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दिल्ली-एनसीआर में पहली बार ‘Exercise Suraksha Chakra’; भूकंप और रासायनिक खतरों से कैसे निपटेगी राजधानी? ‘सुरक्षा चक्र’ में होगा अभ्यास

Exercise Suraksha Chakra in Delhi-NCR: How India’s Capital Is Preparing for Earthquakes and Chemical Disasters
Photo By Indian Army

Exercise Suraksha Chakra: भारत की राजधानी और उसके आसपास के क्षेत्रों को भूकंप और औद्योगिक रासायनिक खतरों से सुरक्षित रखने के लिए दिल्ली छावनी स्थित मानेकशॉ सेंटर में एक अनोखा अभ्यास शुरू हुआ है। इस तीन दिवसीय आयोजन को ‘एक्सरसाइज सुरक्षा चक्र’ (Exercise Suraksha Chakra) नाम दिया गया है और इसका आयोजन दिल्ली एरिया मुख्यालय द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश की राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों (SDMAs) के सहयोग से किया जा रहा है।

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क्या है Exercise Suraksha Chakra का उद्देश्य?

इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य आपदा के समय सभी एजेंसियों सेना, सिविल प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थानों को एक मंच पर लाकर कॉर्डिनेशन स्थापित करना है। इस प्रयास के जरिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी प्राकृतिक या मानवजनित आपदा आने पर सभी एजेंसियां मिलकर जल्दी और प्रभावी रूप से कार्रवाई कर सकें।

अभ्यास में दिल्ली के 11, हरियाणा के 5 और उत्तर प्रदेश के 2 जिलों को शामिल किया गया है। यह पहली बार है जब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में इतनी बड़ी स्तर पर भूकंप और औद्योगिक रासायनिक आपदाओं से निपटने की योजना का संयुक्त अभ्यास किया जा रहा है।

29 जुलाई को शुरू हुए इस अभ्यास का पहला दिन दिल्ली-एनसीआर में आपदा खतरों और विभिन्न एजेंसियों की क्षमताओं को समझने पर केंद्रित रहा। अभ्यास के पहले दिन की शुरुआत एनडीएमए चीफ राजेन्द्र सिंह के उद्घाटन भाषण से हुई। इसके बाद पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार ने मुख्य संबोधन दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दिल्ली-एनसीआर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की तैयारी कितनी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि हमें पहले से ही कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर लेनी चाहिए और वहां पर राहत सामग्री तथा उपकरणों को पहले से ही रख देना चाहिए ताकि समय पर मदद पहुंचाई जा सके। उन्होंने रिस्क मैनेजमेंट और फास्ट रेस्पॉन्स तेज की जरूरत बताई।

Exercise Suraksha Chakra in Delhi-NCR: How India’s Capital Is Preparing for Earthquakes and Chemical Disasters
Photo By Indian Army

दिल्ली है संवेदनशील

दिल्ली एरिया के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल भवनीश कुमार ने अपने संबोधन में बताया कि दिल्ली क्षेत्र किन-किन आपदाओं के प्रति संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि दिल्ली न केवल भूकंप के खतरों का सामना करती है, बल्कि औद्योगिक क्षेत्रों में रासायनिक रिसाव, आग लगने और अन्य मानवीय लापरवाही से होने वाली आपदाएं भी चिंता का विषय हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि सभी एजेंसियां मिलकर किस प्रकार इन खतरों को कम करने के लिए काम कर रही हैं, और किस प्रकार पूर्व योजना बनाकर तैयारी की जा रही है।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और अन्य तकनीकी एजेंसियों द्वारा आधुनिक राहत और बचाव उपकरणों की प्रदर्शनी लगाई गई। इस प्रदर्शनी में ड्रोन, आधुनिक स्ट्रेचर, गैस रिसाव रोकने वाले उपकरण और जीवन रक्षक किट शामिल थीं। प्रदर्शनी से यह दिखाया गया कि भारत अब आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में कितनी तकनीकी प्रगति कर चुका है और अब हम किसी भी आपदा की स्थिति में वैज्ञानिक तरीकों से काम करने में सक्षम हैं।

टेबल टॉप अभ्यास और सिम्युलेशन

तीन दिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन टेबल टॉप एक्सरसाइज होगी, जिसमें एजेंसियां मिलकर एक ड्रिल के जरिए अपनी प्रतिक्रिया योजनाएं साझा करेंगी। इसके बाद 1 अगस्त 2025 को एक मॉक ड्रिल आयोजित की जाएगी, जिसमें सभी एजेंसियां एक साथ एक सिम्युलेटेड आपदा से निपटने की तैयारियों का प्रदर्शन करेंगी। इसमें फील्ड स्तर पर कॉर्डिनेशन, उपकरणों का इस्तेमाल, लोगों की निकासी और चिकित्सा सहायता जैसे सभी पहलुओं का अभ्यास किया जाएगा।

क्यों जरूरी है यह अभ्यास?

यह अभ्यास दिल्ली-एनसीआर जैसे घनी आबादी वाले और जोखिम भरे क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को परखने का एक अनूठा अवसर है। यह क्षेत्र भूकंप के लिए संवेदनशील है, और हाल के महीनों में जुलाई 2025 में हरियाणा के झज्जर में 3.7 और 4.4 तीव्रता के भूकंप के हल्के झटके महसूस किए गए थे। इसके अलावा, औद्योगिक रासायनिक खतरे भी इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। ‘सुरक्षा चक्र’ इन खतरों से निपटने के लिए रणनीतियों को बेहतर बनाने और संसाधनों की कमी को पहचानने में मदद करेगा।

इंस्टीट्यूशनल मैकेनिज्म को मजबूत करना

‘सुरक्षा चक्र’ केवल एक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह आपदा प्रबंधन के लिए एक इंस्टीट्यूशनल मैकेनिज्म को स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को बढ़ाने, स्थानीय स्तर की विशेषज्ञता को रणनीतिक योजना के साथ जोड़ने, और जनता को आपदा के लिए तैयार करने का प्रयास है। एनडीएमए के सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने बताया कि पिछले पांच सालों में एनडीएमए ने देश भर में 200 छोटे-बड़े मॉक अभ्यास आयोजित किए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी निर्देश दिए हैं कि देश के प्रत्येक 750 जिलों में हर तीन साल में ऐसे अभ्यास किए जाएं।

Shaktibaan Artillery Regiments: क्या है भारतीय सेना की नई ‘शक्तिबाण’ रेजीमेंट? क्या होगा इसमें खास और पारंपरिक आर्टिलरी यूनिट से कैसे होगी अलग, पढ़ें Explainer

Shaktibaan Artillery Regiments: What is Indian Army’s New ‘Shaktibaan’, How It’s Different from Traditional Artillery Units – Full Explainer
Dhanush and Bofors in Drass. Photo By Raksha Samachar

Shaktibaan Artillery Regiments: थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ के मौके पर भारतीय सेना के मॉर्डनाइजेशन को लेकर कई बड़े एलान किए। सेना प्रमुख ने एलान किया कि थलसेना को फ्यूचर रेडी फोर्स बनाने के लिए ‘रुद्र’ ऑल-आर्म्स ब्रिगेड, ‘भैरव’ लाइट कमांडो बटालियन, ‘शक्तिबाण’ आर्टिलरी रेजीमेंट, ‘दिव्यास्त्र’ बैटरियों, ड्रोन से लैस इन्फेंट्री बटालियनों और स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम की फॉर्मेशन की जा रही है। इनमें से शक्तिबाण रेजीमेंट भारतीय सेना की मॉडर्न वॉरफेयर स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, जिसमें नई टेक्नोलॉजी और हथियारों को शामिल किया जाएगा। आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं कि यह रेजीमेंट क्या है और यह कैसे काम करेगी।

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Shaktibaan Artillery Regiments: क्या है शक्तिबाण रेजीमेंट?

11.5 लाख जवानों वाली भारतीय सेना अब ‘शक्तिबाण’ आर्टिलरी रेजीमेंट की फॉर्मेशन कर रही है, जिसमें सर्विलांस के लिए ‘दिव्यास्त्र’ और लोइटरिंग म्यूनिशन बैटरियों शामिल होंगी। इसके साथ ही, दुनिया भर में जिस तरह से ड्रोन टेक्नोलॉजी की मांग बढ़ रही है, उसे देखते हुए, सेना की लगभग 400 इन्फेंट्री बटालियनों को चरणबद्ध तरीके से ड्रोन प्लाटून से लैस किया जाएगा। हर शक्तिबाण रेजीमेंट में एक ‘कंपोजिट बैटरी’ होगी, जिसमें ये सभी तकनीकें शामिल होंगी। इसका मतलब है कि इस रेजीमेंट में न केवल पारंपरिक आर्टिलरी भी शामिल होगी, बल्कि मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरतों को पूरा करने के लिए ड्रोन और दूसरी टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल करेगी।

क्यों जरूरत पड़ी Shaktibaan Regiments बनाने की?

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान ने ड्रोन के जरिये भारत में घुसपैठ करने और गोपनीय जानकारी जुटाने की कोशिश की, तो भारतीय सेना को यह एहसास हुआ कि अब सिर्फ पारंपरिक हथियारों और तकनीकों से काम नहीं चलेगा। अब युद्ध के तरीके बदल चुके हैं और दुश्मन नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। इसी चुनौती का सामना करने के लिए सेना में ‘शक्तिबाण’ जैसी आधुनिक रेजीमेंट की जरूरत महसूस हुई।

इसके साथ ही, चीन और पाकिस्तान दोनों मिल कर जिस तरह से साजिशें रच रह रहे हैं, यह भारत के लिए दोहरी चुनौती बन चुकी है। ऐसे में सेना को दोनों सीमाओं पर एक साथ तैयार रहना होता है। इसलिए अब ऐसी रेजीमेंट्स की जरूरत है जो तेजी से जवाब दे सकें, सटीक हमला कर सकें और ड्रोन जैसे नए खतरों का मुकाबला कर सकें। ‘शक्तिबाण’ रेजीमेंट इसी नई सोच और जरूरत का हिस्सा है।

क्या करेगी शक्तिबाण रेजीमेंट?

भारतीय सेना की ‘शक्तिबाण रेजीमेंट’ एक नई और खास तरह की आर्टिलरी यूनिट होगी, जिसे भविष्य के युद्धों की जरूरतों को देखते हुए तैयार किया गया है। इसका मकसद सेना को और ताकतवर, तेज और तकनीकी रूप से आधुनिक बनाना है।

1. ड्रोन से जंग की तैयारी:

रूस और यूक्रेन संघर्ष में देखा गया कि कैसे ड्रोन से सैन्य ठिकानों, टैंकों, रडार और सैनिकों को सटीक निशाना बनाकर नष्ट किया जा सकता है। भारत भी इसी दिशा में अपनी क्षमताओं को बढ़ा रहा है। शक्तिबाण रेजीमेंट न केवल ड्रोन हमले करेगी, बल्कि दुश्मन के ड्रोन को भी जाम, कन्फ्यूज या नष्ट करने में भी सक्षम होगी। इसमें ऐसे रडार और सेंसर लगाए जाएंगे, जो जो दुश्मन के ड्रोनों को ढूंढ कर उन्हें मार गिरा सकें। साथ ही, यह रेजीमेंट अपने खुद के ड्रोनों से दुश्मन की गतिविधियों पर निगरानी भी रखेगी और जरूरत पड़ने पर हमला भी करेगी।

2. ‘लॉइटर म्यूनिशन’ का इस्तेमाल:

लॉइटर म्यूनिशन एक ऐसा हथियार होता है जो उड़ता रहता है और जब सही मौका मिलता है, तब लक्ष्य पर हमला करता है। इसे ‘उड़ता हुआ बम’ कहा जा सकता है। शक्तिबाण रेजीमेंट के पास ये हथियार होंगे जो दुश्मन के छिपे ठिकानों पर अचानक हमला करने में मदद करेंगे।

3. नेटवर्क वॉरफेयर पर फोकस:

इस रेजीमेंट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल पारंपरिक आर्टिलरी रेजीमेंट नहीं होगी, बल्कि इसमें ड्रोन, सेंसर, सेटेलाइट लिंक और कंप्यूटर आधारित सिस्टम होंगे जो एक-दूसरे से कनेक्ट होंगे। इसका मतलब है कि पूरी रेजीमेंट एक नेटवर्क की तरह काम करेगी, जिससे जंग के मैदान में कहीं से भी फुर्ती और सटीक हमले किए जा सकेंगे। इस रेजीमेंट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह भारतीय सेना की बाकी टुकड़ियों से भी रीयल-टाइम (तत्काल) डेटा शेयर कर सके। उदाहरण के लिए, जब कोई ड्रोन किसी दुश्मन के ठिकाने का पता लगाएगा, तो उसकी जानकारी तोपों या मिसाइल यूनिट्स को तुरंत मिल जाएगी और वे सटीक हमला कर सकेंगी। इससे युद्ध के मैदान में तुरंत फैसला लिया जा सकेगा।

इसके अलावा, यह रेजीमेंट भारत के पहाड़ी और हाई एल्टीट्यूड इलाकों में भी काम करने में सक्षम होगी, जहां पारंपरिक हथियारों और सैनिकों की सीमाएं होती हैं।

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Photo By Raksha Samachar

स्वदेशी हथियार होंगे शामिल

शक्तिबाण रेजीमेंट में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर हथियार, तकनीक और सिस्टम भारत में ही बनाए गए हैं। इससे एक तरफ सेना की ताकत बढ़ेगी और दूसरी तरफ देश की आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा। मिसाइल सिस्टम से लेकर काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी तक, सब कुछ ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार किया जाएगा।

शक्ति, सटीकता और रफ्तार होगी पहचान

शक्तिबाण रेजीमेंट दरअसल तीन सिद्धांतो पर काम करेगी। शक्ति यानी भारी मारक क्षमता, सटीकता यानी बिल्कुल निशाने पर हमला करने की ताकत, और रफ्तार यानी बेहद तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता। यही तीन बातें इसे दुश्मनों के घातक बना देती हैं। यह एक ऐसी आर्टिलरी यूनिट है जो आज के जमाने के नए तरह के खतरों का तुरंत और सही जवाब दे सकती है। अगर दुश्मन ड्रोन के झुंड भेजता है, इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से सिस्टम को गड़बड़ करने की कोशिश करता है, या अचानक हमला करता है, तो शक्तिबाण रेजीमेंट उसे उसी समय रोकने और मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम होगी।

सेना में अभी तकरीबन 250 से ज्यादा ब्रिगेड्स हैं। इनमें से हर एक ब्रिगेड में लगभग 3,000 सैनिक होते हैं। पहले ये ब्रिगेड्स अलग-अलग काम के लिए होती थीं। जैसे कोई इन्फैंट्री यानी पैदल सेना की थी, कोई टैंकों की, कोई तोपों की। लेकिन अब इन्हें मिलाकर एक साथ लड़ने लायक बनाया जा रहा है। इसका मतलब है कि एक ही ब्रिगेड में अब पैदल सैनिक, टैंक, तोप, ड्रोन और स्पेशल फोर्स सब होंगे। इनके साथ जरूरत के मुताबिक सामान पहुंचाने वाली टीम और तकनीकी मदद भी दी जाएगी।

पहले ये अलग-अलग ब्रिगेड्स सिर्फ युद्धाभ्यास या असली जंग के समय साथ आती थीं। लेकिन अब जो ‘रुद्र ब्रिगेड्स’ बन रही हैं, वे हमेशा एक साथ तैनात रहेंगी और सीमावर्ती इलाकों में खास ऑपरेशन के लिए तैयार रहेंगी। इस योजना को मंजूरी मिल चुकी है और दो ‘रुद्र ब्रिगेड्स’ पहले ही बन चुकी हैं।

यह बदलाव उस बड़ी योजना का हिस्सा है, जिसमें सेना की कुछ यूनिट्स को पूरी तरह तैयार ‘इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स’ में बदला जाना है। इन ग्रुप्स में 5,000 से 6,000 सैनिक होंगे और इनके पास हर तरह की लड़ाई के लिए जरूरी ताकत होगी। जैसे इन्फैंट्री, टैंक, आर्टिलरी, एयर डिफेंस, सिग्नल और इंजीनियरिंग टीमें। इनका नेतृत्व मेजर जनरल जैसे सीनियर अफसर करेंगे। हालांकि इस बड़े प्रस्ताव को सरकार की अंतिम मंजूरी अभी बाकी है।

MEA grievance redressal: सरकार ने संसद में बताया, खाड़ी देशों में मजदूरों की मदद के लिए बनाई हेल्पलाइन, महिला श्रमिकों को मिलती हैं ये सुविधाएं

MEA Grievance Redressal: Helplines, Legal Aid & Support for Indian Workers in Gulf Countries
Minister of State for External Affairs, Kirti Vardhan Singh (Photo From Rajya Sabha)

MEA grievance redressal: सरकार ने लोकसभा में बताया है कि दुनियाभर की जेलों में फिलहाल 10,574 भारतीय नागरिक बंद हैं। इनमें से कई मौत की सजा का सामना कर रहे हैं, जबकि सैकड़ों लोग खाड़ी देशों में कानूनी सहायता और मदद का इंतज़ार कर रहे हैं। लोकसभा में पूछे गए दो सवालों के जवाब में विदेश मंत्रालय के राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि खाड़ी देशों में भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा, मदद और कल्याण के लिए कई हेल्पलाइन और समझौते (MoUs) सक्रिय हैं। साथ ही, श्रीलंका में बंद 28 भारतीय मछुआरों की रिहाई के लिए भी भारत लगातार प्रयास कर रहा है।

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MEA grievance redressal: खाड़ी देशों में मजदूरों के लिए हेल्पलाइन

लोकसभा में पूछे गए सवालों के जवाब में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि भारत सरकार ने खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय मजदूरों/श्रमिकों, खासकर गुजरात जैसे राज्यों से जाने वाले श्रमिकों के लिए कई तरह की सहायता सुविधाएं और शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism) स्थापित किए हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय दूतावास और मिशन मजदूरों को कई माध्यमों के जरिए मदद प्रदान करते हैं। वहां मौजूद भारतीय कामगारों को व्यक्तिगत रूप से मिलने की सुविधा (वॉक-इन), ईमेल, सोशल मीडिया, 24 घंटे उपलब्ध आपातकालीन नंबर, और MADAD व CPGRAMS जैसे ऑनलाइन शिकायत निवारण पोर्टल के जरिए मदद दी जाती है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में भारतीय मिशनों ने टोल-फ्री हेल्पलाइन, व्हाट्सएप नंबर, और मोबाइल एप शुरू किए हैं, ताकि संकट में फंसे भारतीय नागरिक आसानी से संपर्क कर सकें।

महिलाओं को स्वदेश वापसी की सुविधा

इन सुविधाओं का मकसद है कि संकट में फंसे भारतीय मजदूरों को बिना किसी देरी के मदद दी जा सके। विशेष रूप से महिला मजदूरों की सुरक्षा के लिए भारतीय दूतावासों ने कई व्यवस्थाएं की हैं। जो महिलाएं किसी मुश्किल में हैं, उन्हें ठहरने की जगह, खाना, चिकित्सा उपचार, और स्वदेश वापसी की सुविधा दी जाती है। ऐसी महिलाएं दिन के किसी भी समय दूतावास से संपर्क कर सकती हैं, और उन्हें पूरी मदद दी जाती है, जब तक कि वे सुरक्षित भारत वापस न आ जाएं। इसके अलावा, दुबई (यूएई), रियाद और जेद्दा (सऊदी अरब), और मलेशिया के कुआलालंपुर में प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र (Pravasi Bharatiya Sahayata Kendra – PBSK) भी मौजूद हैं।

प्रवासी श्रमिकों के लिए कल्याण योजनाएं

इसके अलावा, सरकार ने प्रवासी वासी भारतीय बीमा योजना (Pravasi Bharatiya Bima Yojana – PBBY) और यात्रा से पहले जागरूकता प्रशिक्षण (Pre-Departure Orientation & Training – PDOT) जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं। इन योजनाओं का लक्ष्य है कि भारतीय कामगार सुरक्षित तरीके से विदेश जाएं, वहां अच्छे काम और रहने की स्थिति पाएं, अपने अधिकारों के बारे में जागरूक हों, और सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें। इन कार्यक्रमों के तहत कामगारों को विदेश जाने से पहले प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे वहां की कानूनी और सामाजिक परिस्थितियों से परिचित हो सकें।

महिला श्रमिकों की सुरक्षा के लिए विशेष कदम

खाड़ी देशों में काम करने वाली भारतीय महिलाओं, खासकर ECR (Emigration Check Required) श्रेणी की पासपोर्ट धारक महिलाओं, के लिए सरकार ने विशेष सुरक्षा उपाय किए हैं। इनमें घरेलू क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं, जो शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। सरकार ने केवल सरकारी भर्ती एजेंसियों को ही ऐसी महिलाओं की भर्ती की अनुमति दी है, और यह प्रक्रिया e-Migrate पोर्टल के जरिए होती है। इसके अलावा, ऐसी महिलाओं के लिए विदेश में काम करने की न्यूनतम आयु 30 वर्ष निर्धारित की गई है, ताकि उनके शोषण की संभावना कम हो।

ICWF के ज़रिए कानूनी और आर्थिक सहायता

भारतीय मिशनों द्वारा संकट में फंसे भारतीय नागरिकों की मदद के लिए भारतीय समुदाय कल्याण निधि (Indian Community Welfare Fund-ICWF) का उपयोग किया जाता है। इस निधि के तहत जरूरतमंद लोगों को ठहरने की जगह, स्वदेश वापसी के लिए हवाई टिकट, कानूनी सहायता, आपातकालीन चिकित्सा, और छोटे जुर्माने का भुगतान जैसी सुविधाएं दी जाती हैं। यह निधि उन भारतीयों की मदद करती है, जो विदेश में आर्थिक या कानूनी संकट में फंस जाते हैं।

यूएई, ओमान और सऊदी अरब के साथ समझौते

भारत ने खाड़ी देशों के साथ श्रम और मानव संसाधन सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ 2018 में, ओमान के साथ 2008 में, और सऊदी अरब के साथ 2016 में हुए समझौते शामिल हैं। इन समझौतों के तहत संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group) बनाए गए हैं, जो नियमित बैठकों में कामगारों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं। ये समझौते भारतीय श्रमिकों के हितों की रक्षा और उनके कामकाजी माहौल को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन बैठकों में कामगारों की शिकायतों, काम की परिस्थितियों, और उनके अधिकारों पर विचार-विमर्श होता है।

विदेशी जेलों में 10,574 भारतीय, 43 को मौत की सजा

लोकसभा में पूछे गए एक अन्य सवाल के जवाब में सरकार ने खुलासा किया कि इस समय 10,574 भारतीय नागरिक विदेशी जेलों में बंद हैं। इनमें से 43 ऐसे हैं, जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई है। विभिन्न देशों में भारतीय कैदियों की संख्या के आंकड़े बताते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में सबसे अधिक 2,773 भारतीय कैदी हैं, इसके बाद सऊदी अरब में 2,379, कतर में 795, यूनाइटेड किंगडम में 323, कुवैत में 342, मलेशिया में 380, नेपाल में 1,357, पाकिस्तान में 246, अमेरिका में 175, और चीन में 183 भारतीय नागरिक जेलों में हैं।

मौत की सजा का सामना कर रहे 43 भारतीयों में से सबसे ज्यादा यूएई में 21, सऊदी अरब में 7, और चीन में 4 हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि कई देशों में सख्त निजता कानूनों के कारण भारतीय मिशनों को कैदियों की जानकारी प्राप्त करने में मुश्किल होती है। ये जानकारी तभी मिल पाती है, जब कैदी स्वयं इसके लिए सहमति दे।

सरकार की ओर से उठाए गए कदम

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जैसे ही किसी भारतीय के गिरफ्तार होने की जानकारी मिलती है, मिशन तत्काल वहां की सरकार से संपर्क करता है और उस व्यक्ति की स्थिति की जानकारी लेता है। मिशन यह सुनिश्चित करता है कि उस व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा हो। मिशन यह भी प्रयास करते हैं कि मुकदमा जल्द खत्म हो और यदि संभव हो तो सज़ा को माफ करवा लिया जाए। इसके अलावा, जिन देशों के साथ भारत का कैदी स्थानांतरण समझौता है, वहां कोशिश की जाती है कि सज़ा भारत में पूरी की जाए।

बनाया स्थानीय वकीलों का पैनल 

भारत ने कई देशों के साथ कैदी हस्तांतरण संधियां की हैं, जिनके तहत सजा काट रहे भारतीय अपने देश में सजा पूरी कर सकते हैं। भारतीय मिशन उन देशों में स्थानीय वकीलों का पैनल रखते हैं, जहां भारतीय समुदाय की संख्या अधिक है। इन वकीलों की मदद से कैदियों को कानूनी सहायता दी जाती है। ICWF के तहत कैदियों को कानूनी सहायता, यात्रा दस्तावेज, और स्वदेश वापसी के लिए हवाई टिकट जैसी सुविधाएं भी प्रदान की जाती हैं। भारतीय दूतावास इन सुविधाओं के लिए कोई शुल्क नहीं लेते।

श्रीलंका में 28 भारतीय मछुआरे बंद

सरकार ने यह भी बताया कि 15 जुलाई 2025 तक 28 भारतीय मछुआरे श्रीलंका की जेलों में बंद हैं। इनमें से 27 तमिलनाडु से और 1 पुडुचेरी से हैं। भारत सरकार ने बताया कि मछुआरों की सुरक्षा और कल्याण उसकी प्राथमिकता है और श्रीलंका से इनकी जल्द रिहाई की मांग लगातार उठाई जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 5 अप्रैल 2025 को श्रीलंका के राष्ट्रपति से हुई मुलाकात में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया था। भारत ने श्रीलंका से अपील की है कि इस मामले को मानवीय और आजीविका के आधार पर देखा जाए। मछुआरों से जुड़े मुद्दों को जॉइंट वर्किंग ग्रुप की बैठकों में भी उठाया जाता है, जिसमें तमिलनाडु सरकार के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। आखिरी जॉइंट वर्किंग ग्रुप बैठक 29 अक्टूबर 2024 को हुई थी। भारतीय कांसुलर अधिकारी नियमित रूप से स्थानीय जेलों और हिरासत केंद्रों का दौरा करते हैं, ताकि मछुआरों की स्थिति का जायजा लिया जाए और उनकी रिहाई और स्वदेश वापसी में मदद की जाए।

Ran Samwad 2025: बदल रही है युद्ध की तस्वीर, अब टेक्नोलॉजी से लड़ी जाएगी जंग, ट्राई सर्विसेज सेमिनार में होगी तैयारियों पर खुल कर चर्चा

Ran Samwad 2025: Tech to Shape Future Wars, Tri-Services Seminar to Discuss Preparedness
Photo: HQ IDS

Ran Samwad 2025: भारतीय सेना एक नई पहल के साथ युद्ध की बदलती रणनीति और तकनीक के प्रभाव को समझने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सेना की तीनों शाखाओं थलसेना, वायुसेना और नौसेना के संयुक्त प्रयास से ‘रण संवाद 2025’ नामक एक सेमिनार 26-27 अगस्त को आर्मी वॉर कॉलेज, महू (म.प्र.) में आयोजित की जाएगी। इस आयोजन का विषय है, ‘तकनीक का युद्ध पर प्रभाव’, जिसमें युद्ध की रणनीतियों, मिलिट्री इनोवेशंस और राष्ट्रीय सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

इस सेमिनार में सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारी, रक्षा विशेषज्ञ, स्ट्रेटेजिकल रिसर्चर्स, थिंक टैंक, शिक्षाविद और रक्षा क्षेत्र से जुड़े निजी संस्थान शामिल होंगे। इसका उद्देश्य भारत की सेनाओं को भविष्य की तकनीकी चुनौतियों के लिए तैयार करना है।

Ran Samwad 2025: तकनीक और युद्ध का पुराना रिश्ता

इतिहास बताता है कि हर युग में तकनीक ने युद्ध की दिशा और स्वरूप को बदला है – चाहे वह तलवार से बंदूक तक का सफर हो या फिर परमाणु हथियार और सैटेलाइट जासूसी की दुनिया। प्राचीन काल में लोहे के हथियारों ने युद्ध की दिशा बदली, तो मध्ययुग में बारूद और बाद में टेलीग्राफ ने युद्ध के तरीकों को नया रूप दिया। मशहूर रणनीतिकार कार्ल वॉन क्लॉजविट्ज ने कहा था, “हर युग का युद्ध अपने समय के हिसाब से अनोखा होता है।” आज हम एक ऐसे दौर में हैं, जहां एक छोटा सा साइबर कोड या ड्रोन का झुंड पूरी सेना जितना नुकसान पहुंचा सकता है।

लेकिन 21वीं सदी में युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं लड़े जाते, अब वे कंप्यूटर कोड, स्वार्म ड्रोन, साइबर हमलों और सूचना युद्ध के जरिए लड़े जा रहे हैं। रण संवाद 2025 इसी तेजी से बदलती दुनिया को समझने और उसके अनुसार खुद को तैयार करने का प्रयास है।

गोलियों से नहीं, डेटा से लड़े जा रहे हैं युद्ध

सेमिनार में यह समझने की कोशिश की जाएगी कि कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोनोमस सिस्टम, साइबर कैपेबिलिटी और अंतरिक्ष आधारित तकनीकें आज के और भविष्य के युद्धों को प्रभावित कर रही हैं। अब युद्ध केवल गोलियों से नहीं, बल्कि डेटा से भी लड़े जा रहे हैं। दुश्मन के इनफॉरमेशन सिस्टम को निशाना बनाना, फेक न्यूज फैलाना, सोशल मीडिया पर प्रभाव बनाना, ये सभी अब मॉडर्न वारफेयर का हिस्सा बन चुके हैं।

उदाहरण के तौर पर चीन की “इंटेलिजेंटाइज्ड वॉरफेयर” की रणनीति में पूरा युद्ध आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भरोसे लड़ा जाता है। ऐसे में भारत के लिए भी जरूरी हो गया है कि वह न सिर्फ इन तकनीकों को अपनाए बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता के साथ विकसित भी करे।

इस विषय के अंतर्गत जिन बिंदुओं पर चर्चा होगी, उनमें शामिल हैं:

हाल के युद्धों का अध्ययन: रूस-यूक्रेन, आर्मेनिया-अजरबैजान और इजरायल-हमास जैसे युद्धों ने दिखाया कि ड्रोन, साइबर हमले और सूचना युद्ध कितने महत्वपूर्ण हो गए हैं।
उभरती तकनीकों की पहचान: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमैटिक हथियार और साइबर क्षमताएं युद्ध को बदल रही हैं।
सूचना को हथियार बनाना: झूठी खबरें और प्रचार को तकनीक के जरिए नियंत्रित करना युद्ध का हिस्सा बन गया है।
हथियारों का तेजी से निर्माण: सैन्य उपकरणों को जल्दी डिजाइन और बनाने के लिए सिविल और मिलिट्री टेक्नोलॉजी को मिलाना होगा।
स्वचालित ड्रोन रणनीति: समुद्री और जमीनी युद्धों में स्वार्म ड्रोनों का इस्तेमाल बढ़ेगा, जिसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से और प्रभावी बनाया जा सकता है।
तकनीक का उपयोग: सेना में नई तकनीकों को लागू करने के लिए रणनीति और प्रशिक्षण की जरूरत है।

सेना के प्रशिक्षण में बदलाव की जरूरत

रण संवाद 2025 सेमिनार में इस पर भी चर्चा होगी कि जब तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है, तो क्या हमारी मिलिट्री ट्रेनिंग भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ रही है? भविष्य के युद्धों को देखते हुए अब सिर्फ बंदूक चलाना या टैंक चलाना ही पर्याप्त नहीं रह गया है। अब सैनिकों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना होगा। उदाहरण के तौर पर, अनमैन्ड व्हीकल्स का इस्तेमाल आने वाले समय में बहुत बढ़ेगा। यानी ऐसे जमीन पर चलने वाले वाहन, ड्रोन या निगरानी उपकरण जो इंसान के बिना काम करेंगे। ऐसे सिस्टम को इस्तेमाल करना और इनसे ऑपरेशन करना, इसके लिए एक पूरी नई ट्रेनिंग की जरूरत है।

इसी तरह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान और चीन के खिलाफ जो अनुभव मिले, वे अब ट्रेनिंग का हिस्सा बनाए जा रहे हैं। जैसे ऊंचे पहाड़ी इलाकों में एयर डिफेंस सिस्टम कैसे काम करता है, सीमित समय में दुश्मन पर सटीक हमला कैसे किया जाए, और दुश्मन की निगरानी से बचने के लिए किस तरह की तकनीकी रणनीति अपनाई जाए।

अब केवल जमीन पर युद्ध की सोच पर्याप्त नहीं है। आने वाले समय में अंतरिक्ष और साइबर युद्ध की भूमिका भी उतनी ही अहम होगी। इसलिए ट्रेनिंग में अब स्पेस कम्युनिकेशन यानी उपग्रह के जरिए कम्युनिकेशन, और साइबर सुरक्षा जैसे विषय भी जोड़े जा रहे हैं। सैनिकों को सिखाया जाए कि दुश्मन के हैकिंग या जासूसी के प्रयासों से कैसे बचा जाए और अपने सिस्टम को सुरक्षित कैसे रखा जाए।

इतना ही नहीं, डिजिटल सप्लाई चेन वारफेयर भी युद्ध का अहम हिस्सा है। अब दुश्मन की लॉजिस्टिक्स यानी हथियार, ईंधन, राशन आदि की आपूर्ति को कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए रोका जा सकता है। इसके लिए ऐसे विशेषज्ञ सैनिक तैयार किए जा रहे हैं जो तकनीक से दुश्मन की सप्लाई चेन को बाधित कर सकें।

कुल मिलाकर, भारतीय सेना अब ऐसी युद्ध रणनीति और प्रशिक्षण पद्धति की ओर बढ़ रही है जो सिर्फ आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाले 10–20 साल के लिए भी उपयोगी हो। रण संवाद 2025 का यही उद्देश्य है कि तीनों सेनाएं थल, जल और वायु मिलकर ऐसा ज्वाइंट ऑपरेशनल ट्रेनिंग सिस्टम बनाएं, जिसमें तकनीक और परंपरा दोनों का संतुलन हो।

ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख

भारतीय सेना द्वारा हाल ही में चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह स्पष्ट किया कि तकनीक की ताकत के बिना आधुनिक युद्ध में जीत पाना कठिन है। पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के खिलाफ तकनीकी रूप से तैयार रहना भारत के लिए अनिवार्य हो चुका है। ऑपरेशन सिंदूर में ड्रोन, एआई-आधारित निगरानी, और साइबर इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके पाकिस्तान के आधुनिक चीनी और तुर्की हथियारों का सफलतापूर्वक सामना किया गया।

Tri-Services Academia Technology Symposium: रिसर्च एंड डेवलपमेंट में सेना की नई पहल, अब डिफेंस टेक्नोलॉजी के लिए मिलकर काम करेंगे शैक्षणिक संस्थान और सेनाएं

भारत जैसे देश के लिए, जहां आमने-सामने की जंग के साथ-साथ अदृश्य खतरे (ग्रे जोन थ्रेट्स) का भी सामना करना पड़ता है, इन घटनाओं का अध्ययन जरूरी है। इस सेमिनार से सेना को यह समझने में मदद मिलेगी कि भविष्य में कैसे तैयार रहना है, किस तकनीक पर ध्यान देना है और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल कैसे बेहतर किया जाए।

Sando Top in Drass: कारगिल युद्ध की वह अहम जगह जहां से टाइगर हिल की जीत का रास्ता हुआ था तैयार, आज भी पाकिस्तान की है सीधी नजर, पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट

Sando Top in Drass: The Crucial Kargil Battlefield That Led to Tiger Hill Victory, Still Under Pakistan’s Watchful Eye – Ground Report
Tiger Hill from Sando Top. Photo By Raksha Samachar

Sando Top in Drass: हाई एल्टीट्यूड इलाके द्रास में जहां सांस लेना भी चुनौती है, वहां सैंडो टॉप जैसी सैन्य चौकी पर जवान 24 घंटे तैनात रहते हैं। यह ऐसी जगह है जहां दुश्मन की नजर सीधे इस टॉप पर हमेशा बनी रहती है। 14200 फीट की ऊंचाई पर स्थित सैंडो टॉप, टाइगर हिल के बिल्कुल नजदीक है। टाइगर हिल लद्दाख की लाइफलाइन यानी श्रीनगर-लेह राजमार्ग (नेशनल हाइवे-1) की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती है। यह वही जगह है, जहां 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस से तिरंगा फहराया था। कारगिल विजय दिवल 2025 के दौरान रक्षा समाचार को सैंडो टॉप तक जाने का मौका मिला।

Kargil Vijay Diwas 2025: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना का बड़ा कदम, रूद्र, भैरव और दिव्यास्त्र करेंगे दुश्मनों का सर्वनाश

Sando Top in Drass: सैंडो टॉप की ऊंचाई 14 हजार फीट

द्रास से सैंडो टॉप पहुंचना आसान नहीं है। द्रास लगभग 10,800 फीट की ऊंचाई पर है, जबकि सैंडो टॉप की ऊंचाई 14 हजार फीट से ज्यादा है। सैंडो टॉप तक पहुंचने के लिए कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं उपलब्ध है। सैंडो टॉप द्रास सेक्टर का हिस्सा है, और यह इलाका सेना की कड़ी निगरानी में आता है। सैंडो टॉप तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनाने का काम जारी है। लेकिन कई जगह रास्ता उबड़-खाबड़ है। लेकिन पूरा रास्ता चढ़ाई वाला है। हमें बताया गया कि सर्दियों में यह रास्ता पूरी तरह से बर्फ से ढक जाता है और द्रास से बिल्कुल कट जाता है। लगभग एक घंटे का सफर तय करके हम सैंडो टॉप पहुंचे।

माइनस 40 डिग्री तक पहुंच जाता है तापमान

सैंडो टॉप पर पहुंचते ही ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी। यहां पहुंचते ही सबसे पहले सामना तेज चलती हवा से हुआ। यहां मौसम पल भर में बदल जाता है। थोड़ा चलते ही सांस फूलने लगती है। अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे इन मुश्किल हालात में हमारी सेना के जवान यहां तैनात रहते हैं। यहां से पूरा द्रास नजर आता है। यहां से श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1) पूरी तरह से नजर आता है, जो लद्दाख की लाइफलाइन भी है। इसी लाइफलाइन को काटने के लिए पाकिस्तानी सेना ने कारगिल की चोटियों को पर कब्जा किया था। सर्दियों में यहा तापमान माइनस 40 डिग्री तक पहुंच जाता है और 15 फीट तक बर्फ जम जाती है। आगे की चौकियां (फॉरवर्ड पोस्ट) 7-8 महीनों के लिए पूरी तरह कटऑफ हो जाती हैं। इन चौकियों के लिए जरूरी सामान राशन, ईंधन और दवाइयों जैसी जरूरी चीजों को पहले ही जमा कर लिया जाता है, ताकि सैनिकों को कोई कमी न हो।

“ये दिल मांगे मोर”

सैंडो टॉप से 17000 फीट ऊंची टाइगर हिल बिल्कुल सामने दिखाई देती है। हालांकि द्रास से भी टाइगर हिल दिखती है, लेकिन कई पहाड़ियों के बीच उसे पहचान पाना मुश्किल होता है। हालाकिं लामोचेन व्यू प्वाइंट से भी टाइगर हिल दूर से दिखाई देती है। लेकिन वहां से उसकी कठिन चढ़ाई का अंदाजा लगा पाना मुश्किल होता है। सैंडो टॉप पहुंचने के बाद अहसास हुआ कि भारतीय सेना से कैसे इस दुश्कर कार्य का अंजाम दिया होगा। टाइगर हिल सिर्फ एक पहाड़ी नहीं है। बल्कि ये वो युद्धक्षेत्र है, जहां हमारे जवानों ने असंभव को संभव कर दिखाया। ठंड में ठिठुरते हुए, दुश्मन की गोलियों का सामना करते हुए हमारे देश के जवानों नामुमकिन हालातों से लड़कर भारत का तिरंगा बुलंद रखा। यही वह जगह है जहां कैप्टन विक्रम बत्रा ने बोला था “ये दिल मांगे मोर।”

Sando Top in Drass: The Crucial Kargil Battlefield That Led to Tiger Hill Victory, Still Under Pakistan’s Watchful Eye – Ground Report
Sando Valley View. Photo By Raksha Samachar

एक कंपनी करती थी 126 किलोमीटर LoC की निगरानी

कारगिल युद्ध से पहले सर्दियां आते ही यहां बनीं भारतीय पोस्टें खाली कर दी जाती थीं। जिसे सेना की भाषा में विंटर वैकेटेड पोस्ट कहा जाता है। इस दौरान लगभग छह महीने के लिए हमारे जवान नीचे मैदान में आकर मोर्चा संभालते थे। उस समय लगभग 120 जवानों की एक कंपनी 126 किलोमीटर लंबी लाइन ऑफ कंट्रोल की निगरानी करती थी। वहीं इसी तरह पाकिस्तानी सेना नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री (एनएलआई) भी सर्दियों में अपनी ऊंचाई वाली पोस्ट खाली करके नीचे आ जाती थी। कहा जा सकता है कि यह एक अघोषित समझौता था, जो सालों से चला आ रहा था। वहीं जनरल मुशर्रफ ने साजिश रची और इसका फायदा उठाते हुए पाकिस्तानी सेना ने चुपचाप यहां की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया।

घातक प्लाटून ने टाइगर हिल पर किया था कब्जा

उस समय यहां 16 ग्रेनेडियर और 8 सिख तैनात थी 121 इन्फैंट्री ब्रिगेड का हिस्सा थी। लेकिन घुसपैठियों के भेष में आए पाकिस्तानी सैनिकों को भगाने में नाकामयाब रही और काफी जानोमाल का नुकसान उठाऩा पड़ा। जिसके बाद उस समय कर्नल रहे खुशाल सिंह ठाकुर (अब रिटायर्ड ब्रिगेडियर के नेतृत्व में 18 ग्रेनेडियर यहां पहुंची। उन्होंने सैंडो टॉप जाकर दुश्मन की टोह ली और टाइगर हिल पर हमले की योजना बनाई। टाइगर हिल पर कब्जे में 18 ग्रेनेडियर की घातक प्लाटून का अहम योगदान रहा। हाड़ जमा देने वाली ठंडी हवाएं, सीधी खड़ी चट्टानें और दुश्मन की गोलीबारी के बीच लेफ्टिनेंट बलवान सिंह (अब कर्नल) के नेतृत्व में घाटक प्लाटून ने टाइगर हिल की मुश्किल चढ़ाई शुरू की। इसमें ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव जैसे वीर भी शामिल थे। रात के अंधेरे में, दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच, इन जवानों ने खड़ी चट्टानों को पार कर हमला शुरू किया। यह वही हमला था जिसने दुश्मन की ताकत तोड़ दी। ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव को 15 गोलियां लगीं। उन्हें दो ग्रेनेड हमलों में भी चोटें लगीं। अपनी जान की परवाह न करते हुए टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने में अहम भूमिका निभाई और इसके लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

Sando Top in Drass: The Crucial Kargil Battlefield That Led to Tiger Hill Victory, Still Under Pakistan’s Watchful Eye – Ground Report
Point 5353 and Aftab Gap occupied by Pakistan. Photo By Raksha Samachar

पाकिस्तान चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता

खैर बात सैंडो टॉप की करते हैं, तो सैंडो टॉप चारों दिशाओं से रिज से घिरा हुआ है। सामने की तरफ तीन रिज हैं, जिनमें टाइगर हिल रिज, त्रिशूल रिज और मार्पोला रिज। इन रिजों से ही लाइन ऑफ कंट्रोल भी गुजरती है। मार्पोला रिज में भारत और पाकिस्तान दोनों की सैन्य चौकियां हैं, और इसमें सबसे ऊंचा बिंदु है पॉइंट 5353, जो अभी भी पाकिस्तान के कब्जे में है। इस बिंदु से कुछ ही दूरी पर भारतीय पोस्ट भी मौजूद हैं। यहां दोनों सेनाएं आमने-सामने हैं। पॉइंट 5353 के नीचे थोड़ी दूरी पर भारतीय सेना की ज्ञान चौकी मौजूद है। पॉइंट 5353 के बगल में आफताब गैप है, जिस पर पाकिस्तान का कब्जा है। उसके बगल में पॉइंट 5240, पॉइंट 5130, पॉइंट 5100 हैं, जहां पर भारत बैठा है। भारतीय सेना ने पॉइंट 5353 की इस तरह से घेराबंदी कर रखी है कि यहां पाकिस्तान चाह कर अब कुछ नहीं कर सकता।

साफ दिखाई देती है हमारी गतिविधि

त्रिशूल रिज की ओर एलओसी की दूरी करीब 8 किलोमीटर है, जबकि मार्पोला रिज की तरफ से पॉइंट 5353 से केवल 1 किलोमीटर से भी कम है। इसका मतलब है कि यहां हम जो भी गतिविधि कर रहे हैं, वह दुश्मन साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए सेना की हर गतिविधि बेहद अनुशासित और रणनीतिक तरीके से होती है। हमें बताया गया कि सैंडो टॉप पर हमारी हर गतिविधि को दुश्मन साफ देख सकता है। यही वजह है कि यहां फोटोग्राफी पर सख्त पाबंदी है।

सैंडो टॉप की ऊंचाई और उसकी रणनीतिक स्थिति इसे बेहद संवेदनशील बनाती है। यहां हर कदम पर सतर्कता बरतनी पड़ती है। हमें बताया गया कि कुछ जगहें, जैसे पॉइंट 5353, नक्शे पर नहीं दिखाई देतीं और इन्हें सिर्फ लैंडमार्क के जरिए ही पहचाना जा सकता है। हमने बाइनोकुलर के जरिए रिज और चौकियों की स्थिति समझी। यहां से टाइगर रिज और ईस्टर्न रिज जैसे इलाके साफ दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ हिस्से इतने संवेदनशील हैं कि उनकी जानकारी गोपनीय रखी जाती है।

26 साल बाद भी सेना की मजबूत मौजूदगी

1999 के मुताबले सैंडो टॉप पर अब बिजली की सुविधा है और हाई-स्पीड इंटरनेट भी उपलब्ध है। यह देखकर हैरानी होती है कि इतनी ऊंचाई पर, जहां सांस लेना मुश्किल है, वहां इंटरनेट की स्पीड शहरों जैसी है। लेकिन इन सुविधाओं के बावजूद, मौसम यहां का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब हम सैंडो टॉप पहुंचे, धूप खिली थी। लेकिन 30 मिनट के भीतर ही मौसम ने ऐसी करवट ली कि काले बादल छा गए और तेज हवाएं चलने लगीं। ऐसा लगा कि अगर ज्यादा देर बाहर खड़े रहे तो हवा हमें उड़ा ले जाएगी।

सैंडो टॉप पर अब भारतीय सेना साल भर इन चौकियों पर डटी रहती है। सैंडो टॉप और आसपास की रिज पर सेना की मजबूत तैनाती है। टाइगर रिज, ईस्टर्न रिज और अन्य फर्म बेस कॉम्प्लेक्स 1999 के बाद से और मजबूत किए गए हैं। सेना की एक कंपनी अब छोटे-छोटे हिस्सों में बंटकर इलाके की सुरक्षा करती है। अब एक कंपनी को सिर्फ 13 किलोमीटर की एलओसी की जिम्मेदारी दी जाती है, जिससे किसी भी खतरे का तुरंत जवाब दिया जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी सैंडो टॉप पर पाकिस्तान की तरफ से रेकी के लिए ड्रोन आए थे, लेकिन हमारे एयर डिफेंस सिस्टम ने उन्हें नाकाम कर दिया।

Dhanush Artillery Guns: ‘स्वदेशी’ फायरपावर से लैस हुई भारतीय सेना, LAC से LOC तक ‘धनुष’ का जलवा, कैसे देश ने बोफोर्स घोटाले से लिया सबक?

Dhanush Artillery Guns: From Bofors Legacy to Atmanirbhar Bharat
Photo By Raksha Samachar

Dhanush Artillery Guns: भारतीय सेना ने कुछ साल पहले ही स्वदेश में बनी धनुष तोप को अपनी आर्टिलरी रेजीमेंट में शामिल किया है। जिसके बाद सेना की आर्टिलरी पावर में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। लद्दाख और चीन-पाकिस्तान की सीमाओं पर स्वदेशी ‘धनुष’ तोप की तैनाती अब भारतीय सेना की ताकत बनेगी। दरअसल 1980 के दशक में स्वीडन से बोफोर्स FH77B हॉवित्जर की खरीद के बाद बरसों तक बोफोर्स भ्रष्टाचार घोटाला लंबे समय तक सेना की रक्षा खरीद प्रक्रिया को प्रभावित करता रहा। जिसके चलते लंबे समय तक सेना की आर्टिलरी क्षमता को मॉर्डेनाइज नहीं किया जा सका। वहीं भारत ने इसके बाद फैसला किया वह विदेशी खरीद पर निर्भर न रह कर स्वदेश में ही हथियार बनाएगा। द्रास स्थित कारगिल बैटल स्कूल में हमें धनुष गन को नजदीक से देखने का मौका मिला, जहां इन सभी का ट्रायल और ट्रेनिंग दी जाती है और सैनिकों को हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर के लिए तैयार किया जाता है।

Dhanush Artillery Guns: बोफोर्स से आगे निकली ‘धनुष’

भारतीय सेना की आर्टिलरी क्षमता में इजाफे की शुरुआत बोफोर्स तोप से हुई थी, जिसे 1986 में स्वीडन से 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कीमत में खरीदा गया था। बोफोर्स FH77B तोप 39-कैलिबर की बैरल और करीब 27 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है। वहीं, बोफोर्स घोटाले के बाद भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देते हुए 2000 के दशक की शुरुआत में ‘फील्ड आर्टिलरी रेशनलाइजेशन प्लान (FARP)’ की शुरुआत की। इसका उद्देश्य पुराने हथियारों को हटाकर 2030 तक 3,000 से 4,000 नई 155 मिमी/52 कैलिबर की तोपों से सेना को लैस करना था। बता दें कि धनुष एक 155 मिमी/45 कैलिबर की होवित्जर (howitzer) तोप है, जिसे बोफोर्स की टेक्नोलॉजी को आधार बनाकर एडवांस बनाया गया है।

स्वदेशी निर्माण और आत्मनिर्भरता की मिसाल

भारतीय आयुध निर्माणी बोर्ड (OFB) जिसे अब अब AWEIL (Advanced Weapons and Equipment India Ltd) के नाम से जाना जाता है, उसने बोफोर्स के डिजाइन को रिवर्स-इंजीनियर करके ‘धनुष’ तोप को बनाया है। यह तोप जबलपुर की गन कैरेज फैक्ट्री में बनाई जा रही है और इसमें 81% स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है, जिसे भविष्य में 90% तक बढ़ाने का लक्ष्य है। धनुष तोप को 2016-17 में भारतीय सेना के लिए उत्पादन के लिए मंजूरी मिली। पहली धनुष तोप को आधिकारिक रूप से 2019 में सेना में शामिल किया गया, और तब से इसका उत्पादन जबलपुर के गन कैरिज फैक्ट्री में चल रहा है।

तकनीकी खूबियों से है लैस

वहीं इस तोप में बोफोर्स की सारी खूबियां तो हैं ही, बल्कि यह एडवांस टेक्नोलॉजी से भी लैस है। धनुष तोप 38 किलोमीटर तक सटीक फायर कर सकती है, जो बोफोर्स से 11 किलोमीटर ज्यादा है। इसके अलावा इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, मजल वेलोसिटी रडार (गोली की रफ्तार नापने वाला यंत्र), और कम्प्यूटर-आधारित निशाना लगाने की टेक्नोलॉजी है, जिससे निशाना लगाने का समय 30 मिनट से घटकर 2 मिनट हो जाता है। भारतीय सेना के पीआरओ कर्नल अरविंद के मुताबिक, “धनुष की सटीकता (accuracy) और समय पर फायरिंग क्षमता ने युद्ध के मैदान में हमारी ताकत को कई गुना बढ़ा दिया है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम है।”

ऑपरेशन सिंदूर में शानदार प्रदर्शन

सूत्रों ने बताया, “धनुष ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दुश्मन के ठिकानों पर सटीक प्रहार किए और ‘शूट एंड स्कूट’ (मारो और हटो) रणनीति में खुद को साबित किया।” नी दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से पहले जगह बदलने की क्षमता रखती है। इसकी सेल्फ-प्रोपल्शन क्षमता (खुद चलने की क्षमता) इसे युद्ध के बाद जल्दी स्थान बदलने में मदद करती है, जो कि पहाड़ी युद्धक्षेत्रों में अत्यंत आवश्यक होता है। यानी यह तेजी से हमला कर खुद को सुरक्षित करने में सक्षम है।

Dhanush Artillery Guns: From Bofors Legacy to Atmanirbhar Bharat
Dhanush Gun: Photo By Raksha Samachar

114 तोपों की होनी है तैनाती

भारतीय सेना के पीआरओ कर्नल निशांत अरविंद के अनुसार, “1999 के कारगिल युद्ध में बोफोर्स ने शानदार प्रदर्शन किया था, और आज भी वह हमारे तोपखाने का हिस्सा है। लेकिन धनुष, जो कि भारत में पूरी तरह से बनी है, उससे भी आगे की क्षमताएं रखती है।” उन्होंने बताया कि धनुष एक 155 मिमी, 45 कैलिबर की लंबी बैरल वाली तोप है, जिसकी रेंज बोफोर्स से कहीं अधिक है। कर्नल निशांत अरविंद के मुताबिक, सेना की एक रेजिमेंट में पहले ही 18 धनुष तोपें शामिल हो चुकी हैं, और कुल 114 तोपों की तैनाती चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर प्रस्तावित है। बता दें कि भारतीय सेना में वर्तमान में लगभग 410 बोफोर्स FH-77B तोपें हैं। जिन्हें 10,000-13,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात किया गया है।

आर्टिलरी मॉर्डेनाइजेशन में तेजी

सेना का ‘फील्ड आर्टिलरी रेशनलाइजेशन प्लान’ (FARP) पहले से ही चालू है, जिसके तहत 2030 तक लगभग 3000–4000 नई 155mm तोपों को शामिल किया जाना है। इस योजना के तहत AWEIL अब 52-कैलिबर टोड आर्टिलरी गन परियोजना की तैयारी कर रहा है। जिसके तहत 45 कैलिबर से 52 कैलिबर तोपों की ओर आगे बढ़ रहा है। कर्नल निशांत ने बताया, “अब हम मास फायरिंग (भारी संख्या में गोले दागना) की बजाय प्रिसीजन फायरिंग (सटीक निशाना) पर ध्यान दे रहे हैं। इससे सैन्य प्रभावशीलता तो बढ़ेगी ही, साथ ही गोला-बारूद की बचत भी होगी।”

वहीं, भारत अब धनुष की सफलता से उत्साहित हो कर अन्य स्वदेशी परियोजनाओं पर फोकस कर रहा है। दक्षिण कोरियाई तकनीक पर आधारित K9 वज्र को अब भारत में ही बनाया जा रहा है। इसके अलावा सेना अब 155mm/52 कैलिबर वाली नई ‘माउंटेड गन सिस्टम’ और ‘एडवांस टोइड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS)’ पर भी काम कर रही है। इससे भारत न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि भविष्य की किसी भी जंग के लिए तकनीकी रूप से तैयार भी रहेगा।

नेटवर्क युद्ध के लिए है तैयार

खास बात यह है कि धनुष को Army’s Artillery Combat Command and Control System (ACCCS) से जोड़ा गया है, जिससे सेना के सभी आर्टिलरी इक्विपमेंट्स एक नेटवर्क से जुड़ते हैं और युद्ध के दौरान रियल टाइम डाटा साझा करते हैं। यह भारतीय सेना की नेटवर्क वारफेयर का हिस्सा है। इसमें K9 वज्र तोप और माउंटेड दृष्टि सिस्टम भी शामिल हैं।

कारगिल युद्ध से लिया बड़ा सबक

कारगिल सेक्टर अब पहले से कहीं ज्यादा आधुनिक हथियारों और वाहनों से लैस है। अगर 1999 में भारतीय सेना के पास सीमित हथियार थे, तो आज भारतीय सेना 1999 की तुलना में कहीं अधिक ताकतवर और तकनीकी रूप से एडवांस है। कारगिल युद्ध ने भारत को अपनी रक्षा तैयारियों में कमियों को पहचानने का मौका दिया। उस समय की चुनौतियों ने भारत को स्वदेशीकरण के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। आज, धनुष और अन्य स्वदेशी हथियार उस सबक का परिणाम हैं।

26th Kargil Vijay Diwas: After Operation Sindoor, Indian Army Launches Rudra Brigades, Bhairav Commandos, and Divyastra Batteries to Crush Future Threats
Photo By Raksha Samachar

आज भारतीय सैनिकों के पास इजरायली नेगेव लाइट मशीन गन (LMG), स्वदेशी AK-203 राइफल और अमेरिकी SIG राइफल जैसे आधुनिक हथियार हैं। बर्फीले इलाकों में ऑपरेशन के लिए सेना को पोलारिस और स्वदेशी ‘कपित ध्वज’ जैसे ऑल-टेरेन वाहन मिले हैं, जो हाई एल्टीट्यूड और ग्लेशियरों इलाकों में तेजी से मूवमेंट में मदद करते हैं।

Kargil Vijay Diwas 2025: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना का बड़ा कदम, रूद्र, भैरव और दिव्यास्त्र करेंगे दुश्मनों का सर्वनाश

साथ ही, सेना के पास त्रिनेत्र और फर्स्ट पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन जैसे स्वदेशी निगरानी उपकरण हैं। इसके अलावा Asteria AT-15 जैसे सिस्टम भी दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखने में मदद करते हैं। यह सभी एक्विपमेंट्स कारगिल बैटल स्कूल में सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रहे हैं, जहां जवानों को हाई एल्टीट्यूड इलाकों में युद्ध और रणनीति की ट्रेनिंग दी जाती है। भारतीय सेना अब हर मोर्चे पर तैयार है, चाहे वह बर्फीली ऊंचाइयां हों या टेक्नोलॉजी से लैस युद्धभूमि। वहीं, धनुष जैसी तोपें भारत की इसी तैयारियों की मिसाल बन रही हैं। ये हथियार न केवल भारत की सैन्य ताकत को बढ़ाते हैं, बल्कि देश के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को भी दर्शाते हैं।

Kargil Vijay Diwas 2025: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना का बड़ा कदम, रूद्र, भैरव और दिव्यास्त्र करेंगे दुश्मनों का सर्वनाश

26th Kargil Vijay Diwas: After Operation Sindoor, Indian Army Launches Rudra Brigades, Bhairav Commandos, and Divyastra Batteries to Crush Future Threats
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Kargil Vijay Diwas 2025: कारगिल युद्ध की 26वीं वर्षगांठ के अवसर पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सेना की तीन नई मिलिट्री फॉर्मेशंस बनाने का एलाान किया। ये हैं रुद्र ब्रिगेड, भैरव लाइट कमांडो बटालियन और दिव्यास्त्र बैटरियां। इनका मकसद भारतीय सीमाओं की सुरक्षा को और अधिक सशक्त बनाना है, साथ ही सेना को मॉडर्न वॉरफेयर के लिए तैयार करना है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यह घोषणा द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पर की, जहां जनरल द्विवेदी ने शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी और सेना के भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया।। बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना प्रमुख पहली बार सार्वजनिक तौर पर बोले हैं।

Excalibur Artillery Ammunition: ऑपरेशन सिंदूर में देसी के साथ इस विदेशी हथियार ने भी दिखाया था अपना कैलिबर, 9 में 7 आतंकी ठिकाने किए थे तबाह!

Kargil Vijay Diwas 2025: क्या है भारतीय सेना की नई रूद्र ब्रिगेड?

भारतीय सेना आज केवल वर्तमान खतरों का मुकाबला नहीं कर रही, बल्कि खुद को एक आधुनिक और भविष्य के लिए तैयार सैन्य शक्ति के रूप में भी खुद को तेजी से ढाल रही है। इसी दिशा में सेना ने दो इन्फैंट्री ब्रिगेड को रुद्र ब्रिगेड में बदल दिया है, जिन्हें अब सीमाओं पर तैनात किया गया है। जनरल द्विवेदी ने कहा, “रुद्र ब्रिगेड हमारी सेना का भविष्य है। यह युद्ध के मैदान में हमें रणनीतिक बढ़त देगी, खासकर संवेदनशील इलाकों में।

रुद्र ब्रिगेड भारतीय सेना का नया कॉन्सेप्ट है, जिसे “ऑल आर्म्स ब्रिगेड” भी कहा जाता है। इसका मतलब है कि इसमें हर प्रकार की कॉम्बैट यूनिट्स एक साथ काम करेंगी। जैसे कि पैदल सेना (इन्फैंट्री), बख्तरबंद गाड़ियां (टैंक और आर्मर्ड व्हीकल), मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, तोपखाना (आर्टिलरी), स्पेशल फोर्स, और अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स जिनमें ड्रोन भी शामिल हैं। सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद इन्हें बनाने की जरूरत समझी गई और प्रयोग के तौर पर दो इन्फैंट्री ब्रिगेड को रुद्र ब्रिगेड मे बदला गया। संतोषजनक परिणाम मिलने के बाद इसे बनाने का आधिकारिक एलान किया गया।

इन सभी को मिलाकर एक ऐसी ब्रिगेड बनाई गई है, जो किसी भी परिस्थिति में तुरंत कार्रवाई कर सके और सीमाओं पर होने वाले खतरों का जवाब सटीक रूप में दे सके। रुद्र ब्रिगेड को खासतौर पर तैयार किया गया लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और बैटल सपोर्ट सिस्टम दिया गया है, जिससे इन्हें बॉर्डर एरिया में तैनात करना आसान हो गया है।

‘घातक’ भैरव लाइट कमांडो बटालियन

सेना प्रमुख ने बताया कि इसके साथ ही, भैरव लाइट कमांडो बटालियन का भी गठन किया गया है, जो दुश्मन को चौंकाने और सीमाओं पर तेजी से कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। भैरव बटालियन एक तेज, फुर्तीली और खतरनाक स्पेशल फोर्स यूनिट है। इसका नाम भगवान शिव के उग्र रूप ‘भैरव’ पर रखा गया है। इसका मकसद सीमाओं पर चुपके से दुश्मन के इलाकों में घुसकर टारगेट को नष्ट करना है।

26th Kargil Vijay Diwas: After Operation Sindoor, Indian Army Launches Rudra Brigades, Bhairav Commandos, and Divyastra Batteries to Crush Future Threats
Photo By Raksha Samachar

यह बटालियन आधुनिक नाईट विजन डिवाइस, MP5 सबमशीन गन और स्वदेशी ड्रोन बम से लैस किया गया है। ये सैनिक रात के अंधेरे या कोहरे में भी दुश्मन को हैरान कर सकते हैं। इन्हें पहाड़ों, बर्फीले क्षेत्रों और दुर्गम जंगलों में काम करने के लिए ट्रेन किया गया है। भैरव कमांडो दुश्मन की सप्लाई लाइन को काट सकते हैं, उनके बंकरों पर अचानक हमला कर सकते हैं और जरूरी जानकारियां जुटा सकते हैं। ये स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स रात के अंधेरे में मिशन पूरा करने के लिए बनाई गई हैं। मिसाल के तौर पर, अगर एलएसी या एलओसी पर तनाव बढ़ता है, तो भैरव कमांडो दुश्मन की सप्लाई लाइन काट सकते हैं, उनके ठिकानों को नष्ट कर सकते हैं, और तोपखाने के लिए सटीक कोर्डिनेट्स दे सकते हैं।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि भैरव यूनिट्स दुश्मन को चौंकाने और उनके मनोबल को तोड़ने का काम करेंगी। ये भारतीय सेना की विशेष क्षमताओं को नई ऊंचाई तक ले जाएंगी।

दिव्यास्त्र बैटरियां: भारतीय सेना की आर्टिलरी की नई ताकत

जनरल द्विवेदी ने कहा, “दिव्यास्त्र हमारी तोपखाने की ताकत को कई गुना बढ़ाएगा। उन्होंने बताया कि आर्टिलरी में ‘दिव्यास्त्र बैटरियों’ और लॉयटर म्युनिशन बैटरियों के जरिए भारतीय सेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया गया है। सेना की एयर डिफेंस को भी अब स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों से लैस किया जा रहा है।

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दिव्यास्त्र भारतीय सेना के आर्टिलरी सिस्टम का नया नाम है। इसमें कई अत्याधुनिक हथियार प्रणाली शामिल हैं। इसमें लॉयटर मुनिशन बैटरीज और स्वदेशी मिसाइल सिस्टम शामिल हैं। लॉयटर मुनिशन, जिन्हें ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी कहा जाता है, हवा में लंबे समय तक मंडराकर दुश्मन पर सटीक हमला कर सकते हैं। ये हथियार दुश्मन की हरकतों पर नजर रखते हैं और सही समय पर हमला करते हैं, जिससे सेना को युद्ध में बड़ी बढ़त मिलती है।

दिव्यास्त्र में आकाश और QRSAM जैसी स्वदेशी मिसाइलें भी शामिल हैं, जो एरियल अटैक का मुकाबला करती हैं। ये मिसाइलें न केवल सटीक हैं, बल्कि सस्ती भी हैं। यह भविष्य के युद्धों में गेम-चेंजर होगा।” हर पैदल सेना बटालियन में अब ड्रोन प्लाटून भी शामिल किए गए हैं, जो रियल-टाइम जासूसी और हमले में मदद करेंगे।

हर इन्फैंट्री बटालियन में ड्रोन प्लाटून

सेना प्रमुख ने यह भी बताया कि अब हर इन्फैंट्री बटालियन में अलग से एक ड्रोन प्लाटून होगी। इसका मकसद यह है कि किसी भी इलाके में दुश्मन की हलचल की तुरंत जानकारी मिल सके। ड्रोन प्लाटून के जरिए सैनिक बिना खतरे में पड़े दुश्मन की पोजिशन, मूवमेंट और हथियारों की स्थिति जान सकते हैं। यह तकनीक युद्ध के मैदान में भारतीय सेना को बड़ी बढ़त देती है।

ऑपरेशन सिंदूर पर बोले सेना प्रमुख

जनरल द्विवेदी ने हाल ही में संपन्न ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। यह ऑपरेशन उस समय चलाया गया जब जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमें 26 नागरिक मारे गए थे। जिसके जवाब में भारतीय सेना ने 6 और 7 मई की रात को पाकिस्तान और पीओजेके में 9 बड़े आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया। यह हमला इस तरह से किया गया कि किसी भी निर्दोष नागरिक की जान नहीं गई। उन्होंने कहा, यह सिर्फ जवाब नहीं था, बल्कि एक साफ संदेश था “अब जो आतंकवाद को पनाह देंगे, वे बच नहीं पाएंगे।”

उन्होंने कहा कि 7 से 9 मई के बीच पाकिस्तान ने जो सैन्य कार्रवाई की, उसका भारतीय सेना ने तुरंत और सटीक जवाब दिया। हमारी आर्मी एयर डिफेंस एक मजबूत दीवार की तरह खड़ी रही, जिसे कोई ड्रोन या मिसाइल भेद नहीं सका। यह पूरा अभियान “राष्ट्रव्यापी समन्वय” का उदाहरण था, जहां सेना, वायुसेना, नौसेना और अन्य सरकारी विभाग एकजुट होकर खड़े हुए। उन्होंने कहा कि जो भी ताकतें भारत की संप्रभुता, एकता या जनता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगी, उन्हें करारा जवाब दिया गया है, और आगे भी दिया जाएगा।

सेना प्रमुख ने शुरू की तीन नई पहल

कारगिल विजय की 26वीं वर्षगांठ के अवसर पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कारगिल युद्ध स्मारक पर तीन नई पहलों का उद्घाटन किया, जिन्हें ‘लेगेसी प्रोजेक्ट्स’ नाम दिया गया है। इन पहलों का उद्देश्य कारगिल युद्ध के नायकों की स्मृति को सहेजना और युवाओं को सैन्य इतिहास से जोड़ना है।

इंडस व्यू पॉइंट: युद्ध पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

इन परियोजनाओं में पहला है इंडस व्यू पॉइंट, जिसे बटालिक सेक्टर में स्थापित किया गया है। यहां से पर्यटक उस स्थान को देख सकते हैं जहां सिंधु नदी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में प्रवेश करती है। सेना ने इसे बैटल एरिया टूरिज्म यानी युद्ध क्षेत्र पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विकसित किया है। यह स्थान न सिर्फ रणनीतिक रूप से अहम है, बल्कि कारगिल युद्ध के दौरान कई घटनाओं का साक्षी भी रहा है।

ई-श्रद्धांजलि पोर्टल: अब शहीदों को ऑनलाइन दी जा सकेगी श्रद्धांजलि

दूसरी पहल के रूप में सेना ने ई-श्रद्धांजलि पोर्टल की शुरुआत की है। यह एक डिजिटल मंच है, जहां देश के नागरिक अब किसी भी स्थान से कारगिल युद्ध के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। यह पोर्टल न केवल भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम है, बल्कि नई पीढ़ी को शहीदों की गाथा से जोड़ने का एक प्रयास भी है।

सेना के अनुसार, यह पोर्टल देशभर के युवाओं, स्कूली छात्रों, एनसीसी कैडेट्स और आम नागरिकों को वीरगति को प्राप्त सैनिकों के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक आधुनिक माध्यम प्रदान करेगा।

QR-आधारित ऑडियो गेटवे: युद्ध स्मारक पर इतिहास अब डिजिटल रूप में

तीसरी पहल के तहत कारगिल युद्ध स्मारक पर QR-आधारित ऑडियो गेटवे लगाया गया है। इस तकनीक के जरिए स्मारक पर आने वाले लोग क्यूआर कोड स्कैन करके अपने मोबाइल फोन पर युद्ध से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां, वीर गाथाएं और ऐतिहासिक प्रसंग सुन सकते हैं। यह एक तरह का इंटरएक्टिव डिजिटल अनुभव है, जिससे युद्ध स्मारक की जानकारी और भावनात्मक असर और गहरा होगा।

युवाओं, वेटरन्स और सीमांत गांवों को जोड़ने की पहल

सेना प्रमुख ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि लद्दाख जैसे सीमांत इलाकों में सेना अब केवल सुरक्षा का काम नहीं कर रही, बल्कि विकास में भी भागीदार बन रही है। सेना की संचार प्रणाली का उपयोग अब दूरदराज के गांवों में मोबाइल नेटवर्क देने के लिए किया जा रहा है। इसके साथ ही, सीमांत गांवों में टूरिज्म को बढ़ावा देने, वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को आगे ले जाने, और स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सेना लगातार काम कर रही है।

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: एलएसी पर चीन को टक्कर देने की तैयारी, अक्टूबर तक न्योमा एयरस्ट्रिप पर लैंड कर सकेंगे मिग-29 और सुखोई-30 फाइटर जेट

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh to Host MiG-29, Su-30 Jets by October Amid China Tensions
ये फोटो 2024 में न्योमा यात्रा के दौरान खींचा गया था, उस वक्त यहां निर्माण कार्य चल रहा था। फोटो- रक्षा समाचार

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर चीन की बराबरी करने के लिए सेना की सभी अग्रिम चौकियों तक कनेक्टिविटी देने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। इसके साथ ही पूर्वी लद्दाख में स्थित रणनीतिक एयरबेस न्योमा (Nyoma) इस साल अक्टूबर तक पूरी तरह से ऑपरेशनल हो जाएगा। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन ने न्योमा में इस कच्चे रनवे को पक्का करने का काम लगभग पूरा कर लिया है। यह रनवे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर है। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि अक्टूबर 2025 तक न्योमा एयरबेस का निर्माण पूरा हो जाए।”

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Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: न्योमा में बन रहा फाइटर एयरबेस

पूर्वी लद्दाख के न्योमा (Nyoma) इलाके में स्थित मुद एयरबेस को अक्टूबर 2025 तक पूरी तरह से तैयार कर लिया जाएगा। यह एयरबेस वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर है और समुद्र तल से लगभग 11,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। न्योमा एयरबेस का निर्माण पहले से मौजूद “एडवांस लैंडिंग ग्राउंड” (Advanced Landing Ground – ALH) को अपग्रेड कर किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग 218 करोड़ रुपये है। इस एयरबेस के चालू हो जाने के बाद भारतीय वायुसेना मिग-29 (MiG-29) और सुखोई-30 एमकेआई (Su-30 MKI) जैसे लड़ाकू विमान यहां से उड़ान भर सकेंगे।

उतर सकेंगे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी

इसके अलावा, सी-130जे और एएन-32 जैसे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी यहां से नियमित रूप से सैनिकों और सामान को ले जा सकेंगे। न्योमा में हवाई अड्डे को डेवलप करने का विचार 2010 में तब सामने आया था, जब भारतीय वायुसेना ने यहां एक एएन-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को सफलतापूर्वक लैंड किया था। लेकिन 2020 में भारत-चीन सीमा विवाद के बाद इस परियोजना पर तेजी से कााम शुरू हुआ।

लद्दाख में चौथा एयरबेस

न्योमा एयरबेस के बन जाने के बाद यह लद्दाख के डाउनहिल फ्लैट प्लेन्स (नीचे के समतल क्षेत्र) में स्थित दक्षिणी क्षेत्र का पहला वायुसेना अड्डा होगा। वहीं, न्योमा की ऊंचाई अपेक्षाकृत कम है, जिससे यह फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट के लिए ज्यादाा बेहतर है।

न्योमा एयरबेस को इस तरह से डेवलप किया जा रहा है ताकि युद्ध की स्थिति में एयरलिफ्ट (वायु मार्ग से सैनिकों और उपकरणों की आवाजाही) और हमलों में तेजी लाई सके और दुश्मन को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। इसके पूरा होते ही यह लद्दाख का चौथा वायुसेना अड्डा बन जाएगा। इससे पहले लेह एक सक्रिय एयरबेस है, जबकि कारगिल और थॉईस (Thoise), जो सियाचिन के पास है, पहले से ही फुल-फ्लेज्ड हवाई पट्टियों से लैस हैं। इसके अलावा दौलत बेग ओल्डी (DBO) में एक मिट्टी का रनवे है जिसका इस्तेमाल विशेष अभियानों के लिए किया जाता है। हालांकि फुकचे (Fukche) और चुशूल (Chushul) में भी दो अन्य रनवे मौजूद हैं, जो एलएसी से मात्र 2–3 किलोमीटर की दूरी पर हैं, लेकिन युद्ध जैसे हालात में इनका इस्तेमाल संभव नहीं है।

चीन ने अपनी तरफ से 3,488 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा पर अपने हवाई अड्डों को एडवांस बनाया है। उसने रनवे को लंबा किया। इसे देखते हुए भारत सरकार ने हाल के वर्षों में एलएसी के पास स्थित सभी एयरबेस और सैन्य ठिकानों को अपग्रेड करने पर फोकस किया है। इसमें रनवे की लंबाई बढ़ाना, पक्के हैंगर बनाना और आधुनिक सुविधाएं जोड़ना शामिल है। इसका उद्देश्य चीन के मुकाबले सैन्य तैयारियों को मजबूत करना है।

BRO का लक्ष्य, हर पोस्ट तक कनेक्टिविटी

बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा, “आने वाले पांच वर्षों में भारत की सीमा पर कोई भी ऐसा हिस्सा नहीं होगा, जहां हम सेना की तैनाती न कर सकें। हमारा लक्ष्य है कि हर अग्रिम चौकी (Forward Post) तक पक्की सड़कें बनाई जाएं, जहां अभी तक पैदल रास्तों से ही पहुंचा जा सकता था।” उन्होंने बताया कि खासकर ऊंचाई वाले इलाकों में में सड़कें अब भी नहीं हैं। पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में बीआरओ प्रमुख राजमार्गों का निर्माण कर रहा है, जिससे दूर-दराज की घाटियों को एक-दूसरे से जोड़ा जा सके। अब अरुणाचल प्रदेश में फ्रंटियर हाईवे (Arunachal Frontier Highway) का निर्माण भी शुरू हो चुका है।

उन्होंने कहा, “हम चीन से पीछे नहीं रहना चाहते। अगर हमें बराबरी करनी है तो लगातार काम करते रहना होगा। पहले हम सीमा से 40 किलोमीटर पीछे थे और हमें यह तक पता नहीं होता था कि चीन क्या कर रहा है। लेकिन अब हर साल हम एक कदम आगे बढ़ रहे हैं।”

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डबल लेन सड़कें और नए हाईवे

लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने कहा, “बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन का अगला लक्ष्य है कि जहां-जहां सड़कें बन चुकी हैं, उन्हें डबल लेन (Double Lane) किया जाए ताकि सैन्य तैनाती और रसद की सप्लाई और भी तेज और सुरक्षित हो सके। अभी तक जो सड़कें सिंगल लेन हैं, उन्हें डबल लेन में बदला जाएगा ताकि सेना की बड़ी गाड़ियां भी एक साथ आवाजाही कर सकें।”

इसके अलावा अन्य बड़ी परियोजनाओं में शिंकुन ला (Shinkun La) सुरंग भी शामिल है, जो दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित सुरंग बनाई जा रही है। यह सुरंग लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के बीच पूरे साल भर संपर्क बनाए रखेगी और लद्दाख को जोड़ने वाला तीसरा वैकल्पिक मार्ग बन जाएगी।

डीबीओ तक वैकल्पिक सड़क

6,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) और डेपसांग तक वैकल्पिक सड़क अगले साल के अंत तक तैयार हो जाएगी। यह 18,000 फीट ऊंचे कराकोरम दर्रे के करीब है, जो चीन के शिनजियांग प्रांत को लद्दाख से अलग करता है। डीबीओ के पश्चिम में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) बन रहा है, और कराकोरम राजमार्ग, जो गिलगित को शिनजियांग से जोड़ता है, भी इसके नजदीक है। इस वजह से डीबीओ की सामरिक अहमियत और बढ़ जाती है।

वर्तमान में डीबीओ तक पहुंचने के लिए दारबुक-श्योक-डीबीओ (डीएसडीबीओ) सड़क का इस्तेमाल होता है, जो एलएसी के समानांतर चलती है। लेकिन कई जगहों पर इस सड़क पर चीन की सीधी नजरें रहती हैं, जिससे यह रणनीतिक रूप से कम सुरक्षित है। इस समस्या को हल करने के लिए एक वैकल्पिक सड़क बनाई जा रही है, जिसका नाम है सासोमा-सासेर ला-सासेर ब्रांग्सा-गपशन-डीबीओ। यह सड़क 2026 तक तैयार हो जाएगी और जिसके बाद सियाचिन बेस कैंप से जवानों को डीबीओ तक पहुंचने में कुछ ही घंटे लगेंगे।

अभी तक डीबीओ पहुंचने के लिए सैनिकों को लगभग दो दिन का समय लगता है, क्योंकि उन्हें पहले लेह आना पड़ता है और फिर डीएसडीबीओ मार्ग से जाना पड़ता है। नई सड़क बनने से यह समय बहुत कम हो जाएगा। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा बनाई जा रही इस सड़क में नौ पुल हैं, जो अभी 40 टन तक के वाहनों को ले जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, इन पुलों को क्लास-70 पुलों में बदला जाएगा, ताकि टैंक जैसे भारी सैन्य वाहनों की भी आवाजाही हो सके।

सासेर ला के नीचे सुरंग की योजना

नई सड़क मार्च से नवंबर तक चालू रहेगी, लेकिन सर्दियों में भारी बर्फबारी के चलते इसे बंद करना पड़ सकता है। इस समस्या को हल करने के लिए 17,800 फीट ऊंचे सासेर ला के नीचे एक सुरंग बनाने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। अगर सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो इस सड़क को पूरा करने में चार से पांच साल लग सकते हैं। इस सुरंग के बनने से डीबीओ तक साल भर पहुंच संभव हो जाएगी, और भारत को दो रास्तों से इस महत्वपूर्ण ठिकाने तक पहुंचने का विकल्प मिलेगा।

Sasoma-DBO Road: चीन की नजरों में आए बिना डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी में तेजी से तैनात हो सकेगी भारतीय सेना, 2026 के आखिर तक तैयार हो जाएगा नया रूट

Sasoma–DBO Road to Boost Army Access to Depsang Without Chinese Surveillance, Operational by End of 2026

Sasoma-DBO Road: पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) को कनेक्ट करने के लिए एक वैकल्पिक सड़क मार्ग के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है और इसके अक्टूबर-नवंबर 2026 तक पूरी तरह से शुरू होने की उम्मीद है। यह नया मार्ग ससोमा-सासेर ला-सासेर ब्रंगसा–गपशान-डीबीओ के रूट पर बनाया जा रहा है और यह मौजूदा दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) सड़क के लगभग समानांतर है। इस सड़क मार्ग को बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन बना रहा है। अभी तक भारतीय सेना दौलत बेग ओल्डी तक पहुंचने के लिए दरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड का ही इस्तेमाल कर रही है, लेकिन इसके कई हिस्सों पर चीन की सीधी नजर है।

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Sasoma-DBO Road: नई सड़क की क्या है खूबियां

यह वैकल्पिक मार्ग करीब 130 किलोमीटर लंबा होगा, जिसमें कुल 9 पुल होंगे जो 40 टन भार वहन कर सकेंगे। वहीं, मौजूदा दरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड 255 किलोमीटर लंबी है और इसमें 37 पुल हैं। नए मार्ग के बन जाने से लेह से दौलत बेग ओल्डी की दूरी 322 किलोमीटर से घटकर 243 किलोमीटर रह जाएगी और सफर का समय दो दिन से घटकर केवल 11–12 घंटे ही रह जाएगा। इनमें ससोमा–सासेर ला (52.4 किमी), सासेर ला–सासेर ब्रंगसा (16 किमी), सासेर ब्रंगसा–मुरगो (18 किमी) और सासेर ब्रंगसा–गपशन की दूरी 41.97 किमी है।

सूत्रों के अनुसार, “सूत्रों ने बताया, “ससोमा से सासेर ब्रांग्सा तक का काम पूरा हो चुका है और इसके आगे पूर्व की ओर, मुरगो और गपशान तक, 70 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो चुका है। हमें भरोसा है कि अगले साल अक्टूबर-नवंबर तक यह पूरा मार्ग चालू हो जाएगा।”

सूत्रों के अनुसार, 255 किलोमीटर लंबी डीएसडीबीओ सड़क 16,614 फीट की ऊंचाई पर दौलत बेग ओल्डी यानी डीबीओ में समाप्त होती है, जो 18,700 फीट ऊंचे कारोकारम पास से लगभग 20 किलोमीटर पहले है।

क्यों जरूरी है यह रोड

यह मार्ग सेना के लिए वैकल्पिक कम्यूनिकेशन लाइन तैयार करेगा, जिससे सैनिकों और हथियारों की फटाफट तैनाती की जा सकेगी। इसके अलावा सियाचिन क्षेत्र के लिए भी यह रास्ता अहम होगा, क्योंकि यह ससोमा से निकलता है जो नुब्रा घाटी में सियाचिन बेस कैंप के रास्ते में पड़ता है। ससोमा लेह से सियाचिन बेस कैंप के रास्ते पर पड़ता है। सूत्रों ने बताया, “इस मार्ग पर सासेर ब्रांग्सा तक लगभग सभी तरह के आर्टिलरी की लोड कैपेसिटी का परीक्षण पहले ही किया जा चुका है। इनमें बोफोर्स भी शामिल है।”

सूत्रों ने यह भी बताया, यहां मौजूद 40 टन क्षमता वाले पुलों को अब 70 टन में बदला जा रहा है, जिससे भारी बख्तरबंद वाहनों की तैनाती संभव होगी।

नया सड़क मार्ग ससोमा से शुरू हो कर वहां से यह सासेर ला (17,800 फीट ऊंचा दर्रा) और फिर नीचे उतरकर सासेर ब्रंगसा तक जाता है। यह स्थान पुराने समय में कश्मीर-शिनजियांग व्यापार मार्ग पर एक अस्थायी कैंपिंग साइट थी। यहां से सड़क दो दिशाओं में जाती है: एक रास्ता पूर्व की ओर मुरगो जाता है, तो दूसरा रास्ता उत्तर-पूर्व की ओर गपशान की ओर बढ़ता है। फिर आखिर में दोनों रास्तों का अंत वर्तमान 255 किलोमीटर लंबी दरबुक–श्योक–डबो (DSDBO) सड़क से अलग-अलग स्थानों पर होता है।

सुरंग बनाने की भी है योजना

सूत्रों ने बताया, इस हमारी तैयारी है कि इस सड़क मार्ग को हर मौसम के लिए उपयोगी बनाया जाए। इसके लिए बॉर्डर रोड आर्गेनइजेशन की सासेर ला पर 8 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने की भी योजना है, जो 17,660 फीट की ऊंचाई पर बनेगी। सुरंग बनने के बाद यह रास्ता बारी बर्फबारी में भी खुला रहेगा। फिलहाल यह सुरंग को लेकर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report) तैयार की जा रही है, और इस सुरंग परियोजना के बनने में 4–5 साल लग सकते हैं।

प्रोजेक्ट हिमांक और प्रोजेक्ट विजयक पर जिम्मेदारी

लद्दाख में महत्वपूर्ण सड़कों के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी बीआरओ के पास है। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) की दो परियोजनाएं प्रोजेक्ट हिमांक और प्रोजेक्ट विजयक इस कार्य की जिम्मेदारी निभा रही हैं। भारत पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ 832 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) साझा करता है। ससोमा से सासेर ब्रांग्सा तक का निर्माण कार्य बीआरओ के प्रोजेक्ट विजयक द्वारा किया जा रहा है, जिसमें 300 करोड़ रुपये की लागत आई है। सासेर ब्रांग्सा से डीबीओ तक सड़क और पुलों का निर्माण बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक द्वारा किया जा रहा है, जिसकी लागत 200 करोड़ रुपये है।

इस सड़क मार्ग के बन जाने के बाद डीबीओ और दूसरी फॉरवर्ड पोस्टों पर सैनिकों, हथियारों और रसद की आवाजाही आसान हो जाएगी, क्योंकि सियाचिन बेस कैंप पास में है। सियाचिन बेस कैंप हाई एल्टीट्यूड और कम ऑक्सीजन स्तर के चलते तैनाती से पहले सैनिकों के लिए एक्लिमटाइजेशन का तीसरा फेज है।

मई 2020 में भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ने के बाद इस वैकल्पिक मार्ग की जरूरत समझी गई और इसके निर्माण की योजना बनाई गई। गलवान घाटी उसी इलाके में है जहां से मौजूदा डीएसडीबीओ सड़क गुजरती है और इस इलाके में चीनी सेना की सीधी निगरानी रहती है। इस सड़क निर्माण को मई 2022 के बाद गति मिली जब राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife) ने इस नए मार्ग को काराकोरम वन्यजीव अभयारण्य (Karakoram Wildlife Sanctuary) के 55 हेक्टेयर क्षेत्र से होकर गुजरने की अनुमति दी। यह स्वीकृति इस मार्ग के सामरिक महत्व को देखते हुए दी गई, क्योंकि मौजूदा DSDBO मार्ग किसी आपातकाल में खतरे की स्थिति में आ सकता है।

डेपसांग में सबसे ऊंचा एयरफील्ड

डेपसांग क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सियाचिन और दौलत बेग ओल्डी एयरफील्ड से जुड़ा हुआ है, जो विश्व का सबसे ऊंचा एयरफील्ड है, जिसकी ऊंचाई 16,614 फीट (5,065 मीटर) है। इस क्षेत्र में भारी बख्तरबंद गाड़ियों की आवाजाही संभव है और चीन की कई सड़कें यहां तक पहुंच रखती हैं, जबकि भारत के पास केवल डीएसडीबीओ मार्ग ही था। वहीं, इस नए वैकल्पिक सड़क मार्ग के बनने से पूर्वी लद्दाख के सब सेक्टर नॉर्थ (Sub-Sector North-SSN) के डेपसांग प्लेंस और दौलत बेग ओल्डी जैसे अहम क्षेत्रों तक पहुंच आसान होगी।

LAC से सटे इस इलाके में 65 पेट्रोलिंग पॉइंट

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) से सटे इस इलाके में कुल 65 पेट्रोलिंग पॉइंट हैं, जो काराकोरम पास से लेकर डेमचोक तक फैले हुए हैं। डेपसांग में अक्टूबर 2024 में हुए सैन्य गतिरोध के दौरान चीन ने पांच पेट्रोलिंग पॉइंट 10, 11, 11A, 12 और 13 तक भारतीय सेना की पहुंच को रोक दिया था। इन पांच पॉइंट्स का कुल क्षेत्रफल लगभग 952 वर्ग किलोमीटर है। ये सभी पॉइंट्स रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माने जाते हैं, क्योंकि ये भारत की सीमा के अंदर होते हुए भी एलएसी के करीब हैं और चीनी गतिविधियों को रोकने के लिए यहां लगातार पेट्रोलिंग की जरूरत है।

TRF Terrorist Designation: आईएसआई और लश्कर की कठपुतली द रेजिस्टेंस फ्रंट पर बड़ी चोट! अमेरिका ने लगाया ग्लोबल टेरेरिस्ट का ठप्पा, पहलगाम हमले के बाद आईबी और रॉ पर मढ़े थे ये आरोप

TRF Terrorist Designation: US Declares ISI-Backed Lashkar Proxy a Global Threat After Pahalgam Attack, Exposes False Flag Claims Against RAW and IB

TRF Terrorist Designation: 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए नरसंहार के बाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ भारत की बात को गंभीरता से सुना जा रहा है। अमेरिका ने ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ यानी TRF को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ (Foreign Terrorist Organization- FTO) और ‘वैश्विक आतंकवादी संस्था’ (Specially Designated Global Terrorist Entity) घोषित कर दिया है। भारत पहले ही जनवरी 2023 में गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत आतंकवादी संगठन करार दे चुका है। द रेजिस्टेंस फ्रंट को लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन माना जाता है, जो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारों पर काम करता है। इसके द्वारा की गई ज्यादातर आतंकी गतिविधियों का लक्ष्य आम नागरिक, अल्पसंख्यक, पर्यटक और सुरक्षाबल रहे हैं।

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पहलगाम हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी, और यह भारत में 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद सबसे बड़ा आतंकवादी हमला माना गया था।

TRF Terrorist Designation: क्या कहा अमेरिका ने अपने आधिकारिक बयान में

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि द रेजिस्टेंस फ्रंट को आतंकी संगठन घोषित करने का फैसला अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस नीति’ का हिस्सा है। उन्होंने साफ कहा कि यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसमें उन्होंने पहलगाम हमले के दोषियों को न्याय दिलाने का वादा किया था।

बयान में कहा गया है कि “यह कदम अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा, आतंकवाद से लड़ने और पहलगाम हमले के लिए न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।”

इन नामों पर भी निगरानी

इस फैसले में लश्कर-ए-तैयबा के द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF), कश्मीर रेसिस्टेंस फ्रंट और कश्मीर रेसिस्टेंस को भी शामिल किया गया है। रूबियो के मुताबिक यह फैसला प्रशासनिक रिकॉर्ड की जांच और अटॉर्नी जनरल व ट्रेजरी सेक्रेटरी से सलाह के बाद लिया गया। इसकी जानकारी भी फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित की जाएगी।

TRF Terrorist Designation: क्या है कानूनी आधार?

द रेजिस्टेंस फ्रंट को आतंकी संगठन घोषित करने की प्रक्रिया अमेरिका के इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट की धारा 219 के तहत की गई है। इसके साथ ही, एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 13224 के तहत इसे SDGT की सूची में भी डाला गया है। इससे टीआरएफ और उससे जुड़े किसी भी अन्य नाम या इकाई की संपत्ति अमेरिका में जब्त हो सकती है, साथ ही फंडिंग भी रोक दी जाती है, और कोई भी व्यक्ति या संस्था टीआरएफ से संपर्क रखने पर कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकता है। FTO और SDGT घोषणा के तहत, टीआरएफ और इसके सदस्यों की संपत्ति को जब्त किया जा सकता है, और उनकी यात्रा और वित्तीय लेन-देन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

साथ ही टीआरएफ के नेताओं के खिलाफ इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो सकते हैं, और जो भी देश टीआरएफ को समर्थन देते हैं, उन पर आर्थिक दबाव बनाया जा सकता है। इससे पहले भी अमेरिका ने हिजबुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को आतंकी संगठनों की सूची में शामिल किया था।

लश्कर-ए-तैयबा: पाकिस्तान का सबसे घातक प्रॉक्सी

लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना 1986-90 के बीच अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में हुई थी। यह मरकज-उद-दावा-वल-इरशाद (Markaz-ud-Dawa-wal-Irshad (MDI) का मिलिट्री सैन्य विंग था, जिसे सोवियतों के खिलाफ तैयार किया गया था। बाद में यह संगठन पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए भारत के खिलाफ एक “प्रॉक्सी टूल” बन गया।

लश्कर की हमेशा से रणनीति पाकिस्तान के बाहर हमलों पर केंद्रित रही है। इसने कभी भी पाकिस्तान के भीतर हमले नहीं किए, जिसके चलते इसे सरकार का भी खास माना जाता है। वहीं, आईएसआई के लिए यह संगठन बेहद उपयोगी साबित हुआ क्योंकि यह केवल बाहर हमले करता है, जिससे पाकिस्तान को यह कहने का मौका मिल जाता है, कि इसमें उसका हाथ नहीं है।

द रेजिस्टेंस फ्रंट: नाम बदला, मंशा नहीं

द रेजिस्टेंस फ्रंट को अक्टूबर 2019 में जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद बनाया गया था। इस अनुच्छेद के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हो गया था। आतंकी संगठनों की साजिश थी कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में अशांति बनी रहे, जिसके चलते उस दौरान कई शैडो आतंकी संगठन भी सामने आए। TRF को लश्कर-ए-तैयबा का एक मोहरा माना जाता है, जिसे कश्मीर में आतंकवाद को “स्थानीय” रंग देने के लिए बनाया गया था। यह रणनीति पाकिस्तान की पुरानी चाल का हिस्सा है, जिसमें आतंकी संगठनों को नए नाम देकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध से बचाने और स्थानीय समर्थन हासिल करने की कोशिश की जाती है।

किसने बनाया था द रेजिस्टेंस फ्रंट

द रेजिस्टेंस फ्रंट का गठन शेख सज्जाद गुल के नेतृत्व में हुआ, जो इसका सुप्रीम कमांडर है। इसके अलावा, संगठन के अन्य प्रमुख नेता जैसे मुहम्मद अब्बास शेख (संस्थापक, अब मृत) और बासित अहमद दार (चीफ ऑपरेशन कमांडर, अब मृत) ने इसके जरिए आतंकी गतिविधियां चलानी शुरू कीं। मुहम्मद अब्बास शेख को 2021 में मुठभेड़ में मार गिराया गया। वहीं, बासित अहमद डार (अबू कामरान) मई 2024 में मारा गया। जबकि शेख सज्जाद गुल अभी भी पाकिस्तान में मौजूद है, जिस पर भारत और अमेरिका दोनों ने इनाम घोषित किया है। जबकि अहमद खालिद इस संगठन का प्रवक्ता है। भारत ने जनवरी 2023 में TRF को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आतंकी संगठन घोषित किया था, और अब अमेरिका का यह कदम इसे वैश्विक स्तर पर आतंकी संगठन के रूप में मान्यता देता है।

सज्जाद गुल: पत्रकार की हत्या से लेकर साइबर जंग तक का सफर

सज्जाद गुल पहले एक पत्रकार था। 2018 में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या की साजिश में उसका नाम सामने आया। इसके बाद वह पाकिस्तान भाग गया और वहीं से “KashmirFight” नाम का डिजिटल नेटवर्क शुरू किया, जो अब टीआरएफ का प्रचार तंत्र बन गया है। KashmirFight के जरिए भारत सरकार के खिलाफ फर्जी मानवाधिकार का नैरेटिव खड़ा किया गया। यह वेबसाइट दिसंबर 2024 में आइसलैंड से रजिस्टर्ड की गई और NameCheap जैसी कंपनी के जरिए होस्ट की गई, ताकि असली पहचान छुपी रहे। इस मंच पर कश्मीरी पंडितों और सरकारी कर्मचारियों को धमकी देने वाले पोस्ट नियमित रूप से डाले जाते थे।

टीआरएफ और सज्जाद गुल के नेटवर्क ने Mastodon, Telegram, ChirpWire और BiP जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी साइबर गतिविधियां फैलाईं। ‘KashmirFight PUBLIC’ नाम के Telegram चैनल पर TRF हमलों की जिम्मेदारी लेता है और वीडियो व फर्जी दस्तावेज साझा करता है। इसके अलावा Jhelum Media House मीडिया प्लेटफॉर्म भी इस प्रोपेगेंडा में शामिल हैं। जिनका मकसद आतंक को आजादी की लड़ाई के रूप में दिखाना है। NIA और भारतीय साइबर एजेंसियों ने इन गतिविधियों की जांच शुरू की है और सज्जाद गुल को इंटरपोल नोटिस से ट्रैक करने की कोशिश जारी है।

टीआरएफ की आतंकी यूनिट ‘Falcon Squad’  

सूत्रों के मुताबिक, टीआरएफ की फॉल्कन स्क्वाड (Falcon Squad) एक विशेष टास्क फोर्स है, जिसमें पाकिस्तान की स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) के पूर्व कमांडो तक शामिल रहे हैं। टीआरएफ और लश्कर-ए-तैयबा की प्रमोशन पॉलिसी में महिलाओं और परिवारों को “शहीदों के गौरव” से जोड़कर पेश किया जाता है। इसका उद्देश्य युवाओं को भावनात्मक रूप से प्रेरित कर कट्टरपंथ की ओर ले जाना है।

मुरीदके से बहावलपुर आया टीआरएफ

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत स्थित लश्कर के प्रमुख अड्डे मुरिदके और जैश-ए-मोहम्मद के गढ़ बहावलपुर पर जोरदार हमले किए थे। इसके बाद से पाकिस्तान में मौजूद आतंकी अड्डों में खलबली मची हुई है। अब जो इनपुट सामने आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि पाकिस्तान की सेना दोनों संगठनों को बहावलपुर में एक साथ ला रही रही है।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा और उसका यह नया मुखौटा संगठन टीआरएफ अब अपना मुख्यालय मुरिदके से हटाकर बहावलपुर शिफ्ट कर रहे हैं। दोनों आतंकी संगठनों की इस हलचल पर भारतीय खुफिया एजेंसियां नजर बनाए हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान की सेना खुद इन संगठनों के नए मुख्यालय को एक ही जगह पर ला कर रही है, ताकि निगरानी और मदद दोनों आसानी से दी जा सकें।

टीआरएफ की आतंकी गतिविधियां

टीआरएफ ने 2019 में अपने गठन के बाद से जम्मू-कश्मीर में कई आतंकी हमलों को अंजाम दिया है। ये हमले नागरिकों, अल्पसंख्यकों, सुरक्षा बलों, और पर्यटकों को निशाना बनाते हैं। इसमें 22 अप्रैल 2025 को किया गया पहलगाम हमला सबसे घातक हमला था, जिसमें पहलगाम की बैसरण घाटी में 28 लोग मारे गए और 20 से अधिक घायल हुए। हमलावरों ने M4 कार्बाइन और AK-47 जैसे ऑटोमैटिक राइफल्स का इस्तेमाल किया। हमले में पर्यटकों, जिसमें एक नौसेना अधिकारी शामिल था, को निशाना बनाया गया। हमलावरों ने हिंदू पुरुषों को विशेष रूप से चुना, उनके नाम और धार्मिक पहचान की जांच की, और कुछ को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया। यह हमला 2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत में नागरिकों पर सबसे बड़ा हमला था।

रियासी हमला (9 जून 2024): रियासी जिले में हिंदू तीर्थयात्रियों के एक बस पर हमला किया गया, जिसमें 9 लोग मारे गए और 33 घायल हुए। यह बस शिव खोरी मंदिर से लौट रही थी। शुरुआत में TRF ने इसकी जिम्मेदारी ली, हालांकि बाद में लश्कर-ए-तैयबा से संबंध होने की बात सामने आई।

गांदरबल हमला (20 अक्टूबर 2024): सोनमर्ग के जेड-मोर्ह सुरंग निर्माण स्थल पर 7 लोग, जिसमें एक डॉक्टर और 6 मजदूर शामिल थे, मारे गए। TRF ने इस हमले को मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर के खिलाफ जवाबी कार्रवाई बताया। हमलावरों ने एक महीने पहले इस जग की रैकी की थी।

अनंतनाग हमला (13 सितंबर 2023): कोकेरनाग में भारतीय सेना के एक कर्नल, मेजर, और डीएसपी सहित तीन लोग मारे गए। यह हमला लश्कर के एक आतंकी रियाज अहमद के मारे जाने के जवाब में था।

बांदीपोरा हमला (8 जुलाई 2020): बीजेपी नेता और उनके परिवार के तीन सदस्यों की हत्या कर दी गई। TRF ने उन्हें “राजनीतिक कठपुतली” करार दिया।

टीआरएफ ने हाल के वर्षों में गैर-स्थानीय मजदूरों, पर्यटकों, और हिंदू-सिख समुदायों को निशाना बनाना शुरू किया है। इसकी वजह बताते हैं कि वे कश्मीर में बाहरियों के “अवैध कब्जे” और “जनसांख्यिकीय बदलाव” को रोकना चाहते हैं।

पहलगाम हमले से बदली रणनीति

जानकारों का कहना है कि पहलगाम हमला टीआरएफ की रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाता है। इस हमले में “फाल्कन स्क्वाड” से जुड़े पांच आतंकियों ने कैमोफ्लैग पहना हुआ था और एडवांस विपंस का इस्तेमाल किया था। हमलावरों ने हेलमेट-माउंटेड कैमरे और संचार उपकरणों का इस्तेमाल किया, और हिंदू पुरुषों को धार्मिक आधार पर निशाना बनाया। सूत्रों का कहना है कि इस हमले की अगुवाई हाशिम मूसा (उर्फ आसिफ फौजी) ने की थी, जो कथित तौर पर पाकिस्तान के स्पेशल सर्विस ग्रुप का पूर्व कमांडो था। जबकि अन्य हमलावरों में अली भाई (पाकिस्तानी नागरिक) और दो भारतीय कश्मीरी शामिल थे। इस हमले की योजना लश्कर के वरिष्ठ कमांडर सैफुल्लाह कसूरी (उर्फ खालिद) ने बनाई थी, जो हाफिज सईद का करीबी सहयोगी है। हमलावरों के डिजिटल फुटप्रिंट लश्कर के मुजफ्फराबाद और कराची में सेफ हाउसेज तक ट्रेस किए गए।

जनरल असीम मुनीर: आतंक के खेल का मास्टरमाइंड

खुफिया सूत्रों का कहना है, पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर पहलगाम नरसंहार और इसके बाद के घटनाक्रमों के प्रमुख सूत्रधार हैं। उनका कहना है कि असीम मुनीर ने अपने कार्यकाल के दौरान कश्मीर में ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ को बढ़ावा देने के लिए टीआरएफ जैसे मुखौटा संगठनों का इस्तेमाल किया। उन्होंने इस हमले की टाइमिंग इस तरह तय की जिससे पाकिस्तान में इमरान की पार्टी पीटीआी पर चल रहे असंवैधानिक दमन से ध्यान भटकाया जा सके और “फील्ड मार्शल” बन कर किसी भी तरह के दमनकारी आरोपों से बचा जा सके। सूत्रों ने बताया कि असीम मुनीर ने खुद को फील्ड मार्शल घोषित करने के लिए आतंकी खतरे का बहाना बनाना चाहते थे, और सेना के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे।

वहीं, मुनीर के नेतृत्व में, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ने कश्मीर में आतंकवाद को “स्थानीय प्रतिरोध” का रंग देने की कोशिश की, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के खिलाफ नैरेटिव खड़ा किया जा सके। जानकार कहते हैं कि मुनीर की यह चाल न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डालती है, बल्कि यह भी बताती है कि पाकिस्तानी सेना अब एक “राज्य प्रायोजित आतंकी नेटवर्क” में तब्दील हो चुकी है। टीआरएफ जैसे मुखौटा संगठनों के जरिए वह अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचते हुए आतंकवाद को नया नाम और चेहरा देने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, अपनी व्यक्तिगत सत्ता की भूख के लिए आतंकवाद को एक रणनीतिक औजार बना चुके हैं।

टीआरएफ ने भारत पर मढ़े थे ये आरोप

वहीं, टीआरएफ ने कथित टेलीग्राम चैनल के जरिए पहलगाम हमले की जिम्मेदारी से इनकार किया और इसे भारत की खुफिया एजेंसी और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) का “ब्लैक ऑपरेशन” करार दिया। संगठन ने दावा किया कि हमले की जानकारी हमले से 10 मिनट पहले “आधिकारिक रिकॉर्ड” में दर्ज की गई थी, और पहलगाम पुलिस स्टेशन की कथित ‘ढिलाई’ को “राज्य प्रायोजित झूठे हमले” का सबूत बताया। टीआरएफ ने यह भी दावा किया कि उसने भारतीय खुफिया एजेंसियों को हैक किया और “झूठे हमलों की योजना” को उजागर करने की धमकी दी।

27 अप्रैल 2025 को, टीआरएफ ने दावा किया कि उसने भारतीय खुफिया तंत्र में घुसपैठ की है, और “ऑपरेशन त्रिनेत्र” नामक एक कथित RAW दस्तावेज को लीक करने की धमकी दी, जो कथित तौर पर TRF को बदनाम करने के लिए बनाया गया था। टीआरएफ का दावा था कि रॉ की यह रिपोर्ट 16 अप्रैल 2025 की तारीख की थी और इसका मकसद पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट को एक बड़े नागरिक और सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले के लिए जिम्मेदार ठहराना था। इस रिपोर्ट में टीआरएफ को आईएसआई का मोहरा बताया गया था। दस्तावेज के अनुसार, ऑपरेशन त्रिनेत्र का मकसद एक ऐसे “जनसंहारक घटना” को अंजाम देना था, जिससे भारत अमेरिकी उपराष्ट्रपति सेनेटर वांस के भारत दौरे के दौरान आतंकवाद के खिलाफ अपनी वैश्विक स्थिति और नैरेटिव को मजबूत कर सके। हालांकि इन दावों की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं हो सकी, लेकिन सूत्रों का कहना है कि दरअसल ये टीआरएफ की साइबर प्रचार रणनीति का हिस्सा हैं।