनिक और घातक अटैक हेलिकॉप्टरों में गिना जाता है। यह हेलिकॉप्टर दो जनरल इलेक्ट्रिक T700 टर्बोशैफ्ट इंजनों से लैस होता है। इसके नोज पर लगा सेंसर सूट लक्ष्य को ढूंढने, ट्रैक करने, और हमला करने में मदद करता है, जो दिन-रात, हर मौसम में काम करता है। इसमें लगे मॉडर्न टारगेट एक्विजिशन सिस्टम की मदद से यह दुश्मन के टैंक, बंकर और सैनिक ठिकानों को सटीकता से निशाना बना सकता है।

Apache AH-64E Delay: India Still Waiting, Morocco Receives First Batch!
Royal Moroccan Air Force Apache

अपाचे में नाइट विजन, लेजर और इंफ्रारेड आधारित सिस्टम होते हैं। इसमें 30 मिमी की ऑटोमैटिक तोप (cannon), 70 मिमी रॉकेट्स और हेलफायर मिसाइलें लगाई जा सकती हैं। भारतीय वायुसेना के अपाचे हेलिकॉप्टरों के साथ अमेरिका से हेलफायर लॉन्गबो मिसाइल, स्टिंगर मिसाइल और फायर कंट्रोल रडार भी शामिल थे। सेना को भी इसी तरह की क्षमताओं वाले हेलिकॉप्टर मिलेंगे।

रेगिस्तान में क्यों होगी तैनाती

सेना अधिकारियों के मुताबिक, अपाचे हेलिकॉप्टरों को राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया जाएगा, जहां ये दुश्मन के टैंक और आर्मर्ड फॉर्मेशन के खिलाफ कार्रवाई में अहम भूमिका निभाएंगे। ये हेलिकॉप्टर दुश्मन की सीमा के भीतर घुसकर ऑपरेशन करने की क्षमता रखते हैं और इन्हें ‘उड़ता हुआ टैंक’ भी कहा जाता है।

भारतीय हेलिकॉप्टर ‘प्रचंड’ से तुलना

जहां अपाचे को रेगिस्तानी इलाकों के लिए उपयुक्त माना गया है, वहीं ऊंचाई वाले इलाकों के लिए भारतीय हल्के अटैक हेलिकॉप्टर LCH ‘प्रचंड’ को बेहतर बताया गया है। ‘प्रचंड’ को खासतौर पर ऊंचे पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। सूत्रों के अनुसार, ये हेलिकॉप्टर न केवल हमले (अटैक) के लिए, बल्कि टोही, सुरक्षा, और शांति मिशनों में भी उपयोगी होंगे। इनकी तैनाती से सेना की रणनीतिक ताकत बढ़ेगी, खासकर उन इलाकों में जहां त्वरित और सटीक हमले की जरूरत होती है।

ड्रोन को कर सकते हैं कंट्रोल

अपाचे AH-64E हेलिकॉप्टर एक और खूबी के लिए जाना जाता है। यह मानव रहित हवाई वाहन (ड्रोन) को रिमोट से नियंत्रित कर सकता है। इससे इसकी निगरानी, हमला और रीयल टाइम जानकारी हासिल करने की क्षमता और बढ़ जाती है।

अमेरिका में हो रही है अपाचे की जगह नई तकनीक की तैयारी

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका खुद अपने पुराने AH-64D और E वर्जन के अपाचे हेलिकॉप्टरों को हटाकर नई पीढ़ी के फ्लारा (FLRAA – Future Long-Range Assault Aircraft) प्रोग्राम पर काम कर रहा है। अमेरिकी सेना ने 2019 में इस प्रोग्राम की शुरुआत की और अब इसकी मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया में प्रवेश कर चुका है। नया हेलिकॉप्टर MV-75 नाम से जाना जाएगा, जो ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर की भी जगह लेगा।

अपाचे हेलिकॉप्टर की खासियतें

अपाचे AH-64E, जिसे अपाचे गार्जियन भी कहा जाता है, दुनिया का सबसे उन्नत मल्टी-रोल अटैक हेलिकॉप्टर है। इसे बोइंग कंपनी बनाती है और यह पुराने Mi-35 हेलिकॉप्टरों की जगह लेगा।

अपाचे में मॉडर्नाइज्ड टारगेट एक्विजिशन डेजिग्नेशन सिस्टम (MTADS) है, जो दिन-रात और हर मौसम में लक्ष्य को ट्रैक करने की क्षमता देता है। इसका फायर कंट्रोल रडार हवा और जमीन दोनों तरह के 128 लक्ष्यों को एक मिनट से कम समय में पहचान सकता है और 16 लक्ष्यों पर हमला कर सकता है।

यह हेलफायर मिसाइल्स (AGM-114L-3 और AGM-114R-3), 70mm रॉकेट्स, और 30mm ऑटोमैटिक कैनन से लैस है, जो 1,200 राउंड गोला-बारूद ले जा सकता है। ये हथियार बख्तरबंद वाहनों, बंकरों, और दुश्मन की किलेबंदी को नष्ट करने में सक्षम हैं।

Apache Helicopters: जल्द खत्म होगा इंतजार! भारतीय सेना को दिसंबर 2024 में मिलेगा पहला AH-64E अपाचे हेलीकॉप्टर बैच

नोज-माउंटेड सेंसर और नाइट विजन नेविगेशन इसे रात के अंधेरे में भी ऑपरेशन करने की क्षमता देते हैं। अपाचे ड्रोन जैसे MQ-1C ग्रे ईगल को रिमोटली कंट्रोल कर सकता है, जिससे टोही (रेकनोसन्स) और निगरानी की क्षमता बढ़ती है। यह रेगिस्तानी गर्मी, पहाड़ी इलाकों, और समुद्री वातावरण में प्रभावी ढंग से काम करता है। इसकी अधिकतम रफ्तार 365 किलोमीटर प्रति घंटा है। यह युद्धक्षेत्र की तस्वीरें रियल-टाइम में भेज और प्राप्त कर सकता है, जिससे कमांडरों को तुरंत जानकारी मिलती है।

INS Mahendragiri: जानें भारतीय नौसेना को कब मिलने जा रहा है सबसे आधुनिक स्वदेशी स्टील्थ युद्धपोत, पढ़ें क्या है प्रोजेक्ट 17A?

INS Mahendragiri: India’s Most Advanced Indigenous Stealth Warship to Join Navy in 2026 Under Project 17A
PIC Source: Indian Navy

INS Mahendragiri: भारत अब सभी युद्धपोतों का निर्माण अब भारत में ही करेगा। प्रोजेक्ट 17A के तहत बन रहे नीलगिरी-क्लास के स्टील्थ फ्रिगेट्स में से आखिरी युद्धपोत, INS महेंद्रगिरि, फरवरी 2026 तक भारतीय नौसेना को सौंप दिया जाएगा। यह नीलगिरी क्लास का सातवां और सबसे आधुनिक युद्धपोत है। इस फ्रिगेट (युद्धपोत) को मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में तैयार किया जा रहा है और इसे फरवरी 2026 तक भारतीय नौसेना को सौंप दिया जाएगा।

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INS Mahendragiri: क्या है प्रोजेक्ट 17A?

प्रोजेक्ट 17A, भारतीय नौसेना के लिए बनाए जा रहे गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट्स की एक सीरीज है। इस प्रोजेक्ट के तहत कुल 7 स्टील्थ फ्रिगेट्स बनाए जा रहे हैं, जिनमें से 4 को मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड, मुंबई और 3 को गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता में तैयार किया जा रहा है। INS महेंद्रगिरि, MDL द्वारा बनाए जा रहे चौथे और आखिरी शिप के रूप में फरवरी 2026 में नौसेना को सौंपा जाएगा।

प्रोजेक्ट 17A के तहत बन रहे ये युद्धपोत भारतीय नौसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में और मजबूत बनाएंगे। ये जहाज पारंपरिक और गैर-पारंपरिक खतरों, जैसे समुद्री डकैती, तस्करी, और प्राकृतिक आपदाओं, से निपटने में सक्षम हैं। नौसेना का कहना है, “ये युद्धपोत भारत की समुद्री सुरक्षा को और मजबूत करेंगे। हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन और चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच ये जहाज हमारी ताकत का प्रतीक हैं।”

INS महेंद्रगिरि की खूबियां

INS महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट 17A के तहत बनने वाला सातवां और आखिरी स्टील्थ फ्रिगेट है। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) के अतिरिक्त महाप्रबंधक जय वर्गीज जय वर्गीज ने बताया, “महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट 17A का चौथा और अंतिम युद्धपोत है, जो MDL में बन रहा है। यह नीलगिरी-क्लास का हिस्सा है और भारतीय नौसेना को और मजबूती देगा। यह युद्धपोत अत्याधुनिक तकनीक से लैस है और हवा, समुद्र, और पानी के नीचे के खतरों से निपटने में सक्षम है।”

इस युद्धपोत का नाम ओडिशा के पूर्वी घाट में स्थित महेंद्रगिरि पर्वत के नाम पर रखा गया है। यह नीलगिरी-क्लास का सातवां युद्धपोत है, जो पुरानी शिवालिक-क्लास (प्रोजेक्ट 17) का एडवांस वर्जन है।

अत्याधुनिक घातक हथियारों से है लैस

INS महेंद्रगिरि में कई आधुनिक हथियार और सेंसर लगाए गए हैं, जो इसे मल्टीपर्पज और ताकतवर बनाते हैं। जय वर्गीज ने बताया, “यह युद्धपोत ब्रह्मोस और बराक मिसाइलों, टॉरपीडो, रॉकेट लॉन्चर, और AK-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम से जैसे घातक हथियारों से लैस है। यह हवा, समुद्र, और पानी के नीचे के लक्ष्यों पर सटीक हमला कर सकता है। इसके अलावा, इस युद्धपोत पर एक इंटीग्रेटेड हेलिकॉप्टर (सम्भवत: ALH या MH-60R) भी मौजूद रहेगा, जिससे समुद्र में गश्त और विरोधी पनडुब्बियों पर नजर रखना और आसान हो जाएगा।”

INS Mahendragiri: India’s Most Advanced Indigenous Stealth Warship to Join Navy in 2026 Under Project 17A
PIC Source: Indian Navy

इसमें लगीं ब्रह्मोस मिसाइलें सुपरसोनिक सरफेस-टू-सरफेस मिसाइलें हैं, जो 500 किलोमीटर तक की दूरी तक लक्ष्य भेद सकती हैं। वहीं, बराक मिसाइलें मध्यम दूरी की सरफेस-टू-सरफेस मिसाइलें हैं, जो हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम हैं। ये भारत और इजराइल ने मिलकर डेवलप की हैं। पानी के नीचे के खतरों, जैसे पनडुब्बियों, से निपटने के लिए टॉरपीडो हैं। जबकि नजदीकी खतरों, जैसे मिसाइलों और छोटे जहाजों, से निपटने के लिए इसमें AK-630 गन लगी। इसमें 76 एमएम की मुख्य तोप है, जो लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम है और इसे भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) ने बनाया है। साथ ही, यह वॉरशिप एडटी-सबरमरीन वारफेयर के RBU-6000 रॉकेट लॉन्चर से भी लैस है।

इसके अलावा, युद्धपोत में अत्याधुनिक रडार सिस्टम (EL/M-2248 MF-STAR) और हुम्सा-एनजी सोनार सिस्टम भी हैं, जो इसे दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों का पता लगाने में सक्षम बनाते हैं।

75 फीसदी स्वदेशी सामग्री

प्रोजेक्ट 17A के तहत बन रहे सभी सात युद्धपोतों में करीब 75 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है। बाकी 25 फीसदी हिस्सा आयातित उपकरणों का है, जिसमें गैस टरबाइन (अमेरिका की GE कंपनी से), मल्टी-फंक्शन रडार (इजराइल से), और बराक मिसाइल सिस्टम शामिल हैं। यह स्वदेशीकरण भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।

इस प्रोजेक्ट में 200 से ज्यादा छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) ने हिस्सा लिया है, जिससे देश में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिज़ाइन ब्यूरो ने इन युद्धपोतों को डिज़ाइन किया है, जो भारत की तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।

रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) और इन्फ्रारेड सिग्नेचर कम

इस युद्धपोत की लंबाई करीब 149 मीटर होगी और इसका वज़न (डिस्प्लेसमेंट) लगभग 6,670 टन होगा। यह पोत करीब 28 नॉट्स (52 किमी/घंटा) की अधिकतम गति से चल सकेगा। इनमें स्टील्थ तकनीक का उपयोग हुआ है, जिससे इनका रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) और इन्फ्रारेड सिग्नेचर कम होता है, जिससे दुश्मन के लिए इन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता है। INS महेंद्रगिरि में आधुनिक इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम (IPMS) लगा होगा, जिससे जहाज के सभी प्रणालियों को डिजिटल रूप से नियंत्रित किया जा सकेगा। इसमें CODOG (Combined Diesel or Gas) प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें डीज़ल इंजन और गैस टरबाइन दोनों होंगे। इससे पोत को गति और दक्षता दोनों मिलती है।

कम समय में निर्माण

INS महेंद्रगिरि और अन्य युद्धपोतों को ‘इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन’ तकनीक से तैयार किया जा रहा है। इसका मतलब है कि निर्माण के दौरान ही अधिकतर उपकरणों को पहले से इंस्टॉल कर दिया जाता है, जिससे पोत को तैयार करने में समय की बचत होती है। उदाहरण के तौर पर, इसी प्रोजेक्ट के तहत बनी INS उदयगिरि को लॉन्चिंग के केवल 37 महीनों में नौसेना को सौंप दिया गया, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इसमें इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम (IPMS) लगा है, जो जहाज के सभी सिस्टम को कंट्रोल करता है। इसमें हेलीकॉप्टर डेक है, जिसमें HAL ध्रुव या सी किंग Mk. 42B जैसे हेलीकॉप्टरों को रखने की सुविधा है, जो समुद्री निगरानी और पनडुब्बी-रोधी युद्ध में मदद करते हैं।

INS महेंद्रगिरि को 1 सितंबर 2023 को मझगांव डॉक में लॉन्च किया गया था। इस समारोह में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की पत्नी सुदेश धनखड़ मुख्य अतिथि थीं। लॉन्च के बाद यह युद्धपोत अरब सागर के वेट बेसिन में खड़ा है, जहां इसकी फिटिंग और ट्रायल चल रहे हैं। फरवरी 2026 तक इसे पूरी तरह तैयार करके नौसेना को सौंप दिया जाएगा।

इससे पहले, प्रोजेक्ट 17A के तहत INS नीलगिरी को जनवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौसेना में शामिल किया था। INS उदयगिरि को 1 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया, और इसे अगस्त 2025 में कमीशन किया जाएगा। बाकी पांच युद्धपोत (हिमगिरि, तारागिरि, दुनागिरि, विंध्यगिरि, और महेंद्रगिरि) 2026 के अंत तक नौसेना में शामिल हो जाएंगे।

Zorawar Light Tank Trials: जानें भारतीय सेना कब शुरू करेगी भारत के स्वदेशी लाइट वेट टैंक जोरावर के ट्रायल्स, दूसरे प्रोटोटाइप में किए ये सुधार

Zorawar Light Tank Trials: Indian Army to Begin User Testing in August 2025 with Improved Second Prototype
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Zorawar Light Tank Trials: भारत के स्वदेशी जोरावर लाइट वेट टैंक को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इस स्वदेशी टैंक का पहला प्रोटोटाइप तैयार हो चुका है, और इसके यूजर ट्रायल्स जल्द शुरू होने जा रहे हैं। ये ट्रायल्स 12 से 18 महीनों तक चलेंगे, जिसमें टैंक को लद्दाख की बर्फीली ठंड और राजस्थान की तपती गर्मी में परखा जाएगा। इसके साथ ही, इसका दूसरा प्रोटोटाइप सितंबर 2025 तक तैयार हो जाएगा। यह टैंक भारतीय सेना को ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में मजबूती देगा। इस टैंक का नाम महान डोगरा योद्धा ‘जोरावर सिंह’ के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने हिमालय पार कर लद्दाख और तिब्बत तक विजय पताका फहराई थी।

Zorawar Tank: क्या सेना ने रिजेक्ट कर दिया है स्वदेशी जोरावर टैंक? ट्रायल्स को लेकर सेना प्रमुख ने दी बड़ी जानकारी

Zorawar Light Tank Trials: यूजर ट्रायल्स अगस्त 2025 से

जोरावर टैंक को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने मिलकर बनाया है। यह टैंक खास तौर पर लद्दाख जैसे ऊंचे और कठिन इलाकों में तैनाती के लिए बनाया गया है, जहां 2020 में चीन के साथ गलवान में हुई झड़प के बाद एलएसी पर भारी टैंक जैसे टी-72 और टी-90 को ले जाने में कई मुश्किलें आई थीं।

इसका पहला प्रोटोटाइप दिसंबर 2024 में टेस्ट किया जा चुका है। वहीं, अब इसे सेना के ट्रायल के लिए भेजा गया है। पहले प्रोटोटाइप का प्रारंभिक परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। इस दौरान टैंक की 105 मिलीमीटर बैरल, मशीन गन, और गन लॉन्च्ड एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम), मोबिलिटी, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सस्पेंशन और रडार सिस्टम की क्षमताओं की जांच होगी।

Zorawar Light Tank Trials: Indian Army to Begin User Testing in August 2025 with Improved Second Prototype
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जोरावर टैंक के यूजर ट्रायल्स अगस्त 2025 से शुरू होंगे। इन ट्रायल्स में टैंक को लद्दाख की ठंड यानी -20 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में टैंक को परखा जाएगा। वहीं, राजस्थान की तपती गर्मी 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में टैंक के एंड्युरेंस और सेंसर सिस्टम की जांच होगी। ट्रायल्स के बाद, अगर टैंक सभी मानकों पर खरा उतरता है, तो इसे 2027 तक भारतीय सेना में शामिल कर लिया जाएगा। एलएंडटी की गुजरात में मुंद्रा फैक्ट्री में टैंक का उत्पादन शुरू होगा। शुरुआत में 59 टैंकों का उत्पादन होगा, और भविष्य में 354 टैंकों की जरूरत को पूरा करने के लिए इसका उत्पादन बढ़ाया जाएगा।

जोरावर टैंक की खूबियां

जोरावर टैंक को भारतीय सेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किया गया है। यह 25 टन वजनी हल्का टैंक है, जिससे ये हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी आसानी से चढ़ सकता है। टैंक में 105 मिलीमीटर की तोप, मशीन गन, और एंटी-टैंक मिसाइलें लगी हैं। इसकी मेन गन दुश्मन के टैंकों और बंकरों को नष्ट कर सकती है।

इसमें ड्रोन कनेक्टिविटी की खूबी है। जोरावर टैंक ड्रोन से जुड़ सकता है, जिससे यह दुश्मन की प्रत्येक गतिविधियों पर नजर रख सकता है और रियल-टाइम जानकारी हासिल कर सकता है। इसमें 760 हॉर्सपावर (570 kW) का VTA903E-T760 कमिंस (Cummins) इंजन लगा है, जो इसे हाई एल्टीट्यूड वाले इलाकों में कम ऑक्सीजन की स्थिति में भी तेज रफ्तार देता है। पहले इसमें रोल्स-रॉयस की जर्मन फर्म एमटीयू के इंजन लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन देरी के चलते कमिंस इंजन चुना गया। भविष्य में इसे 1,000 हॉर्सपावर के कमिंस एडवांस्ड कॉम्बैट इंजन से बदला जाएगा। डीआरडीओ भी एक स्वदेशी इंजन विकसित कर रहा है, ताकि विदेशी निर्भरता कम हो। नया कमिंस ACE इंजन 14.3 लीटर, टू-स्ट्रोक, ओपोज्ड-पिस्टन (विपरीत दिशा में चलने वाले पिस्टन) डिजाइन पर आधारित है। इसमें पारंपरिक वाल्व सिस्टम नहीं होता, जिससे यह इंजन साइज में छोटा, ताकतवर और कम गर्मी पैदा करता है। जिससे यह खासतौर पर ऊंचाई और कम ऑक्सीजन वाले इलाकों में आसानी से चढ़ सकता है।

टैंक में मॉड्यूलर कवच (आर्मर) और एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम है, जो इसे दुश्मन के हमलों से बचाती है। साथ ही, इसमें एडवांस सेंसर और नाइट विजन सिस्टम हैं, जो रात में भी ऑपरेशन को आसान बनाते हैं। हल्के वजन और मजबूत सस्पेंशन सिस्टम के चलते यह ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों, नदियों, और झीलों को आसानी से पार कर सकता है।

दूसरे प्रोटोटाइप में किए कई सुधार

जोरावर टैंक के पहले प्रोटोटाइप के परीक्षणों के आधार पर, डीआरडीओ और एलएंडटी ने दूसरे प्रोटोटाइप में कई सुधार किए हैं। दूसरा प्रोटोटाइप एडवांस सस्पेंशन सिस्टम के साथ आएगा, जो इसे ऊंचे पहाड़ों और कठिन रास्तों पर अधिक स्थिरता और रफ्तार देगा। साथ ही, इंजन को कम ऑक्सीजन वाले खासतौर पर लद्दाख की 15,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में बेहतर प्रदर्शन के लिए ट्यून किया गया है। इसमें नए सेंसर जोड़े गए हैं, जो सैनिकों को युद्ध के मैदान में दुश्मन की स्थिति, मौसम, और इलाके की जानकारी देंगे। इससे सेना को रणनीतिक बढ़त मिलेगी। इसके अलावा टैंक का वजन कम रखा गया है ताकि इसे भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर जैसे विमानों से जल्दी से सीमा पर ले जाया जा सके।

स्वदेशी बैरल लगाने की तैयारी

जोरावर टैंक के पहले प्रोटोटाइप में बेल्जियम की Cockerill 105mm HP बैरल लगाई गई थी। वहीं, भारत इस आयातित बैरल की जगह अब स्वदेशी 105mm HP बैरल का इस्तेमाल करना चाहता है। इसके लिए डीआरडीओ के तहत आने वाला आयुध अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (ARDE) काम कर रहा है। ARDE ने स्वदेशी 105mm बैरल के डिजाइन का कार्य पूरा कर लिया है और इसके निर्माण के लिए एक इंडस्ट्रियल पार्टनर का भी चयन कर लिया गया है।

यह 105mm बैरल हाई-एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (HEAT) राउंड्स और आर्मर-पियर्सिंग फिन-स्टैबलाइज्ड डिसकार्डिंग सबोट (APFSDS) राउंड्स दाग सकेगी। सााथ ही, DRDO एक गन-लॉन्च्ड एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (GLATGM) भी बना रहा है, जिसे इस 105mm बैरल से दागा जा सकेगा। इससे टैंक की मारक क्षमता काफी बढ़ जाएगी और यह दूर तक स्थित आर्मर्ड टारगेट्स को भी आसानी से नष्ट कर सकेगा।

लद्दाख के लिए क्यों जरूरी है जोरावर?

2020 में लद्दाख की गलवान घाटी भारत-चीन तनाव के दौरान भारतीय सेना ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए हल्के टैंकों की जरूरत महसूस की। भारतीय सेना के भारी टैंकों T-72 और T-90 को वहां पहुंचाने में काफी परेशानी हुई थी। उनका वजन ज्यादा होने की वजह से उन्हें हवाई जहाजों या सीमित रोड कनेक्टिविटी के जरिए लाना मुश्किल था। वहीं, जोरावर इस कमी को दूर करेगा क्योंकि यह हल्का, तेज और ताकतवर है। दिसंबर 2024 में भारतीय वायुसेना ने सी-17 ग्लोबमास्टर या आईएल-76 के जरिए इसे एयरलिफ्ट करके दिखाया था कि जोरावर को विमान से जल्दी से लद्दाख जैसे दूर-दराज के इलाकों में पहुंचाया जा सकता है। यह टैंक ऊंचे पहाड़ों, नदियों, और कठिन इलाकों में भी आसानी से काम कर सकता है।

यह टैंक चीन के ‘टाइप-15’ लाइट टैंक को टक्कर देने के लिए डिजाइन किया गया है। टाइप-15 भी हल्का टैंक है, जिसे चीन ने हिमालयी क्षेत्रों में तैनात किया है। जोरावर उबड़-खाबड़, पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में आसानी से चल सकता है, और झीलों या नदियों के किनारे पर भी इसका इस्तेमाल किया जा सकताा है।

Indian Navy Submarines: भारतीय नौसेना को मिलेंगी 9 नई पनडुब्बियां, खास AIP तकनीक से होंगी लैस, चीन और पाकिस्तान के पास पहले से है ये टेक्नोलॉजी

India Germany Submarine Deal Project 75I
Indian Navy’s Kalvari Class Submarine - INS Vela

Indian Navy Submarines: भारत की समुद्री ताकत में बड़ा इजाफा होने जा रहा है। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में दो महत्वपूर्ण पनडुब्बी निर्माण परियोजनाओं को अंतिम रूप देने की तैयारी में है। इन दोनों प्रोजेक्ट्स के तहत कुल नौ पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा, जिससे भारतीय नौसेना की अंडरवाटर फाइटिंग कैपेबिलिटी को जबरदस्त मजबूती मिलेगी। वहीं इन पनडुब्बियों में खास AIP तकनीक की इस्तेमाल किया जाएगा।

इन दोनों परियोजनाओं की अनुमानित लागत 1.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। पहला प्रोजेक्ट ‘प्रोजेक्ट 75-इंडिया (P-75I)’ और दूसरा Project 75 ‘स्कॉर्पीन क्लास एड-ऑन’ प्रोजेक्ट है, जिसकी प्रक्रिया इस साल जनवरी में पूरी की गई थी।

मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के डायरेक्टर (सबमरीन और हेवी इंजीनियरिंग) कमोडोर एसबी जमगांवकर (रिटायर्ड) ने बताया कि P-75I के लिए कॉस्ट नेगोशिएशन कमेटी कमर्शियल और टेक्निकल शर्तों को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत शुरू करने जा रही है। वहीं तीन स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के एड-ऑन प्रोजेक्ट के लिए बातचीत पूरी हो चुकी है।

उन्होंने बताया, “हम इन दोनों प्रोजेक्ट्स को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उम्मीद है कि 31 मार्च 2026 तक दोनों समझौते साइन हो जाएंगे।”

Indian Navy Submarines: प्रोजेक्ट 75-इंडिया: खास AIP तकनीक होंगी लैस

P-75I के तहत छह नई पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा, जिसमें भारत को जर्मनी की थीसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (tkMS) कंपनी तकनीकी मदद देगी। इस परियोजना की अनुमानित लागत 70,000 करोड़ रुपये है। इन पनडुब्बियों में ‘एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन’ (AIP) तकनीक को खासतौर पर शामिल किया जाएगा, जो पारंपरिक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी के भीतर रहकर ऑपरेशन करने की क्षमता देती है। सामान्य तौर पर ऐसी पनडुब्बियों को समय-समय पर सतह पर आना पड़ता है ताकि वे ऑक्सीजन लेकर बैटरियों को चार्ज कर सकें, लेकिन AIP टेक्नोलॉजी से यह दिक्कत खत्म हो जाती है।

भारत में इस टेक्नोलॉजी पर काम चल रहा है, जबकि पाकिस्तान के पास पहले से दो एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन पनडुब्बियां हैं और उसने चीन के साथ छह और एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सबमरीन के लिए करार किया है।

Indian Navy Submarines: 9 New AIP-Enabled Subs to Boost Underwater Power
Indian Navy’s Kalvari Class Submarine – INS Vela

स्कॉर्पीन एड-ऑन प्रोजेक्ट: 3 और पनडुब्बियां बनेंगी

दूसरा प्रोजेक्ट के तहकत स्कॉर्पीन क्लास की तीन अतिरिक्त पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा। जिसकी अनुमानित लागत 36,000 करोड़ रुपये है। इनका निर्माण भी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड द्वारा ही किया जाएगा। स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियों की पिछली खेप छह यूनिट्स की थी, जिसमें से आखिरी सबमरीन INS वाघशीर (INS Vaghsheer) को जनवरी 2025 में नौसेना को सौंपा गया था। 23,500 करोड़ रुपये की लागत वाले प्रोजेक्ट 75 (P-75) के तहत ये सभी पनडुब्बियां फ्रांस की नेवल ग्रुप से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत बनाई गईं थीं। इन्हें कलवरी-क्लास (Kalvari-class) स्कॉर्पीन) डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक समबरीन के नाम से भी जाना जाता है। अब तीन और पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा, जिसके बाद भारत की समुद्री मारक क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी।

सात साल बाद डिलीवरी

P-75I के तहत पहली पनडुब्बी की डिलीवरी कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के सात साल बाद होगी। इसके बाद हर साल एक पनडुब्बी नौसेना को दी जाएगी। पहले यूनिट में 45 फीसदी स्वदेशी सामग्री होगी, जो छठी पनडुब्बी तक बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंचाई जाएगी। वहीं, स्कॉर्पीन एड-ऑन प्रोजेक्ट की पहली पनडुब्बी छह साल में और बाकी दो हर साल के हिसाब से तैयार होंगी।

एमडीएल बना सकता है 11 सबमरीन, 10 डेस्ट्रॉयर

एमडीएल के कॉर्पोरेट प्लानिंग और पर्सनल डायरेक्टर कमांडर वी पुराणिक (सेवानिवृत्त) ने बताया कि मजगांव डॉकयार्ड एक साथ 11 पनडुब्बियां और 10 विध्वंसक जहाज (destroyers) बनाने की क्षमता रखता है। इस समय सभी जरूरी स्किल्ड लेबर, सप्लाई चेन और रिसोर्सेस मौजूद हैं।

क्या है SP मॉडल?

प्रोजेक्ट 75I को रक्षा मंत्रालय के स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप (SP) मॉडल के तहत लागू किया जा रहा है। इस मॉडल के तहत, भारत की एक निजी या सरकारी कंपनी विदेशी पार्टनर के साथ मिलकर रक्षा उपकरणों का स्वदेश में निर्माण करती है। इस मॉडल के तहत थीसेनक्रुप भारत में डिजाइन और तकनीक ट्रांसफर करेगा, जिससे भारत भविष्य में अपनी पनडुब्बियों को खुद डिजाइन और डेवलप कर सकेगा।

Scorpene Submarines: समंदर में बढ़ेगी भारतीय नौसेना की ताकत, मिलेंगी तीन और स्कॉर्पीन पनडुब्बियां, 36,000 करोड़ रुपये की डील को दी मंजूरी

पनडुब्बियां समुद्र में छुप कर रहते हुए दुश्मन पर वार करने की ताकत रखती हैं। इनका स्टील्थ (छिपकर रहने की क्षमता) और अचानक हमला करने की विशेषता इन्हें घातक बनाती है। ये उन इलाकों में भी ऑपरेशन कर सकती हैं, जहां युद्धपोत नहीं पहुंच सकते। आज के समय में जब हिंद महासागर क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान अपनी नौसैनिक क्षमता बढ़ा रहे हैं, भारत की यह नई पहल सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

Shtil-1 Missile System: INS तमाल में लगा यह खास ‘शक्ति कवच’, 360 डिग्री घुम कर हर दो सेकंड में दुश्मन के 12 टारगेट्स को एक साथ कर सकता है तबाह

Shtil-1 Missile System in INS Tamal: 360° Shield That Destroys 12 Targets Every 2 Seconds

Shtil-1 Missile System: हाल ही में भारतीय नौसेना ने रूस में बने अत्याधुनिक युद्धपोत आईएनएस तमाल को अपने बेड़े में शामिल किया है। भारतीय नौसेना में शामिल होने वाला यह आखिरी वारशिप है, जिसके बाद अब सभी जहाज भारत में ही बनाए जाएंगे। आईएनएस तमाल को मॉडर्न वारफेयर की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किया गया है। आईएनएस तमाल में कई एडवांस विपंस लगे हैं, जिनमें सबसे खास है श्तिल-1 (Shtil-1) वर्टिकल लॉन्च सरफेस-टू-एयर मिसाइल (SAM) सिस्टम। यह मिसाइल सिस्टम हवाई खतरों से निपटने में बेजोड़ है और यह 360 डिग्री एंगल में चारों तरफ से आने वाले हवाई हमलों को नाकाम कर सकता है।

क्या है INS तमाल?

आईएनएस तमाल एक तुषिल-क्लास स्टील्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। आईएनएस तमाल रूस के बनाए प्रोजेक्ट 11356 फ्रिगेट क्लास का आठवां युद्धपोत है, जिसे 1 जुलाई 2025 को कमीशन किया गया। इसे रूस की सरकारी रक्षा निर्यात कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट द्वारा भारत को सौंपा गया है। आईएनएस तमाल की नींव 15 नवंबर 2013 को रखी गई थी, जब इसे रूस में एडमिरल इस्टोमिन के नाम से शुरू किया गया था। इसका निर्माण यांतर शिपयार्ड, कालिनिनग्राद में भारतीय नौसेना की विशेषज्ञों की देखरेख में हुआ है। जहाज ने 24 फरवरी 2022 को लॉन्चिंग पूरी की और नवंबर 2024 में अपने पहले समुद्री परीक्षण शुरू किए। इसने फैक्ट्री ट्रायल्स, स्टेट कमेटी ट्रायल्स और डिलीवरी एक्सेप्टेंस ट्रायल्स को जून 2025 तक पूरा किया। इन परीक्षणों में Shtil-1 मिसाइल सिस्टम, आर्टिलरी हथियारों और टॉरपीडो की फायरिंग शामिल थी।

इस 125 मीटर लंबे और 3,900 टन वजनी फ्रिगेट में 26 फीसदी से अधिक स्वदेशी उपकरण लगे हैं, जैसे कि ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, और यह भारतीय नौसेना का आखिरी विदेश निर्मित युद्धपोत है। इसका नाम भगवान इंद्र की पौराणिक तलवार के नाम पर रखा गया है और इसका आदर्श वाक्य “सर्वत्र सर्वदा विजय” (हमेशा, हर जगह विजय) है। इस पोत को 250 नौसैनिकों और 26 अधिकारियों की एक टीम ऑपरेट करती है, जिन्हें रूस में कठिन प्रशिक्षण और समुद्री परीक्षणों से गुजरना पड़ा।

Shtil-1 Missile System in INS Tamal: 360° Shield That Destroys 12 Targets Every 2 Seconds
Pic: Indian Navy

क्या है Shtil-1 Missile System:

INS तमाल में लगे ‘Shtil-1’ (श्तिल-1) मिसाइल सिस्टम को रूसी रक्षा कंपनी अल्माज-एंटी एयर एंड स्पेस डिफेंस कॉर्पोरेशन ने तैयार किया है। जो एक वर्टिकल लॉन्च यानी सीधे ऊपर की ओर दागी जाने वाली मिसाइल है, जो हवा से आने वाले किसी भी खतरे का तुरंत जवाब देने में सक्षम है। यह मिसाइल 360 डिग्री की दिशा में एक साथ 2 से 12 हवाई लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। यह क्षमता आज के समय में बहुत ही कम देशों के पास है। इस मिसाइल सिस्टम की खासियत यह है कि यह हर 2-3 सेकंड में एक मिसाइल लॉन्च कर सकता है, जिससे यह लगातार हमलों का जवाब देने में सक्षम है। यह सिस्टम पहले से मौजूद ‘बुक एम2’ मिसाइल का मरीन वर्जन है, जिसे खासतौर पर नौसेना के जहाजों पर तैनात किया जाता है।

कश्मीर शिपबोर्न सिस्टम का अपग्रेडेड वर्जन

‘Shtil-1 सिस्टम 1990 के दशक के अंत में भारत को मिले कश्मीर शिपबोर्न सिस्टम का अपग्रेडेड वर्जन है, जो पहले से ही दिल्ली-क्लास डिस्ट्रॉयर में इस्तेमाल हो रहा है। नई तकनीक के साथ यह सिस्टम अब पहले से कहीं अधिक घातक हो चुका है। कश्मीर सिस्टम को प्रोजेक्ट-15 के तहत दिल्ली-क्लास डिस्ट्रॉयर जैसे आईएनएस दिल्ली, आईएनएस मैसूर, और आईएनएस मुंबई में तैनात किया गया था।

Shtil-1 मिसाइल सिस्टम की खूबियां

श्तिल-1 (Shtil-1) मिसाइल सिस्टम में 9M317ME मिसाइल का यूज किया जाता है, जो पुरानी 9M317E मिसाइल का एडवांस वर्जन इसकी रेंज 50 किलोमीटर है जो नीचे उड़ान वाली क्रूज मिसाइलों और ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों को नष्ट कर सकती है। इसकी रफ्तार 1550 मीटर प्रति सेकंड है, जो पुराने वर्जन की 1230 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से कहीं अधिक है। वहीं, दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, एंटी-शिप मिसाइलें, हाई स्पीड बोट्स और हवाई और सतही लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। यह हर 2-3 सेकंड में एक मिसाइल दागने की क्षमता रखती है। INS तमाल पर लगा रडार सिस्टम Shtil-1 को एरियल टारगेट्स की सटीक जानकारी देता है। यह पूरा सिस्टम एक डिजिटल नेटवर्क से जुड़ा है, जिसके चलते इसका रिएक्शन टाइम बेहद कम होता है।

इस सिस्टम की खासियत है इसका मल्टी-चैनल डिजाइन। इसका मतलब है कि यह एक साथ कई मिसाइलों को अलग-अलग टारगेट की ओर गाइड कर सकता है। इसके अलावा यह सिस्टम डिजिटल सॉफ्टवेयर और नए गाइडेंस सिस्टम से लैस है जो टारगेट को पहचानकर मिसाइल को सही दिशा में भेजता है।

यह सिस्टम अकेले INS तमाल को नहीं, बल्कि इसके आसपास तैनात दूसरे जहाजों को भी हवाई सुरक्षा दे सकती है, यानी यह कलेक्टिव डिफेंस भी दे सकती है।

रूस में सफल परीक्षण

INS तमाल पर लगे Shtil-1 सिस्टम का परीक्षण बाल्टिक सागर (Baltic Sea) में सफलतापूर्वक किया गया था। इसमें रूस के विशेषज्ञों और अल्माज-एंटी कॉर्पोरेशन की टीम ने हिस्सा लिया। परीक्षणों के दौरान Shtil-1 ने सभी लक्ष्यों को सफलता से नष्ट किया। जिसके बाद आईएनएस तमाल को भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया। यह सिस्टम जहाज पर लगे रडार सिस्टम के साथ मिलकर काम करता है।

आईएनएस तमाल की अन्य खूबियां

आईएनएस तमाल में Shtil-1 के अलावा ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल लगी है, जो 450 किलोमीटर तक की रेंज के साथ जमीन और समुद्री लक्ष्यों को भेदने की क्षमता रखती है। इसकी रफ्तार 30 नॉट से अधिक है। इसमें 100 मिमी और 30 मिमी आर्टिलरी सिस्टम लगा है, जो सतही लक्ष्यों और नजदीकी हवाई खतरों से निपट सकता है। वहीं इसमें लगा एके-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम (सीआईडब्ल्यूएस) ड्रोन और एंटी-शिप मिसाइलों जैसे नजदीकी खतरों को रोकने के लिए, जो प्रति मिनट 5000 राउंड तक फायर कर सकता है। इसके अलावा इसमें टॉरपीडो और रॉकेट लॉन्चर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और कामोव-28 (पनडुब्बी-रोधी) और कामोव-31 हेलीकॉप्टरों को ऑपरेट करने के लिए हेलीपैड भी है।

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आईएनएस तमाल पश्चिमी नौसेना कमांड के तहत वेस्टर्न फ्लीट का हिस्सा है, जिसे नौसेना का तलवार बांह (स्वॉर्ड आर्म) कहा जाता है। यह अरब सागर और पश्चिमी हिंद महासागर में ऑपरेट करता है, जो पाकिस्तान के कराची नौसैनिक अड्डे के नजदीक है।

Astra BVRAAM: एस्ट्रा मिसाइल में लगाया स्वदेशी सीकर, DRDO और वायुसेना ने Su-30 MKI से किया सफल परीक्षण

Astra BVRAAM Test: DRDO & IAF Successfully Fire Indigenous Seeker-Equipped Missile from Su-30 MKI

Astra BVRAAM: भारत ने डिफेंस सेक्टर में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय वायुसेना ने 11 जुलाई 2025 को ओडिशा के तट पर सुखोई-30 एमके-आई विमान से स्वदेशी बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (BVRAAM) ‘एस्ट्रा’ का सफल उड़ान परीक्षण किया। खास बात यह थी कि इस मिसाइल में स्वदेशी रेडियो फ्रीक्वेंसी (Radio Frequency – RF) सीकर लगाया गया था। परीक्षण के दौरान दो मिसाइलें दागी गईं, और दोनों ही मामलों में मिसाइलों ने लक्ष्यों को सटीकता के साथ नष्ट कर दिया।

Astra BVRAAM: क्या है ‘अस्त्र’ मिसाइल?

‘अस्त्र’ का मतलब होता है ‘हथियार’। यह एक बीवीआरएएएम (Beyond Visual Range Air-to-Air Missile) है यानी ऐसी मिसाइल जो आंखों से न दिखने वाली दूरी से भी दुश्मन के विमान को निशाना बना सकती है। इसकी मारक क्षमता 100 किलोमीटर से अधिक है और यह अत्याधुनिक मार्गदर्शन और नेविगेशन सिस्टम से लैस है। । यानी दुश्मन के विमान को इतने फासले से भी गिराया जा सकता है कि वो आपको देख तक नहीं सकता। इसकी रफ्तार 4.5 मैक (लगभग हाइपरसोनिक) है, और यह इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स (ईसीएम) के खिलाफ भी प्रभावी है।

कैसे हुआ परीक्षण?

मिसाइल को भारतीय वायुसेना के Su-30 MKI विमान से लॉन्च किया गया। इस परीक्षण के दौरान डीआरडीओ और भारतीय वाायुसेना की टीम ने दो बार मिसाइल को दागा। दोनों बार यह बिना किसी चूक के लक्ष्य को बिल्कुल सटीकता से भेदने में सफल रही। ये दोनों लक्ष्य हाई-स्पीड, यानी बहुत तेज उड़ान भरने वाले बिना पायलट वाले हवाई टारगेट (unmanned aerial targets) थे। इनका उपयोग इसीलिए किया गया ताकि असली युद्ध जैसे हालात बनाए जा सकें।

रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर: क्या है इसकी अहमियत?

परीक्षण के दौरान सभी सबसिस्टम ने उम्मीद के मुताबिक काम किया, जिसमें डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया स्वदेशी आरएफ सीकर भी शामिल है। सीकर (Seeker) मिसाइल का वह हिस्सा होता है जो टारगेट को ट्रैक करता है और अंत तक उसका पीछा करता है। आमतौर पर हाईटेक मिसाइलों में यह हिस्सा विदेशी तकनीक पर आधारित होता है, लेकिन DRDO ने इसे भी अब पूरी तरह से स्वदेश में ही डेवलप किया है। यह रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) सीकर हवा में उड़ते लक्ष्य से निकलने वाले रेडियो सिग्नल को पकड़ता है और उसी दिशा में मिसाइल को गाइड करता है। ताकि मिसाइल अपने टारगेट से बिल्कुल न चूके। यह तकनीक अब तक केवल कुछ चुनिंदा देशों के पास ही थी।

परफॉर्मेंस रही शानदार

परीक्षण के बाद मिले आंकड़ों (फ्लाइट डेटा) से यह साबित हो गया कि मिसाइल के सभी हिस्सों यानी गाइडेंस सिस्टम, नेविगेशन, इंजन, सीकर और एक्सप्लोसिव सिस्टम ने उम्मीद के मुताबिक काम किया। डीआरडीओ के चांदीपुर इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में लगे मॉनिटरिंग सिस्टम ने हर सेकंड की जानकारी को रिकॉर्ड किया।

एस्ट्रा बीवीआरएएएम की रेंज 100 किलोमीटर से अधिक है और यह लेटेस्ट गाइडेंस और नेविगेशन सिस्टम से लैस है। इस विपन सिस्टम को डेवलप करने में डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं के अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) समेत 50 से अधिक सार्वजनिक और निजी उद्योगों ने योगदान दिया है।

रक्षा मंत्री और डीआरडीओ चेयरमैन ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि के लिए डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना और देश की रक्षा इंडस्ट्री को बधाई दी। उन्होंने कहा कि “स्वदेशी सीकर के साथ ‘अस्त्र’ मिसाइल का सफल परीक्षण भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मील का पत्थर है।”

वहीं, रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के सचिव और DRDO के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने इस पूरी टीम को बधाई दी और कहा कि यह परीक्षण भारत की तकनीकी शक्ति और वैज्ञानिकों की मेहनत का प्रतिफल है।

बता दें कि अस्त्र मिसाइल का पहला परीक्षण साल 2014 में हुआ था, लेकिन उस समय इसका सीकर विदेशी था। 2019 में इसे भारतीय वायुसेना में शामिल कर लिया गया, लेकिन फिर भी इसकी कुछ तकनीकी प्रणाली आयातित थी। अब 2025 में इसे पूरी तरह स्वदेशी बना दिया गया है। इससे पहले ‘एस्ट्रा’ को सुखोई, मिराज-2000, तेजस और मिग-29 जैसे लड़ाकू विमानों के साथ इंटीग्रेट किया जा चुकी है, ताकि यह हर मिशन में इस्तेमाल की जा सके।

इससे पहले इसी साल 12 मार्च 2025 को, ओडिशा के चांदीपुर तट पर स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस एलसीए एमके-1ए से बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (बीवीआरएएएम) ‘एस्ट्रा’ का सफल उड़ान परीक्षण किया गया था। इस परीक्षण में मिसाइल ने हाई-स्पीड हवाई लक्ष्य को सटीकता के साथ नष्ट किया।

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2022-23 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने भारत डायनामिक्स लिमिटेड को 200 एस्ट्रा मार्क-1 मिसाइलों के उत्पादन के लिए मंजूरी दी थी, जिसकी लागत 2,900 करोड़ रुपये से अधिक है। यह मिसाइल रूसी मूल की आर-77 मिसाइल का बेहतर विकल्प मानी जा रही है, जो भारतीय वायुसेना की हवाई युद्ध क्षमता को और मजबूत करेगी।

OPERATION SHIVA 2025: अमरनाथ यात्रा में यात्रियों को न हो कोई दिक्कत इसके लिए भारतीय सेना ने शुरू किया ये खास ऑपरेशन, कोई भी दुस्साहस आतंकियों को पड़ेगा भारी

Operation Shiva 2025: Indian Army’s High-Tech Security Shield to Ensure Safe Amarnath Yatra and Neutralise Terror Threats
PIC: Indian Army

OPERATION SHIVA 2025: जम्मू-कश्मीर में हर साल लाखों श्रद्धालु श्री अमरनाथ जी की पवित्र यात्रा के लिए पहुंचते हैं। इस साल 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना इस यात्रा को सुरक्षित और सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए ‘ऑपरेशन शिवा 2025’ शुरू किया है। यह अभियान नागरिक प्रशासन और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के साथ मिलकर चलाया जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के बढ़ते खतरे को देखते हुए सेना इस बार अपनी तैयारियों में कोई कोताही नहीं बरतना चाहती। भारतीय सेना की कोशिश हैं कि पवित्र गुफा के दर्शन करने आने वाले यात्रियों को किसी भी दिक्कत का सामना न करना पड़े।

OPERATION SHIVA 2025: 8,500 से ज्यादा जवानों की तैनाती

इस साल की यात्रा के लिए सुरक्षा व्यवस्था को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत किया गया है। भारतीय सेना ने 8,500 से अधिक जवानों को तैनात किया है। इसके साथ ही आतंकवाद के खतरे को रोकने के लिए काउंटर टेरर ग्रिड (Counter-Terror Grid), अत्याधुनिक तकनीक के जरिए कॉरिडोर सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। इसके अलावा, आपदा प्रबंधन और आपातकालीन स्थिति में नागरिक प्रशासन को हर संभव सहायता प्रदान की जा रही है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान समर्थित आतंकियों से हमले की आशंका को देखते हुए सेना ने एक काउंटर-टेरर ग्रिड बनाया है। इस ग्रिड के तहत यात्रा मार्गों के आसपास निगरानी, तलाशी अभियान, कॉल इंटरसेप्ट, आईईडी स्कैनिंग और ह्यूमन इंटेलिजेंस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

50 से ज्यादा काउंटर-यूएएस ड्रोन तैनात

यात्रा मार्गों को सुरक्षित रखने के लिए सेना ने 50 से ज्यादा काउंटर-यूएएस (Unmanned Aerial System) और ईडब्ल्यू (Electronic Warfare) सिस्टम तैनात किए हैं। ये सिस्टम दुश्मन ड्रोन या किसी अन्य हवाई खतरे को पहचानकर उसे निष्क्रिय करने की क्षमता रखते हैं। ड्रोन से किसी भी संभावित हमले या जासूसी की आशंका को पहले ही रोकने की तैयारियां की गई हैं।

जबकि भारतीय सेना की सिग्नल कंपनियां की कोशिश है कि कम्यूनिकेशन में कोई दिक्कत न आए, इसके लिए वे लगातार कााम कर रही हैं। ईएमई (इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियर्स) टुकड़ियां तकनीकी मदद दे कर रही हैं। इसके अलावा, बम डिटेक्शन और डिस्पोजल स्क्वॉड भी तैनात किए गए हैं।

गुफा की लाइव निगरानी

पूरे यात्रा मार्ग पर नियमित ड्रोन उड़ाए जा रहे हैं, जो पवित्र गुफा तक की निगरानी कर रही हैं। इनकी फुटेज को हाई-रेजॉल्यूशन वाले PTZ (Pan-Tilt-Zoom) कैमरों के जरिए इंटीग्रेट करके सेना हर मिनट की जानकारी रख रही है। इस लाइव मॉनिटरिंग के जरिए सुरक्षा व्यवस्था को हर समय चाकचौबंद बनाए रखने में मदद मिल रही है।

इंजीनियर टास्क फोर्स की तैनाती

इसके अलावा सेना की इंजीनियर रेजिमेंट यात्रा मार्गों की चौड़ाई बढ़ाने, पुल निर्माण और आपदा राहत के कार्यों में जुटी हैं। भारी बारिश के चलते अगर किसी भी जगह रास्ता बाधित होता है या भूस्खलन होता है तो यह टीमें तत्काल मौके पर पहुंचती हैं, और मदद मुहैया कराती हैं। रास्तों की मजबूती और वैकल्पिक मार्ग तैयार करने के काम भी तेजी से हो रहे हैं। बुलडोजर, जेसीबी और खुदाई मशीनें मौके पर रखी गई हैं ताकि तुरंत कार्रवाई हो सके।

इसकी अलावाा किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 25,000 लोगों के लिए आपातकालीन राशन, क्विक रेस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी), टेंट सिटी, वाटर पॉइंट्स और भारी मशीनरी जैसे बुलडोजर और एक्सकेवेटर भी तैयार रखे गए हैं। साथ ही, भारतीय सेना के हेलीकॉप्टरों को किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रखा गया है।

मेडिकल सुविधा में पहली बार इतनी जबरदस्त व्यवस्था

सेना ने इस बार स्वास्थ्य सेवा को भी ऑपरेशन शिवा का एक अहम हिस्सा बनाया है। ऊंचाई, ठंड, ऑक्सीजन की कमी जैसी स्थितियों से निपटने के लिए ऑक्सीजन बूथ, मेडिकल कैंप, चलते-फिरते अस्पताल और विशेष डॉक्टरों की टीम तैनात की गई है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए 150 से अधिक डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ तैनात किए गए हैं। दो अत्याधुनिक ड्रेसिंग स्टेशन, नौ मेडिकल सहायता केंद्र, एक 100 बेड का अस्पताल और 26 ऑक्सीजन बूथ स्थापित किए गए हैं। इनके लिए 2,00,000 लीटर ऑक्सीजन की व्यवस्था की गई है।

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कई एजेंसियां जुटीं

इस पूरे ऑपरेशन में सेना अकेली नहीं है। सीएपीएफ, बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, जम्मू-कश्मीर पुलिस और स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल के जरिए हर कार्य किया जा रहा है। सभी एजेंसियों के बीच रियल-टाइम कोऑर्डिनेशन की व्यवस्था की गई है, जिससे छोटी से छोटी जानकारी तुरंत साझा हो सके और बड़ी से बड़ी स्थिति से भी निपटने में देरी न हो।

Excalibur Artillery Ammunition: ऑपरेशन सिंदूर में देसी के साथ इस विदेशी हथियार ने भी दिखाया था अपना ‘कैलिबर’, 9 में 7 आतंकी ठिकाने किए थे तबाह!

Excalibur Artillery Ammunition: US-Made Precision Shells Helped Destroy 7 of 9 Terror Targets in Operation Sindoor

Excalibur Artillery Ammunition: भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ चार दिन चले ऑपरेशन सिंदूर में न केवल स्वदेशी हथियारों ने अपनी ताकत दिखाई थी, बल्कि उनमें से कुछ ऐसे विदेशी हथियार भी थे, जिन्होंने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सटीक हमला करके पाकिस्तानी सेना की कमर तोड़ दी थी। इन हथियारों से से कई अमेरिका से लिए गए थे। इन्ही में से एक हथियार था एक्सकैलिबर (Excalibur) आर्टिलरी एम्युनिशन, जिसने पाकिस्तान में जमकर तबाही मचाई। वहीं एक्सकैलिबर गोलों की सटीकता से प्रभावित होकर भारत अमेरिका से और ऐसे गोले खरीदने की योजना बना रहा है।

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Excalibur Artillery Ammunition: पीओके में जमकर बरपाया था कहर

सैन्य सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना की आर्टिलरी ने पाकिस्तान और पीओके में जमकर कहर बरपाया था और आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। इस दौरान बोफोर्स, M777 और इजराइली सॉल्टम तोपों का इस्तेमाल किया गया। ऑपरेशन से जुड़े सूत्रों ने बताया कि इस दौरान नौ आतंकी ठिकानों को टारगेट दिया गया था, जिनमें से सात को भारतीय सेना ने नष्ट किया था।

सूत्रों ने बताया, “पीओके में सात आतंकी शिविरों को खत्म करने में तोपों का बेहद सटीक और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया गया था।”

दो मीटर तक की सटीकता

सूत्रों ने बताया, इस दौरान अमेरिका से खरीदे गए एक्सकैलिबर (Excalibur) आर्टिलरी एम्युनिशन ने बेहद सटीक हमले किए थे। इनकी सटीकता का अंदाजा इसी लगा सकते हैं कि एक्सकैलिबर एक GPS-गाइडेड आर्टिलरी एम्युनिशन है, और इसकी सटीकता इतनी अधिक होती है कि यह 2 मीटर के भीतर ही लक्ष्य को भेद सकता है। भारतीय सेना ने एयर डिफेंस यूनिट के साथ मिलकर आर्टिलरी ने नियंत्रण रेखा से 6 से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सभी सात आतंकी शिविरों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया। भारतीय सेना की आर्टिलरी ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को 2019 में सेना में शामिल किए गए एक्सकैलिबर गोला-बारूद के जरिए नष्ट किए। इन गोलों को M777 हॉवित्जर से दागा गया था। यह आर्टिलरी एम्युनिशन 50 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्यों को सटीकता से भेदने में सक्षम है।

एक्सकैलिबर की क्या हैं खूबियां

एक्सकैलिबर का पहली बार इस्तेमाल 2007 में इराक में हुआ था, जहां इसने शहरी युद्ध में अपनी सटीकता साबित की। 2012 में अफगानिस्तान में, M777 हॉवित्जर ने Excalibur का इस्तेमाल कर 36 किमी की दूरी पर टारगेट को निशाना बनाया, जो मरीन कॉर्प्स के लिए रिकॉर्ड था।

M982 एक्सकैलिबर 155 मिमी तोप का गोला है, जो बहुत सटीक निशाना लगाता है। इसे अमेरिका की कंपनी Raytheon और स्वीडन की BAE Systems ने मिलकर बनाया है। यह गोला M777 जैसे लाइट आर्टिलरी हॉवित्जर से दागा जाता है। इसे खास तौर पर ऐसे युद्धों के लिए बनाया गया है कि शहरों में या सीमावर्ती इलाकों में आसपास की जगहों को नुकसान पहुंचाए बिना सटीक हमला किया जा सके।

Excalibur एक “स्मार्ट” गोला है, जो GPS और एक खास नेविगेशन सिस्टम की मदद से अपने लक्ष्य को ढूंढता है। यह सामान्य तोप के गोले से अलग है, क्योंकि यह उड़ते समय अपनी दिशा को ठीक कर सकता है। इसे M777, M109A6 पलाडिन, या अन्य आधुनिक तोपों से दागा जा सकता है। जहां सामान्य गोले 50-200 मीटर तक चूक सकते हैं, लेकिन यह मात्र 2 मीटर के भीतर ही लक्ष्य को निशाना बना सकता है।

इसकी रेंज की बात करें, तो M777 हॉवित्जर से यह 40 किलोमीटर तक मार कर सकता है। वहीं, अगर ज्यादा लंबी बैरल वाली तोप (जैसे 52-कैलिबर) हो, तो यह 50 किलोमीटर तक मार कर सकता है। जबकि कुछ खास वैरिएंट 70 किलोमीटर तक भी मार कर सकते हैं।

M777 हॉवित्जर से गोला जैसे ही निकलता है, वह एक साधारण गोले की तरह आगे बढ़ता है, लेकिन जैसे-जैसे वह अपनी अधिकतम ऊंचाई (apogee) पर पहुंचने वाला होता है, उसमें लगे छोटे-छोटे पंख (canards) अपने आप बाहर निकल आते हैं। ये पंख गोले को उड़ान के दौरान स्थिर रखते हैं और सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

इसके बाद गोला अपने अंदर लगे GPS सिस्टम से उपग्रहों से सिग्नल लेकर अपने लक्ष्य को ट्रैक करता है। अगर कभी GPS सिग्नल न मिले तो इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम भी होता है, जो गोले को उसकी दिशा और स्थिति बनाए रखने में मदद करता है। जैसे ही गोला अपने टारगेट के नजदीक पहुंचता है, तो यह लगभग सीधी दिशा (near-vertical angle) में नीचे गिरता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा असर हो। इसके अंदर लगे फ्रैग्मेंटेशन वारहेड्स यानी टुकड़ों में बिखरने वाला विस्फोटक, लक्ष्य पर गिरते ही या उसके अंदर घुसकर या हवा में एक निर्धारित ऊंचाई पर फटता है।

एक्सकैलिबर गोले में तीन तरह के फ्यूज विकल्प जैसे हाइट ऑफ बर्स्ट, पॉइंट डिटोनेशन और डिले एंड पेनिट्रेशन होते हैं। इस गोले का वजन लगभग 48 किलो होता है और यह एक खास तकनीक (base-bleed) से काम करता है। इस तकनीक में गोले के पीछे से हल्की गैस निकलती है, जिससे हवा का घर्षण कम होता है और गोला लंबी दूरी तक जा सकता है।

इतनी है एक गोले की कीमत

वहीं, इसकी कीमत की बात करें, करीब 68,000 से 100,000 डॉलर (56 लाख से 82 लाख रुपये) प्रति गोला है। यह पारंपरिक गोले (लगभग 800 डॉलर) से काफी महंगा है। एक्सकैलिबर को गाइड करने के लिए फायर सपोर्ट सेंसर सिस्टम वाला M707 नाइट व्हीकल इस्तेमाल किया जाता है, जो दुश्मन की लोकेशन, मौसम, ऊंचाई और समय जैसी जानकारियों को प्रोसेस कर गोले को अंतिम दिशा देता है। इस पूरे सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी भी दूरी पर बेहद सटीक हमला किया जा सकता है, आसपास होने वाला नुकसान बहुत कम होता है, जिससे हर टारगेट पर कम गोले खर्च होते हैं।

अमेरिका से तुरंत चाहिए एक्सकैलिबर

वहीं, इसकी सटीकता से प्रभावित हो कर भारत ने अमेरिका से एक्सकैलिबर GPS-गाइडेड एम्युनिशन की आपातकालीन खरीद का अनुरोध किया है। ये गोले M777 लाइट हॉवित्ज़र से दागे जाते हैं और 40 किलोमीटर दूर तक 15-20 मीटर की सटीकता से निशाना साध सकते हैं।

सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर ने M777 तोपों, एक्सकैलिबर गोला-बारूद और दूसरे मिलिट्री इक्विपमेंट्स का सपोर्ट मिला है, इससे यह संकेत मिलता है कि भारत अब सिर्फ भरोसे पर नहीं, बल्कि ठोस विश्वसनीयता पर जोर दे रहा है। हालांकि, इस दिशा में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिका में ट्रंप प्रशासन से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच इस प्रक्रिया को बिना प्रभावित हुए कैसे आगे बढ़ाया जाए।

इसके अलावा भारत ने अमेरिका से ‘जेवलिन’ एंटी-टैंक मिसाइलें भी तुरंत खरीदने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव पहले से चल रही डील से अलग है। फरवरी 2025 में पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान इस डील का जिक्र हुआ था।

बता दें कि भारतीय सेना ने 2019 में एक्सकैलिबर गोलों की खरीद शुरू की थी। शुरुआत में भारत ने अक्टूबर 2019 में 1,200 एक्सकैलिबर गोले खरीदे। इनमें दो प्रकार के गोले शामिल थे, 500 गोले 20 मीटर की सटीकता (Circular Error Probable, CEP) वाले। और 700-800 गोले: 2 मीटर की सटीकता वाले। वहीं, 2020 में लद्दाख में भारत-चीन के तनाव के बाद, भारतीय सेना ने जून 2021 में $9.17 मिलियन मूल्य के एक्सकैलिबर Increment Ib गोलों की खरीद की थी। ये गोले GPS जैमिंग के खिलाफ बेहद कारगर हैं।

Excalibur Artillery Ammunition: US-Made Precision Shells Helped Destroy 7 of 9 Terror Targets in Operation Sindoor
M777 155 mm light howitzers (PIC: IAF)

 

M777 सबसे हल्की फील्ड हॉवित्जर

M777 हॉवित्जर को दुनिया का सबसे हल्का 155 मिमी तोपखाना कहा जाता है, जिसका वजन लगभग 7,500 पाउंड (4218 किग्रा) होता है। इसे हेलीकॉप्टर (जैसे चिनूक) या अन्य एयरक्राफ्ट द्वारा कहीं भी ले जाया जा सकता है। यह खासकर ऊबड़-खाबड़ इलाके या ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बेहद कारगर है। इसकी अधिकतम रेंज 24.7 किमी होती है, लेकिन एक्सकैलिबर जैसे खास गोलों के जरिए 30 किमी या उससे अधिक तक निशाना साध सकती है।

M777 हॉवित्जर डील की शुरुआत 2010 में हुई थी। 30 नवंबर 2016 को भारत और अमेरिका ने 737 मिलियन डॉलर (लगभग 5500 करोड़ रुपये) की डील पर दस्तखत किए। यह सौदा अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स प्रोग्राम के तहत हुआ था। इस डील में 145 M777 तोपें, लेजर इनर्शियल आर्टिलरी पॉइंटिंग सिस्टम (LINAPS), स्पेयर पार्ट्स, ट्रेनिंग, और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल था। मई 2017 में पहली दो M777 तोपें भारत पहुंचीं। इन्हें राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में टेस्ट किया गया। जिसके बाद भारत ने 145 M777 हॉवित्जर को 2019 में शामिल किया। इस सौदे में 2020 में 25 M777 हॉवित्जर अमेरिका से पूरी तरह तैयार (रेडी-बिल्ट) अवस्था में आयात की गईं। और 2022 में 120 तोपें भारत में महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स लिमिटेड के साथ मिलकर असेंबल की। जिसका मकसद पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनाती था। भारत के पास M777 हॉवित्जर की सात रेजिमेंट्स हैं, यानी हर रेजिमेंट में 18 तोपें।

लेकिन M777 की खरीद इतनी भी आसान नहीं थी। 2014 में यह सौदा रद्द होने की कगार पर था, क्योंकि अमेरिका ने कीमत बढ़ा दी थी। 2017 में पोखरण टेस्टिंग के दौरान एक M777 की बैरल खराब हो गई थी, जिसकी वजह भारतीय ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) का गोला-बारूद बताया गया था।

M777 प्रति मिनट तेज रफ्तार से 4 राउंड (गोले) दाग सकता है। हालांकि, यह रेट केवल छोटी अवधि (1-2 मिनट) के लिए संभव है, क्योंकि इससे बैरल गर्म हो जाती है। वहीं, इसका निरंतर फायरिंग रेट प्रति मिनट 2 राउंड है।