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MDL-Naval Group MoU: फ्रांस के नेवल ग्रुप के साथ स्कॉर्पिन सबमरीन बनाएगी मझगांव डॉक, “फ्रेंडली कंट्री” के लिए हुआ करार

MDL Naval Group MoU: India, France Partner to Export Evolved Scorpene Submarines under Horizon 2047 Vision

MDL-Naval Group MoU: मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने फ्रांस के नेवल ग्रुप के साथ एक एक्सक्लूसिव मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग साइन किया है। यह समझौता एक “फ्रेंडली कंट्री” के लिए स्कॉर्पिन सबमरीन्स बनाने को लेकर किया गया है, जो अपना सबमरीन एक्विजिशन प्रोग्राम चला रही है।

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यह करार रक्षा मंत्रालय के नेवल सिस्टम्स डिवीजन के जॉइंट सेक्रेटरी राजीव प्रकाश की मौजूदगी में हुआ। इसका उद्देश्य भारत और फ्रांस के बीच दीर्घकालिक साझेदारी को होराइजन 2047 विजन के तहत और मजबूती देना है।

MDL-Naval Group MoU: भारत बना सबमरीन एक्सपोर्ट का हब

इस समझौते से भारत पहली बार वैश्विक सबमरीन एक्सपोर्ट मार्केट में एक को-प्रोड्यूसर देश के तौर पर प्रवेश कर रहा है। अब दोनों कंपनियां मिलकर विकसित स्कॉर्पिन कैटेगरी की पनडुब्बियां उन मित्र देशों को ऑफर करेगा जो भारत और फ्रांस दोनों के लिए रणनीतिक रूप से अहम हैं।

एमडीएल ने एक बयान में कहा कि यह साझेदारी भारत के मेक इन इंडिया विजन के तहत की गई है, जिसमें अब भारत केवल निर्माण केंद्र नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी पार्टनर के तौर पर उभरा है।

प्रोजेक्ट 75 की सफलता से खुला रास्ता

एमडीएल और नेवल ग्रुप की साझेदारी कोई नई नहीं है। 2005 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट 75 भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग का सबसे सफल उदाहरण रहा है। इसके तहत एमडीएल ने छह स्कॉर्पिन-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन्स बनाईं, जिनमें आईएनएस कलवरी, आईएनएस खंडेरी, आईएनएस करंज, आईएनएस वेला, आईएनएस वागीर और आईएनएस वाघशीर शामिल हैं।

आईएनएस वाघशीरr को जनवरी 2025 में भारतीय नौसेना को सौंपा गया, जिससे प्रोजेक्ट 75 की आखिरी सबमरीन थी। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत ने 90% से अधिक इंडिजिनाइजेशन लेवल हासिल कर लिया है।

इन पनडुब्बियों में स्टील्थ टेक्नोलॉजी, उन्नत टॉरपीडो सिस्टम, एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एऐपी) मॉड्यूल और लंबे समय तक अंडरवॉटर क्षमता जैसी अत्याधुनिक खूबिया हैं। अब, इसी तकनीक के एडवांस वर्जन को भारत-फ्रांस मिलकर मित्र देशों के लिए तैयार कर रहे हैं।

फ्रेंडली कंट्री के लिए होगी सबमरीन पेशकश

एमडीएल और नेवल ग्रुप ने देश का नाम सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह सौदा इंडो-पैसिफिक रीजन के एक देश से जुड़ा हो सकता है। क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्थिरता को देखते हुए इंडोनेशिया या वियतनाम जैसे देश इसके संभावित भागीदार माने जा रहे हैं।

एमओयू के मुताबिक, दोनों कंपनियां केवल “परस्पर मित्र राष्ट्र” को ही विकसित स्कॉर्पीन सबमरीन ऑफर करेंगी। यह न केवल भारत के रक्षा निर्यात में नया अध्याय खोलेगा, बल्कि भारतीय शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बनाएगा।

भारत-फ्रांस साझेदारी का नया चरण

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा 2023 में घोषित “होराइजन 2047 डिफेंस पार्टनरशिप विजन” का उद्देश्य रक्षा अनुसंधान, को-प्रोडक्शन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के क्षेत्र में भारत-फ्रांस सहयोग को 2047 तक नए स्तर पर ले जाना है।

इससे पहले, जुलाई 2025 में नेवल ग्रुप ने डीआरडीओ के साथ एआईपी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर एग्रीमेंट साइन किया था। यह तकनीक स्कॉर्पीन सबमरीन को 14 दिनों तक बिना सतह पर आए अंडरवॉटर ऑपरेशन में सक्षम बनाती है।

इस एमओयू से एमडीएल की ऑर्डर बुक में भी बढ़ोतरी होगी। कंपनी फिलहाल 38,000 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर्स पर काम कर रही है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह एक्सपोर्ट डील फाइनल होती है, तो एमडीएल के पोर्टफोलियो में 10,000-15,000 करोड़ रुपये के नए कॉन्ट्रैक्ट जुड़ सकते हैं।

शेयर मार्केट में भी इस घोषणा के बाद एमडीएल के शेयर में 3 फीसदी की तेजी दर्ज की गई और यह 4,200 रुपये के स्तर पर पहुंच गया।

UN Peacekeeping Conclave 2025: भारत बना संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों का टेक्नोलॉजी पार्टनर, दुनिया ने देखा आत्मनिर्भर भारत का मॉडल

UN Peacekeeping Conclave 2025: India Becomes Technology Partner for Global Peacekeeping, Showcases Aatmanirbhar Innovations

UN Peacekeeping Conclave 2025: भारत ने एक बार फिर ग्लोबल प्लेटफार्म पर अपनी तकनीकी और रणनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया है। तीन दिवसीय संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन देशों के प्रमुखों के सम्मेलन (UNTCC) के समापन के साथ भारत ने न केवल अपनी मेजबानी निभाई, बल्कि खुद को संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के एक टेक्नोलॉजी पार्टनर के तौर पर भी स्थापित कर लिया।

UNTCC Chiefs Conclave में जनरल उपेंद्र द्विवेदी बोले- ‘ब्लू हैलमेट’ पहने सैनिक शांति का प्रतीक, समझदारी से हासिल किया जा सकता है अमन

यह सम्मेलन 14 से 16 अक्टूबर 2025 तक नई दिल्ली में आयोजित किया गया। भारतीय सेना द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में 32 देशों के सेनाध्यक्षों और संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वैश्विक शांति अभियानों को नई तकनीक, नवाचार और सहयोग के जरिए अधिक प्रभावी बनाना था।

UN Peacekeeping Conclave 2025: भारत ने दिखाया ‘टेक्नोलॉजी ड्रिवन पीसकीपिंग’ का मॉडल

सम्मेलन का सबसे चर्चित सत्र था “संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना में प्रौद्योगिकी का फायदा उठाना” (लीवरेजिंग टेक्नोलॉजी इन यूएन पीसकीपिंग), जिसमें भारत ने अपनी स्वदेशी रक्षा तकनीक और इनोवेशन की झलक पेश की। इस सत्र में 15 देशों के उद्योग प्रतिनिधि और संयुक्त राष्ट्र के रक्षा विशेषज्ञ शामिल हुए।

इस सत्र में यह चर्चा हुई कि आधुनिक शांति अभियानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन निगरानी, डेटा एनालिटिक्स, सैटेलाइट लिंकिंग और साइबर सिक्योरिटी सिस्टम जैसी तकनीकों का समावेश कैसे किया जा सकता है। भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठनों और निजी कंपनियों ने अपने स्वदेशी इनोवेशन का प्रदर्शन करते हुए दिखाया कि भारत अब केवल सैनिक योगदान नहीं, बल्कि तकनीकी योगदान में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

भारतीय प्रतिनिधियों ने बताया कि भविष्य के यूएन मिशन सिचुएशनल अवेयरनेस सिस्टम्स, रियल टाइम कम्युनिकेशन नेटवर्क्स और ऑटोमेटेड लॉजिस्टिक सपोर्ट सिस्टम्स के सहारे ज्यादा सुरक्षित और कुशल हो सकते हैं।

UN Peacekeeping Conclave 2025: India Becomes Technology Partner for Global Peacekeeping, Showcases Aatmanirbhar Innovations

“टेक्नोलॉजी अब शांति अभियानों की रीढ़” – UN Peacekeeping Conclave 2025

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि “शांति अभियानों को आज टेक्नोलॉजिकल इनोवेशंस से सशक्त करने की जरूरत है। अब संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि डेटा, साइबर स्पेस और सूचना तंत्र तक फैल चुके हैं। ऐसे में, तकनीक के माध्यम से ही शांति अभियानों को आधुनिक और प्रभावी बनाया जा सकता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि शांति सैनिकों की सुरक्षा और ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाने में तकनीक निर्णायक भूमिका निभा रही है। जयशंकर ने कहा कि भारत इस दिशा में अपने अनुभव और इनोवेशंस को विश्व के साथ साझा करने के लिए तैयार है।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी बोले- “शांति में भी टेक्नोलॉजी की भूमिका जरूरी”

भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सम्मेलन के दौरान छह देशों बुरुंडी, तंजानिया, पोलैंड, इथियोपिया, नेपाल और युगांडा के सेनाध्यक्षों से द्विपक्षीय वार्ता की। इन बैठकों में शांति अभियानों में तकनीकी समन्वय, इंटरऑपरेबिलिटी और ट्रेनिंग साझेदारी पर चर्चा हुई।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि “भारत तकनीक आधारित शांति अभियानों का मॉडल दुनिया के सामने रख रहा है। हमारा उद्देश्य केवल सैनिक भेजना नहीं, बल्कि समाधान और इनोवेशंस देना है।”

उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय सेना अब अपने सभी शांति अभियानों में टेक-बेस्ड सिचुएशनल अवेयरनेस सिस्टम्स और डिजिटल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट को शामिल कर रही है।

डिफेंस एक्सपो में दिखा ‘आत्मनिर्भर भारत’ का दम

सम्मेलन के साथ-साथ आयोजित डिफेंस एक्पो में भारत की तकनीकी ताकत का बड़ा प्रदर्शन हुआ। इसमें 41 भारतीय रक्षा कंपनियों और स्टार्टअप्स ने अपने अत्याधुनिक सिस्टम्स और प्लेटफॉर्म्स का प्रदर्शन किया। इस एक्सपो ने यह संदेश दिया कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का खरीदार नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर आपूर्तिकर्ता और टेक्नोलॉजी डेवलपर बन चुका है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संदेश, “भारत सिर्फ सैनिक नहीं, तकनीकी नेतृत्व भी दे रहा है”

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में सभी सेनाध्यक्षों और प्रतिनिधियों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि “शांति अभियानों में भारत की भूमिका अब सैनिक योगदान से आगे बढ़ चुकी है। हम अब टेक्नोलॉजी और रणनीति के क्षेत्र में भी नेतृत्व कर रहे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में शांति अभियानों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश कितनी तेजी से तकनीकी सहयोग और नवाचार को अपनाते हैं।

UN Peacekeeping Conclave 2025: India Becomes Technology Partner for Global Peacekeeping, Showcases Aatmanirbhar Innovations
Chiefs and Heads of Delegations planted saplings of Ashoka at the Peacekeepers’ Grove in Manekshaw Centre, New Delhi

प्रस्ताव पर जताई सहमति 

सम्मेलन के दौरान सभी देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों को नई वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप ढालने के लिए साझा टेक्नोलॉजी फ्रेमवर्क बनाया जाना चाहिए। इसमें डेटा शेयरिंग नेटवर्क्स, साइबर प्रोटेक्शन प्रोटोकॉल्स, और इंटरऑपरेबल कम्युनिकेशन सिस्टम्स को प्राथमिकता देने की सिफारिश की गई।

सम्मेलन के अंत में सभी प्रतिनिधियों ने “इंडिया डिक्लेरेशन ऑन टेक्नोलॉजी फोर पीसकीपिंग” नामक प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई, जो भविष्य के शांति अभियानों के लिए तकनीकी सहयोग का खाका तैयार करेगा।

तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में भारत ने न केवल अपनी कूटनीतिक क्षमता दिखाई, बल्कि यह भी साबित किया कि वह 21वीं सदी के शांति अभियानों का तकनीकी मार्गदर्शक बन सकता है।

भारत की यह भूमिका एक ऐसे समय में आई है जब दुनिया के कई हिस्सों में शांति अभियानों को साइबर अटैक्स, इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर और एआई-आधारित खतरों का सामना करना पड़ रहा है।

Indian Navy Cybersecurity: एडमिरल दिनेश त्रिपाठी बोले- हर मैरीटाइम सिस्टम में हो साइबर सिक्योरिटी सिस्टम, खतरे में एनर्जी सप्लाई और ट्रेड रूट्स भी

Indian Navy Cybersecurity Seminar: Admiral Dinesh Tripathi Stresses Cybersecurity in Every Maritime System

Indian Navy Cybersecurity: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा कि “हर मैरीटाइम सिस्टम में शुरुआत से ही साइबर सिक्योरिटी सिस्टम शामिल किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी साइबर हमले की स्थिति में तुरंत और सटीक जवाबी कार्रवाई की जा सके।

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नई दिल्ली में आयोजित भारतीय नौसेना के साइबर सुरक्षा सेमिनार ‘‘इम्पैक्ट ऑफ साइबर अटैक्स ऑन मैरीटाइम सेक्टर एंड आईटीएस इफेक्ट्स ऑन नेशनल सिक्युरिटी एंड इंटरनेशनल रिलेशंस’’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियां भारत को “समुद्र से समृद्धि” के विजन को आगे बढ़ा रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की आर्थिक प्रगति का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों और सुरक्षा पर निर्भर है, और इसीलिए समुद्री अमृत काल विजन 2047, सागरमाला और प्रधानमंत्री गति शक्ति जैसी योजनाओं को साइबर सिक्योरिटी के साथ जोड़ा जाना जरूरी है।

भारतीय नौसेना की तरफ से आयोजित इस सेमिनार में केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, रक्षा विशेषज्ञ, साइबर सुरक्षा संस्थान, निजी उद्योग प्रतिनिधि और नौसेना के उच्च अधिकारी शामिल हुए। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में बढ़ते साइबर खतरों की समझ को गहराई से बढ़ाना और राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा के ढांचे को और मजबूत बनाना था।

एडमिरल त्रिपाठी ने इस बात पर जोर दिया कि नौसेना के सभी सिस्टम, इक्विपमेंट्स और नेटवर्क को शुरू से ही साइबर-रेसिलिएंट बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “साइबर हमले अब सिर्फ डेटा की चोरी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा, एनर्जी सप्लाई, और व्यापारिक मार्गों को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए हमें सिक्योरिटी सिस्टम को उसी रफ्तार से डेवलप करना होगा, जिस गति से खतरे बढ़ रहे हैं।”

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि साझेदारी और समन्वय ही साइबर सिक्योरिटी को मजबूत बना सकते हैं, इसके लिए सरकारी संस्थानों, उद्योगों और तकनीकी विशेषज्ञों को एकजुट होकर काम करना होगा।

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कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने कहा कि भारत की समुद्री सीमाएं न केवल हमारे आर्थिक हितों की रक्षा करती हैं, बल्कि हमारी रणनीतिक सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा भी हैं। उन्होंने कहा कि “समुद्री सुरक्षा अब केवल जहाजों और बंदरगाहों तक सीमित नहीं है। यह साइबर नेटवर्क, डाटा कम्युनिकेशन सिस्टम और ऑटोमेटेड लॉजिस्टिक्स से जुड़ चुकी है। इसलिए हमें एक मजबूत और फ्लैक्सिबल साइबर डिफेंस आर्किटेक्चर तैयार करना होगा।”

सेमिनार में तीन प्रमुख पैनल डिस्कशंस आयोजित किए गए, जिनमें मिनिस्ट्री ऑफ पोर्ट्स, शिपिंग एंड वाटरवेज, नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट, सर्ट-आईएन, गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड, नेशनल क्रिटिकल इन्फॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर और नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन जैसी संस्थाओं के विशेषज्ञों ने भाग लिया।

Indian Navy Cybersecurity

चर्चा का फोकस मैरीटाइम इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते साइबर खतरों, सिविल-मिलिटरी पार्टनरशिप और समुद्री क्षेत्र को क्रिटिकल इन्फॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता पर रहा। विशेषज्ञों ने कहा कि समुद्री व्यापार, बंदरगाह प्रबंधन और एनर्जी सप्लाई सिस्टम अब साइबर हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील हो गए हैं। इसलिए भारत को डिजिटल मैरीटाइम इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षा के दायरे में लाना होगा।

DRDO ARDE Lab: रक्षा मंत्री ने देखी जोरावर टैंक की परफॉरमेंस, ATAGS, पिनाका और आकाश-NG का भी देखा प्रदर्शन

DRDO ARDE Lab: Defence Minister Reviews Zorawar Tank Performance, Witnesses ATAGS, Pinaka & Akash-NG Demonstrations

DRDO ARDE Lab: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल एक नीति नहीं है, बल्कि यह देश की सबसे मजबूत सुरक्षा ढाल है। पुणे स्थित आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) के दौरे के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत का लक्ष्य अब केवल रक्षा उपकरणों का उपयोगकर्ता बनना नहीं है, बल्कि उनका निर्माता बनना है। एआरडीई प्रयोगशाला डीआरडीओ के तहत आर्मामेंट एंड कॉम्बैट इंजीनियरिंग सिस्टम्स (एसीई) क्लस्टर का हिस्सा है।

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रक्षा मंत्रालय की संसदीय परामर्श समिति की इस बैठक की अध्यक्षता करते हुए राजनाथ सिंह ने अत्याधुनिक वेपन सिस्टम और उभरती तकनीकों के प्रदर्शन का निरीक्षण किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि हम केवल तकनीक के उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि उसके निर्माता बनना चाहते हैं। आत्मनिर्भरता सिर्फ एक लक्ष्य नहीं, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की ढाल है।”

उन्होंने बताया कि भारत में अब रक्षा अनुसंधान को सिर्फ सरकारी प्रयास नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखा जा रहा है। इस दिशा में डीआरडीओ, उद्योग, स्टार्टअप्स और शिक्षण संस्थान मिलकर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।

बैठक के दौरान समिति के सदस्यों ने पुणे स्थित एआरडीई (DRDO ARDE Lab) में डेवलप हुए कई वेपन सिस्टम्स का प्रदर्शन भी देखा, जिनमें एडवांस टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS), पिनाका रॉकेट सिस्टम, लाइट टैंक जोरावर, व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म और आकाश-नेक्स्ट जनरेशन मिसाइल शामिल थे।

राजनाथ सिंह ने इन वेपन सिस्टम्स (DRDO ARDE Lab) को देखकर कहा कि ये सभी सिस्टम भारत की तकनीकी प्रगति और स्वदेशी रक्षा क्षमताओं का उदाहरण हैं। उन्होंने बताया कि अब भारत ने उन तकनीकों में भी सफलता हासिल की है जिन्हें पहले आयात किया जाता था।

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उन्होंने यह भी बताया कि डीआरडीओ (DRDO ARDE Lab) के वैज्ञानिक अब रोबोटिक्स, रेल गन, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS) और हाई एनर्जी प्रोपल्शन मटेरियल्स जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में भी रिसर्च कर रहे हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज का युग टेक्नोलॉजिकल डोंमिनेंस का है। जो देश विज्ञान और इनोवेशन को प्राथमिकता देता है, वही भविष्य का नेतृत्व करेगा। उन्होंने कहा कि तकनीक अब केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी रणनीतिक नीतियों और रक्षा निर्णयों का आधार बन चुकी है।

राजनाथ सिंह ने कहा, “अक्सर कुछ देश अपनी एडवांस टेक्नोलॉजी साझा नहीं करते। लेकिन भारत ने इन सीमाओं को चुनौती दी है। आज हम न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं बल्कि दुनिया के लिए विश्वसनीय रक्षा साझेदार बन चुके हैं।”

उन्होंने कहा कि डीआरडीओ (DRDO ARDE Lab) और निजी क्षेत्र की साझेदारी से भारत में रक्षा अनुसंधान का नया इकोसिस्टम बन रहा है। अब रक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक उपक्रम, निजी उद्योग, स्टार्टअप्स और शिक्षण संस्थान मिलकर काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “भारत अब सिर्फ आत्मनिर्भर नहीं, बल्कि ग्लोबल डिफेंस इनोवेशन हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने यह साबित किया है कि अगर इरादा साफ हो और नीति स्पष्ट हो, तो कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं जिसमें हम आत्मनिर्भर न बन सकें।” उन्होंने कहा कि डीआरडीओ के वैज्ञानिक ऐसे उत्पाद बना रहे हैं जो पहले केवल विदेशों से खरीदे जाते थे। उन्होंने कहा कि अब भारत फ्यूचरिस्टिक प्रोडक्ट्स के निर्माण में भी अग्रणी बन रहा है, जिन पर अभी दुनिया के कई देश काम शुरू ही कर रहे हैं।

राजनाथ सिंह (DRDO ARDE Lab) ने यह भी बताया कि भारत के युवा अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, क्वांटम कम्युनिकेशन, रोबोटिक्स और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन नई तकनीकों ने न केवल भारतीय सेनाओं को आधुनिक बनाया है बल्कि युवाओं के लिए नए अवसर भी खोले हैं।

Self Reliant India: रक्षा मंत्री बोले- ऑपरेशन सिंदूर भारत की बढ़ती स्वदेशी रक्षा क्षमता का प्रतीक, सालाना रक्षा उत्पादन पहुंचा 1.5 लाख करोड़ रुपये

Self Reliant India
Raksha Mantri Rajnath Singh addressing the students of Symbiosis Skills and Professional University, Pune during their convocation ceremony.

Self Reliant India: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर भारत की बढ़ती स्वदेशी रक्षा क्षमता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह भारत सरकार के उन प्रयासों का परिणाम है जिसके तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में आत्मनिर्भर डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार किया गया है।

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पुणे स्थित सिंबायोसिस स्किल्स एंड प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि जब सरकार ने रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य तय किया था, तब यह एक कठिन चुनौती लग रही थी। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह सपना धीरे-धीरे साकार हो रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में सरकार ने हर स्तर पर स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए, जिसके परिणाम आज देश के सामने हैं।

Self Reliant India: दुनिया ने देखी भारतीय सैनिकों की बहादुरी 

राजनाथ सिंह ने कहा, स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारत विदेशी हथियारों पर निर्भर रहा। राजनीतिक इच्छाशक्ति और नीतिगत समर्थन की कमी के चलते देश में रक्षा निर्माण को बढ़ावा नहीं मिल पाया। लेकिन अब स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। देश में कानून, नीतियां और औद्योगिक माहौल इस दिशा में पूरी तरह सहयोगी हैं। उन्होंने कहा, “हमने प्रण लिया था कि हमारे सैनिकों के लिए हथियार अब भारत में ही बनेंगे। पूरी दुनिया ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सैनिकों की बहादुरी देखी, जब उन्होंने ‘मेड-इन-इंडिया’ हथियारों से अपने लक्ष्य पूरे किए।

रक्षा मंत्री ने बताया कि बीते दस वर्षों में देश का वार्षिक रक्षा उत्पादन 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें लगभग 33,000 करोड़ रुपये का योगदान निजी क्षेत्र का है। उन्होंने कहा कि भारत अब 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

राजनाथ सिंह ने छात्रों से कहा कि केवल अकादमिक उपलब्धियों से आगे बढ़कर उन्हें देश के विकास में योगदानकर्ता और इनोवेशन के वाहक बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि “वास्तविक सफलता डिग्री से नहीं, बल्कि उस ज्ञान से आती है जिसे समाज के हित में इस्तेमाल किया जाए।” उन्होंने छात्रों से कहा कि आत्मविश्वास और दृढ़ता जैसे गुण किसी भी व्यक्ति की सफलता की बुनियाद होते हैं।

उन्होंने कहा कि आज का युग “व्हाट डू यू नो” का नहीं, बल्कि “व्हाट कैन यू डू” का है। उन्होंने छात्रों को संदेश दिया कि सीखना तभी सार्थक है जब उसे स्किल्स के तौर पर लागू किया जाए।

रक्षा मंत्री ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी बात की और कहा कि तकनीक इंसान की जगह नहीं लेगी, बल्कि जो लोग तकनीक का उपयोग करना जानते हैं, वही आगे बढ़ेंगे। उन्होंने छात्रों को तकनीक को एक साधन के रूप में देखने की सलाह दी, न कि मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों के विकल्प के तौर पर।

राजनाथ सिंह (Self Reliant India) ने युवाओं से आग्रह किया कि वे सोशल मीडिया और बाहरी दबावों से प्रभावित हुए बिना अपने सपनों का पीछा करें। उन्होंने कहा कि भारत अब अपने “अमृत काल” में प्रवेश कर चुका है और वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है। उन्होंने कहा, “आपके जीवन के अगले 20 से 25 साल केवल आपके करियर को नहीं, बल्कि देश के भविष्य को भी आकार देंगे। आपके सपने ही भारत के परिवर्तन के इंजन बन सकते हैं।”

Apollo Micro Systems क्यों बना हुआ है मल्टीबैगर डिफेंस स्टॉक? DRDO से मिली टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की ये बड़ी मंजूरी

Apollo Micro Systems

Apollo Micro Systems: हैदराबाद स्थित रक्षा कंपनी अपोलो माइक्रो सिस्टम्स लिमिटेड (एएमएसएल) को भारतीय रक्षा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। कंपनी को रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों यानी डिफेंस पीएसयू से कुल 39.27 करोड़ रुपये (392.70 मिलियन) के नए ऑर्डर मिले हैं। साथ ही, कंपनी को डीआरडीओ की ओर से मेकेट्रॉनिक फ्यूज फोर ग्रेनेड्स के टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मंजूरी भी मिली है।

Bharat Electronics: बीईएल को मिला 592 करोड़ रुपये का नया डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट, कवच सिस्टम और टैंक अपग्रेड पर फोकस

यह जानकारी कंपनी ने 16 अक्टूबर 2025 को अपने रेगुलेटरी फाइलिंग में दी है। इस घोषणा के बाद कंपनी के शेयरों में शुरुआती कारोबारी सत्र में लगभग 3 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर Apollo Micro Systems का शेयर 301.75 रुपये तक पहुंच गया, जबकि सुबह 10 बजे के आसपास यह 296 रुपये पर ट्रेड कर रहा था।

कंपनी ने बताया कि उसे डीआरडीओ से 4.3 करोड़ रुपये के ऑर्डर और रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों से 34.97 करोड़ रुपये के ऑर्डर मिले हैं। इन दोनों ऑर्डर्स को मिलाकर कुल मूल्य 39.27 करोड़ रुपये होता है।

Apollo Micro Systems को मेकेट्रॉनिक फ्यूज की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मंजूरी मिलना रक्षा निर्माण क्षेत्र के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है। यह तकनीक ग्रेनेड फ्यूजिंग सिस्टम से जुड़ी है, जो सटीक और सुरक्षित विस्फोट होता है। इस टेक्नोलॉजी को डीआरडीओ ने बनाया है और अब इसका ट्रांसफर Apollo Micro Systems को किया जा रहा है।

कंपनी अब इस तकनीक के उत्पादन और डिलीवरी में सीधे योगदान दे सकेगी, जिससे भारत की डिफेंस सप्लाई चैन में स्वदेशी तकनीक की हिस्सेदारी और बढ़ेगी।

Apollo Micro Systems पहले से ही एयरोस्पेस, डिफेंस, रेलवे और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में काम कर रही है।

शेयर मार्केट के आंकड़ों के अनुसार, अपोलो माइक्रो सिस्टम का प्रदर्शन पिछले एक साल में बेहद शानदार रहा है। कंपनी के शेयर ने 12 महीनों में निवेशकों को 193 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। वहीं, दो साल में इसका मूल्य 340 प्रतिशत और पांच साल में 2,500 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है।

शेयर विश्लेषकों का कहना है कि कंपनी के लगातार नए ऑर्डर्स और DRDO से मिली तकनीक की मंजूरी उसके लिए एक बड़ा प्रोत्साहन साबित होगी। इससे कंपनी की रेवेन्यू कैपेबिलिटी और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी।

कंपनी ने सितंबर तिमाही के अपने कारोबारी नतीजे जारी किए थे, जिसमें कंपनी की कुल आय 225.26 करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल की समान तिमाही के 161 करोड़ रुपये के मुकाबले 40 फीसदी ज्यादा है। इसके अलावा, पिछली तिमाही की तुलना में यह 68 फीसदी की बढ़त दिखी है।

कंपनी ने जून तिमाही में 18.51 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे ऊंचा शुद्ध मुनाफा दर्ज किया था, जो सालाना आधार पर 115 फीसदी की बढ़त है।

Apollo Micro Systems ने हाल ही में डिफेंस और साइबर सिक्योरिटी क्षेत्र में कई अहम साझेदारियां की हैं। कंपनी ने सिबरसेंटिनेल टेक्नोलॉजीज और ज़ूम टेक्नोलॉजीज के साथ सरकारी एजेंसियों के लिए साइबर सुरक्षा सॉल्यूशन डेवलप करने के लिए एमओयू साइन किए हैं।

साथ ही, इसकी सहायक कंपनी अपोलो स्ट्रैटेजिक टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड ने अमेरिकी कंपनी डायनेमिक इंजीनियरिंग एंड डिजाइन इंक के साथ बीएम-21 ग्रैड ईआर डिजाइन मोटर के संयुक्त विकास के लिए समझौता किया है।

कंपनी को डीआरडीओ से एनएएसएम-एसआर मिसाइल वॉरहेड्स के लिए तकनीक ट्रांसफर की मंजूरी भी मिली है। लगातार बढ़ते ऑर्डर्स और साझेदारियों के चलते कंपनी के शेयर ने छह महीनों में 200% की शानदार तेजी दर्ज की है।

डिस्क्लेमर: शेयरों में निवेश करने से वित्तीय नुकसान का जोखिम होता है। इसलिए, निवेशकों को शेयरों में निवेश या ट्रेडिंग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। निवेश करने से पहले कृपया अपने निवेश सलाहकार से सलाह लें।

Bharat Electronics: बीईएल को मिला 592 करोड़ रुपये का नया डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट, कवच सिस्टम और टैंक अपग्रेड पर फोकस

Bharat Electronics

Bharat Electronics: भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को 592 करोड़ रुपये का नया डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट मिला है। यह जानकारी कंपनी ने बीएसई और एनएसई को एक आधिकारिक फाइलिंग में दी। इन नए कॉन्ट्रैक्ट्स के साथ बीईएल की ऑर्डर बुक और भी मजबूत हो गई है। यह कॉन्ट्रैक्ट 29 सितंबर 2025 के बाद से मिले हैं, जब कंपनी ने 1,092 करोड़ रुपये के अतिरिक्त ऑर्डर का एलान किया था।

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कंपनी ने बताया कि ये नए कॉन्ट्रैक्ट कई अहम क्षेत्रों से जुड़े हैं। इनमें टैंक सबसिस्टम और उनके ओवरहॉलिंग, कम्युनिकेशन इक्विपमेंट, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम और शिप डेटा नेटवर्क शामिल हैं। इन तकनीकों से भारतीय सेनाओं की ऑपरेशनल क्षमता में बढ़ोतरी होगी।

Bharat Electronics को इस बार रेलवे सुरक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा ऑर्डर मिला है। कंपनी को ट्रेन कोलिशन अवॉयडेंस सिस्टम (कवच) के लिए ऑर्डर प्राप्त हुआ है। यह भारत में विकसित एक घरेलू सुरक्षा प्रणाली है जो ट्रेन टकराव की घटनाओं को रोकने में मदद करती है। इसके अलावा कंपनी को लेजर डैजलर्स, जैमर्स, और विभिन्न अपग्रेड, स्पेयर्स और सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स भी मिले हैं। कंपनी के मुताबिक, इन कॉन्ट्रैक्ट्स का दायरा रक्षा के साथ-साथ गैर-रक्षा क्षेत्रों तक फैला हुआ है।

पिछले कुछ महीनों में बीईएल को लगातार नए ऑर्डर मिल रहे हैं। सितंबर 2025 में कंपनी ने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम अपग्रेड, डिफेंस नेटवर्क अपग्रेड, टैंक सबसिस्टम और ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल्स जैसे सेक्टर्स में भी कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए थे। इसके साथ ही कंपनी को ईवीएम, स्पेयर्स और सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए भी ऑर्डर मिले थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि Bharat Electronics का यह नया ऑर्डर भारतीय रक्षा उद्योग में तेजी से बढ़ते निवेश का संकेत है। कंपनी के उत्पाद जैसे कि कवच सिस्टम, कॉम्बैट मैनेजमेंट नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक जामिंग उपकरण भारत की सामरिक क्षमताओं को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

Bharat Electronics एक नवरत्न रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम है, जो रक्षा, संचार, अंतरिक्ष, और रेलवे जैसे क्षेत्रों में एडवांस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स बनाती है। यह कंपनी लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को अत्याधुनिक तकनीकी सॉल्यूशन प्रोवाइड कर रही है।

नए ऑर्डर्स के साथ कंपनी की कुल ऑर्डर बुक अब 80,000 करोड़ रुपये से अधिक की बताई जा रही है। उद्योग जगत के जानकारों के अनुसार, बीईएल की मजबूत ऑर्डर स्थिति और उच्च स्वदेशी कंटेंट भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र के लिए एक बड़ा सकारात्मक संकेत है।

कंपनी के शेयरों में गुरुवार को हल्की तेजी देखी गई। ट्रेडिंग के दौरान Bharat Electronics का शेयर 226.50 रुपये पर पहुंच गया, जो पिछले दिन के मुकाबले लगभग 1.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। मार्केट विश्लेषकों के अनुसार, रक्षा क्षेत्र में सरकार की बढ़ती प्राथमिकता और बीईएल की विश्वसनीय तकनीक निवेशकों के विश्वास को बढ़ा रही है।

डिस्क्लेमर: शेयरों में निवेश करने से वित्तीय नुकसान का जोखिम होता है। इसलिए, निवेशकों को शेयरों में निवेश या ट्रेडिंग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। निवेश करने से पहले कृपया अपने निवेश सलाहकार से सलाह लें।

Akash Missile: आकाश एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने के लिए इच्छुक है ब्राजील! चीनी हथियारों पर नहीं है भरोसा

India offers Akash Missile air defence system to Brazil

Akash Missile: भारत और ब्राजील के बीच रक्षा सहयोग को एक नई ऊंचाई देते हुए भारत ने अपने स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम की पेशकश ब्राजील को की है। यह पेशकश रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ब्राजील के उपराष्ट्रपति जेराल्डो अल्कमिन तथा रक्षा मंत्री जोसे मुशियो मोंटेइरो फिल्हो के बीच नई दिल्ली में हुई बैठक के दौरान की गई। इस बैठक में दोनों देशों ने रक्षा साझेदारी को और मजबूत करने तथा संयुक्त अनुसंधान, विकास और उत्पादन के नए अवसरों की पहचान करने पर सहमति जताई।

UAE Akash Missile Explainer: पैट्रियट, पैंटसिर और THAAD के बावजूद UAE को क्यों भा रहा है भारत का ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम?

भारत और ब्राजील के बीच यह रक्षा सहयोग ऐसे समय में सामने आया है जब भारत रक्षा निर्यात के क्षेत्र में लगातार सफलता दर्ज कर रहा है। हाल के सालों में भारत ने आर्मेनिया को आकाश, पिनाका और 155 मिमी आर्टिलरी गन जैसी सिस्टम की सप्लाई की है, जबकि फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें दी जा चुकी हैं।

बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने रक्षा क्षेत्र में जारी परियोजनाओं की समीक्षा की और भविष्य के लिए प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की। इस बैठक का मुख्य फोकस सैन्य से सैन्य सहयोग, संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम और रक्षा तकनीक के सह-विकास पर रहा। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि भारत और ब्राजील के बीच यह साझेदारी “रणनीतिक साझेदारी” का रूप ले चुकी है।

भारत ने ब्राजील को जिस आकाश मिसाइल सिस्टम की पेशकश की है, वह मध्यम दूरी का सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है। इसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है और यह भारतीय सेना और वायुसेना दोनों में तैनात है। यह प्रणाली दुश्मन के हेलीकॉप्टर, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और फाइटर जेट्स को 25 किलोमीटर की दूरी तक मार गिराने में सक्षम है।

Akash Missile: “मेक इन इंडिया” का ग्लोबल ब्रांड बन रहा आकाश सिस्टम

आकाश मिसाइल सिस्टम अब “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” का प्रतीक बन चुका है। इसमें 96 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है। यह सिस्टम न केवल सस्ता है बल्कि ऑपरेशन सिंदूर में अपनी क्षमता भी दिखा चुका है। इसी कारण दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और अब दक्षिण अमेरिका के कई देशों ने इसमें रुचि दिखाई है।

आर्मेनिया ने 2022 में लगभग 6,000 करोड़ रुपये के सौदे के तहत 15 आकाश सिस्टम खरीदे थे। पहली बैटरी नवंबर 2024 में और दूसरी जून 2025 में डिलीवर की गई। आकाश के सफल ऑपरेशन ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के रक्षा निर्यात पर भरोसा बढ़ाया है।

ब्राजील के रक्षा विशेषज्ञों ने पहले ही भारत की मिसाइल तकनीक की विश्वसनीयता की सराहना की है। अब आकाश सिस्टम की पेशकश से यह संभावना बनती है कि दोनों देश रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

आकाश मिसाइल सिस्टम में एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक करने और नष्ट करने की क्षमता है। यह सिस्टम रडार और फायर कंट्रोल यूनिट के साथ सिंक रहती है, जिससे यह मुश्किल लक्ष्यों को भी आसानी से टारगेट कर सकती है। वहीं, इसका लेटेस्ट वर्जन, आकाश-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) भी डेवलप किया जा रहा है, जिसकी न केवल रेज ज्यादा होगी, बल्कि उसकी स्पीड और प्रिसिजन स्ट्राइकिंग रेट भी बेहतर होगा।

आकाश को बनाने में डीआरडीओ के अलावा कई निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां जैसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स भी शामिल रही हैं। भारत का लक्ष्य डिफेंस एक्सपोर्ट को 2025 तक 5 बिलियन डॉलर तक पहुंचाना है, और आकाश सिस्टम इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहा है।

ब्राजील ने हाल के सालो में चीन के कुछ डिफेंस प्रोडक्ट्स का असेसमेंट किया है, लेकिन भारतीय सिस्टम की लागत और भरोसेमंद होने के चलते उसका झुकाव भारत की ओर दिख रहा है।

भारत पहले ही संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम, मिस्र, बेलारूस, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों के साथ डिफेंस एक्सपोर्ट को लेकर बाातचीत कर रहा है। इन देशों ने भारतीय आकाश मिसाइल सिस्टम, पिनाका रॉकेट लॉन्चर और ब्रह्मोस मिसाइल में रुचि दिखाई है।

India UN Peacekeeping Conference: विदेश मंत्री एस. जयशंकर बोले- संयुक्त राष्ट्र अब भी 1945 की दुनिया में अटका, जरूरी हैं सुधार

India UN Peacekeeping Conference: Jaishankar urges UN reform, says peacekeepers’ safety and Global South’s voice must be priorities
India UN Peacekeeping Conference: EAM S. Jaishankar urges UN reform, says peacekeepers’ safety and Global South’s voice must be priorities

India UN Peacekeeping Conference: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नई दिल्ली में आयोजित संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन देशों के प्रमुखों के सम्मेलन में कहा कि दुनिया बदल चुकी है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र अब भी 1945 की हकीकतों पर आधारित स्ट्रक्चर में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि अगर संस्थान समय के साथ नहीं बदलते तो उनकी प्रासंगिकता और वैधता दोनों खत्म हो जाती हैं।

 Rajnath Singh UN Conclave: संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन सम्मेलन में बोले रक्षा मंत्री- भारत के लिए शांति स्थापना ‘आस्था का विषय’

जयशंकर ने इस मौके पर कहा कि भारत जैसे देश, जो दशकों से संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं, अब समय आ गया है कि उन्हें फैसला लेने की प्रक्रिया में बड़ा स्थान मिले। उन्होंने कहा कि “भारत और अन्य विकासशील देश अब केवल प्रतिभागी नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता के निर्माण में नेतृत्वकर्ता बनने को तैयार हैं।”

India UN Peacekeeping Conference: यूएन को 2025 की दुनिया के मुताबिक बनना होगा

जयशंकर ने कहा कि वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र का स्ट्रक्चर संरचना उस दौर का है जब यह संस्था बनी थी। आज दुनिया की जनसंख्या, अर्थव्यवस्थाएं और भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। उन्होंने कहा, “80 साल बहुत लंबा समय है। इन दशकों में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश चार गुना हो चुके हैं, लेकिन फैसला लेने की प्रक्रिया अभी भी कुछ ही देशों के हाथों में है।”

उन्होंने चेताया कि अगर सुधार नहीं हुए, तो संयुक्त राष्ट्र न सिर्फ अप्रासंगिक हो जाएगा बल्कि उसकी विश्वसनीयता भी खत्म हो जाएगी। जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार जरूरी है ताकि यह संस्थान अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक बने।

भारत की शांति मिशनों में अग्रणी भूमिका

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने हमेशा वैश्विक शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। अब तक तीन लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में हिस्सा लिया है। इनमें से 182 भारतीय शांति सैनिकों ने कर्तव्य पालन के दौरान सर्वोच्च बलिदान दिया।

उन्होंने कहा, “भारत के लिए शांति मिशनों में भाग लेना केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हमारे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के दर्शन का विस्तार है।” जयशंकर ने कहा कि भारत शांति, समानता और मानव गरिमा के सिद्धांतों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था में विश्वास रखता है।

आधुनिक दौर के शांति अभियानों की नई चुनौतियां

जयशंकर ने अपने संबोधन में बताया कि आज शांति अभियानों की प्रकृति पहले जैसी नहीं रही। पहले जहां शांति सैनिक दो देशों के बीच बफर की भूमिका निभाते थे, वहीं अब उन्हें आतंकी संगठनों, गैर-राज्य तत्वों और सशस्त्र समूहों से भी मुकाबला करना पड़ता है। उन्होंने कहा, “आज का शांति मिशन ऐसे माहौल में काम करता है, जहां दुश्मन की कोई वर्दी नहीं होती और कोई नियम नहीं माने जाते।”

उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक अब शांति अभियानों का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। आधुनिक युद्ध और संघर्षों में साइबर खतरों, ड्रोन हमलों और फेक न्यूज अभियानों की चुनौती बढ़ी है। ऐसे में शांति सैनिकों को अत्याधुनिक उपकरणों, संचार साधनों और साइबर क्षमताओं से लैस करना जरूरी है।

भारत तकनीकी साझेदार के रूप में तैयार

जयशंकर ने कहा कि भारत शांति अभियानों में तकनीकी इनोवेशंस का प्रदर्शन करने को तैयार है। उन्होंने कहा कि भारत की डीआरडीओ जैसी संस्थाएं और निजी रक्षा उद्योग ऐसे सॉल्यूशन डेवलप कर रहे हैं जो वैश्विक शांति अभियानों को और अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महिला शांति सैनिकों के लिए भी कई कार्यक्रमों की मेजबानी की। फरवरी 2025 में भारत ने “ग्लोबल साउथ वूमन पीसकीपर्स कॉन्फ्रेंस” आयोजित की थी, जिसमें 35 देशों की महिला सैनिकों ने भाग लिया था। अगस्त 2025 में भारत ने यूएन वूमन मिलिट्री ऑफिसर्स कोर्स भी आयोजित किया था। जयशंकर ने कहा, “अब सवाल यह नहीं है कि महिलाएं शांति स्थापना कर सकती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या शांति स्थापना उनके बिना सफल हो सकती है।”

सुनें ग्लोबल साउथ की आवाज

जयशंकर ने अपने भाषण में कहा कि दुनिया के अधिकांश संघर्ष क्षेत्र “ग्लोबल साउथ” यानी विकासशील देशों में स्थित हैं। इसलिए इन देशों की जरूरतें अलग हैं और इनके समाधान भी स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा अपने दक्षिणी भागीदारों के साथ खड़ा रहा है और शांति अभियानों में अपने अनुभव साझा करता रहेगा।

जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत का दृष्टिकोण केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि मानवीय भी है। भारत मानता है कि “शांति कहीं भी हो, वह हर जगह की शांति को मजबूत करती है।”

India UN Peacekeeping Conference: भारत ने की 7 प्रमुख सुधारों की मांग

जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के भविष्य को लेकर सात प्रमुख बिंदु रखे। उन्होंने कहा कि ट्रूप कंट्रीज और होस्ट नेशंस को मिशन के जनादेश तय करने में शामिल किया जाना चाहिए। मिशन के उद्देश्यों को स्पष्ट और वास्तविकता बनाया जाए। उन्होंने शांति सैनिकों की सुरक्षा, टेक्नोलॉजी के उपयोग और गलत सूचना अभियानों के खिलाफ रणनीति को भी जरूरी बताया।

उन्होंने जोर देकर कहा कि शांति सैनिकों पर होने वाले किसी भी हमले के दोषियों को सजा मिलनी चाहिए ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

Military Combat Parachute System: डीआरडीओ ने रचा इतिहास, 32,000 फीट से किया स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट का सफल परीक्षण

Military Combat Parachute System: DRDO’s Indigenous Parachute Successfully Tested at 32,000 Feet by Indian Air Force

Military Combat Parachute System: डीआरडीओ ने स्वदेश में ही बने मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम का 32,000 फीट की ऊंचाई से सफल परीक्षण किया गया है। यह परीक्षण भारतीय वायुसेना के टेस्ट जम्पर्स ने किया गया, जिन्होंने इस पैराशूट के जरिए ऊंचाई से फ्रीफॉल जम्प किया। इस सफलता के साथ भारत ने यह साबित कर दिया है कि अब देश पूरी तरह से स्वदेशी एयरबोर्न कॉम्बैट सिस्टम बनाने में सक्षम है।

Safran-DRDO Jet Engine India: डीआरडीओ और फ्रांस की सफरान मिल कर बनाएंगे AMCA का इंजन, लेकिन क्या वाकई होगा 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर?

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, डीआरडीओ ने यह पैराशूट सिस्टम पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से तैयार किया है। इस परियोजना पर डीआरडीओ की दो प्रमुख प्रयोगशालाओं आगरा की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट और बेंगलुरु की डिफेंस बायोइंजीनियरिंग एंड इलेक्ट्रोमेडिकल लेबोरेटरी ने मिलकर काम किया है।

यह पैराशूट सिस्टम भारतीय सेनाओं में फिलहाल एकमात्र ऐसा सिस्टम है जो 25,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर भी डिप्लॉय किया जा सकता है। मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम का ट्रायल 32,000 फीट की ऊंचाई से किया गया, जो तकनीकी रूप से बेहद जटिल और जोखिम भरा होता है। लेकिन भारतीय वायुसेना के पैराट्रूपर्स ने ने 32,000 फीट की ऊंचाई से सफल फ्रीफॉल जंप किया।

यह सिस्टम 30,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात किया गया था। जिससे यह भारतीय सेनाओं में इस ऊंचाई पर काम करने वाला पहला सिस्टम बन गया है। यह जंप वायुसेना के विंग कमांडर विशाल लखेश (वीएम-जी), एमडब्ल्यूओ आर.जे. सिंह और एमडब्ल्यूओ विवेक तिवारी ने किया।

इस पैराशूट सिस्टम में कई एडवांस खूबियां जोड़ी गई हैं। इसमें कम डिसेंट रेट और बेहतर स्टीयरिंग क्षमता दी गई है, जिससे पैराट्रूपर्स विमान से सुरक्षित तरीके से बाहर निकल सकते हैं और निर्धारित दिशा में सुरक्षित लैंडिंग कर सकते हैं। सिस्टम में आधुनिक नेविगेशन भी लगाया गया है। इसमें भारत का खुद का नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन (NavIC) लगाया गया है, जिससे यह सिस्टम किसी भी बाहरी देश की इंटरफेरेंस या सिग्नल जैमिंग से बेअसर रहेगा।

Military Combat Parachute System

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस सिस्टम की सफलता से भारत अब विदेशी पैराशूट सिस्टम पर निर्भर नहीं रहेगा। पहले ऐसे कॉम्बैट पैराशूट्स यूरोप और अमेरिका से खरीदे जाते थे, जिनकी सर्विसिंग और रिपेयरिंग में काफी समय लगता था। अब स्वदेशी प्रणाली से यह समय और खर्च दोनों में बचत होगी।

वहीं, इस उपलब्धि को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, भारतीय सशस्त्र बलों और रक्षा उद्योग को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस उपलब्धि के लिए वैज्ञानिकों की टीम की सराहना की और इसे एरियल डिलीवरी सिस्टम्स में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताया।

डीआरडीओ की टीम ने बताया कि यह सिस्टम न केवल सटीक और भरोसेमंद है बल्कि यह लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके रखरखाव में भी बहुत कम समय लगता है और यह बाहर से खरीदे गए इक्विपमेंट्स की तुलना में अधिक टिकाऊ है। इसके सफल परीक्षण से भारतीय सेना को अब हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस में तैनाती के दौरान बेहतर कॉम्बैट डिलीवरी क्षमता मिलेगी।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस सिस्टम का इस्तेमाल स्पेशल ऑपरेशंस में भी किया जाएगा, जहां सैनिकों को दुश्मन के इलाके में हाई एल्टीट्यूड, लो ओपनिंग या हाई एल्टीट्यूड, हाई ओपनिंग जम्प के जरिए एंट्री होती है। इस प्रकार की तकनीक से न केवल सैनिकों की सुरक्षा बढ़ेगी बल्कि भारत की सामरिक क्षमता भी मजबूत होगी।