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AMCA Explained: आ रहा है चीनी चेंगदू जे-20 माइटी ड्रैगन का बाप! ‘मेड इन इंडिया’ स्टील्थ जेट एएमसीए को मिली हरी झंडी, 2026 तक प्रोटोटाइप तैयार!

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AMCA Explained: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम के लिए प्रोटोटाइप मॉडल को मंजूरी दे दी है। यह भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट होगा, जिसका प्रोटोटाइप 2026-27 तक तैयार होने की उम्मीद है और 2028 तक पहली उड़ान भर सकता है। AMCA तैयार होने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों (अमेरिका, चीन, रूस) की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनके पास पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं। वर्तमान में अमेरिका के पास F-22 रैप्टर और F-35 लाइटनिंग II, चीन के पास J-20, और रूस के पास सुखोई-57 जैसे विमान हैं।

AMCA क्या है और क्यों है खास?

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) भारत का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, जिसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तहत एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) डेवलप कर रही है। यह एक पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है, जो मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

AMCA कार्यक्रम की शुरुआत 2010 में हुई थी, जिसे पहले मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MCA) के नाम से जाना जाता था। यह भारत-रूस के संयुक्त FGFA (Fifth Generation Fighter Aircraft) कार्यक्रम के समानांतर शुरू हुआ था, लेकिन बाद में भारत ने FGFA से हटकर AMCA को प्राथमिकता दी। अक्टूबर 2010 में, रक्षा मंत्रालय ने फिजिबिलिटी स्टडी के लिए 90 करोड़ रुपये आवंटित किए। नवंबर 2010 में, ADA ने दो टेक्नोलॉजी डेमोंस्टेटर्स और सात प्रोटोटाइप के लिए 9,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त फंडिंग मांगी।

2013-2014 के बीच, AMCA के 9 डिज़ाइन कॉन्फ़िगरेशन्स (3B-01 से 3B-09) की स्टडी हुई, जिसमें CAD, विंड टनल टेस्टिंग, और रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) टेस्टिंग शामिल थी। 2014 तक, 3B-09 कॉन्फ़िगरेशन को अंतिम रूप दिया गया। 2015 में, Aero India में AMCA का बेसिक डिज़ाइन फाइनल हुआ। 2023 में डिज़ाइन का काम पूरा हुआ, और मार्च 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने प्रोटोटाइप विकास के लिए ₹15,000 करोड़ की मंजूरी दी।

AMCA की कुछ प्रमुख विशेषताएं

AMCA एक 25 टन का ट्विन-इंजन जेट होगा, जो IAF के बाकी फाइटर्स से बड़ा होगा। शुरुआत में इसमें 75% स्वदेशी कंटेंट होगा, जो बाद में 85% तक बढ़ेगा।

एडवांस्ड स्टील्थ फीचर्स

AMCA में एडवांस्ड स्टील्थ फीचर्स होंगे, जो इसे रडार से छुपाने में मदद करेंगे। इसका लो इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सिग्नेचर रडार के लिए इसे डिटेक्ट करना मुश्किल बनाएगा। जेट की सतह पर खास मटेरियल यूज होगा, जो रडार सिग्नल को रिफ्लेक्ट करने की बजाय डायवर्ट करेगा। डायवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट और सर्पेंटाइन एयर इनटेक डक्ट इंजनों को रडार से बचाएंगे।

6.5 टन का बड़ा इंटरनल फ्यूल टैंक

AMCA में 6.5 टन का बड़ा इंटरनल फ्यूल टैंक होगा, जो इसे लंबी दूरी के मिशंस के लिए फिट बनाएगा। इसका इंटरनल वेपन्स बे 1,500 किलो तक का पेलोड ले जा सकता है, जिसमें चार लॉन्ग-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल्स और कई प्रिसीजन-गाइडेड हथियार शामिल होंगे। इंटरनल वेपन्स बे और फ्यूल टैंक रडार सिग्नेचर को कम करते हैं, जो बाहर लगे हथियारों या टैंक्स के साथ मुमकिन नहीं है।

इंजन

AMCA का Mk1 वर्जन अमेरिकी GE F414 इंजन (98 किलोन्यूटन) के साथ उड़ेगा, जिसका प्रोडक्शन हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ भारत में शुरू हो चुका है। Mk2 वर्जन में DRDO का गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) 110 किलोन्यूटन का देसी इंजन डेवलप करेगा। भारत फ्रांस की सैफरान SA कंपनी के साथ इस इंजन के लिए बातचीत कर रहा है।

AMCA में इंटीग्रेटेड व्हीकल हेल्थ मैनेजमेंट (IVHM) सिस्टम होगा, जो रियल-टाइम में जेट की कंडीशन चेक करेगा। ये सिस्टम मेंटेनेंस टाइम को कम करेगा और जेट को ज्यादा वक्त तक यूज करने में मदद करेगा। साथ ही, AMCA में एडवांस सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम होगा, जो दुश्मन के विमानों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम होगा।

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भारत के लिए AMCA क्यों जरूरी है?

भारत का स्ट्रेटेजिक सिनारियो बेहद चुनौतीपूर्ण है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ तनाव और उनकी बढ़ती सैन्य क्षमता भारत के लिए बड़ा खतरा है। भारतीय वायुसेना (IAF) को 41 स्क्वाड्रन की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में केवल 29 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं। खासकर तब जब पाकिस्तान अपनी वायुसेना को आधुनिक बना रहा है और चीन से J-10 औऱ J-20 स्टील्थ फाइटर जेट और एडवांस विपंस सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है औऱ LAC पर भारत के लिए चुनौती पेश कर रहा है।

AMCA का डेवलपमेंट इन चुनौतियों का जवाब है। यह न केवल भारतीय वायुसेना की कमी को पूरा करेगा, बल्कि इसे आधुनिक युद्ध की जरूरतों के लिए तैयार करेगा। AMCA अपने स्टील्थ फीचर्स, एडवांस्ड एवियोनिक्स और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के साथ इस गैप को भर सकता है। स्टील्थ का मतलब है कि ये जेट दुश्मन के रडार से बच सकता है, जो आज के युद्ध में बहुत बड़ा फायदा है।

पाकिस्तान अपनी वायुसेना को चीन की मदद से अपग्रेड कर रहा है, जिसमें J-20 जैसे स्टील्थ फाइटर भी शामिल हैं। दूसरी तरफ, चीन की वायुसेना पहले से ही पांचवीं पीढ़ी के जेट्स के साथ बहुत ताकतवर है। अगर AMCA सक्सेसफुल होता है, तो ये दोनों पड़ोसियों के खिलाफ भारत को बराबरी का मौका दे सकता है।

AMCA की टाइमलाइन

AMCA प्रोग्राम को अप्रैल 2024 में सरकार की मंजूरी मिली थी, और अब रक्षा मंत्री द्वारा प्रोटोटाइप मॉडल को हरी झंडी दिखाई गई है। इसकी टाइमलाइन इस तरह रहेगी:

  • 2026-27: पहला प्रोटोटाइप तैयार होगा।
  • 2028: पहली उड़ान की उम्मीद।
  • 2032: विमान का सर्टिफिकेशन पूरा होगा।
  • 2034: भारतीय वायुसेना में शामिल होने की योजना।

ADA जल्द ही एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) जारी करेगी, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को विकास प्रक्रिया में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। यह एक प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया होगी, जिसमें केवल भारतीय कंपनियां ही हिस्सा ले सकेंगी। यह कदम भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूत करेगा।

AMCA का डेवलपमेंट दो चरणों में होगा:

  • पहला चरण: 75% स्वदेशी सामग्री के साथ शुरुआती मॉडल।
  • दूसरा चरण: 85% स्वदेशी सामग्री के साथ एडवांस मॉडल।

GE F414 इंजन का प्रोडक्शन HAL के साथ भारत में शुरू हो चुका है, जो AMCA के लिए समय पर इंजन सप्लाई सुनिश्चित करेगा।

क्या हैं चुनौतियां?

AMCA का रास्ता आसान नहीं है। भारत के स्वदेशी डिफेंस प्रोजेक्ट्स का इतिहास, जैसे तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, देरी और कॉस्ट ओवररन से भरा है। AMCA, जो फिफ्थ-जेनरेशन जेट है, DRDO, ADA और इंडस्ट्री पार्टनर्स के लिए और भी बड़ा टेस्ट होगा। स्टील्थ टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड इंजन्स और एवियोनिक्स बनाने के लिए ढेर सारा पैसा, टेक्निकल स्किल्स और टाइम चाहिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, AMCA का प्रोटोटाइप 2026-27 तक तैयार हो सकता है और पहली फ्लाइट 2028 में हो सकती है। लेकिन डिफेंस मिनिस्ट्री का लेटेस्ट स्टेटमेंट साफ टाइमलाइन नहीं देता, जो चैलेंजेस को दिखाता है। सर्टिफिकेशन 2032 तक और IAF में इंडक्शन 2034 तक प्लान्ड है।

IAF की तुरंत जरूरतें भी चिंता का सबब हैं। सिर्फ 29 स्क्वाड्रनों के साथ, वायुसेना पहले से दबाव में है। AMCA को सर्विस में आने में कई साल लगेंगे। तब तक, भारत को राफेल या एक्स्ट्रा तेजस जेट्स जैसे ऑप्शंस पर भरोसा करना होगा। AMCA की सक्सेस पॉलिटिकल सपोर्ट, फंडिंग और DRDO, ADA और प्राइवेट इंडस्ट्री के बीच स्मूथ कोऑर्डिनेशन पर टिकी है।

क्यों चाहिए स्वदेशी फाइटर जेट?

भारत के पास विकल्प था कि वह अमेरिका का F-35 या रूस का Su-57 खरीद ले। ये दोनों विश्व स्तरीय फाइटर जेट्स हैं, लेकिन इनसे जुड़ी कई समस्याएं हैं। विदेशी जेट्स खरीदना बहुत महंगा है। साथ ही, उनके मेंटेनेंस और स्पेयर पार्ट्स के लिए हमेशा विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर रहना पड़ता है। युद्ध के समय अगर सप्लाई चेन में रुकावट आती है, तो ये भारत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। इसके अलावा, विदेशी जेट्स में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर पाबंदियां होती हैं, यानी हम उन्हें अपनी जरूरतों के हिसाब से बदल नहीं सकते।

AMCA को भारत में ही बनाना ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन का हिस्सा है। AMCA प्रोजेक्ट से नौकरियां बढ़ेंगी, टेक्निकल नॉलेज बढ़ेगा और भारत का एयरोस्पेस इकोसिस्टम मजबूत होगा। रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि ADA जल्द ही इंडस्ट्री पार्टनर्स के साथ एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) इश्यू करेगी। ये पार्टनरशिप इनोवेशन को तेज करेगी और AMCA को भारत की खास जरूरतों, जैसे हिमालय में हाई-एल्टिट्यूड फाइटिंग या इंडियन ओशन में मैरिटाइम ऑपरेशंस के लिए तैयार करेगी।

AMCA का सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये 85 फीसदी स्वदेशी होगा। विदेशी जेट्स में अक्सर “ब्लैक बॉक्स” सिस्टम्स होते हैं या क्रिटिकल पार्ट्स की एक्सेस लिमिटेड होती है। लेकिन AMCA के साथ भारत को टेक्नोलॉजी पर फुल कंट्रोल मिलेगा। इससे स्वदेशी हथियार, सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम्स को आसानी से फिट किया जा सकेगा। मिसाल के तौर पर, AMCA में भारत की बनी मिसाइलें और एडवांस्ड रडार सिस्टम्स लगाए जा सकते हैं, जो इसे IAF की जरूरतों के लिए परफेक्ट बनाएंगे।

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क्या AMCA बन सकता है डिटरेंट?

AMCA के तैयार होते ही पाकिस्तान और चीन को बड़ी चुनौती मिलेगी। इसके स्टील्थ फीचर्स, एडवांस्ड सेंसर्स और वेपन्स IAF को एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिशंस में बड़ा एज देंगे। पाकिस्तान के खिलाफ, AMCA मॉडर्नाइज्ड जेट्स और एयर डिफेंस सिस्टम्स को न्यूट्रलाइज कर सकता है। यह चीन के खिलाफ J-20 को तगड़ा जवाब दे सकता है, जिससे भारत को लद्दाख या अरुणाचल जैसे इलाकों में रणनीतिक बढ़त हासिल होगी।

Book Review: ‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’! हिमालय की ऊंचाइयों से तिब्बत की गहराइयों तक, आईएएस अफसर रवींद्र कुमार के जुनून की कहानी

Book Review: 'The Other Side of Everest' – An IAS Officer's Thrilling Journey from Himalayan Heights to Tibetan Depths

Book Review: ‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ रवींद्र कुमार की एक ऐसी किताब है, जो पाठकों को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की सैर कराती है और साथ ही जीवन की चुनौतियों को जीतने की प्रेरणा देती है। रवींद्र कुमार एक आईएएस अधिकारी हैं, जो पर्वतारोहण का भी शौक रखते हैं। इस किताब में उन्होंने अपनी एवरेस्ट चढ़ाई और तिब्बत की सांस्कृतिक-अध्यात्मिक यात्रा का रोचक वर्णन किया है। खास तौर पर जोखांग मठ का जिक्र इस किताब को और खास बनाता है।

Book Review: उत्तरी दिशा से एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे

रवींद्र कुमार एक साधारण परिवार से आते हैं। मेहनत और लगन से वे पहले आईएएस अधिकारी बने और फिर एवरेस्ट जैसे मुश्किल पर्वत को फतह करने का सपना देखा। किताब की शुरुआत में वे बताते हैं कि कैसे उन्होंने 2013 में एवरेस्ट पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। यह असफलता उनके लिए हार नहीं थी। कई साल की मेहनत, शारीरिक और मानसिक तैयारी के बाद 2017 में वे तिब्बत की उत्तरी दिशा से एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे। तिब्बत में एवरेस्ट को चोमोलंगमा कहते हैं, तो नेपाल में इसे सागरमाथा कहा जाता है। नेपाल की तरफ के मुकाबले तिब्बत की तरफ से चढ़ना बेहद मुश्किल माना जाता है और बेहद चुनिंद लोग ही तिब्बत की तरफ से समिट पूरा कर पाते हैं।

किताब का नाम ‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ सिर्फ पर्वत की दूसरी दिशा को नहीं दिखाता, बल्कि यह जीवन के उन पहलुओं की बात करता है, जहां इंसान अपनी कमजोरियों को हराकर कुछ बड़ा हासिल करता है। लेखक कहते हैं, “एवरेस्ट सिर्फ एक पर्वत नहीं, यह जीवन की हर बड़ी चुनौती का प्रतीक है।”

तिब्बत और जोखांग मठ का जादू

इस किताब का एक खास हिस्सा तिब्बत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक झलक है। जब लेखक ल्हासा, जो तिब्बत की राजधानी है, पहुंचे, तो वे जोखांग मठ गए। यह मठ तिब्बती बौद्ध धर्म का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र है। लेखक इसे “शांति और ऊर्जा का स्थान” कहते हैं। उनके शब्दों में, मठ में कदम रखते ही उन्हें एक अनोखी शांति मिली, जैसे सारी चिंताएं गायब हो गईं।

जोखांग मठ का निर्माण 7वीं सदी में राजा सोंगत्सेन गम्पो ने करवाया था। यह तिब्बती कला और वास्तुकला का शानदार नमूना है। लेखक बताते हैं कि 1966 में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान इस मठ को काफी नुकसान हुआ था, लेकिन 1972 से 1980 तक इसे फिर से बनाया गया। आज यह मठ तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

लेखक लिखते हैं, “मठ के आसपास तीर्थयात्रियों की भीड़ और उनकी आस्था को देखकर मुझे अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिली। यह अनुभव किसी ध्यान साधना जैसा था।” यह वर्णन पाठकों को तिब्बत की संस्कृति और आध्यात्मिकता के करीब ले जाता है। यह किताब को सिर्फ पर्वतारोहण की कहानी से कहीं ज्यादा बनाता है।

दिल को छू लेती है किताब

रवींद्र कुमार की लेखन शैली बहुत आसान और दिल को छूने वाली है। पर्वतारोहण जैसे जटिल विषय को भी उन्होंने इतने सरल तरीके से लिखा है कि कोई भी आम पाठक इसे समझ सकता है। उनकी लेखनी में हिमालय की बर्फीली चोटियां, ठंडी हवाएं और मुश्किल रास्ते जैसे जीवंत हो उठते हैं। पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह खुद एवरेस्ट की चढ़ाई कर रहा हो।

लेखक ने सिर्फ पर्वतारोहण की बातें ही नहीं लिखीं, बल्कि अपने डर, अकेलापन और आत्मविश्वास की कमी जैसे मानसिक संघर्षों को भी खुलकर बताया है। वे लिखते हैं कि कैसे उन्होंने इन कमजोरियों को हराकर खुद को मजबूत किया। यह किताब सिर्फ शारीरिक मेहनत की कहानी नहीं, बल्कि मन की ताकत और आत्मविश्वास की जीत की कहानी है।

‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ एक ऐसी किताब है, जो हर पाठक को प्रेरित करती है। लेखक का मानना है कि असफलता कोई अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। उनकी 2013 की नाकाम कोशिश और फिर 2017 में मिली सफलता इस बात का सबूत है। वे कहते हैं कि अगर आपके पास साहस, मेहनत और धैर्य है, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।

यह किताब खास तौर पर उन युवाओं के लिए है, जो असफलता से डरकर अपने सपने छोड़ देते हैं। लेखक का यह अनुभव बताता है कि मेहनत और लगन से हर शिखर को छुआ जा सकता है। चाहे वह एवरेस्ट की चोटी हो या जीवन का कोई और बड़ा लक्ष्य। लेखक का यह संदेश है कि अगर आपने ठान लिया, तो कोई भी मुश्किल आपको रोक नहीं सकती।

किताब का हर पन्ना देता है नई प्रेरणा और उत्साह

यह किताब हर तरह के पाठकों के लिए है। जो लोग साहसिक कहानियां पसंद करते हैं, उनके लिए इसमें एवरेस्ट की चढ़ाई का रोमांच है। जो लोग संस्कृति और आध्यात्मिकता में रुचि रखते हैं, उनके लिए तिब्बत और जोखांग मठ का वर्णन एक अनमोल अनुभव है। और जो लोग जीवन में प्रेरणा ढूंढ रहे हैं, उनके लिए यह किताब एक मार्गदर्शक है। लेखक ने अपनी कहानी को इतने रोचक तरीके से लिखा है कि पाठक इसे एक बार शुरू करने के बाद खत्म किए बिना नहीं रह सकता। किताब का हर पन्ना नई प्रेरणा और उत्साह देता है।

‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ एक ऐसी किताब है, जो रोमांच, आध्यात्मिकता और प्रेरणा का मिश्रण है। रवींद्र कुमार ने अपनी इस किताब में न सिर्फ अपनी एवरेस्ट यात्रा को साझा किया, बल्कि तिब्बत की संस्कृति और जोखांग मठ की आध्यात्मिकता को भी खूबसूरती से पेश किया। यह किताब सिर्फ एक पर्वतारोही की कहानी नहीं, बल्कि हर उस इंसान की कहानी है, जो अपने सपनों को सच करना चाहता है।

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यह किताब हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए, जो अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता है। यह न केवल एक यात्रा की कहानी है, बल्कि आत्म-खोज और आत्मविश्वास की एक प्रेरक गाथा है। रवींद्र कुमार की यह किताब हमें सिखाती है कि अगर मन में ठान लिया जाए, तो कोई भी शिखर दूर नहीं।

इस बार हिंडन हिंडन एयरबेस पर होगा Air Force Day 2025, ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी के बाद भारत दिखाएगा आसमान में दम!

Air Force Day 2025 at Hindon: India to Showcase Power Post Operation Sindoor
Credit: IAF

Air Force Day 2025: भारतीय वायुसेना (IAF) का सबसे बड़ा आयोजन, वायुसेना दिवस, इस बार फिर से गाजियाबाद के हिंडन एयरफोर्स स्टेशन पर होने जा रहा है। हर साल 8 अक्टूबर को मनाया जाने वाला यह दिन वायुसेना के जवानों की बहादुरी और समर्पण को सम्मान देने का मौका होता है। इस बार यह आयोजन इसलिए भी खास है, क्योंकि यह हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर की शानदार सफलता के बाद हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक, हिंडन एयरबेस पर इस समारोह को भव्य बनाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

Air Force Day 2025: हिंडन पर वापसी क्यों है खास?

हिंडन एयरबेस लंबे समय तक वायुसेना दिवस का मुख्य केंद्र रहा है। साल 2021 तक यह आयोजन हर साल यहीं होता था, लेकिन 2022 से इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित करने का फैसला लिया गया। इसका मकसद था कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस आयोजन से जुड़ सकें और वायुसेना की ताकत को करीब से देख सकें। 2022 में चंडीगढ़, 2023 में प्रयागराज और 2024 में चेन्नई में यह समारोह हुआ। इस बदलाव के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सुझाव था कि सेना और अर्धसैनिक बलों के बड़े आयोजन देश के अलग-अलग हिस्सों में हों, ताकि हर क्षेत्र के लोग इसे देख सकें और गर्व महसूस करें।

लेकिन इस बार वायुसेना दिवस की हिंडन में वापसी अपने आप में एक बड़ा संदेश है। हिंडन एयरबेस वायुसेना के इतिहास और गौरव का प्रतीक है। साथ ही, हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में इस एयरबेस की अहम भूमिका ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया है। इसीलिए इस बार हिंडन को चुना गया है, ताकि देश और दुनिया को भारत की ताकत का एक बार फिर अहसास हो सके।

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद बड़ा आयोजन

इस साल का वायुसेना दिवस इसलिए भी खास है, क्योंकि यह ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद पहला बड़ा आयोजन होगा। 7 मई 2025 को भारत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब देने के लिए ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस हमले में 26 लोग मारे गए थे, जिसमें ज्यादातर पर्यटक थे। इसके जवाब में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आतंकियों के 9 ठिकानों पर सटीक हमले किए। इन ठिकानों में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के बड़े शिविर शामिल थे।

ऑपरेशन सिंदूर में हिंडन एयरबेस ने अहम भूमिका निभाई। यहां से विमानों को भेजा गया और पूरी रणनीति को अंजाम दिया गया। इस दौरान हिंडन के सिविल टर्मिनल से कमर्शियल उड़ानों को रोक दिया गया था, ताकि कोई जोखिम न हो। अधिकारियों ने बताया कि यह कदम सुरक्षा के लिए उठाया गया था, क्योंकि यह टर्मिनल मिलिट्री एयरबेस के अंदर ही है। अभी यहां से 16 उड़ानें चलती हैं, जो बड़े शहरों को जोड़ती हैं, और एयर इंडिया एक्सप्रेस मुख्य एयरलाइन है।

पाकिस्तान ने इस हमले का जवाब देने की कोशिश की और भारतीय सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और गोलीबारी से हमला किया। लेकिन भारतीय वायुसेना ने इसका करारा जवाब दिया। 9 और 10 मई की रात को वायुसेना ने पाकिस्तान के 11 बड़े एयरबेस को निशाना बनाया, जिसमें नूर खान एयरबेस भी शामिल था। इन हमलों में ब्रह्मोस मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया, जिन्होंने पाकिस्तानी ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने भारत के आदमपुर एयरबेस और वहां तैनात S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को नुकसान पहुंचाया, लेकिन 13 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद आदमपुर पहुंचे और इन दावों को झूठा साबित कर दिया। पीएम मोदी C-130J सुपर हरक्यूलस विमान से आदमपुर के रनवे पर उतरे, जहां S-400 सिस्टम को लॉन्च करते हुए दिखाया गया। इस घटना ने भारत की ताकत को दुनिया के सामने ला दिया।

वायुसेना दिवस में क्या होगा खास?

8 अक्टूबर को होने वाले वायुसेना दिवस के समारोह में कई शानदार प्रदर्शन देखने को मिलेंगे। इस दिन हिंडन एयरबेस पर फ्लाईपास्ट का आयोजन होगा, जिसमें वायुसेना अपनी ताकत का प्रदर्शन करेगी। फाइटर जेट्स जैसे सुखोई-30 MKI, मिग-29 और तेजस हवा में अलग-अलग फॉर्मेशन में उड़ान भरेंगे। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट विमान जैसे C-17 ग्लोबमास्टर और C-130J सुपर हरक्यूलस भी अपनी ताकत दिखाएंगे।

इस बार का फ्लाईपास्ट इसलिए भी खास होगा, क्योंकि इसमें ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हुए विमानों और हथियारों का प्रदर्शन भी हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक, इस समारोह में ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम और सुखोई-30 MKI विमानों को खास तौर पर दिखाया जा सकता है, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में बड़ी भूमिका निभाई। साथ ही, वायुसेना के जवान हवा में हैरतअंगेज करतब दिखाएंगे, जो दर्शकों को रोमांचित कर देंगे।

इस आयोजन में वायुसेना के इतिहास और इसकी उपलब्धियों को भी दिखाया जाएगा। एक खास प्रदर्शनी का आयोजन होगा, जिसमें वायुसेना के पुराने विमानों, हथियारों और तकनीक की झलक देखने को मिलेगी। साथ ही, ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को एक वीडियो के जरिए दिखाया जाएगा, जिसमें इस ऑपरेशन की पूरी कहानी को समझाया जाएगा।

देशभर से लोग होंगे शामिल

वायुसेना दिवस का यह समारोह न सिर्फ वायुसेना के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का पल होगा। हिंडन में होने की वजह से दिल्ली-एनसीआर के आसपास के लोग आसानी से इस आयोजन का हिस्सा बन सकेंगे। साथ ही, इस बार इसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए इसका सीधा प्रसारण भी किया जाएगा। दूरदर्शन और कई न्यूज चैनल इस समारोह को लाइव दिखाएंगे, ताकि देश के कोने-कोने में बैठे लोग इसे देख सकें।

इसके अलावा, स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों को खास तौर पर आमंत्रित किया जाएगा, ताकि वे वायुसेना की ताकत को देख सकें और उनमें देशभक्ति की भावना जागे। वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करते हैं।

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हिंडन एयरबेस दिल्ली-एनसीआर में स्थित है और देश की राजधानी के करीब होने की वजह से रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। कई बड़े ऑपरेशनों में हिंडन ने अहम भूमिका निभाई है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर भी शामिल है। इस एयरबेस की वापसी वायुसेना के लिए एक तरह से घर वापसी जैसी है, जो इसके गौरव को और बढ़ा रही है।

Galwan Visit: नॉर्दन कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा क्यों गए गलवान और देपसांग, क्या वहां इंडिया गेट बनाने की है तैयारी?

Galwan Visit: Northern Commander Lt Gen Prateek Sharma Visits Galwan and Depsang

Galwan Visit: भारतीय सेना की नॉर्दन कमांड के नए कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने हाल ही में गलवान और देपसांग का दौरा किया। नॉर्दन कमांड का कार्यभार संभालने के बाद लेह में स्थित 14 कोर में यह उनका पहला आधिकारिक दौरा था, जिसमें उन्होंने फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स की यूनिट्स और फॉर्मेशन्स के साथ मुलाकात की और इलाके की सुरक्षा स्थिति का जायजा लिया। इस दौरे की खास बात यह रही कि वह गलवान घाटी भी गए, जहां 15 जून 2020 की देर रात भारत औऱ चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए थे। वहीं गलवान को अगले महीने पर्यटकों के लिए भी खोला जाना है।

Galwan Visit: गलवान घाटी क्यों गए कमांडर?

लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 30 अप्रैल 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नॉर्दन आर्मी कमांडर का पदभार संभाला था। वे लेफ्टिनेंट जनरल एमवी सुचिंद्र कुमार की जगह पर नियुक्त हुए हैं, जो 30 अप्रैल को ही रिटायर हो गए। 22 मई 2025 को लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने गलवान घाटी और आसपास के इलाकों का दौरा किया। कमांडर बनने के बाद यहां उनका यह पहला आधिकारिक दौरा था। यह इलाका लद्दाख में तैनात त्रिशूल डिविजन का हिस्सा है। इस दौरान उन्होंने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के पास तैनात जवानों से मुलाकात की और उनकी तैयारियों का जायजा लिया।

नॉर्दन कमांड के आधिकारिक एक्स हैंडल से साझा की गई तस्वीरों में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा को सैनिकों के साथ बातचीत करते और इलाके की स्थिति को समझते देखा जा सकता है। वहीं दूसरी फोटो में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा देपसांग बुल्ज में रॉक क्लांइबिंग इक्विपमेंट्स पहने जवानों की हौसला अफजाई करते दिख रहे हैं।

नॉर्दन कमांड ने अपनी पोस्ट में लिखा है, “सैनिकों की लगन की सराहना
लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा, सेना कमांडर, #नॉर्दर्नकमांड ने #फायरफ्यूरीकॉर्प्स के तहत संरचनाओं और इकाइयों का दौरा किया ताकि परिचालन तैयारियों और सुरक्षा उपायों की समीक्षा की जा सके।
सेना कमांडर ने सैनिकों की लगन और समर्पण की तारीफ की और उन्हें परिचालन प्रभावशीलता और पेशेवरता के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।”

रिटायर्ड मेजर जनरल सुधाकर जी, जो महार रेजिमेंट के पूर्व कर्नल और पूर्वी लद्दाख में 3 डिवीजन के कमांडर रह चुके हैं, उन्होंने कहा कि यह साइकोलॉजिकल वारफेयर का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि कोई भी नया कमांडर उन क्षेत्रों में अवश्य जाता है, जहां तनाव या गतिरोध हो। यह सेना का रणनीतिक तौर-तरीका है। नॉर्दन कमांडर जैसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इस इलाके का दौरा इसलिए करते हैं ताकि वे खुद वहां की स्थिति को समझ सकें और सैनिकों की तैयारियों का जायजा ले सकें।

क्या भव्य मेमोरियल बनाने की है तैयारी?

नॉर्दन कमांड के आधिकारिक एक्स हैंडल से साझा की गई तस्वीरों में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा अपने गलवान दौरे के दौरान वहां बने मेमोरियल भी गए। गलवान घाटी में गलवान नदी के किनारे शहीद स्मारक (मेमोरियल) का निर्माण 15 जून 2021 को पूरा हुआ था। यह स्मारक 15-16 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत-चीन सैन्य झड़प में शहीद हुए 20 भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया है। वहीं लगता है कि अब इस स्मारक को रेजांग-ला वॉर मेमोरियल की तरह भव्य बनाने की तैयारी है।

Galwan Visit: Northern Commander Lt Gen Prateek Sharma Visits Galwan and Depsang

नॉर्दन कमांड की तरफ से जारी एक फोटो में वॉर मेमोरियल के मॉडल को दिखाया गया है। जिसे देख कर अनुमान लगाया जा रहा है कि सरकार वहां शहीदों की याद में बड़ा मेमोरियल बनाने की तैयारी कर रही है। फोटो दो प्रोटोटाइप दिखाई दे रहे हैं। वहीं दूसरा प्रोटोटाइप कुछ खास दिखाई दे रहा हैं। उसमें इंडिया गेट बना हुआ दिखाई दे रहा है। संभव है कि वहां जाने वाले पर्यटकों को इंडिया गेट गलवान में भी देखने को मिल सकता है। वहीं लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा के साथ फायर एंड फ्यूरी यानी 14 कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला भी पीछे खड़े दिखाई दे रहे हैं।

15 जून से खुलेगाा गलवान!

भारतीय थलसेना दिवस पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने ‘भारत रणभूमि दर्शन’ नाम का एक खास प्रोग्राम शुरू किया था। इस प्रोग्राम का मकसद रणक्षेत्र टूरिज्म को बढ़ावा देना है, ताकि लोग ऐतिहासिक युद्ध स्थलों को देख सकें और शहीदों की वीरता को जान सकें। इसके लिए एक वेबसाइट भी बनाई गई है, जिसका नाम ‘भारत रणभूमि दर्शन’ ही रखा गया है।

सेना से जुड़े सूत्रों ने बताया कि पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी को 15 जून 2025 से पर्यटकों के लिए खोलने की योजना है। यह क्षेत्र, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास है, अभी यहां जाना प्रतिबंधित है। उन्होंने बताया कि मार्च में तापमान -5 डिग्री तक पहुंचने पर काम शुरू होगा, और मई के अंत तक पर्यटकों के लिए व्यवस्था तैयार हो जाएगी। गलवान घाटी में शहीद हुए सैनिकों की याद में एक मेमोरियल बनाया गया है। यह मेमोरियल दुर्बुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) रोड पर श्योक गांव से करीब 100 किलोमीटर दूर है। DSDBO रोड, जो 256 किलोमीटर लंबी है, पर गलवान वॉर मेमोरियल KM 120 पोस्ट के पास स्थित है। अभी तक इस सड़क पर सिर्फ श्योक गांव तक ही आम लोगों को जाने की इजाजत थी। 2020 के बाद से इस इलाके में स्थानीय लोगों और सेना के अलावा किसी को भी आने की अनुमति नहीं दी गई थी। अब इस प्रोग्राम के जरिए लोग इन जगहों को देख सकेंगे और शहीदों को श्रद्धांजलि दे सकेंगे।

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इस रास्ते में अभी रहने-खाने की सुविधा नहीं है, लेकिन मौसम अनुकूल होने पर अस्थायी स्ट्रक्चर, कैफेटेरिया, गेस्ट हाउस और व्यू पॉइंट बनाए जाएंगे। स्थानीय लोग होम स्टे शुरू करने के इच्छुक हैं, और सिविल प्रशासन इस दिशा में काम कर रहा है। मेमोरियल को भी रिनोवेट किया जा रहा है। अभी गलवान जाने के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है, लेकिन पर्यटन शुरू होने पर इसे हटा दिया जाएगा, हालांकि रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा। 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित गलवान के लिए 6 दिन का एक्लेमटाइजेशन जरूरी होगा, जिसकी पालना चेक पॉइंट्स पर सुनिश्चित की जाएगी।

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गलवान में तैनात सैनिकों को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। ऊंचाई पर स्थित यह इलाका ठंडा और दुर्गम है, जहां ऑक्सीजन की कमी और कठोर मौसम सैनिकों के लिए रोज की चुनौती है। ऐसे में कमांडर का दौरा सैनिकों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन होता है। यह दौरे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि सैनिकों के पास जरूरी संसाधन, हथियार और तकनीक मौजूद हों, ताकि वे किसी भी स्थिति से निपट सकें।

Indian Parliamentary Delegation: भारत 32 देशों में ही क्यों भेज रहा सभी दलों के सांसदों का प्रतिनिधिमंडल? इससे पीएम मोदी की ग्लोबल इमेज को होगा क्या फायदा?

Indian Parliamentary Delegation: Why India is Sending All-Party MPs to 32 Nations and How It Boosts PM Modi's Global Image
Credit: India in Japan on X

Indian Parliamentary Delegation: 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने पहले तो ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों ध्वस्त किया, उसके बाद पाकिस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई का भी मुंहतोड़ जवाब दिया। वहीं पाकिस्तान को डिप्लोमेटिक स्तर पर घेरने की तैयारी है। जिसके तहत भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन जुटाने और आतंकवाद के प्रति अपनी जीरो टॉलरेंस नीति को मजबूत करने के लिए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल 32 देशों की यात्रा पर भेजा है। इनमें से तीन प्रतिनिधिमंडल अपनी यात्रा शुरू भी कर चुके हैं। इस मुहिम में 59 सांसद शामिल हैं, जिनमें से 31 सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और 20 विपक्षी दलों से हैं। प्रत्येक प्रतिनिधिमंडल के साथ कम से कम एक पूर्व डिप्लोमेट भी शामिल है, जो डिप्लोमेटिक डायलॉग और स्ट्रेटेजिक कम्यूनिकेशन में मदद करेंगे।

Indian Parliamentary Delegation: बनाए सात प्रतिनिधिमंडल

इन सात प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व देश के प्रमुख राजनेता कर रहे हैं। पहला समूह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बैजयंत जय पांडा के नेतृत्व में है, जबकि दूसरा समूह बीजेपी के ही रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में काम करेगा। तीसरे समूह की कमान जनता दल (यूनाइटेड) के संजय झा संभाल रहे हैं, और चौथे समूह का नेतृत्व शिवसेना के श्रीकांत शिंदे करेंगे। पांचवें समूह की अगुवाई कांग्रेस सांसद शशि थरूर को सौंपी गई है, जबकि छठा समूह द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की सांसद कनिमोई करुणानिधि के नेतृत्व में है। सातवें और अंतिम समूह का नेतृत्व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की नेता सुप्रिया सुले कर रही हैं।

इन देशों की करेंगे यात्रा

यह कूटनीतिक अभियान भारत के लिए कई मायनों में अहम है। इसका मुख्य उद्देश्य लश्कर के मुखौटा संगठन द रजिस्टेंस फ्रंट यानी TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना है। पहलगाम आतंकी हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे, और पहले उसकी जिम्मेदारी TRF ने ली थी, लेकिन बाद में खुद पर एक साइबर अटैक की बात कह कर अपनी बात से पलट गया था।

ये प्रतिनिधिमंडल 32 देशों और क्षेत्रों की यात्रा करेंगे, जिनका चयन खास रणनीति के तहत किया गया है। मध्य पूर्व में सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और कतर जैसे देश शामिल हैं। यूरोप में यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, डेनमार्क, यूरोपीय संघ, स्पेन, ग्रीस, स्लोवेनिया और लातविया इस अभियान का हिस्सा हैं। एशिया में इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर जैसे देशों को चुना गया है। अफ्रीका से अल्जीरिया, लाइबेरिया, कांगो, सिएरा लियोन, इथियोपिया और दक्षिण अफ्रीका इस सूची में शामिल हैं। अमेरिका महाद्वीप से संयुक्त राज्य अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया का चयन किया गया है। इसके अलावा, रूस भी इस सूची में शामिल है। इन देशों का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये या तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के वर्तमान या भविष्य के सदस्य हैं या फिर भारत के प्रमुख रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं।

क्या है पूर्व राजनयिकों की राय

इन देशों के चयन के रणनीतिक महत्व को लेकर पूर्व राजनयिक प्रभु दयाल (रिटायर्ड), “भारत 32 देशों में संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेज रहा है। इसका कारण यह है कि ये सभी देश निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये देश या तो वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सदस्य हैं या अगले साल या 2027 में इसके सदस्य बनेंगे।” प्रभु दयाल इससे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, पाकिस्तान, मिस्र और ईरान जैसे देशों में सेवाएं दे चुके हैं।

उन्होंने आगे कहा, “ये सभी देश इस साल, 2026 या 2027 में UNSC में डिसिजन मेकर के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आतंकवाद के मामले में इनका रुख हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये देश इस मुद्दे पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।”

चीन क्यों नहीं भेजा डेलीगेशन?

चीन UNSC का स्थायी सदस्य है, जबकि पाकिस्तान इसके 10 गैर-स्थायी सदस्यों में से एक है। फिर भी, भारत ने बीजिंग या इस्लामाबाद में कोई प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा। 25 अप्रैल को, पाकिस्तान और चीन ने UNSC पर दबाव बनाकर द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) को प्रेस स्टेटमेंट से हटवाया, जबकि भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था।

भारत TRF को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाने के लिए सक्रिय रूप से अभियान चला रहा है। इसके लिए भारत ने न्यूयॉर्क में एक टेक्निकल टीम भेजी थी, जो 1267 सेंक्शन्स कमेटी के मॉनिटरिंग टीम और संयुक्त राष्ट्र के सहयोगी देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र कार्यालय काउंटर-टेरेरिज्म (UNOCT) और काउंटर-टेरेरिज्म कमेटी एक्जीक्यूटिव डायरेक्टरेट (CTED) के साथ बैठकें कर चुकी है।

UNSC चीन और पाकिस्तान का विरोध

पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत (रिटायर्ड) ने बताया कि UNSC में 15 सदस्य हैं, और भारत के प्रतिनिधिमंडल इनमें से चीन और पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी देशों की यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने बताया, “ये प्रतिनिधिमंडल उन देशों में जा रहे हैं, जो हमारे रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं। TRF को आतंकवादी संगठन घोषित करने का मामला संयुक्त राष्ट्र में जाएगा, जहां पाकिस्तान इसका विरोध करेगा और चीन तकनीकी रूप से इसे रोकने की कोशिश करेगा। ऐसे में यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है कि इन देशों को अपने पक्ष में लाया जाए, ताकि पाकिस्तान का असली चेहरा सामने आए।”

प्रभु दयाल ने आगे कहा, “पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवादी गतिविधियां हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा बन रही हैं। हम इसे UNSC में मजबूती से उठाना चाहते हैं। इसलिए हम उन देशों तक पहुंच रहे हैं, जो या तो स्थायी सदस्य हैं या इस साल, अगले साल या 2027 में गैर-स्थायी सदस्य होंगे।” उन्होंने यह भी जोड़ा, “इस पहल का मुख्य उद्देश्य इन देशों को हमारी चिंताओं के प्रति जागरूक करना और आतंकवाद के मुद्दे पर निर्णय लेने में उन्हें अपने पक्ष में लाना है।”

UNSC के मौजूदा सदस्य

P5 देशों (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम) के अलावा, UNSC के 10 नॉन परमानेंट मेंबर्स में अल्जीरिया, डेनमार्क, ग्रीस, गुयाना, पाकिस्तान, पनामा, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, स्लोवेनिया और सोमालिया शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 6 जून 2024 को हुए मतदान में 2026-2027 के लिए सुरक्षा परिषद के पांच नए गैर-स्थायी सदस्यों का चयन किया है। ये देश हैं- कनाडा, जर्मनी, थाईलैंड, उगांडा, और वेनेजुएला। इनका कार्यकाल 1 जनवरी 2026 से शुरू होकर 31 दिसंबर 2027 तक चलेगा।

सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 स्थायी (चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, और अमेरिका) और 10 गैर-स्थायी सदस्य शामिल हैं। गैर-स्थायी सदस्यों का चुनाव हर साल पांच सीटों के लिए होता है, ताकि दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो सके। इस बार कनाडा और जर्मनी पश्चिमी यूरोप और अन्य क्षेत्र से, थाईलैंड एशिया-प्रशांत से, उगांडा अफ्रीका से, और वेनेजुएला लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र से चुने गए हैं।

ये नए सदस्य अल्जीरिया, गुयाना, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, और स्लोवेनिया की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को खत्म होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए अहम फैसले लेती है, और इन नए सदस्यों की भूमिका अगले दो सालों में महत्वपूर्ण होगी।

क्या यह कदम पीएम मोदी की छवि को और मजबूत करेगा?

सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस अभियान का मकसद साफ है, पाकिस्तान के आतंकवाद प्रायोजन को वैश्विक मंच पर उजागर करना और TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना। लेकिन इस अभियान का एक और बड़ी खूबी है, जो राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण है। वह है विपक्षी नेताओं की भागीदारी।

विपक्षी नेताओं का इस अभियान में शामिल होना भारत के आतंकवाद विरोधी रुख में एकता का प्रतीक है। शशि थरूर, कनिमोई करुणानिधि, और सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख विपक्षी चेहरों का नेतृत्व वैश्विक समुदाय को यह संदेश देता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का राजनीतिक वर्ग एकजुट है। इससे न केवल भारत की कूटनीतिक ताकत बढ़ती है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस छवि को भी मजबूत करती है, जिसमें वे सभी दलों को साथ लेकर चलने वाले नेता के रूप में दिखते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस अभियान से मोदी की छवि को कई तरह से फायदा हो सकता है। सबसे पहले, यह वैश्विक मंच पर भारत को एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल एक संवेदनशील मुद्दे पर कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। यह संदेश उन देशों के लिए खासा प्रभावी है, जो भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को महत्व देते हैं। दूसरा, यह मोदी की कूटनीतिक रणनीति को और मजबूत करता है, जिसमें वे न केवल भारत की आवाज को वैश्विक मंच पर बुलंद करते हैं, बल्कि विपक्ष को भी राष्ट्रीय हितों के लिए साथ लाते हैं।

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इसके अलावा, यह अभियान मोदी सरकार की आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति को और मजबूत करता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद विपक्षी नेताओं को इस अभियान में शामिल करना यह दर्शाता है कि भारत का यह कदम केवल एक सरकार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है। यह पूरी दुनिया को यह भरोसा होगा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में पूरी तरह प्रतिबद्ध और एकजुट है।

Army Air Defence: ऑपरेशन सिंदूर में जब दो महिला कमांडिंग ऑफिसर्स बनीं ‘काली माता’, हवा में पस्त हुए पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल

Army Air Defence: Women COs Crush Pak Drones in Operation Sindoor
Credit: AI Image

Army Air Defence: ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने न केवल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को कड़ा जवाब दिया, बल्कि इस ऑपरेशन ने दुनियाभर के सामने भारत की अचूक सैन्य ताकत का भी लोहा मनवाया। इस ऑपरेशन में जहां कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह दुनिया के सामने भारतीय सेनाओं का प्रमुख चेहरा थीं, तो पर्दे के पीछे भी महिला सैनिक अफसरों की भूमिका कम नहीं थी। एक ऐसी ही कहानी दो महिला कर्नल की है, जिन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता से पाकिस्तान को धूल चटाई। हालांकि दोनों महिला कमांडिंग ऑफिसर्स के लिए यह पहला युद्ध था, लेकिन बावजूद इसके उन्होंने अपनी यूनिट को कमांड किया और पाकिस्तान के हमलों को भरपूर जवाब दिया।

Army Air Defence: 6-7 मई की रात को शुरू हुआ था ऑपरेशन सिंदूर

इन दोनों महिला कमांडिंग ऑफिसर्स ने भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स का नेतृत्व करते हुए पाकिस्तान के मिसाइल और ड्रोन हमलों को नाकाम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत 7 मई की सुबह हुई, जब भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। इन हमलों में 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए। यह ऑपरेशन पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच चार दिनों तक जबरदस्त सैन्य टकराव देखा गया। इस दौरान लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, ड्रोनों, लॉॉन्ग रेंज आर्टिलरी और भारी हथियारों का इस्तेमाल हुआ। 10 मई को दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद युद्धविराम लागू हुआ।

इस दौरान पाकिस्तान ने भारत के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में कई स्थानों, जैसे अवंतिपुरा, श्रीनगर, जम्मू, चंडीगढ़, पठानकोट, अमृतसर, कपूरथला, जालंधर, लुधियाना, आदमपुर, बठिंडा, सूरतगढ़, नल, फलोदी, उत्तरलाई और भुज पर हमले करने की कोशिश की। लेकिन भारत के मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम ने इन सभी हमलों को विफल कर दिया। इस ऑपरेशन में दो महिला कर्नलों ने अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया।

पठानकोट और सूरतगढ़ में पाक हमलों को रोका

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना की 25 एयर डिफेंस यूनिट्स में से दो का नेतृत्व दो महिला कर्नलों ने किया। एक कर्नल ने पंजाब के पठानकोट में और दूसरी ने राजस्थान के सूरतगढ़ में अपनी यूनिट की अगुवाई की। ये दोनों स्थान पाकिस्तानी हमलों के प्रमुख निशाने पर थे, लेकिन इन महिला अधिकारियों ने अपनी सूझबूझ और साहस से दुश्मन के इरादों को नाकाम कर दिया।

इन दोनों महिला कर्नलों ने लगभग दो साल पहले अपनी यूनिट की कमान संभाली थी। प्रत्येक यूनिट में करीब 800 जवान हैं, और ये दोनों एकमात्र महिला कमांडिंग ऑफिसर हैं। सूत्रों के अनुसार, इन अधिकारियों ने युद्ध के दौरान असाधारण नेतृत्व का प्रदर्शन किया। उनकी यूनिट्स ने सैन्य और नागरिक क्षेत्रों, यहां तक कि धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने वाले पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइल हमलों को नेस्तानाबूद कर दिया।

120 महिलाएं भारतीय सेना में कमांडिंग ऑफिसर

भारतीय सेना ने 2023 में एक स्पेशल सिलेक्शन बोर्ड के जरिए 108 महिला अधिकारियों को कर्नल के पद पर प्रमोट किया था। यह कदम जेंडर इक्वलिटी को बढ़ावा देने और महिलाओं को कमांड की भूमिकाएं सौंपने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल थी। वर्तमान में, लगभग 120 महिलाएं भारतीय सेना में कमांडिंग ऑफिसर के रूप में सेवा दे रही हैं, जिनमें से 60 फीसदी उत्तरी और पूर्वी कमांड जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात हैं, जो भारत की सीमाओं की सुरक्षा कर रही हैं।

महिलाओं को सेना में केवल मिलिट्री पुलिस कोर में अग्निवीर के तौर पर शामिल किया जाता है। लेकिन कर्नल रैंक तक पहुंचने वाली इन महिला अधिकारियों ने यह साबित कर दिया कि वे किसी भी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में पुरुषों के बराबर प्रदर्शन कर सकती हैं। ऑपरेशन सिंदूर में इन दो महिला कर्नलों का नेतृत्व इसका जीताजागता उदाहरण है।

अग्निवीरों का भी शानदार प्रदर्शन

ऑपरेशन सिंदूर में अग्निवीरों ने भी जमकर अपनी बहादुरी दिखाई। लगभग 3,000 अग्निवीर, जिनकी उम्र करीब 20 वर्ष है और जिन्हें पिछले दो वर्षों में भर्ती किया गया था, ने एयर डिफेंस सिस्टम को ऑपरेट करने में अहम भूमिका निभाई। अग्निपथ योजना के तहत भर्ती इन सैनिकों ने युद्ध के दौरान कई तरह की जिम्मेदारियां दी गई थीं।

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

जून 2022 में शुरू अग्निपथ योजना के तहत सैनिकों को चार साल के लिए भर्ती किया जाता है, जिसमें से 25% को नियमित सेवा में 15 साल के लिए बनाए रखने का प्रावधान है। ऑपरेशन सिंदूर में अग्निवीरों ने स्वदेशी एयर डिफेंस कंट्रोल और रिपोर्टिंग सिस्टम, आकाशतीर, को ऑपरेट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस सिस्टम ने पाकिस्तानी मिसाइलों और ड्रोनों का पता लगाने, उनकी पहचान करने और उन्हें नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई।

Srinagar IndiGo flight: भारतीय वायुसेना पर DGCA के आरोपों की क्या है सच्चाई? क्या ऐसे हालात के लिए चालक दल की है गलती?

IndiGo Delhi-Srinagar Flight: DGCA Questions IAF Role, Pilot Error in Focus
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Srinagar IndiGo flight: 21 मई 2025 को दिल्ली से श्रीनगर जा रही इंडिगो की उड़ान संख्या 6E-2142 एक खतरनाक टर्बुलेंस में फंस गई थी, जिससे जहाज के नोज यानी अगले हिस्से को काफी नुकसान पहुंचा था। वहीं इस घटना के दो दिन बाद बाद नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने क्रू यानी चालक दल के सदस्यों के हवाले से भारतीय वायुसेना पर पायलटों की समय पर मदद न करने के आरोप लगाए हैं। वहीं घटना ने कई सवाल भी उठाए हैं: क्या पायलट ने श्रीनगर में प्लेन की लैंडिंग करके गलत फैसला लिया? क्या प्लेन का वेक्टर रडार ठीक काम नहीं कर रहा था?

Srinagar IndiGo flight: क्या हुआ था उस दिन?

21 मई 2025 को इंडिगो की उड़ान 6E-2142 दिल्ली से श्रीनगर के लिए निकली थी। प्लेन 36,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था। जब यह पठानकोट के पास पहुंचा, तो अचानक खराब मौसम में फंस गया। तेज ओलावृष्टि और हवाओं के झटकों (टर्बुलेंस) से प्लेन हिलने लगा। पायलटों ने बताया कि उन्होंने मौसम रडार पर खराब मौसम देखा और उड़ान का रास्ता बदलने की कोशिश की। सबसे पहले, उन्होंने भारतीय वायुसेना के उत्तरी क्षेत्र नियंत्रण (Northern Area Control) से अनुमति मांगी कि वे प्लेन को बायीं तरफ 100 मील पर अंतरराष्ट्रीय सीमा (पाकिस्तान एय़र स्पेस) की तरफ मोड़ने की अनुमति दें, ताकि खराब मौसम से बचा जा सके। लेकिन वायुसेना ने यह अनुमति नहीं दी। इसके बाद, पायलटों ने लाहौर (पाकिस्तान) के एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) से उनके हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने की इजाजत मांगी, लेकिन लाहौर ने भी मना कर दिया।

अब पायलटों के पास दो रास्ते थे, या तो वे प्लेन को वापस दिल्ली ले जाएं या खराब मौसम के बीच से होकर श्रीनगर की ओर बढ़ें। चूंकि वे पहले ही बादलों के बहुत करीब थे, इसलिए पायलटों ने फैसला किया कि वे श्रीनगर की ओर सबसे छोटे रास्ते से जाएंगे। इस दौरान प्लेन को भयंकर ओलावृष्टि और हवाओं का सामना करना पड़ा।

प्लेन के सिस्टम में कई समस्याएं शुरू हो गईं। कई तरह की चेतावनियां (वॉर्निंग) दिखने लगीं, जैसे कि Angle of Attack में खराबी, Alternate Law प्रोटेक्शन का बंद होना, और स्पीडोमीटर ठीक से काम नहीं कर रहे थे। ऑटोपायलट मोड (स्वचालित उड़ान प्रणाली) भी बंद हो गया। प्लेन की रफ्तार बार-बार बहुत तेज या बहुत धीमी हो रही थी। इस दौरान प्लेन की अधिकतम रफ्तार (VMO/MMO) और स्टॉल (प्लेन के रुकने की चेतावनी) की चेतावनियां भी बार-बार बजीं। एक समय तो प्लेन 8,500 फीट प्रति मिनट की रफ्तार से नीचे की ओर भी चला गया।

पायलटों ने इसके बाद प्लेन को मैनुअल मोड पर उड़ाया। और उन्होंने श्रीनगर ATC को “पैन पैन” (Possible Assistance Needed- आपातकाल) की सूचना दी और रडार की मदद मांगी। आखिरकार, प्लेन श्रीनगर हवाई अड्डे पर सुरक्षित उतर गया। ऑटो थ्रस्ट (स्वचालित गति नियंत्रण) सामान्य रूप से काम कर रहा था। सौभाग्य से, प्लेन में सवार 222 यात्रियों और चालक दल को कोई चोट नहीं आई। लेकिन जब प्लेन की जांच की गई, तो उसके अगले हिस्से (नोज रडोम) को काफी नुककसान पहुंचा था। जिसके चलते प्लेन को मरम्मत के लिए रोक दिया गया।

डीजीसीए ने लगाए ये आरोप

डीजीसीए ने कहा क्रू (चालक दल के सदस्यों) के हवाले से कहा कि कि भारतीय वायुसेना ने पायलटों की मदद नहीं की। उनके मुताबिक, वायुसेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा यानी पाकिस्तान की तरफ रास्ता बदलने की अनुमति नहीं दी, और बाद में लाहौर ATC ने भी लैंडिंग से इनकार कर दिया। डीजीसीए का मानना है कि अगर पायलटों को सही समय पर अनुमति मिल जाती, तो शायद यह घटना न होती। डीजीसीए अब इस मामले की जांच कर रहा है। वे यह भी देख रहे हैं कि क्या पायलटों ने सही फैसला लिया या उनकी कोई गलती थी।

लेकिन भारतीय वायुसेना के सूत्रों ने डीजीसीए के इन आरोपों को गलत बताया। सूत्रों का कहना है कि उत्तरी क्षेत्र नियंत्रण केंद्र (Northern Area Control-NACC) को अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति देने का अधिकार नहीं है। यह काम दिल्ली एयर ट्रैफिक कंट्रोल का है। वायुसेना ने बताया कि उन्होंने पायलटों को तुरंत मदद दी। उन्होंने इंडिगो के चालक दल को लाहौर ATC की रेडियो फ्रीक्वेंसी दीं, ताकि पायलट वहां से अनुमति मांग सकें। जब लाहौर ने अनुमति नहीं दी, तो वायुसेना ने श्रीनगर तक प्लेन की सुरक्षित लैंडिंग के लिए रडार वेक्टर और ग्राउंड स्पीड की जानकारी दी।

वायुसेना सूत्रों ने यह भी बताया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर से पहले एक नोटाम (Notice to Airmen-NOTAM A0220/25) जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि 23 मई 2025 तक भारतीय सिविल या मिलिट्री प्लेनों को उनके हवाई क्षेत्र में आने की अनुमति नहीं है। भारत ने भी जवाब में अपने हवाई क्षेत्र को पाकिस्तानी प्लेनों के लिए बंद कर रखा था (NOTAM G0586/25)। जिसे 23 मई की शाम को आगे बढ़ा कर 23 जून 2025 कर दिया गया है।

चालक दल ने ऐसा फैसला क्यों लिया?

एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों ने पायलटों के फैसले पर कई सवाल उठाए हैं। इंडिगो के प्लेन में मौसम रडार होता है, जो खराब मौसम को पहले ही दिखा देता है। पायलटों ने रडार पर खराब मौसम देखा था। वेक्टर रडार में रंगों के आधार पर बारिश और ओलावृष्टि की तीव्रता का अनुमान लगाया जाता है, और पायलटों को इसके लिए ट्रेनिंग दी जाती है। फिर भी, पायलट ने घने बादलों के बीच जाने का फैसला क्यों लिया?

वायुसेना सूत्रों का कहना है कि वे पठानकोट के पास जिस लोकेशन पर थे, वहां से आगे जाना बहुत रिस्की था। ऐसे में वे पीछे लौट सकते थे। वहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट अमृतसर का था, जो वहां से लगभग 150 किमी की दूरी पर था। वे पाकिस्तानी एयर स्पेस में जाने की बजाय वहां से यूटर्न भी ले सकते थे औऱ सेफ लैंडिंग कर सकते थे। इससे प्लेन को नुकसान भी नहीं पहुंचता।

एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों ने इंडिगो कंपनी पर ही सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कंपनी ने पैसे बचाने के लिए श्रीनगर जाने का कदम उठाया होगा। उन्होंने कहा कि पायलटों से कहा गया होगा कि वापस दिल्ली लौटने में समय और ईंधन ज्यादा लगेगा। साथ ही अगर वे अमृतसर लैंडिंग करते हैं, तो यात्रियों के खाने-पीने और ठहरने का भी इंतजाम करना होगा। इसलिए, चालक दल ने खराब मौसम के बीच से होकर श्रीनगर जाने का फैसला किया। लेकिन यह फैसला जोखिम भरा था, क्योंकि प्लेन को ओलावृष्टि और तेज हवाओं का सामना करना पड़ा। डीजीसीए अब इस बात की जांच कर रहा है कि क्या पायलटों का यह फैसला सही था या उन्होंने जल्दबाजी की।

क्या मौसम रडार में कोई खराबी थी?

एयरबस A321 जैसे प्लेन में मौसम रडार बहुत आधुनिक होता है। यह बारिश, ओलावृष्टि और गरज-चमक वाले बादलों को आसानी से पकड़ लेता है। इस मामले में भी रडार ने खराब मौसम का संकेत दिया था, क्योंकि पायलटों ने उसी के आधार पर रास्ता बदलने की मांग की थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या रडार ने मौसम की सही जानकारी दी थी? कुछ लोग मानते हैं कि शायद पायलटों ने रडार की जानकारी को ठीक से समझा नहीं, या फिर मौसम इतनी तेजी से बिगड़ा कि उनके पास फैसला लेने का समय नहीं था। डीजीसीए इस बात की भी जांच कर रहा है।

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कई सांसद थे सवार

प्लेन में 222 यात्री सवार थे, जिनमें तृणमूल कांग्रेस के पांच सांसद जिनमें डेरेक ओ’ब्रायन, नदीमुल हक, सागरिका घोष, मानस भुनिया, और ममता ठाकुर भी शामिल थे। ये सांसद नियंत्रण रेखा (LoC) के पास गोलाबारी से प्रभावित लोगों से मिलने जा रहे थे। सागरिका घोष ने बताया कि यह अनुभव “मौत के करीब” जैसा था। जब प्लेन हिल रहा था, तो यात्री डर के मारे चीख रहे थे और प्रार्थना कर रहे थे। लैंडिंग के बाद जब उन्होंने प्लेन का अगला हिस्सा (नोज रडोम) टूटा हुआ देखा, तो सभी हैरान रह गए। सागरिका ने पायलटों की तारीफ की, जिन्होंने इतनी मुश्किल स्थिति में प्लेन को सुरक्षित उतारा।

इंडिगो ने क्या कहा?

इंडिगो ने अपने बयान में कहा कि उनकी उड़ान को अचानक ओलावृष्टि का सामना करना पड़ा, लेकिन यह श्रीनगर में सुरक्षित उतर गया। एयरलाइन ने सभी यात्रियों को उतरने के बाद मदद दी और कहा कि प्लेन को पूरी जांच और मरम्मत के बाद ही दोबारा उड़ान के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

Theatre Commands: फ्यूचर में अगर हुआ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ तो इस तरह लड़ा जाएगा युद्ध, तीनों सेनाओं के चीफ के पास नहीं होगी ये जिम्मेदारी!

CDS Reveals: Theatre Commands to Lead India’s Future Wars
Credit: HQ-IDS X account

Theatre Commands: ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान पर सफलतापूर्वक कड़ी कार्रवाई करने के बाद चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने अपनी नई किताब को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने भविष्य में होने वाले युद्धों की रणनीति को लेकर एक किताब लिखी है। इस किताब का नाम है “रेडी, रिलेवेंट एंड रिसर्जेंट: ए ब्लूप्रिंट फॉर द ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ इंडियाज मिलिट्री” (Ready, Relevant and Resurgent: A Blueprint for the Transformation of India’s Military)। इस किताब में उन्होंने भारतीय सेनाओं के लिए एक नया खाका पेश किया है, जिसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब युद्ध और मिलिट्री ऑपरेशंस की जिम्मेदारी थिएटर कमांडरों को दी जाएगी, न कि थल सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों को। इस किताब को गुरुवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में लॉन्च किया।

Theatre Commands क्या है और क्यों जरूरी है?

जनरल अनिल चौहान ने अपनी किताब में बताया कि थिएटर कमांड एक ऐसी व्यवस्था होगी, जिसमें एक खास भौगोलिक क्षेत्र में मौजूद सभी मिलिट्री रिसोर्सेज और जवानों को एक ही कमांडर के नेतृत्व में लाया जाएगा। इसका मतलब है कि सेना, नौसेना और वायुसेना के जवान और हथियार एक साथ मिलकर काम करेंगे, और इन सभी की कमान एक थिएटर कमांडर के हाथ में होगी। अभी तक युद्ध के दौरान तीनों सेनाओं के प्रमुख अपनी-अपनी सेनाओं को निर्देश देते थे, लेकिन अब यह जिम्मेदारी थिएटर कमांडर की होगी।

सीडीएस ने इसे दो हिस्सों में बांटा है – “फोर्स एप्लिकेशन” और “फोर्स जेनरेशन”। फोर्स एप्लिकेशन का मतलब है युद्ध लड़ना और मिलिट्री ऑपरेशंस चलाना, जो थिएटर कमांडर का काम होगा। वहीं, फोर्स जेनरेशन का मतलब है सैनिकों को भर्ती करना, उनकी ट्रेनिंग करना और सेना को बनाए रखना, जिसे रेज, ट्रेन एंड सस्टेन (आरटीएस) कहा जाता है। यह जिम्मेदारी अब भी सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों के पास रहेगी।

क्यों पड़ी बदलाव की जरूरत?

जनरल चौहान ने अपनी किताब में लिखा है कि आज के समय में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। पहले युद्ध सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित थे, लेकिन अब इसमें साइबर हमले, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम, अंतरिक्ष और बाहरी अंतरिक्ष जैसे नए क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और जल सुरक्षा जैसे मुद्दों ने भी सुरक्षा की परिभाषा को बदल दिया है। ऐसे में सेना को इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहना होगा।

CDS Reveals: Theatre Commands to Lead India’s Future Wars
Credit: HQ-IDS X account

उन्होंने कहा कि हमें अपनी सोच, संगठन और संसाधनों में बड़ा बदलाव लाना होगा। सेना को न सिर्फ नए हथियारों और तकनीकों की जरूरत है, बल्कि हमें अपनी रणनीति, तकनीक और युद्ध की प्रक्रियाओं को भी आधुनिक बनाना होगा। जनरल चौहान ने इसे एक “क्वांटम जंप” यानी बहुत बड़ा बदलाव बताया, जो हमें भविष्य के लिए तैयार करेगा।

थिएटर कमांड लागू करने में क्या हैं चुनौतियां?

सीडीएस ने यह भी स्वीकार किया कि थिएटर कमांड लागू करना आसान नहीं होगा। इसके लिए सेना, नौसेना और वायुसेना को एक साथ मिलकर काम करना होगा, जिसे “जॉइंटनेस” कहा जाता है। अभी तक तीनों सेनाएं अपने-अपने तरीके से काम करती रही हैं, लेकिन अब उन्हें एकजुट होकर एक ही कमांडर के नेतृत्व में काम करना होगा। इसके लिए कई प्रक्रियाओं, गतिविधियों और बुनियादी ढांचे को एक साथ लाना होगा।

जनरल चौहान ने लिखा कि यह बदलाव तभी सफल होगा, जब सभी स्तर के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी जाए और वे इसे स्वीकार करें। उन्होंने कहा कि यह भारतीय सेनाओं के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव होगा, जो आजादी के बाद के युग में सेना को एक नई दिशा देगा।

ऑपरेशन सिंदूर में दिखी झलक!

ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेनाओं के लिए एक मिसाल बन गया है, जिसमें सेना, नौसेना और वायुसेना ने अद्भुत तालमेल दिखाया। इस ऑपरेशन ने यह साबित कर दिया कि तीनों सेनाओं के बीच सिनर्जी कितनी प्रभावी हो सकती है। यह थिएटर कमांड कॉन्सेप्ट की एक छोटी सी झलक है।

थिएटर कमांड के पीछे का मुख्य सोच यही है कि एक खास ज्योग्राफिकल एरिया में तीनों सेनाओं के रिसोर्सेज और जवानों को एक कमांडर के नेतृत्व में लाया जाए। ऑपरेशन सिंदूर में ऐसा ही कुछ देखने को मिला। तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने एकजुट होकर रणनीति बनाई और उसे लागू किया, जिसके परिणामस्वरूप ऑपरेशन सफल रहा। इस दौरान सेना ने जमीन पर, नौसेना ने समुद्र में और वायुसेना ने एयर ऑपरेशंस को एक साथ मिलकर अंजाम दिया।

जनरल चौहान ने अपनी किताब में लिखा है कि भविष्य के युद्धों में साइबर, अंतरिक्ष और जलवायु जैसे नए क्षेत्रों को शामिल करना होगा। ऑपरेशन सिंदूर ने यह संकेत दिया कि थिएटर कमांड लागू होने पर भारतीय सेना इन चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हो सकती है।

जनरल चौहान ने अपनी किताब में भविष्य के युद्धों की तैयारी पर भी जोर दिया। उन्होंने तकनीक के महत्व पर भी प्रकाश डाला। जनरल चौहान ने कहा कि तकनीक युद्ध के तरीके को पूरी तरह बदल देती है। आज सैन्य तकनीक का इस्तेमाल नागरिक क्षेत्र में और नागरिक तकनीक का इस्तेमाल सेना में हो रहा है। हमें इन नई तकनीकों को अपनाना होगा और अपनी रणनीति को उनके अनुसार ढालना होगा।

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जनरल अनिल चौहान को सितंबर 2022 में सीडीएस नियुक्त किया गया था। पिछले 22 महीनों से वे इस पद पर हैं और इस दौरान उन्होंने सेना में कई बदलावों की शुरुआत की है। अपनी किताब में उन्होंने लिखा कि हमें पुरानी सोच को छोड़कर नई शुरुआत करनी होगी। उन्होंने एक कहावत का जिक्र किया – “हमें फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी पुरानी आदतों को छोड़कर नई शुरुआत करनी होगी। हमें अपने पुरखों की सीख को याद करना होगा और उनके अनुभवों से सीखते हुए आगे बढ़ना होगा।”

Permanent Commission for Woman: सुप्रीम कोर्ट ने नौसेना को लगाई फटकार, ‘अहंकार छोड़ें, महिला अधिकारी को दें परमानेंट कमीशन’

SC to Navy: Drop Ego, Grant Permanent Commission to Woman Officer
Credit: AI Image (For Representation purpose only)

Permanent Commission for Woman: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय नौसेना को कड़ी फटकार लगाई है। नौसेना ने 2007 बैच की एक शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) महिला अधिकारी को स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) देने में ढिलाई बरती, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। यह अधिकारी नौसेना की जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) शाखा में कार्यरत हैं और उनका नाम सीमा चौधरी है। कोर्ट ने नौसेना को साफ निर्देश दिए कि वह अपना अहंकार छोड़ें और इस अधिकारी को तुरंत स्थायी कमीशन दें।

Permanent Commission for Woman: क्या है पूरी कहानी

सीमा चौधरी ने 6 अगस्त 2007 को भारतीय नौसेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन ऑफिसर के रूप में जेएजी शाखा में अपनी सेवा शुरू की थी। 2009 में उन्हें लेफ्टिनेंट और 2012 में लेफ्टिनेंट कमांडर के पद पर पदोन्नति मिली। उनकी सेवा के दौरान, नवंबर 2016 में उन्हें दो साल का विस्तार दिया गया और फिर अगस्त 2018 में दोबारा इतने ही समय के लिए विस्तार मिला। लेकिन 5 अगस्त 2020 को उन्हें सूचित किया गया कि उनकी सेवा 5 अगस्त 2021 को समाप्त हो जाएगी।

सीमा इसके खिलाफ अदालत पहुंच गईं। उन्होंने पहले भी कई बार कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दरअसल, 17 मार्च 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम लेफ्टिनेंट कमांडर एनी नागराजा मामले में फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि शिक्षा, कानून और लॉजिस्टिक्स कैडर की सभी एसएससी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन के लिए विचार किया जाना चाहिए। इस फैसले के तहत सीमा का नाम भी उन अधिकारियों में शामिल था, जिन्हें स्थायी कमीशन मिलना था। लेकिन नौसेना ने उन्हें यह अवसर नहीं दिया।

क्या था नौसेना का तर्क?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, नौसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने पक्ष रखते हुए कहा कि सीमा चौधरी की 2016-2017 से 2018-19 तक की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में कुछ नकारात्मक टिप्पणियां थीं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि इन टिप्पणियों को रिव्यू ट्रिब्युनल ने पहले ही रद्द कर दिया था। कोर्ट ने सवाल किया कि जब सीमा हर मापदंड में फिट पाई गईं, तो फिर उन्हें स्थायी कमीशन क्यों नहीं दिया गया?

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति सूर्या कांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए नौसेना के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई। न्यायमूर्ति कांत ने कहा, “अब बहुत हो गया। नौसेना को अपना अहंकार छोड़ना होगा। हम आपको एक हफ्ते का समय देते हैं कि सीमा चौधरी को स्थायी कमीशन दे दिया जाए।” उन्होंने यह भी कहा कि नौसेना के पुरुष अधिकारियों का रवैया सही नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सीमा ने सभी क्षेत्रों में अच्छे अंक हासिल किए, लेकिन एक पुरुष अधिकारी ने उनकी मेहनत को नजरअंदाज करते हुए उन्हें अयोग्य करार दे दिया।

सीमा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली ने कोर्ट में कहा कि नौसेना पुरुषों को सीधे स्थायी कमीशन देती है, लेकिन महिलाओं को पहले शॉर्ट सर्विस कमीशन से गुजरना पड़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि नौसेना में बहुत कम जेएजी महिला अधिकारी हैं और अभी तक किसी को भी स्थायी कमीशन नहीं मिला है।

2024 में अपने फैसले में ये कहा था

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने सीमा चौधरी के मामले में नौसेना को निर्देश दिए हैं। 2024 में, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने नौसेना को निर्देश दिया था कि वह सीमा के मामले पर नए सिरे से विचार करे। कोर्ट ने कहा था कि एक नया चयन बोर्ड बनाया जाए और सीमा के मामले को अलग से देखा जाए, क्योंकि वह 2007 बैच की एकमात्र जेएजी अधिकारी थीं, जिनके स्थायी कमीशन पर विचार किया जाना था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर सीमा को जगह देने के लिए रिक्तियों में बढ़ोतरी करनी पड़े, तो ऐसा किया जाए, लेकिन यह भविष्य के लिए मिसाल न बने।

इसके बावजूद, नौसेना ने कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया। सीमा ने नौसेना पर कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाते हुए दोबारा सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें स्थायी कमीशन इसलिए नहीं दिया जा रहा, क्योंकि उन्होंने एक पुरुष अधिकारी के खिलाफ कार्यस्थल पर उत्पीड़न की शिकायत की थी। जांच में उनकी शिकायत सही पाई गई थी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें एक दिन के अंदर ट्रांसफर कर दिया गया, जबकि उस पुरुष अधिकारी को उसी जगह पर रहने दिया गया।

“2024 का फैसला अंतिम”

न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने नौसेना को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, “2024 का फैसला अंतिम है और उसमें साफ निर्देश दिए गए थे। नौसेना के अधिकारी अपनी मर्जी से फैसले नहीं ले सकते। उन्हें यह अहंकार का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। सीमा चौधरी को तुरंत स्थायी कमीशन दिया जाए।” कोर्ट ने यह भी कहा कि यह अन्याय लंबे समय से चला आ रहा है और अब इसे ठीक करने का समय है।

Permanent Commission: ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका निभाने वाली महिला विंग कमांडर को मिलेगा परमानेंट कमीशन, सुप्रीम कोर्ट ने खोला रास्ता

कोर्ट ने इस मामले को जुलाई के पहले हफ्ते में सुनवाई के लिए रखा है। नौसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. बालासुब्रमण्यम ने कोर्ट से अपील की है कि उन्हें अपने पक्ष को तैयार करने के लिए कुछ समय दिया जाए। लेकिन कोर्ट ने साफ कर दिया कि नौसेना को जल्द से जल्द इस मामले में फैसला लेना होगा।

Permanent Commission: ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका निभाने वाली महिला विंग कमांडर को मिलेगा परमानेंट कमीशन, सुप्रीम कोर्ट ने खोला रास्ता

Supreme Court Opens Door for Permanent Commission to Woman Officer Who Played Key Role in Operation Sindoor
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Permanent Commission: ऑपरेशन सिंदूर में अहम भूमिका निभाने वाली एक महिला विंग कमांडर के परमानेंट कमीशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट एक ऐतिहासिक फैसले में भारतीय वायुसेना की एक महिला विंग कमांडर को अगस्त 2025 में होने वाले रिटायरमेंट की बजाय अपनी सेवा जारी रखने की अनुमति दी है। विंग कमांडर पांडे ने ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन बालाकोट जैसे महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया था। उन्होंने स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

Permanent Commission: भारतीय वायुसेना में 13 साल तक दी सेवाएं

विंग कमांडर पांडे ने भारतीय वायुसेना में 13 साल तक अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान उन्होंने कई चुनौतीपूर्ण हालात में अपनी ड्यूटी को पूरी जिम्मेदारी के सााथ पूरा किया। ऑपरेशन बालाकोट 2019 में हुआ था, भारत की आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक कार्रवाई थी। जबकि ऑपरेशन सिंदूर हाल ही में पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ शुरू किया गया था, जो अभी भी जारी है।

इसके बावजूद, विंग कमांडर पांडे को अगस्त 2025 में रिटायर होने का आदेश मिला। भारतीय वायुसेना में परमानेंट कमीशन मिलने के बाद उनकी सेवा अवधि बढ़ जाती है और उच्च पदों तक पहुंचने का रास्ता खुल जाता है। लेकिन महिलाओं के लिए यह अवसर अभी भी सीमित हैं। इस आदेश के खिलाफ, पांडे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और परमानेंट कमीशन देने की मांग की।

भविष्य में स्थायी कमीशन के लिए बनाए नीति

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्या कांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने की। सुनवाई के दौरान, विंग कमांडर पांडे की ओर से सीनियर वकील मनेका गुरुस्वामी ने उनका पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट से कहा, “विंग कमांडर पांडे ने 13 साल तक भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन बालाकोट जैसे महत्वपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया। इतने अनुभव और योगदान के बावजूद, उन्हें अगले महीने रिटायर होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह उनके साथ अन्याय है और देश की डिफेंस कैपेबिलिटी के लिए भी नुकसानदायक है।”

न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने इस मामले में गहरी संवेदनशीलता दिखाते हुए उन्होंने सरकार की ओर से मौजूद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी से कहा, “उन्हें सेवा में बने रहने दें। हमें ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।” उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सरकार को भविष्य में ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन का रास्ता खुले।

सरकार ने कही ये बात

एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि विंग कमांडर पांडे ने स्थायी कमीशन के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने से पहले संबंधित प्राधिकरणों या ट्रिब्यूनल में कोई आवेदन नहीं दिया। उन्होंने यह भी बताया कि वायुसेना के बोर्ड ने पांडे को स्थायी कमीशन के लिए अनफिट माना था। भाटी ने यह दावा भी किया कि हाल के सालों में काफी महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया गया है। उन्होंने कहा, “अगर आप आंकड़े देखें, तो महिलाओं को पहले की तुलना में कहीं अधिक स्थायी कमीशन मिल रहा है।”

हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने इस दलील पर जोर दिया कि केवल आंकड़ों की बात करना काफी नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें समानता और योग्यता के आधार पर नीतियां बनानी चाहिए। अगर एक सक्षम अधिकारी, जिसने महत्वपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया है, उसे रिटायर होने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो यह नीतिगत कमी को दर्शाता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि इस फैसले से कोई विशेष अधिकार (इक्विटी) नहीं बनाया जाएगा। इसका मतलब है कि विंग कमांडर पांडे को फिलहाल अपनी सेवा जारी रखने की अनुमति दी गई है, लेकिन इस मामले का अंतिम फैसला पूरी सुनवाई के बाद होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार और भारतीय वायुसेना को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश काफी अहम माना जा रहा है। इससे अन्य महिला अधिकारियों को भी फायदा होगा, जो स्थायी कमीशन की मांग कर रही हैं।

2020 में खुला था स्थायी कमीशन का रास्ता

भारतीय सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। पहले, महिलाओं को केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत भर्ती किया जाता था, जिसकी अवधि सीमित होती थी। हाल के वर्षों में, सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों ने महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का रास्ता साफ किया है। 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन और कमांड पोस्ट देने से इनकार करना लैंगिक भेदभाव है। इस फैसले के बाद, कई महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन मिला।

न्यायमूर्ति सूर्या कांत ने सुनवाई के दौरान यह सुझाव दिया कि सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जो अधिक महिलाओं को स्थायी कमीशन प्रदान करने की प्रक्रिया को आसान बनाएं। यह सुझाव भारतीय सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वर्तमान में, भारतीय वायुसेना में महिलाएं पायलट, नेविगेटर और अन्य तकनीकी भूमिकाओं में अपनी सेवाएं दे रही हैं। लेकिन स्थायी कमीशन की प्रक्रिया में अभी भी कई बाधाएं हैं, जैसे चयन बोर्ड की सख्त मापदंड और सीमित कोटा।

OROP Supreme Court: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया- इन रिटायर्ड कर्मियों को OROP के तहत नहीं मिलेगी बढ़ी हुई पेंशन!

कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर कोर्ट ने कही थी ये बात

इससे पहले ऑपरेशन सिंदूर का चेहरा बनीं कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया थाा। 17 फरवरी 2020 को, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) देने के अपने ऐतिहासिक फैसले में कर्नल सोफिया कुरैशी की उपलब्धियों की विशेष रूप से जिक्र किया था। कोर्ट ने कहा था कि कर्नल सोफिया, जो आर्मी सिग्नल कोर में लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में कार्यरत थीं, पहली महिला अधिकारी थीं, जिन्होंने 2016 में ‘एक्सरसाइज फोर्स 18’ नामक मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज में भारतीय सेना के दस्ते का नेतृत्व किया था। यह भारतीय सेना द्वारा आयोजित सबसे बड़ा विदेशी सैन्य अभ्यास था।

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने 2006 में कांगो में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने युद्धविराम की निगरानी और मानवीय सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नल सोफिया के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि महिला अधिकारी पुरुष सहकर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की सेवा कर रही हैं और उनकी क्षमताओं पर लिंग के आधार पर सवाल उठाना संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है। कोर्ट ने जोर दिया कि महिलाओं को कमांड भूमिकाओं से वंचित करना अनुचित है और उनकी योग्यता को सम्मान देना चाहिए।