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Space-Based Surveillance: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत लॉन्च करेगा 52 डिफेंस सैटेलाइट, दुश्मन की हर हलचल पर अब स्पेस से रखेगा नजर

India to Launch 52 Defence Satellites for Space-Based Surveillance Post Sindoor
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Space-Based Surveillance: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत अब दुश्मन की हर गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखने की बड़ी तैयारी कर रहा है। भारत सरकार ने 52 डिफेंस सैटेलाइट्स (रक्षा उपग्रहों) को तेजी से लॉन्च करने की योजना बनाई है। ये सैटेलाइट्स आर्म्ड फोर्सेस के लिए खास तौर पर तैयार किए जा रहे हैं। साथ ही, देश एक व्यापक सैन्य अंतरिक्ष नीति (Military Space Doctrine) को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में भी है। इस कदम से भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

पिछले साल अक्टूबर में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने अंतरिक्ष आधारित निगरानी (स्पेस-बेस्ड सर्विलांस) कार्यक्रम के तीसरे चरण (Space-Based Surveillance-SBS-3) को मंजूरी दी थी। इस परियोजना की लागत 26,968 करोड़ रुपये है। इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 21 उपग्रहों का निर्माण और लॉन्चिंग करेगा, जबकि तीन निजी कंपनियां मिलकर 31 उपग्रह तैयार करेंगी।

Space-Based Surveillance: 2029 से पहले सभी 52 सैटेलाइट अंतरिक्ष में होंगे

सूत्रों के मुताबिक, पहला उपग्रह अगले साल अप्रैल तक लॉन्च किया जाएगा, और 2029 के अंत तक सभी 52 उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। इस पूरे मिशन की अगुवाई डिफेंस स्पेस एजेंसी (Defence Space Agency – DSA) और इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) कर रहे हैं। एक सूत्र ने बताया, “हम इन उपग्रहों को तेजी से निम्न पृथ्वी कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) और भू-स्थिर कक्षा (जियोस्टेशनरी ऑर्बिट) में स्थापित करने के लिए समयसीमा को और कम करने की कोशिश कर रहे हैं। जिन तीन निजी कंपनियों को कॉन्ट्रैक्ट मिला है, उन्हें उपग्रहों के निर्माण में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं।”

कवर होगा चीन, पाकिस्तान और हिंद महासागर क्षेत्र

SBS-3 का मुख्य उद्देश्य चीन, पाकिस्तान और हिंद महासागर क्षेत्र के बड़े हिस्सों को कवर करना है। इसके लिए उपग्रहों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे कम समय में दोबारा उसी क्षेत्र की निगरानी (रिविजिट टाइम) कर सकें और बेहतर रिजॉल्यूशन (इमेजिंग क्वालिटी) के साथ तस्वीरें उपलब्ध करा सकें। इससे दुश्मन की छोटी से छोटी गतिविधि को भी तुरंत ट्रैक किया जा सकेगा। इसके अलावा, सैन्य अंतरिक्ष नीति को भी और बेहतर किया जा रहा है, ताकि भारत की अंतरिक्ष आधारित रक्षा रणनीति को और मजबूती मिले।

इसके साथ ही भारतीय वायुसेना तीन हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम (High Altitude Platform System – HAPS) हासिल करने की योजना बना रही है। ये बिना पायलट वाले विमान होते हैं जिन्हें “स्यूडो-सैटेलाइट्स” (Pseudo-satellites) भी कहा जाता है। ये स्ट्रैटोस्‍फेयर (Stratosphere – समताप मंडल) में लंबे समय तक उड़ान भर सकते हैं और जासूसी, सर्विलांस और निगरानी (ISR – Intelligence, Surveillance and Reconnaissance) मिशनों में मदद करते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर ने बढ़ाई सैटेलाइट की अहमियत

सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, जो 7 से 10 मई के बीच चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने घरेलू सैटेलाइट्स जैसे Cartosat के साथ-साथ विदेशी कॉमर्शियल सैटेलाइट्स का इस्तेमाल किया। इसका मकसद पाकिस्तान के सैन्य मूवमेंट पर नजर रखना था। एक अन्य सूत्र ने कहा, “हमें अब अपनी OODA लूप (Observe, Orient, Decide, Act) को Qj तेज करना होगा। जितनी जल्दी भारत 52 सैटेलाइट्स की पूरी सीरीज को अंतरिक्ष में स्थापित करेगा, उतना बेहतर रहेगा।”

स्पेस डोमेन में चीन की चुनौती

चीन की सैन्य अंतरिक्ष क्षमता में तेजी से बढ़ोतरी भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन रही है। 2010 में जहां चीन के पास केवल 36 उपग्रह थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर 1,000 से अधिक हो गई है, जिनमें से 360 उपग्रह खुफिया, निगरानी और टोही (आईएसआर) मिशनों के लिए हैं। चीन ने डायरेक्ट असेंडेंट एंटी-सैटेलाइट मिसाइल, को-ऑर्बिटल सैटेलाइट्स), इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण और हाई-पावर लेज़र वेपन बना लिए हैं। जो अन्य देशों की सैटेलाइट गतिविधियों में रुकावट पैदा कर सकते हैं।

चीन बना चुका है एयरोस्पेस फोर्स

चीन ने पिछले साल अप्रैल में पीएलए एयरोस्पेस फोर्स बनाई थी। इस महीने की शुरुआत में एक सेमिनार में एकीकृत रक्षा स्टाफ (IDS) के प्रमुख एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने भारत की निगरानी सीमा (सर्विलांस एनवेलप) को बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “हमें अपनी सीमाओं पर खतरे आने से पहले ही, जब वे दुश्मन के एयरबेस या तैयारी क्षेत्रों में हों, तभी पहचानना और ट्रैक करना जरूरी है। इससे हमें रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस (Real-Time Situational Awareness) मिलेगी।”

एयर मार्शल दीक्षित ने बताया कि चीन के उपग्रह हाल ही में निम्न पृथ्वी कक्षा में जटिल “डॉगफाइटिंग” युद्धाभ्यास (मैनुवर्स) करते हुए देखे गए हैं। उन्होंने बताया, चीन अब ‘किल चेन’ (Kill Chain) से ‘किल मेष’ (Kill Mesh) की ओर बढ़ चुका है, जो एक इंटीग्रेटेड नेटवर्क है जिसमें आईएसआर उपग्रहों को विपंस सिस्टम के साथ जोड़ा गया है।”

सैन्य रणनीति में स्पेस का महत्व बढ़ा

भारत की यह नई योजना न केवल दुश्मन की गतिविधियों पर बेहतर नजर रखेगी, बल्कि यह भारत की सैन्य रणनीति को तकनीकी रूप से और सशक्त बनाएगी। सैन्य अंतरिक्ष सिद्धांत (Military Space Doctrine) को भी इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा रहा है, जिसमें भविष्य के युद्धों में स्पेस डोमेन को निर्णायक भूमिका दी जाएगी।

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उपग्रहों के साथ-साथ, भारतीय वायु सेना (आईएएफ) तीन हाई-एल्टिट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम (एचएपीएस) विमानों के लिए भी प्रस्ताव पर काम कर रही है। ये मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी) या “छद्म-उपग्रह” (स्यूडो-सैटेलाइट्स) हैं, जो स्ट्रैटोस्फेयर में लंबे समय तक खुफिया, निगरानी और टोही मिशनों के लिए काम करते हैं।

Agniveer retention policy: अग्निवीरों के लिए बड़ी खबर, इन बहादुरों को मिलेगी परमानेंट नौकरी की गारंटी, तीसरा असेसमेंट तय करेगा सेना में फ्यूचर!

Agniveer Retention Policy- Third Assessment to Decide Permanent Service
Image Source: @PRODefPune

Agniveer retention policy: भारतीय सेना में अग्निवीर योजना के तहत भर्ती हुए पहले बैच के लिए तीसरा असेसमेंट शुरू हो चुका है। यह बैच जनवरी 2023 में सेना में शामिल हुआ था। इस असेसमेंट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थायी सेवा के लिए चुने गए अग्निवीर न केवल शारीरिक रूप से फिट हों, बल्कि उनके पास सैन्य करियर के लिए आवश्यक कौशल और योग्यता भी हो। डिफेंस सूत्रों ने बताया कि इस प्रक्रिया को निष्पक्षता, पारदर्शिता और उद्देश्यपूर्ण तरीके से डिजाइन किया गया है, ताकि किसी भी तरह का पक्षपात न हो।

Agniveer retention policy: अग्निवीर योजना और असेसमेंट प्रक्रिया

अग्निपथ योजना की घोषणा 14 जून, 2022 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की थी। इस योजना के तहत अग्निवीरों को चार साल के लिए भर्ती किया जाता है, जिसमें से 25 प्रतिशत को परमानेंट किया जाता है। चार साल की सेवा के दौरान, अग्निवीरों का असेसमेंट चार बार किया जाता है। पहला मूल्यांकन भर्ती के 31 सप्ताह के भीतर रेजिमेंटल केंद्र में होता है, दूसरा 18 महीने की सेवा के बाद उनकी यूनिट में, तीसरा 30 महीने में, जो अभी चल रहा है, और चौथा 42वें महीने में, यानी यूनिट छोड़ने से छह महीने पहले किया जाता है।


सूत्रों के अनुसार, इस व्यवस्था को इस तरह से बनाया गया है कि हर स्तर पर अग्निवीरों को अपने प्रदर्शन को बेहतर साबित करने के लिए पूरा मौका मिले। इस प्रक्रिया को डिजाइन करने में निष्पक्षता और पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। पहले चरण का असेसमेंट रेजिमेंटल केंद्र में होता है, जहां नई भर्तियों को ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद दो असेसमेंट उनकी यूनिट में और आखिरी असेसमेंट उच्च अधिकारी करता है, जिसके अधीन यूनिट काम करती है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि असेसमेंट में कोई पक्षपात न हो, अग्निवीर की सेवा वाली यूनिट को उनके असेसमेंट में सीधे शामिल नहीं किया जाता।

असेसमेंट का क्या है तरीका

हर चरण में अग्निवीरों को असेसमेंट में पास होने के पर्याप्त मौके दिए जाते हैं। रेजिमेंटल केंद्र में होने वाले पहले चरण के टेस्ट में ड्रिल, फिजिकल टेस्ट और फायरिंग शामिल होती है। प्रत्येक टेस्ट में अग्निवीरों को तीन मौके दिए जाते हैं, और इनमें से सबसे अच्छा प्रदर्शन असेसमेंट सॉफ्टवेयर में दर्ज किया जाता है। बाद के चरणों में उन्हें दो मौके दिए जाते हैं, और दोनों में से बेहतर प्रदर्शन दर्ज किया जाता है।

अग्निवीर अपने प्रदर्शन के डेटा को अपने लॉगिन आईडी के जरिए देख सकते हैं, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहती है। सूत्रों ने बताया कि सेना की यूनिट्स देश के अलग-अलग हिस्सों में, जैसे सियाचिन और लद्दाख (12,000 फीट से अधिक) जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात होती हैं। ऐसे मामलों में परीक्षा देने के लिए उन्हें नजदीकी कोर बैटल स्कूल या रियर यूनिट्स से जोड़ा जाता है ताकि उनका मूल्यांकन समान रूप से हो सके।

सूत्रों ने बताया, इस असेसमेंट प्रोसेस की सबसे अहम बात यह है कि जहां अग्निवीर तैनात हैं, वही यूनिट उनका असेसमेंट नहीं करती। इससे किसी भी तरह के पक्षपात की संभावना खत्म हो जाती है। भारतीय सेना के अडजुटेंट जनरल ब्रांच (Adjutant General Branch) ने इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक सक्षम अधिकारी (Competent Authority) नियुक्त किया है, जो किसी भी अपवाद या छूट की अनुमति देने का अधिकार रखता है। यह ब्रांच सेना के मानव संसाधन, प्रशासनिक सहायता और मैनपावर मैनेजमेंट का काम देखती है।

बहादुरी पुरस्कार पाने वालों को प्राथमिकता

अग्निवीरों के करियर में वीरता पुरस्कार (gallantry awards) और मेडल्स की अहम भूमिका है। सूत्रों के अनुसार, जिन अग्निवीरों को सेना मेडल (Sena Medal) या उससे ऊपर के पुरस्कार जैसे अशोक चक्र, कीर्ति चक्र, या शौर्य चक्र मिले हैं, उन्हें सीधे पक्की नौकरी मिल जाएगी।

इसके अलावा, “मेंशन इन डिस्पैचेस” (Mention in Dispatches) पाने वालों को 25 अतिरिक्त अंक दिए जाएंगे। सेना प्रमुख, आर्मी कमांडर और कोर कमांडर द्वारा दी गई प्रशंसा पत्र (Commendation Cards) के लिए भी अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं।

खिलाड़ियों के लिए अवसर

अग्निपथ योजना के तहत भर्ती हुए खिलाड़ियों को भी स्थायी सेवा में शामिल होने का मौका मिलता है। जो अग्निवीर अंतरराष्ट्रीय स्तर (international events) पर खेलों में हिस्सा लेते हैं, उनकी स्थायी भर्ती पक्की हो जाती है। राष्ट्रीय स्तर (national events) पर हिस्सा लेने वालों को 10 अतिरिक्त अंक और सर्विसेज स्तर (services level events) पर हिस्सा लेने वालों को 6 अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं।

असेसमेंट का कुल स्कोर

मूल्यांकन में कुल 1000 अंकों का आकलन होता है। यह डेटा अग्निवीरों के चार साल की सेवा पूरी होने से तीन महीने पहले, यानी अक्टूबर 2026 तक, डेटा शीट में दर्ज करना होता है। पहले बैच के अग्निवीर जनवरी 2027 में अपनी सेवा पूरी करेंगे। चार साल की सेवा के बाद सभी अग्निवीरों को रिलीज मेडिकल बोर्ड से गुजरना होगा, जो उनकी मेडिकल स्थिति का आकलन करेग।

चार साल की सेवा के बाद की प्रक्रिया

सूत्रों के अनुसार, जो अग्निवीर परमानेंट किए जाएंगे उन्हें यूनिट छोड़ने के सात दिनों के भीतर सूचित किया जाएगा, और उन्हें 30 दिनों के भीतर अपने रेजिमेंटल केंद्र में रिपोर्ट करना होगा। एक सप्ताह की अतिरिक्त अवधि भी दी जाएगी। अगर कोई अग्निवीर इस अवधि में रिपोर्ट नहीं करता, तो उसे सेवा में शामिल होने का इच्छुक नहीं माना जाएगा, और मेरिट लिस्ट में अगले व्यक्ति को मौका मिलेगा। चयनित 25 प्रतिशत अग्निवीर कम से कम 15 साल या उससे अधिक समय तक सेना में परमानेंट नौकरी कर करेंगे।

यह ध्यान देना जरूरी है कि पहले सैनिकों को 15 साल की सेवा के बाद पेंशन मिलती थी, लेकिन अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों को यह लाभ नहीं मिलता। स्थायी भर्ती की प्रक्रिया “आर्म एंड सर्विस” यानी हथियार और सेवाओं से जुड़ी ट्रेड के अनुसार की जाएगी। हर ट्रेड के लिए अलग मेरिट लिस्ट बनेगी।

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तीसरा असेसमेंट अग्निवीरों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो उनकी मेहनत, समर्पण और कौशल को परखेगा। भारतीय सेना इस प्रक्रिया के जरिए यह सुनिश्चित कर रही है कि केवल सर्वश्रेष्ठ और सबसे योग्य अग्निवीर ही स्थायी सेवा के लिए चुने जाएं।

Asim Munir threatens India: अमेरिका की शह पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने फिर उगला जहर, भारत पर लगाया आतंकी हमले का आरोप, खुद को बताया “नेट रीजनल स्टैबिलाइजर”

Asim Munir Threatens India Again, Calls Pak 'Net Regional Stabiliser'

Asim Munir threatens India: पाकिस्तान की सेना एक बार फिर भारत के खिलाफ जहर उगलने पर उतर आई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ लंच क्या कर लिया कि लगता है जैसे उन्हें अमेरिकी की शह मिल गई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने एक बार फिर भारत के खिलाफ तीखा बयान दिया है। कराची स्थित पाकिस्तान नौसेना अकादमी (Pakistan Naval Academy) में आयोजित एक कार्यक्रम में पाक सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने न केवल भारत को दो बार ‘बिना किसी उकसावे के हमला करने’ का आरोप लगाया, बल्कि कश्मीर मुद्दे को लेकर भड़काऊ बयान देते हुए भारत को ‘निर्णायक जवाब’ की चेतावनी भी दे डाली। साथ ही, मुनीर ने यह भी आरोप लगाया कि जब पाकिस्तान आतंकवाद को खत्म करने के करीब है, तब भारत जानबूझकर क्षेत्र में तनाव पैदा कर रहा है।

Asim Munir threatens India: “नेट रीजनल स्टैबिलाइजर” कहकर खुद की तारीफ

जनरल असीम मुनीर ने अपने भाषण में पाकिस्तान को इस क्षेत्र का “नेट रीजनल स्टैबिलाइज़र” यानी क्षेत्रीय स्थिरता कायम रखने वाला (Net Regional Stabiliser) बताया और दावा किया कि भारत की कथित ‘आक्रामकता’ के बावजूद पाकिस्तान ने संयम और परिपक्वता दिखाई है। उन्होंने कहा, “भारत ने रणनीतिक दूरदर्शिता की कमी दिखाई है और बिना किसी कारण के पाकिस्तान पर हमला किया है। इसके बावजूद, हमने संयम बरता और शांति के लिए प्रतिबद्धता जताई।”

यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध पहले ही संवेदनशील मोड़ पर हैं। खासतौर पर 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद, जिसमें पाक समर्थित आतंकियों ने निर्दोष पर्यटकों को मौत के घाट उतार दिया था, भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर निशाना साधा था।

फिर छेड़ा कश्मीर राग

मुनीर ने अपने भाषण में कश्मीर को लेकर एक बार फिर विवादास्पद बयान दिया। उन्होंने कहा, “हमें अपने कश्मीरी भाइयों की कुर्बानियों को याद रखना चाहिए, जो भारत के अवैध कब्जे के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत कश्मीर के “न्यायपूर्ण समाधान” के लिए आवाज उठाता रहेगा।

यह पहली बार नहीं है जब मुनीर ने कश्मीर को लेकर भड़काऊ बयान दिए हैं। कुछ दिन पहले ही, उन्होंने विदेश में रहने वाले पाकिस्तानी समुदाय को संबोधित करते हुए कश्मीर को पाकिस्तान की “गले की नस” (जगुलर वेन) बताया था। उन्होंने कहा था, “कश्मीर हमारी गले की नस है, और रहेगी। हम इसे कभी नहीं भूलेंगे।” इस बयान के कुछ ही दिनों बाद, कश्मीर के खूबसूरत पहलगाम इलाके में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने दो दर्जन से अधिक पुरुष पर्यटकों की हत्या कर दी थी। इस हमले के जवाब में भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जिसे पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इसके बाद भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान के भीतर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाकर नष्ट किया गया।

वजीरिस्तान हमले का आरोप मढ़ा भारत पर

मुनीर ने अपने ताजा बयान में वजीरिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा में हुए एक आतंकी हमले का भी जिक्र किया, जिसमें 16 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। उन्होंने इस हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि, भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि भारत शांति और स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। वहीं, भारतीय सूत्रों का कहना है कि यह हमला पाकिस्तानी सेना की एक “झूठी साजिश” (फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन) हो सकता है, जिसमें अपनी ही सेना के सैनिकों को मारकर पाकिस्तान पीड़ित होने का दावा कर रहा है। इस तरह के “झूठे हमले” (फॉल्स फ्लैग ऑपरेशंस) का इतिहास पाकिस्तान में पहले भी देखा गया है।

दिल्ली के सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के विश्लेषक राकेश शर्मा कहते हैं, “वजीरिस्तान में तहरीक-ए-तलबान पाकिस्तान (TTP) के हमले बढ़ रहे हैं। पाकिस्तान की सेना को इनसे निपटने में मुश्किल हो रही है। भारत पर इल्जाम लगाकर वे अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।” TTP ने हाल के सालों में कई सैन्य चौकियों पर हमले किए हैं, जिसने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की कमजोरियां जगजाहिर हुई हैं।

लंदन स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के विश्लेषक अमना खान ने कहा, “यह एक संभावित फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन हो सकता है। खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के खिलाफ पाकिस्तान सेना की लड़ाई में उसे बार-बार असफलताएं मिली हैं। हाल के सालों में TTP ने सैन्य चौकियों पर हमलों को तेज किया है। वजीरिस्तान में हुए हमले को भारत पर दोष मढ़कर सेना अपनी कमजोरियों को छिपाने की कोशिश कर रही है।”

पाकिस्तान का आतंक पर ‘डबल गेम’

पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को आतंक के खिलाफ लड़ने वाला देश बताता रहा है, लेकिन हकीकत में वही आतंक को समर्थन देता रहा है। चाहे वह कश्मीर घाटी में आतंकवाद हो या अफगान सीमा पर चरमपंथ, पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI पर लगातार आतंकियों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं।

मुनीर का ताज़ा बयान इस ‘डबल गेम’ की पुष्टि करता है। उन्होंने अपने भाषण में आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की “करीबी सफलता” का दावा किया, लेकिन साथ ही कश्मीर को लेकर उग्र भाषा का इस्तेमाल किया, जो यह बताता है कि पाकिस्तान अभी भी आतंक को अभी भी बढ़ावा दे रहे हैं।

क्या है मुनीर की रणनीति?

असीम मुनीर के बयानों को पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय भारी संकट से गुजर रही है। मुद्रास्फीति (इन्फ्लेशन) और बेरोजगारी ने जनता का असंतोष बढ़ा दिया है। ऐसे में, भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान देकर मुनीर जनता का ध्यान आंतरिक मामलों से हटाना चाहते हैं।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों और थिंक टैंक ने असीम मुनीर के बयान को ‘भड़काऊ और गैर-जिम्मेदाराना’ बताया है। रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अरविंद नारंग के मुताबिक, “पाकिस्तान अपनी आंतरिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से ध्यान भटकाने के लिए बार-बार भारत के खिलाफ जहर उगलता है। लेकिन अब भारत की नीति स्पष्ट है, आतंक के हर रूप को निर्णायक तौर से कुचलना।”

कश्मीर मुद्दे को जिंदा रखना चाहता है पाक

जनरल मुनीर मे अपने भाषण में कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देने की बात दोहराई। यह पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही प्रॉक्सी युद्ध की नीति का हिस्सा है। रक्षा विश्लेषक और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रमेश ठाकुर के अनुसार, “पाकिस्तान का यह रुख कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीवित रखने और भारत पर दबाव बनाने की कोशिश है। यह विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत ने अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद कश्मीर को सुरक्षा मुद्दा घोषित कर दिया है।”

Pakistan TTK Conspiracy: जम्मू-कश्मीर में इस आतंकी संगठन के जरिए हमले की योजना बना रहा पाकिस्तान, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी टला नहीं है खतरा!

उन्होंने कहा, भारत पर हमले का आरोप लगाकर और कश्मीर में “नैतिक और कूटनीतिक समर्थन” की बात करके, पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे मंचों पर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, उन्होंने इस तरह के दावों को खारिज करते हुए इसे “पाकिस्तान का पुराना प्रचार” करार दिया।

India-Bangladesh relations: बांग्लादेश में तेजी से पकड़ बना रहे चीन-पाकिस्तान, विदेश मामलों की संसदीय समिति ने जताई चिंता

India-Bangladesh Relations: China, Pakistan Gaining Rapid Foothold, Says Panel
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India-Bangladesh relations: भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते पिछले कुछ समय से तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। खासकर अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार के सत्ता से बेदखल होने और मोहम्मद यूनुस की अंतिरम सरकार के सत्ता में आने के बाद से दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ी हैं। हाल ही में, नई दिल्ली में विदेश मामलों की संसदीय समिति को विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बांग्लादेश में चीन और पाकिस्तान तेजी से रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं।

India-Bangladesh relations: शशि थरूर की अध्यक्षता में हुई अहम बैठक

शेख हसीना की सरकार के दौरान भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफी मजबूत थे। हसीना की नीतियां भारत के साथ सहयोग और दोस्ती पर आधारित थीं। लेकिन अगस्त 2024 में छात्रों के भारी विरोध के चलते उनकी सरकार गिर गई, और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक केयरटेकर सरकार ने सत्ता संभाली। इसके बाद से दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं। खासकर बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के साथ हो रहे उत्पीड़न को लेकर भारत ने बार-बार चिंता जताई है।

शुक्रवार को नई दिल्ली में संसद की विदेश मामलों की समिति की एक मीटिंग हुई, जिसमें पूर्व विदेश सचिव शिव शंकर मेनन, जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन अमिताभ मट्टू, बांग्लादेश में भारत की पूर्व हाई कमिश्नर रीवा गांगुली दास और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने हिस्सा लिया।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता में हुई बैठक का विषय था “भारत-बांग्लादेश संबंधों का भविष्य”। कमिटी के चेयरपर्सन, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बाद में कहा, “हमें चार शानदार विशेषज्ञों से बहुत अच्छी जानकारी मिली। हमारी रिपोर्ट अगले कुछ हफ्तों में आएगी।”

इन विशेषज्ञों ने समिति को यह बताया कि बांग्लादेश में मौजूदा अंतरिम सरकार की नीतियों और राजनीतिक रुख का लाभ उठाकर चीन और पाकिस्तान दोनों ही अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं, जो भारत के लिए चिंता का विषय है।

चीन और पाकिस्तान की बढ़ती पैठ

मीटिंग में विशेषज्ञों ने बताया कि यूनुस की अंतरिम सरकार के सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश में चीन और पाकिस्तान का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। कुछ समय पहले, 19 जून 2025 को चीन ने युन्नान प्रांत के कुनमिंग शहर में बांग्लादेश और पाकिस्तान के साथ एक त्रिपक्षीय मीटिंग की थी। इस मीटिंग में व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, समुद्री सहयोग और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर बात हुई। यह मीटिंग दक्षिण एशिया की भूराजनीति में एक नया समीकरण बनाती दिख रही है।

विशेषज्ञों ने कमेटी को बताया कि चीन ने बांग्लादेश में कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश किया है, जैसे कि कॉक्स बाजार में सबमरीन बेस का निर्माण किया गया है। यह बेस न सिर्फ बांग्लादेश की नेवल पावर को बढ़ाता है, बल्कि बंगाल की खाड़ी में चीन की रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूत करता है। इसके अलावा, मोहम्मद यूनुस की हाल की चीन यात्रा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात ने तीस्ता नदी परियोजना को लेकर भी चर्चा छेड़ दी है। पहले शेख हसीना की सरकार ने इस प्रोजेक्ट में भारत को प्राथमिकता देने की बात कही थी, लेकिन अब यूनुस सरकार के रुख से भारत के लिए कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ रही हैं।

वहीं, पाकिस्तान का प्रभाव भी बढ़ता दिख रहा है। कुछ एक्स पोस्ट्स में दावा किया गया है कि नॉर्थ-ईस्ट इलाके की सुरक्षा को देखते हुए तीनों देशों का यह आपसी सहयोग भारत के लिए खतरे की घंटी है। हालांकि, बांग्लादेश ने स्पष्ट किया है कि यह मीटिंग किसी तीसरे देश (भारत) के खिलाफ नहीं थी और यह सिर्फ आर्थिक सहयोग के लिए थी। फिर भी, भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है।

अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा की मांग

भारत ने बार-बार बांग्लादेश से अपनी अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। अप्रैल 2025 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थाईलैंड में बिम्सटेक समिट के दौरान यूनुस से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में मोदी ने कहा, “मैंने बांग्लादेश में शांति, स्थिरता, समावेशिता और लोकतंत्र के लिए भारत के समर्थन को दोहराया। हमने अवैध सीमा पार से होने वाले पलायन को रोकने के उपायों पर चर्चा की और हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए अपनी गंभीर चिंता जताई।”

विशेषज्ञों ने कमिटी को बताया कि अवैध बांग्लादेशी अप्रवासियों का भारत में आना काफी हद तक कम हो गया है। लेकिन मीडिया में इस मुद्दे को लेकर काफी हाइप बनाया जा रहा है, जो भारत-बांग्लादेश रिश्तों को और खराब कर रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मीडिया की यह बेवजह का तूल देना दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की प्रक्रिया को फिर से बहालकरने में बाधा डाल रहा है।

1971 युद्ध में भारत की भूमिका

मीटिंग में बीजेपी सांसद किरण चौधरी ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भारत की भूमिका को याद किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता, ब्रिगेडियर आत्मा सिंह, जो 17 कुमाऊं रेजिमेंट का हिस्सा थे, उन्होंने इस युद्ध में बहादुरी दिखाई थी और उन्हें गोलियां भी लगी थीं। उनकी रेजिमेंट को “फांउडिंग फादर” का दर्जा मिला और उनकी यूनिट को बैटल ऑनर्स से नवाजा गया।

क्या हो सकता है समाधान?

कमिटी की मीटिंग में कुछ सांसदों ने सुझाव दिए कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) को पुनर्जीवित करके चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सकता है। इसके अलावा, लोगों से जुड़ाव बढ़ाने के लिए पत्रकारों के एक्सचेंज का सुझाव भी सामने आया।

एक और अहम मुद्दा गंगा जल बंटवारे की संधि है, जो 2026 में खत्म हो रही है। दोनों देश अगले कुछ महीनों में इस संधि को नवीकरण करने के लिए मीटिंग करेंगे। विशेषज्ञों ने गंगा और तीस्ता नदियों के लिए डाटा शेयरिंग की अहमियत पर भी जोर दिया, क्योंकि यह दोनों देशों के लिए भू-रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से जरूरी है।

बांग्लादेश में चीन ने शुरू किए कई सॉफ्ट पावर प्रोजेक्ट्स

बैठक में यह भी बताया गया कि बांग्लादेश में चीन इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी, सैन्य उपकरण और शिक्षा संस्थानों के जरिए अपना नेटवर्क बना रहा है। चीन ने ढाका में अपने दूतावास के माध्यम से कई सॉफ्ट पावर प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं, जिनमें चीनी भाषा केंद्र, छात्रवृत्ति योजनाएं और डिजिटल तकनीक की साझेदारी शामिल है।

पाकिस्तान की उपस्थिति चीन के मुकाबले कम है, लेकिन वह धार्मिक संगठनों और कट्टरपंथी तत्वों के माध्यम से अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों ने यह भी संकेत दिया कि कुछ चरमपंथी संगठनों को पाकिस्तान की शह मिल रही है, जिससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

क्या है मौजूदा स्थिति?

फिलहाल, भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक तनाव बना हुआ है। भारत की कोशिश है कि वह बांग्लादेश के साथ अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बनाए रखे, लेकिन चीन और पाकिस्तान का बढ़ता दखल इस रास्ते में चुनौती बनता जा रहा है। यूनुस सरकार के रुख और बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति ने भी इस मुद्दे को और जटिल बना दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है, भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति के तहत बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है। शेख हसीना के समय भारत-बांग्लादेश के संबंधों में अभूतपूर्व प्रगति हुई थी। उस दौरान सीमा विवाद, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, सुरक्षा सहयोग और जल संसाधनों पर समझौते हुए थे। लेकिन मौजूदा राजनीतिक अनिश्चितता और चीन-पाकिस्तान के बढ़ते दखल ने इस समीकरण को जटिल और अस्थिर बना दिया है।

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बैठक में शामिल विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि अगर भारत इस बदलती स्थिति में मौन रहता है या केवल “रिएक्टिव” की भूमिका निभाता है, तो आने वाले सालों में बांग्लादेश भारत के लिए एक रणनीतिक सिरदर्द बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि भारत को अपनी विदेश नीति में लचीलापन लाना होगा। बांग्लादेश के साथ आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सार्क जैसी क्षेत्रीय पहलों से भारत को मजबूत बनाकर इस स्थिति को संतुलित किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए दोनों देशों के बीच खुली बातचीत और आपसी विश्वास की जरूरत है।

India-China Border Dispute: क्यों आज तक असली सीमा में नहीं बदल पाई LAC? 200 साल पुराने नक्शों ने क्यों उलझाया मामला?

India-China Border Dispute: Why Has the LAC Still Not Become a Real Border?
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India-China Border Dispute: चीन के किंगदाओ में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के रक्षामंत्रियों की बैठक के दौरान भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन से मुलाकात की। उन्होंने चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन से मुलाकात में यह साफ संदेश दिया कि भारत-चीन सीमा विवाद का अब “स्थायी समाधान” होना चाहिए। उन्होंने बॉर्डर डिमार्केशन यानी वास्तविक और परिभाषित सीमा रेखा तय करने की जरूरत पर जोर दिया। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक ऐसा मसला है, जो न सिर्फ दोनों देशों की विदेश नीति को प्रभावित करता है, बल्कि दक्षिण एशिया की शांति और स्थिरता पर भी गहरा असर डालता है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब सीमा रेखा को स्थायी रूप से निर्धारित करने की बात हुई है। लेकिन इसकी जड़ें 200 साल पुराने ब्रिटिश नक्शों और “ग्रेट गेम” की कूटनीतिक चालों में छिपी हैं, जो आज भी भारत और चीन के बीच गहरी खाई का कारण बनी हुई हैं।

ब्रिटिश राज और ग्रेट गेम का हिस्सा

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की शुरुआत 19वीं सदी में ब्रिटिश राज से जुड़ी है। उस समय, ब्रिटेन और रूस के बीच “ग्रेट गेम” (1813-1907) चल रहा था। यह एक तरह की भूराजनीतिक शतरंज थी, जिसमें ब्रिटेन और रूस मध्य एशिया में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। रूस के दबाव के जवाब में ब्रिटिश विदेश नीति बार-बार बदलती रहती थी। इस दौरान, ब्रिटिश हुकूमत ने कई बार भारत-तिब्बत सीमा को निर्धारित करने की कोशिश की, लेकिन हर बार असफल रही।

1834 में, जम्मू की डोगरा सेना ने जनरल जोरावर सिंह के नेतृत्व में लद्दाख पर कब्जा किया। इसके बाद, चीन के किंग साम्राज्य ने लद्दाख पर हमला किया, लेकिन हार गई। 1842 में चुशुल की संधि हुई, जिसने कुछ समय के लिए शांति स्थापित की। लेकिन 19वीं सदी के मध्य में, पहले एंग्लो-सिख युद्ध के बाद ब्रिटिश ने जम्मू और कश्मीर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद, ब्रिटिश ने 1846, 1865, 1873, 1899 और 1914 में सीमा निर्धारित करने के लिए पांच बार प्रस्ताव रखे। हर बार चीन ने इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया।

1847 में, ब्रिटिश अधिकारी मेजर अलेक्जेंडर कनिंघम सीमा निर्धारण की कोशिश की थी। उन्होंने ने अपनी किताब लद्दाख: फिजिकल, स्टैटिस्टिकल एंड जियोग्राफिकल (1854) में लिखा, “लद्दाख और तिब्बत के बीच सीमा का निर्धारण बहुत महत्वपूर्ण था।” लेकिन यह काम कभी पूरा नहीं हुआ। ब्रिटिश और रूस के बीच भू-राजनीतिक खेल में कश्मीर, शिनजियांग और अफगानिस्तान को बफर जोन बनाया गया। लद्दाख और उसका उत्तर-पूर्वी हिस्सा, जिसे अक्साई चिन कहते हैं, भी ऐसा ही एक बफर जोन था।

आजादी के बाद बढ़ीं मुश्किलें

1947 में भारत की आजादी और 1949 में चीन के तिब्बत पर कब्जा करने के बाद यह मसला और पेचीदा हो गया। दोनों देशों के बीच कोई स्पष्ट सीमा रेखा नहीं थी। इसकी जगह, 3,448 किलोमीटर लंबी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) बनाई गई, जो हिमालय की रिजलाइन के साथ पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली है। यह एलएसी एक तरह से दोनों देशों के बीच सीमा की तरह काम करती है। लेकिन इसमें कई जगहों पर दोनों देशों के अपने-अपने दाावे हैं। जिसके कारण विवाद बना रहता है। दोनों देशों की सेनाएं इस एलएसी पर स्टेटस को (यथास्थिति) बनाए रखने की कोशिश करती हैं, लेकिन फिर भी तनाव बना रहता है।

1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ, जिसमें भारत को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी कई बार सैन्य टकराव हुए। 1986 में सुमद्रोंग चू, 2013 में देपसांग, 2014 में चुमुर, 2017 में डोकलाम और 2020 में पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी में हिंसक झड़पें हुईं। इन टकरावों ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ाने का काम किया।

पहले भी हुई हैं बातचीत की कोशिशें

सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिशें नई नहीं हैं। ब्रिटिश काल में 1846 से 1914 तक कई बार ऐसी कोशिशें हुईं, लेकिन चीन ने हर बार मना कर दिया। आजादी के बाद भी कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।

1960 में, चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री झोउ एनलाई भारत आए और एक “जहां है जैसा है” (as is where is) के आधार पर सीमा समझौते का प्रस्ताव रखा। इसका मतलब था कि चीन अरुणाचल प्रदेश पर भारत के नियंत्रण को मानेगा, बशर्ते भारत अक्साई चिन को छोड़ दे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और चीन से अक्साई चिन खाली करने को कहा।

1959 में, सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने भी माओ जेदोंग और झोउ एनलाई से भारत के साथ विवाद सुलझाने की सलाह दी थी। लेकिन यह सलाह भी बेकार गई।

1979 में, जब अटल बिहारी वाजपेयी जो उस समय मोरारजी देसाई सरकार में विदेश मंत्री थे, चीन गए, तो डेंग शियाओपिंग ने फिर से इस “पैकेज डील” की बात उठाई। लेकिन कुछ महीनों बाद भारत में सरकार गिर गई। 1988 में, डेंग ने राजीव गांधी से इस डील की बात दोहराई, लेकिन भारत ने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद दोनों देशों ने एक जॉइंट वर्किंग ग्रुप (JWG) बनाया, जिसका मकसद सीमा मसले को सुलझाना था।

मैप्स और कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स

1996 में, भारत और चीन ने अपनी-अपनी सीमा की परसेप्शन के आधार पर नक्शों की अदला-बदली करने का फैसला किया। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के लिए मैप्स का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के लिए चीन इस वायदा से पीछे हट गया।

2003 में जॉइंट वर्किंग ग्रुप की जगह स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स (SRs) मैकेनिज्म बनाया गया। पिछले साल अक्टूबर में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने लद्दाख में सैन्य टकराव खत्म करने का फैसला किया और स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स को एक “निष्पक्ष, उचित और दोनों पक्षों को स्वीकार्य” समाधान खोजने का निर्देश दिया।

2005 में, LAC पर कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स (CBMs) लागू करने पर सहमति बनी। इसमें सैनिकों को आत्मसंयम बरतने और आमने-सामने की स्थिति में टकराव रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा गया। यह भी तय हुआ कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे। लेकिन 15-16 जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में इन नियमों का उल्लंघन हुआ।

लद्दाख के यूटी स्टेटस का चीन ने किया विरोध

2019 में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाकर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फैसला किया, तो चीन ने इसका विरोध किया। तब चीन ने इसका विरोध किया और कहा कि यह “बॉर्डर की स्थिति बदलने” जैसा है। उसने दावा किया कि इससे सीमा का स्टेट्स बदल गया है। जबकि भारत ने साफ किया कि यह उसका आंतरिक मामला है और एलएसी पर कोई बदलाव नहीं किया गया। लेकिन हकीकत यह है कि एलएसी पर कोई स्पष्ट सीमा है ही नहीं, जिसके आधार पर ऐसा दावा किया जा सके।

आज क्या हैं हालात

आज भारत और चीन के बीच एलएसी पर तनाव बना हुआ है। दोनों देशों की सेनाएं अपनी-अपनी पोजीशन्स पर तैनात हैं, और समय-समय पर छोटे-मोटे टकराव की खबरें आती रहती हैं। राजनाथ सिंह ने किंगदाओ में चीन के रक्षा मंत्री से मुलाक़ात के दौरान यही मुद्दा दोहराया, “अब समय आ गया है कि सीमा निर्धारण को लेकर एक स्पष्ट, स्थायी और पारदर्शी व्यवस्था हो।” राजनाथ सिंह का “स्थायी समाधान” का सुझाव एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इतिहास बताता है कि इस मसले का हल इतना आसान नहीं है। इसके लिए दोनों देशों को न केवल अपने वर्तमान हितों को संतुलित करना होगा, बल्कि ऐतिहासिक और भौगोलिक जटिलताओं पर गौर करना होगा।

SCO Summit: चीन से बातचीत में राजनाथ सिंह ने सुनाई खरी-खरी, कहा- “सीमा विवाद का स्थायी हल जरूरी”, सुझाया ये चार-सूत्रीय प्लान

यह विवाद न केवल भारत और चीन के रिश्तों को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इसका असर पड़ता है। एळएसी पर शांति बनाए रखना दोनों देशों के लिए जरूरी है, क्योंकि यह न सिर्फ उनकी सुरक्षा, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।

Sukhoi 30MKI Upgrade: भारत के सुखोई जेट्स को मिलेगा मॉडर्न अपग्रेड, 2027 तक मिलेंगे बाकी S-400 एयर डिफेंस सिस्टम

Sukhoi 30MKI Upgrade: India’s Jets to Get Modern Boost, S-400 Deliveries by 2027
Image Source: Rajnath Singh X Account

Sukhoi 30MKI Upgrade: भारत अपने सुखोई-30 एमकेआई (Sukhoi-30 MKI) फाइटर जेट्स की पूरी फ्लीट को बड़े पैमाने पर अपग्रेड करने की तैयारी में है। इस अपग्रेड में मॉडर्न एवियोनिक्स, लेटेस्ट रडार और 78 फीसदी स्वदेशी कंटेंट शामिल होगा। इस अपग्रेड पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रूस के रक्षा मंत्री आंद्रे बेलोउसॉव (Andrey Belousov) के बीच शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक के दौरान अहम चर्चा हुई। यह बैठक चीन के चिंगदाओ शहर में SCO डिफेंस मिनिस्टर्स मीटिंग के मौके पर हुई, जहां दोनों नेताओं ने इंडो-रशियन डिफेंस कोऑपरेशन, क्रॉस-बॉर्डर टेररिज़्म और भू-राजनीतिक हालातों पर गहन चर्चा की।

Sukhoi 30MKI Upgrade: वायुसेना के पास 260 सुखोई-30

भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) के पास इस समय करीब 260 सुखोई-30 एमकेआई जेट्स हैं, जो देश की वायुसेना की रीढ़ हैं। इन जेट्स ने हाल ही में 10 मई को ऑपरेशन सिंदूर (में अहम भूमिका निभाई थी, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइल के एयर-लॉन्च वर्जन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के कई एयर बेसों पर सटीक हमला किया गया था। इसके बाद यह साफ हो गया कि भारत को अब अपने एयरप्लेटफॉर्म्स को अपग्रेड करना होगा, ताकि वे भविष्य के युद्धों में नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक डॉमिनेशन के लिए पूरी तरह सक्षम हो सकें।

राजनाथ-बेलौसोव की मुलाकात: क्या रही चर्चा?

रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार सुबह एक बयान में बताया कि दोनों मंत्रियों ने वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति (geopolitical situations), सीमा पार आतंकवाद (cross-border terrorism) और भारत-रूस रक्षा सहयोग (Indo-Russian defence cooperation) जैसे कई मुद्दों पर विस्तार से बात की। यह मुलाकात ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा जरूरतों को बढ़ाने और रक्षा उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

मंत्रालय ने बताया, “चर्चा में एयर डिफेंस सिस्टम, एयर-टू-एयर मिसाइल्स, मॉडर्न टेक्नोलॉजी, और हवाई प्लेटफॉर्म्स के अपग्रेड जैसे महत्वपूर्ण बिंदु शामिल थे। इसके अलावा, एस-400 सिस्टम की सप्लाई, सुखोई-30 एमकेआई के अपग्रेड और जरूरी सैन्य हार्डवेयर की जल्द खरीद पर भी बात हुई।”

Sukhoi 30MKI Upgrade में क्या होगा खास?

सुखोई-30 एमकेआई भारत की वायुसेना का रीढ़ माना जाता है। इस अपग्रेड प्रोग्राम के तहत इन जेट्स को कई मॉडर्न फीचर्स से लैस किया जाएगा। रूस ने चार महीने पहले, फरवरी में, अपने लेटेस्ट स्टील्थ फाइटर जेट सुखोई-57 (Sukhoi-57) में इस्तेमाल होने वाला इंजन (AL-41) सुखोई-30 एमकेआई के लिए ऑफर किया था। अभी तक Sukhoi-30MKI में AL-31F इंजन लगा है, जो कम थ्रस्ट देता है। AL-41 इंजन ज्यादा फ्यूल एफिशिएंट, कम मेंटेनेंस वाला और ज्यादा पावरफुल है। रूस का प्रस्ताव है कि पुराने इंजन को AL-41 से रिप्लेस किया जाए, जो जेट की परफॉर्मेंस को कई गुना बेहतर करेगा। अगर यह बदलाव होता है, तो भारतीय सुखोई विमानों की फाइटिंग क्षमता और सुपरसोनिक परफॉर्मेंस काफी बेहतर हो जाएगी।

इससे पहले सुखोई-57 की परफॉर्मेंस को भारत ने फरवरी में बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया (Aero India) शो में देखा था, जहां इस जेट ने अपनी क्षमताओं का शानदार प्रदर्शन किया। इसने भारत के रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान खींचा और अपग्रेड प्रोग्राम में इसकी टेक्नोलॉजी को शामिल करने की चर्चा तेज हुई। हालांकि भारत अभी तक AMCA प्रोजेक्ट के तहत अपने स्वदेशी फिफ्थ जनरेशन फाइटर पर काम कर रहा है, लेकिन Sukhoi-30 के अपग्रेड में Sukhoi-57 की तकनीक को शामिल करने का विचार रणनीतिक रूप से अहम है।

इस अपग्रेड में भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियर्स की भी बड़ी भूमिका होगी। डीआरडीओ (DRDO) के बनाए उत्तम एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (Uttam AESA) रडार को इन जेट्स में लगाया जाएगा। यह रडार दुश्मन के टारगेट को डिटेक्ट करने और ट्रैक करने की क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा, जेट्स में फुल डिजिटल ग्लास कॉकपिट (glass cockpit) होगा, जिसमें बड़े टचस्क्रीन डिस्प्ले होंगे। ये पायलट को बेहतर सिचुएशनल अवेयरनेस (situational awareness) देंगे। साथ ही, एक नया मिशन कंप्यूटर भी लगाया जाएगा, जो अपग्रेडेड एवियोनिक्स के लिए जरूरी प्रोसेसिंग पावर को हैंडल करेगा।

स्वदेशीकरण पर जोर

इस अपग्रेड प्रोजेक्ट में भारत का फोकस 78 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट पर है। इसका मतलब है कि जेट्स में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर पार्ट्स भारत में ही बनाए जाएंगे। इससे न सिर्फ विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी बूस्ट मिलेगा। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), जो भारत में सुखोई-30 एमकेआई का लाइसेंस के तहत प्रोडक्शन करता है, इस अपग्रेड प्रोजेक्ट के लिए वर्क-शेयर कॉन्ट्रैक्ट साइन करने जा रहा है। HAL के इंजीनियर्स और टेक्नीशियन्स इस प्रोजेक्ट में अहम भूमिका निभाएंगे। एचएएल अब रूस के साथ वर्क-शेयर एग्रीमेंट पर साइन करेगा, जिसमें भारत में बने उपकरणों को रूसी तकनीक के साथ इंटीग्रेट किया जाएगा।

इसके अलावा भारत और रूस के रक्षा मंत्रियों की बैठक में दोनों देशों के बीच क्रिटिकल मिलिट्री हार्डवेयर की सप्लाई और सहयोग को लेकर भी सहमति बनी है। इस समझौते के तहत कई अत्याधुनिक रक्षा उपकरण भारत को मिलेंगे, जो देश की सैन्य शक्ति को और मजबूती देंगे। रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में स्पष्ट किया गया कि S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा, एयर-टू-एयर मिसाइलों की सप्लाई पर भी रूस ने सहमति जताई है, जो भारतीय वायुसेना की ताकत को कई गुना बढ़ाएंगी।

बाकी बचे S-400 की डिलीवरी जल्द

रूस ने भारत को भरोसा दिलाया है कि 2027 तक बचे हुए एस-400 (S-400) ट्रायम्फ सर्फेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम्स की डिलीवरी पूरी हो जाएगी। 2018 में 40,000 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट के तहत भारत ने पांच एस-400 स्क्वॉड्रन खरीदने का फैसला किया था। अब तक दो स्क्वॉड्रन डिलीवर हो चुके हैं, और बाकी तीन 2027 तक मिलने की उम्मीद है। हर स्क्वॉड्रन में दो मिसाइल बैटरी होती हैं, जो 120 से 380 किलोमीटर की रेंज में दुश्मन के जेट्स, मिसाइल्स और ड्रोन्स को नष्ट कर सकती हैं।

एस-400 सिस्टम भारत की वायुसेना के लिए गेमचेंजर साबित हो रहा है, खासकर सीमा पर बढ़ते खतरे को देखते हुए। हाल ही में पांचवें स्क्वॉड्रन की डिलीवरी की प्रगति पर भी बात हुई। पीएम मोदी ने पिछले साल इस सिस्टम का जायजा लिया था, जो भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूत कर रहा है। यह सौदा स्वदेशी डीआरडीओ प्रोजेक्ट के साथ भी मेल खाता है, जो 350 किलोमीटर रेंज की मिसाइलें विकसित कर रहा है।

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भारत-रूस के मजबूत रिश्ते

रूसी रक्षा मंत्री बेलौसोव ने राजनाथ सिंह के साथ मुलाकात में भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे मजबूत रिश्तों की बात की। उन्होंने कहा कि ये रिश्ते समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। उन्होंने 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निंदा की और भारत के साथ एकजुटता जताई। इस हमले को उन्होंने “कायरतापूर्ण और भयानक” करार दिया।

Indian Navy Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय नौसेना के वार से बाल-बाल बचा था पाकिस्तान! नेवी को मिला था ये बड़ा टारगेट

Indian Navy Operation Sindoor: Pakistan Narrowly Escaped Targeted Strikes
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Indian Navy Operation Sindoor: भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब वायुसेना और थलसेना ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए, उस वक्त नौसेना भी पूरी तरह हमले के लिए तैयार थी। भारतीय नौसेना को बाकायदा टारगेट पैकेज सौंपे गए थे, यानी पाकिस्तान के अंदर किन-किन जगहों पर हमला करना है, ये पहले ही तय कर दिया गया था। हालांकि आखिरी समय में आदेश नहीं दिया गया और नौसेना ने फायर नहीं किया।

Indian Navy Operation Sindoor: कौन-कौन से टारगेट थे निशाने पर?

सूत्रों के मुताबिक, “नौसेना आखिरी क्षणों में पहचाने गए टारगेट्स पर हमला करने से रुक गई। इनमें कराची बंदरगाह पर पाकिस्तानी नौसेना के जहाज, सबमरीन्स और जमीन पर मौजूद टारगेट्स शामिल थे।” सूत्रों ने बताया, भारतीय नौसेना को जो टारगेट सौंपे गए थे, उनमें कराची बंदरगाह में खड़े पाकिस्तानी नेवी के जंगी जहाज और सबमरीन, साथ ही कुछ लैंड-बेस्ड टारगेट्स (ज़मीनी सैन्य ठिकाने) शामिल थे। इन पर हमलों के लिए BrahMos मिसाइलों और Kilo-class सबमरीन से दागी जाने वाली Klub-सीरीज़ की लैंड अटैक क्रूज़ मिसाइलें इस्तेमाल होनी थीं। भारतीय नौसेना के जंगी जहाज और सबमरीन, दोनों ही हमले के लिए अपनी पोजीशन में थे और किसी भी समय एंटी-शिप और लैंड अटैक मिसाइलें फायर कर सकते थे।

अगर ऑल-आउट नेवल अटैक होता तो क्या होता?

अगर ये आदेश दे दिया जाता तो भारतीय नौसेना का ये हमला युद्ध स्तर पर गिना जाता। यह सिर्फ एक सर्जिकल ऑपरेशन नहीं बल्कि एक पूर्ण सैन्य प्रतिक्रिया होती, जिससे भारत-पाकिस्तान के बीच मिलिट्री एस्केलेशन (सैन्य तनाव में तेजी) और बढ़ सकती थी।

वहीं, अगर ये हमले होते तो पाकिस्तानी नेवी के कई जहाज वहीं पोर्ट में डूब सकते थे, क्योंकि वो बाहर ऑपरेशनल पेट्रोलिंग पर नहीं थे। पाकिस्तान की नौसेना के फ्रिगेट्स और कोर्वेट्स जैसे फ्रंटलाइन जंगी जहाज पूरे संघर्ष के दौरान हार्बर के अंदर ही “बंद” पड़े रहे।

भारतीय नौसेना की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने उत्तरी अरब सागर में पूरी तरह से दबदबा बनाए रखा। INS विक्रांत कैरियर बैटल ग्रुप और उसमें मौजूद मिग-29K फाइटर जेट्स ने पाकिस्तान के दक्षिणी तट के हवाई क्षेत्र पर कब्जा जमाए रखा। सूत्रों ने बताया, “कैरियर बैटल ग्रुप की मौजूदगी ने पाकिस्तानी एयर असेट्स पर दबाव बनाए रखा, जिसके चलते समुद्र के ऊपर उनकी मौजूदगी लगभग न के बराबर थी।”

पाकिस्तानी सी ईगल को खदेड़ा गया

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव खत्म होने के कुछ दिन बाद, पाकिस्तानी नौसेना का एक RAS-72 सी ईगल, जो ATR-72 टर्बो-प्रॉप विमान का मैरीटाइम पैट्रोल वर्जन है, उसे INS विक्रांत बैटल ग्रुप ने ट्रैक किया था। सूत्रों ने बताया, “पाकिस्तान का यह अकेला सर्विलांस विमान जब समुद्र में निकला, तो उसे मिग-29K ने तुरंत ट्रैक किया और कुछ सौ मीटर की दूरी तक पहुंचकर उसे तट की ओर वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया।” INS विक्रांत से उड़ान भरने वाले भारतीय नौसेना के मिग-29K ने पाकिस्तानी विमान के इतने करीब पहुंचकर उसे पीछे हटने पर मजबूर किया।

Pakistan TTK Conspiracy: जम्मू-कश्मीर में इस आतंकी संगठन के जरिए हमले की योजना बना रहा पाकिस्तान, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी टला नहीं है खतरा!

ऑपरेशन सिंदूर 6-7 मई 2025 को भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा किए गए हवाई और मिसाइल हमलों की एक सीरीज थी, जिसमें पाकिस्तान के कम से कम नौ आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया। यह हमला 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब था, जिसमें 26 नागरिक मारे गए थे। सूत्रों के अनुसार, भारतीय नौसेना ने भले ही समुद्र से सीधे हमला नहीं किया, लेकिन जमीन से लॉन्च किए गए नौसेना के हथियार सिस्टम्स का इस्तेमाल करके पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों और अन्य टारगेट्स को निशाना बनाया गया। हालांकि, इन हथियार सिस्टम्स की डिटेल्स सार्वजनिक नहीं की गईं।

SCO Summit: चीन से बातचीत में राजनाथ सिंह ने सुनाई खरी-खरी, कहा- “सीमा विवाद का स्थायी हल जरूरी”, सुझाया ये चार-सूत्रीय प्लान

SCO Summit: Rajnath Tells China – Permanent Border Solution Needed, Offers 4-Point Plan
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SCO Summit: भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन के बीच शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान एक अहम बातचीत हुई। इस मुलाकात में भारत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारत-चीन सीमा पर सीमा निर्धारण को लेकर अब कोई अस्थायी समाधान नहीं चलेगा। उन्होंने सीमा निर्धारण के लिए एक ठोस और स्थायी समाधान की जरूरत पर जोर दिया। दोनों देशों के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर तनाव कम करने और सैनिकों की वापसी (de-escalation) के लिए एक रोडमैप तैयार करने की बात भी कही।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, दोनों मंत्रियों ने भारत-चीन सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने की जरूरत पर गहन चर्चा की। राजनाथ सिंह ने एलएसी पर जटिल मुद्दों को सुलझाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि दोनों देशों को एक रोडमैप तैयार करना चाहिए, जो स्थायी समाधान और तनाव कम करने की दिशा में काम करे। उन्होंने अप्रैल 2020 में पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर शुरू हुए सैन्य गतिरोध का जिक्र करते हुए कहा कि 2020 के बाद पैदा हुए विश्वास की कमी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

बता दें कि यह मीटिंग उस समय हुई है जब भारत और चीन के बीच मई 2020 से पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य तनाव बना हुआ है। हालांकि 2024 में कुछ स्तर पर डी-एस्क्लेशन पर बातचीत हुई थी, औऱ जिसके बाद तनाव में कमी आई थी। लेकिन अब भी कई संवेदनशील क्षेत्रों में सैनिकों की भारी तैनाती है।

SCO Summit: क्या है भारत का चार-सूत्रीय प्लान?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत-चीन सीमा तनाव को कम करने और द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक चार सूत्रीय योजना भी पेश की। इस योजना का उद्देश्य एलएसी पर शांति स्थापित करना और लंबे समय से चले आ रहे विवादों का स्थायी समाधान निकालना है।

2024 डिसएंगेजमेंट प्लान का पालन: 2024 के डिसएंगेजमेंट प्लान को पूरी तरह लागू करना। यह समझौता पूर्वी लद्दाख में डेपसांग और डेमचोक जैसे क्षेत्रों में सैन्य वापसी को सुनिश्चित करता है। दोनों देशों को इस प्लान का सख्ती से पालन करना होगा ताकि तनाव कम हो और विश्वास बहाली हो।

तनाव कम करने के निरंतर प्रयास: एलएसी पर सैन्य तनाव को कम करने के लिए लगातार प्रयास। इसमें सैनिकों की तैनाती को कम करना, गश्ती गतिविधियों में समन्वय और संवाद को बढ़ाना शामिल है ताकि टकराव की स्थिति न बने।

सीमा निर्धारण और परिसीमन में तेजी: सीमा निर्धारण और परिसीमन (demarcation and delimitation) में तेजी लाना। लंबे समय से लंबित सीमा विवाद को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाने और समयबद्ध तरीके से प्रक्रिया को पूरा करने की जरूरत है।

विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत: मौजूदा तंत्र के जरिए मतभेदों को प्रबंधित करने और रिश्तों को बेहतर करने के लिए नई प्रक्रियाएं विकसित करना। यह तंत्र आपसी संवाद को बढ़ावा देगा और जटिल मुद्दों का समाधान निकालने में मदद करेगा। यह योजना भारत-चीन संबंधों में स्थिरता और विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इसके अलावा, राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि हाल ही में शुरू किया गया भारत का ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के खिलाफ भारत की सैद्धांतिक स्थिति को दर्शाता है। 22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र करते हुए, जिसमें 26 लोग मारे गए थे, राजनाथ सिंह ने इसकी कड़ी निंदा की और कहा कि भारत आतंकवादी नेटवर्क को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जताई खुशी

मुलाकात के दौरान राजनाथ सिंह ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के लगभग छह साल बाद फिर से शुरू होने पर खुशी जताई। उन्होंने इसे दोनों देशों के बीच सकारात्मक कदम बताया। रक्षा मंत्री ने अपने चीनी समकक्ष को बिहार की मधुबनी पेंटिंग भेंट की, जो मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक कला है और अपनी रंगीन रेखाओं और पैटर्न के लिए जानी जाती है।

SCO दस्तावेज पर भारत का रुख

बैठक से पहले, राजनाथ सिंह ने SCO दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि इसमें आतंकवाद के मुद्दे को कमजोर किया गया था और पहलगाम हमले का जिक्र नहीं था। सूत्रों के अनुसार, चीन, जो SCO की अध्यक्षता कर रहा है, और उसका करीबी सहयोगी पाकिस्तान, इस दस्तावेज में आतंकवाद के मुद्दे को हल्का करने की कोशिश कर रहे थे। इसके बजाय, दस्तावेज में बलूचिस्तान में हुए हमलों और जाफर एक्सप्रेस हाईजैकिंग का उल्लेख किया गया था, जिसे भारत के खिलाफ एक राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा गया। भारत ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए दस्तावेज पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। जिसके बाद एससीओ का साझा बयान जारी नहीं हो सका।

सकारात्मक दिशा में बढ़ते रिश्ते

राजनाथ सिंह ने ट्वीट कर कहा, “चिंगदाओ में एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन के साथ बातचीत की। हमने द्विपक्षीय रिश्तों से जुड़े मुद्दों पर रचनात्मक और दूरदर्शी विचारों का आदान-प्रदान किया। कैलाश मानसरोवर यात्रा के छह साल बाद फिर से शुरू होने पर खुशी जताई। दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि इस सकारात्मक गति को बनाए रखा जाए और द्विपक्षीय रिश्तों में नई जटिलताएं न जोड़ी जाएं।”

चीन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत बीजिंग के साथ किसी भी टकराव की तलाश में नहीं है और आपसी विश्वास और संवाद को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, भारत की ओर से इस मुलाकात पर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

2024 में हुए डिसएंगेजमेंट समझौते के बाद पहली बैठक

यह मुलाकात भारत और चीन के बीच 2024 में हुए डिसएंगेजमेंट समझौते के बाद पहली उच्च-स्तरीय बैठक थी। मई 2020 में शुरू हुए पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था। पिछले साल अक्टूबर में रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्तों में सुधार देखा गया है। पीएम मोदी ने तब कहा था, “भारत-चीन रिश्ता न केवल हमारे लोगों के लिए बल्कि वैश्विक शांति, स्थिरता और प्रगति के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है।”

हाल ही में डेपसांग और डेमचोक में डिसएंगेजमेंट समझौता होने के बाद दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई है। इस मुलाकात को दोनों देशों के बीच नए सिरे से शुरू हुए राजनयिक रिश्तों को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

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रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार, दोनों मंत्रियों ने डिसएंगेजमेंट, तनाव कम करने, सीमा प्रबंधन और अंततः सीमा निर्धारण से जुड़े मुद्दों पर प्रगति के लिए विभिन्न स्तरों पर परामर्श जारी रखने पर सहमति जताई। राजनाथ सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों को अच्छे पड़ोसी जैसे हालात बनाने चाहिए, ताकि आपसी लाभ के साथ-साथ एशिया और विश्व में स्थिरता के लिए सहयोग किया जा सके।

Galwan 5 Years: गलवान के वीरों को भारतीय सेना ने कुछ इस तरह दी श्रद्धांजलि, देपसांग प्लेंस में किया माउंटेनियरिंग एक्सपेडिशन, चीन को ऐसे दिया संदेश!

Galwan 5 Years: Indian Army Pays Tribute with Mountaineering Expedition in Depsang Plains

Galwan 5 Years: इस साल 15-16 जून को गलवान झड़प के पांच साल पूरे हो गए हैं। पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर चीनी हमले को विफल करने के दौरान वहां तैनात 20 भारतीय सैनिकों ने देश की सुरक्षा में सर्वोच्च बलिदान दिया था। वहीं पांच साल पूरे होने पर वहां की सीमा सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली 14 कॉर्प्स यानी फायर एंड फ्यूरी ने गलवान के बहादुरों को अलग अंदाज में श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर वहां तैनात भारतीय सेना ने लद्दाख के दुर्गम माउंट शाही कांगरी और माउंट सिल्वर पीक पर एक यादगार माउंटेनियरिंग एक्सपेडिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया।

Galwan 5 Years: Indian Army Pays Tribute with Mountaineering Expedition in Depsang Plains

Galwan 5 Years: कब और कैसे हुआ ये मिशन शुरू?

यह विशेष पर्वतारोहण अभियान 28 मई 2025 को शुरू हुआ और 18 जून 2025 को समाप्त हुआ। इसे ‘फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स’ के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला ने हरी झंडी दिखाई थी और 18 जून को हुए समापन पर उन्हें ही पर्वतारोहण दल ने ‘एक्सपेडिशन फ्लैग’ और ‘आइस एक्स’ भेंट किए।

इस अभियान में कुल 28 जवान शामिल थे, जिन्हें कठिन बर्फीले और पथरीले इलाकों में एक्सपेडिशन के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया था। इस एक्सपेडिशन से सेना ने ये भी दिखाया कि कैसे हर एक जवान ने शारीरिक, मानसिक और तकनीकी दक्षता की बदौलत एक्सपेडिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया।

एक्सपेडिशन की शुरुआत और मकसद

इस माउंटेनियरिंग एक्सपेडिशन के जरिए जहां भारतीय सेना गलवान के वीरों को अनूठे अंदाज में श्रद्धांजलि देना चाहती थी, तो वहीं लद्दाख के बॉर्डर एरिया में टूरिज्म को बढ़ावा देना भी सेना का उद्देश्य है। इसके लिए भारतीय सेना ने लद्दाख की दो दुर्गम चोटियों माउंट शाही कांगरी (6934 मीटर) और माउंट सिल्वर पीक (6871 मीटर) को चुना। माउंट शाही कांगरी और माउंट सिल्वर पीक लद्दाख की कारोकारोम रेंज में स्थित हैं। जो लद्दाख में देपसांग मैदानों (Depsang Plains) के दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित हैं। प्लेन्स का इलाका पहले से ही लद्दाख का सबसे सख्त इलाका माना जाता है, और यहां का मौसम भी बदलता रहता है। देपसांग ये इलाके साल भर बर्फ से ढके रहते हैं और यहां का मौसम और भौगोलिक स्थिति बेहद कठोर मानी जाती है। इसके बावजूद, सैनिकों ने हिम्मत नहीं हारी और हर मुश्किल को पार किया।

Galwan 5 Years: Indian Army Pays Tribute with Mountaineering Expedition in Depsang Plains
जीओसी फायर एंड फ्यूरी ले. जनरल हितेश भल्ला को फ्लैंग सौंपते टीम के सदस्य।

एक्सपेडिशन टीम ने इन चोटियों की चढ़ाई दक्षिण-पूर्व दिशा से की, जिससे दूरी थोड़ी कम हुई, लेकिन रास्ता अत्यधिक खतरनाक और चुनौतियों से भरा था। इस दौरान टीम को गहरी दरारें (crevasses), बर्फीले टीलों (cornices) और ग्लेशियरों के बीच से होकर गुजरना पड़ा। सेना ने इस एक्सपेडिशन के जरिए अपने जवानों की हिम्मत और हुनर को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की। साथ ही, ये मिशन गलवान संघर्ष में बलिदान देने वाले जवानों को याद करने का एक तरीका भी था।

Galwan 5 Years: Indian Army Pays Tribute with Mountaineering Expedition in Depsang Plains
जवानों से मुलाकात करते जीओसी फायर एंड फ्यूरी लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला।

क्यों है यह अभियान खास?

सेना के सूत्रों बताया कि यह पहली बार है जब माउंट शाही कांगरी और सिल्वर पीक जैसी ऊंची चोटियों को एक साथ फतह करने के लिए ऐसा सैन्य अभियान चलाया गया है। इस एक्सपेडिशन को आर्मी एडवेंचर विंग ने मंजूरी दी थी, क्योंकि ये मिशन सिर्फ चढ़ाई तक सीमित नहीं था। इसका मकसद था सिविल माउंटेनियर्स को भी इन चोटियों पर आने के लिए प्रेरित करना। सेना चाहती है कि भविष्य में सिविलियन भी इन बर्फीले पहाड़ों पर चढ़ाई करें, जिससे लद्दाख में एडवेंचर टूरिज्म को नई उड़ान मिले। ये एक्सपेडिशन 10 दिन से ज्यादा समय तक चला। इस दौरान टीम ने दिन-रात मेहनत की और हर मौसम का सामना किया। बर्फीले तूफान, कम ऑक्सीजन, और ठंडी हवाओं के बावजूद सैनिकों ने हार नहीं मानी। आखिरकार, जब वे चोटियों पर पहुंचे, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। एक्सपेडिशन खत्म होने पर टीम ने फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के जीओसी को एक्सपेडिशन फ्लैग और आइस एक्स सौंपा।

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बता दें कि देपसांग का इलाका रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दौलत बेग ओल्डी (DBO) एयरबेस से करीब 30 किमी दक्षिण-पूर्व में है और चीनी सेना ने पहले यहां भारतीय पेट्रोलिंग को ब्लॉक किया था। 2020 से पहले की स्थिति बहाल होने के बावजूद, यहां तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, क्योंकि LAC की अलग-अलग धारणाएं अभी भी विवाद की वजह हैं। पिछले साल 21 अक्टूबर 2024 को दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत देपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी और पेट्रोलिंग अधिकारों को बहाल करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस समझौते के तहत, 23 अक्टूबर 2024 से सैनिकों ने अस्थायी संरचनाओं को हटाना शुरू किया, और 29-30 अक्टूबर 2024 तक यह प्रक्रिया पूरी हो गई। समझौते के तहत भारतीय सैनिक पेट्रोलिंग पॉइंट्स (PP) 10 से 13 तक जा सकेंगे। दोनों देशों ने पेट्रोलिंग शेड्यूल साझा करने और टकराव से बचने के लिए 14-15 सैनिकों की टीमें तैनात करने का फैसला किया। फिलहाल, दोनों पक्षों के बीच सैन्य और कूटनीतिक बातचीत जारी है।

INS Arnala Commissioning: पाकिस्तानी पनडुब्बियों का ऐसे ‘शिकार’ करेगा INS अर्णाला, जानिए भारतीय नेवी के लिए क्यों है ये खास?

INS Arnala Commissioning: India’s New Submarine Hunter Joins the Indian Navy
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INS Arnala Commissioning: भारतीय नौसेना बुधवार को विशाखापट्टनम डॉकयार्ड में अपने पहले एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) INS अर्णाला (पनडुब्बी रोधी) को कमीशन करने जा रही है। यह ऐतिहासिक कदम पूर्वी नौसेना कमान के तहत उठाया जा रहा है। INS अर्णाला देश का पहला ऐसा युद्धपोत है, जो खास तौर पर तटीय इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों को मार गिराने के लिए बनाया गया है। INS अर्णाला को बुधवार 18 जून को पूर्वी नौसेना कमान के अधीन विशाखापट्टनम के नौसैनिक डॉकयार्ड में नौसेना में शामिल किया जाएगा। इस अवसर पर भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे।

INS Arnala Commissioning: क्यों खास है INS अर्णाला?

नौसेना सूत्रों के मुताबिक, जहां बड़े वारफेयर यूनिट्स जैसे फ्रिगेट्स (Frigates) और डिस्ट्रॉयर (Destroyers) आमतौर पर एंटी-सबमरीन वारफेयर (ASW) क्षमता से लैस होते हैं, लेकिन उनका प्रमुख काम दुश्मन की वायु और सतह से होने वाले हमलों को नष्ट करना होता है। इसके मुकाबले INS अर्णाला जैसे जहाज खास तौर पर डिफेंसिव ऑपरेशंस के लिए बनाए गए हैं। यानी तटीय क्षेत्रों यानी उथले पानी में दुश्मन की पनडुब्बियों को पहचानना, ट्रैक करना और नष्ट करना। इससे बड़े वारफेयर शिप्स को रणनीतिक मिशंस पर ध्यान देने का मौका मिलता है।

INS अर्णाला को ऐसे खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है, जो उथले पानी (50-60 मीटर गहराई) में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगा सकता है। ये पनडुब्बियां टॉरपीडो फायर करने के लिए ऐसी जगहों पर आती हैं। अर्णाला इनका दूर से ही पता लगा सकता है और स्टैंड-ऑफ रेंज से हमला कर सकता है। इससे बड़े युद्धपोतों को खतरा कम होता है।

आकार और ताकत में सबसे आगे

INS अर्णाला 77 मीटर लंबा और 1,490 टन से ज्यादा वजन वाला युद्धपोत है। यह भारतीय नौसेना का सबसे बड़ा ऐसा जहाज है, जो डीजल इंजन और वॉटरजेट प्रोपल्शन सिस्टम से चलता है। यह सिस्टम इसे उथले पानी में तेज रफ्तार और बेहतर मैन्यूवरेबिलिटी देता है। नौसेना के मुताबिक, यह जहाज न सिर्फ पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे मुकाबला करने में माहिर है, बल्कि सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन्स, लो-इंटेंसिटी मैरीटाइम ऑपरेशन्स (LIMO), और माइन-लेइंग जैसे काम भी कर सकता है। माइन-लेइंग की क्षमता इस क्लास के जहाजों में बहुत कम देखने को मिलती है।

हाई-टेक सोनार सिस्टम से लैस

INS अर्णाला में भारत की सीएफएफ फ्लूइड कंट्रोल लिमिटेड और जर्मन कंपनी थायसेनक्रुप की सब्सिडियरी एटलस इलेक्ट्रॉनिक ने मिलकर बनाया वेरिएबल-डेप्थ सोनार सिस्टम (Variable-Depth Sonar System) लगाया गया है। यह सोनार सिस्टम Active और Passive दोनों मोड में काम करता है और शत्रु की पनडुब्बियों को उस रेंज से पहले ही डिटेक्ट कर सकता है, जहां से वे हमला कर सकती हैं। इसका मतलब यह है कि भारतीय नौसेना पहले ही उन्हें ट्रैक कर नष्ट करने में सक्षम होगी।

इसके अलावा, जहाज में 80% से ज्यादा स्वदेशी उपकरण और सिस्टम्स लगे हैं। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), लार्सन एंड टुब्रो (L&T), महिंद्रा डिफेंस, और MEIL जैसी भारतीय कंपनियों ने इसके लिए एडवांस्ड सिस्टम्स बनाए हैं। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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पाकिस्तान की रणनीति को मात

नौसेना के सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के पास सीमित संख्या में आधुनिक सतह युद्धपोत हैं और उनके पास खास एंटी सबमरीन वारफेयर प्लेटफॉर्म्स की भी भारी कमी है। ऐसे में पाकिस्तान अपनी नौसैनिक रणनीति में पनडुब्बियों पर ज्यादा निर्भर रहता है। वहीं, INS अर्णाला का रणनीतिक महत्व खासतौर पर पाकिस्तान के खिलाफ है। INS अर्णाला जैसे जहाजों की तैनाती से भारत के तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा और मजबूत हो जाएगी और दूसरी तरफ बड़े जहाजों को अधिक स्वतंत्रता मिलेगी कि वे आक्रामक या मिशन-बेस्ड कार्यों में जुट सकें।

बनाए जाएंगे 16 जहाज

INS अर्णाला को गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने लार्सन एंड टुब्रो के साथ पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में डिजाइन और बनाया है। यह पहला भारतीय युद्धपोत है, जिसे शिपबिल्डर ने डिजाइन भी किया और बनाया भी। पहले नौसेना डिजाइन देती थी और शिपयार्ड उसे बनाते थे। यह बदलाव भारतीय शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री की बढ़ती क्षमता को दिखाता है।

ASW-SWC क्लास के पहले आठ जहाज GRSE बना रहा है, जबकि बाकी आठ को कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) डिजाइन और डेवलप करेगा। इस क्लास के जहाज पुराने को नौसेना के पुराने अभय-क्लास (Abhay-Class) जहाजों की जगह लेंगे। अभय-क्लास जहाज सोवियत पाउक-क्लास कॉर्वेट्स का कस्टमाइज्ड वर्जन हैं, जो तटीय ASW ऑपरेशंस के लिए इस्तेमाल होते हैं। INS अर्णाला अपने पुराने जहाजों की तुलना में बड़ा, ज्यादा टिकाऊ, और एडवांस्ड कॉम्बैट सिस्टम्स से लैस है।

तटीय सुरक्षा के लिए खास रणनीति

भारतीय नौसेना भविष्य में सभी 16 ASW-SWC जहाजों को देश के 16 प्रमुख बंदरगाहों के पास तैनात करने की योजना बना रही है। इससे तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत एंटी सबमरीन शील्ड तैयार किया जाएगा। INS अर्णाला इस रेंज का पहला जहाज है और दूसरा जहाज इसी साल के अंत तक कमीशन किया जा सकता है।

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कमीशनिंग समारोह

INS अर्णाला के कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान करेंगे। इस मौके पर वरिष्ठ नौसेना अधिकारी, शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री के प्रतिनिधि, और अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहेंगे। यह समारोह भारतीय नौसेना के लिए एक गर्व का पल होगा, क्योंकि यह न केवल एक जहाज का कमीशन है, बल्कि स्वदेशी तकनीक और डिजाइन की जीत भी है।