भारतीय सेना ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को लगभग 30,000 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया है। इस टेंडर के तहत सेना को 5 से 6 रेजिमेंट अनंत शस्त्र एयर डिफेंस सिस्टम की सप्लाई की जाएगी। डीआरडीओ द्वारा बनाए इस सिस्टम को पहले क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल (QRSAM) के नाम से जाना जाता था।
Anant Shastra भारत में विकसित एक एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के विमानों, ड्रोन और मिसाइलों से भारतीय सेना की सुरक्षा करना है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी मोबिलिटी और क्विक रेस्पॉन्स क्षमता है। यह प्रणाली चलते-फिरते लक्ष्यों को ट्रैक कर सकती है और बेहद कम समय में फायर करने की क्षमता रखती है।
यह प्रणाली पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इसमें उत्तम एईएसए रडार और एडवांस सेंसर लगे हैं, जो दिन और रात दोनों परिस्थितियों में लक्ष्य को पहचानकर उसे नष्ट करने में सक्षम हैं।
मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने चीनी ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। उस समय भारतीय सेना की एयर डिफेंस य़ूनिट्स ने एल-70 और ज़ू-23 गनों से कई ड्रोन गिराए थे। साथ ही, आकाश और एमआर-एसएएम सिस्टम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस कार्रवाई ने दिखा दिया कि भारतीय सेना को छोटे और मध्यम रेंज के और ज्यादा एडवांस सिस्टम की जरूरत है। जिसके बाद अनंत शस्त्र के प्रोजेक्ट पर फोकस किया गया।
करीब 30,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत बीईएल भारतीय सेना को अनंत शस्त्र प्रणाली उपलब्ध कराएगी। बताया गया है कि इस प्रणाली की तैनाती पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर किया जाएगी, ताकि पाकिस्तान और चीन से आने वाले हवाई खतरों का मुकाबला किया जा सके।
इसकी रेंज लगभग 30 किलोमीटर है, जो पहले से मौजूद आकाश और मीडियम रेंज सरफेस टू एय़र मिसाइल MRSAM जैसी सिस्टम के साथ काम करेगी।
Anant Shastra प्रणाली का कई बार सफल परीक्षण किया जा चुका है। इन ट्रायल्स में इसे दिन और रात दोनों परिस्थितियों में परखा गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसने हर बार अपने लक्ष्यों को सटीकता से भेदा। इसके मोबाइल लॉन्चर सिस्टम की वजह से इसे फटाफट तैनात किया जा सकता है।
भारतीय सेना की आर्मी एयर डिफेंस वर्तमान में आकाश और मीडियम रेंज सरफेस टू एय़र मिसाइल और दूसरे छोटे एयर डिफेंस सिस्टम्स का इस्तेमाल करती है। यह भारतीय वायुसेना के साथ मिलकर हवाई खतरों से सुरक्षा देती है। इसके अलावा सेना को नए रडार, जामर और लेजर-आधारित सिस्टम भी मिलने वाले हैं, ताकि पाकिस्तान और चीन से आने वाले आधुनिक ड्रोन खतरों से निपटा जा सके।
Anant Shastra प्रणाली पूरी तरह से डीआरडीओ ने तैयार की है। और बीईएल इसकी सप्लाई के लिए जिम्मेदार होगी। इस प्रोजेक्ट में लगभग 105 भारतीय कंपनियां कंपोनेंट्स के निर्माण में शामिल हैं। इससे भारत का एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग मजबूत होगा और बड़ी संख्या में रोजगार भी पैदा होंगे। अनुमान है कि हर साल करीब 11,750 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहेंगे।
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under
Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa
Lashkar-e-Taiba in KPK: भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी आतंकी संगठनों ने अपने ठिकाने बदलने शुरू कर दिए हैं। पहले यह कैंप पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर पीओके और पंजाब में चलते थे, लेकिन अब इन्हें खैबर पख्तूनख्वा यानी केपीके में शिफ्ट किया जा रहा है। इटेंलिजेंस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य-प्रायोजित और संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा अब केपीके लोअर दिर जिले में नया ट्रेनिंग और रेजिडेंशियल सेंटर बना रहा है और Lashkar-e-Taiba in KPK का मुद्दा लगातार चर्चा का टॉपिक बन गया है।
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa
22 सितंबर 2025 को सामने आई तस्वीरों और वीडियोज से पुष्टि हुई कि लश्कर-ए-तैयबा लोअर दिर के कुम्बन मैदान इलाके में लगभग 4,643 वर्ग फुट भूमि पर नया सेंटर बना रहा है। इसे मरकज जिहाद-ए-अक्सा नाम दिया गया है। यह जगह अफगान सीमा से महज 47 किलोमीटर दूर है। जुलाई 2025 से निर्माण शुरू हुआ और सितंबर तक इसकी पहली मंजिल का फ्रेम तैयार हो चुका है। आरसीसी छत डालने का काम भी तेजी से चल रहा है।
Visual shows steady flow of materials and labor, consistent with a deliberate plan to reconstitute
Lashkar-e-Taiba in KPK हमेशा से धार्मिक संस्थानों की आड़ में अपने आतंकी ठिकाने बनाता रहा है। नया ट्रेनिंग भी इसके पास बनी जामिया अहले सुन्नत मस्जिद के बगल में बनाया जा रहा है। इस रणनीति का उद्देश्य आतंकियों की आवाजाही और भर्ती को धार्मिक गतिविधियों की आड़ में छिपाना है।
वहीं, खास बात यह है कि लोअर दिर में लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन के नए निर्माणाधीन कैंपों के बीच की दूरी केवल 4 किलोमीटर है, जिससे अंदेशा लगाया जा रहा है कि दोनों आतंकी संगठन आपसी तेलमेल के जरिए आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं।
आतंकी नेताओं को मिली जिम्मेदारियां
नए कैंप की कमान कुख्यात आतंकी नसर जावेद को दी गई है, जो 2006 हैदराबाद बम धमाके का सह-साजिशकर्ता रहा है। वह 2004 से 2015 तक पीओके के दुलई प्रशिक्षण कैंप को चलाता था और वर्तमान में लश्कर की फंडिंग संस्था खिदमत-ए-खल्क से जुड़ा है। इसके अलावा मुहम्मद यासीन उर्फ बिलाल भाई को जिहादी विचारधारा सिखाने की जिम्मेदारी मिली है, जबकि हथियारों की ट्रेनिंग अनसुल्लाह खान देख रहा है, जिसे 2016 में गरही हबीबुल्लाह कैंप में ट्रेनिंग दी गई थी।
दाऊरा-ए-खास और दाऊरा-ए-लश्कर की तैयारी
एक बार यह ठिकाना तैयार हो जाने पर यहां दो मुख्य ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएंगे – दाऊरा-ए-खास और दाऊरा-ए-लश्कर। यह केंद्र लश्कर के जान-ए-फिदाई फिदायीन यूनिट का नया ठिकाना बनेगा। पहले यह यूनिट भिम्बर-बर्नाला स्थित मरकज अहले हदीस से चलती थी, जिसे 7 मई को भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ध्वस्त कर दिया था।
इंटेलिजेंस सूत्र बताते हैं कि इस पूरी शिफ्टिंग के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का स्पेशल ऑपरेशंस डायरेक्टरेट है। इसके जरिए आतंकियों की गतिविधियों को भारतीय निगरानी से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही हिजबुल मुजाहिद्दीन और जैश-ए-मोहम्मद ने भी अपने नए ठिकाने केपीके में शिफ्ट कर लिए हैं।
दिसंबर 2025 तक पूरा होने की उम्मीद
सूत्रों ने बताया कि लश्कर-ए-तैयबा के नए ट्रेनिंग सेंटर का काम दिसंबर 2025 तक पूरा होने की उम्मीद है, आने वाले समय में बड़े स्तर का खतरा बन सकता है। अभी यह निर्माणाधीन है, लेकिन पहले से ही इसे भर्ती, कट्टरपंथ फैलाने और बड़े पैमाने पर आतंकी प्रशिक्षण का नया अड्डा माना जाने लगा है। खास बात यह है कि इसके बगल में बन रहा मरकज़ जामिया अहले सुन्नत अभी केवल 80 फीसदी ही तैयार हुआ है, लेकिन उसे अधूरा छोड़कर लश्कर-ए-तैयबा ने अपनी पूरी ताकत, संसाधन और पैसा जिहाद-ए-अक्सा ट्रेनिंग सेंटर बनाने में झोंक दिया है।
पाकिस्तानी सेना ने टीटीपी पर चलाई क्लीनअप ड्राइव
लोअर दिर ऐतिहासिक रूप से भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों का गढ़ रहा है, जहां अल-बदर जैसे संगठन सक्रिय रहे। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर से पहले यहां लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन की कोई मौजूदगी नहीं थी। अल-बदर के अलावा, यह इलाका लंबे समय तक तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का मजबूत ऑपरेशनल बेस रहा। हालांकि, दोनों संगठनों की विचारधारा में फर्क है। टीटीपी देवबंदी सोच रखता है और पाकिस्तान विरोधी है, जबकि लश्कर अहले हदीस विचारधारा को मानता है और पाकिस्तान समर्थक है। इसी वजह से लोअर दिर में टीटीपी के आतंकियों ने लश्कर कमांडरों की कई बार टारगेटेड हत्याएं कीं।
साल 2011 में, जब लश्कर ने यहां अस्थायी ट्रेनिंग सेंटर बनाया, तो टीटीपी ने एक आत्मघाती हमला किया। यह हमला एक लश्कर कमांडर के जनाजे में हुआ था, जिसमें 20 लोगों की मौत हो गई। माना जाता है कि लश्कर की गतिविधियों को सुरक्षित रखने और ट्रेनिंग बिना बाधा जारी रखने के लिए पाकिस्तानी सेना ने जून 2025 में लोअर दिर में एक “क्लीनअप ड्राइव” शुरू की। इसमें टीटीपी के आतंकियों को निशाना बनाया गया। इस अभियान में दो दर्जन से ज्यादा टीटीपी आतंकी मारे गए और इसके बाद सिर्फ एक महीने के भीतर लश्कर ने अपना नया आतंकी केंद्र बनाना शुरू कर दिया।
केपीके में पाक सेना कर रही हमले
पाकिस्तानी सेना और एयरफोर्स ने जून 2025 से अब तक केपीके में 40 से अधिक नागरिकों की हत्या की है। आधिकारिक बयान में कहा गया कि ये अभियान “टेरर-फ्री” करने के लिए हैं, लेकिन असल में इसका उद्देश्य पाकिस्तान विरोधी आतंकियों को खत्म करना और भारत विरोधी संगठनों को सुरक्षित माहौल देना है।
पाकिस्तान की यह दस साल से चली आ रही नीति को वहां के मुख्यमंत्री अली अमीन गांधापुर ने अगस्त 2025 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद स्वीकार किया था। खास बात यह है कि पाकिस्तान जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद-रोधी अभियान के लिए मदद मांगता है, तो मिली हुई राशि का बड़ा हिस्सा आम नागरिकों की हत्या या फिर सरकार-विरोधी आतंकियों को खत्म करने में लगा देता है। इससे नतीजा यह निकलता है कि सरकार-समर्थित आतंकी संगठनों के लिए सुरक्षित माहौल तैयार हो जाता है।
देखें फोटो गैलरी
1 of 8
Visual shows steady flow of materials and labor, consistent with a deliberate plan to reconstitute
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under
Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under
Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa
लोअर दिर में लश्कर का यह नया प्रशिक्षण केंद्र दिसंबर 2025 तक तैयार हो सकता है। यह न केवल भर्ती और वैचारिक ब्रेनवॉश का केंद्र बनेगा बल्कि हथियारों और बड़े ऑपरेशनों की ट्रेनिंग भी यहां दी जाएगी। आशंका है कि अब आगे इसी सेंटर के जरिए भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को चलाने की कोशिशें की जाएंगी
MiG-21 Last Sortie: भारतीय वायुसेना के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मिग-21 लड़ाकू विमानों ने आखिरकार शुक्रवार को औपचारिक विदाई दे दी गई। इस मौके को और यादगार बनाने के लिए भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद ‘बादल 3’ कॉल साइन के साथ मिग-21 की आखिरी सॉर्टी यानी उड़ान भरी। उनके साथ स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्माने भी उड़ान भरी। दोनों ने इससे पहले पिछले महीने राजस्थान के नाल एयरबेस पर मिग-21 बाइसन पर सोलो कॉम्बैट सॉर्टी की थी। उस फॉर्मेशन की अगुवाई स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्मा ने की थी।
यह उड़ान सिर्फ एक सैन्य परंपरा का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह उस पूरे दौर को सलाम थी, जिसने भारत की हवाई शक्ति को दशकों तक मजबूती दी। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने MiG-21 का नेतृत्व करते हुए जो फ्लाईपास्ट किया, मिग-21 के प्रति अपनी गहरी आस्था और सम्मान को प्रदर्शित किया।
चंडीगढ़ एयरबेस पर हुए इस समारोह में एक बेहद प्रतीकात्मक फ्लाईपास्ट किया गया। इसमें MiG-21 बाइसन और स्वदेशी एलसीए तेजस ने साथ उड़ान भरी। यह दृश्य पुराने और नए युग का मिलन थास जहां सोवियत दौर का ‘बाइसन’ अपने कंधों पर गौरव का इतिहास लिए विदा हो रहा था और स्वदेशी तेजस भविष्य की दिशा दिखा रहा था।
इसके बाद छह मिग-21 विमानों ने अपनी अंतिम उड़ान पूरी की और रक्षा मंत्री, सेना प्रमुखों और सभी वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में औपचारिक रूप से अलविदा कह दिया गया।
इस विदाई कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी मौजूद थे। रक्षा मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि मिग-21 भारतीय वायुसेना का “बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स” रहा है और इसकी भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता और MiG-21 Last Sortie यादगार है।
समारोह के दौरान एयरफोर्स के अफसरों और 28 स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर ने फॉर्म-700 डॉक्यूमेंट वायुसेना प्रमुख को सौंपा। यह दस्तावेज किसी विमान की आधिकारिक सेवा समाप्ति का प्रतीक माना जाता है।
विदाई को यादगार बनाने के लिए रक्षा मंत्री ने एक विशेष डाक टिकट और डे कवर भी जारी किया। इसे भारतीय वायुसेना के लंबे और गौरवशाली इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
इस कार्यक्रम में सिर्फ उड़ान ही नहीं, बल्कि वायुसेना की कई विशेष टीमों ने अपने कौशल का प्रदर्शन भी किया। आकाश गंगा स्काईडाइविंग टीम ने शानदार छलांग लगाई, जबकि एयर वारियर ड्रिल टीम ने सटीक और अनुशासित मूवमेंट्स के जरिए दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इसके अलावा सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम ने आकाश में खास प्रस्तुति की। समारोह के दौरान जगुआर और MiG-21 विमानों ने मिलकर एक प्रतीकात्मक फ्लाईपास्ट भी किया, जिसने 1971 और कारगिल जैसे ऐतिहासिक अभियानों की याद ताजा कर दी और अब MiG-21 Last Sortie को सब देख रहे है।
मिग-21 भारतीय वायुसेना में 1963 से शामिल हुआ और तब से अब तक इसने हर बड़े युद्ध और ऑपरेशन में अपनी क्षमता साबित की। चाहे वह 1971 का युद्ध हो, कारगिल संघर्ष हो या 2019 का बालाकोट एयरस्ट्राइक, इस विमान ने हमेशा भारतीय तिरंगे को गर्व से ऊंचा रखा।
वर्षों तक इसे लगातार अपग्रेड किया गया और इसका बाइसन वैरिएंट वायुसेना के लिए सबसे विश्वसनीय इंटरसेप्टर साबित हुआ। लेकिन तकनीकी विकास और नए विमानों के आने के बाद अब MiG-21 Last Sortie सम्मानजनक विदाई दी गई है।
MiG-21 retirement: भारतीय वायुसेना का सबसे पुराना और भरोसेमंद लड़ाकू विमान मिग-21 अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। 62 साल तक आसमान में भारतीय तिरंगे की शान बढ़ाने वाले इस विमान को शुक्रवार को औपचारिक रूप से विदाई दी गई। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे “बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स” कहते हुए श्रद्धांजलि दी और कहा कि इसने हर भूमिका में भारतीय वायुसेना का सिर ऊंचा किया और पीढ़ियों के पायलटों को तैयार किया।
MiG-21 की आखिरी पीढ़ी बाइसन को चंडीगढ़ एयरबेस पर 28 स्कवॉड्रन पर आखिरी विदाई दी गई। मिग-21 के विदाई समारोह में राजनाथ सिंह ने भावुक शब्दों में कहा कि मिग-21 पर सवार होकर पीढ़ियों के पायलटों ने उड़ान सीखी, कठिन परिस्थितियों में जीत हासिल की। उन्होंने कहा कि यही वह प्लेटफॉर्म था जिसने भारतीय वायुसेना की रणनीति को दशकों तक दिशा दी। उन्होंने कहा, “मिग-21 केवल एक विमान नहीं था, बल्कि साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था। इसी विमान ने हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया और आज हम एलसीए तेजस और एएमसीए जैसे स्वदेशी विमानों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।”
रक्षा मंत्री ने कहा, कोई भी ऐतिहासिक मिशन हो, हर बार मिग-21 ने तिरंगे का सम्मान किया। इसलिए यह विदाई, हमारी सामूहिक स्मृतियों का भी है, हमारे राष्ट्रीय गौरव का भी है, और उस यात्रा का भी है, जिसमें साहस, बलिदान और उत्कृष्टता की कहानी लिखी गई है
MiG-21 की कहानी 1963 में भारतीय वायुसेना में इसके शामिल होने से शुरू होती है। सोवियत मूल के इस विमान को भारत ने समय-समय पर अपग्रेड किया और आखिरी वैरिएंट को मिग-21 बाइसन के नाम से जाना गया। यह दुनिया में सबसे ज्यादा बनाए गए लड़ाकू विमानों में शामिल है। करीब 11,500 मिग-21 तैयार किए गए थे, जिनमें से लगभग 850 ने भारत की वायुसेना की सेवा की।
रक्षा मंत्री राजनाथ ने कहा, 62 साल की लंबी यात्रा में मिग-21 ने भारत के लगभग हर बड़े युद्ध और अभियान में अपनी ताकत दिखाई। 1971 के भारत-पाक युद्ध में इसने ढाका के गवर्नर हाउस पर हमला किया और भारत की जीत सुनिश्चित की। कारगिल युद्ध 1999 में यह दुर्गम पहाड़ी इलाकों में दुश्मन की चौकियों पर सटीक हमलों के लिए इस्तेमाल हुआ। बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 में भी इसकी मौजूदगी रही, जब विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान ने इसी विमान से पाकिस्तान के एफ-16 को मार गिराया और इतिहास रचा। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर 2025 में भी इस विमान को अग्रिम मोर्चे पर तैनात किया गया था, जहां इसने भारतीय पायलटों को हवाई बढ़त दिलाई।
इस दौरान MiG-21 को लगातार अपग्रेड भी किया गया। रक्षा मंत्री ने समारोह में साफ किया कि सेवा में बने रहे विमान अधिकतम 40 साल पुराने थे, जो कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक सामान्य उम्र है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने इसे हमेशा तकनीकी रूप से प्रासंगिक बनाए रखने के लिए आधुनिक राडार, एवियोनिक्स और बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल जैसी क्षमताओं से लैस किया। इन्हीं अपग्रेड्स की वजह से इसे “बाइसन” कहा जाने लगा। वहीं, मिग-21 को भारतीय वायुसेना में कई नामों से पुकारा गया, त्रिशूल, विक्रम, बादल और बाइसन। हर नाम इसकी क्षमताओं और बदलाव की एक नई कहानी कहता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, भारतीय वायुसेना के लिए यह विमान केवल एक फाइटर जेट नहीं बल्कि “ट्रेनिंग स्कूल” था, जिसने हजारों पायलटों को तैयार किया। और इस जहाज ट्रेनिंग लेकर बाद में सुखोई-30I और राफेल जैसे आधुनिक विमानों को उड़ाने में भी सक्षम बने। राजनाथ सिंह ने कहा कि आज हमारे जो भी कुशल पायलट हैं, उनकी नींव मिग-21 पर रखी गई थी। यही वजह है कि यह विमान भारतीय वायुसेना के इतिहास में अमर रहेगा।
शुक्रवार को जब MiG-21 ने अपनी आखिरी ऑपरेशनल उड़ान भरी, तो भारतीय वायुसेना का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया। विदाई समारोह में वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी, पूर्व पायलट और एचएएल के इंजीनियर मौजूद थे, जिन्होंने इस एतिहासिक पल को अपनी आंखों से देखा।
एचएएल की भूमिका को भी विशेष रूप से सराहा गया। लगातार मरम्मत और अपग्रेड की वजह से यह विमान छह दशक तक हवा में मजबूती से खड़ा रहा। राजनाथ सिंह ने एचएएल के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की मेहनत को सलाम करते हुए कहा कि उनकी कोशिशों ने ही इस विमान को इतना लंबा जीवन दिया।
विदाई के इस मौके पर राजनाथ सिंह ने कहा कि इस विमान को अलविदा कहना केवल एक सैन्य परंपरा नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यता और विरासत का हिस्सा है। मिग-21 अब भले ही सक्रिय सेवा से बाहर हो गया हो, लेकिन इसके साहस और योगदान की गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी।
Pinaka MBRL: भारतीय सेना पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को ड्रोन खतरों से सुरक्षित रखने के लिए एक नया कदम उठाया है। अब इन रॉकेट लॉन्चरों पर कोप केज लगाया जा रहा है। हाल ही में इसकी एक फोटो सामने आई जिसमें पिनाका सिस्टम के ऊपर कोप केज लगा हुआ है। सेना ने यह कदम रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्धों से मिली सीख के बाद उठाया है। जहां ड्रोन ने पारंपरिक भारी हथियारों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसे बड़े पैमाने पर अपनाना शुरू किया है। हालांकि इस ऑपरेशन में पिनाका का इस्तेमाल नहीं हुआ था।
पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर जिसे डीआरडीओ ने बनाया है। यह सिस्टम 90 किमी तक की मारक क्षमता वाली मिसाइलें दाग सकता है। वहीं, आधुनिक युद्ध में छोटे, सस्ते और तेजी से तैनात होने वाले ड्रोन यानी यूएवी और एफपीवी फर्स्ट पर्सन व्यू टाइप ड्रोन से बड़े हथियारों बड़ा नुकसान देखने को मिल रहा है। इन चुनौतियों के देखते हुए भारतीय सेना ने पिनाका और अन्य आर्टिलरी सिस्टम पर ‘कोप केज’ लगाने का फैसला किया है।
कोप केज एक सस्ता और सरल जुगाड़ है, जो टैंक, रॉकेट लॉन्चर, और अन्य सैन्य उपकरणों के ऊपरी हिस्से पर लगाया जाता है। यह जालीदार स्ट्रक्चर ड्रोन से गिराए गए विस्फोटकों, लॉयटरिंग म्यूनिशन (जैसे कामिकेज़ ड्रोन), और टॉप-अटैक एंटी-टैंक मिसाइलों को रोकने में मदद करता है। यह हथियारों को सीधे टकराने से पहले विस्फोट को ट्रिगर करता है, जिससे नुकसान कम होता है और चालक दल सुरक्षित रहते हैं। भारत में इसे स्वदेशी रूप से बनाया जा रहा है, जो लागत को और कम करता है। भारतीय सेना ने यह तकनीक यूक्रेन-रशिया युद्ध और इजराइल-हमास संघर्ष से मिली सीख के बाद अपनाई है, क्योंकि इन संघर्षों में कोप-स्टाइल प्रोटेक्शन ने कई मौकों पर बड़े नुकसान होने से बचाया है।
भारतीय सेनाओं ने 2023 से कोप केज का इस्तेमाल शुरू किया और ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसकी तैनाती में तेजी देखी गई है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि कोप केज को पहले कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्म्स पर आजमाया गया, फिर बड़े पैमाने पर रोल-आउट किया गया। पिनाका बैटरियों, मोबाइल रॉकेट सिस्टम, कुछ बख्तरबंद वाहनों और लॉजिस्टिक्स काफिलों पर यह स्ट्रक्चर लगाया जा रहा है ताकि सीमाओं पर होने वाले ड्रोन हमलों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।
एक बड़े फायदे के तौर पर कोप केज को सस्ता और फटाफट लगाये जाने वाला सिस्टम माना जा रहा है। इसे मौजूदा वाहनों और सिस्टम पर बिना किसी बड़े मैकेनिकल परिवर्तन के लगाया जा सकता है, जिससे लागत और समय दोनों बचते हैं। सैनिक कारवाईयों में कम-लागत जुगाड़ों की जरूरत उस समय देखने को मिली जब सस्ते ड्रोनों ने महंगे हथियारों को भी निशाना बनाना शुरू किया।
क्यों लगाया पिनाका पर?
ऑपरेशन सिंदूर में पिनाका का सीधा इस्तेमाल तो नहीं हुआ। हां, अग्रिम मोर्चों पर यह सिस्टम तैनात जरूर किया गया था और उसे रिजर्व में रखा गया था ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत काम में लिया जा सके। रक्षा सूत्रों का कहना है कि अगर पिनाका को सक्रिय रूप से उपयोग में लाया जाता तो विरोधी को मौजूदा नुकसान से कहीं ज्यादा झेलना पड़ता। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान को इसका अंदेशा लग गया था, इसीलिए उसने पिनाका की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए निगरानी ड्रोन भेजे थे, जिन्हें भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया।
पिनाका फील्ड में तेज प्लट-आउट और शूट-एंड-स्कूट कैपेबिलिटी देता है। सूत्रों के मुताबिक, 2025 तक पिनाका की कुछ रेजिमेंटें ऑपरेशनल हैं और आगे बढ़ते हुए और बैटरियां तैनात की जा रही हैं। फिलहाल पिनाका की 6 रेजिमेंट ऑपरेशनल हैं, जो कुल 18 बैटरी बनाती हैं। वहीं, 2025 के अंत तक 8 रेजिमेंट (24 बैटरी) और 2026 के मध्य तक 10 रेजिमेंट (30 बैटरी) ऑपरेशनल करने की योजना है। वहीं, पिनाका पर कोप केज लगाने का फैसला उन्हीं रेजिमेंट्स और बैटरी के ऑपरेशनल सुरक्षा स्तर को और बढ़ाने के मकसद से लिया गया है।
पिनाका की एक बैटरी में छह लॉन्चर होते हैं और हर लॉन्चर में बारह रॉकेट लगे रहते हैं, यानी कुल मिलाकर एक बैटरी में 72 रॉकेट होते हैं। सूत्रों के अनुसार 72 रॉकेट लगभग 44 सेकंड में फायर किए जा सकते हैं। एक पूरी बैटरी की कटिंग-पॉवर लगभग 0.8 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को प्रभावी ढंग से तबाह कर सकती है और इसके जरिए एक बार में लगभग 7.2 टन विस्फोटक टारगेट को निशाना बना सकता है।
किन हथियारों पर हो रहा इस्तेमाल
भारतीय सेना ने कोप केज को विभिन्न बख्तरबंद वाहनों, आर्टिलरी सिस्टम, और लॉजिस्टिक इक्विपमेंट्स पर तैनात किया है। भारतीय सेना का मुख्य युद्धक टैंक टी-90 भीष्म अब टॉप-अटैक प्रोटेक्शन केज (TAPC) से लैस है। यह टरेट के ऊपर लगाया गया है ताकि ड्रोन और मिसाइल हमलों से ऊपरी कवच की रक्षा हो सके। इसकी शुरुआत 2023 में पश्चिमी कमांड (पाकिस्तान सीमा) पर हुई।
T-90 Tank with Cope Cage
वहीं, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री यूनिट्स में इस्तेमाल होने वाला बीएमपी-2 सरथ इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल (IFV) भी अब कोप केज से लैस है। 2025 में पहली बार इसकी पूरी फ्लीट पर यह जाली लगाई गई, ताकि FPV (फर्स्ट-पर्सन व्यू) ड्रोन्स से होने वाले हमलों से बचा जा सके।
इसके अलावा बीएम-21 रॉकेट लॉन्चर जो वज्र कोर का हिस्सा है। 2025 में इस पर कोप केज लगाए गए ताकि ड्रोन हमलों से लॉन्चर और क्रू की सुरक्षा हो।
साथ ही, लंबी दूरी के बीएम-30 स्मर्च रॉकेट लॉन्चर को भी 2025 में कोप केज से अपग्रेड किया गया है। यह आर्टिलरी रेजिमेंट्स में तैनात है और टॉप-अटैक ड्रोंस से बचाव के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। यह सिस्टम 90 किमी तक मार कर सकता है।
105 एमएम इंडियन फील्ड गन पर भी अगस्त 2025 से कोप केज लगाया गया है। यह आर्टिलरी गन क्रू और ब्रेच एरिया को एफपीवी ड्रोंस और लॉयटरिंग म्यूनिशन से बचाता है।
इसके अलावा सीमा पर लॉजिस्टिक सप्लाई के लिए इस्तेमाल होने वाले अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रकों पर 16 फीट×9 फीट का वायर मेश केज लगाया गया। जून 2025 से यह बॉर्डर कन्वॉय में ड्रोन हमलों से सामान की सुरक्षा करता है।
हाल के मिलिट्री अभ्यासों में कोप केज वाले प्लेटफ़ॉर्म ने अच्छा प्रदर्शन दिखाया है। सैनिकों और इकाइयों से मिले फीडबैक में यह बात सामने आई कि यह उपाय कारगर है। फील्ड-इंस्पेक्शन्स और रन-ऑफ-ऑपरेशन टेस्ट के बाद कर्नल स्तर के कमांडरों ने इसे सीमाओं पर तैनात करने की सिफारिशें दी हैं। साथ ही टेक्निकल प्रयोगशालाओं में इसके डिजाइन में सुधार के सुझाव भी उठाए जा रहे हैं ताकि वजन कम करके और अधिक असरदार बनाया जा सके।
CDS on 1962 War: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने 1962 के भारत-चीन युद्ध पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर उस समय भारतीय वायुसेनाका इस्तेमाल किया गया होता, तो चीन का आक्रमण काफी हद तक धीमा हो सकता था और भारतीय सेना को तैयारी करने के लिए अधिक समय मिल जाता।
उनका यह बयान कई मायनों में खास है क्योंकि अब तक इस विषय पर औपचारिक रूप से खुलकर चर्चा नहीं होती थी। जनरल चौहान ने यह विचार पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान साझा किए, जहां लेफ्टिनेंट जनरल एसपीपी थोराट की आत्मकथा “Reveille to Retreat” के संशोधित संस्करण का विमोचन किया गया।
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि 1962 के समय एयरफोर्स का इस्तेमाल “एस्केलेटरी” यानी हालात को और बिगाड़ने वाला माना गया था, इसी कारण इसे युद्ध में शामिल नहीं किया गया। लेकिन उनके अनुसार यह एक गंभीर रणनीतिक गलती थी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर एयरफोर्स को शामिल किया गया होता तो चीन का हमला कमजोर हो जाता और भारतीय सेना को अतिरिक्त तैयारी का समय मिल सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि अब हालात बदल चुके हैं। आधुनिक युद्ध में एयरपावर को नजरअंदाज करना असंभव है।
जनरल चौहान ने इसका उदाहरण हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर से दिया, जिसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीरमें आतंकवादी ठिकानों पर कार्रवाई की थी।
अपने बयान में सीडीएस ने भारत की फॉरवर्ड पॉलिसी की भी समीक्षा की। उन्होंने कहा कि इसे लद्दाख और नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) दोनों जगह एक समान तरीके से लागू करना गलत था।
CDS Gen Anil Chauhan breaks silence on the 1962 war, calling the decision not to use the IAF a “critical mistake.”
🔹 “Air power could have slowed the Chinese offensive, if not stopped it,” he said, stressing that what was seen as “escalatory” then is no longer true – as proven… pic.twitter.com/KqWZ45Er2w
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 25, 2025
उनके अनुसार, लद्दाख और नेफा के विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग थी और भौगोलिक परिस्थितियां भी भिन्न थीं। लद्दाख में चीन पहले से भारतीय क्षेत्र के हिस्से पर कब्जा कर चुका था, जबकि नेफा में भारत का दावा कहीं अधिक वैध था। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों इलाकों को एक जैसा मानकर नीतियां बनाना उस समय की बड़ी रणनीतिक भूल थी।
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने इस बात पर जोर दिया कि 1962 और आज की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। उस समय की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति आज से पूरी तरह अलग थी। आज भारत ने न सिर्फ अपनी सीमाओं पर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है, बल्कि वायुसेना और थलसेना की क्षमताएं भी काफी मजबूत हो चुकी हैं।
From Reveille to Retreat, the iconic autobiography of Lt Gen S.P.P. Thorat, KC, DSO, Padma Shri
उन्होंने कहा कि आज किसी भी परिस्थिति में एयरफोर्स को “एस्केलेटरी” मानना सही नहीं होगा। बल्कि आधुनिक युद्ध में एयर पावर निर्णायक भूमिका निभाती है।
1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उस समय भारत की सैन्य तैयारी सीमित थी और चीन ने अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन नेफा) के कई हिस्सों पर हमला किया था। हालांकि भारतीय सैनिकों ने वीरतापूर्वक मुकाबला किया, लेकिन रणनीतिक कमजोरियों के कारण भारत को नुकसान उठाना पड़ा।
जिस कार्यक्रम में सीडीएस ने यह विचार रखे, वहां लेफ्टिनेंट जनरल एसपीपी थोराट की आत्मकथा “Reveille to Retreat” का संशोधित संस्करण लॉन्च किया गया। जनरलचौहान ने कहा कि यह किताब केवल एक आत्मकथा नहीं है, बल्कि इसमें नेतृत्व, रणनीति और सेवा को लेकर महत्वपूर्ण सीखें दी गई हैं। इसमें उस दौर के फैसलों की ईमानदारी से समीक्षा की गई है, जो आज भी प्रासंगिक हैं।
Should the IAF Convert Retired MiG-21 Bison Fighters into UAVs
MiG-21 into UAVs?: भारतीय वायुसेना 26 सितंबर को 62 साल बाद अपने बाकी बचे 27 मिग-21 बाइसन लगभग दो स्क्वाड्रन को रिटायर कर देगी। यह फैसला इसलिए लेना पड़ा क्योंकि यह विमान अब पुराना हो चुका है और तकनीकी सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता। 1963 से 2025 तक लगभग 463 मिग-21 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं और 200 से अधिक पायलट इन हादसों में मारे गए। जिसके चलते वायुसेना की छवि और ऑपरेशनल सेफ्टी दोनों पर सवाल उठने लगे।
वहीं कुछ लोगों का कहना है कि क्या इन विमानों को कबाड़ में बदलने की बजाय इन्हें यूएवी या ड्रोन में बदला जा सकता है? क्योंकि चीन ने भी अपने पुराने जे-6 विमानों को कबाड़ की बजाय ड्रोन में बदला है। हाल ही में चीन ने इन्हें शोकेस भी किया है। कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन्हें ड्रोन में तब्दील कर दिया जाए तो यह भारत की युद्ध क्षमता में कई गुना बढ़ोतरी कर सकता है।
MiG-21 into UAVs?: 1963 में भारतीय वायुसेना में हुए थे शामिल
MiG-21 सोवियत युग का सुपरसोनिक फाइटर जेट है, जिसे 1963 में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। इसके बाद से यह भारत की एयर पावर की रीढ़ बना रहा। इस विमान ने 1971 के भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध और बालाकोट एयर स्ट्राइक में अहम भूमिका निभाई। 2000 के दशक की शुरुआत में इसके बाइसन वेरिएंट को आधुनिक एवियोनिक्स और रडार से लैस करके अपग्रेड भी किया गया, ताकि इसकी आयु और युद्ध क्षमता बढ़ाई जा सके। लेकिन 2025 तक आते-आते यह विमान तकनीकी रूप से इतना पुराना हो चुका है कि इसके पार्ट्स मिलना भी मुश्किल है, मेंटेनेंस का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है और लगातार हो रहे हादसों ने इसके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
क्या UAV में बदला जा सकता है मिग-21?
जानकारों का कहना है कि इन विमानों को सीधे स्क्रैप करने की बजाय इन्हें ड्रोन प्लेटफॉर्म में बदला जा सकता है। इस ट्रांसफॉर्मेशन से कई तरह की विकल्प खुलेंगे। सबसे पहले इन्हें टारगेट ड्रोन में बदला जा सकता है। इसका मतलब है कि वायुसेना के पायलट और मिसाइल सिस्टम इनका इस्तेमाल अभ्यास और परीक्षण में कर सकते हैं। मैक-2 की रफ्तार से उड़ने वाला मिग-21 अगर दुश्मन के इलाके में घुस जाए तो उसे असली विमान जैसा लगेगा। वहीं, नए मिसाइल सिस्टम जैसे आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएमऔर एक्सआरएसएएमके ट्रायल्स के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।
वहीं, दूसरी संभावना है कि इन्हें डिकॉय ड्रोन बनाया जाए। यानी इन्हें इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरणों से लैस करके दुश्मन के रडार सिस्टम को कन्फ्यूज करने में लगाया जाए। इससे दूसरे मानव-संचालित विमानों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
MiG-21 Retirement India से जुड़ी यह रिपोर्ट भारतीय वायुसेना और वर्थमान परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी बताती है। एयर मार्शल (रि.) सिम्हकुत्ती वर्थमान से लेकर ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वर्थमान तक, इस परिवार का MiG-21 से गहरा रिश्ता रहा है।https://t.co/xSguuin2q0#MiG21…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 23, 2025
तीसरा, इन्हें कम्युनिकेशन रिले के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। मॉडर्न कम्यूनिकेशन सिस्टम को लगाकर यह दुर्गम इलाकों में हवाई कम्युनिकेशन नोड की तरह काम कर सकते हैं।
इसके अलावा, इन्हें खुफिया निगरानी कामों में भी लगाया जा सकता है। ये हाई एल्टीट्यूड इलाकों में बेहतर तरीके से उड़ान भर सकते हैं, इनकी ये क्षमता इन्हें लंबी दूरी के जासूसी मिशनों के लिए उपयोगी बनाती है।
वहीं, इन्हें कामिकाजे ड्रोन यानी आत्मघाती ड्रोन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जो विस्फोटक से लैस होकर दुश्मन के ठिकानों पर एकतरफा हमला कर सकते हैं।
Should the IAF Convert Retired MiG-21 Bison Fighters into UAVs?
क्या हैं तकनीकी चुनौतियां
हालांकि, MiG-21 को यूएवी में बदलना उतना आसान नहीं है जितना सुनने में लगता है। इसे लेकर हमने एयरफोर्स के कई अधिकारियों से बात की। उन्हें यह आइडिया तो सुहाता है, लेकिन वह कहते हैं कि इनके साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका स्ट्रक्चर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बहुत पुराना है। इन्हें लेटेस्ट रिमोट-कंट्रोल और ऑटोनॉमस फ्लइट सिस्टम से जोड़ना बेहद मुश्किल होगा। साथ ही यह बेहद खर्चीला भी होगा। उनका कहना है कि दशकों तक इस्तेमाल होने के कारण इनका एयरफ्रेम कमजोर हो चुका है। ऐसे में इसे लंबे समय तक ड्रोन के तौर पर ऑपरेट करना जोखिम भरा हो सकता है।
वहीं, बड़ी चुनौती बजट को लेकर है। भारत पहले ही राफेल, तेजस एमके 1ए और एमके 2 जैसे नए जहाजों पर अरबों रुपये खर्च कर रहा है। ऐसे में पुराने विमानों को ड्रोन में बदलने का खर्च अलग पड़ेगा, जिसका असर रक्षा बजट पर नकारात्मक पड़ सकता है।
अमेरिका और चीन कर चुके हैं ऐसा
हालांकि यह आइडिया नया नहीं है। अमेरिका ने अपने एफ-16 विमानों को क्यूएफ-16 टारगेट ड्रोन में बदला है, जिन्हें मिसाइल परीक्षणों में इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, इजराइल ने भी अपने पुराने एफ-4 फैंटम विमानों को ड्रोन बनाया था।
वहीं, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स ने हाल ही में अपने जे-6 फाइटर जेट्स को ड्रोन में बदला है। 1950 और 1960 के दशक में बने ये विमान, जो कभी सोवियत मिग-19 पर आधारित थे, अब पूरी तरह से यूएवी में बदल दिए गए हैं।
हाल ही में चांगचुन एयर शो 2025 में पहली बार जे-6डब्ल्यू ड्रोन को शोकेस किया गया था। यह वही विमान है जिसे कभी चीन ने हजारों की संख्या में बनाया था, लेकिन अब इसे ड्रोन के तौर पर जंग के लिए तैयार किया जा रहा है।
चीन ने बनाया स्वार्म अटैक का बेड़ा
चीन ने भी अपने पुराने जे-6 और जे-7 विमानों को ड्रोन और यूसीएवी में बदलने का काम किया है। इन विमानों को स्वार्म अटैक के लिए तैयार किया गया है। अनुमान है कि चीन ने सैकड़ों पुराने विमानों को इस तरह अपग्रेड किए है, जिन्हें ताइवान के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।
जे-6 चीन का दूसरा पीढ़ी का सुपरसोनिक लड़ाकू विमान था। इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 1.3 थी और यह 700 किलोमीटर की रेंज तक उड़ सकता था। 1960 से लेकर 1980 के दशक तक चीन ने इनकी हजारों यूनिट बनाई। लेकिन जब जे-10, जे-11 और जे-20 जैसे आधुनिक विमान आए, तो यह मॉडल पुराना हो गया।
हालांकि, चीन ने इन विमानों को पूरी तरह कबाड़ नहीं किया। बीते दो दशकों में इन्हें सुरक्षित रूप से एयरबेस पर रखा गया और अब बड़ी संख्या में इन्हें ड्रोन में बदला जा रहा है।
कैसे किया ट्रांसफॉर्मेशन?
ड्रोन ट्रांसफॉर्मेशन की प्रक्रिया में सबसे पहले पायलट से जुड़ी सभी चीजें हटा दी गईं। कॉकपिट, कैनन, सहायक ईंधन टैंक और इजेक्शन सीट को निकाल दिया गया। इसके बाद इन विमानों को आधुनिक ऑटोपायलट सिस्टम, टेर्रेन-मैचिंग नेविगेशन, और अटोनॉमस फ्लाइट कंट्रोल से लैस किया गया।
इसके अलावा, नए वेपन स्टेशन जोड़े गए, ताकि ये विमानों की तरह हथियार ले जा सकें। कुछ विमानों को कामिकाजे ड्रोन के तौर पर तैयार किया गया है, जो एकतरफा हमलों में इस्तेमाल होंगे।
चीन का उद्देश्य ताइवान पर दबाव बनाना है। जे-6 ड्रोन बड़े पैमाने पर स्वॉर्म अटैक में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। जब सैकड़ों पुराने जे-6 ड्रोन एक साथ उड़ान भरेंगे, तो ताइवान के एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ेगा।
यह ड्रोन ताइवान के रडार और मिसाइल रक्षा सिस्टम को भ्रमित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ताइवान इन ड्रोन को रोकने के लिए महंगे पैट्रियॉट मिसाइल इंटरसेप्टर्स का इस्तेमाल करेगा, तो उसका स्टॉक जल्दी खत्म हो जाएगा। इसके बाद चीन के आधुनिक जे-20 और जे-35 लड़ाकू विमान आसानी से हमला कर सकेंगे।
एट्रिशन वारफेयर टेक्निक
रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि चीन के पास लगभग 3,000 पुराने जे-6 विमान अब भी स्टोरेज में हैं। इनमें से सैकड़ों पहले ही ड्रोन में बदले जा चुके हैं। हालांकि जे-6 ड्रोन आधुनिक विमानों की तुलना में धीमे और पुराने हैं, लेकिन इनकी खासियत यह है कि ये सस्ते और बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। यही कारण है कि इन्हें एट्रिशन वारफेयर यानी थकाऊ युद्ध की रणनीति में इस्तेमाल किया जाएगा। इनकी मदद से चीन दुश्मन को अपने एयर डिफेंस सिस्टम को लगातार इस्तेमाल करने पर मजबूर करेगा।
एचएएल और बीईएल मिलकर कर सकते हैंट्रांसफॉर्मेशन
वहीं, भारत में इस ट्रांसफॉर्मेशन को एचएएल और बीईएल मिलकर कर सकते हैं। एचएएल को MiG-21के मैंटेनेंस का दशकों का अनुभव है, जबकि बीईएलकी विशेषज्ञता राडार और टेलिमेट्री सिस्टम में है। डीआरडीओइस प्रोजेक्ट का तकनीकी नेतृत्व कर सकता है।
जानकारों के अनुसार, एक मिग-21 को टारगेट ड्रोन में बदलने की लागत लगभग 5 से 10 करोड़ रुपये होगी। वहीं, अगर इन्हें UCAV यानी कॉम्बैट ड्रोन में बदला जाए तो लागत 50 से 100 करोड़ रुपये तक जा सकती है। इसके मुकाबले एक नए एमक्यू-9बीजैसे ड्रोन की कीमत कई सौ करोड़ रुपये है।
कर सकते हैं मिसाइलों की टेस्टिंग
वहीं, भारत अभी नई पीढ़ी की एयर डिफेंस मिसाइलों डेवलप कर रहा है। इनमें आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और एक्सआरएसएएम शामिल हैं। इन मिसाइलों को टेस्ट करने के लिए ऐसे टारगेट्स की जरूरत होती है जो तेज गति से उड़ने वाले दुश्मन विमानों जैसी चुनौती पेश कर सकें।
मैक-2 की रफ्तार और 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ने की क्षमता वाले मिग-21 बाइसनइस काम के लिए बिल्कुल उपयुक्त हैं। जब इन्हें ड्रोन में बदला जाएगा तो ये रीयल टाइम वॉर जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जिससे मिसाइलों की सही क्षमता का पता लगाया जा सकेगा।
ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने तुर्की के बायरकटार टीबी2जैसे ड्रोन का इस्तेमाल किया था। वहीं, चीन बड़े पैमाने पर पुराने विमानों को ड्रोन में बदलकर उन्हें स्वॉर्म अटैक्स के लिए तैयार कर रहा है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह ऐसे प्रयोग करे जिससे उसकी ड्रोन और एयर डिफेंस क्षमता दोनों मजबूत हों। मिग-21 को ड्रोन में बदलना इस दिशा में एक ब्रिज कैपेबिलिटीसाबित हो सकता है, जब तक कि डीआरडीओ के तापसऔर घातक जैसे प्रोजेक्ट पूरी तरह से ऑपरेशनल न हो जाएं।
97 LCA Mk1A Deal: रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ 97 एलसीए एमके1ए (LCA Mk1A) विमान की खरीद के लिए 62,370 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत किए हैं। इन विमानों में 68 लड़ाकू और 29 ट्विन-सीटर शामिल हैं।
इस डील के मुताबिक इन विमानों की डिलीवरी 2027-28 से शुरू होगी और अगले छह सालों में पूरी की जाएगी। इस बीच एचएएल अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम करेगा, ताकि वायुसेना की ज़रूरतें समय पर पूरी हो सकें।
नए कॉन्ट्रैक्ट के तहत एचएएल को यह सुनिश्चित करना होगा कि विमानों में 64 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया जाए। इसके लिए 67 अतिरिक्त स्वदेशी आइटम जोड़े गए हैं, जो पहले जनवरी 2021 में हुए कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा नहीं थे।
तेजस एमके1ए अपने पुराने वैरिएंट के मुकाबले में काफी एडवांस है। इसमें उत्तम एईएसए (Active Electronically Scanned Array) रडार भी लगाया जाएगा। इसके साथ स्वयम् रक्षा कवच (Swayam Raksha Kavach) और कंट्रोल सरफेस एक्ट्यूएटर्स जैसी स्वदेशी सिस्टम भी इसमें लगाए जाएंगे।
उत्तम एईएसए रडार दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को दूर से ही ट्रैक करने में सक्षम है और मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट की सुविधा देता है। गैलियम आर्सेनाइड बेस्ड यह रडार 150 किलोमीटर से दूर से ही ट्रैक कर सकता है और 50 से अधिक टारगेट्स को 100 किलोमीटर से अधिक दूरी पर ट्रैक कर सकता है। वहीं एलसीए एमके2 में एडवांस गैलियम नाइट्राइड रडार लगाया जाएगा, जो 180-200 किलोमीटर की रेंज तक ट्रैक कर सकताा है।
वहीं, स्वयम् रक्षा कवच मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और काउंटरमेजर्स से लैस है, जो विमान को दुश्मन की मिसाइल से बचाने में मदद करता है।
🚨 Big Boost to IAF!
The Ministry of Defence has inked a mega deal worth ₹62,370 Cr with HAL for 97 LCA Mk1A jets – 68 fighters + 29 twin-seaters. ✈️🇮🇳
Deliveries begin 2027-28 & will be completed in 6 years.
✅ 64% indigenous content
✅ Equipped with UTTAM AESA Radar, Swayam… pic.twitter.com/hcfK7tBzBG
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 25, 2025
इस प्रोजेक्ट में करीब 105 भारतीय कंपनियां शामिल होंगी, जो विभिन्न कंपोनेंट्स और इक्विपमेंट्स बनाएंगी। इस वजह से अगले छह साल तक हर साल लगभग 11,750 सीधी और अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी। यह भारतीय एयरोस्पेस सेक्टर को नई ऊर्जा देगा और निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी रक्षा निर्माण में बड़ा योगदान करने का अवसर मिलेगा।
वहीं यह कॉन्ट्रैक्ट रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 की ‘बॉय (India-IDDM)’ कैटेगरी के अंतर्गत किया गया है। इस श्रेणी का उद्देश्य है कि रक्षा जरूरतों के लिए अधिक से अधिक स्वदेशी उत्पाद तैयार किए जाएं। आईडीडीएम (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) कैटेगरी में आने वाले उत्पाद पूरी तरह भारत में डिजाइन और विकसित होते हैं।
यह डील इसलिए भी अहम है क्योंकि 26 सितंबर के बाद जब मिग-21 रिटायर हो जाएंगे तो भारतीय वायुसेना के पास केवल 29 स्क्वाड्रन ही रह जाएंगे। वहीं पाकिस्तान के पास वर्तमान में लगभग 25 लड़ाकू स्क्वॉड्रन हैं और वह चीन से 40 जे-35ए पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हासिल करने की तैयारी कर रहा है। चीन पहले से ही भारत से कई गुना अधिक फाइटर जेट, बॉम्बर और फोर्स-मल्टीप्लायर ऑपरेट कर रहा है। ऐसे में भारतीय वायुसेना के लिए नए लड़ाकू विमानों की जरूरत और भी अहम हो जाती है।
मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया कि भारतीय वायुसेना को नई तकनीकों और बड़ी संख्या में लड़ाकू विमानों की जरूरत है। उस दौरान पाकिस्तान ने चीन के बने जे-10 विमानों का इस्तेमाल किया था, जो पीएल-15 जैसे 200 किलोमीटर रेंज वाले बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस थे। वायुसेना की इंटरनल रिव्यू रिपोर्ट में कहा गया है कि दो फ्रंच मोर्चों को देखते हुए भारत को 50 से ज्यादा अधिक स्क्वॉड्रन और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी से लैस विमानों की तुरंत जरूरत है।
वहीं, वायुसेना की जरूरतों को देखते हुए एलसीए तेजस का डेवलपमेंट और प्रोडक्शन बेहद धीमी रफ्तार से चल रहा है। 2021 में 83 तेजस एमके1ए विमानों के लिए 46,898 करोड़ रुपये की डील हुई थी। लेकिन अभी तक भारतीय वायुसेना को पहला विमान भी नहीं मिला। हालांकि, एचएएल का दावा है कि अक्टूबर 2025 में शुरुआती दो विमान वायुसेना की डिलीवरी कर देगा।
इसमें अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक की बड़ी भूमिका है, जिसने अगस्त 2021 में 5,375 करोड़ रुपये की सौदे के तहत 99 जीई-एफ404 टर्बोफैन इंजन देने का करार किया था। अब तक तीन इंजन भारत पहुंच चुके हैं और साल के अंत तक सात और आने की उम्मीद है। आने वाले सालों में हर साल 20 इंजन दिए जाएंगे। नए 97 विमानों के लिए एएचएल को 113 और इंजन खरीदने होंगे, जिसकी लागत करीब 1 अरब डॉलर होगी।
एचएएल ने भरोसा दिलाया है कि वह धीरे-धीरे उत्पादन दर को बढ़ाकर हर साल 20 विमान बनाएगा और फिर इसे 24 से 30 विमानों तक ले जाएगा। इसके लिए नासिक में तीसरी प्रोडक्शन लाइन शुरू की जा चुकी है, जो बेंगलुरु की दो मौजूदा लाइनों के साथ मिलकर काम करेगी। इसके अलावा निजी क्षेत्र की कंपनियों की सप्लाई चेन भी एचएएल को मदद करेगी।
वहीं, भारतीय वायुसेना इन विमानों को डिलीवरी तभी करेगी जब एस्ट्रा वीवीआर मिसाइल, शॉर्ट-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल और लेजर-गाइडेड बम जैसे हथियारों के फायरिंग ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे हो जाएंगे। इसके अलावा इजरायली एल्टा ELM-2052 रडार और फायर कंट्रोल सिस्टम का इंटीग्रेशन भी पूरी तरह से सर्टिफाइड होना जरूरी है।
ALG On LaC: चीन से बढ़ते खतरे को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने दो पुराने एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड को फिर से तैयार करने का फैसला किया है। इनमें पहला चुशूल में है, जो पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यनी एलएसी के पास स्थित है, और दूसरा अरुणाचल प्रदेश के दूरस्थ इलाके अनीनी में है। दोनों एयरस्ट्रिप सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं और इनके फिर तैयार होने से भारतीय वायुसेना और थलसेना की क्षमताएं मजबूत होंगी।
पूर्वी लद्दाख में स्थित चुशूल समुद्र तल से करीब 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह जगह एलएसी से महज चार किलोमीटर पश्चिम में है। इस इलाके में यही समतल जमीन है, जो एयरस्ट्रिप के लिए मुफीद है।
वहीं, चूशुल 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान ऐतिहासिक भूमिका निभा चुका है। रक्षा मंत्रालय की 1993 में जारी एक “सीक्रेट हिस्ट्री” रिपोर्ट में उल्लेख है कि 25 अक्टूबर 1962 को सोवियत मूल के एएन-12 विमान ने चंडीगढ़ से चुशूल तक एएमएक्स-13 टैंकों और 25-पाउंडर गनों को पहुंचाया था। जिसके बाद टैंकों और गनों ने जंग का रुख बदल दिया था और भारतीय सैनिकों को निर्णायक बढ़त दी थी।
हालांकि, युद्ध के बाद चुशूल की एयरस्ट्रिप बेकार पड़ी रही। समय-समय पर इसे फिर से एक्टिव करने का प्रस्ताव आया, लेकिन चीन की संवेदनशीलता और सीमा पर तनाव को देखते हुए इसे आगे नहीं बढ़ाया गया। अब रक्षा मंत्रालय ने इसे दोबारा डेवलप करने का फैसला लिया है, ताकि यहां से ड्रोन, हेलिकॉप्टर और स्पेशल मिशनों के लिए एयरबस सी-295 और सी-130जे जैसे लॉजिस्टिक एयरक्राफ्ट ऑपरेट किए जा सकें।
ALG On LaC: अरुणाचल का भूला-बिसरा एयरस्ट्रिप अनीनी
अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली जिले में स्थित अनीनी भारत-चीन सीमा के पूर्वी छोर पर पड़ता है और सामरिक दृष्टि से बेहद अहम है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहां से अंग्रेज चीन तक सप्लाई पहुंचाने का इसे स्टेजिंग ग्राउंड की तरह यूज करते थे। उस समय सहयोगी सेनाओं के विमान हिमालय के ऊपर से होकर उड़ान भरते थे। इस मार्ग को “द हंप” कहा जाता था, क्योंकि इसमें ऊंचे पर्वतों को पार करना पड़ता था।
आजादी के बाद भारतीय वायुसेना ने यहां मिट्टी से बना रनवे तैयार किया, लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं हुआ। अब अरुणाचल प्रदेश सरकार ने केंद्र से मांग की थी कि इस एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड यानी एएलजी को दोबारा से डेवलप किया जाए। यहां 1.5 किलोमीटर लंबा रनवे पहले से मौजूद है, जिसे वायुसेना और थलसेना के इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाएगा। हाल ही में वायुसेना और रक्षा मंत्रालय की एक टीम ने इस जगह का सर्वे भी किया था।
ALG On LaC: क्या है एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड
एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड एक मिलिट्री टर्म है, जो सीमा के पास मौजूद कच्ची या पक्की हवाई पट्टियों के लिए इस्तेमाल होता है। ये एयरस्ट्रिप फॉरवर्ड मोर्चे पर सैनिकों और सप्लाई पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। वहीं, एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड को एक्टिव करने का मतलब है कि यहां रनवे बनाने के अलावा एक छोटी यूनिट को तैनात करनी पड़ी, विमानों और हेलिकॉप्टरों की लैंडिंग-टेकऑफ के लिए गाइडेंस सिस्टम लगाना और धीरे-धीरे बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत भी करना होगा। इसमें फ्यूल स्टोरेज, कम्यूनकेशन सिस्टम और सैनिकों की अस्थायी तैनाती की सुविधाएं शामिल होती हैं।
पिछले बीस सालों में भारत ने कई पुराने एएलजी को दोबारा सक्रिय किया है। लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी और न्योमा जैसे एएलजी पहले ही फिर से चालू हो चुके हैं। इनमें से न्योमा एएलजी को अब पूर्ण एयरबेस में बदलने की प्रक्रिया चल रही है, और अगले महीने से इसे औपचारिक तौर पर ऑपरेशनल किया जाएगा।
अरुणाचल प्रदेश में भी सात एएलजी को रनवे में बदला गया है। इनमें अलोंग, मेचुका, पासीघाट, तूतिंग, विजयनगर, वालोंग और जीरो शामिल हैं। इन जगहों से न केवल सैन्य विमान बल्कि सिविलियन ट्रैफिक भी चलता है, जिससे स्थानीय आबादी को भी फायदा मिलता है।
रक्षा मंत्रालय ने इसे भारतीय वायुसेना के “फ्यूचर रोडमैप” का हिस्सा बताया है। मंत्रालय के अनुसार, चुशूल और अनीनी दोनों ही जगहें यूएवी, हेलिकॉप्टर और स्पेशल एयरक्राफ्ट ऑपरेशन के लिए उपयुक्त हैं। मंत्रालय का मानना है कि इन एयरस्ट्रिप्स को सक्रिय करने से भारत की रणनीतिक पहुंच बढ़ेगी और दुश्मन की गतिविधियों पर बेहतर नजर रखी जा सकेगी।
Stealth Fighter AMCA: लार्सन एंड टुब्रो और सरकारी डिफेंस कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड दोनों मिल कर महत्वाकांक्षी फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोजेक्ट यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) डेवलपमेंट प्रोग्राम में हिस्सा लेंगे। लार्सन एंड टुब्रो ने घोषणा करते हुए कहा कि कंपनी बीईएल के साथ मिलकर भारत के स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर जेट के विकास में हिस्सा लेगी। दोनों कंपनियां मिलकर प्रोटोटाइप निर्माण, फ्लाइट टेस्ट और सर्टिफिकेशन में योगदान देंगी। इसके लिए वे एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी को अपने एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट (ईओआई) का जवाब देंगी।
डीआरडीओ का विंग एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी यानी एडीए एएमसीए प्रोग्राम को इंडस्ट्री पार्टनरशिप मॉडल के जरिए आगे बढ़ा रही है। जून 2025 में एडीए ने ईओआई जारी किया था ताकि निजी और सरकारी भारतीय कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में शामिल किया जा सके। कंपनियों को 30 सितंबर तक अपना प्रस्ताव जमा करना होगा।
एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए भारत का फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है। यह विमान अत्याधुनिक स्टेल्थ तकनीक, सुपरक्रूज क्षमता, एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन और मल्टीरोल ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। इसे भारतीय वायुसेना के पुराने विमानों जैसे मिग-29 और मिराज-2000 से रिप्लेस किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत 2029 तक पहली प्रोटोटाइप उड़ान होगी। वहीं, 2034 तक इसका डेवलपमेंट वर्क पूरा किए जाने की उम्मीद है। जिसके बाद इसका उत्पादन शुरू होगा। एएमसीए को पांचवीं पीढ़ी की क्षमता से लैस किया जाएगा, और भविष्य में इसे छठी पीढ़ी की कुछ विशेषताओं तक अपग्रेड करने की योजना है।
लार्सन एंड टुब्रो का डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर में अच्छा अनुभव है। कंपनी ने सबमरीन, वॉरशिप, मिसाइल लॉन्चर और विभिन्न स्ट्रैटेजिक प्लेटफॉर्म डेवलप किए हैं। दूसरी तरफ बीईएल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और सिस्टम्स में एक्सपर्ट है और रडार, एवियोनिक्स और कम्युनिकेशन सिस्टम्स के लिए जानी जाती है।
दोनों कंपनियां मिलकर एएमसीए के डिजाइन, उपकरण, इंटीग्रेशन, इंजीनियरिंग, टेस्टिंग और क्वालिटी मैनेजमेंट में योगदान करेंगी।
एलएंडटी के चेयरमैन एस. एन. सुब्रमण्यम ने कहा कि यह साझेदारी भारत की रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है और बीईएल के साथ मिलकर काम करना हमारे लिए गर्व की बात है।
वहीं, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मनोज जैन ने कहा, “एएमसीए परियोजना रक्षा प्रौद्योगिकी में भारत की बढ़ती क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करती है। एलएंडटी के साथ हमारा सहयोग इस दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
एएमसीए प्रोजेक्ट में एल एंड टी और बीईएल अकेले खिलाड़ी नहीं हैं। एडीए को और भी कई बड़ी कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट मिले हैं, जिनमें अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, महिंद्रा ग्रुप, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और दूसरी निजी कंपनियां भी शामिल हैं।
अब एडीए इन कंपनियों का मूल्यांकन करेगी और इसके बाद शॉर्टलिस्टेड कंपनियों को रिक्वेस्ट फॉर कोटेशन (RFQ) जारी किया जाएगा। इस प्रक्रिया से यह तय होगा कि कौन सी कंपनियां एचएएल के साथ मिलकर एएमसीए का निर्माण करेंगी।
इससे पहले तक माना जा रहा था कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इस प्रोजेक्ट की मुख्य कंपनी होगी। लेकिन मई 2025 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इंडस्ट्री पार्टनरशिप मॉडल को मंजूरी देकर नए रास्ते खोल दिए। इस मॉडल से न केवल एएचएल बल्कि निजी कंपनियों को भी बराबरी का मौका मिलेगा।
एएचएल ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए कई निजी कंपनियों से संपर्क किया है और एएचएल ने एक कमेटी का गठन किया है, जो इन कंपनियों में से दो को शॉटलिस्ट करेगी।
AMCA की खूबियां
एएमसीए स्टेल्थ डिजाइन, डेल्टा विंग कॉन्फिगरेशन और ट्विन-इंजन पावर से लैस होगा। इसमें AESA राडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स, ड्यूल-रिडंडेंट नेविगेशन और कैनिस्टराइज्ड वेपन सिस्टम होंगे। यह विमान सुपरसोनिक स्पीड के बिना आफ्टरबर्नर के सुपरक्रूज कर सकेग। इसका कॉम्बैट रेडियस 1,500 किलोमीटर से अधिक होगा और इसमें परमाणु और पारंपरिक दोनों हथियार ले जाने की क्षमता होगी। इसे भविष्य में ड्रोन टीमिंग और नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए भी तैयार किया जाएगा।
To provide the best experiences, we use technologies like cookies to store and/or access device information. Consenting to these technologies will allow us to process data such as browsing behavior or unique IDs on this site. Not consenting or withdrawing consent, may adversely affect certain features and functions.
Functional
Always active
The technical storage or access is strictly necessary for the legitimate purpose of enabling the use of a specific service explicitly requested by the subscriber or user, or for the sole purpose of carrying out the transmission of a communication over an electronic communications network.
Preferences
The technical storage or access is necessary for the legitimate purpose of storing preferences that are not requested by the subscriber or user.
Statistics
The technical storage or access that is used exclusively for statistical purposes.The technical storage or access that is used exclusively for anonymous statistical purposes. Without a subpoena, voluntary compliance on the part of your Internet Service Provider, or additional records from a third party, information stored or retrieved for this purpose alone cannot usually be used to identify you.
Marketing
The technical storage or access is required to create user profiles to send advertising, or to track the user on a website or across several websites for similar marketing purposes.