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Surveillance and Electro-Optics 2025: “आधुनिक जंग का नया मंत्र; पहले देखो, दूर तक देखो, सटीक देखो!” ऑपरेशन सिंदूर ने साबित की आत्मनिर्भरता की ताकत

Surveillance and Electro-Optics 2025: India’s Vision to See First, See Far, Strike Smart
PIC Source: IAF

Surveillance and Electro-Optics 2025:  ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की डिफेंस कैपेबिलिटीज को वैश्विक स्तर पर साबित किया। इस ऑपरेशन में स्वदेशी टेक्नोलॉजी, खासकर इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) और आकाश तीर सिस्टम ने दिखाया कि भारत अब न सिर्फ अपनी एयरस्पेस की सुरक्षा कर सकता है, बल्कि दुश्मन के डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी सटीक हमलों से खासा नुकसान पहुंचा सकता है। इस सक्सेस स्टोरी की गूंज आज दिल्ली में हुए ‘सर्विलांस एंड इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स इंडिया 2025’ सेमिनार और प्रदर्शनी में सुनाई दी।

सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज (CAPS) और इंस्टीट्यूट ऑफ मिलिट्री रिसर्च (IMR) द्वारा आयोजित इस इवेंट में भारत के टॉप मिलिट्री ऑफिसर्स, डिफेंस एक्सपर्ट्स, इंडस्ट्री लीडर्स, और पॉलिसी मेकर्स ने हिस्सा लिया। इस सेमिनार का मकसद था भारत की सर्विलांस और इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स (EO) टेक्नोलॉजी को फ्यूचर वॉरफेयर के लिए तैयार करना।

Surveillance and Electro-Optics 2025:  ऑपरेशन सिंदूर: स्वदेशी टेक्नोलॉजी की ताकत

चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत के रक्षा इतिहास सुनहरा अध्याय बताया। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि जब स्वदेशी इनोवेशन को सही दिशा में प्रयोग किया जाता है, तो हम ग्लोबल बेंचमार्क्स को न सिर्फ मैच कर सकते हैं, बल्कि उनसे आगे भी निकल सकते हैं।” उन्होंने कहा, इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम IACCS ने सेंसर-टू-शूटर टाइमलाइन को जबरदस्त तरीके से कम किया, जिससे हम दुश्मन के डिसीजन साइकिल से तेजी से रिस्पॉन्ड कर सके। इसका रिजल्ट ये हुआ कि एक भी पाकिस्तानी एयरक्राफ्ट भारतीय एयरस्पेस में घुस नहीं सका, और हमारे प्रिसीजन स्ट्राइक्स ने उनके एयर डिफेंस सिस्टम्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया।

एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने जोर देकर कहा “यह सफलता कोई इत्तेफाक नहीं थी। यह सालों की मेहनत, स्वदेशी डेवलपमेंट, रिगरस टेस्टिंग, और कंटीन्यूअस रिफाइनमेंट का नतीजा था। ऑपरेशन सिंदूर ने आत्मनिर्भरता की ताकत को साबित किया।”

सर्विलांस: मॉडर्न वॉरफेयर का कोर

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि सर्विलांस और इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स अब सिर्फ एक फोर्स मल्टीप्लायर नहीं, बल्कि मॉडर्न वॉरफेयर का सेंट्रल पिलर है। उन्होंने ग्लोबल कॉन्फ्लिक्ट्स जैसे आर्मेनिया-अजरबैजान, रूस-यूक्रेन, और इजरायल-हमास का उदाहरण देते हुए बताया कि इन जंगों ने एक बात साफ की, “जो पहले देखता है, सबसे दूर देखता है, और सबसे सटीक देखता है, वही जीतता है।”

उन्होंने कहा कि मॉडर्न हथियार, जैसे ब्रह्मोस, SCALP, और HAMMER, सैकड़ों किलोमीटर दूर टारगेट्स को पिनपॉइंट एक्यूरेसी के साथ हिट कर सकते हैं। इससे फ्रंट, रियर, और फ्लैंक्स जैसे ट्रेडिशनल कॉन्सेप्ट्स अब रिलेवेंट नहीं रहे। “अब बैटलफील्ड और थिएटर एक हो गए हैं। हमें दुश्मन को उनके स्टेजिंग एरियाज, एयरफील्ड्स, और बेस में ही ट्रैक करना होगा, न कि तब जब वे हमारी बॉर्डर्स के पास पहुंचें।”

दीक्षित ने हाइपरसोनिक मिसाइल्स और ड्रोन स्वार्म्स की रफ्तार का जिक्र करते हुए कहा, “ये हथियार मिनटों में सैकड़ों किलोमीटर पार कर लेते हैं। ऐसे में रियल-टाइम या नियर-रियल-टाइम सर्विलांस अब ऑप्शनल नहीं, बल्कि सर्वाइवल की जरूरत है।” उन्होंने मेगा स्मॉल सैटलाइट कॉन्स्टलेशन्स, EO, SAR, और SIGINT के फ्यूजन को क्रेडिट दिया, जो 24×7 डायनामिक और प्रेडिक्टिव बैटलफील्ड अवेयरनेस दे रहे हैं। उन्होंने कहा, “अब हम सिर्फ ऑब्जर्व नहीं करते, बल्कि प्रेडिक्ट और प्री-एम्प्ट भी करते हैं।”

दीक्षित ने कहा कि फ्यूचर बैटलफील्ड में मल्टी-डोमेन सेंसर, क्लाउड डेटा, और AI-इंटीग्रेटेड सिस्टम्स की जरूरत होगी। “MALE और HALE प्लेटफॉर्म्स जैसे MQ-9, RUSTOM, और TAPAS को मॉड्यूलर पेलोड्स, एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन, और AI-बेस्ड एनालिसिस के साथ अपग्रेड करना होगा।” उन्होंने कहा कि मिनी हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर और ऑनबोर्ड एज कंप्यूटिंग से लैटेंसी कम होगी, जिससे सिस्टम्स इंसानों से तेजी से डिसीजन ले सकें। “फ्यूचर वॉर्स वही जीतेगा, जो OODA लूप (Observe, Orient, Decide, Act) को सबसे तेजी से पूरा करेगा।”

चीन की चुनौती: स्पेस में नई जंग

सेमिनार में चीन के मिलिट्री स्पेस प्रोग्राम पर भी चर्चा हुई। एयर मार्शल दीक्षित ने बताया कि 2010 में चीन के पास सिर्फ 36 सैटलाइट्स थे, लेकिन 2024 तक यह संख्या 1,000 से ज्यादा हो गई, जिनमें 360 ISR मिशंस के लिए हैं। अप्रैल 2024 में चीन ने एक इंडिपेंडेंट एयरोस्पेस फोर्स बनाई, जो सीधे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन को रिपोर्ट करती है। उनके सैटलाइट्स अब LEO में “डॉगफाइटिंग” मैन्यूवर्स कर सकते हैं, जो दुश्मन के स्पेस असेट्स को ट्रैक और डिसेबल करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। दीक्षित ने कहा, “चीन ने ‘किल चेन’ से ‘किल मेश’ की तरफ शिफ्ट किया है। “यह एक इंटीग्रेटेड नेटवर्क है, जो ISR सैटलाइट्स को वेपन सिस्टम्स के साथ सीमलेसली जोड़ता है। AI-ड्रिवन डेटा फ्यूजन से वे रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस हासिल कर रहे हैं।”

इसके जवाब में भारत की तैयारियों पर बात करते हुए दीक्षित ने कहा कि हमें अपनी सर्विलांस कैपेबिलिटीज को और मजबूत करना होगा। “ISRO और DRDO की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पॉलिसी ने प्राइवेट सेक्टर को नई ताकत दी है। हमें AI-इंटीग्रेटेड EO सिस्टम्स, मल्टीस्पेक्ट्रल ऑल-वेदर सिस्टम्स, और इंटरऑपरेबल प्लेटफॉर्म्स चाहिए, जो सियाचिन से लेकर हिंद महासागर तक हर परिस्थिति में काम करें।”

प्राइवेट सेक्टर: आत्मनिर्भरता का नया पार्टनर

सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज के डायरेक्टर जनरल रिटायर्ड एयर वाइस माार्शल अनिल गोलानी ने प्राइवेट सेक्टर की रोल को हाईलाइट करते हुए कहा, “तकनीकी बदलाव की रफ्तार इतनी तेज है कि सरकार अकेले इसे मैनेज नहीं कर सकती। एवीएम गोलानी ने भी यही बात दोहराई: “EO और सर्विलांस सिस्टम्स भारत को डिफेंस इनोवेशन में ग्लोबल लीडर बना सकते हैं। हमें आत्मनिर्भरता और कोलैबोरेशन पर फोकस करना होगा।”

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उन्होंने ISRO और DRDO की तारीफ की, जो प्राइवेट कंपनियों को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर रहे हैं। “ISRO का ऑप्टिकल इमेजिंग सिस्टम ट्रांसफर एक गेम-चेंजर है। इससे कॉम्पैक्ट और लॉन्ग-रेंज सर्विलांस प्लेटफॉर्म्स बन रहे हैं, जो हमारी ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी को बढ़ा रहे हैं।” दीक्षित ने भी प्राइवेट सेक्टर से अपील की कि वे नेशनल सिक्योरिटी में पार्टनर बनें, न कि सिर्फ वेंडर्स। उन्होंने कहा, “AI-ड्रिवन इमेजिंग सीकर्स, ऑटोमेटेड थ्रेट रिकॉग्निशन, और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स की जरूरत है। हमें ऐसे सिस्टम्स चाहिए, जो हर मौसम और ज्योग्राफिकल कंडीशन में काम करें।”

Women in Indian Armed Forces: मोदी राज में नारी शक्ति का पराक्रम; भारतीय सेनाओं में 11 साल में तीन गुना बढ़ी महिलाओं की भागीदारी

Women in Indian Armed Forces: 3X Rise in Modi Era
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Women in Indian Armed Forces: 7 से 10 मई तक चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को इस मिशन का चेहरा बनाया गया। पूरे देश ने उनकी काबिलियत की सराहना की। वहीं 9 मई को लेफ्टिनेंट कमांडर यशस्वी सोलंकी (27) को भारत के राष्ट्रपति की पहली महिला एड-डी-कैंप (ADC) बनने का गौरव प्राप्त किया। ये नियुक्तियां बताती हैं कि भारतीय सेना में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 11 सालों में भारत ने नारी शक्ति को सशक्त बनाने की दिशा में कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। खास तौर पर रक्षा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लिए सरकार ने कई नीतिगत बदलाव किए, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की संख्या में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई है।

2014 में जहां सशस्त्र बलों में लगभग 3,000 महिला अधिकारी थीं, वहीं आज यह संख्या बढ़कर 11,000 से अधिक हो गई है। एक दशक पहले तक जिन क्षेत्रों में महिलाओं की मौजूदगी सीमित थी, वहीं अब वे स्थायी कमीशन से लेकर नेशनल डिफेंस अकादमी (NDA) जैसे संस्थानों में अपनी जगह बना चुकी हैं। मोदी सरकार के 11 साल पूरे होने पर केंद्र ने जो रिपोर्ट जारी की है, उसमें नारी सशक्तिकरण का विशेष तौर पर उल्लेख किया गया है। खासतौर पर सेना में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को इस रिपोर्ट में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्शाया गया है।

Women in Indian Armed Forces: 2014 में सिर्फ 3,000 महिला अधिकारी, अब 11,000 के पार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद से रक्षा क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए। सरकार ने अपने 11 साल के कार्यकाल के अवसर पर जारी एक बयान में कहा, “पिछले 11 वर्षों में महिलाएं भारत के रक्षा बलों में केंद्र में रही हैं। 2014 में तीनों सेनाओं में केवल 3,000 महिला अधिकारी थीं, लेकिन आज यह संख्या 11,000 से अधिक हो गई है। यह बदलाव नीतियों और सोच में आए परिवर्तन का स्पष्ट प्रमाण है।”

हालांकि, यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि 2014-15 के आंकड़ों में महिला डॉक्टर, डेंटिस्ट और नर्स शामिल नहीं थीं, जबकि नवीनतम आंकड़ों में इन्हें शामिल किया गया है। फिर भी, यह बढ़ोतरी महिलाओं की सेना में बढ़ती भागीदारी को दर्शाती है।

स्थायी कमीशन से खुला नेतृत्व का रास्ता

मोदी सरकार ने महिलाओं को सेना में लंबे समय तक सेवा देने और नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाने के अवसर प्रदान करने के लिए कई कदम उठाए। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है 507 महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) दिया गया। जिसके बाद महिलाओं को न केवल लंबी अवधि तक सेना में बने रहने का मौका मिला, बल्कि उन्हें विभिन्न रैंकों और शाखाओं में नेतृत्व करने का अवसर भी मिला।

हालांकि यह बदलाव तब संभव हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला अधिकारियों को भी स्थायी कमीशन का अधिकार है। सरकार द्वारा शारीरिक सीमाओं का हवाला देकर की गई दलीलों को सुप्रीम कोर्ट ने “लिंग आधारित रूढ़ियों” (Sex Stereotypes) के तौर पर खारिज कर दिया। इस फैसले ने सेना में महिलाओं के लिए नए रास्ते खोले और उनके करियर को नई दिशा दी।

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में महिलाओं की एंट्री

2021 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसके तहत महिलाओं को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में प्रवेश की अनुमति दी गई। कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद, 30 मई 2025 को एनडीए के 148वें कोर्स से 17 महिलाओं का पहला बैच ग्रेजुएट हुआ। 2021 के बाद से अब तक कुल 126 महिला कैडेट्स को एनडीए में शामिल किया गया है। यह दिन देश की सैन्य शिक्षा और लैंगिक समानता की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।

सरकार ने अपने बयान में कहा, “यह बदलाव रक्षा क्षेत्रों में महिलाओं के व्यापक एकीकरण को दर्शाता है, चाहे वह युद्ध सहायता हो या फाइटर जेट उड़ाना। यह इस विश्वास को रेखांकित करता है कि शक्ति और सेवा लिंग से परे हैं।”

महिलाएं अब फाइटर पायलट भी, युद्धक मोर्चों पर भी तैनात

पिछले एक दशक में, भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की भूमिका केवल संख्या तक सीमित नहीं रही। सरकार ने नीतिगत बदलावों के माध्यम से महिलाओं को उन क्षेत्रों में भी अवसर प्रदान किए, जो पहले पुरुषों के लिए आरक्षित माने जाते थे। उदाहरण के लिए, महिलाएं अब न केवल युद्ध सहायता भूमिकाओं में, बल्कि फाइटर पायलट, नौसेना के युद्धपोतों पर तैनाती और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं।

जहां पहले महिलाएं केवल सपोर्ट सर्विसेज में दिखती थीं, वहीं अब वे फ्रंटलाइन की भूमिकाएं भी निभा रही हैं। वायुसेना में महिलाएं अब फाइटर जेट्स उड़ा रही हैं और सेना में वे इन्फैंट्री व इंजीनियरिंग कोर जैसी शाखाओं में शामिल हो रही हैं। नौसेना में भी महिला अधिकारियों को युद्धपोतों पर तैनाती दी जा रही है।

2016 में, भारतीय वायुसेना ने पहली बार तीन महिला फाइटर पायलटों को कमीशन किया। इनमें अवनी चतुर्वेदी, भावना कंठ और मोहना सिंह शामिल थीं, जिन्होंने न केवल देश में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सुर्खियां बटोरीं। इसके बाद, कई अन्य महिलाओं ने इस क्षेत्र में कदम रखा और आज भारतीय वायुसेना में महिला पायलटों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

नौसेना में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। 2020 में, नौसेना ने पहली बार दो महिला अधिकारियों को युद्धपोतों पर तैनात किया। इसके अलावा, महिलाएं अब नौसेना के हेलिकॉप्टर पायलट के रूप में भी सेवा दे रही हैं। सेना में, महिलाएं सैन्य पुलिस में शामिल हुई हैं और सीमा पर तैनात इकाइयों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही हैं।

सैनिक स्कूलों से लेकर अग्निवीर बन रहीं महिलाएं

सरकार ने सैनिक स्कूलों में भी लड़कियों के दाखिले की अनुमति दी है। अब देशभर के 33 सैनिक स्कूलों में छात्राएं पढ़ाई कर रही हैं। इससे भविष्य में NDA और सेना की अन्य शाखाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी और बढ़ेगी।

अग्निपथ योजना के तहत भी महिलाओं की भर्ती को बढ़ावा दिया जा रहा है। थलसेना, वायुसेना और नौसेना में ‘अग्निवीर’ के तौर पर महिला अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है और फील्ड में तैनात किया जा रहा है।

युद्धपोतों पर महिलाओं की तैनाती

भारतीय नौसेना में भी बदलाव की लहर देखने को मिली है। पहले महिलाओं की तैनाती केवल किनारे (shore-based postings) तक सीमित थी। लेकिन अब INS विक्रांत जैसे विमान वाहक पोत पर भी महिला अधिकारी तैनात की जा रही हैं। यह न केवल साहसिक है बल्कि तकनीकी दृष्टिकोण से भी महिला अधिकारियों की क्षमताओं पर भरोसा जताने का प्रतीक है।

सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और कल्याण योजनाओं में भागीदारी

महिलाओं को अब Armed Forces Tribunal (AFT) जैसे संस्थानों में भी प्रतिनिधित्व मिलने लगा है। इसके अलावा महिला अधिकारियों को प्रशासनिक निर्णय लेने वाली समितियों में भी शामिल किया जा रहा है।

सरकार की कई योजनाएं जैसे कि Ex-Servicemen Welfare Schemes, जिसमें युद्ध विधवाओं और शहीदों की पत्नियों को सम्मान और सहायता दी जाती है, उसमें भी महिला सैनिकों की भूमिका उभर कर सामने आई है।

DRDO, HAL, और रक्षा उद्योग में महिलाओं की सक्रिय भूमिका

यह बात केवल वर्दीधारी सैनिकों तक सीमित नहीं है। DRDO, HAL और अन्य रक्षा अनुसंधान एवं उत्पादन संस्थानों में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। महिला वैज्ञानिक अब स्वदेशी मिसाइल, युद्धक ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम्स पर काम कर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में भारत की बेटियां

संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन (UN Peacekeeping Missions) में भी भारत की महिला सैनिकों की उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की साख बढ़ा रही है। भारत ने कई बार महिला फोर्स कंटिंजेंट्स को UN मिशन में भेजा है, जो संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में सेवा देते हुए मानवता की मिसाल पेश कर रही हैं।

सरकार ने किए कई नीतिगत बदलाव

महिलाओं को सशस्त्र बलों में शामिल करने के लिए सरकार ने कई नीतिगत बदलाव किए। इनमें भर्ती प्रक्रिया में सुधार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों में लैंगिक समानता और कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएं शामिल हैं। उदाहरण के लिए, सेना ने महिलाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए हैं, जो उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए हैं।

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इन नीतिगत बदलावों का प्रभाव न केवल सेना तक सीमित है, बल्कि समाज में भी देखा जा सकता है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने युवा लड़कियों को प्रेरित किया है कि वे रक्षा क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में सोचें। स्कूलों और कॉलेजों में आयोजित होने वाले जागरूकता कार्यक्रमों ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना को और ताकतवर बनाने की तैयारी, DAC की बैठक में हो सकते हैं ये बड़े फैसले

IAF AWACS RFI

Post Operation Sindoor: पिछले महीने हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की वायुसेना (IAF) खुद को और मजबूत बनाने की तैयारियों में जुटी है। रक्षा मंत्रालय अब छह नए एम्ब्राएर एयरक्राफ्ट खरीदने की योजना बना रहा है, जिन्हें AWACS (Airborne Warning and Control System) यानी एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम में बदला जाएगा। इसके साथ ही वायुसेना को और छह मिड-एयर रिफ्यूलर (हवाई ईंधन भरने वाले विमान) भी मिलने वाले हैं। इसे लेकर जल्द ही रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की बैठक होने वाली है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करेंगे।

Post Operation Sindoor: AWACS क्या है और इसकी क्यों जरूरत है?

AWACS यानी एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम, किसी भी देश की वायुसेना के लिए आंख और कान का काम करता है। ये विमान 350 किलोमीटर दूर तक दुश्मन की गतिविधियों को ट्रैक कर सकते हैं, चाहे वह लड़ाकू विमान हो, मिसाइल हो या तोपखाना। इसके साथ ही ये सिस्टम ऑपरेशन के दौरान अपने जेट्स को दिशा और डेटा भी भेजता है, जिससे वायुसेना का रिस्पॉन्स और तेज और सटीक हो जाता है।

भारत के पास अभी DRDO के बनाए Netra Mk1 और इजरायली फाल्कन रडार सिस्टम वाले तीन विमान हैं। लेकिन पाकिस्तान के पास 8 Saab-2000 AEW&C विमान हैं, जिनमें Erieye रडार सिस्टम लगा है। इसके अलावा चार चीनी ZDK-03 AEW&C, तीन Dassault Falcon DA-20 इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर एयरक्राफ्ट भी उसके पास मौजूद हैं।

बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की वायुसेना ने S-400 एयर डिफेंस सिस्टम के जरिए एक पाकिस्तानी Saab-2000 AEW&C विमान को 314 किलोमीटर दूर से मार गिराया था।

Post Operation Sindoor: भारत का स्वदेशी Netra Mk1A

नई योजना के तहत भारत ब्राजील से छह अतिरिक्त एम्ब्राएर एयरक्राफ्ट खरीदेगा। इन विमानों को डीआरडीओ के बनाए नेत्रा मार्क 1ए एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार के साथ एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम में बदला जाएगा।

ये रडार सिस्टम मौजूदा Netra Mk1 से कहीं ज्यादा सटीक, तेज और बेहतर डेटा लिंकिंग क्षमताओं से लैस होगा। Netra Mk1A न केवल दुश्मन की मूवमेंट को दूर से पहचान सकता है, बल्कि अपने नेटवर्क से जुड़े सभी लड़ाकू विमानों, ड्रोन और ग्राउंड सिस्टम को रियल-टाइम इंटेलिजेंस भी देता है। जिससे ऑपरेशन को फायदा मिलता है।

मिड-एयर रिफ्यूलर

फिलहाल भारत के पास 6 IL-78 मिड-एयर रिफ्यूलर हैं जो रूस से खरीदे गए थे। लेकिन अब रक्षा मंत्रालय एक KC-135 Stratotanker को अमेरिका के मेट्रिया मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर से वेट लीज पर ले रहा है और 6 नए रिफ्यूलर विमानों की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी कर चुका है।

मिड-एयर रिफ्यूलर की खासियत यह है कि यह हवाई जहाजों को उड़ान के दौरान ही ईंधन भर सकता है, जिससे मिशन की रेंज बढ़ जाती है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने लगभग 13 पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जिनमें कुछ उत्तर में पेशावर से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक फैले थे। ऐसे ऑपरेशन के लिए लंबी दूरी तक बिना रुके उड़ान भरने की क्षमता बेहद जरूरी हो जाती है।

Post Operation Sindoor: चीन और तुर्की के हथियारों पर होगी ‘रिसर्च’

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पीओके में नौ आतंकी ठिकानों पर बमबारी की और कम से कम 100 आतंकियों को मार गिराया। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 13 हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया। मंगलवार को यह खुलासा हुआ कि 7 से 10 मई के बीच हुए इस संघर्ष में भारत ने पाकिस्तान के पेशावर से लेकर हैदराबाद तक कई स्थानों पर ड्रोन हमले किए थे।

पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के जवाब में ऑपरेशन बुनयान-उम-मरसूस शुरू किया था, जो महज आठ घंटे में विफल हो गया। सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने मंगलवार को कहा कि पाकिस्तान का भारत को 48 घंटे में घुटनों पर लाने का दावा पूरी तरह खोखला साबित हुआ। ऑपरेशन सिंदूर का मकसद पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब देना था, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी।

ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तानी सेना ने चीन और तुर्की के बने हथियार इस्तेमाल किए थे, जो बेकार साबित हुए औऱ भारतीय सीमा में आकर गिर गए। जिनमें चीन की PL-15ई हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल, फतह रॉकेट और तुर्की निर्मित YIHA ड्रोन शामिल हैं। इन हथियारों का विश्लेषण भारत के शीर्ष तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा किया जा रहा है। भारत अब एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास चीनी हथियार प्रणालियों जैसे J-10, JF-17 फाइटर जेट, HQ-9 एय़र डिफेंस सिस्टम और SH-15 हॉवित्जर का रियल टाइम वार में परफॉरमेंस का डेटा उपलब्ध है। इससे भारत को भविष्य की रणनीतियों में काफी मदद मिलने वाली है।

7 जून, 2025 को सैन्य प्रमुखों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े लोगों की एक बैठक हुई। इस बैठक में ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबकों पर चर्चा हुई। इस बैठक में यह सहमति बनी कि भारत को अपनी सैन्य क्षमताओं को और बढ़ाने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान भविष्य में चीन से और अधिक हथियार हासिल करेगा। चीन पहले से ही पाकिस्तान को युआन-क्लास डीजल पनडुब्बियां, फ्रिगेट्स और आर्म्ड ड्रोन उपलब्ध करा रहा है। इसके अलावा, तुर्की भी पाकिस्तान को कॉर्वेट्स बना रहा है, अगस्ता 90बी पनडुब्बियों को अपग्रेड कर रहा है और F-16 विमानों के लिए स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई कर रहा है। सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस खरीद का मकसद पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों की बढ़ती सैन्य क्षमताओं का जवाब देना है।

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साथ ही, बैठक में यह आशंका भी जताई गई है कि भविष्य में पाकिस्तान के जिहादी ग्रुप भारत पर बड़े पैमाने पर आत्मघाती हमला कर सकते हैं। ऐसे में भारतीय सेना को न केवल जवाबी हमले के लिए तैयार रहना होगा, बल्कि पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक निगरानी क्षमता को और मजबूत करना होगा।

11 Years of India defence: तेजस से ब्रह्मोस तक, 11 साल में हुआ सेना का मेगा ट्रांसफॉर्मेशन, कैसे बना भारत एक आधुनिक सैन्य शक्ति

11 Years of India Defence: From Tejas to BrahMos, A Military Makeover
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11 Years of India defence: नरेंद्र मोदी सरकार के केंद्र में 11 साल पूरे होने के साथ, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने भारतीय सेनाओं के आधुनिकीकरण और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी प्रगति पर विशेष ध्यान दिया है। पिछले एक दशक में, अत्याधुनिक डिफेंस इक्विपमेंट्स की खरीद से लेकर स्वदेशी उद्योग को बढ़ावा देने तक, सरकार ने सेना को और अधिक शक्तिशाली और एडवांस बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” पहल के तहत, भारत ने न केवल विदेशों से महत्वपूर्ण उपकरण खरीदे हैं, बल्कि स्वदेशी उत्पादन को भी बढ़ावा दिया है, जिससे विदेशी निर्भरता कम हुई है। आइए, पिछले 11 वर्षों में मोदी सरकार के कार्यकाल में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना को कई अत्याधुनिक डिफेंस सिस्टम्स से लैस किया गया है। इसमें मिसाइल सिस्टम, लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, सबमरीन, रडार सिस्टम और स्मार्ट हथियारों की एक लंबी फेहरिस्त शामिल है।

11 Years of India defence: मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम

भारत ने अपने एयर डिफेंस को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। रूस से पांच रेजिमेंट्स एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा गया, जिसकी रेंज 400 किलोमीटर है। यह सिस्टम भारत की हवाई सीमाओं को और सुरक्षित करने में सक्षम है। इसके अलावा, इज़रायल से बराक-8 मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (MRSAM) खरीदी गई, जिसकी रेंज 70 किलोमीटर है। इसे स्वदेशी सिस्टम्स के साथ इंटीग्रेट कर महत्वपूर्ण रक्षा ठिकानों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।

स्वदेशी स्तर पर, आकाश सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम की कई यूनिट्स भारतीय सेना और वायुसेना के लिए खरीदी गईं, जिनकी रेंज 25 किलोमीटर है। भारतीय नौसेना के लिए ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल की 200 से अधिक यूनिट्स की खरीद के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया गया। इन मिसाइलों की रेंज 290 किलोमीटर है, और कुछ एडवांस संस्करणों की रेंज 450 किलोमीटर तक है।

छोटी दूरी के एयर डिफेंस को मज़बूत करने के लिए, रूस से इग्ला-एस मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) भी खरीदा गया है। इसके साथ ही, भारतीय वायुसेना के पुराने लंबी दूरी के रडारों को आधुनिक एक्टिव अपर्चर फेज्ड ऐरे सिस्टम (Active Aperture Phased Array System) से बदलने के लिए लार्सन एंड टुब्रो के साथ 5,700 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया गया।

आर्टिलरी और स्मार्ट गोला-बारूद

BAE सिस्टम्स से 145 M777 अल्ट्रा-लाइट हॉविट्जर गन खरीदी गईं, जो पहाड़ी इलाकों में बेहद उपयोगी हैं। इसके अलावा 307 एडवांस ATAGS 155mm/52 कैलिबर तोप और 327 हाई मोबिलिटी 6×6 गन टोइंग वाहन की खरीद का 7,000 करोड़ का अनुबंध किया गया।

इसी दौरान 100 K9 वज्र-T गन भी शामिल की गईं, जिनका सौदा 2017 में 720 मिलियन डॉलर में हुआ था। इसके अतिरिक्त 114 स्वदेशी धनुष तोपें भी 2026 तक सेना में शामिल की जाएंगी। थल सेना 300 माउंटेड गन सिस्टम (MGS) और 400 टो गन सिस्टम (TGS) की खरीद की प्रक्रिया में है। ये सिस्टम भारत फोर्ज और टाटा द्वारा निर्मित किए जा रहे हैं।

राइफल और छोटे हथियार

सेना के लिए 1.44 लाख सिग 716 बैटल राइफल्स खरीदी गईं, ताकि पुरानी इंसास राइफल्स को बदला जा सके। भारतीय सेना 2026 तक 114 धनुष तोप सिस्टम्स को शामिल करने की प्रक्रिया में है। इसके अलावा, 300 माउंटेड गन सिस्टम्स (MGS) और 400 टोड गन सिस्टम्स (TGS) की खरीद की प्रक्रिया भी चल रही है। सेना ने 100 के9 वज्र-टी तोपों को भी शामिल किया है, जिसके लिए 2017 में 720 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट हुआ था।

वायुसेना के लिए लड़ाकू और परिवहन विमान

भारतीय वायुसेना को मज़बूत करने के लिए कई बड़े कॉन्ट्रैक्ट किए गए। 2016 में, फ्रांस के साथ 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का 60,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट हुआ। ये सभी विमान अब अंबाला और हासीमारा में तैनात हो चुके हैं। इसके अलावा, अक्टूबर 2024 में अमेरिका से 31 एमक्यू-9बी हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम (RPAS) खरीदने का कॉन्ट्रैक्ट हुआ, जिसकी लागत लगभग 3 बिलियन डॉलर है। ये ड्रोन निगरानी और हमले की क्षमताओं को बढ़ाएंगे।

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) से वायुसेना को 180 तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट मिलेंगे, जिनमें से 40 विमान वर्तमान में ऑपरेट हो रहे हैं। 56 सी295 परिवहन विमान एयरबस डिफेंस एंड स्पेस से 21,935 करोड़ रुपये में खरीदे गए, ताकि वायुसेना के पुराने एवरो-748 विमानों को बदला जा सके।

2015 में, 22 अपाचे एएच-64 अटैक हेलीकॉप्टर अमेरिका से वायुसेना के लिए खरीदे गए थे। जबकि भारतीय सेना को अभी छह अपाचे हेलीकॉप्टर मिलने बाकी हैं।

वायुसेना को 15 चिनूक सीएच-47 हैवी-लिफ्ट हेलीकॉप्टर मिले, जिनका कॉन्ट्रैक्ट 2015 में हुआ। इसके अलावा, 151 एमआई-17वी-5 हेलीकॉप्टर भारत में असेंबल किए गए। 10 प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर 2023 में वायुसेना को और 5 भारतीय सेना को मिले। HAL के साथ 156 स्वदेशी प्रचंड हेलीकॉप्टर के लिए 53,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट भी हुआ।

निगरानी और समुद्री क्षमताएं

भारतीय नौसेना ने पिछले दशक में 6 कालवरी-क्लास स्कॉर्पीन पनडुब्बियों को शामिल किया। 2023 में, फ्रांस के साथ तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के लिए 38,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट हुआ। प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट्स के तहत तीन जहाज़ शामिल किए गए हैं, और तीन और जल्द ही शामिल होंगे। P-8I पोसाइडन मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट की 4 यूनिट और जोड़ी गई हैं। इससे पहले 8 विमान पहले से नौसेना के पास थे। अमेरिका से और 6 विमानों की खरीद पर चर्चा चल रही है। ये विमान समुद्री निगरानी, पनडुब्बी रोधी युद्ध और खुफिया कार्यों में अहम भूमिका निभाते हैं।

रक्षा सौदों में पारदर्शिता  

मोदी सरकार ने रक्षा खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी और तेज़ बनाने की दिशा में भी काम किया है। रक्षा मंत्रालय ने समयबद्ध तरीके से कॉन्ट्रैक्टों को अंतिम रूप दिया, जिससे सेना की तत्काल ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। विदेशी खरीद के साथ-साथ, स्वदेशी उत्पादन पर जोर देकर भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

साथ ही, भारत रक्षा क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने के लिए कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है। नौसेना के लिए और पनडुब्बियों और जहाज़ों की खरीद, वायुसेना के लिए अतिरिक्त लड़ाकू विमान, और सेना के लिए आधुनिक तोपखाने की योजनाएं प्रगति पर हैं। स्वदेशी ड्रोन और मिसाइल सिस्टम्स का विकास भी तेज़ी से हो रहा है।

स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा

मोदी सरकार ने न केवल विदेशी रक्षा सौदों पर जोर दिया बल्कि भारतीय कंपनियों को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया। HAL, भारत फोर्ज, टाटा, DRDO, L&T जैसे संस्थानों को मेक इन इंडिया नीति के तहत बड़े रक्षा अनुबंध मिले।

HAL का तेजस प्रोग्राम, DRDO का आकाश और नाग मिसाइल, भारत फोर्ज की ATAGS तोप, BEL का रडार सिस्टम, और बीएई के साथ पार्टनरशिप में बनी M777 तोपें इसका उदाहरण हैं।

“मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” के तहत, सरकार ने स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहन दिया है। तेजस, प्रचंड, और आकाश जैसे सिस्टम्स इसका उदाहरण हैं। HAL, भारत फोर्ज, और टाटा जैसे स्वदेशी कंपनियों ने डिफेंस इक्विपमेंट्स के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। HAL, भारत फोर्ज, टाटा, DRDO, L&T जैसे संस्थानों को मेक इन इंडिया नीति के तहत बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट भी दिए गए। साथ ही, विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी कर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा दिया गया है।

नई टेक्नोलॉजी पर फोकस

भारत अब ‘स्मार्ट युद्ध’ की ओर बढ़ रहा है। यानी ऐसे हथियार और प्लेटफॉर्म जो तेजी से निर्णय लें, कम संसाधनों में ज्यादा प्रभाव डालें, और तकनीक के बल पर दुश्मन को चौंका दें। इसके लिए स्मार्ट गोला-बारूद, रडार से जुड़ी सटीकता, एआई-एनेबल्ड ड्रोन्स, और साइबर युद्ध क्षमताओं पर काम किया जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय ने समय के साथ ऑपरेशनल कमांड स्ट्रक्चर को भी अधिक फुर्तीला और जॉइंट बनाया है। तीनों सेनाओं में समन्वय बढ़ा है। तेज निर्णय, आधुनिक लॉजिस्टिक्स और सटीक इंटेलिजेंस के कारण भारत अब सीमित समय में सीमित संसाधनों के साथ अधिक प्रभावी सैन्य प्रतिक्रिया देने में सक्षम हो चुका है।

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रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत

पिछले 11 वर्षों में, भारत ने रक्षा क्षेत्र में न केवल अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाई है, बल्कि वैश्विक मंच पर भी अपनी स्थिति को मजबूत किया है। अत्याधुनिक उपकरणों की खरीद और स्वदेशी उत्पादन के संयोजन ने भारत को एक मज़बूत रक्षा शक्ति के रूप में स्थापित किया है। यह प्रयास न केवल सशस्त्र बलों को सशक्त बना रहा है, बल्कि भारत को रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी एक नई पहचान दे रहा है।

Kargil Vijay Diwas 2025: इस साल कारगिल दिवस की थीम है “शौर्य को सलाम, बलिदान को नमन”, 545 शहीदों के घर पहुंचेगी सेना

Kargil Vijay Diwas 2025: "Salute to Valor, Tribute to Sacrifice" – Army to Honor 545 Martyrs' Families
Pic: Raksha Samachar

Kargil Vijay Diwas 2025: 26 जुलाई 2025 को भारत 26वां कारगिल विजय दिवस मनाने जा रहा है। इस अवसर पर भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के नायकों की वीरता, बलिदान और अटूट साहस को सम्मान देने के लिए कई कार्यक्रमों की योजना बनाई है। यह कार्यक्रम 26 जुलाई तक चलेंगे। दो महीने की लंबी स्मृति श्रृंखला में न केवल शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी, बल्कि उनके परिजनों को भी सम्मानित किया जाएगा। इस वर्ष करगिल विजय दिवस की थीम है “शौर्य को सलाम, बलिदान को नमन”, और इसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए भारतीय सेना कई अभिनव कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है।

Kargil Vijay Diwas 2025:

कारगिल युद्ध भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जो सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से हमेशा याद किया जाएगा। 1999 में जब पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था। तब भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत इन ऊंचाइयों को वापस हासिल किया और देश की संप्रभुता की रक्षा की। यह युद्ध कई मायनों में अनोखा था। भारतीय सेना ने युद्ध को कारगिल-सियाचिन क्षेत्र तक सीमित रखने की रणनीति अपनाई और तीनों सेनाओं (थलसेना, वायुसेना और नौसेना) के समन्वय से अभूतपूर्व सफलता हासिल की। इस दौरान सैनिकों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में, बर्फीले पहाड़ों और दुर्गम इलाकों में, असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया।

26वां कारगिल विजय दिवस

इस वर्ष कारगिल विजय दिवस का आयोजन विशेष रूप से भव्य और भावनात्मक होगा। भारतीय सेना ने इस अवसर पर कई कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की है, जो न केवल वीर सैनिकों के बलिदान को श्रद्धांजलि देंगे, बल्कि स्थानीय समुदायों को भी जोड़ेंगे। लद्दाख के लोग युद्ध के दौरान सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, वे भी इन आयोजनों का हिस्सा होंगे। उनके सहयोग और योगदान को भी सम्मानित किया जाएगा। यह आयोजन न केवल सैनिकों के बलिदान को याद करने का अवसर है, बल्कि यह स्थानीय लोगों और सेना के बीच के अटूट रिश्ते को भी मजबूत करेगा। इन आयोजनों में पश्चिमी लद्दाख के कठिन और रणनीतिक इलाकों में भारतीय सेना की देशभक्ति, साहसिकता और सांस्कृतिक भावना की झलक दिखाई जाएगी।

शहीदों के परिवारों के लिए विशेष पहल

इस बार कारगिल विजय दिवस की सबसे खास पहल है ‘विशेष आउटरीच ड्राइव’, जो इस सप्ताह से शुरू हो रही है। इस पहल के तहत करगिल युद्ध में शहीद हुए 545 सैनिकों के परिवारों को सेना के अधिकारी उनके घर जाकर सम्मानित करेंगे। यह पहल अपने आप में भी अनूठी है, क्योंकि सेना के जवान 25 राज्यों, 2 केंद्र शासित प्रदेशों और नेपाल तक जाएंगे। वे शहीदों के परिजनों को भारतीय सेना की ओर से एक प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं की जानकारी और अन्य मदद प्रदान करेंगे।

इसके साथ ही, सेना यह भी सुनिश्चित करेगी कि शहीदों के परिवारों को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। अगर कोई परिवार किसी समस्या से जूझ रहा हो, तो उसका समाधान भी इस मौके पर खोजने की कोशिश की जाएगी। इस दौरान शहीदों से संबंधित स्मृति चिन्ह भी एकत्र किए जाएंगे, जिन्हें कारगिल युद्ध स्मारक, द्रास में सम्मानपूर्वक संरक्षित किया जाएगा। यह पहल न केवल शहीदों के परिवारों के प्रति सेना की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, बल्कि उनके बलिदान को अमर करने का भी एक प्रयास है।

इस दो महीने के चलने वाले कार्यक्रम का समापन 26 जुलाई 2025 को द्रास स्थित करगिल वॉर मेमोरियल पर श्रद्धांजलि समारोह से होगा। यहां सेना प्रमुख, वरिष्ठ अधिकारी, शहीदों के परिजन, स्थानीय लोग और देशभर से आए लोग वीरगति को प्राप्त जवानों को नमन करेंगे। यह स्मारक उन वीर सैनिकों का प्रतीक है, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इस समारोह में सैन्य अधिकारी, शहीदों के परिजन, स्थानीय लोग और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी शामिल होंगे। यह आयोजन न केवल अतीत के बलिदानों को सम्मान देगा, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को सेवा और समर्पण के मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।

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असाधारण था कारगिल युद्ध

कारगिल युद्ध कई मायनों में असाधारण था। युद्ध के दौरान भारतीय सेना को न केवल दुश्मन की घुसपैठ का सामना करना पड़ा, बल्कि ऊंचे पहाड़ों, कठिन मौसम और सीमित संसाधनों जैसी प्राकृतिक चुनौतियों से भी जूझना पड़ा। फिर भी, सैनिकों ने अपने अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल से दुश्मन को परास्त किया। इस युद्ध में भारतीय सेना ने जिस तरह से युद्ध को सीमित क्षेत्र तक रखा और भारत की स्थिति को मजबूत किया, वह एक मिसाल है।

Khalistani Plot Targets PM Modi: कनाडा G7 सम्मेलन में खालिस्तान की बड़ी साजिश का खुलासा, पीएम मोदी को दी धमकी, भारत में गुरिल्ला युद्ध छेड़ने की तैयारी!

Khalistani Plot Targets PM Modi at Canada G7 Summit, Threats Issued, Guerrilla War Planned in India

Khalistani Plot Targets PM Modi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 से 17 जून 2025 के बीच कनाडा में होने वाले जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। लेकिन इस यात्रा से पहले ही कनाडा में बसे खालिस्तानी समूहों एक्टिव हो गए हैं। कनाडा में होने वाले इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से पहले खालिस्तानी संगठनों ने पीएम मोदी को धमकियां देनी शुरू कर दी हैं। वैंकूवर में 8 जून को खालिस्तान समर्थकों ने एक रैली निकाली। इस रैली के दौरान सभी खालिस्तानी संगठनों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कार्रवाई करने की धमकी भी दी। वहीं, इन संगठनों में अकाल फौज (आर्मी) और एक नया खालिस्तानी ग्रुप आनंदपुर खालसा फौज (AKF) भी शामिल है।

Khalistani Plot Targets PM Modi: 15 से 17 जून तक G7 सम्मेलन

इस बार का G7 सम्मेलन कनाडा में हो रहा है। जबकि पिछले साल यह इटली में हुआ था। इसमें दुनिया के सात बड़े औद्योगिक देशों कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल होंगे। यह सम्मेलन 15 से 17 जून 2025 तक कनाडा के अल्बर्टा में कनानास्किस में होगा। हर साल G7 मेजबान देश कुछ अतिथि देशों को भी निमंत्रित करता है। इस बार कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पीएम मोदी को निमंत्रण दिया है। हालांकि भारत G7 का सदस्य नहीं है, लेकिन पिछले कुछ सालों से उसे इस सम्मेलन में बुलाया जाता रहा है।

वहीं, पीएम मोदी ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है और वे 17 जून को होने वाली आउटरीच सत्र में हिस्सा लेंगे। उन्होंने कहा, “मुझे कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का फोन मिला, जिन्होंने मुझे G7 सम्मेलन के लिए निमंत्रण दिया। भारत और कनाडा, दोनों लोकतंत्र के रूप में, आपसी सम्मान और साझा हितों के साथ मिलकर काम करेंगे।” बता दें कि पिछले कुछ समय से भारत और कनाडा के बीच 2023 में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और खालिस्तानी गुटों पर कार्रवाई न करने को लेकर संबंधों में तनाव चल रहा है।

खालिस्तानी समूहों की धमकी

कनाडा में खालिस्तानी समूहों ने पीएम मोदी के खिलाफ खुलेआम धमकियां दी हैं। इन समूहों ने कहा है कि वे G7 सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी की “राजनीति को खत्म” करने की कोशिश करेंगे। कुछ प्रदर्शनों में खालिस्तानी नेता यह भी दावा कर रहे हैं कि वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों के वंशज हैं और पीएम मोदी के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई करेंगे।

हाल ही में वैंकूवर में एक रैली के दौरान एक कनाडाई पत्रकार मोचा बेजिरगन पर हमला हुआ, जो खालिस्तानी गतिविधियों पर रिपोर्टिंग कर रहे थे। बेजिरगन ने बताया, “खालिस्तानी समर्थकों ने मुझे घेर लिया और धमकी दी। वे खुलेआम कह रहे थे कि वे पीएम मोदी की राजनीति को G7 में निशाना बनाएंगे।” सूत्रों का कहना है कि खालिस्तानी समूह जी7 सम्मेलन के दौरान विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं।

कनाडा में बनाया नया संगठन AKF

हाल ही में पंजाब पुलिस ने बयान जारी कर बताया था कि आनंदपुर खालसा फौज यानी AKF इंटरनेशनल एसोसिएशन का गठन हाल ही में कनाडा के सुरजी (सरे), ब्रिटिश कोलंबिया में गुरु नानक सिख गुरुद्वारा में हुआ है। यह समूह खालिस्तान की मांग को हथियारों के बल पर आगे बढ़ाने की योजना बना रहा है। 16 फरवरी 2025 को AKF ने एक बयान जारी किया था, जिसमें उसने दावा किया कि यह समूह अमृतपाल सिंह खड्डोर साहिब (MP) और चीफ WPD के निर्देशन में बना है, जो अभी दिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं।

वैंकूवर में रैली-प्रदर्शन के दौरान AKF के सदस्यों को भी भारतीय दूतावास के बाहर भी देखा गया। प्रदर्शन के दौरान AKF के सदस्यों ने भारत सरकार और दूतावास के खिलाफ नारे लगाए। एक नेता ने कहा, “हम नरेंद्र मोदी को हटाएंगे और खालिस्तान बनाएंगे।” प्रदर्शन में शामिल लोगों ने भारतीय झंडे को जलाने की कोशिश भी की, लेकिन कनाडा पुलिस ने हस्तक्षेप करके इसे रोका।

सूत्रों ने बताया कि AKF ने विदेश में रहने वाले सिखों को हथियारों की ट्रेनिंग लेने के लिए कहा है। उनका कहना है कि पंजाब में आजादी (खालिस्तान) केवल हथियारों से ही मिल सकती है। साथ ही, उन्होंने भारतीय दूतावासों और वहां काम करने वाले कर्मचारियों को हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का जिम्मेदार ठहराया है। सूत्रों ने बताया कि AKF ने जल्द ही वहां स्थित दूतावासों के घेराव की भी योजना बना रहा है।

सूत्रों का कहना है कि AKF ने विदेश से फंड जुटाने की भी योजना बनाई है। वह भारतीय सिखों को हथियार खरीदने के लिए फंड देगा। इसके अलावा, वह अन्य संगठनों के साथ मिलकर खालिस्तान की मांग आगे बढ़ाएगा।

23 मार्च को पंजाब पुलिस ने जारी किया था अलर्ट

पंजाब पुलिस ने 23 मार्च 2025 को एक अलर्ट जारी किया था, जिसमें सभी पुलिस कमिश्नर, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और खुफिया अधिकारियों को AKF की गतिविधियों पर नजर रखने के निर्देश दिए गए थे। इस अलर्ट को पंजाब के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (खुफिया) ने सभी जिला पुलिस प्रमुखों को भेजा था। इसमें कहा गया था कि AKF ने विदेश में रहने वाले रिटायर्ड सिख सैनिकों से पंजाब में रह रहे सिख नौजवानों को हथियारों की ट्रेनिंग देने और भारत के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) के लिए तैयार करने की साजिश रच रहा है।

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पुलिस ने यह भी चेतावनी दी थी कि AKF के सदस्य भारत में हिंसा फैलाने की कोशिश कर सकते हैं। इसके लिए उन्होंने खास तौर पर पंजाब, दिल्ली और हरियाणा में सतर्कता बढ़ाने को कहा है। पुलिस का कहना है कि अगर AKF की गतिविधियां बढ़ीं, तो यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

Command Subedar Major: भारतीय सेना में बड़ा बदलाव; पहली बार ‘कमांड सूबेदार मेजर’ की नियुक्ति, जानिए इस ऐतिहासिक फैसले के मायने

Command Subedar Major: Indian Army Appoints First-Ever Senior JCO Advisor in Historic Move
Subedar Major Ojit Sahab of 3 Assam

Command Subedar Major: भारतीय सेना में जवानों और जूनियर कमीशंड अफसरों (JCOs) की भूमिका को और मजबूती देने के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। भारतीय सेना ने पहली बार “कमांड सूबेदार मेजर” का पद सृजित किया है, और इस पद पर पहली नियुक्ति सूबेदार मेजर ओजीत सिंह साहब की हुई है, जो थर्ड असम रेजिमेंट से हैं। इस नई पहल को सेना के उच्च नेतृत्व और जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (जेसीओ) तथा जवानों के बीच संवाद को मजबूत करने के लिए शुरू किया गया है। यह बदलाव भारतीय सेना में जवानों और अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल और नीति निर्माण में सुधार लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कौन हैं Command Subedar Major ओजीत सिंह?

भारतीय सेना में यह नया पद चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के निर्देश पर बनाया गया है। इसकी प्रेरणा पश्चिमी सेनाओं के सीनियर सार्जेंट मेजर की भूमिका से ली गई है। सूबेदार मेजर ओजीत सिंह भारतीय सेना की थर्ड असम रेजीमेंट से हैं और उन्हें उत्तरी कमान (Northern Command) का पहला कमांड सूबेदार मेजर नियुक्त किया गया है। यह घोषणा लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा, जीओसी-इन-सी, उत्तरी कमान द्वारा की गई। ओजीत सिंह अब सेना में एक नई भूमिका निभाते हुए JCOs और अन्य जवानों की आवाज को सेना के हाई कमान तक पहुंचाने का काम करेंगे।

इस नियुक्ति के पीछे क्या है उद्देश्य?

कमांड सूबेदार मेजर का कार्य केवल सलाहकारी होगा। इस पद पर नियुक्त व्यक्ति के पास कोई प्रशासनिक या कार्यकारी अधिकार नहीं होंगे। उनका मुख्य कार्य कमांडरों को जेसीओ और जवानों से संबंधित मामलों पर सलाह देना, नीति निर्माण में योगदान देना, जवानों का मनोबल बढ़ाना, प्रशिक्षण में सुधार करना और जवानों की भलाई के लिए सुझाव देना होगा। यह पद सेना के जमीनी स्तर की वास्तविकताओं को उच्च कमांड तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

नियुक्ति की प्रक्रिया और कार्यकाल

कमांड सूबेदार मेजर के चयन की प्रक्रिया बेहद कठिन और पारदर्शी है। इस पद के लिए उम्मीदवारों को कई स्तरों पर साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है, और इस प्रक्रिया की निगरानी स्वयं सेना कमांडर द्वारा की जाती है। अंतिम नियुक्ति का आदेश इन्फैंट्री डायरेक्टर द्वारा जारी किया जाता है। इस पद का कार्यकाल सामान्य रूप से दो वर्ष का होगा, जिसे विशेष परिस्थितियों में तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ ने इस कदम की सराहना करते हुए कहा, “सूबेदार मेजर ओजीत साहब की नियुक्ति ‘कमांड सूबेदार मेजर’ के रूप में एक स्वागत योग्य पहल है। यह सेना के वरिष्ठ नेतृत्व और जवानों के बीच संवाद का सेतु बनेगा। यह सिस्टम कोर, डिवीजन और ब्रिगेड स्तर तक भी बढ़ाया जाना चाहिए।”

कमांड सूबेदार मेजर की क्या होगी भूमिका?

कमांड सूबेदार मेजर सेना के उच्च नेतृत्व और जेसीओ/जवानों के बीच एक सेतु का काम करेगा। कमांड सूबेदार मेजर कमांडरों को जेसीओ और जवानों से संबंधित मामलों पर सलाह देंगे। यह सलाह नीति निर्माण, प्रशिक्षण, और जवानों के कल्याण से संबंधित होगी। यह पद जमीनी स्तर पर जवानों की समस्याओं और चुनौतियों को समझकर उन्हें उच्च कमांड तक पहुंचाएगा। इससे नीतियों को और अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाया जा सकेगा। कमांड सूबेदार मेजर जवानों के मनोबल को बढ़ाने और उनके प्रशिक्षण में सुधार के लिए सुझाव देंगे। यह सैनिकों के बीच विश्वास और एकजुटता को मजबूत करेगा। इसके अलावा कमांडरों के साथ यूनिट विजिट और निरीक्षणों में शामिल होकर, यह पद सैनिकों की वास्तविक स्थिति को समझने में मदद करेगा।

इसके अलावा, यह पद भारतीय वायुसेना में पहले से मौजूद मास्टर वारंट ऑफिसर की तरह है, जहां इस तरह की नियुक्तियां पहले से ही हो रही हैं। मास्टर वारंट ऑफिसर एयरफोर्स के सीनियर-नॉन कमीशंड ऑफिसर्स (SNCOs) और अफसरों के बीच पुल का कार्य करते हैं। सेना अब इस मॉडल को अपने स्ट्रक्चर में अपनाने जा रही है। हालांकि, भारतीय सेना में यह पहल नई है और इसे पश्चिमी सेनाओं की तर्ज पर लागू किया गया है।

जमीनी सच्चाई भी समझनी होगी

सैनिक वेलफेयर एसोसिएशन के रिटायर्ड कैप्टन लोकेंद्र सिंह तालान का कहना है, अभी तक सूबेदार मेजर का पद अक्सर केवल औपचारिकताओं तक सीमित रहता है, और कई बार वे उच्च अधिकारियों के सामने सही जानकारी साझा करने से हिचकते हैं। कुछ सैनिकों का यह भी कहना है कि सूबेदार मेजर कभी-कभी केवल उच्च अधिकारियों की हां में हां मिलाने का काम करते हैं, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।

वहीं, यह कदम जवानों और जेसीओ के बीच यह भावना पैदा करेगा कि उनकी आवाज सुनी जा रही है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि जमीनी स्तर की समस्याएं उच्च कमांड तक नहीं पहुंच पातीं, जिसके कारण नीतियां और निर्णय प्रभावित होते हैं। कमांड सूबेदार मेजर का पद इस कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने और उनकी भलाई के लिए नीतियों को और अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेगा।

Indian Armed Forces ADC reform: नया साल तीनों सेनाओं के लिए होगा गेमचेंजर, अब ऐसे बनेंगे एडीसी, जानें क्या होते हैं Aides-de-Camp?

कैप्टन लोकेंद्र सिंह तालान के मुताबिक कमांड सूबेदार मेजर के चयन में उनके पिछले कार्यकाल के एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट्स (एसीआर) को चयन प्रक्रिया में शामिल न किया जाए, बल्कि उनकी सेवा और अनुशासन के रिकॉर्ड को प्राथमिकता दी जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि केवल योग्य और निष्पक्ष उम्मीदवार ही इस पद के लिए चुने जाएं।

Pakistan TTK Conspiracy: जम्मू-कश्मीर में इस आतंकी संगठन के जरिए हमले की योजना बना रहा पाकिस्तान, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी टला नहीं है खतरा!

Pakistan TTK Conspiracy: Pak Plots Fresh Attacks in J&K Despite Operation Sindoor Setback

Pakistan TTP-K Conspiracy: जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर आतंकी हमले का साया मंडराने लगा है। खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में करारी हार और भारी नुकसान के बावजूद पाकिस्तान अपने आतंकी एजेंडे से पीछे नहीं हट रहा है। इस बार उसकी नजर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों, बाहर से आए मजदूरों और गैर-कश्मीरी नागरिकों पर है। खुफिया जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI अब नए आतंकी समूहों को हथियार और पैसा देकर हमले की साजिश रच रही है।

Pakistan TTK Conspiracy: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी खतरा बरकरार

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था, जिसमें कई मासूम लोग मारे गए थे। इस हमले के जवाब में भारत ने 6-7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कई आतंकी और सैन्य ठिकानों पर जोरदार हमले किए, जिसमें उनके कई लड़ाकू विमान और हथियार नष्ट हो गए। यह ऑपरेशन इतना सफल रहा कि पाकिस्तान की सैन्य ताकत को तगड़ा झटका लगा। लेकिन इसके बावजूद, खुफिया एजेंसियों के मुताबिक पाकिस्तान ने हार मानने की बजाय अपने आतंकी मंसूबों को और तेज कर दिया है।

नया आतंकी समूह तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर (TTK)

खुफिया सूत्रों के अनुसार, ISI अब एक नए आतंकी समूह “तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर” (TTK) को बढ़ावा दे रही है। इस समूह को दो खतरनाक आतंकी चला रहे हैं। पहला नाम है अब्दुल्ला उमर खान, जो एक पूर्व पाकिस्तानी वायु सेना पायलट है और “गाजी शहजादी” के नाम से जाना जाता है। दूसरा नाम है मूसा गजनवी, जिसे मूर्तजा खान भी कहते हैं। मूसा गजनवी लश्कर-ए-तैयबा का सक्रिय सदस्य है और वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) से आतंकी गतिविधियों को चला रहा है।

मूसा गजनवी सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके कश्मीरी युवाओं को बहकाने में माहिर है। वह फर्जी प्रचार के जरिए इन युवाओं को लश्कर के ट्रेनिंग कैंप में भेजने की कोशिश करता है। ISI इस समूह को हथियार, पैसा और दूसरी मदद मुहैया करवा रही है ताकि वे भारत की सीमा में घुसपैठ कर सकें। खुफिया एजेंसियों ने हाल ही में एक बातचीत भी पकड़ी है, जिसमें ISI ने जेलों में बंद आतंकियों से संपर्क साधा है। इन आतंकियों से कहा गया है कि अगर वे कश्मीर में “जिहाद” के लिए लड़ने को तैयार हैं, तो उन्हें रिहा कर दिया जाएगा।

बता दें कि हाल ही में 3 जून को पाकिस्तान के दक्षिणी शहर कराची में भूकंप के झटके महसूस किए गए थे। इस दौरान कराची के मालिर जिले में स्थित मालिर जेल के जेल प्रशासन ने भूकंप के डर से कैदियों को उनकी सेल से बाहर निकाला। लेकिन कैदियों ने मौके का फायदा उठाया और जेल गार्डों पर हमला कर दिया। स्थानीय पुलिस और अधिकारियों के मुताबिक, करीब 200 से ज्यादा कैदी जेल से भागने में सफल रहे। इनमें से कई ऐसे कैदी भी थे, जो आतंकी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। हालांकि 80 को पुलिस ने पकड़ लिया, लेकिन 130 से ज्यादा कैदियों का अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है। कैदियों को भगाने की इस घटना के पीछे भी आईएसआई का हाथ माना जा रहा है।

सुरक्षा बल और गैर-कश्मीरियों पर हमले का इनपुट!

खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, TTK का मकसद कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों पर हमले करना है। इसके अलावा, वे बाहर से आए मजदूरों और गैर-कश्मीरी नागरिकों को भी निशाना बना सकते हैं। आतंकियों को निर्देश दिया गया है कि वे स्थानीय स्लीपर सेल्स (छिपे हुए आतंकी) को सक्रिय करें। इन हमलों में “लोन वुल्फ” यानी अकेले आतंकी भी शामिल हो सकते हैं, जो अचानक हमला करके भाग जाएं। खास तौर पर वे उन सुरक्षा कर्मियों को निशाना बना सकते हैं, जो छुट्टी पर कश्मीर में हों।

पहलगाम हमले के बाद से सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही अलर्ट पर हैं। लेकिन अब स्थिति और गंभीर हो गई है। खुफिया जानकारी के आधार पर सुरक्षा बलों को सलाह दी गई है कि वे अपनी हरकतों में सावधानी बरतें और अपनी सतर्कता न कम करें। मजदूरों के कैंप और गैर-कश्मीरी नागरिकों के रहने की जगहों पर भी अतिरिक्त सुरक्षा बढ़ाई जा रही है।

कश्मीर घाटी में तैनात सुरक्षा बलों को अब और सावधानी बरतने के लिए कहा गया है। उन्हें सलाह दी गई है कि वे हर समय चौकस रहें। पहलगाम हमले के बाद भी ऐसी चेतावनियां जारी की गई थीं, लेकिन अब खतरे का स्तर और बढ़ गया है। सुरक्षा एजेंसियां मजदूरों और गैर-कश्मीरी नागरिकों की सुरक्षा के लिए खास इंतजाम कर रही हैं ताकि कोई भी हमला न हो सके।

तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर (TTK) के बारे में

तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर (TTK) एक नया आतंकी समूह है, जो हाल ही में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, यह संगठन कश्मीर को भारत और पाकिस्तान दोनों से आजादी दिलाने का दावा करता है। इसका पहला बयान हाल ही में एक टेलीग्राम ग्रुप के जरिए जारी किया गया, जिसमें उसने दोनों देशों की सेनाओं के खिलाफ जंग छेड़ने की बात कही। TTK का कहना है कि वह इस्लामी सिद्धांतों के आधार पर लड़ाई लड़ेगा और कश्मीर में “कब्जे वाली ताकतों” को निशाना बनाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समूह सिर्फ कश्मीर की आजादी की बात नहीं कर रहा, बल्कि पाकिस्तान की साजिश का हिस्सा है। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद से कश्मीर में तनाव बढ़ा है। इसके जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ। इस हार से बौखलाए पाकिस्तान ने TTK जैसे नए समूहों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया ताकि भारत को परेशान किया जा सके।

Pakistani propaganda: जब TRF पर मंडराया खतरा तो घबराया पाकिस्तान, कश्मीर में बनाया नया आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर!

बता दें कि मूसा गजनवी सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके कश्मीरी युवाओं को बहकाने में माहिर है। वह फर्जी वीडियो और पोस्ट के जरिए इन युवाओं को लश्कर के ट्रेनिंग कैंप में भेजता रहा है। खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, मूसा 2011 से PoK में लश्कर की प्रचार गतिविधियां चला रहा था। अब वह TTK के बैनर तले भारत के खिलाफ जिहादी प्रचार चला रहा है।

Operation Disinformation: चीन और पाकिस्तान की साजिश; राफेल के खिलाफ फर्जी खबरों का फैलाया जाल, फ्रांस ने किया खुलासा

Operation Disinformation: China, Pakistan Spread Fake News Against Rafale, France Exposes Plot
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Operation Disinformation: भारत के राफेल लड़ाकू विमान को बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। फ्रांस के सूत्रों का कहना है कि इस अभियान में चीन और पाकिस्तान सक्रिय रूप से शामिल हैं। फ्रांसीसी सूत्रों के अनुसार, चीन और पाकिस्तान की मिलीभगत से रफाल की छवि को धूमिल करने के लिए एक संगठित ‘डिसइंफोर्मेशन ऑपरेशन’ चलाया जा रहा है। इस दुष्प्रचार में फर्जी खबरें, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए राफेल की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। इस ऑपरेशन का मकसद दुनियाभर के लोगों का राफेल पर से भरोसा घटाना है, बल्कि भारत और फ्रांस की साझेदारी को कमजोर करना और चीनी जे-10 जैसे प्रतिस्पर्धी विमानों को बढ़ावा देना भी है।

Operation Disinformation: ऑपरेशन सिंदूर बना वजह

चीन और पाकिस्तान का यह डिसइंफोर्मेशन ऑपरेशन उस समय शुरू हुआ, जब भारत ने मई 2025 में पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर राफेल विमानों का उपयोग करके स्कैल्प मिसाइलों से हमले किए। इन हमलों के बाद, पाकिस्तान और चीन की तरफ से सोशल मीडिया पर यह अफवाहें फैलने लगीं कि रफाल ने उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं किया या वह हमलों में असफल रहा। फ्रांस के सूत्रों के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य राफेल की तकनीकी क्षमता पर सवाल उठाना और राफेल को लेकर भारतीय सेनाओं के मनोबल को गिराना है।


फ्रांस के सूत्रों ने बताया कि इस दुष्प्रचार का केंद्र पाकिस्तान रहा है, जहां से फर्जी खबरें और तकनीकी रूप से गलत विश्लेषण शुरू किए गए। इन खबरों को चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, खासकर टिकटॉक और अन्य चीनी ब्लॉगिंग साइट्स के जरिए बढ़ावा दिया गया। इनमें फर्जी वीडियो, पोस्ट और लेख भी लिखे गए, राफेल क्षमता को लेकर सवाल उठाए गए।

फ्रांसीसी सूत्रों का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य सिर्फ राफेल की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना ही नहीं है, बल्कि चीन के बनाए लड़ाकू विमान J-10C को प्रमोट करना और भारत-फ्रांस के रक्षा सहयोग को कमजोर करना भी है।

चीन-पाकिस्तान का फर्जी प्रचार तंत्र

इस ‘डिसइंफो ऑपरेशन’ में पाकिस्तान से चलाए जा रहे फर्जी नैरेटिव को चीन के सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने जमकर बढ़ाया। TikTok वीडियो, X पोस्ट्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर झूठे विश्लेषणों से यह प्रचार किया जा रहा है कि राफेल विमानों ने टारगेट्स को मिस कर दिया या वे उड़ान भर ही नहीं पाए।

इस तरह की खबरों के जरिए इंडोनेशिया को भी निशाना बनाया गय। चीनी सोशल मीडिया अकाउंट्स और कुछ मीडिया आउटलेट्स ने दावा किया कि भारत के ऑपरेशन के बाद इंडोनेशिया राफेल विमानों की खरीद पर पुनर्विचार कर रहा है। हालांकि, यह दावा पूरी तरह गलत साबित हुआ जब फ्रांस और इंडोनेशिया ने 2022 में हुए एक समझौते को आगे बढ़ाते हुए अतिरिक्त राफेल विमानों के लिए एक लेटर ऑफ इंटेंट पर दस्तखत किए।

तीन राफेल गिरने की झूठी खबर

सबसे बड़ी झूठी खबर यह फैलाई गई कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तीन राफेल विमानों को पाकिस्तान ने मार गिराया। साथ ही यह भी दावा किया गया कि पहले चरण के बाद राफेल विमानों का उपयोग नहीं किया गया। भारतीय सरकार के सूत्रों ने बताया कि ये सभी दावे पूरी तरह झूठे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 7 मई को हुए हमलों में राफेल सहित कई लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया गया और मुरिदके और बहावलपुर में आतंकी ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

सूत्रों ने यह भी बताया कि 9-10 मई की रात को पाकिस्तानी वायुसेना के ठिकानों पर किए गए हमलों में राफेल विमानों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। इन हमलों में कई हाई-वैल्यू टारगेट्स को सफलतापूर्वक नष्ट किया गया। 7 मई के शुरुआती हमलों में भारत को कुछ नुकसान जरूर हुआ था, जिसे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने “टैक्टिकल मिस्टैक” के तौर पर स्वीकार किया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इन गलतियों से सबक लिया गया और बाद के हमलों में पाकिस्तान को करारा जवाब दिया गया।

चीन से शुरू, पश्चिम तक फैला दुष्प्रचार

दुष्प्रचार का दायरा केवल एशिया तक सीमित नहीं रहा। 7 मई को एक चीनी ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म पर दावा किया गया कि फ्रांस ने भारत से राफेल विमानों का इस्तेमाल बंद करने को कहा है। यह फर्जी दावा जल्द ही पश्चिमी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जैसे कि एक्स पर फैल गया और व्यापक रूप से शेयर किया गया। फ्रांस के सूत्रों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह राफेल की छवि को नुकसान पहुंचाने की एक सुनियोजित कोशिश थी।

साझेदारी कमजोर करने की साजिश

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा अभियान सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि फ्रांस को भी वैश्विक रक्षा बाजार में नुकसान पहुंचाने के लिए चलाया गया है। चीन नहीं चाहता कि भारत के पास रफाल जैसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स हों और वह रक्षा क्षेत्र में फ्रांस के साथ गहरे संबंध बनाए। इसलिए वह JF-17 या J-10 जैसे अपने कम गुणवत्ता वाले विमानों को आगे बढ़ाने के लिए रफाल के खिलाफ यह फर्जी अभियान चला रहा है।

भारतीय रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “यह अभियान भारत की रक्षा तैयारियों और हमारी रणनीतिक साझेदारियों को कमजोर करने की कोशिश है। राफेल विमान ने अपनी क्षमता को बार-बार साबित किया है, और ये हमले इसकी तकनीकी श्रेष्ठता का प्रमाण हैं।”

5 प्रतिशत समय फर्जी खबरों को रोकने में लगा

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना का 15 प्रतिशत समय फर्जी खबरों और गलत सूचनाओं को रोकने में खर्च हुआ। सिंगापुर में शांगरी-ला डायलॉग के दौरान उन्होंने बताया कि फर्जी खबरों से निपटना एक बड़ा काम था। सेना ने जल्दबाजी में जवाब देने के बजाय सोच-समझकर और तथ्यों के आधार पर रणनीति अपनाई, क्योंकि गलत सूचनाएं लोगों के बीच जल्दी गलत धारणा बना सकती हैं।

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उन्होंने कहा कि आजकल युद्ध में छल-कपट वाली रणनीतियां बढ़ रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर में 15 प्रतिशत समय सिर्फ गलत नैरेटिव्स का जवाब देने में लगा। इससे पता चलता है कि सूचना युद्ध कितना अहम है। जनरल चौहान ने सुझाव दिया कि इसके लिए एक खास सूचना युद्ध इकाई बनानी चाहिए। भारत ने इस दौरान हमेशा सच पर आधारित और संयमित जवाब दिया, भले ही इसमें समय ज्यादा लगा। यह बयान बताता है कि ऑपरेशन सिंदूर में सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ फर्जी खबरों से लड़ना भी एक बड़ी चुनौती थी, और सेना ने इसे तथ्यों के साथ समझदारी से संभाला।

Pakistan UNSC CTC Co-Chair: पाकिस्तान को यूएन में एंटी टेररिज्म कमेटी का उपाध्यक्ष बनाने से क्या पड़ेगा असर? पढ़ें 5 पॉइंट्स में

Pakistan UNSC CTC Co-Chair: 5 Key Impacts on India
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Pakistan UNSC CTC Co-Chair: पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की आतंकवाद-रोधी समिति के उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। पाकिस्तान इन नियुक्तियों को एक बड़ी जीत की तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, यह भारत के लिए खासतौर पर चिंताजनक है, क्योंकि पाकिस्तान पर लंबे समय से आतंकवाद को बढ़ावा देने और आतंकी संगठनों को पनाह देने का आरोप है। भारत सालों से सीमा पार आतंकवाद का शिकार रहा है, और पाकिस्तान की यह नियुक्ति न सिर्फ कूटनीतिक चुनौती है, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा है।

Pakistan UNSC CTC Co-Chair: शहबाज शरीफ ने जताया गर्व

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस नियुक्ति को अपने देश के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह नियुक्ति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान की आतंकवाद-रोधी कोशिशों पर पूरा भरोसा है। शरीफ ने दावा किया कि पाकिस्तान आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से एक है, जहां इसने 90,000 से ज्यादा लोगों की जान ली और 150 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से लड़ने में पाकिस्तान का बलिदान बेजोड़ है।


पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार, साथ ही पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर जैसे नेताओं ने भी ऐसी ही बातें कही हैं। वे इसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं। लेकिन भारत ने इस नियुक्ति को लेकर कड़ा ऐतराज जताया है, इसे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई के लिए हानिकारक बताया है।

क्या है पाकिस्तान की नियुक्ति की पृष्ठभूमि?

पाकिस्तान फिलहाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) का दो साल के लिए अस्थायी सदस्य है, उसे हाल ही में इसकी दो अहम समितियों में जगह मिली है। उसे तालिबान प्रतिबंध समिति का अध्यक्ष और आतंकवाद-रोधी समिति का उपाध्यक्ष चुना गया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद-रोधी समिति (Counter-Terrorism Committee – CTC) का गठन 2001 में अमेरिका में हुए 9/11 आतंकी हमलों के बाद किया गया था। यह समिति आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक नियम बनाने, आतंकी संगठनों पर नजर रखने और देशों को आतंकवाद से लड़ने में मदद करने का काम करती है। इस समिति में उपाध्यक्ष की भूमिका बहुत अहम होती है, क्योंकि यह देशों को आतंकवाद से जुड़े नियमों और फैसलों को प्रभावित करने का मौका देती है। भारत ने कई बार संयुक्त राष्ट्र में सबूत दिए हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देता है। फिर भी, उसे यह पद मिलना चिंता का विषय है।

वहीं, पाकिस्तान को इस अहम पद पर नियुक्त करने के कई बड़े प्रभाव हो सकते हैं। इससे न केवल दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई प्रभावित होगी, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को भी बढ़ा सकती है।

पाकिस्तान की छवि सुधारने की कोशिश

पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद को समर्थन देने के लिए दुनिया की आलोचना झेल रहा है। इस नियुक्ति से उसे मौका मिलेगा कि वह खुद को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला देश दिखाए। यह एक तरह से उसकी छवि को चमकाने की कोशिश हो सकती है। वह यह दावा कर सकता है कि वह आतंकवाद से लड़ने में गंभीर है। हालांकि, भारत ने बार-बार सबूत दिए हैं कि पाकिस्तान आतंकी संगठनों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को संरक्षण देता है। भारतीय राजदूत अनुपमा सिंह ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक बैठक में कहा था कि इस नियुक्ति से पाकिस्तान को अपनी कथित “पीड़ित” छवि को और मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले में अपनी संलिप्तता को लेकर पाकिस्तान इन हमलों पर पर्दा डाल सकता है या भारत के सबूतों को कमजोर कर सकता है। इससे भारत की आतंकवाद से लड़ाई कमजोर हो सकती है।

आतंकवाद-रोधी नियमों पर असर

यह समिति आतंकी संगठनों और लोगों को वैश्विक आतंकी सूची में डालने, आतंकवाद के लिए पैसे रोकने और देशों के बीच सहयोग बढ़ाने जैसे बड़े फैसले लेती है। पाकिस्तान इस पद का फायदा उठाकर इन फैसलों को अपने हित में मोड़ सकता है। उदाहरण के लिए, वह भारत के खिलाफ काम करने वाले आतंकी संगठनों पर कार्रवाई को कमजोर कर सकता है। पाकिस्तान भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकी संगठनों पर कार्रवाई को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है। इससे पहले भी पाकिस्तान ने चीन के समर्थन से UNSC की प्रस्ताव संख्या 1267 के तहत आतंकियों को सूचीबद्ध करने के प्रयासों को बार-बार बाधित किया है। अब उपाध्यक्ष के रूप में, उसका प्रभाव और बढ़ सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

इस नियुक्ति पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। एक देश, जिस पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप है, उसे आतंकवाद-रोधी समिति में इतना बड़ा पद देना सही नहीं लगता। इससे यूएनएससी की साख पर सवाल उठ रहे हैं। यह उन देशों के लिए निराशा की बात है, जो आतंकवाद के खिलाफ मजबूत कार्रवाई चाहते हैं। इससे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई कमजोर पड़ सकती है।

बढ़ सकता है भारत-पाक के बीच तनाव

पहलगाम हमले औऱ उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही रिश्ते तनावपूर्ण हैं। वहीं इस नियुक्ति के बाद पाकिस्तान यूएन में भारत के खिलाफ अपनी रणनीति धार दे सकता है। खासकर कश्मीर के मुद्दे पर, पाकिस्तान इस मंच का गलत इस्तेमाल कर सकता है और भारत को आतंकवाद के संदर्भ में बदनाम करने की कोशिश कर सकता है। भारत ने हमेशा कहा है कि कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है, लेकिन पाकिस्तान इस मंच का इस्तेमाल अपनी कहानी को बढ़ावा देने के लिए कर सकता है।

पाकिस्तान हमेशा कश्मीर को यूएन जैसे मंचों पर उठाकर भारत को घेरने की कोशिश करता है। लेकिन इस नई भूमिका के साथ, वह कश्मीर को आतंकवाद से जोड़कर भारत को बदनाम कर सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि पहलगाम के बाद जब भारत ने पहलगाम हमले में शामिल टीआरएफ को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में चर्चा के दौरान आतंकी लिस्ट में नाम शामिल करने की बात कही, तो चीन ने कथित तौर पर कुछ आतंकवादियों या संगठनों को सूचीबद्ध करने से रोकने की कोशिश की।

पहले भी, पाकिस्तान और चीन ने मिलकर यूएन की आतंकी सूची में आतंकियों को शामिल करने के प्रयासों को रोका है। अब इस पद के साथ, वह इसे और आसानी से कर सकता है। इससे भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकी संगठनों पर वैश्विक कार्रवाई मुश्किल हो सकती है।

भारत की कूटनीति पर असर

भारत ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थन को बेनकाब करने में काफी मेहनत की है। भारतीय राजनयिकों, पर्वतनेनी हरीश और अनुपमा सिंह ने बार-बार पाकिस्तान की नीतियों की आलोचना की है। लेकिन इस नियुक्ति से भारत के इन प्रयासों को झटका लग सकता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत की कूटनीतिक विफलता का प्रतीक हो सकता है, क्योंकि पाकिस्तान को इतना महत्वपूर्ण पद हासिल करने से रोकने में भारत नाकाम रहा।

हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद, भारतीय सांसदों के सात शिष्टमंडलों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के सदस्य देशों का दौरा किया। इनमें से एक शिष्टमंडल का नेतृत्व कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने किया। शशि थरूर का कहना है, “यूएनएससी में कई आतंकवाद-रोधी समितियां हैं, और सदस्य देशों को बारी-बारी से इनकी जिम्मेदारी मिलती है। पाकिस्तान को उसकी सदस्यता के कारण यह भूमिका मिली है। लेकिन भारत का यूएन मिशन पाकिस्तान की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखेगा।”

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने नहीं, तो किसने लड़ी जंग? पहलगाम हमले के पीछे आसिम मुनीर नहीं तो कौन है मास्टरमाइंड?

इस नियुक्ति को भारत की कूटनीतिक हार के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत पाकिस्तान को यह पद लेने से रोकने में नाकाम रहा। इससे भारत की वैश्विक छवि पर असर पड़ सकता है।