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INS ARNALA: हिंद महासागर में भारत की ‘अदृश्य ढाल’ तैयार, दुश्मन की पनडुब्बियों के लिए बनेगा काल

INS Arnala Set to Join Indian Navy Fleet!
Source: Indian Navy

INS ARNALA: भारतीय नौसेना की ताकत में जबरदस्त इजाफा होने जा रहा है। जल्द ही भारतीय नौसेना में पहला पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट) ‘अर्नाला’ को औपचारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। देश का पहली ‘एंटी-सबमरीन वॉरफेयर – शैलो वॉटर क्राफ्ट’ (ASW-SWC) श्रेणी का युद्धपोत INS अर्णाला (INS Arnala) 18 जून को नौसेना में आधिकारिक रूप से शामिल किया जाएगा। यह कमीशनिंग समारोह विशाखापत्तनम के नेवल डॉकयार्ड में आयोजित होगा, जिसकी अध्यक्षता चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान करेंगे। इस समारोह में पूर्वी नौसेना कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल राजेश पेंढारकर मेजबान के रूप में मौजूद रहेंगे।

INS ARNALA: आत्मनिर्भर भारत की मिसाल

INS अर्णाला न केवल एक अत्याधुनिक युद्धपोत है, बल्कि यह ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की सशक्त मिसाल भी है। यह युद्धपोत कोलकाता स्थित गॉर्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा डिजाइन और निर्मित किया गया है। निर्माण में एलएंडटी शिपबिल्डर्स की भागीदारी भी रही है, जिसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत बनाया गया है।

जहां भारत लंबे समय तक एंटी-सबमरीन क्षमताओं के लिए विदेशों पर निर्भर रहा, वहीं INS अर्णाला के कमीशन के साथ भारत अपनी समुद्री सीमाओं की निगरानी और सुरक्षा के लिए अब पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर भरोसा कर सकेगा।

क्या है ASW-SWC और क्यों है यह जरूरी?

Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft (ASW-SWC) यानी “पनडुब्बी रोधी युद्ध, समुद्र में ऑपरेट होने वाले विशेष प्रकार के युद्धपोत होते हैं। ‘अर्नाला’ को तटीय क्षेत्रों और कम गहराई वाले समुद्रों में विभिन्न पनडुब्बी रोधी अभियानों, जैसे पानी के नीचे निगरानी, खोज और बचाव मिशन, और कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। INS अर्णाला 77 मीटर लंबा युद्धपोत है औऱ इसका वजन 1490 टन से अधिक का है और इसे डीजल इंजन-वाटरजेट कॉम्बिनेशन से ऑपरेट किया जाता है, जो इसे भारतीय नौसेना का सबसे बड़ा ऐसा जहाज बनाता है। यह जहाज भारत के तटीय रक्षा को मजबूत करने और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने में अहम भूमिका निभाएगा। भारतीय उपमहाद्वीप की लंबी समुद्री सीमाएं और चीनी नौसेना की बढ़ती उपस्थिति को देखते हुए, ऐसी एडवांस क्षमताओं की ज़रूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही थी। INS अर्णाला इस खाली स्थान को भरने का काम करेगा।

इस युद्धपोत में 80% से अधिक उपकरण और सिस्टम स्वदेशी हैं। इसमें भारत की प्रमुख रक्षा कंपनियों भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), एलएंडटी, महिंद्रा डिफेंस, और एमईआईएल जैसी प्रमुख भारतीय रक्षा कंपनियों के बनाए एडवांस सिस्टम लगाए गए हैं। इस परियोजना में 55 से अधिक एमएसएमई कंपनियों को शामिल किया गया, जिससे स्वदेशी रक्षा उद्योग को न केवल प्रोत्साहन मिला, बल्कि हजारों रोजगार के अवसर भी पैदा हुए।

इतिहास से जुड़ा है नाम ‘अर्णाला’

‘अर्नाला’ का नाम महाराष्ट्र के वसई के पास स्थित ऐतिहासिक अर्नाला किले से लिया गया है, जो 1737 में मराठों द्वारा चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में बनाया गया था। यह किला वेतारणा नदी के मुहाने पर उत्तरी कोंकण तट की सुरक्षा के लिए बनाया गया था और कई के बाद भी मजबूती से खड़ा रहा। ठीक उसी तरह, यह युद्धपोत समुद्र में एक मजबूत मौजूदगी के लिए डिजाइन किया गया है। ठीक उसी तरह, यह युद्धपोत समुद्र में एक मजबूत उपस्थिति के लिए डिजाइन किया गया है। INS अर्णाला के डिजाइन और निर्माण में इसी प्रेरणा को देखा जा सकता है, मजबूत हुल, अत्याधुनिक सेंसर, और घातक हथियार। किले की पत्थर की दीवारों की तरह इसका हुल, और तोपों की जगह मिसाइल व सोनार सिस्टम इसकी सुरक्षा की गारंटी बनते हैं। INS अर्णाला भी उसी तरह भारत की समुद्री सीमाओं की रक्षक बनकर दुश्मनों के सामने दीवार बनकर खड़ा होगा।

‘अर्णवे शौर्यम्’ – जहाज का आदर्श वाक्य

‘अर्नाला’ की क्रेस्ट में एक नीले पृष्ठभूमि पर एक स्टाइलिश ऑगर शेल (Auger Shell) को दर्शाया गया है, जिसके आधार पर जहाज का नाम देवनागरी लिपि में लिखा है। ऑगर शेल अपनी सर्पिल, मजबूत संरचना और सटीक नोक के लिए जाना जाता है, जो लचीलापन, सतर्कता, और कठिन परिस्थितियों में प्रभुत्व का प्रतीक है। यह जहाज की विशेषताओं को दर्शाता है, जो समुद्र की अथक ताकतों का सामना करने और पनडुब्बी रोधी अभियानों को सटीकता के साथ अंजाम देने के लिए बनाया गया है। क्रेस्ट के नीचे एक रिबन पर जहाज का आदर्श वाक्य “अर्णवे शौर्यम्” (Arnave Shauryam) लिखा है, जिसका अर्थ है “समुद्र में वीरता”। यह वाक्य जहाज की अटूट साहस, ताकत और समुद्र पर प्रभुत्व को दर्शाता है, जो चालक दल को किसी भी चुनौती का डटकर सामना करने के लिए प्रेरित करता है।

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नौसेना के लिए बड़े बदलाव की शुरुआत

INS अर्णाला 16 युद्धपोतों की उस सीरीज की पहली कड़ी है, जिन्हें भविष्य में ASW-SWC के तौर पर नौसेना में शामिल किया जाएगा। इसका मतलब है कि अगले कुछ वर्षों में भारत के पास 16 अत्याधुनिक पनडुब्बी रोधी युद्धपोतों की फ्लीट होगी, जो तटीय रक्षा को और अजेय बनाएगी।

155mm Artillery Shells: ब्रह्मास्त्र तैयार! भारत का स्वदेशी 155mm गोला-बारूद लास्ट फेज में, विदेशी खरीद होगी कम

Indigenous 155mm Artillery Shells Near Completion, Reducing Foreign Dependency

155mm artillery shells: भारत अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने और विदेशी निर्भरता को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के नेतृत्व में चल रही स्वदेशी तोपखाने की गोला-बारूद परियोजना अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस परियोजना के तहत 155 मिलीमीटर के चार तरह के गोला-बारूद का सफलतापूर्वक ट्रायल्स पूरे किए जा चुके हैं, और ये भारतीय सेना की सभी जरूरतों को पूरा करते हैं। नवंबर 2025 में आखिरी यूजर ट्रायल्स होने की उम्मीद है, जिसके बाद यह गोला-बारूद सेना के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार होगा। इस परियोजना में रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर और यंत्र इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियां डीआरडीओ के साथ मिलकर काम कर रही हैं। यह परियोजना न केवल भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत करेगी, बल्कि वैश्विक बाजार में रक्षा निर्यात की संभावनाओं को भी खोलेगी।

155mm artillery shells: स्वदेशी गोला-बारूद का महत्व

भारत की डिफेंस पॉलिसी में आत्मनिर्भरता का प्रमुख स्थान रहा है। वर्तमान में भारतीय सेना को अपने तोपखाने के लिए गोला-बारूद के लिए काफी हद तक विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर रहना पड़ता है। यह न केवल महंगा पड़ता है, बल्कि युद्ध की परिस्थितियों में सप्लाई चेन के प्रबावित होने का भी जोखिम रहता है। डीआरडीओ की इस परियोजना का उद्देश्य इन चुनौतियों को दूर करना और भारत को गोला-बारूद उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है।

पिछले दो वर्षों में डीआरडीओ ने 155 मिलीमीटर कैटेगरी के चार अलग-अलग प्रकार के गोला-बारूद का सफल परीक्षण किया है। जिसमें उच्च विस्फोटक (High Explosive), धुआं उत्पन्न करने वाले (Smoke), और दोहरे उद्देश्य वाले उन्नत पारंपरिक हथियार (ड्यूल पर्पस इम्प्रूव्ड कन्वेंशनल म्युनिशन-DPICM) राउंड शामिल हैं। सेना ने इन सभी को इस्तेमाल के योग्य माना है। वहीं अब DRDO ने नवंबर 2025 में अंतिम यूजर ट्रायल की योजना बनाई है।

इनमें हाई एक्सप्लोसिव राउंड्स दुश्मन के ठिकानों को नष्ट करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। जबकि स्मोक राउंड्स धुआं पैदा करने वाले गोले हैं, जो युद्ध के मैदान में विजिबिलिटी को कम करने और सेना की फॉर्मेशन स्थिति को छिपाने में मदद करते हैं। वहीं, ड्यूल पर्पस इम्प्रूव्ड कन्वेंशनल म्युनिशन (डीपीआईसीएम) राउंड बड़े क्षेत्र को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किए गए हैं, जो पैदल सेना और हल्के बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ असरदार हैं।

इन सभी गोलों का परीक्षण भारतीय सेना की कठिन मानकों के अनुसार किया गया है, और ये सभी अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं। सूत्रों के अनुसार, ये गोले न केवल भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा करते हैं, बल्कि कुछ मामलों में विदेशी गोलों से भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

बड़े पैमाने पर उत्पादन की मंजूरी

डीआरडीओ के सूत्रों ने बताया कि इस परियोजना का डेवलपमेंट फेज लगभग पूरा हो चुका है। अब यह परियोजना यूजर ट्रायल फेज में प्रवेश कर रही है, जो नवंबर 2025 में होने की संभावना है। इन परीक्षणों में भारतीय सेना के विशेषज्ञ गोला-बारूद की प्रभावशीलता, विश्वसनीयता और सुरक्षा का मूल्यांकन करेंगे। यदि ये गोले आखिरी ट्रायल्स में सफल रहते हैं, तो इन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए मंजूरी दी जाएगी।

इस परियोजना में भारतीय सेना को शुरू से ही शामिल किया गया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गोला-बारूद उनकी विशिष्ट जरूरतों के अनुसार डेवलप हों। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमने सेना के साथ मिलकर काम किया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गोला-बारूद उनकी रणनीतिक और तकनीकी जरूरतों को पूरा करता हो। यूजर ट्रायल इस प्रक्रिया का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है।”

DRDO संग निजी और सार्वजनिक कंपनियों की साझेदारी

इस गोला-बारूद को ‘डिज़ाइन-कम-प्रोडक्शन पार्टनर’ (DcPP) मॉडल के तहत बनाया गया है। इसमें दो प्रमुख साझेदार हैं, इनमें रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की सहयोगी कंपनी जय एम्युनिशन लिमिटेड और सरकारी स्वामित्व वाली यंत्र इंडिया लिमिटेड शामिल हैं। दोनों कंपनियां पिछले दो सालों से इस परियोजना पर DRDO की आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ARDE), पुणे के साथ मिलकर गोला-बारूद के प्रोटोटाइप विकसित कर रही हैं।

रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर इस क्षेत्र में इतिहास रचने जा रही है, क्योंकि यह पहली निजी भारतीय कंपनी बन गई है जिसने पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक के जरिए 155 मिमी के चार प्रकार के गोला-बारूद तैयार किए हैं। रिलायंस के एक प्रवक्ता ने बताया कि विकास का काम पूरा हो चुका है और कंपनी अब उत्पादन शुरू करने के लिए तैयार है। 10 से अधिक भारतीय कंपनियों को सप्लाई चेन में शामिल किया गया है ताकि बड़े पैमाने पर निर्माण सुनिश्चित हो सके।

10,000 करोड़ रुपये के गोला-बारूद

भारत में तोपखाने के गोला-बारूद की मांग लगातार बढ़ रही है। अनुमान है कि अगले 10 वर्षों में यह 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, अगर ये गोला-बारूद विदेशी बाजारों में निर्यात होते हैं तो आय कई गुना बढ़ सकती है। केपीएमजी की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सेना का गोला-बारूद पर वार्षिक खर्च 2023 में 7,000 रुपये करोड़ था, जो 2032 तक 12,000 रुपये करोड़ तक पहुंच सकता है।

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रिलायंस अपनी दीर्घकालिक रक्षा रणनीति के तहत रत्नागिरी, महाराष्ट्र में ‘धीरूभाई अंबानी डिफेंस सिटी’ (DADC) नाम से एक ग्रीनफील्ड एम्युनिशन और एक्सप्लोसिव्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित कर रही है। इस परियोजना में 5,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। कंपनी को रत्नागिरी के वटाड इंडस्ट्रियल एरिया में 1,000 एकड़ जमीन आवंटित की गई है, जो भारत में निजी क्षेत्र द्वारा रक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ा ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट है। वहीं, हाल ही में रिलायंस डिफेंस ने जर्मनी की कंपनी Rheinmetall AG के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है। इस साझेदारी के तहत रिलायंस Rheinmetall को मीडियम और लार्ज कैलिबर गोला-बारूद के लिए एक्सप्लोसिव और प्रोपेलेंट्स की सप्लाई करेगी।

Epstein Files: क्या हैं एपस्टीन फाइल्स? जिसे लेकर मस्क और ट्रंप की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई? जानें Bromance से Breakup तक का सफर

Epstein Files: What Sparked the Musk-Trump Feud? From Bromance to Breakup Explained
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Epstein Files: चाणक्य नीति कहती है, “मित्र जब भरोसा तोड़े, तो वह शत्रु से भी अधिक हानिकारक होता है।” कुछ ऐसा ही इन दिनों दुनिया के दो सबसे चर्चित और प्रभावशाली चेहरों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क के बीच देखने को मिल रहा है। दोनों के बीच की यह ‘ब्रोमांस’ पिछले 10 महीनों से सुर्खियों में थी, लेकिन अब यह रिश्ता एक कड़वे झगड़े में बदल गया है। दोनों ने एक-दूसरे पर तीखे हमले किए हैं, और इस विवाद का केंद्र बनी हैं ‘एपस्टीन फाइल्स’ (Epstein Files)। आखिर क्या हैं ये फाइल्स, और और क्यों मस्क और ट्रंप की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई?

Epstein Files: Bromance to Breakup: ट्रंप-मस्क की टूटी दोस्ती

साल 2024 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में एलन मस्क ने ट्रंप का खुला समर्थन किया था। इतना ही नहीं, उन्होंने ट्रंप के प्रचार में 200 मिलियन डॉलर भी खर्च किए थे। चुनाव जीतने के बाद ट्रंप ने मस्क को ‘Department of Government Efficiency (DOGE)’ का प्रमुख बनाया। इसके बाद मस्क व्हाइट हाउस की बैठकों से लेकर एयरफोर्स वन की उड़ानों तक, ट्रंप के साथ मौजूद दिखे।

मस्क ने DOGE के तहत कई बड़े फैसले लिए, जिनमें 10,000 से ज्यादा सरकारी कर्मचारियों की छंटनी और कई एजेंसियों, जैसे यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) में भारी कटौती शामिल थी। इन फैसलों की वजह से मस्क की आलोचना भी हुई, लेकिन ट्रंप ने हमेशा उनका साथ दिया।

मार्च में ट्रंप ने कांग्रेस के एक संयुक्त सत्र में मस्क की तारीफ करते हुए कहा, “एलन, तुम बहुत मेहनत कर रहे हो। तुम्हें इसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन हम तुम्हारे काम की कद्र करते हैं।” इसके बाद ट्रंप ने व्हाइट हाउस के साउथ लॉन पर टेस्ला की गाड़ियों का एक शोकेस भी आयोजित किया, जहां उन्होंने मस्क की कंपनी का प्रचार किया। ट्रंप ने कहा, “मैं चाहता हूं कि लोग जानें कि देशभक्ति की सजा नहीं मिलनी चाहिए।” इस दौरान ट्रंप ने यह भी बताया कि उन्होंने खुद एक टेस्ला कार खरीदी है।

लेकिन 31 मई को मस्क ने DOGE से इस्तीफा दे दिया। इस मौके पर ट्रंप ने उन्हें व्हाइट हाउस का प्रतीक चिन्ह लगा एक सुनहरी चाबी भेंट की, जो उन्होंने कहा कि वह केवल “खास लोगों” को देते हैं।

दोस्ती में आनी शुरू हुई दरार

राजनीति में एक कहावत मशहूर है- न कोई स्थायी दोस्त होता है, न दुश्मन, सिर्फ हित स्थायी होते हैं। ट्रंप और मस्क की दोस्ती में भी यही दिखा। मस्क के DOGE छोड़ने के कुछ दिन पहले ही ट्रंप का एक महत्वाकांक्षी विधेयक, जिसे ‘वन बिग ब्यूटीफुल बिल एक्ट’ कहा गया, उस पर विवाद शुरू हुआ। मस्क ने एक इंटरव्यू में इस बिल की आलोचना करते हुए कहा कि यह बिल देश के बजट घाटे को और बढ़ाएगा, जो DOGE के मिशन के खिलाफ है।

3 जून को मस्क ने अपनी बात को और सख्ती से रखा। उन्होंने X पर कई पोस्ट किए, जिसमें उन्होंने बिल को “घिनौना” और “अनैतिक” बताया। मस्क ने लिखा, “इस बिल को रात के अंधेरे में इतनी जल्दबाजी में पास किया गया कि कांग्रेस के ज्यादातर सदस्य इसे पढ़ भी नहीं पाए।” उन्होंने अपने फॉलोअर्स से अपील की कि वे कांग्रेस के सदस्यों को फोन करके इस बिल को रद्द करने की मांग करें। उन्होंने इसे ‘disgusting abomination’ कहा।

Epstein Files की हुई एंट्री

मामला तब और गर्म हो गया जब मस्क ने ट्रंप पर व्यक्तिगत हमला बोला। इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा धमाका तब हुआ जब मस्क ने ट्रंप पर Jeffrey Epstein से जुड़े होने का आरोप लगाया। 5 जून को मस्क ने X पर लिखा, “अब असली बम फोड़ने का वक्त है: @realDonaldTrump का नाम एपीस्टीन फाइल्स (Epstein Files) में हैं। यही वजह है कि इन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया। गुड डे, DJT!”

मस्क (Epstein Files) के इन सनसनीखेज आरोपों ने पूरे अमेरिका में हलचल मचा दी। जेफरी एप्सटीन एक कुख्यात अमेरिकी फाइनेंसर और सेक्स ऑफेंडर थे, जिन्हें 2019 में जेल में रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत पाया गया था। एप्सटीन पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और मानव तस्करी के गंभीर आरोप थे। 2008 में, उन्होंने फ्लोरिडा में वेश्यावृत्ति से संबंधित आरोपों को स्वीकार करते हुए 13 महीने की सजा भी काटी। लेकिन 2019 में, न्यूयॉर्क में उन पर फिर से सेक्स ट्रैफिकिंग के आरोप लगे। उसी साल, जेल में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई, जिसे आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया गया।

उनकी फाइल्स (Epstein Files) में कई बड़े नामों के शामिल होने की बात सामने आई थी, जिनमें राजनेता, व्यापारी और अन्य प्रभावशाली लोग शामिल थे। इन फाइल्स को अभी तक पूरी तरह से सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिसके चलते कई तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं। मस्क का दावा है कि ट्रंप का नाम भी इन फाइलों में है और इसलिए यह डेटा सार्वजनिक नहीं किया जा रहा।

कहा जाता है कि एपस्टीन फाइल्स (Epstein Files) में कई लीगल डॉक्यूमेंट्स हैं। इनमें एप्सटीन के निजी जेट, जिसे “लोलिता एक्सप्रेस” के नाम से जाना जाता है, उनकी यात्रा के रिकॉर्ड भी हैं। इनमें उन लोगों के नाम हैं जो उनके साथ यात्रा करते थे। इसके अलावा एप्सटीन का “लिटिल ब्लैक बुक” या कॉन्टैक्ट लिस्ट, जिसमें कई प्रभावशाली लोगों जैसे पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप, ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू, और अन्य के नाम शामिल हैं। इसके अलावा सबूतों में एप्सटीन की संपत्तियों (न्यूयॉर्क और यूएस वर्जिन आइलैंड्स) से जब्त की गई वस्तुओं की सूची, जैसे नग्न तस्वीरों वाली सीडी, मसाज टेबल, और सेक्स टॉयज भी हैं।

इन फाइल्स में 250 से अधिक नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण से जुड़े दावे शामिल हैं, जिन्हें एप्सटीन ने अपने न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा और यूएस वर्जिन आइलैंड्स के घरों में कथित तौर पर शोषित किया।

28 फरवरी, 2025 को, अमेरिकी न्याय विभाग ने अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी के नेतृत्व में “एप्सटीन फाइल्स: फेज 1” के तहत करीब 200 पेज के दस्तावेज जारी किए। इनमें फ्लाइट लॉग्स, एक भारी रेडैक्टेड कॉन्टैक्ट बुक, और एक साक्ष्य सूची शामिल थी। लेकिन ये दस्तावेज ज्यादातर पहले से सार्वजनिक जानकारी पर आधारित थे और इनमें कोई नया सनसनीखेज खुलासा नहीं था। पाम बॉन्डी ने दावा किया कि न्यूयॉर्क में एफबीआई फील्ड ऑफिस ने हजारों पेज के दस्तावेज छिपाए हैं, और उन्होंने एफबीआई निदेशक काश पटेल को इन सभी दस्तावेजों को 28 फरवरी, 2025 की सुबह 8 बजे तक सौंपने का आदेश दिया। बॉन्डी ने यह भी कहा कि पीड़ितों की पहचान की रक्षा के लिए कुछ जानकारी रेडैक्ट की जाएगी।

हालांकि, यह सच है कि ट्रंप का नाम एप्सटीन (Epstein Files) के फ्लाइट लॉग्स में कई बार आया है। रिकॉर्ड्स के अनुसार, ट्रंप ने 1990 के दशक में एप्सटीन के निजी जेट में कम से कम सात बार यात्रा की थी, जिसमें 1995 में उनके बेटे एरिक ट्रंप और 1994 में तत्कालीन पत्नी मारला मैपल्स और बेटी टिफनी ट्रंप के साथ उड़ानें शामिल थीं। लेकिन इन दस्तावेजों में ट्रंप पर कोई आपराधिक गतिविधि का आरोप नहीं है। ट्रंप ने कहा था कि उन्होंने 2004 में एक रियल एस्टेट विवाद के बाद एप्सटीन से संबंध तोड़ लिए थे और उसे अपने मार-ए-लागो क्लब से प्रतिबंधित कर दिया था। 2019 में, ट्रंप ने कहा कि वह एप्सटीन के “फैन” नहीं थे और पिछले 15 सालों से उनसे बात नहीं की थी।

आरोपों के बाद ट्रंप ने किया पलटवार

वहीं, ट्रंप ने भी पलटवार कर मस्क को धमकी दी। ट्रंप ने X पर लिखा, “एलन मेरे लिए बोझ बन रहा था। मैंने उसे DOGE से हटाया, और उसने मेरे इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मैंडेट को खत्म करने के फैसले पर बवाल मचाया।” ट्रंप ने दावा किया कि मस्क को पहले से पता था कि वह EV मैंडेट को खत्म करने वाले हैं, और यह उनकी नाराजगी की असली वजह है।

ट्रंप ने यह भी कहा कि मस्क की मदद के बिना भी वह 2024 का चुनाव जीत सकते थे, खासकर पेन्सिलवेनिया जैसे महत्वपूर्ण राज्य में। उन्होंने मस्क पर “थैंकलेस” का आरोप लगाया। ट्रंप ने कहा, अगर उन्होंने सरकार की आलोचना बंद नहीं की, तो उनकी कंपनियों Tesla और SpaceX के सभी कॉन्ट्रैक्ट्स रद्द कर दिए जाएंगे।

जब एक यूजर ने कहा कि इससे NASA के प्रोजेक्ट्स जैसे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर असर पड़ेगा, तो मस्क ने इसका जवाब और तल्खी से दिया। उन्होंने ट्रंप पर इम्पीचमेंट की मांग की और लिखा, “मेरे बिना ट्रंप चुनाव हार जाते।” मस्क ने यह भी कहा कि अगर ट्रंप उनकी कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट्स रद्द करेंगे, तो यह अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने ट्रंप को चुनौती देते हुए लिखा, “Go ahead, make my day.”

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क्या खत्म हो गई दोस्ती?

ट्रंप पहले भी अपने सहयोगियों से झगड़ा कर बाद में मेल-मिलाप करते रहे हैं। लेकिन एलन मस्क जैसे हाई-प्रोफाइल व्यक्ति से इतनी बड़ी लड़ाई पहली बार हुई है। दूसरी तरफ मस्क ने यह तक कह दिया कि अब अमेरिका में एक नया राजनीतिक दल बनना चाहिए जो आम लोगों की बात करे। उन्होंने X पर एक पोल शुरू किया, जिसमें पूछा, “क्या अमेरिका में एक नई राजनीतिक पार्टी बनानी चाहिए, जो 80 फीसदी मध्यमार्गी लोगों का प्रतिनिधित्व करे?”

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने नहीं, तो किसने लड़ी जंग? पहलगाम हमले के पीछे आसिम मुनीर नहीं तो कौन है मास्टरमाइंड?

Post Operation Sindoor: China’s Shadow War with India Exposed Through Pakistan’s Proxy Role
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Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में आतंक के खिलाफ भारत ने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया। जिसके बाद पाकिस्तान ने भारत की पश्चिमी सीमा पर कई जगहों पर ड्रोन अटैक किए। ये ड्रोन अटैक राजस्थान से लेकर लद्दाख तक में किए गए। 6-7 मई से 10 मई 2025 तक चले इस संघर्ष में भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया और पाकिस्तान के कई स्ट्रैटेजिक एयरबेसों को निशाना बनाया। वहीं, अब जो जानकारी सामने आ रही है, उससे लगता है कि इस जंग में पाकिस्तान अकेला नहीं था। बल्कि चीन ने पाकिस्तान को हर कदम पर मदद दी और यह भी अंदेशा लगाया जा रहा है कि पहलगाम हमले के पीछे भी चीन का ही हाथ था। भले ही लड़ाई पाकिस्तानी सेना लड़ रही थी लेकिन पर्दे के पीछे असली रिमोट चीन के पास था। चीन ने न केवल हथियार, खुफिया जानकारी, सैटेलाइट से निगरानी, साइबर वॉर में मदद की बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान को कूटनीतिक सहारा दिया।

Post Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर: कैसे शुरू हुई यह जंग?

22 अप्रैल 2025 को, जब कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ। इस हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। हमले की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली, जो पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का एक हिस्सा है। भारत ने इस हमले को बहुत गंभीरता से लिया और 6-7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में 9 जगहों पर आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। भारत ने अपने राफेल, सुखोई-30 MKI, मिग-29 और मिराज 2000 जैसे फाइटर जेट्स का इस्तेमाल किया। इन जेट्स ने ब्रह्मोस मिसाइलें, SCALP क्रूज़ मिसाइलें और हारोप ड्रोन जैसे हथियारों से हमले किए।

दूसरी तरफ, पाकिस्तान ने अपने JF-17 और J-10C जेट्स से जवाबी हमले किए, जिसमें उसने चीन की बनी PL-15E मिसाइलें और CM-401 हाइपरसोनिक मिसाइलें दागीं।

पहलगाम हमले के पीछे चीन का हाथ?

पाकिस्तान के एक पूर्व सैन्य अधिकारी आदिल राजा ने खुलासा किया है कि पहलगाम हमला पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने चीन के इशारे पर करवाया था। आदिल राजा ने कहा कि चीन ने मुनीर को इस हमले का आदेश दिया, ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके। पहलगाम में हमले के बाद एक प्रतिबंधित हुवावे कंपनी के सैटेलाइट फोन का सुराग मिला था, जो चीन के Beidou नेविगेशन सिस्टम से जुड़ा था। इसका मतलब है कि पाकिस्तानी सेना और आतंकियों को चीन की सीधी मदद मिल रही थी।

चीन के हथियारों का हुआ इस्तेमाल

पाकिस्तान ने इस जंग में चीन के हथियारों और ड्रोनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के 81 फीसदी हथियार चीन से आते हैं। इस जंग में पाकिस्तान ने PL-15E मिसाइलें दागीं, जो पंजाब के होशियारपुर में बिना टारगेट को हिट किए गिर गईं। JF-17 जेट्स ने CM-401 हाइपरसोनिक मिसाइलें दागीं, जो भारत के एयर डिफेंस का निशाना बन गईं। पाकिस्तान ने चीन के CH-4 ड्रोन भी इस्तेमाल किए, लेकिन भारत के S-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने इन्हें आसानी से नष्ट कर दिया।

चीन ने दी सैटेलाइट और खुफिया जानकारी

चीन ने पाकिस्तान को 5 सैटेलाइट्स की मदद दी, ताकि वह भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख सके। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने पाकिस्तान को रियल-टाइम खुफिया जानकारी दी और जमीनी व हवाई ऑपरेशनों में मदद की। चीन ने सैटेलाइट कवरेज को भारत की ओर इस तरह से एडजस्ट किया ताकि पाकिस्तान को ऑपरेशनल एडवांटेज मिल सके।

सेंटर फॉर जॉइंट वारफेयर स्टडीज़ – CENJOWS के डायरेक्टर रिटायर्ड मेजर जनरल डॉ. अशोक कुमार ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन की भूमिका पर कहा था, “चीन ने पाकिस्तान की मदद की ताकि वे अपने एयर डिफेंस रडार को दोबारा तैनात कर सकें और सैटेलाइट कवरेज को इस तरह एडजस्ट कर सकें कि भारत की ओर से होने वाली किसी भी हवाई गतिविधि की उन्हें पहले से जानकारी मिल जाए।”

उन्होंने यह भी खुलासा किया था, “इस युद्ध में चीन की मदद सिर्फ लॉजिस्टिक सपोर्ट तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह रणनीतिक स्तर पर भी थी। चीन ने अपने डिफेंस सिस्टम्स को भारत के खिलाफ असली युद्ध में टेस्ट करने का मौका देखा और उसी उद्देश्य से पाकिस्तान को एडवाइस, टेक्नोलॉजी और सैटेलाइट इंटेलिजेंस उपलब्ध कराई।” मेजर जनरल डॉ. अशोक कुमार के मुताबिक, “हम अब अपनी हर मिलिट्री स्ट्रेटेजी में दो फ्रंट को ध्यान में रखते हैं, चीन के पास जो भी सिस्टम या हथियार हैं, उसे मान लेना चाहिए कि कल वे पाकिस्तान के पास होंगे।” कुल मिला कर माना जाए कि चीन और पाकिस्तान के संबंध इतने घनिष्ठ हो चुके हैं कि भारत को अब हर संभावित हमले में दोनों को एक साथ सोचकर तैयारी करनी होगी।

चीन ने फैलाया प्रोपेगंडा

चीन ने इस जंग में इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर भी शुरू किया। कॉग्निटिव वॉरफेयर स्ट्रेटेजी में दुश्मन लोगों के दिमाग को प्रभावित करके उनके खिलाफ झूठी कहानियां फैलाता है। चीन ने सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए भारत को बदनाम करने की कोशिश की। चीनी मीडिया ने पाकिस्तान का साथ देते हुए पहलगाम हमले में उसकी भूमिका को नकारा और इसे भारत का “फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन” बताया। चीनी सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें फैलाई गईं कि पाकिस्तान ने भारत के राफेल जेट्स को मार गिराया, जो सच नहीं था। चीनी ब्लॉगर्स और “वूमाओ सैनिकों” (5 सेंट आर्मी), जो पैसे लेकर प्रचार करते हैं) ने पाकिस्तान की मदद की और भारत को इस तरह से पेश किया कि जैसे वह हमलावर है। ये लोग पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) से सीधे जानकारी ले रहे थे।

संयुक्त राष्ट्र में चीन का समर्थन

चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भी पाकिस्तान का साथ दिया। उसने तुर्की और बांग्लादेश के साथ मिलकर UNSC की काउंटर-टेररिज्म कमेटी 1267 में पहलगाम हमले की जिम्मेदार TRF (The Resistance Force) को बचाने की भी कोशिश की। इससे साफ है कि चीन हर मंच पर पाकिस्तान को बचाने की कोशिश कर रहा था।

भारत की जीत, चीन-पाकिस्तान की हार

चीन की सारी मदद के बावजूद, ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान हार गया। भारत ने न केवल 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट किया, बल्कि पाकिस्तान की सेना को भी भारी नुकसान भी पहुंचाया। भारतीय वायुसेना ने 6 पाकिस्तानी फाइटर जेट्स, 2 हाई-वैल्यू सर्विलांस विमान, और एक C-130 मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एय़रक्राफ्ट को भी नष्ट कर दिया। इसके अलावा, 10 से ज्यादा आर्म्ड ड्रोन, कई क्रूज़ मिसाइलें, और रडार साइट्स को भी निशाना बनाया। चीन के HQ-9B और HQ-16 एय़र डिफेंस सिस्टम भारत की मिसाइलों के सामने टिक नहीं पाए।

पाकिस्तान ने कहा कि भारत ने 19 जगहों पर हमला किया, जबकि भारत का दावा है कि उसने सिर्फ 11 जगहों को निशाना बनाया। शायद पाकिस्तान खुद को पीड़ित दिखाने के लिए ऐसा कह रहा है।

चीन की हकीकत सामने आई

यह पहली बार था जब चीन की हथियार प्रणालियों का असली जंग में टेस्ट हुआ। चीन की PL-15E मिसाइलें, CM-401 हाइपरसोनिक मिसाइलें, और HQ-9B सिस्टम सब नाकाम रहे। इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या चीन की तकनीक असली जंग में काम कर सकती है? यह चीन के हथियार निर्यात के लिए भी झटका है, क्योंकि अब दूसरे देश उस पर भरोसा करने से पहले दो बार सोचेंगे।

पाकिस्तान को क्यों इस्तेमाल कर रहा है चीन?

चीन पाकिस्तान को एक रणनीतिक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। इसका मकसद है भारत को दबाव में रखना, ताकि चीन अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं पूरी कर सके। चीन, पाकिस्तान को अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। चीन, भारत को अपनी राह का रोड़ा मानता है। वह पाकिस्तान का इस्तेमाल करके भारत पर दबाव बनाना चाहता है। भारत की आर्थिक तरक्की और चीन से कई कंपनियों का भारत आना उसे परेशान कर रहा है।

वहीं, पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति चीन के लिए बहुत अहम है। यह चीन को हिंद महासागर तक पहुंच देता है, जिससे वह मलक्का स्ट्रेट की समस्या से बच सकता है। पाकिस्तान, चीन के “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह भारत को घेरना चाहता है।

इसके अलावा, भारत में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का बढ़ना और चीन की अर्थव्यवस्था का कमज़ोर होना भी एक वजह है। चीन नहीं चाहता कि भारत निवेश के लिए एक सुरक्षित जगह बने, इसलिए उसने पाकिस्तान से आतंकी हमले करवाए।

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चीन की मदद के बावजूद, पाकिस्तान ने इस 4 दिनों की छोटी सी जंग में मुंह की खाई। भारत की स्वदेशी ब्रह्मोस मिसाइल और S-400 सिस्टम के आगे चीन के हथियार कमजोर साबित हुए। भारत ने साफ कर दिया कि वह किसी भी आतंकी हमले का मज़बूत जवाब देगा और आतंकियों व उनके समर्थक देशों में फर्क नहीं करेगा। भारत ने यह भी कहा कि वह परमाणु हथियारों के डर को स्वीकार नहीं करेगा।

Pakistan air defence failure: गुस्से में पाकिस्तान, ब्रह्मोस के आगे फेल हुए चीनी एयर डिफेंस सिस्टम, चीन बोला- ‘ब्रह्मोस को रोकने के लिए नहीं किया डिजाइन’

Pakistan Air Defence Failure: Chinese HQ-9B and HQ-16 Systems Fail Against BrahMos, Sparking Outrage as China Admits They Weren’t Designed for It
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Pakistan air defence failure: ऑपरेशन सिंदूर में भारत की स्वदेशी ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ने पाकिस्तान में जिस तरह से कहर मचाया, उससे अभी तक पाकिस्तान उबर नहीं पाया है। ब्रह्मोस मिसाइल ने पाकिस्तान की एयर डिफेंस सिस्टम की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। इस बात से पाकिस्तान में बहुत नाराजगी है।

पाकिस्तानी सेना के सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने हाल ही में चीन से शिकायत की है कि उसके सप्लाई किए गए एयर डिफेंस सिस्टम HQ-9B और HQ-16 ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे। वहीं, जवाब में चीन की ओर से साफ कहा गया है कि इन सिस्टम्स को इस तरह की मिसाइलों को रोकने के लिए डिजाइन ही नहीं किया गया था।

Pakistan air defence failure: ब्रह्मोस की ‘सर्जिकल’ एंट्री

7 से 10 मई 2025 के बीच हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में पाकिस्तान के अंदर कई सैन्य और आतंकी ठिकानों को टारगेट किया। भारत ने अपने राफेल, सुखोई-30 MKI, मिग-29 और मिराज 2000 जैसे फाइटर जेट्स का इस्तेमाल किया। भारत ने इसमें फ्रांस के SCALP मिसाइल, इजराइली Harop ड्रोन और सबसे अहम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल का इस्तेमाल किया था।

ब्रह्मोस ने मैक 3 की रफ्तार से उड़ते हुए पाकिस्तानी एयरस्पेस को चीरते हुए अपने टारगेट्स को सटीकता से तबाह किया। इस ऑपरेशन में भारत ने 11 बड़े पाकिस्तानी हवाई ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें नूर खान, रफीकी और मुरिद जैसे अहम एयर बेस शामिल थे। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि पाकिस्तान की एयर डिफेंस प्रणाली खासकर HQ-9B और HQ-16 इन मिसाइलों को न तो समय रहते डिटेक्ट कर सकीं और न ही इंटरसेप्ट। ब्रह्मोस मिसाइल मैक 3 की रफ्तार (लगभग 3700 किमी/घंटा) से चलती है और बहुत नीचे उड़ान भरती है, जिससे इसे रडार से पकड़ना मुश्किल होता है।

HQ-9B और HQ-16: नाम बड़े, निकले कमजोर?

HQ-9B को चीन ने अमेरिकी Patriot सिस्टम के मुकाबले का बताया था, जिसकी रेंज करीब 300 किलोमीटर है। वहीं HQ-16 (LY-80) को मिड-रेंज डिफेंस सिस्टम के तौर पर प्रचारित किया गया था। HQ-9B एक लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (SAM) है, जो 250-300 किलोमीटर तक के लक्ष्य को भेद सकती है। वहीं, HQ-16 मध्यम दूरी की प्रणाली है, जो 40 किलोमीटर तक के निचले और मध्यम ऊंचाई वाले लक्ष्यों को रोकने के लिए बनाई गई है। ये सिस्टम पाकिस्तान के व्यापक हवाई रक्षा (Comprehensive Layered Integrated Air Defence -CLIAD) का हिस्सा थे। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दोनों सिस्टम या तो बायपास हो गए, या जैम कर दिए गए, या फिर तबाह कर दिए गए। खास बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पहले ही पाकिस्तानी रडार सिस्टम YLC-8E को निशाना बनाकर उसे निष्क्रिय कर दिया था। इसके बाद ब्रह्मोस ने बिना किसी रोक के लक्ष्य को भेदा। पाकिस्तान ने दावा किया था कि ये सिस्टम भारत के राफेल जेट्स और ब्रह्मोस मिसाइलों को रोक सकते हैं।

भारत की ब्रह्मोस मिसाइल ने इन दोनों डिफेंस सिस्टम को चकमा दे दिया और अपने लक्ष्य को भेद दिया। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (EW) तकनीकों का इस्तेमाल करके पाकिस्तान के रडार को जाम कर दिया, जिससे HQ-9B और HQ-16 कुछ नहीं कर पाए। इसके अलावा, भारत ने हारोप ड्रोन का इस्तेमाल करके लाहौर और सियालकोट में HQ-9B लांचर को भी नष्ट कर दिया। पंजाब के चुनियां में चीन का YLC-8E एंटी-स्टील्थ रडार भी तबाह हो गया।

चीन ने दिया ये जवाब

वहीं, ब्रह्मोस ने जिस तरह से पाकिस्तान के एय़र डिफेंस सिस्टम को चकमा दिया, उससे पाकिस्तान बहुत नाराज़ है। उसने चीन के निर्माताओं से शिकायत की कि HQ-9B और HQ-16 ने ब्रह्मोस मिसाइल को रोकने में पूरी तरह से फेल कर दिया। लेकिन चीनी कंपनियों का जवाब चौंकाने वाला था। चीन ने जवाब दिया कि HQ-9B और HQ-16 को कभी भी ब्रह्मोस जैसी हाई-स्पीड, लो-एल्टीट्यूड मिसाइलों के लिए डिज़ाइन ही नहीं किया गया था।

चीन का कहना है कि HQ-9B और HQ-16 पारंपरिक क्रूज मिसाइलों और विमानों को रोकने के लिए बनाए गए हैं। चीन ने शुरुआत में इन सिस्टम्स को ‘सभी तरह के खतरे से निपटने में सक्षम’ बताया था। अब पाकिस्तानी अधिकारी महसूस कर रहे हैं कि उनके साथ धोका किया गया।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

चीन के अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर भी इस चूक को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोगों ने पाकिस्तान की ट्रेनिंग को दोषी ठहराया, तो कई यूजर्स ने कहा कि इससे चीन के हथियार एक्सपोर्ट की साख को बड़ा नुकसान हुआ है। एक यूज़र ने लिखा, “HQ-9B एक अच्छा सिस्टम है, लेकिन अगर इस्तेमाल करने वाले को ट्रेनिंग ही नहीं है, तो यह बेकार है।” चीन के लिए पाकिस्तान बड़ा बाजार है। औऱ वह करीब 82% हथियार खरीद वह चीन से करता है। ऐसे में HQ-9B और HQ-16 की असफलता से चीन के बाकी हथियारों जैसे J-10C, JF-17, PL-15 मिसाइल और Wing Loong ड्रोन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

2022 की घटना ने पहले ही उठाए थे सवाल

यह पहली बार नहीं है जब चीन के हवाई रक्षा सिस्टम पर सवाल उठे हैं। 2022 में, भारत से गलती से एक ब्रह्मोस मिसाइल छूट गई थी, जो पाकिस्तान के मियां चन्नू में 124 किलोमीटर अंदर जाकर गिरी। उस वक्त भी पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने मिसाइल को ट्रैक किया था, लेकिन उसे रोकने की कोशिश नहीं की। तब भी HQ-9B और HQ-16 नाकाम रहे थे, जिसके बाद कई सवाल उठे थे।

पाकिस्तान अब तलाश रहा है नया विकल्प

इस नाकामी के बाद पाकिस्तान अब अपनी डिफेंस स्ट्रैटेजी बदलने की सोच रहा है। वह अब तुर्की के SİPER 1 और SİPER 2 सिस्टम्स खरीदने की योजना बना रहा है। ये सिस्टम 70 से 150 किलोमीटर तक के लक्ष्य को भेद सकते हैं और इनमें गाइडेंस, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे सिस्टम लगे हैं। इससे साफ है कि पाकिस्तान अब सिर्फ चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहता और अपनी सुरक्षा के लिए नए रास्ते तलाश रहा है।

BrahMos NG: सुखोई के बाद अब तीन और फाइटर जेट होंगे BrahMos से लैस, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना का बड़ा फैसला!

चीन ने HQ-9B को अमेरिका के पैट्रियट सिस्टम की तरह पेश किया था, लेकिन इसकी नाकामी ने उसकी साख को ठेस पहुंची है। चीन की सेना (PLA) भी अपने रक्षा सिस्टम में 300 से ज्यादा HQ-9 सिस्टम इस्तेमाल करती है। अगर ये सिस्टम भारत के सामने नाकाम रहे, तो खुद चीन में भी उसकी डिफेंस स्ट्रैटेजी पर सवाल उठ सकते हैं।

Smart Ammunitions: अब स्मार्ट युद्ध की तैयारी! ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना को मिलेंगे स्मार्ट हथियार, साइबर शील्ड और रडार सिस्टम

Smart Ammunitions: Rs 40000 Cr Tech Boost for Precision Warfare Post-Sindoor
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Smart Ammunitions: भारत की सेना एक बार फिर अपनी ताकत बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अब रक्षा मंत्रालय ने सेना को फिर से लैस करने और नई तकनीकों को अपनाने के लिए 9,000 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि आवंटित की है। इसके साथ ही, वायु सेना और नौसेना के लिए भी 31,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि मंजूर की गई है ताकि वे आधुनिक हथियारों और तकनीकों से लैस हो सकें। इसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की बढ़ती हरकतों और सीमा पर चीन की गतिविधियों का मुकाबला करना है।

Smart Ammunitions: ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख, सेना तैयार

ऑपरेशन सिंदूर से भारतीय सेना कई अहम सबक सीखे हैं। इस ऑपरेशन का मकसद सीमा पर दुश्मनों को सबक सिखाना था, लेकिन इस दौरान कई कमियां को भी नोटिस किया गया। रक्षा मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है, लेकिन उसकी सीख को ध्यान में रखते हुए सेना को और मजबूत करना जरूरी है। इसीलिए 2025-26 के डिफेंस बजट का करीब 15-20 फीसदी हिस्सा, यानी 6.81 लाख करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा, इस बार नई तकनीकों और हथियारों पर खर्च किया जाएगा।

चार दिन चले इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया, जिससे पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाना पड़ा। वहीं, इस ऑपरेशन के दौरान भारी मात्रा में गोला-बारूद और रिसोर्सेज की खपत हुई। इसके बाद सरकार ने यह तय किया कि सेना की मारक क्षमता को जल्द से जल्द बहाल करना जरूरी है। इसी के तहत अब ‘इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-6’ (EP-6) योजना के तहत यह 9,000 करोड़ रुपये सेना को दिए गए हैं।

क्या है EP-6?

‘इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-6’ का उद्देश्य है सेना की तात्कालिक जरूरतों को तुरंत पूरा करना, ताकि कोई भी खतरा सामने आने पर तुरंत जवाब दिया जा सके। यह योजना पहले भी 2020 में गलवान घाटी में हुए हिंसक संघर्ष (2020) और विभिन्न आतंकरोधी अभियानों में इस्तेमाल की जा चुकी है।

EP-6 के तहत न केवल सेना को गोला-बारूद और मिसाइलें मुहैया कराई जाएंगी, बल्कि आर्टिलरी, टैंक, एयर डिफेंस और पैदल सेना के लिए ‘स्मार्ट एम्युनिशन’ भी खरीदे जाएंगे। यह स्मार्ट हथियार ऐसे होते हैं जो लक्ष्य को पहचानकर सटीकता से हमला करते हैं, जिससे कम संसाधनों में अधिक असर होता है। इनमें इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉन (ISR) सिस्टम, कम्युनिकेशन और कमांड एंड कंट्रोल टेक्नोलॉजी, साइबर और स्पेस वॉरफेयर सॉल्यूशंस के अलावा रेडियो फ्रिक्वेंसी जैमर और GPS स्पूफिंग जैसे नॉन-काइनेटिक हथियार भी खरीदे जाएंगे।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि हमें न केवल हथियारों की संख्या बढ़ानी है, बल्कि उन्हें स्मार्ट और तेज भी बनाना है। इसीलिए सेना अब ‘स्मार्ट हथियारों’ पर ध्यान दे रही है। इनमें स्मार्ट गोला-बारूद, आधुनिक तोपें, बख्तरबंद वाहन और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार शामिल हैं। इन हथियारों का इस्तेमाल खास तौर पर ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में किया जाएगा, जहां दुश्मन को तेजी से जवाब देना जरूरी होता है।

पाकिस्तान और चीन की चुनौतियों का जवाब

पाकिस्तान लगातार भारत की सीमा पर ड्रोन और UAV (Unmanned Aerial Vehicle) के जरिए घुसपैठ की कोशिश कर रहा है। 8 मई 2025 की रात को पाकिस्तान ने लेह से लेकर सर क्रीक तक 36 लोकेशनों पर करीब 300-400 ड्रोन भेजे, ताकि भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम की टोह ली जा सके। इन ड्रोन हमलों से निपटने में भारत को अपने महंगे और सीमित संसाधनों का प्रयोग करना पड़ा, जिसके बाद सेना के हलकों में महसूस किया गया कि अब समय आ गया है कि सस्ती लेकिन स्मार्ट टेक्नोलॉजी को अपनाया जाए।

वायुसेना और नौसेना को 31,000 करोड़

रक्षा मंत्रालय ने सिर्फ थल सेना ही नहीं, बल्कि वायुसेना और नौसेना को भी अत्याधुनिक बनाने के लिए करीब 31,000 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की है। इस राशि का उपयोग नए फाइटर जेट्स, मिसाइल डिफेंस सिस्टम, रडार, समुद्री निगरानी प्रणाली और अत्याधुनिक पनडुब्बियों की खरीद में किया जाएगा।

यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत को अब दो मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम में जहां पाकिस्तान है, तो पूर्व में चीन से चुनौती मिल रही है।

क्या हैं ‘स्मार्ट हथियार’ और क्यों हैं जरूरी?

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, सेना अब ‘स्मार्ट हथियारों’ पर ज्यादा जोर दे रही है। लेकिन ये स्मार्ट हथियार क्या हैं? आसान भाषा में कहें तो ये ऐसे हथियार हैं जो न केवल सटीक निशाना लगाते हैं, बल्कि कम लागत में ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं। मिसाल के तौर पर, स्मार्ट गोला-बारूद ऐसा हथियार है जो अपने लक्ष्य को खुद ढूंढ लेता है और उसे नष्ट कर देता है। इसमें रडार, जीपीएस और सेंसर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है।

इन हथियारों की जरूरत इसलिए बढ़ गई है क्योंकि आज की जंग पुराने तरीकों से नहीं लड़ी जाती। अब दुश्मन सस्ते ड्रोनों और साइबर हमलों का सहारा लेता है। ऐसे में हमें भी अपनी स्ट्रैटेजी बदलनी होगी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि स्मार्ट हथियार न केवल जंग को आसान बनाते हैं, बल्कि हमारे सैनिकों की जान भी बचाते हैं।

‘कॉस्ट-टू-किल’ रेशियो

ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह स्पष्ट हो गया कि हर लक्ष्य पर हमला करने में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों का खर्च समझदारी से किया जाना चाहिए। इसी को ध्यान में रखते हुए रक्षा विश्लेषकों ने ‘कॉस्ट-टू-किल रेशियो’ की बात की है, यानी किसी भी हमले में लगने वाले संसाधनों का मूल्यांकन लक्ष्य की अहमियत के आधार पर होना चाहिए। इससे ना सिर्फ संसाधनों की बचत होगी, बल्कि सेना की रणनीति भी ज्यादा प्रभावी बनेगी।

स्मार्ट स्ट्रैटेजी और स्मार्ट हथियारों की जरूरत

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर ने हमें कई अहम सबक सिखाए। पहला, हमें यह समझ आया कि जंग अब केवल हथियारों की संख्या से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए हमें स्मार्ट स्ट्रैटेजी और स्मार्ट हथियारों की जरूरत है। दूसरा, हमें अपनी इंटेलिजेंस सिस्टम को और मजबूत करना होगा ताकि दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखी जा सके। सूत्रों ने कहा, “हमें अब स्मार्ट और इंटेलिजेंट लड़ाई के लिए तैयार रहना है। हमें अपने संसाधनों को सुरक्षित रखना है और इंटेलिजेंस, डिटेक्शन और इंटरसेप्शन पर भारी निवेश करना है।”

CDS on Op Sindoor: सीडीएस चौहान ने मानी फाइटर जेट गिरने की बात, कहा- ऑपरेशन सिंदूर में हुईं गलतियों को समझा, सुधारा और दोबारा हमला किया

अधिकारी ने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने हमें यह सिखाया कि हमें अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करना चाहिए। कई बार ऐसा हुआ कि हमने जरूरत से ज्यादा हथियारों का इस्तेमाल किया, जिससे लागत बढ़ गई। अब सेना इस बात पर ध्यान दे रही है कि कम लागत में ज्यादा नुकसान कैसे पहुंचाया जा सकता है।

Theatre Commands: क्या भारत को नहीं है थिएटर कमांड की जरूरत?, ऑपरेशन सिंदूर को लेकर रिटायर्ड एयर मार्शल ने कही ये बड़ी बात

Theatre Commands: Does India Really Need Them? Retired Air Marshal Speaks on Operation Sindoor
PM Modi with CDS and all 3 chiefs

Theatre Commands: ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) से न केवल भारत की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस पॉलिसी में एक रणनीतिक बदलाव देखने को मिला है, बल्कि अब यह भी सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या भारत को वाकई थिएटर कमांड (Theatre Commands) की जरूरत है? सेंट्रल एयर कमांड के पूर्व एओसी-इन-सी रह चुके रिटायर्ड एयर मार्शल आरजीके कपूर का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) ने यह साबित कर दिया है कि भारत का मौजूदा मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर छोटे-मोटे खतरों से निपटने में बेहद सक्षम है और हमें थिएटर कमांड (Theatre Commands) जैसे बड़े बदलाव करने की जरूरत नहीं है।

Theatre Commands: 48 घंटों में ही पाकिस्तान ने टेके घुटने

ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) को देश की पश्चिमी सीमा पर अंजाम दिया गया, जो पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में शुरू किया गया था। वहीं, मात्र 48 घंटों में ही पाकिस्तान को घुटने टेकने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस ऑपरेशन की खूबी यह थी कि भारत ने बिना एलओसी पार किए बेहद सटीकता के पाकिस्तान में मौजूद आतंकी अड्डों को निशाना बनाया, बल्कि उसके प्रमुख एयरबेसों को भी निशाना बनाया गया। रिटायर्ड एयर मार्शल आरजीके कपूर के मुताबिक, यह ऑपरेशन 1971 के युद्ध के बाद पहली बार था, जब भारत ने परमाणु खतरे के बावजूद एक पारंपरिक ऑपरेशन को अंजाम दिया। इस दौरान भारतीय वायुसेना की निर्णायक भूमिका रही, जिसने एकीकृत नेटवर्क सिस्टम (आईएसीसीएस) की अहमियत को दिखाया। ऑपरेशन में तीनों सेनाओं थल सेना, नौसेना और वायु सेना के सीमित संसाधनों का कुशलता से इस्तेमाल किया गया, जिससे परिणाम सबके सामने हैं।

बताईं ये चार वजह

एयर मार्शल कपूर के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) ने यह साबित कर दिया कि भारत को थिएटर कमांड (Theatre Commands) की जरूरत नहीं है। उन्होंने इसके पीछे चार मुख्य वजह बताईं। पहली, इस रणनीति को बनाने और लागू करने में देश के बड़े सैन्य अधिकारी शामिल थे, जैसे चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीओएससी) और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस)। इसके अलावा, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए), रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं (थल सेना, वायु सेना, नौसेना) के प्रमुखों ने भी इसमें हिस्सा लिया। सबने मिलकर लगातार बैठकें कीं, योजना बनाई और खतरों से निपटने के लिए कदम उठाए। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन को अमलीजामा दिल्ली में ही पहनाया गया, जिसके लिए सैन्य नेतृत्व का दिल्ली में मौजूद रहना जरूरी है।

दूसरा, बाकी देशों के मुकाबले भारत की स्थिति थोड़ी अलग है। भारत के दो बड़े पड़ोसी, पाकिस्तान और चीन, दोनों से अलग-अलग तरह के खतरे हैं। ऐसे में तीनों सेनाओं के प्रमुखों की भूमिका अहम बनी रहती है, जो थिएटर कमांड (Theatre Commands) की संरचना में संभव नहीं है।

तीसरी वजह को लेकर उन्होंने कहा, किसी भी युद्ध में हवाई ताकत मुख्य हथियार होगी। आजकल के युद्ध में हवाई ताकत बहुत जरूरी है। वायु सेना ड्रोन और आधुनिक हथियारों के साथ बिना सीधे संपर्क के दुश्मन पर हमला कर सकती है। यह तरीका ज्यादा कारगर है। उन्होंने कहा कि हवई ताकत को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना सही नहीं होगा, बल्कि इसे सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल में रखना जरूरी है।

चौथी वजह बताते हुए एयर मार्शल कपूर ने कहा, ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के दौरान एक बड़ी अच्छी चीज जो देखने को मिली कि तीनों सेनाओं ने साथ मिल कर काम किया। हालांकि तीनों सेनाएं पहले से ही एक साथ काम कर रही हैं। उनके बीच तालमेल और संयुक्तता (जॉइंटनेस) पहले से ही अच्छी है। इस वजह से अलग से थिएटर कमांड (Theatre Commands) बनाने की जरूरत नहीं है।

सीडीएस की भूमिका अहम

एयर मार्शल कपूर के मुताबिक सेना में एकजुटता और सहयोग शीर्ष स्तर से नीचे की ओर आना चाहिए, न कि एक कमांडर के तहत रिसोर्सेज को जोड़कर। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) की सफलता में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान की भूमिका भी अहम रही। उन्होंने सिंगापुर में मीडिया को बताया कि यह ऑपरेशन नॉन कॉन्टैक्ट वारफेयर और मल्टी डोमेन ऑपरेशन का एक उदाहरण है। इसमें ड्रोन, साइबर, अंतरिक्ष और ऑटोनॉमस सिस्टम का इस्तेमाल हुआ, जिसने इंटीग्रेटेड एय़र डिफेंस सिस्टम (आईएसीसीएस) की अहमियत को दिखाया। इस ऑपरेशन में तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और एकजुटता साफ दिखी। जिसे देख कर लगता है कि थिएटर कमांड (Theatre Commands) की जरूरत नहीं है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का महत्व बढ़ा

कपूर ने यह भी बताया कि बदलते युद्ध की प्रकृति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और नई तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है। भारत में सीमा पर झड़पें, आतंकवाद विरोधी अभियान, सममित युद्ध और छोटे लेकिन तेज ऑपरेशन ज्यादा होने की संभावना है। ऐसे में हवाई ताकत की गति और लचीलापन इसे पहली पसंद बनाता है। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) ने यह भी दिखाया कि तीनों सेनाओं की इंटीग्रेटेड एय़र डिफेंस सिस्टम को आईएसीसीएस के तहत वायु सेना के नेतृत्व में रखना कितना जरूरी है।

वायु सेना ने किया था विरोध

सैन्य मामलों के जानकार सुशांत सिंह ने कहा, “अगर नई दिल्ली के दावे सही हैं, तो यह ऑपरेशन वायु सेना के उस रुख को मजबूत करता है, जिसमें उसने 2019 में पीएम मोदी के थिएटर कमांड (Theatre Commands) की घोषणा का विरोध किया था।” वहीं, कर्नल अनिल तलवार ने कहा, “थिएटर कमांड (Theatre Commands) बनाने से जटिलता बढ़ेगी, हवाई ताकत कमजोर होगी और ऑपरेशन पर असर पड़ेगा। भारत को केंद्रीकृत योजना और गहरे तालमेल पर ध्यान देना चाहिए, न कि सेनाओं को भौगोलिक आधार पर बांटना चाहिए।”

एयर मार्शल कपूर ने सुझाव दिया कि इसके बजाय साइबर और स्पेस कमांड बनाने, तीनों सेनाओं के प्रतिनिधियों के साथ एक सेंट्रलाइज्ड प्लानिंग ऑफिस बनाने और भविष्य के युद्धों पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “हमें पिछले युद्धों के बजाय अगले युद्ध की तैयारी करनी होगी।”

क्या है थिएटर कमांड (Theatre Commands)?

थिएटर कमांड (Theatre Commands) एक ऐसा मिलिट्री सिस्टम है जिसमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना के रिसोर्सेज को एक साथ एक कमांडर के तहत लाया जाएगा। यह कमांडर एक खास भौगोलिक क्षेत्र में सभी सैन्य अभियानों की योजना बनाने और लागू करने में अहम भूमिका निभाएगा। इसका मकसद तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और एकीकृत रणनीति बनाना है, ताकि युद्ध के समय संसाधनों का सही इस्तेमाल हो और तेजी से जवाब दिया जा सके।

मौजूदा योजना के अनुसार, भारत में तीन मुख्य थिएटर कमांड (Theatre Commands) बनाने की बात है:

  • उत्तरी थिएटर कमांड (Theatre Commands): यह कमांड मुख्य रूप से चीन से लगने वाली सीमा पर केंद्रित होगी, खासकर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों में। इसका मुख्यालय लखनऊ में प्रस्तावित है।
  • पश्चिमी थिएटर कमांड (Theatre Commands): यह कमांड पाकिस्तान से लगने वाली पश्चिमी सीमा पर ध्यान देगी, जिसमें जम्मू-कश्मीर और पंजाब जैसे क्षेत्र शामिल होंगे। इसका मुख्यालय जयपुर में प्रस्तावित है।
  • समुद्री थिएटर कमांड (Theatre Commands): यह कमांड हिंद महासागर क्षेत्र और भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए होगी, जिसमें नौसेना की मुख्य भूमिका होगी। इसका मुख्यालय कर्नाटक के कारवार में प्रस्तावित है।

इसके अलावा, कुछ अन्य फंक्शनल कमांड्स जैसे साइबर, स्पेस और लॉजिस्टिक्स कमांड भी बनाने की बात है, लेकिन मुख्य रूप से तीन भौगोलिक थिएटर कमांड (Theatre Commands) पर जोर दिया जा रहा है। यह योजना अभी प्रस्ताव के स्तर पर है।

कब से होगी लागू?

थिएटर कमांड (Theatre Commands) को लागू करने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन अभी तक यह पूरी तरह लागू नहीं हुई है। 2024 में जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में इसके लिए एक योजना सरकार को सौंपी गई थी, और 2025 को रक्षा मंत्रालय ने “सुधारों का साल” घोषित किया है। माना जा रहा है कि इसे पूरी तरह लागू होने में 2026 तक का समय लग सकता है। हालांकि, मई 2025 में इंटर-सर्विसेज ऑर्गनाइजेशन (कमांड, कंट्रोल और डिसिप्लिन) नियम लागू किए गए हैं, जो थिएटर कमांड (Theatre Commands) बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

Theatre Commands: फ्यूचर में अगर हुआ ऑपरेशन सिंदूर, तो इस तरह लड़ा जाएगा युद्ध, तीनों सेनाओं के चीफ के पास नहीं होगी ये जिम्मेदारी!

मई 2025 में लागू हुए नए नियमों के तहत थिएटर कमांड (Theatre Commands)र को अपने अधीन तीनों सेनाओं (थल सेना, वायु सेना, नौसेना) के जवानों और अधिकारियों पर अनुशासनात्मक और प्रशासनिक कार्रवाई करने का अधिकार दे दिया गया है। पहले हर सेना अपने अलग नियमों (जैसे आर्मी एक्ट 1950, नेवी एक्ट 1957) के तहत काम करती थी, लेकिन अब इंटीग्रेटेड कमांड के तहत एक कमांडर को यह पावर मिल गई है। यह कदम तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को बढ़ाने और थिएटर कमांड (Theatre Commands) को जल्द लागू करने की दिशा में उठाया गया है।

Defence Ministry Advisory: रक्षा मंत्रालय की सख्त चेतावनी; सीनियर अफसरों और उनके परिवारों की प्राइवेसी का सम्मान करे मीडिया!

Defence Ministry Advisory: Strict Warning to Media to Respect Privacy of Senior Officers and Families

Defence Ministry Advisory: रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण एडवाइजरी जारी करते हुए सभी मीडिया संस्थानों से आर्म्ड फोर्सेज के वरिष्ठ अधिकारियों और उनके परिवारों की निजता का सम्मान करने की अपील की है। यह एडवाइजरी ऐसे समय में आई है, जब हाल के दिनों में ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों के दौरान वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों की निजी जिंदगी में मीडिया की बढ़ती दखलअंदाजी को देखते हुए उठाया गया है। मंत्रालय ने सभी मीडिया संगठनों से इस एडवाइजरी का सख्ती से पालन करने का आग्रह किया है, ताकि सैन्य कर्मियों की गरिमा, गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

Defence Ministry Advisory: मीडिया की भूमिका को सराहा, लेकिन जिम्मेदारी की याद दिलाई

रक्षा मंत्रालय ने अपने एडवाइजरी में सबसे पहले मीडिया की भूमिका की सराहना की है। मंत्रालय ने कहा कि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की गतिविधियों, उपलब्धियों और बलिदानों को जनता तक पहुंचाने में मीडिया ने हमेशा अहम भूमिका निभाई है। मीडिया ने न केवल सैन्य बलों के शौर्य को उजागर किया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर जनता को जागरूक करने में भी योगदान दिया है। लेकिन इसके साथ ही मंत्रालय ने यह भी कहा कि मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, खासकर तब जब बात सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों की निजता की हो।

एडवाइजरी में साफ कहा गया है कि यह सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के साथ जारी की गई है और इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

इंटरव्यू के लिए न करें संपर्क

रक्षा मंत्रालय के जनसंपर्क निदेशालय (डीपीआर) की तरफ से इस एडवाइजरी में चार मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया गया है। पहला, मीडिया को आर्म्ड फोर्सेज के सेवारत या सेवानिवृत्त कर्मियों के निजी आवासों पर जाने या उनके परिवारों से व्यक्तिगत कहानियों या साक्षात्कार के लिए संपर्क करने से बचने के लिए कहा गया है। मंत्रालय ने साफ किया है कि ऐसा तभी किया जा सकता है, जब आधिकारिक चैनलों के माध्यम से अनुमति दी गई हो। दूसरा, मीडिया को सैन्य कर्मियों के परिवारों के निजी विवरण, जैसे आवासीय पते, पारिवारिक सदस्यों की तस्वीरें, या अन्य गैर-ऑपरेशनल जानकारी को प्रकाशित करने या प्रसारित करने से रोकने का निर्देश दिया गया है। तीसरा, मीडिया से अपील की गई है कि वे अपनी कवरेज को आर्म्ड फोर्सेज की पेशेवर और ऑपरेशनल गतिविधियों तक सीमित रखें और निजी जिंदगी के बारे में अनुमानित या दखलअंदाजी वाली खबरों से बचें। चौथा, सक्रिय अभियानों या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील समय के दौरान गोपनीयता और ऑपरेशनल गोपनीयता की सीमाओं का सम्मान करने पर जोर दिया गया है। खास तौर पर सक्रिय सैन्य अभियानों या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील समय में गोपनीयता और निजता का विशेष ध्यान रखना होगा। मंत्रालय ने कहा कि ऐसे समय में छोटी सी चूक भी बड़ा खतरा बन सकती है।

निजता पर बढ़ता खतरा

एडवाइजरी में खास तौर पर ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र किया गया है। इस अभियान के दौरान कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया, जिसके चलते वे जनता और मीडिया की नजरों में आ गए। लेकिन मंत्रालय ने चिंता जताई कि इस बढ़ते ध्यान ने अधिकारियों और उनके परिवारों की निजता को खतरे में डाल दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ मीडिया कर्मियों ने सैन्य अधिकारियों के घरों तक पहुंचने की कोशिश की और उनके परिवार के सदस्यों से संपर्क करने की कोशिश की। कई बार उनके निजी जीवन से जुड़ी ऐसी जानकारियां प्रकाशित की गईं, जो न तो जनता के हित में थीं और न ही जरूरी थीं। मंत्रालय ने इसे बेहद अनुचित और संभावित रूप से खतरनाक बताया। एडवाइजरी में कहा गया कि ऐसे कदम न केवल अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी असर डाल सकते हैं।

प्राइवेसी का सम्मान सभी की जिम्मेदारी

रक्षा मंत्रालय ने इस परामर्श में साफ किया है कि आर्म्ड फोर्सेस के सीनियर अफसर भले ही सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हों, लेकिन उनके परिवार निजी नागरिक हैं और उनकी गोपनीयता का सम्मान करना सभी की जिम्मेदारी है। मंत्रालय ने कहा, “हम मीडिया की भूमिका की सराहना करते हैं, जो सशस्त्र बलों की गतिविधियों, उपलब्धियों और बलिदानों को जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में सैन्य कर्मियों और उनके परिवारों की गरिमा और निजता का ख्याल रखा जाए।”

इस परामर्श को लेकर सैन्य विशेषज्ञों और पत्रकारों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। रिटायर्ड मेजर जनरल अजय शर्मा ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा, “यह एक जरूरी और स्वागतयोग्य कदम है। सैन्य कर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर देश की सेवा करते हैं। ऐसे में उनकी निजी जिंदगी को सुर्खियों में लाना न केवल अनुचित है, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि सैन्य सेवा की अपनी सीमाएं और गोपनीयता होती है।”

एक सीनियर अफसर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हमारी सेना के जवान देश की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं। उनके परिवार पहले से ही बहुत तनाव में रहते हैं। ऐसे में अगर मीडिया उनके निजी जीवन में दखल देगा, तो यह उनके लिए और मुश्किलें खड़ी कर देगा।”

मीडिया की स्वतंत्रता पर पाबंदी

वहीं, कुछ पत्रकारों का मानना है कि यह परामर्श मीडिया की स्वतंत्रता पर एक तरह की पाबंदी है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमें सैन्य कर्मियों की निजता का सम्मान करना चाहिए, लेकिन कई बार उनकी व्यक्तिगत कहानियां जनता को प्रेरित करती हैं। अगर हम पूरी तरह से निजी जिंदगी को कवर करने से रोक दिए गए, तो यह हमारी पत्रकारिता की आजादी पर भी सवाल खड़ा करता है।”

एक प्रमुख समाचार चैनल के संपादक ने कहा, “हम रक्षा मंत्रालय के इस कदम का स्वागत करते हैं। यह सही है कि हमें सैन्य बलों की निजता का सम्मान करना चाहिए। हम अपनी कवरेज को पेशेवर रखने की पूरी कोशिश करेंगे।” वहीं, कुछ पत्रकारों ने इस पर चिंता भी जताई कि इससे सैन्य गतिविधियों पर खबरें प्रकाशित करने में मुश्किलें आ सकती हैं। लेकिन मंत्रालय ने भरोसा दिलाया है कि वह जरूरी सूचनाएं उपलब्ध कराने में कोई कमी नहीं करेगा।

सोशल मीडिया पर भी इस एडवाइजरी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कई नागरिकों ने इसे सही कदम बताया है। एक यूजर ने लिखा, “हमारे सैनिक देश के लिए इतना कुछ करते हैं। कम से कम उनकी निजता तो बरकरार रहनी चाहिए। मीडिया को थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए।” वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि मीडिया को भी अपनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता निजता को भंग करने की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

New ECHS Advisory: अगर डिस्पेंसरी में नहीं है दवा तो क्या करें? रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी हुए नए दिशा-निर्देश

यह पहली बार नहीं है जब रक्षा मंत्रालय को इस तरह का कदम उठाना पड़ा है। अतीत में भी कई बार सैन्य अभियानों के दौरान मीडिया की अति उत्साहपूर्ण कवरेज को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परामर्श सही दिशा में एक कदम है, लेकिन इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए मीडिया और मंत्रालय के बीच बेहतर संवाद की जरूरत होगी।

IHI XF9-1 Engine for AMCA: जापान ने भारत के AMCA प्रोग्राम के लिए पेश किया अपना IHI XF9-1 इंजन, 6th जनरेशन फाइटर जेट्स में भी हो सकेगा इस्तेमाल

Indian AMCA fighter jet: Indian firms submit bids with DRDO to build 5th-gen fighter aircraft

IHI XF9-1 Engine for AMCA: भारत के महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम को लेकर एक नई खबर सामने आई है। जापान ने भारत को उसके AMCA प्रोग्राम के लिए अपने अत्याधुनिक IHI XF9-1 इंजन की पेशकश की है। यह इंजन भारतीय वायुसेना (IAF) के अगले 5.5-जेनरेशन स्टील्थ फाइटर जेट को पॉवर दे सकता है। जापान ने इस इंजन के जॉइंट डेवलपमेंट और भारत में ही प्रोडक्शन करने का प्रस्ताव दिया है। इस पेशकश के साथ जापान AMCA के इंजन डेवलपमेंट में सहयोग करने वाला चौथा देश बन गया है।

IHI XF9-1 Engine for AMCA: क्या है AMCA प्रोग्राम?

AMCA भारत का पहला स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है, जिसे डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) मिलकर डेवलप कर रहे हैं। इसका मकसद भारतीय वायुसेना के पुराने विमानों, जैसे मिग-21 और जगुआर, को रिप्लेस करना है। AMCA एक 5.5-जेनरेशन फाइटर जेट होगा, जो स्टील्थ (रडार से बचने की क्षमता), सुपरक्रूज़ (बिना आफ्टरबर्नर के सुपरसोनिक स्पीड), और मल्टी-रोल मिशन (हवा से हवा और हवा से जमीन पर हमला) करने में सक्षम होगा। इस जेट को 2035 तक पूरी तरह से तैयार करने का लक्ष्य है, और इसके प्रोटोटाइप 2028 तक उड़ान भर सकते हैं।

लेकिन इस प्रोग्राम की सबसे बड़ी चुनौती है एक ऐसा पावरफुल इंजन ढूंढना है, जो AMCA की जरूरतों को पूरा कर सके। अभी तक AMCA के प्रोटोटाइप में जनरल इलेक्ट्रिक F414 इंजन का इस्तेमाल करने की योजना है, जो 98 kN थ्रस्ट देता है। लेकिन यह एक अस्थायी समाधान है। AMCA के फाइनल वर्जन के लिए भारत को 110-130 kN थ्रस्ट वाले इंजन की जरूरत है, जो सुपरक्रूज़ और स्टील्थ फीचर्स को सपोर्ट कर सके।

जापान का IHI XF9-1 इंजन: क्या है खास?

जापान ने भारत को अपने IHI XF9-1 इंजन की पेशकश की है, जो एक लो-बायपास आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन है। इसे जापान की IHI कॉरपोरेशन और जापान की एक्विजिशन, टेक्नोलॉजी एंड लॉजिस्टिक्स एजेंसी (ATLA) ने मिलकर बनाया है। इस इंजन का प्रोटोटाइप 2018 में तैयार हुआ था और यह 11 टन (107 kN) का ड्राई थ्रस्ट और 15 टन (147 kN) का थ्रस्ट आफ्टरबर्नर के साथ देता है। खास बात यह है कि इस इंजन को और बेहतर बनाया जा सकता है, जिससे यह 20 टन (196 kN) तक का थ्रस्ट दे सके। यह इसे न केवल 5.5-जेनरेशन जेट्स के लिए, बल्कि भविष्य के सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर जेट्स के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है।

भारत की गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) AMCA के लिए ऐसा इंजन चाहती है जो 120 kN का थ्रस्ट और 73-75 kN का ड्राई थ्रस्ट दे सके, ताकि सुपरक्रूज संभव हो सके। IHI XF9-1 का ड्राई थ्रस्ट 110 kN के करीब है, जो GTRE की जरूरत से ज्यादा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस इंजन को मॉडिफाई करके भारत की जरूरतों के हिसाब से ड्राई थ्रस्ट को कम किया जा सकता है। वहीं, इसका डिज़ाइन ऐसा है कि यह कम हीट सिग्नेचर (इन्फ्रारेड सिग्नल) छोड़ता है, जो स्टील्थ जेट्स के लिए बहुत जरूरी है। यह इंजन जापान ने अपने अगले-जेनरेशन फाइटर प्रोग्राम के लिए बनाया गया था, लेकिन अब जापान इसे भारत के साथ साझा करने को तैयार है।

जापान का ऑफर: भारत के लिए क्यों खास?

जापान ने यह ऑफर ऐसे समय पर दिया है, जब भारत AMCA के लिए इंजन की खोज में कई देशों से बातचीत कर रहा है। जापान से पहले अमेरिका (GE F414 और F110), फ्रांस (साफरान M88), और ब्रिटेन (रॉल्स-रॉयस) ने भी अपने इंजन ऑफर किए थे। जापान ने कहा है कि वह भारत में इस इंजन का प्रोडक्शन करने और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने को तैयार है। यह भारत की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल के अनुरूप है। इससे भारत को न सिर्फ इंजन मिलेगा, बल्कि उसे बनाने की तकनीक भी सीखने का मौका मिलेगा।

वहीं, XF9-1 का डिज़ाइन इतना एडवांस्ड है कि यह भविष्य में 6ठी-जेनरेशन फाइटर जेट्स के लिए भी काम आ सकता है। यानी यह एक ऐसा निवेश है, जो भारत को लंबे समय तक फायदा देगा। भारत और जापान पहले से ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में साझा हित साझा करते हैं। दोनों देश चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। यह सहयोग रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करेगा।

AMCA प्रोग्राम में अब तक क्या हुआ?

AMCA प्रोग्राम की शुरुआत 2010 में हुई थी। शुरू में इसे 20 टन कैटेगरी का जेट माना गया था, लेकिन अब यह 25 टन कैटेगरी का फाइटर जेट है। 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने इस प्रोजेक्ट के लिए 15,000 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी। डिजाइन का काम 2023 में पूरा हो चुका है, और पहला प्रोटोटाइप 2028 तक तैयार होने की उम्मीद है। बड़े पैमाने पर उत्पादन 2035 तक शुरू होने की संभावना है।

कावेरी इंजन का हाल

भारत ने अपने स्वदेशी कावेरी इंजन प्रोग्राम पर कई सालों से काम किया है, जिसे गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) लीड कर रहा है। लेकिन यह प्रोग्राम अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। कावेरी इंजन जरूरी थ्रस्ट लेवल हासिल नहीं कर पाया, और इसे AMCA जैसे हाई-परफॉर्मेंस जेट के लिए इस्तेमाल करना मुश्किल है। इस वजह से भारत को विदेशी सहयोग की जरूरत पड़ रही है। जापान के साथ सहयोग से भारत को नई तकनीक सीखने का मौका मिलेगा, जो भविष्य में कावेरी प्रोग्राम को भी बेहतर करने में मदद कर सकता है।

AMCA Explained: आ रहा है चीनी चेंगदू जे-20 माइटी ड्रैगन का बाप! ‘मेड इन इंडिया’ स्टील्थ जेट एएमसीए को मिली हरी झंडी, 2026 तक प्रोटोटाइप तैयार!

हालांकि जापान का ऑफर भले ही आकर्षक हो, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। जापान की रक्षा तकनीक पर सख्त निर्यात नियम हैं, क्योंकि वह शांति का पक्षधर है। हालांकि, खासकर चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी को देखते हुए हाल के सालों में जापान ने इन नियमों में ढील दी है। जापान पहले से ही यूके और इटली के साथ ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) में शामिल है। अगर भारत और जापान इस डील को अंतिम रूप दे देते हैं, तो यह दोनों देशों के बीच एक नई साझेदारी की शुरुआत होगी।

Explained: यूक्रेन का Operation Spider Web क्यों है भारत के लिए बड़ा सबक? पढ़ें ‘ट्रोजन हॉर्स’ अटैक की पूरी कहानी

Why Ukraine's 'Operation Spider Web' is a Big Lesson for India? Read the Full Story of the 'Trojan Horse' Attack
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Operation Spider Web: यूक्रेन और रूस के बीच पिछले तीन साल तीन महीने से युद्ध चल रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत 24 फरवरी 2022 को हुई थी, जब रूस ने यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया। हालांकि दोनों देशों के बीच तनाव 2014 से ही चल रहा था, जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था और डोनबास क्षेत्र में संघर्ष शुरू हुआ था। कुल मिला कर दोनों के बीच पिछले 11 साल से तनाव जारी है। शांति विराम को लेकर दोनों पक्षों के बीच 2025 में अब तक दो प्रत्यक्ष (16 मई और 2 जून) बैठकें हो चुकी हैं। लेकिन युद्ध बंद करने को लेकर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। वहीं, दो जून की बैठक से ठीक पहले यूक्रेन ने रूस में ड्रोन से एक बड़ा हमला किया, जिसमें रूस के लगभग 41 स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स को खड़े-खड़े नष्ट कर दिया। इसे नाम दिया गया ऑपरेशन स्पाइडर वेब। इस ऑपरेशन ने न केवल रूस की सैन्य ताकत को बड़ा झटका दिया, बल्कि यह भी दिखाया कि आधुनिक युद्ध में छोटी और सस्ती तकनीकें कितनी प्रभावी हो सकती हैं। आइए, समझते हैं कि कैसे यूक्रेन ने रूस के एक तिहाई स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को निशाना बनाया।

क्या था Operation Spider Web?

ऑपरेशन स्पाइडर वेब (Operation Spider Web) यूक्रेन की एक ऐसी सैन्य रणनीति थी, जिसमें छोटे-छोटे ड्रोन का इस्तेमाल करके रूस के सैन्य ठिकानों पर हमला किया गया। ये ड्रोन इतने छोटे और सस्ते थे कि इन्हें आसानी से छिपाया जा सकता था, लेकिन इनकी ताकत इतनी थी कि ये रूस के बड़े-बड़े स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को नष्ट करने में सक्षम थे। अनुमान के मुताबिक एक ड्रोन की कीमत करीब 50000 रुपये है। यूक्रेन ने अपने 40,000 ड्रोन सैनिकों में से कुछ को इस मिशन के लिए चुना।

इस ऑपरेशन की सबसे खास बात यह थी कि इन ड्रोनों को रूस की सीमा के अंदर छिपाकर ले जाया गया और फिर वहां से हमला किया गया। यहां कि फ्रंटलाइन से 4000 किमी दूर साइबेरिया में मौजूद रूसी एयरबेस पर भी जहाजों को निशाना बनाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूक्रेन ने दावा किया कि इस हमले में रूस के 117 ड्रोन और 117 ऑपरेटर शामिल थे, जिन्होंने मिलकर 41 रूसी विमानों को तबाह कर दिया। इससे रूस के रणनीतिक बमवर्षकों के बेड़े का लगभग एक-तिहाई हिस्सा नष्ट हो गया। इन सैनिकों ने रूस की सीमा में घुसकर ड्रोनों को छिपाने और लॉन्च करने का काम किया। इस ऑपरेशन में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “यह हमारी सबसे बड़ी सफलता है। हमने दिखा दिया कि छोटे हथियार भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं।”

ऑपरेशन का पहला चरण: ड्रोनों को रूस में भेजना

ऑपरेशन (Operation Spider Web) की शुरुआत यूक्रेन के सैनिकों ने रूस की सीमा में घुसकर की। इसके लिए यूक्रेन ने खास तरह के ड्रोन इस्तेमाल किए, जिन्हें फर्स्ट-पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन कहा जाता है। ये ड्रोन कैमरे से लैस होते हैं, जिससे ऑपरेटर दूर बैठकर ड्रोन को कंट्रोल कर सकता है और सीधे निशाना साध सकता है। इन ड्रोनों को रूस की सीमा में ले जाने के लिए यूक्रेन ने ट्रकों का इस्तेमाल किया।

इन ट्रकों को रूस की सीमा के पास ले जाया गया, जहां से सैनिकों ने ड्रोनों को छिपाने का काम शुरू किया। ड्रोनों को रूस के सैन्य ठिकानों के पास जंगलों, गांवों और छोटे-छोटे घरों में छिपाया गया। इस काम में स्थानीय लोगों की मदद भी ली गई, जो रूस के खिलाफ थे और यूक्रेन का समर्थन कर रहे थे। एक बार ड्रोन छिप जाने के बाद, सैनिकों ने इन्हें मोबाइल नेटवर्क के जरिए कंट्रोल करने की तैयारी शुरू की।

ऑपरेशन का दूसरा चरण: हमले की तैयारी

ड्रोनों को छिपाने के बाद यूक्रेन के सैनिकों ने रूस के सैन्य ठिकानों की सही जानकारी जुटाई। इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों और जासूसी का सहारा लिया गया। रूस के जो स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमान इस ऑपरेशन के निशाने पर थे, वे मुख्य रूप से पांच हवाई ठिकानों पर मौजूद थे जिनमें मुरमांस्क, इवानोवो, रियाज़ान, अमूर और इरकुत्स्क शामिल थे।

इन ठिकानों पर रूस के 41 विमान मौजूद थे, जिनमें से ज्यादातर स्ट्रैटेजिक बॉम्बर थे। ये विमान लंबी दूरी तक मिसाइल दागने में सक्षम थे और यूक्रेन के लिए बड़ा खतरा थे। यूक्रेन की रणनीति थी कि इन विमानों को नष्ट करके रूस की हवाई ताकत को कमजोर किया जाए। ड्रोन हमले में रूस के 57 अरब डॉलर के सैन्य विमानों को नष्ट कर दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस के जो 41 एयरक्राफ्ट नष्ट हुए उनमें ए-50 अर्ली वार्निंग प्लेंस, TU-23M3, TU-95 जैसे स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स भी थे। रूस के पास अब 100 से कम स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स बचे हैं। यह रूस के स्ट्रैटेजिक बॉम्बर बेड़े का 34% हिस्सा था।

ड्रोनों को इन ठिकानों तक पहुंचाने के लिए यूक्रेन ने रात का समय चुना। सैनिकों ने ट्रकों के जरिए ड्रोनों को ठिकानों के पास पहुंचाया और फिर वहां से ड्रोनों को लॉन्च किया। ड्रोन इतने छोटे थे कि रूस के रडार सिस्टम इन्हें पकड़ नहीं सके। जैसे ही ट्रक लक्ष्य के पास पहुंचे, उनकी छत खुली और ड्रोन बाहर निकलकर एक साथ एयरबेस पर टूट पड़े। इन हमलों में छोटे-छोटे FPV ड्रोन इस्तेमाल हुए, जिनकी कीमत मात्र 40,000 से 50,000 रुपये के बीच थी, लेकिन असर टैंक या मिसाइल जितना था।

ऑपरेशन का तीसरा चरण: हमला और नुकसान

जब ड्रोन रूस के हवाई ठिकानों तक पहुंचे, तो उन्होंने एक साथ हमला शुरू कर दिया। ये सभी ड्रोन विस्फोटकों से लैस थे, जो विमानों को नष्ट करने के लिए काफी थे। यूक्रेन के सैनिकों ने 117 ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जिसमें से हर ड्रोन ने एक विमान को निशाना बनाया।

हमले में रूस के 41 विमानों को नुकसान पहुंचा, जिसमें से कई पूरी तरह से नष्ट हो गए। रूस की वायु सेना और सुरक्षा बल इस हमले से हैरान रह गए, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतने छोटे ड्रोन इतना बड़ा नुकसान कर सकते हैं। इस हमले में रूस के एक तिहाई स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को नुकसान पहुंचा, जो रूस के लिए एक बड़ा झटका था।

ऑपरेशन की सफलता के पीछे क्या था?

इस ऑपरेशन (Operation Spider Web) की सफलता के पीछे कई कारण थे। पहला, यूक्रेन ने सस्ते और छोटे ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जिन्हें रूस के रडार सिस्टम पकड़ नहीं सके। दूसरा, यूक्रेन ने रूस की सीमा के अंदर अपनी जासूसी और स्थानीय लोगों की मदद से सही जानकारी जुटाई। तीसरा, इस ऑपरेशन में यूक्रेन के सैनिकों ने बहुत साहस और समझदारी दिखाई। इस हमले की खास बात यह थी कि ड्रोन ट्रकों के अंदर छिपाकर रूस के अंदर भेजे गए थे। ये ट्रक रूस में सामान्य नागरिक ट्रकों की तरह चलाए जा रहे थे। अंदर छिपे ड्रोन को मोबाइल नेटवर्क के जरिए ऑपरेटर कंट्रोल कर रहे थे।

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा, “यह ऑपरेशन (Operation Spider Web) हमारी तकनीक और साहस का प्रतीक है। हमने दिखा दिया कि युद्ध में ताकत ही सब कुछ नहीं होती, रणनीति भी बहुत मायने रखती है।”

रूस के नुकसान का आकलन

यूक्रेन के जासूसी विभाग SBU के प्रमुख ने कहा कि “रूसी विमानों को बम सहित नष्ट किया गया।” रूस की सेना ने माना कि उनके रडार सिस्टम और एयर डिफेंस सिस्टम छोटे ड्रोनों को पकड़ने में नाकाम रहा। रूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगे और भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए नए कदम उठाएंगे।

हालांकि, इस हमले से रूस को बड़ा नुकसान हुआ। रूस के स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमान लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम थे, और इनका नष्ट होना रूस की सैन्य ताकत के लिए एक बड़ा झटका था। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस को इन विमानों को दोबारा बनाने में कई साल लग सकते हैं, क्योंकि ये विमान बहुत महंगे और जटिल होते हैं।

आधुनिक युद्ध में ड्रोन गेम-चेंजर

ऑपरेशन सिंदूर में (Operation Spider Web) जिस तरह से पाकिस्तान ने भारत पर हमला करने के लिए सस्ते ड्रोनों का इस्तेमाल किया औऱ जिस तरह से यूक्रेन ने रूस के बॉम्बर्स नष्ट किए, उसने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन एक गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। ये ड्रोन न केवल सस्ते होते हैं, बल्कि इन्हें कहीं भी छिपाकर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस ऑपरेशन ने दुनिया भर की सेनाओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को कैसे बेहतर करें।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस ऑपरेशन (Operation Spider Web) ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले युद्धों में ड्रोन और ‘छल’ (Trojan Horse) जैसे हमले निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यूक्रेन के इस प्रयोग ने युद्ध की परिभाषा ही बदल दी है। उनका कहना है कि भविष्य में ड्रोन युद्ध और बढ़ेगा। छोटे और सस्ते ड्रोन बड़े हथियारों को नष्ट करने में सक्षम होंगे, जिससे युद्ध की रणनीति पूरी तरह से बदल जाएगी। यूक्रेन ने इस ऑपरेशन के जरिए यह दिखा दिया कि तकनीक और रणनीति का सही इस्तेमाल किसी भी सेना को मजबूत बना सकता है, चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो।

भारत में ड्रोन टेक्नोलॉजी

भारत ने हाल के वर्षों में ड्रोन तकनीक पर काफी ध्यान दिया है। भारतीय सेना ने DRDO के जरिए स्वदेशी ड्रोन विकसित किए हैं, जैसे कि रुस्तम-2 और घटक। इसके अलावा, भारत ने इजरायल और अमेरिका से ड्रोन खरीदे हैं, जैसे कि हैरन और प्रेडेटर ड्रोन। 2023 में भारत ने ड्रोन नियमों को आसान बनाया, जिसके बाद निजी कंपनियां भी ड्रोन बनाने में सक्रिय हो गई हैं।

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हालांकि, भारत को अभी भी बड़े पैमाने पर ड्रोन ऑपरेशन और सस्ते FPV ड्रोनों के इस्तेमाल में काफी काम करने की जरूरत है। यूक्रेन का यह ऑपरेशन भारत को एक रोडमैप देता है कि कैसे सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल बड़े दुश्मन के खिलाफ किया जा सकता है।