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Manipur M4 Rifle Recovery: कश्मीर के बाद अब मणिपुर में उग्रवादियों से बरामद हुई M4 असाल्ट राइफल, पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने की बड़ी तैयारी

Manipur M4 Rifle Recovery: Militants' Plot to Disrupt Northeast Foiled

Manipur M4 Rifle Recovery: 14 मई 2025 को मणिपुर के चंदेल जिले में भारत-म्यांमार सीमा के पास न्यू समताल गांव में असम राइफल्स ने इस ऑपरेशन में 10 उग्रवादियों को मार गिराया गया। उग्रवादियों के पास से बड़ी मात्रा में हथियारों का जखीरा बरामद किया गया है। खास बात यह है कि जखीरे में उग्रवादियों के पास से पहली बार अमेरिकी M4 राइफल भी बरामद हुई है। यह पहली बार है कि जब पूर्वोत्तर के उग्रवादियों से एम4 असाल्ट राइफल मिली है। पिछले साल अपुष्ट खबरें आईं थी कि यहां के उग्रवादियों के पास एम4 जैसी अत्याधुनिक राइफलें देखी गई हैं। लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हुई थी। एम4 राइफलें अभी तक जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से मुठभेड़ के बाद बरामद हुई हैं। जो उन्हें पाकिस्तान सेना की तरफ से उपलब्ध कराई गईं।

Manipur M4 Rifle Recovery: कैसे शुरू हुआ ऑपरेशन?

मणिपुर का चंदेल जिला भारत-म्यांमार सीमा के करीब है, अपनी जटिल भौगोलिक स्थिति और उग्रवादी गतिविधियों के लिए जाना जाता है। खेंगजॉय तहसील में पड़ने वाले न्यू समताल गांव एक पहाड़ी और जंगली इलाका है। यहां 398 किलोमीटर लंबी खुली सीमा हैं, जहां से उग्रवादी हथियारों की तस्करी को अंजाम देते हैं। 14 मई को असम राइफल्स को खुफिया जानकारी मिली कि इस क्षेत्र में कुछ सशस्त्र लोग छिपे हैं।

इस सूचना के आधार पर, असम राइफल्स की एक टुकड़ी ने गश्त शुरू की। जैसे ही जवान न्यू समताल के पास पहुंचे, उन पर सेना की वर्दी पहने उग्रवादियों ने अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। गोलियों की बौछार के बीच, असम राइफल्स के जवानों ने तुरंत कवर लिया और जवाबी कार्रवाई की। इस गोलीबारी में असम राइफल्स ने 10 उग्रवादियों को ढेर कर दिया। खास बात यह रही कि इस ऑपरेशन में असम राइफल्स का कोई जवान घायल नहीं हुआ।

M4 राइफल बरामद

गोलीबारी खत्म होने के बाद, असम राइफल्स ने इलाके की गहन तलाशी ली। इस दौरान उन्हें हथियारों का एक बड़ा जखीरा मिला, जिसमें सात AK-47 राइफलें, एक RPG लॉन्चर, चार सिंगल-बैरल ब्रीच-लोडिंग (SBBL) राइफलों के अलावा एक M4 राइफल भी बरामद हुई। इसके अलावा, भारी मात्रा में गोला-बारूद, विस्फोटक सामग्री, और सामरिक उपकरण जैसे रेडियो सेट और बैकपैक भी बरामद हुए। अभी तक वहां के उग्रवादियों से AK-47 जैसी राइफलें बरामद होती रही हैं। लेकिन एम4 राइफल का मिलना चौंकाने वाली बात है।

M4 राइफल अमेरिका में कोल्ट द्वारा निर्मित एक अत्याधुनिक असॉल्ट राइफल है। M4 राइफल अमेरिकी सेना का प्रमुख हथियार है और इसे नाइट-विज़न स्कोप या लेजर साइट जैसे उपकरणों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत के पूर्वोत्तर में इस तरह का अत्याधुनिक हथियार मिलना बेहद चिंताजनक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह राइफल म्यांमार के रास्ते तस्करी से भारत में लाई गई होगी। म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध ने वहां हथियारों की कालाबाजारी को बढ़ावा दिया है, और वहीं से ये हथियार भारत के उग्रवादी समूहों तक पहुंच रहे हैं। 2024 में मणिपुर पुलिस ने 161 हथियार बरामदगी की घटनाओं की सूचना दी, जिसमें विदेशी मूल के हथियार शामिल थे। सूत्रों का कहना है कि इस बात का पता लगाया जा रहा है कि उग्रवादियों के पास ये एम4 राइफल कहां से आई है। असम राइफल्स और मणिपुर पुलिस इस राइफल के ऑरिजन और इसके सीरियल नंबर की जांच कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मणिपुर के उग्रवादी समूहों ने M4 राइफल को अंतरराष्ट्रीय हथियार डीलरों से खरीदा हो सकता है। यह खरीद म्यांमार के रास्ते हुई हो सकती है, जहां मैतई और कुकी उग्रवादी समूह सक्रिय हैं।

सूत्रों का कहना है, एम4 राइफल मिलने का मतलब यह है कि यहां अब जल्दी शांति नहीं लौटने वाली है। उग्रवादी गुट बड़ी तैयारी कर रहे हैं और यहां अस्थिरता फैलाने की फिराक में हैं। यह इस बाक संकेत हैं कि उग्रवादी समूह अब म्यांमार के जरिए अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजारों तक पहुंच बना रहे है। उन्होंने कहा कि अगर यह पहली बार है, तो यह उग्रवादियों की बढ़ती सैन्य क्षमता का संकेत है।

मणिपुर में 2023 में शुरू हुई थी हिंसा

मणिपुर लंबे समय से उग्रवाद और जातीय हिंसा से जूझ रहा है। मई 2023 से मैतई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच हिंसा ने 130 से ज्यादा लोगों की जान ली और 400 से ज्यादा घायल हुए। चंदेल जिला उग्रवादियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना रहा है। यह इलाका नगा और अन्य आदिवासी समुदायों का गढ़ है। यहां उग्रवादी समूह उगाही, हथियार तस्करी, और सीमा पार हमलों में शामिल रहते हैं।

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असम राइफल्स ने 2024 में 425 से ज्यादा ऑपरेशन किए, जिनमें 1,000 से अधिक हथियार बरामद हुए। चंदेल और उखरूल जैसे जिलों में अवैध अफीम की खेती को भी नष्ट किया गया। इस साल जनवरी में ही 13 उग्रवादियों को पकड़ा गया और 35 हथियार जब्त किए गए।

Three Brothers Alliance: पाकिस्तान-तुर्किए-अजरबैजान की यह जुगलबंदी क्यों बढ़ा रही है भारत की टेंशन? पढ़ें ये एक्सप्लेनर

Three Brothers Alliance: Why Pakistan-Turkey-Azerbaijan Trio Worries India? Explained
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Three Brothers Alliance: ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान, तुर्किए और अजरबैजान के नापाक गठबंधन का खुलासा हुआ है। जिसके बाद भारत में तुर्किए और अजरबैजान को लेकर विरोध शुरू हो गया है। पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई में तुर्किए का नाम सामने के बाद भारत के कई विश्वविद्यालयों ने वहां की यूनिवर्सिटीज के साथ संबंध तोड़ लिए हैं। इसके अलावा तुर्किए की एविएशन कंपनी सेलेबी से भारत सरकार ने सिक्योरिटी क्लीयरेंस वापस ले लिया है। यह कंपनी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोचिन, अहमदाबाद, गोवा, और कन्नूर जैसे नौ प्रमुख हवाई अड्डों पर ग्राउंड हैंडलिंग और कार्गो संचालन का काम देखती है। साथ ही कई भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने तुर्किए की यात्रा और वहां के उत्पादों का बहिष्कार करने की अपील की है। मेकमायट्रिप और ईजमायट्रिप जैसी ऑनलाइन ट्रैवल कंपनियों ने बताया कि तुर्किए जाने की बुकिंग्स में भारी गिरावट आई है। वहीं अजरबैजान की बुकिंग्स भी रद्द की गई हैं। तीनों देशों का यह गठबंधन भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

Three Brothers Alliance: क्या है और कैसे बना?

थ्री ब्रदर्स अलायंस (Three Brothers Alliance) की शुरुआत 2021 में हुई, जब पाकिस्तान, तुर्किए और अजरबैजान के नेताओं ने अजरबैजान की राजधानी बाकू में एक अहम शिखर सम्मेलन आयोजित किया। इस बैठक में तीनों देशों ने फैसला लिया कि वे अपने राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रिश्तों को मजबूत करेंगे। इस गठजोड़ का नाम “थ्री ब्रदर्स अलायंस” पड़ा, क्योंकि ये तीनों देश एक-दूसरे को भाई की तरह देखते हैं। इनके बीच सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्ते भी हैं। तुर्किए और अजरबैजान की जड़ें तुर्किक संस्कृति से जुड़ी हैं, वहीं तीनों देश इस्लामिक बहुल हैं।

इस गठबंधन (Three Brothers Alliance) का मुख्य मकसद है कि ये तीनों देश एक-दूसरे के हितों को बढ़ावा दें। मसलन, अगर पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर समर्थन चाहिए, तो तुर्किए और अजरबैजान उसकी मदद करेंगे। इसी तरह, अगर अजरबैजान को नागोर्नो-कराबाख विवाद में समर्थन चाहिए, तो पाकिस्तान और तुर्किए उसका साथ देंगे। तुर्किए भी उत्तरी साइप्रस के अपने विवाद में इन दोनों देशों का समर्थन लेता है।

भारत के लिए क्यों बन गया है खतरा?

हाल ही में पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव फिर से बढ़ गया। पिछले महीने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें 36 लोग मारे गए और 57 घायल हो गए। भारत ने इसका जवाब ऑपरेशन सिंदूर से दिया औऱ पाकिस्तान को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दियाा। इस दौरान तुर्किए और अजरबैजान ने खुलकर पाकिस्तान (Three Brothers Alliance) का समर्थन किया। तुर्किए ने तो पाकिस्तान को ड्रोन तक दिए, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया। इन ड्रोनों में तुर्किए का मशहूर बायकर बायरक्तर, और एसिसगार्ड सॉन्गर ड्रोन भी शामिल था।

1971 के बाद यह पहली बार था जब भारत और पाकिस्तान (Three Brothers Alliance) के इतने जबरदस्त हमले देखे गए। भारत ने कहा कि पाकिस्तानी गोलाबारी में उसके 16 नागरिक मारे गए, वहीं भारत ने इन हमलों को पहलगाम आतंकी हमले का जवाब बताया। लेकिन पाकिस्तान ने आतंकी हमले में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया। इस तनाव के बीच थ्री ब्रदर्स अलायंस ने भारत के खिलाफ एकजुटता दिखाई, जिससे भारत को चिंतित होना लाजिमी था।

यह गठबंधन (Three Brothers Alliance) भारत के लिए एक बड़ी टेंशन के तौर पर उभर रहा है। खासकर 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने पर तुर्किए ने संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर बार-बार इस मसले को उठाया, औऱ पाकिस्तान का साथ दिया। जिससे भारत की नाराजगी बढ़ी। वहीं, अजरबैजान ने भी पाकिस्तान के कश्मीर रुख का समर्थन किया। इसके अलावा, तुर्किए और अजरबैजान ने पाकिस्तान को सैन्य मदद दी, जैसे ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य हथियार, जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा बढ़ गया।

इस गठबंधन के पीछे तुर्किए की क्या भूमिका है?

इस गठबंधन की शुरुआत तुर्किए ने की ही थी। तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन अपने देश का प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। वे इस्लामिक और तुर्किक देशों के साथ गठजोड़ (Three Brothers Alliance) करके अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। तुर्किए और अजरबैजान के बीच तुर्किक सांस्कृतिक रिश्ते बहुत पुराने हैं। 2020 में जब अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-कराबाख को लेकर युद्ध हुआ, तब तुर्किए ने अजरबैजान को सैन्य मदद दी। इस मदद की वजह से अजरबैजान ने आर्मेनिया को हरा दिया। पाकिस्तान ने भी इस युद्ध में अजरबैजान का साथ दिया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ पाकिस्तानी भाड़े के सैनिकों ने अजरबैजान की तरफ से लड़ाई भी लड़ी। इस जीत के बाद इन तीनों देशों ने अपने रिश्तों को और मजबूत किया और थ्री ब्रदर्स अलायंस बनाया।

भारत ने तेज की अपनी कूटनीति

भारत ने इस गठबंधन (Three Brothers Alliance) का मुकाबला करने के लिए अपनी कूटनीति को तेज कर दिया है। भारत ने उन देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं, जो इस गठबंधन से परेशान हैं। इनमें आर्मेनिया, ईरान, साइप्रस और ग्रीस जैसे देश शामिल हैं। आर्मेनिया के साथ भारत ने सैन्य सहयोग बढ़ाया है। भारत ने आर्मेनिया को हथियार-स्थान रडार, तोपखाने और रॉकेट लांचर जैसे उपकरण बेचे हैं। जेम्सटाउन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में भारत और आर्मेनिया के बीच 2 बिलियन डॉलर का रक्षा समझौता हुआ था, जिसके बाद आर्मेनिया भारत से सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाला देश बन गया।

लेकिन इससे अजरबैजान नाराज हो गया। अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने पिछले साल भारत से आर्मेनिया को हथियार देना बंद करने की मांग की थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब भारत में अजरबैजान का विरोध शुरू हुआ तो गुरुवार सुबह 10 बजे, अजरबैजान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर भारत से आर्मेनिया को हथियारों की आपूर्ति बंद करने की मांग की। हालांकि यह पहली बार नहीं हुआ है, पिछले साल अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने भी भारत से ऐसा ही अनुरोध किया था, लेकिन भारत ने इसे ठुकरा दिया था।

वहीं गुरुवार को भी अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच तनाव की खबरें आईं। नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र में आज सुबह दोनों देशों की सेनाओं के बीच हल्की झड़प हुई, जिसमें किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। अजरबैजान ने आर्मेनिया पर सीमा उल्लंघन का आरोप लगाया था, वहीं, आर्मेनिया ने इसे खारिज कर दिया।

ईरान भी इस गठबंधन से चिंतित

थ्री ब्रदर्स अलायंस (Three Brothers Alliance) से केवल भारत ही नहीं ईरान भी इस गठबंधन से चिंतित है। ईरान में लाखों अजरी लोग रहते हैं, जो सांस्कृतिक रूप से अजरबैजान से जुड़े हैं। ईरान को डर है कि अजरबैजान इन रिश्तों का इस्तेमाल अलगाववादी आंदोलनों को बढ़ावा देने के लिए कर सकता है। भारत ने ईरान के साथ मिलकर इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बनाने की बात कही है, जो भारत को ईरान और आर्मेनिया के रास्ते यूरोप से जोड़ता है। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत हुई है।

भारत ने साइप्रस और ग्रीस के साथ भी अपने कूटनीतिक रिश्ते मजबूत किए हैं। साइप्रस का तुर्किए के साथ उत्तरी साइप्रस को लेकर पुराना विवाद है। भारत ने साइप्रस का समर्थन किया, और बदले में साइप्रस ने भारत के कूटनीतिक मुद्दों का साथ दिया है।

तुर्किए-अजरबैजान का बॉयकॉट

हाल के दिनों में भारत के तुर्किए और अजरबैजान (Three Brothers Alliance) के साथ रिश्ते और खराब हुए हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने एक तुर्किए विश्वविद्यालय के साथ अपना शैक्षणिक समझौता भी रद्द कर दिया है। वहीं, जामिया यूनिवर्सिटी ने भी ऐसा ही कदम उठाया है। भारतीय पर्यटक भी तुर्किए और अजरबैजान का बहिष्कार कर रहे हैं।

पश्चिमी एशिया (मिडिल ईस्ट) मामलों के जानकार और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) में डिप्टी डायरेक्टर और फैलो कबीर तनेजा का कहना है, “यह गठबंधन (Three Brothers Alliance) भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा नहीं है। यह भारत के लिए एक स्थानीय समस्या तो है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह ज्यादा प्रभावशाली नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि तुर्किए और अजरबैजान ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में ज्यादा निवेश नहीं किया है, जिससे इस गठबंधन की ताकत सीमित है।”

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर थ्री ब्रदर्स अलायंस अपने सैन्य और कूटनीतिक सहयोग को और बढ़ाता है, तो यह भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। वहीं, भारत इसके लिए पहले से ही तैयारियों में जुटा हुआ है। वह अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ा रहा है और नए गठबंधनों को मजबूत कर रहा है। रूस का इस क्षेत्र में प्रभाव कम होना भी भारत के लिए एक मौका है, क्योंकि आर्मेनिया जैसे देश अब रूस की जगह भारत की ओर देख रहे हैं।

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

Pakistan Air Defence: 2022 Blunder Powers India's Operation Sindoor Triumph
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Pakistan Air Defence: भारतीय सेनाओं में एक किताब अवश्य पढ़ाई जाती है, Sun Tzu की “The Art of War”। Sun Tzu एक प्राचीन चीनी सैन्य रणनीतिकार, दार्शनिक और लेखक थे। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, “लोगों को वही दिखाओ जिसकी उन्हें अपेक्षा हो। इससे वे आपके फैंके जाल में फंस जाते हैं, और तुम उस क्षण की प्रतीक्षा कर सकते हो जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते।” वहीं, उन्होंने एक जगह यह भी लिखा है, “युद्ध की सर्वोच्च कला यह है कि बिना लड़े ही दुश्मन को पराजित कर दिया जाए।” कुछ ऐसा ही पाकिस्तान के साथ हुआ है। 2022 में हुई एक घटना जिसे बेहद सामान्य मान कर पाकिस्तान ने इग्नोर कर दिया था, उसका खामियाजा आज उसे ऑपरेशन सिंदूर में अपने 11 एयरबेसों पर हुई सटीक मिसाइल स्ट्राइक के तौर पर भुगतना पड़ा और बिना लड़े ही घुटने टेकने पड़े।

Pakistan Air Defence: क्या हुआ 9 मार्च, 2022 को?

9 मार्च 2022 को एक खबर आई थी कि ब्रह्मोस मिसाइल पाकिस्तानी इलाके (Pakistan Air Defence) में आ कर गिरी है। उस दौरान पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के महानिदेशक मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार ने 10 मार्च 2022 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि पाकिस्तान वायु सेना (PAF) के एयर डिफेंस ऑपरेशंस सेंटर ने 9 मार्च 2022 को शाम 6:43 बजे भारतीय क्षेत्र के अंदर एक “हाई-स्पीड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट” को ट्रैक किया था। मिसाइल को हरियाणा के सिरसा से लॉन्च किया गया था। उनके अनुसार, मिसाइल ने अपनी तय दिशा से अचानक पाकिस्तानी क्षेत्र की ओर रुख किया और शाम 6:50 बजे मियां चन्नू, खानेवाल जिला, पंजाब में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। पाकिस्तान ने कहा कि मिसाइल ने 124 किमी तक पाकिस्तानी क्षेत्र में 3 मिनट 44 सेकंड तक उड़ान भरी थी।

वहीं, 11 मार्च 2022 को, इस घटना के लगभग 48 घंटे बाद, भारत के रक्षा मंत्रालय ने एक संक्षिप्त बयान जारी किया था। इसमें कहा गया, “9 मार्च 2022 को, नियमित रखरखाव के दौरान एक तकनीकी खराबी के कारण एक मिसाइल गलती से लॉन्च हो गई। यह मिसाइल पाकिस्तान के एक क्षेत्र में गिरी। भारत ने इस घटना पर खेद जताया था और कहा था कि यह राहत की बात है कि इससे किसी की जान नहीं गई।”

मंत्रालय ने यह भी बताया कि सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और एक उच्च-स्तरीय जांच समिति (Court of Enquiry) का गठन किया है। हालांकि इस बयान में मिसाइल के प्रकार का उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन बाद में सूत्रों ने पुष्टि की कि यह भारत-रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल थी। 15 मार्च 2022 को, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारतीय संसद में इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा, “नियमित रखरखाव और निरीक्षण के दौरान एक मिसाइल का अनजाने में लॉन्च हो जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। हमें बाद में पता चला कि मिसाइल पाकिस्तान (Pakistan Air Defence) के क्षेत्र में गिरी।” उन्होंने दोहराया कि यह घटना “खेदजनक” थी और सरकार ने इसे रोकने के लिए प्रक्रियाओं की समीक्षा शुरू कर दी है।

तब भी पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम हुआ था फेल

हालांकि पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने मिसाइल को ट्रैक किया, लेकिन सूत्रों का का कहना है कि पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) उस समय भी फेल हो गया था। उस समय भी पाकिस्तान के पास चीनी मूल के HQ-9 और HQ-16 (LY-80) सिस्टम शामिल थे औऱ वे इस सुपरसोनिक मिसाइल को प्रभावी ढंग से ट्रैक करने या रोकने में असमर्थ रहे। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान के चीनी रडार सिस्टम ने मिसाइल को किसी भी चरण में डिटेक्ट नहीं किया, और केवल इसके दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद ही पाकिस्तानी सेना ने इसकी जानकारी दी।

सूत्रों ने बताया कि अगर पाकिस्तान ने मिसाइल को ट्रैक किया था, तो उसने इसे इंटरसेप्ट क्यों नहीं किया, खासकर जब यह न्यूक्लियर-कैपेबल मिसाइल थी। उस समय भी पाकिस्तान टुडे की एक रिपोर्ट में इस ओर इशारा किया गया था और पाकिस्तान के एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) पर सवाल उठाए गए थे कि मियां चन्नू में दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले ही मिसाइल को क्यों नहीं रोका गया था।

भारतीय सैन्य सूत्रों ने बताया कि समझदार के लिए इशारा ही काफी है। उस समय दोनों देशों के बीच कोई जंग तो छिड़ी नहीं थी। ऐसे में मिसाइल की स्टेल्थ कैपेबिलिटी को टेस्ट करने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता था। गलती मान ली और बात रफादफा हो गई। उन्होंने दावा किया कि मिसाइल का लॉन्च “आकस्मिक” नहीं, बल्कि जानबूझकर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया समय और रक्षा क्षमताओं का टेस्टिंग करने के लिए किया गया था।

ब्रह्मोस की रफ्तार और रेंज के आगे हुए फेल

पाकिस्तान के पास उस समय HQ-9 और HQ-16 (जिसे LY-80 भी कहा जाता है) जैसे एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) थे। लेकिन ये ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों को रोकने में नाकामयाब रहे। HQ-9 की क्रूज मिसाइलों के खिलाफ प्रभावी रेंज केवल 25 किमी के आसपास है, जो ब्रह्मोस की रफ्तार और रेंज (290-500 किमी) के सामने बेकार है। हालांकि 2022 की घटना के बाद पाकिस्तान ने अपने LY-80 सिस्टम में 388 तकनीकी दिक्कतों की एक सूची चीन को सौंपी थी, जिनमें से 255 में तत्काल सुधार की जरूरत थी। हालांकि 2024 में पाकिस्तान ने HQ-16FE जैसे एयर डिफेंस सिस्टम को शामिल करने की पहल की थी।

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ऑपरेशन सिंदूर में मिला ‘गलती’ का फायदा

सूत्रों ने बताया कि ‘गलती’ से ब्रह्मोस मिसाइल गिरने से भारत ने बहुत कुछ सीखा और ऑपरेशन सिंदूर में इसका जबरदस्त फायदा मिला। भारतीय वायुसेना ने 7 से 10 मई के बीच पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी और सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए। ये हमले तब किए गए जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयर डिफेंस (AD) सिस्टम (Pakistan Air Defence) को जाम कर दिया।

सरकारी बयान के मुताबिक, भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की एयर डिफेंस (Pakistan Air Defence) को जाम कर 23 मिनट के भीतर मिशन पूरा किया। इन हमलों में नौ आतंकवादी शिविरों को नष्ट किया गया। रात 9-10 मई को, IAF ने रफीकी, मुरिद, चकलाला, रहीम यार खान, सियालकोट, सक्कर, स्कार्दू, सर्गोधा, जैकोबाबाद, कराची के भोलारी और मलिर कैंट सहित 13 एयरबेस पर हमले किए। खास बात यह रही कि इन हमलों में ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया गया। यह 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर सबसे बड़ा हमला था।

भारतीय वायुसेना ने चीनी HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) को जाम कर दिया, जिससे पाकिस्तान के रडार को सिग्नल नहीं मिला, और भारतीय विमानों को टारगेट करने में फेल हो गए। यही नहीं, भारत ने पहली बार इतने व्यापक स्तर पर लोइटरिंग म्यूनिशन (आत्मघाती ड्रोन) का इस्तेमाल किया, जिससे दुश्मन के हाई-वैल्यू टारगेट जैसे रडार और मिसाइल यूनिट तबाह कर दिए गए। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल किया और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों, जैसे डिकॉय, सिग्नल ब्लॉकिंग और रडार जैमिंग का इस्तेमाल किया। SEAD (Suppression of Enemy Air Defenses) रणनीति के तहत हार्पी ड्रोन ने पाकिस्तानी रडार और मिसाइल सिस्टम को नष्ट किया। लाहौर, सियालकोट और कराची में तैनात रडार यूनिट्स पूरी तरह बेकार हो गईं।

23 मिनट में पूरा किया मिशन

वायुसेना सूत्रों का कहना है, भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के चीनी एय़र डिफेंस सिस्टम (Pakistan Air Defence) को नाकाम और जाम कर दिया, मात्र 23 मिनट में मिशन पूरा किया। जामिंग के चलते दुश्मन के रडार कन्फ्यूज हो गए और मिसाइलों को डिटेक्ट नहीं कर पाए। सूत्रों ने बताया कि 2022 तो छोड़िए 2019 में भी पुलवामा आतंकी हमले के बाद जब भारतीय फाइटर जेट बालाकोट में घुसे थे, तो भी पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम उन्हें ट्रैक नहीं कर पाया था।

ऑपरेशन सिंदूर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार ने बताया था कि मिशन के दौरान हमले में स्कैल्प क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। ये मिसाइलें राफेल लड़ाकू विमानों में लगाई गई थीं। ये फ्रांसीसी मूल की मिसाइलें चुपचाप हमला करने के लिए जानी जाती हैं और 500 किलोमीटर से अधिक की रेंज और जमीन के करीब उड़ान भरने की खबियों के लिए जानी जाती हैं। इन मिसाइलों ने पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में बिना रडार की पकड़ में आए निशाने पर सटीक वार किया। एक भी मिसाइल को रडार डिटेक्ट नहीं कर पाए।

सूत्रों का कहना है कि कई सालों की खरीद और अपग्रेड के बावजूद, पाकिस्तान का इंटीग्रेटेड एय़र डिफेंस नेटवर्क (Pakistan Air Defence) उस समय पूरी तरह विफल हो गया जब उसकी असली परीक्षा थी। HQ-9 स्कैल्प मिसाइलों को ट्रैक ही नहीं कर पाया। पाकिस्तान को समझना चाहिए कि जिस बीजिंग के हथियारों के भरोसे वह जंग के मैदान में उतरा है, वह कितने कारगर हैं।

एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है ब्रह्मोस

सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के एयर डिफेंस (Pakistan Air Defence) के जाम होने का फायदा ब्रह्मोस को मिला और वे उसे डिटेक्ट नहीं कर पाए। बता दें कि ब्रह्मोस की रफ्तार लगभग 2.8 से 3.5 मैक है, जो दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज मिसाइलों में से एक है। इस तेज रफ्तार के कारण दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है। 290 किमी की रेंज वाली ब्रह्मोस कुछ ही मिनटों में लक्ष्य तक पहुंच सकती है, जिससे इंटरसेप्शन मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा ब्रह्मोस समुद्र की सतह से 3-10 मीटर की ऊंचाई पर उड़ान भर सकती है (सी-स्किमिंग) और जमीनी लक्ष्यों के लिए इलाके के करीब (टेरेन-हगिंग) उड़ान भरती है। इससे रडार इसका पता नहीं पाते क्योंकि क्योंकि कम ऊंचाई पर रडार की लाइन-ऑफ-साइट सीमित होती है।

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इसके अलावा ब्रह्मोस विभिन्न फ्लाइट पाथ, जैसे कि ऊंची उड़ान, सीधी गोता (Steep Dive), और समुद्र-स्तर की उड़ान, का उपयोग कर सकती है। इस ट्रैजेक्टरी के चलते एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना मुश्किल हो जाता है। साथ ही, ब्रह्मोस में भी स्टील्थ खूबियां हैं, जो इसके रडार क्रॉस-सेक्शन को कम करती हैं। इससे यह रडार द्वारा आसानी से डिटेक्ट नहीं होती। ब्रह्मोस-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) में यह खूबी और एडवांस होगी, जिससे इसे डिटेक्ट करना और मुश्किल होगा। ब्रह्मोस में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS), जीपीएस/ग्लोनास, और एक्टिव/पैसिव रडार सीकर का कॉन्बिनेशन है। जो इसे इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेज़र्स (ECCM) के खिलाफ ताकतवर बनाता है, क्योंकि यह दुश्मन के जैमिंग प्रयासों को नजरअंदाज कर लक्ष्य को भेद सकता है।

Trump Meets Al-Shara: सामने आया अमेरिका और ट्रंप का दोगलापन, ‘पूर्व वांटेड आतंकी’ से की मुलाकात, रखा था 85 करोड़ का इनाम

Trump Meets Al-Shara: U.S. Hypocrisy Exposed, $10M Bounty to Ally

Trump Meets Al-Shara: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात की। यह मुलाकात इसलिए भी सुर्खियों में है क्योंकि अल-शरा वही शख्स हैं, जिन पर कुछ साल पहले अमेरिका ने 10 मिलियन डॉलर (लगभग 85 करोड़ रुपये) का इनाम रखा था और उन्हें आतंकवादी घोषित किया था। इस मुलाकात ने न केवल पूरी दुनिया को चौंकाया है, बल्कि इससे अमेरिका और ट्रंप का दोहरा चेहरा भी सामने आ गया है।

Trump Meets Al-Shara: कौन है अल-शरा?

अहमद अल-शरा (Trump Meets Al-Shara) को पहले अबू मोहम्मद अल-जुलानी के नाम से जाना जाता था। जो एक समय अल-कायदा से जुड़े रहे थे। 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले के बाद वे वहां अमेरिकी सेना के खिलाफ लड़ने वाले विद्रोहियों में शामिल हो गए थे। बाद में, उन्होंने सीरिया में नुसरा फ्रंट की स्थापना की, जो अल-कायदा की सीरियाई शाखा थी। इस संगठन को बाद में हयात तहरीर अल-शाम (HTS) के रूप में पुनर्गठित किया गया, जो कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित है।

अमेरिका ने अल-शरा (Trump Meets Al-Shara) को उनकी आतंकवादी गतिविधियों के लिए मोस्ट वांटेड सूची में शामिल किया था और उनके सिर पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा था। इराक में उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी, लेकिन बाद में वे रिहा हो गए और सीरियाई गृहयुद्ध में एक प्रमुख चेहरा बन गए। दिसंबर 2024 में, HTS के नेतृत्व में विद्रोही समूहों ने दमिश्क पर कब्जा कर लिया और बशर अल-असद के 54 साल पुराने शासन का अंत कर दिया। जनवरी 2025 में अल-शरा को सीरिया का अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया गया।

ट्रंप का यू-टर्न

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Trump Meets Al-Shara) ने मंगलवार, 13 मई 2025 को सऊदी अरब में एक इनवेस्टमेंट समिट को संबोधित करते हुए सीरिया पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा की। यह घोषणा अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक कदम थी, क्योंकि ये प्रतिबंध बशर अल-असद के शासन के दौरान लगाए गए थे ताकि सीरियाई सरकार पर आर्थिक और राजनयिक दबाव बनाया जा सके। ट्रंप ने कहा, “सीरिया में एक नई सरकार है, और हम उन्हें शांति और पुनर्निर्माण का मौका देना चाहते हैं। मैं सभी प्रतिबंध हटाने का आदेश देता हूं। सीरिया, हमें कुछ विशेष दिखाएं।”

इस घोषणा के ठीक एक दिन बाद, ट्रंप ने अल-शरा (Trump Meets Al-Shara) से मुलाकात की। यह 25 वर्षों में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति और सीरियाई नेता की पहली मुलाकात थी। इससे पहले 2000 में, तत्कालीन सीरियाई राष्ट्रपति हाफिज अल-असद ने जिनेवा में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुलाकात की थी। ट्रंप और अल-शरा की यह मुलाकात सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की मौजूदगी में हुई, और तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन भी फोन कॉल के जरिए इस चर्चा में शामिल रहे।

मुलाकात का क्या है कूटनीतिक महत्व

यह मुलाकात कई मायनों में महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, यह अमेरिका की सीरिया नीति में एक बड़े बदलाव का प्रतीक है। जहां एक समय अल-शरा को अमेरिका आतंकवादी (Trump Meets Al-Shara) मानता था, वहीं अब ट्रंप प्रशासन ने उनके साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ट्रंप ने इस मुलाकात को क्षेत्रीय स्थिरता और ईरान के प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा बताया। सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय शक्तियों ने भी अल-शरा की सरकार को समर्थन दिया है, क्योंकि उनका मानना है कि इससे सीरिया में ईरान का प्रभाव कम होगा, जिसने असद शासन के दौरान वहां अपनी पकड़ मजबूत की थी।

दूसरा, इस मुलाकात ने सीरिया के लिए आर्थिक और कूटनीतिक राहत की संभावनाएं खोली हैं। प्रतिबंधों के हटने से सीरिया को पुनर्निर्माण और आर्थिक सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता मिलने की उम्मीद है। सीरिया के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के इस फैसले को “सीरियाई लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण” बताया और कहा कि यह देश को युद्ध के दर्दनाक दौर से बाहर निकालने में मदद करेगा।

सीरिया में जश्न का माहौल

ट्रंप की प्रतिबंध हटाने की घोषणा के बाद सीरिया (Trump Meets Al-Shara) की राजधानी दमिश्क में जश्न का माहौल देखा गया। सरकारी समाचार एजेंसी ‘सना’ ने वीडियो और तस्वीरें जारी कीं, जिनमें उमय्यद स्कवायर पर लोग आतिशबाजी करते और नया सीरियाई झंडा लहराते नजर आए। कई लोगों ने अपनी कारों के हॉर्न बजाकर खुशी जाहिर की। यह जश्न इस बात का प्रतीक था कि सीरियाई जनता, जो पिछले 14 वर्षों से गृहयुद्ध और आर्थिक संकट से जूझ रही थी, अब एक नई शुरुआत की उम्मीद कर रही है।

हालांकि, ट्रंप की इस मुलाकात (Trump Meets Al-Shara) और प्रतिबंध हटाने के फैसले पर विवाद भी खड़ा हुआ है। कई आलोचकों का कहना है कि यह मुलाकात अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति के खिलाफ है। अल-शरा का संगठन HTS अभी भी अमेरिका और अन्य देशों की आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुलाकात सऊदी अरब के दबाव और व्यापारिक हितों के कारण हुई। सऊदी अरब ने हाल ही में अमेरिका में 600 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की है, और माना जा रहा है कि ट्रंप ने यह कदम क्षेत्रीय सहयोगियों को खुश करने के लिए उठाया।

इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों ने अभी तक इस पर कोई ठोस बयान नहीं दिया है, लेकिन कुछ यूरोपीय नेता स्थिरता और प्रवास की नई लहरों को रोकने के लिए सीरिया के साथ आर्थिक जुड़ाव की वकालत कर रहे हैं।

वहीं कुछ विशेषज्ञों ने ट्रंप की इस मुलाकात (Trump Meets Al-Shara) को क्षेत्रीय स्थिरता और ईरान के प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा, “सीरिया में एक नई सरकार है। हमें उनके साथ काम करने का मौका लेना चाहिए।” यह मुलाकात सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों के समर्थन से संभव हुई, जो मानते हैं कि अल-शरा की सरकार सीरिया में ईरान की पकड़ को ढीला कर सकती है।

अल-शरा का नया चेहरा

अल-शरा ने हाल के महीनों में खुद को एक उदारवादी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। वे पश्चिमी शैली के सूट पहनते हैं और सीरिया के विकास के लिए प्रतिबंध हटाने की वकालत करते हैं। उन्होंने अल-कायदा से अपने संबंध तोड़ लिए हैं और अल्पसंख्यकों व महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की बात की है। हालांकि, कई विश्लेषकों को संदेह है कि क्या वे इन वादों पर लंबे समय तक अमल कर पाएंगे।

सऊदी अरब में भव्य स्वागत

ट्रंप का सऊदी अरब में शाही अंदाज में स्वागत किया गया। जैसे ही एयर फोर्स वन रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा, सऊदी पायलटों द्वारा उड़ाए गए छह अमेरिकी निर्मित F-15 लड़ाकू विमानों ने उन्हें एस्कॉर्ट किया। ट्रंप ने बैंगनी रंग के कालीन पर कदम रखा, जो सऊदी अरब में रेगिस्तानी जंगली फूलों और आतिथ्य का प्रतीक है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सैकड़ों सैन्य, सरकारी और व्यावसायिक अधिकारियों के साथ उनकी अगवानी की। अमेरिकी और सऊदी झंडों के साथ सफेद अरबी घोड़ों पर सवार सैनिकों ने ट्रंप के काफिले को शाही टर्मिनल तक पहुंचाया, जहां पारंपरिक कॉफी समारोह का आयोजन हुआ। यह भव्य स्वागत 2022 में जो बाइडन के दौरे के विपरीत था, जब खशोगी हत्याकांड के बाद तनावपूर्ण संबंधों के बीच बाइडन का स्वागत बेहद सादा रहा था।

आर्थिक और रक्षा समझौते

ट्रंप की यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना था। यूएस-सऊदी निवेश मंच में 600 बिलियन डॉलर के समझौतों की घोषणा की गई, हालांकि दस्तावेजों से पता चला कि केवल 283 बिलियन डॉलर के समझौते ही पक्के हुए हैं। इनमें सबसे बड़ा था 142 बिलियन डॉलर का रक्षा सौदा, जिसे “इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा बिक्री समझौता” बताया गया। इस सौदे के तहत सऊदी अरब को उन्नत अमेरिकी सैन्य उपकरण, प्रशिक्षण और सहायता मिलेगी।

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सऊदी टेक कंपनी डाटावोल्ट ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा बुनियादी ढांचे में 20 बिलियन डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई। एनवीडिया ने सऊदी कंपनी ह्यूमैन को 18,000 से अधिक ब्लैकवेल एआई चिप्स बेचने का समझौता किया। अमेरिकी कंपनियां जैसे जैकब्स और AECOM सऊदी अरब में किंग सलमान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, किंग सलमान पार्क और किद्दिया सिटी जैसे बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं।

Air Defense: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान रूस ने भारत को दिया था S-500 का बड़ा ऑफर! ‘स्वदेशी S-400’ करेगा चीन-पाकिस्तान की नींद हराम

Air Defense: Russia offers India S-500 production; India trusts Project Kusha

Air Defense: भारत ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपने एयर डिफेंस और अपनी सैन्य ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने न केवल दुश्मन देश पाकिस्तान के होश उड़ गए, बल्कि चीन को भी तगड़ा सरप्राइज मिला। इस अभियान में भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान के भीतर नौ आतंकी ठिकानों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में भारतीय सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोनों से हमले किए, लेकिन भारत के अचूक एयर डिफेंस सिस्टम ने इन सभी खतरों को नाकाम कर दिया। इस ऑपरेशन ने भारत की मल्टी लेयर डिफेंस सिस्टम को दुनिया के सामने ला खड़ा किया, जिसमें रूस से मिले S-400 ट्रायम्फ, इजरायल के साथ विकसित बराक-8, स्वदेशी आकाश मिसाइल, और डीआरडीओ की एडवांस टेक्नोलॉजी ने अहम भूमिका निभाई।

Air Defense: रूस ने दिया S-500 का ऑफर

इस सफलता के बाद रूस ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ही भारत को एडवांस S-500 प्रोमेथियस एय़र डिफेंस सिस्टम के संयुक्त उत्पादन का भी प्रस्ताव दिया है। इससे पहले जुलाई 2024 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान, रूस ने S-500 के संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव दिया था। दिसंबर 2021 में, रूसी उपप्रधानमंत्री यूरी बोरिसोव ने कहा था कि भारत S-500 सिस्टम का पहला विदेशी खरीदार हो सकता है। S-500 प्रोमेथियस (Prometheus), जिसे 55R6M त्रिउम्फ़टोर-M भी कहा जाता है, यह रूस का सबसे एडवांस सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है, जो S-400 का उत्तराधिकारी है। एस-500 की रेंज 600 किमी (बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए) और 500 किमी (वायु रक्षा के लिए) है। यह हाइपरसोनिक मिसाइलों, स्टील्थ विमानों, इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM), और निम्न-कक्षा उपग्रहों को भी निशाना बना सकती है। इसका AESA रडार 2,000 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्य का पता लगा सकता है, और इसका प्रतिक्रिया समय केवल 4 सेकंड है, जो S-400 के 10 सेकंड से कहीं तेज है।

हालांकि भारत ने रूस के इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक तौर पर कोई बयान जारी नहीं किया है। रक्षा सूत्रों का कहना है कि दीर्घकालिक स्वदेशी समाधानों पर ध्यान दे रहा है। क्योंकि भारत को अमेरिका, इजरायल, और अन्य पश्चिमी देशों के साथ रक्षा सहयोग को भी बनाए रखना है। उन्होंने बताया कि S-400 सौदे के बाद CAATSA प्रतिबंधों का खतरा था। S-500 के लिए भी यही जोखिम है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पहले ही बाकी बची दो S-400 की डिलीवरी में देरी हुई है, जो S-500 के लिए भी हो सकती है। ऐसे में भारत स्वदेश में ही निर्मित एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी पर फोकस कर रहा है।

Air Defense: Project Kusha
Project Kusha

भारत का स्वदेशी S-400!

रक्षा सूत्रों के मुताबिक भारत अपने स्वदेशी S-400 को बनाने में जुटा है। डीआरडीओ का प्रोजेक्ट कुशा, यह लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (LRSAM) है, जो S-400 के समकक्ष है, जिसका पहला परीक्षण 2026 में होने की उम्मीद है। यह सिस्टम भारतीय वायुसेना (IAF) और नौसेना को हवाई खतरों जैसे स्टील्थ फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल, ड्रोन, और बैलिस्टिक मिसाइलों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। अप्रैल 2024 में कुशा का डिजाइन फेज पूरा हुआ, और अब डुअल-पल्स रॉकेट मोटर और नए प्रोपेलेंट फ्यूल-1 की टेस्टिंग जल्द होने वाली है। प्रोजेक्ट कुशा को रूस के S-400 ट्रायम्फ और इज़राइल के आयरन डोम के समकक्ष माना जा रहा है। यह भारत के एयर डिफेंस हवाई को मजबूत करने के साथ-साथ विदेशी हथियार प्रणालियों पर निर्भरता को कम करेगा। हाल ही में फरवरी में हुए एयरो इंडिया 2025 में प्रोजेक्ट कुशा का स्केल मॉडल भी शोकेस किया गया था, जिसमें तीन अलग-अलग SAM (120-350 किमी रेंज) और उनकी टेक्नोलॉजी को दिखाया गया था।

सूत्हरों का कहना है, हमें चीनी हाइपरसोनिक क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल खतरों का मुकाबला करने के लिए S-500 जैसी स्वदेशी प्रणाली की जरूरत है। S-500 मैक-20 की गति वाली मिसाइलों को रोक सकता है, जबकि प्रोजेक्ट कुशा मैक-7+ की मिसाइलों को रोकने में सक्षम है, जो पर्याप्त नहीं है।

350-400 किलोमीटर होगी रेंज

अगस्त 2024 तक, डीआरडीओ ने M1 मिसाइल (150 किमी रेंज) के लिए पांच यूनिट्स का निर्माण शुरू कर दिया था। इसके लिए 20 सेट एयरफ्रेम, 20 सेट रॉकेट मोटर, और 50 किल व्हीकल (वॉरहेड) का ऑर्डर दिया गया। इस सिस्टम में तीन तरह की इंटरसेप्टर मिसाइलें होंगी, जिनकी रेंज 150, 250, और 350-400 किलोमीटर होगी। मिसाइल की रफ्तार मैक 5.5 होगी, और यह IR+RF सीकर से लैस होगी। इसमें लंबी दूरी का सर्विलांस और फायर कंट्रोल रडार शामिल होगा, जिसमें LRBMR (लॉन्ग रेंज बैटल मैनेजमेंट रडार) S-बैंड रडार 500 किमी से अधिक की दूरी तक खतरों का पता लगा सकता है। खास बात यह होगी कि यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के साथ पूरी तरह इंटीग्रेट होगा, जो विभिन्न रडारों और वेपन सिस्टम को जोड़ता है।

वहीं, अगर भारत में ही सिस्टम तैयार होता है, तो भारत को एस-400 की मिसाइलों की तरह इसके लिए मिसाइलें खरीदने के लिए विदेश की तरफ नहीं ताकना होगा। भारतीय नौसेना इसे अपने अगली पीढ़ी के युद्धपोतों पर तैनात करने की योजना बना रही है। 2022 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी, और 2023 में रक्षा मंत्रालय ने 21,700 करोड़ रुपये की लागत से पांच स्क्वाड्रन की खरीद को हरी झंडी दिखाई। इसे 2028-29 तक वायुसेना और नौसेना में तैनात किया जाएगा। भारतीय वायुसेना कुल 10 स्क्वाड्रन शामिल करने की योजना बना रही है, जिससे भारत का एय़र डिफेंस मजबूत होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोजेक्ट कुशा की सफलता के बाद भारत इसे ASEAN देशों को निर्यात कर सकता है, जिससे चीन के क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिलेगी।

मोदी सरकार ने मजबूत किया एयर डिफेंस सिस्टम

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता रातोंरात नहीं मिली। यह पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की रक्षा नीति और रणनीतिक तैयारी का नतीजा है। 2014 के बाद से, भारत ने अपनी हवाई रक्षा को मजबूत करने के लिए कई बड़े और ठोस कदम उठाए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है रूस के साथ 2018 में हुआ 35,000 करोड़ रुपये का सौदा, जिसमें भारत ने पांच S-400 ट्रायम्फ स्क्वाड्रन खरीदे। इनमें से तीन स्क्वाड्रन अब चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात हैं। यह प्रणाली 400 किलोमीटर की दूरी तक हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम है और ऑपरेशन सिंदूर में इसने पाकिस्तानी मिसाइलों और ड्रोन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अलावा, भारत ने 2017 में इजरायल के साथ 2.5 बिलियन डॉलर का सौदा किया, जिसके तहत बराक-8 मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम खरीदा था। यह सिस्टम अब बठिंडा जैसे अग्रिम सैन्य अड्डों की सुरक्षा में तैनात है। डीआरडीओ के स्वदेशी आकाश मिसाइल सिस्टम ने भी छोटी और मध्यम दूरी के खतरों को नष्ट करने में अपनी क्षमता साबित की। साथ ही, डीआरडीओ की एंटी-ड्रोन तकनीक और मैन पोर्टेबल काउंटर ड्रोन सिस्टम (MPCDS) ने पाकिस्तानी ड्रोन को जाम कर उन्हें मार गिराया।

एलओसी पार किए बिना सर्जिकल स्ट्राइक

2021 में भारत ने स्वदेशी लॉइटरिंग म्यूनिशन्स का ऑर्डर दिया था, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार युद्ध में हिस्सा लिया। ये आत्मघाती ड्रोन एक साथ कई लक्ष्यों पर सटीक हमले करने में सक्षम हैं। इसके अलावा, इजरायल के हारोप ड्रोन, जो अब भारत में ही बनाए जा रहे हैं, ने पाकिस्तानी हवाई रक्षा इकाइयों को नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई। राफेल विमानों ने SCALP और HAMMER मिसाइलों के साथ जमकर कहर बरपाया, जिससे साबित हुआ कि भारत एलओसी पार किए बिना ही पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक करने की ताकत रखता है। इन सभी सिस्टम को इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के साथ जोड़ा गया है। यह सिस्टम विभिन्न रडारों और वेपन सिस्टम को एकजुट करता है, जिससे भारत को एक ऐसी हवाई रक्षा छतरी मिली है, जो खतरों का पता लगाने के साथ-साथ उन्हें तुरंत नष्ट कर सकती है। यह सिस्टम ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का आधार बना।

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ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पूरी दुनिया ने भारत की डिफेंस कैपेबिलिटी को देखा है। जिसने यह दिखा दिया कि खुद को बेहद एडवांस कहने वाली पाकिस्तानी सेना भी घुटने टेकने को मजबूर हो गई। साथ ही ये भी बता दिया कि बिना सीमा लांघे भारत न केवल दुश्मन के इलाके में भी निर्णायक कार्रवाई कर सकता है, बल्कि अपने आसमान और अपनी सीमाओं की भी सुरक्षा कर सकता है।

India-China: इधर देश ऑपरेशन सिंदूर में उलझा रहा, उधर चीन ने अरुणाचल प्रदेश में रची ये बड़ी साजिश, भारत ने दिखाया आइना

India-China: China renames Arunachal Pradesh locations, India rejects
Credit: AI Image

India-China: जब पूरा देश भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और ऑपरेशन सिंदूर की सफलताओं में व्यस्त था, उसी दौरान चीन ने चुपचाप भारत के राज्य अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नाम बदलने की घोषणा कर दी। यह कोई पहली बार नहीं है, बल्कि चीन की ओर से अरुणाचल को लेकर इस तरह की यह पांचवीं सूची है, जिसमें उसने भारतीय क्षेत्र को अपने नक्शे और नामों में शामिल करने की कोशिश की है।

वहीं भारत ने इसे चीन का एक और बेतुका और आधारहीन प्रयास करार देते हुए कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। साथ ही, भारत सरकार ने चीन के प्रोपेगंडा पर कड़ी कार्रवाई करते हुए चीन के माउथपीस ग्लोबल टाइम्स औऱ शिनहुआ न्यूज एजेंसी के एक्स अकाउंट को भारत में ब्लॉक कर दिया है।

India-China: जांगनान का हिस्सा मानता है चीन

चीन ने अपने नागरिक मामलों के मंत्रालय के जरिए 11 मई को अरुणाचल प्रदेश के 27 जगहों के लिए नए नामों का एलान किया। चीन के सिविल अफेयर्स मंत्रालय ने इसे “दक्षिण तिब्बत क्षेत्र के सार्वजनिक नामकरण (पांचवी सूची)” के रूप में जारी किया है। चीन इसे तिब्बत के दक्षिणी हिस्से (जिसे वह “जांगनान” कहता है) का हिस्सा मानता है और इन नामों को “मानकीकृत भौगोलिक नाम” के रूप में पेश करता है।

भारत ने दिया जवाब

भारत ने इसे चीन का एक और बेतुका और आधारहीन प्रयास करार देते हुए कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। विदेश मंत्रालय का कहना है, “चीन की यह हरकत न केवल आधारहीन है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों और भारत की संप्रभुता का उल्लंघन भी है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इस तरह की कोशिशें न तो ऐतिहासिक तथ्यों को बदल सकती हैं और न ही अरुणाचल प्रदेश के लोगों की भावनाओं को।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “चीन बार-बार अरुणाचल प्रदेश में जगहों के नाम बदलने की नाकाम कोशिश कर रहा है। हम इस तरह के प्रयासों को पूरी तरह खारिज करते हैं।” चीन की इस हरकत को लेकर भारत ने साफ कर दिया है कि इस तरह की “नामकरण” की कोशिशें अरुणाचल प्रदेश की वास्तविकता को कभी नहीं बदल सकतीं। जयसवाल ने कहा, “यह सच्चाई अटल है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है और रहेगा।”

विदेश मंत्री का सख्त रुख

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब चीन ने इस तरह की हरकत की हो। यह अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने की उसकी यह पांचवीं सूची है। इससे पहले भी चीन ने कई बार इस तरह की कोशिशें की हैं, जिन्हें भारत ने हर बार करारा जवाब दिया है।

इससे पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी इस मुद्दे पर चीन को कड़ा संदेश दिया था। उन्होंने कहा था, “अगर मैं आपके घर का नाम बदल दूं, तो क्या वह मेरा हो जाएगा? अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। नाम बदलने से हकीकत नहीं बदलती।” जयशंकर ने यह भी कहा था कि चीन की यह हरकत “बेतुकी” है और बार-बार ऐसा करने से भी यह बेतुकी ही रहेगी।

उन्होंने यह भी जोड़ा, “मैं इसे इतनी स्पष्टता से कह रहा हूं कि न केवल देश में, बल्कि देश के बाहर भी लोग इस संदेश को अच्छी तरह समझ लें।” जयशंकर का यह बयान न केवल चीन के लिए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक साफ संदेश था कि भारत अपनी संप्रभुता पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा।

क्या है इस विवाद की जड़?

चीन और भारत के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। चीन अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों को तिब्बत का हिस्सा मानता है और इसे “जांगनान” कहता है। वह समय-समय पर इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, बस्तियां बसाने और नाम बदलने जैसी गतिविधियां करता रहता है, जिन्हें भारत अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।

अरुणाचल प्रदेश भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और सामरिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह क्षेत्र भारत-चीन सीमा पर स्थित है और दोनों देशों के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही इस क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है।

दबे शब्दों में चीन की बौखलाहट

खास बात यह है कि चीन ने इस सूची को भारत-पाकिस्तान तनाव के समय जारी किया, जब भारत का फोकस सीमा पर सैन्य ऑपरेशन और राजनयिक गतिविधियों पर था। यह चीन की रणनीति हो सकती है कि जब भारत किसी और मोर्चे पर व्यस्त हो, तब वह अपने पुराने एजेंडे को आगे बढ़ाए।

लेकिन भारत ने समय रहते प्रतिक्रिया दी और चीन की इस कूटनीतिक चाल को नकार दिया। भारत ने चीन की इस हरकत पर कड़ा लेकिन संतुलित प्रतिक्रिया दी। सरकार की नीति यह रही है कि उकसावे में आए बिना, तथ्यों और कूटनीतिक आधार पर जवाब दिया जाए। भारत ने न केवल इस कदम की आलोचना की, बल्कि चीन को यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि नाम बदलना, इतिहास और भूगोल को नहीं बदल सकता।

वहीं, अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानूनों और सीमाओं के अनुसार मजबूत है। यहां लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार है, संविधान के तहत शासन है, और यहां के लोग खुद को भारतीय नागरिक मानते हैं।

संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों ने भी यह साफ कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। चीन की इस प्रकार की गतिविधियां वैश्विक समुदाय में उसकी स्थिति को और कमजोर करती हैं।

Operation Sindoor: भारत की जवाबी कार्रवाई, ढेर हुआ चीन से खरीदा पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन से लाहौर तक की मार!

भारत सरकार ने इस क्षेत्र में विकास कार्यों को तेज किया है, जिसमें सड़कें, पुल, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है। अरुणाचल प्रदेश के लोग भी चीन की इन हरकतों का पुरजोर विरोध करते हैं। भारत ने वहां अपनी सीमाओं की सुरक्षा को और मजबूत किया है। अरुणाचल प्रदेश में सैन्य अड्डों का निर्माण, सड़कों का जाल और संचार सुविधाओं का विस्तार इसका प्रमाण है। भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

Nur Khan Airbase: जब ‘दिल’ पर लगी चोट, तो क्यों घबराया पाकिस्तान? इसलिए घुटने पर आने को हुआ मजबूर, चीन भी हुआ बेनकाब

Nur Khan Airbase Strike: Why Pakistan Buckled and China Got Exposed

Nur Khan Airbase: 10 मई 2025 की रात पाकिस्तान के लिए एक बुरे सपने की तरह थी, जब भारत ने रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस या चकलाला एयरबेस को तबाह कर दिया। यह हमला न केवल पाकिस्तान के ‘दिल’ के पर चोट थी, बल्कि उसके सबसे बड़े साझेदार चीन को भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। इस दिल पर लगी चोट की वजह से ही पाकिस्तान घुटने पर आया और संघर्ष विराम के लिए मजबूर हुआ। यह हमला सिर्फ नूर खान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत ने 90 मिनट के भीतर पाकिस्तान के कई अन्य एयरबेस को भी निशाना बनाया।

सैन्य सूत्रों का कहना है कि यह एयरबेस पाकिस्तान की परमाणु रणनीति का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। भारत ने इस हमले के जरिए न केवल पाकिस्तान की सैन्य ताकत को झकझोर दिया, बल्कि उसकी परमाणु हथियारों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अब पाकिस्तान की हरकतों का जवाब सख्ती से देगा। इस हमले ने पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया है और उसे अपनी रक्षा नीतियों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।

वहीं भारत ने इस हमले से दो बातें स्पष्ट कर दीं, पहली यह कि भारत आतंक के हर अड्डे को उसके गढ़ में घुसकर नष्ट करेगा, और दूसरी, अब पाकिस्तान की ‘परमाणु धमकी’ की ब्लफिंग काम नहीं करेगी।

Nur Khan Airbase पर हमला: क्या हुआ?

10 मई की रात भारत ने एक सटीक सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया। इस हमले में रावलपिंडी के नूर खान एयरबेस को निशाना बनाया गया। यह बेस इस्लामाबाद के बेहद करीब है और कहा जाता है कि यहां पाकिस्तान ने अपने परमाणु जखीरे को रखा हुआ है। यह हमला इतना सटीक था कि नूर खान एयरबेस के कई अहम ढांचे मिनटों में तबाह हो गए। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, भारत ने इस हमले में ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया, जो अपनी सटीकता के लिए जाना जाती है औऱ किसी रडार सिस्टम की पकड़ में नहीं आती है।

लेकिन भारत का हमला सिर्फ नूर खान तक सीमित नहीं था। भारत ने एक के बाद एक कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इनमें रफीकी एयरबेस (शोरकोट), मुरिद एयरबेस (पंजाब), सुक्कुर एयरबेस (सिंध), सियालकोट एयरबेस, सरगोधा एयरबेस, स्कर्दू एयरबेस, भोलारी एयरबेस (कराची के पास), जैकोबाबाद एयरबेस और पासरूर हवाई पट्टी शामिल थे। ये सभी हमले 90 मिनट के भीतर किए गए, जिसने पाकिस्तान की वायु सेना को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया।

ऑपरेशन सिंदूर के तहत की गई कार्रवाई में भारत ने न केवल पाकिस्तान के हमलों का जवाब दिया, बल्कि पाकिस्तान की ओर से दागी गई 8 मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया। इसके बाद भारत ने लाहौर और इस्लामाबाद में भी जवाबी कार्रवाई की।

नूर खान एयरबेस क्यों है इतना अहम?

नूर खान एयरबेस पाकिस्तान की सैन्य और परमाणु रणनीति का एक बड़ा केंद्र है। यह बेस रावलपिंडी में है, जो इस्लामाबाद से ज्यादा दूर नहीं है। इसकी खासियत यह है कि यह पाकिस्तान की सेना के मुख्यालय के करीब है। इस वजह से यह बेस सेना और वायु सेना के बीच तालमेल बनाने में अहम भूमिका निभाता है।

खुफिया सूत्रों के मुताबिक, नूर खान एयरबेस पर कई अहम सैन्य उपकरण रखे गए थे। यहां पर साब एरियाई जैसे हवाई चेतावनी सिस्टम, C-130 ट्रांसपोर्टर विमान और IL-78 रिफ्यूलिंग विमान मौजूद थे। ये सिस्टम पाकिस्तान की वायु सेना के लिए बहुत जरूरी हैं, क्योंकि ये निगरानी, सामान ढोने और विमानों को हवा में ईंधन भरने का काम करते हैं। यह बेस न सिर्फ वीआईपी ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स का मुख्य अड्डा है, बल्कि यहां से एयर मोबिलिटी कमांड और ड्रोन ऑपरेशंस का संचालन भी होता है। यही वह स्थान है जहां से शाहपर-I और तुर्की निर्मित बैरक्तार TB2 ड्रोन उड़ाए जाते थे, जो हाल ही में भारत के खिलाफ हमलों में इस्तेमाल हुए।

Nur Khan Airbase Strike: Why Pakistan Buckled and China Got Exposed

नूर खान बेस का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से जुड़ा हुआ है। यहां पर परमाणु हथियार रखे जाते हैं। इस बेस पर परमाणु हथियारों से लैस विमानों को तैनात किया जाता है, जो भारत के खिलाफ पाकिस्तान की परमाणु रणनीति का हिस्सा हैं। इसके अलावा, यह बेस इस्लामाबाद और रावलपिंडी के करीब होने की वजह से पाकिस्तान की त्वरित प्रतिक्रिया रणनीति में अहम भूमिका निभाता है।

सूत्रों ने बताया कि नूर खान बेस का इस्तेमाल बड़े नेताओं और वीआईपी लोगों को ले जाने वाले विमानों के लिए भी होता था। यहाँ पर खास पायलटों को ट्रेनिंग दी जाती थी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जैसे लोग इस बेस से अपने विमानों का इस्तेमाल करते थे। इतना ही नहीं, यह बेस सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी शामिल था।

पाकिस्तान आया घुटनों पर

इस हमले ने पाकिस्तान को कई तरह से नुकसान पहुंचाया। सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि नूर खान एयरबेस के नष्ट होने से पाकिस्तान की वायु सेना और सेना के बीच का संपर्क टूट गया। यह बेस पाकिस्तान की वायु सेना की रीढ़ की हड्डी माना जाता था। इसके तबाह होने से पाकिस्तान के एयर डिफेंस और जवाबी हमले करने की क्षमता पर बड़ा असर पड़ा। नूर खान एयर बेस पर परमाणु हथियारों से लैस मिराज-5 विमानों को तैनात करने की क्षमता है, जो भारत के खिलाफ पाकिस्तान की परमाणु प्रतिरोधक रणनीति का हिस्सा हैं।

दूसरा, इस हमले ने पाकिस्तान के डिफेंस सिस्टम को तार-तार कर दिया। नूर खान एयरबेस की सुरक्षा में चीनी रडार तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन भारतीय हमले ने स्पष्ट कर दिया कि HQ-9 जैसे चीनी सिस्टम भारतीय मिसाइलों के सामने बेकार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि “यह हमला चीन के लिए भी शर्मनाक है क्योंकि उसकी टेक्नोलॉजी पाकिस्तान के लिए ढाल नहीं बन सकी।”

तीसरा, इस हमले ने पाकिस्तान की सैन्य छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान हमेशा से खुद को भारत के बराबर की सैन्य ताकत बताता रहा है, लेकिन इस हमले ने उसकी इस छवि को तोड़ दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और तस्वीरों में नूर खान एयरबेस के जलते ढांचे साफ दिख रहे थे। पाकिस्तान की सेना ने दावा किया कि उसने भारत के हमले को रोक लिया, लेकिन इन तस्वीरों ने उसके दावों की पोल खोल दी।

पाकिस्तान में आम लोगों ने भी अपनी सेना का मजाक उड़ाया। सोशल मीडिया पर लोग मीम्स और वीडियो शेयर कर रहे थे, जिनमें वे सेना के झूठे दावों की हंसी उड़ा रहे थे। इससे पाकिस्तान की सेना को अपने ही देश में शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

पाकिस्तान के अन्य सैन्य ठिकानों का हाल

पाकिस्तान के पास कई ऐसे सैन्य ठिकाने हैं, जो परमाणु हथियारों से जुड़े हैं। नूर खान एयरबेस के अलावा भारत ने कई अन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया। वाह कैंट में पाकिस्तानी ऑर्डिनेंस फैक्ट्री को भी निशान बनाया गया, जो परमाणु हथियार बनाने का एक बड़ा केंद्र है। यहां पर परमाणु हथियारों के लिए जरूरी सामान तैयार किया जाता है। वहीं, हरिपुर में तरनावा मिसाइल कॉम्प्लेक्स को निशाना बनाया, यह जगह मिसाइलों और परमाणु हथियारों को बनाने और उनकी टेस्टिंग के लिए जानी जाती है।

Op Sindoor: कौन हैं कश्मीरी मुस्लिम एयर वाइस मार्शल हिलाल अहमद? जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान पर बरसाए बम!
जबकि इस्लामाबाद के निलोर रीप्रोसेसिंग प्लांट में परमाणु हथियारों के लिए प्लूटोनियम बनाया जाता है, इसे भी निशाना बनाया गया। इसके अलावा फतेह जंग के नेशनल डेवलपमेंट कॉम्प्लेक्स, जहां परमाणु हथियारों और मिसाइलों को बनाया जाता है, वहां भी भारतीय मिसाइलों ने चोट पहुंचाई। इसके अलावा काहुता एनरिचमेंट प्लांट (काहुता), जहां परमाणु हथियारों के लिए यूरेनियम को तैयार किया जाता है, वहां भी भारतीय मिसाइलों के हमले हुए। इन सभी ठिकानों का नूर खान एयरबेस के साथ सीधा कनेक्शन है।

Op Sindoor: कौन हैं कश्मीरी मुस्लिम एयर वाइस मार्शल हिलाल अहमद? जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान पर बरसाए बम!

Op Sindoor: Kashmiri Muslim AVM Hilal Ahmed Bombed Pakistan in Operation Sindoor!

Op Sindoor: भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी एयर वाइस मार्शल हिलाल अहमद इन दिनों चर्चा में हैं। वजह है ऑपरेशन सिंदूर। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने 7 मई को पाकिस्तान और पीओके में स्थित 9 आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। कश्मीर के अनंतनाग से आने वाले हिलाल एक कश्मीरी मुस्लिम हैं और पहले भारतीय हैं, जिन्होंने अत्याधुनिक राफेल लड़ाकू विमान को उड़ाया। ऑपरेशन सिंदूर में उनकी रणनीति के तहत ही पाकिस्तान को जबरदस्त चोट पहुंचाई गई।

Op Sindoor: कौन हैं एयर वाइस मार्शल हिलाल अहमद?

हिलाल अहमद जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले से ताल्लुक रखते हैं और भारतीय वायुसेना में एक कश्मीरी मुस्लिम अधिकारी के रूप में उन्होंने कई ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्हें भारत का पहला ऐसा पायलट माना जाता है, जिसने राफेल फाइटर जेट उड़ाया। उनके नाम पर 3,000 से अधिक एक्सीडेंट-फ्री फ्लाइंग ऑवर्स हैं, और वे मिराज-2000 और मिग-21 जैसे कई फ्रंटलाइन कॉम्बैट एयरक्राफ्ट उड़ा चुके हैं।

Op Sindoor: Kashmiri Muslim AVM Hilal Ahmed Bombed Pakistan in Operation Sindoor!

हिलाल अहमद का जन्म जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता, मोहम्मद अब्दुल्ला राथर, जम्मू-कश्मीर में एक छोटे-मोटे कारोबारी थे, और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। अनंतनाग उस समय आतंकवाद और अशांति का केंद्र था, और वहां बड़े सपने देखना आसान नहीं था। लेकिन हिलाल ने बचपन से ही आसमान छूने का सपना देखा। वे अपने स्कूल के दिनों में पढ़ाई में बहुत अच्छे थे और खेलों में भी हिस्सा लेते थे। हिलाल की मेहनत और लगन ने उन्हें राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) तक पहुंचाया, जहाँ से उन्होंने अपनी सैन्य सफर शुरू किया।

1988 में भारतीय वायुसेना में बने फाइटर पायलट

हिलाल ने 1988 में भारतीय वायुसेना में एक फाइटर पायलट के तौर पर अपनी शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने कई बड़े संस्थानों से ट्रेनिंग ली। वे अमेरिका के एयर वार कॉलेज गए, जहां उन्होंने डिस्टिंक्शन के साथ डिग्री हासिल की। उनकी इस उपलब्धि ने उन्हें वायुसेना में एक अलग पहचान दी। समय के साथ वे फ्लाइट लेफ्टिनेंट, विंग कमांडर, ग्रुप कैप्टन, और फिर 2019 में एयर कोमोडोर बने। उनकी मेहनत और अनुशासन ने उन्हें 2025 तक एयर वाइस मार्शल की रैंक तक पहुंचाया।

उनकी पहली बड़ी उड़ान मिग-21 विमान के साथ थी, जो उन्होंने 1990 के दशक में श्रीनगर एयरबेस से भरी थी। उस समय कश्मीर में हालात बहुत खराब थे, और हिलाल ने वहां से कई मिशन पूरे किए।

राफेल डील में अहम भूमिका

हिलाल अहमद उस वक्त भारत के लिए एयर अताशे के तौर पर फ्रांस में तैनात थे, जब राफेल डील को अंतिम रूप दिया जा रहा था। वे न सिर्फ राफेल विमानों की डिलीवरी के गवाह बने, बल्कि उन्होंने भारतीय ऑपरेशनल जरूरतों के मुताबिक हथियार (weaponization), कस्टमाइजेशन और ट्रेनिंग मॉड्यूल्स को भी सुपरवाइजज किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इन विमानों में भारत की जरूरतों के हिसाब से बदलाव हों, जैसे कि ठंडे इलाकों में काम करने की क्षमता, लंबी दूरी की मेटियोर मिसाइलें, और दुश्मन के रडार को चकमा देने की तकनीक भी हो। यही नहीं, 27 जुलाई 2020 को वे राफेल फाइटर जेट को फ्रांस से भारत तक खुद उड़ाकर लाए और भारतीय रक्षा इतिहास में बड़ा इतिहास रचा।

इसके अलावा, हिलाल ने ग्वालियर में मिराज स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर भी काम किया, जहां उन्होंने मिराज 2000 विमानों को उड़ाया और स्क्वाड्रन को मजबूती दी। उनके इस अनुभव ने उन्हें राफेल जैसे विमानों को समझने और उनकी तकनीक को भारतीय जरूरतों के हिसाब से ढालने में मदद की।

सूत्रों ने बताया कि उनकी अगुवाई में वायुसेना ने नई तकनीकों जैसे ड्रोन, साइबर सुरक्षा, और इलेक्ट्रॉनिक युद्धको अपनाया। हिलाल ने यह सुनिश्चित किया कि वायुसेना आज के समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो।

ऑपरेशन सिंदूर में हिलाल की भूमिका

7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। यह कार्रवाई अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब थी, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। इस ऑपरेशन में राफेल विमानों का भी इस्तेमाल हुआ, जिन्होंने बहावलपुर में आतंकी ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर दिया। हालांकि के ऑपरेशन सिंदूर के ऑन-ग्राउंड एक्जीक्यूशन में हिलाल अहमद का नाम सीधे तौर पर जुड़ा नहीं है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, उनकी रणनीति और अनुभव ने इस अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

राफेल जैसे स्टेल्थ फाइटर जेट्स, स्कैल्प मिसाइल, हैमर बम और उनके ऑपरेशनल प्लांस में हिलाल अहमद की गहरी तकनीकी समझ और अनुभव ने वायुसेना को एक नई दिशा दी है। ऑपरेशन सिंदूर में जब पाकिस्तान के भीतर 100 किलोमीटर तक सटीक हमले किए गए, तो यह एयरफोर्स की तकनीकी परिपक्वता और रणनीतिक परिपक्वता का परिचायक था, जिसे बनाने में हिलाल अहमद जैसे अधिकारियों का योगदान अहम है।

Operation Sindoor: भारत की जवाबी कार्रवाई, ढेर हुआ चीन से खरीदा पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन से लाहौर तक की मार!

सूत्रों का कहना है कि हिलाल जैसे अनुभवी अधिकारियों की जानकारी और रणनीति इस तरह के बड़े अभियानों के लिए बहुत जरूरी होती है। राफेल विमानों को भारत लाने और उनकी तैयारी में हिलाल की मेहनत का असर इस ऑपरेशन में साफ दिखा। राफेल जैसे फाइटर जेट्स, स्कैल्प मिसाइल, हैमर बम और उनके ऑपरेशनल प्लांस में हिलाल अहमद की गहरी तकनीकी समझ और अनुभव ने वायुसेना को एक नई दिशा दी। राफेल विमानों ने जिस तरह से पाकिस्तान के भीतर 100 किलोमीटर तक आतंकी ठिकानों को नष्ट किया तो इसके पीछे हिलाल अहमद की पहले की मेहनत को श्रेय दिया जा रहा है।

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Operation Sindoor: India Retaliation, Pakistan Air Defense System Destroyed

Operation Sindoor: पाकिस्तान में आतंक के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है। सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के तहत लाहौर में हुए एक कामिकाजे ड्रोन हमले में पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा है। पाकिस्तानी सेना की HQ-9 के एयर डिफेंस मिसाइल लॉन्चर यूनिट्स को गंभीर क्षति पहुंची है। वहीं, इस हमले में लाहौर के वाल्टन इलाके में 4 एयर डिफेंस रेजिमेंट (4 AD Regt) की अल्फा बैटरी के डिप्टी बैटरी कमांडर सहित पांच सैनिक मारे गए हैं। इसके अलावा, 4 AD रेजिमेंट की HQ-16 बैटरी पर एक ड्रोन हमले (UAV) ने बड़ा नुकसान पहुंचाया। सूत्रों के के अनुसार, भारतीय सेना ने दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाने के लिए हरपी ड्रोनों का इस्तेमाल किया।

भारत ने 7 मई 2025 की रात शुरू हुए ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओके) में नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इस ऑपरेशन की प्रेस ब्रीफिंग में भारत ने अपनी कार्रवाई को केंद्रित, संयमित और गैर-उत्तेजक बताया था। भारत ने साफ किया था कि पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को निशाना नहीं बनाया गया है। साथ ही यह भी दोहराया गया कि भारत में सैन्य ठिकानों पर किसी भी हमले का उचित जवाब दिया जाएगा। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया, जिसके जवाब में भारत को सख्त कार्रवाई करनी पड़ी।

Operation Sindoor: पाकिस्तान ने किया ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल

7-8 मई 2025 की रात को पाकिस्तान ने उत्तरी और पश्चिमी भारत में कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की। इन ठिकानों में अवंतीपुरा, श्रीनगर, जम्मू, पठानकोट, अमृतसर, कपूरथला, जालंधर, लुधियाना, आदमपुर, भटिंडा, चंडीगढ़, नाल, फलोदी, उत्तरलाई, और भुज शामिल थे। पाकिस्तान ने ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया। वहीं पुंछ में इन हमलों में जानमाल का गंभीर नुकसान हुआ है। वहां 13 लोग मारे गए और 44 जख्मी हो गए।

लेकिन भारत की इंटीग्रेटेड काउंटर UAS ग्रिड और एयर डिफेंस सिस्टम्स ने इन हमलों को नाकाम कर दिया। इन हमलों का मलबा कई जगहों से बरामद किया गया है।

भारत ने लाहौर में की जवाबी कार्रवाई

पाकिस्तान के हमले के जवाब में भारतीय सशस्त्र बलों ने 8 मई 2025 की सुबह पाकिस्तान में कई जगहों पर एयर डिफेंस रडार और सिस्टम को निशाना बनाया। भारत ने अपनी कार्रवाई को उसी तरह और उसी तीव्रता के साथ अंजाम दिया, जैसा पाकिस्तान ने किया था। सूत्रों से पक्की जानकारी मिली है कि लाहौर में एक एयर डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। यह सिस्टम लाहौर जैसे बड़े शहर की हवाई रक्षा के लिए तैनात था।

पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम: HQ-9 और HQ-16

पाकिस्तान ने अपनी हवाई रक्षा को मजबूत करने के लिए चीन से HQ-9 और HQ-16 जैसी एडवांस मिसाइल सिस्टम खरीदे हैं। HQ-9 एक लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम है, जो 200 किलोमीटर तक विमानों, ड्रोनों, और मिसाइलों को नष्ट कर सकता है। इसे “चाइनीज पैट्रियट” भी कहा जाता है, क्योंकि यह अमेरिका की पैट्रियट मिसाइल प्रणाली की तरह काम करती है। HQ-9 का रडार 300 किलोमीटर तक लक्ष्य का पता लगा सकता है और एक साथ कई लक्ष्यों को निशाना बना सकता है।

वहीं, HQ-16 एक मध्यम दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम है, जो 40 किलोमीटर तक विमानों और मिसाइलों को रोक सकता है। यह सिस्टम क्रूज मिसाइलों और ड्रोनों जैसे छोटे लक्ष्यों को नष्ट करने में माहिर है। पाकिस्तान ने इन प्रणालियों को अपनी सीमाओं, खासकर भारत से लगते इलाकों में तैनात किया था, ताकि भारतीय विमानों और मिसाइलों से अपनी रक्षा कर सके।

लाहौर में हमला: अल्फा बैटरी पर निशाना

सूत्रों के अनुसार, लाहौर के वाल्टन इलाके में 4 एयर डिफेंस रेजिमेंट (4 AD Regt) की अल्फा बैटरी पर बड़ा हमला हुआ। इस हमले में अल्फा बैटरी के डिप्टी बैटरी कमांडर सहित पांच सैनिक मारे गए। अल्फा बैटरी HQ-9 मिसाइल लॉन्चरों से लैस थी, जो लाहौर जैसे बड़े शहर की हवाई रक्षा के लिए तैनात थी। इस हमले में HQ-9 सिस्टम के रडार और लॉन्चर को भी भारी नुकसान पहुंचा है। सूत्रों का कहना है कि कई लॉन्चर पूरी तरह नष्ट हो गए। इससे लाहौर और आसपास के इलाकों का एयर डिफेंस कमजोर हो गया है।

HQ-16 बैटरी पर ड्रोन हमला

4 AD रेजिमेंट की एक दूसरी बैटरी, जो HQ-16 मिसाइलों से लैस थी, उस पर भी कामीकाजा ड्रोन (UAV) ने हमला किया। यह बैटरी भी लाहौर के पास तैनात थी। यह कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोनों और क्रूज मिसाइलों के खिलाफ कारगार है। लेकिन भारतीय ड्रोन हमले में यह बैटरी भी ढेर हो गई। सूत्रों के अनुसार, ड्रोन ने बैटरी के रडार और कमांड सेंटर को निशाना बनाया।

हरपी ड्रोन क्या हैं?

हरपी ड्रोन एक खास तरह का मानवरहित हवाई वाहन (UAV) है, जिसे इज़राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) ने बनाया है। इसे “लॉइटरिंग मुनिशन” कहा जाता है, यानी यह ऐसा ड्रोन है जो दुश्मन के इलाके में मंडराता रहता है और सही समय पर हमला करता है। हरपी ड्रोन को खास तौर पर दुश्मन की हवाई रक्षा प्रणालियों, जैसे रडार सिस्टम, को नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह ड्रोन 32 किलोग्राम का विस्फोटक ले जा सकता है और इसमें एक खास “एंटी-रेडिएशन सीकर” होता है, जो रडार से निकलने वाली रेडियो तरंगों को ट्रैक करके हमला करता है।

हरपी ड्रोन की खासियत यह है कि यह पूरी तरह स्वचालित मोड में काम कर सकता है या फिर “मैन-इन-द-लूप” मोड में, जिसमें एक ऑपरेटर इसे कंट्रोल करता है। यह 6 घंटे तक हवा में रह सकता है और 500 किलोमीटर की दूरी तक हमला कर सकता है। इसका छोटा आकार और कम रडार सिग्नेचर इसे दुश्मन के रडार से बचने में मदद करते हैं। भारत ने 2000 के दशक की शुरुआत से हरपी ड्रोनों का इस्तेमाल शुरू किया था, और 2009 में भारतीय वायुसेना ने 100 मिलियन डॉलर में 10 हरपी ड्रोन खरीदे थे।

हरपी ड्रोन का इस्तेमाल भारत की रणनीति का एक अहम हिस्सा है। ये ड्रोन दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को कमजोर करने में माहिर हैं। इन्हें “सप्रेशन ऑफ एनिमी एयर डिफेंस” (SEAD) के लिए डिज़ाइन किया गया है, यानी दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करना ताकि भारतीय वायुसेना के विमान सुरक्षित रूप से ऑपरेशन कर सकें। हरपी ड्रोन ऑटोमैटिकली रडार सिग्नल्स को पकड़कर हमला करते हैं, जिससे वे बड़े रडार सिस्टम को आसानी से नष्ट कर सकते हैं।

Operation Sindoor को लेकर क्यों कोर्ट पहुंचे रिलायंस, वायुसेना के पूर्व अफसर और दिल्ली के नामी वकील, मिलिट्री ऑपरेशन पर कब्जा करने की कोशिश!

पाकिस्तान ने इस घटना पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, वह इस नुकसान को छिपाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सिंदूर को “युद्ध की घोषणा” करार दिया था और जवाबी कार्रवाई की धमकी दी थी।

Operation Sindoor को लेकर क्यों कोर्ट पहुंचे रिलायंस, वायुसेना के पूर्व अफसर और दिल्ली के नामी वकील, मिलिट्री ऑपरेशन पर कब्जा करने की कोशिश!

Operation Sindoor Trademark Race: Reliance, Lawyer, Ex-IAF Officer Compete

Operation Sindoor: भारत की सैन्य कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर के एलान के कुछ ही घंटों बाद, इस नाम के ट्रेडमार्क के लिए होड़ शुरू हो गई। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने सबसे पहले 7 मई 2025 को सुबह 10:42 बजे ट्रेडमार्क के लिए आवेदन किया। अगले 24 घंटों में तीन और आवेदकों मुंबई के मुकेश चेतराम अग्रवाल, रिटायर्ड वायुसेना अधिकारी ग्रुप कैप्टन कमल सिंह ओबेरो, और दिल्ली के वकील आलोक कोठारी ने भी इस नाम के लिए दावा ठोका। ये सभी आवेदन क्लास 41 के तहत किए गए, जो मनोरंजन, शिक्षा, सांस्कृतिक और मीडिया सेवाओं को कवर करता है। लेकिन सवाल यह है कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे राष्ट्रीय महत्व के नाम पर ट्रेडमार्क की दौड़ क्यों और कैसे शुरू हुई? आइए, इसकी पूरी कहानी समझते हैं।

वहीं इस खबर के बाद रिलायंस की तरफ से स्पष्टीकरण जारी किया गया है।

Operation Sindoor: एक नाम, कई अर्थ

ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) भारत की हालिया सीमा पार सैन्य कार्रवाई का नाम है, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा। 7 मई 2025 को तड़के भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओके) में नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। यह कार्रवाई 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में थी, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। “सिंदूर” शब्द भारतीय संस्कृति में बलिदान, वीरता और प्रतिबद्धदेवता का प्रतीक माना जाता है, जिसने इस ऑपरेशन को भावनात्मक और देशभक्ति से जोड़ा। इस नाम की लोकप्रियता के चलते इसे फिल्मों, वेब सीरीज, डॉक्यूमेंट्री, या अन्य व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर लोगों में होड़ मच गई।

ट्रेडमार्क की दौड़: कौन-कौन शामिल?

भारत की (Operation Sindoor) सबसे बड़ी कंपनियों में से एक रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने सबसे पहले सुबह 10:42 बजे आवेदन किया। इसके बाद मुकेश चेतराम अग्रवाल (मुंबई), ग्रुप कैप्टन कमल सिंह ओबेरो (रिटायर्ड वायुसेना अधिकारी), और आलोक कोठारी (दिल्ली के वकील) ने 7 मई को शाम 6:27 बजे तक अपने आवेदन दाखिल किए। सभी ने ऑपरेशन सिंदूर को “प्रस्तावित उपयोग” के तौर पर चिह्नित किया, यानी अभी इसका व्यावसायिक उपयोग शुरू नहीं हुआ, लेकिन भविष्य में इसके लिए योजना है।

Operation Sindoor Trademark Race: Reliance, Lawyer, Ex-IAF Officer Compete

ये आवेदन क्लास 41 के तहत हैं, जो निम्नलिखित सेवाओं जैसे शिक्षा और प्रशिक्षण सेवाएं, फिल्म और मीडिया प्रोडक्शन, लाइव प्रदर्शन और इवेंट्स, डिजिटल कंटेंट डिलीवरी और प्रकाशन, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों को कवर करता है। इसका मतलब है कि “ऑपरेशन सिंदूर” का नाम फिल्म, वेब सीरीज, डॉक्यूमेंट्री, या किसी इवेंट के लिए इस्तेमाल हो सकता है।

भारत में ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया

भारत में ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन (Operation Sindoor) ट्रेड मार्क्स एक्ट, 1999 के तहत होता है। यह प्रक्रिया व्यवस्थित लेकिन जटिल है, जिसमें कई चरण शामिल हैं। कोई व्यक्ति या कंपनी ट्रेडमार्क रजिस्ट्री में आवेदन दाखिल करती है। इसमें ट्रेडमार्क का नाम, लोगो, या स्लोगन, साथ ही उसकी क्लासिफिकेशन (जैसे क्लास 41) और उपयोग का विवरण देना होता है। आवेदन के साथ फीस जमा की जाती है, जो व्यक्तिगत आवेदकों के लिए कम और कंपनियों के लिए ज्यादा हो सकती है।

“ऑपरेशन सिंदूर” (Operation Sindoor) के मामले में, चार आवेदकों ने 7 मई 2025 को क्लास 41 के तहत आवेदन किया, जो मनोरंजन, शिक्षा, और सांस्कृतिक सेवाओं से संबंधित है।

इसके बाद ट्रेड मार्क्स रजिस्ट्री आवेदन की जांच करती है। यह देखा जाता है कि ट्रेडमार्क मौजूदा रजिस्टर्ड मार्क्स से मिलता-जुलता तो नहीं है। रजिस्ट्री यह भी जांचती है कि ट्रेडमार्क भ्रामक, आपत्तिजनक, या सार्वजनिक नीति के खिलाफ तो नहीं है। “ऑपरेशन सिंदूर” जैसे नाम के लिए, रजिस्ट्री यह जांच सकती है कि क्या यह राष्ट्रीय भावनाओं या रक्षा से गलत संबंध सुझाता है।

यदि आवेदन प्रारंभिक जांच में पास हो जाता है, तो इसे ट्रेडमार्क्स जर्नल में चार महीने के लिए प्रकाशित किया जाता है। इस दौरान कोई भी व्यक्ति या संगठन, जैसे रक्षा मंत्रालय या अन्य आवेदक, ट्रेडमार्क के खिलाफ विरोध दर्ज कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के मामले में, यदि सरकार यह मानती है कि इस नाम का व्यावसायिक उपयोग अनुचित है, तो वह विरोध कर सकती है।

यदि कोई विरोध होता है, तो ट्रेडमार्क रजिस्ट्री दोनों पक्षों को सुनवाई का मौका देती है। विरोध के आधार पर आवेदन खारिज हो सकता है, या आवेदक को अपने दावे को मजबूत करने के लिए सबूत पेश करने पड़ सकते हैं। यदि कई आवेदक एक ही नाम के लिए दावा करते हैं, जैसे “ऑपरेशन सिंदूर”, (Operation Sindoor) तो रजिस्ट्री जांच को रोक सकती है और विरोध कार्यवाही शुरू हो सकती है। वहीं, अगर कोई विरोध नहीं होता या आवेदक विरोध में जीत जाता है, तो ट्रेडमार्क रजिस्टर हो जाता है। रजिस्ट्रेशन के बाद ट्रेडमार्क धारक को 10 साल के लिए विशेष अधिकार मिलते हैं, जिसे नवीनीकरण के साथ बढ़ाया जा सकता है।

क्या सैन्य ऑपरेशन का नाम ट्रेडमार्क हो सकता है?

भारत में सैन्य ऑपरेशन के नाम, जैसे “ऑपरेशन सिंदूर”, (Operation Sindoor) स्वतः बौद्धिक संपदा के रूप में संरक्षित नहीं होते। रक्षा मंत्रालय आमतौर पर ऐसे नामों को रजिस्टर या व्यावसायिक उपयोग के लिए सुरक्षित नहीं करता। कोई विशेष कानूनी ढांचा इन नामों को निजी व्यक्तियों या कंपनियों द्वारा ट्रेडमार्क के रूप में दावा करने से नहीं रोकता, जब तक कि सरकार हस्तक्षेप न करे।

हालांकि, ट्रेड मार्क्स एक्ट, 1999 की धारा 9(2) और धारा 11 के तहत, रजिस्ट्रार किसी ट्रेडमार्क को खारिज कर सकता है, अगर वह भ्रामक हो, राष्ट्रीय रक्षा से गलत संबंध सुझाता हो, सार्वजनिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता हो। इसके बावजूद, वर्तमान में ऐसे नामों को रजिस्टर करने पर कोई रोक नहीं है, जब तक कि सरकार या कोई अन्य पक्ष इसका विरोध न करे।

क्यों मची है होड़?

ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) का नाम देशभक्ति और भावनात्मक जुड़ाव के चलते लोगों को लुभा रहा है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने अनुमान लगाया कि रिलायंस इस नाम का इस्तेमाल किसी फिल्म, वेब सीरीज, या डॉक्यूमेंट्री के लिए कर सकता है। मुकेश चेतराम अग्रवाल और आलोक कोठारी जैसे व्यक्तियों के आवेदन से यह संकेत मिलता है कि छोटे निर्माता या उद्यमी भी इस नाम को भुनाने की कोशिश में हैं। ग्रुप कैप्टन कमल सिंह ओबेरो, जो एक रिटायर्ड वायुसेना अधिकारी हैं, शायद इस नाम का उपयोग किसी सैन्य थीम वाली शैक्षिक या सांस्कृतिक परियोजना के लिए करना चाहते हैं।

वहीं, इस खबर पर रिलायंस का कहना है,

रिलायंस इंडस्ट्रीज का ऑपरेशन सिंदूर को ट्रेडमार्क करने का कोई इरादा नहीं है, यह एक ऐसा नाम है जो अब राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन चुका है और भारतीय वीरता का एक प्रभावशाली प्रतीक है। जियो स्टूडियोज, जो रिलायंस इंडस्ट्रीज की एक इकाई है, ने अपनी ट्रेडमार्क आवेदन वापस ले लिया है, जो एक जूनियर कर्मचारी द्वारा अनजाने में और बिना अनुमति के दायर किया गया था। रिलायंस इंडस्ट्रीज और इसके सभी हितधारक ऑपरेशन सिंदूर पर बेहद गर्व करते हैं, जो पहलगाम में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुआ था। ऑपरेशन सिंदूर हमारे वीर सशस्त्र बलों की गर्वपूर्ण उपलब्धि है, जो भारत की आतंकवाद के बुराई के खिलाफ अडिग लड़ाई का प्रतीक है। रिलायंस आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में हमारी सरकार और सशस्त्र बलों के साथ पूरी तरह से समर्थन में खड़ा है। ‘इंडिया फर्स्ट’ के हमारे नारे के प्रति हमारी प्रतिबद्धता अटूट बनी हुई है।”

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सोशल मीडिया पर इस ट्रेडमार्क दौड़ को लेकर बहस छिड़ी है। एक यूजर ने लिखा, “जब देश सैन्य कार्रवाई की बात कर रहा था, कुछ लोग ट्रेडमार्क फाइल करने में व्यस्त थे।” वहीं, कुछ लोग इसे व्यावसायिक अवसर मान रहे हैं। एक अन्य यूजर ने कहा, “अगर रिलायंस इस नाम से फिल्म बनाए, तो यह ब्लॉकबस्टर होगी।”