Indian Army Freight Train: भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपनी पहली एक्सक्लूसिव फ्रेट ट्रेन को सफलता पूर्वक चलाया। यह ट्रेन उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (USBRL) पर 12–13 सितंबर को बीडी बाड़ी (बाड़ी ब्राह्मणा) से अनंतनाग तक चलाई गई। इस पहल ने न सिर्फ सेना की एडवांस विंटर स्टॉकिंग प्रक्रिया को नया आयाम दिया, बल्कि स्थानीय नागरिकों के लिए भी नए अवसर खोले।
भारतीय सेना हर साल सर्दियों से पहले अपनी यूनिट्स और फॉर्मेशंस तक आवश्यक सामग्री पहुंचाने के लिए एडवांस विंटर स्टॉकिंग करती है। पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में बर्फबारी और खराब मौसम के कारण सड़क मार्ग अक्सर बंद हो जाते हैं, जिससे सेना को पहले से ही सारा सामान जमा करना पड़ता है। इस बार पहली बार इस रूट पर पर फ्रेट ट्रेन के जरिए 753 मीट्रिक टन सामग्री पहुंचाई गई।
इस ट्रेन में सेना की जरूरतों के लिए राशन, ईंधन और अन्य महत्वपूर्ण सामान शामिल था। ताकि वह ऊंचाई वाले इलाकों में भी हर मौसम में पूरी तरह तैयार रह सके।
🚆🇮🇳 Historic First! Indian Army runs its exclusive freight train on USBRL
The Udhampur–Srinagar–Baramulla Rail Link (USBRL) achieved a major milestone with the Army’s first dedicated freight train from BD Bari to Anantnag on 12–13 Sept.
📦 The train carried 753 MT of Advance… pic.twitter.com/J4nkMXbdaf
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इस पहल की सबसे खास बात यह है कि वापसी में यही ट्रेन स्थानीय किसानों के लिए कश्मीरी सेब देश के अन्य हिस्सों तक ले जाएगी। अक्सर भूस्खलन और बाढ़ की वजह से किसानों का माल बाजार तक नहीं पहुंच पाता था और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता था। लेकिन इस पहल से किसानों को न सिर्फ राहत मिलेगी बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ेगी।
वहीं, भारतीय सेना का यह प्रयास स्थानीय लोगों के लिए भी उम्मीद की नई किरण लेकर आया है। अब फसल का समय पर बाजार तक पहुंचना आसान होगा और किसानों को लाइवलिहुड सिक्योरिटी यानी रोजगार की सुरक्षा मिलेगी। साथ ही, राज्य की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।
भारतीय सेना के लिए यह फ्रेट ट्रेन सिर्फ एक साधारण लॉजिस्टिक प्रयोग नहीं है। यह हिमालयी इलाकों में उसकी ऑपरेशनल रेडीनेस को और मजबूत करती है। सर्दियों में जब रास्ते बंद हो जाते हैं, तब पहले से किया गया यह स्टॉकिंग काम आता है। अब रेल मार्ग से तेज और सुरक्षित ढंग से सामान पहुंचाकर सेना समय और संसाधनों की बचत कर रही है।
PM Modi at Combined Commanders Conference: Jointness, Atmanirbharta and Innovation for Armed Forces Readiness
PM Modi at CCC: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कोलकाता में आयोजित 16वीं कॉम्बाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस (Combined Commanders’ Conference) का उद्घाटन किया। हर दो साल में आयोजित होने वाली इस कॉन्फ्रेंस में पीएम मोदी ने कहा कि संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन ही भविष्य की चुनौतियों का सबसे बड़ा जवाब हैं। प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता की सराहना की और यह संदेश दिया कि भारतीय सेना न सिर्फ देश की सुरक्षा बल्कि राष्ट्र निर्माण, एंटी-पाइरेसी मिशन, नागरिकों की सुरक्षित वापसी और आपदा राहत में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है।
कॉम्बाइंड कमांडर्स को आर्मर्ड फोर्सेस का सबसे बड़ा विचार-विमर्श मंच माना जाता है। इस बार का विषय है – ईयर ऑफ रिफॉर्म्स– ट्रांसफॉर्मेशन फॉर द फ्यूचर यानी सुधार का वर्ष – भविष्य के लिए परिवर्तन। इस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य सशस्त्र बलों के टॉप मिलिट्री और सिविल लीडरशिप को एक मंच पर लाकर रक्षा तैयारियों पर चर्चा करना और भविष्य की सैन्य रणनीति का खाका तैयार करना है।
PM Modi at Combined Commanders Conference: Jointness, Atmanirbharta and Innovation for Armed Forces Readiness
PM Modi at CCC: सुधारों पर जल्द से जल्द काम करे रक्षा मंत्रालय
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भारतीय सशस्त्र बलों की सराहना की और कहा कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय सेना हर परिस्थिति में देश की रक्षा करने में सक्षम है। उन्होंने न सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की बात की, बल्कि नौसेना के एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन, विदेशी संघर्ष क्षेत्रों से भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी और मानवतावादी सहायता (HADR) अभियानों में भी सशस्त्र बलों की भूमिका की भी सराहना की।
Thread 🧵 | PM Modi at Combined Commanders’ Conference 2025
1/ PM Shri @narendramodi inaugurated the 16th Combined Commanders’ Conference (CCC) in Kolkata today.
Theme: Year of Reforms – Transformation for the Future 🚀
The apex forum brings top civilian & military leadership… pic.twitter.com/1ZAGm7PsFx
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प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 2025 को रक्षा सुधारों का वर्ष घोषित किया गया है और इस दिशा में जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन तीन प्रमुख स्तंभ होंगे। उन्होंने जॉइंटनेस को लेकर कहा कि तीनों सेनाओं को एक साथ मिलकर काम करना होगा ताकि हर परिस्थिति में अधिक प्रभावी और समन्वित कार्रवाई की जा सके। आत्मनिर्भरता के बारे में उन्होंने बोलते हुए कहा कि भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना होगा। उन्होंने निजी उद्योग, स्टार्ट-अप और एमएसएमई को भी रक्षा क्षेत्र में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित किया। वहीं, प्रधानमंत्री ने इनोवेशन को लेकर कहा कि नई तकनीकें जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और स्पेस डोमेन आने वाले युद्धों का चेहरा बदल देंगी। इसलिए भारत को इन क्षेत्रों में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे।
उन्होंने रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया कि इन सुधारों को जल्द से जल्द अमल में लाया जाए ताकि भविष्य की चुनौतियों का सामना मजबूती से किया जा सके।
प्रधानमंत्री ने जोर दिया कि भारत को मल्टीफंक्शनल मिलिट्री तैयारियां रखनी होंगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में जियो-स्ट्रेटेजिक हालात बेहद जटिल हैं और ऐसे में भारतीय सेना को चुस्त और निर्णायक बनना होगा।
कॉन्फ्रेंस का फोकस इस बार तीन बिंदुओं रिफॉर्म्स, ट्रांसफॉर्मेशन और ऑपरेशनल प्रीपेयर्डनेस पर है। यह भारतीय सशस्त्र बलों की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है जिसमें संस्थागत सुधार, गहरी इंटीग्रेशन और तकनीकी आधुनिकीकरण शामिल हैं।
PM Modi at Combined Commanders Conference: Jointness, Atmanirbharta and Innovation for Armed Forces Readiness
PM Modi at CCC: पीएम को दी ऑपरेशन सिंदूर के बाद के हालात की जानकारी
कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री को ऑपरेशन सिंदूर के बाद बनी नई परिस्थितियों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई। ऑपरेशन सिंदूर मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान और पीओके स्थित आतंकी ठिकानों पर किए गए सटीक हमलों का कोडनेम था। प्रधानमंत्री को बताया गया कि ऑपरेशन सिंदूर ने भविष्य की युद्ध रणनीति को एक नया आयाम दिया है। इसमें उभरती तकनीकें और नई टैक्टिक्स इस्तेमाल की गईं, जिसने भारत की सैन्य शक्ति को और अधिक प्रभावी बनाया।
प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दो वर्षों में लागू किए गए सुधारों की समीक्षा की और आने वाले दो वर्षों के लिए बनाई गई योजना पर भी चर्चा की। रक्षा मंत्रालय ने उन्हें विस्तार से बताया कि किन क्षेत्रों में सुधार किए गए हैं और किन पर काम जारी है।
इस कॉन्फ्रेंस में अगले दो दिनों तक विभिन्न ढांचागत, प्रशासनिक और ऑपरेशनल मुद्दों पर गहन समीक्षा की जाएगी। साथ ही बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की सैन्य तैयारियों पर चर्चा होगी।
PM Modi at CCC: मौजूद थी टॉप लीडरशिप
इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी, थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और डीआरडीओ प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। वहीं, रक्षा मंत्री 16 सितंबर को कमांडर्स को संबोधित करेंगे, जबकि 17 सितंबर को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अपनी बात रखेंगे।
PM Modi at CCC: सुधार और चुनौतियों पर मंथन
कॉन्फ्रेंस का एजेंडा इस बार बेहद व्यापक रखा गया है। इसमें न केवल ऑपरेशनल तैयारियों की समीक्षा होगी, बल्कि संरचनात्मक और प्रशासनिक सुधारों पर भी चर्चा होगी। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि यह कॉन्फ्रेंस आने वाले समय में भारतीय सेना की रणनीतिक दिशा तय करने में अहम साबित होगी। इसमें सभी रैंकों के अधिकारियों की राय शामिल की जाएगी ताकि जमीनी हकीकत भी सामने आ सके।
MiG-21 Variants History: भारतीय वायुसेना का इतिहास कई ऐसे लड़ाकू विमानों से भरा है, जिन्होंने दशकों तक आसमान में भारत की ताकत का परचम लहराया। लेकिन जब भी इस गौरवशाली सफर की चर्चा होती है, तो मिग-21 का नाम सबसे पहले आता है। लगभग छह दशक तक यह जेट भारतीय वायुसेना की रीढ़ बना रहा।
1963 में जब पहला मिग-21 भारत आया, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह विमान आने वाले कई दशकों तक देश की हवाई सुरक्षा का अहम हिस्सा बना रहेगा। 1965 के युद्ध से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, 1999 के कारगिल युद्ध और 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक तक, MiG-21 ने बार-बार अपनी ताकत साबित की।
अब जब यह विमान 2025 में इतिहास बनने जा रहा है, तो आइए विस्तार से जानते हैं भारत में मिग-21 के सभी वैरिएंट्स का सफर।
MiG-21PF
MiG-21 Variants History: मिग-21PF (Type 76): भारत का पहला इंटरसेप्टर
1960 के दशक में भारतीय वायुसेना को मिग-21PF मिला, जिसे टाइप 76 भी कहा जाता है। यह मूल रूप से एक इंटरसेप्टर विमान था, जिसका काम दुश्मन के विमानों को रोकना और गिराना था। इसमें R1L AI रडार और टेल श्यूट लगाया गया था। इसमें ‘PF’ का मतलब रूसी में “Perekhvatchik Forsirovanny” था, यानी “बूस्टेड इंजन वाला इंटरसेप्टर”। इसमें ट्यूमांस्की R-11F-300 टर्बोजेट इंजन, जो 5,740 किग्रा थ्रस्ट (आफ्टरबर्नर के साथ) देता था। इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 2.05 (2,230 किमी/घंटा) थी। इसमें 30एमएम की NR-30 कैनन, हवा-से-हवा मिसाइलें, जैसे K-13 (AA-2 Atoll) और हवा-से-जमीन पर मार करने वाले हथियार लगे थे। भारत ने इन विमानों को सीधे सोवियत संघ से आयात किया था।
MiG-21: वायुसेना में मिग-21 की एंट्री 1963 में हुई थी। लेकिन पायलटों की ट्रेनिंग 1962 में ही सोवियत संघ में शुरू हो गई थी। पायलटों की शुरुआती ट्रेनिंग बेहद चुनौतीपूर्ण रही। रूसी भाषा, मीट्रिक डायल और बिना ट्रेनर जेट ने पायलटों के होश उड़ा दिए थे… https://t.co/OwjbAV5ayZ#MiG21…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 14, 2025
भारतीय वायुसेना की 28 स्क्वॉड्रन ने इस वैरिएंट से शुरुआत की। बाद में इन्हें अपग्रेड करके टाइप 77 स्क्वॉड्रनों में शामिल किया गया। यह वह दौर था, जब भारत सुपरसोनिक जेट युग में प्रवेश कर रहा था और मिग-21PF ने इस सफर की शुरुआत की।
मिग-21R को “फाइटर रेक्की” (Fighter Reconnaissance) के रूप में जाना जाता था। यह एक ऐसा वेरिएंट है जिसने टोही मिशनों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें ‘R’ का अर्थ रूसी भाषा में “Razvedchik” यानी रेकनाइसेंस था।
मिग-21R को खासतौर पर हवाई टोही मिशनों के लिए डिजाइन किया गया था। यह विमान मिग-21PF और PFM मॉडल्स पर आधारित था, लेकिन इसमें एडवांस कैमरे, सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) सेंसर, और बाहरी रेकनाइसेंस पॉड्स जोड़े गए थे। यह न केवल टोह लेने में माहिर था, बल्कि जरूरत पड़ने पर लड़ाकू भूमिका भी निभा सकता था।
इसमें ट्यूमांस्की R-11F2S-300 टर्बोजेट लगा था, जो 6,175 किग्रा थ्रस्ट देता था। वहीं, इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 2.05 (2,230 किमी/घंटा) थी। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इसने सीमा क्षेत्रों की निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने में अहम योगदान दिया। इसके बाहरी पॉड्स में लगे पैनोरमिक और ओब्लिक कैमरों ने युद्ध के दौरान खुफिया जानकारियां जुटाईं थीं।
मिग-21FL (Type 77): भारत का वर्कहॉर्स
MiG-21FL यानी टाइप 77, भारतीय वायुसेना का पहला वैरिएंट था, जिसे भारत में ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने बनाया। इसमें R11F-300 इंजन और RP-21 रडार लगाया गया था। FL का मतलब था “Forsazh” (आफ्टरबर्नर) और “Lokator” (रडार) यानी “बूस्टेड लाइट” वेरिएंट। इसमें ट्यूमांस्की R-11F2S-300 टर्बोजेट इंजन, जो 6,175 किग्रा थ्रस्ट (आफ्टरबर्नर के साथ) देता था। इसकी टॉप स्पीड मैक 2.05 (2,230 किमी/घंटा) थी।
MiG-21FL
1966 से 1973 के बीच रूस से 38 और HAL द्वारा 197 जेट बनाए गए। यह पहला वैरिएंट था, जिसने सिर्फ इंटरसेप्शन नहीं, बल्कि ग्राउंड अटैक मिशनों में भी अपनी ताकत साबित की।
1971 के युद्ध में मिग-21FL ने पाकिस्तान के एयरबेस और रनवे पर हमला किया, जिससे इसे “रनवे बस्टर्स” का नाम मिला। इसने पाकिस्तानी F-86, F-104 स्टारफाइटर और F-6 को भी मार गिराया।
मिग-21M (Type 96): मल्टीरोल फाइटर
MiG-21 M यानी टाइप 96 को मल्टीरोल एयरक्राफ्ट कहा जाता था। क्योंकि यह सिर्फ ऊंचाई पर ही नहीं बल्कि लो और मिड एल्टीट्यूड पर भी काम कर सकता था। ‘M’ का मतलब रूसी में “Modernizirovanny” था, यानी “आधुनिकीकरण”। यह विमान भारतीय वायु सेना की रीढ़ रहा और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने इसे स्वदेशी रूप से निर्मित किया था।
MiG-21M
इसमें RP-21M रडार, GSh-23L कैनन और R-3S इंफ्रारेड सीकर मिसाइलें लगी थीं। साथ ही यह एडवांस नेविगेशन सिस्टम, रेडियो कम्युनिकेशन, और IFF (Identification Friend or Foe) सिस्टम से भी लैस था।
मिग-21M ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने हवाई युद्ध में पाकिस्तानी विमानों को चुनौती दी और जमीनी ठिकानों पर हमले किए। मिग-21M ने पाकिस्तान के कई एयरबेस और रनवे तबाह किए।
मिग-21Bis (Type 75): सबसे ताकतवर वैरिएंट
MiG-21 Bis, यानी टाइप 75, को मिग-21 का सबसे एडवांस और आधुनिक वैरिएंट माना गया। ‘Bis’ रूसी में “दूसरा” या “संशोधित” कहा जाता था, जिससे पता लगता था कि यह एडवांस फीचर्स वाला फाइटर जेट था। इसमें RP-22 Sapfir-21 रडार लगा था, जो हवाई और जमीनी लक्ष्यों को ट्रैक करने में सक्षम था, और मिग-21M की तुलना में अधिक पावरफुल था।
MiG-21Bis
इसमें R25-300 टर्बोजेट इंजन था, जो 7,100 किग्रा थ्रस्ट (आफ्टरबर्नर के साथ) देता था। जिससे इसे डॉगफाइट में जबरदस्त ताकत मिली। इसमें R-60M मिसाइलें भी थीं, जिससे यह चौथी पीढ़ी के पश्चिमी फाइटर्स का सामना कर सकता था। इसे बड़े पैमाने पर भारत में बनाया गया और यह 1970 से 1990 के दशक तक भारतीय वायुसेना का मुख्य वर्कहॉर्स रहा। मिग-21Bis ने 1999 के कारगिल युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और जमीनी ठिकानों पर सटीक हमले किए। इसकी चुस्ती और तेज रफ्तार ने इसे हाई एल्टीट्यूड इलाकों के लिए मुफीद बनाया। मिग-21Bis का इस्तेमाल पायलट ट्रेनिंग और टैक्टिकल ऑपरेशन्स में भी किया गया। हर आपातकालीन स्थिति में सबसे पहले इसी वैरिएंट को स्क्रैम्बल किया जाता था।
मिग-21 Bison: अपग्रेडेड योद्धा
1996 में भारत ने 125 MiG-21 Bis को अपग्रेड करने का फैसला लिया। इनमें से 123 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड नासिक फैक्ट्री में 2001 से 2008 के बीच अपग्रेड किया गया और उन्हें नया नाम मिला – मिग-21 बाइसन। इस अपग्रेड के तहत एयरफ्रेम को नया जीवन दिया गया। नई कैनोपी, मल्टीफंक्शन डिस्प्ले, हेड-अप डिस्प्ले, ऑटोपायलट, GPS, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और फाजोट्रॉन कोप्यो (Kopyo) रडार लगाया गया। फाजोट्रॉन कोप्यो मल्टी-मोड रडार था, जो हवाई और जमीनी टारगेट्स को 57 किमी तक ट्रैक कर सकता था। यह चौथी पीढ़ी के विमानों का भी मुकाबला कर सकता था।
MiG-21 Bison
यह रडार एक साथ आठ टारगेट ट्रैक कर सकता था और दो को एंगेज कर सकता था। इसके साथ R-27, R-77 और R-73 जैसी एयर-टू-एयर मिसाइलें और KAB-500Kr लेजर-गाइडेड बम भी शामिल किए गए। इसमें मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले और हेड-अप डिस्प्ले, एडवांस नेविगेशन सिस्टम, जैसे GPS और INS, इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर और रडार वॉर्निंग रिसीवर, IFF सिस्टम और डेटा लिंक जैसे फीचर थे।
2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद हुई हवाई लड़ाई में विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने इसी मिग-21 बाइसन से पाकिस्तान के आधुनिक F-16 को मार गिराकर इतिहास रचा था।
Artillery’s Thunder: The Untold Kargil Story” by Maj. Gen. Lakhwinder Singh (Retd)
Artillery in Kargil War: कारगिल युद्ध की जब भी चर्चा होती है, तो कहानियां अक्सर जवानों की वीरता के इर्द-गिर्द आकर सिमट जाती हैं। लेकिन इस युद्ध में जितनी बहादुरी सैनिकों ने दिखाई तो वहीं मशीनों के योगदान को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की आर्टिलरी की गूंज ने भी दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। उस दौरान कारगिल युद्ध में 8 माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड की कमान संभालने वाले (उस समय ब्रिगेडियर) रिटायर्ड मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने अपनी नई किताब ‘आर्टिलरीज थंडर: द अनटोल्ड कारगिल स्टोरी’ के मौके पर आर्टिलरी यानी तोपखाने के किस्सों को साझा किया है।
Artillery’s Thunder: The Untold Kargil Story में उन्होंने बताया है कि किस तरह तोपों की गरज ने युद्ध का पासा पलट दिया था। कैसे भारी संख्या में दागे गए गोलों ने दुश्मन के बंकरों को चकनाचूर करते हुए इन्फैंट्री के आगे बढ़ने का रास्ता साफ किया था।
Artillery in Kargil War: ‘एनरेज्ड बुल ऑफ द्रास’
रिटायर्ड मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने कारगिल युद्ध के दौरान 8 माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड की कमान संभाली थी। कारगिल में अपनी वीरता और नेतृत्व क्षमता और अपनी आक्रामक रणनीति के चलते उन्हें Enraged bull of Drass यानी ‘द्रास का गुस्सैल सांड’ जैसा उपनाम भी मिला था। उन्होंने बोफोर्स एफएच-77बी हॉवित्जर तोपों का इस्तेमाल करके तोलोलिंग और टाइगर हिल जैसी चोटियों को वापस जीतने में अहम भूमिका निभाई थी। इस योगदान के लिए उन्हें युद्ध सेवा मेडल से भी सम्मानित किया गया था।
Major general Lakhwinder Singh
उन्होंने युद्ध के दौरान 100 से अधिक बोफोर्स हॉवित्जर गनों को एक साथ इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई। उनका कहना था, “सौ तोपों से एक साथ 3,000 किलो स्टील और विस्फोटक गिराना ऐसा था जैसे दुश्मन पर बिजली गिर गई हो। मात्र आधे घंटे में एक लाख किलो विस्फोटक दागकर हमने दुश्मन की पोजिशनें तबाह कर दीं।”
Artillery in Kargil War: तोपों से बदले युद्ध के हालात
मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने बताया कि युद्ध की शुरुआत में 8 माउंटेन डिवीजन के पास केवल 6-7 फायर यूनिट या छह आर्टिलरी की बैटरियां उपलब्ध थीं। तोलोलिंग पर कब्जे की शुरुआती कोशिशों में इन्फैंट्री को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ा। कई प्रयास असफल रहे क्योंकि दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था और भारतीय सैनिक नीचे से चढ़ाई कर रहे थे। लेकिन जब एक साथ 155 एमएम वाली 108 तोपों ने गोलाबारी शुरू की तो हालात बदल गए। मेजर जनरल सिंह ने कहा, “युद्ध का रुख तभी बदला जब हमारी तोपों ने दुश्मन की पोजिशन पर सीधी मार की।” उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की रणनीति का भी उल्लेख किया, जिसमें आर्टिलरी को कभी-कभी रायफल की तरह सीधे निशानेबाजी के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
पाकिस्तानी बोले- बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है
मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने बताया, “असल में, इन्फैंट्री और आर्टिलरी के सामने पाकिस्तानियों के पास कोई जवाब नहीं था। दोनों ने गजब का काम किया। आर्टिलरी का असर इतना जबरदस्त था कि पहाड़ों पर पाकिस्तानी चिल्लाते थे– हमें बचाओ, हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा है। वो इतने डरे हुए थे कि अपनी पोजिशन छोड़ना ही बेहतर समझते थे।” उन्होंने बताया कि सबसे पहले ये तोलोलिंग में ऐसा हुआ था। जब हमने वहां फायरिंग की तो हमें इंटरसेप्ट में यही आवाजें सुनाई दीं। और फिर हर ऊंचाई पर जहां भी हम गए, वही हालात थे, हर जगह पाकिस्तानी यही चिल्ला रहे थे।“
Artillery in Kargil War: सैनिक तोपों को करते थे सलाम
युद्ध के दौरान तकरीबन 2.9 लाख तोपों के गोले दागे गए। इन गोलाबारियों ने न सिर्फ भारतीय सैनिकों के हौसले को बढ़ाया बल्कि पाकिस्तानी सैनिकों को भी हतोत्साहित कर दिया। कई बार ऐसा हुआ कि जब पैदल सेना मोर्चे से लौटती थी, तो वे तोपों को सलामी देते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इन तोपों ने उनकी जान बचाई।
Artillery in Kargil War: पत्नी ने दी किताब लिखने की प्रेरणा
मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने कहा, कारगिल वॉर पर बहुत किताबें आई हैं, लेकिन कई पहलू अभी तक सामने नहीं आए थे। मैंने सोचा जितना हो सके खुलकर और ईमानदारी से वो सच लिखूं जो जरूरी था। इसी वजह से इसका नाम रखा The Untold Story।” उन्होंने कहा, “असल में मेरी पत्नी ने बार-बार कहा कि मुझे लिखना चाहिए। मैं हिचकिचा रहा था, लेकिन मेरे दिमाग में बहुत सारी बातें थीं, जो लोगों तक पहुंचनी चाहिए थीं। फिर मैंने कलम उठाई और लिखना शुरू किया। मुझे लगता है, यह किताब लोगों के लिए दिलचस्प होगी।”
Artillery in Kargil War: पॉइंट 5140 को मिला था “गन हिल” नाम
मेजर जनरल सिंह ने कहा कि आर्टिलरी को महज सपोर्टिंग आर्म नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, कारगिल में यह साफ हो गया कि आर्टिलरी युद्ध का निर्णायक हथियार है और इसे स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। शायद इसीलिए आर्टिलरी को “गॉड ऑफ वॉर” भी कहा जाता है। वहीं इन्फैंट्री को “क्वीन” और आर्मर्ड कोर “किंग ऑफ वॉर” कहा जाता है।
द्रास-मश्कोह में 6 नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री उस समय प्वाइंट 5140 (16,864 फीट) पर थी। यह वही जगह थी जहां से गनों के इस्तेमाल से पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा गया था। जिसके बाद 30 जुलाई को द्रास सेक्टर के पॉइंट 5140 को औपचारिक रूप से “गन हिल” नाम दिया गया था, ताकि आर्टिलरी के योगदान को हमेशा याद रखा जा सके।
कारगिल युद्ध के बाद प्वाइंट 5140 का नाम गन हिल रखने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। हालांकि आर्टिलरी ने न केवल पॉइंट 5140 बल्कि तोलोलिंग, पॉइंट 4700, थ्री पिंपल्स, टाइगर हिल और पॉइंट 4875 (जिसे बत्रा टॉप भी कहा जाता है) जैसी चोटियों पर मौजूद पाकिस्तानी बंकरों को बरबाद करने में अहम भूमिका निभाई थी। युद्ध के बाद तत्कालीन 8 माउंटेन डिवीजन के आर्टिलरी कमांडर लखविंदर सिंह किसी एक जगह को “गन हिल” नाम रखने का प्रस्ताव गंभीरता से दिया था। उन्होंने यह बात तत्कालीन डायरेक्टोरेट ऑफ आर्टिलरी से यह बात कही थी। जिसके बाद तत्कालीन 15वीं कोर के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल कृष्ण पाल युद्ध के बाद प्वाइंट 4875 का नाम गन हिल रखने पर सहमत हुए थे। लेकिन उसे पहले से ही बत्रा टॉप के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके बाद प्वाइंट 5140 का नाम गन हिल रखा गया था। लेफ्टिनेंट जनरल पाल ने ही तत्कालीन ब्रिगेडियर लखविंदर सिंह को द्रास में नियुक्त किया था। बता दें कि युद्ध की शुरुआत में मेजर जनरल लखविंदर सिंह ने ही युद्ध को भारतीय सेना के पक्ष में बदलने के लिए चार बोफोर्स रेजिमेंटों को द्रास में भेजने का प्रस्ताव रखा था।
Disability Pension: रक्षा मंत्रालय की तरफ से सितंबर 2023 में लागू किए गए नए डिसेबिलिटी पेंशन नियमों को लेकर विवाद छिड़ गया है। 21 सितंबर 2023 को जारी इन नियमों का नाम दिया गया है, “Entitlement Rules for Casualty Pension and Disability Compensation Awards to Armed Forces Personnel, 2023”। ये नियम सभी पुराने प्रावधानों की जगह ले चुके हैं और अब विकलांगता पेंशन को इम्पेयरमेंट रिलीफ कहा जाएगा।
सैनिकों और पूर्व सैनिकों के अनुसार, इसके बदलाव से उनके अधिकारों और लंबे समय तक की गई सेवाओं पर असर पड़ सकता है। साथ ही, उन्हें यह भी आशंक है कि इन नियमों से पेंशन में भारी कटौती हो सकती है।
Disability Pension: नए नियमों में क्या है प्रावधान
नए प्रावधान के अनुसार अब सैनिकों की विकलांगता का प्रतिशत तय किया जाएगा और उसी हिसाब से पेंशन का निर्धारण होगा। पहले यह व्यवस्था काफी सुविधाजनक थी, लेकिन अब “डिसेबिलिटी एलिमेंट” को पूरी तरह से हटा दिया गया है और उसकी जगह “इम्पेयरमेंट रिलीफ” लागू किया गया है।
इस बदलाव का असर खासकर उन जवानों और अधिकारियों पर पड़ेगा, जिनकी सेहत नौकरी में रहने के दौरान बिगड़ती है। हालांकि पहली बार इन नियमों में लाइफस्टाइल बीमारियों जैसे हाइपरटेंशन और टाइप-2 डायबिटीज को शामिल किया गया है। लेकिन इनका फायदा सिर्फ उन सैनिकों को मिलेगा, जिन्होंने हाई एल्टीट्यूड वाले इलाकों या बेहद कठिन हालात में ड्यूटी करते हुए यह बीमारी झेली हो।
पहले तक सभी हृदय रोग और स्ट्रेस से जुड़ी बीमारियां सेना की नौकरी से जुड़ी मानी जाती थीं, लेकिन अब यह प्रावधान सीमित कर दिया गया है।
Disability Pension: कैडेट्स और ऑफिसर ट्रेनिंग पर भी असर
नए नियमों में कैडेट्स और ऑफिसर ट्रेनिंग कर रहे उम्मीदवारों को भी फायदों से वंचित कर दिया गया है। अब उन्हें सिर्फ एक्स-ग्रेशिया भुगतान मिलेगा। सैनिक संगठनों का कहना है कि यह फैसला अनुचित है क्योंकि कैडेट्स भी कठिन ट्रेनिंग और दबाव का सामना करते हैं।
Disability Pension: सीएजी रिपोर्ट बनी आधार
मार्च 2023 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक-सीएजी की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि हर साल रिटायर होने वाले लगभग 36-40 फीसदी अफसरों को डिसेबिलिटी पेंशन मिलती है, जबकि केवल 15-18 फीसदी जवानों को यह लाभ मिलता है।
सेना के अनुसार, यह अंतर स्वाभाविक है क्योंकि जवान कम उम्र में रिटायर हो जाते हैं और अपेक्षाकृत स्वस्थ रहते हैं। दूसरी ओर, अधिकारी 54 से 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं, जब लंबे समय की सेवा और मानसिक दबाव उनकी सेहत पर असर डालता है। इसके आधार पर एक इंटर-सर्विस पैनल बनाया गया, जिसकी अध्यक्षता आर्मी के एडजुटेंट जनरल ने की थी।
Disability Pension: पूर्व सैनिकों की नाराजगी
ऑल इंडिया एक्स-सर्विसमेन वेलफेयर एसोसिएशन ने रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर इन नियमों को वापस लेने की मांग की है। संगठन का कहना है कि नए नियम सैनिकों की वास्तविक चुनौतियों को नजरअंदाज करते हैं और “इनवैलिडेशन” की परिभाषा को बदलकर इसे पिछड़ा हुआ कदम बना दिया गया है। संगठन ने कहा कि अब इनवैलिड पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 साल की सेवा पूरी करनी होगी।
संस्था ने कहा कि पहले हृदय रोग जैसे सभी मामले सर्विस स्ट्रेस से जुड़े माने जाते थे, लेकिन अब इन्हें सिर्फ ऊंचाई वाले इलाकों से जोड़ा गया है। जबकि तनाव और दबाव सैनिक चाहे जहां भी तैनात हों, हर समय झेलते हैं।
अदालत का फैसला और सरकार की हार
दिल्ली हाई कोर्ट ने जुलाई 2023 में रक्षा मंत्रालय की उन 300 याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें विकलांगता पेंशन को लेकर सैनिकों के खिलाफ अपील की गई थी।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और शालिंदर कौर की बेंच ने कहा कि विकलांगता पेंशन का उद्देश्य उन सैनिकों की मदद करना है, जिन्होंने ड्यूटी के दौरान बीमारी या चोट झेली है। अदालत का स्पष्ट मत था कि यह पेंशन सैनिकों का अधिकार है और इसे छीनना न्याय के खिलाफ है।
सैनिकों के हालात की अनदेखी
संस्था का कहना है कि रक्षा मंत्रालय ने नए नियम बनाते समय सैनिकों की जमीनी वास्तविकताओं पर ध्यान नहीं दिया। भारतीय सैनिक ऊंचे ग्लेशियर से लेकर रेगिस्तान और घने जंगलों तक हर तरह की भौगोलिक परिस्थितियों में तैनात रहते हैं।
उनकी जिंदगी हमेशा खतरे में होती है कभी सीमा पर, कभी आतंकी इलाकों में और कभी आंतरिक सुरक्षा ड्यूटी पर। हमेशा हाई-अलर्ट पर रहना उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। साथ ही, सैनिकों को सिर्फ भौगोलिक कठिनाइयां ही नहीं झेलनी पड़तीं, बल्कि परिवार की चिंता भी उनकी सेहत पर असर डालती है। लंबे समय तक पोस्टिंग के कारण परिवार से दूर रहना, बच्चों और पत्नी की देखभाल न कर पाना, और हर पल हमले का खतरा, यह सब मिलकर सैनिकों की सेहत बिगाड़ देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाइपरटेंशन, दिल की बीमारियां और मानसिक तनाव इन्हीं हालात की देन हैं।
वर्तमान नियमों को लेकर विशेषज्ञों और पूर्व सैनिकों का कहना है कि रक्षा मंत्रालय को संवेदनशीलता दिखाते हुए सैनिकों के मनोबल का ख्याल रखना चाहिए। सैनिक हर वक्त आदेश मानकर सीमा से लेकर शांति क्षेत्रों तक कहीं भी सेवा के लिए तैयार रहते हैं।
पूर्व सैनिकों का कहना है कि सरकार उन्हें मुकदमों में उलझाकर और पेंशन घटाकर उनका मनोबल गिरा रही है। उनका तर्क है कि जो सैनिक अपने प्राणों की परवाह किए बिना ड्यूटी करता है, उसे ऐसी नीतियों से नहीं बल्कि संवेदनशील फैसलों से समर्थन मिलना चाहिए।
MiG-21 Memories: भारतीय वायुसेना का इतिहास कई महत्वपूर्ण पड़ावों से भरा हुआ है, लेकिन उसमें मिग-21 का आना और इसकी शुरुआती ट्रेनिंग का दौर सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। मिग-21, जो दुनिया का सबसे ज्यादा बनाया गया सुपरसोनिक फाइटर है, भारत में 1960 के दशक की शुरुआत में आया और छह दशकों से ज्यादा समय तक भारतीय आसमान का प्रहरी बना रहा। यह मिग-21एफ-13 वेरिएंट था, जिसे औपचारिक रूप से 1964 में वायुसेना में शामिल किया गया।
चीन के साथ 1962 के युद्ध के तुरंत बाद भारत ने सोवियत संघ से मिग-21 खरीदने का फैसला किया। उस समय यह विमान तकनीकी रूप से एडवांस था और इसके आने के बाद ही भारत की सुपरसोनिक युग में एंट्री हुई। 1963 में पहली बार छह MiG-21 विमान भारत पहुंचे। इन्हें बॉम्बे (अब मुंबई) से चंडीगढ़ लाकर रूसी इंजीनियरों ने असेंबल किया और इन्हें नंबर 28 स्क्वाड्रन में शामिल किया गया। इस स्क्वाड्रन ने खुद को “फर्स्ट सुपरसोनिक्स” नाम दिया।
इन विमानों में पहला जहाज BC 816 टेल नंबर वाला था, जिसे देखकर भारतीय पायलट हैरान रह गए। उनके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के विमानों पर उड़ान भर रहे थे।
MiG-21 Memories: सोवियत संघ में भारतीय पायलटों की ट्रेनिंग
भारतीय पायलटों का पहला बैच 1962 में सोवियत संघ भेजा गया। इसमें आठ पायलट शामिल थे स्क्वाड्रन लीडर दिलबाग सिंह, एसके मेहरा, वोल्लेन, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एके मुखर्जी, डेनजिल कीलर, एचएस गिल, लाडू सेन और सबसे जूनियर ब्रजेश धर जयाल। इनमें से कई आगे चलकर भारतीय वायुसेना प्रमुख और एयर मार्शल बने।
सोवियत संघ में ट्रेनिंग आसान नहीं थी। भारतीय पायलटों को सुपरसोनिक विमान उड़ाने का कोई अनुभव नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि MiG-21 का कोई ट्रेनर वर्जन उपलब्ध नहीं था। पायलटों को पहले पुराने सबसोनिक मिग-15 और मिग-17 पर उड़ान भरनी पड़ी और फिर सीधे मिग-21 में बैठकर अकेले उड़ना पड़ा।
इसके अलावा, कॉकपिट की हर चीज रूसी भाषा में थी और सभी डायल मीटर और किलोमीटर में बने थे, जबकि भारतीय पायलट फीट और माइल्स में काम करने के आदी थे। इस वजह से शुरुआती दिनों में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
MiG-21 Memories: रूस ने रोक दी थी ट्रेनिंग
फ्लाइट लेफ्टिनेंट ब्रजेश धर जयाल याद करते हैं कि सब कुछ बिल्कुल नया था। रूसी ट्रेनर भी शुरुआती दिनों में ज्यादा मददगार नहीं थे। पायलटों को लगता था कि रूस भारत को अपने कीमती विमान देने में हिचक रहा है। रूसी भाषा न समझ पाने की वजह से कॉकपिट में बैठकर हर बटन और डायल को समझना उनके लिए एक कठिन परीक्षा जैसा था।
एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) दिलबाग सिंह ने अपनी किताब On the Wings of Destiny में लिखा है कि उस समय रूस और चीन के संबंध काफी अच्छे थे। जब चीन ने भारत पर हमला किया तो रूस में ट्रेनिंग कर रहे भारतीय पायलटों से कई बार पूछा गया, “तुम चीन से क्यों लड़ रहे हो? वे तो कम्युनिस्ट हैं।” इस वजह से कुछ समय के लिए ट्रेनिंग रोक भी दी गई थी। बाद में राजनीतिक स्तर पर फैसला होने के बाद ही ट्रेनिंग दोबारा शुरू हो सकी।
MiG-21 Memories: सब कुछ नया और चौंकाने वाला
एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) एवाई टिपनिस ने याद किया कि जब उन्होंने पहली बार मिग-21 देखा तो वे दंग रह गए। उनका कहना था, “रूसी कॉकपिट, मीट्रिक डायल, सुपरसोनिक स्पीड, कोई ट्रेनर नहीं, न सिम्युलेटर। सब कुछ नया और चौंकाने वाला था।”
MiG-21 की लैंडिंग और टेकऑफ वेस्टर्न विमानों से बिल्कुल अलग थी। इसकी एप्रोच और क्लाइंबिंग ऐंगल पश्चिमी विमानों की तुलना में तीन गुना ज्यादा था। हेलमेट वाइजर में हीटिंग सिस्टम था, जो रूस की ठंड के लिए बनाया गया था, लेकिन भारत की गर्मी में पायलटों के सिर पसीने से भीग जाते थे। हाइड्रोलिक ब्रेक्स की जगह न्यूमैटिक ब्रेक्स थे, जिससे पायलटों को शुरू में असहजता महसूस हुई।
MiG-21 Memories: दो 1963 में ही हो गए थे दुर्घटनाग्रस्त
शुरुआती दौर में मिग-21 का ऑपरेशन आसान नहीं था। पहले छह विमानों में से दो 1963 में दुर्घटनाग्रस्त हो गए। इन्हें वोल्लेन और मुखर्जी उड़ा रहे थे। केवल चार विमान ही सुरक्षित बचे। टिपनिस का कहना है कि यह हादसे तकनीकी चुनौतियों और प्रशिक्षण की कमी की वजह से हुए।
लेकिन भारतीय वायुसेना ने हार नहीं मानी। जल्द ही छह और विमान आए। यह टाइप-76 FL वर्जन था, जिसमें नया रडार, आफ्टरबर्नर और दो एयर-टू-एयर मिसाइलें लगी थीं। यह भारतीय पायलटों के लिए बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे सिर्फ कैनन से फायर करने के आदी थे।
MiG-21 Memories: धीरे-धीरे बढ़ी मिग-21 की संख्या
1965 तक भारतीय वायुसेना में मिग-21 का इस्तेमाल बढ़ने लगा था। इसे हाई-एल्टीट्यूड इंटरसेप्टर की तरह डिजाइन किया गया था, लेकिन भारतीय पायलटों ने इसे कई और भूमिकाओं में ढाल लिया। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद, धीरे-धीरे मिग-21 भारतीय वायुसेना की रीढ़ बनता चला गया।
एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) टिपनिस कहते हैं कि हालांकि शुरू में कॉकपिट ने पायलटों को आत्मविश्वास नहीं दिया, लेकिन समय के साथ यह विमान उनके दिल के बेहद करीब हो गया। “मैंने जब पहली बार अंबाला में इस विमान को देखा, तो इसकी डेल्टा विंग और नोज कोन ने मुझे मोहित कर लिया। मुझे लगा कि यह सिर्फ मेरा है। यह एक खतरनाक खूबसूरती थी, जैसे कोई वैम्प।”
MiG-21 Memories: 1966 में दो ट्रेनर जेट
भारतीय पायलटों की सबसे बड़ी मांग थी कि उन्हें ट्रेनिंग के लिए मिग-21 का ट्रेनर वर्जन दिया जाए। आखिरकार 1966 में रूस ने दो ट्रेनर विमान भारत भेजे। यह नई पीढ़ी के पायलटों के लिए राहत की बात थी। इसी साल मिग-21 ने पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में फ्लाईपास्ट किया। उस दिन भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया कि अब वह सुपरसोनिक फाइटर जेट्स से लैस है। टिपनिस ने 1966 में पहली बार मिग-21 से एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल फायर की थी। यह उस समय एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि मिग-21 को शुरू में केवल इंटरसेप्टर माना जाता था।
IAF Inflatable Decoys: भारतीय वायुसेना अपनी वॉर स्ट्रेटेजी में लगातार बदलाव कर रही है। वायुसेना ने हाल ही में 400 इन्फ्लेटेबल डिकॉय खरीदने का फैसला किया है। हवा से फुलाने वाले ये डिकॉय असली फाइटर जेट और S-400 ट्रायंफ एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हथियारों की हूबहू नकल हैं। इसका मकसद दुश्मन देशों को भ्रम में रख कर अपने असली एसेट्स की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह खरीद इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने डिकॉय टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दिया था।
IAF Inflatable Decoys: ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए थे डिकॉय
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया। इस जवाबी कार्रवाई में वायुसेना ने कई नई रणनीतियों का इस्तेमाल किया। इनमें सबसे अहम था डिकॉय सिस्टम। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने पहली बार बड़े पैमाने पर डिकॉय सिस्टम का इस्तेमाल किया।
शुरुआती चरण में डिकॉय ड्रोन, डमी जेट्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर पेलोड्स को उड़ाए थे, जिससे पाकिस्तानी रडार कवरेज सैचुरेटेड हो कर कन्फ्यूज हो गया। ये ड्रोन दुश्मन की रडार स्क्रीन पर असली लड़ाकू विमान जैसे दिख रहे थे। इससे उनका एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिव हो गया और उन्होंने समय से पहले मिसाइलें दाग दीं। जिसके चलते इसी प्रक्रिया ने उनकी लोकेशन का पता भारतीय वायुसेना को दे दिया।
असल में पाकिस्तान ने चीनी HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम को एक नई जगह पर तैनात कर दिया था, जिसका भारत को पता नहीं था। डमी जेट विमानों के जरिए भारत को HQ-9 एडी की नई लोकेशन का पता लग गया। जिससे भारत को रडार व एयर डिफेंस सिस्टम पर हमला करने में मदद मिली। इसके बाद भारतीय वायुसेना ने इजरायल निर्मित हारोप लूटरिंग म्यूनिशंस और ब्रह्मोस मिसाइलों से इन लक्ष्यों पर हमला किया।
वायुसेना ने इसके लिए पायलटलेस टारगेट एयरक्राफ्ट (PTA) का इस्तेमाल किया। इन्हें इस तरह तैयार किया गया था कि वे पाकिस्तानी रडार पर Su-30 और MiG-29 जैसे फाइटर जेट्स दिखाई दें। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम भ्रमित हो गए और असली हमले से पहले ही पाकिस्तान की एयर डिफेंस की लोकेशन पता लग गई।
IAF Inflatable Decoys: राफेल पर लगाया था ये खास ‘चकमा’ सिस्टम
इस ऑपरेशन में राफेल फाइटर जेट्स पर लगे X-Guard सिस्टम ने भी अहम भूमिका निभाई। यह एक AI-पावर्ड टोअड डिकॉय (AI-powered Towed Decoy) था, जिसका वजन लगभग 30 किलो होता है। यह सिस्टम दुश्मन की PL-15E एयर-टू-एयर मिसाइलों और J-10C फाइटर जेट्स को चकमा देने में कामयाब रहा। X-Guard दुश्मन के रडार सिग्नल को कॉपी कर देता है, जिससे दुश्मन को लगता है कि उसने असली जेट को निशाना बनाया है। इस दौरान असली राफेल सुरक्षित रहते हुए अपने मिशन को अंजाम देते रहे और आतंकियों के ठिकानों को टरगेट बनाते रहे।
IAF Inflatable Decoys: ब्रह्मोस हमलों से पहले उड़ाए डमी एयरक्राफ्ट
सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों के हमले से पहले भी डमी एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया था। डिकॉय के इस्तेमाल से पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम बार-बार एक्टिव होता रहा। जब उनके रडार ने भारतीय विमानों को आते देखा, तो उन्होंने HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया। लेकिन वास्तव में वे डमी टारगेट थे।
9-10 मई 2025 की रात भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 12 में से 11 बड़े एयरबेस पर हमले किए। इन हमलों में लगभग 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी गईं। इसके साथ ही स्कैल्प, रैम्पेज और क्रिस्टल मेज जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें भी इस्तेमाल हुईं।
इन हमलों का मकसद पाकिस्तानी वायुसेना को पूरी तरह नष्ट करना नहीं था, बल्कि उनके एयरबेस को निष्क्रिय करना और उनकी विमान तैनाती क्षमता को सीमित करना था।
इन हमलों में पाकिस्तान ने न केवल अपने एयरबेस का बड़ा हिस्सा खोया, बल्कि खबरों के मुताबिक एक AWACS (Airborne Warning and Control System) विमान और कई लंबे समय तक उड़ान भरने वाले UAV भी नष्ट हुए।
IAF Inflatable Decoys: 400 नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय
अब भारतीय वायुसेना 400 नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय खरीदने जा रही है। ये डिकॉय न केवल फाइटर जेट्स बल्कि S-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम की भी हूबहू नकल कर सकते हैं। इससे दुश्मन की इंटेलिजेंस सर्विलांस और ड्रोन जासूसी नेटवर्क को चकमा दिया जा सकेगा। इससे दुश्मन वास्तविक और डमी टारगेट्स में फर्क नहीं कर पाएगा, जिससे अहम हथियार की सुरक्षा में इजाफा होगा।
भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ये डिकॉय सर्विलांस या स्ट्राइक मिशन्स के दौरान दुश्मन के लिए वास्तविक और नकली एसेट्स के बीच अंतर करना मुश्किल बना देंगे। इससे दुश्मन की रडार प्रणाली कन्फ्यूज होगी और वास्तविक मिलिट्री एसेट्स की सुरक्षा बढ़ेगी।
रिटायर्ड कर्नल अनिल राणा के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध केवल गोलियों और मिसाइलों से नहीं जीता जाता, बल्कि दुश्मन को धोखे में रखना (Deception Tactics) भी अहम रणनीति है। ऑपरेशन सिंदूर में हमने डिकॉय का इस्तेमाल करके भारत ने न केवल पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को नाकाम किया, बल्कि अपने विमानों और पायलटों को भी सुरक्षित रखा।
उनका कहना है कि S-400 जैसे दिखने वाले ये नए इन्फ्लेटेबल डिकॉय भारत की सैन्य क्षमताओं में बढ़ोतरी करेंगे। इनके इस्तेमाल से भारत अपने एयर डिफेंस को और मजबूत कर सकेगा और भविष्य में होने वाली जंगों में दुश्मनों को चकमा देने में मदद मिलेगी।
Made in India Rafale Jets: भारतीय वायु सेना ने एक बड़ा कदम उठाते हुए 114 राफेल फाइटर जेट की खरीद का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को सौंपा है। इस प्रस्ताव के तहत 114 ‘मेड इन इंडिया’ राफेल फाइटर जेट्स खरीदे जाने हैं। ये विमान फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन (Dassault Aviation) भारतीय एयरोस्पेस कंपनियों के साथ मिल कर भारत में ही बनाएगी। इस प्रस्ताव की अनुमानित लागत 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा माना जा रहा है।
Made in India Rafale Jets: रक्षा मंत्रालय में चर्चा शुरू
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, वायुसेना द्वारा तैयार किया गया स्टेटमेंट ऑफ केस (SoC) कुछ दिन पहले मंत्रालय को मिला है। अब यह प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय के डिफेंस फाइनेंस के पास समीक्षा के लिए गया हुआ है। आगे चलकर यह प्रस्ताव डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड (DPB) के पास जाएगा और उसके बाद अंतिम फैसला डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) में लिया जाएगा।
Made in India Rafale Jets: भारत के लिए सबसे बड़ी डील
अगर यह डील मंजूर होती है, तो यह भारत सरकार का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा। इस डील के बाद भारतीय वायुसेना के पास कुल 176 राफेल फाइटर जेट हो जाएंगे। फिलहाल वायुसेना के पास 36 राफेल विमान पहले से हैं, जिन्हें गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट समझौते के तहत खरीदा गया था। वहीं, भारतीय नौसेना ने भी 26 राफेल विमान का ऑर्डर दिया है।
MiG-21 Bison Retirement: जल्द रिटायर होने जा रहे मिग-21 बाइसन को लेने के लिए क्यों मची होड़! कई संस्थानों ने किया आवेदन, 5-6 साल का है वेटिंग पीरियड, जानें खर्च करने होंगे कितने रुपये…पढ़ें ये खास खबर https://t.co/IL6ew60eM7#MiG21#IAF#IndianAirForce#MiG21Bison…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 12, 2025
Made in India Rafale Jets: ऑपरेशन सिंदूर में राफाल का प्रदर्शन
यह प्रस्ताव उस समय आया है, जब हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल फाइटर जेट ने पाकिस्तान के खिलाफ शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट (Spectra Electronic Warfare Suite) की मदद से चीनी PL-15 एयर-टू-एयर मिसाइलों को पूरी तरह मात दी। इसने वायुसेना की क्षमता को और मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
लगााए जाएंगे नए हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें
भारत में बनने वाले राफाल विमानों को और भी ताकतवर शक्तिशाली बनाने की योजना है। इनमें मौजूदा स्कैल्प (Scalp) एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल से भी लंबी दूरी की मिसाइलों को जोड़ा जाएगा। स्कैल्प का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों और मिलिट्री ठिकानों को निशाना बनाने में भी किया गया था।
Made in India Rafale Jets: 60 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री
इस डील की सबसे खास बात यह है कि इसमें 60 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री शामिल होगी। यह भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान और घरेलू रक्षा उत्पादन को नई गति देगा। भारतीय कंपनियां इस निर्माण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
Made in India Rafale Jets: मेंटेनेंस हब भी भारत में
फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल (MRO) फैसिलिटी भी लगाएगी। यह हब हैदराबाद में बनाया जाएगा, जहां राफेल जेट्स में इस्तेमाल होने वाले M-88 इंजन की मरम्मत और रखरखाव का काम किया जाएगा। दसॉ ने इसके लिए पहले से ही भारत में एक कंपनी बना ली है। माना जा रहा है कि टाटा जैसी प्रमुख भारतीय एयरोस्पेस कंपनियां इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगी।
भारतीय वायुसेना को इस समय लड़ाकू विमानों की तत्काल जरूरत है। मौजूदा सुरक्षा परिदृश्य और पड़ोसी देशों से बढ़ते खतरे को देखते हुए वायुसेना का लक्ष्य अपनी स्क्वॉड्रन क्षमता को 42 तक बढ़ाना है। फिलहाल वायुसेना 31 स्क्वॉड्रन के साथ काम कर रही है।
180 LCA मार्क-1A तेजस विमानों के ऑर्डर
भारत पहले ही 180 LCA मार्क-1A तेजस विमानों का ऑर्डर दे चुका है। इसके अलावा, 2035 के बाद बड़ी संख्या में स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट भी शामिल करने की योजना है।
राफेल जेट्स को भारत ने पहली बार 2016 में खरीदा था और 2020 में इन्हें औपचारिक रूप से वायुसेना में शामिल किया गया। यह विमान अपनी रफ्तार, हथियारों और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स के चलते दुनिया के बेहतरीन मल्टीरोल फाइटर जेट्स में गिने जाते हैं।
भारतीय नौसेना और वायुसेना दोनों के लिए लाभ
नई डील केवल भारतीय वायुसेना के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना के लिए भी अहम साबित होगी। नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर पर तैनात होने वाले ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) विमानों में भी इस डील से तैयार नई टेक्नोलॉजी का फायदा मिलेगा। भारतीय नौसेना ने पहले ही 26 राफेल M का ऑर्डर दिया है, जिन्हें INS विक्रांत और भविष्य के विमानवाहक पोत पर तैनात किया जाएगा।
क्यों चुना फ्रांस को
भारत ने राफेल प्रोजेक्ट के लिए फ्रांस को इसलिए चुना है क्योंकि फ्रांस ने अतीत में कई मौकों पर भारत का साथ दिया है। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद जब दुनिया के कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे, तब फ्रांस ने न केवल प्रतिबंध लगाने से इंकार किया, बल्कि मिराज-2000 फाइटर जेट्स और मिसाइल तकनीक के लिए सहयोग जारी रखा।
आज भी फ्रांस, भारत को एडवांस INGPS सिस्टम और मिराज 2000 विमानों के लिए स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराता है। यही वजह है कि राफेल के निर्माण और रखरखाव में फ्रांस, भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार माना जा रहा है।
INS Aravali: भारतीय नौसेना ने शुक्रवार को गुरुग्राम में अपना नया नेवल बेस INS अरावली कमीशन कर दिया। इस एतिहासिक समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे, उन्होंने इस बेस को नौसेना में शामिल करने की घोषणा की। समारोह के दौरान नौसेना प्रमुख को 50 सदस्यीय गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।
एडमिरल दिनेश ने कहा कि INS अरावली भारतीय नौसेना को मजबूत प्रशासनिक और लॉजिस्टिक सपोर्ट प्रदान करेगा। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे नौसेना का आकार और उसकी तकनीकी क्षमता बढ़ रही है, वैसे ही इस प्रकार के आधुनिक बेस की जरूरत भी महसूस की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह नया बेस केवल टेक्नोलॉजी का सेंटर नहीं होगा, बल्कि सहयोग का ऐसा हब बनेगा, जो भारत और उसके साझेदार देशों को जोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘महासागर विजन’ (Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions-MAHASAGAR) को आगे बढ़ाएगा।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि INS अरावली भारत की भूमिका को हिंद महासागर क्षेत्र में “प्रिफर्ड सिक्योरिटी पार्टनर” के रूप में और मजबूत करेगा। उन्होंने बेस के कमांडिंग ऑफिसर और पूरी कमीशनिंग टीम को बधाई दी और उनसे नौसेना के मूल्यों कर्तव्य, सम्मान और साहस को निभाने का आह्वान किया।
INS Aravali का महत्व
INS अरावली का नाम गुरुग्राम में स्थित अरावली पर्वतमाला से प्रेरित है। यह बेस भारतीय नौसेना की इनफॉरमेशन और कम्यूनिकेशन युनिट को सपोर्ट करेगा। ये यूनिट्स भारत और नौसेना की कमांड, कंट्रोल और मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) फ्रेमवर्क में अहम भूमिका निभाती हैं। इस बेस का आदर्श वाक्य है – ‘सामुद्रिकसुरक्षायाः सहयोगं’ यानी ‘सहयोग के जरिए समुद्री सुरक्षा। इसका उद्देश्य है नौसेना की यूनिट्स, MDA सेंटर्स और सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करना और समुद्री सुरक्षा को और मजबूत करना।
क्रेस्ट है बेहद खास
INS अरावली का क्रेस्ट भी खास है। इसमें अरावली श्रृंखला की पर्वत छवि है जो दृढ़ता और शक्ति का प्रतीक है। इसके साथ उगता हुआ सूरज दर्शाया गया है जो अनंत सतर्कता, ऊर्जा और आधुनिक तकनीकी क्षमताओं का प्रतीक है। यह क्रेस्ट नौसेना की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है जिसके तहत वह भारत के समुद्री हितों की रक्षा के लिए हर पल तैयार रहती है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मुंबई से Samudra Pradakshina अभियान को वर्चुअली हरी झंडी दिखाई। यह दुनिया का पहला ट्राई सर्विसेज महिला नौकायन अभियान है जिसमें 10 महिला अफसर 26,000 समुद्री मील की परिक्रमा करेंगी। https://t.co/9D9kWOXdiT#SamudraPradakshina#IndianArmy#IndianNavy…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 11, 2025
हिंद महासागर और सामरिक महत्व
हिंद महासागर क्षेत्र दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। यहां से दुनिया के लगभग एक-तिहाई बड़े कार्गो जहाज, आधे कंटेनर शिप और दो-तिहाई तेल के जहाज गुजरते हैं। इस कारण यह क्षेत्र व्यापार और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। INS अरावली इसी रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
IFC-IOR: अंतरराष्ट्रीय सहयोग का केंद्र
INS अरावली में मौजूद इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर – इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) की स्थापना 2018 में की गई थी। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और मित्र देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान करना है। यहां 25 देशों के 43 मल्टीनैशनल सेंटर से लाइव फीड प्राप्त होती है।
अब तक इस सेंटर ने 28 देशों के साथ 76 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संपर्क स्थापित किए हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, जापान और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर्स (ILO) भी शामिल हैं।
IMAC की पैनी नजर
इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) को भारतीय नौसेना का नर्व सेंटर माना जाता है। यहां विशाल स्क्रीन पर समुद्र में हो रही हर गतिविधि को लाइव देखा जा सकता है। IMAC में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिसिस तकनीक का इस्तेमाल होता है। यह कुछ ही सेकंड में बता देता है कि समुद्र में कितने जहाज हैं, वे कहां से आए हैं, कहां जा रहे हैं और उनकी गतिविधियां सामान्य हैं या संदिग्ध।
हर जहाज का रजिस्ट्रेशन नंबर, क्रू और कार्गो की जानकारी इस सिस्टम में उपलब्ध होती है। अगर कोई जहाज झूठा सिग्नल भेजकर स्पूफिंग करने की कोशिश करता है, तो IMAC उसे तुरंत पकड़ लेता है। भारत की 7,600 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा पर लगभग 90 तटीय रडार स्टेशन स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा, 89 ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम समुद्र की लगातार निगरानी करते हैं। यहां तक कि 20 मीटर से छोटी नावों को भी ट्रैक करने के लिए ट्रांसपोडर सिस्टम लगाया गया है। देशभर की करीब 2.20 लाख मछली पकड़ने वाली नावें इस सिस्टम से जुड़ी हुई हैं।
लाइव रिपोर्टिंग और सुरक्षा नेटवर्क
INS अरावली से भारतीय नौसेना अपने चार प्रमुख जॉइंट ऑपरेशन सेंटर मुंबई, कोच्चि, विशाखापट्टनम और पोर्ट ब्लेयर से जुड़ी रहती है। यहां से हर जहाज और नाव की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती है। अब 20 मीटर से छोटी मछली पकड़ने वाली नावों के ट्रांसपोडर भी सैटेलाइट के जरिए डेटा भेजेंगे, जिसे IMAC में देखा जा सकेगा। इससे निगरानी क्षमता और भी बढ़ जाएगी।
INS Aravali Commissioned: भारतीय नौसेना ने शुक्रवार को दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम में नया नेवल बेस INS अरावली कमिशन किया। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी की मौजूदगी में आयोजित इस समारोह ने नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को और मजबूत किया। अरावली पर्वत श्रृंखला के नाम पर रखे गए इस बेस का क्रेस्ट पर्वत और उगते सूरज के प्रतीक से सजा है, जो अटल शक्ति और सतत सतर्कता का प्रतिनिधित्व करता है। इसका ध्येय वाक्य है“सामुद्रिकसुरक्षायाः सहयोगं”, यानी सहयोग के माध्यम से समुद्री सुरक्षा।
हिंद महासागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री क्षेत्रों में से एक है। यहां से दुनिया के लगभग एक-तिहाई बड़े कार्गो जहाज, आधे कंटेनर शिप और दो-तिहाई तेल के जहाज गुजरते हैं। इस कारण यह क्षेत्र न केवल व्यापारिक बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। INS अरावली इसी रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
INS Aravali Commissioned: गुरुग्राम से समंदर की निगरानी
गुरुग्राम स्थित इस बेस का मुख्य काम भारतीय नौसेना के विभिन्न इनफॉरमेशन और कम्यूनिकेशंस सेंटर्स को सपोर्ट करना है। यहां से मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) को बढ़ावा मिलेगा, जो भारत और मित्र देशों की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है।
इस बेस में दो प्रमुख केंद्र हैंइंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) और इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR)। दोनों मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में गुजरने वाले जहाजों पर निगरानी रखते हैं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत पहचान कर कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मुंबई से Samudra Pradakshina अभियान को वर्चुअली हरी झंडी दिखाई। यह दुनिया का पहला ट्राई सर्विसेज महिला नौकायन अभियान है जिसमें 10 महिला अफसर 26,000 समुद्री मील की परिक्रमा करेंगी। https://t.co/9D9kWOXdiT#SamudraPradakshina#IndianArmy#IndianNavy…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 11, 2025
IFC-IOR: अंतरराष्ट्रीय सहयोग का केंद्र
INS अरावली में मौजूद IFC-IOR की स्थापना 2018 में हुई थी। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और मित्र देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान करना है। यहां 25 देशों के 43 मल्टीनैशनल सेंटर की लाइव फीड उपलब्ध होती है। इस सेंटर ने 28 देशों के साथ 76 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संपर्क स्थापित किए हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, जापान और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर्स (ILO) भी शामिल हैं।
INS Aravali Commissioned: समुद्री सुरक्षा के नए मानक
INS अरावली न केवल भारतीय नौसेना बल्कि पूरी दुनिया के लिए समुद्री सुरक्षा का नया केंद्र बनेगा। यहां से समुद्री डकैती, आतंकवाद, तस्करी, अवैध मछली पकड़ने और मानव तस्करी जैसी चुनौतियों से निपटने में सहयोग मिलेगा।
IFC-IOR का काम है, मित्र देशों को समय रहते चेतावनी देना, सूचनाओं को साझा करना और किसी भी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना।
INS Aravali Commissioned:IMAC की पैनी नजर
इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) को भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी का नर्व सेंटर माना जाता है। इसके मॉनिटरिंग रूम में लगी विशाल स्क्रीन पर समुद्र में होने वाली हर गतिविधि लाइव दिखाई देती है। यह स्क्रीन केवल जहाजों की आवाजाही ही नहीं, बल्कि संभावित खतरों और असामान्य गतिविधियों का भी तुरंत संकेत देती है।
IMAC में इस्तेमाल हो रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिसिस तकनीक इसे और भी ताकतवर बनाती है। कुछ ही सेकंड में यह सिस्टम बता देता है कि समुद्र में कितने जहाज मौजूद हैं, वे कहां से आए हैं, कहां जा रहे हैं और उनकी गतिविधियां सामान्य हैं या संदिग्ध। इससे भारतीय नौसेना को समुद्री सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बड़ी मदद मिलती है।
हर जहाज का रजिस्ट्रेशन नंबर, उसमें मौजूद क्रू की जानकारी और कार्गो का पूरा विवरण इस सिस्टम में तुरंत उपलब्ध हो जाता है। अगर कोई जहाज झूठा सिग्नल भेजकर या स्पूफिंग के जरिए अपनी असली पहचान छिपाने की कोशिश करता है, तो IMAC उसे तुरंत पकड़ लेता है।
भारत की 7,600 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा पर लगभग 90 तटीय रडार स्टेशन स्थापित किए गए हैं, जो लगातार निगरानी रखते हैं। इसके अलावा, 89 ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम समुद्र के हर हिस्से पर नजर रखते हैं और वास्तविक समय में सूचना उपलब्ध कराते हैं।
सिर्फ बड़े जहाज ही नहीं, बल्कि 20 मीटर से छोटी नौकाओं को भी ट्रैक करने के लिए ट्रांसपोडर सिस्टम लगाया गया है। देशभर में करीब 2.20 लाख से अधिक मछली पकड़ने वाली छोटी नावें इन ट्रांसपोडर से जुड़ी हुई हैं। इनके जरिए भी लगातार सिग्नल मिलते हैं, जो सैटेलाइट से होकर सीधे IMAC तक पहुंचते हैं।
इस तरह, IMAC के पास मौजूद यह एडवांस तकनीक भारतीय समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा को अभेद्य बनाती है। चाहे तटीय निगरानी हो, जहाजों की मूवमेंट पर नजर रखना हो या किसी भी संदिग्ध गतिविधि का तुरंत पता लगाना हो, यह सेंटर हर पल सक्रिय रहता है।
समुद्री गतिविधियों पर लाइव रिपोर्टिंग
INS अरावली से भारतीय नौसेना अपने चार प्रमुख जॉइंट ऑपरेशन सेंटरमुंबई, कोच्चि, विशाखापट्टनम और पोर्ट ब्लेयर से लगातार जुड़ी रहती है। यहां से हर जहाज और नाव की गतिविधि पर नजर रखी जाती है। खास बात यह है कि अब 20 मीटर से छोटी मछली पकड़ने वाली नावों पर लगाए गए ट्रांसपोडर भी सैटेलाइट के जरिए डेटा भेजेंगे, जिसे IMAC में देखा जा सकेगा।
सूत्रों ने बताया कि INS अरावली की स्थापना भारत के बढ़ते सामरिक महत्व और वैश्विक दृष्टिकोण को भी दर्शाती है। यह सिर्फ एक नेवल बेस नहीं बल्कि भारत की “सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी” का भी हिस्सा है। यहां से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की नौसैनिक क्षमताओं और सहयोग की भावना को मजबूत किया जाएगा।
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