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Indian Navy Amphibious Warships: 80 हजार करोड़ का सौदा; नौसेना को मिलेंगे चार मेगा लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक वारशिप्स

Indian Navy MDL Projects:
INS Jalashwa

Indian Navy Amphibious Warships: भारतीय नौसेना अपनी सामरिक क्षमताओं को और मजबूत करने के लिए जल्द ही चार बड़े साइज वाले एंफीबियस वॉरशिप्सके निर्माण के लिए लगभग 80,000 करोड़ रुपये का टेंडर जारी करने जा रही है। इन जहाजों को लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (LPD) कहा जाता है।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि इस प्रस्ताव को उच्च-स्तरीय बैठक में जल्द ही मंजूरी दी जाएगी। इस अनुबंध में भारतीय शिपबिल्डर्स यानी लार्सन एंड टुब्रो, मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड प्रमुख दावेदार होंगे। इन भारतीय शिपयार्ड्स को अंतरराष्ट्रीय डिजाइन पार्टनर्स के साथ मिलकर जहाजों का निर्माण करना होगा। इसमें नवानिया (स्पेन), नेवल ग्रुप (फ्रांस) और फिनकैंटिएरी (इटली) जैसे ग्लोबल शिपबिल्डर डिजाइन सहयोग दे सकते हैं।

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भारतीय नौसेना लंबे समय से अपनी एम्फीबियस वॉरफेयर क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इन जहाजों से न केवल तटीय इलाकों में सैनिकों और हथियारों की तैनाती की जा सकेगी, बल्कि इन्हें ह्यूमेनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ (HADR) मिशनों के लिए भी इस्तेमाल किया जाएगा।

चीन के पास 13 जहाज

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एम्फीबियस वारशिप्स का महत्व लगातार बढ़ रहा है। चीन की नौसेना के पास 13 से अधिक अत्याधुनिक एम्फीबियस जहाज हैं, जिनमें टाइप 075 LHD और टाइप 071 LPD शामिल हैं।

वर्ष 2021 से 2025 के बीच चीन ने चार टाइप 075 लैंडिंग हेलीकॉप्टर डॉक जहाज कमीशन किए हैं। इनमें सीएनएस हैनान, गुआंग्शी, अनहुई और हुबेई हैं। लगभग 36,000 टन वजनी ये जहाज 30 हेलीकॉप्टर्स, 1,200 सैनिक और कई लैंडिंग क्राफ्ट ले जाने में सक्षम हैं।

इसके अलावा, चीन के पास आठ से अधिक टाइप 071 लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक युझाओ क्लास जहाज भी हैं। ये 25,000 टन के युद्धपोत चार हेलीकॉप्टर्स, 60 बख्तरबंद वाहन और 800 सैनिक ले जा सकते हैं।

चीन ने दिसंबर 2024 में पहला टाइप 076 लैंडिंग हेलीकॉप्टर असॉल्ट जहाज सीएनएस सिचुआन लॉन्च किया था, जिसके 2025 में कमीशन होने की उम्मीद है। 40,000 टन वजनी यह जहाज ड्रोन और फिक्स्ड-विंग विमानों को ले जाने में सक्षम है।

वहीं, पाकिस्तान नौसेना के पास कोई बड़ा LPD या LHD नहीं है, सिर्फ कुछ छोटे लैंडिंग क्राफ्ट हैं, जो बड़े अभियान के लिए नाकाफी हैं।

नौसेना के पास सीमित LPD

वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास सीमित संख्या में ही एम्फीबियस जहाज हैं। आईएनएस जलाश्व (L41), जो अमेरिका से खरीदा गया ऑस्टिन-क्लास एलपीडी है, नौसेना की मुख्य ताकत है। आईएनएस जलाश्व 16,590 टन वजनी है और 2007 में कमीशन हुआ था। यह 900 सैनिक, चार लैंडिंग क्राफ्ट और हेलीकॉप्टर्स ले जाने में सक्षम है। इसके अलावा चार लैंडिंग शिप टैंक (LST) भी हैं। इनमें मगर क्लास का आईएनएस घड़ियाल (L23, 1997) तथा शार्दुल क्लास के आईएनएस शार्दुल (L16, 2007), आईएनएस केसरी (L15, 2008) और आईएनएस एरावत (L24, 2009) हैं। प्रत्येक जहाज 8 टैंक या 500 सैनिक ले सकता है। इनके साथ 8 एलसीयू Mk-IV जहाज भी ऑपरेशन में हैं। लेकिन बड़े पैमाने के अभियान के लिए ये नाकाफी हैं।

इनमें से अधिकतर पुराने हैं। नए लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक आने से भारत इस क्षेत्र में चीन के मुकाबले अपनी ताकत बढ़ा सकेगा और पाकिस्तान पर भारी बढ़त बनाए रखेगा। नए लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (LPD) बनने के बाद नौसेना को समुद्र से तट पर बड़े पैमाने पर सैनिकों, टैंकों और हेलीकॉप्टरों को ले जाने की क्षमता मिलेगी। इन जहाजों में आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम, लंबी दूरी की एंटी-शिप मिसाइलें और ड्रोन भी होंगे।

2021 में जारी की थी आरएफआई

भारतीय नौसेना ने वर्ष 2021 में एलपीडी प्रोजेक्ट के लिए आरएफआई जारी की थी। नौसेना चाहती है कि ये युद्धपोत आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम्स से लैस हों, ताकि किसी भी हवाई खतरे से पूरी तरह सुरक्षा की जा सके। इन जहाजों में आक्रामक क्षमता भी होगी, जिनमें लॉन्ग-रेंज एंटी-शिप मिसाइल्स और ड्रोन शामिल होंगे।

नौसेना की योजना है कि ये वारशिप्स “आउट-ऑफ-एरिया कंटिन्जेंसी ऑपरेशंस” करने में सक्षम हों, यानी वे बड़े पैमाने पर सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों को समुद्र से तट तक पहुंचाकर ऑपरेशन चला सकें। इसके अलावा, इन एम्फीबियस वारशिप्स का उपयोग मानव सहायता और डिज़ास्टर रिलीफ ऑपरेशंस में भी किया जाएगा, ताकि प्राकृतिक आपदाओं या संकट की स्थिति में तुरंत मदद पहुंचाई जा सके।

2004 की सुनामी और 2015 के नेपाल भूकंप जैसी आपदाओं के दौरान भारतीय नौसेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भविष्य में लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक जैसे जहाजों से यह क्षमता और बढ़ेगी।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन नए जहाजों से भारत को न केवल हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी, बल्कि यह पड़ोसी देशों के साथ मानवीय सहायता और आपदा प्रबंधन सहयोग में भी अहम साबित होंगे।

Navy Chief Sri Lanka Visit: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी श्रीलंका की चार दिवसीय यात्रा पर, गाले डायलॉग 2025 में लेंगे हिस्सा

Navy Chief Sri Lanka Visit

Navy Chief Sri Lanka Visit: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी 22 से 25 सितंबर तक श्रीलंका की चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर हैं। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सहयोग को और गहरा करना और सुरक्षा साझेदारी को मजबूत बनाना है।

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यात्रा के दौरान एडमिरल त्रिपाठी श्रीलंका की प्रधानमंत्री हरीनी अमरसूरिया से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा वे श्रीलंका के तीनों सेनाध्यक्षों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ द्विपक्षीय बातचीत करेंगे। इन चर्चाओं का फोकस मैरीटाइम सिक्योरिटी, सैन्य क्षमता में वृद्धि, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग के नए रास्तों की पहचान पर रहेगा।

नौसेना ने सोमवार को बताया कि इस यात्रा के दौरान होने वाली बातचीत से दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के ढांचे को और मजबूती मिलेगी। भारत और श्रीलंका समुद्र से जुड़े कई साझा मुद्दों पर पहले से मिलकर काम कर रहे हैं और यह यात्रा उस दिशा में एक अहम कदम है।

एडमिरल त्रिपाठी इस दौरान गाले डायलॉग 2025 (Galle Dialogue 2025) में भी हिस्सा लेंगे। यह एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री सम्मेलन है, जिसका आयोजन कोलंबो में किया जा रहा है। इस सम्मेलन का विषय है – बदलती परिस्थितियों में हिंद महासागर का समुद्री परिदृश्य। इसमें क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर समुद्री सुरक्षा, सहयोग और नई चुनौतियों पर चर्चा होगी।

भारतीय नौसेना और श्रीलंका नौसेना के बीच नियमित तौर पर गहरे संबंध और बातचीत होती रही है। दोनों देश सालाना डिफेंस डॉयलॉग, स्टाफ टॉक्स और अन्य ऑपरेशनल आदान-प्रदान के जरिए लगातार सहयोग कर रहे हैं। इसमें सबसे अहम है श्रीलंका-इंडिया नेवल एक्सरसाइज (SLINEX), जहां दोनों देशों की नौसेनाएं साझा अभ्यास करती हैं। इसके अलावा प्रशिक्षण, हाइड्रोग्राफी और समुद्री मानचित्रण के क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है।

इनके अलावा दोनों नौसेनाएं इंडियन ओशन नेवल सिंपोजियम, गाले डायलॉग, मिलन, गोवा मैरीटाइम कॉन्क्लेव और कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव जैसे आयोजनों में भी सक्रिय रूप से भाग लेती हैं।

New Terror Outfit: दुनिया को धोखा देने के लिए पाकिस्तान ने कश्मीर में खड़ा किया नया आतंकी संगठन! एक दिन में बदला प्रवक्ता

Mountain Warriors of Kashmir: New Terror Outfit Emerges in Pakistan
Lashkar e Taiba LeT commander Saifullah Kasuri

New Terror Outfit: पांच महीने पहले हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान की सरजमीं पर बने आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया था। बावजूद इसके पाकिस्तान का कारगुजारियां अभी भी जारी हैं। एक तरफ जहां पाकिस्तान आतंकी ढाचों के पुनर्निर्माण में लगा हुआ है, तो दूसरी तरफ नए आतंकी संगठन भी बना रहा है। अब पाकिस्तान से एक नया आतंकी संगठन सामने आया है, जिसने खुद को “माउंटेन वॉरियर्स ऑफ कश्मीर” (MWK) नाम दिया है। इस नए नाम का मकसद एक बार फिर आतंक को कश्मीरियत और आजादी की आड़ में छिपाकर पेश करना है।

Relocation of terror camps: ऑपरेशन सिंदूर के बाद जैश-हिजबुल के ठिकाने पीओके से खैबर पख्तूनख्वा हुए शिफ्ट, 25 सितंबर को पेशावर में बड़ी भर्ती की तैयारी में आतंकी

New Terror Outfit: एक दिन में बदल दिया प्रवक्ता

11 सितम्बर को जारी प्रेस रिलीज में इस संगठन ने खुद को “हम माउंटेन वॉरियर्स ऑफ कश्मीर, युद्ध के मैदान में अपनी एंट्री की घोषणा करते हैं…हम अपनी जान को आजादी की लड़ाई में न्यौछावर करने की कसम खाते हैं” कहकर पेश किया। बयान पर हस्ताक्षर अहमद हनन नामक प्रवक्ता के थे। लेकिन अगले ही दिन 12 सितम्बर को जारी प्रेस रिलीज में संगठन का प्रवक्ता दानिश भट को दिखाया गया। सूत्रों का कहना है कि यह संगठन जबरदस्ती अपनी पहचान को ‘कश्मीरी मूल’ से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।

Mountain Warriors of Kashmir: New Terror Outfit Emerges in Pakistan
Destroyed Terror outfit during Operation Sindoor

New Terror Outfit: नाम बदलने की नई चाल

आतंकी संगठनों की यह पुरानी रणनीति रही है कि वे खुद को नया चेहरा देकर कश्मीर से जुड़ा बताते हैं। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे नाम आतंकी गतिविधियों के चलते दुनियाभर में बदनाम हो चुके हैं। इसलिए अब वे नए नामों से सामने आ रहे हैं, जैसे पीपुल्स एंटी फासीस्ट फ्रंट (PAFF), द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF), कश्मीर टाइगर्स (KT) और अब माउंटेन वॉरियर्स ऑफ कश्मीर। लेकिन असलियत में ये सब पुराने संगठनों के ही मुखौटे हैं।

New Terror Outfit: पाकिस्तान की आईएसआई है पीछे

भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि नाम बदलने की यह कवायद महज एक धोखा है। एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि द रेसिस्टेंस फ्रंट भले ही एक अलग संगठन दिखाई देता हो, लेकिन असल में यह लश्कर-ए-तैयबा की ही ब्रांच है। इसके लीडरशिप, हथियारों की खरीद, ट्रेनिंग मॉड्यूल और ठिकाने सब लश्कर के ही नेटवर्क से जुड़े हैं, जिनका संचालन पाकिस्तान की आईएसआई करती है।

2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद द रेसिस्टेंस फ्रंट को जन्म दिया गया था, ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचा जा सके और यह जताया जा सके कि आतंकी गतिविधियां कश्मीरियों की स्थानीय पहल है। अब यही पैटर्न नए संगठन माउंटेन वॉरियर्स ऑफ कश्मीर यानी MWK के साथ भी अपनाया जा रहा है।

New Terror Outfit: आतंकियों को टेंपरेरी किया शिफ्ट

पाकिस्तान सरकार ने लश्कर-ए-तैयबा के पुनर्निर्माण में भी सीधा सहयोग दिया है। जानकारी के अनुसार, पाक सरकार ने 4 करोड़ पाकिस्तानी रुपये देकर लश्कर के मुख्यालय मरकज तैयबा (मुरीदके) को फिर से खड़ा करने की अनुमति दी है। यह वही मुख्यालय है, जिसे भारतीय वायुसेना ने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर में तबाह कर दिया था।

अस्थायी तौर पर लश्कर के कैडर्स को मरकज अक्सा (बहावलपुर) और जुलाई से मरकज यरमौक (पटोकी, जिला कसूर) में शिफ्ट किया गया है। यहां उनकी ट्रेनिंग और ठहरने की व्यवस्था की जा रही है। इस पूरी व्यवस्था की निगरानी अब्दुल राशिद मोहसिन कर रहा है, जो लश्कर के डिप्टी चीफ सैफुल्लाह कसूरी का करीबी है।

New Terror Outfit: चाहिए 15 करोड़ रुपये

लश्कर-ए-तैयबा फरवरी 2026 तक, यानी कश्मीर सॉलिडैरिटी डे या योम-ए-यकजहती कश्मीर से पहले, अपने मुख्यालय का निर्माण पूरा करना चाहता है। भारतीय खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लश्कर को लगभग 15 करोड़ पाकिस्तानी रुपये की जरूरत है, लेकिन उसके पास अभी पर्याप्त धनराशि नहीं है। संगठन फिलहाल अपने आंतरिक संसाधनों और बाहरी सहयोग से फंड जुटाने की कोशिश कर रहा है। यह पुनर्निर्माण कार्य मरकज तैयबा के चीफ मौलाना अबू जार, लश्कर-ए-तैयबा का मुख्य प्रशिक्षक उस्तादुल मुजाहिद्दीन और कमांडर (ऑपरेशनल ओवरसाइट) यूनुस शाह बुखारी की निगरानी में हो रहा है।

जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान बार-बार नाम बदलकर और नए संगठन खड़े कर, आतंकी गतिविधियों को छिपाने की कोशिश करता है। लेकिन असलियत वही रहती है कि इन सबका संचालन पाकिस्तान की धरती से होता है और इन्हें सीधे आईएसआई की मदद मिलती है। एमडब्ल्यूके भी उसी सिलसिले की नई कड़ी है।

MiG-21 record flying hours: इस पायलट के लिए मां की तरह था मिग-21! रिकॉर्ड 4000 घंटे भरी उड़ान, 83 साल की उम्र में जताई आखिरी सॉर्टी की इच्छा

MiG-21 record flying hours

MiG-21 record flying hours: भारतीय वायुसेना के इतिहास में कुछ नाम ऐसे दर्ज होते हैं, जो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक युग का प्रतीक बन जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है रिटायर्ड एयर कोमोडोर सुरेंद्र सिंह त्यागी, जिन्हें उनके साथी पायलट “बंडल” नाम से पुकारते थे। वे भारतीय वायुसेना के ऐसे फाइटर पायलट रहे, जिन्होंने दुनिया में सबसे ज्यादा मिग-21 पर उड़ान भरकर इतिहास रचा।

MiG21 in 1965 War: जब 1965 की जंग में मिग-21 ने पहली बार दिखाई अपनी सुपरसोनिक पावर, हकला गया था पाकिस्तानी एयर फोर्स का स्क्वॉड्रन लीडर

उन्होंने अकेले इस एक विमान पर 4003 घंटे से अधिक और 6316 सॉर्टिज (उड़ान मिशन) पूरे करना अपने आप में ऐसा कीर्तिमान है जिसे कोई और छू भी नहीं सका। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि आज भी यह विश्व रिकॉर्ड बना हुआ है। यहां तक कि रूसी सरकार से मिग-21 पर रिकॉर्ड उड़ान के लिए 2013 में उन्हें ट्रॉफी भी दी थी।

MiG-21 record flying hours
Air Commodore Surendra Singh Tyagi (Photo: Anchit Gupta on X)

MiG-21 record flying hours: मिग-21 के साथ जीवनभर का रिश्ता

साल 1965 में 92वें पायलट कोर्स से कमीशन पाकर सुरेंद्र सिंह त्यागी भारतीय वायुसेना में शामिल हुए। यह दौर बेहद चुनौतीपूर्ण था। चीन के साथ 1962 का युद्ध और पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग ने भारत को सिखा दिया था कि वायुसेना की ताकत को लगातार बढ़ाना होगा। इसी समय भारत ने सोवियत संघ से MiG-21 जैसे सुपरसोनिक जेट को अपनी स्क्वाड्रन में शामिल किया।

त्यागी का भाग्य भी उसी समय उन्हें मिग-21 के करीब ले आया। 17 जुलाई 1968 को उन्होंने पहली बार चंडीगढ़ स्थित 45 स्क्वाड्रन में मिग-21 उड़ाया। उस समय पायलट्स हंटर और वैम्पायर जैसे ट्रांसोनिक एयरक्राफ्ट उड़ा रहे थे। MiG-21 की स्पीड और ताकत ने युवा त्यागी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने खुद कहा था कि “जब आफ्टरबर्नर के साथ मिग-21 रनवे से उठा तो ऐसा लगा जैसे मैं अर्जुन के धनुष से निकला हुआ बाण हूं।” उस पहली उड़ान के बाद जो रिश्ता बना, वह जीवनभर कायम रहा।

MiG-21 record flying hours: 1971 का भारत-पाक युद्ध बना टर्निंग पॉइंट

1971 का भारत-पाक युद्ध त्यागी के करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उस समय वे तेजपुर एयरबेस से ऑपरेट कर रहे थे। इस युद्ध के दौरान उन्होंने अकेले 22 सॉर्टीज उड़ाईं। उनकी स्क्वाड्रन ने बांग्लादेश में दुश्मन के ठिकानों पर बमबारी की और ढाका एयरबेस को तबाह कर दिया। भारतीय वायुसेना ने पहली बार दिखाया कि MiG-21 सिर्फ इंटरसेप्टर नहीं बल्कि बल्कि मल्टी-रोल फाइटर जेट है, ग्राउंड अटैक, रिकॉनसेंस मिशन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तक हर भूमिका निभा सकता है।

MiG-21 record flying hours
Air Commodore Surendra Singh Tyagi (Photo: Anchit Gupta on X)

MiG-21 record flying hours: फाइटर कॉम्बैट लीडर और ट्रेनर

एयर कॉमोडोर त्यागी ने केवल खुद मिग-21 पर उड़ान नहीं भरी बल्कि अनगिनत पायलटों को प्रशिक्षित भी किया। वे फाइटर कॉम्बैट लीडर (FCL) बने और एयर-टू-एयर कॉम्बैट के साथ-साथ एयर-टू-ग्राउंड वेपन ट्रेनिंग भी दी। उन्होंने भारतीय वायुसेना की कई स्क्वाड्रन को ऑपरेशनल बनाया, जिनमें 3, 7, 17, 21 और 26 स्क्वाड्रन शामिल हैं। उनकी ट्रेनिंग टेक्नीक इतनी प्रभावशाली थी कि मात्र 5 महीनों में 13 पायलट्स को पूरी तरह से युद्ध के लिए तैयार कर दिया था।

MiG-21 record flying hours: मिग-21 उड़ाते हुए “ध्यान”

त्यागी के मुताबिक मिग-21 को उड़ाना आसान नहीं था। लेकिन उनके उड़ान भरने का अंदाज बेहद अनोखा था। वे एनर्जी मैनेजमेंट और एंगल-ऑफ-अटैक पर पूरा ध्यान देते थे। यही कारण था कि उन्होंने MiG-21 जैसे कठिन विमान पर हजारों घंटे सुरक्षित उड़ान भरने का रिकॉर्ड बनाया। उनका कहना था, “जब कॉकपिट बंद होता था तो लगता था जैसे ध्यान की अवस्था में चले गए हों। क्योंकि हर पल सावधानी, स्पीड पर नियंत्रण और दुश्मन की हरकतों पर नजर रखना पड़ती थी।” यही वजह थी कि उन्होंने कभी भी गंभीर दुर्घटना का सामना नहीं किया और सुरक्षित रहते हुए हजारों घंटे उड़ान पूरी की।

उन्होंने 1978 में एक इंजन फेलियर के चलते 400 किमी/घंटा की स्पीड से क्रैश लैंडिंग भी की, लेकिन साइड-टर्न से बच गए। मिग-21 की “स्नेकिंग” (मैक 2.3 से ऊपर अस्थिरता) को मास्टर किया, जो मैक 2.45 तक जा सकता था।

उनके साथी पायलट याद करते हैं कि वे हमेशा शांत, संयमित और अनुशासित रहते थे। उनके लॉगबुक को देखकर कोई भी समझ सकता था कि वे कितनी बारीकी और जिम्मेदारी से हर उड़ान दर्ज करते थे।

MiG-21 record flying hours: इराकी वायुसेना को दी ट्रेनिंग

साल 1981 से 1983 के बीच सुरेंद्र सिंह त्यागी को इराक भेजा गया। वहां उन्होंने इराकी वायुसेना को मिग-21 उड़ाने की ट्रेनिंग दी। इस दौरान भी उन्होंने लगभग 445 घंटे की उड़ान भरी। यह अनुभव उनके लिए बेहद अनोखा था क्योंकि इससे उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मिग-21 की क्षमताओं को साबित किया।

MiG-21 record flying hours
Air Commodore Surendra Singh Tyagi (Photo: Anchit Gupta on X)

MiG-21 record flying hours: मां की तरह था मिग-21

26 सितंबर 2025 को मिग-21 भारतीय वायुसेना से विदा हो जाएगा। लेकिन इससे पहले एयर कॉमोडोर सुरेंद्र सिंह त्यागी जैसे दिग्गजों की कहानियां हमेशा याद रहेंगी। त्यागी ने खुद एक इंटरव्यू में कहा था कि मिग-21 उनके लिए सिर्फ एक विमान नहीं बल्कि मां की तरह था। कभी-कभी रूठता था, तो कभी माफ कर देता था। यही रिश्ता उन्हें और मिग-21 को एक-दूसरे से हमेशा जोड़ता रहा।

हालांकि मिग-21 बाइसन के 2025 में रिटायरमेंट से पहले, 83 वर्ष की आयु में उन्होंने एक अंतिम सॉर्टी की इच्छा भी जताई है। माना जा रहा है कि जिस दिन मिग-21 का रिटायरमेंट होगा, उन्हें शायद टू-सीटर ट्रेनर में एक एक्टिव पायलट के साथ उड़ाने का मौका भी मिले।

MiG-21 record flying hours: भारतीय वायुसेना की रीढ़ रहा मिग-21

भारतीय वायुसेना ने मिग-21 का इस्तेमाल कई भूमिकाओं में किया। शुरुआत में इसे इंटरसेप्टर के रूप में शामिल किया गया था, लेकिन समय के साथ इस पर बमबारी, रॉकेट अटैक, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और रिकॉनसेंस जैसे मिशन भी कराए जाने लगे। कारगिल युद्ध के दौरान मिग-21 ने दुश्मन की चौकियों और ठिकानों की तस्वीरें खींचकर भारतीय सेना को रणनीतिक मदद दी।

मिग-21 छह दशकों तक भारतीय वायुसेना की रीढ़ बना रहा। जिस तरह एफ-16 अमेरिका के लिए अहम रहा, उसी तरह मिग-21 ने भारत की एयर पावर को नई ऊंचाई दी। यह वही विमान है, जिसने पाकिस्तान के एफ-16 को भी चुनौती दी और 2019 में ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वर्थमान ने इसी विमान से दुश्मन का एफ-16 गिराया।

IAF squadrons: दो मोर्चों पर एक साथ हुई जंग तो 29 स्क्वॉड्रन के साथ कैसे लड़ेगी वायुसेना? जानें चीन-पाकिस्तान के पास कितने हैं फाइटर जेट?

IAF squadrons

IAF squadrons: भारतीय वायुसेना की ताकत और भविष्य की योजनाओं पर इन दिनों बड़ी बहस छिड़ी हुई है। लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि किसी संभावित दो मोर्चों की जंग यानी चीन और पाकिस्तान के खिलाफ एक साथ लड़ाई के लिए भारतीय वायुसेना को कम से कम 42 फाइटर स्क्वॉड्रन की जरूरत होगी। लेकिन अब वायुसेना के टॉप अफसरों और मिलिट्री स्ट्रक्चर की समीक्षा में यह साफ हो गया है कि 42 स्क्वॉड्रन भी आज की चुनौतियों और बदलती तकनीक के सामने नाकाफी हैं।

MiG-21 Gun Troubles: शुरूआती मिग-21 थे ‘गनलेस जेट’, पढ़ें कैसे भारतीय वायु सेना ने जुगाड़ से इंटरसेप्टर को बनाया डॉगफाइटर

IAF squadrons: क्या है मौजूदा स्थिति

आज की तारीख में भारतीय वायुसेना के पास स्क्वॉड्रन 1965 से भी कम है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 32 सक्रिय स्क्वॉड्रन थे। उस दौरान भारतीय वायुसेना ने लगभग 572 कॉम्बैट विमानों का इस्तेमाल किया था, जिनमें से करीब 460 एक्टिव स्क्वॉड्रनों में तैनात थे।

वहीं, 26 सितंबर 2025 को जब वायुसेना का वर्कहॉर्स MiG-21 रिटायर हो जाएगा, तब वायुसेना के पास केवल 29 स्क्वॉड्रन बचेंगे। इसका मतलब है कि कुल 464 से 522 फाइटर जेट्स ही सक्रिय रह जाएंगे। यह संख्या तय 42 स्क्वॉड्रन की तुलना में लगभग 250 फाइटर कम है।

इन 29 स्क्वॉड्रनों में 12 स्क्वॉड्रन सुखोई-30, तीन मिराज-2000, दो राफेल, दो एलसीए तेजस के स्क्वॉड्रन शामिल हैं। इसके अलावा जगुआर (SEPECAT Jaguar) विमानों के 6 सक्रिय स्क्वॉड्रन हैं। जबकि मिग-29 विमानों के 2 सक्रिय स्क्वॉड्रन हैं। जिनमें अपग्रेडेड मिग-29यूपीजी वेरिएंट हैं।

IAF squadrons: चीन और पाकिस्तान से बढ़ता खतरा

जहां भारतीय वायुसेना अपने स्क्वॉड्रन की कमी से जूझ रही है, वहीं पड़ोसी देशों की स्थिति कहीं ज्यादा मजबूत दिखती है। चीन की वायुसेना PLAAF के पास 2000 से ज्यादा फाइटर जेट्स हैं। वहीं, पाकिस्तान के पास भी लगभग 500 फाइटर जेट्स मौजूद हैं। हाल ही में पाकिस्तान ने यह भी एलान किया है कि वह 40 J-35 फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट्स शामिल करने की योजना बना रहा है।

चीन पहले ही फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट्स को ऑपरेशनल कर चुका है और अब सिक्स्थ जनरेशन जेट्स पर काम शुरू कर चुका है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स और नेवी (PLAN) के पास मुख्य रूप से दो प्रकार के फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट्स हैं। इनमें चेंगदू जे-20 (मुख्य रूप से PLAAF के लिए) और शेनयांग जे-35 (मुख्य रूप से PLAN के लिए, लेकिन PLAAF में भी J-35A वेरिएंट) हैं। ये स्टेल्थ फाइटर हैं, जो एडवांस रडार-एवॉइडिंग तकनीक, सुपरक्रूज और नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर क्षमताओं से लैस हैं। इनमें चेंगदू जे-20 की संख्या 300+ और 20-30 शेनयांग जे-35 हैं। इनमें जे-35 का उत्पादन अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन 2026-2027 तक 100+ तक पहुंच सकता है।

वहीं, ऐसे हालात में भारत अभी भी अपने पहले फिफ्थ जनरेशन जेट को शामिल करने से करीब एक दशक दूर है। भारत को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए तेजस जैसे स्वदेशी विमान, राफेल, और आने वाले सालों में नए स्टेल्थ जेट्स की जरूरत भारत का लक्ष्य 2047 तक पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनना है, जिसमें डिजाइन, विकास और उत्पादन शामिल हैं।

IAF squadrons: 50 से ज्यादा स्क्वॉड्रन की जरूरत

1962 के चीन युद्ध के बाद जब भारत ने अपनी हवाई ताकत की समीक्षा की थी, तो जेआरडी टाटा कमेटी ने 50 कॉम्बैट स्क्वॉड्रन की सिफारिश की थी। लेकिन आर्थिक दिक्कतों के चलते इसे घटाकर 35 कर दिया गया।

बाद में 2012 में इस संख्या को बढ़ाकर 42 स्क्वॉड्रन किया गया। उस समय यह सोचा गया था कि पाकिस्तान और चीन से दो मोर्चों पर जंग की संभावना को देखते हुए यह संख्या काफी होगी। लेकिन अब वायुसेना मानती है कि 42 भी काफी नहीं है और इसे 50 से ज्यादा स्क्वॉड्रन तक ले जाने की जरूरत है।

भारत सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक पूरी तरह से आत्मनिर्भर होकर अपने फाइटर जेट्स डिजाइन, डेवलप, और मैन्युफैक्चरिंग कर सके। इसी दिशा में कई प्रोजेक्ट्स पर काम हो रहा है। वहीं, आने वाले सालों में भारतीय वायुसेना को 83 तेजस मैक-1ए, 120 तेजस मैक-2, और 126 स्वदेशी 5वीं पीढ़ी के स्टेल्थ विमान एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) मिलने वाले हैं। इसके अलावा, तत्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए 114 मल्टी-रोल फाइटर विमानों (MRFA) की भी खरीद की योजना है।

IAF squadrons: राफेल ही क्यों?

मल्टी-रोल फाइटर विमानों के लिए कई दावेदार हैं, लेकिन फिलहाल राफेल को ही सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, वायुसेना पहले से ही राफेल का इस्तेमाल करती है, इसलिए स्पेयर पार्ट्स, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक्स में ज्यादा बदलाव नहीं करना पड़ेगा। दूसरा, मेंटेनेंस की लागत कम होगी। तीसरा, नौसेना ने भी राफेल का मरीन वर्जन खरीदा है।

IAF squadrons: स्थायी रक्षा समिति ने जताई थी चिंता

दिसंबर 2024 में संसद की स्थायी रक्षा समिति ने भी तेजी से घटती वायुसेना की ताकत पर चिंता जताई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि कुल स्ट्रैंथ 42 स्क्वॉड्रन हैं, लेकिन वायुसेना के पास केवल 31 स्क्वॉड्रन बचे हैं। यह संख्या आने वाले समय में और कम हो सकती है।

किसी भी फाइटर जेट की जनरेशन उसकी तकनीक, एवियोनिक्स, हथियारों, स्पीड और स्टील्थ क्षमता से तय होती है। नई जनरेशन का मतलब है पुराने डिजाइन से एक कदम आगे। यही वजह है कि दुनिया की एयरफोर्स लगातार अपनी स्क्वॉड्रन संख्या के साथ-साथ जेट्स की जनरेशन पर भी ध्यान देती हैं। वहीं, भारतीय वायुसेना अब धीरे-धीरे 4 और 4.5 जनरेशन से आगे बढ़कर फिफ्थ जनरेशन और भविष्य में सिक्स्थ जनरेशन की ओर देख रही है।

MiG-21 in 1971 War: ऑपरेशन सिंदूर से 54 साल पहले मिग-21 ने की थी यह जबरदस्त ‘प्रिसिजन स्ट्राइक’, हाथ मलते रह गया था “गार्जियन एंजल”

MiG-21 in 1971 War

MiG-21 in 1971 War: ऑपरेशन सिंदूर को आज प्रिसिजन टारगेट स्ट्राइक के तौर पर जाना जाता है; लेकिन ठीक उसी तरह आज से 54 साल पहले 14 दिसंबर 1971 को ढाका पर हुई वायु कार्रवाई को भी इतिहास में एक तगड़ा प्रिसिजन स्ट्राइक माना जाता रहा है। उस दिन भारतीय वायुसेना ने वह कौशल, सटीकता और संयम दिखाया, जिसने न केवल टारगेट को नष्ट किया बल्कि आसपास आम जाम-माल को भी कम से कम नुकसान हुआ, ठीक जैसे ऑपरेशन सिंदूर में हुआ था। यह हमला न सिर्फ एक सैन्य उपलब्धि था, बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीतिक तस्वीर बदलने वाला एक निर्णायक मोड़ भी बन गया।

1962 के चीन युद्ध ने भारत को यह एहसास करा दिया था कि बिना आधुनिक हवाई ताकत के सीमा सुरक्षित नहीं रह सकती। इस झटके के बाद भारत ने सोवियत संघ से MiG-21 खरीदे। 1963 में पहली बार ये विमान भारतीय वायुसेना में शामिल हुए। उनकी डेल्टा विंग डिजाइन, सुपरसोनिक स्पीड और मिसाइल क्षमता ने भारत को नई शक्ति दी। ये तेज, सुपरसोनिक इंटरसेप्टर थे।

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MiG-21 in 1971 War: 1965 जंग में नहीं मिला कोई किल

1965 के भारत–पाक युद्ध में मिग-21 की पहली परीक्षा हुई। उस समय पाकिस्तान के पास अमेरिकी F-86 साबरे और F-104 स्टारफाइटर जैसे विमान थे। 1965 के युद्ध के समय केवल एक स्क्वाड्रन (नंबर 28, फर्स्ट सुपरसोनिक्स) ही ऑपरेशनल था। यह स्क्वाड्रन मुख्य रूप से डिफेंसिव सॉर्टी (कॉम्बैट एयर पैट्रोल या CAP) के लिए तैनात था, खासकर पंजाब क्षेत्र में।
1965 में MiG-21 ने युद्ध में कई इंटरसेप्शन (पीछा करने) की कोशिश की, लेकिन कोई सफल हवाई जीत नहीं दर्ज की थी। 4 सितंबर 1965 को, मिग-21 ने पाकिस्तानी F-86 सैबर जेट्स का पीछा किया और K-13 मिसाइलें दागीं (2-3 मिसाइलें फायर की गईं), लेकिन कोई हिट नहीं हुई। एक सैबर पायलट बाल-बाल बच गया। हालांकि उस वक्त तक मिग-21 का उपयोग मुख्य रूप से हाई-लेवल इंटरसेप्शन के लिए था, लेकिन पायलट ट्रेनिंग और मिसाइल रिलायबिलिटी की कमी के चलते कोई किल नहीं हुआ।

1965 का युद्ध मुख्यतः ग्नैट (Gnat) और हंटर (Hunter) विमानों के नाम रहा, लेकिन इसने साबित कर दिया कि मिग-21 आने वाले दिनों में भारतीय वायुसेना की रीढ़ बनने वाला है।

1971 तक मिग-21 विमानों के पायलटों ने इन्हें मल्टीरोल भूमिका में ढाला। मिग-21 की सरलता, गति और छोटे आकार के कारण इसे ‘वर्कहॉर्स’ कहा जाने लगा, और यह जल्द ही भारतीय वायुसेना की रीढ़ बन गया।

MiG-21 in 1971 War: पाकिस्तान को था “गार्जियन एंजल्स” का इंतजार

दिसंबर 1971 के मध्य में भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान के कई हिस्सों में तेजी से आगे बढ़ी, और ढाका के चारों ओर पाकिस्तानी सेना को घेरा जा चुका था। उस समय इंटरनेशनल पॉलिटिकल दबाव और अमेरिकी समु्द्री फ्लीट की गतिविधियों ने स्थिति को संवेदनशील बना दिया था।

भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ ने रेडियो पर बार-बार पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण करने की अपील की, लेकिन असर नहीं हुआ। पाकिस्तानी सैनिक “गार्जियन एंजल्स” यानी अमेरिका की मदद का इंतजार कर रहे थे। वास्तव में, अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पाकिस्तान को हथियार दिए थे और भारत को युद्ध से रोकने की चेतावनी भी दी थी। उन्होंने अमेरिकी सेवंथ फ्लीट को बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया। इसमें न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर य़ूएसएस एंटरप्राइजेज भी शामिल था। यह सीधे चिटगांव की ओर बढ़ रहा था।

MiG-21 in 1971 War: ढाका गवर्नर हाउस की अहम बैठक

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पता लगाया कि पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर एएम मलिक ने ढाका सर्किट हाउस में एक अहम बैठक बुलाई है। इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि जॉन केली को भी बुलाया गया था। अगर इस बैठक से अंतरराष्ट्रीय दखल की अपील हो जाती, तो भारत की जीत अधर में लटक सकती थी। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने यह जानकारी तुरंत दिल्ली और एयरफोर्स तक पहुंचाई। आदेश साफ था – इस बैठक को हर हाल में रोका जाए। लेकिन किसी नागरिक या विदेशी को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

MiG-21 in 1971 War
IAF MiG-21 attack on Dhaka Governor House in 1971 war

MiG-21 in 1971 War: मिग-21 को मिला ऐतिहासिक आदेश

ऐसे हालात में सारी जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना और खासकर ग्रुप कैप्टन मैलकम वोलन पर आ गई। उनके पास दो MiG-21 स्क्वाड्रन की कमान थी। समस्या यह थी कि भारतीय पायलटों के पास ढाका का कोई सैन्य नक्शा नहीं था। आखिरकार पर्यटक नक्शे का सहारा लिया गया। विंग कमांडर बीके बिश्नोई को इस ऑपरेशन का नेतृत्व सौंपा गया। उनके साथ चार मिग-21 और दो हंटर विमान थे।

14 दिसंबर 1971: 20 मिनट की उड़ान और प्रिसिजन स्ट्राइक

मिग-21 ने गुवाहाटी और हाशीमारा एयरफील्ड से उड़ान भरी। ढाका पहुंचने में सिर्फ 20 मिनट लगे। आसमान से बिश्नोई ने देखा कि गवर्नर हाउस के बाहर कई गाड़ियां खड़ी थीं। उन्होंने अंदाजा लगाया कि बैठक वहीं चल रही है। गुंबद के नीचे ही कॉन्फ्रेंस रूम होगा।

MiG-21 in 1971 War
IAF MiG-21 attack on Dhaka Governor House in 1971 war

बिश्नोई ने आदेश दिया और मिग-21 ने रॉकेट दागे। ये सीधे गुंबद को चीरते हुए मीटिंग हॉल में गिरे। इसके बाद हंटर विमानों ने मशीन गन से हमला किया। यह हमला इतना सटीक था कि किसी आम नागरिक को नुकसान नहीं हुआ, लेकिन बैठक तहस-नहस हो गई। गवर्नर मलिक ने तुरंत इस्तीफा लिखकर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी कार्यालय का रुख किया। सिर्फ 48 घंटे के भीतर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने 90,000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।

16 दिसंबर को ढाका में भारतीय सेना ने जीत का परचम लहराया और बांग्लादेश का जन्म हुआ।

ग्रुप कैप्टन मैलकम वोलन को उनकी भूमिका के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया। विंग कमांडर बी.के. बिश्नोई और उनके साथियों का नाम इतिहास में अमर हो गया। इस प्रिसिजन स्ट्राइक के बाद मिग-21 भारत का “हीरो” बन गया।

MiG-21 in 1971 War: पश्चिमी मोर्चे पर भी किया कमाल

पूर्वी मोर्चे के अलावा मिग-21 ने पश्चिमी मोर्चे पर भी शानदार प्रदर्शन किया। 12 दिसंबर को जामनगर में पाकिस्तानी F-104 ने हमला किया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट बीबी सोनी ने मिग-21 से उसका पीछा किया और गनफायर से गिरा दिया। मिग-21 से पाकिस्तान के दिग्गज पायलट विंग कमांडर मर्विन मिडलकॉट को मार गिराया। यह दुनिया की पहली घटना थी जब मिग-21 ने एफ-104 स्टारफाइटर को मार गिराया। 16 और 17 दिसंबर को राजस्थान के उत्तरलई सेक्टर में स्क्वाड्रन लीडर आईएस बिंद्रा और उनके साथियों ने भी पाकिस्तानी एफ-104 स्टारफाइटर को मिसाइल और गन दोनों से निशाना बनाया।

असली सुपरसोनिक गनफाइटर

1971 युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना ने तय किया कि हर MiG-21 में गन होना जरूरी है। रूस और भारत ने मिलकर मिग-21एमएफ (MiG-21MF) तैयार किया, जिसमें गन को विमान के भीतर फिट किया गया। भारतीय इंजीनियरों ने यहां तक जुगाड़ निकाला कि गन के कारतूसों को विमान के एयर इनटेक के चारों ओर लपेटकर रखा जाए। साथ ही आधुनिक ASP-PFD गाइरो गनसाइट भी लगाया गया। इससे मिग-21 एक असली सुपरसोनिक गनफाइटर बन गया।

BRO Project Vijayak: जिस प्रोजेक्ट ने कारगिल और लद्दाख को देश से जोड़ा, पूरे हुए उसके 15 साल, बनाईं 1400 किमी लंबी सड़कें और 80 पुल

BRO Project Vijayak Raising Day

BRO Project Vijayak: बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के प्रोजेक्ट विजयक ने 21 सितंबर 2025 को अपना 15वां स्थापना दिवस कारगिल में धूमधाम से मनाया। साल 2010 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट ने बीते पंद्रह वर्षों में लद्दाख के दुर्गम इलाकों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है। इस मौके पर शौर्य, सेवा और इंजीनियरिंग की उत्कृष्टता को सम्मानित किया गया।

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प्रोजेक्ट विजयक ने अब तक 1,400 किलोमीटर से अधिक सड़कें और 80 बड़े पुल तैयार और संरक्षित किए हैं। यह निर्माण कार्य दुनिया के सबसे कठिन और ऊंचाई वाले इलाकों में किया गया है, जहां मौसम और भौगोलिक चुनौतियां बेहद कठिन होती हैं।

BRO Project Vijayak: रिकॉर्ड समय में खुला जोजिला दर्रा

अप्रैल 2025 में प्रोजेक्ट विजयक ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की, जब रणनीतिक महत्व वाले जोजिला पास को सर्दियों के बंद होने के सिर्फ 31 दिनों के भीतर खोल दिया गया। इससे लद्दाख और देश के अन्य हिस्सों के बीच लगातार संपर्क सुनिश्चित हुआ। यह काम बीआरओ के इंजीनियरों और मजदूरों की मेहनत और तकनीकी दक्षता का प्रमाण है।

स्थापना दिवस का जश्न कई आयोजनों के साथ मनाया गया। महीने की शुरुआत में लद्दाखी संस्कृति और बीआरओ के योगदान पर आधारित पेंटिंग प्रतियोगिता हुई। 8 सितंबर को कारगिल से द्रास वॉर मेमोरियल तक बाइक रैली निकाली गई, जिसमें देशभक्ति और बलिदान का संदेश दिया गया।

20 सितंबर को आयोजित बड़ाखाना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने अधिकारियों, सैनिकों और उनके परिवारों को एक साथ लाकर आपसी संबंधों को मजबूत किया। 21 सितंबर को मुख्य कार्यक्रम हुआ, जिसमें सैनिक सम्मेलन, मंदिर और गुरुद्वारे में विशेष प्रार्थना, और विजयक मेमोरियल का उद्घाटन शामिल रहा। इस स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। समारोह का समापन “पागल जिमखाना” के आयोजन से हुआ, जो बीआरओ की आपसी एकजुटता और भाईचारे का प्रतीक है।

BRO Project Vijayak: मजदूरों के लिए कई कल्याणकारी कदम

प्रोजेक्ट विजयक ने सिर्फ सड़क और पुल नहीं बनाए, बल्कि अपने कामगारों की देखभाल पर भी विशेष ध्यान दिया है। कैजुअल पेड लेबरर्स (CPLs) के लिए सुरक्षित पानी और स्वच्छता वाली इंसुलेटेड शेल्टर, बेहतर विंटर गियर और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए गए। इसके साथ ही स्वास्थ्य जांच और मेडिकल कैंप भी नियमित रूप से आयोजित किए गए। यह पहल बीआरओ के उस समर्पण को दर्शाती है, जिसमें संगठन अपने हर कर्मचारी को परिवार का हिस्सा मानता है।

भविष्य में प्रोजेक्ट विजयक 1,200 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाले नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम करेगा। इनमें सड़कों का चौड़ीकरण, पुलों और सुरंगों का निर्माण और ऊंचाई वाले इलाकों में बेहतर संपर्क स्थापित करना शामिल है। इन कार्यों में जियोटेक्सटाइल्स, एडवांस सर्फेसिंग, स्लोप स्टेबिलाइजेशन, डिजिटल मॉनिटरिंग और इको-फ्रेंडली कंस्ट्रक्शन जैसी आधुनिक तकनीकें इस्तेमाल होंगी।

प्रोजेक्ट विजयक न सिर्फ भारतीय सेना की परिचालन क्षमता को बढ़ाता है, बल्कि लद्दाख की आम जनता के जीवन को भी आसान बनाता है। बीआरओ की ये सड़कें और पुल विकास, सुरक्षा और एकता की जीवन रेखा हैं, जो संगठन के इस नारे को सही साबित करती हैं – “कनेक्टिंग प्लेसेज, कनेक्टिंग पीपल।”

60 Years of 1965 War: हाजीपीर, असल उत्तर और डोगराई की जंग ने लिखी 65 की जंग में जीत की कहानी, वेटरंस ने ताजा की युद्ध की यादें

60 Years of 1965 War
HajiPur and Indian Army in Lahore

60 Years of 1965 War: 1965 में हुई भारत-पाकिस्तान की जंग को हुए भले ही 60 साल बीत चुके हैं। लेकिन जंग में अपना शौर्य दिखा चुके कई वेटरन के जहन में आज भी जंग की यादें ताजा हैं। ठीक वैसे ही जैसे कल ही जंग हुई हो। हालांकि 1965 जंग की शुरुआत अप्रैल 1965 में रन ऑफ कच्छ के बंजर इलाकों से हुई, जहां पाकिस्तान ने भारत की इच्छाशक्ति को परखने के लिए छोटी-छोटी झड़पें शुरू कीं। इन झड़पों ने माहौल गरमा दिया और पाकिस्तान को यह भ्रम हुआ कि अगर वह जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करेगा तो भारत जल्दी दबाव में आ जाएगा।

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60 Years of 1965 War: ऑपरेशन जिब्राल्टर और हाजीपीर की लड़ाई

अगस्त 1965 में पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया। हजारों सशस्त्र घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर भेजा गया ताकि स्थानीय विद्रोह खड़ा किया जा सके। भारतीय सेना ने तुरंत कार्रवाई की और हालात को नियंत्रण में लिया। इसी दौरान 28 अगस्त 1965 को भारतीय सैनिकों ने हाजीपीर पास पर कब्जा कर लिया। यह पास सामरिक दृष्टि से बेहद अहम था क्योंकि यहीं से घुसपैठिए भारत में दाखिल होते थे।

उस जंग में शामिल रहे वेटरन रिटायर्ड ब्रिगेडियर अर्विंदर सिंह (1 पैरा) इस ऑपरेशन में कंपनी कमांडर थे। उन्होंने कहा, “हाजीपीर पर कब्जा आसान नहीं था। 8500–9000 फीट ऊंचाई पर सांस लेना भी मुश्किल था। ऊपर से दुश्मन ऊंचाई से हमला कर रहा था। हमारे पास तोपखाने का सपोर्ट भी नहीं था, सिर्फ छोटे हथियार थे। हाथ से हाथ की लड़ाई भी हुई। मेरे सात जवान शहीद हुए, 22 घायल हुए और मैं खुद भी घायल हुआ। लेकिन दर्रे पर कब्जा हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।”

उनकी यादों में उस दौर की मुश्किलें आज भी ताजा हैं। उन्होंने कहा कि अगर आज हाजीपीर पास भारत के पास होता तो घाटी में होने वाली घुसपैठ 90 फीसदी तक कम हो जाती।

60 Years of 1965 War: पाकिस्तान का ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम

ऑपरेशन जिब्राल्टर की नाकामी से पाकिस्तान निराश हो गया। सितंबर की शुरुआत में उसने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया। इसका लक्ष्य था अखनूर पर कब्जा कर कश्मीर घाटी का भारत से संपर्क तोड़ देना। साथ ही, पाकिस्तान ने पंजाब के खेमकरण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर टैंक हमले किए।

लेकिन भारतीय सेना ने डटकर मुकाबला किया। खेमकरण में हुई असल उत्तर की लड़ाई को भारत की सबसे बड़ी जीतों में से एक माना जाता है। भारतीय सैनिकों ने 100 से अधिक पैटन टैंकों को तबाह कर दिया। इस जीत के बाद खेमकरण को “ग्रेवयार्ड ऑफ पैटन्स” टैंक कहा जाने लगा।

वेटरन कर्नल बंसी लाल (1/9 गोरखा रेजिमेंट) उस लड़ाई के गवाह थे। उन्होंने बताया, “8 सितंबर की सुबह दुश्मन ने टैंकों के साथ हमला किया। हमारी टुकड़ी ने पहले ही मोर्चा संभाल लिया था। दुश्मन के 94 टैंक तबाह हुए। कई दिनों तक तोपखाने और हवाई हमलों के बावजूद हमने जमीन नहीं छोड़ी।”

उन्होंने बताया, “5 सितंबर को हमें खेमकरण सेक्टर में भेजा गया था। 8 सितंबर की सुबह दुश्मन ने टैंकों से हमला किया। हमने पहले ही मोर्चा संभाल लिया था। हमारी टुकड़ी ने कई दुश्मन टैंक तबाह किए। लगातार तोपखाने और हवाई हमलों के बावजूद हमने जमीन नहीं छोड़ी। इस इलाके में पाकिस्तान के 94 टैंक तबाह हुए। इसीलिए इसे ग्रेवयार्ड ऑफ पैटन्स कहा गया।”

इस जंग में कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद की वीरता आज भी याद किया जाता है। उन्होंने अकेले कई पैटन टैंक तबाह कर दिए और परमवीर चक्र से सम्मानित हुए।

60 Years of 1965 War
1965 War Veterans interacting with COAS

60 Years of 1965 War: लाहौर और सियालकोट की ओर बढ़ी भारतीय सेना

6 सितंबर 1965 को भारत ने पहल करते हुए अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की और लाहौर व सियालकोट की ओर बढ़ना शुरू किया। इस दौरान डोगराई की जंग बेहद अहम रही।

वेटरन मेजर आरएस बेदी (14 हॉर्स – सिंध हॉर्स) ने इस मोर्चे पर टैंक टुकड़ी की अगुवाई की। उन्होंने कहा, “17 सितंबर को हमें डोगराई की ओर बढ़ने का आदेश मिला। दुश्मन ने जोरदार फायरिंग की। मेरा टैंक दुश्मन की गोली से जल उठा। दो साथी मारे गए, मैं गंभीर रूप से घायल हुआ। लेकिन मैंने अपने चालक को जलते टैंक से बाहर निकाला। यह वीरता का काम माना गया और मुझे वीर चक्र मिला।”

बेदी ने आगे बताया कि युद्ध के बाद भारत ने खुफिया एजेंसियों को मजबूत किया। यही कारण था कि 1969 में रॉ बनी और बाद में एनटीआरओ की स्थापना हुई, जिसे उन्होंने 2003 में खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि 1965 के युद्ध के बाद भारत में इंटेलिजेंस सिस्टम और मजबूत हुआ।

60 Years of 1965 War: फिल्लौरा और चाविंडा की जंग

लाहौर और सियालकोट की तरफ बढ़ते हुए भारतीय सेना ने फिल्लौरा और चाविंडा में भीषण टैंक लड़ाइयां लड़ीं। यहां भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के हमले को रोकते हुए अपनी ताकत दिखाई। वहीं, राजस्थान सेक्टर में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के अंदर मोर्चाबंदी शुरू करते हुए मुनाबाओ और गडरा रोड पर कब्जा किया। इससे भारतीय सेना ने यह साबित किया कि वह रेगिस्तानी मोर्चों पर भी बड़े पैमाने पर युद्ध लड़ सकती है। वहीं, शकरगढ़ बुल्ज क्षेत्र में टैंकों की भीषण लड़ाई हुई। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को रोकते हुए जम्मू–पठानकोट मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित की।

60 Years of 1965 War
Maj Sudarshan Singh, father of Additional Director General (ADG) of Strategic Communication interacting with COAS General Upendra Dwivedi and Raksha Mantri Rajnath Singh

60 Years of 1965 War: मेजर सुदर्शन सिंह ने साझा की यादें

1965 के भारत–पाक युद्ध को गुजरे हुए 60 साल बीत चुके हैं, लेकिन उस दौर की यादें आज भी जीवंत हैं। 1 डोगरा रेजिमेंट के अधिकारी रहे वेटरन मेजर सुदर्शन सिंह उस समय सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर थे। उन्होंने उस दौर के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया, “हमें बिना ज्यादा ट्रेनिंग के आदेश मिला कि सीमा पर जाना है। मुझे बस आदेश मिला और मैंने सोचा कि आदेश का पालन करना ही मेरा कर्तव्य है। उस समय यह नहीं सोचते थे कि आगे क्या होगा। बस ड्यूटी समझकर सीमा पर जाना था।”

मेजर सुदर्शन सिंह ने कहा कि उस समय वे प्लाटून कमांडर थे। उनका मुख्य काम रात में सामान और गोला-बारूद पहुंचाना था, जो बेहद तनावपूर्ण होता था। रात के अंधेरे में कभी नहीं पता होता था कि दुश्मन कब सामने आ जाएगा। दिन में ज्यादा मूवमेंट संभव नहीं था क्योंकि दुश्मन के हवाई हमले का खतरा हमेशा मंडराता था।

उन्होंने एक खास मिशन का जिक्र करते हुए कहा, “मुझे आदेश मिला कि ढोलन गांव की स्थिति का पता लगाओ। अगर वह पाकिस्तान के कब्जे में है, तो दुश्मन को आगे बढ़ने मत देना और अगर खाली है तो उसे कब्जे में लेना। यह काम बेहद जोखिम भरा था लेकिन यही हमारी जिम्मेदारी थी।”

60 Years of 1965 War: पहुंच चुके थे लाहौर के नजदीक

मेजर सुदर्शन सिंह से जब पूछा गया कि क्या 1965 में भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई थी, तो उन्होंने कहा कि उस समय सैनिकों को स्पष्ट आदेश नहीं दिए जाते थे। कई बार सिर्फ यह बताया जाता था कि आगे बढ़ो और कब्जा करो। “हम लाहौर के बिल्कुल नजदीक तक पहुंचे थे, लेकिन उसके बाद हमें वापस बुला लिया गया।”

“युद्ध कभी अच्छा नहीं होता”

आज की आधुनिक युद्ध प्रणाली और 1965 के युद्ध की तुलना पर उन्होंने कहा, “वह पारंपरिक युद्ध था और आज का युद्ध ड्रोन और तकनीक पर आधारित है। लेकिन सच्चाई यह है कि युद्ध कभी अच्छा नहीं होता। यह देश की अर्थव्यवस्था और व्यवस्था को पीछे धकेल देता है। युद्ध से कोई लाभ नहीं होता।”

23 सितंबर 1965 को संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से युद्धविराम हुआ। पाकिस्तान की कोशिश थी कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति बदली जाए, लेकिन भारतीय सेना ने उसे पूरी तरह नाकाम कर दिया।

Relocation of terror camps: ऑपरेशन सिंदूर के बाद जैश-हिजबुल के ठिकाने पीओके से खैबर पख्तूनख्वा हुए शिफ्ट, 25 सितंबर को पेशावर में बड़ी भर्ती की तैयारी में आतंकी

Relocation of terror camps
Marqaz Shuhuda-e-Islam, Manshera

Relocation of terror camps: ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों की रणनीति में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में कम से कम नौ बड़े आतंकी अड्डों को ध्वस्त किया था। जिसके बाद घबराए पाकिस्तान ने इन संगठनों को अपने ठिकाने खैबर पख्तूनख्वा (KPK) प्रांत में शिफ्ट करने का फरमान जारी कर दिया है।

Pakistan Terror Funding: डिजिटल वॉलेट्स के जरिए दुनिया की आंखों में धूल झोंक रहे आतंकी, जैश-ए-मोहम्मद ने शुरू किया 3.91 अरब रुपये का फंडरेजिंग नेटवर्क

सूत्रों के अनुसार, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठन अब पीओके को असुरक्षित मानते हैं। उन्हें लगता है कि भारतीय सेना की सटीक हमले की क्षमता के सामने पीओके अब सुरक्षित नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा यानी केपीके का रुख किया है, क्योंकि यहां भौगोलिक हालात बिल्कुल अलग हैं। वहीं, अफगान बॉर्डर के पास जिहादी सेफ हेवन पहले से मौजूद हैं और पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों का सीधा समर्थन भी मिलता है।

Relocation of terror camps
Mulana Mufti Masood Ilyas Kashmiri alias Abu Mohammad

Relocation of terror camps: मंसेहरा में भर्तियों का खेल

सूत्रों के मुताबिक सबसे बड़ी जानकारी मंसेहरा जिले के गरही हबीबुल्ला कस्बे से सामने आई है। यहां 14 सितंबर 2025 को भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच शुरू होने से करीब सात घंटे पहले जैश-ए-मोहम्मद ने एक पब्लिक भर्ती अभियान का आयोजन किया था।

हालांकि दिखावे के लिए इसे देवबंदी धार्मिक सम्मेलन बताया गया, लेकिन असल में यह जैश और जमीअत उलेमा-ए-इस्लाम द्वारा मिलकर चलाया गया भर्ती अभियान था। इस कार्यक्रम की अगुवाई जैश के खैबर पख्तूनख्वा और कश्मीर प्रभारी मौलाना मुफ्ती मसूद इलियास कश्मीरी उर्फ अबु मोहम्मद ने की। यह वही व्यक्ति है, जो जैश के संस्थापक मसूद अजहर का करीबी माना जाता है और भारत में वांछित आतंकियों की सूची में शामिल है।

इलियास कश्मीरी ने 14 सितंबर 2025 को खैबर पख्तूनख्वा के गढ़ी हबीबुल्लाह में आयोजित ‘मिशन मुस्तफा कॉन्फ्रेंस’ में बयान दिया था कि ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने बहावलपुर के मारकज सुब्हानअल्लाह (जैश का मुख्यालय) पर हमला किया, जिसमें मसूद अजहर का पूरा परिवार (बीवी, बेटे और बच्चे) “टुकड़े-टुकड़े हो गया”। उसने कहा, “सब कुछ कुर्बान करने के बाद, 7 मई को बहावलपुर में मौलाना मसूद अजहर के परिवार के लोग रेजा-रेजा हो गए, टुकड़ों में तक्सीम हो गए।” कश्मीरी ने दावा किया था कि पाकिस्तानी सेना और सेना प्रमुख आसिम मुनीर जैश को खुला समर्थन देते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय हमलों में मारे गए जैश सदस्यों के अंतिम संस्कार में पाकिस्तानी सेना के जनरल पहुंचे थे।

Relocation of terror camps
Inspector Liaqat Shah

Relocation of terror camps: पुलिस सुरक्षा में जैश का कार्यक्रम

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह पूरा कार्यक्रम पुलिस सुरक्षा में हुआ। स्थानीय पुलिस थाने का इंस्पेक्टर लियाकत शाह खुद मौजूद था। जेईएम के हथियारबंद आतंकी अमेरिकी एम-4 राइफल्स लेकर सुरक्षा में खड़े थे। इससे यह साफ है कि पाकिस्तान की सरकारी मशीनरी न सिर्फ इन संगठनों को संरक्षण देती है, बल्कि इनके खुलेआम कार्यक्रमों को भी सहयोग करती है।

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Marqaz Shuhuda-e-Islam, Manshera-2

Relocation of terror camps: ओसामा बिन लादेन को बताया प्रिंस

सूत्रों ने बताया कि कार्यक्रम में मसूद इलियास कश्मीरी ने करीब 30 मिनट का भाषण दिया। उसने ओसामा बिन लादेन को शोहदा-ए-इस्लाम और प्रिंस ऑफ अरब कहकर पेश किया। साथ ही उसने जेईएम की विचारधारा को सीधे अल-कायदा की विरासत से जोड़ दिया।

उसने लोगों को याद दिलाया कि 1999 के कंधार हाइजैक के बाद जब मसूद अजहर भारत की जेल से छूटकर पाकिस्तान लौटा था, तब उसने खैबर पख्तूनख्वा के बालाकोट को अपना मुख्यालय बनाया था। उसने कहा कि केपीके हमेशा से मुजाहिदीन का सुरक्षित ठिकाना रहा है और आगे भी रहेगा।

Relocation of terror camps: ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

कश्मीरी ने अपने भाषण में साफ कहा कि 7 मई को जब भारत ने जैश के मरकज सुब्हानअल्लाह कैंप पर हमला किया और मसूद अजहर के परिवार के कई सदस्य मारे गए, तब पाकिस्तानी सेना ने इसे गंभीर मानते हुए जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) से आदेश जारी किया। जिसके अनुसार, सेना के अधिकारियों ने आतंकियों के जनाजे में सलामी दी और पाकिस्तान एयर फोर्स ने ऊपर से सुरक्षा दी। वहीं, कश्मीरी के इस बयान से यह खुलासा हुआ कि पाकिस्तान की सेना खुद इन आतंकियों को शहीद मानती है और खुलेआम उनका सम्मान करती है।

Relocation of terror camps
JeM planning another gathering on 25 Sep 25 at Peshawar

Relocation of terror camps: भर्ती कैंप और नए ट्रेनिंग सेंटर

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक यह पूरा आयोजन दरअसल भर्ती के लिए था। सूत्रों ने पुष्टि की है कि मंसेहरा में मरकज शोहदा-ए-इस्लाम नामक ट्रेनिंग कैंप का विस्तार भी किया जा रहा है। लोगों को खुलेआम कहा गया कि वे जैश में भर्ती हों और जिहाद के लिए तैयार रहें।

स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि इस कैंप में पिछले कुछ महीनों से लगातार निर्माण कार्य और सामग्री की सप्लाई बढ़ी है। इससे यह साफ है कि ऑपरेशन सिंदूर में पीओके के अड्डे नष्ट होने के बाद जैश ने अपने नए ठिकाने के रूप में केपीके को चुना है।

Relocation of terror camps: पेशावर में अगला बड़ा इवेंट

सूत्रों ने बताया कि जैश अब 25 सितंबर 2025 को पेशावर में मरकज शहीद मकसूदाबाद में एक और बड़ा कार्यक्रम करने जा रहा है। यह सभा मसूद अजहर के भाई यूसुफ अजहर की याद में होगी, जो ऑपरेशन सिंदूर में मारा गया था।

इस कार्यक्रम का आयोजन जैश के नए नाम अल-मुराबितून के तहत किया जाएगा। यह नाम पश्चिम अफ्रीका के एक अल-कायदा समूह से मिलता-जुलता है, जिसका अर्थ है – इस्लाम की जमीन के रक्षक। सूत्रों का कहना है कि नाम बदलकर जैश अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचना चाहता है, क्योंकि यह पहले से प्रतिबंधित संगठन है।

Relocation of terror camps
HIZBUL MUJAHIDDEN CAMP RELOCATION TO KPK

Relocation of terror camps: हिजबुल मुजाहिदीन का नया ठिकाना

सिर्फ जैश ही नहीं, बल्कि हिजबुल मुजाहिदीन ने भी खैबर पख्तूनख्वा यानी केपीके में अपने ठिकाने बनाने शुरू कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व पाकिस्तानी कमांडो खालिद खान की अगुवाई में लोअर दिर जिले के बंडाई इलाके में नया ट्रेनिंग सेंटर एचएम- 313 बनाया जा रहा है।

Relocation of terror camps
Khalid Khan, Hizbul Mujahideen Commander (ex Pak Army Commando)

यह जमीन अगस्त 2024 में खरीदी गई थी और अब ऑपरेशन सिंदूर के बाद यहां तेजी से निर्माण का काम चल रहा है। 313 नाम का सीधा संबंध इस्लामी इतिहास की बद्र की जंग और अल-कायदा की ब्रिगेड 313 से है। इससे साफ है कि हिजबुल अब वैश्विक जिहादी समूहों से अपनी पहचान जोड़ना चाहता है।

मसूद इलियास कश्मीरी की भूमिका

इस पूरी रणनीति के केंद्र में मसूद इलियास कश्मीरी है। वह 2001 से जैश से जुड़ा और 2007 में उसने पीओके में अपना ट्रेनिंग कैंप बनाया। बाद में उसे केपीके और कश्मीर का अमीर बनाया गया। वह 1980 के दशक में पाकिस्तानी सेना की स्पेशल सर्विस ग्रुप (SSG) में शामिल हुआ था। सोवियत-अफगान युद्ध (1979-1989) में उसने मुजाहिदीनों को माइन वारफेयर की ट्रेनिंग दी। इस दौरान उसने एक आंख और एक उंगली गंवा दी। 1990 के दशक में कश्मीर में भारत के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (HuJI) के नेता कारी सैफुल्लाह अख्तर से मतभेद के बाद 313 ब्रिगेड नामक इसने अपनी यूनिट भी बनाई, जो अल-कायदा से जुड़ी हुई है। एक समय में इसे लादेन का उत्तराधिकारी भी कहा जाता था। वहीं, 2011 में अमेरिकी ड्रोन हमले में इसके मारे जाने की रिपोर्ट भी आई। लेकिन जून 2011 में टीटीपी ने इसे जिंदा बताया। वहीं, 2012 में यूएन ने इसे ‘रिपोर्टेडली डीड’ कहा, लेकिन हाल ही में इसके कई वीडियो सामने आने के बाद यह स्पष्ट है कि इलियास कश्मीरी अभी जिंदा है। इलियास कश्मीरी को दक्षिण एशिया के सबसे खतरनाक जिहादी कमांडरों में गिना जाता है।

Relocation of terror camps
MASOOD ILYAS KASHMIRI- JeM SENIOR COMMANDER & COMMANDER OF HILAL-UL-HAQ BRIAGDE (ALIAS PEOPLES’ ANTI FASCIST FRONT OR PAFF)

भारत की एनआईए चार्जशीट में उसका नाम 2018 के सुंजवां आर्मी कैंप अटैक में आया था, जिसमें छह भारतीय सैनिक और एक नागरिक शहीद हुए थे। 2019 में उसने लश्कर-ए-तैयबा और जैश की साझा ब्रिगेड हिलाल-उल-हक की कमान संभाली, जिसे बाद में पीपुल्स एंटी फासीस्ट फ्रंट (PAFF) नाम दिया गया।

जेईएम का नेता मसूद इलियास कश्मीरी सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका और इजराइल के खिलाफ भी जहर उगलता है। इसके बावजूद पाकिस्तान इन संगठनों को पनाह दे रहा है। यह वही नीति है जिसमें पाकिस्तान एक तरफ सहयोगी दिखता है और दूसरी तरफ आतंकियों को बढ़ावा देता है।

Non-Contact Warfare: पुणे में जनरल एसएफ रॉड्रिग्स मेमोरियल सेमिनार 2025 में भारतीय सेना ने की नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर की चुनौतियों पर चर्चा

Non-Contact Warfare

Non-Contact Warfare: भारतीय सेना के डायरेक्टर जनरल आर्टिलरी, लेफ्टिनेंट जनरल आदोष कुमार का कहना है कि पहले लड़ाइयां आमने-सामने लड़ी जाती थीं, लेकिन अब कई बार दुश्मन को दूर से ही हराने की जरूरत होती है। इसे ही नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर कहा जाता है। डीजी आर्टिलरी पुणे में पुणे में जनरल एसएफ रॉड्रिग्स मेमोरियल सेमिनार 2025 में बोल रहे थे। इस सेमिनार का आयोजन भारतीय सेना और सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज (CLAWS) ने मिलकर करते हैं। यह सेमिनार सेना के पूर्व चीफ जनरल एसएफ रॉड्रिग्स की याद में हर साल आयोजित की जाती है।

Artillery in Kargil War: कौन है द्रास का गुस्सैल सांड? मेजर जनरल लखविंदर सिंह की किताब ने खोले कई राज, आर्टिलरी कैसे बनी कारगिल युद्ध में गॉड ऑफ वॉर 

जनरल एसएफ रॉड्रिग्स मेमोरियल सेमिनार 2025 का इस बार का मुख्य विषय था, “नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर और भारतीय सेना की क्षमता निर्माण।” सेमिनार को संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल आदोष कुमार ने कहा कि अब युद्ध का रूप बदल चुका है। पहले लड़ाइयां आमने-सामने लड़ी जाती थीं, लेकिन अब कई बार दुश्मन को दूर से ही हराने की जरूरत होती है। इसे ही नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर कहा जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सेना को नई तकनीक और आधुनिक तरीकों को अपनाकर अपनी तैयारी और मजबूत करनी होगी।

Non-Contact Warfare

सेमिनार को तीन अलग-अलग सत्रों में बांटा गया। पहले सत्र में भारत के सामने मौजूद साइबर अटैक, फेक न्यूज, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और इंफॉर्मेशन वॉरफेयर जैसी चुनौतियों पर चर्चा हुई। दूसरे सत्र में दुनिया भर में हो रहे बदलावों और तकनीकों को भारतीय सेना किस तरह अपना सकती है, इस पर जोर दिया गया। तीसरे और आखिरी सत्र में सेना के अधिकारियों और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों ने चर्चा की। इसमें साफ हुआ कि सेना और शिक्षा जगत मिलकर काम करेंगे तो नई सोच और रणनीतियां तैयार होंगी।

सेमिनार में सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि आज की जटिल सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय सेना को मल्टी-डोमेन एप्रोच अपनाना होगा। इसका अर्थ है कि थल, जल और वायु सेना के साथ-साथ साइबर, स्पेस और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे क्षेत्रों को भी इंटीग्रेट किया जाए। अगर इन सबको मिलाकर तैयारी की जाए तो किसी भी चुनौती का सामना आसानी से किया जा सकता है।

इस मौके पर लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन, चीफ ऑफ स्टाफ, सदर्न कमांड, कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, उद्योग जगत से जुड़े लोग, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और सेना के वेटरन भी मौजूद थे।