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Agni-Prime Missile: अब चलती ट्रेन से भी छोड़ी जा सकेगी अग्नि-प्राइम मिसाइल, टारगेट पर चीन के कई शहर, जानें रेल-बेस्ड लॉन्चर क्यों है खास

Agni-Prime Missile: India successfully tests Agni-Prime from rail-based mobile launcher

Agni-Prime Missile: डीआरडीओ ने गुरुवार को ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए अग्नि-प्राइम मिसाइल का सफल परीक्षण किया। ये परीक्षण इसलिए भी खास है क्योंकि पहली बार इस मिसाइल को रेल-आधारित मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च किया गया। यह परीक्षण डीआरडीओ और स्ट्रैटेजिक फोर्सेसज कमांड के सथ मिल कर किया गया। वहीं, इस उपलब्धि के बाद भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है जिनके पास कैनिस्टराइज्ड रेल नेटवर्क से मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता है।

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता को “ऐतिहासिक क्षण” बताते हुए डीआरडीओ, स्ट्रैटेजिक फोर्सेसज कमांड और भारतीय सशस्त्र बलों को बधाई दी। रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह परीक्षण भारत की सामरिक क्षमताओं को और मजबूती देगा और भविष्य की सैन्य रणनीतियों के लिए निर्णायक साबित होगा।

Agni-Prime Missile: क्या है अग्नि-प्राइम मिसाइल?

अग्नि-प्राइम मिसाइल भारत की अग्नि सीरीज की नई पीढ़ी की मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। इसे 1,000 से 2,000 किलोमीटर की दूरी तक मार करने के लिए डिजाइन की गई है। यह मिसाइल परमाणु और पारंपरिक दोनों तरह के हथियार ले जाने में सक्षम है।

यह अग्नि-I और अग्नि-II का अपग्रेड वर्जन है, लेकिन उससे हल्की, अधिक सटीक और तकनीकी रूप से एडवांस है। अग्नि-प्राइम का वजन लगभग 11,500 किलोग्राम है, जो अग्नि-III की तुलना में लगभग आधा है। इसके कैनिस्टराइज्ड डिजाइन के चलते इसे लंबे समय तक स्टोर करने और किसी भी समय तुरंत लॉन्च किया जा सकता है।

रेल-बेस्ड मोबाइल लॉन्चर क्यों है खास?

इस परीक्षण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पहली बार अग्नि-प्राइम को रेल-आधारित मोबाइल लॉन्चर से छोड़ा गया। यह लॉन्चर भारतीय रेल नेटवर्क पर बिना किसी विशेष तैयारी के आसानी से लॉन्च किया जा सकता है।

रेल-आधारित लॉन्चर पूरी तरह से सेल्फ-कंटेंड सिस्टम है। इसमें आधुनिक संचार उपकरण, सुरक्षा प्रणाली और स्वतंत्र रूप से लॉन्च करने की क्षमता मौजूद है। यह मिसाइल को कम समय में तैयार कर सकता है और लॉन्च कर सकता है, जिससे भारत तुरंत जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

भारत का रेलवे सिस्टम दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक है, जिसकी कुल लंबाई 69,181 किमी है। वहीं, भारत चीन सीमा के आसपास रेल नेटवर्क को तेजी से बढ़ा रहा है। यहां रेल नेटवर्क मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्यों (नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे) के जिम्मे है, जहां 2025 में 500 किमी नई लाइनें बनाने की योजना है। यहां एलएसी से 100 से 200 किमी तक सटे इलाकों में पहले से 800-1,000 किमी का रेल नेटवर्क मौजूद है। वहीं, एलएसी से सटे सिक्कम में नाथू ला और अरुणाचल में तवांग तक कई इलाकों को रेल नेटवर्क से जोड़ने की योजना है। जिसके बाद चीन के 10 से 12 शहर अग्निप्रााइम की रेंज में आ जाएंगे। अग्नि-प्राइम मिसाइल चीन के पश्चिमी क्षेत्रों में तैनात मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

रेल नेटवर्क का उपयोग मिसाइल को देश के किसी भी हिस्से तक ले जाने में मदद करता है, जिससे दुश्मनों के लिए इसे ट्रैक करना और नष्ट करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसे ले जाने वाली खास ट्रेनें टनलों में छिप सकती हैं। जिससे ये किसी की नजर में नहीं आती। यह तकनीक भारत की रक्षा रणनीति में “गेम चेंजर” साबित हो सकती है।

बताया “टेक्स्ट बुक लॉन्च”

24 सितंबर को किए गए परीक्षण के दौरान मिसाइल की ट्रैजेक्टरी (trajectory) को कई ग्राउंड स्टेशनों से ट्रैक किया गया। डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और स्ट्रैटेजिक फोर्सेसज कमांड के अधिकारियों ने इस लॉन्च को देखा और इसे “टेक्स्ट बुक लॉन्च” बताया, यानी यह पूरी तरह सफल रहा और मिशन के सभी उद्देश्यों को हासिल किया गया।

2,000 किलोमीटर तक की रेंज के साथ यह मिसाइल पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों तक मार करने में सक्षम है। रेल-आधारित लॉन्चर से तैनाती से भारत की सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी मजबूत होगी। वहीं, परमाणु युद्ध की स्थिति में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे भारत दुश्मन के पहले हमले के बाद भी प्रभावी जवाब दे सकता है।

इससे पहले अग्नि-प्राइम का पहला सफल परीक्षण 28 जून 2021 को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया था। इसके बाद दिसंबर 2021, जून 2023 और अप्रैल 2024 में भी सफल उड़ान परीक्षण हुए। सड़क-आधारित मोबाइल लॉन्चर से यह मिसाइल पहले ही सेना में शामिल की जा चुकी है। लेकिन रेल-आधारित लॉन्चर से यह पहला परीक्षण था।

अग्नि-प्राइम की खूबियां

अग्नि-प्राइम मिसाइल को कई एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस किया गया है। हल्के डिजाइन होने की वजह से इसे ले जाना आसान है। इसमें डुअल रिडंडेंट नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है, जिसमें आईएनएस, जीपीएस और आईआरएनएसएस शामिल हैं। इसके कारण इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) 10 मीटर से भी कम है, यानी यह अपने लक्ष्य को बहुत सटीकता से भेद सकती है।

मिसाइल में मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल (MaRV) तकनीक है, जो इसे दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम से बचने में सक्षम बनाती है। इसमें थ्रस्टर या एयरोडायनामिक कंट्रोल सिस्टम होते हैं, जिससे यह मिसाइल वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान अपनी दिशा बदल सकती है। यह दो चरणों में सॉलिड ईंधन पर चलती है। इस मिसाइल को कैनिस्टर में स्टोर किया जाता है। जिससे यह मौसम और बाहरी खतरों से बची रहती है और साथ ही इसे फटाफट लॉन्च किया जा सकता है।

किन-किन देशों के पास है यह सुविधा

रेल-बेस्ड लॉन्चर सिस्टम बहुत कम देशों के पास है। रूस ने 1980 में आरटी-23 मिसाइल के लिए इसका इस्तेमाल किया था। चीन के पास डीएफ-41 मिसाइल का रेल वर्जन है। डीएफ-41 आईसीबीएम के रेल वर्जन को 2015-2016 में टेस्ट किया गया था। यह सॉलिड-फ्यूल्ड और मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) तकनीक से लैस है। MIRV की खासियत है कि एक मिसाइल कई वारहेड्स ले जा सकती है, और प्रत्येक वारहेड को अलग-अलग टारगेट्स पर निशाना बनाने की क्षमता होती है। इसे पीएलए की रॉकेट फोर्स ऑपरेट करती है।

वहीं, उत्तर कोरिया ने 15 सितंबर, 2021 में ह्वासोंग-11A मिसाइल को रेल से छोड़ा था। जिसे रेलवे-बोर्न मिसाइल रेजिमेंट ने ऑपरेट किया था। वहीं, पाकिस्तान के पास अभी ऐसी कोई सुविधा नहीं है और वह अभी भी रोड बेस्ड मिसाइलों पर ही निर्भर है।

Indian Army Recruitment Rally: दिल्ली से द्वीप पहल के तहत भारतीय सेना आयोजित कर रही है भर्ती रैली, यहां पढ़ें पूरी जानकारी

Indian Army Recruitment Rally

Indian Army Recruitment Rally: भारतीय सेना ने पहली बार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बड़े स्तर पर भर्ती रैलियों का आयोजन करने का ऐलान किया है। इसे “दिल्ली से द्वीप” नाम दिया गया है। इस पहल का उद्देश्य देश के सबसे दूरदराज इलाकों तक समान अवसर पहुंचाना और युवाओं को सेना में शामिल होने का मौका देना है।

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जोनल रिक्रूटिंग ऑफिस, चेन्नई ने जानकारी दी है कि भर्ती रैली अक्टूबर 2025 में आयोजित होगी। उत्तर, मध्य और दक्षिण अंडमान जिले के उम्मीदवारों के लिए रैली 8 से 10 अक्टूबर तक श्री विजया पुरम के नेताजी स्टेडियम में होगी। वहीं, निकोबार जिले के युवाओं के लिए 14 और 15 अक्टूबर को ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे में मिनी स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजन होगा।

Indian Army Recruitment Rally: कौन-कौन से पदों पर भर्ती

यह रैली अग्निवीर जनरल ड्यूटी, अग्निवीर ऑफिस असिस्टेंट और स्टोर कीपर टेक्निकल, अग्निवीर टेक्निकल, अग्निवीर ट्रेड्समैन (10वीं और 8वीं पास), सिपाही फार्मेसी, सोल्जर टेक्निकल नर्सिंग असिस्टेंट/वेटरनरी नर्सिंग असिस्टेंट और अग्निवीर (महिला) मिलिट्री पुलिस जैसे पदों पर भर्ती के लिए होगी। यह कदम अंडमान-निकोबार के युवाओं को मुख्यधारा में शामिल करने की बड़ी कोशिश है।

ऑनलाइन परीक्षा से शॉर्टलिस्टिंग

सेना ने स्पष्ट किया है कि इन रैलियों के लिए उम्मीदवारों को पहले ऑनलाइन कॉमन एंट्रेंस एग्जामिनेशन (CEE) के जरिए शॉर्टलिस्ट किया गया है। इसके बाद ही उन्हें भर्ती रैली में बुलाया जाएगा। सभी उम्मीदवारों के लिए एडमिट कार्ड अगस्त 2025 के आखिरी सप्ताह में जारी होंगे। उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे नियमित रूप से वेबसाइट और अपनी ईमेल जांचते रहें ताकि समय पर अपडेट मिल सके। वहीं भर्ती से जुड़ी किसी भी तरह की शंका या मदद के लिए उम्मीदवार सीधे “भर्ती कार्यालय (मुख्यालय), चेन्नई, फोर्ट सेंट जॉर्ज कॉम्प्लेक्स, चेन्नई – 600009, फोन नं- 044-25674924” से संपर्क कर सकते हैं।

जरूरी दस्तावेज और नियम

उम्मीदवारों को भर्ती स्थल पर पहुंचते समय अपने सभी दस्तावेज साथ लाने होंगे। सेना ने चेतावनी दी है कि अधूरे दस्तावेज या गलत फॉर्मेट वाले कागजात (खासतौर पर हलफनामा) के बिना किसी को रैली में शामिल नहीं किया जाएगा। सभी जरूरी दस्तावेजो का विवरण और फॉर्मेट सेना की आधिकारिक वेबसाइट [www.joinindianarmy.nic.in](http://www.joinindianarmy.nic.in) पर उपलब्ध है।

सेना ने दोहराया है कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह ऑटोमेटेड और पारदर्शी है। किसी भी एजेंट या दलाल का इसमें कोई रोल नहीं है। उम्मीदवारों से कहा गया है कि वे मेहनत और तैयारी के बल पर चयन की कोशिश करें और धोखाधड़ी करने वालों से दूर रहें।

भारतीय सेना की यह पहल न सिर्फ रोजगार का अवसर है, बल्कि अनुशासन, सम्मान और देश सेवा की राह भी खोलती है। “दिल्ली से द्वीप” पहल को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया जा रहा है। अंडमान और निकोबार जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के युवाओं के लिए यह ऐतिहासिक मौका है, जहां वे अपने ही द्वीप पर भर्ती रैली में शामिल होकर भारतीय सेना का हिस्सा बन सकते हैं।

FCAS dispute: क्या AMCA की वजह से खटाई में पड़ा फ्रांस, जर्मनी और स्पेन का छठी पीढ़ी का फाइटर जेट प्रोजेक्ट, तीनों देशों में क्यों छिड़ी रार?

FCAS dispute
France Germany fighter jet dispute

FCAS dispute: एक तरफ चीन जहां अपने छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट चेंगदू जे-36 और शेनयांग जे-50 के प्रोटोटाइप की टेस्टिंग करने में जुटा है, तो वहीं यूरोपीय देशों में अभी छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने को लेकर तू-तू मैं-मैं छिड़ी हुई है। यूरोप की सबसे बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट्स में शामिल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) को लेकर इन दिनों रार छिड़ी हुई है। इस प्रोजेक्ट के तहत 2040 तक यूरोप की एयर फोर्स के लिए छठवीं पीढ़ी का फाइटर जेट तैयार करना है। वहीं इस प्रोजेक्ट में फ्रांस की दसॉ एविएशन, जर्मनी स्पेन की एयरबस शामिल है। लेकिन इन तीनों के बीच कलह ठन गई है और ये प्रोजेक्ट खत्म होने की कगार पर खड़ा है।

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इस प्रोजेक्ट का मकसद था कि यूरोप अपने दम पर छठवीं पीढ़ी का एक ऐसा फाइटर जेट बनाए जो दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीकों से लैस हो। इस विमान को मानवयुक्त लड़ाकू विमानों के साथ ही स्वार्मिंग ड्रोंस और डिजिटल कॉम्बैट क्लाउड से जोड़ा जाना था। लेकिन अब इस प्रोजेक्ट की राह इतनी आसान नहीं लग रही, क्योंकि फ्रांस और जर्मनी के बीच इस पर लीडरशिप को लेकर जबरदस्त खींचतान चल रही है।

FCAS dispute: “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” पर होना था काम

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2017 में हुई थी, जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन और जर्मनी की तत्कालीन चांसलर एंजेला मर्केल ने इसका एलान किया। इसका लक्ष्य 2040 तक फ्रांस के राफेल, जर्मनी के यूरोफाइटर टाइफून और स्पेन के EF-18 हॉर्नेट जैसे मौजूदा विमानों की जगह लेना था। इस प्रोजेक्ट को फ्रांस में Système de Combat Aérien du Futur-SCAF नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत यह थी कि इसमें केवल एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि पूरे “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” पर काम होना था। इस सिस्टम में तीन मुख्य हिस्से रखे गए। पहला, न्यू जेनरेशन फाइटर यानी मानवयुक्त स्टेल्थ जेट, जिसे फ्रांस की दसॉ एविएशन लीड कर रही थी। दूसरा, रिमोट कैरियर्स यानी ऐसे ड्रोंस जो स्वार्मिंग और मल्टी-रोल मिशंस को अंजाम दे सकें। इन्हें एयरबस की जिम्मेदारी में जर्मनी और स्पेन को तैयार करना था। तीसरा, रीयल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग और डिसीजन मेकिंग के कॉम्बैट क्लाउड सिस्टम, जो एक तरह का डिजिटल नेटवर्क था और जिसका उद्देश्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से सभी प्लेटफॉर्म्स को जोड़ना था।

FCAS dispute: प्रोजेक्ट को कब्जे में लेना चाहता है दसॉ?

जब यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ था तो इसकी लागत लगभग सौ अरब यूरो आंकी गई थी। उम्मीद थी कि यह यूरोप को अमेरिका के एफ-35 और चीन के जे-20 जैसे लड़ाकू विमानों की बराबरी में खड़ा कर देगा। लेकिन जल्द ही मतभेद उभरने लगे। विवाद तब और गहराया जब 2019 में स्पेन भी इसमें शामिल हो गया। स्पेन के शामिल होने से एयरबस का हिस्सा बढ़कर लगभग दो-तिहाई हो गया और दसॉ की हिस्सेदारी एक-तिहाई रह गई। जर्मनी और स्पेन की ओर से प्रतिनिधित्व करने वाली एयरबस का कहना है कि दसॉ प्रोजेक्ट को कब्जे में लेना चाहता है और सभी अहम फैसले अपने हाथ में रखना चाहता है। दूसरी ओर दसॉ का कहना है कि लीडरशिप के बिना प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सकता।

दसॉ एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने हाल ही में पेरिस के पास एक नई राफेल फैक्ट्री के उद्घाटन पर अपने बयान से पूरे विवाद को और भड़का दिया। उन्होंने कहा कि फ्रांस अकेले भी यह फाइटर जेट बना सकता है। उन्होंने जर्मनी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि बर्लिन चाहे, तो वह भी अकेले यह काम कर सकता है, क्योंकि दसॉ के पास इस तरह की क्षमता पहले से है। उनका कहना था कि फ्रांस ने पिछले सत्तर सालों में मिराज और राफेल जैसे विमान बनाकर यह साबित किया है कि डिजाइन से लेकर प्रोडक्शन तक हर चरण में वह आत्मनिर्भर है।

FCAS dispute: इन वजहों से खटाई में पड़ी साझेदारी

दसॉ न्यू जेनरेशन फाइटर यानी NGF का प्राइम कॉन्ट्रैक्टर है, लेकिन स्पेन की एंट्री के बाद फैसलों में वह आउटवोटेड हो गया। फ्रांस की मांग है रि उसे NGF पर 80 फीसदी कंट्रोल दिया जाए। जर्मनी का आरोप है कि दसॉ फ्रांस में ज्यादातर काम रखना चाहता है और अगले फेज (डेमॉन्स्ट्रैटर बनाने) को ब्लॉक कर रहा है। दसॉ का कहना है कि स्पष्ट लीडरशिप के बिना प्रोजेक्ट धीमा हो रहा है। स्पेन के शामिल होने से एयरबस का शेयर 66 फीसदी हो गया, जिससे दसॉ को केवल 25-33 फीसदी काम मिल रहा है। दसॉ के मुताबिक, इससे “जॉइंट डिजाइन अथॉरिटी” मॉडल फेल हो रहा है। वहीं, जर्मनी के डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिस्टोरियस ने अगस्त 2025 में कहा कि जर्मनी प्रोजेक्ट में देरी और नहीं बर्दाश्त कर सकता”।

फ्रांस पहले भी हुआ था बाहर

यह भी कहा जा रहा है कि यूरोफाइटर प्रोजेक्ट के फेल होने के पीछे भी फ्रांस ही था। यूरोफाइटर टाइफून को यूरोपियन फाइटर एयरक्राफ्ट (EFA) या फ्यूचर यूरोपियन फाइटर एयरक्राफ्ट (FEFA) के नाम से जाना जाता था, जो चौथी पीढ़ी का मल्टी-रोल फाइटर जेट है। इसे 1983 में यूरोप के चार देशों जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, इटली और स्पेन के सहयोग से शुरू किया गया था। वहीं शुरुआत में फ्रांस भी इसका हिस्सा था, लेकिन वह 1985 में ही बाहर हो गया था। कहा जाता है कि फ्रेंच इंडस्ट्री हमेशा से सहयोग के खिलाफ रही, लेकिन पॉलिटिकल दबाव और यूरोपियन यूनियन के चलते ऐसा करना पड़ा।

जर्मनी तलाश रहा साझेदार

जर्मनी की स्थिति फिलहाल असमंजस में है। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस पहले ही यह कह चुके हैं कि प्रोजेक्ट में और देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। जर्मनी की संसद में तो यहां तक सुझाव दिया गया कि बर्लिन को इस प्रोजेक्ट से बाहर निकलकर किसी अन्य साझेदारी की ओर देखना चाहिए। इसके बाद खबरें आईं कि जर्मनी ब्रिटेन, इटली और जापान के साथ मिलकर चल रहे GCAP यानी ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम से जुड़ने पर विचार कर रहा है। यही नहीं, स्वीडन के साथ भी बातचीत की चर्चा है।

क्या कहना है स्पेन का

स्पेन इस विवाद में अपेक्षाकृत शांत है। उसकी भूमिका एयरबस के जरिए है और वह फ्रांस तथा जर्मनी के बीच सीधी खींचतान में नहीं पड़ना चाहता। लेकिन स्पेन भी प्रोजेक्ट में लगातार हो रही देरी से परेशान है क्योंकि इस पर उसकी वायुसेना के भविष्य की योजनाएं टिकी हैं। स्पेन का कहना है कि वह इस प्रोजेक्ट में पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। स्पेनिश प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने हाल ही में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “स्पेन की रुचि इस प्रोजेक्ट में तीनों देशों जर्मनी, फ्रांस और स्पेन द्वारा पहले से तय शर्तों पर पूरी तरह से है। सांचेज ने कहा कि FCAS “मूल वर्कशेयर डील” का सम्मान करे। बता दें कि स्पेन 2019 में फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम प्रोजेक्ट में शामिल हुआ था। वहीं, मैड्रिड ने अमेरिकी एफ-35 को भी ठुकरा कर FCAS या यूरोफाइटर टाइफून पर फोकस कर लिया।

वहीं स्पेन की कंपनी इंद्रा सिस्टेमास (Indra) इस प्रोजेक्ट में सेंसर, रिमोट कैरियर्स (ड्रोंस) और कॉम्बैट क्लाउड पर काम कर रही है। साथ ही, स्पेन कुल फंडिंग का लगभग 33 फीसदी (फ्रांस और जर्मनी के बराबर) दे रहा है।

वहीं, अगर फ्रांस नहीं मानता है, तो जर्मनी GCAP यानी यूके-इटली-जापान या स्वीडन से जुड़ सकता है। इससे स्पेन का नुकसान कम होगा। वहीं अगर FCAS सफल हुआ तो स्पेन को 100+ विमान मिलेंगे, जो EF-18 को 2040 तक रिप्लेस करेंगे।

क्या होंगी FCAS में खूबियां

फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम के तहत न्यू जेनरेशन फाइटर एक ट्विन इंजन डेल्टा विंग डिजाइन पर बेस्ड स्टेल्थ जेट होगा। इसकी रफ्तार मैक 2 से भी अधिक बताई जा रही है और इसमें आफ्टरबर्नर के बिना ही सुपरक्रूज की क्षमता होगी। इसका कॉम्बैट रेडियस लगभग 1500 किलोमीटर से ज्यादा होगा। इसमें इंटरनल वेपन्स बे होंगे, जिससे इसका रडार क्रॉस सेक्शन बेहद कम रहेगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कॉकपिट और सेंसर फ्यूजन की खूबी होगी। साथ ही यह फाइटर जेट विमान हाइपरसोनिक हथियारों और लेजर वेपंस तक ले जाने में सक्षम होगा।

रिमोट कैरियर्स इस प्रोजेक्ट का दूसरा अहम हिस्सा है। ये ऐसे ड्रोन्स होंगे जो अलग-अलग आकार और भूमिका में तैनात किए जा सकेंगे। इनका इस्तेमाल निगरानी, स्ट्राइक और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे मिशनों में किया जाएगा। इन्हें विमान या अन्य प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकेगा। ये पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से ऑपरेट होंगे लेकिन कंट्रोल नीचे क्रू के हाथों में रहेगा।

कॉम्बैट क्लाउड FCAS का तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक डिजिटल नेटवर्क होगा जो रीयल-टाइम डेटा शेयरिंग, साइबर सिक्योरिटी और बिग डेटा एनालिसिस की सुविधा देगा। इसकी मदद से वायु, थल, नौसेना और स्पेस सभी प्लेटफॉर्म एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे। यह नेटवर्क युद्ध के दौरान फैसले लेने में मदद करेगा।

FCAS के इंजन की बात करें, तो इसे सफरान और एमटीयू मिल कर बना रही हैं। इसमें वेरिएबल साइकिल एडवांस्ड टर्बोफैन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जिससे यह सुपरक्रूज कर सकेगा और साथ ही फ्यूल एफिशिएंसी भी बनी रहेगी। यह इंजन हाई थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो देने वाला होगा और इसमें ऐसा डिजाइन होगा जिससे इसका इन्फ्रारेड सिग्नेचर कम हो और दुश्मन इसे आसानी से ट्रैक न कर सके।

भारत को दिया था शामिल होने का ऑफर

जहां एक ओर यूरोप इस प्रोजेक्ट को लेकर बंटा हुआ नजर आ रहा है, वहीं भारत को भी इसमें शामिल होने का ऑफर दिया गया था। जर्मनी और स्पेन ने नवंबर 2024 में इस प्रोजेक्ट में भारत को ऑब्जर्वर स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा था। जिसके तहत भारत इस प्रोजेक्ट की तकनीक को करीब से देख सकेगा और उसकी सप्लाई चेन यानी एवियोनिक्स, सेंसर, इंजन कंपोनेंट्स की सप्लाई में हिस्सा ले सकेगा। हालांकि इसमें भारत के पास फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं होता। वहीं, इसके लिए फ्रांस और स्पेन की मंजूरी जरूरी थी। खबरों के मुताबिक पिछले साल फ्रांस, जर्मनी औऱ स्पेन ने भारत में मल्टी लेटरल एक्सरसाइज तरंग शक्ति में हिस्सा लिया था। जो इस ऑफर का आधार का बना। हालांकि फ्रांस ने ऑफर का विरोध नहीं किया, लेकिन मंजूरी भी नहीं दी। वहीं भारत को डुअल ऑफर्स मिले। जहां भारत को FCAS के अलावा यूके-इटली-जापान के ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम- GCAP में भी आमंत्रित किया गया था।

भारत ने इसलिए किया रिजेक्ट

वहीं, भारत ने फरवरी 2025 में ऑफर को अस्वीकार कर दिया। भारत की प्राथमिकता फिलहाल अपना स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA प्रोजेक्ट पर है। भारत नहीं चाहता कि उसकी एनर्जी और रिसोर्सेज किसी विदेशी प्रोजेक्ट में उलझें। लेकिन अगर भारत को ऑब्जर्वर स्टेटस मिलता है तो उसकी प्राइवेट डिफेंस इंडस्ट्री को यूरोप की सप्लाई चेन में जुड़ने का बड़ा मौका मिल सकता था।

भारत के लिए यह स्थिति दिलचस्प है। एक ओर वह AMCA पर तेजी से काम कर रहा है, दूसरी ओर वह यूरोपीय तकनीक से सीखने का अवसर भी पा सकता है। लेकिन भारत के लिए प्राथमिकता आत्मनिर्भरता ही है और इसी वजह से उसने FCAS में शामिल होने का कोई औपचारिक प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। वहीं, भारत और सफरान मिल कर AMCA के लिए इंजन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस समझौते के तहत भारत को पहली बार पूर्ण रूप से जेट इंजन की टेक्नोलॉजी मिलेगी। यह भारत का पहला 100 फीसदी स्वदेशी जेट इंजन होगा जिसे यहीं बनाया जाएगा। और सफरान ने 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश भी की है।

Hanle-Chumar Road: रंग लाई बीआरओ की मेहनत, लद्दाख में 17,200 फीट ऊंचाई पर बनी 91 किमी लंबी ऑल वेदर रोड जनता के लिए खुली

Hanle-Chumar Road

Hanle-Chumar Road: लद्दाख के दुर्गम रास्तों के बीच बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के प्रोजेक्ट हिमांक के तहत बनी हानले-चुमार रोड को जनता के लिए खोल दिया गया है। यह सड़क कुल 91 किलोमीटर लंबी है और 14,500 फीट से लेकर 17,200 फीट तक की ऊंचाई पर बनी है। इस मार्ग पर स्थित साल्सा ला पास को पार करना रोड इंजीनियरिंग की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। बता दें कि प्रोजेक्ट हिमांक 1985 से चल रहा है।

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यह सड़क भारत-चीन सीमा लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के करीब स्थित है। इस सड़क के बन जाने के बाद चुमार सेक्टर तक आवाजाही आसान हो गई है। इस मार्ग से भारतीय सेना को सैनिकों, हथियारों और रसद सामग्री की सप्लाई में बड़ी मदद मिलेगी। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से लद्दाख में सड़क और पुलों का नेटवर्क तेजी से बनाया जा रहा है। हानले-चुमार रोड इस रणनीतिक प्रयास का अहम हिस्सा है।

हाई-एल्टीट्यूड सड़कें बनाने में सामान्य से ज्यादा वक्त लगता है। क्योंकि लद्दाख जैसे क्षेत्र में जहां काम केवल गर्मियों (मई से अक्टूबर) में ही संभव होता है।

वहीं सेना के साथ आम लोग भी इस सड़क का इस्तेमाल कर सकेंगे। यह मार्ग कई पर्यटन स्थलों को जोड़ता है जहां अभी तक बेहद कठिन रास्तों से ही पहुंचा जा सकता था। इस सड़क के जरिए पर्यटक अब आसानी से हानले हान्ले वेधशाला, क्यूं त्सो लेक, चिलिंग त्सो लेक और आगे त्सो मोरिरी लेक तक पहुंच सकेंगे। हानले ऑब्जर्वेटरी दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित वेधशालाओं में से एक है, जहां रात का आसमान तारों से भरा हुआ दिखाई देता है। वहीं, यह सड़क के बनने के बाद अब पर्यटक भी इस अनुभव का आनंद दे सकेंगे।

लद्दाख जैसे कठिन भौगोलिक इलाके में सड़क बनाना आसान नहीं होता। यहां का मौसम बेहद शुष्क है, तापमान अक्सर शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है और ऑक्सीजन का स्तर भी कम हो जाता है। ऐसे हालात में बीआरओ ने इस सड़क का निर्माण किया और दिखाया कि भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता कितनी मजबूत है। प्रोजेक्ट हिमांक पहले भी उमलिंग ला पास पर 19,024 फीट की ऊंचाई पर दुनिया की सबसे ऊंची सड़क बनाकर रिकॉर्ड कायम कर चुका है।

वहीं इस रोड के बनने से स्थानीय लोगों को भी फायदा होगा। अब गांवों तक सामान की सप्लाई आसान होगी। स्थानीय किसान और हस्तशिल्प कलाकार अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचा पाएंगे। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं भी इन इलाकों में तेजी से पहुंचेंगी। साथ ही पर्यटन बढ़ने से होमस्टे, गाइड और स्थानीय परिवहन सेवाओं को बढ़ावा मिलेगा।

हानले-चुमार रोड का उद्घाटन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ था, जिसमें 50 बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण किया गया था। इनमें से 16 प्रोजेक्ट्स लद्दाख में पूरे किए गए हैं। इनकी कुल लागत लगभग 947 करोड़ रुपये है। इनमें कई महत्वपूर्ण सड़कें और छह बड़े पुल भी शामिल हैं। साथ ही, हनले में एक विशेष एम्युनिशन स्टोरेज साइट और सड़कों पर नई इंटरलॉकिंग कंक्रीट ब्लॉक तकनीक का इस्तेमाल भी किया गया है, जिससे सर्दियों में सड़कें टिकाऊ बनी रह सकें।

साल्सा ला पास से गुजरेगी सड़क

इस सड़क का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा सालसा ला पास है। यह पास 17,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यहां पर मौसम अचानक बदल जाता है। बर्फबारी और तेज हवाओं के बीच सड़क निर्माण बेहद कठिन था। बीआरओ ने कठिन परिश्रम और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके इस रास्ते को तैयार किया, जो अब पूरे साल इस्तेमाल किया जा सकेगा।

IAF MiG-21 ceremony: वायुसेना अपने वर्कहॉर्स मिग-21 को खास तरीके से देगी विदाई, तेजस और जगुआर ऐसे देंगे आखिरी सलामी

IAF MiG-21 ceremony

IAF MiG-21 ceremony: भारतीय वायुसेना 26 सितंबर के दिन को एतिहासिक बनाने की तैयारी कर रही है। 62 साल की सेवा के बाद 26 सितंबर को उसका सबसे पुराना फाइटर जेट मिग-21 आखिरी बार आसमान में गरजता नजर आएगा। चंडीगढ़ वायुसेना स्टेशन पर होने वाले इस भव्य विदाई समारोह में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह खुद कॉकपिट में बैठेंगे। उनके साथ स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्मा भी MiG-21 की आखिरी उड़ान का हिस्सा होंगे और इस तरीके से MiG-21 ceremony होगी

MiG-21 in 1971 War: ऑपरेशन सिंदूर से 54 साल पहले मिग-21 ने की थी यह जबरदस्त प्रिसिजन स्ट्राइक, हाथ मलते रह गया था गार्जियन एंजल

IAF MiG-21 ceremony: बादल और पैंथर फॉर्मेशन

वायुसेना सूत्रों के मुताबिक मिग-21 नंबर 23 स्क्वॉड्रन “पैंथर्स” का हिस्सा हैं, आखिरी बार दो अलग-अलग फॉर्मेशन में उड़ान भरेंगे। इनमें पहला होगा तीन विमानों का “बादल फॉर्मेशन”, जिसमें एयर चीफ मार्शल एपी सिंह लीड करेंगे। वे लैंडिंग करेंगे जबकि बाकी दो मिग-21 ऊपर उठकर कॉम्बैट एयर पेट्रोल (CAP) का प्रदर्शन करेंगे।

दूसरा होगा “पैंथर फॉर्मेशन”, जिसमें तीन MiG-21 और दो स्वदेशी तेजस एलसीए मैक-1 शामिल होंगे। जैसे ही मिग-21 स्क्वॉड्रन सलामी देंगे, वे अलग हो जाएंगे और तेजस विमान भारतीय आसमान में आगे बढ़ते हुए भविष्य का संकेत देंगे। MiG-21 ceremony नजारा पुराने युग से नए युग की ओर बढ़ते कदमों की तस्वीर पेश करेगा।

IAF MiG-21 ceremony: जगुआर भी बनेंगे हिस्सा

समारोह में सिर्फ मिग-21 ही नहीं बल्कि जगुआर लड़ाकू विमान भी हिस्सा लेंगे। वे बेस स्ट्राइक का डेमो देंगे और दिखाएंगे कि वायुसेना की ताकत अब किस तरह आधुनिक विमानों पर टिक चुकी है। इसके अलावा स्वदेशी तेजस भी पहली बार मिग-21 के साथ आधिकारिक विदाई में शामिल होंगे।

प्रिया शर्मा ने पहले भी उड़ाया था मिग

कुछ हफ्ते पहले राजस्थान के नाल एयरबेस पर एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद मिग-21 बाइसन सीयू2777 पर सोलो कॉम्बैट सॉर्टी की थी। खास बात यह रही कि उस फॉर्मेशन की अगुवाई स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्मा ने की थी। वायुसेना ने इसे “ट्रेडिशन एंड ट्रांसफॉर्मेशन” का पल बताया था। अब यही जोड़ी MiG-21 की आखिरी उड़ान में भी हिस्सा लेकर इतिहास का हिस्सा बनेगी।

राजस्थान के झुंझुनू जिले में जन्मी स्क्वाड्रन लीडर प्रिया शर्मा आईएएफ की सातवीं महिला फाइटर पायलट हैं। वे 2018 में एयर फोर्स अकादमी, दुंदिगल से ग्रेजुएट हुईं, जहां उन्होंने स्टेज-1 (पिलाटस पीसी-7), स्टेज-2 (किरण) पर ट्रेनिंग पूरी की। जनवरी 2019 से स्टेज-3 (बीदर AFS) में मिग-21 पर एडवांस्ड ट्रेनिंग ली। वहीं वे मोहना सिंह औऱ प्रतिभा सिंह के बाद राजस्थान की तीसरी महिला फाइटर पायलट हैं। उनके पिता भी बीदर एयरफोर्स स्टेशन में सेवाएं चुके हैं।

वहीं भारतीय वायुसेना के लिए यह सिर्फ MiG-21 ceremony नहीं बल्कि दुनिया को यह संदेश भी देना है कि वायुसेना में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है।

एसीएम एपी सिंह के पास 5000 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस

मिग-21 केवल एक विमान नहीं बल्कि कई पीढ़ियों के पायलटों की पहचान रहा है। भारतीय वायुसेना के लगभग हर एयर चीफ ने इस विमान को उड़ाया है और इसकी कठिन उड़ानों से खुद को तैयार किया है। वर्तमान एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के पास कुल पांच हजार घंटे से ज्यादा का फ्लाइंग अनुभव है और उन्होंने MiG-21 पर लंबा समय बिताया है। 1984 में कमीशन हुए एसीएम एपी सिंह मिग-21 पर कमांडर रहे थे और 1985 में उन्होंने तेजपुर में टाइप-77 वेरिएंट उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि मिग-21 ने पीढ़ियों को ट्रेनिंग दी है, इसकी एजिलिटी और क्विक एक्सेलरेशन ने ऑपरेशनल फिलॉसफी को प्रभावित किया है। खुद एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने मिग-29 अपग्रेड प्रोजेक्ट भी लीड किया है।

उनके पहले एयर चीफ्स का इतना है फ्लाइंग अनुभव

उनके पूर्ववर्ती एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी (2021-2024) के पास 3,800 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस है, जिसमें मिग-21, मिग-23एमएफ, मिग-29 और सुखोई-30एमकेआई शामिल हैं।

वहीं रिटायर्ड एसीएम आरकेएस भदौरिया (2019-2021) के नाम 26 तरह के विमानों पर 4,250 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस है। जबकि बीएस धनोआ (2016-2019) ने 3,000 घंटे लॉग किए। वे 1999 कारगिल में नंबर 17 स्क्वाड्रन कमांडर रहे, जहां उन्होंने मिग-21 पर सॉर्टी उड़ाईं। उन्होंने 2019 में विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान के साथ अंतिम ट्रेनर सॉर्टी उड़ाई थी।

जबकि उनके पूर्ववर्ती एसीएम अरूप राहा (2013-2016) के 3,400 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस है। उन्होंने मिग-29 स्क्वाड्रन कमांड किया। जबकि एनएके ब्राउन (2012-2013) ने 3,500 घंटे लॉग किए। एक बार MiG-21 ने उनकी जान बचाई थी, जब इंजन फेल होने पर बेली आउट के बजाय इमरजेंसी लैंडिंग की। वहीं उनके भी पूर्ववर्ती पीवी नाइक (2009-2012) के 3,000 घंटे हैं, जिनमें 2,000 घंटे मिग-21 पर बिताए। उन्होंने 1971 युद्ध में भाग लिया और मिग-21 बाइसन अपग्रेड शुरू किया। एफएच मेजर (2007-2009) ने 3,200 घंटे लॉग किए, जिनमें मिग-21 प्रमुख रहा।

उनके पहले एसपी त्यागी (2005-2007) के 3,000 घंटे हैं, और उन्होंने मिग-21 पर खूब सोलो सॉर्टी उड़ाईं। 1980 के दशक में बॉर्डर टेंशन के दौरान कमांड किया।

जबकि उनके पहले प्रदीप वासंत नाइक (2009-2011) के पास 3,000 घंटे काा फ्लाइंग एक्सपीरियंस रहा। उन्होंने मिग-21 के सभी वैरियंट्स पर उड़ान भरी। साथ ही, उन्होंने 1971 युद्ध में पूर्वी-पश्चिमी सेक्टर में सक्रिय भूमिका भी निभाई थी।

मिग का कॉकपिट किसी राजा की गद्दी से भी ज्यादा कीमती

मिग-21 का सफर भारतीय वायुसेना में लगभग 900 विमानों से शुरू हुआ था। अलग-अलग वेरिएंट्स में इसे शामिल किया गया। दशकों तक यह भारतीय वायुसेना का सबसे बड़ा फाइटर फ्लीट रहा। 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक जीत से लेकर 1999 कारगिल युद्ध में हवाई सुरक्षा तक इसने अपनी क्षमता दिखाई। वहीं, 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद पाकिस्तान के एफ-16 को गिराने वाले मिग-21 बाइसन की सफलता आज भी लोगों को याद है।

पूर्व एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनिस ने “भारतीय वायुसेना के साथ मिग-21 के 50 साल” किताब में लिखा था कि मिग-21 का कॉकपिट किसी राजा की गद्दी से भी ज्यादा कीमती है, क्योंकि यह लड़कों को मर्द और पायलटों को योद्धा बना देता है।

पहला सुपरसोनिक इंटरसेप्टर

1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ मिग-21 सोवियत संघ का पहला सुपरसोनिक इंटरसेप्टर था। जो आने वाले दशकों में भारत की एयर पावर की बैक बोन बना। 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के कई ठिकाने तबाह करने से लेकर करगिल युद्ध और बालाकोट एयरस्ट्राइक तक में मिग-21 ने अपनी क्षमता साबित की। पिछले छह दशकों में 400 से ज्यादा मिग-21 हादसों का शिकार हुए औऱ तकरीबन 200 पायलटों ने अपनी जान गंवाई। बावजूद इसके, भारतीय वायुसेना अपने इस वर्कहॉर्स को लगातार अपग्रेड किया और नए हथियारों की मदद से इसे 21वीं सदी तक ऑपरेशन में बनाए रखा और अब MiG-21 ceremony हो रही है।

MiG-21 Retirement on Sept 26: मिग-21 के साथ खत्म हुई एक परंपरा, पिता ने टेस्ट किया तो बेटे ने दुश्मन का जहाज गिराया

MiG-21 Retirement on Sept 26

MiG-21 Retirement on Sept 26: भारतीय वायुसेना के लिए साल 2025 बेहद अहम रहा है। पहले ऑपरेशन सिंदूर और अब वायुसेना के वर्कहॉर्स के नाम से मशहूर मिग-21 की विदाई भी इसी साल हो रही है। पिछले पांच दशकों से आसमान पर राज करने वाला मिग-21 26 सितंबर को भारतीय वायुसेना को अलविदा कह देगा। इनके साथ ही भारतीय वायुसेना के इतिहास का एक बड़ा अध्याय भी बंद हो जाएगा। भारतीय वायुसेना के इतिहास में शायद मिग-21 ही ऐसा फाइटर जेट रहा है, जिस पर पायलटों की कई पीढ़ियों ने ट्रेनिंग ली है। पिता ने भी मिग-21 को उड़ाया तो बेटे ने भी बाइसन पर ट्रेनिंग लेकर अपने करियर की नींव रखी। ऐसी ही एक कहानी है पाकिस्तान का एफ-16 गिराने वाले अभिनंदन वर्थमान की।

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MiG-21 Retirement on Sept 26: एफ-16 और मिग-21 की यादगार डॉगफाइट

साल 2019 का वह वाकया तो आपको याद होगा, जब बालाकोट एयर स्ट्राइक के अगले दिन भारत-पाकिस्तान के फाइटर जेट्स की डॉग फाइट हुई थी। इसी दौरान जब ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वर्थमान ने पाकिस्तानी एफ-16 को अपने मिग-21 बाइसन से गिराया था। हालांकि उनका विमान भी गिरा और उन्हें पाकिस्तान ने बंदी बना लिया था। उस दौरान उनकी मूंछों वाली तस्वीर खूब वायरल हुई थी। ऐसा इतिहास में पहली बार था जब किसी MiG-21 ने अमेरिका के अत्याधुनिक एफ-16 को निशाना बनाया हो।

MiG-21 Retirement on Sept 26: दादा भी थे वायुसेना में

वहीं उनके पिता एयर मार्शल (रिटायर्ड) सिम्हकुत्ती वर्थमान भी कभी मिग-21 उड़ाते थे। वे चार दशक तक वायुसेना में रहे और कई युद्धों व अभियानों का हिस्सा बने। इससे पहले उनके दादा भी वायुसेना में रहे। यानी वर्थमान परिवार की तीन पीढ़ियां भारतीय आसमान की रखवाली करती रही हैं।

MiG-21 Retirement on Sept 26: 1973 में जॉइन की थी वायुसेना

तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित सैनिक स्कूल अमरावतीनगर से पढ़ाई करने के बाद एयर मार्शल सिम्हकुत्ती वर्थमान ने 1973 में वायुसेना जॉइन की। वे एक कुशल फाइटर पायलट बने और बाद में टेस्ट पायलट के रूप में जाने गए। उनके करियर के कई अहम पड़ाव भारतीय वायुसेना के इतिहास से जुड़े हुए हैं।

पूर्वी क्षेत्र में उन्होंने मिग-21 स्क्वॉड्रन की कमान संभाली। उनकी यूनिट ने 9,500 उड़ानें बिना किसी दुर्घटना के पूरी कीं, जिसके लिए उन्हें 2002 में विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। सिम्हकुत्ती ने MiG-21 के कई वेरिएंट्स जैसे टाइप 77 औऱ बाइसन उड़ाए।

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वे ग्वालियर एयरबेस के चीफ ऑपरेशंस ऑफिसर थे। उनकी प्लानिंग और कॉर्डिनेशन के कारण मिराज-2000 विमानों का इस्तेमाल कर भारत ने पाकिस्तानी ठिकानों को सटीक निशाना बनाया। यह युद्ध भारतीय वायुसेना की क्षमता दिखाने वाला अहम मोड़ था।

बेंगलुरु की एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट (ASTE) में वे चीफ टेस्ट पायलट रहे। यहां उन्होंने मिग-21 सहित कई विमानों की टेस्टिंग की। बाद में 2011 में उन्हें ईस्टर्न एयर कमांड का प्रमुख बनाया गया और 2012 में वे रिटायर हुए। उनकी पत्नी डॉ. शोभा वर्थमान डॉक्टर हैं और बेटी अदिति फ्रांस में रहती हैं।

MiG-21 Retirement on Sept 26: हीरो बनकर लौटे थे अभिनंदन

वहीं, अभिनंदन 2004 में भारतीय वायुसेना में कमीशन हुए और फिर फाइटर पायलट बने। वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के पूर्व छात्र रहे हैं। अभिनंदन ने 16 साल तक मिग-21 उड़ाया और 3,000 से ज्यादा उड़ान घंटे पूरे किए।

26 फरवरी 2019 को भारत ने बालाकोट एयरस्ट्राइक कर पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट किया, तो अगले दिन पाकिस्तानी वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई की और एफ-16 समेत कई लड़ाकू विमान भारतीय सीमा में दाखिल हुए। अभिनंदन ने श्रीनगर एयर बेस से MiG-21 बाइसन से उड़ान भरी। इस दौरान अभिनंदन वर्थमान ने अपने मिग-21 बाइसन के साथ एफ-16 का मुकाबला किया।

उन्होंने हवा में डॉगफाइट कर एक एफ-16 को मार गिराया। लेकिन उनका मिग-21 भी गिरा और उन्हें पाकिस्तान की सीमा में लैंडिंग करनी पड़ी। उन्हें पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया। दो दिन बाद पाकिस्तान ने उन्हें रिहा कर दिया और वे हीरो बनकर लौटे। इस मिशन में उनकी बहादुरी के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके थर्ड जनरेशन मिग-21 ने पुराने डिजाइन के बावजूद फोर्थ जनरेशन एफ-16 जैसे आधुनिक जेट को टक्कर दी।

पिता ने कहे थे ये शब्द

जब अभिनंदन पाकिस्तान की हिरासत में थे तो एयर मार्शल (रिटायर्ड) सिम्हकुत्ती वर्थमान ने अपने बेटे विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान की बहादुरी पर गर्व जताया था। पाकिस्तानी मीडिया में अभिनंदन के इंटरोगेशन वीडियो सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा था, “एक सच्चा सैनिक, देखिए कैसे बहादुरी से बोला। मैं प्रार्थना करता हूं कि उसे प्रताड़ित न किया जाए और वह सुरक्षित लौटे।” वहीं जब अभिनंदन रिहा हुए थे उनके पिता ने कहा, “हमारी प्रार्थनाएं सुन ली गईं,” और उन्होंने उनकी मिग-21 उड़ाने की क्षमता को परिवार का गौरव बताया।

एक युग का अंत!

भारतीय वायुसेना के इतिहास में मिग-21 सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं है, बल्कि यह एक युग के खत्म होने जैसा है। इस विमान ने 1965, 1971 और 1999 के युद्धों में अपनी अहमियत साबित की। इसने पायलटों को वह अनुभव दिया, जिसने उन्हें अनुभवी बनाया। वर्थमान परिवार इसका जीता-जागता उदाहरण है। पिता और पुत्र दोनों ने अलग-अलग समय में इस विमान को उड़ाया। एक ने कारगिल युद्ध के समय प्लानिंग और स्ट्रैटेजी से इतिहास रचा, तो दूसरे ने पाकिस्तानी F-16 को मार गिराकर नई पीढ़ी के सामने साहस का उदाहरण पेश किया।

Navy Chief Sri Lanka Visit: श्रीलंका की पीएम से मिले नेवी चीफ, संयुक्त अभ्यास में और ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाएंगी दोनों देशों की नौसेनाएं

Indian Navy Chief Sri Lanka Visit: Admiral Dinesh K Tripathi strengthens defence ties in Colombo
Indian Peace Keeping Force (IPKF) Memorial in Colombo.

Indian Navy Chief Sri Lanka Visit: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी इन दिनों चार दिवसीय आधिकारिक दौरे पर श्रीलंका में हैं। 22 सितंबर से शुरू हुआ यह दौरा 25 सितंबर तक चलेगा। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और श्रीलंका के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा और समुद्री संबंधों को और अधिक मजबूत करना है।

Navy Chief Sri Lanka Visit: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी श्रीलंका की चार दिवसीय यात्रा पर, गाले डायलॉग 2025 में लेंगे हिस्सा

23 सितंबर को एडमिरल त्रिपाठी ने श्रीलंका की प्रधानमंत्री डॉ. हरिनी अमरसूरिया से मुलाकात की। दोनों के बीच व्यापक स्तर पर रक्षा सहयोग को लेकर चर्चा हुई। जिसमें समुद्री सुरक्षा, क्षमता विकास, प्रशिक्षण और सहयोग के नए रास्ते तलाशने पर खास जोर दिया गया। मुलाकात के दौरान यह भी तय हुआ कि भारत और श्रीलंका की सेनाएं भविष्य में संयुक्त अभ्यास और समुद्री अभियानों में और ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाएंगी।

दौरे के दौरान एडमिरल त्रिपाठी ने श्रीलंका के कई वरिष्ठ सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों से भी मुलाकात की। इनमें डिप्टी डिफेंस मिनिस्टर मेजर जनरल केपी अरुण जयसेकेरा, रक्षा सचिव एयर वाइस मार्शल संपथ थुयाकोंथा (रिटायर्ड), श्रीलंका नेवी के कमांडर वाइस एडमिरल कंचना बनागोडा, श्रीलंका एयर फोर्स के कमांडर एयर मार्शल वीबी एदिरिसिंघे और श्रीलंका आर्मी के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल लसनथा रोड्रिगो शामिल रहे। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और सेवाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाने पर सहमति जताई गई।

एडमिरल त्रिपाठी ने इस दौरे के दौरान श्रीलंका की धरती पर भारतीय शांति सेना के शहीद सैनिकों को भी श्रद्धांजलि दी। उन्होंने 22 सितंबर को कोलंबो स्थित आईपीकेएफ यानी इंडियन पीस कीपिंग फोर्स मेमोरियल पर पुष्पचक्र भी अर्पित किया। इस समारोह ने दोनों देशों के बीच साझा इतिहास और बलिदानों की याद दिलाई।

Indian Navy Chief Sri Lanka Visit
VAdm Kanchana Banagoda, Commander of the Sri Lanka Navy (in Left), Lt Gen Lasantha Rodrigo, Commander of the Sri Lanka Army. (in Right)

23 सितंबर को एडमिरल त्रिपाठी ने कोलंबो स्थित नेशनल डिफेंस कॉलेज में भी संबोधन किया। अपने संबोधन में उन्होंने भारत और श्रीलंका के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रिश्तों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बदलती वैश्विक समुद्री परिस्थितियों, तकनीकी बदलावों और ग्रे-जोन खतरों का उल्लेख करते हुए तीन मुख्य बिंदुओं पर जोर देते हुए विश्वसनीय क्षमता, गहन सहयोग और तकनीकी परिवर्तन पर बात की। उन्होंने यह भी बताया कि भारत और श्रीलंका ने मिलकर एंटी-पाइरेसी मिशनों और नारकोटिक्स इंटरडिक्शन ऑपरेशनों में सफलता हासिल की है। SLINEX (श्रीलंका-इंडिया नेवल एक्सरसाइज) और गोवा मैरिटाइम सेमिनार जैसे प्लेटफॉर्म्स को भी उन्होंने दोनों देशों की साझा दक्षता का अहम हिस्सा बताया।

दौरे के दौरान भारतीय नौसेना का स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस सतपुड़ा भी कोलंबो में मौजूद रहा। इस जहाज पर 22 सितंबर को डेक रिसेप्शन आयोजित किया गया, जिसकी मेजबानी खुद नौसेना प्रमुख एडमिरल त्रिपाठी ने की। इस कार्यक्रम में श्रीलंका के न्याय और राष्ट्रीय एकीकरण मंत्री हर्षना ननायक्कारा मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। भारत के उच्चायुक्त संतोष झा भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।

भारतीय नौसेना और श्रीलंका नौसेना के बीच लंबे समय से मजबूत सहयोग रहा है। दोनों देश हर साल सालाना डिफेंस टॉक्स, स्टाफ टॉक्स और संयुक्त अभ्यासों जैसे SLINEX यानी श्रीलंका-इंडिया नेवल एक्सरसाइज, पासेज एक्सरसाइज और हाइड्रोग्राफी सहयोग में हिस्सा लेते रहे हैं। इसके अलावा दोनों नौसेनाएं बहुपक्षीय आयोजनों जैसे इंडियन ओशन नेवल सेमिनार, गॉल डायलॉग, मिलन और कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव में भी सक्रिय रूप से शामिल होती हैं।

इस दौरे का एक अहम हिस्सा गॉल डायलॉग 2025 भी है। यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री सम्मेलन 12वीं बार आयोजित किया जा रहा है, जिसका विषय है, “बदलती गतिशीलता के तहत हिंद महासागर का समुद्री परिदृश्य”। इस सम्मेलन में एडमिरल त्रिपाठी भारत की तरफ से हिस्सा लेंगे और क्षेत्रीय समुद्री चुनौतियों, बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्यों और सहयोग की संभावनाओं पर विचार साझा करेंगे।

श्रीलंका दौरे का एक और महत्वपूर्ण पहलू भारत और श्रीलंका के बीच बढ़ते औद्योगिक सहयोग का है। मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) श्रीलंका की सबसे बड़ी शिपबिल्डिंग और रिपेयर कंपनी कोलंबो डॉकयार्ड पीएलसी (CDPLC) में हिस्सेदारी हासिल करने की प्रक्रिया में है। इसे भारतीय महासागर क्षेत्र में भारत की औद्योगिक मौजूदगी को मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है।

एडमिरल त्रिपाठी का यह दौरा भारत-श्रीलंका संबंधों को एक नई ऊर्जा देने वाला माना जा रहा है। समुद्री सुरक्षा, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग पर हुई चर्चाएं आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की गहराई को और बढ़ाने वाली हैं।

Indian Navy Androth: समंदर में एंटी-सबमरीन वॉरफेयर को मिलेगी मजबूती, इस दिन भारतीय नौसेना में शामिल होगा ‘अंद्रोथ’

Indian Navy Androth
Indian Navy Androth

Indian Navy Androth: भारतीय नौसेना 6 अक्टूबर 2025 को अपनी नई एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट ‘अंद्रोथ’ (Androth) को औपचारिक रूप से शामिल करने जा रही है। विशाखापट्टनम के नेवल डॉकयार्ड में होने वाले इस कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता ईस्टर्न नेवल कमांड के प्रमुख वाइस एडमिरल राजेश पेंढरकर करेंगे। यह सोलह जहाजों की सीरीज का दूसरा जहाज है जिसे नौसेना में शामिल किया जा रहा है।

Indian Navy Expansion: भारतीय नौसेना को 2027 तक मिलेंगे 25 नए युद्धपोत, एंटी सबमरीन वॉरफेयर के लिए कर रही है बड़ी तैयारी

अंद्रोथ का निर्माण कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड ने किया है। इसमें 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी उपकरण और तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। इस जहाज को 13 सितंबर 2025 को भारतीय नौसेना को सौंपा गया था। यह प्रोजेक्ट डायरेक्टरेट ऑफ शिप प्रोडक्शन और वारशिप ओवरसीइंग टीम, कोलकाता की निगरानी में तैयार हुआ है।

इस नए युद्धपोत का नाम लक्षद्वीप द्वीप समूह के ‘अंद्रोथ द्वीप’ से लिया गया है। इसका नाम भारत की सामरिक सोच और समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इससे पहले आईएनएस अंद्रोथ (P69) भारतीय नौसेना में 27 साल तक सेवा दे चुका है। नया अंद्रोथ पुराने जहाज को रिप्लेस करेगा।

Indian Navy Androth
Indian Navy Androth

नया अंद्रोथ अत्याधुनिक हथियार और सेंसर सिस्टम, आधुनिक संचार प्रणाली और वॉटरजेट प्रोपल्शन से लैस है। यह जहाज पानी के भीतर छिपे खतरों को पहचानने, उनका पीछा करने और उन्हें तबाह करने की क्षमता रखता है। यह न केवल एंटी-सबमरीन वॉरफेयर में काम आएगा, बल्कि मैरिटाइम सर्विलांस, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन, और कोस्टल डिफेंस मिशन जैसे अहम कार्य भी करेगा।

Indian Navy Expansion: भारतीय नौसेना को 2027 तक मिलेंगे 25 नए युद्धपोत, एंटी सबमरीन वॉरफेयर के लिए कर रही है बड़ी तैयारी

Indian Navy Expansion: 25 New Warships to Join Fleet by 2027 Amid Indo-Pacific Tensions
Source: Indian Navy (File Photo)

Indian Navy Expansion: भारतीय नौसेना आने वाले तीन वर्षों में 25 नए जहाजों को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है। इसके साथ ही 2027 तक भारतीय नौसेना की ताकत 150 जहाजों तक पहुंच जाएगी। रक्षा सूत्रों के अनुसार, इस समय देश में 54 जहाजों के निर्माण का काम चल रहा है, जो अगले छह से सात सालों में नौसेना का हिस्सा बनेंगे। यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते तनाव और हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी के चलते किया जा रहा है।

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सूत्रों ने बताया कि इन 25 जहाजों में चार वॉरशिप प्रोजेक्ट 17A से जुड़े हैं। इनमें से एक इस साल के आखिर तक तक और बाकी 2026 और 2027 में नौसेना को सौंप दिए जाएंगे। इसके अलावा दो सर्वे वेसल भी अगले दो वर्षों में कमीशन किए जाएंगे। ये जहाज समुद्री सीमाओं की जांच, पोर्ट और हार्बर सर्वे, ओशनोग्राफिक और जियो-ग्राफिकल डेटा इकट्ठा करने में सक्षम होंगे, जो रक्षा जरूरतों के लिए जरूरी है।

भारतीय नौसेना की पनडुब्बी रोधी क्षमता यानी एंटी सबमरीन वॉरफेयर को बढ़ाने के लिए 14 नए जहाज भी अगले छह से सात वर्षों में शामिल किए जाएंगे। ये जहाज अत्याधुनिक सेंसर और हथियारों से लैस होंगे, जो दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करने में सक्षम होंगे।

इसके अलावा एक डाइविंग सपोर्ट वेसल आईएनएस निपुण भी इस साल नौसेना में शामिल किया जाएगा। इसका निर्माण लार्सन एंड टूब्रो कर रही है। इसी दौरान दो मल्टीपर्पज वेसल भी नौसेना को मिलेंगे। कोलकाता स्थित टिटागढ़ कंपनी पांच छोटे डाइविंग सपोर्ट वेसल बना रही है, जिनमें से एक अगले महीने कमीशन हो जाएगा। ये 30 मीटर लंबे जहाज आधुनिक डाइविंग उपकरणों से लैस हैं और कोस्टल ऑपरेशन के लिए बनाए जा रहे हैं।

नौसेना के ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत करने के लिए तीन नए कैडेट ट्रेनिंग शिप्स बनाए जा रहे हैं। इन्हें एलएंडटी बना रही है। वहीं, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड मिलकर 11 नेक्स्ट जनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल का निर्माण कर रहे हैं।

विशाखापट्टनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड पांच फ्लीट सपोर्ट शिप्स का निर्माण कर रहा है, जो नौसेना की लंबी दूरी की तैनाती और ऑपरेशंस को सपोर्ट करेंगे। यह पूरी योजना भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण अभियान का हिस्सा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियां, जिबूती में उसका नेवल बेस और हिंद महासागर क्षेत्र में उसके युद्धपोतों और पनडुब्बियों की तैनाती के चलते ही भारत तेजी से अपनी नौसेना को और मजबूत बना रहा है।

जिसके चलते 2027 तक भारतीय नौसेना न केवल संख्या के लिहाज से बड़ी होगी, बल्कि तकनीकी रूप से भी और अधिक आधुनिक और सक्षम होगी। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी शिपयार्ड इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, जिससे भारत की सामरिक ताकत और औद्योगिक क्षमता दोनों को मजबूती मिलेगी।

India Su-57 Fighter Jets: ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना को हुई थी ये दिक्कत, इसलिए चाहिए Su-57 फाइटर जेट्स, 2026 तक आएगा S-400

India Su-57 Fighter Jets and S-400

India Su-57 Fighter Jets: भारत अब रूस के Su-57 फाइटर जेट्स खरीदने को लेकर फिर से गंभीरता से विचार कर रहा है। रूस ने भारत को Su-57 फाइटर जेट्स की सप्लाई और भारत में इनके लोकल प्रोडक्शन का प्रस्ताव भेजा है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव में भारत की एयरोस्पेस कंपनियों को शामिल करने की संभावना भी है। साथ ही, रूस ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत को दिए जा रहे पांच एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम्स की डिलीवरी 2026 तक पूरी कर दी जाएगी। यह डील 2018 में दोनों देशों के बीच हुई थी और अब यह अंतिम चरण में है।

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India Su-57 Fighter Jets: दो स्क्वॉड्रन एसयू-57 खरीदने पर विचार

सूत्रों का कहना है कि भारत रूस से कम से कम दो स्क्वॉड्रन एसयू-57 खरीदने पर विचार कर रहा है। इनमें से कुछ विमान सीधे रूस से आएंगे और बाकी का निर्माण भारत में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड करेगी। एचएएल पहले से ही रूस के सुखोई ब्यूरो के साथ काम कर रही है। एचएएल की नासिक स्थित फैक्ट्री में इन विमानों का निर्माण संभव हो सकता है।

रूस की ओर से प्रस्ताव है कि 2 स्क्वॉड्रन उड़ान भरने की तैयार हालत में आएंगे और जबकि 3 से 5 स्क्वॉड्रन भारत में ही बनाए जा सकते हैं।

भारत ने क्यों किया FGFA प्रोग्राम से बाहर निकलने का फैसला

दिलचस्प बात यह है कि 2018 में भारत ने रूस के साथ मिलकर चल रहे फिफ्थ जनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट (FGFA) प्रोग्राम से खुद को अलग कर लिया था। उस समय कई वजहें थीं। पहली बड़ी वजह लागत थी। भारत ने शुरुआती डिजाइन स्टेज में ही करीब 1,483 करोड़ रुपये (295 मिलियन अमेरिकी डॉलर) लगाए थे। लेकिन 127 विमानों के लिए आगे का खर्चा लगभग 35 अरब डॉलर तक पहुंच जाता। प्रति विमान लागत 150 से 200 मिलियन डॉलर तक जा सकती थी।

दूसरी बड़ी समस्या परफॉर्मेंस की थी। एसयू-57 के एएल-41एफ1 इंजन में असली सुपर क्रूज क्षमता नहीं थी। उस समय भारतीय वायुसेना ने सुपर क्रूज (बिना आफ्टरबर्नर लगातार सुपरसोनिक उड़ान भरने की क्षमता) को कमजोर माना था। नए इंजन इजडेलिये-30 का वादा तो किया गया था, लेकिन उपलब्ध नहीं हो पाया।

तीसरी समस्या स्टेल्थ डिजाइन की थी। यह केवल सामने के 60 डिग्री आर्क तक स्टेल्थ रहता था। यानी चौथी पीढ़ी के सुखोई-30 के मुकाबले कोई बड़ा फायदा नहीं था। एक और बड़ी चुनौती थी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर। रूस अहम तकनीक साझा करने को तैयार नहीं था, जबकि भारत जॉइंट-प्रोडक्शन चाहता था।

2018 में भारत के बाहर निकलने के बाद भी रूस ने इस विमान को सीमित स्तर पर ही अपनाया। 2023 तक रूस के पास केवल दो दर्जन एसयू-57 फाइटर जेट थे। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी इसका प्रदर्शन खास प्रभावी नहीं रहा। यही वजह थी कि भारत ने इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए थे।

India Su-57 Fighter Jets: आईएएफ को चाहिए लॉन्ग रेंज स्ट्राइक पावर

मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना को अहसास हुआ कि पाकिस्तान के खिलाफ लंबी दूरी तक स्ट्राइक करने की क्षमता नहीं है। भारतीय वायुसेना के पास राफेल और सुखोई-30 जैसे ताकतवर विमान तो थे, लेकिन वे लंबी रेंज तक मार नहीं सकते थे। जिसके बाद एसयू-57 पर फोकस किया गया। हालांकि यह पूरी तरह से फिफ्थ जनरेशन विमान नहीं है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत है हथियार ले जाने की क्षमता और लंबी रेंज।

एसयू-57 में R-37M एयर टू एयर मिसाइल लग सकती है, जिसकी रेंज 300 किलोमीटर से ज्यादा है। यानी दुश्मन को बेहद दूर से निशाना बनाया जा सकता है। भारतीय वायुसेना सुखोई-30 अपग्रेड में भी इसी मिसाइल को शामिल करने की योजना बना रही है।

इसके अलावा एसयू-57 में किंझल (Kinzhal) हाइपरसोनिक एयर-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइल भी लग सकती है। यह हाई-वैल्यू टारगेट को तेजी और सटीकता से मार गिराने की क्षमता देती है।

सूत्रों का कहना है कि एसयू-57 का इस्तेमाल स्टेल्थ के लिए नहीं, बल्कि लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक प्लेटफॉर्म के तौर पर होगा। इसका वेपन बे और लॉन्ग रेंज क्षमता इसे डीप-स्ट्राइक मिशन के लिए मुफीद बनाती है, जो आईएएफ की असल जरूरत है।

यह वायुसेना की मौजूदा राफेल और सुखोई-30 स्क्वॉड्रन की मदद करेगा। खासतौर पर तब, जब चीन ने पाकिस्तान को अपना जे-31 स्टेल्थ फाइटर देने की पेशकश की है।

बता दें कि एसयू-57 का प्रस्ताव अलग है और इसे MRFA यानी मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम से नहीं जोड़ा गया है। MRFA के तहत भारतीय वायुसेना राफेल को प्राथमिकता दे रही है।

2026 तक एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी

रूस ने इसके अलावा भारत को भरोसा दिलाया है कि 2026 तक एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी पूरी कर दी जाएगी। 2018 में 5.5 अरब डॉलर का यह सौदा हुआ था। अभी तक तीन यूनिट मिल चुकी हैं और बाकी दो 2026 और 2027 तक आएंगी।

सूत्रों के अनुसार भारत और रूस के बीच अतिरिक्त एस-400 सिस्टम्स पर भी बातचीत चल रही है। रूस की तरफ से यह प्रस्ताव भी आया है कि ट्रायम्फ का प्रोडक्शन भारत में शुरू किया जाए।

माना जा रहा है कि इस साल के आखिरी में होने वाली रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत के यात्रा के दौरान इन समझौतों को अमली जामा पहनाया जा सकता है।

भारत और रूस की रक्षा साझेदारी दशकों पुरानी है। टैंक से लेकर मिसाइल और एयरक्राफ्ट तक, दोनों देशों ने मिलकर कई प्रोजेक्ट पूरे किए हैं। टी-90 टैंक, सुखोई-30 फाइटर जेट, ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम और एके-203 राइफल्स इसका उदाहरण हैं। भारतीय नौसेना का एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य भी रूस से मिला है।

बता दें कि हाल ही में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात हुई थी। दोनों नेताओं ने मुश्किल हालात में भी साथ खड़े होने का संदेश दिया था। वहीं, रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कहा था कि भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से संसाधन खरीदना बंद नहीं किया, जिससे रूस भारत को अपना सच्चा दोस्त मानता है।