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LUH RFI: पुराने चेतक-चीता बेड़े की जगह सेना और वायुसेना को चाहिए 200 नए हल्के हेलिकॉप्टर, जारी की आरएफआई, ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी को प्राथमिकता

LUH RFI Army, IAF Seek 200 Light Helicopters to Replace Ageing Chetak-Cheetah Fleet
Photo: Indian Army

LUH RFI: रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेनाओं के नए टोही और निगरानी हेलिकॉप्टरों (रिकॉनिसेंस एंड सर्विलांस हेलिकॉप्टर – RSH) की खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए मौजूदा चेतक और चीता हेलिकॉप्टर बेड़े को बदलने की योजना के तहत रक्षा मंत्रालय ने रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी की है। इसके तहत कुल लगभग 200 हेलिकॉप्टर खरीदे जाएंगे, जिनमें 120 भारतीय सेना और 80 भारतीय वायुसेना के लिए होंगे।

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LUH RFI: इन कामों में होंगे इस्तेमाल

इन हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल दिन और रात में विभिन्न मिशनों के लिए किया जाएगा। इनका इस्तेमाल टोही और निगरानी, छोटे दस्ते या क्विक रिएक्शन टीम की तैनाती, ग्राउंड ऑपरेशंस में आंतरिक और बाहरी लोड ले जाना, अटैक हेलिकॉप्टर के साथ स्काउट मिशन, खोज और बचाव अभियान और सिविल एडमिनिस्ट्रशन को इमरजेंसी सपोर्ट जैसे कामों में किया जाएगा। आरएफआई में स्पष्ट किया गया है कि ये हेलीकॉप्टर ढलान वाले हेलीपैड, बर्फ, रेत और पानी से ढके क्षेत्रों में उतरने और उड़ान भरने में सक्षम होना चाहिए। इसके अलावा, इनमें आकाशीय बिजली से सुरक्षा, गोला-बारूद से बचाव और लंबे समय तक खुले में खड़े रहने की क्षमता होनी चाहिए।

LUH RFI: नाइट विजन गॉगल से हों लैस

वहीं, ये नए हेलिकॉप्टर सिंगल या ट्विन इंजन डिजाइन के हो सकते हैं और इनमें अधिकतम पेलोड क्षमता, ऊंचाई पर उड़ान और विभिन्न मौसम परिस्थितियों में काम करने की क्षमता होनी चाहिए। फ्यूल सिस्टम की बात करें, तो इनमें हॉट रिफ्यूलिंग और प्रेशर रिफ्यूलिंग की सुविधा, साथ ही प्रोजेक्टाइल से सुरक्षा अनिवार्य होगी। कॉकपिट नाइट विजन गॉगल (NVG) से लैस होना चाहिए और इसमें ऑटो-पायलट, आधुनिक एवियोनिक्स और एडवांस कम्यूनिकेशन सिस्टम होना चाहिए।

LUH RFI: इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के खतरों से सुरक्षा

साथ ही, नए हेलिकॉप्टर ऐसे होने चाहिए जो हथियारों और मिशन सिस्टम के साथ इंटीग्रेट किए जा सकें। इनमें रॉकेट, गन पॉड, एंटी-टैंक मिसाइल, एयर-टू-एयर मिसाइल और पिंटल माउंटेड गन लगाए जा सकें। इनके साथ सर्विलांस सिस्टम, लॉइटर म्यूनिशन और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन जैसे एडवांस इक्विपमेंट भी जोड़े जा सकें। आरएफआई में कहा गया है कि प्लेटफॉर्म में सेल्फ-प्रोटेक्शन सूट जैसे लेजर वार्निंग रिसीवर (LWR), रडार वार्निंग रिसीवर (RWR) और मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम (MAWS) लगाए जा सकें, ताकि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर खतरों से भी सुरक्षा मिल सके।

#CAS Air Chief Marshal AP Singh took to the skies in the Light Utility Helicopter at #AeroIndia2025, praising its performance and flight experience
Photo: HAL

‘मेक इन इंडिया’ और ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी को प्राथमिकता

सरकार ने इस खरीद प्रक्रिया में विदेशी निर्माताओं को भी मौका दिया है। सरकार ने आरएफआई में साफ किया है ‘मेक इन इंडिया’ और ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। मतलब, जो भी कंपनी ये हेलिकॉप्टर बनाएगी, उसे जरूरी तकनीक भारत को देनी होगी और यहां पर ही फैक्ट्री लगाकर उत्पादन करना होगा। ToT के तहत पावर प्लांट, रोटर सिस्टम, ट्रांसमिशन सिस्टम, एवियोनिक्स और बाकी जरूरी हिस्सों की तकनीक भारत लाई जाएगी, ताकि उनका निर्माण देश में हो सके। इसके साथ ही कंपनियों को यह भी बताना होगा कि हेलिकॉप्टर में कितनी स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल होगी, वे किन कंपनियों के साथ साझेदारी करेंगी और उनकी उत्पादन क्षमता कितनी है।

ट्रायल इवैल्यूएशन ‘नो कॉस्ट, नो कमिटमेंट’ आधार पर

आरएफआई में बताया गया है कि ट्रेनिंग के लिहाज से सप्लायर्स को यह बताना होगा कि क्या हेलिकॉप्टर बिना किसी विशेष बदलाव के ट्रेनिंग मिशन के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। पायलट और तकनीकी कर्मचारियों के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम, सिम्युलेटर और वर्चुअल मेंटेनेंस ट्रेनर की उपलब्धता भी स्पष्ट करनी होगी। वहीं, यह खरीद प्रक्रिया ‘सिंगल स्टेज–टू बिड सिस्टम’ के तहत पूरी होगी, जिसमें टेक्निकल और फाइनेंशियल प्रपोजल अलग-अलग लिफाफों में जमा होंगे। तकनीकी मूल्यांकन के बाद हेलिकॉप्टरों का ट्रायल इवैल्यूएशन ‘नो कॉस्ट, नो कमिटमेंट’ आधार पर किया जाएगा। वहीं, कॉन्ट्रैक्ट के सप्लायर को लाइफ टााइम स्पेयर पार्ट्स और मैंटेनेंस इक्विपमेंट्स उपलब्ध कराने होंगे।

मार्च में, भारतीय वायुसेना पहले ही काफी संख्या में यूटिलिटी हेलिकॉप्टरों और अन्य डिफेंस प्लेटफॉर्म की खरीद की योजना बना चुकी थी। संसद में पेश स्थायी रक्षा समिति की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025-26 के लिए प्रमुख प्रस्तावित खरीद में लो-लेवल रडार, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA), लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH), मल्टी-रोल हेलिकॉप्टर और किराए पर लिए जाने वाले मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान शामिल हैं।

इसके अलावा, कैबिनेट सिक्योरिटी कमेटी ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड से 45,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 156 लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर (LCH) खरीदने को भी मंजूरी दी है। ये 156 हेलिकॉप्टर, जो क्षमता में RSH जैसे हैं, जो भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना में बांटे जाएंगे। साथ ही, ये हेलीकॉप्टर चीन और पाकिस्तान सीमा पर मिशन में इस्तेमाल होंगे।

Indian Army Rudra Brigades: पूर्वी लद्दाख और सिक्किम में तैनात होंगी भारतीय सेना की नई ‘रुद्र’ ब्रिगेड्स

Indian Army Rudra Brigades to be Deployed in Eastern Ladakh and Sikkim
Photo: Indian Army

Indian Army Rudra Brigades: भारतीय सेना ने चीन से लगी उत्तरी सीमा पर नई ‘रुद्र’ ब्रिगेड को तैनात करने का फैसला किया है। यह वहीं ब्रिगेड है जिसका एलान सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 26वें कारगिल विजय दिवस पर द्रास में किया था। सूत्रों के अनुसार, इनमें से एक ब्रिगेड पूर्वी लद्दाख में और दूसरी सिक्किम में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास तैनात की जाएगी। इन ब्रिगेड्स को आधुनिक हथियारों, आर्मर्ड ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, मिसाइलों और कमांडो यूनिट्स से लैस किया जाएगा।

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Indian Army Rudra Brigades: रुद्र जल्द होगी ऑपरेशनलाइज

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के मौके पर ‘रुद्र’ ब्रिगेड्स बनाने की घोषणा की थी। सूत्रों ने बताया कि अगले कुछ महीनों में दोनों रुद्र ब्रिगेड्स को पूरी तरह से ऑपरेशनलाइज करने का लक्ष्य है। यह कदम एलएसी जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में सेना की युद्धक क्षमताओं को रीऑर्गेनाइज्ड करने की रणनीति का हिस्सा है। भारत और चीन के बीच एलएसी वास्तविक सीमा के रूप में कार्य करती है, और यहां तनाव को देखते हुए सेना अपनी ताकत को और मजबूत करना चाहती है।


पारंपरिक ब्रिगेड्स में आमतौर पर 3,000 से 3,500 जवान होते हैं और ये इन्फैंट्री या आर्मर्ड यूनिट्स पर फोकस करती हैं। लेकिन रुद्र ब्रिगेड्स अलग होंगी। इसमें कई प्रकार की कॉम्बैट यूमिट्स को एक साथ जोड़ा जाएगा, ताकि एक ही ब्रिगेड जमीन पर सीधा मुकाबला कर सके, बख्तरबंद गाड़ियों और टैंकों के साथ तेजी से आगे बढ़ सके, दूर से आर्टिलरी के जरिए भारी गोलाबारी कर सके और स्पेशल मिशनों के लिए प्रशिक्षित कमांडो भी तैनात कर सके। इनके साथ इनमें ड्रोन भी शामिल होंगे, जो निगरानी और सटीक हमलों के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे। इसके अलावा, एक मजबूत लॉजिस्टिक्स और कॉम्बैट सपोर्ट सिस्टम भी होगा, जो हर परिस्थिति में ब्रिगेड की सप्लाई और सपोर्ट देगा।

Indian Army Rudra Brigades: ‘भैरव’ और ‘शक्तिबाण’ यूनिट्स

रुद्र ब्रिगेड्स की ताकत बढ़ाने के लिए ‘भैरव’ नामक नई लाइट कमांडो बटालियन भी तैयार की जा रही हैं। ये स्पेशल फोर्सेज की तरह जल्द कार्रवाई करने वाले दस्ते होंगे, जो मौजूदा ‘घातक’ प्लाटून की मदद करेंगे, जो वर्तमान में नियंत्रण रेखा (एलओसी) और आतंकवाद-रोधी भूमिकाओं में तैनात हैं। आर्टिलरी में ‘शक्तिबाण’ आर्टिलरी रेजीमेंट बनाई जा रही हैं, जो ड्रोन वॉरफेयर और ‘लॉइटरिंग म्यूनिशन’ में एक्सपर्ट होगी।

रुद्र ब्रिगेड्स में ‘दिव्यास्त्र’ बैटरियां

रुद्र ब्रिगेड्स में ‘दिव्यास्त्र’ बैटरियों को भी शामिल किया जाएगा। ये इन्फैंट्री की बटालियन होंगी, जो ड्रोन और स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम से लैस रहेंगी। ये यूनिट्स सेना की ‘लेयर्ड एयर डिफेंस’ रणनीति का हिस्सा हैं, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के ड्रोन हमलों को नाकाम किया था।

नई यूनिट्स नहीं

खास बाात यह होगी कि रूद्र ब्रिगेड्स के लिए नई यूनिट्स खड़ी नहीं की जाएंगी, बल्कि मौजूदा यूनिट्स को नए तरीके से ऑर्गेनाइज्ड और रीडिप्लॉयमेंट किया जाएगा। इसका उद्देश्य ऑपरेशनल जरूरतों के मुताबिक फोर्स स्ट्रक्चर को तैयार करना है।

साल 2023 में सेना के शीर्ष अधिकारियों ने चरणबद्ध तरीके से सेना के पुनर्गठन की योजना शुरू की थी। इसका मकसद सेना को ज्यादा फुर्तीला, सक्षम और तकनीकी रूप से आधुनिक बनाना है। इस दिशा में ‘इंटीग्रेटेड बैटल-रेडी ब्रिगेड्स’ के कॉन्सेप्ट को पंजाब में सैन्य अभ्यासों के दौरान सफलतापूर्वक परखा गया।

ये सभी बदलाव 2022 में की गई एक स्टडी ‘री-ऑर्गनाइजेशन एंड राइटसाइजिंग ऑफ इंडियन आर्मी’ पर आधारित हैं। इस अध्ययन में पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर बदलते खतरों के मद्देनजर मौजूदा सैन्य ढांचे की समीक्षा की गई थी, ताकि उसकी दक्षता और युद्ध-तैयारी को और बेहतर बनाया जा सके।

L-70 FCR Drone Detector: भारतीय सेना की 50 साल पुरानी ये एतिहासिक गन बनेगी और दमदार, अब ‘सूंघ-सूंघ’ कर माइक्रो और स्वॉर्म ड्रोनों का करेगी विनाश

Photo: Indian Army

L-70 FCR Drone Detector: 7 से 10 मई के दौरान ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तानी ड्रोनों को मार गिराने वाली 70 के दशक की L-70 एयर डिफेंस गन अब और घातक बनने जा रही है। उस दौरान इन गनों ने अपनी सटीक निशानेबाजी से अपनी क्षमता साबित की थी। रक्षा मंत्रालय ने इन गनों के लिए एयर डिफेंस नए फायर कंट्रोल रडार-ड्रोन डिटेक्टर (ADFCR-DD) खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिसके बाद एल-70 गन छोटे से छोटे ड्रोन को खोजने, पहचानने और मार गिराने में समक्षम होंगी।

L-70 AD Guns: ऑपरेशन सिंदूर में तहलका मचाने वाली L-70 गनें हुईं सॉफ्ट पावर से लैस, अब नहीं बच पाएंगे दुश्मन के ड्रोन

L-70 FCR Drone Detector: ऑपरेशन सिंदूर में L-70 गनों की ताकत

मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के सैन्य ठिकानों और नागरिक इलाकों में ड्रोनों और स्वार्म ड्रोन्स के जरिए निगरानी और हमले की कोशिश की। पाकिस्तान का मकसद खुफिया जानकारी जुटाना और एयर डिफेंस को नुकसान पहुंचाना था। लेकिन भारतीय सेना के एयर डिफेंस नेटवर्क, जिसमें L-70 गन, रूसी Zu-23mm और शिलका गन शामिल थीं, उन्होंने एक-एक कर सभी पाकिस्तानी ड्रोन को निशाना बनाया। इन गनों का हाई रेट ऑफ फायर और सटीक टारगेटिंग ने दुश्मन की हर कोशिश नाकाम कर दी।

L-70 FCR Drone Detector: 1970 के दशक में खरीदी थी स्वीडन से

40mm सिंगल बैरल एंटी-एयरक्राफ्ट L-70 गनें 1970 के दशक में स्वीडन से खरीदी गई थीं। ये अपनी जबरदस्त फायरिंग कैपेसिटी के लिए जानी जाती हैं। यह प्रति मिनट 300 से ज्यादा गोले दाग सकती हैं, जिनकी प्रोजेक्टाइल स्पीड 1000 मीटर प्रति सेकंड है। वहीं, इसकी मारक क्षमता 3-4 किलोमीटर तक है। हाल के वर्षों में इसे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, थर्मल इमेजर और एयर डिफेंस नेटवर्क से जोड़ा गया है, जिससे यह और घातक हो गई है।

L-70 FCR Drone Detector: छोटे ड्रोनों का है खतरा

अभी L-70 गन पुराने रडार सिस्टम जैसे अपग्रेडेड सुपर फ्लेडरमस और फ्लाई कैचर के साथ काम करती हैं, जो फाइटर जेट और हेलिकॉप्टर डिटेक्शन में सक्षम हैं। पिछले कुछ सालों में हवाई खतरों का स्वरूप बदल गया है। पहले दुश्मन के लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर मुख्य खतरा थे, लेकिन अब माइक्रो ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन और लो-आरसीएस UAV नए खतरे बनकर उभरे हैं। ये ड्रोन छोटे आकार, कम रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) और कम इन्फ्रारेड सिग्नेचर के कारण आसानी से पकड़ में नहीं आते। रूस-यूक्रेन, इजरायल-हमास और ऑपरेशन सिंदूर में इन ड्रोनों का इस्तेमाल निगरानी और हमले के लिए देखा गया है।

L-70 FCR Drone Detector: Indian Army’s 50-Year-Old Iconic Gun to Get Deadly Upgrade, Now Capable of Detecting & Destroying Micro and Swarm Drones
Photo: Indian Army

ऑपरेशन सिंदूर से सबक लेते हुए भारतीय सेना को अपने एयर डिफेंस को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई। L-70 गनें प्रभावी तो हैं, लेकिन उनके पुराने रडार सिस्टम छोटे ड्रोनों को पकड़ने में पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। इसलिए, रक्षा मंत्रालय ने अब नए फायर कंट्रोल रडार की खरीद का फैसला किया है, जो विशेष रूप से ड्रोनों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किए गए हैं। सेना को ऐसा फायर कंट्रोल रडार चाहिए, जो इन छोटे और कम सिग्नेचर वाले ड्रोनों को कहीं भी और कभी भी ट्रैक कर सके।

L-70 FCR Drone Detector: फायर कंट्रोल रडार में क्या है खास?

रक्षा मंत्रालय ने अगस्त 2025 की शुरुआत में एक रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी किया है, जिसमें नए फायर कंट्रोल रडार-ड्रोन डिटेक्टर की जरूरतों को बताया गया। सेना ने अपनी जरूरत के मुताबिक साफ किया है कि नया फायर कंट्रोल रडार हल्का होना चाहिए और इसे एक 4×4 वाहन पर आसानी से माउंट किया जा सके। यह रडार कम से कम दो L-70 गनों को एक साथ कंट्रोल करने में सक्षम हो। इसमें 3D एक्टिव ऐरे तकनीक पर आधारित सर्च रडार हो, जो एक समय में 25 लक्ष्यों को ट्रैक कर सके। ट्रैक रडार की रेंज न्यूनतम 12 किलोमीटर होनी चाहिए और यह 4,500 मीटर की ऊंचाई तक आसानी से काम कर सके।

सिस्टम में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम, लेजर रेंज फाइंडर और Identification Friend or Foe (IFF) सिस्टम भी शामिल होना चाहिए, ताकि अपने और दुश्मन के टारगेट्स में फर्क किया जा सके। यह रडार डेटा को वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS) और शोल्डर-लॉन्च्ड मिसाइल सिस्टम तक ट्रांसमिट करने में सक्षम हो। इसके अलावा, यह सिस्टम सभी तरह के इलाकों चाहे वह रेगिस्तान हो, हाई एल्टीट्यूड क्षेत्र, तटीय इलाका या मैदानी क्षेत्र में बिना किसी रुकावट के इस्तेमाल किया जा सके।

स्वदेशी रडार पर फोकस

सेना पहले विदेशी रडार खरीदने की योजना बना रही थी, लेकिन आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अब स्वदेशी कंपनियों से रडार खरीदे जाएंगे। रक्षा मंत्रालय की पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट में एयर डिफेंस इक्विपमेंट्स शामिल हैं, जिसके कारण विदेशी खरीद पर रोक लग गई है।

सेना के पास करीब 800 L-70 गन

बता दें कि वर्तमान में सेना के पास करीब 800 L-70 गन हैं, जो लद्दाख से लेकर पूर्वोत्तर और पश्चिमी मोर्चे तक तैनात हैं। इनके पुराने रडार, जैसे सुपर फ्लेडरमस और फ्लाई कैचर, 1970 और 1980 के दशक के हैं। सुपर फ्लेडरमस को 1990 के दशक में अपग्रेड किया गया था, लेकिन अब ये छोटे ड्रोनों को पकड़ने में कम असरदार हैं। नए रडार इन तोपों को आधुनिक खतरों से निपटने की नई ताकत देंगे।

बीईएल ने L-70 को बनाया मॉडर्न

पिछले कुछ सालों में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने L-70 गनों को मॉडर्न बनाया है। पुराने मैकेनिकल सिस्टम को इलेक्ट्रिक ड्राइव से बदला गया, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और फायर कंट्रोल कंप्यूटर जोड़े गए। ये तोपें अब एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन नेटवर्क से जुड़ी हैं, जिससे इन्हें रीयल-टाइम जानकारी मिलती है। इससे तोपें तेजी से लक्ष्य पर निशाना साध सकती हैं। ऑपरेशन सिंदूर में इन अपग्रेड्स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

Bactrian Camels: लद्दाख में सेना की मदद करेंगे ये खास ऊंट, हाई-एल्टीट्यूड इलाकों में इन साइलेंट वर्कहॉर्स से मिलेगी लास्ट माइल कनेक्टिविटी

Bactrian Camels: Special Double-Humped ‘Silent Workhorses’ to Aid Indian Army in Ladakh’s High-Altitude Last-Mile Connectivity
Photo: Raksha Samachar

Bactrian Camels: लद्दाख के कठिन और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रसद पहुंचाने और पेट्रोलिंग के लिए भारतीय सेना ने लद्दाख के नुब्रा इलाके के विश्व प्रसिद्ध दो कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंटों को औपचारिक रूप से अपने सिस्टम में शामिल किया है। लगभग एक दशक तक चले ट्रायल्स के बाद सेना ने यह फैसला किया है। वहीं, इन ऊंटों की खूबी है कि ये ऊंट लद्दाख की परिस्थितियों के लिए अनुकूल हैं और ऊंचाई वाले इलाकों में बिना किसी परेशानी के काम कर सकते हैं। वहीं सेना के इस फैसले के बाद सेना के लॉजिस्टिक नेटवर्क में बढ़ोतरी होगी और हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस की क्षमता बढ़ेगी।

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Bactrian Camels: कैसे हुई शुरुआत?

साल 2016 में सेना ने को जरूरत महसूस हुई कि उन्हें एक ऐसा लॉजिस्टिक प्लेटफॉर्म चाहिए जो लद्दाख के ऊंचे और कठिन इलाकों में भारी सामान ढो सके, मौसम की चुनौतियों को झेल सके और सीमावर्ती चौकियों तक ‘लास्ट माइल’ डिलीवरी कर सके।

इसी के बाद डीआरडीओ की लद्दाख में लैब डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (DIHAR) ने रिमाउंट एंड वेटरिनरी कॉर्प्स (RVC) के साथ मिलकर एक रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य यह जाानना था कि क्या बैक्ट्रियन ऊंटों को ट्रेनिंग देकर ऊंचाई वाले इलाकों में सेना की ड्यूटी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

Bactrian Camels: लद्दाख में रसद की चुनौतियां

लद्दाख की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। कई बार यहां की ऊंची चोटियों, ठंडे मौसम और दुर्गम इलाकों में सेना को रसद पहुंचाने के लिए कई दिक्कतों को सामना करना पड़ता है। पिछले कुछ दशकों में लद्दाख में सड़कों का एक व्यापक जाल बिछाया गया है, लेकिन दूरदराज के चौकियों तक “लास्ट-माइल कनेक्टिविटी” अभी भी कुली पोर्टर्स और खच्चरों पर निर्भर है।

हाल के सालों में, सेना में ड्रोन और रोबो म्यूल्स का भी इस्तेमाल लॉजिस्टिक्स के लिए किया जा रहा है। लेकिन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कई बार विजिबिलिटी न होने से ड्रोन काम नहीं कर पाते। इसके अलावा, ड्रोन और रेडियो-कंट्रोल इक्विपमेंट्स दुश्मन के जवाबी हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए बैक्ट्रियन ऊंट अच्छा विकल्प हैं। सूत्रों ने बताया कि लद्दाख जैसे इलाकों में जहां सड़क नेटवर्क होने के बावजूद ‘लास्ट माइल’ चौकियों तक पहुंचना कठिन है, वहां बैक्ट्रियन ऊंट सेना के लिए एक साइलेंट वर्कहॉर्स बन सकते हैं।

Bactrian Camels की खूबियां

बैक्ट्रियन ऊंटों का वैज्ञानिक नाम कैमेलस बैक्ट्रियानस है। ये ऊंट मध्य एशिया का मूल निवासी है। ये ऊंट अपने दो कूबड़ों और छह फीट से कम ऊंचाई के लिए पहचाने जाते हैं। पुराने समय में ये ऊंट सिल्क रूट पर व्यापार के लिए महत्वपूर्ण साधन थे, जो मध्य एशिया को तिब्बत और भारत के लद्दाख से जोड़ता था। व्यापारिक मार्ग बंद होने के बाद कई ऊंटों को व्यापारियों ने लद्दाख के जंगलों में छोड़ दिया था। आज ये ऊंट विलुप्तप्राय प्रजाति (एंडेंजर्ड स्पीशीज) की सूची में हैं और लद्दाख में इनकी संख्या कुछ सौ तक सीमित है। वर्तमान में, ये मुख्य रूप से नुब्रा घाटी में पर्यटकों को सवारी (टूरिस्ट राइड्स) के लिए उपयोग किए जाते हैं।

बैक्ट्रियन ऊंटों की खासियत उनकी हाइपोक्सिया (कम ऑक्सीजन) और अत्यधिक ठंड में जीवित रहने की क्षमता है। ये ऊंट 150-200 किलोग्राम वजन को 14,000 फीट की ऊंचाई पर ऱबड़-खाबड़ रस्तों पर आसानी से ढो सकते हैं, जबकि म्यूल और पोनी केवल 60-80 किलोग्राम वजन ही ले जा सकते हैं। इतना ही नहीं, इन ऊंटों को कम भोजन और देखभाल की जरूरत होती है। वहीं, इनके साथ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का भी खतरा नहीं है।

सेना में शामिल होने की प्रक्रिया

डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च के अपने अनुसंधान के दौरान RVC के साथ मिल कर ऊंटों को कमांड एंड बिहेवियरल संबंधी ट्रेनिंग दी। उनका फिजिकल मेजरमेंट, एडॉप्टेशन फिजियोलॉजी और विभिन्न इलाकों व ऊंचाइयों पर भार ढोने की सहनशक्ति का अध्ययन किया गया। कुछ बैक्ट्रियन ऊंटों को सेना की यूनिट्स में भेजा गया, जहां उनका लोड कैरिंग ट्रायल हुआ, जिसमें अलग-अलग टेरेन पर वजन ढोने की क्षमता को जांचा गया। इसके अलावा उन्होंने पेट्रोलिंग, वजन ढोने और युद्ध के हालात जैसे टेस्ट (बैटल इनोकुलेशन टेस्ट्स) किए गए। इन परीक्षणों में यह देखा गया कि ये ऊंट बैटल कंडीशन ट्रेनिंग यानी गोलीबारी, धमाकों, धुएं और युद्ध जैसी की परिस्थितियों में कैसी प्रतिक्रिया करते हैं। वहीं, कुछ बैक्ट्रियन ऊंटों को ईस्टर्न लद्दाख में फॉरवर्ड लोकेशंस पर भी भेजा गया ताकि वास्तविक ऑपरेशनल कंडीशन्स में उनकी परफॉर्मेंस को परखा जा सके।

DIHAR के वैज्ञानिकों ने पाया कि ये ऊंट न केवल भारी वजन ढो सकते हैं, बल्कि युद्ध के माहौल में भी प्रशिक्षित होकर अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इस सफलता के बाद, कुछ हफ्ते पहले DIHAR ने 14 प्रशिक्षित और तैनाती के लिए तैयार बैक्ट्रियन ऊंटों को सेना की 14 कोर यानी फायर एंड फ्यूरी को सौंपा। इसके साथ ही, ऊंटों की ट्रेनिंग और मैनेजमेंट के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स और हेल्थ रिकॉर्ड भी सौंपे। सेना का कहना है कि कम भोजन और कम देखभाल के चलते ये ऊंट सेना के लिए कॉस्ट-इफेक्टिव साबित हो सकते हैं।

रेगिस्तानी ऊंटों से ज्यादा बेहतर

DIHAR ने बैक्ट्रियन ऊंटों की क्षमताओं को बेहतर समझने के लिए राजस्थान से तीन रेगिस्तानी ऊंटों (सिंगल-हंप्ड कैमल्स) को लेह लाया गया। रेगिस्तानी ऊंटों का इस्तेमाल सीमा सुरक्षा बल (BSF) राजस्थान और गुजरात में किया जाता है। दोनों की तुलना में पाया गया कि बैक्ट्रियन ऊंट लद्दाख की ठंडी और कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में रेगिस्तानी ऊंटों की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हैं। उनकी दो कूबड़ों में संचित वसा (फैट) उन्हें लंबे समय तक एनर्जी देती है, जिससे वे लद्दाख के लिए अधिक उपयुक्त हैं।

ITBP की भी है तैयारी

सेना के अलावा, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) भी बैक्ट्रियन ऊंटों के इस्तेमाल का सोच रही है। लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर तनाव और रणनीतिक महत्व को देखते हुए, ये ऊंट सेना और ITBP के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। खास तौर पर उन इलाकों में जहां सड़कें नहीं पहुंचतीं या मौसम उपकरणों को प्रभावित करता है, वहां ये ऊंट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

संरक्षण में मिलेगी मदद

लद्दाख में बैक्ट्रियन ऊंटों का इस्तेमाल फिलहाल अभी तक पर्यटन तक ही सीमित था। नुब्रा घाटी में पर्यटक इन ऊंटों पर सवारी का आनंद लेते हैं। वहीं, अगर सेना इनकाा इस्तेमाल करती है, तो इनके संरक्षण में भी मदद मिलेगी। करेगा, बल्कि इनकी उपयोगिता को एक नए स्तर पर ले जाएगा। यह कदम न केवल सैन्य रसद को मजबूत करेगा, बल्कि इस विलुप्तप्राय प्रजाति के प्रति जागरूकता भी बढ़ाएगा।

Defence Acquisition Council: डीएसी की बैठक में 67,000 करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी, तीनों सेनाओं को मिलेंगे एडवांस हथियार और सिस्टम

Defence Acquisition Council: DAC Approves Rs 67,000 Crore Defence Proposals, New Weapons & Systems for Army, Navy, Air Force
Photo: PIB

Defence Acquisition Council: भारत की रक्षा तैयारियों को और मजबूत करने के लिए मंगलवार को डिफेंस एक्विजेशन काउंसिल (डीएसी) ने लगभग 67,000 करोड़ रुपये की लागत वाले कई अहम रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इस बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। इन प्रस्तावों का उद्देश्य थलसेना, नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता को आधुनिक तकनीक और एडवांस वीपेन सिस्टम से लैस करना है।

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना को और ताकतवर बनाने की तैयारी, DAC की बैठक में हो सकते हैं ये बड़े फैसले

Defence Acquisition Council: थल सेना के लिए नाइट विजन सिस्टम

भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री (Mechanised Infantry) के लिए एक बेहद अहम स्वीकृति दी गई है। डीएसी ने बीएमपी (BMP – इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल) के लिए थर्मल इमेजर आधारित ड्राइवर नाइट साइट की खरीद को मंजूरी दी है। यह तकनीक बीएमपी जैसे बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों को रात के समय भी तेजी से और सुरक्षित तरीके से चलाने में सक्षम बनाएगी। इससे सीमावर्ती और मुश्किल इलाकों में सेना की मोबिलिटी बढ़ेगी और ऑपरेशनल एडवांटेज में फायदा मिलेगा।

भारतीय नौसेना के लिए नए हथियार और सिस्टम

भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए डीएसी ने तीन बड़े प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इनमें कॉम्पैक्ट ऑटोनोमस सरफेस क्राफ्ट (Compact Autonomous Surface Craft) की खरीद भी है, जो मानव रहित है और पानी में पेट्रोलिंग और मिशन को अंजाम दे सकेगी। यह सरफेस एयरक्राफ्ट एंटी-सबमरीन वॉरफेयर मिशनों में खतरे का पता लगाने, पहचान करने और उन्हें निष्क्रिय भी करेगा।

इसके अलावा ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर (BrahMos Fire Control System & Launchers) की खरीद को भी मंजूरी दी गई है। यह लॉन्चर नौसेना के जहाजों पर ब्रहमोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की तैनाती और सटीक निशाना लगाने में मदद मिलेगी। इस सिस्टम के आने के बाद नौसेना की मारक क्षमता में और बढ़ोतरी होगी।

डीएसी ने बराक-1 पॉइंट डिफेंस मिसाइल सिस्टम को अपग्रेडेशन करने का भी फैसला किया है। यह सिस्टम जहाजों के करीब आने वाले हवाई खतरों जैसे एंटी-शिप मिसाइल, ड्रोन और विमानों जैसे हवाई खतरों से मुकाबला करेगा।

इन फैसलों से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते समुद्री खतरों के मद्देनजर भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा और एंटी-सबमरीन क्षमता में जबरदस्त इजाफा होगा।

वायुसेना के लिए माउंटेन रडार और SAKSHAM/SPYDER सिस्टम

भारतीय वायुसेना के लिए दो अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। पहाड़ी इलाकों में वायु निगरानी क्षमता को बढ़ाने के लिए माउंटेन रडार (Mountain Radars) की खरीद को मंजूरी दी गई है। ये रडार सीमा के दोनों ओर उड़ने वाले विमानों, ड्रोन और मिसाइलों की समय रहते पहचान करने में मदद करेंगे।

इसके साथ ही, SAKSHAM/SPYDER वेपन सिस्टम को इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा जाएगा, जिससे हवाई रक्षा और मजबूत होगी।

तीनों सेनाओं के लिए MALE ड्रोन

बैठक में तीनों सेनाओं के लिए मीडियम ऑल्टिट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस (MALE) रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम की खरीद को भी मंजूरी दी गई। MALE RPAs यानी Remotely Piloted Aircrafts ऐसा ड्रोन सिस्टम है जो मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकते हैं। ये कई प्रकार के पेलोड और हथियारों को ले जाने में सक्षम होते हैं और इनका इस्तेमाल 24×7 निगरानी (surveillance), सटीक हमलों (precision strike), और गुप्त अभियानों (covert operations) में किया जा सकता है। ये ड्रोन आधुनिक युद्ध में “आई इन द स्काई” की भूमिका निभाएंगे, जो जमीनी और समुद्री ऑपरेशनों के लिए रियल-टाइम खुफिया और स्ट्राइक सपोर्ट प्रदान करेंगे। इन ड्रोन की तैनाती से भारत की सीमाओं पर निगरानी क्षमता में भारी बढ़ोतरी होगी, साथ ही ये भविष्य के नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध में बड़ी भूमिका निभाएंगे।

S-400, C-17 और C-130J बेड़े का मेंटेनेंस

डीएसी ने कुछ अहम मौजूदा सिस्टम के मेंटेनेंस और अपग्रेडन की भी मंजूरी दी है। इनमें C-17 ग्लोबमास्टर और C-130J सुपर हरक्यूलिस परिवहन विमानों का सस्टेनेंस शामिल है। ये विमान भारतीय वायुसेना के लिए रसद और परिवहन के महत्वपूर्ण साधन हैं। इनके रखरखाव से ये विमान लंबे समय तक सेवा में रह सकेंगे। इसके अलावा रूस से खरीदे गए S-400 लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम के लिए कॉम्प्रिहेन्सिव एनुअल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट को भी मंजूरी दी गई है।

BrahMos supersonic cruise missiles: ऑपरेशन सिंदूर के बाद सबकी फेवरेट बनी ब्रह्मोस, एयरफोर्स और नेवी बड़ा ऑर्डर देने की तैयारी में

BrahMos Missile 800 km
File Photo

BrahMos supersonic cruise missiles: हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को करारा नुकसान पहुंचाने के बाद, भारतीय सेनाएं ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का बड़ा ऑर्डर देने की तैयारी कर रही हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि जल्द ही एक उच्च स्तरीय बैठक में भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और भारतीय वायुसेना के लिए इन मिसाइलों की खरीद को मंजूरी दी जा सकती है। इन मिसाइलों में जमीन से और हवा से मार करने वाले सिस्ट्म्स शामिल होंगे।

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BrahMos supersonic cruise missiles: ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस ने दिखाए थे जलवे

6 जून से 10 जून तक चार दिनों तक चले इस मिलिट्री ऑपरेशन दौरान ब्रह्मोस मिसाइलों ने पाकिस्तानी एयर बेस और सेना के ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इन मिसाइलों ने पूरे पाकिस्तान में फैले सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और भारी नुकसान पहुंचाया। सूत्रों के अनुसार, भारतीय नौसेना इन मिसाइलों को अपने वीर-क्लास वॉरशिप्स पर तैनात करेगी, जबकि भारतीय वायुसेना अपने सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों को इनसे लैस करेगी। बता दें, ब्रह्मोस मिसाइल की रफ्तार (मैक 2.8 से मैक 3) है और रेंज 400 किलोमीटर से अधिक है।

प्रधानमंत्री ने की थी स्वदेशी हथियारों की तारीफ

हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर में स्वदेशी हथियारों के शानदार प्रदर्शन की सराहना की थी। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी दुनिया ने हमारे स्वदेशी हथियारों की ताकत देखी। हमारे एयर डिफेंस सिस्ट्म्स, खासकर ब्रह्मोस मिसाइलों और ड्रोन ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की ताकत को साबित किया।”

आतंकवादी अड्डों को किया बरबाद

ऑपरेशन सिंदूर के पहले चरण में, भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालयों को निशाना बनाया। इन हमलों में ब्रह्मोस मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया, जिन्होंने पाकिस्तान के पंजा में स्थित आतंकी ठिकानों को बेहद सटीकता के साथ नष्ट किया। इन हमलों ने न केवल आतंकवादी अड्डों को ध्वस्त किया, बल्कि पाकिस्तानी एयर बेसों को भी भारी नुकसान पहुंचाया।

वहीं, ब्रह्मोस मिसाइलों के हमलों से तिलमिलाई पाकिस्तानी सेना ने आतंकवादियों और उनके ठिकानों को बचाने की कोशिश की और जवाबी कार्रवाई करने की कोशिश की। हालांकि, भारतीय सेनाओं की रणनीति और ब्रह्मोस की ताकत के सामने उनकी कोशिशें नाकाम रहीं।

ब्रह्मोस मिसाइल की खूबियां

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का जॉइंट वेंचर हैं। यह सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल अपनी रफ्तार और सटीकता के लिए जानी जाती है। यह जमीन, समुद्र और हवा से मार करने में सक्षम है। इसे दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। यह लगभग मैक 2.8 से मैक 3 की रफ्तार से अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है।

यह मिसाइल 200 से 300 किलोग्राम तक का हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड लेकर चल सकती है। इसके गाइडेंस सिस्टम में अत्याधुनिक Inertial Navigation System और GPS/NavIC आधारित तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह अपने लक्ष्य तक बेहद सटीकता के साथ पहुंचती है और मिशन की सफलता की संभावना को अधिकतम करती है। वहीं, सटीक मारक क्षमता के चलते ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के सिविलियन ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।

Naval Exercise in South China Sea: चीन की तरह भारत ने भी दक्षिण चीन सागर में भेजा अपना सर्वेशिप, फिलीपींस के साथ नौसैनिक अभ्यास से चीन को लगी मिर्ची

Naval Exercise in South China Sea: India Sends Survey Ship for Joint Drill with Philippines, China Strongly Protests
Source: Indian Navy

Naval Exercise in South China Sea: फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड आर. मार्कोस जूनियर इन दिनों अपने पांच दिवसीय दौरे पर दिल्ली आए हुए हैं। इसी दौरान भारत और फिलीपींस की दक्षिण चीन सागर में हुए संयुक्त नौसैनिक अभ्यास ने चीन की नींद उड़ा दी है। यह अभ्यास दो दिन तक चला। जिसके बाद चीन ने इस पर आपत्ति जताते हुए फिलीपींस पर “बाहरी ताकतों” को शामिल करने का आरोप लगाया है। चीन ने जवाब में अपनी नौसेना की ओर से क्षेत्र में पेट्रोलिंग भी शुरू की है।

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Naval Exercise in South China Sea: फिलीपींस में नेवी के चार जहाज

भारत और फिलीपींस की नौसेनाओं ने हाल ही में दक्षिण चीन सागर में दो दिन का एक संयुक्त नौसैनिक अभ्यास पूरा किया। इस अभ्यास को दोनों देशों के बीच रक्षा और मैरीटाइम कॉपरेशन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। भारतीय नौसेना ने 1 अगस्त को बताया था कि यह द्विपक्षीय संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास कम्यूनिकेशन प्रोटोकॉल, और मैरीटाइम प्रीपेयर्डनेस बढ़ाने पर केंद्रित होगा। इसका उद्देश्य आपसी विश्वास को बढ़ाना और दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच ऑपरेशनल सिनर्जी को मजबूत करना था। इस अभ्यास में भारतीय नौसेना तीन वॉरशिप्स आईएनएस दिल्ली, आईएनएस शक्ति और आईएनएस किल्टन ने हिस्सा लिया था।

Naval Exercise in South China Sea: India Sends Survey Ship for Joint Drill with Philippines, China Strongly Protests
Source: Indian Navy

लेकिन सबसे खास बात यह है कि यह अभ्यास “वेस्ट फिलीपीन सागर” में आयोजित किया गया था, जिसे फिलीपींस दक्षिण चीन सागर में अपना हिस्सा बताता है। चीन ने इस अभ्यास पर कड़ी आपत्ति जताई है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के दक्षिणी थिएटर कमांड के प्रवक्ता सीनियर कर्नल तियान जुनली के हवाले से कहा, “फिलीपींस ने भारत जैसे बाहरी देश को दक्षिण चीन सागर में हस्तक्षेप करने के लिए उकसाया है। इस तरह के संयुक्त गश्त क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को कमजोर करते हैं।” तियान ने यह भी कहा कि चीन की सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और समुद्री हितों की रक्षा के लिए हाई अलर्ट पर है।

दक्षिण चीन सागर पर चीन का पांच देशों के साथ समुद्री सीमा को लेकर विवाद है। इनमें फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान शामिल हैं। यह इलाका तेल, गैस जैसे हाइड्रोकार्बन संसाधनों और मत्स्य संसाधनों से भरपूर है और वैश्विक व्यापार का एक अहम समुद्री मार्ग भी है।

महत्वपूर्ण समय पर हुआ अभ्यास

यह अभ्यास ऐसे समय हुआ है जब फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड रोमुआल्डेज़ मार्कोस जूनियर चार दिवसीय राजकीय दौरे पर भारत आए हैं। 5 अगस्त को हैदराबाद हाउस में उनकी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात होनी है, जिसमें कई समझौतों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।

मार्कोस जूनियर ने नई दिल्ली पहुंचने पर विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की। जयशंकर ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा, “राष्ट्रपति मार्कोस के साथ उनकी भारत यात्रा की शुरुआत में मुलाकात कर खुशी हुई। मुझे विश्वास है कि उनकी पीएम मोदी के साथ कल की बातचीत हमारे द्विपक्षीय साझेदारी को और मजबूत करेगी।”

Naval Exercise in South China Sea: India Sends Survey Ship for Joint Drill with Philippines, China Strongly Protests
Source: Indian Navy

खरीद चुका है ब्रह्मोस

फिलीपींस ने 2022 में भारत से ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदा था, जो नौसैनिक लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन की गई है। अब मनीला भारत के आकाश एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद पर विचार कर रहा है, जिसने पाकिस्तान के साथ एक झड़प में अपनी क्षमता साबित की थी। फिलीपींस की सशस्त्र सेना के प्रमुख जनरल रोमियो ब्राउनर जूनियर ने स्थानीय मीडिया में कहा, “हम भारत से और उपकरण और वेपन सिस्टम खरीद रहे हैं। भारतीय रक्षा उपकरण न केवल उच्च गुणवत्ता के हैं, बल्कि अन्य देशों के विकल्पों की तुलना में कॉस्ट इफेक्टिव भी हैं।”

आईएनएस संधायक पहुंचा मनीला

इससे पहले एक अगस्त को भारतीय नौसेना का हाइड्रोग्राफिक सर्वे जहाज आईएनएस संधायक (J18) पहली बार फिलीपींस पहुंचा है। यह पोत फरवरी 2024 में शामिल हुआ था और पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन पर आधारित है। इसके कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन नट्टुवा धीरज ने बताया, “हम समुद्र की मैपिंग करते हैं, जिसका इस्तेमाल पूरी दुनिया के नाविक करते हैं। यह मुख्य रूप से हाइड्रोग्राफी से जुड़ा कार्य है, न कि डिफेंस से।” उन्होंने कहा, “यह जहाज पहली बार इस क्षेत्र में आया है। यह एक नया जहाज है, जिसमें लंबा एंड्यूरेंस और अत्याधुनिक सर्वे इक्विपमेंट्स लगे हैं।” उन्होंने बताया कि जहाज का मुख्य कार्य महासागरों की मैपिंग और समुद्री डेटा जुटाना है, जो नाविकों, पर्यावरण निगरानी और आर्थिक विकास के लिए उपयोगी है।

कैप्टन धीरज ने यह भी बताया कि यह जहाज आपातकाल या युद्ध के समय में अस्पताल जहाज के रूप में भी काम कर सकता है। “हमारे पास सीमित तटीय रक्षा ( क्षमता और छोटे हथियार हैं, लेकिन यह मुख्य रूप से शांति काल का जहाज है।”

मनीला में आईएनएस संधायक के साथ-साथ आईएनएस दिल्ली (गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर), आईएनएस शक्ति (फ्लीट टैंकर) और आईएनएस किल्टन (एंटी-सबमरीन वॉरफेयर कॉर्वेट) भी मौजूद हैं।

Agnishodh Research Cell: आर्मी चीफ बोले- जंग के मैदान में ‘बूट्स के साथ बॉट्स’ की भी जरूरत, IIT Madrass में शुरू किया ‘अग्निशोध’ रिसर्च सेल

Army Chief on Op Sindoor: Army Chief on Control of Land in War
File Photo: Indian Army

Agnishodh Research Cell: भारतीय सेना ने स्वदेशी रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने के लिए ‘अग्निशोध’ रिसर्च सेल की शुरुआत की है। यह केंद्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास में बनाया गया है। इसका उद्घाटन भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपनी दो दिन की चेन्नई यात्रा के दौरान किया। यह केंद्र भारतीय सेना के परिवर्तन के पांच मुख्य लक्ष्यों में से एक, यानी आधुनिकीकरण और तकनीक को अपनाने को बढ़ावा देता है। यह एकेडमिक रिसर्च को सेना की जरूरतों के साथ जोड़ने की कोशिश है।

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क्या है Agnishodh Research Cell?

‘अग्निशोध’ दरअसल Indian Army Research Cell (IARC) है, जिसे IIT मद्रास परिसर में तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य भारतीय सेना और शैक्षणिक संस्थानों के बीच ऐसा ब्रिज तैयार करना है, जिससे प्रयोगशालाओं में डेवलप हो रही तकनीकों को सीधे युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल किया जा सके। यह कदम सेना के ‘पांच स्तंभों वाले परिवर्तन ढांचे’ (Five Pillars of Transformation) में से एक मॉर्डनाइजेशन और टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया है। यह केंद्र सैनिकों को नई तकनीकों जैसे 3D प्रिंटिंग, साइबर सुरक्षा, क्वांटम कम्प्यूटिंग, वायरलेस कम्यूनिकेशन और ड्रोन सिस्टम में ट्रेनिंग देगा। इससे सेना के जवान तकनीक में माहिर होंगे।

आतंकवाद के खिलाफ नया अध्याय

IIT मद्रास में एक समारोह में जनरल द्विवेदी ने “ऑपरेशन सिंदूर – भारत की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में नया अध्याय” पर बात की। उन्होंने बताया कि यह 88 घंटे का ऑपरेशन खुफिया जानकारी पर आधारित था और इसने भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति को नया रूप दिया। यह ऑपरेशन अपने आकार, प्रभाव और रणनीति के कारण खास था। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन कूटनीति, सूचना, सैन्य और आर्थिक (DIME) क्षेत्रों में किया गया। जनरल द्विवेदी ने बताया कि युद्ध का तरीका बदल रहा है। अब युद्ध गैर-संपर्क (बिना सीधे संपर्क), रणनीतिक गति और मनोवैज्ञानिक प्रभाव से लड़े जाएंगे। भारतीय सेना इसके लिए तैयार है।

जनरल द्विवेदी ने यह भी कहा कि आने वाले युद्ध पांचवीं पीढ़ी के संघर्ष होंगे, जहां आमने-सामने की लड़ाई नहीं बल्कि डिजिटल युद्ध, साइबर हमले, और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हावी होंगे।

Agnishodh Research Cell: Army Chief Says 'Bots Must Share Space with Boots' as Indian Army Launches Defence Tech Hub at IIT Madras
Photo: Indian Army

आत्मनिर्भर भारत में सेना की भूमिका

जनरल द्विवेदी ने ‘स्वदेशीकरण से सशक्तिकरण’ (Swadeshikaran Se Sashaktikaran) की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि सेना ने INDIAai, Chip-to-Startup, और Project QuILA जैसे नेशनल टेक्नोलॉजी मिशनों से साझेदारी की है। इन परियोजनाओं में MCTE मऊ जैसे संस्थानों की भूमिका प्रमुख रही है।

उन्होंने बताया कि IIT दिल्ली, IIT कानपुर और IISc बेंगलुरु में सेना के रिसर्च सेंटरों ने पहले ही कई एडवांस रक्षा तकनीकों पर कामकिया है। IIT मद्रास की तारीफ करते हुए उन्होंने Project SAMBHAV और Army Base Workshops के साथ चल रही एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (3D प्रिंटिंग आधारित उत्पादन) प्रोजेक्ट्स का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ‘अग्निशोध’ शैक्षणिक ज्ञान को युद्ध के मैदान की जरूरतों में बदलेगा और भारत को 2047 तक विकसित बनाने में मदद करेगा।

IIT मद्रास रिसर्च पार्क से होगा विस्तार

‘अग्निशोध’ केंद्र IIT मद्रास रिसर्च पार्क के माध्यम से भी अपना विस्तार करेगा। यह रिसर्च पार्क भारत के अग्रणी इनोवेंशंस सेंटर्स में से एक है, जहां पर एडवांस मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी सेंटर (AMTDC) और प्रवर्तक टेक्नोलॉजीज फाउंडेशन जैसे संगठन कार्यरत हैं। यह प्लेटफॉर्म प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को मैदान में उपयोग के योग्य तकनीकों में बदलने का अवसर देगा।

सेना के जवानों को मिलेगी तकनीकी ट्रेनिंग

उन्होंने बताया कि अग्निशोध’ सैनिकों को नई तकनीकों में भी प्रशिक्षण देगा। यह साइबर सुरक्षा, क्वांटम कम्प्यूटिंग और ड्रोन जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता बढ़ाएगा। साथ ही, यह युद्ध के लिए तैयार तकनीकी समाधान विकसित करेगा। ‘अग्निशोध’ केवल अनुसंधान केंद्र ही नहीं बल्कि तकनीकी मानव संसाधन (tech-enabled human resource) को विकसित करने का माध्यम भी बनेगा। यहां सेना के जवानों को एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (3D प्रिंटिंग), साइबर सुरक्षा (Cybersecurity), क्वांटम कंप्यूटिंग, वायरलेस कम्यूनिकेशन, मानव रहित हवाई प्रणाली (Unmanned Aerial Systems) जैसे क्षेत्रों में एडवांस ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे सेना में एक ऐसा तकनीकी कौशलयुक्त बल विकसित होगा, जो भविष्य की चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना कर सके।

“सैनिकों को रोबोट के साथ करना होगा काम।”

अपनी चेन्नई यात्रा के दौरान जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) का भी दौरा किया। वहां उन्हें अकादमी के ढांचे, आधुनिक प्रशिक्षण और युवा सैन्य अधिकारियों को तैयार करने की योजनाओं के बारे में बताया गया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय सेना एक परिवर्तन के दशक (Decade of Transformation) में प्रवेश कर चुकी है। युद्ध की प्रकृति बदल रही है। अब ग्रे जोन संघर्ष और तकनीकी बदलावों का दौर है।

ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इस ट्राई सर्विसेज (सेना, नौसेना, वायुसेना) कार्रवाई ने भारत की ताकत दिखाई, जिसने पाकिस्तान को 88 घंटों में युद्धविराम के लिए मजबूर किया। उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्ध में पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों का मिश्रण होगा, जहां “सैनिकों को रोबोट के साथ काम करना होगा।” उन्होंने कहा कि अब युद्ध के मैदान में सिर्फ ‘बूट्स’ (सैनिकों की मौजूदगी) नहीं, बल्कि ‘बॉट्स’ (मशीनें और स्वचालित प्रणालियां) की भी जरूरत होगी। उन्होंने सेना के डिकेड ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन के लक्ष्य को दोहराया।

Joint Expedition in Pangong Tso: लद्दाख में पैंगोंग त्सो की सबसे ऊंची चोटियों पर भारत ने फहराया परचम, तीन प्रतिष्ठित पर्वतारोहण संस्थानों की संयुक्त टीम ने रचा इतिहास

Joint Expedition in Pangong Tso: Indian Mountaineers Conquer Highest Peaks in Ladakh
Source: Indian Army

Joint Expedition in Pangong Tso: लद्दाख के दुर्गम और हाई एल्टीट्यूड इलाके पैंगोंग त्सो में भारतीय मााउंटेनियरिंग टीम ने अपना परचम फहराया है। देश के तीन प्रमुख राष्ट्रीय पर्वतारोहण संस्थानों जवाहर इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड विंटर स्पोर्ट्स (JIM&WS) पहलगाम, नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (NIM) उत्तरकाशी, और हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट (HMI) दार्जिलिंग की एक संयुक्त टीम ने 6,480 मीटर ऊंचे माउंट मेरक-III और 6,710 मीटर ऊंचे माउंट कांगजु कांगरी की सफलतापूर्वक चढ़ाई की।

Joint Expedition in Pangong Tso: Indian Mountaineers Conquer Highest Peaks in Ladakh
Source: Indian Army

इस अभियान की शुरुआत 24 जुलाई, 2025 को सोनमर्ग से हुई, जिसे जेआईएमएंडडब्ल्यूएस पहलगाम के प्रिंसिपल कर्नल हेम चंद्र सिंह ने झंडी दिखाकर रवाना किया और नेतृत्व किया। इस अभियान में तीनों संस्थानों के अनुभवी पर्वतारोहियों ने हिस्सा लिया, जिनके नाम हैं:

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इस पर्वतारोहण अभियान का नेतृत्व पहलगाम स्थित जवाहर इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड विंटर स्पोर्ट्स के प्रिंसिपल कर्नल हेम चंद्र सिंह ने किया। इस अभियान में तीनों संस्थानों के 8 अनुभवी इंस्ट्रक्टर्स ने हिस्सा लिया 24 जुलाई 2025 को इस अभियान को सोनमर्ग से रवाना किया गया।

Joint Expedition in Pangong Tso: Indian Mountaineers Conquer Highest Peaks in Ladakh
Source: Indian Army

टीम के सदस्यों में कर्नल हेम चंद्र सिंह, सुबेदार मेजर/मानद लेफ्टिनेंट (रिटा.) रफीक अहमद मलिक (JIM&WS), हवलदार सज्जाद हुसैन (JIM&WS), नायक भारत सिंह (JIM&WS), हवलदार/नर्सिंग असिस्टेंट योगेश (JIM&WS), सुबेदार मेजर हजारी लाल (NIM), नायब सुबेदार भूपेंद्र सिंह (NIM), रोबिन गुरंग (HMI) और जुबिन राय (HMI) शामिल थे।

Joint Expedition in Pangong Tso: Indian Mountaineers Conquer Highest Peaks in Ladakh
Source: Indian Army

कर्नल हेम चंद्र सिंह के नेतृत्व में इस अभियान को सावधानीपूर्वक योजना और तैयारी के साथ अंजाम दिया गया। अभियान की शुरुआत से पहले, सभी सदस्यों ने कठिन प्रशिक्षण लिया और क्षेत्र की भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों का गहन अध्ययन किया। यह सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक पर्वतारोही शारीरिक रूप से फिट और मानसिक रूप से तैयार हो।

पैंगोंग त्सो क्षेत्र की ये चोटियां अपने मुश्किल इलाकों, बर्फीले तूफानों और बदलते मौसम के लिए जानी जाती हैं। अत्याधिक ठंड, ऑक्सीजन की कमी, खड़ी चढ़ाई, हिमस्खलन (एवलांच) और ग्लेशियर हर कदम पर चुनौती बनते हैं। इन सबके बावजूद, टीम ने डटे रहकर दोनों चोटियों को सफलतापूर्वक फतेह किया।

INS Sindhukirti: नौसेना में वापस लौटी ‘समंदर की शेरनी’, सोवियत-युग की पनडुब्बी रीफिटिंग के बाद हुई और घातक, वापस लौटे सुनहरे दिन

INS Sindhukirti Returns to Navy After Refit, Soviet-Era Submarine Back in Action with Enhanced Lethality
Photo By: Hindustan Shipyard Limited

INS Sindhukirti: भारतीय नौसेना की सबसे पुरानी ऑपरेशनल पनडुब्बी INS सिंधुकीर्ति मिड-लाइफ रिफिटिंग के बाद फिर से नौसेना में शामिल हो गई है। यह सोवियत-युग की बनी यह पनडुब्बी 1989 में भारतीय नौसेना में शामिल की गई थी। इसकी रीफिटिंग की जिम्मेदारी विशाखापत्तनम में हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड के पास थी। इसकी रीफिटिंग का काम जनवरी 2023 से चल रहा था। इस काम की कुल लागत 934 करोड़ रुपये आई है।

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INS Sindhukirti: तीसरी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी

INS सिंधुकीर्ति को तत्कालीन सोवियत संघ (अब रूस) में तैयार किया गया था और इसे 1989 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। यह सिंधुघोष क्लास (Kilo-class) की तीसरी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी है, जो अब भी भारतीय बेड़े में सक्रिय है। नौसेना में शामिल होने के बाद से यह पनडुब्बी भारत की समुद्री सीमाओं की रक्षा में अहम भूमिका निभाती रही है। लेकिन समय के साथ इसकी हालत खराब होने लगी थी, इसलिए इसे मिड-लाइफ रिफिटिंग की जरूरत पड़ी। इस प्रक्रिया में पनडुब्बी को पूरी तरह से नया रूप दिया गया, ताकि यह आधुनिक चुनौतियों का सामना कर सके।

INS Sindhukirti Returns to Navy After Refit, Soviet-Era Submarine Back in Action with Enhanced Lethality
Photo By: Hindustan Shipyard Limited

INS Sindhukirti: वापस लौटे सुनहरे दिन

रीफिटिंग में पनडुब्बी की तकनीकी और ऑपरेशनल कैपेबिलिटी को बेहतर बनाया गया है। इसमें नेविगेशन सिस्टम, हथियार नियंत्रण, इलेक्ट्रॉनिक्स और सुरक्षा से जुड़े कई मॉड्यूल को अपडेट किया गया है। यह कार्य तय समय सीमा में पूरा किया गया और INS सिंधुकीर्ति को फिर से ऑपरेशन के लिए फिट बनाया गया।

हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने इस काम को बड़ी मेहनत और सावधानी के साथ पूरा किया। इस दौरान पनडुब्बी के हर हिस्से की जांच की गई, पुराने पुर्जों को बदला गया, और नई तकनीकों को शामिल किया गया। हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड की टीम ने इसके “सुनहरे दिन” वापस लाने का वादा किया था, और अब यह वादा पूरा हो गया है।

सिंधुकीर्ति की मारक क्षमता

INS सिंधुकीर्ति का मिल लाइफ अपग्रेडेशन नौसेना के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। INS सिंधुकीर्ति की लंबाई 72.6 मीटर (करीब 238 फीट) है, चौड़ाई 9.9 मीटर है और इसकी ऊंचाई 6.5 मीटर है। यह पनडुब्बी अधिकतम 300 मीटर की गहराई तक जा सकती है। पानी के अंदर इसकी रफ्तार 25 नॉट (लगभग 46 किलोमीटर प्रति घंटा) तक होती है, जबकि सतह पर यह 12 नॉट (करीब 22 किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ्तार से चल सकती है।

यह 45 दिनों तक पानी के अंदर रह सकती है और इसकी ऑपरेशनल रेंज करीब 640 किलोमीटर है। यह कई प्रकार के हथियारों जैसे टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल और माइन (समुद्री बारूद) ले जाने में सक्षम है।

INS सिंधुकीर्ति में कुल 53 नौसेना कर्मी तैनात हो सकते हैं, जिसमें अधिकारी और नाविक दोनों शामिल हैं। यह पनडुब्बी डीजल और बैटरी दोनों से चलती है, जिसमें दो जनरेटर और 1300 हॉर्सपावर बीएचपी का डीजल इंजन और 5,500 से 6,800 बीएचपी की इलेक्ट्रिक मोटर लगी है।

दी भावनात्मक विदाई 

हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने इस प्रोजेक्ट को बड़ी कुशलता से संभाला। कंपनी ने पनडुब्बी को नया जीवन देने के लिए दिन-रात मेहनत की। रीफिट के दौरान इंजीनियरों और तकनीशियनों ने हर छोटे-बड़े हिस्से पर काम किया। रीफिट पूरा होने के बाद हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने INS सिंधुकीर्ति को भावनात्मक विदाई दी।

हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड के चेयरमैन ने एक पोस्ट में लिखा: “सिंधुकीर्ति, हमारी कीर्ति। जैसे ही आप हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड से विदा लेती हैं, हम आपको दिल से भावभीनी विदाई देते हैं, प्रिय सिंधुकीर्ति। HSL के साथ आपका यह सफर समर्पण, इंजीनियरिंग उत्कृष्टता और समुद्र की गहराइयों में सन्नाटा लिए शक्ति का प्रतीक रहा है। हम आपके चालक दल और HSL टीम को सलाम करते हैं, जिनके परिश्रम से आप फिर से नौसेना सेवा के लिए तैयार हुई हैं। आपकी तैनाती सफल हो, गोते सुरक्षित रहें और मिशन हमेशा सटीक और प्रभावशाली रहें। अलविदा और मंगल यात्रा! जय हिंद! टीम HSL”

भारतीय नौसेना के लिए रणनीतिक बढ़त

इस रीफिट के साथ, INS सिंधुकीर्ति अब फिर से समुद्र में ऑपरेशन के लिए तैयार है। यह न केवल भारत की रक्षा तैयारियों को और मजबूती देगी, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पकड़ को भी मजबूत करेगी। खासतौर पर जब, पिछले कुछ वर्षों में नौसेना की पनडुब्बी क्षमताओं को लेकर चिंता जताई जाती रही है। ऐसे में INS सिंधुकीर्ति की समय पर रीफिटिंग एक सकारात्मक शुरुआत है।