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HIMARS vs PINAKA: पाकिस्तान को क्यों चाहिए अमेरिका का यह रॉकेट सिस्टम? क्यों पिनाका ने उड़ा रखी है मुनीर की नींद? समझें पूरा समीकरण

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System
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HIMARS vs PINAKA: जून में पाकिस्तानी फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के अमेरिका दौरे के बाद पाकिस्तानी एयरफोर्स चीफ (PAF) जहीर अहमद बाबर सिद्धू अमेरिका पहुंचे। पाकिस्तानी सैन्य प्रमुखों का यह दौरा उनकी छटपटाहट दिखा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद से वे काफी बैचेन हैं। बताया जाता है कि बाबर सिद्धू ने अमेरिका से कई एडवांस मिलिट्री प्लेटफॉर्म जिनमें F-16 ब्लॉक 70 फाइटर जेट्स और एयर डिफेंस सिस्टम की मांग की है। साथ ही पाकिस्तान AIM-7 स्पैरो एयर-टू-एयर मिसाइलें और अमेरिकी HIMARS (हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम) की बैटरियों भी खरीदना चाहता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तानी हमलों को नाकाम किया, उससे पाकिस्तान हैरान और परेशान है। पाकिस्तान अब अमेरिकी HIMARS पर नजरें गड़ा कर बैठा है।

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HIMARS vs PINAKA: अमेरिकी हथियारों में पाकिस्तान की अचानक रुचि क्यों?

सैन्य जानकार बताते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय हथियारों ने जिस तरह से सटीक उनके आतंकी औऱ सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए, उसके बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। चीनी एयर डिफेंस सिस्टम HQ-9 और HQ-16 के फेल हो जाने के बाद पाकिस्तान को अपनी डिफेंस स्ट्रेटेजी पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। HQ-9 और HQ-16 भारतीय ब्रह्मोस मिसाइलों और ड्रोन स्वार्म्स को रोकने में पूरी तरह विफल रहीं। यहां तक कि पाकिस्तान अपने प्रमुख सैन्य ठिकानों, जैसे कि गुजरांवाला और मियांवाली एयरबेस, और संदिग्ध परमाणु केंद्र किराना हिल्स पर किए गए हमलों का भी कोई प्रभावी जवाब नहीं दे पाया। भारतीय हरॉप लोइटरिंग म्यूनिशन्स ने एक LY-80 रडार को नष्ट कर दिया, और HQ-9P सिस्टम भारतीय ड्रोन्स और लो-फ्लाइंग SCALP मिसाइलों को ट्रैक करने में फेल हो गए।

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System
HIMARS vs PINAKA: Chief of the Air Staff, Pakistan Air Force (PAF), Air Chief Marshal Zaheer Ahmad Babar Sidhu and United States Air Force officials.

चीनी हथियारों पर निर्भरता बनी हार की वजह

पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान ज्यादातर हथियार चीन से खरीद रहा है। उसकी सैन्य शक्ति का 81% हिस्सा चीनी हथियारों पर निर्भर है। हाल ही में भारतीय सेना के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ, लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने FICCI की कॉन्फ्रेंस में खुलासा किया था कि चीन ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को भारतीय सैन्य गतिविधियों की “लाइव” सैटेलाइट जानकारी मुहैया कराई थी। इसके बावजूद, चीनी हथियार भारतीय हमलों का मुकाबला करने में नाकाम साबित हुए। पाकिस्तान के पास चीनी HQ-9P एयर डिफेंस सिस्टम है, लेकिन चीन का घरेलू HQ-9B सिस्टम कहीं ज्यादा एडवांस है, जिसकी रेंज 250-300 किमी है। इसका मतलब साफ है कि चीन ने पाकिस्तान को घटिया क्वॉलिटी के हथियार निर्यात किए, जो आधुनिक युद्ध की चुनौतियों का सामना करने में फेल हो गए।

इसके अलावा, चीन ने पाकिस्तान की हाइपरसोनिक मिसाइलों और एडवांस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मांग को भी ठुकरा दिया, जो इस्लामाबाद के लिए बड़ा झटका था। चीनी हथियारों को लेकर नाराजगी न केवल सेना में थी, बल्कि जनता भी खुश नहीं दिखी। पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया पर चीनी हथियारों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए। ऑपरेशन सिंदूर ने न केवल पाकिस्तान की सैन्य कमजोरियों की पोल खोल दी, बल्कि इस्लामाबाद को यह भी अहसास करा दिया कि उसकी चीन पर अत्यधिक निर्भरता उसकी युद्धक्षमता को खतरे में डाल रही है।

पाक को अपने पाले में करना चाहता है अमेरिका

सैन्य सूत्रों ने अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हैनरी किसिंजर के एक कथन का जिक्र करते हुए कहा, “अमेरिका का कोई दोस्त या दुश्मन नहीं है, उसके केवल अपने हित हैं।” वह कहते हैं, अमेरिका अब फिर से उन्हीं देशों की तरफ देख रहा है जिन्हें उसने 20वीं सदी के अंत में छोड़ दिया था। अमेरिका को अब उनकी फिर से पाकिस्तान की जरूरत है।

वह आगे कहते हैं, अमेरिका भारत को एक दशक बाद के लिए खतरा मानता है, और इसके अलावा, वह भारत की सैन्य क्षमताओं को लेकर भी चिंतित है। इसलिए उसने बांग्लादेश को भी इसमें शामिल कर लिया। पाकिस्तान हमेशा कुछ पाने को लालायित रहता है, और अब उसे अमेरिका अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रहा है।

सूत्र कहते हैं कि अब पाकिस्तानियों को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अहसास हुआ है कि इस ऑपरेशन में चीनी हथियारों के फेल हो गए हैं। इसलिए वे अमेरिकियों के साथ संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं। या यूं कहें कि वे चीन का इस्तेमाल करके अमेरिका के संग अपनी नजदीकियां बढ़ा रहे हैं।

अमेरिका बीते एक दशक में पाकिस्तान के चीन के करीब जाने से नाखुश रहा है। लेकिन अब एयर चीफ सिद्दू की यह यात्रा पाकिस्तान की ओर से यह संकेत मानी जा रही है कि इस्लामाबाद अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और रक्षा खरीद में संतुलन बनाना चाहता है। विश्लेषकों का मानना है कि एयर मार्शल सिद्दू की यह यात्रा पाकिस्तान की एक रणनीतिक संतुलन नीति का हिस्सा है, ताकि वॉशिंगटन को यह भरोसा दिलाया जा सके कि पाकिस्तान अपने रक्षा संबंधों को दोबारा पटरी पर लाने के लिए तैयार है।

पाकिस्तान के पास चीन का A-100 MLRS सिस्टम

पाकिस्तान के पास चीन का A-100 MLRS सिस्टम (Multiple Launch Rocket System) है। लेकिन भारत के स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम पिनाका के मुकाबले कम प्रभावी है। पाकिस्तान के पास मौजूद चीनी A-100 MLRS सिस्टम में फिक्स्ड ट्यूब्स लगे हैं। इनमें केवल 300 मिमी की रॉकेट ही फायर किए जा सकते हैं। यह सिस्टम फ्लैक्सिबल नहीं है, और ना ही यह अन्य कैलिबर रॉकेट्स के साथ काम कर सकता है।

जबकि पिनाका पॉड्स का सबसे बड़ा फायदा है- फ्लैक्सिबिलिटी। पिनाका के पॉड फ्रेम को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि उसमें अलग-अलग कैलिबर की लॉन्चर ट्यूब्स लगाई जा सकती हैं। यानी एक ही पॉड फ्रेम को बार-बार अलग-अलग तरह की ट्यूब्स से जोड़ा जा सकता है। पिनाका में अलग-अलग एमएम वाले वॉरहेड्स (हाई-एक्सप्लोसिव, क्लस्टर, एंटी-टैंक, और माइन-लेइंग) फायर किए जा सकते हैं। इस रॉकेट सिस्टम को DRDO ने विकसित किया है और इसका निर्माण टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और L&T इसे बना रही हैं।

वहीं, पिनाका में जो लॉन्चर ट्यूब्स इस्तेमाल होती हैं, वे एक बार इस्तेमाल के बाद बदली जा सकती हैं। ये ट्यूब्स ई-ग्लास एपॉक्सी रेजिन से बनी होती हैं और फिलामेंट वाइंडिंग प्रोसेस से बनाई जाती हैं। इससे ट्यूब्स हल्की होती हैं और फायरिंग के बाद पॉड फ्रेम को फिर से प्रयोग में लाया जा सकता है।

जबकि चीनी A-100 में लगे फिक्स्ड ट्यूब्स को बदला नहीं जा सकता। सिस्टम पुराना हो या ट्यूब डैमेज हो, पूरी यूनिट को रिप्लेस करना पड़ता है। जिससे लागत बढ़ाती है और फ्लैक्सिबिलिटी घटती है।

इसके अलावा पाकिस्तान के भेजे जाने वाले A-100 सिस्टम में 10 ट्यूब्स होती हैं, जो केवल 300 मिमी रॉकेट्स फायर कर सकती हैं। जबकि रूस के Smerch सिस्टम में 12 ट्यूब्स होती हैं। पिनाका Mk-1, Mk-2 और Mk-1 एन्हैंस्ड के लिए 6 ट्यूब पॉड्स होते हैं और गाइडेड पिनाका के लिए 4 ट्यूब्स प्रति पॉड मतलब 8 ट्यूब प्रति लॉन्चर ट्यूब पॉड्स होते हैं।

चीनी दावे के अनुसार इसकी रेंज 120 किलोमीटर तक है, जबकि इंप्रोवाइज्ड रूसी Smerch की रेंज 90 किमी है। A-100 की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह रूसी Smerch रॉकेट्स के साथ कंपेटिबल नहीं है, जबकि कई देश अभी भी रूसी रॉकेट्स का इस्तेमाल करते हैं। चीनी कंपनियां खुद कहती हैं कि A-100 का प्रोपल्शन सिस्टम और डिजाइन अलग है, इसलिए इसमें सिर्फ उनके बनाए स्पेशल रॉकेट्स ही इस्तेमाल हो सकते हैं। A-100 की रेंज भले ही 120 किमी हो, लेकिन इसकी सटीकता और आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता पिनाका से कम है।

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System

HIMARS में क्यों है पाकिस्तान की रुचि?

दरअसल पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम (MBRLS) को अमेरिकी HIMARS के बराबर बताया है। यूक्रेन-रूस युद्ध में HIMARS ने 30 रूसी सैन्य ठिकानों को नष्ट किया, जिसके बाद इसे काफी भरोसेमंद माना जाने लगा। अमेरिका ने जून 2022 में यूक्रेन को पहले चार HIMARS (अब तक 40) सिस्टम दिए थे। इसके बाद यूक्रेन ने दावा किया कि उसने इनकी मदद से 100 से ज़्यादा हाई-वैल्यू टारगेट (महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों) को तबाह किया। HIMARS ने 100+ किमी दूरी से ही हाई एक्सप्लोसिव और GMLRS जैसे गाइडेड रॉकेट्स के जरिए रूस के सैन्य ठिकानों को टारगेट किया और सटीक हमले किए। पाकिस्तान इसे भारत की सटीक हमले की क्षमता के खिलाफ एक संभावित प्रतिरोधक के रूप में देखता है। पाकिस्तान इस सिस्टम को हासिल करके भारत की लॉन्ग-रेंज आर्टिलरी बढ़त को संतुलित करना चाहता है। यह सिस्टम गाइडेड रॉकेट फायर करता है और तेजी से लोकेशन (शूट-एंड-स्कूट- फायर करके तुरंत स्थान बदलना) बदल सकता है, जिससे जवाबी हमला करना मुश्किल होता है।

HIMARS को आप एक चलती-फिरती रॉकेट बैटरी कह सकते हैं। इसमें लगे रॉकेट जीपीएस की मदद से गाइडेड होते हैं, यानी ये बहुत सटीक होते हैं। एक HIMARS 6 जीपीएस गाइडेड रॉकेट्स (69 किमी रेंज) या 2 प्रेसिजन स्ट्राइक मिसाइल्स या 1 आर्मी टैक्टिकल मिसाइल (300 किमी रेंज) फायर कर सकता है। इसके रॉकेट्स का वजन लगभग 200 पाउंड होता है और हर रॉकेट 13 फीट से ज़्यादा लंबा होता है।

HIMARS की एक खास बात यह है कि इसे बहुत कम सैनिकों यानी 3 लोगों की टीम ही ऑपरेट कर सकती है। इतना ही नहीं, इसे दुबारा लोड करने में केवल 1 मिनट लगता है, यानी यह तेजी से फायरिंग के लिए फिर से तैयार हो जाता है। वहीं इसे M1140 6×6 व्हील ड्राइव वाले ट्रक पर लगाया जाता है। HIMARS ट्रक को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वह पहाड़, रेगिस्तान, दलदली ज़मीन और बर्फीले इलाकों में भी आराम से चल सके। यही कारण है कि HIMARS को आज दुनिया के सबसे भरोसेमंद और घातक मोबाइल रॉकेट सिस्टम में गिना जाता है।

HIMARS में अलग-अलग क्षमता वाले कई तरह के रॉकेट और मिसाइल इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें सबसे पहला है GMLRS, यानी गाइडेड मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम, जिसकी रेंज करीब 69 किलोमीटर तक है। इसके बाद आता है ER GMLRS, यानी लंबी दूरी वाला वर्जन, जिसकी रेंज 150 किलोमीटर मानी जाती है।

अगर टैक्टिकल लेवल की बात करें, तो HIMARS में ATACMS नामक मिसाइल का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जिसकी मारक दूरी 300 किलोमीटर तक जाती है। लेकिन सबसे नई और एडवांस मिसाइल है PrSM (Precision Strike Missile), जो करीब 499 किलोमीटर या उससे भी अधिक दूरी तक सटीक वार करने में सक्षम है। इन सभी रॉकेटों की खासियत यह है कि ये जीपीएस गाइडेड होते हैं। अमेरिकी रक्षा निर्माता लॉकहीड मार्टिन के अनुसार, प्रत्येक रॉकेट लक्ष्य के महज 16 फीट के दायरे में गिरता है, जो इसे मॉडर्न वारफेयर के लिए एक बेहद सटीक और भरोसेमंद हथियार बनाता है।

क्या ऑपरेशन सिंदूर में हुआ था पिनाका का इस्तेमाल?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर में पिनाका का इस्तेमाल नहीं किया गया था। हां, अग्रिम मोर्चे पर इसकी तैनाती जरूर की गई थी। इसे रिजर्व में रखा गया था। सूत्र बताते हैं कि अगर इसका इस्तेमाल हो जाता, तो निश्चित तौर पर पाकिस्तान को मौजूदा से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता। एक सूत्र ने बताया कि पाकिस्तान को अंदेशा था कि भारत पिनाका का इस्तेमाल करेगा। जिससे वह काफी डरा हुआ था। यहां तक कि पाकिस्तान ने पिनाका की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए ड्रोन भी भेजे थे। लेकिन उन्हें मार गिराया गया।

पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) के बारे में कहा जाता है कि एक पूरी बैटरी अगर पूरे दमखम के साथ इस्तेमाल की जाए, तो यह लगभग 1000 मीटर x 800 मीटर (0.8 वर्ग किलोमीटर) के इलाके को बरबाद कर सकता है। दरअसल एक पिनाका बैटरी में 6 लॉन्चर होते हैं, और प्रत्येक लॉन्चर में 12 रॉकेट्स होते हैं। यानी, एक बैटरी में कुल 72 रॉकेट्स होते हैं। ये 72 रॉकेट्स 44 सेकंड में फायर किए जा सकते हैं, जो एक बड़े क्षेत्र (सैन्य ठिकानों, हथियार डिपो, या सैनिकों की टुकड़ियों) को तुरंत तबाह कर सकते हैं। सेना सूत्रों के अनुसार, एक बैटरी एक बार में 7.2 टन विस्फोटक सामग्री दुश्मन के इलाके में गिरा सकती है। पिनाका को 8×8 टाट्रा या BEML-टाट्रा ट्रक पर लगाया जाता है, जो इसे तेजी से तैनात करने में मदद करता है। इसकी शूट-एंड-स्कूट क्षमता दुश्मन के जवाबी हमलों से बचाती है।

प्रत्येक रॉकेट में हाई-एक्सप्लोसिव फ्रैगमेंटेशन (HE-FRAG), क्लस्टर म्यूनिशन, या अन्य वॉरहेड्स होते हैं, जो बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं। एक बैटरी का हमला 1000 मीटर x 800 मीटर (लगभग 0.8 वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्र को प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकता है। यह क्षेत्र सैन्य ठिकानों, हथियार डिपो, या सैनिकों की टुकड़ियों को तबाह करने के लिए काफी बड़ा है। खासकर अगर क्लस्टर म्यूनिशन का इस्तेमाल किया जाए, तो यह सैकड़ों छोटे-छोटे विस्फोटकों में बंट जाता है, जो एक बड़े क्षेत्र में तबाही मचा सकता है।

पिनाका में कई देशों ने दिखाई रूचि

पिनाका की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फ्रांस, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, वियतनाम औरर कुछ यूरोपीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई देश इसमें रूचि दिखा चुके हैं। वहीं, आर्मेनिया पिनाका MBRL का पहला विदेशी खरीदार है। 2023 में उसने भारत से 245 मिलियन डॉलर की डील के तहत पिनाका सिस्टम खरीदा था। ये सिस्टम आर्मेनिया को ईरान के रास्ते डिलीवर किए गए, ताकि वह अजरबैजान के खिलाफ अपनी रक्षा को मजबूत कर सके। सूत्र बताते हैं कि भारत अब हर साल 5,000 से ज्यादा पिनाका रॉकेट बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है।

भारतीय सेना के पास 6 पिनाका रेजिमेंट

वहीं, भारतीय सेना के पास 2025 तक 6 पिनाका रेजिमेंट (108+ लॉन्चर) हैं, और 4 और रेजिमेंट ऑर्डर पर हैं। भारत ने 2025 में 10,147 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट्स के साथ पिनाका की गोला-बारूद क्षमता बढ़ाई, जिसमें एरिया डिनायल म्यूनिशन (ADM) और हाई-एक्सप्लोसिव प्री-फ्रैगमेंटेड (HEPF) रॉकेट्स शामिल हैं। भारत का लक्ष्य भारतीय सेनाओं में 2030 तक 22 पिनाका रेजिमेंट्स तैनात करना है।

HIMARS vs Pinaka: Pakistan is lobbying for US-made High Mobility Artillery Rocket System
Pinaka and HIMARS Showcase Firepower Together at Yudh Abhyas 2024

2024 में पिनाका औऱ HIMARS दिखे थे साथ-साथ

पिछले साल 2024 में पहली बार भारतीय सेना का पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम और अमेरिकी सेना का HIMARS (हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम) एक ही फायरिंग रेंज पर एकसाथ गरजे थे। युद्ध अभ्यास 2024 में पहली बार भारत-अमेरिका ने लॉन्ग रेंज फायरपावर की ताकत दिखाई थी। सूत्रों ने बताया कि युद्ध अभ्यास 2024 के दौरान अमेरिका ने भारत को HIMARS सिस्टम बेचने का भी ऑफर दिया था।

Tri-Services Academia Technology Symposium: रिसर्च एंड डेवलपमेंट में सेना की नई पहल, अब डिफेंस टेक्नोलॉजी के लिए मिलकर काम करेंगे शैक्षणिक संस्थान और सेनाएं

Tri-Services Academia Technology Symposium 2025: Indian Armed Forces and Top Institutes Join Hands for Defence Research and development
Pic Source: Indian Army

Tri-Services Academia Technology Symposium: भारतीय सेनाएं अब रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान और विकास (R&D) को बढ़ावा देने के लिए नए कदम उठा रही हैं। हाल ही में संपन्न हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया कि स्वदेशी तकनीकों की ताकत भारत की रक्षा तैयारियों को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती हैं। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारतीय सेनाओं ने देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों जैसे आईआईटी, एनआईटी और टॉप विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर एक अनूठा मंच तैयार करने की योजना बनाई है। इस मंच का नाम है ट्राई-सर्विसेज एकेडमिया टेक्नोलॉजी सिंपोजियम, जिसका उद्देश्य सेनाओं की जरूरतों के अनुरूप स्वदेशी और अत्याधुनिक तकनीकों का विकास करना है।

Tri-Services Academia Technology Symposium 2025: Indian Armed Forces and Top Institutes Join Hands for Defence Research and development
Pic Source: Indian Army

Tri-Services Academia Technology Symposium 22-23 सितंबर को

नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में हाल ही में इस सिंपोजियम के लिए एक कर्टेन रेजर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह आयोजन भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के संयुक्त प्रयासों से हुआ। इस कार्यक्रम ने 22-23 सितंबर 2025 को होने वाले मुख्य सिंपोजियम की तैयारियों की औपचारिक शुरुआत की। इस साल की थीम “विवेक व अनुसंधान से विजय” रखी गई है, जिसका मतलब है तकनीकी समझदारी और शोध ही भविष्य की जीत की कुंजी है।

इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य देश के शैक्षणिक संस्थानों और रक्षा क्षेत्र के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है। इसके लिए एक विशेष वेब पोर्टल लॉन्च किया गया है, जिसके जरिए देशभर के कॉलेज, विश्वविद्यालय और शोध संस्थान अपने प्रतिनिधियों को रजिस्टर कर सकते हैं। यह पोर्टल 10 अगस्त 2025 तक खुला रहेगा। संस्थानों को दो तरह से भाग लेने का मौका मिलेगा। पहला, वे या तो सेमिनार और पैनल चर्चाओं में प्रतिभागी के रूप में शामिल हो सकते हैं या दूसरा वे अपने टेक्निकल प्रपोजल और इनोवेशंस को प्रोजेक्ट के तौर पर पेश कर सकते हैं।

एकेडमिक इंस्टीट्यूशंस को बड़ा मंच

आर्मी डिजाइन ब्यूरो के एडीजी मेजर जनरल सीएस मान ने कर्टेन रेजर कार्यक्रम में कहा कि यह सिंपोजियम शैक्षणिक संस्थानों को अपनी प्रतिभा और इनोवेशंस को रक्षा क्षेत्र तक पहुंचाने का एक अनूठा अवसर प्रदान करेगा। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य एक ऐसा सिस्टम बनाना है, जिसमें सशस्त्र बलों की जरूरतें और अकादमिक संस्थानों की क्षमताएं एक-दूसरे से जुड़ सकें।”

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इस आयोजन के लिए देश के टॉप 200 शैक्षणिक संस्थानों और 50 शोध संगठनों को निमंत्रण भेजा गया है। इसके अलावा, अन्य इच्छुक संस्थान भी इस पोर्टल के जरिए भाग ले सकते हैं। मेजर जनरल मान ने बताया कि जो भी तकनीकी प्रस्ताव या आइडिया इस पोर्टल के जरिए भेजे जाएंगे, उनकी समीक्षा सेना के विशेषज्ञ करेंगे। चयनित प्रस्तावों को सिंपोजियम के दौरान प्रदर्शनी में शामिल किया जाएगा, और उनके प्रतिनिधियों को रक्षा अधिकारियों के साथ सीधे संवाद का मौका मिलेगा।

चुने गए प्रोजेक्ट्स को न केवल प्रदर्शनी में जगह मिलेगी, बल्कि उन्हें पुरस्कार और मान्यता भी दी जाएगी। इससे संस्थानों को भविष्य में और अधिक R&D के लिए प्रेरणा मिलेगी। मेजर जनरल मान ने कहा, “आत्मनिर्भर भारत का मतलब सिर्फ हथियार बनाना नहीं, बल्कि अपनी डिजाइन और शोध क्षमता को विश्व स्तर पर ले जाना है।”

Tri-Services Academia Technology Symposium 2025: Indian Armed Forces and Top Institutes Join Hands for Defence Research and development
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अमेरिका से प्रेरणा

आईआईटी गुवाहटी के डायरेक्टर प्रोफेसर देवेंद्र जलिहाल ने इस आयोजन में अमेरिका का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्वविद्यालयों और रक्षा क्षेत्र ने मिलकर कई क्रांतिकारी तकनीकों का विकास किया। एमआईटी, बर्कले और न्यू मैक्सिको जैसे संस्थानों में रक्षा प्रयोगशालाएं स्थापित की गईं, जो रडार, ऊर्जा और पानी के नीचे की तकनीकों पर काम करती हैं। उन्होंने कहा कि भारत को भी ऐसा मॉडल अपनाने की जरूरत है।

प्रोफेसर जलिहाल ने जोर देकर कहा कि भविष्य के युद्ध तकनीक पर आधारित होंगे। “जो देश तकनीक में माहिर होगा, वही दुनिया में नेतृत्व करेगा।” उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का हवाला देते हुए कहा कि यह ऑपरेशन इस बात का सबूत है कि युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि तकनीकी क्षेत्र में लड़े जाते हैं। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि भारत में शैक्षणिक संस्थान और रक्षा क्षेत्र के बीच संवाद की कमी है। यह सिंपोजियम इस कमी को दूर करने का एक महत्वपूर्ण कदम है।

सरकार का सहयोग

भारत सरकार का विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग भी इस आयोजन में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है। विभाग ने राष्ट्रीय मिशन ऑन इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स (NMICPS) के तहत 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन सेंटर स्थापित किए हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, ड्रोन और अन्य उन्नत तकनीकों पर काम कर रहे हैं। ये सेंटर इस सिंपोजियम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

एयरफोर्स चीफ और डीआरडीओ चीफ ने कही थी ये बात

एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने हाल ही में 29 मई 2025 को हुई CII एनुअल बिजनेस समिट में रिसर्च एंड डेवलपमेंट के महत्व पर अपने विचार साझा किए थे। उन्होंने कहा था कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता तभी संभव है, जब भारत न केवल उत्पादन में, बल्कि डिजाइन और विकास में भी सक्षम बने। उन्होंने जोर देकर कहा, “रिसर्च एंड डेवलपमेंट में जोखिम लेना जरूरी है। असफलताएं हो सकती हैं, लेकिन उनसे सीखकर आगे बढ़ना होगा। अगर तकनीक समय पर उपलब्ध नहीं होती, तो उसका महत्व खत्म हो जाता है।” उन्होंने प्रतिभा पलायन पर भी चिंता जताते हुए कहा था कि देश में बेहतर वेतन, प्रोत्साहन और वर्क इनवायरमेंट की जरूरत है।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए बताया कि स्वदेशी तकनीकों, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), भारतीय उपग्रह नविक (NavIC), ड्रोन और रडार सिस्टम ने इस ऑपरेशन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि तकनीक में देरी रक्षा तैयारियों को कमजोर करती है, इसलिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट में तेजी और जोखिम लेने की क्षमता को बढ़ाना होगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत को वैश्विक रक्षा क्षेत्र में अग्रणी बनने के लिए अपनी डिजाइन क्षमताओं को मजबूत करना होगा।

वही, डीआरडीओ प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत ने भी CII एनुअल बिजनेस समिट में रिसर्च एंड डेवलपमेंट को रक्षा क्षेत्र की रीढ़ बताया था। उन्होंने कहा था, “हमें केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। भारत को अपने सिस्टम डिजाइन करने और विकसित करने की क्षमता बढ़ानी होगी।”

China role in Op Sindoor: भारतीय सेना ने बताया ऑपरेशन सिंदूर में एक नहीं तीन थे दुश्मन! चीन की भूमिका का किया खुलासा, पाकिस्तान को मोहरा बना की हथियारों की टेस्टिंग!

China role in Op Sindoor: Indian Army Reveals Three Adversaries, Exposes China's Support to Pakistan
Lieutenant General Rahul Singh

China role in Op Sindoor: भारतीय सेना के उप प्रमुख (कैपेबिलिटी डेवलपमेंट एंड सस्टेनेंस) लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने शुक्रवार को ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कई अहम खुलासे किए। भारतीय सेना ने पहली बार आधिकारिक स्तर पर ऑपरेशन सिंदूर में चीन के रोल को लेकर खुल कर अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि इस 87 घंटे की सैन्य कार्रवाई से भारत ने कई सबक सीखे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सबक यह है कि भले ही भारत ने सिर्फ एक सीमा पर एक युद्ध लड़ा, लेकिन उसके सामने कम से कम तीन दुश्मन थे।

शुक्रवार को फिक्की (FICCI) की तरफ से आयोजित ‘न्यू एज मिलिट्री टेक्नोलॉजीज’ कार्यक्रम में बोलते हुए लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर पर बोलते हुए कहा, हमने एक तरफ पाकिस्तान को देखा, लेकिन असल में दुश्मन दो नहीं, बल्कि चार या कम से कम तीन थे।”

उन्होंने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा, “पाकिस्तान तो बस एक चेहरा था। लेकिन पीछे से चीन हर संभव मदद पहुंचा रहा था। उन्होंने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अगर आप आंकड़ों पर नजर डालें, तो पिछले पांच साल में पाकिस्तान को मिलने वाले 81 फीसदी सैन्य उपकरण चीन से आए हैं। इसका मतलब है कि चीन पाकिस्तान को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है।” उन्होंने चीन की रणनीति को “उधार की छुरी से वार” (Killed by a borrowed knife) करार दिया। यानी चीन खुद भारत के साथ उत्तरी सीमा पर सीधे टकराव में पड़ने के बजाय पड़ोसी देश का इस्तेमाल करके हमें परेशान करना चाहता है।”

China role in Op Sindoor: हथियारों की ‘लाइव टेस्टिंग लैब’?

लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने बताया कि चीन ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपरोक्ष रूप से पाकिस्तान की मदद करके अपने हथियारों की टेस्टिंग भी की। उन्होंने कहा, “यह उनके लिए एक लाइव टेस्टिंग लैब की तरह था। हमें इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। इसके अलावा, तुर्की ने भी पाकिस्तानी सेना को कई तरह के ड्रोन उपलब्ध कराए।”

चीन के सैटेलाइट से पाकिस्तान को मिली ‘लाइव जानकारी’

लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन अपने सैटेलाइट्स के जरिए भारतीय सेना की तैनाती पर नजर रख रहा था। इसका मतलब है कि चीन ने अपने सैटेलाइट और निगरानी तंत्र के जरिए भारत की सैन्य गतिविधियों पर नज़र रखी और वो जानकारियां पाकिस्तान को दीं।

उन्होंने कहा, ” हमें कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशंस, कंप्यूटर्स, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसन्स और सिविल-मिलिट्री फ्यूजन के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ करने की जरूरत है।” उन्होंने बताया कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस) स्तर की बातचीत चल रही थी, तब हमें बता रहा था कि हमारी कौन सी यूनिट (सेना की टुकड़ी) कहां तैनात है और हमसे उसे पीछे हटाने की अपील कर रहा था। इसका मतलब है कि पाकिस्तान को चीन से सीधी जानकारी मिल रही थी।” लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा, “पाकिस्तान को यह जानकारी चीन से रियल-टाइम में मिल रही थी। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां हमें तेजी से काम करना होगा और उचित कदम उठाने होंगे।”

Indian Navy Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना के वार से बाल-बाल बचा था पाकिस्तान! नेवी को मिला था ये बड़ा टारगेट

बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक कुमार, जो सेंटर फॉर जॉइंट वॉरफेयर स्टडीज (CENJOWS) के डायरेक्टर जनरल हैं, उन्होंने भी उस दौरान चीन की भूमिका पर गंभीर खुलासे किए थे। उन्होंने एक साक्षात्कार में खुलासा किया था कि चीन ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को रियल-टाइम सैटेलाइट जानकारी दी। जिससे पाकिस्तान को अपने एयर डिफेंस सिस्टम्स को फिर से व्यवस्थित करने में मदद मिली ताकि भारत की हवाई गतिविधियों का पता लगाया जा सके। इसके अलावा, चीन ने अपने सैटेलाइट्स को भारत के ऊपर फोकस किया, जिससे पाकिस्तान को भारतीय सैन्य टुकड़ियों की गतिविधियों की जानकारी मिली।”

आबादी वाले इलाकों पर खतरा!

लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारे आबादी वाले इलाके उनके सीधे निशाने पर नहीं थे, लेकिन अगली बार ऐसा हो सकता है। हमें उसकी तैयारी अभी से करनी होगी।” इसका मतलब है कि आने वाले समय में दुश्मन की रणनीति बदल सकती है और वो आबादी वाले इलाकों पर भी हमले की कोशिश कर सकता है। उन्होंने आगे कहा कि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है और अगले दौर में हमें इसके लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा, “हमें और अधिक एयर डिफेंस, एंटी-रॉकेट, आर्टिलरी डिटेक्शन और एंटी-ड्रोन सिस्टम तैयार करने होंगे। हमें इस दिशा में बहुत तेजी से काम करना होगा।” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि स्वदेशी सैन्य सिस्टम ने इस ऑपरेशन में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन कुछ सिस्टम उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।

Dalai Lama Succession: दलाई लामा के उत्तराधिकारी पर फूंक-फूंक कर कदम रख रही भारत सरकार, चीन के साथ रिश्तों पर काले बादल मंडराने का डर!

Dalai Lama Succession: India Treads Cautiously Amid China Tensions

Dalai Lama Succession: बातचीत में केंद्र सरकार में एक वरिष्ठ सूत्र कहते हैं, दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। बड़ी मुश्किल से अभी-अभी गलवान के पांच साल बाद भारत-चीन के संबंधों में थोड़ी तरावट आई है। पिछले साल 23 अक्टूबर को रूस के कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) के दौरान हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी। जो पांच साल बाद पहली औपचारिक द्विपक्षीय बैठक थी। उसके बाद अभी 26 जून को ही चीन के किंगदाओ में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की रक्षा मंत्रियों की बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीनी रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून मिले थे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से 23 जून 2025 को SCO के सुरक्षा से संबंधित सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी। कैलाश मानसरोवर यात्रा अभी-अभी बहाल हुई है, लेकिन तिब्बत के सर्वोच्च धार्मिक नेता दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर दिए बयान के बाद सरकार में कन्फ्यूजन की स्थिति है। वह कहते हैं कि समझ नहीं आ रहा कि इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया दें।

Explainer Dalai Lama Reincarnation: क्या फिर जन्म लेंगे दलाई लामा? तिब्बती सर्वोच्च गुरु के एलान के क्या हैं मायने? क्या उनका पुनर्जन्म बनेगा भारत-चीन टकराव की वजह?

तिब्बती बौद्ध धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता 14वें दलाई लामा ने हाल ही में अपने उत्तराधिकारी की खोज और चयन को लेकर अहम एलान किया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि उनके उत्तराधिकारी का चयन पूरी तरह से उनकी मर्जी और गदेन फोडरंग ट्रस्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर होगा, जिसमें चीन की कोई भूमिका नहीं होगी। इस घोषणा के बाद भारत सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर बेहद सतर्कता के साथ कदम रख रही है, क्योंकि उसे डर है कि इस मसले के चलते दोनों देशों के बीच सुधरते रिश्तों पर फिर से काली छाया मंडरा सकती है।

Dalai Lama Succession: चीनी राजदूत शू फेइहोंग ने कही ये बात

दलाई लामा ने 2 जुलाई को धर्मशाला में दिए अपने वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि उनके उत्तराधिकारी की खोज उनकी मृत्यु के बाद शुरू होगी और यह प्रक्रिया पूरी तरह से तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार होगी। उन्होंने यह भी कहा कि गदेन फोडरंग ट्रस्ट, जो एक गैर-लाभकारी संगठन है, इस प्रक्रिया को संभालेगा। दलाई लामा का यह बयान चीन के लिए एक बड़ा झटका है, जो लंबे समय से तिब्बत और वहां की धार्मिक परंपराओं पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

चीन ने भी तुरंत इस घोषणा पर प्रतिक्रिया दी। भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने कहा, दलाई लामा और अन्य प्रमुख लामाओं के पुनर्जन्म की प्रक्रिया को “कड़े धार्मिक अनुष्ठानों, ऐतिहासिक परंपराओं और चीनी कानूनों” के अनुसार पूरा करना होगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि वर्तमान दलाई लामा का चयन भी 1792 में शुरू हुई स्वर्ण कलश (Golden Urn) प्रणाली के तहत हुआ था, और भविष्य में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। चीन का कहना है कि इस प्रक्रिया में बीजिंग की मंजूरी जरूरी है।

इस मसले पर “वेट एंड वॉच” की नीति

भारत के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। भारत में तिब्बती शरणार्थियों की संख्या 66,000 से 85,000 के बीच है, जिनमें से अधिकांश धर्मशाला-मैकलॉडगंज में रहते हैं, जहां 14वें दलाई लामा रह रहे हैं। एक तरफ, भारत दलाई लामा को एक आध्यात्मिक नेता के रूप में सम्मान देता है और 1959 से धर्मशाला में तिब्बती सरकार-निर्वासन (Central Tibetan Administration) को शरण दे रहा है। दूसरी तरफ, भारत नहीं चाहता कि इस मुद्दे के कारण चीन के साथ उसके रिश्ते और खराब हों। पिछले नौ महीनों में भारत-चीन संबंधों में कुछ सुधार के संकेत दिखे हैं, खासकर गलवान घाटी में 2020 के टकराव के बाद। ऐसे में भारत इस मसले पर “वेट एंड वॉच” की नीति अपना रहा है।

हालांकि केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरन रिजिजू ने कहा, “दलाई लामा का स्थान केवल तिब्बतियों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में फैले उनके करोड़ों अनुयायियों के लिए अत्यंत सम्मान और आस्था का प्रतीक है। उनके उत्तराधिकारी को लेकर निर्णय लेने का पूरा अधिकार केवल और केवल दलाई लामा के पास है। इसमें किसी भी अन्य देश या सरकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

वहीं, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा, “14वें दलाई लामा द्वारा उनकी संस्था के जारी रहने की पुष्टि से मुझे अत्यंत हर्ष और आध्यात्मिक संतोष मिला है। इस फैसले से हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लाखों लोगों और पूरी दुनिया में फैले उनके अनुयायियों को गहरी खुशी और आध्यात्मिक संबल मिला है। यह घोषणा हमारी आस्था को और भी दृढ़ करती है। यह लोगों की प्रतिबद्धता, सामूहिक ज्ञान और शांति के प्रति विश्वास को और सशक्त बनाती है।”

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार अभी इस मुद्दे पर खुल कर बोलने से से बच रही है। बुधवार 2 जुलाई को दलाई लामा के एलान के बाद और चीन का बयान आने के बाद भी सरकार ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। सूत्रों ने बताया कि भारत का यह मानना है कि यह एक धार्मिक मामला है, और इसमें किसी भी देश, खासकर चीन, का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। भारत ने पहले भी दलाई लामा को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों की स्वतंत्रता दी है, लेकिन उन्हें भारत में कोई राजनीतिक गतिविधि करने की इजाजत नहीं है। सूत्रों ने बताया कि तिब्बत मसले से जुड़े भारत सरकार के अधिकांश अधिकारी चीन से संबंध बनाए रखने के पक्ष में हैं। वे नहीं चाहते कि नए-नए सुधरे रिश्तों में फिर से कोई आंच आए। हालांकि सरकार में अंदरखाने इस मुद्दे को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

तिब्बत का “चीनीकरण” में जुटा चीन

तक्षसिला के इंडो-पैसिफिक अध्ययन कार्यक्रम से जुड़ी अनुष्का सक्सेना कहती हैं, चीन ने पिछले कुछ दशकों में तिब्बत को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की है। उसने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का नाम बदलकर “शीजांग” (Xizang) कर दिया और वहां की धार्मिक प्रतिष्ठानों पर कड़ा नियंत्रण बना लिया है। बीजिंग ने यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सभी जीवित लामाओं का चयन और उनकी गतिविधियां चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियमों के अनुसार हों। वह कहती हैं, 2016 में, चीन ने एक ऑनलाइन प्रणाली शुरू की थी, जिसके जरिए पुनर्जन्म का दावा करने वाले लामाओं की पहचान की जाती है। इस पूरे ढांचे का मकसद यह है कि तिब्बती धार्मिक संस्थाओं को भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधीन कर दिया जाए।

अनुष्का कहती हैं, चीन का दावा है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी वही होगा, जिसे वह स्वर्ण कलश प्रणाली के जरिए चुनेगा और जिसे बीजिंग की मंजूरी मिलेगी। लेकिन दलाई लामा ने साफ कर दिया है कि उनका उत्तराधिकारी स्वतंत्र दुनिया में पैदा होगा, न कि चीन में। उनकी किताब वॉयस फॉर द वॉयसलेस में भी उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि तिब्बती बौद्ध धर्म की वैधता केवल उनकी परंपराओं और अनुयायियों की आस्था पर आधारित होगी, न कि किसी सरकार के हस्तक्षेप पर। वह कहती हैं कि चीन की भी दलाई लामा की संस्था को भंग करने के रास्ते पर जाने की संभावना नहीं है।

भारत के सामने है दोहरी चुनौती

अनुष्का आगे कहती हैं, भारत के सामने इस मसले पर एक नैतिक और रणनीतिक दुविधा है। नैतिक रूप से, भारत को तिब्बती समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करना चाहिए और दलाई लामा की पसंद को मान्यता देनी चाहिए। लेकिन रणनीतिक दृष्टिकोण से, यह कदम भारत-चीन संबंधों को नुकसान पहुंचा सकता है। वह कहती हैं कि नई दिल्ली के लिए सबसे आसान तरीका यह है कि वह इस मुद्दे से दूर रहे और यह तर्क दे कि यह एक धार्मिक मुद्दा है, न कि राजनीतिक।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत ने चीन द्वारा चुने गए उत्तराधिकारी को मान्यता देने से इनकार किया, तो बीजिंग इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देख सकता है। इससे दोनों देशों के बीच तनाव फिर से बढ़ सकता है, जैसा कि 2017 में दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा के कुछ महीनों बाद 73 दिन तक चले डोकलाम सैन्य टकराव के दौरान देखा गया था।

दूसरी ओर, अगर भारत चीन के चुने हुए उत्तराधिकारी को मान्यता देता है, तो इस कदम से तिब्बती समुदाय और भारत के अपने लोगों के बीच असंतोष पैदा हो सकता है, जो दलाई लामा को बहुत सम्मान देते हैं। इसके अलावा, भारत का यह कदम तिब्बती शरणार्थियों के अधिकारों और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल को कमजोर कर सकता है।

सूत्र कहते हैं कि यह किसी से नहीं छुपा है कि भारत ने दलाई लामा को सभाएं आयोजित करने की स्वतंत्रता दी है। विदेशी अनुयायी उनसे मिलने धर्मशाला आते हैं। यहां तक कि पिछले साल पूर्व अमेरिकी सदन की स्पीकर नैंसी पेलोसी भी कुछ सांसदों के साथ दलाई लामा से मिली थीं। उनसे मिलने को लेकर भारत ने किसी को नहीं रोका है। वह कहते हैं कि यह तर्क कि भारत ने 2003 में तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को स्वीकार किया था, यहां लागू नहीं होता है, और उत्तराधिकार के प्रश्न को क्षेत्रीय स्वायत्तता से अलग रखा जाना चाहिए।

चीन के इस सेंटर ने दी थी चेतावनी

चीन की तिब्बत नीति को आकार देने वाले बीजिंग स्थित चाइना तिब्बतोलॉजी रिसर्च सेंटर ने 2019 में चेतावनी दी थी कि अगर भारत “पारंपरिक” प्रक्रिया के माध्यम से दलाई लामा की नियुक्ति की अवहेलना करता है, तो द्विपक्षीय संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उस दौरान बारत सरकार ने कहा था कि कोई भी बुद्धिमान नेता या मित्र देश ऐसा नहीं करेगा, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि भारत इस मामले से दूर रह सकता है या सार्वजनिक तौर से चीनी चयन का समर्थन नहीं कर सकता है।

चीन इस मुद्दे को अपनी संप्रभुता (sovereignty) से जोड़कर देख रहा है। उसका मानना है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनना उसका आंतरिक मामला है। बीजिंग ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह तिब्बत में किसी भी तरह के विरोध को बर्दाश्त नहीं करेगा। तिब्बत में पहले भी हिंसक विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं, और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के वेस्टर्न थिएटर कमांड की मजबूत मौजूदगी के चलते वह किसी भी स्थिति को नियंत्रित करने में सक्षम है।

चीन ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह दलाई लामा की संस्था को खत्म करने की कोशिश नहीं करेगा, बल्कि वह अपने चुने हुए उत्तराधिकारी को वैधता देने की कोशिश करेगा। अगर दोहरे उत्तराधिकार की स्थिति बनती है, यानी एक दलाई लामा भारत और तिब्बती समुदाय द्वारा चुना जाए और दूसरा चीन द्वारा, तो यह स्थिति और जटिल हो सकती है।

Dalai Lama Succession: India Treads Cautiously Amid China Tensions
Panchen Lama visits Jokhang Temple in Lhasa

तिब्बत में पंचेन लामा, कर सकते हैं बड़ा एलान

हालांकि चीन इस ऐलान पर पहले ही नजर रख रहा है। इसी साल 6 जून 2025 को बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पंचेन लामा (ग्यालत्सेन नोरबू) की मुलाकात हुई थी। यह मुलाकात दलाई लामा के 90वें जन्मदिन (6 जुलाई 2025) से ठीक एक महीने पहले हुई, जिसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुलाकात के दौरान पंचेन लामा ने सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई। चीन ने 1995 में 11वें पंचेन लामा के रूप में नियुक्त किया था। शी जिनपिंग ने पंचेन लामा से तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में जातीय एकता, धार्मिक सौहार्द, स्थिरता, विकास और प्रगति को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया। शी जिनपिंग ने पंचेन लामा से तिब्बती बौद्ध धर्म के “चीनीकरण” को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास करने को कहा। यह चीन की उस नीति का हिस्सा है, जो 2012 से सभी धर्मों (बौद्ध धर्म और इस्लाम सहित) को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मार्गदर्शन में लाने की कोशिश कर रही है।

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Panchen Lama visits Jokhang Temple in Lhasa

ग्यालत्सेन नोरबू को चीन ने 1995 में 5 साल की उम्र में पंचेन लामा नियुक्त किया था, जबकि दलाई लामा द्वारा चुने गए पंचेन लामा गेधुन चोएक्यी न्यिमा को उसी समय चीन ने गायब कर दिया था। गेधुन अभी तक लापता हैं, और उन्हें दुनिया का सबसे कम उम्र का राजनीतिक बंदी माना जाता है। पंचेन लामा तिब्बती बौद्ध धर्म की गेलुग परंपरा में दलाई लामा के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक नेता हैं। पंचेन लामा को बुद्ध के ज्ञान (प्रज्ञा) के अवतार अमिताभ बुद्ध का रूप माना जाता है, जबकि दलाई लामा को करुणा के अवतार अवलोकितेश्वर का रूप माना जाता है।

वहीं खास बात यह रही कि दलाई लामा के इस एलान के दौरान पंचेन लामा ने 1 जुलाई 2025 को पंचेन लामा ग्यालत्सेन नोरबू (एरदनी चोस-क्यी ग्याल-पो) ने दक्षिण-पश्चिम चीन के तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र (Xizang Autonomous Region) की राजधानी ल्हासा स्थित जोखांग टेंपल का दौरा किया। यह मंदिर तिब्बती बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है और लाखों बौद्ध श्रद्धालु इसे तीर्थ के रूप में देखते हैं। वहीं पंचेन लामा की इस यात्रा के चीन की तरफ से आधिकारिक फोटो भी जारी किए। सूत्रों ने बताया कि चीन जल्द ही पंचेन लामा के जरिए दलाई लामा के पुनर्जन्म को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी करवा सकता है। चीन यह दिखाना चाहता है कि वह तिब्बती बौद्ध धर्म की परंपराओं को “संविधान और कानून” के दायरे में रखते हुए आगे बढ़ा रहा है।

तिब्बती समुदाय को भारत से है उम्मीद

धर्मशाला में रहने वाले तिब्बती समुदाय और दुनिया भर में फैले तिब्बती बौद्ध अनुयायी इस मुद्दे को लेकर बहुत उम्मीदों के साथ भारत की ओर देख रहे हैं। 6 जुलाई को दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के मौके पर धर्मशाला में एक बड़ा आयोजन होने वाला है, जिसमें धार्मिक अनुयायी, कलाकार, और विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस आयोजन को दुनिया भर के तिब्बती बौद्ध अनुयायी भी उत्साह के साथ देखेंगे।

तिब्बती समुदाय का मानना है कि भारत को उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं का समर्थन करना चाहिए। कई तिब्बती नेताओं ने भारत सरकार से अपील की है कि वह दलाई लामा के ट्रस्ट द्वारा चुने गए उत्तराधिकारी को मान्यता दे और चीन के किसी भी हस्तक्षेप को खारिज करे।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी है नजर

इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है। अमेरिका ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन को एक धार्मिक मामला मानता है, जिसमें किसी भी सरकार की भूमिका नहीं होनी चाहिए। 2019 में, अमेरिका ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की धमकी दी थी, और उसने तिब्बती स्वायत्तता और धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करने की बात कही थी।

Dalai Lama Successor: दलाई लामा को तिब्बत में स्थायी रूप से रखने को तैयार है चीन! किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है उत्तराधिकारी

हालांकि, भारत ने इस मुद्दे पर अमेरिका की तरह खुलकर कोई रुख नहीं अपनाया है। भारत की नीति हमेशा से संतुलित रही है, और वह इस बार भी सावधानी के साथ आगे बढ़ना चाहता है। भारत का मानना है कि यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है, लेकिन वह इसे राजनीतिक रंग देने से बचना चाहता है।

Dalai Lama Successor: दलाई लामा को तिब्बत में स्थायी रूप से रखने को तैयार है चीन! किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है उत्तराधिकारी

Dalai Lama Successor: China Insists Control, Heir Can Be Any Gender or Nationality
HH Dalai Lama Youtube

Dalai Lama Successor: तिब्बत के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के अवसर पर ऐलान किया कि उनके उत्तराधिकारी का फैसला गदेन फोडरांग ट्रस्ट ही लेगा, यानि अगले अवतार की खोजबीन का अधिकार इस ट्रस्ट के पास ही होगा। बुधवार को 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में गदेन फोडरांग ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी सैमधोंग रिनपोछे ने कहा कि उनका उत्तराधिकारी किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है। वहीं, सेंट्रल तिब्बती प्रशासन (CTA) के सिक्योंग (निर्वाचित नेता) पेनपा त्सेरिंग ने कहा कि दलाई लामा तिब्बत की यात्रा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनकी स्वास्थ्य स्थिति अनुमति दे और चीन की ओर से कोई प्रतिबंध न हो।

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Dalai Lama Successor: क्या कहा सैमधोंग रिनपोछे ने?

धर्मशाला में आयोजित 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में दलाई लामा के 24 सितंबर 2011 में बनाए गदेन फोडरांग ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी सैमधोंग रिनपोछे ने कहा, 14वें दलाई लामा का स्वास्थ्य अच्छा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दलाई लामा ने अभी तक अपने उत्तराधिकारी (succession) के बारे में कोई लिखित निर्देश नहीं दिए हैं। उन्होंने साफ कहा कि दलाई लामा का पुनर्जन्म तय करने का अधिकार केवल गदेन फोडरंग ट्रस्ट के पास है।

Explainer Dalai Lama Reincarnation: क्या फिर जन्म लेंगे दलाई लामा? तिब्बती सर्वोच्च गुरु के एलान के क्या हैं मायने? क्या उनका पुनर्जन्म बनेगा भारत-चीन टकराव की वजह?

ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी और पूर्व कालोन त्रिपा (प्रधानमंत्री) रह चुके सैमधोंग रिनपोछे ने आगे कहा कि अगला दलाई लामा किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है, और उसका जन्म तिब्बत या चीन में होना अनिवार्य नहीं है। रिनपोछे ने चीन के उस दावे की निंदा की, जिसमें वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार रखता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार ही लिया जाएगा और इसमें बाहरी हस्तक्षेप (विशेष रूप से चीन का) स्वीकार्य नहीं होगा।

रिनपोछे ने यह भी बताया कि दलाई लामा ने हमेशा ऐसी व्यवस्था पर काम किया है, जो उनके बाद भी तिब्बती समुदाय को एकजुट और आत्मनिर्भर बनाए रखे। उन्होंने कहा, “दलाई लामा का मानना है कि उनकी व्यक्तिगत भूमिका समय के साथ कम महत्वपूर्ण होनी चाहिए, ताकि तिब्बती लोग अपनी संस्कृति और धर्म को खुद संभाल सकें।”

दलाई लामा ने दिया वीडियो संदेश

सम्मेलन के दौरान आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने एक वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि उनकी संस्था, यानी दलाई लामा की परंपरा, भविष्य में भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा, “मैं यह पुष्टि करता हूं कि दलाई लामा की संस्था बनी रहेगी।” यह बयान सुनते ही धर्मशाला की लाइब्रेरी में मौजूद सौ से अधिक भिक्षुओं ने तालियां बजाकर अपना उत्साह व्यक्त किया। इस सम्मेलन में दुनिया भर के पत्रकार, तिब्बती समुदाय के लोग, समर्थक, हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गेरे भी मौजूद थे। दलाई लामा ने यह भी जोर देकर कहा कि उनके पुनर्जनन की प्रक्रिया का एकमात्र अधिकार गदेन फोडरांग ट्रस्ट के पास है, जो तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार काम करता है। उन्होंने साफ कहा, “इस प्रक्रिया में कोई बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होगा।”

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चीन जाने के लिए तैयार हैं दलाई लामा

वहीं, सेंट्रल तिब्बती प्रशासन (Central Tibetan Administration, CTA) के सिक्योंग (निर्वाचित नेता) पेनपा त्सेरिंग ने दलाई लामा की तिब्बत यात्रा और पुनर्जन्म के मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दलाई लामा तिब्बत की यात्रा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनकी सेहत इजाजत दे और चीन की ओर से कोई पाबंदी या शर्त न हो। यह यात्रा 1959 के बाद उनकी पहली तिब्बत यात्रा होगी।

हालांकि, पेनपा त्सेरिंग ने यह भी बताया कि चीन ने एक सख्त शर्त रखी है, यदि दलाई लामा तिब्बत जाते हैं, तो उन्हें वहां स्थायी तौर पर रहना होगा। वहीं, इस शर्त पर दलाई लामा का जवाब था, “अगर मुझे तिब्बत और चीन जाने का मौका मिलता है, तो मैं जरूर जाऊंगा, लेकिन मैं वहां स्थायी तौर पर नहीं रहूंगा, क्योंकि वहां स्वतंत्रता नहीं है।” लेकिन मैं वहां नहीं रहूंगा, क्योंकि वहां कोई स्वतंत्रता नहीं है।’ त्सेरिंग ने कहा, यह पुनर्जन्म से भी जुड़ा है जहां परम पावन कहते हैं ‘मैं एक स्वतंत्र दुनिया में जन्म लूंगा’। पेनपा त्सेरिंग ने इस बयान को दोहराते हुए कहा कि दलाई लामा का यह रुख तिब्बत के लोगों के हक में है और उनकी वापसी का मकसद केवल तीर्थयात्रा या सांस्कृतिक संरक्षण होना चाहिए, न कि चीन की शर्तों पर बंधना।

पेनपा त्सेरिंग ने चीन के पुनर्जन्म दावों का भी विरोध किया। उन्होंने कहा, “तिब्बती लोग कभी भी चीन के उस दावे को स्वीकार नहीं करेंगे, जिसमें वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने की बात करता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह तिब्बती बौद्ध परंपराओं पर आधारित होगी।” उन्होंने सम्मेलन में मौजूद लोगों से अपील की कि वे एकजुट रहें और दलाई लामा की इच्छाओं को पूरा करने के लिए मिलकर काम करें।

पेनपा त्सेरिंग ने 6 जुलाई 2025 से शुरू होने वाले दलाई लामा की 90वें जन्मदिन के उत्सव को “करुणा का वर्ष” (Year of Compassion) के रूप में मनाने की बात कही।

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पहले भी जता चुके हैं तिब्बत वापसी की इच्छा

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब दलाई लामा ने तिब्बत जाने की इच्छा जताई है। दलाई लामा ने कहा है कि वे ल्हासा के जोखांग मंदिर और पोटाला पैलेस जैसे पवित्र जगहों की तीर्थयात्रा करना चाहते हैं। 2014 में एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा था कि वह बिना किसी राजनीतिक मकसद के एक साधारण तीर्थयात्री के रूप में तिब्बत जाना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह तब तक नहीं लौटेंगे, जब तक वहां “वास्तविक स्वतंत्रता” नहीं होती। वह यह मानते हैं कि उनकी वापसी केवल तब होनी चाहिए जब तिब्बती लोगों को आत्म-सम्मान और सांस्कृतिक आजादी मिले।

1980 के दशक से, दलाई लामा ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग छोड़कर “मध्य मार्ग दृष्टिकोण” अपनाया, जिसमें तिब्बत के लिए वास्तविक स्वायत्तता की मांग की गई। 1987 की पांच सूत्री शांति योजना और 1988 के स्ट्रासबर्ग प्रस्ताव में, उन्होंने तिब्बत में स्वायत्त सरकार की स्थापना का प्रस्ताव रखा, जिसमें उनकी वापसी की संभावना शामिल थी।

1959 के बाद, दलाई लामा और चीन के बीच कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। 1979 में डेंग शियाओपिंग के सुधारों के बाद, दलाई लामा के भाई ग्यालो थोंडुप के जरिए संपर्क हुआ। 1982, 1984, और 2002-2008 के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन चीन ने दलाई लामा को “अलगाववादी” मानकर उनकी शर्तें ठुकरा दीं। 2002 में, दलाई लामा ने एक संक्षिप्त तीर्थयात्रा के लिए तिब्बत जाने की इच्छा जताई, लेकिन यह प्रस्ताव भी अस्वीकार हुआ। 2008 में तिब्बत में बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद, बातचीत फिर शुरू हुई, लेकिन बेनतीजा रही। चीन ने शर्त रखी कि दलाई लामा तिब्बत को चीन का हिस्सा मानें और “अलगाववादी गतिविधियां” छोड़ें।

Dalai Lama Successor: China Insists Control, Heir Can Be Any Gender or Nationality
Chinese foreign ministry spokesperson Mao Ning

चीन ने दोहराया पुराना दावा

2 जुलाई 2025 दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर दिए बयान के बाद चीन ने को फिर से दोहराया कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार उसके पास है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, “दलाई लामा और पंचेन लामा जैसे प्रमुख बौद्ध गुरुओं के पुनर्जन्म को ‘गोल्डन अर्न’ यानी सुनहरे कलश रस्म के जरिए और केंद्रीय सरकार की मंजूरी से चुना जाना चाहिए।” यह रस्म 1793 में किंग राजवंश के दौरान शुरू हुई थी, और चीन इसे अपनी सत्ता का आधार मानता है। जिसमें संभावित नामों को एक सुनहरे पात्र में रखा जाता है और लॉटरी के माध्यम से उत्तराधिकारी तय किया जाता है। निंग ने कहा कि चीन धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता की नीति का पालन करता है।

ऐसे होता है पुनर्जन्म

तिब्बती परंपरा में माना जाता है कि एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु की आत्मा उसकी मृत्यु के बाद एक बच्चे के शरीर में पुनर्जन्म लेती है। दलाई लामा की वेबसाइट के अनुसार, 6 जुलाई, 1935 को वर्तमान किंघई प्रांत में एक किसान परिवार में जन्मे ल्हामो धोंडुप के रूप में 14वें दलाई लामा के पुनर्जन्म की पहचान भी दो साल बच्चे में की गई थी। दलाई लामा की वेबसाइट के अनुसार, एक वरिष्ठ भिक्षु की देखरेख में कई संकेतों के आधार पर एक खोज दल ने उनकी पहचान की थी। उन्हें अब दुनिया के सबसे प्रभावशाली धार्मिक व्यक्तियों में से एक माना जाता है। उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

Explainer Dalai Lama Reincarnation: क्या फिर जन्म लेंगे दलाई लामा? तिब्बती सर्वोच्च गुरु के एलान के क्या हैं मायने? क्या उनका पुनर्जन्म बनेगा भारत-चीन टकराव की वजह?

Dalai Lama Reincarnation Row: Spiritual Legacy or Geopolitical Flashpoint?
Pic Source: Dalai Lama X Account

Dalai Lama Reincarnation: अपने 90वें जन्मदिन से चार दिन पहले तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे सम्मानित और प्रभावशाली आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने दो जुलाई को एतिहासिक एलान करते हुए कहा कि उनकी मृत्यु के बाद भी दलाई लामा की संस्था (Institution of the Dalai Lama) चलती रहेगी और उनके पुनर्जन्म (Reincarnation) को केवल गेडन फोडरंग ट्रस्ट (Gaden Phodrang Trust) ही मान्यता देगा। यानी कि केवल उनके द्वारा स्थापित “गदेन फोड्रांग ट्रस्ट” को ही अगला अवतार यानी पुनर्जन्म पहचानने का अधिकार होगा।

उनका ये बयान उस वक्त आया जब पूरी दुनिया उनकी उम्र को लेकर चिंतित थी। 6 जुलाई 2025 को वह 90 साल के हो जाएंगे। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठ रहा था कि क्या 14वें दलाई लामा के बाद इस संस्था का अस्तित्व रहेगा या नहीं?

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Dalai Lama Reincarnation: कैसे होता है दलाई लामा का पुनर्जन्म

दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे प्रमुख धार्मिक नेता होते हैं। “दलाई लामा” का अर्थ होता है “ज्ञान का महासागर”। यह पद एक “पुनर्जन्म परंपरा” (Reincarnation System) पर आधारित है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में यह माना जाता है कि जब कोई उच्च आत्मा जैसे दलाई लामा देह त्यागते हैं, तो वे दोबारा जन्म लेते हैं। यह जन्म उसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए होता है, यानी संसार में करुणा, अहिंसा और अध्यात्म का संदेश फैलाना। माना जाता है कि उनकी आत्मा किसी नवजात बालक में जन्म लेती है और वर्षों की खोजबीन के बाद उस बच्चे की पहचान अगली पीढ़ी के दलाई लामा के रूप में की जाती है। दलाई लामा की परंपरा ‘तुल्कु’ प्रणाली पर आधारित है यानि यानी पूर्व जन्म की आत्मा को पहचानना और उसे प्रशिक्षण देकर नया दलाई लामा बनाना। जिसमें किसी बड़े बौद्ध गुरु की मृत्यु के बाद उसका पुनर्जन्म खोजा जाता है।

दलाई लामा की परंपरा 600 साल पुरानी है। पहला दलाई लामा, गेदुन द्रुपा, 1391 में पैदा हुए थे। इसके बाद से यह क्रम चलता आया है। हर दलाई लामा को पिछले दलाई लामा की आत्मा का पुनर्जन्म माना जाता है।

14वें दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के टकस्तेर गांव में हुआ था। जब वे सिर्फ दो साल के थे, तिब्बती धर्मगुरुओं ने उन्हें 13वें दलाई लामा थुब्तेन ग्यात्सो का पुनर्जन्म माना। उनकी पहचान के लिए खास संकेतों का इस्तेमाल किया गया। एक वरिष्ठ भिक्षु ने छोटे ल्हामो धोंडुप को 13वें दलाई लामा की वस्तुएं दिखाईं तो उन्होंने पहचान लिया, जिससे यह पक्का हो गया कि वही अगला दलाई लामा हैं। दो साल की उम्र में उन्हें 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म घोषित कर दिया गया और 1940 में ल्हासा के पोटाला पैलेस में उन्हें आधिकारिक रूप से गद्दी सौंपी गई और औपचारिक रूप से तिब्बती लोगों के आध्यात्मिक नेता के रूप में स्थापित किया गया। 1950 के दशक में जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया, तो 1959 में उन्होंने भारत की ओर पलायन कर लिया। तब से वे हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासन में रह रहे हैं, जहां सेंट्रल तिब्बतेन एडमिनिस्ट्रेशन (Central Tibetan Administration) के नाम से तिब्बती सरकार-इन-एक्ज़ाइल काम कर रही है।

Dalai Lama Reincarnation Row: Spiritual Legacy or Geopolitical Flashpoint?
Pic Source: Dalai Lama X Account

क्या कहा दलाई लामा ने अपने पुनर्जन्म को लेकर?

तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने स्पष्ट रूप से ऐलान किया है कि उनकी मृत्यु के बाद दलाई लामा संस्था (Dalai Lama Institution) जारी रहेगी, और उनके भविष्य के पुनर्जन्म की पहचान केवल Gaden Phodrang Trust द्वारा ही की जाएगी। उन्होंने यह बयान तिब्बत, हिमालयी क्षेत्र, मंगोलिया, रूस और चीन के बौद्ध अनुयायियों की 14 वर्षों से लगातार आ रही अपीलों के जवाब में दिया।

अपने आधिकारिक बयान में दलाई लामा ने कहा, “1969 से मैंने यह कहा है कि दलाई लामा का पुनर्जन्म होना चाहिए या नहीं, यह तिब्बती जनता और बौद्ध परंपरा से जुड़े लोगों का निर्णय होना चाहिए।” उन्होंने यह भी दोहराया कि चीन या किसी भी बाहरी संस्था को इस प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

दलाई लामा ने स्पष्ट किया कि 24 सितंबर 2011 में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, Gaden Phodrang Trust, जो उनके कार्यालय का हिस्सा है,वही इस प्रक्रिया को धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूरा करेगा। इसके लिए बौद्ध धर्मगुरुओं और “वरिष्ठ लामाओं” से सलाह ली जाएगी।

हालांकि दलाई लामा ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की, लेकिन पिछले 14 सालों में उन्हें कई जगहों से पत्र और संदेश मिले। तिब्बत के अंदर और बाहर रहने वाले तिब्बती, तिब्बती निर्वासित संसद के सदस्य, केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के लोग, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), हिमालय क्षेत्र, मंगोलिया, रूस के बौद्ध गणराज्य, और एशिया सहित मुख्यभूमि चीन के बौद्धों ने उन्हें पत्र लिखे। इन सभी ने जोर देकर कहा कि दलाई लामा की संस्था को जारी रखना जरूरी है। खास तौर पर, तिब्बत में रहने वाले तिब्बतियों ने भी अलग-अलग माध्यमों से यही अपील की। इन सभी अनुरोधों को ध्यान में रखते हुए, दलाई लामा ने घोषणा की कि दलाई लामा की संस्था आगे भी चलेगी।

खास बात यह है कि उनका यह बयान 21 मई 2025 को धर्मशाला में तैयार किया गया और 2 जुलाई 2025 को आधिकारिक रूप से जारी किया गया।

चीन को लगेगी मिर्ची

दलाई लामा का यह बयान चीन के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश है। चीन ने कई बार कहा है कि वह अगले दलाई लामा की नियुक्ति अपने नियंत्रण वाली धार्मिक संस्थाओं के जरिए करेगा। चीन सरकार “Golden Urn System” के तहत पुनर्जन्म प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहती है, जो एक तरह की पर्ची निकालने की प्रक्रिया है, जिसमें बालक का नाम रखा जाता है। लेकिन तिब्बती समुदाय और भारत इस कदम का सख्त विरोध करते हैं। दलाई लामा ने गदेन फोडरंग ट्रस्ट को अपने पुनर्जन्म की मान्यता देने का एकमात्र अधिकार देकर चीन के दावों को नकार दिया है। चीन द्वारा नियुक्त कोई भी दलाई लामा अवैध माना जाएगा। वहीं, इससे भारत की स्थिति को भी मजबूती मिलेगी, क्योंकि तिब्बती निर्वासित सरकार (गवर्नमेंट इन एक्साइल) हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित है। भारत को असली आध्यात्मिक उत्तराधिकारी की देखभाल करने वाला देश माना जाएगा। हालांकि, अगर चीन भविष्य में अपने तरीके से कोई दलाई लामा घोषित करता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव पैदा हो सकता है। उदाहरण के लिए, चीन पहले पंचेन लामा की नियुक्ति में हस्तक्षेप कर चुका है, और ऐसा ही कुछ यहां भी हो सकता है।

चीन ने बताया था दलाई लामा को “अलगाववादी”

चीन की सरकार 14वें दलाई लामा को “विभाजनकारी” (Splittist) और “अलगाववादी” बताती है। तिब्बत में दलाई लामा की तस्वीर रखना भी अपराध माना जाता है। 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार पाने के बावजूद उनकी तस्वीरें सार्वजनिक रूप से दिखाने पर पाबंदी है। 2007 में चीन ने एक नया नियम बनाया जिसके तहत बिना सरकारी अनुमति के किसी बौद्ध नेता का पुनर्जन्म मान्य नहीं होगा। यानी चीन चाहता है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी सिर्फ उसकी मर्जी से घोषित हो। मार्च 2025 में, चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने दलाई लामा को “राजनीतिक निर्वासित” कहा, जिनका तिब्बती लोगों को प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए दलाई लामा की घोषणा चीन के उस एजेंडे को सीधी चुनौती देती है।

दलाई लामा की उम्र अब 90 साल के करीब है। वे जानते हैं कि उनके जाने के बाद क्या होगा, इसलिए वे अपनी शर्तों पर तैयारी कर रहे हैं। गदेन फोडरंग ट्रस्ट और बौद्ध धर्मगुरुओं के जरिए चयन प्रक्रिया को व्यवस्थित करके उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि राजनीतिक शक्तियां इस प्रक्रिया पर कब्जा न कर सकें। दलाई लामा दुनिया भर के बौद्ध समुदायों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे चीन के दावों को न मानें।

पंचेन लामा की क्या है भूमिका

पंचेन लामा को अमिताभ बुद्ध (बुद्ध के असीम प्रकाश के रूप) का अवतार माना जाता है, जो करुणा और ज्ञान का प्रतीक हैं। दूसरी ओर, दलाई लामा को अवलोकितेश्वर (करुणा के बुद्ध) का अवतार माना जाता है। पंचेन लामा गेलुग स्कूल में दलाई लामा के बाद दूसरा सबसे बड़ा आध्यात्मिक पद है। पंचेन लामाओं ने तिब्बती शासन में सलाहकार की भूमिका निभाई है, खासकर जब दलाई लामा नाबालिग होते थे या निर्वासित जीवन जी रहे होते थे।

वहीं, पारंपरिक रूप से, पंचेन लामा और दलाई लामा एक-दूसरे के पुनर्जन्म की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि दोनों की उम्र में लगभग 50 साल का अंतर होता है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य की तरह होता है, जहां पंचेन लामा दलाई लामा के पुनर्जन्म की खोज में मदद करते हैं। पहले आधिकारिक पंचेन लामा, पंचेन लामा की परंपरा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई, जब 5वें दलाई लामा, न्गवांग लोबसांग ग्यत्सो, ने अपने गुरु लोबसांग चोकी ग्याल्त्सेन को पहला आधिकारिक पंचेन लामा घोषित किया। यह 1645 की बात है। लोबसांग चोकी ग्याल्त्सेन ताशिलहुनपो मठ (जो तिब्बत के शिगात्से में स्थित है) के प्रमुख थे। इसके बाद, कई अन्य लामाओं को मरणोपरांत पंचेन लामा की उपाधि दी गई, लेकिन आधिकारिक रूप से यह परंपरा 1645 से शुरू मानी जाती है। 10वें पंचेन लामा 1959 में दलाई लामा के निर्वासन के बाद तिब्बत में रहे, लेकिन बाद में चीन के साथ मतभेद के चलते वे नजरबंद रहे और 1989 में उनकी मृत्यु हो गई।

1995 में, दलाई लामा ने 6 साल के गेदुन चोएक्यी न्यिमा को 11वें पंचेन लामा के रूप में मान्यता दी थी, लेकिन चीन ने उन्हें हिरासत में ले लिया, और उनका पता आज तक अज्ञात है। इसके बाद चीन ने 5 साल के ग्यांचेन नोर्मा को अपना पंचेन लामा घोषित किया। यह चयन “स्वर्ण घड़ा” पद्धति (जो 1793 में किंग राजवंश द्वारा शुरू की गई पद्धति, जिसमें नामों को एक घड़े से निकाला जाता था) के आधार पर किया गया था। ग्यांचें नोर्मा अब 35 साल के हैं और हाल ही में, जून 2025 में, उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की, जहां उन्हें “तिब्बती बौद्ध धर्म के एकीकरण” और चीनीकरण (धर्म को चीनी विचारधारा के अनुरूप ढालना) को बढ़ावा देने के लिए उपयोग कर रहा है।

हालांकि तिब्बती निर्वासित समुदाय और दलाई लामा चीन के चयन को मान्यता नहीं दी है, लेकिन चीन का दावा है कि पंचेन लामा की नियुक्ति में उसका ऐतिहासिक अधिकार है। दलाई लामा ने कहा है कि जो लोग धर्म में विश्वास नहीं करते, वे लामा के पुनर्जन्म में दखल क्यों दें? उन्होंने अपनी किताब “वॉइस फॉर द वॉयसलेस” में तिब्बतियों से अपील की कि वे चीन की तरफ से चुने गए किसी उम्मीदवार को न मानें।

करमापा ने दी ‘दूसरे बुद्ध’ की उपाधि

दलाई लामा के 90वें जन्मदिन से पहले, तिब्बती बौद्ध धर्म की कर्मा काग्यु परंपरा के प्रमुख 17वें करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने भी एक भावुक पत्र जारी करते हुए दलाई लामा को ‘दूसरे बुद्ध’ की उपाधि दी। साथ ही, चीन द्वारा उनके पुनर्जन्म को नियंत्रित करने की कोशिशों को सख्ती से नकारा है।

Dalai Lama Reincarnation Row: Spiritual Legacy or Geopolitical Flashpoint?
Karmapa Ogyen Trinley Dorje With Dalai Lama

करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने दलाई लामा को “सभी तिब्बती परंपराओं के लिए शरण और रक्षक” बताया और तिब्बत पर चीन के हिंसक कब्जे की निंदा की। उनका यह समर्थन इसलिए भी अहम है क्योंकि करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे का जन्म तिब्बत में हुआ था और उन्हें चीन और दलाई लामा दोनों ने ही मान्यता दी थी।

पत्र में करमापा ओग्येन त्रिनले दोरजे ने लिखा है कि जब तिब्बत की जनता अकेली थी और उनके पास कोई सहारा नहीं था, तब दलाई लामा “पूर्वजों के संदेशवाहक बनकर” आए। उन्होंने कहा कि दलाई लामा ने “बुद्ध के ज्ञान को धरती और आकाश के बीच जीवित रखा” और हिमालय से लेकर दुनियाभर में फैलाया।

करमापा ने चीन को “आक्रामक हमलावर” कहा, जिन्होंने तिब्बत की “बर्फ को खून से लाल कर दिया।” उन्होंने दलाई लामा से पुनर्जन्म की अपील करते हुए कहा, “आप तब तक जीवित रहें, जब तक यह पृथ्वी और मेरु पर्वत टिके रहें।” यह बयान चीन के उस दावे पर सीधी चोट है, जिसमें वह कहता है कि अगला दलाई लामा उसकी निगरानी में चुना जाएगा। 2019 में भी करमापा ने चीन द्वारा तिब्बती परंपरा में हस्तक्षेप के खिलाफ चेतावनी दी थी। कई तिब्बती अनुयायियों की यह भी इच्छा है कि करमापा भारत लौटें, जिससे तिब्बती बौद्ध परंपरा को भारत में और बल मिलेगा और चीन को एक स्पष्ट संदेश जाएगा।

बता दें कि करमापा लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के काग्यु स्कूल, विशेष रूप से कर्मा काग्यु शाखा, के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता हैं। वे पुनर्जन्म की एक प्राचीन परंपरा का हिस्सा हैं, जो लगभग 900 साल से चली आ रही है। करमापा को “बुद्ध की सभी गतिविधियों का अवतार” माना जाता है। 17वें करमापा की मान्यता को लेकर विवाद है। दलाई लामा ने उग्येन त्रिनले दोरजे को 17वें करमापा के रूप में मान्यता दी है, जो वर्तमान में अमेरिका में रहते हैं। पिछले साल जब दलाई लामा अमेरिकी इलाज के लिए गए थे, तो ज्यूरिख में दोनों की मुलाकात भी हुई थी। वहीं, दूसरे दावेदार, थाए दोरजे भी हैं, लेकिन शादी करने के बाद उनकी दावेदारी पर सवाल उठने लगे हैं।

क्या है अमेरिका का रुख?

अमेरिका ने तिब्बती मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लगातार समर्थन जताया है। 2024 में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रिजॉल्व तिब्बत अधिनियम (Resolve Tibet Act) कानून पर हस्ताक्षर किए, जिसमें चीन से तिब्बत को अधिक स्वायत्तता देने की मांग की गई। अमेरिकी सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे चीन के अगले दलाई लामा के चयन में हस्तक्षेप का विरोध करते हैं। वहीं 2020 में अमेरिकी कांग्रेस के बनाए तिब्बती नीति और सहायता अधिनियम (Tibetan Policy and Support Act – TPSA) में यह स्पष्ट किया गया है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म (रीइनकार्नेशन) और उनके उत्तराधिकारी के चयन का निर्णय केवल तिब्बती बौद्ध नेताओं और तिब्बती लोगों के पास विशेष अधिकार है, न कि चीनी सरकार के पास। यह कानून चीन के किसी भी हस्तक्षेप को अस्वीकार करता है और चीनी अधिकारी अगर इस प्रक्रिया में दखल देते हैं, तो उन पर यों पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी देता है। इसके अतिरिक्त, इस अधिनियम में ल्हासा में एक अमेरिकी वाणिज्य दूतावास स्थापित करने का प्रावधान है और तिब्बत में मानवाधिकारों की स्थिति पर नजर रखने की बात कही गई है।

अगले दलाई लामा कहां पैदा होंगे?

मार्च 2025 में प्रकाशित अपनी किताब Voice for the Voiceless में दलाई लामा ने कहा, उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर पैदा होगा। वे 1959 से भारत में निर्वासित जीवन जी रहे हैं, और यह संकेत देता है कि अगला दलाई लामा भी किसी स्वतंत्र देश में पैदा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने उत्तराधिकारी की पहचान से जुड़े सभी नियम और प्रक्रिया लिखित रूप में छोड़ देंगे, ताकि आगे कोई भ्रम न हो। धर्मशाला में सोमवार को उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार के लिए एक स्ट्रक्चर होगा, लेकिन इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दी।

क्या है भारतीय नौसेना का Project 17A? मात्र 37 महीनों में बना ‘समंदर का शिकारी! ब्लू वॉटर ऑपरेशंस के लिए तैयार नया स्टील्थ वॉरशिप INS Udaygiri

What is Indian Navy’s Project 17A? INS Udaygiri: Stealth Hunter Built in Just 37 Months!
Pic Source: Indian Navy

INS Udaygiri: मंगलवार 1 जुलाई 2025 का दिन नौसेना के नाम रहा। जहां तरफ रूस के कालिनिनग्राद में INS Tamal कमीशन किया, तो मुंबई में स्टील्थ वॉरशिप ‘उदयगिरि’ (INS Udaygiri) को भारतीय नौसेना को सौंपा गयाा। ‘उदयगिरि’ (यार्ड 12652) मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDSL) में बनाया जा रहा प्रोजेक्ट 17ए का दूसरा स्टील्थ फ्रिगेट है। यह जहाज प्रोजेक्ट 17 के शिवालिक श्रेणी के फ्रिगेट्स का फॉलो ऑन है, जो अभी सक्रिय सेवा में है।

INS Udaygiri: क्या है Project 17A?

Project 17A, भारतीय नौसेना के उन वॉरशिपों की सीरीज है, जो पहले ‘शिवालिक क्लास’ के नाम से जाने जाते थे। इन वॉरशिपों का उद्देश्य समुद्र में भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा करना है। ‘ब्लू वॉटर ऑपरेशन’ यानी दूर समुद्री क्षेत्र में भी यह वॉरशिप मिशन पूरा करने में सक्षम है।

प्रोजेक्ट 17A के तहत कुल 7 वॉरशिप तैयार किए जा रहे हैं। इन सातों में से ‘उदयगिरि’ दूसरा पोत है जो मझगांव डॉक, मुंबई में बना है। बाकी पोतों का निर्माण एमडीएल और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता में चल रहा है।

क्यों जरूरी था Project 17A?

भारतीय नौसेना को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने के उद्देश्य से Project 17A की शुरुआत की गई। इसका मकसद था आधुनिक तकनीकों से लैस ऐसे वॉरशिप बनाना जो भारत की समुद्री सुरक्षा को और मजबूत बना सकें। आज के दौर में समुद्र में खतरे लगातार बदल रहे हैं। जैसे दुश्मन की पनडुब्बियां, मिसाइलें, ड्रोन और अज्ञात हवाई हमले। Project 17A के वॉरशिप, जैसे कि INS उदयगिरि, इन खतरों से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। ये शिप सुपरसोनिक मिसाइलों और अत्याधुनिक सेंसर से लैस हैं जो दुश्मन को पहले पहचान कर सटीक जवाब देने में सक्षम हैं।

Project 17 के तहत जो शिवालिक क्लास वॉरशिप बने थे, वे लंबे समय तक नौसेना में रहे। लेकिन समय के साथ तकनीक बदल गई और नए खतरों से निपटने के लिए ज्यादा एडवांस सिस्टम की जरूरत थी। Project 17A उसी का अगला चरण है, जिसमें स्टील्थ डिजाइन (दुश्मन के रडार से बचने की क्षमता), बेहतर हथियार सिस्टम और उच्च तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

क्या खास है INS Udaygiri में?

उदयगिरी (INS Udaygiri) सात में से दूसरा फ्रिगेट है, जो मझगांव डॉक (मुंबई) और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (कोलकाता) में बनाया जा रहा है। यह मल्टीपर्पज फ्रिगेट गहरे समुद्र (ब्लू वाटर) में काम करने में सक्षम है और भारत के समुद्री इलाकों में पारंपरिक युद्ध या आतंकवाद और तस्करी जैसी गैर-पारंपरिक चुनौतियों से निपटने में सक्षम है। उदयगिरी अपने पूर्ववर्ती, पुराने INS उदयगिरी का मॉडर्न अवतार है, जो एक स्टीम जहाज था और 24 अगस्त 2007 को 31 साल की शानदार सेवा के बाद रिटायर हुआ था।

मात्र 37 महीनों में बनाया

INS उदयगिरि (INS Udaygiri) में कई अत्याधुनिक तकनीकें लगाई गई हैं जो इसे पहले की ‘शिवालिक क्लास’ के वॉरशिपों से कहीं अधिक आधुनिक और घातक बनाती हैं। इस शिप को ‘इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन’ तकनीक से तैयार किया गया है, जिसमें जहाज के निर्माण के दौरान ही उसमें जरूरी सिस्टम, पाइपलाइन, केबिल आदि फिट कर दिए जाते हैं। इससे निर्माण की कुल अवधि काफी घट जाती है। यही वजह है कि INS उदयगिरि को लॉन्चिंग के महज 37 महीने के भीतर रिकॉर्ड समय में भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया।

साइज और डिजाइन में बड़ा बदलाव

Project 17A के तहत तैयार किए जा रहे वॉरशिपों की स्ट्रक्चर में भी काफी बदलाव किए गए हैं। इनका ढांचा P17 यानी ‘शिवालिक क्लास’ की तुलना में 4.54 फीसदी बड़ा है। साथ ही, पोत को ‘स्लीक और स्टील्थ’ बनाया गया है, यानी यह दुश्मन के राडार पर पकड़ में नहीं आता है।

इस शिप (INS Udaygiri) में एक खास इंजन सिस्टम लगाया गया है जिसे ‘CODOG’ (Combined Diesel or Gas) कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि शिप को चलाने के लिए या तो डीजल इंजन का उपयोग किया जा सकता है या फिर गैस टरबाइन का। इसे एक अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म प्रबंधन प्रणाली (Integrated Platform Management System – IPMS) से जोड़ा गया है, जिससे पूरे शिप के ऑपरेशन की निगरानी की जा सकती है।

हथियारों में सुपरसोनिक सतह-से-सतह मिसाइल सिस्टम, मध्यम दूरी की सतह-से-हवा मिसाइल सिस्टम, 76 मिमी की तोप जो शत्रु के जहाजों और हवाई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। इसमें 30 मिमी और 12.7 मिमी की फायरिंग गन लगी है, जो पास आती मिसाइल या बोट को रोक सकती है।

INS उदयगिरि पूरी तरह से भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है। इसमें इस्तेमाल किए गए अधिकतर हथियार और तकनीकी उपकरण देश के ही छोटे और मझोले उद्योगों (MSME) ने बनाए हैं। इस प्रोजेक्ट में 200 से अधिक MSME कंपनियों ने योगदान दिया है, जिससे भारत में नौसेना जहाज निर्माण की घरेलू क्षमता में भारी इजाफा हुआ है। इससे केवल स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा नहीं मिला, बल्कि रोजगार के भी हजारों अवसर भी पैदा हुए हैं। इस प्रोजेक्ट के कारण लगभग 4,000 लोगों को सीधा रोजगार मिला है, जबकि 10,000 से ज्यादा लोगों को परोक्ष रूप से रोजगार के अवसर मिले हैं।

INS Tamal Commissioned: भारतीय नौसेना को मिला रूस में बना सबसे आधुनिक स्टील्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट, ब्रह्मोस और देसी हथियारों से है लैस

प्रोजेक्ट 17ए के बाकी पांच वॉरशिप अभी निर्माण के अलग-अलग चरणों में हैं। इन्हें मुंबई के मझगांव डॉक और कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स में तैयार किया जा रहा है। नौसेना सूत्रों के अनुसार, सभी सात युद्धपोतों को 2026 के अंत तक भारतीय नौसेना को सौंप दिया जाएगा।

Explainer: क्या खत्म हो गया SAARC? पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन बना रहे हैं नया संगठन, जानें भारत पर क्या होगा असर?

New South Asia Bloc: China, Pakistan, Bangladesh Plans SAARC Alternative Explained
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New South Asia Bloc: 19 जून को चीन के कुनमिंग में एक खास बैठक हुई, जिसमें चीन, पाकिस्ताान और बांग्लादेश शामिल हुए। इस बैठक को लेकर कयास लगाए जाने लगे कि तीनों देश मिल कर कोई खिचड़ी पका रहे हैं। लेकिन अब साफ हुआ है कि पाकिस्तान और चीन मिलकर दक्षिण एशिया में एक नया क्षेत्रीय संगठन बनाने की योजना बना रहे हैं। यह कदम दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की कमजोरी और उसकी निष्क्रियता को देखते हुए उठाया जा रहा है। SAARC में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल हैं, जो पिछले कुछ सालों से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।

इस बैठक में बांग्लादेश के शामिल होने लेकर भी सवाल उठ खड़े हुए। क्योंकि वहां फिलहाल अभी कार्यकारी सरकार है। हालांकि बांग्लादेश ने इस त्रिपक्षीय बैठक को लेकर साफ किया कि यह कोई राजनीतिक गठबंधन या नया संगठन बनाने की कोशिश नहीं थी। बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार एम. तौहीद हुसैन ने कहा कि कुनमिंग, चीन में 19 जून 2025 को हुई बैठक केवल आधिकारिक स्तर की थी और इसमें किसी भी तरह के गठबंधन का कोई तत्व शामिल नहीं था। उन्होंने कहा था, “हम किसी गठबंधन का गठन नहीं कर रहे हैं।” बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि बैठक का मकसद आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाना था, न कि किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ कोई मोर्चा बनाना।

New South Asia Bloc: क्या है खबर का आधार?

लेकिन सच किसी से छिपता नहीं है और सामने आ ही जाता है। यह जानकारी सबसे पहले पाकिस्तान के अखबार “एक्सप्रेस ट्रिब्यून” में छपी। अखबार ने बताया कि पाकिस्तान और चीन के बीच एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था बनाने की बात चल रही है। इस योजना को लेकर कूटनीतिक स्रोतों ने दावा किया कि दोनों देश इसे SAARC का विकल्प मान रहे हैं। खबर के मुताबिक, हाल ही में चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक कुनमिंग (चीन) में हुई। इस बैठक में नई क्षेत्रीय साझेदारी की रूपरेखा पर चर्चा हुई। हालांकि, अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

SAARC क्यों ठप हो गया?

SAARC की शुरुआत 1985 में हुई थी और इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान जैसे देश शामिल हैं। सार्क का मकसद था कि क्षेत्र में व्यापार, आपसी संपर्क और राजनीतिक बातचीत बढ़े। लेकिन 2016 के बाद से SAARC की गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं। आखिरी SAARC सम्मेलन 2014 में काठमांडू (नेपाल) में हुआ था। 2016 में प्रस्तावित सम्मेलन को भारत ने उरी आतंकी हमले (Uri Terror Attack) के बाद बहिष्कार कर दिया था, जिसमें सेना के 19 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भी सम्मेलन में शामिल होने से इनकार कर दिया था। तभी से यह संगठन निष्क्रिय है।

‘कुनमिंग त्रिपक्षीय’ बैठक में पड़ी नींव!

रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2025 में चीन के कुनमिंग शहर में पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश के अधिकारियों के बीच एक ‘त्रिपक्षीय बैठक’ (Trilateral Meeting) हुई। इसमें क्षेत्रीय संपर्क (Connectivity), व्यापार और राजनीतिक समन्वय जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इसे एक ट्रायल बलून (Trial Balloon) यानी एक प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे यह आंका जा सके कि छोटे देशों में इस तरह के समूह के प्रति कितनी रुचि है।

कैसा होगा नया संगठन?

अखबार के मुताबिक, इस नए संगठन में कई दक्षिण एशियाई और मध्य एशियाई देशों को शामिल करने की योजना है। इसमें श्रीलंका, मालदीव, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हो सकते हैं। भारत को भी इसमें शामिल करने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि यह संगठन SAARC की तरह पुराने ढांचे से हटकर होगा। इसका मकसद क्षेत्र में व्यापार, संपर्क और राजनीतिक सहयोग को बढ़ाना होगा।

चीन की दिलचस्पी क्यों?

हालांकि चीन SAARC का सदस्य नहीं है, लेकिन पिछले कुछ सालों में उसने बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव काफी बढ़ाया है। BRI एक ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसमें चीन दुनियाभर में सड़क, रेल और बंदरगाह बनाकर अपने व्यापार को बढ़ाना चाहता है। पाकिस्तान के साथ उसका CPEC (China-Pakistan Economic Corridor) प्रोजेक्ट पहले से चल रहा है। अब वह बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों में भी निवेश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में एक नया मंच बनाकर SAARC की जगह लेना चाहता है, ताकि वह अपनी आर्थिक और राजनीतिक पकड़ को मजबूत कर सके।

क्या भारत होगा इस नए समूह से बाहर?

पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ ही भारत के संबंध में तनाव से गुजर रहे हैं। ऐसे में भारत के इस नए समूह का हिस्सा बनने की संभावना बेहद कम है। पाकिस्तान और चीन के बीच हुई बातचीत में यह बात सामने आई है कि SAARC को अनिश्चितकाल के लिए ‘सस्पेंड’ मान लिया गया है और अब समय है कि एक नया क्षेत्रीय मंच तैयार किया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मौजूदगी के बिना ऐसा कोई भी संगठन टिकाऊ (sustainable) नहीं होगा, क्योंकि भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति है। हालांकि भारत इस नए प्रस्ताव पर चुप्पी साधे हुए है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इसे लेकर सतर्क रहेगा। भारत को डर है कि अगर यह संगठन चीन के प्रभाव में चला गया, तो यह उसके हितों के खिलाफ हो सकता है। भारत पहले से ही चीन के BRI प्रोजेक्ट का विरोध करता आया है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे उसकी संप्रभुता पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अगर भारत को इस संगठन में शामिल होने का निमंत्रण मिलता है, तो वह अपनी शर्तों पर ही इसमें हिस्सा लेगा।

बांग्लादेश का रुख क्या है?

बांग्लादेश ने फिलहाल किसी भी नए समूह में शामिल होने से इनकार किया है। अंतरिम सरकार के विदेश सलाहकार एम. तौहीद हुसैन ने स्पष्ट कहा कि कुनमिंग में जो बैठक हुई थी, वह कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं था और न ही उसमें किसी प्रकार के ‘एलायंस’ की औपचारिक घोषणा हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध ‘रीअडजस्टमेंट’ की स्थिति में हैं और चीन-पाकिस्तान के साथ कोई नई व्यवस्था बनाने का फिलहाल कोई संकेत नहीं है।

श्रीलंका, नेपाल और अन्य देशों का क्या होगा?

नए ब्लॉक में श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और अफगानिस्तान जैसे देशों को शामिल करने की योजना बताई जा रही है। लेकिन इन देशों की अपनी-अपनी आंतरिक समस्याएं हैं और वे खुलकर चीन या पाकिस्तान के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते। अफगानिस्तान की स्थिति भी अनिश्चित है, क्योंकि वहां की सरकार में बदलाव के बाद उसका रुख साफ नहीं है। फिर भी, अगर चीन आर्थिक मदद देता है, तो अफगानिस्तान भी इसमें रुचि दिखा सकता है। यह अब देखना दिलचस्प होगा कि नेपाल, श्रीलंका, मालदीव जैसे देश इस नए प्रस्तावित समूह पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। ये सभी देश SAARC के सदस्य हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कारण इनकी भूमिका सीमित हो गई थी। अगर चीन और पाकिस्तान मिलकर कोई नया समूह बनाते हैं, तो इन देशों की भागीदारी तय करेगी कि यह पहल कितनी सफल होगी।

क्या SCO से जुड़ेगा नया ब्लॉक?

अनुमान \लगाया जा रहा है कि प्रस्तावित संगठन को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के दायरे में लाया जा सकता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों सदस्य हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह जियोपॉलिटिकल संतुलन को और मुश्किल बना सकता है। SCO में भारत, पाकिस्तान, चीन और मध्य एशियाई देश शामिल हैं। यह दक्षिण एशिया व मध्य एशिया के देशों के लिए एक बड़ा मंच है। SCO की अगली शिखर बैठक 15-16 अक्टूबर 2025 को इस्लामाबाद में होने वाली है, और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरान इस नए ब्लॉक के बारे में कोई घोषणा हो सकती है।

India-Bangladesh relations: बांग्लादेश में तेजी से पकड़ बना रहे चीन-पाकिस्तान, विदेश मामलों की संसदीय समिति ने जताई चिंता

भारत के लिए क्यों है चिंता की बात

भारत के लिए इस मामले में चिंता की कई वजहें हो सकती हैं। अगर चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश मिलकर नया संगठन बनाते हैं, तो इससे चीन का दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ सकता है। भारत का मानना है कि यह संगठन चीन के “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” (BRI) को आगे बढ़ाने का जरिया बन सकता है, जिसका हिस्सा होने से भारत पहले ही इनकार कर चुका है। इसके अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही रिश्ते तनावपूर्ण हैं। अगर नया संगठन बनता है और पाकिस्तान इसमें प्रमुख भूमिका निभाता है, तो भारत के लिए इसमें शामिल होना मुश्किल होगा। इसके अलावा, श्रीलंका, मालदीव जैसे छोटे देश पहले से ही चीन के आर्थिक प्रोजेक्ट्स पर निर्भर हैं, और अगर ये देश नए संगठन में शामिल होते हैं, तो भारत के लिए हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी स्थिति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। साथ ही, SAARC में भारत की अहम भूमिका है, लेकिन उसकी निष्क्रियता के कारण यह कमजोर पड़ा है, और अगर नया संगठन SAARC की जगह लेता है और भारत को इससे बाहर रखा जाता है, तो क्षेत्रीय नेतृत्व में भारत की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

INS Tamal Commissioned: भारतीय नौसेना को मिला रूस में बना सबसे आधुनिक स्टील्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट, ब्रह्मोस और देसी हथियारों से है लैस

INS Tamal Commissioned: India's Most Advanced Stealth Frigate Joins Indian Navy
Image Source: Indian Navy

INS Tamal Commissioned: 1 जुलाई 2025 को भारतीय नौसेना ने अपनी सबसे आधुनिक स्टील्थ मल्टी-रोल फ्रिगेट, INS तमाल, को रूस के कालिनिनग्राद में कमीशन किया। यह समारोह दोपहर 2:00 बजे से 4:00 बजे तक भारतीय समय के अनुसार आयोजित हुआ। समारोह की अध्यक्षता वाइस एडमिरल संजय जे. सिंह, फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, वेस्टर्न नेवल कमांड ने की, जिसमें भारत और रूस के कई वरिष्ठ सरकारी और रक्षा अधिकारी शामिल थे। INS तमाल (INS Tamal), क्रिवाक क्लास (Krivak Class) फ्रिगेट्स की श्रृंखला में आठवां जहाज है, जिसे पिछले दो दशकों में रूस से शामिल किया गया है। यह तुशील क्लास (Tushil Class) का दूसरा युद्धपोत है, जो पहले के तलवार और तैग क्लास युद्धपोतों से कहीं ज्यादा आधुनिक और घातक है। इस पूरी श्रृंखला में कुल 10 ऐसे युद्धपोत होंगे, जिनमें कई तकनीकी समानताएं होंगी – जैसे कि हथियार प्रणाली, सेंसर्स और संचार उपकरण – जिससे नौसेना की संचालन क्षमता और भी मजबूत होगी।

यह 2016 में भारत-रूस अंतर-सरकारी समझौते (IGA) के तहत निर्मित चार फ्रिगेट्स में से एक है, जिसमें दो जहाज रूस से आयात किए गए और दो गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) में बनाए जा रहे हैं। INS तमाल हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारतीय नौसेना की स्ट्रैटेजिक और ऑपरेशन कैपेबिलिटी को मजबूत करेगा। इसे खासतौर पर पाकिस्तानी समुद्री सीमा और कराची पोर्ट की निगरानी के लिए तैनात किया जा सकता है।

INS Tamal Commissioned: रूस में बना है INS तमाल

आईएनएस तमाल का निर्माण रूस के यांतार शिपयार्ड (Yantar Shipyard), कालिनिनग्राद में हुआ है। इसके निर्माण की देखरेख भारतीय नौसेना की एक विशेषज्ञ टीम ने की, जो मास्को स्थित भारतीय दूतावास के तहत तैनात वॉरशिप ओवरसाइट टीम (Warship Overseeing Team) का हिस्सा थी। भारत सरकार के “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” मिशन के तहत यह अंतिम युद्धपोत है, जिसे भारत ने किसी विदेशी स्रोत से हासिल किया है। यह खास बात है कि INS Tamal में लगभग 26 फीसदी स्वदेशी तकनीक का उपयोग हुआ है।

इस फ्रिगेट में लंबी दूरी तक मार करने वाली ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल प्रणाली लगी है, जो समुद्र और ज़मीन दोनों लक्ष्यों को भेद सकती है। इसके अलावा, इसमें वर्टिकल लॉन्च Shtil-1 सरफेस-टू-एयर मिसाइल (Surface-to-Air Missile), उन्नत 100 मिमी तोप, आधुनिक EO/IR सिस्टम, 30 मिमी क्लोज-इन वेपन सिस्टम (CIWS), टॉरपीडो ट्यूब और रॉकेट लॉन्चर (जैसे RBU-6000), एंटी-सबमरीन रॉकेट्स और कई अत्याधुनिक रडार व नियंत्रण प्रणाली लगाई गई हैं।

INS Tamal की एक और बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एयर अर्ली वॉर्निंग और मल्टी-रोल हेलिकॉप्टरों को ऑपरेट करने की क्षमता है। इसमें एक विशेष “क्विक लॉन्च सिस्टम” भी है, जो हेलीकॉप्टर को आपात स्थिति में 5 मिनट से भी कम समय में उड़ान भरने की सुविधा देता है। इसके अतिरिक्त यह जहाज नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर (Network Centric Warfare) प्रणाली और एडवंस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम से भी लैस है। इसकी गति 30 नॉट (लगभग 55 किमी/घंटा) से अधिक है, और यह लंबे समय तक समुद्र में टिक सकता है।

चालक दल में 250 से अधिक नौसैनिक

INS तमाल के चालक दल में 250 से अधिक नौसैनिक हैं, जिन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग और कालिनिनग्राद की कठोर सर्दियों में कठोर प्रशिक्षण लिया। पिछले तीन महीनों में इस युद्धपोत ने कई समुद्री परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए हैं, जिनमें हथियारों, रडार और अन्य प्रणालियों की टेस्टिंग शामिल थी।

इस जहाज का निर्माण भारतीय विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा बारीकी से देखा गया, जो कालिनिनग्राद में वॉरशिप ओवरसीइंग टीम के तहत तैनात थी। यह टीम मॉस्को में भारतीय दूतावास के तहत काम कर रही थी। नौसेना मुख्यालय में, इस परियोजना को डायरेक्टरेट ऑफ शिप प्रोडक्शन के तहत कंट्रोलर ऑफ वॉरशिप प्रोडक्शन एंड एक्विजिशन ने ऑपरेट किया।

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इंद्र की तलवार के नाम पर रखा नाम तमाल

INS तमाल का नाम भारतीय पौराणिक कथाओं में इंद्र, देवताओं के राजा, द्वारा युद्ध में इस्तेमाल की गई पौराणिक तलवार से प्रेरित है। इसका शुभंकर (Mascot) भारतीय पौराणिक चरित्र जाम्बवन्त (जाम्बवंत) और रूस के राष्ट्रीय पशु यूरेशियन ब्राउन बीयर के मेल से तैयार किया गया है। इस कारण जहाज के चालक दल को गर्व से ‘द ग्रेट बेयर’ कहा जाता है। तमाल भारत-रूस सहयोग और दोस्ती का प्रतीक है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है।

INS Tamal का आदर्श वाक्य है – “सर्वदा सर्वत्र विजय” (Sarvada Sarvatra Vijaya), जो भारतीय नौसेना की युद्धक्षमता और हर मिशन में जीत सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह भारतीय नौसेना के मिशन – ‘कॉम्बैट रेडी, क्रेडिबल, कोहेसिव एंड फ्यूचर रेडी फोर्स सेफगार्डिंग नेशनल मैरीटाइम इंटरेस्ट्स – एनटाइम, एनव्हेयर’ (Combat Ready, Credible, Cohesive and Future Ready Force Safeguarding National Maritime Interests – Anytime, Anywhere) का भी प्रतीक है।

INS Tamal के कमीशन होते ही यह भारतीय नौसेना के ‘स्वॉर्ड आर्म’ – पश्चिमी बेड़े (Western Fleet) – में शामिल हो जाएगा। यह न केवल भारतीय नौसेना की बढ़ती क्षमताओं का प्रतीक होगा, बल्कि भारत-रूस की दशकों पुरानी साझेदारी की मिसाल भी पेश करेगा।

भारत में बने 33 से अधिक सिस्टम्स का इस्तेमाल

125 मीटर लंबा और 3900 टन वजनी INS तमाल एक घातक युद्धपोत है। Tamal के डिज़ाइन को रूस के Severnoye Design Bureau और भारतीय नौसेना के विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया है। इसमें भारत में बने 33 से अधिक सिस्टम्स का इस्तेमाल हो रहा है। इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, HUMSA NG Mk II सोनार सिस्टम, लेटेस्ट सरफेस सर्विलांस रडार, अत्याधुनिक एंटी-सबमरीन वेपन कॉम्प्लेक्स, नेविगेशन और डाटा लिंक सिस्टम जैसी खूबियां हैं। इस निर्माण में शामिल प्रमुख भारतीय कंपनियों में ब्रह्मोस एयरोस्पेस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), केल्ट्रॉन, नोवा इंटीग्रेटेड सिस्टम्स (TATA), एल्कोम मरीन, जॉनसन कंट्रोल्स इंडिया जैसी कंपनियां शामिल थीं।

गुप्त स्टील्थ डिजाइन की खूबी

INS तमाल की स्टील्थ (गोपनीय) तकनीक केवल इसके एंटी रडार स्ट्रक्चर तक सीमित नहीं है। इस जहाज में एक खास “सिग्नेचर प्रबंधन प्रणाली” (Signature Management System) लगाई गई है, जो इसके इंफ्रारेड (गर्मी से निकलने वाले) और एकॉस्टिक (ध्वनि से संबंधित) सिग्नेचर को बहुत कम कर देती है। इसका मतलब है कि यह जहाज दुश्मन के थर्मल सेंसर और सोनार (समुद्र में ध्वनि तरंगों से खोज करने वाली तकनीक) की पकड़ में नहीं आता।

INS Tamal: ‘बायर्स नेवी’ से ‘बिल्डर्स नेवी’ बनी भारतीय नौसेना, जून में कमीशन होगा आईएनएस तमाल, अब बाहर से नहीं खरीदे जाएंगे वॉरशिप

इस एडवांस सिस्टम के तकनीकी पहलुओं को गोपनीय रखा गया है, लेकिन इतना साफ है कि यह तकनीक INS तमाल को समुद्र में लगभग अदृश्य बना देती है। इससे यह दुश्मन की नज़रों से बचकर, चुपचाप और प्रभावी तरीके से अपना मिशन पूरा कर सकता है।

Mid-air Refuellers: भारतीय वायुसेना के फाइटर जेट्स को आसमान में मिलेगी ‘लाइफ लाइन’, 2007 से लटकी डील को सरकार ने दिए पंख!

AF’s Mid-Air Refuellers Deal Finally Takes Off After 17 Years
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Mid-air Refuellers: भारतीय वायुसेना (आईएएफ) ने छह मिड-एयर रिफ्यूलर विमानों की खरीद के लिए टेक्निकल इवेल्यूशन शुरू कर दिया है। ये विमान वायुसेना के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। यह प्रक्रिया 2007 से लंबित रही है, लेकिन अब रक्षा मंत्रालय और वायुसेना ने इस दिशा में तेजी दिखाई है। सूत्रों के अनुसार, तीन से चार कंपनियों ने इन छह रिफ्यूलर विमानों के लिए अपनी बोली जमा की है।

सूत्रों ने बताया कि अभी टेक्निकल इवेल्यूशन की स्टेज चल रही है, और इन कंपनियों द्वारा पेश किए गए रिफ्यूलर विमानों की जांच की जा रही है। यह देखा जा रहा है कि कौन-सा टैंकर (Mid-air Refuellers) भारतीय जरूरतों के हिसाब से सबसे उपयुक्त है। एक बार यह चरण पूरा हो जाने के बाद, इन टैंकर विमानों के मेंटेनेंस के लिए एक भारतीय पार्टनर की तलाश भी की जाएगी।

क्यों है मिड-एयर रिफ्यूलर (Mid-air Refuellers) की जरूरत

मिड-एयर रिफ्यूलर (Mid-air Refuellers) विमान भारतीय वायुसेना के लिए फोर्स मल्टीप्लायर हैं। ये विमान फाइटर जेट्स को हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा देते हैं। इससे लड़ाकू विमान अधिक समय तक हवा में रह सकते हैं, ज़्यादा दूरी तक ऑपरेशन कर सकते हैं और दुश्मन की सीमा के भीतर गहराई तक हमला कर सकते हैं। इस तकनीक से भारतीय वायुसेना की रणनीतिक पहुंच (Strategic Reach) बढ़ती है। वहीं, भारतीय वायुसेना की तैयारी कई नए फाइटर जेट्स को शामिल करने की है, जिनमें हवा में ईंधन भरा जा सके। इसीलिए रिफ्यूलर विमानों की जरूरत और भी बढ़ गई है। वर्तमान में वायुसेना के पास 36 फाइटर स्क्वाड्रन हैं, लेकिन इसे और मजबूत करने के लिए नए विमानों की आवश्यकता है। रिफ्यूलर विमान इन स्क्वाड्रनों की क्षमता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

अभी कितने हैं टैंकर?

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास रूस से खरीदे गए 6 इल्यूशिन आईएल-78 (Ilyushin Il-78MKI) टैंकर (Mid-air Refuellers) हैं, जो 2003-04 के दौरान उज्बेकिस्तान से खरीदे गए थे। लेकिन इन छह विमानों में से आमतौर पर केवल तीन या चार ही किसी भी समय उड़ान भरने की स्थिति में रहते हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट (2010 से 2016 के बीच की जांच) में भी इन टैंकरों की मेंटेनेंस और इस्तेमाल को लेकर कई खामियां उजागर की गई थीं। रिपोर्ट में बताया गया था कि विमान अक्सर मरम्मत में रहते हैं और समय पर ऑपरेशन के लिए उपलब्ध नहीं रहते।

इन विमानों की लागत उस समय प्रति विमान 132 करोड़ रुपये थी। इसके अलावा, वायुसेना भारतीय नौसेना के मिग-29के फाइटर जेट्स को भी सीमित रिफ्यूलिंग सुविधा देती है।

2007 से तीसरी कोशिश

भारतीय वायुसेना ने 2007 से मिड-एयर रिफ्यूलर (Mid-air Refuellers) विमानों की खरीद की कोशिश शुरू की थी, लेकिन यह तीसरी कोशिश है। इससे पहले दो बार टेंडर रद्द किए जा चुके हैं, क्योंकि कीमत को लेकर विवाद हो गया था। इस बार वायुसेना ने पुराने (pre-owned) विमानों को रिफ्यूलर में बदलने का विकल्प भी खुला रखा है। इन विमानों को बाद में टैंकर में बदला जा सकता है। इसकी वजह है कि आने वाले सालों में दुनिया भर की एयरलाइंस कंपनियां पुराने विमानों की जगह नए इंजनों वाले विमान खरीदने जा रही हैं। इससे बाजार में पर्याप्त संख्या में पुराने विमान उपलब्ध होंगे, जिन्हें बाद में टैंकर में बदला जा सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, यह स्पष्ट नहीं है कि बोली लगाने वाली सभी कंपनियों ने पुराने विमानों को ही पेश किए हैं या नहीं। लेकिन इस रणनीति से वायुसेना को अगले 25-30 साल की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। एक बार रिफ्यूलर विमानों का चयन हो जाने के बाद, उनके रखरखाव के लिए भारत में एक मेंटेनेंस पार्टनर की तलाश की जाएगी।

वेट लीज पर लिया अमेरिकी एयरक्राफ्ट

फरवरी 2024 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाले रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council – DAC) ने छह नए मिड-एयर रिफ्यूलर (Mid-air Refuellers) की खरीद को मंजूरी दी थी। इसके अलावा मार्च 2025 में रक्षा मंत्रालय ने मेट्रिया मैनेजमेंट (Metrea Management) नाम की अमेरिकी कंपनी के साथ एक समझौता किया था। इसके तहत भारत को एक KC-135 विमान मिलेगा, जो भारतीय वायुसेना और नौसेना के पायलटों को एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग की ट्रेनिंग देने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इस समझौते के अनुसार, Metrea को छह महीने के भीतर यह विमान भारतीय वायुसेना को उपलब्ध कराना होगा। वहीं, यह भारतीय वायुसेना द्वारा वेट लीज (wet lease-किराए पर चालक दल सहित) पर लिया गया, पहला रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट होगा।

क्यों फेल हुए पहले दो प्रयास?

यह तीसरी बार है जब भारतीय वायुसेना मिड-एयर रिफ्यूलर (Mid-air Refuellers) टैंकर खरीदने की कोशिश कर रही है। इससे पहले दो बार यह प्रक्रिया कीमतों को लेकर हुए विवाद के कारण रद्द हो चुकी है। एयरबस ए330 मल्टी-रोल टैंकर ट्रांसपोर्ट (MRTT) और इल्यूशिन आईएल-78 दोनों ही इस कॉन्ट्रैक्ट को हासिल करने की दौड़ में थे। लेकिन कीमत और रखरखाव को लेकर अंतिम फैसला नहीं हो पाया।

IAF Chief बोले- भारतीय वायुसेना को हर साल चाहिए 35-40 नए फाइटर जेट, निजी क्षेत्र की भागीदारी पर दिया जोर

इसके अलावा, सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (आईएआई) के साथ मिलकर बोइंग 767 यात्री विमानों को भारत में रिफ्यूलर (Mid-air Refuellers) में बदलने के लिए एक समझौता किया था। लेकिन यह भी अब तक पूरा नहीं हो सका।