Home Blog Page 101

Bhairav Vs Ghatak Platoon: क्या भैरव फोर्स के आने के बाद खत्म हो जाएगी बटालियन में ‘घातक प्लाटून’? जानिए क्या है सेना का असली प्लान?

Bhairav vs Ghatak Platoon: Will Bhairav Light Commando Battalions Replace Ghatak Platoons in Indian Army?
Photo: Raksha Samachar

Bhairav Vs Ghatak Platoon: 26वें करगिल विजय दिवस के मौके पर आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक बड़ा ऐलान किया कि अब सेना में एक नई घातक और तेजतर्रार यूनिट तैयार की जा रही है, जिसका नाम होगा ‘भैरव लाइट कमांडो बटालियन’ (Bhairav Light Commando Battalion)। इस ऐलान के साथ ही ये सवाल भी पूछे जाने लगे कि क्या यह नई भैरव फोर्स पुरानी “घातक प्लाटून” को खत्म कर देगी, जो हर इन्फैंट्री बटालियन का एक खास हिस्सा हैं। लेकिन इन दोनों का मकसद दुश्मन पर तेज और असरदार हमला करना है, लेकिन दोनों की भूमिका, क्षमता और इस्तेमाल के तरीके अलग हैं। आखिर ‘घातक’ और ‘भैरव’ में क्या अंतर है? आइए जानते हैं…

Kargil Vijay Diwas 2025: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना का बड़ा कदम, रूद्र, भैरव और दिव्यास्त्र करेंगे दुश्मनों का सर्वनाश

Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक प्लाटून: हर बटालियन की सबसे खतरनाक यूनिट

घातक प्लाटून भारतीय सेना की हर इंफैंट्री बटालियन में मौजूद एक विशेष कमांडो टुकड़ी होती है। घातक प्लाटून की सबसे बड़ी खासियत है इनकी तेजी और चपलता। ये हथियारों के साथ-साथ बिना हथियारों के भी लड़ने में माहिर हैं। इन जवानों को बहुत खास मिशनों के लिए तैयार किया जाता है। इनका काम होता है दुश्मन के इलाके में चुपके से जाकर हमला करना, दुश्मन की डिफेंस लाइन को तोड़ना, आतंकवादियों से लड़ना, या सर्जिकल स्ट्राइक जैसे बड़े ऑपरेशन करना।

हर बटालियन में करीब 20–30 जवानों की यह टीम बनाई जाती है, जिसमें सिर्फ सबसे फुर्तीले, ताकतवर और प्रशिक्षित जवानों को ही जगह मिलती है। इन सैनिकों को हथियारों से लेकर हाथ से लड़ाई (जैसे कराटे, जूडो, मार्शल आर्ट) तक की ट्रेनिंग दी जाती है। इन जवानों को स्नाइपर राइफल, मशीन गन और बम जैसे हथियार चलाने में महारत हासिल होती है। इन्हें ऊंचे पहाड़ी इलाकों, जंगलों, नदियों और बर्फीली जगहों पर ऑपरेशन करने की भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इसके अलावा इन्हें पैरा जंपिंग जैसे मुश्किल मिशनों के लिए भी तैयार किया जाता है।

Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक प्लाटून का इतिहास

घातक प्लाटून की शुरुआत 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद हुई थी। उस समय सेना ने फैसला किया कि हर इन्फैंट्री बटालियन में एक खास कमांडो प्लाटून होनी चाहिए। इस प्लाटून में सबसे ताकतवर और तेज-तर्रार जवान चुने जाते थे। इनका काम था दुश्मन पर अचानक हमला करना, उनके डिफेंस को तोड़ना और गुप्त मिशनों को पूरा करना। समय के साथ इस कमांडो प्लाटून का नाम बदलकर “घातक प्लाटून” कर दिया गया। साथ ही, इनके प्रशिक्षण को और सख्त और खास बनाया गया ताकि ये और भी खतरनाक और कारगर बन सकें। आज घातक प्लाटून हर बटालियन की रीढ़ हैं और सेना के सबसे मुश्किल मिशनों में हिस्सा लेते हैं।

Shaktibaan Artillery Regiments: क्या है भारतीय सेना की नई ‘शक्तिबाण’ रेजीमेंट? क्या होगा इसमें खास और पारंपरिक आर्टिलरी यूनिट से कैसे होगी अलग, पढ़ें Explainer

घातक प्लाटून की उपलब्धियां

घातक प्लाटून ने कई बड़े और मुश्किल मिशनों में अपनी ताकत दिखाई है। 1999 के कारगिल युद्ध में ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव भी 18 ग्रेनेडियर्स की घातक प्लाटून में थे। उनकी टीम ने टाइगर हिल पर कब्जा करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक में घातक कमांडो ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक और खतरनाक हमले किए। 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई झड़प में भी घातक प्लाटून के जवानों ने नजदीकी लड़ाई में अपनी ताकत दिखाई। ये जवान हर बार अपनी हिम्मत और कौशल से सेना का नाम रोशन करते हैं।

Bhairav vs Ghatak Platoon: Will Bhairav Light Commando Battalions Replace Ghatak Platoons in Indian Army?
Photo: Raksha Samachar

घातक प्लाटून की खूबियां

घातक प्लाटून का चुनाव पूरी तरह बटालियन के भीतर से होता है। इसमें शामिल होने वाले सैनिक अपनी मर्जी से नामांकन देते हैं, फिर उनमें से सबसे बेहतर को चुना जाता है। यह गर्व की बात मानी जाती है क्योंकि यह यूनिट बटालियन की ‘सबसे घातक’ ताकत होती है। घातक प्लाटून का नेतृत्व आमतौर पर एक युवा अफसर करता है, जो कैप्टन या मेजर रैंक का होता है। इनके साथ जेसीओ, हवलदार और नायक रैंक के जवान होते हैं।

घातक प्लाटून को असली युद्ध के हालात के लिए तैयार किया जाता है। ये न सिर्फ हाथ से लड़ाई में माहिर होते हैं, बल्कि हथियारों का भी बेहतरीन इस्तेमाल जानते हैं। इन्हें यह भी सिखाया जाता है कि कैसे सीमित संसाधनों में जीना है, मैप पढ़ना है और दुर्गम जगहों में टिके रहना है।

क्यों बनाई जा रही है भैरव लाइट कमांडो बटालियन?

2025 में करगिल विजय दिवस के मौके पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने घोषणा की कि अब सेना “भैरव लाइट कमांडो बटालियन” नाम से एक नई विशेष कमांडो यूनिट तैयार कर रही है। इसका उद्देश्य यह है कि बॉर्डर के नजदीक दुश्मन को चौंका देने वाली कार्रवाई की जा सके।

भैरव यूनिट्स को ‘लाइट कमांडो बटालियन’ इसलिए कहा गया है क्योंकि ये सामान्य स्पेशल फोर्सेस (जैसे पैरा स्पेशल फोर्सेज) की तरह भारी हथियारों से लैस नहीं होंगी, लेकिन फिर भी ये बेहद फुर्तीली, घातक और आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस होंगी। इन यूनिट्स में ड्रोन्स, स्मार्ट गियर और लेटेस्ट कम्यूनिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा।

सेना प्रमुख के मुताबिक, भैरव यूनिट्स को खासतौर पर बॉर्डर इलाकों में घात लगा कर दुश्मन को चौंकाने वाली कार्रवाई करने के लिए तैयार किया गया है।

भैरव फोर्स की हर बटालियन में करीब 620 जवान

भैरव फोर्स में 40 से 50 इन्फैंट्री यूनिट्स होंगी, जिन्हें धीरे-धीरे बनाया जाएगा। हर बटालियन में करीब 620 जवान होंगे। ये यूनिट्स ड्रोन, नाइट विजन डिवाइस, एडवांस हथियार, GPS, और कम्युनिकेशन सिस्टम से लैस होंगी, जो इन्हें आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करेंगे। भैरव फोर्स का काम होगा खास मिशनों में दुश्मन को नुकसान पहुंचाना। लेकिन यह स्पेशल फोर्सेज, जैसे पैरा एसएफ, की तरह बड़े और रणनीतिक मिशनों के लिए नहीं होगी। यह सीमा पर त्वरित और छोटे हमलों के लिए बनी हैं। कुछ भैरव यूनिट्स पहले ही बन चुकी हैं और सीमा पर तैनात होने के लिए तैयार हैं।

Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक और भैरव में क्या है अंतर?

घातक प्लाटून और भैरव यूनिट्स दोनों ही भारतीय सेना की आक्रामक रणनीति का हिस्सा हैं, लेकिन इनके काम करने के तरीके और स्केल में फर्क है। घातक प्लाटून बटालियन स्तर की यूनिट है, यानी हर इंफैंट्री बटालियन के पास खुद की घातक टीम होती है। ये सीमित संख्या में होते हैं और उनका इस्तेमाल बटालियन की जरूरतों के अनुसार होता है।

वहीं, भैरव यूनिट्स ब्रिगेड या उससे ऊपर के स्तर की स्केमेटिक फोर्स हैं। इन्हें अलग से खड़ा किया जा रहा है, और यह पूरी तरह एक नई कमांडो ब्रिगेड जैसी होंगी। घातक प्लाटून पारंपरिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में अधिक इस्तेमाल होती हैं, जबकि भैरव फोर्स को खासतौर पर सीमावर्ती इलाकों में छोटे लेकिन सटीक हमले करने के लिए तैनात किया जाएगा। घातक फोर्स में शामिल सैनिक बटालियन के भीतर से ही चुने जाते हैं, जबकि भैरव बटालियन के लिए नए तरीके से चयन और प्रशिक्षण की योजना बनाई जा रही है। वहीं, घातक प्लाटून ज्यादातर जमीनी ऑपरेशंस को अंजाम देती है, जबकि भैरव यूनिट्स को डिजिटल युद्ध, ड्रोंस, निगरानी और फास्ट पेट्रोलिंग जैसे कामों के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है।

क्या भैरव के बाद खत्म हो जाएगी घातक प्लाटून?

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कई लोगों को लगता है कि जब भैरव जैसी नई फोर्स बन रही है तो घातक प्लाटून की जरूरत नहीं रह जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है। सेना के सूत्रों के अनुसार, घातक प्लाटून बटालियन के सबसे करीबी और भरोसेमंद फोर्स मानी जाती है। घातक प्लाटून बटालियन के अंदर होती है और उसका दायरा सीमित होता है। उनका इस्तेमाल तुरंत और लोकल स्तर पर होता है।

दूसरी ओर, भैरव यूनिट्स को रणनीतिक स्तर पर तैनात किया जाएगा। दोनों की भूमिका अलग-अलग है और दोनों ही एक-दूसरे को पूरक बनाती हैं। सूत्रों ने बताया कि भारतीय सेना का उद्देश्य अपनी युद्ध क्षमता को और मजबूत करना है, न कि मौजूदा यूनिट्स को खत्म करना। भैरव लाइट कमांडो बटालियन को तैयार करना एक अतिरिक्त कदम है, जो सेना को और अधिक फुर्तीला बनाएगा।

नहीं, सेना ने साफ किया है कि भैरव, स्पेशल फोर्स जैसी नहीं होंगी, जैसे पैरा स्पेशल फोर्स या गरुड़ कमांडो होती हैं। लेकिन इनकी ट्रेनिंग और हथियार उन्हें एक ‘मिनी स्पेशल फोर्स’ जैसा बनाएंगे। भैरव एक स्टैंड-अलोन यूनिट होगी, जिसे जरूरत के हिसाब से सीमावर्ती क्षेत्रों या टारगेट ऑपरेशन में तैनात किया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि नई भैरव लाइट कमांडो बटालियनें भारतीय सेना की पहले से मौजूद 10 पैरा स्पेशल फोर्स और 5 पैरा (एयरबोर्न) बटालियनों के अलावा होंगी। ये पुरानी यूनिट्स खास ट्रेनिंग और आधुनिक हथियारों से लैस हैं, और दुश्मन की सीमा के अंदर गुप्त ऑपरेशनों के लिए बनाई गई हैं।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद का मानना है, “घातक प्लाटून भारतीय सेना की रीढ़ हैं और उनकी भूमिका को कम नहीं किया जा सकता। भैरव फोर्स का गठन सेना की रणनीति को और मजबूती देगा, ताकि वह विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना कर सके। घातक प्लाटून नजदीकी लड़ाई और बटालियन-स्तर के मिशनों में माहिर हैं, जबकि भैरव फोर्स बड़े पैमाने पर हल्के और तेज हमलों के लिए है।”

जरूरी है ऐसी फोर्सेज का फॉर्मेशन

आज के जमाने के युद्ध पहले जैसे नहीं रहे। अब लड़ाई सिर्फ़ बंदूक और सैनिकों से नहीं होती, बल्कि इसमें टेक्नोलॉजी और ड्रोन से होती है, जिसमें तुरंत कार्रवाई की जरूरत होती है। चीन अपनी सेना को मार्शल आर्ट जैसी फुर्तीली लड़ाई की ट्रेनिंग दे रहा है और तिब्बत जैसे ऊंचे इलाकों में खास सैनिक तैनात कर रहा है। वहीं ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने कई सबक सीखें हैं। जिसमें भारतीय सेना की रिस्ट्रक्चरिंग किए जाने की जरूरत महसूस हुई। ऐसे माहौल में भारत को भी अपनी सेना को हर मोर्चे के लिए तैयार रखना जरूरी है, चाहे वो जमीनी लड़ाई हो, सीमाओं की निगरानी हो या अचानक जवाब देने की जरूरत। घातक फोर्स जहां जरूरत पड़ने पर बटालियन की पहली पंक्ति में होते हैं, वहीं भैरव भारत की नई युद्ध शैली की नींव रखेंगी, जहां टेक्नोलॉजी और रणनीतिक चौकसी सबसे बड़ी ताकत होगी।

Lt Gen Pushpendra Singh बने भारतीय सेना के नए वाइस चीफ, पहले ही दिन 1989 को शहीद हुए अपने पांच साथियों को दी श्रद्धांजलि

Lt Gen Pushpendra Singh Takes Over as Vice Chief of Indian Army, Pays Tribute to Fallen Comrades from 1989 Sri Lanka Operation on First Day
Lt Gen Pushpendra Singh Takes Over as Vice Chief of Indian Army, Pays Tribute to Fallen Comrades from 1989 Sri Lanka Operation on First Day (Photo: Indian Army)

Lt Gen Pushpendra Singh next Vice Chief of Army Staff: लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह भारतीय सेना में वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ यानी उप सेना प्रमुख बनाए गए हैं। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि की जगह ली, जो 39 साल की शानदार सेवा के बाद 31 जुलाई को रिटायर हो गए। अपनी ज्वॉइनिंग के पहले दिन उन्होंने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जाकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी और श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के दौरान शहीद हुए सैनिकों के परिवारों को सम्मानित किया।

Tank Transporter Trailers: अब बॉर्डर पर फटाफट टैंकों को तैनात कर सकेगी भारतीय सेना, 212 स्वदेशी टैंक ट्रांसपोर्टर ट्रेलर की खरीद के लिए किया करार

Lt Gen Pushpendra Singh: 35 साल का शानदार मिलिट्री कैरियर

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह का सेना में 35 साल से भी अधिक लंबा और शानदार करियर रहा है। लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उन्होंने लखनऊ के ला मार्टिनियर कॉलेज और लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून से प्रशिक्षण लेकर दिसंबर 1987 में 4 पैरा (स्पेशल फोर्सेस) में कमीशन प्राप्त किया। उनके पास मैनेजमेंट स्टडीज में मास्टर्स डिग्री और पंजाब यूनिवर्सिटी से एम.फिल की डिग्री है। उन्होंने DSSC वेलिंगटन, CDM हैदराबाद और IIPA दिल्ली से हायर कोर्स भी कर चुके हैं।

हर बड़े मिलिट्री ऑपरेशन में लिया हिस्सा

पिछले 35 सालों में लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह ने कई अहम मिलिट्ररी ऑपरेशंस में हिस्सा लिया है। इनमें श्रीलंका में ऑपरेशन पवन, सियाचिन में ऑपरेशन मेघदूत, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन रक्षक, पूर्वोत्तर भारत में ऑपरेशन ऑर्किड और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर ऑपरेशन स्नो लेपर्ड शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने श्रीलंका और लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भी भारत का नेतृत्व किया। उनकी बहादुरी और रणनीतिक नेतृत्व के लिए उन्हें दो बार अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) और सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

श्रीलंका में पहले मिशन से शुरू हुई वीरता की कहानी

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह का करियर श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) के ऑपरेशन पवन से शुरू हुआ। इस मिशन में 4 पैरा बटालियन को अक्टूबर 1987 में श्रीलंका भेजा गया था, जहां उसे जाफना और बाद में किलिनोच्ची में तैनात किया गया। 22 जुलाई 1989 को, जब वह एक युवा अफसर के तौर पर इरानमडु से किलिनोच्ची जा रहे थे, उनकी 13 सदस्यीय क्विक रिएक्शन टीम (क्यूआरटी) पर एलटीटीई आतंकवादियों ने घात लगाकर हमला किया। इस हमले में पांच सैनिक शहीद हो गए। खुद लेफ्टिनेंट पुष्पेंद्र सिंह समेत दो अन्य सैनिक भी इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में उन्होंने जवाबी हमला कर चार आतंकवादियों को मार गिराया और कई को घायल किया।

पहले दिन ही दी शहीद साथियों को दी श्रद्धांजलि

01 अगस्त को उप सेनाध्यक्ष का पद संभालने के पहले ही दिन, लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह ने 22 जुलाई 1989 को शहीद हुए अपने उन जांबाज साथियों को याद किया जो श्रीलंका में उस ऑपरेशन के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्होंने उन वीर सैनिकों के परिवारजनों और वीर नारियों को राष्ट्रीय समर स्मारक (नेशनल वॉर मेमोरियल) पर आमंत्रित किया और उनके साथ जाकर ‘त्याग चक्र’ पर पुष्पांजलि अर्पित की, जहां इन शहीदों के नाम अमर कर दिए गए हैं।

राइजिंग स्टार कोर के थे जीओसी

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह ने अपने लंबे करियर के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। अप्रैल 2022 में, उन्होंने हिमाचल प्रदेश के योल छावनी में राइजिंग स्टार कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) का पद संभाला। यह कोर 2005 में स्थापित हुई थी और जम्मू डिविजन में अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। इसके अलावा, उन्होंने सेंट्रल कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ और सेना मुख्यालय में महानिदेशक (ऑपरेशनल लॉजिस्टिक्स एंड स्ट्रैटेजिक मूवमेंट) के रूप में भी सेवाएं दीं। उन्होंने इन्फैंट्री स्कूल, मउ और स्ट्रैटेजिक फोर्स कमांड में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

“कोई भी सैनिक पीछे नहीं छूटेगा”

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र सिंह ने अपने पहले दिन यह संदेश दिया कि कोई भी सैनिक पीछे नहीं छूटेगा। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि और उनके परिवारों को सम्मान देकर उन्होंने यह दिखाया कि वह न केवल एक कुशल सैन्य अधिकारी हैं, बल्कि अपने सैनिकों और उनके बलिदान के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखते हैं। उनकी यह पहल सैनिकों और उनके परिवारों के बीच विश्वास को और मजबूत करेगी।

Tank Transporter Trailers: अब बॉर्डर पर फटाफट टैंकों को तैनात कर सकेगी भारतीय सेना, 212 स्वदेशी टैंक ट्रांसपोर्टर ट्रेलर की खरीद के लिए किया करार

Indian Army Signs Deal for 212 Indigenous Tank Transporter Trailers to Boost Rapid Border Deployment of Tanks
Photo: Indian Army

Tank Transporter Trailers: भारतीय सेना ने भारी भरकम टैंकों को जल्द से जल्द मूवमेंट कराने के लिए बड़ा फैसला लिया है। सेना ने नए ट्रांसपोर्टर ट्रेलर खरीदने के लिए बेंगलुरु की निजी कंपनी एक्सिसकेड्स एयरोस्पेस एंड टेक्नोलॉजीज़ प्राइवेट लिमिटेड (Axiscades Aerospace and Technologies Pvt. Ltd.) के साथ 223.95 करोड़ रुपये का करार किया है। जिसके बाद जल्द ही सेना के पास ऐसे खास ट्रक होंगे, जिनसे भारी टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां एक जगह से दूसरी जगह जल्दी और आसानी से पहुंचाई जा सकेंगी।

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: एलएसी पर चीन को टक्कर देने की तैयारी, अक्टूबर तक न्योमा एयरस्ट्रिप पर लैंड कर सकेंगे मिग-29 और सुखोई-30 फाइटर जेट

क्या होते हैं ये Tank Transporter Trailers?

ये ट्रेलर बड़े और मजबूत ट्रक जैसे होते हैं, जिन पर युद्धक टैंक या बख्तरबंद (आर्मर्ड) वाहनों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह बिल्कुल वैसे ही होता है जैसे कोई ट्रेलर ट्रक कारों को लेकर जाता है, बस फर्क इतना है कि ये बहुत बड़े और शक्तिशाली होते हैं। सेना के नए ट्रांसपोर्टर ट्रेलर आधुनिक तकनीक से लैस हैं। इनमें हाइड्रॉलिक और न्यूमैटिक रैंप लगे हैं। इनकी मदद से बख्तरबंद वाहन या टैंक आसानी से और जल्दी ट्रेलर पर चढ़ाए और उतारे जा सकेंगे। जिससे समय की बचत होती है। इनमें लगे स्टीयरेबल और लिफ्टेबल एक्सल्स ट्रेलर को संकरे और मुश्किल रास्तों पर भी आसानी से मोड़ने और चलाने में सक्षम बनाते हैं। साथ ही, ये एक्सल्स ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर ट्रेलर को स्थिर रखते हैं।

सेना को क्यों है जरूरत

सेना ने भारतीय कंपनी मैसर्स एक्सिसकेड्स एयरोस्पेस एंड टेक्नोलॉजीज़ से 212 नए ट्रांसपोर्टर ट्रेलर खरीदने का करार किया है। इस करार के तहत सेना को 212 नए-पीढ़ी के 50 टन टैंक ट्रांसपोर्टर ट्रेलर मिलेंगे। इन ट्रेलरों के सेना में आने से बहुत फायदा होगा। अब सेना किसी भी जगह पर टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां जल्दी और सुरक्षित तरीके से भेज पाएगी। सेना के लिए ये ट्रेलर एक ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की तरह काम करेंगे। इससे युद्ध की स्थिति में सेना का बहुत समय बचेगा और उसका जवाब देने की क्षमता में बढ़ोतरी होगी। 50 टन वजन उठाने की क्षमता के साथ ये ट्रेलर भारतीय सेना के भारी टैंकों जैसे अर्जुन और टी-90 को आसानी से ले जा सकते हैं। इसके अलावा ये ट्रेलर रेगिस्तान की गर्मी, पहाड़ों की ठंड और मैदानी क्षेत्रों की नमी में भी बिना रुके काम कर सकते हैं।

ट्रेलर पूरी तरह से भारत में डिजाइन और निर्मित

इस करार पर ‘बाय (इंडियन–आईडीडीएम)’ यानी ‘भारतीय–डिज़ाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग’ श्रेणी के तहत दस्तखत किए हगए हैं। आईडीडीएम यानी ‘इंडिजनसली डिजाइंड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड’ का मतलब है कि ये ट्रेलर पूरी तरह से भारत में डिजाइन और निर्मित किए गए हैं। सरकार चाहती है कि भारत अब रक्षा उपकरणों के लिए बाहर के देशों पर कम निर्भर रहे और ज़्यादा से ज़्यादा चीजें भारत में ही बने। इसी सोच के तहत ये ट्रेलर एक भारतीय कंपनी से खरीदे जा रहे हैं। इन ट्रेलर का डिज़ाइन, तकनीक और निर्माण सब कुछ भारत में ही हुआ है। इससे हमारे देश की कंपनियों को भी बढ़ावा मिलेगा और देश के पैसे भी यहीं पर खर्च होंगे।

इसके अलावा जब ऐसे ट्रेलर भारत में बनेंगे तो उससे बहुत सारे लोगों को रोजगार मिलेगा। इसमें इंजीनियर, मिस्त्री, तकनीशियन, ड्राइवर और दूसरी सहायक इंडस्ट्रीज़ के लोग शामिल होंगे। साथ ही इन ट्रेलरों की मरम्मत, देखभाल और प्रशिक्षण के लिए भी कई लोगों को ज़रूरत पड़ेगी।

सेना लगातार बदलते हालात और तकनीक को देखते हुए खुद को अपडेट कर रही है। इन ट्रेलरों की मदद से सेना का लॉजिस्टिक सिस्टम और भी मज़बूत होगा, जिससे वो आने वाली किसी भी चुनौती का आसानी से सामना कर सकेगी।

Op Mahadev LoRa Device: ऑपरेशन महादेव में LoRa का क्या रहा रोल? आतंकियों के सीक्रेट कम्यूनिकेशन को सुरक्षा बलों ने किस तरह किया ट्रैक?

Op Mahadev LoRa Device: How Indian Forces Tracked Terrorists Using Long-Range Communication Tech
Right image for Representation Only

Op Mahadev LoRa Device: 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले के तीनों गुनहगारों को सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन महादेव के जरिए अपने अंजाम तक पहुंचा दिया। इस हमले शामिल तीनों आतंकी पाकिस्तानी थे, जिससे यह भी साफ हुआ कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन अभी भी घाटी में आतंक को हवा दे रहे हैं। ऑपरेशन महादेव में आतंकियों के पास से हथियारों का भारी जखीरा तो बरामद हुआ ही, साथ ही, इन आतंकियों के पास से LoRa कम्युनिकेशन डिवाइस, मोबाइल फोन और NADRA कार्ड जैसी चीजें मिलीं, जिसने सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया।

TRF Terrorist Designation: आईएसआई और लश्कर की कठपुतली द रेजिस्टेंस फ्रंट पर बड़ी चोट! अमेरिका ने लगाया ग्लोबल टेरेरिस्ट का ठप्पा, पहलगाम हमले के बाद आईबी और रॉ पर मढ़े थे ये आरोप

Op Mahadev LoRa Device: क्या है लोरा (LoRa) डिवाइस?

लोरा (LoRa) का पूरा नाम लॉन्ग रेंज (Long Range) है। यह एक ऐसी वायरलेस कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी है जो लो-पावर में भी लंबी दूरी तक कम्यूनिकेशन करने की क्षमता रखती है। यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी है, जहां मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट की सुविधा नहीं होती। लोरा डिवाइस का उपयोग सामान्य रूप से स्मार्ट सिटी, कृषि, और औद्योगिक निगरानी जैसे क्षेत्रों में होता है, लेकिन आतंकी संगठन इसे सीक्रेट कम्यूनिकेशन के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं। LoRa यानी Long Range कम्युनिकेशन डिवाइस बिना किसी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट के कई किलोमीटर तक डेटा ट्रांसफर करने में सक्षम होती है।

आतंकवादियों के इसके इस्तेमाल करने की वजह है कि यह तकनीक बेहद कम बिजली में काम करती है, पकड़ में आसानी से नहीं आती और इसे साधारण से उपकरण में भी छिपाया जा सकता है। यही वजह है कि ऑपरेशन महादेव में इस डिवाइस की बरामदगी ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। लोरा डिवाइस सैटेलाइट फोन की तरह आसानी से पकड़ में नहीं आते, क्योंकि ये रेडियो फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं और मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर नहीं होते। वहीं, आतंकी इन उपकरणों को विशेष रूप से बनाए गए एन्क्रिप्टेड रेडियो (encrypted radio) में इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनके संदेशों को सुनना मुश्किल होता है।

11 जुलाई को मिला पहला सिग्नल

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बैसारन क्षेत्र में हुए आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी। हमले के बाद सेना और पुलिस ने सुरागों को तलाशना शुरू किया। 11 जुलाई को पहली बार LoRa डिवाइस का एक रेडियो सिग्नल पकड़ा गया और 17 दिन बाद 27 जुलाई को उसी तरह का एक और सिग्नल श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित महादेव पीक से आया। इसी तकनीकी जानकारी के आधार पर सुरक्षाबलों ने महादेव के जंगलों में सर्च ऑपरेशन शुरू किया। 28 जुलाई की सुबह जब आतंकियों को एक तंबू के नीचे आराम करते हुए पाया गया, तो उन्हें घेर लिया गया और कुछ ही घंटों में तीनों को ढेर कर दिया गया।

घने जंगलों में ढूंढना चुनौतीपूर्ण

LoRa डिवाइस की मदद से ये आतंकवादी पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से संपर्क में थे। इस डिवाइस ने मोबाइल फोन से जोड़कर उन्होंने रेडियो फ्रिक्वेंसी के जरिए संदेश भेजे, जिससे ट्रैक करना मुश्किल था। हालांकि इसकी सीमाएं हैं। LoRa डिवाइस से सिर्फ सिग्नल की दिशा और सामान्य क्षेत्र का अंदाज़ा लगाना संभव होता है। लेकिन इतनी भी जानकारी सुरक्षाबलों के लिए काफी थी। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के पास ऐसी तकनीक है, जो इन उपकरणों के चालू होने पर उनकी अनुमानित लोकेशन (3-5 किलोमीटर के दायरे में) का पता लगा सकती है। लेकिन घने जंगलों में सटीक स्थान ढूंढना चुनौतीपूर्ण होता है।

NADRA कार्ड हुए बरामद

सूत्र बताते हैं कि ऑपरेशन महादेव के दौरान आतंकियों से मुठभेड़ के बाद जब तलाशी ली गई तो तीन मोबाइल फोन, तीन मोबाइल चार्जर, दो LoRa सेट, NADRA कार्ड की तस्वीरें, आधार कार्ड, 28-वॉट का सोलर चार्जर, GoPro हार्नेस, स्विस मिलिट्री पावर बैंक, एक M4 कार्बाइन राइफल, दो AK-47 राइफल, 17 राइफल ग्रेनेड और सिलाई का सामान, दवाइयां, स्टोव, सूखा राशन, और ढेर सारी चाय बरामद हुई। इनमें से NADRA कार्ड पाकिस्तान की नागरिक पहचान एजेंसी द्वारा जारी किए गए थे। इसका मतलब साफ था कि ये आतंकी पाकिस्तान के नागरिक थे और वहीं से प्रशिक्षित होकर भारत में घुसपैठ कर रहे थे। मोबाइल फोन से कई अहम जानकारियां मिलीं, जिनमें तस्वीरें, दस्तावेज, और कई ओवरग्राउंड वर्कस के मोबाइल नंबर शामिल थे। ये फोन फिलहाल राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) की जांच में हैं, जो इनके डेटा का गहन विश्लेषण कर रहा है।

सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ सालों में, जम्मू-कश्मीर में आतंकियों और घुसपैठियों से LoRa डिवाइस बरामद हुए हैं। ये उपकरण पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स के साथ बातचीत के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। पिछले कुछ सालों में 50 से अधिक जवानों की हत्या करने वाले आतंकियों के पास लोरा डिवाइस मिले थे। वहीं, ये डिवाइस अक्सर सामान्य हार्डवेयर में छिपाए जाते हैं, ताकि इन्हें आसानी से न पहचाना जाए।

ऑपरेशन महादेव 28 जुलाई 2025 को जम्मू-कश्मीर के दाचीगाम जंगल में शुरू किया गया था, जिसमें भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस, और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) ने हिस्सा लिया था।

आतंकियों के पास मिले आधार कार्ड

इस ऑपरेशन में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने टेक्निकल सर्विलांस का भी इस्तेमाल किया था। केवल ह्यूमन इंटेलिजेंस पर भरोसा करने के बजाय उन्होंने सैटेलाइट इमेजरी, LoRa और सैटेलाइट फोन के रेडियो सिग्नल, और ड्रोन से निगरानी जैसी आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया। साथ ही आतंकियों की लोकेशन पुख्ता करने के लिए हीट सिग्नेचर ड्रोन का भी इस्तेमाल किया गया।

वहीं, हर बार जब कोई कम्यूनिकेशन डिवाइस एक्टिव होती, उसका सिग्नल ट्रैक कर लिया जाता और उस इलाके में सर्च अभियान चलाया जाता। यह ऑपरेशन बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योंकि महादेव का इलाका घने जंगलों, गुफाओं और ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

एक और अहम बात जो सामने आई, वह थी आतंकियों के पास से मिले भारतीय आधार कार्ड। ये कार्ड श्रीनगर और गांदरबल के नामों से थे। इससे यह आशंका और गहराई कि पाकिस्तान से आने वाले आतंकी भारतीय ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) की मदद से या तो फर्जी आधार कार्ड बनवा लेते हैं या खरीद लेते हैं, ताकि वे स्थानीय दिखें और चेकपोस्ट पर शक न हो। सूत्रों का कहना है कि आतंकियों की यह रणनीति सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बनती जा रही है।

गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बताया था कि मारे गए तीनों आतंकी वही थे, जिन्होंने अप्रैल में बैसारन घाटी में नरसंहार किया था। उनकी पहचान चार चश्मदीदों ने की गई, जिनमें बैसारन हमले में बचे हुए लोग और दो स्थानीय लोग शामिल थे, जिन्होंने आतंकियों को शरण दी थी। आतंकियों में शामिल थे सुलेमान शाह (लश्कर-ए-तैयबा का ट्रेनिंग सेंटर मुरिदके से प्रशिक्षित कमांडर), हामिद अफगानी (अफगान मूल का आतंकी) और जिबरान (जो पहले भी Z-मोर सुरंग पर हमले में शामिल रहा था)।

Himgiri Project 17A: भारतीय नौसेना को मिला नीलगिरि क्लास का तीसरा फ्रिगेट “हिमगिरी”, प्रोजेक्ट 17A का यह स्टील्थ वॉरशिप ब्रह्मोस मिसाइल से है लैस

Himgiri Project 17A: Indian Navy Inducts Third Nilgiri-Class Stealth Frigate Equipped with BrahMos Missiles
Photo: Indian Navy

Himgiri Project 17A: भारतीय नौसेना के लिए गुरुवार का दिन बेहद खास रहा है। कोलकाता में गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने प्रोजेक्ट 17A के तहत अत्याधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट हिमगिरी को 31 जुलाई 2025 को भारतीय नौसेना को सौंप दिया। यह युद्धपोत ‘प्रोजेक्ट 17ए’ के तहत बनने वाले नीलगिरि क्लास फ्रिगेट्स में से तीसरा है और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) द्वारा बनाया गया पहला फ्रिगेट है। हिमगिरी को 14 दिसंबर 2020 को कोलकाता की हुगली नदी में लॉन्च किया गया था।

INS Mahendragiri: जानें भारतीय नौसेना को कब मिलने जा रहा है सबसे आधुनिक स्वदेशी स्टील्थ युद्धपोत, पढ़ें क्या है प्रोजेक्ट 17A?

Himgiri Project 17A: हिमगिरी है नया अवतार

हिमगिरी का नाम भारतीय नौसेना के एक पुराने लैंडर-क्लास फ्रिगेट, INS हिमगिरी, से लिया गया है, जिसने 1974 से 2005 तक 30 साल तक देश की सेवा की। पुराना हिमगिरी एक भाप से चलने वाला वॉरशिप था, जिसे 6 मई 2005 को सेवा से हटा लिया गया। नया हिमगिरी आधुनिक तकनीक, स्टील्थ (रडार से बचने की क्षमता), और शक्तिशाली हथियारों से लैस है। खास बात यह है कि नए हिमगिरी को स्वदेश में ही डिजाइन और निर्मित किया गया है।

क्या है प्रोजेक्ट 17A

प्रोजेक्ट 17A को नीलगिरी क्लास के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय नौसेना के लिए सात अत्याधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट बनाने जाने हैं। ये फ्रिगेट शिवालिक-क्लास (प्रोजेक्ट 17) का अपग्रेड वर्जन हैं, जो पहले से ही नौसेना में एक्टिव है। प्रोजेक्ट 17A को 2015 में भारत सरकार ने मंजूरी दी थी, और इसका कुल खर्च लगभग 45,381 करोड़ रुपये (2023 में $8.1 बिलियन के बराबर) है। इन सात फ्रिगेट में से चार का निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई में हो रहा है, जबकि तीन का निर्माण GRSE, कोलकाता में हो रहा है। हिमगिरी GRSE का बनाया पहला फ्रिगेट है, जिसे 31 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया। बाकी पांच फ्रिगेट 2026 के अंत तक चरणबद्ध तरीके से सौंपे जाएंगे।

इन फ्रिगेट की लंबाई 149 मीटर, वजन 6,670 टन, और गति 28 नॉट है। ये जहाज न केवल ताकतवर हैं, बल्कि एर्गोनॉमिक डिजाइन के साथ बनाए गए हैं, ताकि नाविकों को ऑपरेट करने में आसानी हो।

प्रोजेक्ट 17A के तहत बनाए जा रहे सात फ्रिगेट नीलगिरी, उदयगिरी, हिमगिरी, तारागिरी, दूनागिरी, विंध्यगिरी, और महेंद्रगिरी शामिल हैं। ये वॉरशिप ब्लू वॉटर में ऑपरेट करने के लिए बनाए गए हैं, जो पारंपरिक और गैर-पारंपरिक खतरों, जैसे पनडुब्बी हमले, हवाई हमलों, और सरफेस अटैक से निपट सकते हैं।

ब्रह्मोस से लैस है हिमगिरी

हिमगिरी और प्रोजेक्ट 17A के बाकी फ्रिगेट भी कई मायनों में खास हैं। ये युद्धपोत समुद्र में सभी तरह की चुनौतियों हवा, सतह, और पानी के नीचे होने वाले खतरों से से निपटने के लिए डिजाइन किए गए हैं। हिमगिरी में स्टील्थ तकनीक का प्रयोग किया गया है। हिमगिरी का डिजाइन रडार सिग्नल को कम करने के लिए बनाया गया है, जिससे इसे दुश्मन के रडार पर पकड़ना मुश्किल हो। इसका स्ट्रक्चर और साइज रडार तरंगों को अवशोषित और विक्षेपित करता है, जिससे यह “अदृश्य” जैसा बन जाता है। इसके इंफ्रारेड सिग्नेचर को इस तरह से तैयार किया गया है कि यह आधुनिक रडार और निगरानी सिस्टम से खुद को छुपा सके।

हिमगिरी में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (मैक 3 की गति), मध्यम दूरी की सतह-से-हवा मिसाइल (सर्फेस-टू-एयर मिसाइल), भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) की बनाई 76 मिमी की ओटो मेलारा नौसैनिक कैनन, और 30 मिमी व 12.7 मिमी की तेजी से फायर करने वाली क्लोज-इन वेपन सिस्टम्स शामिल हैं। यह सभी हथियार और सेंसर इसे एक मल्टी-मिशन युद्धपोत बनाते हैं, जो समुद्री युद्ध, निगरानी, बचाव और सुरक्षा अभियानों को एकसाथ अंजाम दे सकता है।

तय समयसीमा में बना है हिमगिरी

हिमगिरी को भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो (WDB) ने डिजाइन किया है। इसकी देखरेख कोलकाता की वारशिप ओवरसीइंग टीम ने की है। प्रोजेक्ट 17A में इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन की कॉन्सेप्ट का इस्तेमाल किया गया हैं, जिसमें 300 टन के बड़े ब्लॉक पहले से तैयार किए जाते हैं और फिर जोड़े जाते हैं। इससे निर्माण समय कम होता है और क्वॉलिटी बेहतर रहती है। हिमगिरी तय समयसीमा यानी 37 महीनों में बनकर तैयार हुआ है।

Himgiri Project 17A: Indian Navy Inducts Third Nilgiri-Class Stealth Frigate Equipped with BrahMos Missiles
Photo: Indian Navy

GRSE ने अपने बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाते हुए इसमें “गोलियथ” गैन्ट्री क्रेन, मॉड्यूलर वर्कशॉप, और गीला बेसिन शामिल की हैं। जिससे बड़े वॉरशिप बनााने में मदद मिलती है। यह युद्धपोत 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से निर्मित है और इसके निर्माण में 200 से अधिक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) की भागीदारी रही है। इससे 4,000 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और 10,000 से ज्यादा को परोक्ष रोजगार मिला है।

हिमगिरी में CODOG (कम्बाइंड डीजल ऑर गैस) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है, जिसमें एक डीजल इंजन और एक गैस टरबाइन शामिल होते हैं। यह सिस्टम कंट्रोल करने योग्य पिच प्रोपेलर (CPP) के जरिए दोनों शाफ्ट्स को ऑपरेट करता है, जो इसे 28 नॉट (लगभग 52 किमी/घंटा) की स्पीड देता है। इसके साथ ही इसमें इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम (IPMS) जहाज के सभी सिस्टम को एक साथ जोड़ता है, जिससे ऑपरेट करना आसान होता है।

Trump Threat India: ट्रंप की धमकी के बाद रूस से रिश्ता तोड़ेगा भारत? जब पुतिन पर नहीं चला बस, तो इंडिया पर कर रहा ‘आर्थिक हथियार’ का इस्तेमाल

Trump Threat India: Will New Delhi Break Ties with Russia Under Pressure? 'Economic Warfare' Tactics in Play as Putin Stands Firm
AI Image

Trump Threat India: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को एक बार फिर धमकी दी है। ट्रंप ने भारत पर रूस से हथियार और तेल खरीदने के लिए 25 प्रतिशत टैरिफ (आयात शुल्क) और पेनल्टी लगाने की चेतावनी दी है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर लिखा, “भारत हमेशा से अपने ज्यादातर हथियार रूस से खरीदता रहा है और रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है। इसलिए, 1 अगस्त से भारत को 25 प्रतिशत टैरिफ के साथ-साथ पेनल्टी भी देनी होगा।” लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि भारत के लिए अपने मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को रूस से अलग करना न तो आसान है और न ही व्यावहारिक।

ट्रंप की इस धमकी के बावजूद भारत के लिए रूस से अपने सैन्य उपकरणों का रिश्ता तोड़ना लगभग असंभव है। भारत की सेना का एक बड़ा हिस्सा रूसी हथियारों पर निर्भर है, और यह रिश्ता दशकों पुराना है, जो रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पर टिका है।

Russia Su-57E India offer: रूस का भारत को बड़ा ऑफर, Su-57E में लगा सकेंगे सुपर-30 वाले कॉन्फिगरेशन, पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की कमी होगी पूरी

Trump Threat India: ट्रंप की धमकी: टैरिफ और जुर्माना

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा: “भारत रूस से हथियारों और ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है… इसलिए 1 अगस्त 2025 से उस पर 25% टैरिफ और अतिरिक्त जुर्माना लगाया जाएगा।”

यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका और यूरोपीय देश रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस की आर्थिक मदद को लेकर भारत और चीन पर सवाल उठा रहे हैं।

भारत और रूस मिल कर बनाते हैं ब्रह्मोस

भारत की मिलिट्री ताकत का ज्यादातर हिस्सा रूस से खरीदे गए हथियारों पर टिका है। इसमें फाइटर जेट्स, टैंक, राइफलें, हेलीकॉप्टर और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। इसके अलावा, भारत और रूस मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल बनाते हैं, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी ताकत दिखाई थी। यह मिसाइल की सटीकता और ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने पाकिस्तान के सात एयरबेस को बुरी तरह से तबाह कर दिया था। और पाकिस्तान को कानोंकान खबर भी नहीं हो पई थी।

भारत की वायुसेना में सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमान, थलसेना में टी-90 टैंक, और नौसेना में कई जहाज और हेलीकॉप्टर रूसी मूल के हैं। जानकारों का अनुमान है कि भारत के मौजूदा सैन्य उपकरणों का 60 से 70 फीसदी हिस्सा रूस या पुराने सोवियत संघ से आता है। वहीं, यह निर्भरता केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। बल्कि इनकी मेंटेनेंस, रिपेयर, और ओवरहॉलिंग की पूरी व्यवस्था भी रूसी तकनीक पर चलती है। भारत में कई कारखाने, जैसे चेन्नई के पास टी-90 टैंक बनाने वाली फैक्ट्री और लखनऊ के पास अमेठी में एके-203 राइफल बनाने वाली फैक्टरी सभी रूसी मदद से ही चल रहे हैं।

रूस देता है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सुविधा

रूस भारत की एक खास जरूरत को पूरा करता है, जो पश्चिमी देश नहीं करते। वह है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर। रूस ने भारत को सिर्फ हथियार ही नहीं दिए, बल्कि उनकी टेक्नोलॉजी को भारत में बनाने की इजाजत भी दी। मिसाल के तौर पर, सुखोई-30 एमकेआई विमानों का ज्यादातर हिस्सा भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बनाता है। ब्रह्मोस मिसाइल का उत्पादन भी भारत और रूस की साझेदारी का नतीजा है।

वहीं, अमेरिका के साथ भारत का रिश्ता ज्यादातर खरीद-बिक्री तक ही सीमित रहा है। पिछले डेढ़ दशक में भारत ने अमेरिका से करीब 20 अरब डॉलर के हथियार खरीदे। इनमें जनरल इलेक्ट्रिक एफ-404 इंजन, बोइंग पी8-आई निगरानी विमान, सी-17 और सी-130जे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, और चिनूक, अपाचे, और एमएच-60आर अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। लेकिन, अमेरिका ने इनमें से किसी भी बड़े हथियार की टेक्नोलॉजी भारत को नहीं दी है। जबकि यह भारत के लिए घाटे का सौदा है, क्योंकि स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जरूरी है।

शीत युद्ध से शुरू हुआ था रिश्ता

भारत और रूस (या पुराने सोवियत संघ) का सैन्य सहयोग शीत युद्ध के समय से शुरू हुआ। उस वक्त पश्चिमी देश भारत जैसे “गुटनिरपेक्ष” देश को एडवांस हथियार देने से कतराते थे। सोवियत संघ ने भारत पर भरोसा जताया और हथियारों की सप्लाई शुरू की। सोवियत हथियार न सिर्फ अच्छे थे, बल्कि पश्चिमी हथियारों से सस्ते भी थे। यह सौदा भारत जैसे विकासशील देश के लिए बहुत मायने रखता था।

रूस ने भारत को लाइसेंस के तहत हथियार बनाने की अनुमति दी, जिसके चलते भारत में डिफेंस प्रोडक्शन शुरू हुआ। आज भारत में आज भी हजारों सैनिक और इंजीनियर हैं जिन्होंने रूसी सिस्टम्स पर ट्रेनिंग ली हुई है। जो हथियारों की मेंटेनेंस, रिपेयर, और ओवरहॉलिंग का काम देखते हैं। यह सिस्टम इतनी गहराई तक पैठ बना चुका है कि अब किसी और देश के हथियार को रूसी हथियारों से बदलना आसान नहीं है।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार खरीदार

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट्स के अनुसार 2010-2014 में भारत के कुल हथियार आयात का 72% रूस से था, जो 2015-2019 में घटकर 55% और 2020-2024 में 36% रह गया। इस दौरान भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा।

2015-2019 में भारत के हथियार आयात में रूस का योगदान करीब 55% था, जिसमें सुखोई-30 एमकेआई विमान, टी-90 टैंक और ब्रह्मोस मिसाइल जैसे हथियार शामिल थे। 2020-2024 में यह हिस्सा 36% तक कम हुआ, क्योंकि भारत ने फ्रांस (28%) और इजराइल (34%) जैसे पश्चिमी देशों से आयात बढ़ाया। फिर भी, रूस भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना रहा, जिसके पास भारत के लिए सबसे ज्यादा लंबित ऑर्डर थे।

रूस से आयात में कमी की वजह भारत का स्वदेशी हथियार उत्पादन बढ़ाना और पश्चिमी सप्लायर्स की ओर रुख करना है। हालांकि, रूसी हथियारों की कम लागत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सुविधा के चलते भारत की निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेश में ही हथियार बनाने पर जोर दे रही है। तेजस लड़ाकू विमान, अर्जुन टैंक, और ध्रुव हेलीकॉप्टर जैसे प्रोजेक्ट इसकी मिसाल हैं। लेकिन, इनके पूरी तरह तैयार होने और पुराने रूसी हथियारों की जगह लेने में अभी वक्त लगेगा।

भारत का रूस से तेल आयात: सस्ता सौदा, बड़ी रणनीति

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से तेल आयात में जबरदस्त इजाफा किया। पहले रूस भारत के तेल आयात का सिर्फ 0.2% हिस्सा था, लेकिन अब वह सबसे बड़ा सप्लायर है। वित्तीय वर्ष 2022 में भारत ने रूस से 2.1% तेल खरीदा, जिसका मूल्य 18,000 करोड़ रुपये था। 2024 तक यह हिस्सा 35.1% हो गया, और मूल्य 4,20,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गयाा। 2025 में आयात 35% रहा, जिसका अनुमानित मूल्य 3,70,000 करोड़ रुपये है। जुलाई 2024 में भारत ने 23,500 करोड़ रुपये का 19.4 मिलियन टन तेल आयात किया, जो कुल आयात का 40% था। अक्टूबर में यह 18,000 करोड़ रुपये (19%) रहा, जबकि नवंबर में 55% की गिरावट आई। मई 2025 में आयात 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन और जून में 2.08-2.2 मिलियन बैरल तक पहुंचा, जो दो साल का उच्चतम स्तर था। 2020-2025 के बीच भारत ने रूस से तेल आयात 96% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ाया, जिसमें 2024-2025 में 4,50,000 करोड़ रुपये के फॉसिल फ्यूल शामिल थे।

वहीं, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी कहते हैं कि रूस से तेल खरीदने से वैश्विक कीमतें $120-130 तक नहीं पहुंचीं। भारत ने मध्य पूर्व पर निर्भरता कम की, लेकिन ट्रंप की 25% टैरिफ और पेनल्टी लगाने की धमकी चुनौती है। रूस के शैडो टैंकर और भुगतान की जटिलताएं भी मुश्किलें बढ़ाती हैं। फिर भी, भारत ने अमेरिका, नाइजीरिया, और ब्राजील से आयात बढ़ाकर संतुलन बनाया। यह रणनीति भारत को आर्थिक और रणनीतिक लाभ दे रही है।

क्या होगा ट्रंप की धमकी का असर

ट्रंप की धमकी भारत के लिए नई चुनौती ला सकती है। अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी अक्सर भारत और चीन पर रूस से तेल और हथियार खरीदने का आरोप लगाते हैं। उनका कहना है कि इससे रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए पैसा मिलता है। लेकिन, भारत ने हमेशा अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखा है। भारत न तो पूरी तरह पश्चिमी देशों पर निर्भर है, न ही रूस को छोड़ने को तैयार है। भारत के लिए रूस से तेल खरीदना आर्थिक रूप से फायदेमंद है, क्योंकि रूस सस्ता तेल देता है। इसी तरह, सैन्य उपकरणों के मामले में रूस की सस्ती और विश्वसनीय आपूर्ति भारत की रक्षा जरूरतों के लिए जरूरी है।

रणनीतिक और आर्थिक कारण

भारत और रूस का रिश्ता सिर्फ हथियारों का नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का भी है। रूस भारत को न केवल हथियार देता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उसका साथ देता है। शीत युद्ध के बाद भी यह रिश्ता मजबूत रहा है। रूस से हथियार खरीदने की वजह से भारत को कई बार आलोचना का सामना भी करना पड़ता है। खासकर, यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ा है। लेकिन, भारत की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति ऐसी है कि उसे अपनी रक्षा के लिए रूस जैसे भरोसेमंद साथी की जरूरत है। भारत की सीमाएं दो बड़े पड़ोसियों चीन और पाकिस्तान से लगती हैं, और इनके साथ तनाव हमेशा बना रहता है। ऐसे में, रूसी हथियार सबसे कारगर साबित होते हैं।

इसके अलावा, रूस से हथियारों की आपूर्ति में देरी या यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस की अपनी सीमाएं भी भारत के लिए चिंता का विषय हैं। फिर भी, भारत ने रूस के साथ अपने रिश्ते को बनाए रखा है, क्योंकि इसका कोई तुरंत विकल्प नहीं है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

साउथ एशिया एक्सपर्ट माइकल कुजेलमैन कहते हैं, “भारत का रूस और फ्रांस के साथ “नो-ड्रामा” रिश्ता है, जो अमेरिका के साथ अक्सर तनावपूर्ण रहता है। ट्रंप की व्यापार धमकियों के चलते भारत-अमेरिका रिश्तों पर सवाल उठे, खासकर जब ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाकिस्तान तनाव में हस्तक्षेप किया। उनका मानना है कि भारत को रूस के साथ रिश्ता बनाए रखना चाहिए, क्योंकि वह भरोसेमंद है।”

आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल

वहीं विदेश मामलों के जानकार, ब्रह्मा चेल्लानी भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं, वह कहते हैं, “ट्रंप की धमकियां दिखाती हैं कि अमेरिका रणनीतिक सुरक्षा में भरोसेमंद नहीं है। भारत को रूस के साथ सैन्य और तेल संबंध बनाए रखने चाहिए, क्योंकि यह दीर्घकालिक हितों के लिए जरूरी है।”

वह आगे कहते हैं, “पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के सामानों पर 25% आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने और रूस से तेल खरीद जारी रखने पर सजा के तौर पर अतिरिक्त टैक्स लगाने के फैसले से दोनों देशों के पहले से ही कमजोर हो चुके रिश्तों में और तनाव ला सकता है। यह अमेरिका की ओर से “सेकेंडरी टैरिफ” (दूसरे देश से व्यापार पर तीसरे देश को दंड) का पहला इस्तेमाल है, जिससे पता लगता है कि ट्रंप इसे आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।”

वह कहते हैं, जब ट्रंप ने पहले भारत के ऑटो पार्ट्स, स्टील और एल्युमिनियम पर टैक्स लगाया था, तब भारत ने कोई कड़ा जवाब नहीं दिया। भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) को जवाबी कदमों की सूचना जरूर दी थी, लेकिन बातचीत का रास्ता चुना। लेकिन अब अमेरिका लगातार भारत के विशाल और बढ़ते बाजार में पूरी पहुंच की मांग कर रहा है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार समझौता लंबे समय से अटका हुआ है।

झूठ बोल रहे हैं ट्रंप

ब्रह्मा चेल्लानी का कहना है कि पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच कुल व्यापार 130 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। इसके बावजूद ट्रंप का कहना है कि “हमने भारत के साथ वर्षों से ज्यादा व्यापार नहीं किया”, यह बयान न केवल झूठा है, बल्कि यह उनकी राजनीति में अतिशयोक्ति और भ्रम फैलाने की आदत को भी दिखाता है।

चीन के साथ उदार

चीन के साथ ट्रंप का रुख पूरी तरह बदलता रहा है। पहले जहां उन्होंने कड़ा रुख अपनाया था, वहीं अब बीजिंग में एक समझौते और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के लिए वह झुकाव दिखा रहे हैं। उन्होंने ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-टे पर भी दबाव डाला कि वह अपनी अमेरिका यात्रा को रद्द करें। आखिरकार, लाई ने अपनी पूरी लैटिन अमेरिका यात्रा ही रद्द कर दी।

यह कोई संयोग नहीं है कि अमेरिका के निशाने पर अब ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे स्वतंत्र और उभरते लोकतांत्रिक देश हैं, जो ग्लोबल साउथ (दक्षिणी दुनिया) का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमेरिका की “या तो हमारे साथ या हमारे खिलाफ” वाली सोच एक बार फिर उसकी विदेश नीति के केंद्र में आ रही है।

लेकिन ट्रंप का यह दबाव और धमकी का तरीका इन देशों पर काम करने वाला नहीं है। ये देश अपनी विदेश नीति और कारोबारी फैसले स्वतंत्र रूप से लेते हैं और किसी भी बड़े देश की धमकी से डरकर अपनी रणनीति नहीं बदलने वाले हैं।

Defence Innovation: भारतीय सेना के इनोवेटर मेजर राज प्रसाद बोले- इंजीनियरिंग छात्रों को भी मिले रक्षा कंपनियों में काम करने का मौका

Defence Innovation: Army Innovator Maj Raj Prasad Says Engineering Students Should Be Placed in Defence PSUs
Kanu Sarda from The Week interacted with Major Raj Prasad during The Week Education Conclave held in New Delhi. (Photo By The Week)

Defence Innovation:भारतीय सेना की इंजीनियरिंग कोर से जुड़े मेजर राज प्रसाद का कहना है कि जैसे सिविल इंजीनियरिंग छात्रों को सीआरआरआई (Compulsory Rotary Residential Internship) जैसे संस्थानों में इंटर्नशिप का मौका मिलता है, वैसे ही इंजीनियरिंग छात्रों को डिफेंस सेक्टर की सार्वजनिक कंपनियों में भी मौका मिलना चाहिए। मेजर राज प्रसाद भारतीय सेना में इनोवेटर हैं और उनके चार इनोवेशंस को भारतीय में बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्हें एनएसजी काउंटर IED इनोवेटर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

NSG International Seminar: आतंकवाद के खिलाफ स्वदेशी हथियारों से वार, मेजर राजप्रसाद को किया एनएसजी काउंटर आईईडी इनोवेटर अवॉर्ड से सम्मानित

नई दिल्ली में आयोजित ‘द वीक एजुकेशन कॉन्क्लेव’ के दौरान मेजर राज प्रसाद ने शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीक के बारे बात करते हुए कहा कि भारत को सिर्फ विदेशी तकनीक को अपनाने वाला देश नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमें खुद अपनी तकनीक विकसित करने वाला देश बनना चाहिए। मेजर प्रसाद ने कहा, “भारतीय सेना सिर्फ लड़ाई नहीं लड़ती, हम टेक्नोलॉजी वाले सोल्जर हैं।” उन्होंने बताया कि सेना के पास रडार, ड्रोन, वायरलेस डेटोनेटर जैसी कई तकनीकें हैं, और इन्हें चलाने व डेवलप के लिए बेहतरीन दिमाग की जरूरत है। इसमें आम छात्रों और नागरिकों की भी मदद ली जा सकती है।

उन्होंने बताया कि अब तक उन्होंने 12 टेक्नोलॉजी इनोवेशन बनाए हैं, जिनमें से 4 भारतीय सेना में इस्तेमाल हो रहे हैं। इनमें से एक वायरलेस डेटोनेशन सिस्टम है जो बिना तार के 2.5 किलोमीटर दूर से विस्फोट कर सकता है और एक ऐसा सिस्टम है जो बिना आदमी की जान को खतरे में डाले बारूदी सुरंगों का पता लगा सकता है। ये तकनीकें युद्ध के दौरान कई सैनिकों की जान बचा चुकी हैं। इनमें से वायरलेस डेटोनेशन सिस्टम को पेटेंट भी किया जा चुका है।

उन्होंने भारतीय सेना के इनोवेशन फ्रेमवर्क के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सफलता की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा, “हमने एक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मॉडल तैयार किया। फील्ड ट्रायल्स के बाद हमारे सिस्टम्स को प्राइवेट कंपनियों को सौंप दिया गया ताकि उनका बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन किया जा सके। इससे न सिर्फ रेवेन्यू आया, बल्कि हमारी मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटी भी बढ़ी और जॉब्स भी क्रिएट हुईं।”

पुणे स्थित कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग में इनोवेशन प्रोग्राम्स के हेड और फिलहाल आईआईटी दिल्ली में आर्मी टेक्नोलॉजी सेल की जिम्मेदारी संभाल रहे मेजर प्रसाद सशस्त्र बलों और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि अभी तक आईआईटी दिल्ली को 24 टेक्नोलॉजी प्रपोजल्स मिले हैं और सेना सितंबर में एक एकेडेमिया सेमिनार आयोजित करने की योजना बना रही है, ताकि देशभर के संस्थानों को जोड़ा जा सके।

भारत में टैलेंट पाइपलाइन तैयार करने के तरीके पर फिर से सोचने की जरूरत बताते हुए, मेजर प्रसाद ने एमबीबीएस इंटर्नशिप मॉडल को आईआईटी ग्रेजुएट्स पर भी लागू करने का सुझाव दिया। उन्होंने पूछा, “अगर मेडिकल स्टूडेंट्स को हॉस्पिटल्स में एक साल की सेवा करनी पड़ती है, तो इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स को डिफेंस पीएसयूज में एक या दो साल के लिए क्यों नहीं भेजा जा सकता, ताकि वे स्वदेशी टेक्नोलॉजी डेवलप कर सकें?”

मेजर प्रसाद ने कहा कि सिर्फ लिखित परीक्षा पास करना ही काफी नहीं, हमें छात्रों के प्रोजेक्ट, रुचियों और असली दुनिया में उनके काम को भी महत्व देना चाहिए। इससे असली टैलेंट की पहचान होगी। उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस छात्रों को ढेर सारी जानकारी दे रहा है, लेकिन छात्रों को सही दिशा दिखाना अभी भी शिक्षकों की जिम्मेदारी है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि डिफेंस टेक्नोलॉजी जैसे हाई प्रेशर सेक्टर में मानसिक स्वास्थ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

मेजर प्रसाद ने चेतावनी दी कि दुनिया में तकनीक बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है और हमें भी उस रफ्तार से खुद को तैयार करना होगा। उन्होंने सरकार द्वारा शुरू किए गए iDEX जैसे प्लेटफॉर्म्स का जिक्र किया, जिनके जरिए नए इनोवेटर्स और स्टार्टअप्स भी सेना के साथ मिलकर टेक्नोलॉजी डेवलप कर सकते हैं।

मेजर प्रसाद ने कहा कि “विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत तब तक संभव नहीं है जब तक हम चिप से शुरू होकर अपनी तकनीकी क्षमताएं खुद नहीं बनाते। सरकार ने जरूरी प्लेटफॉर्म तैयार कर दिए हैं, अब जमीन पर काम करने वाले लोगों की जिम्मेदारी है कि वे इसमें भाग लें और इसे सफल बनाएं।” आखिर में उन्होंने छात्रों को कहा, “जो भी सेक्टर चुनो, उसमें सबसे बेहतर बनो। भीड़ के पीछे मत चलो, खुद को एक्सपर्ट बनाओ।”

Project Dantak: भूटान के दौरे पर बीआरओ के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन, किंग और प्रधानमंत्री से की मुलाकात

BRO Chief Lt Gen Raghu Srinivasan Visits Bhutan, Meets King and Prime Minister under Project Dantak Initiative
DGBR Lt Gen Raghu Srinivasan Calls on Bhutan’s King Jigme Khesar Namgyel Wangchuck During Official Visit (Photo: BRO)

Project Dantak: सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासनल इन दिनों भूटान की यात्रा पर हैं। वे 2 अगस्त 2025 तक भूटान के आधिकारिक दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वे भूटान में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को लेकर बीआरओ की भूमिका को लेकर चर्चा करेंगे। बता दें कि बॉर्डर रोड आर्गेनाइजेशन भूटान में पहले से ही प्रोजेक्ट दंतक चला रहा है।

Sasoma-DBO Road: चीन की नजरों में आए बिना डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी में तेजी से तैनात हो सकेगी भारतीय सेना, 2026 के आखिर तक तैयार हो जाएगा नया रूट

लेफ्टिनेंट जनरल रघु श्रीनिवासन ने इस दौरान प्रोजेक्ट दंतक के तहत भूटान में चल रही और प्रस्तावित सड़क परियोजनाओं की समीक्षा भी की। प्रोजेक्ट दंतक 1960 में शुरू हुआ था, भूटान के सामाजिक-आर्थिक विकास (सोशियो-इकोनॉमिक डेवलपमेंट) में एक अहम साझेदार रहा है। इस दौरे के दौरान, डीजीबीआर ने भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक से भी मुलाकात की। इस दौरान भूटान के राजा ने प्रोजेक्ट दंतक के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में योगदान की सराहना की। इसके अलावा, डीजीबीआर लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवासन भूटान के प्रधानमंत्री ल्योनछेन दाशो शेरिंग तोबगे से भी मिले। प्रधानमंत्री ने प्रोजेक्ट दंतक और बीआरओ के प्रयासों को भारत-भूटान सहयोग का आधार बताया और भूटान के व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास में उनके योगदान के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने इस लंबी साझेदारी को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

Project Dantak: कॉन्फ्लुएंस-हा रोड का उद्घाटन

उनके इस दौरे के दौरान 1 अगस्त 2025 को भूटान के प्रधानमंत्री कॉन्फ्लुएंस-हा रोड का उद्घाटन भी करेंगे। प्रोजेक्ट दंतक के तहत इस महत्वपूर्ण सड़क खंड को प्राइमरी नेशनल हाईवे के मानकों पर अपग्रेड किया गया है। वानाखा से हा तक के इस रास्ते में पांच नए पुल, बेहतर रोड जियोमेट्री, और एडवांस सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं। यह परियोजना 254 करोड़ रुपये की लागत से पूरी हुई है और यह हर मौसम में हा घाटी तक बेहतर कनेक्टिविटी मिलेगी। वहीं, इस सड़क के बन जाने से क्षेत्रीय विकास, टूरिज्म, और मिलिट्री लॉजिस्टिक्स को भी बड़ा फायदा होगा। हा घाटी की प्राकृतिक सुंदरता को देखने आने वाले पर्यटकों के लिए यह सड़क यात्रा को और सुगम बनाएगी।

भूटान के लिए महत्वपूर्ण है Project Dantak

प्रोजेक्ट दंतक ने 1960 में अपनी शुरुआत के बाद से भूटान के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य (लैंडस्केप) को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके तहत फुंतशोलिंग-थिम्पू राजमार्ग से लेकर पारो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दवाथांग अस्पताल, इंडिया हाउस एस्टेट, शेरुब्त्से कॉलेज, भूटान ब्रॉडकास्टिंग सर्विस स्टेशन जैसे कई एतिहासिक प्रोजेक्ट्स को पूरा किया है। हाल के वर्षों में, प्रोजेक्ट दंतक ने तख्ती पुल, कॉन्फ्लुएंस-हा और नंगालम-दवाथांग सड़कों पर मॉड्यूलर स्टील पुल, और दारंगा-त्राशिगांग और खोथाक्पा-त्शोबाले सड़कों को अपग्रेड करने के अलावा खासकर पूर्वी भूटान में कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स भी पूरे किए हैं।

फिलहाल, प्रोजेक्ट दंतक पश्चिमी और पूर्वी भूटान में कई महत्वपूर्ण सड़कों के निर्माण और सुधार में लगा हुआ है। इनमें खोथाक्पा-त्शोबाले, नंगालम-पनबांग, दवाथांग-सामद्रुपचोलिंग, और समरंग-जोमोत्सांगखा सड़कें शामिल हैं।

डीजीबीआर के दौरे के दौरान कई नई परियोजनाओं और सहयोग के क्षेत्रों पर चर्चा होने की उम्मीद है। प्रोजेक्ट दंतक की मौजूदा परियोजनाएं, जैसे खोथाक्पा-त्शोबाले और नंगालम-पनबांग सड़कें, भूटान के सुदूर क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ये सड़कें न केवल स्थानीय लोगों के लिए आवागमन को आसान बनाएंगी, बल्कि व्यापार और पर्यटन को भी बढ़ावा देंगी।

Army convoy accident in Ladakh: लद्दाख के गलवान में सेना के काफिले पर गिरा बोल्डर, एक अफसर और एक जवान शहीद, तीन अधिकारी गंभीर रूप से जख्मी

Army Convoy Accident in Ladakh: Boulder Crash in Galwan Kills Officer and Jawan, Three Others Critically Injured
Photo by Sources

Army convoy accident in Ladakh: लद्दाख के दुर्गम और संवेदनशील गलवान इलाके में बुधवार सुबह सेना के एक काफिले के साथ एक बड़ा हादसा हो गया। सुबह लगभग 11:30 बजे (1130 घंटे), जब भारतीय सेना का काफिला दरबुक से चोंगताश की ओर नियमित प्रशिक्षण गतिविधि के लिए जा रहा था, तभी अचानक चारबाग (गलवान) इलाके में एक खड़ी चट्टान से एक विशालकाय बोल्डर अचानक सीधे एक सैन्य वाहन पर आ गिरा।

Army Convoy Accident in Ladakh: Boulder Crash in Galwan Kills Officer and Jawan, Three Others Critically Injured
Lieutenant Colonel Bhanu Pratap Singh and Lance Dafadar Daljeet Singh (Pic by 14 Corps)

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: एलएसी पर चीन को टक्कर देने की तैयारी, अक्टूबर तक न्योमा एयरस्ट्रिप पर लैंड कर सकेंगे मिग-29 और सुखोई-30 फाइटर जेट

हादसे में 14 हॉर्स (सिंध हॉर्स) रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल भानु प्रताप सिंह मणकोटिया और नायक दलजीत सिंह की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन अन्य अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों में शामिल हैं: मेजर मयंक शुभम 14 हॉर्स (सिंध हॉर्स), मेजर अमित दीक्षित और कैप्टन गौरव (60 आर्मर्ड रेजिमेंट)। ये सभी अधिकारी 60 आर्मर्ड रेजिमेंट के वाहन में सवार थे।

यह इलाका अपनी कठोर भौगोलिक परिस्थितियों, संकरी घाटियों और लैंडस्लाइड के लिए जाना जाता है। 60 आर्मर्ड रेजिमेंट, जो उच्च ऊंचाई और युद्ध स्थितियों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित होती है, उस समय इस इलाके से गुजर रही थी।

हादसे के तुरंत बाद साथ चल रही सेना की टुकड़ियों ने तत्काल बचाव अभियान शुरू किया। घायलों को हेलीकॉप्टर की मदद से लेह के 153 जनरल हॉस्पिटल पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है। सेना के मुताबिक, तीनों की हालत गंभीर बनी हुई है, और उन्हें विशेष चिकित्सा निगरानी में रखा गया है।

Army Convoy Accident in Ladakh: Boulder Crash in Galwan Kills Officer and Jawan, Three Others Critically Injured
Photo by Sources

भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन ने हादसे के बाद प्रभावित इलाके में फिर से सड़क खोलने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इंजीनियरिंग टीमों को मौके पर तैनात किया है। चारों ओर फैली बड़ी-बड़ी चट्टानों और संकरी सड़क के कारण राहत कार्य चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन सेना की दक्षता और तत्परता के चलते घायलों को समय पर इलाज मिल सका।

उनके साथ काम कर चुके एक अफसर ने बताया, “मणकोटिया मेरे बहुत ही प्रिय मित्र थे। हम दोनों ने साथ में IMTRAT में सेवा दी थी। यह खबर सुनकर मैं पूरी तरह स्तब्ध हूं। वे एक ऐसे अफसर थे जो जिम्मेदारी, मेहनत और अच्छे व्यवहार की मिसाल थे। वे इस बात का साक्षात उदाहरण थे कि एक सैन्य अधिकारी को कैसा होना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “लेफ्टिनेंट कर्नल बीपीएस मणकोटिया एक चौथी पीढ़ी के सैन्य अधिकारी थे। उन्होंने एनडीए, आईएमए और उसके बाद के सभी कोर्सेज में टॉप किया था। सिर्फ पिछले साल ही उन्हें डिफेंस सर्विस स्टाफ कॉलेज (DSSC) में अपने सर्विस क्रम में पहले स्थान पर रहने के लिए मानेकशॉ मेडल से भी सम्मानित किया गया था।”

लद्दाख जैसे सीमावर्ती और ऊंचाई वाले इलाकों में केवल दुश्मन की चुनौती नहीं, बल्कि प्रकृति भी सैनिकों के लिए एक बड़ा खतरा है। विशेषकर मानसून के मौसम में यहां भूस्खलन और चट्टानों के गिरने की घटनाएं आम हो जाती हैं, जो सेना की नियमित आवाजाही और ऑपरेशनल गतिविधियों के लिए गंभीर खतरा बनती हैं।

सेना और प्रशासन ने इस घटना के बाद नागरिकों और सैन्य वाहनों को चेतावनी जारी की है कि वे इस तरह के इलाकों में सावधानीपूर्वक यात्रा करें और मौसम की स्थिति को देखते हुए ही आगे बढ़ें। घटनास्थल पर जांच अभी जारी है और विस्तृत जानकारी जुटाई जा रही है।

Surya Dronathon 2025: स्पीति घाटी में भारतीय सेना का ‘सूर्य ड्रोनाथन 2025’, अगर ड्रोन सेक्टर में कुछ करने की है काबिलियत तो आप भी ले सकते हैं हिस्सा

Surya Dronathon 2025: Indian Army’s High-Altitude Drone Challenge in Spiti Valley
Photo By Indian Army

Surya Dronathon 2025: हिमाचल प्रदेश की बर्फीली और दुर्गम स्पीति घाटी देश के सबसे बड़े मिलिट्री ड्रोन कंपटीशन की मेजबानी करने जा रही है। भारतीय सेना की ‘सूर्य कमान’ (Surya Command) और ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया के सहयोग से ‘सूर्य ड्रोनाथन 2025’ (Surya Dronathon 2025) का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन आत्मनिर्भर भारत अभियान और सेना की आधुनिक तकनीक अपनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

Chinese parts in Drones: ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर भारतीय सेना में सप्लाई हो रहे चाइनीज ड्रोन! RTI कार्यकर्ता ने IdeaForge पर की कार्रवाई की मांग

Surya Dronathon 2025: कहां और कब होगा आयोजन?

‘सूर्य ड्रोनाथन 2025’ हिमाचल प्रदेश के सुमदो (Sumdo) में आयोजित होगा, जो स्पीति घाटी में समुद्र तल से लगभग 10,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां देश का सबसे ऊंचाई पर बना ड्रोन बाधा कोर्स (Obstacle Course) तैयार किया गया है, जहां प्रतियोगी कम ऑक्सीजन और तेज हवाओं में अपने ड्रोन की तकनीक, सटीकता और ताकत का प्रदर्शन करेंगे।

इस कार्यक्रम का आयोजन दो चरणों में होगा। पहला चरण 10 से 15 अगस्त 2025 और दूसरा चरण 20 से 24 अगस्त 2025 तक आयजित होगा। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि 5 अगस्त 2025 है। इस प्रतियोगिता में सिर्फ पुरस्कार ही नहीं मिलेंगे, बल्कि विजेताओं को सेना के साथ काम करने का अवसर भी मिलेगा। उनके ड्रोन सिस्टम्स को आगे चलकर भारतीय सेना की ऑपरेशनल रणनीति में शामिल किया जा सकता है।

कौन-कौन ले सकता है हिस्सा?

इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए तीन अलग-अलग कैटेगरीज बनाई गई हैं, जिससे देश के हर कोने से जुड़ी प्रतिभाएं इसमें हिस्सा ले सकें। पहली श्रेणी उन सैन्यकर्मियों (Service Personnel) के लिए है जो भारतीय सेना में कार्यरत हैं, चाहे वे जवान हों या अधिकारी। उनके लिए विशेष श्रेणी तय की गई है, ताकि वे अपने अनुभव के आधार पर ड्रोन तकनीक को और बेहतर बनाने में योगदान दे सकें। दूसरी श्रेणी ओपन कैटेगरी की है, जिसमें टेक्नोलॉजी में रुचि रखने वाले आम नागरिक, छात्र, युवा इनोवेटर और फ्रीलांस पायलट हिस्सा ले सकते हैं। यह श्रेणी खास तौर पर उन लोगों के लिए है जो किसी संगठन से जुड़े हुए नहीं है। लेकिन उसके पास आइडियाज और स्किल्स हैं। तीसरी श्रेणी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स यानी ओईएम के लिए रखी गई है, जिसमें ड्रोन बनाने वाली कंपनियां, स्टार्टअप्स और टेक इंडस्ट्री के अनुभवी खिलाड़ी अपने इनोवेशन के साथ हिस्सा ले सकते हैं।

प्रतियोगिता में क्या-क्या होगा?

इस प्रतियोगिता में प्रतिभागियों को अपने ड्रोन की क्षमताएं केवल दिखानी ही नहीं हैं, बल्कि उन्हें चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में परखना भी होगा। ड्रोन रेस के जरिए यह देखा जाएगा कि प्रतिभागी कितनी तेजी, सटीकता और संतुलन के साथ अपने ड्रोन को कंट्रोल कर सकते हैं। इसके बाद ऑब्सटेकल ट्रायल की बारी आएगी, जहां प्रतिभागियों को अपने ड्रोन को एक जटिल और अवरोधों से भरे मार्ग में सफलतापूर्वक उड़ाना होगा। यह परीक्षण इस बात की कसौटी है कि ड्रोन जटिल ऑपरेशनल इलाकों में कितनी कुशलता से काम कर सकता है। सबसे अहम है फील्ड टेस्टिंग, जो स्पीति घाटी की असली ऊंचाई, पतली हवा और अचानक बदलते मौसम की परिस्थितियों में आयोजित किया जाएगा। यहां ड्रोन को वास्तविक युद्ध जैसी स्थितियों में जांचा जाएगा कि क्या वह ड्रोन तेज हवाओं का सामना कर सकता है, क्या उसका कम्यूनिकेशन सिस्टम इन पहाड़ियों में काम करती है, और क्या वह सैनिकों की जरूरत के अनुसार तुरंत कार्रवाई में सक्षम है। इन सभी ट्रायल्स का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कौन सा ड्रोन वाकई भारतीय सेना की जमीनी जरूरतों को पूरा कर सकता है, विशेषकर उन दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्रों में जहां पारंपरिक तरीकों से निगरानी या सपोर्ट मुश्किल होता है।

क्या है इस आयोजन का उद्देश्य?

‘सूर्य ड्रोनाथन’ का मकसद है स्वदेशी ड्रोन तकनीक को बढ़ावा देना। यानि भारत में ही बने ड्रोन, उनके सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर को प्राथमिकता देकर आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम उठाना। साथ ही यह आयोजन इनोवेशन को भी बढ़ावा देना है। जहां कोई भी युवा या अनुभवी इनोवेटर अपनी प्रतिभा दिखा सकता है। इस ड्रोनाथन की एक खास बात यह भी है कि इसका सारा फोकस सेना की जमीनी जरूरतों को समझने और उन्हें पूरा करने वाले समाधान खोजने पर है। मतलब अब रक्षा टेक्नोलॉजी सिर्फ बड़ी कंपनियों के दायरे तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वो लोग भी इसमें हिस्सा ले सकते हैं जो सेना की चुनौतियों को करीब से समझते हैं चाहे वे स्टार्टअप हों, छात्र हों या फ्रीलांसर। यही नहीं, इस पहल के जरिए रक्षा क्षेत्र में सेना और उद्योगों के बीच सीधा संवाद और सहयोग भी बढ़ेगा।