Home Blog Page 107

Explainer: क्या हैं Luneberg lens, F-35B स्टील्थ जेट में इनका इस्तेमाल क्यों, और क्या है भारत में इमरजेंसी लैंडिंग का पूरा माजरा? जानें

Explainer: What Are Luneberg lens, Why Are They Used in F-35B Stealth Jets, and What’s the Story Behind the Emergency Landing in India?
Photo Source: IAF

Luneberg lens: 14 जून 2025 की रात, जब अरब सागर के ऊपर आसमान में तेज हवाएं चल रही थीं, तब एक ब्रिटिश F-35B स्टील्थ फाइटर जेट को केरल के तिरुवनंतपुरम में इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी। यह जेट यूके की रॉयल नेवी के HMS प्रिंस ऑफ वेल्स कैरियर से उड़ा था, जो अपने स्ट्राइक ग्रुप के साथ इंडो-पैसिफिक मिशन पर था। हालांकि यह आम इमरजेंसी लैंडिंग थी, लेकिन घटना के बाद एक टेक्निकल डिबेट भी छिड़ गई। सोशल मीडिया पर यूजर्स “ल्यूनबर्ग लेंस” की बात करने लगे। आखिर ल्यूनबर्ग लेंस क्या हैं? F-35B जैसे स्टील्थ जेट में इनका यूज क्यों होता है? और भारतीय वायुसेना (IAF) की इस जेट को डिटेक्ट करने की बात इतनी चर्चा में क्यों है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं।

Luneberg lens: क्या है ये टेक्नोलॉजी?

ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) का नाम सुनकर लग सकता है कि जैसे यह कोई साइंस फिक्शन गैजेट है, लेकिन असल में ये एक साधारण सा रडार रिफ्लेक्टर है, जो रडार सिग्नल्स को बढ़ाकर वापस भेजता है। इसे 1944 में जर्मन साइंटिस्ट रुडोल्फ कार्ल ल्यूनबर्ग ने डिजाइन किया था। खासकर एयर डिफेंस सिस्टम की ट्रेनिंग के लिए इसका इस्तेमाल 1950-60 के दशक से हो रहा है।

यह लेंस गोलाकार होता है और इसके एक तरफ मेटल कोटिंग होती है। जब रडार की किरणें इस पर पड़ती हैं, तो ये उन्हें फोकस करके कई गुना ज्यादा ताकत के साथ रिफ्लेक्ट करता है। मिसाल के तौर पर, 44 सेंटीमीटर का एक ल्यूनबर्ग लेंस X-बैंड रडार पर 100 वर्ग मीटर तक का रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) बना सकता है। यानी, एक छोटा सा ड्रोन भी रडार पर B-52 जैसे बड़े बॉम्बर जेट जितना बड़ा दिख सकता है।

F-35B स्टील्थ जेट में क्या है ल्यूनबर्ग लेंस का रोल?

F-35B एक स्टील्थ फाइटर जेट है, जिसका मतलब है कि ये रडार से बचने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) बहुत छोटा होता है, जिससे दुश्मन के रडार इसे आसानी से पकड़ नहीं पाते। लेकिन शांति के समय पीस टाइम या दोस्त देशों के एयरस्पेस में उड़ते वक्त स्टील्थ जेट्स को रडार पर दिखना जरूरी होता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर ये रडार पर न दिखें, तो एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) या फ्रेंडली एयर डिफेंस सिस्टम के लिए प्रॉब्लम हो सकती है। यहीं पर ल्यूनबर्ग लेंस काम आता है।

F-35B के पेट (बेली) पर एक छोटा सा गोल उभार होता है, जिसमें ल्यूनबर्ग लेंस फिट किया जाता है। ये लेंस रडार सिग्नल्स को बढ़ाकर रिफ्लेक्ट करता है, जिससे जेट रडार पर साफ दिखता है। ये खास तौर पर ट्रेनिंग, जॉइंट एक्सरसाइज, या इमरजेंसी सिचुएशन में यूज होता है। इस लेंस को ग्राउंड क्रू आसानी से हटा या लगा सकता है, लेकिन फ्लाइट के दौरान पायलट इसे कंट्रोल नहीं कर सकता।

Explainer: What Are Luneberg lens, Why Are They Used in F-35B Stealth Jets, and What’s the Story Behind the Emergency Landing in India?

14 जून की इमरजेंसी लैंडिंग के दौरान क्या हुआ?

14 जून 2025 को HMS प्रिंस ऑफ वेल्स कैरियर से उड़ा F-35B जेट अरब सागर के ऊपर मिशन पर था। लेकिन खराब मौसम और कम फ्यूल की वजह से पायलट कैरियर पर लैंड नहीं कर सका। ऐसे में उसने डायवर्जन रिक्वेस्ट किया और तिरुवनंतपुरम में लैंडिंग की। भारतीय वायुसेना ने इसे रूटीन प्रोसीजर बताया और कहा कि IAF ने फ्लाइट सेफ्टी के लिए जेट को फुल सपोर्ट दिया। IAF के रडार ने जेट को डिटेक्ट किया, क्लासिफाइड किया, और लैंडिंग के लिए गाइड किया।

17 जून को यूके रॉयल नेवी की टेक्निकल टीम हेलिकॉप्टर से तिरुवनंतपुरम पहुंची। ये टीम जेट के सभी पैरामीटर्स चेक कर रही है ताकि इसे वापस कैरियर पर भेजा जा सके। HMS प्रिंस ऑफ वेल्स अपने स्ट्राइक ग्रुप के साथ इंडो-पैसिफिक में 8 महीने के मिशन पर है, जिसमें F-35B जेट्स, ड्रोन, हेलिकॉप्टर, और न्यूक्लियर अटैक सबमरीन शामिल हैं।

ल्यूनबर्ग लेंस पर शुरू हुई डिबेट?

F-35B की लैंडिंग के बाद सोशल मीडिया और डिफेंस सर्कल्स में “ल्यूनबर्ग आर्ग्यूमेंट” (Luneberg argument) की चर्चा शुरू हुई। कुछ लोगों का कहना है कि IAF का इस जेट को डिटेक्ट करना कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि जेट पर ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) लगा था। इस लेंस की वजह से जेट का रडार क्रॉस-सेक्शन यानी RCS बढ़ गया होगा, जिससे रडार को इसे पकड़ने में आसानी हुई। उनका तर्क है कि ये रूटीन प्रोसीजर था, न कि IAF के Integrated Air Command and Control System (IACCS) रडार की कोई खास काबिलियत।

दूसरी तरफ, कुछ लोग IAF की तारीफ कर रहे हैं। उनका कहना है कि भले ही ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) लगा हो, लेकिन IAF के एयर डिफेंस सिस्टम ने जेट को तुरंत डिटेक्ट, क्लासिफाइड, और सेफ लैंडिंग कराई, जो सिस्टम की रेडीनेस दिखाता है। कुछ एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है कि अगर लेंस नहीं होता, तब भी IAF के VHF रडार शायद जेट को पकड़ लेते, क्योंकि ऐसे रडार स्टील्थ जेट्स के खिलाफ इफेक्टिव माने जाते हैं।

Explainer: What Are Luneberg lens, Why Are They Used in F-35B Stealth Jets, and What’s the Story Behind the Emergency Landing in India?

हालांकि, IAF ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि जेट पर ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) था या नहीं। इसलिए, दोनों ही पक्षों के दावे अभी अनुमानों पर आधारित हैं। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में ये भी दावा किया गया कि जेट इंडियन नेवी और रॉयल नेवी की जॉइंट एक्सरसाइज का हिस्सा था, और लेंस जानबूझकर लगाया गया था। लेकिन इसकी कोई ऑफिशियल कन्फर्मेशन नहीं है।

ल्यूनबर्ग लेंस का दूसरा यूज: डिसेप्शन टैक्टिक्स

ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) का इस्तेमाल केवल सेफ्टी के लिए नहीं होता। युद्ध के समय इसका इस्तेमाल दुश्मन को धोखा देने के लिए भी होता है। मिसाल के तौर पर, रूस अपने लॉन्ग-रेंज ड्रोन्स में ल्यूनबर्ग लेंस यूज करता है। इससे छोटा सा ड्रोन रडार पर बड़ा टारगेट दिखता है, जिससे दुश्मन का ध्यान भटकता है और असली अटैक ड्रोन्स टारगेट तक पहुंच जाते हैं। यूक्रेन भी इस टैक्टिक का इस्तेमाल करता है। उनके ADM-160 MALD ड्रोन्स में ल्यूनबर्ग लेंस लगे होते हैं, जो दुश्मन के मिसाइल्स को अपनी तरफ खींचते हैं, ताकि असली क्रूज मिसाइल्स सेफ रहें।

F-35B जैसे जेट्स में भी ट्रेनिंग के दौरान ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) यूज करके RCS को वैरी किया जाता है। इससे पायलट्स और ग्राउंड क्रू को ये समझने में मदद मिलती है कि अलग-अलग सिचुएशन में रडार जेट को कैसे डिटेक्ट करता है। ये डिसेप्शन टैक्टिक्स का भी हिस्सा है, ताकि दुश्मन को कन्फ्यूज किया जा सके।

भारतीय वायुसेना ने की मदद

वहीं भारतीय वायुसेना ने न सिर्फ जेट की सेफ लैंडिंग कराई, बल्कि यूके की टेक्निकल टीम को फुल सपोर्ट भी दिया। HMS प्रिंस ऑफ वेल्स का इंडो-पैसिफिक मिशन भी भारत के लिए अहम है, क्योंकि दोनों देश इस रीजन में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं।

कुछ डिफेंस एनालिस्ट्स का मानना है कि ये इमरजेंसी लैंडिंग एक तरह से जॉइंट ऑपरेशनल कैपेबिलिटी को टेस्ट करने का मौका भी था। IAF का IACCS (इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम) इस मौके पर एक्टिव रहा, जिसने जेट को ट्रैक और गाइड किया। ये सिस्टम भारत की एयर डिफेंस का रीढ़ है और ऑपरेशन सिंदूर के बाद एख बार फिर इसने अपनी इफिशिएंसी साबित की है।

LCA Mk-1A Tejas: जुलाई-अगस्त में खत्म हो सकता है वायुसेना का 16 महीने का इंतजार! नासिक में बने पहले तेजस की जल्द होगी पहली टेस्ट फ्लाइट

Luneberg lens: सेफ्टी या स्टील्थ का कॉम्प्रोमाइज?

ल्यूनबर्ग लेंस (Luneberg lens) का इस्तेमाल स्टील्थ जेट्स के लिए दोधारी तलवार की तरह होता है। एक तरफ, ये खासकर पीसटाइम में सेफ्टी के लिए जरूरी है, तो दूसरी तरफ, कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर युद्ध के समय गलती से लेंस हटाना भूल जाए, तो जेट का स्टील्थ फायदा कम हो सकता है। हालांकि, F-35B जैसे एडवांस जेट्स में ऐसे रिस्क को मिनिमाइज करने के लिए सख्त प्रोसीजर्स होते हैं।

LCA Mk-1A Tejas: जुलाई-अगस्त में खत्म हो सकता है वायुसेना का 16 महीने का इंतजार! नासिक में बने पहले तेजस की जल्द होगी पहली टेस्ट फ्लाइट

LCA Mk-1A Tejas: Maiden Flight of First Nashik-Built Jet Likely by July-August After 16-Month Delay
Image Source By HAL

LCA Mk-1A Tejas: भारतीय वायुसेना के लिए अच्छी खबर है। पिछले 16 महीनों से जिस तेजस फाइटर जेट की डिलीवरी का इंतजार किया जा रहा है, वह अब खत्म होने वाला है। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की नई नासिक असेंबली लाइन में बना भारत का पहला स्वदेशी लाइट कॉम्बैट फाइटर जेट (LCA) तेजस Mk-1A अपनी पहली उड़ान भड़ने के लिए तैयार है। तेजस Mk-1A की पहली उड़ान जुलाई के मध्य में होने की उम्मीद जताई जा रही है। एचएएल के सूत्रों का कहना है कि जुलाई-अगस्त में ही पहले फाइटर जेट की डिलीवरी भी भारतीय वायुसेना को सौंपी जा सकती है।

इस साल के अंत तक बनेंगे 16 LCA Mk-1A Tejas

एचएएल नासिक में बनी यह नई प्रोडक्शन लाइन तेजी से काम कर रही है और इस साल के अंत तक 16 Mk-1A विमानों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। HAL के बेंगलुरु स्थित प्रोडक्शन सेंटर के साथ मिलकर नासिक यूनिट इस प्रोजेक्ट को रफ्तार दे रही है। अधिकारियों के मुताबिक, नासिक यूनिट की मदद से यह संख्या सालाना 24 जेट तक पहुंच सकती है, जिससे भविष्य में वायु सेना की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। पहली बार Mk-1A फरवरी में उड़ान भरने वाला था, लेकिन तकनीकी वजहों के चलते इसमें देरी हुई। वहीं, अब यह विमान अपनी पहली परीक्षण उड़ान भरने के लिए तैयार है।

एचएल सूत्रों का कहना है, नासिक प्रोडक्शन लाइन से इस साल चार से पांच Mk-1A लड़ाकू विमान तैयार होंगे, और अगले साल से सालाना आठ विमानों का प्रोडक्शन होगा। इसकी प्रमुख वजह अमेरिकी कंपनी GE Aerospace की F404-IN20 इंजनों की समय पर सप्लाई न हो पाने और कुछ जरूरी सर्टिफिकेशन में देरी शामिल है। अधिकारियों के अनुसार, तकनीकी चुनौतियों और सप्लाई चेन में देरी की दिक्कतों ने इस प्रोजेक्ट को प्रभावित किया। हालांकि, अब हालात नियंत्रण में हैं और उत्पादन तेजी से आगे बढ़ रहा है। Mk-1A को वायु सेना के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है, जिसमें आधुनिक हथियार और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ है। यह विमान दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने में सक्षम है।

तेजस है 4.5 पीढ़ी का मल्टी-रोल फाइटर

LCA Mk-1A एक हल्का लड़ाकू विमान (Light Combat Aircraft) है, जिसे HAL ने डेवलप किया है। यह विमान पुराने Mk-1 वर्जन की तुलना में काफी अपग्रेडेड है और इसे 4.5 पीढ़ी का मल्टी-रोल फाइटर माना जाता है। इसमें डिजिटल रडार वार्निंग रिसीवर, जैमर, सेल्फ-प्रोटेक्शन सूट, एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलें, और वियोंड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइल क्षमता है। यह विमान दुश्मन के एय़र डिफेंस को भेदने में सक्षम है और लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है। इसके अलावा, Mk-1A में पायलट के लिए आधुनिक कॉकपिट और सुरक्षा उपकरण भी दिए गए हैं, जो इसे अन्य लड़ाकू विमानों से अलग बनाते हैं।

पहले आएगा F404-IN20 इंजन से लैस फाइटर जेट

भारतीय वायुसेना पहले ही LCA Mk-1A की डिलीवरी में देरी को लेकर चिंता जता चुकी है। वायु सेना ने फरवरी 2021 में 83 Mk-1A लड़ाकू विमानों के लिए 48,000 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया था और 97 और Mk-1A खरीदने की योजना है, जिसकी लागत करीब 67,000 करोड़ रुपये होगी।

सूत्रों ने बताया, “एचएएल ने अभी तक बेंगलुरु में 83 विमानों के ऑर्डर को पूरा करने के लिए छह LCA Mk-1A बनाए हैं। इनमें से एक, जो GE के F404-IN20 इंजन से लैस है, जुलाई-अगस्त में IAF को सौंपा जाएगा। जीई एयरोस्पेस ने मार्च में 99 F404-IN20 इंजनों में से पहला इंजन एचएएल को सौंपा। दूसरा इंजन जुलाई में आएगा, इसके बाद दिसंबर तक हर महीने दो इंजन दिए जाएंगे। वहीं अगले साल से डिलीवरी में तेजी आएगी। जीई कंपनी ने एचएएल को भरोसा दिया है कि प्रोडक्शन बढ़ाया जा रहा है, ताकि भारतीय ऑर्डर पूरा हो सके।

2004 में, F404-IN20 इंजन को पुराने LCA Mk-1 के लिए चुना गया था, जिसे भारतीय वायुसेना ने शामिल किया था। 2016 तक, जीई एरोस्पेस ने Mk-1 विमान के लिए कुछ ही F404-IN20 इंजन डिलीवर किए थे। लेकिन अतिरिक्त इंजन ऑर्डर न होने के चलते, अमेरिका में F404-IN20 के लिए प्रोडक्शन लाइन बंद कर दी गई थी। हालांकि, 2021 में एएचएल ने LCA Mk-1A के लिए 99 अतिरिक्त इंजन ऑर्डर दिए, जिसके बाद अमेरिकी कंपनी ने पांच साल से ठप पड़ी प्रोडक्शन लाइन को फिर से शुरू करने और ग्लोबल सप्लाई चेन से जुड़ने कोशिशें शुरू कीं।

देरी पर वायु सेना जता चुकी है नाराजगी

इसी साल मई में एयरफोर्स चीफ ने तेजस प्रोजक्ट में देरी को लेकर अपनी नाराजगी जताई थी। वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने सीआईआई की सालाना बिजनेस समिट 2025 में कहा था कि वायु सेना को लड़ाकू विमानों की कमी का सामना करना पड़ रहा है और उसके पास 30 स्क्वाड्रन हैं, जबकि 42 की जरूरत है। पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी और एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने इस मुद्दे को विभिन्न मंचों पर उठा चुके हैं। उनका कहना है कि जब देश में ही इतना बड़ा ऑर्डर है, तब HAL जैसी संस्थाएं इसे समय पर क्यों नहीं पूरा कर पा रही हैं? उन्होंने साफ कहा कि अगर HAL समय पर डिलीवरी नहीं कर पाती है तो फिर डिफेंस सेक्टर में प्राइवेट प्लेयर्स को भी मौका मिलना चाहिए।

ऑपरेशन सिंदूर ने बदले हालात

हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने प्रिसिशन गाइडेड मिसाइलों जैसे ब्रह्मोस और स्कैल्प का उपयोग कर यह दिखा दिया कि दूरी अब युद्ध में बाधा नहीं रही। भारतीय वायुसेना के एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित के अनुसार, आज की तकनीक ने “दूरी और खतरे” (distance and vulnerability) के बीच के रिश्ते को ही बदल दिया है। उन्होंने कहा कि अब दुश्मन की सीमा के अंदर सटीक हमले करना आम बात हो गई है।

AMCA की तैयारी

भारत अब अपने 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) को तेज़ी से विकसित कर रहा है। इसके लिए अब एक प्रतिस्पर्धी मॉडल अपनाया जाएगा, जिसमें HAL के अलावा टाटा, लार्सन एंड टुब्रो, महिंद्रा और अडानी जैसे प्राइवेट प्लेयर्स भी भाग ले सकेंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे एक “क्रिटिकल मोमेंट” कहा है, क्योंकि अब भारत में फाइटर जेट्स बनाने की क्षमता सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र मिलकर तैयार करेंगे।

LCA Tejas Delay: क्या भारत में अब निजी कंपनियां बनाएंगी फाइटर जेट? राजनाथ सिंह को सौंपी रिपोर्ट, क्या होगा HAL का रोल?

डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

तेजस Mk-1A की डिलीवरी भले देरी से हो रही हो, लेकिन यह भारत के स्वदेशी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग अभियान “आत्मनिर्भर भारत” के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है। यह विमान न केवल फोर्थ जनरेशन फाइटर जेट्स का आधुनिक रूप है, बल्कि भारत को ग्लोबल फाइटर जेट मार्केट में मजबूत दावेदार बनाने की दिशा में भी एक ठोस कदम है।

Quantum Entanglement: DRDO-IIT दिल्ली ने रचा इतिहास! 1 किमी दूर तक भेजा हैक-प्रूफ कम्युनिकेशन, जानें फ्यूचर वॉरफेयर में कैसे मिलेगी मदद?

Quantum Entanglement: DRDO-IIT Delhi’s 1km Hack-Proof Communication Explained
Photo By DRDO

Quantum Entanglement: भारत ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो ना सिर्फ देश के रक्षा क्षेत्र में बल्कि पूरे वैश्विक तकनीकी जगत में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। डीआरडीओ (DRDO) और IIT दिल्ली की साझेदारी में एक बेहद अहम प्रयोग सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) यानी क्वांटम पर आधारित फ्री-स्पेस क्वांटम सिक्योर कम्युनिकेशन। यह तकनीक सामान्य भाषा में समझें तो ऐसा सुरक्षित सिक्योर कम्युनिकेशन है जिसे कोई हैक नहीं कर सकता। यानी यह भविष्य की ‘Unbreakable Communication’ यानी हैकप्रूफ कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी की तरफ एक बड़ा कदम है। इस एक्सपेरीमेंट में क्वांटम एंटैंगलमेंट का इस्तेमाल करके 1 किमी से ज्यादा की दूरी पर फ्री-स्पेस क्वांटम सिक्योर कम्युनिकेशन को सफलतापूर्वक डेमो करके दिखाया गया।

क्या है यह Quantum Entanglement तकनीक?

डीआरडीओ और IIT दिल्ली ने क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) का उपयोग करते हुए एक किलोमीटर से ज़्यादा दूरी तक बिना किसी फाइबर या तार के, पूरी तरह से सुरक्षित संचार प्रणाली का सफल परीक्षण किया है। इसे ‘Free-Space Quantum Secure Communication’ कहा जाता है।

इस प्रयोग में वैज्ञानिकों ने क्वांटम एंटैंगलमेंट की मदद से एक खास तरह का सिक्योर कम्युनिकेशन बनाया। इसमें दो फोटोन (प्रकाश के कण) को आपस में जोड़ा गया, जो एक-दूसरे से दूर होने के बावजूद एक साथ व्यवहार करते हैं। यानी कि जब इन दोनों में से किसी एक में कोई बदलाव होता है, तो दूसरे में भी वही बदलाव तुरंत आ जाता है, भले ही वे कितनी भी दूर क्यों न हों। यही ‘Quantum Entanglement’ की ताकत है।

इस तकनीक से डेटा को इतने सुरक्षित तरीके से भेजा जा सकता है कि कोई भी इसे चुरा या तोड़ नहीं सकता। प्रयोग के दौरान करीब 240 बिट्स प्रति सेकंड की सिक्योर की रेट (Secure Key Rate) हासिल की गई, और क्वांटम बिट एरर रेट (Quantum Bit Error Rate) 7 फीसदी से कम रहा। यानी यह सिस्टम बहुत सटीक और भरोसेमंद है।

कहां और कैसे हुआ यह डेमो?

यह डेमो IIT दिल्ली के कैंपस में हुआ। प्रोफेसर भास्कर कंसारी की रिसर्च टीम ने इसे अंजाम दिया, जिन्होंने डीआरडीओ के डायरेक्टोरेट ऑफ फ्यूचरिस्टिक टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट (DFTM) के सपोर्ट से यह प्रोजेक्ट शुरू किया था। इस मौके पर डीआरडीओ के डीजी, डायरेक्टर SAG, डायरेक्टर DFTM, IIT दिल्ली के डीन (R&D), और डीए-कोई (DIA-CoE) के डायरेक्टर समेत कई कई अहम लोग मौजूद थे।

डेमो के दौरान एक फ्री-स्पेस ऑप्टिकल लिंक (optical beam path) के जरिए एक किलोमीटर की दूरी तय कर सुरक्षित ‘Quantum Key Distribution’ (QKD) संभव बनाया गया।

यह कैसे काम करता है?

क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) विज्ञान का हिस्सा है। इसमें दो या ज्यादा कणों को इस तरह जोड़ा जाता है कि अगर एक कण में बदलाव होता है, तो दूसरा कण तुरंत उस बदलाव को महसूस करता है, चाहे वे कितनी भी दूर क्यों न हों। इस प्रॉपर्टी का इस्तेमाल करके वैज्ञानिकों ने एक ऐसी Key बनाई, जो डेटा को सुरक्षित रखती है। अगर कोई इस Key को चुराने की कोशिश करेगा, तो क्वांटम सिस्टम खुद बता देगा कि कोई गड़बड़ हो रही है। यह पारंपरिक तरीकों से कहीं बेहतर है, जहां डिवाइस खराब होने पर सिक्योरिटी कमजोर पड़ सकती है और हैकिंग का खतरा बढ़ जाता है। पारंपरिक सिस्टम में अगर कोई बीच में सिग्नल को इंटरसेप्ट करता है तो आसानी से डेटा चुराया जा सकता है। लेकिन क्वांटम सिस्टम में जैसे ही कोई अनधिकृत व्यक्ति सिग्नल को छूने की कोशिश करता है, पूरे सिस्टम की स्थिति (quantum state) बदल जाती है और वह पकड़ में आ जाता है। इसलिए इसे अनहैकेबल कम्यूनिकेशन कहा जाता है।

इससे क्या होगा फायदा?

यह तकनीक कई तरीकों से फायदेमंद है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह डेटा पूरी तरह से सुरक्षित रहता है। इसका इस्तेमाल डिफेंस, फाइनेंस, और टेलीकम्युनिकेशन जैसे अहम सेक्टर्स में हो सकता है, जहां डेटा लीक का बड़ा खतरा होता है। इसके अलावा, जंग के दौरान यह नेशनल सिक्योरिटी के लिए भी बहुत उपयोगी ।

दूसरा फायदा यह है कि इसमें ऑप्टिकल फाइबर बिछाने की जरूरत नहीं पड़ती। आमतौर पर सिक्योर कम्युनिकेशन के लिए जमीन के नीचे फाइबर केबल्स डाली जाती हैं, जो महंगी और मुश्किल होती हैं। वहीं, पहाड़ी या घनी आबादी वाले इलाकों में फाइबर केबल बिछाने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। लेकिन फ्री-स्पेस QKD (Quantum Key Distribution) से यह दिक्कत खत्म हो सकती है। Free-Space QKD में हवा के जरिए (laser-based optical path) सिग्नल भेजे जा सकते हैं, जो सस्ता और आसान है। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे लेज़र बीम दो टावरों के बीच भेजी जा रही हो।

2022 में मिली थी बड़ी सफलता

यह पहली बार नहीं है जब भारत ने क्वांटम टेक्नोलॉजी में सफलता हासिल की हो। 2022 में डीआरडीओ ने विन्ध्याचल और प्रयागराज के बीच पहला इंटरसिटी क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक बनाया था। इसमें कमर्शियल ग्रेड अंडरग्राउंड डार्क ऑप्टिकल फाइबर का इस्तेमाल हुआ था, और प्रोफेसर भास्कर की टीम ने इसमें अहम भूमिका निभाई। फिर 2024 में, उनकी टीम ने 100 किमी लंबे टेलीकॉम ग्रेड ऑप्टिकल फाइबर पर क्वांटम कीज को सफलतापूर्वक भेजा। ये दोनों प्रोजेक्ट्स डीआरडीओ के सपोर्ट से हुए थे।

अब यह नया प्रयोग फ्री-स्पेस में हुआ, जो एक बड़ी छलांग है। यह तकनीक क्वांटम साइबर सिक्योरिटी, क्वांटम नेटवर्क्स, और फ्यूचर क्वांटम इंटरनेट के विकास का रास्ता खोलेगी।

यह सफलता डीआरडीओ-इंडस्ट्री-अकादमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (DIA-CoE) की बदौलत संभव हुई है। यह डीआरडीओ की एक खास पहल है, जिसमें 15 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाए गए हैं। ये सेंटर IITs, IISc, और यूनिवर्सिटीज में हैं, जहां कटिंग-एज डिफेंस टेक्नोलॉजीज पर काम हो रहा है। इन सेंटर्स की मदद से भारत नई-नई तकनीकों को डेवलप कर रहा है, जो देश की सुरक्षा को मजबूती देंगे।

रक्षा मंत्री ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर डीआरडीओ और IIT दिल्ली को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत अब क्वांटम युग में कदम रख चुका है, जहां खासकर फ्यूचर वॉरफेयर में सिक्योर कम्युनिकेशन एक गेम चेंजर साबित होगा। उन्होंने कहा कि यह तकनीक भारत को दुश्मनों से लड़ने में नई ताकत देगी।

QTRC: DRDO ने दिल्ली में शुरू किया क्वांटम टेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर, अल्ट्रा-स्मॉल एटॉमिक क्लॉक समेत कई तकनीकों पर होगा काम

इस एक्सपेरीमेंट की सफलता में डीआरडीओ के सेक्रेटरी और चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत, और IIT दिल्ली के डायरेक्टर प्रोफेसर रंगन बनर्जी ने भी टीम को शाबाशी दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत के साइंस और टेक्नोलॉजी के लिए एक मील का पत्थर है। टीम ने दिन-रात मेहनत करके इस तकनीक को हकीकत में बदला, और यह उनकी कड़ी मेहनत का नतीजा है।

PM Modi Cyprus Visit: साइप्रस से तुर्की को करारा कूटनीतिक संदेश, जहां एक भारतीय जनरल ने 50 साल पहले बचाया था एक देश

PM Modi in Cyprus: A Strong Diplomatic Message to Turkey from the Land an Indian General Once Saved
Image: PM Office

PM Modi Cyprus Visit: 16 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन देशों की अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत साइप्रस (Cyprus) से की। यह वही देश है जो 1974 में तुर्की (Turkiye) के हमले का शिकार हुआ था। वहीं, 20 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री साइप्रस पहुंचा है। वहीं, पीएम मोदी की इस यात्रा को सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती ही नहीं बल्कि, एक अहम भू-राजनीतिक (Geopolitical) संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। खासतौर पर तुर्की के लिए जिसने हाल ही में पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था।

साइप्रस यात्रा के दौरान पीएम मोदी को साइप्रस का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस III’ (Grand Cross of the Order of Makarios III) से नवाजा गया। यह सम्मान उस देश के पहले राष्ट्रपति आर्कबिशप मकारियोस के नाम पर दिया जाता है। इस दौरान उन्होंने साइप्रस के प्रेसिडेंट निकोस क्रिस्टोडौलिड्स से मुलाकात की और लिमासोल में बिजनेस लीडर्स को संबोधित किया।

PM Modi Cyprus Visit: साइप्रस यात्रा का रणनीतिक महत्व

पीएम मोदी की इस यात्रा के पीछे कई रणनीतिक संदेश छिपे हैं। भारत ने तुर्की द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को ड्रोन, हथियार और मैनपावर देने को गंभीरता से लिया है। जवाब में भारत ने कई तुर्की कंपनियों को देश छोड़ने के लिए कहा और अब पीएम मोदी की साइप्रस यात्रा को उसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।

साइप्रस की भौगोलिक स्थिति इसे भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। यह मेडिटेरेनियन सागर में स्थित है और यूरोप से मिडिल ईस्ट तक कनेक्टिविटी का केंद्र है। साइप्रस ने हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है, खासकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर। इसके अलावा, साइप्रस में भारतीय शांति सेना के योगदान को भी याद किया जाता है, जो 1964 से वहां तैनात है।

मोदी साइप्रस की राजधानी निकोसिया में हैं, जो यूएन-कंट्रोल्ड बफर जोन के पास स्थित है। यह शहर पूर्व में तुर्की कब्जे वाले क्षेत्र, तुर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस (TRNC) से भी सटा हुआ है। 20 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली साइप्रस विजिट है।

भारत का संदेश: यह युद्ध का युग नहीं है

सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साइप्रस ने हमेशा भारत का साथ दिया है। पीएम मोदी ने अपनी इस यात्रा के दौरान कहा, “हम साइप्रस के लगातार समर्थन के लिए आभारी हैं। मोदी ने साइप्रस को भारत का “विश्वसनीय साझेदार” बताया और कहा कि भारत क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म, ड्रग्स तस्करी और हथियारों की गैरकानूनी सप्लाई रोकने के लिए रीयल-टाइम इन्फॉर्मेशन एक्सचेंज मैकेनिज्म बनाएगा।”

PM Modi in Cyprus: A Strong Diplomatic Message to Turkey from the Land an Indian General Once Saved
Image: PM Office

पीएम मोदी ने साइप्रस से दुनिया को शांति का संदेश दिया। उन्होंने कहा, “हम पश्चिमी एशिया और यूरोप में जारी संघर्षों पर चिंता जताते हैं। हमारा मानना है कि यह युद्ध का दौर नहीं है।” यह बयान वैश्विक तनाव के बीच शांति और सहयोग पर जोर देता है। साइप्रस के साथ भारत के रिश्ते पर्यटन और अर्थव्यवस्था में भी मजबूत हो रहे हैं। मोदी ने साइप्रस को एक मशहूर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बताया और भारत के डेस्टिनेशन डेवलपमेंट पर फोकस की बात कही।

इसके अलावा, इस साल भारत-साइप्रस-ग्रीस साझेदारी की शुरुआत हुई, और इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को शांति और समृद्धि का रास्ता माना जा रहा है। साइप्रस ने भारत के यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में स्थायी सदस्यता के लिए भी समर्थन दिया है, जिसकी पीएम मोदी ने तारीफ की।

जियोस्ट्रैटेजिस्ट ब्रह्मा चेल्लानी कहते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गैस से भरपूर साइप्रस का दौरा तुर्की के लिए एक खास संदेश हो सकता है। तुर्की शायद इसे भारत के अपने क्षेत्रीय दुश्मनों ग्रीस, आर्मेनिया और मिस्र के साथ रिश्ते और गहरे करने का इशारा मानेगा। वह कहते हैं कि साइप्रस अगले साल यूरोपीय काउंसिल की बागडोर संभालेगा। यह भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) का एक अहम हिस्सा है, जो व्यापार और शांति को बढ़ावा दे सकता है। भारत का साइप्रस के साथ जुड़ाव इस देश को ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत करेगा। साथ ही, इससे भारत मेडिटेरेनियन सागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा सकेगा और तुर्की के विस्तारवाद का विरोध करने वाले देशों के गठबंधन को ताकत देगा।

तुर्की को अप्रत्यक्ष संदेश

भारत और तुर्की के संबंध हाल के वर्षों में तनावपूर्ण हुए हैं। तुर्की ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को ड्रोन, हथियारों की सप्लाई की थी। इसके जवाब में भारत ने कई तुर्की कंपनियों को देश छोड़ने को कहा है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र में बार-बार कश्मीर मुद्दा उठाया, और पाकिस्तान का खुला समर्थन किया। इसके जवाब में भारत ने न सिर्फ तुर्की कंपनियों पर कार्रवाई की बल्कि सॉफ्ट टूरिज्म बायकॉट भी शुरू किया।

वहीं, सरकार ने सुरक्षा कारणों से तुर्की की कंपनी सेलेबी को एयरपोर्ट ग्राउंड सर्विसेज देने की मंज़ूरी भी रद्द कर दी। अब मोदी की साइप्रस यात्रा और उसे एक टूरिज्म हब के तौर पर भारत द्वारा पहचान देना, सीधा मैसेज है कि हम तुर्की के विकल्प तलाश रहे हैं।

पुराने हैं भारत और साइप्रस के संबंध

तुर्की और साइप्रस के बीच रिश्ते अच्छे नहीं हैं। 1974 में तुर्की ने साइप्रस पर हमला किया था और वहां के उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे तुर्की नॉर्दर्न साइप्रस कहता है। लेकिन यूरोपियन यूनियन और संयुक्त राष्ट्र इसे साइप्रस का हिस्सा मानते हैं, जो तुर्की के कब्जे में है।

हालांकि भारत और साइप्रस के बीच यह संबंध सिर्फ आज के नहीं हैं। 1964 में यूनाइटेड नेशन्स पीसकीपिंग फोर्स (UNFICYP) के गठन के बाद, पहले कमांडर बने थे भारत के लेफ्टिनेंट जनरल पीएस ग्यानी। फिर आए जनरल केएस थिमय्या, जो ड्यूटी के दौरान साइप्रस में ही शहीद हुए। उनके सम्मान में वहां एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिसंबर 2024 में यूएन ने निकोसिया में उनकी याद में एक कार्यक्रम भी आयोजित किया था। 1974 के तुर्की हमले के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल दीवान प्रेमचंद ने वहां तैनात यूएन फोर्स की कमान संभाली और साइप्रस में सीजफायर लाइन को टूटने नहीं दिया।

2022 में साइप्रस के विदेश मंत्रालय ने इन तीनों भारतीय जनरलों को “कन्फ्लिक्ट के दौरान जान बचाने में अहम भूमिका निभाने वाले” बताया। यह सम्मान केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज के मजबूत संबंधों की नींव भी है।

भारत-साइप्रस के बीच कई एमओयू साइन

पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान भारत और साइप्रस के बीच कई एमओयू (सहमति पत्र) साइन हुए। नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और साइप्रस के यूरोबैंक के बीच यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) सर्विस शुरू करने का समझौता हुआ, जो साइप्रस में डिजिटल पेमेंट को आसान करेगा। इसके अलावा, NSE इंटरनेशनल एक्सचेंज गिफ्ट सिटी और साइप्रस स्टॉक एक्सचेंज के बीच क्रॉस-बॉर्डर फ्लो को बढ़ावा देने का करार हुआ।

पीएम मोदी ने लिमासोल में बिजनेस राउंडटेबल में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने साइप्रस को भारत का भरोसेमंद पार्टनर बताया। उन्होंने कहा कि 23 साल बाद किसी भारतीय पीएम का साइप्रस दौरा भारत-साइप्रस आर्थिक रिश्तों की अहमियत को दर्शाता है। पर्यटन में भी सहयोग बढ़ेगा, क्योंकि भारत साइप्रस जैसे डेस्टिनेशंस के विकास पर काम कर रहा है।

Three Brothers Alliance: पाकिस्तान-तुर्किए-अजरबैजान की यह जुगलबंदी क्यों बढ़ा रही है भारत की टेंशन? पढ़ें ये एक्सप्लेनर

जी7 सम्मेलन में हिस्सा लेने कनाडा जाएंगे पीएम मोदी

साइप्रस के बाद पीएम मोदी कनानास्किस, कनाडा जाएंगे, जहां वे कनाडाई पीएम मार्क कार्नी के निमंत्रण पर जी7 सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह उनकी छठवीं लगातार जी7 भागीदारी होगी। सम्मेलन में ऊर्जा सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, खासकर AI-ऊर्जा संबंध और क्वांटम मुद्दों पर चर्चा होगी। इसके बाद वे क्रोएशिया की यात्रा करेंगे, जहां वे प्रेसिडेंट जोरन मिलानोविक और पीएम एंड्रेज प्लेनकोविक से मुलाकात करेंगे।

SIPRI Yearbook 2025: दुनिया में फिर शुरू हो सकती है हथियारों की होड़, कई देश बढ़ा रहे हैं न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा

SIPRI Yearbook 2025: New Arms Race Looms as Countries Boost Nuclear Arsenals
AI Image

SIPRI Yearbook 2025: दुनिया भर में न्यूक्लियर हथियारों की तादाद और उनकी ताकत को बढ़ाने का काम तेजी से चल रहा है। 2024 में नौ न्यूक्लियर हथियारों से लैस देशों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, नॉर्थ कोरिया और इजरायल ने अपने हथियारों को अपग्रेड करने और नए वर्जन जोड़ने के लिए जोरदार प्रोग्राम शुरू किए। जनवरी 2025 तक, दुनिया में करीब 12,241 न्यूक्लियर वॉरहेड्स हैं, जिनमें से लगभग 9,614 को मिलिट्री स्टॉकपाइल में रखा गया है, जो जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल के लिए तैयार हैं। इनमें से 3,912 वॉरहेड्स मिसाइल्स और एयरक्राफ्ट के साथ तैनात हैं, जबकि बाकी सेंट्रल स्टोरेज में सुरक्षित हैं। इन तैनात वॉरहेड्स में से करीब 2,100 को बैलिस्टिक मिसाइल्स पर हाई ऑपरेशनल अलर्ट पर रखा गया है, और ज्यादातर ये रूस और अमेरिका के पास हैं। हाल ही में चीन ने भी शांति के वक्त कुछ वॉरहेड्स मिसाइल्स पर तैनात करना शुरू किया हो सकता है।

सिपरी की ताजा रिपोर्ट (SIPRI Yearbook 2025) के मुताबिक कोल्ड वॉर खत्म होने के बाद से रूस और अमेरिका ने पुराने वॉरहेड्स को धीरे-धीरे खत्म किया, जिससे न्यूक्लियर हथियारों की वैश्विक तादाद में हर साल कमी आती रही। लेकिन अब यह ट्रेंड बदलने की कगार पर है। पुराने हथियारों को खत्म करने की रफ्तार धीमी पड़ रही है, जबकि नए हथियारों को तैनात करने का काम तेज हो गया है। यह बदलाव दुनिया के लिए एक नई चुनौती बन सकता है।

SIPRI Yearbook 2025: रूस और अमेरिका का दबदबा

सिपरी के वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन प्रोग्राम में एसोसिएट सीनियर फेलो और फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) में न्यूक्लियर इन्फॉर्मेशन प्रोजेक्ट के डायरेक्टर हंस एम. क्रिस्टेंसेन कहते हैं, “दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों की संख्या में कमी का दौर, जो कोल्ड वॉर के खत्म होने के बाद से चला आ रहा था, अब खत्म होने की कगार पर है।” उनका कहना है, इसके बजाय, हम एक स्पष्ट ट्रेंड देख रहे हैं, जिसमें न्यूक्लियर आर्सेनल बढ़ रहा है, न्यूक्लियर रेटोरिक तेज हो रहा है और आर्म्स कंट्रोल समझौतों को छोड़ दिया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, रूस और अमेरिका के पास दुनिया के करीब 90 फीसदी न्यूक्लियर हथियार हैं। 2024 में इन दोनों देशों के मिलिट्री स्टॉकपाइल में खास बदलाव नहीं हुआ, लेकिन दोनों ने अपने हथियारों को मॉडर्नाइज करने के बड़े प्रोग्राम शुरू किए हैं। अगर इनके बीच कोई नया समझौता नहीं होता, तो 2010 का न्यू स्टार्ट ट्रीटी, जो फरवरी 2026 में खत्म हो रही है, उसके बाद इनके स्ट्रैटेजिक मिसाइल्स पर तैनात वॉरहेड्स की संख्या बढ़ सकती है। अमेरिका का मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम भले ही चल रहा हो, लेकिन 2024 में प्लानिंग और फंडिंग की दिक्कतों ने इसे धीमा कर दिया। नई नॉन-स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर वॉरहेड्स को जोड़ने से भी इस प्रोग्राम पर दबाव बढ़ा है।

रूस का मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम भी चुनौतियों से जूझ रहा है। 2024 में नए सरमात इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के टेस्ट में नाकामी और अन्य सिस्टम्स के अपग्रेड में देरी हुई। अमेरिका का अनुमान था कि रूस अपने नॉन-स्ट्रैटेजिक वॉरहेड्स की संख्या बढ़ाएगा, लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ। फिर भी, आने वाले सालों में दोनों देशों की तैनाती बढ़ने की संभावना है। रूस अपनी पुरानी स्ट्रैटेजिक फोर्स को मॉडर्नाइज कर हर मिसाइल पर ज्यादा वॉरहेड्स तैनात कर सकता है, जबकि अमेरिका मौजूद लॉन्चरों पर ज्यादा वॉरहेड्स जोड़ सकता है और खाली साइलो को फिर से सक्रिय कर सकता है।

चीन का तेजी से बढ़ता जखीरा

चीन का न्यूक्लियर आर्सेनल सबसे तेजी से बढ़ रहा है। SIPRI के मुताबिक, चीन के पास अब कम से कम 600 वॉरहेड्स हैं, और 2023 से हर साल करीब 100 नए वॉरहेड्स जोड़े जा रहे हैं। जनवरी 2025 तक, चीन ने देश के उत्तरी रेगिस्तानी इलाकों और पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में करीब 350 नए ICBM साइलो बनाए हैं या बनाने का काम पूरा कर लिया है। अगर चीन अपनी फोर्स को इसी तरह बढ़ाता है, तो दस साल में इसके पास 1500 वॉरहेड्स हो सकते हैं, जो रूस और अमेरिका के मौजूदा स्टॉकपाइल का करीब एक-तिहाई होगा।

ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य देश भी नहीं हैं पीछे

ब्रिटेन ने 2024 में अपने न्यूक्लियर वॉरहेड्स की संख्या नहीं बढ़ाई, लेकिन 2023 की इंटीग्रेटेड रिव्यू रिफ्रेश में वॉरहेड्स की सीमा बढ़ाने की योजना को मंजूरी दी गई थी। जुलाई 2024 में चुनी गई लेबर सरकार ने चार नए न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBNs) बनाने और लगातार समुद्र में न्यूक्लियर डिटरेंस बनाए रखने का वादा किया। हालांकि, अब उसे ऑपरेशनल और फाइनेंशियल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

फ्रांस ने 2024 में तीसरी जेनरेशन के SSBN और नए एयर-लॉन्च्ड क्रूज मिसाइल को डेवलप करने का काम जारी रखा। मौजूद सिस्टम्स को रिफर्बिश और अपग्रेड करने का भी प्रयास हुआ, जिसमें एक बेहतर बैलिस्टिक मिसाइल और नया वॉरहेड मॉडिफिकेशन शामिल है।

भारत-पाकिस्तान ने बढ़ाया न्यूक्लियर आर्सेनल

2024 में भारत ने अपने न्यूक्लियर आर्सेनल को थोड़ा और बढ़ाया है, और नए तरह के न्यूक्लियर डिलीवरी सिस्टम विकसित करने का काम जारी रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के नए ‘कैनिस्टराइज्ड’ मिसाइल्स, जो वॉरहेड्स के साथ ट्रांसपोर्ट किए जा सकते हैं, शांति के वक्त भी न्यूक्लियर वॉरहेड्स ले जाने में सक्षम हो सकते हैं। जब ये मिसाइल्स पूरी तरह से ऑपरेशनल हो जाएंगे, तो हर मिसाइल पर कई वॉरहेड्स ले जाने की क्षमता भी हो सकती है।

उधर, पाकिस्तान ने भी 2024 में नए डिलीवरी सिस्टम डेवलप करने और फिसाइल मटीरियल इकट्ठा करने का काम जारी रखा, जिससे संकेत मिलता है कि आने वाले दशक में उसका न्यूक्लियर आर्सेनल बढ़ सकता है।

SIPRI के वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन प्रोग्राम में एसोसिएट सीनियर रिसर्चर और FAS में न्यूक्लियर इन्फॉर्मेशन प्रोजेक्ट के एसोसिएट डायरेक्टर मैट कोरडा ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान न्यूक्लियर से जुड़े सैन्य ढांचे पर हमले और गलत सूचनाओं का मेल एक सामान्य टकराव को भी न्यूक्लियर संकट में बदल सकता था। यह उन देशों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो न्यूक्लियर हथियारों पर अपनी निर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।”

नॉर्थ कोरिया और इजरायल की तैयारी

नॉर्थ कोरिया अपने मिलिट्री न्यूक्लियर प्रोग्राम को अपनी नेशनल सिक्योरिटी का अहम हिस्सा मानता है। SIPRI के अनुसार, उसके पास अब करीब 50 वॉरहेड्स हैं, और पर्याप्त फिसाइल मटीरियल से 40 और वॉरहेड्स बनाए जा सकते हैं। जुलाई 2024 में साउथ कोरिया ने चेतावनी दी कि नॉर्थ कोरिया ‘टैक्टिकल न्यूक्लियर वॉपन’ डेवलप करने के आखिरी चरण में है। नवंबर 2024 में किम जोंग उन ने अपने देश के न्यूक्लियर प्रोग्राम को ‘असीमित तरीके से’ आगे बढ़ाने का ऐलान किया।

इजरायल, जो सार्वजनिक रूप से न्यूक्लियर हथियारों को स्वीकार नहीं करता, अपने आर्सेनल को मॉडर्नाइज कर रहा है। 2024 में उसने एक मिसाइल प्रोपल्शन सिस्टम का टेस्ट किया, जो उसके जेरिको फैमिली के न्यूक्लियर-कैपेबल बैलिस्टिक मिसाइल्स से जुड़ा हो सकता है। साथ ही, डिमोना में अपने प्लूटोनियम प्रोडक्शन रिएक्टर साइट को अपग्रेड करने का काम भी चल रहा है।

SIPRI Yearbook 2025: New Arms Race Looms as Countries Boost Nuclear Arsenals
Image From Sipri

आर्म्स कंट्रोल पर संकट

SIPRI डायरेक्टर डैन स्मिथ ने अपनी 2025 की रिपोर्ट में न्यूक्लियर आर्म्स कंट्रोल पर संकट की चेतावनी दी है। रूस और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय न्यूक्लियर कंट्रोल कई सालों से संकट में है और अब लगभग खत्म हो चुका है। न्यू स्टार्ट, जो रूस और अमेरिका की स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर फोर्स को सीमित करता है, फरवरी 2026 तक प्रभावी है, लेकिन इसके नवीनीकरण या बदलाव की कोई बातचीत नहीं हो रही। अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में और अब फिर दोहराया कि किसी भी नए समझौते में चीन के न्यूक्लियर आर्सेनल पर भी सीमा होनी चाहिए, जो बातचीत को और मुश्किल बना देगा।

स्मिथ ने नए हथियारों की रेस के जोखिमों पर भी चेतावनी दी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर कैपेबिलिटीज, स्पेस एसेट्स, मिसाइल डिफेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसे नए तकनीकों का तेजी से विकास न्यूक्लियर कैपेबिलिटीज, डिटरेंस और डिफेंस को बदल रहा है, जिससे अस्थिरता बढ़ सकती है। मिसाइल डिफेंस और समुद्र में क्वांटम टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से देशों के न्यूक्लियर आर्सेनल की भेद्यता प्रभावित हो सकती है। साथ ही, AI और अन्य तकनीकों से संकट में फैसले तेज होने से गलतफहमी, गलत कम्युनिकेशन या तकनीकी गलती से न्यूक्लियर संघर्ष का खतरा बढ़ गया है।

नए देशों में न्यूक्लियर हथियारों की दिलचस्पी

ईस्ट एशिया, यूरोप और मिडल ईस्ट में न्यूक्लियर स्टेटस और स्ट्रैटेजी पर चर्चा हो रही है। इससे संकेत मिलता है कि और देश अपने न्यूक्लियर हथियार डेवलप कर सकते हैं। इसके अलावा, न्यूक्लियर-शेयरिंग अरेंजमेंट्स पर भी ध्यान बढ़ा है। 2024 में रूस और बेलारूस ने दावा दोहराया कि रूस ने बेलारूसी जमीन पर न्यूक्लियर हथियार तैनात किए हैं। कई यूरोपीय NATO सदस्यों ने अमेरिकी न्यूक्लियर हथियार अपने यहां रखने की इच्छा जताई, और फ्रांस के प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों ने ‘यूरोपीय पहलू’ में फ्रांसीसी न्यूक्लियर पावर की बात की।

SIPRI की रिपोर्ट में खुलासा, 2023 में दुनियाभर में बिके 52 लाख करोड़ रुपये के हथियार, 4.2 फीसदी की हुई बढ़ोतरी

मैट कोरडा ने कहा, “यह याद रखना बहुत जरूरी है कि न्यूक्लियर हथियार सुरक्षा की गारंटी नहीं देते। हाल ही में भारत और पाकिस्तान में हुई हिंसक घटनाओं ने साफ दिखाया कि न्यूक्लियर हथियार संघर्ष को रोकने में असफल रहते हैं। इनके साथ बढ़ोतरी और भयानक गलतफहमियों का जोखिम भी जुड़ा है, खासकर जब गलत सूचनाएं फैल रही हों, और ये देश की आबादी को सुरक्षित करने के बजाय असुरक्षित बना सकते हैं।”

5 years of Galwan Clash: गलवान हिंसा के पांच साल बाद भारत के लिए क्या हैं 5 सबसे बड़े सबक? दो फ्रंट वॉर के लिए रहना होगा तैयार!

5 Years of Galwan Clash: 5 Key Lessons India Must Not Forget
Pic Source: Indian Army

5 years of Galwan Clash: 15-16 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटी गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुई हिंसक झड़प को आज पांच साल पूरे हो गए हैं। पूर्वी लद्दाख के गलवान में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प में कर्नल संतोष बाबू समेत 20 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई, जबकि चीनी सेना के 40 से भी अधिक जवान मारे गए। हालांकि आधिकारिक तौर पर चीन ने इसकी संख्या नहीं बताई। लेकिन गलवान में हुए खूनी संघर्ष ने देश की सुरक्षा नीति, सामरिक दृष्टिकोण और पड़ोसी देशों को लेकर सोच को बदलने को मजबूर कर दिया।

5 years of Galwan Clash: क्या हुआ था गलवान में?

पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी एक ऐसी जगह है, जहां भारत और चीन की सीमा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल या LAC) को लेकर हमेशा विवाद रहा है। भारत और चीन के बीच सीमा पर तनातनी कोई नई बात नहीं है। 2013 के बाद से ही ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। 2020 की शुरुआत में, चीनी सैनिकों ने इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई और निर्माण कार्य शुरू किए। एलएसी से सटे इलाकों में ये निर्माण कार्य भारत के लिए चिंता का कारण बने। दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन 15 जून की रात बातचीत के दौरान झड़प हो गई। लेकिन गलवान में हुई इस झड़प में लाठी-डंडों और पत्थरों का इस्तेमाल हुआ, क्योंकि दोनों पक्षों के पास हथियारों का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी। फिर भी, इस हिंसा में कई सैनिक घायल हुए और 20 भारतीय जवान शहीद हो गए। एलएसी पर पहली बार 45 सालों में सीमा पर सैनिकों की मौत हुई। 1996 और 2005 के समझौतों के तहत, दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि सीमा पर हथियारों का उपयोग नहीं होगा, लेकिन गलवान में चीनी सैनिकों ने लोहे की छड़ों, कील लगे डंडों और कांटेदार तारों से हमला किया।

इस घटना के बाद दोनों देशों की सेनाओं ने उस इलाके में अपने सैनिक और हथियारों की तैनाती बढ़ा दी। गलवान के बाद LAC पर गश्त और निगरानी बढ़ाई गई, और दोनों देशों के बीच कई बार बैठकें हुईं ताकि हालात पर काबू रखा जा सके।

चीन का यह व्यवहार अचानक नहीं था। 1959 में तिब्बत को हथियाने के बाद से चीन धीरे-धीरे इस क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। 1980 के दशक से वह LAC के आसपास सड़कें, हवाई पट्टियां और निर्माण कर रहा है। साथ ही वह डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर भी बदल रहा है और तिब्बत में हान चीनी आबादी बसाकर स्थानीय पहचान को कमजोर कर रहा है।

चीन की मंशा साफ है कि भारत को सीमाओं पर उलझाकर, अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करना। गलवान से पहले डोकलाम (2017) और उससे पहले 2013 में देपसांग और चुमार में भी ऐसी ही घटनाएं हुईं थीं। लेकिन गलवान एक चेतावनी थी, एक ऐसा अलार्म जिसने भारत को झकझोर कर रख दिया।

पहला सबक: सीमा पर सतर्कता जरूरी

गलवान की घटना ने भारत को सिखाया कि सीमा पर सतर्कता कभी कम नहीं होनी चाहिए। 2020 से पहले, कई लोग मानते थे कि भारत और चीन के बीच छोटी-मोटी सीमा विवाद तो होते रहते हैं, लेकिन बड़ी लड़ाई की संभावना कम है। लेकिन गलवान ने दिखाया कि चीनी सेना अचानक से अपनी पोजीशन मजबूत कर सकती है। इसलिए, भारतीय सेना ने LAC पर अपनी तैनाती बढ़ाई और नई टेक्नोलॉजी जैसे ड्रोन और सैटेलाइट का इस्तेमाल शुरू किया ताकि दुश्मन की हरकतों पर नजर रखी जा सके।

इसके अलावा, स्थानीय लोगों और चरवाहों से मिली जानकारी भी अहम साबित हुई थी। 1999 के कारगिल युद्ध की तरह, गलवान में भी शुरुआती अलर्ट चरवाहों ने ही दिया था। इसका मतलब है कि सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के साथ तालमेल बनाना जरूरी है ताकि समय रहते खतरे का पता चल सके।

दूसरा सबक: सैनिकों की ट्रेनिंग और तैयारी

गलवान में हुई झड़प से पता चला कि सैनिकों को सिर्फ हथियार चलाने की ट्रेनिंग नहीं, बल्कि हाथ से हाथ की लड़ाई (हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट) की भी तैयारी करनी होगी। उस रात सैनिकों ने बिना गोली चलाए डंडों और पत्थरों से अपनी रक्षा की। इसके बाद भारतीय सेना ने अपनी ट्रेनिंग में बदलाव किए। अब सैनिकों को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने और ठंड में बचे रहने की खास ट्रेनिंग दी जाती है। साथ ही, उन्हें ऐसी स्थिति से निपटने के लिए नई टैक्टिक्स भी सिखाई जा रही हैं, जहां हथियारों का इस्तेमाल सीमित हो। सेना ने हाई-ऑल्टीट्यूड ट्रेनिंग सेंटर भी शुरू किए, जहां सैनिकों को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने की प्रैक्टिस कराई जाती है। इसके अलावा, सेना ने अपने कम्युनिकेशन सिस्टम को अपग्रेड किया ताकि दुश्मन की हरकतों की तुरंत जानकारी मिल सके।

तीसरा सबक: डिप्लोमेसी और सैन्य शक्ति का संतुलन

गलवान के बाद भारत ने समझा कि डिप्लोमेसी (राजनयिक बातचीत) और सैन्य ताकत का संतुलन जरूरी है। झड़प के बाद भारत ने चीन के साथ बातचीत शुरू की, लेकिन साथ ही अपनी सेना और हथियारों को मजबूत किया। भारत ने अपने बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर (सीमा ढांचा) को बेहतर किया, जैसे सड़कें, पुल और हेलीपैड बनाए गए, ताकि सैनिकों को जल्दी मदद पहुंचाई जा सके। साथ ही, भारत ने रूस, अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों से हथियार और टेक्नोलॉजी खरीदी, और अपनी सैन्य क्षमता में इजाफा किया। गलवान हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीन की आक्रामकता को सामने लाने में मदद की। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपियन यूनियन ने भारत का समर्थन किया। इसके बाद क्वाड (QUAD) समूह की भूमिका भी मजबूत हुई। भारत ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर अपनी स्थिति को स्पष्ट किया, हम शांति चाहते हैं, लेकिन कमजोरी नहीं दिखाएंगे।

चौथा सबक: जनता का समर्थन और जागरूकता

गलवान घटना पूरे देश को झकझोरने वाली थी। लोगों ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी और सेना के लिए समर्थन जताया। सोशल मीडिया पर गलवान में सैनिकों की बहादुरी की कहानियां ट्रेंड हुईं, और लोग सैनिकों की बहादुरी की कहानियां शेयर करने लगे। यह घटना ने देशवासियों को यह सिखाया कि सीमा पर क्या हो रहा है, इसकी जानकारी रखना जरूरी है। स्कूलों और कॉलेजों में अब बच्चों को सीमा सुरक्षा और सैनिकों के बलिदान के बारे में बताया जाता है ताकि वे देश के प्रति जिम्मेदारी समझें।

पांचवां सबक: स्वदेशी हथियारों पर जोर

गलवान ने भारत को यह एहसास दिलाया कि विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करनी होगी। इसके बाद भारत ने अपनी डिफेंस इंडस्ट्री को मजबूत करने का फैसला लिया। अब ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम के तहत राइफल्स, ड्रोन और बुलेटप्रूफ जैकेट्स जैसे हथियार बनाए जा रहे हैं। इससे न सिर्फ सेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि देश की इकोनॉमी को भी फायदा होगा।

गलवान के बाद भारत ने LAC पर इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण तेज हुआ। सड़कों और पुलों को अपग्रेड किया गया, बॉर्डर पोस्ट्स को मजबूत किया गया और फॉरवर्ड बेस को एक्टिव किया गया। अब भारत सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि रणनीतिक तैयारी भी करता है।

इसके साथ ही सरकार ने सेना को निर्णय लेने की अधिक स्वतंत्रता दी। भारतीय जवान अब उत्तरी लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर लंबे समय तक तैनात रह सकते हैं। रणनीतिक दृष्टिकोण से यह बदलाव अहम था।

Galwan Visit: नॉर्दन कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा क्यों गए गलवान और देपसांग, क्या वहां इंडिया गेट बनाने की है तैयारी?

पाकिस्तान और चीन की साजिशें

पहले गलवान और अब ऑपरेशन सिंदूर ने साबित किया कि चीन और पाकिस्तान की मिलीभगत गहरी होती जा रही है। गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान ने चीन को सैन्य सहूलियतें दी हैं, और चीनी सेना कई पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को ट्रेनिंग भी मुहैया करवा रही है। ऐसे में भारत के लिए दो फ्रंट वाला खतरा और गंभीर हो जाता है। गलवान के बाद भारत ने पश्चिमी मोर्चे यानी पाकिस्तान सीमा पर भी फोकस किया। अब भारत एक साथ दोनों मोर्चों पूर्वी लद्दाख और जम्मू-कश्मीर पर रणनीतिक तौर पर काम कर रहा है।

Kargil Vijay Diwas 2025: कारगिल विजय की 26वीं सालगिरह से पहले तोलोलिंग टॉप पर पहुंची भारतीय सेना, ऐसे दी वीरों को दी श्रद्धांजलि

Kargil Vijay Diwas 2025: Indian Army Pays Tribute at Tololing Top Ahead of 26th Anniversary
PIC: Indian Army

Kargil Vijay Diwas 2025: 1999 के कारगिल युद्ध में तोलोलिंग की ऐतिहासिक लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए, भारतीय सेना की ‘फॉरएवर इन ऑपरेशंस डिवीजन’ ने 11 जून 2025 को तोलोलिंग चोटी पर चढ़ाई की। इस अभियान की शुरुआत द्रास स्थित कारगिल वॉर मेमोरियल से हुई, जो कारगिल की ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराने वाले वीरों को शहादत को नमन करने के लिए बनाया गया है।

इस अभियान में तोलोलिंग की लड़ाई में हिस्सा लेने वाली विभिन्न यूनिट्स के 30 बहादुर सैनिकों की एक टीम ने तोलोलिंग चोटी पर चढ़ाई की और वहां तिरंगा फहराया। और ऑपरेशन विजय के शहीदों को श्रद्धांजलि दी। भारतीय वायुसेना के ऑफिसर्स और एयरमैन ने भी इस अभियान में हिस्सा लिया।

कारगिल विजय की 26वीं सालगिरह के मौके पर यह अभियान सैनिकों के साहस, देशभक्ति और निस्वार्थ सेवा की एक मार्मिक याद दिलाता है, जो भारतीय सेना की पहचान है। यह सिर्फ एक एडवेंचर नहीं है, बल्कि एक ऐसी यात्रा है जो यादों, चिंतन और सम्मान से भरी है, जिसका मकसद नई पीढ़ियों को साहस और बलिदान की कहानियों से प्रेरित करना है, जिन्होंने देश के लिए अपनी कुर्बानी दी।

Kargil Vijay Diwas 2025: कारगिल की चोटियों पर श्रद्धांजलि

कारगिल युद्ध की यादें आज भी हर भारतीय के दिल में जिंदा हैं। 1999 की गर्मियों में, जब कारगिल की बर्फीली चोटियां पिघलने लगीं, तब स्थानीय चरवाहे ताशी नामग्याल ने भारतीय क्षेत्र में पाकिस्तानी घुसपैठियों की मौजूदगी की सूचना दी थी। ये घुसपैठिए उन कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा जमाए बैठे थे, जहां से श्रीनगर और लेह को जोड़ने वाला एकमात्र नेशनल हाइवे (NH-1D) को निशाना बना सकते थे। 3 मई 1999 को ताशी नामग्याल ने इस घुसपैठ की जानकारी दी, और 7 मई को भारतीय सेना ने पेट्रोलिंग के जरिए इस घुसपैठ की पुष्टि की। इसके बाद ऑपरेशन विजय की शुरुआत हुई, जो कारगिल युद्ध का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

इस युद्ध में तोलोलिंग की लड़ाई बेहद अहम थी। तोलोलिंग चोटी दुश्मन के लिए एक स्ट्रैटेजिक पोजिशन थी, जहां से वे हाइवे पर नजर रख सकते थे। भारतीय सैनिकों ने बेहद मुश्किल हालात में, खड़ी चढ़ाई, ठंड और दुश्मन की भारी फायरिंग के बीच इस चोटी को वापस हासिल किया। यह जीत युद्ध में पहली बड़ी सफलता थी, जिसने भारतीय सेना को बाकी चोटियों पर कब्जा करने का हौसला दिया।

Kargil Vijay Diwas 2025: Indian Army Pays Tribute at Tololing Top Ahead of 26th Anniversary
Pic: Indian Army

तोलोलिंग अभियान का महत्व

11 जून 2025 को शुरू हुआ यह अभियान सिर्फ एक श्रद्धांजलि ही नहीं, बल्कि सैनिकों की उस बहादुरी को सेलिब्रेट करने का जरिया है, जिसने कारगिल युद्ध में भारत को जीत दिलाई। 30 सैनिकों की टीम में उन यूनिट्स के जवान शामिल थे, जिन्होंने 1999 में तोलोलिंग की लड़ाई में हिस्सा लिया था। इस एक्सपीडिशन को कारगिल वॉर मेमोरियल से फ्लैग ऑफ किया गया, जो द्रास में शहीदों की याद में बनाया गया है। इस मेमोरियल में उन सैनिकों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की।

तोलोलिंग चोटी की चढ़ाई आसान नहीं थी। खड़ी ढलान, ठंडी हवाएं और ऑक्सीजन की कमी ने इस मिशन को चैलेंजिंग बनाया। फिर भी, सैनिकों ने हिम्मत नहीं हारी और चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया।

वायुसेना ने निभाई थी अहम भूमिका

वायुसेना ने अपने ऑफिसर्स और एयरमेन को भी इस एक्सपीडिशन में शामिल होने के लिए भेजा। कारगिल युद्ध में भी वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर के तहत अहम रोल निभाया था। उस वक्त एयर फोर्स को लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पार न करने की सख्त हिदायत थी, फिर भी उन्होंने सटीक हवाई हमलों से दुश्मन की पोजिशंस को कमजोर किया।

आने वाले अभियान

तोलोलिंग अभियान कारगिल विजय की 26वीं सालगिरह से पहले कई ऐसे मिशंस का हिस्सा है, जिनमें सैनिक और सिविलियन्स की टीमें कारगिल की उन चोटियों पर जाएंगी, जहां अहम लड़ाइयां लड़ी गई थीं। 13 जून से शुरू होकर 14 जुलाई 2025 तक ये अभियान गन हिल, पॉइंट 5203, खालूबार, पॉइंट 4812, टाइगर हिल, बत्रा टॉप और पॉइंट 5229 जैसी चोटियों तक जाएंगे। इन जगहों पर तिरंगा फहराया जाएगा और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। इन अभियानों में सिविलियन्स की भागीदारी खास है, क्योंकि यह देशवासियों को उन बलिदानों से जोड़ता है, जिन्होंने भारत की संप्रभुता को बचाया।

कारगिल युद्ध का बैकग्राउंड

25 मई 1999 को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने वायुसेना को सीमित हवाई कार्रवाई की मंजूरी दी, जिसके तहत ऑपरेशन सफेद सागर लॉन्च हुआ। इंडियन नेवी ने भी ऑपरेशन तलवार शुरू किया, जिसमें कराची के पास सबमरीन्स तैनात की गईं और अरब सागर में गश्त शुरू हुई। जून के पहले हफ्ते से भारतीय सैनिकों ने चोटियों पर हमले शुरू किए। बेहद मुश्किल टेरेन और दुश्मन की मजबूत पोजिशंस के बावजूद, सैनिकों ने तोलोलिंग, टाइगर हिल और बत्रा टॉप जैसी चोटियों को वापस हासिल किया।

Kargil Vijay Diwas 2025: इस साल कारगिल दिवस की थीम है शौर्य को सलाम, बलिदान को नमन, 545 शहीदों के घर पहुंचेगी सेना

11 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई के चलते पाकिस्तानी घुसपैठियों ने पीछे हटना शुरू किया। 14 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की, और 26 जुलाई को भारतीय सेना ने पूरी घुसपैठ खत्म होने की पुष्टि की। यह दिन आज कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Ex Shakti 2025: भारत-फ्रांस सैन्य अभ्यास ‘शक्ति 2025’ 18 जून से 1 जुलाई तक, इस बार ला कैवेलरी में होगी एक्सरसाइज

Ex Shakti 2025: India-France Joint Military Exercise to Be Held in La Cavalerie from June 18 to July 1
Pic Source: Indian Army

Ex Shakti 2025: भारत और फ्रांस के बीच सैन्य सहयोग को और मजबूत करने के लिए, दोनों देशों की सेनाओं के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘शक्ति’ का आठवां संस्करण 18 जून से 1 जुलाई 2025 तक फ्रांस के ला कैवेलरी (La Cavalerie) में आयोजित किया जाएगा। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं की संयुक्त सैन्य क्षमता को बढ़ाना है, ताकि वे अलग-अलग तरह के ऑपरेशन्स जैसे आतंकवाद के खिलाफ जंग में बेहतर काम कर सकें।

‘शक्ति’ अभ्यास की शुरुआत 2011 में हुई थी और यह हर साल में होता है, एक बार भारत में तो दूसरी बार फ्रांस में।इसका पिछला संस्करण मई 2024 में भारत के मेघालय में संयुक्त प्रशिक्षण नोड (Joint Training Node) उमरोई में हुआ था। अब फ्रांस में होने वाला यह अभ्यास दोनों देशों के रक्षा सहयोग को और मजबूत करेगा।

अभ्यास का उद्देश्य

‘शक्ति 2025’ का उद्देश्य है दोनों सेनाओं के बीच आपसी तालमेल बढ़ाना है। यह अभ्यास दोनों देशों को अपनी बेस्ट ट्रेनिंग और तरीके शेयर करने का मौका देगा। इससे रक्षा सहयोग बढ़ेगा और भारत-फ्रांस के रिश्ते और मजबूत होंगे। आज के युद्ध में जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और स्पेस जैसे कई डोमेन में एक साथ काम करना पड़ता है। इस अभ्यास में सैनिकों को आतंकवाद-रोधी ऑपरेशन्स और मुश्किल हालात में काम करने की ट्रेनिंग मिलेगी।

अभ्यास में क्या होगा

इस अभ्यास में कई तरह की सैन्य गतिविधियां होंगी, जैसे मिलिट्री ड्रिल्स, जॉइंट ऑपरेशंस और स्ट्रैटेजी पर फोकस किया जाएगा। अभ्यास के दौरान दोनों देशों के जवान हथियारों का इस्तेमाल, युद्ध के तरीके और इमरजेंसी में तेजी से कैसे रिस्पॉन्स किया जाए, इसका अभ्यास करेंगे। एक्सरसाइज के दौरान टैंक्स, आर्मर्ड व्हीकल्स और हेलिकॉप्टर्स जैसे मॉडर्न इक्विपमेंट्स इस्तेमाल होंगे। सिमुलेटेड मिशन्स के जरिए सैनिकों को रियल-टाइम में डिसीजन लेने की ट्रेनिंग दी जाएगी। ताकि वे असल जंग जैसे हालात में बेहतर काम कर सकें।

2024 में मेघालय के उमरोई में हुई थी एक्सरसाइज

इससे पहले भारत और फ्रांस के बीच 7वां संयुक्त सैन्य अभ्यास शक्ति 2024 मेघालय के उमरोई में 13 से 26 मई 2024 तक आयोजित किया गया था। इस अभ्यास में भारतीय सेना की मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट से 60 सैनिकों ने हिस्सा लिया, जबकि फ्रांस की 21वीं मरीन इन्फैंट्री रेजिमेंट की टुकड़ी शामिल हुई। मेघालय का जंगली और पहाड़ी इलाका इस अभ्यास के लिए चुना गया, क्योंकि यह आतंकवाद-रोधी और जंगल वारफेयर की ट्रेनिंग के लिए बेहतरीन था। दोनों सेनाओं ने मिलकर टोही मिशन, घेराबंदी, तलाशी, और आतंकवादियों से निपटने की रणनीतियां समेत कई तरह के युद्ध अभ्यास किए थे। इस दौरान आधुनिक हथियार, ड्रोन, और संचार उपकरणों का भी इस्तेमाल हुआ। इससे दोनों सेनाओं को नई तकनीकों को समझने और एक-दूसरे के साथ काम करने का मौका मिला।

Indian Army Helicopter Fleet: पुराने हेलीकॉप्टर बेड़े को बदलेगी भारतीय सेना, शामिल करेगी 250 नए चॉपर, ये कॉप्टर हैं रेस में

शक्ति एक्सरसाइज इंडिया-फ्रांस स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का हिस्सा है, जो 2011 में शुरू हुई थी। यह एक्सरसाइज लैंड (शक्ति), सी (वरुणा) और एयर (गरुड़ा) डोमेन्स में होने वाली बाइलेटरल ट्रेनिंग का हिस्सा है। जनवरी 2024 में प्रेसिडेंट मैक्रों और प्राइम मिनिस्टर मोदी की मीटिंग में, दोनों देशों ने अपनी डिफेंस कोऑपरेशन को और मजबूत करने पर जोर दिया। उसके बाद फ्रेंच नेवी और आर्मी चीफ ने भी भारत का दौरा किया, जबकि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने अप्रैल 2024 में फ्रांस का विजिट किया था। वहीं इस साल भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी भी फ्रांस दौरे पर गए थे।

QRSAM Explained: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत को मिलने जा रही है नई एयर डिफेंस शील्ड, पाकिस्तान और चीन के सिस्टम से क्यों है बेहतर?

QRSAM Explained: India’s New Air Defence Shield After Operation Sindoor

QRSAM Explained: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों से हमले की कोशिश की थी। पाकिस्तान की ओर से हुए मिसाइल, ड्रोन और एयरक्राफ्ट हमलों के बाद भारत को यह एहसास हुआ कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम कारगर तो है, लेकिन इसमें अब भी कुछ खामियां हैं। जिसके बाद QRSAM यानी क्विक रिएक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम को खरीदने का फैसला लिया गया। यह सिस्टम मॉडर्न वारफेयर की चुनौतियों से निपटने के लिए एडवांस सिस्टम से लैस है। यह सिस्टम ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों और अचानक हुए हवाई हमलों से तुरंत निपट सकता है। QRSAM की लागत करीब 30,000 करोड़ रुपये होगी और रक्षा मंत्रालय जून में प्रस्तावित रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डीएसी की बैठक में इस सौदे की मंजूरी दे सकता है। जल्द ही खरीदने की मंजूरी देने वाला है।

क्यों जरूरी है QRSAM?

ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि आज के युद्ध में खतरे अचानक और बहुत तेजी से आते हैं। पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम किसी जगह पर स्थायी तौर पर तैनात होते हैं, ऐसे तेजी से बदलते हालात में हमेशा प्रभावी नहीं होते। वहीं QRSAM को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह चलते-चलते भी लक्ष्य को पहचान सकता है और उसे निशाना बना सकता है। इसे मोबाइल डिप्लॉयमेंट के लिए बनाया गया है, यानी सेना जहां रुकेगी, वहीं से इसे तैनात किया जा सकता है।

QRSAM की ताकत क्या है?

यह सिस्टम लगभग 30 किलोमीटर की रेंज में आने वाले किसी भी हवाई खतरे को पहचान कर उसे निशाना बना सकता है। चाहे वह फाइटर जेट हो, अटैक हेलिकॉप्टर, ड्रोन, या फिर क्रूज मिसाइल। इसकी रडार यूनिट्स और मिसाइल दोनों भारत में बनी हैं। यह सिस्टम पूरी तरह ‘ट्रैक-व्हील-शूट’ क्षमता रखता है यानी चलते वाहन से लक्ष्य की पहचान और उसे मार गिराना संभव है। यह 6×6 हाई मोबिलिटी व्हीकल्स पर तैनात किया जाता है, जिससे इसे युद्ध के मैदान में तेजी से ले जाया जा सकता है। चाहे रेगिस्तानी इलाका हो, पहाड़ी क्षेत्र हो या मैदानी क्षेत्र, QRSAM हर तरह के इलाके में प्रभावी ढंग से काम करता है।

इसमें मल्टीफंक्शन फायर कंट्रोल रडार (MFCR) लगा है, जो एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसके अलावा इसका बैटरी सर्विलांस रडार (BSR) 360 डिग्री कवरेज और 120 किमी तक की डिटेक्शन कैपेबिलिटी देता है। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम (EOTS) लगा है, जो खराब मौसम या रडार जैमिंग की स्थिति में भी टारगेट को ट्रैक कर सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर से मिला सबक

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा कि पाकिस्तान ड्रोन जैसी सस्ते लेकिन खतरनाक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकता है। वहीं चीन पहले से ही अपने एयर डिफेंस को लगातार अपग्रेड कर रहा है। ऐसे में सीमावर्ती इलाकों जैसे राजस्थान, पंजाब, लद्दाख और अरुणाचल में QRSAM जैसी तुरंत जवाब देने वाले सिस्टम की तैनाती जरूरी हो गई है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, एक सीमित स्केल पर QRSAM की तैनाती हुई थी, और इसने पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कुछ ड्रोनों को मार गिराया था। इसके बाद से इसे सेना में शामिल करने का फैसला लिया गया।

सरकार ने संकेत दिया है कि पहली फेज में सेना को तीन QRSAM रेजिमेंट दी जाएंगी। प्रत्येक रेजिमेंट में छह लॉन्चर होंगे और हर लॉन्चर पर छह मिसाइलें होंगी। इस प्रकार एक रेजिमेंट में 36 मिसाइलें होंगी। यह सिस्टम DRDO ने बनाया है और पूरी तरह स्वदेश में ही बनाया गया है। QRSAM की मिसाइलों का निर्माण भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) द्वारा किया जाएगा और रडार व फायर कंट्रोल सिस्टम्स BEL बनाएगा।

सरकार के Make in India मिशन के तहत QRSAM को 90% से अधिक स्वदेशी कंपोनेंट्स के साथ डेवलप किया गया है। DRDO की अगुवाई में इस पर काम हुआ और इसके निर्माण में BEL, BDL और अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों को शामिल किया गया। 2024 तक इसे 99% स्वदेशी बनाने का लक्ष्य है।

पुराने रूसी सिस्टम होंगे रिप्लेस

भारतीय सेना अभी भी एयर डिफेंस के लिए पुराने रूसी सिस्टम जैसे शिल्का, स्ट्रेला-10M, ओसा-AK, पिचौरा और तंगुष्का पर निर्भर है। इनमें से कई सिस्टम 70-80 के दशक में खरीदे गए थे और अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। उदाहरण के लिए, शिल्का एक ट्रैक गन सिस्टम है जो एक मिनट में 8000 राउंड फायर कर सकता है, लेकिन यह क्रूज मिसाइल या ड्रोन के खिलाफ ज्यादा असरदार नहीं है।

स्ट्रेला-10M जैसे सिस्टम सिर्फ 5 किमी तक असरदार होते हैं और उन्हें बार-बार रीलोड करना पड़ता है। वहीं तंगुष्का जैसे सिस्टम में मिसाइल की रेंज केवल 8 किलोमीटर है। OSA-AK में भी कई सीमाएं हैं, जो अब आधुनिक हवाई खतरों के सामने बहुत कारगर नहीं है।

QRSAM इन सभी की जगह लेने जा रहा है क्योंकि यह न केवल रेंज में बेहतर है बल्कि अधिक मोबाइल, तेज और ऑल-वेदर ऑपरेशनल भी है। QRSAM की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चलते-चलते तैनात किया जा सकता है। यानी सेना की टुकड़ी जहां रुकेगी, वहीं से यह सिस्टम टारगेट को खोज भी सकता है और हमला भी कर सकता है। यह दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों में बेहतर काम कर सकता है, जहां पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम को सेटअप करना मुश्किल होता है।

ट्रायल्स में किया साबित

2020 से 2023 के बीच QRSAM के कई ट्रायल्स हुए, जिसमें 2019, 2020 और 2022 में चांदीपुर, ओडिशा के इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में हुए परीक्षण शामिल हैं। इन ट्रायल्स में दिन और रात दोनों समय, और हर तरह के मौसम में इसके काम करने की क्षमता को परखा गया। इन ट्रायल्स में इसने क्रूज मिसाइल और ड्रोन जैसे टारगेट्स को बेहद सटीकता से मार गिराया। DRDO ने इसकी डिजाइनिंग में इस बात का ध्यान रखा है कि यह सिस्टम रेगिस्तान से लेकर पहाड़ तक सभी टेरेन में काम कर सके।

QRSAM के शामिल होने से भारत की सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव आएगा। खासकर जब फॉरवर्ड लोकेशन्स पर टैंक या इंफैंट्री की मूवमेंट हो रही हो, तब यह सिस्टम उनके साथ चलकर उन्हें हवाई हमलों से बचाने में सक्षम होगा।

अब तक भारतीय सेना को सीमावर्ती इलाकों में स्थायी रूप से स्थापित एयर डिफेंस सिस्टम्स पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन QRSAM की तैनाती से ये सीमाएं खत्म हो जाएंगी।

QRSAM मिसाइल मैक 2.5-3 की सुपरसोनिक रफ्तार से निशाना बनाती है। यह मिड-कोर्स इनर्शियल नेविगेशन और टर्मिनल एक्टिव रडार होमिंग के जरिए सटीक निशाना लगाती है। इसका उच्च विस्फोटक प्री-फ्रैगमेंटेड वॉरहेड लक्ष्य को पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम है।

पाकिस्तान का LY-80 और चीन का HQ-9 सिस्टम

सबसे पहले बात करें रेंज की। QRSAM की अधिकतम मारक दूरी 25 से 30 किलोमीटर तक है। वहीं पाकिस्तान का LY-80 सिस्टम चीन की मदद से बनाया एक लो-टू-मीडियम एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसकी रेंज लगभग 40 किमी तक मानी जाती है। यह सिस्टम मोबाइल जरूर है, लेकिन इसके ट्रैकिंग और फायर कंट्रोल फीचर्स काफी हद तक पारंपरिक हैं। इसकी रडार क्षमता सीमित है और मल्टीटारगेट ट्रैकिंग की दक्षता QRSAM जैसी नहीं है।

दूसरी ओर चीन का HQ-9 सिस्टम लंबी दूरी के लिए डिजाइन किया गया है और यह S-300 की तकनीक पर आधारित है। HQ-9 के पास रेंज और एडवांस ट्रैकिंग सिस्टम जरूर हैं, लेकिन इसकी तैनाती प्रक्रिया धीमी और भारी है। यह सिस्टम स्थिर जगहों पर बेहतर काम करता है, जबकि मोबाइल वॉरफेयर की जरूरतें इससे पूरी नहीं होतीं।

QRSAM क्यों है अलग और बेहतर?

QRSAM को DRDO ने भारतीय सेना की खास जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया है। यह सिस्टम ट्रैक-व्हील-शूट कैपेबिलिटी से लैस है – यानी चलते वाहन से ही लक्ष्य को ट्रैक करके मिसाइल दागी जा सकती है। यह विशेषता पाकिस्तान और चीन के सिस्टम में नहीं मिलती।

QRSAM की मारक दूरी करीब 30 किलोमीटर है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत है इसकी तेज तैनाती (Quick Deployment), हाई मोबिलिटी (Mobility) और मल्टीटारगेट क्षमता। इसमें दो अत्याधुनिक रडार सिस्टम BSR और MFCR — लगे हैं, जो 360-डिग्री कवरेज और 120 किमी तक की ट्रैकिंग क्षमता देते हैं। साथ ही इसमें Electro-Optical Tracking System (EOTS) है, जो बिना रडार के भी लक्ष्य खोज सकता है। इसके विपरीत, पाकिस्तान के LY-80 की रडार क्षमता सीमित है और चीन का HQ-9 सिस्टम भले ही लॉन्ग रेंज रडार से लैस हो, लेकिन उसकी रिस्पॉन्स टाइम धीमा है और वह क्लोज-इन थ्रेट्स को उसी फुर्ती से पकड़ नहीं सकता। वहीं QRSAM का रिएक्शन टाइम 6 सेकंड से भी कम है, और यह मात्र छह सेकंड में टारगेट को लॉक और फायर कर सकता है। वहीं, ट्रांसपोर्ट से फायर मोड में स्विच करने में LY-80 / HQ-16 का रिएक्शन टाइम ज्यादा समय लेता है।

टारगेट एंगेजमेंट

अगर टारगेट एंगेजमेंट की बात करें, तो उसमें QRSAM ज्यादा एडवांस्ड है। यह UAVs, फाइटर जेट, ड्रोन, हेलिकॉप्टर और क्रूज मिसाइल तक को सटीकता से निशाना बना सकता है। पाकिस्तान का LY-80 भी एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइल के लिए सक्षम बताया गया है, लेकिन इसकी मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट क्षमता सीमित है। चीन का HQ-9 लॉन्ग रेंज एयर थ्रेट जैसे बड़े फाइटर जेट्स और बैलिस्टिक मिसाइल को टारगेट करता है, लेकिन यह सिस्टम नजदीक के, तेज़ी से मूव करने वाले टारगेट्स के लिए उतना असरदायक नहीं माना जाता।

देता है रीयल टाइम प्रोटेक्शन

अब बात मोबिलिटी की करें तो QRSAM का सबसे बड़ा फायदा यही है कि यह हाई मोबिलिटी व्हीकल पर आधारित है और इसमें ट्रैक-व्हील-शूट की क्षमता है, यानी सेना की टुकड़ी के साथ-साथ चलते हुए भी यह मिसाइल फायर कर सकता है। पाकिस्तान का LY-80 भले ही मोबाइल हो, लेकिन इसकी तैनाती में ज्यादा समय लगता है। चीन का HQ-9 सिस्टम भारी और स्थिर होता है, जिसकी तैनाती युद्ध के बीच में करना बेहद मुश्किल होता है। HQ-9 और LY-80 मुख्य रूप से फिक्स्ड बेस सुरक्षा के लिए उपयोग किए जाते हैं, वहीं QRSAM एक पूरी तरह मोबाइल फोर्स के साथ मूव कर सकता है और यह टैंक रेजिमेंट या इन्फैंट्री कॉलम के साथ रीयल टाइम प्रोटेक्शन देता है।

NSG International Seminar: आतंकवाद के खिलाफ स्वदेशी हथियारों से वार, मेजर राजप्रसाद को किया एनएसजी काउंटर आईईडी इनोवेटर अवॉर्ड से सम्मानित

NSG International Seminar: Major Rajprasad Honoured for Indigenous Anti-IED Weapons
Image Source: Indian Army

NSG International Seminar: भारतीय सेना के 7 इंजीनियर रेजिमेंट के मेजर राजप्रसाद आरएस को आज नई दिल्ली में आयोजित नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) इंटरनेशनल सेमिनार में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन द्वारा प्रतिष्ठित “एनएसजी काउंटर आईईडी इनोवेटर अवॉर्ड” से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें उनके दो अत्याधुनिक इनोवेशंस ‘अग्निअस्त्र- मल्टी टारगेट पोर्टेबल रिमोट डेटोनेशन सिस्टम’ और ‘शत्रुनाश- हैंडहेल्ड ईएमपी गन’ के लिए दिया गया है। मेजर राजप्रसाद के इनोवेशंस ने भारतीय सेना की तकनीकी क्षमताओं को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है और आतंकवाद विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

सेना के कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स से ताल्लुक रखने वाले मेजर राजप्रसाद के तीन इनोवेशंस ‘अग्निअस्त्र’, ‘शत्रुनाश’, और पहले से इंडक्टेड ‘विद्युत रक्षक- IoT एनेबल्ड जेनरेटर मॉनिटरिंग प्रोटेक्शन एंड कंट्रोल सिस्टम’ को भारतीय सेना में पहले ही शामिल किया जा चुका है। ये सभी इनोवेशंस न केवल तकनीकी रूप से एडवांस हैं, बल्कि युद्ध और आपदा राहत कार्यों में भी बेहद उपयोगी हैं।

NSG International Seminar: अग्निअस्त्र: एक गेम-चेंजिंग डेटोनेशन सिस्टम

‘अग्निअस्त्र- मल्टी टारगेट पोर्टेबल रिमोट डेटोनेशन सिस्टम’ एक माइक्रोप्रोसेसर-बेस्ड इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है, जो वायर्ड और वायरलेस दोनों मोड्स में काम करता है। इसकी रेंज 2.5 किलोमीटर तक है। इससे लंबी दूरी से कई टारगेट्स को एक साथ या अलग-अलग डेटोनेट किया जा सकता है। यह सिस्टम मैनुअली या अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (यूएवी) और अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स (यूजीवी) के जरिए डिप्लॉय किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल रूम इंटरवेंशन, रिमोट बंकर डिस्ट्रक्शन, और रिजर्व डेमोलिशन जैसे ऑपरेशंस में किया जा सकता है।

अग्निअस्त्र की खासियत यह है कि यह काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशंस और आईईडी डिस्ट्रक्शन में सैनिकों की जान का जोखिम कम करता है। यह सिस्टम पारंपरिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी मिशनों में एक स्ट्रैटेजिक एडवांटेज प्रदान करता है। मार्च 2024 में राजस्थान के जैसलमेर में आयोजित ‘एक्सरसाइज भारत शक्ति’ के दौरान इस डिवाइस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने प्रदर्शित किया गया था, जहां उन्होंने इसकी क्षमताओं को सराहा था।

शत्रुनाश: हैंडहेल्ड ईएमपी गन

मेजर राजप्रसाद का दूसरा इनोवेशन ‘शत्रुनाश- हैंडहेल्ड ईएमपी गन’ में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स (ईएमपी) गन है, जो दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट्स को निष्क्रिय कर सकती है। यह पोर्टेबल डिवाइस आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, जैसे कम्युनिकेशन डिवाइसेज और ड्रोन, को बिना किसी फिजिकल डैमेज के निष्क्रिय कर सकती है। इसका कॉम्पैक्ट डिजाइन और पोर्टेबिलिटी इसे फील्ड ऑपरेशंस में बेहद असरदार बनाता है।

शत्रुनाश का उपयोग विशेष रूप से काउंटर-आईईडी ऑपरेशंस में महत्वपूर्ण है, जहां यह आतंकवादी गतिविधियों को रोकने में मदद करता है। इसकी तकनीक दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स को टारगेट करके उन्हें बेकार कर देती है, जिससे सैनिकों को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से मिशन पूरा करने में मदद मिलती है। यह डिवाइस भारतीय सेना की टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट की दिशा में एक और मील का पत्थर है।

मेजर राजप्रसाद के इनोवेशंस को भारतीय सेना के आर्मी डिजाइन ब्यूरो (एडीबी) और फाउंडेशन ऑफ इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (एफआईटीटी), आईआईटी दिल्ली के सहयोग से डेवलप किया गया है। इन डिवाइसेज की टेक्नोलॉजी को प्राइवेट डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम को ट्रांसफर किया गया है, ताकि इनका बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन हो सके।

मेजर राजप्रसाद के अन्य इनोवेशंस, जैसे ‘विद्युत रक्षक’ और ‘एक्सप्लोडर- कामिकाजे एंड आईईडी डिस्पोजल RoV’, भी भारतीय सेना में शामिल किए गए हैं। ‘विद्युत रक्षक’ एक IoT-एनेबल्ड जेनरेटर मॉनिटरिंग सिस्टम है, जो पावर सप्लाई को मैनेज करने में मदद करता है, जबकि ‘एक्सप्लोडर’ एक ऑल-टेरेन अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल है, जो रेकी, सर्विलांस, और आईईडी डिस्पोजल जैसे मिशनों में उपयोगी है।

मेजर राजप्रसाद के इनोवेशंस को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी सराहा है। गंगटोक में आयोजित आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में ‘अग्निअस्त्र’ को लॉन्च करते समय जनरल द्विवेदी ने मेजर राजप्रसाद की नवाचार भावना और आर्मी डिजाइन ब्यूरो के योगदान की प्रशंसा की थी।

Military Innovations: बूट, बंदूक और ब्रेन! भारतीय सेना के जवान खुद बना रहे हैं अगली पीढ़ी के हथियार, अब सिर्फ लड़ते नहीं, इनोवेशंस भी करते हैं

नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) का इंटरनेशनल सेमिनार नई दिल्ली में आयोजित किया गया, जिसमें आतंकवाद और आईईडी से निपटने के लिए नई तकनीकों और रणनीतियों पर चर्चा हुई। इस सेमिनार में विभिन्न केंद्रीय और राज्य पुलिस बलों के साथ-साथ विदेशी डेलिगेट्स ने भी हिस्सा लिया। मेजर राजप्रसाद के इनोवेशंस को इस सेमिनार में खासतौर पर सराहा गया, क्योंकि ये काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशंस में गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं।