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1965 War Diamond Jubilee: रक्षामंत्री बोले- ‘जीत हमारे लिए अपवाद नहीं, बन चुकी है आदत’, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और वीर अब्दुल हमीद को किया याद

1965 War Diamond Jubilee
Raksha Mantri Rajnath Singh Interacting with 1965 War veterans.

1965 War Diamond Jubilee: भारत-पाक युद्ध 1965 की 60वीं वर्षगांठ (डायमंड जुबली) के अवसर पर 19 सितंबर 2025 को रक्षा मंत्रालय की ओर से विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 1965 युद्ध के वीर वेटरंस और शहीद सैनिकों के परिजनों से मुलाकात की। साउथ ब्लॉक में आयोजित इस समारोह में रक्षामंत्री ने देश की रक्षा में बलिदान देने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी और युद्ध में अदम्य साहस दिखाने वाले वीरों को नमन किया।

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रक्षामंत्री ने कहा कि पाकिस्तान ने उस समय घुसपैठ और गुरिल्ला हमलों से भारत को डराने की कोशिश की थी, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि हर भारतीय सैनिक इस भावना से लड़ता है कि राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि भारत के सैनिकों ने उस कठिन समय में जिस बहादुरी और देशभक्ति का परिचय दिया, वह इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

राजनाथ सिंह ने इस दौरान युद्ध के प्रमुख मोर्चों खेमकरण में असल उत्तर की लड़ाई, सियालकोट में चविंडा और फिल्लोरा की भीषण लड़ाई का भी जिक्र किया। उन्होंने खासतौर पर परम वीर चक्र से सम्मानित कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद की बहादुरी को याद किया। असल उत्तर की लड़ाई में अब्दुल हमीद ने अपनी जान की परवाह किए बिना कई दुश्मन टैंकों को नष्ट कर दिया था। रक्षामंत्री ने कहा, “अब्दुल हमीद ने साबित किया कि बहादुरी हथियार के साइज से नहीं, बल्कि दिल के आकार से तय होती है।”

अपने संबोधन में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की निर्णायक नेतृत्व क्षमता को भी याद किया। उन्होंने कहा, “कोई भी युद्ध सिर्फ रणभूमि में नहीं जीता जाता। जीत पूरे राष्ट्र की सामूहिक इच्छाशक्ति का परिणाम होती है। 1965 में शास्त्री जी ने न केवल राजनीतिक नेतृत्व दिया, बल्कि पूरे देश का मनोबल ऊंचा किया।”

1965 War Diamond Jubilee
Raksha Mantri Rajnath Singh Interacting with 1965 War veterans.

कार्यक्रम में रक्षामंत्री ने हाल के ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने भारत को झकझोर दिया था, लेकिन हमारी सेनाओं ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए दुश्मनों को सख्त संदेश दिया कि भारत को तोड़ा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर ने दिखा दिया कि अब जीत हमारे लिए अपवाद नहीं, बल्कि आदत बन चुकी है।”

राजनाथ सिंह ने इस अवसर पर सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि सैनिकों, वेटरंस, आश्रित परिवारों और शहीदों के परिजनों का कल्याण सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है। उन्होंने कहा, “हमारे सैनिकों को कभी संसाधनों की कमी न झेलनी पड़े, इसके लिए डिफेंस मॉर्डेनाइजेशन, बेहतर ट्रेनिंग और आधुनिक हथियारों पर लगातार काम किया जा रहा है।”

इस कार्यक्रम में थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी, वेस्टर्न के जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार, दिल्ली एरिया के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल भवनिश कुमार, कई वरिष्ठ अधिकारी, युद्ध के वेटरंस, गैलंट्री अवॉर्ड विजेता और शहीदों के परिजन मौजूद थे।

कार्यक्रम के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार ने वेस्टर्न कमांड की भूमिका और 1965 युद्ध की चुनौतियों पर बोलते हुए कहा कि कैसे भारतीय सेना ने अख्नूर, खेमकरण और असल उत्तर जैसे मोर्चों पर निर्णायक जीत हासिल की।

इस मौके पर एक विशेष डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई, जिसमें 1965 युद्ध की महत्वपूर्ण झलकियाँ और सैनिकों की वीरता की कहानियां भी दिखाई गईं। वेटरंस ने अपने अनुभव साझा किए, लेफ्टिनेंट जनरल सतीश के. नाम्बियार (सेवानिवृत्त) ने युद्ध के रणनीतिक पहलुओं पर विचार रखे, जबकि वीर चक्र विजेता मेजर आरएस बेदी ने युद्धभूमि की अपनी दिल दहला देने वाली कहानी सुनाई।

Smart Cantonments India: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का ऐलान; 2035 तक स्मार्ट और ग्रीन बनेंगे कैंटोनमेंट बोर्ड्स

Smart Cantonments India
Raksha Mantri Rajnath Singh inaugurated MANTHAN 2025 in New Delhi Today

Smart Cantonments India: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारतीय डिफेंस एस्टेट्स सर्विस (IDES) अधिकारियों से आह्वान किया है कि वे देशभर के कैंटोनमेंट बोर्ड्स को स्मार्ट, ग्रीन और सस्टेनेबल शहरी इकोसिस्टम में बदलने की दिशा में काम करें। उन्होंने कहा कि यह कदम सरकार के विकसित भारत विजन के अनुरूप वर्ष 2035 तक इस लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। रक्षा मंत्री 18 सितंबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ‘मंथन 2025’ के उद्घाटन सत्र में मुख्य भाषण दे रहे थे। इस सम्मेलन का विषय था – ‘स्ट्रेटेजिक रोडमैप टू विकसित भारत @2047’।

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राजनाथ सिंह ने आईडीईएस अधिकारियों की सराहना करते हुए कहा कि वे एक साथ दो जिम्मेदारियां निभा रहे हैं – 18 लाख एकड़ से अधिक रक्षा भूमि का प्रबंधन और देशभर के 61 कैंटोनमेंट्स में रहने वाले नागरिकों का कल्याण। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि कैंटोनमेंट्स को आधुनिक शहरों की तरह विकसित किया जाए। इसके लिए सिस्टम और प्रक्रियाओं को लगातार अपग्रेड करना होगा ताकि सेवाएं ज्यादा कारगर, पारदर्शी और नागरिक-अनुकूल बन सकें।

रक्षा मंत्री ने जोर दिया कि डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है ताकि लोग अपने घर बैठे ही पारदर्शी और समयबद्ध सेवाओं का लाभ उठा सकें। साथ ही, नागरिकों की भागीदारी बढ़ानी होगी ताकि वे कैंटोनमेंट्स की भविष्य की योजनाओं के साझेदार बन सकें। उन्होंने कहा, “हमें कैंटोनमेंट बोर्ड्स को आधुनिक, पारदर्शी और जवाबदेह संस्थाओं में बदलना होगा। जो समय की मांग के मुताबिक सेवाएं दे सकें। यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि कैंटोनमेंट में रहने वाले नागरिकों को सर्वोत्तम नागरिक सुविधाएं और शिकायत निवारण की तुरंत व्यवस्था मिले।”

उन्होंने निवासियों के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर जोर देते हुए कहा कि ई-छावनी 2.0 (e-Chhawani 2.0) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाना होगा। इसमें एआई-आधारित शिकायत निवारण, मल्टीलिंगुअल सेवाएं और स्मार्ट हेल्थ सुविधाएं शामिल की जानी चाहिए। राजनाथ सिंह ने कहा कि भविष्य के कैंटोनमेंट्स को स्मार्ट पावर सिस्टम, रिन्यूएबल एनर्जी ग्रिड, ईवी चार्जिंग हब, स्मार्ट वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट और एआई-आधारित सर्विलांस सिस्टम से लैस किया जाना चाहिए।

उन्होंने आईडीईएस और कैंटोनमेंट बोर्ड्स को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की भी जरूरत बताई। इस दिशा में ब्रेनस्टॉर्मिंग कर ठोस फ्रेमवर्क तैयार करने की बात कही। रक्षा मंत्री ने भरोसा दिलाया कि सरकार इस प्रयास में पूरा सहयोग करेगी।

राजनाथ सिंह ने डायरेक्टरेट जनरल ऑफ डिफेंस एस्टेट्स (DGDE) की उपलब्धियों की सराहना की, जिनमें ईज ऑफ डूइंग को बढ़ावा देने के लिए ई-कनेक्ट जैसे प्लेटफॉर्म की शुरुआत शामिल है। उन्होंने कहा कि कैंटोनमेंट बोर्ड्स पर्यावरण के अनुकूल विकास का उदाहरण पेश कर रहे हैं। “आज जब हरियाली घट रही है, तब कैंटोनमेंट हमें दिखाते हैं कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं।”

उन्होंने अधिकारियों से अपील की कि वे लगातार खुद को अपग्रेड करें, नई स्किल्स सीखें और ज्ञान बढ़ाएं। उनके अनुसार, काम को सिर्फ नौकरी न मानकर राष्ट्र निर्माण का माध्यम समझना चाहिए। “अपनी प्रतिभा, ऊर्जा और समय का सर्वोत्तम उपयोग कीजिए। हर दिन खुद को बेहतर बनाइए। आपकी हर कोशिश देश को और मजबूत बना रही है।”

इस अवसर पर वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, डीजीडीई शैलेंद्र नाथ गुप्ता और डीजीडीई-डिजिगनेट शोभा गुप्ता सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

Heron Drones India: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत का बड़ा फैसला, इजराइल से खरीदेगा और हेरॉन ड्रोन, स्पाइक एंटी-टैंक मिसाइलों से होंगे लैस

India to Buy More Heron Drones from Israel, Armed with Spike Anti-Tank Missiles

Heron Drones India: भारतीय सेनाएं अब इजराइल से और अधिक हेरॉन ड्रोन (Heron UAVs) खरीदने जा रही हैं। ये फैसला ऑपरेशन सिंदूर में इनकी सफल तैनाती के बाद लिया गया है। खास बात यह है कि इन ड्रोन को अब और भी ताकतवर बनाने की योजना है। इन्हें स्पाइक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों (Spike ATGMs) से लैस किया जाएगा, जिससे भविष्य के युद्धों में ये सीधे दुश्मन के ठिकानों पर वार कर सकेंगे।

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रक्षा सूत्रों के मुताबिक, भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना के पास पहले से ही बड़ी संख्या में हेरॉन ड्रोन मौजूद हैं। जो तीनों सेनाएं अपने-अपने बेस से इन्हें ऑपरेट करती हैं। खुफिया एजेंसियां भी इन्हीं ड्रोन का इस्तेमाल स्पेशल ऑपरेशंस में करती रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ इन ड्रोन ने अहम भूमिका निभाई थी। उस समय इन्हें इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉन्नेसेंस (ISR) मिशनों में लगाया गया था। इस ऑपरेशन में मिली सफलता के बाद सेना को यह भरोसा मिला कि इन्हें और बड़ी संख्या में खरीदा जा सकता है।

सेना के एक विंग ने हेरॉन ड्रोन को और अधिक घातक बनाने की दिशा में काम शुरू कर दिया है। इन पर स्पाइक-एनएलओएस (Spike NLOS – Non Line of Sight) एंटी-टैंक मिसाइल लगाने की तैयारी चल रही है। इससे यह क्षमता मिलेगी कि ड्रोन न सिर्फ निगरानी करें बल्कि दुश्मन के ठिकानों को निशाना भी बना सकें।

हेरॉन ड्रोन का उपयोग भारतीय सेनाएं लंबे समय से चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर निगरानी के लिए करती रही हैं। इनकी रेंज और ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता इन्हें खास बनाती है। खासकर हिमालयी इलाकों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में हेरॉन ने खुद को बेहद उपयोगी साबित किया है।

भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय लंबे समय से प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah) पर काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य हेरॉन ड्रोन की निगरानी और कॉम्बैट क्षमता को और बढ़ाना है। इसके तहत इन ड्रोन को अपग्रेड किया जा रहा है ताकि ये लंबी दूरी तक लगातार मिशन कर सकें और सैटेलाइट कम्युनिकेशन के जरिए और ज्यादा रेंज हासिल कर सकें।

भारत हाल के वर्षों में हेरॉन मार्क-2 (Heron Mk-2) ड्रोन भी खरीद रहा है। ये ड्रोन आधुनिक सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम से लैस हैं और लंबी अवधि तक उड़ान भरने की क्षमता रखते हैं। इससे सीमाओं पर लगातार निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाना आसान हो गया है।

इसके साथ ही भारत अपने स्वदेशी कार्यक्रम पर भी जोर दे रहा है। सरकार मीडियम ऑल्टिट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) ड्रोन डेवलप करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस योजना के तहत 87 नए यूएवी खरीदे जाने की योजना है, जिसके लिए जल्द ही बोली शुरू की जाएगी। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, आने वाले 10 से 15 वर्षों में भारतीय सशस्त्र बलों को करीब 400 MALE ड्रोन की जरूरत होगी।

डिफेंस सेक्टर की प्रमुख कंपनियां जैसे हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड, लार्सन एंड टूब्रो, सोलार इंडस्ट्रीज डिफेंस एंड एयरोस्पेस, और अदाणी डिफेंस इसमें प्रमुख दावेदार हो सकती हैं। इसके अलावा कुछ ड्रोन इजराइली डिफेंस कंपनियों के सहयोग से भी डेवलप किए जाने की संभावना है।

Eagle in the Arm: अब सेना में हर जवान के पास हथियार के साथ ‘हाथ में होगा ईगल’, इंडियन आर्मी ने शुरू की बड़ी तैयारी

Eagle in the Arm Concept Leads Modernisation of Indian Army Drone Transformation
Chief of Army Staff Gen Upendra Dwivedi visited Likabali in Arunachal Pradesh

Eagle in the Arm: भारतीय सेना तेजी से ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम को अपनी यूनिट्स में शामिल कर रही है। कई यूनिट पहले ही ड्रोन आधारित ऑपरेशन्स को अपना चुकी हैं और देश की प्रमुख सैन्य अकादमियों में विशेष ड्रोन सेंटर्स स्थापित किए गए हैं। इनमें देहरादून की इंडियन मिलिट्री अकादमी, मऊ का इन्फैंट्री स्कूल और चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी शामिल हैं। इन सेंटर्स का मकसद है कि सेना के हर जवान को ड्रोन ऑपरेशन की ट्रेनिंग दी जाए।

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हाल ही में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अरुणाचल प्रदेश के लिकाबाली स्थित एक ऐसी ही ड्रोन फैसिलिटी सेंटर का दौरा किया। सेना अब ड्रोन ऑपरेशंस को सिर्फ एक्सपेरिमेंटल लेवल तक सीमित नहीं रख रही है, बल्कि इसे अपने मेन मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बना रही है।

सेना के अधिकारियों का कहना है कि इस पहल को “ईगल इन द आर्म” (Eagle in the Arm) कॉन्सेप्ट नाम दिया गया है। इसका मतलब है कि जैसे हर सैनिक अपने हथियार को साथ रखता है, वैसे ही उसे ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। यूनिट और सैनिक की जिम्मेदारी के आधार पर ड्रोन का इस्तेमाल अलग-अलग कामों में होगा। इनमें कॉम्बैट मिशन, निगरानी, लॉजिस्टिक्स और यहां तक कि मेडिकल इवैक्यूएशन भी शामिल है। साथ ही, सेना काउंटर-ड्रोन तकनीक भी अपना रही है ताकि दुश्मन के मानवरहित विमानों को मार गिराया जा सके।

बता दें कि इस साल 26 जुलाई को 26वें कारगिल विजय दिवस पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने द्रास में अपने भाषण में स्पष्ट किया था कि हर इन्फैंट्री बटालियन में एक विशेष ड्रोन प्लाटून होगी। उन्होंने कहा था कि आर्टिलरी रेजीमेंट को काउंटर-ड्रोन सिस्टम और लोइटर म्यूनिशन से लैस किया जाएगा। इसके अलावा, “दिव्यास्त्र बैटरियां” बनाई जाएंगी, जिनसे सेना की मारक क्षमता में जबरदस्त इजाफा होगा। उस समय सेना प्रमुख ने कहा था – “हमारी मारक क्षमता अब आने वाले दिनों में कई गुना बढ़ जाएगी।”

Indian Army Accelerates Drone Transformation: ‘Eagle in the Arm’ Concept at Core of Modernisation
Chief of Army Staff Gen Upendra Dwivedi visited Likabali in Arunachal Pradesh

वहीं, हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 26-27 अगस्त 2025 को मध्य प्रदेश के मऊ स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय ट्राई सर्विसेज सेमिनार ‘रण संवाद 2025’ में अपने संबोधन के दौरान भारतीय सेना में ड्रोन तकनीक के महत्व और इसकी ट्रेनिंग पर जोर देते हुए कहा था, “साल 2027 से भारतीय सेना के प्रत्येक सैनिक को आर्मी ट्रेनिंग कमांड द्वारा ड्रोन टेक्नोलॉजी की ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके साथ ही, भारतीय सेना ड्रोन वॉरफेयर को देखते हुए खास यूनिट्स बना रही है, जिनमें रुद्र ब्रिगेड, शक्तिमान रेजीमेंट, दिव्यास्त्र बैटरी, ड्रोन प्लाटून और भैरव बटालियन शामिल हैं। यह कदम आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा करने और तकनीकी रूप से सक्षम सेना तैयार करने के लिए उठाया जा रहा है।”

हाल ही में दुनियाभर में हुए वैश्विक संघर्षों में इस बात का पता चला है कि अब ड्रोन युद्ध में केवल एसेसरीज मात्र नहीं रह गए हैं, बल्कि बैटल फील्ड का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ड्रोन से सैनिकों को न केवल रीयल टाइम जानकारी मिलेगी बल्कि उन्हें दुश्मन पर तेज और सटीक वार करने की क्षमता भी मिलेगी। अब आने वाले समय में सैनिक के पास सिर्फ हथियार ही नहीं बल्कि एक “ईगल”, यानी ड्रोन भी होगा, जो उसकी आंखों, उसकी पहुंच और उसकी ताकत को बैटलफील्ड में कई गुना बढ़ा देगा।

MiG-21 Gun Troubles: शुरूआती मिग-21 थे ‘गनलेस जेट’, पढ़ें कैसे भारतीय वायु सेना ने ‘जुगाड़’ से इंटरसेप्टर को बनाया डॉगफाइटर

MiG-21 Gun Troubles: How Indian Air Force overcame Soviet design flaws

MiG-21 Gun Troubles: पिछली सीरीज में हमने आपको बताया था कि कैसे 1965 की जंग में पहली बार सुपरसोनिक फाइटर जेट मिग-21 की एंट्री हुई। और कैसे विंग कमांडर एमएसडी “मैली” वॉलेन ने अपनी के-13 मिसाइल से एक सेबर को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन मिसाइल ग्राउंड क्लटर के चलते निशाना चूक गया, वहीं दूसरी मिसाइल भी नाकाम रही। हालांकि इससके बाद पाकिस्तान में MiG-21 को लेकर खौफ छा गया था कि भारत के फाइटरजेट उसके सेबर और अमेरिकी F-104 स्टारफाइटर का मुकाबला कर सकते हैं। लेकिन इसके बीच एक दिक्कत भी सामने आई कि मिग-21 के शुरुआती मॉडल्स में गन नहीं थी और मिसाइल पर निर्भरता ने पायलटों को युद्ध में कई बार मुश्किल में डाल दिया था।

MiG21 in 1965 War: जब 1965 की जंग में मिग-21 ने पहली बार दिखाई अपनी सुपरसोनिक पावर, हकला गया था पाकिस्तानी एयर फोर्स का स्क्वॉड्रन लीडर

MiG-21 Gun Troubles: एक्सपोर्ट वर्जन से कई जरूरी उपकरण हटाए

साल 1960 के दशक की शुरुआत में जब पहले MiG-21F भारत पहुंचे, तो पायलट हैरान रह गए। यह मॉडल बेहद साधारण और अधूरा था। एक्सपोर्ट वर्जन से कई जरूरी उपकरण हटा दिए गए थे। इनमें आईएफएफ यानी Identification Friend or Foe सिस्टम नहीं था, रेडियो बेहद कमजोर थे और सबसे चौंकाने वाली कमी थी गनसाइट का न होना।

इसमें लगा हुआ “रिंग-एंड-बीड” रेटिकल द्वितीय विश्व युद्ध के विमान जैसा था। जबकि दस साल पहले आए MiG-15 में भी बेहतर जायरो गनसाइट लगा था।

भारत को मिला अगला वर्जन था MiG-21F-13 (Type-74)। इसमें जायरो गनसाइट तो था, लेकिन वह भी 2.75G से ऊपर की स्थिति में फेल हो जाता था। यानी असली डॉगफाइट में यह पूरी तरह बेकार साबित होता। साफ था कि सोवियत डिजाइनरों ने इस विमान को मिसाइल-केंद्रित बनाया था और गन को केवल औपचारिकता मान लिया था।

MiG-21 Gun Troubles: How Indian Air Force overcame Soviet design flaws
A Pakistan Air Force F-86 Sabre in the Gunsight of an Indian Air Force MiG-21 in the 1965 war
(Photo By: IAF Pilot Sameer Joshi)

MiG-21 Gun Troubles: हर गोली 1 किलो वजनी

मिग-21F-13 में लगी थी NR-30 कैनन, जो कागज पर बेहद शक्तिशाली थी। इसकी हर गोली 1 किलो वजनी थी, जो पश्चिमी 30 मिमी राउंड्स से दोगुनी भारी थी। यह 1000 राउंड प्रति मिनट की रफ्तार से फायर कर सकती थी। लेकिन इसमें सिर्फ एक ही कैनन लगी थी, वह भी स्टारबोर्ड साइड पर, और मात्र 80 राउंड्स की फीड थी।

यह गन वास्तव में बॉम्बर्स को रोकने के लिए बनाई गई थी, न कि डॉगफाइट्स के लिए। रिटायर्ड एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनिस ने बाद में कहा था कि गनसाइट इतनी सीमित थी कि टारगेट को हिट करने से पहले वह विमान की नाक के नीचे गायब हो जाता था।

MiG-21 Gun Troubles: मिग-21PF (Type-76) में गायब की गन

जब MiG-21PF (Type-76) आया, तो सोवियत डिजाइनरों ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए गन को पूरी तरह हटा दिया। इसमें नया RP-21 सैफायर रडार लगाया गया था, लेकिन वजन और ईंधन की जरूरत के कारण गन निकाल दी गई। असल ने सोवियत डिजाइनरों ने मिग-21 को इंटरसेप्टर के तौर पर डिजाइन किया था, ना कि डॉगफाइट या कॉम्बैट रोल के लिए।

MiG-21 Gun Troubles
Source: Legacy of a Legend- MiG-21 in the Indian Air Force

पूरी सीरीज पढ़ने के लिए इस लिंक MiG-21 पर क्लिक करें….

अब यह विमान केवल दो K-13 (AA-2 Atoll) इंफ्रारेड मिसाइलों पर निर्भर था। सोवियत सोच के मुताबिक यह काफी था। पश्चिम में भी उस दौर में यही ट्रेंड था। F-4 Phantom II और English Electric Lightning भी बिना गन के आए। केवल फ्रांस ने असहमति जताई और अपने Mirage III में ट्विन DEFA कैनन लगाए।

लेकिन भारतीय वायुसेना के लिए यह फैसला खतरनाक साबित होना था।

MiG-21 Gun Troubles: 1965 पहली लड़ाई और फेल हुई मिसाइल

4 सितंबर 1965 को जम्मू के जौरियां-अख्नूर सेक्टर में MiG-21 का कॉम्बैट डेब्यू हुआ। योजना थी कि मिग-21PF आसमान को सुरक्षित रखेंगे और पाकिस्तानी स्टारफाइटर्स को फंसाएंगे।

मिशन लीड कर रहे थे विंग कमांडर मल्ली वोल्लेन। उनके साथ थे उनके विंगमैन मुखो। दोनों सोवियत प्रेशर सूट में आसमान में पेट्रोलिंग कर रहे थे। तभी दो पाकिस्तानी F-86 सेबर नजर आए। वोल्लेन ने मिसाइल लॉक किया और फायर किया। पहली K-13 मिसाइल जमीन में जा गिरी। उन्होंने दूसरी मिसाइल चलाई, वह भी लक्ष्य से चूककर नीचे गिरी। अब उनके पास कोई हथियार नहीं बचा था।

गुस्से और निराशा में उन्होंने तय कर लिया कि वे सेबर को रैम यानी (टक्कर) मारेंगे। मिग-21 इतनी नजदीक पहुंच गया कि टक्कर महज 10 मीटर दूर रह गई। आखिरी क्षण में उन्होंने विमान ऊपर खींच लिया। बाद में उन्होंने बेस पर उतरते ही कहा— “एक तोप के लिए… सिर्फ एक तोप के लिए!”

भारतीय प्रेशर के बाद लगाया GP-9 गन पॉड

भारतीय वायुसेना ने तुरंत महसूस किया कि मिसाइलों पर निर्भर रहना खतरनाक है। सोवियत संघ पर दबाव डाला गया और नतीजे में आया GP-9 गन पॉड। इसमें लगा था GSh-23 ट्विन-बैरल गन, जो 3000 राउंड प्रति मिनट की स्पीड से फायर करता था।

200 राउंड्स के साथ यह लगभग 1300 मीटर तक प्रभावी था। GP-9 को विमान के नीचे फिट किया जाता था। यह बेहद भरोसेमंद था और पायलटों के मुताबिक, “इसने कभी युद्ध में फायर करने से इनकार नहीं किया।” इससे इंजन पर असर नहीं पड़ता था और हैंडलिंग भी प्रभावित नहीं होती थी।

हालांकि, यह 490 लीटर का ड्रॉप टैंक हटा देता था, जिससे विमान की रेंज कम हो जाती। इसलिए हर स्क्वाड्रन में सिर्फ कुछ विमान गन फिटेड रहते, बाकी फ्यूल टैंक के साथ उड़ते।

दिक्कत और भी थी – इसमें लगा PKI-1 फिक्स्ड साइट बेहद साधारण था। यह पायलट को डॉगफाइट में कोई मदद नहीं देता थाा। यह केवल एक चमकता हुआ डॉट दिखाता था, जिससे पायलट को एंगल और स्पीड का हिसाब खुद लगाना पड़ता था। फिर भी, GP-9 ने पायलटों का आत्मविश्वास लौटा दिया। अब उनके पास मिसाइल फेल होने पर एक फाइनल हथियार था।

एचएएल से छीना काम

1970 तक गन पॉड आ चुका था, लेकिन स्क्वॉड्रन्स में फिटिंग की रफ्तार बेहद धीमी थी। 1971 में युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। IAF ने 90 GP-9 पॉड और 120 GSh-23 गन का ऑर्डर दिया था। स्क्वाड्रन लीडर डेनजिल कीलोर ने चेतावनी दी कि बिना गन और साइट के मिग-21 खतरनाक रूप से अधूरा रहेगा।

इस बीच, एयर मार्शल वाईवी माल्से ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने एचएएल नासिक से काम छीनकर थर्ड बीआरडी (बेस रिपेयर डिपो) चंडीगढ़ को सौंपा। तीन महीने में ही बीआरडी ने मिग-21 को गन पॉड और PKI-1 साइट के साथ तैयार कर दिया।

जुगाड़ गनसाइट

गन लगने के बावजूद गनसाइट की समस्या बनी रही। तब भरातीय वायुसेना ने अपने ग्नैट (Gnat) से ब्रिटिश एमके आईवीई जायरो सााइट निकाला और MiG-21 में उल्टा फिट कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से यह काम कर गया।

12 दिसंबर 1971 को इसी सी-750 मिग-21FL ने पाकिस्तानी स्टारफाइटर को गिराया। यह भारतीय जुगाड़ की जीत थी, जिसने साबित किया कि मजबूरी में भी इनोवेशन से युद्ध जीता जा सकता है।

भारतीय वायुसेना का ‘गनलेस जेट’ को गनफाइटर बनाना

मिग-21 को सोवियत संघ ने एक मिसाइल इंटरसेप्टर बनाया था। लेकिन भारत ने इसे अपनी ज़रूरतों के हिसाब से डॉगफाइटर में बदल दिया। GP-9 गन पॉड और जुगाड़ साइट ने इसे वह ताकत दी, जिसने पाकिस्तान के सेबर और स्टारफाइटर्स के खिलाफ भारतीय पायलटों को निर्णायक बढ़त दी। मिग-21 को गनफाइटर बनाने का श्रेय भारतीय वायुसेना की जिद और मेहनत को जाता है। जहां सोवियत डिजाइनर मिसाइल पर भरोसा कर रहे थे, वहीं भारतीय पायलटों ने बार-बार साबित किया कि डॉगफाइट में गन की अहमियत कभी खत्म नहीं होती।

US Military in Bangladesh: क्या बांग्लादेश के जरिए चटगांव में किसी बड़े ‘खेल’ की फिराक में हैं ट्रंप? म्यांमार के आर्मी कमांडर की भारत यात्रा के बाद क्यों एक्टिव हुआ अमेरिका?

US Military in Bangladesh
A joint exercise between the Bangladesh Army's Para-Commandos and the US 221 Cavalry

US Military in Bangladesh: बांग्लादेश के रणनीतिक रूप से अहम चटगांव में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां लगाताार बढ़ रही हैं। जिसके बाद भारत और म्यांमार दोनों सतर्क हो गए हैं। चिंता की बात यह है कि चटगांव की भौगोलिक परिस्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह भारत के पूर्वोत्तर और म्यांमार की सीमाओं के बेहद नजदीक है। यहां हो रही हर हलचल का असर सीधे पड़ोसी देशों की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

Nepal crisis: क्या नेपाल हिंसा के पीछे है अमेरिका-आईएसआई का हाथ, बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से क्या है कनेक्शन?

रविवार को अमेरिकी वायुसेना का सी-130जे सुपर हर्क्यूलिस विमान चटगांव के शाह अमानत इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरा। यह विमान आमतौर पर जापान के योकोटा एयरबेस से ऑपरेट होता है। अमेरिका की इस क्षेत्र में बढ़ती दिलचस्पी वाकई चिंता की बात है।

US Military in Bangladesh: भारत आए थे म्यांमार के आर्मी कमांडर

म्यांमार आर्मी के कमांडर बीएसओ-1, लेफ्टिनेंट जनरल को को ऊ और उनके चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने 10 से 12 सितंबर तक भारत का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने नई दिल्ली, आगरा, गया और कोलकाता के विजय दुर्ग स्थित ईस्टर्न कमांड मुख्यालय का दौरा किया था। यह यात्रा भारत और म्यांमार के बीच सातवीं आर्मी-टू-आर्मी स्टाफ टॉक्स (एएएसटी) का हिस्सा थी।

इस यात्रा के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल को को ऊ ने ईस्टर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल राम चंदर तिवारी से मुलाकात की था। इस बैठक में दोनों पक्षों ने रक्षा सहयोग को बढ़ाने पर विस्तार से चर्चा की, खासकर कटिंग-एज टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में। फोकस दोनों देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर था, जिसमें सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना शामिल था। साथ ही, लेफ्टिनेंट जनरल को को ऊ ने 10-11 सितंबर को शत्रुजीत ब्रिगेड का भी दौरा किया था।

शत्रुजीत ब्रिगेड भारत की सेना की एक एलीट पैराशूट रेजिमेंट है, जो मुख्य रूप से कोलकाता, पश्चिम बंगाल में स्थित है। यह भारतीय सेना की 50वीं पैराशूट ब्रिगेड का हिस्सा है। शत्रुजीत ब्रिगेड का ऑपरेशनल बेस कोलकाता में है। यह ब्रिगेड पूर्वी कमांड के तहत काम करती है और रणनीतिक रूप से बंगाल की खाड़ी और पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

US Military in Bangladesh
BAF and US Air Forces Train Together in Chattogram

US Military in Bangladesh: लगातार चटगांव आ रहे हैं अमेरिकी सैन्य दल

अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटाने के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री मुहम्मद यूनुस की सरकार बनने के बाद से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी में तेजी आई है। यूनुस के शासनकाल में अमेरिकी सैन्य दल चटगांव और आसपास के इलाकों में अक्सर देखे गए हैं। कभी वे सर्वेक्षण मिशन पर आते हैं, तो कभी संयुक्त सैन्य अभ्यासों में शामिल होते हैं।

हाल ही में अमेरिका और बांग्लादेश ने मिलकर ऑपरेशन पैसिफिक एंजेल-25 और टाइगर लाइटनिंग-2025 अभ्यास चटगांव में आयोजित किए थे। इनमें एयर मोबिलिटी, आपदा प्रतिक्रिया और काउंटर टेररिज्म जैसी एक्सरसाइज शामिल थीं। सिलहेट के जलालाबाद कैंटोनमेंट में हुए टाइगर लाइटनिंग में अमेरिकी आर्मी पैसिफिक और बांग्लादेश आर्मी के 100 से अधिक सैनिक शामिल हुए। इसमें जंगल ऑपरेशन, मेडिकल इवैक्यूएशन और आईईडी डिफ्यूज करने की ट्रेनिंग दी गई थी।

सूत्रों ने बताया कि एक और संयुक्त अभ्यास की तैयारी चल रही है। पिछले सप्ताह अमेरिकी सैनिकों का एक नया दल चटगांव पहुंचा था। सितंबर 2025 में रैडिसन ब्लू होटल में 120 से अधिक अमेरिकी अधिकारी ठहरे थे, जो इस अभ्यास की योजना बना रहे थे।

US Military in Bangladesh: अमेरिकी अधिकारी की रहस्यमयी मौत

पिछले महीने 31 अगस्त 2025 को वेस्टिन होटल के रूम नंबर 808 में 50 वर्षीय टेरेंस आर्वेल जैक्सन का शव मिला। जैक्सन अमेरिकी आर्मी के एलीट फर्स्ट स्पेशल फोर्सेज कमांड एयरबोर्न के कमांड इंस्पेक्टर जनरल थे, जो नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग से जुड़े थे। वे अप्रैल 2025 से बांग्लादेश में तैनात थे और बांग्लादेशी सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे थे। ढाका पुलिस ने प्रारंभिक जांच में मौत को प्राकृतिक कारणों से बताया, लेकिन ऑटोप्सी न कराने और अमेरिकी दूतावास की तत्काल कार्रवाई ने मामले को और रहस्यमय बना दिया।

जैक्सन अप्रैल 2025 से बांग्लादेश में थे और कई जगहों पर सरकारी काम से घूम रहे थे। होटल में चेक-इन 29 अगस्त को किया था, लेकिन वे दो दिन पहले ही वहां पहुंच चुके थे। होटल स्टाफ ने दोपहर में रूम से कोई जवाब न मिलने पर पुलिस को सूचना दी। सीसीटीवी फुटेज में कोई संदिग्ध गतिविधि नजर नहीं आई। उनके पास 20 वर्षों से अधिक का अनुभव था। वे 2003 में नेशनल गार्ड में शामिल हुए, 2006 में आर्मी में इंफैंट्री ऑफिसर बने और बाद में स्पेशल फोर्सेज में पहुंचे। वे एशिया थिएटर में कई कॉम्बैट डिप्लॉयमेंट्स का हिस्सा रहे और अगले दो वर्षों में रिटायर होने वाले थे। बांग्लादेशी खुफिया एजेंसियों का कहना है कि सबूत बताते हैं कि वे ढाका और सिलहेट में बांग्लादेश आर्मी को ट्रेनिंग दे रहे थे। फोटोज में वे नाइन लाइन अपैरल पहने बांग्लादेशी सैनिकों को सेशन लेते दिखे, जो एक पूर्व स्पेशल फोर्सेज ऑफिसर की ब्रांड है। जैक्सन के अलावा कम से कम एक अन्य अमेरिकी स्पेशल फोर्स अधिकारी अभी भी बांग्लादेश में हैं।

इस मामले में जासूसी की आशंका भी जताई जा रही है। पाकिस्तानी आईएसआई की गतिविधियां बांग्लादेश में बढ़ रही हैं, जो रोहिंग्या रेडिकलाइजेशन और सीमा पार घुसपैठ से जुड़ी हैं। जैक्सन की मौत को आईएसआई और जिहादी एलिमेंट्स से जोड़ा जाा रहा है। सूत्रों का कहना है कि बांग्लादेश की अस्थिरता ने इसे कोवर्ट वॉर का बैटलग्राउंड बना दिया है।

वहीं, पूर्व अमेरिकी राजदूत एरियल हास की यात्राओं ने चिंता बढ़ी हैं। 5 अगस्त को हास ने कॉक्स बाजार में नेशनल कोऑर्डिनेशन प्लेटफॉर्म के पांच नेताओं से मिले, जो एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट्स मूवमेंट से जुड़े हैं। भारतीय एजेंसियां इसे क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़ रही हैं।

US Military in Bangladesh: क्या सेंट मार्टिन आइलैंड चाहिए अमेरिका को?

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने हटाए जाने के पीछे अमेरिका की भूमिका बताई थी। उनका कहना था कि अमेरिका ने उन्हें सत्ता से इसलिए हटवाया क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन आइलैंड अमेरिका को देने से इनकार कर दिया। बंगाल की खाड़ी में स्थित यह छोटा द्वीप सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

हालांकि, हसीना के बेटे साजेब वाजेद ने इस आरोप को खारिज किया और अमेरिकी व्हाइट हाउस ने भी किसी साजिश से इनकार किया। फिर भी, हसीना के जाने के बाद यूनुस सरकार ने अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत किया। अमेरिका-बांग्लादेश के बीच हुए नए समझौते में टैरिफ की दरें भी 20 फीसदी रखी गईं, जो भारत से भी कम है।

US Military in Bangladesh: दुर्लभ खनिजों की है लड़ाई

चटगांव की गतिविधियां सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं हैं। म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध में सक्रिय काचिन इंडिपेंडेंस आर्गेनाइजेशन (KIA) जैसे विद्रोही समूह दुर्लभ खनिज संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं। अमेरिका और चीन दोनों इन विद्रोहियों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।

चीन ने बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट्स के तहत म्यांमार में अरबों डॉलर निवेश किए हैं, जबकि अमेरिका इन खनिजों को चीन से दूर रखना चाहता है। भारतीय खुफिया एजेंसियां भी इन गतिविधियों पर नजर रख रही हैं क्योंकि म्यांमार विद्रोहियों का असर भारत के पूर्वोत्तर में स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

वहीं, अमेरिकी दूतावास का कहना है कि बांग्लादेश के साथ उनका सैन्य सहयोग पिछले 50 वर्षों से है। 2014 से अब तक अमेरिका ने 78 मिलियन डॉलर की फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग और 14 मिलियन डॉलर की इंटरनेशनल मिलिट्री एजुकेशन एंड ट्रेनिंग सहायता दी है। इसके तहत पैट्रोल बोट्स, वाहन, ट्रेनिंग और RQ-21 ब्लैकजैक ड्रोन शामिल हैं।

हालांकि, बांग्लादेश सेना अमेरिकी सैनिकों की बढ़ती मौजूदगी से पूरी तरह सहज नहीं है। सेना का कहना है कि संयुक्त अभ्यासों के अलावा अतिरिक्त सैनिकों की मौजूदगी से स्थानीय माहौल पर असर पड़ सकता है। ़

US Military in Bangladesh: भारत और म्यांमार की चिंता

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने साफ कहा है कि चटगांव क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां पूर्वोत्तर की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं। असम, त्रिपुरा और मिजोरम जैसे राज्यों में म्यांमार से लगी संवेदनशील सीमाएं हैं। म्यांमार में सक्रिय विद्रोही गुट यदि बाहरी शक्तियों से समर्थन मिलता है, तो भारत की सुरक्षा चिंताएं और बढ़ सकती हैं।

Rajnath Singh at CCC 2025: कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस बोले रक्षा मंत्री- अदृश्य खतरों के लिए तैयार रहें सेना, युद्ध में जीत के लिए JAI है जरूरी

Rajnath Singh at CCC 2025
Raksha Mantri Rajnath Singh at Combined Commanders Conference 2025 in Kolkata

Rajnath Singh at CCC 2025: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कोलकाता में आयोजित कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2025 में भारतीय सशस्त्र बलों को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें पारंपरिक युद्ध की परिकल्पना से आगे बढ़कर ऐसे खतरों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा, जो अदृश्य हैं और अनकन्वेंशनल यानी असामान्य रूप में सामने आते हैं। इनमें इनफॉरमेशन वॉर, आइडियोलॉजिकल वॉर, पर्यावरणीय खतरे और जैविक युद्ध जैसी चुनौतियां शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि आज की दुनिया अशांत और अप्रत्याशित परिवर्तनों से गुजर रही है। वैश्विक अस्थिरता और बदलते सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए यह जरूरी है कि सेनाएं हर समय सतर्क और तैयार रहें।

PM Modi at CCC: कॉम्बाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री मोदी ने जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन पर दिया जोर, की सेना की तैयारियों की समीक्षा

Rajnath Singh at CCC 2025: बदल रहा है युद्ध का स्वरूप

राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में कहा कि युद्ध का स्वरूप लगातार बदल रहा है। आज के दौर के युद्ध अचानक शुरू हो सकते हैं और उनकी अवधि का अनुमान लगाना लगभग असंभव है। यह दो महीने भी हो सकता है, एक साल तक भी खिंच सकता है या पांच साल तक भी जारी रह सकता है। ऐसे में भारतीय सेनाओं को अपनी सर्ज कैपेसिटी यानी दीर्घकालिक लड़ाकू क्षमता को हमेशा पर्याप्त बनाए रखना होगा।

उन्होंने जोर दिया कि सेनाओं को टेक्नोलॉजी-फ्रेंडली यानी नई तकनीक को अपनाने वाली ताकत बनाना होगा। यह बदलाव आधुनिक समय की जरूरत है और हालिया वैश्विक संघर्षों ने इसकी अहमियत को देखा गया है।

Rajnath Singh at CCC 2025: दोहराया पीएम मोदी का दिया मंत्र

सम्मेलन में रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में दिए गए मंत्र “जय” यानी Jointness, Aatmanirbharta, Innovation को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि सेनाओं को अपनी रणनीति में इस मंत्र को केंद्र में रखना होगा। संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन ही भविष्य के युद्धों का सामना करने में निर्णायक साबित होंगे।

Rajnath Singh at CCC 2025: “सुदर्शन चक्र” के लिए कमेटी गठित

राजनाथ सिंह ने पीएम मोदी के विज़न “सुदर्शन चक्र” का उल्लेख किया और कहा कि इसके लिए एक समिति गठित कर दी गई है, जो एक रियलिस्टिक एक्शन प्लान तैयार करेगी। इसके लिए उन्होंने पांच साल का मध्यम अवधि का प्लान और दस साल का दीर्घकालिक प्लान बनाने का सुझाव दिया।

आत्मनिर्भरता पर जोर

रक्षा मंत्री ने कहा कि आत्मनिर्भरता केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है। यह रणनीतिक स्वायत्तता की कुंजी है। आत्मनिर्भर भारत न केवल देश की सुरक्षा को मजबूत कर रहा है, बल्कि आर्थिक विकास को भी गति दे रहा है, रोजगार के अवसर पैदा कर रहा है और शिपयार्ड्स, एयरोस्पेस क्लस्टर्स और डिफेंस कॉरिडोर्स जैसी क्षमताओं को भी बढ़ा रहा है।

उन्होंने जोर दिया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का मल्टीप्लायर इफेक्ट है। इससे सुरक्षा भी मजबूत होती है और उद्योग को भी बढ़ावा मिलता है।

इंडस्ट्री और एकेडेमिया से सहयोग

राजनाथ सिंह ने सेनाओं से कहा कि वे उद्योग जगत और अकादमिक संस्थानों के साथ गहरे जुड़ाव पर ध्यान दें। भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहने का यही रास्ता है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र की भागीदारी को और बढ़ाने की जरूरत है, ताकि भारत दुनिया का सबसे मजबूत और सक्षम रक्षा उद्योग हब बन सके।

ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

रक्षा मंत्री ने हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि इसने साबित कर दिया है कि भारत की ताकत तीन स्तंभों पर टिकी है, शक्ति, रणनीति और आत्मनिर्भरता। उन्होंने सेनाओं की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय जवानों के साहस और स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स की बदौलत आज भारत किसी भी चुनौती का डटकर सामना कर सकता है।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में टाई सर्विसेज जॉइंटनेस अत्यंत आवश्यक होगी। इसके लिए सरकार ने ट्राई सर्विसेज लॉजिस्टिक्स नोड्स और ट्राई-सर्विस लॉजिस्टिक मैनेजमेंट एप्लीकेशन की शुरुआत की है, ताकि सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और संसाधनों का साझा उपयोग सुनिश्चित हो सके।

राजनाथ सिंह ने कहा कि यह केवल मिलिट्री जॉइंटनेस ही नहीं बल्कि सिविल-मिलिट्री फ्यूजन यानी नागरिक और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर मेल भी जरूरी है। यही भविष्य की सुरक्षा रणनीति की नींव बनेगा।

रक्षा खरीद प्रक्रिया में सुधार

रक्षा मंत्री ने बताया कि उन्होंने डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य है खरीद प्रक्रिया को सरल बनाना, देरी को कम करना और सेनाओं को समय पर आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराना। इसके साथ ही डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 में भी संशोधन किया जा रहा है, ताकि प्रक्रियाओं को और आसान और प्रभावी बनाया जा सके।

LCA Mk-1A Deal: एचएएल को 97 और एलसीए एमके-1ए का नया ऑर्डर पाने के लिए पूरी करनी होगी ये बड़ी शर्त, ट्रेनर जेट्स में होगा AESA रडार

LCA Mk-1A Deal: India to Sign Rs 66,000-Crore Contract for 97 More Indigenous Fighter Jets

LCA Mk-1A Deal: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और रक्षा मंत्रालय के बीच 97 अतिरिक्त एलसीए एमके-1ए (LCA Mk-1A) फाइटर जेट्स की खरीद के लिए 66,000 करोड़ रुपये का नया सौदा होने वाला है। लेकिन यह कॉन्ट्रैक्ट तभी साइन होगा जब एचएएल भारतीय वायुसेना को पहले से ऑर्डर किए गए 83 विमानों में से शुरुआती दो जेट सौंप देगा।

97 LCA Mark 1A fighter jets: वायुसेना को मिलेंगे 97 स्वदेशी एलसीए मार्क 1ए फाइटर जेट्स, भारत ने 62,000 करोड़ रुपये की डील पर लगाई मुहर

LCA Mk-1A Deal: डिलीवरी के बाद ही नया ऑर्डर

फरवरी 2021 में सरकार ने 48,000 करोड़ रुपये की लागत से 83 एलसीए एमके-1ए का ऑर्डर दिया था। वहीं, अब 97 नए फाइटर जेट का और ऑर्डर देने की तैयारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने अगस्त में इस सौदे को मंजूरी दी थी। मंत्रालय ने एचएएल को स्पष्ट किया है कि जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी, इसलिए नया यह कॉन्ट्रैक्ट तभी साइन होगा जब पहले दो जेट की डिलीवरी हो जाएगी।

LCA Mk-1A Deal: मिले जीई से तीन इंजन

एलसीए एमके-1ए कार्यक्रम में देरी की बड़ी वजह जीई एयरोस्पेस की तरफ से इंजन सप्लाई में देरी रही है। क्योंकि F404-IN20 इंजन समय पर नहीं डिलीवर हो पाए। लेकिन अब सब कुछ ठीक होता दिख रहा है। जीई ने अब तक तीन इंजन दे दिए हैं, सात और दिसंबर तक मिल जाएंगे और अगले साल 20 और इंजन मिलने की उम्मीद है।

एचएएल ने कहा कि कंपनी को अनुचित तरीके से डिलीवरी में देरी का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सप्लाई चेन की समस्या केवल भारत में नहीं बल्कि दुनिया की सभी एयरोस्पेस कंपनियों को झेलनी पड़ी है। यहां तक कि अमेरिकी अपाचे (Apache) हेलिकॉप्टर कार्यक्रम भी देरी का शिकार हुआ।

इसके अलावा, भारत और जीई के बीच 1 बिलियन डॉलर का सौदा भी तय है, जिसके तहत 113 नए इंजन खरीदे जाएंगे। यह कॉन्ट्रैक्ट भी अक्टूबर में साइन होने की संभावना है।

फायरिंग ट्रायल की तैयारी

दो एलसीए एमके-1ए जेट्स ने हाल ही में देश के पूर्वी इलाके में एडवांस्ड शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (ASRAAM) का फायरिंग ट्रायल शुरू कियाा है। इसके बाद अस्ट्रा (Astra) बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (BVRAAM) का ट्रायल होगा। मार्च में अस्ट्रा का एक ट्रायल असफल रहा था, लेकिन अब इसमें सॉफ्टवेयर अपग्रेड किया गया है और इसे जल्द ही फायर किया जाएगा।

एचएएल का कहना है कि मिसाइल फायरिंग टेस्ट पूरे विमान की क्षमता का असली परीक्षण होता है। जब मिसाइल सही तरीके से फायर होकर टारगेट को हिट करती है, तो यह साबित होता है कि विमान का पूरा सिस्टम सही ढंग से काम कर रहा है।

LCA Mk-1A Deal: India to Sign Rs 66,000-Crore Contract for 97 More Indigenous Fighter Jets
LCA Mk1A programme, the second centre fuselage assembly

अक्टूबर में डिलीवरी

एचएएल ने बताया कि अभी तक 10 एलसीए एमके-1ए जेट्स तैयार हैं, जिनमें से दो नए इंजनों के साथ हैं। इसके अलावा 24 फ्यूजलेज (एयरक्राफ्ट का ढांचा) अलग-अलग चरणों में असेंबली लाइन पर तैयार किए जा रहे हैं। एचएएल की सालाना उत्पादन क्षमता 24 विमानों की है।

पहली डिलीवरी अब अक्टूबर में होने की उम्मीद है। इसके बाद डिलीवरी का सिलसिला तेज गति से आगे बढ़ेगा।

भारतीय वायुसेना लंबे समय से एलसीए कार्यक्रम की धीमी गति को लेकर चिंतित रही है। पहली डिलीवरी मार्च 2024 में होनी थी, लेकिन इंजन की देरी और ट्रायल्स के कारण यह योजना आगे खिसक गई। वायुसेना का कहना है कि नए जेट्स की देरी से डिलीवरी उसके ऑपरेशनल रेडीनेस पर असर पड़ सकता है।

आने वाले समय में भारतीय वायुसेना होगी पावरफुल

वहीं अगर आने वाले सालों में सभी ऑडर्स की डिलीवरी समय पर पूरी हो जाती है तो भारतीय वायुसेना की ताकत में जबरदस्त इजाफा होगा। वायुसेना के पास तेजस एमके-1 के 40 लड़ाकू विमान (दो स्क्वॉड्रन) और तेजस एमके-1ए के 180 विमान (नौ स्क्वॉड्रन) होंगे। इसके साथ ही छह स्क्वॉड्रन के लिए 120 एलसीए एमके-2 की योजना तय है। राफेल की संख्या भी बढ़कर 150 (आठ स्क्वॉड्रन) तक पहुंचेगी। वहीं, वायुसेना की रीढ़ माने जाने वाले सुखोई-30 एमकेआई की ताकत 272 विमानों (13 स्क्वॉड्रन) तक बनी रहेगी। हालांकि इसमें स्वदेशी एएमसीए (AMCA) की संख्या शामिल नहीं है।

ट्रेनर जेट्स में AESA रडार

नए कॉन्ट्रैक्ट में 29 ट्रेनर एयरक्राफ्ट भी शामिल होंगे। ये ट्रेनर जेट्स एलसीए एमके-1ए स्टैंडर्ड पर होंगे और इनमें उत्तम एईएसए (Uttam AESA) रडार और मॉडर्न इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट लगाया जाएगा। जबकि 2021 वाले कॉन्ट्रैक्ट में शामिल 10 ट्रेनर पुराने एलसीए एमके-1 स्टैंडर्ड के हैं।

MiG21 in 1965 War: जब 1965 की जंग में मिग-21 ने पहली बार दिखाई अपनी सुपरसोनिक पावर, हकला गया था पाकिस्तानी एयर फोर्स का स्क्वॉड्रन लीडर

MiG-21 in 1965 War: Debut of India’s First Supersonic Fighter Jet in Combat

MiG21 in 1965 War: अलविदा! मिग-21 सीरीज की इस कड़ी में हम बात कर रहे हैं, उस वक्त की, जब मिग को आए केवल दो साल ही हुए थे और भारत की सीमाओं पर एक दूसरे युद्ध ने दस्तक दे दी। 1962 की जंग से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया। पाकिस्तान ने “ऑपरेशन जिब्राल्टर” शुरू किया, जिसके तहत पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने जम्मू और कश्मीर में भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर अस्थिरता फैलानी की कोशिश की। वहीं, 65 की जंग केवल जमीनी लड़ाई तक सीमित नहीं थी, बल्कि आसमान में भी लड़ी गई थी। इसी युद्ध में पहली बार भारतीय वायुसेना ने अपने सुपरसोनिक जेट मिग-21 को जंग में उतारा। 1963 में सोवियत संघ से आए MiG-21 की भले ही इस जंग में सीमित भूमिका थी, लेकिन उनका युद्ध में उतरना ही जंग में एक अहम मोड़ साबित हुआ।

MiG-21 Variants History: मिग-21 इंटरसेप्टर से कैसे बना “रनवे बस्टर”, जानिए हर वैरिएंट की कहानी, 4th जनरेशन फाइटर जेट्स को दे सकता था मात

MiG21 in 1965 War: 1963 में थे केवल छह एयरक्राफ्ट

भारत ने 1962 में फ्रांसीसी मिराज-III और अमेरिकी F-104 स्टारफाइटर जैसे विमान खरीदने पर विचार किया था। लेकिन सौदा सोवियत संघ के साथ हुआ क्योंकि उन्होंने भारत को न सिर्फ विमान देने बल्कि लाइसेंस प्रोडक्शन की अनुमति भी दी। यह उस दौर में भारत के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम था।

पहले बैच के पायलट और इंजीनियर 1963 में कजाखस्तान के लुगोवाया एयरबेस में ट्रेनिंग लेकर लौटे थे और 28 स्क्वॉड्रन “द फर्स्ट सुपरसॉनिक्स” बनाई। हालांकि उस समय केवल छह मिग-21F13 (टाइप-74) विमान ही उपलब्ध थे और कोई ट्रेनर एयरक्रफ्ट भी नहीं था।

जब 1 सितंबर 1965 को पाकिस्तान की 7वीं डिवीजन और 2 टैंक रेजीमेंट ने चंब-जौरियन सेक्टर में हमला बोला। अचानक हुए इस हमले ने भारतीय 191 ब्रिगेड को चौंका दिया और उसे काफी नुकसान हुआ। पाकिस्तानी सेना के इस तेज दबाव ने भारतीय सैनिकों को मुनावर तवी नदी तक पीछे धकेल दिया। यहां भारतीय सेना ने 20 लैंसर्स की एक AMX-13 टैंक स्क्वॉड्रन और 3 महार रेजीमेंट के सहारे रीयर गार्ड एक्शन किया। इस कार्रवाई के दौरान भारतीय वायुसेना के वैम्पायर और मिस्टेयर विमानों ने भी एयर स्ट्राइक्स की, जिससे पाकिस्तानी पैटन टैंकों की रफ्तार धीमे हो गई।

पाकिस्तानी 7वीं डिवीजन के कमांडर ने तुरंत हवाई मदद मांगी। इसके जवाब में पाकिस्तान वायुसेना के F-86 सेबर जेट विमानों ने सीजफायर लाइन पार की और इस हमले के दौरान भारतीय वायुसेना के तीन पुराने वैम्पायर जेट मार गिराए।

MiG21 in 1965 War: 3 सितंबर को गिराया पहला पाकिस्तानी सेबर जेट

3 सितम्बर 1965 को इस इलाके के ऊपर एक जबरदस्त हवाई मुठभेड़ हुई। इस दौरान भारतीय वायुसेना ने अपना पहला हवाई शिकार किया। नं. 23 स्क्वॉड्रन (पैंथर्स) के फ्लाइट लेफ्टिनेंट ट्रेवर कीलर ने, विंग कमांडर जॉनी ग्रीन की अगुवाई वाले ग्नैट (Gnat) विमानों के फॉर्मेशन का हिस्सा रहते हुए, पाकिस्तान वायुसेना का एक F-86F सेबर जेट मार गिराया। यह भारतीय वायुसेना की 1965 युद्ध की पहली बड़ी हवाई सफलता थी।

हालांकि अभी तक MiG-21 जंग के मैदान में नहीं उतरे थे। 1965 तक भारतीय वायुसेना के पास मिग-21 की सीमित संख्या थी। शुरुआती स्क्वॉड्रन में पायलट नए थे और ट्रेनिंग भी पूरी तरह से नहीं हो पाई थी। इसके बावजूद तब स्थिति को संभालने के लिए मिग-21 को भी एक्टिव करना पड़ा।

MiG21 in 1965 War: पाकिस्तानी विमान लगातार कर रहे थे हमला

4 सितंबर 1965 को जौरियन-अखनूर सेक्टर में भारतीय मिग-21 पहली बार दुश्मन के खिलाफ ऑपरेशन में उतरे। जौरियां उस समय भीषण लड़ाई का केंद्र बन चुका था। पाकिस्तानी सेना की 7वीं डिवीजन भारतीय सेना पर लगातार दबाव बना रही थी। इसी बीच पाकिस्तान एयर फोर्स ने दिनभर में 31 हवाई मिशन जौरियां सेक्टर पर चलाए। सबसे बड़ा हमला पाकिस्तान एयर फोर्स के 15 स्क्वॉड्रन ‘कोब्राज’ ने किया, जिसकी अगुवाई उनके कमांडिंग ऑफिसर स्क्वॉड्रन लीडर इरशाद कर रहे थे। 12 F-86 सेबर जेट्स के इस पैकेज को तीन फॉर्मेशनों में बांटा गया था। हर फॉर्मेशन चार–चार विमानों का था, जो पांच–पांच मिनट तक बारी-बारी से भारतीय सेना के ठिकानों पर हमला कर रहे थे।

पहले दो फॉर्मेशन ने अख्नूर–जौरियां मार्ग पर भारतीय सेना के ट्रकों और गाड़ियों पर 2.75 इंच रॉकेट्स दागकर आग लगा दी। इसके बाद आखिरी फॉर्मेशन, जिसका नेतृत्व स्क्वॉड्रन लीडर मुनीरुद्दीन अहमद कर रहे थे, नापाम बम लेकर हमला करने पहुंचा। मुनीरुद्दीन अहमद को खुशमिजाज और हकलाने वाली आदत के लिए जाना जाता था। वे अपने चार सेबर विमानों को लेकर जौरियां में 200 फीट की ऊंचाई पर आए। उन्होंने एक बिल्डिंग को सैन्य ठिकाना समझकर “बम रिलीज, बम रिलीज़” का आदेश दिया। नापाम बम जमीन पर गिरते ही भयंकर आग के गोले में बदल गए।

MiG21 in 1965 War: हकला गया था पाकिस्तानी स्क्वॉड्रन लीडर

हमले के बाद अहमद ने अपने फॉर्मेशन का रेडियो चेक किया, लेकिन वाइपर-4, यानी फ्लाइट लेफ्टिनेंट नासिर बट्ट का कोई जवाब नहीं आया। तभी उन्होंने अपने दाईं ओर एक आग की लकीर और धुएं का ट्रेल देखा, जो उनके विमान के बहुत करीब से गुजरा था। यह हमला था – और पहली बार उन्होंने सामने भारतीय वायुसेना का नया मिग-21 देखा। मुनीरुद्दीन अहमद रेडियो पर हकलाते हुए चिल्लाया – “कॉन्टैक्ट विद म-म-म-मिग-21, बाय गॉड ही नियर्ली हैड मी!”

यही वह क्षण था जब पाकिस्तान एयर फोर्स को आधिकारिक तौर पर पता चला कि भारतीय वायुसेना ने अब MiG-21 सुपरसोनिक जेट को भी युद्ध में उतार दिया है।

4 सितम्बर को मिग-21 की पहली उड़ान

भारतीय वायुसेना ने मिग-21 की 28 स्क्वॉड्रन द फर्स्ट सुपरसोनिक्स को तुरंत आदमपुर एयरबेस से पठानकोट भेज दिया था। स्क्वॉड्रन के कमांडर विंग कमांडर एमएसडी. ‘मल्ली’ वॉलेन और उनके फ्लाइट कमांडर स्क्वॉड्रन लीडर एके मुखर्जी ने 4 सितम्बर को अपनी पहली कॉम्बैट एयर पेट्रोल (CAP) उड़ान भरी।

विंग कमांडर एमएसडी “मैली” वॉलेन और स्क्वॉड्रन लीडर एके मुखर्जी की जोड़ी को पाकिस्तानी जहाजों को रोकने का आदेश मिला था। वॉलेन और मुखर्जी ने अपने MiG-21 T-76 वर्जन से कॉम्बैट एयर पेट्रोल शुरू किया। ये विमान दो के-13 एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस थे लेकिन इनमें गन नहीं थी। यह सोवियत यूनियन की उस समय की सोच थी कि मॉडर्न वॉरफेयर में मिसाइलें ही काफी होंगी।

चार पाकिस्तानी सेबर जेट्स को जौरियां पर थे, तभी MiG-21 ने उन्हें इंटरसेप्ट किया। लेकिन पहाड़ी इलाके की वजह से रडार क्लटर आ रहा था। तभी उनके साथी फ्लाइट लेफ्टिनेंट वीएस पाठानिया ने ग्नैट से एक सेबर को मार गिराया। वॉलेन ने अपनी के-13 मिसाइल से एक सबरे को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन मिसाइल ग्राउंड क्लटर के चलते लक्ष्य से भटक गई। दूसरी मिसाइल भी नाकाम रही। गुस्से में वॉलेन ने सबरे को टक्कर मारने की कोशिश की, लेकिन अंतिम क्षण में उन्होंने विमान ऊपर खींच लिया और टक्कर से बच गए।

हालांकि उस दिन कोई दुश्मन विमान नहीं गिरा, लेकिन पाकिस्तानी पायलटों ने पहली बार भारतीय मिग-21 को आसमान में देखा और रेडियो पर घबराकर इसकी पुष्टि भी की। यह मिग-21 का भारतीय उपमहाद्वीप में पहला एरियल कॉम्बैट था।

यह पहली बार था जब पाकिस्तान को पक्के तौर पर मालूम चला कि भारत ने अपने नए सुपरसोनिक MiG-21 को युद्ध में उतार दिया है। भले ही वॉलेन अपने शिकार को मार नहीं पाए, लेकिन यह मुकाबला इस बात का एलान था कि अब आसमान में भारतीय वायुसेना के पास भी एक ऐसा लड़ाकू विमान है, जो पाकिस्तान के F-104 स्टारफाइटर का सीधा मुकाबला कर सकता है।

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उस समय भारतीय मिग-21PF (टाइप-76) वैरिएंट में केवल मिसाइलें थीं और कैनन (तोप) नहीं था। यही वजह थी कि वॉलेन और मुखर्जी दुश्मन को निशाना बनाते हुए भी अंतिम सफलता हासिल नहीं कर सके। बाद में इस गलती से सबक लेकर मिग-21 के अन्य वर्जन में कैनन और आधुनिक हथियार जोड़े थे।

खौफ में आया पाकिस्तान

इस घटना के बाद पाकिस्तान एयर फोर्स ने अपने कई कॉम्बैट एसेट्स को सिर्फ मिग-21 को ट्रैक और बाइट करने में लगा दिए। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। पाकिस्तानी पायलट्स के बीच चर्चा होने लगी कि अगर मिसाइलें ठीक से काम कर जातीं या मिग-21 के पास गन होती, तो सेबर कभी बच नहीं पाता। यह डर आगे भी कायम रहा।

11 सितम्बर 1965 को पहला मैक-2 मुकाबला

इतिहास का पहला मैक-2 (सुपरसोनिक) बनाम मैक-2 हवाई मुकाबला भी इसी युद्ध में हुआ। 11 सितंबर को पाकिस्तानी एयर फोर्स का एक F-104 स्टारफाइटर पश्चिमी क्षेत्र में भारतीय वायुसेना के दो MiG-21 से भिड़ गया। हालांकि यह मुठभेड़ लंबी नहीं चली और पाकिस्तानी एयर फोर्स का पायलट पेड़ के ऊपर-नीचे उड़ान भरते हुए भाग निकला। भारतीय मिग-21 अब सीधे-सीधे पाकिस्तानी स्टारफाइटर को चुनौती दे रहा था।

पठानकोट में दो मिग-21 पर हमला  

पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा मिग-21 से ही महसूस हुआ। यही वजह थी कि उन्होंने पठानकोट एयरबेस पर सबसे ज्यादा बमबारी की। 6 सितंबर को हुए एक हमले में पाकिस्तानी एयर फोर्स के विमानों ने वहां खड़े दो मिग-21 T-76 वर्जन को नष्ट कर दिया। यह पाकिस्तान की सोची-समझी रणनीति थी ताकि भारतीय वायुसेना अपने सुपरसोनिक फाइटर्स का ज्यादा इस्तेमाल न कर सके।

1965 के युद्ध में पाकिस्तानी एयर फोर्स को अमेरिका से मिले रडार सिस्टम ने बड़ा फायदा दिया। इसकी वजह से उनके पायलट्स को ग्राउंड कंट्रोल इंटरसेप्शन से बेहतर गाइडेंस मिलती थी। जबकि भारत के पास उस समय केवल अमृतसर का एक बड़ा रडार और ग्राउंड ऑब्जर्वर थे।

इसके अलावा पाकिस्तानी एयर फोर्स के पास AIM-9B साइडवाइंडर मिसाइल थी, जो भारतीय K-13 मिसाइल से ज्यादा एडवांस थी। पाकिस्तान ने 1965 में कम से कम तीन एयर-टू-एयर किल्स इन्हीं मिसाइलों से किए थे। लेकिन भारतीय मिग-21 पायलट्स ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने लगातार कॉम्बैट एयर पेट्रोल मिशन उड़ाए और पाकिस्तानियों को कभी भी बढ़त नहीं लेने दी।

हालांकि 1965 में मिग-21 की संख्या बहुत कम थी और युद्ध में कोई बड़ी जीत नहीं हुई, फिर भी इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत गहरा पड़ा। पाकिस्तानी वायुसेना जान गई कि अब भारत के पास ऐसा सुपरसोनिक जेट है जो उनके स्टारफाइटर और सेबर को टक्कर दे सकता है।

1965 का युद्ध मिग-21 के लिए एक टेस्टिंग ग्राउंड साबित हुआ। पायलटों ने सीखा कि सुपरसोनिक जेट को ग्राउंड कंट्रोल इंटरसेप्शन के साथ कैसे सिंक करना है। इसके साथ ही, मिसाइलों की सीमाएं भी पता चलीं, जिससे भविष्य में मिग-21FL और मिग-21Bis जैसे वर्जन में सुधार किए गए।

50 डिग्री तक पहुंच जाता था कॉकपिट का टेंपरेचर

रिटायर्ड एयर मार्शल विक्रम सिंह का कहना है कि MiG-21 भारतीय वायुसेना को “बड़े खिलाड़ियों के क्लब” में ले गया। इसकी मैक-2 (ध्वनि से दोगुनी गति) और हवाई मिसाइल क्षमता ने इसे उस दौर का सबसे आधुनिक विमान बना दिया। हालांकि 1965 में इसकी संख्या कम थी, लेकिन 1971 में यही जेट पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक साबित हुआ।

वह बताते हैं कि मिग-21 उड़ाना आसान नहीं था। कॉकपिट छोटा था औऱ समझने में मुश्किल होती थी। राजस्थान की गर्मी में कॉकपिट का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता था। लैंडिंग स्पीड 340 किमी/घंटा थी, जो बेहद चुनौतीपूर्ण थी। फिर भी भारतीय पायलटों ने इसे न सिर्फ संभाला बल्कि युद्ध में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया।

अलविदा! मिग-21 सीरीज आगे भी जारी…

 

Exercise Pacific Reach 2025: भारतीय नौसेना का नया डाइविंग सपोर्ट वेसल INS निस्तार पहुंचा सिंगापुर, एक्सरसाइज पैसिफिक रीच 2025 में लेगा हिस्सा

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Exercise Pacific Reach 2025: भारतीय नौसेना का लेटेस्ट और पूरी तरह से स्वदेश में डिजाइन किया गया डाइविंग सपोर्ट वेसल आईएनएस निस्तार अपनी पहली विदेशी यात्रा पर सिंगापुर पहुंचा है। यह जहाज 14 सितंबर को चांगी नेवल बेस पर पहुंचा और अब यह मल्टीलेटरल पैसिफिक रीच 2025 में हिस्सा लेगा, जो 15 सितंबर से शुरू हो रहा है।

INS Aravali: नेवी चीफ ने बताया गुरुग्राम में क्यों बनाया नौसेना का नया नेवल बेस, पीएम मोदी के महासागर विजन को मिलेगी मजबूती

आईएनएस निस्तार का कमीशन 18 जुलाई को हुआ था और इसे हिंदुस्तान शिपयार्ड में स्वदेशी तकनीक से बनाया गया। इस जहाज में 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री और तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस जहाज में अत्याधुनिक साइड स्कैन सोनार, वर्क और ऑब्जर्वेशन क्लास ROVs और गहरे समुद्र में काम करने वाला एडवांस डाइविंग सिस्टम लगा है। यह वेसल डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (DSRV) के लिए मदरशिप (MoSHIP) की भी भूमिका निभाएगा।

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भारत ने 2018–19 में दो डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (DSRV) हासिल किए थे, जो 650 मीटर गहराई तक सबमरीन का रेस्क्यू करने में सक्षम हैं। इन सिस्टम्स के शामिल होने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में आ गया है, जिनके पास खास सबमरीन रेस्क्यू सिस्टम है।

ये सिस्टम किसी भी जहाज पर लगाया जा सकता है या फिर हवाई जहाज से नजदीकी पोर्ट तक ले जाकर तुरंत तैनात किया जा सकता है। इस बार दक्षिण चीन सागर में होने वाले अभ्यास में सबमरीन रेस्क्यू यूनिट (East) आईएनएस निस्तार से ऑपरेट करेगी।

इस अभ्यास का मकसद है अलग-अलग देशों द्वारा संचालित सबमरीन रेस्क्यू प्लेटफॉर्म और एसेट्स को एक साथ लाना, प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना, बेस्ट प्रैक्टिसेज साझा करना और इंटरऑपरेबिलिटी (साझा संचालन क्षमता) को मजबूत बनाना।

सिंगापुर की मेजबानी में हो रही यह मल्टीलेटरल एक्सरसइज में 40 से अधिक देश हिस्सा लेंगे। इनमें कई देश सक्रिय तौर पर तो कुछ देश ऑब्जर्वर के तौर पर मौजूद रहेंगे।

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अभ्यास दो चरणों में होगा। पहला चरण होगा हार्बर फेज, जिसमें सबमरीन रेस्क्यू सिस्टम पर गहन चर्चा, सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट एक्सचेंज, मेडिकल सिम्पोजियम और क्रॉस-डेक विजिट्स शामिल होंगी। यह फेज सप्ताह भर चलेगा और इसमें विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एक-दूसरे के अनुभवों से सीखेंगे।

दूसरा चरण होगा सी फेज, जिसमें आईएनएस निस्तार और भारतीय नौसेना की सबमरीन रेस्क्यू यूनिट सक्रिय रूप से हिस्सा लेंगी। इस दौरान कई इंटरवेंशन और रेस्क्यू ऑपरेशन रीयल टाइम एनवॉयरमेंट में किए जाएंगे, ताकि नौसेनाओं की तैयारी का परीक्षण किया जा सके।

आईएनएस निस्तार की इस तैनाती के साथ ही भारत ने यह साफ कर दिया है कि उसकी नौसेना न केवल हिंद महासागर बल्कि व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी सुरक्षा और स्थिरता की गारंटी देने में सक्षम है। इस तरह के बहुपक्षीय अभ्यास भारत को उन देशों के करीब लाते हैं जो समुद्री सुरक्षा, बचाव और आपसी सहयोग को मजबूत बनाना चाहते हैं।