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INS Aravali Commissioned: भारतीय नौसेना को मिला गुरुग्राम में नया नेवल बेस, समंदर की हर हरकत पर रहेगी नजर

INS Aravali Commissioned: Navy’s New Base in Delhi NCR to Strengthen Maritime Domain Awareness
Photo: Indian Navy

INS Aravali Commissioned: भारतीय नौसेना ने शुक्रवार को दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम में नया नेवल बेस INS अरावली कमिशन किया। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी की मौजूदगी में आयोजित इस समारोह ने नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को और मजबूत किया। अरावली पर्वत श्रृंखला के नाम पर रखे गए इस बेस का क्रेस्ट पर्वत और उगते सूरज के प्रतीक से सजा है, जो अटल शक्ति और सतत सतर्कता का प्रतिनिधित्व करता है। इसका ध्येय वाक्य है सामुद्रिकसुरक्षायाः सहयोगं”, यानी सहयोग के माध्यम से समुद्री सुरक्षा।

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हिंद महासागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री क्षेत्रों में से एक है। यहां से दुनिया के लगभग एक-तिहाई बड़े कार्गो जहाज, आधे कंटेनर शिप और दो-तिहाई तेल के जहाज गुजरते हैं। इस कारण यह क्षेत्र न केवल व्यापारिक बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। INS अरावली इसी रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।

INS Aravali Commissioned: गुरुग्राम से समंदर की निगरानी

गुरुग्राम स्थित इस बेस का मुख्य काम भारतीय नौसेना के विभिन्न इनफॉरमेशन और कम्यूनिकेशंस सेंटर्स को सपोर्ट करना है। यहां से मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) को बढ़ावा मिलेगा, जो भारत और मित्र देशों की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है।

इस बेस में दो प्रमुख केंद्र हैं इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) और इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर- इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR)। दोनों मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में गुजरने वाले जहाजों पर निगरानी रखते हैं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत पहचान कर कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं।

IFC-IOR: अंतरराष्ट्रीय सहयोग का केंद्र

INS अरावली में मौजूद IFC-IOR की स्थापना 2018 में हुई थी। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और मित्र देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान करना है। यहां 25 देशों के 43 मल्टीनैशनल सेंटर की लाइव फीड उपलब्ध होती है। इस सेंटर ने 28 देशों के साथ 76 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संपर्क स्थापित किए हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, जापान और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के इंटरनेशनल लायजन ऑफिसर्स (ILO) भी शामिल हैं।

INS Aravali Commissioned: समुद्री सुरक्षा के नए मानक

INS अरावली न केवल भारतीय नौसेना बल्कि पूरी दुनिया के लिए समुद्री सुरक्षा का नया केंद्र बनेगा। यहां से समुद्री डकैती, आतंकवाद, तस्करी, अवैध मछली पकड़ने और मानव तस्करी जैसी चुनौतियों से निपटने में सहयोग मिलेगा।

IFC-IOR का काम है, मित्र देशों को समय रहते चेतावनी देना, सूचनाओं को साझा करना और किसी भी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना।

INS Aravali Commissioned: IMAC की पैनी नजर

इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड एनालिसिस सेंटर (IMAC) को भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी का नर्व सेंटर माना जाता है। इसके मॉनिटरिंग रूम में लगी विशाल स्क्रीन पर समुद्र में होने वाली हर गतिविधि लाइव दिखाई देती है। यह स्क्रीन केवल जहाजों की आवाजाही ही नहीं, बल्कि संभावित खतरों और असामान्य गतिविधियों का भी तुरंत संकेत देती है।

IMAC में इस्तेमाल हो रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिसिस तकनीक इसे और भी ताकतवर बनाती है। कुछ ही सेकंड में यह सिस्टम बता देता है कि समुद्र में कितने जहाज मौजूद हैं, वे कहां से आए हैं, कहां जा रहे हैं और उनकी गतिविधियां सामान्य हैं या संदिग्ध। इससे भारतीय नौसेना को समुद्री सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बड़ी मदद मिलती है।

हर जहाज का रजिस्ट्रेशन नंबर, उसमें मौजूद क्रू की जानकारी और कार्गो का पूरा विवरण इस सिस्टम में तुरंत उपलब्ध हो जाता है। अगर कोई जहाज झूठा सिग्नल भेजकर या स्पूफिंग के जरिए अपनी असली पहचान छिपाने की कोशिश करता है, तो IMAC उसे तुरंत पकड़ लेता है।

भारत की 7,600 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा पर लगभग 90 तटीय रडार स्टेशन स्थापित किए गए हैं, जो लगातार निगरानी रखते हैं। इसके अलावा, 89 ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम समुद्र के हर हिस्से पर नजर रखते हैं और वास्तविक समय में सूचना उपलब्ध कराते हैं।

सिर्फ बड़े जहाज ही नहीं, बल्कि 20 मीटर से छोटी नौकाओं को भी ट्रैक करने के लिए ट्रांसपोडर सिस्टम लगाया गया है। देशभर में करीब 2.20 लाख से अधिक मछली पकड़ने वाली छोटी नावें इन ट्रांसपोडर से जुड़ी हुई हैं। इनके जरिए भी लगातार सिग्नल मिलते हैं, जो सैटेलाइट से होकर सीधे IMAC तक पहुंचते हैं।

इस तरह, IMAC के पास मौजूद यह एडवांस तकनीक भारतीय समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा को अभेद्य बनाती है। चाहे तटीय निगरानी हो, जहाजों की मूवमेंट पर नजर रखना हो या किसी भी संदिग्ध गतिविधि का तुरंत पता लगाना हो, यह सेंटर हर पल सक्रिय रहता है।

समुद्री गतिविधियों पर लाइव रिपोर्टिंग

INS अरावली से भारतीय नौसेना अपने चार प्रमुख जॉइंट ऑपरेशन सेंटर मुंबई, कोच्चि, विशाखापट्टनम और पोर्ट ब्लेयर से लगातार जुड़ी रहती है। यहां से हर जहाज और नाव की गतिविधि पर नजर रखी जाती है। खास बात यह है कि अब 20 मीटर से छोटी मछली पकड़ने वाली नावों पर लगाए गए ट्रांसपोडर भी सैटेलाइट के जरिए डेटा भेजेंगे, जिसे IMAC में देखा जा सकेगा।

सूत्रों ने बताया कि INS अरावली की स्थापना भारत के बढ़ते सामरिक महत्व और वैश्विक दृष्टिकोण को भी दर्शाती है। यह सिर्फ एक नेवल बेस नहीं बल्कि भारत की “सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी” का भी हिस्सा है। यहां से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की नौसैनिक क्षमताओं और सहयोग की भावना को मजबूत किया जाएगा।

Lt Kashish Methwani: मिस इंडिया से भारतीय सेना में अफसर बनीं कशिश मेथवानी, फोटो में देखें ब्यूटी क्वीन से लेफ्टिनेंट तक का सफर

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: एक तरफ रैंप पर चलती चमक-धमक, स्पॉटलाइट और सिर पर सजे ताज की शान तो दूसरी तरफ खाकी वर्दी, अनुशासन और देश की रक्षा का संकल्प। पुणे की रहने वाली कशिश मेथवानी ने दोनों ही दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। 2023 में मिस इंटरनेशनल इंडिया का ताज जीतने वाली कशिश ने 2024 में भारतीय सेना की लेफ्टिनेंट बनकर दिखा दिया कि नारी शक्ति किसी एक राह तक सीमित नहीं होती।

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मिस इंटरनेशनल इंडिया 2023 का खिताब जीतने वाली काशिश मेथवानी अब एक नई पहचान के साथ सामने आई हैं। वह अब भारतीय सेना की अधिकारी हैं और लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त हो चुकी हैं। 6 सितंबर 2024 को उन्होंने चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में अपनी पासिंग आउट परेड पूरी की और सेना में शामिल हो गईं।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: “मैंने या-या नहीं, बल्कि और-और चुना”

कशिश ने अपने एक TEDx टॉक में कहा था, “मैं या-या (either/or) की बजाय और-और चाहती थी। मैं मिस इंडिया भी बनना चाहती थी, वैज्ञानिक भी और ऑफिसर भी। मैं एक क्षेत्र नहीं चुनना चाहती थी। मुझे सबकुछ करना था और उसमें उत्कृष्टता हासिल करनी थी।” यही सोच उन्हें भीड़ से अलग करती है।

Lt Kashish Methwani: पढ़ाई से मॉडलिंग तक का सफर

कशिश मेथवानी ने सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की पढ़ाई की और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) बेंगलुरु से न्यूरोसाइंस में न्यूरोसाइंस में थीसिस लिखी है। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने मॉडलिंग में भी अपना नाम कमाया और 2023 में मिस इंटरनेशनल इंडिया का खिताब जीतकर देशभर में सुर्खियां बटोरीं।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: सेना की वर्दी पहनने का सपना

2024 में कशिश ने कॉम्बाइंड डिफेंस सर्विसेज परीक्षा पास की और पूरे देश में ऑल इंडिया रैंक 2 हासिल की। इसके बाद उन्होंने चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में ट्रेनिंग शुरू की। 6 सितंबर 2024 को उनकी पासिंग आउट परेड हुई और वे आर्मी एयर डिफेंस (AAD) ब्रांच में लेफ्टिनेंट बनीं।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

Lt Kashish Methwani: बचपन से ही सबकुछ करने की चाह

कशिश की मां शोभा मेथवानी, जो आर्मी पब्लिक स्कूल घोरपड़ी में टीचर हैं, कहती हैं—“आम तौर पर माता-पिता बच्चों को प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन हमारे यहां उल्टा था। कशिश खुद कहती थी कि मुझे हर प्रतियोगिता में भाग लेना है। उसे कभी परिणाम की चिंता नहीं होती थी।”

Lt Kashish Methwani: बहुमुखी प्रतिभा की मिसाल

24 वर्षीय काशिश ने अपने छोटे से जीवन में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। वह सिर्फ एक मॉडल या आर्मी ऑफिसर नहीं हैं। वे नेशनल लेवल पिस्टल शूटर और बास्केटबॉल खिलाड़ी भी रह चुकी हैं। इसके अलावा वे तबला बजाने और भरतनाट्यम नृत्य करने में भी निपुण हैं। इतनी कम उम्र में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में खुद को साबित किया।

Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform
Miss India Lt Kashish Methwani to Indian Army Officer: From International Beret to Olive Green Uniform

समाज सेवा में भी आगे

कशिश ने “क्रिटिकल कॉज” नामक एनजीओ की स्थापना की, जो प्लाज्मा और अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाने का काम करता है। महामारी के दौर में उनकी इस पहल ने कई लोगों की मदद की।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का ऑफर ठुकराया

हारवर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी के लिए सिलेक्ट होने के बावजूद उन्होंने भारतीय सेना को चुना। उन्होंने ब्यूटी क्वीन की ग्लैमर्स दुनिया को छोड़कर सैनिक की वर्दी को चुना।

कशिश पहली ऐसी महिला हैं, जिन्होंने अपने परिवार से सेना में कदम रखा। उनके पिता डॉ. गुरमुख दास मेथवानी रक्षा मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल क्वालिटी एश्योरेंस (DGQA) में वैज्ञानिक रहे हैं और वहां से डायरेक्टर पद से रिटायर हुए। उनकी मां शोभा आर्मी पब्लिक स्कूल में पढ़ाती हैं।

कशिश की लंबी जुल्फें अब नहीं हैं। उनकी जगह अब बाल छोटे हैं और चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता है। ताज से लेकर टोपी और अब आर्मी की बेरेट कैप तक, उनका सफर यह बताता है कि कशिश मेथवानी जैसी महिलाएं नई पीढ़ी के लिए रोल मॉडल हैं।

MiG-21 Bison Retirement: संस्थानों में मिग-21 के लिए मची होड़, स्टेटिक डिस्प्ले की जबरदस्त मांग और 5-6 साल का इंतजार!

IAF MiG-21 Bison Retirement After 62 Years: Legacy, Last Flight and What Comes Next
Mig 21 at Kargil War Memorial (Photo: Raksha samachar)

MiG-21 Bison Retirement: भारतीय वायुसेना का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 बाइसन (MiG-21 Bison) अब इतिहास बनने जा रहा है। 62 साल की सेवा के बाद 26 सितंबर 2025 को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित विशेष समारोह में इन विमानों को औपचारिक रूप से रिटायर कर दिया जाएगा। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एयरफोर्स के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 अपने पुराने अंदाज में उड़ान भरते दिखेंगे और उन्हें स्वदेशी तेजस फाइटर जेट एस्कॉर्ट करेंगे। इसके बाद भारतीय वायुसेना के बेड़े में मिग-21 का नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो जाएगा।

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MiG-21 Bison Retirement: इस तरह होगी आखिरी उड़ान

समारोह के दौरान मिग-21 बाइसन पुराने अंदाज में बेस एयर डिफेंस सेंटर (BADC) कॉम्बैट ड्रिल करते दिखाई देंगे। इस ड्रिल में पायलट दिखाएंगे कि 60 साल पहले किस तरह एयरबेस की सुरक्षा के लिए मिग-21 को हवा में तैनात किया जाता था और रेडियो के जरिए उन्हें कंट्रोल किया जाता था। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 बाइसन स्क्वॉड्रन को स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान एस्कॉर्ट करेंगे। जैसे ही यह फॉर्मेशन मुख्य मंच के सामने पहुंचेगी, मिग-21 विमान तेजी से ऊंचाई की ओर उड़ान भरेंगे और फिर आसमान में ओझल हो जाएंगे।

MiG-21 Bison Retirement: रिटायरमेंट के बाद क्या होगा?

सूत्रों ने रक्षा समाचार डॉट कॉम को बताया कि भारतीय वायुसेना ने तय किया है कि इन विमानों को स्मारक के रूप में देशभर में लगाया जाएगा। रिटायरमेंट के बाद कई सरकारी संस्थान, विश्वविद्यालय और स्कूल इन विमानों को स्टैटिक डिस्प्ले के तौर पर लगाने के लिए आवेदन कर चुके हैं। वहीं, सरकारी संस्थानों को विमान मुफ्त में दिए जाएंगे, जबकि निजी संस्थानों को इसके लिए लगभग 30 से 40 लाख रुपये खर्च करने होंगे। वहीं स्वायत्त संस्थानों के लिए यह रकम कम होगी।

IAF MiG-21 Bison Retirement After 62 Years: Legacy, Last Flight and What Comes Next
Mig 21 at Kargil War Memorial (Photo: Raksha samachar)

MiG-21 Bison Retirement: 5-6 साल का इंतजार

सूत्रों ने यह भी बताया कि रिटायर हो जाने के बाद इन्हें देने के लिए कैटेगरी बनाई जााएगी। लेकिन इन जेट्स को पाने के लिए संस्थानों को 5-6 साल का इंतजार करना होगा, क्योंकि वेटिंग लिस्ट लंबी है। भारतीय वायुसेना सभी आवेदनों की स्क्रूटनी करेगी और प्राथमिकता के आधार पर जेट का आवंटन करेगी।

सूत्रों ने बताया कि कुछ जेट्स को भारतीय वायुसेना अपने म्यूजियम में भी रखेगी, जहां आम लोग इन्हें करीब से देख सकेंगे। इन विमानों का स्टैटिक डिस्प्ले युवाओं में साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स (STEM) की पढ़ाई के प्रति उत्सुकता बढ़ाएगा और उन्हें मिलिट्री हिस्ट्री से जोड़ने का काम करेगा। बता दें कि मिग-21 सहित अन्य रिटायर्ड विमानों को पहले भी वायुसेना संग्रहालय (दिल्ली), एचएएल संग्रहालय (बेंगलुरु), और विभिन्न सैन्य अड्डों पर प्रदर्शित किया गया है। दिल्ली के पालम वायुसेना स्टेशन पर मिग-21 को भी प्रदर्शन के लिए रखा गया है।

MiG-21 Bison Retirement: मेंटेनेस करनी है जरूरी

सूत्रों का कहना है कि किसी भी संस्थान को जेट देने से पहले उसके सभी अहम पार्ट्स, जिसमें एवियोनिक्स, संवेदनशील उपकरण और इंजन जैसे जरूरी पार्ट्स को निकाल लिया जाएगा। संस्थानों को केवल एयरफ्रेम ही दिया जाएगा। साथ ही अच्छी कंडीशंस वाले जेट्स को ही आवंटित किया जाएगाा। वहीं सस्थानों को डिस्प्ले के लिए दिए जाने वाले गए मिग-21 का नियमित रखरखाव करना भी आवश्यक होगाा, जिसमें सफाई, पेंटिंग, और जंग-रोधी उपचार शामिल हैं।

MiG-21 Bison Retirement: अपनी मर्जी से नहीं कर सकते कोई कलर

वहीं, इसके लिए शहर की म्यूनिसिपिलिटी की परमिशन की भी जरूरी होती है, क्योंकि राष्ट्रीय धरोहर होने के नाते इसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी उन्ही की होती है। वे उस संबंधित संस्थान के साथ इसके मेंटेनेंस में सहयोग करते हैं औऱ समय-समय पर जांच करते हैं। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायु सेना का रिपेयर एंड सॉल्वेज यूनिट (RSU) इसमें उनकी मदद करता है। इनके मेंटेनेंस के लिए पूरे डेकोरम का पालन करना होता है। वहीं, संस्थान इन्हें अपनी मर्जी से कोई भी कलर नहीं कर सकता है। बल्कि ऑरिजनल कलर और राष्ट्रीय झंडा बनाना जरूरी होता है।

MiG-21 Bison Retirement: छह दशक तक की देश की सेवा

भारत-चीन युद्ध के बाद मिग-21 को 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। यह भारत का पहला सुपरसोनिक फाइटर जेट था और जल्द ही इसे वायुसेना की रीढ़ माना जाने लगा। इसे सोवियत संघ के मिकोयान-गुरेविच डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया था और भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने लाइसेंस लेकर इसका निर्माण किया।

भारत ने 850 से अधिक मिग-21 विमान उड़ाए और इनकी 24 फाइटर स्क्वॉड्रन और 4 ट्रेनिंग यूनिट्स तैयार कीं। आने वाले वर्षों में भारत दुनिया का सबसे बड़ा मिग-21 ऑपरेटर बन गया।

MiG-21 Bison Retirement: बची हैं बस दो स्क्वॉड्रन

मिग-21 की आखिरी दो स्क्वॉड्रन नाल एयरबेस पर मौजूद हैं। इन्हें “नंबर प्लेटिंग” के जरिए फ्रीज कर दिया जाएगा और इन्हीं स्क्वॉड्रन नंबरों पर अब स्वदेशी तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमान शामिल होंगे। नंबर 3 स्क्वॉड्रन “कोबरा” और नंबर 23 स्क्वॉड्रन “पैंथर्स” की लेगेसी अब तेजस के साथ जुड़ जाएगी। इन दोनों स्क्वॉड्रन में लगभग 27-28 मिग ही मौजूद हैं।

तेजस की पहली डिलीवरी भी इन्हीं स्क्वॉड्रन में होगी। दिलचस्प बात यह है कि मिग-21 बाइसन का पहला अपग्रेड भी नंबर 3 स्क्वॉड्रन में ही शामिल हुआ था और अब तेजस मार्क-1A भी वहीं से अपनी उड़ान शुरू करेगा।

26 सितंबर को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित समारोह में वायुसेना के सभी रिटायर्ड और मौजूदा पायलटों को आमंत्रित किया गया है, जिन्होंने मिग-21 उड़ाया है। आसमान में आकाश गंगा डिस्प्ले टीम का प्रदर्शन होगा और मिग-21 बाइसन का अंतिम फ्लाइपास्ट आयोजित किया जाएगा। इसके बाद स्क्वॉड्रन की चाबी रक्षा मंत्री को सौंपी जाएगी और औपचारिक रूप से मिग-21 वायुसेना से विदा लेगा।

Samudra Pradakshina: इतिहास रचने निकली तीनों सेनाओं की 10 महिला अफसर, स्वदेशी नौका IASV त्रिवेणी से लगाएंगी दुनिया का चक्कर

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से एक ऐतिहासिक अभियान को हरी झंडी दिखाई। यह अभियान दुनिया का पहला ट्राई-सर्विसेज महिला नौकायन अभियान है, जिसे ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ नाम दिया गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ को वर्चुअल माध्यम से हरी झंडी दिखाई। इस अभियान पर 10 महिला सैन्य अधिकारी स्वदेशी नौका त्रिवेणी पर सवार होकर निकलीं हैं, जो अगले 9 महीनों में दुनिया की पूरी परिक्रमा करेंगी।

यह दुनिया का पहला ट्राई सर्विसेज (थल, जल और वायु सेना) महिला परिक्रमा नौकायन अभियान है। इससे पहले इसी वर्ष मई 2025 में “नाविका सागर परिक्रमा-II” अभियान भी पूरा हुआ, जिसमें दो बहादुर नौसेना अधिकारी लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ए ने डबल-हैंडेड मोड में दुनिया की परिक्रमा कर भारत का परचम लहराया।

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Samudra Pradakshina: नारी शक्ति और आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक

रक्षा मंत्री ने साउथ ब्लॉक से अपने संबोधन में कहा कि ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ केवल समुद्री यात्रा भर नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना और अनुशासन का अभियान है। उन्होंने कहा कि इस नौकायन यात्रा में 10 महिला अधिकारी नौ महीने तक समुद्र की लहरों से जूझते हुए दुनिया की परिक्रमा करेंगी। इस दौरान वे चुनौतियों का सामना करेंगी, लेकिन उनका दृढ़ निश्चय अंधकार को चीरते हुए विजय की ओर अग्रसर होगा। रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में इस अभियान को न केवल एक नौकायन यात्रा बल्कि “आध्यात्मिक साधना और अनुशासन की परख” बताया। उन्होंने कहा कि हमारी अधिकारी अनेक चुनौतियों का सामना करेंगी, लेकिन उनका दृढ़ संकल्प अंधेरे को चीरकर उजाला लेकर आएगा।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

इस यात्रा में 10 महिला अधिकारी स्वदेशी रूप से निर्मित भारतीय सेना नौकायन पोत त्रिवेणी (IASV Triveni) पर सवार होकर लगभग 26,000 समुद्री मील की दूरी तय करेंगी। यह पोत पुडुचेरी में बना 50 फुट लंबा यॉट है, जिसे आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बताया गया है।

Samudra Pradakshina: दो बार पार करेंगी भूमध्य रेखा

दल पूर्वी मार्ग से यात्रा करेगा और नौ महीने के दौरान भूमध्य रेखा (Equator) दो बार पार करनी होगी। दुनिया के तीन बड़े अंतरीपों लीउविन, हॉर्न और गुड होप का चक्कर लगाएंगी। यह यात्रा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा के बंदरगाहों को छूते हुए मई 2026 में मुंबई लौटेगी। इस दौरान अभियान दल अटलांटिक, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर सहित सभी बड़े महासागरों से गुजरेगा। सबसे कठिन चरण दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच दक्षिणी महासागर और ड्रेक पैसेज से गुजरना होगा, जहां विशाल लहरें, बर्फीली हवाएं और अप्रत्याशित तूफान नाविक कौशल की अंतिम परीक्षा माने जाते हैं।

इस अभियान के दौरान दल चार अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों फ्रेमेंटल (ऑस्ट्रेलिया), लिटलटन (न्यूजीलैंड), पोर्ट स्टेनली (कनाडा) और केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका) का दौरा करेगा। इन यात्राओं में भारतीय संस्कृति और सैन्य शक्ति का परिचय कराया जाएगा।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: अभियान दल की कमान है इनके हाथ

अभियान दल की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल अनुजा वरुडकर संभाल रही हैं, जबकि स्क्वाड्रन लीडर श्रद्धा पी राजू उप-अभियान नेता हैं। टीम में मेजर करमजीत कौर, मेजर ओमिता दलवी, कैप्टन प्राजक्ता पी निकम, कैप्टन दौली बुटोला, लेफ्टिनेंट कमांडर प्रियंका गुसाईं, विंग कमांडर विभा सिंह, स्क्वाड्रन लीडर अरुवी जयदेव और स्क्वाड्रन लीडर वैशाली भंडारी शामिल हैं।

इस दल ने पिछले तीन सालों में कठिन ट्रेनिंग ली है। शुरुआत छोटे जहाजों पर ऑफशोर अभियानों से हुई और फिर अक्टूबर 2024 में अधिग्रहित त्रिवेणी यॉट पर अभ्यास किया गया। इस वर्ष की शुरुआत में उन्होंने मुंबई से सेशेल्स तक एक अंतरराष्ट्रीय परीक्षण अभियान भी सफलतापूर्वक पूरा किया।

Samudra Pradakshina: Raksha Mantri Flags Off First Tri-Service All-Women Sailing Expedition from Mumbai

Samudra Pradakshina: भारत में बनी है IASV त्रिवेणी

पुडुचेरी में निर्मित 50 फुट लंबा पोत IASV त्रिवेणी में अत्याधुनिक नेविगेशन और सुरक्षा तकनीक लगाई गई है। यह अभियान वर्ल्ड सेलिंग स्पीड रिकॉर्ड काउंसिल के सभी मानकों का पालन करेगा। इसके अनुसार, सभी देशांतरों और भूमध्य रेखा को पार करना और बिना नहरों या मशीनरी की मदद के केवल पाल के सहारे 21,600 समुद्री मील से अधिक दूरी तय करनी होगी।

यात्रा के दौरान दल राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के साथ मिलकर वैज्ञानिक अनुसंधान भी करेगा। इसमें सूक्ष्म प्लास्टिक का अध्ययन, समुद्री जीवन का डॉक्यूमेंटेशन और महासागरों के स्वास्थ्य पर जागरूकता अभियान शामिल हैं।

नाविका सागर परिक्रमा (2017-18)

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह से नौका के जरिए पूरी दुनिया की यात्रा की गई हो। इससे पहले 2017 में भी भारतीय नौसेना ने नाविका सागर परिक्रमा मिशन शुरू किया था। यह मिशन पूरी तरह महिला दल द्वारा संचालित था और 1 अप्रैल 2017 को मुंबई से रवाना हुआ।

दल ने 254 दिनों में लगभग 29,000 नॉटिकल मील की दूरी तय की और 20 देशों के 14 बंदरगाहों पर रुका। इस यात्रा में लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी के नेतृत्व में छह महिला अधिकारियों ने आईएनएसवी तारिणी पर सवार होकर तूफानों, ऊंची लहरों और कठिन मौसम का सामना किया। यह पहली बार था जब भारतीय महिला अधिकारियों ने विश्व परिक्रमा पूरी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी वापसी पर स्वागत किया। इस मिशन को नारी शक्ति पुरस्कार और अन्य सम्मान भी मिले।

नाविका सागर परिक्रमा-II (2024-25)

वहीं, पहले मिशन की सफलता के बाद भारतीय नौसेना ने दिसंबर 2024 में नाविका सागर परिक्रमा-II की शुरुआत की। दो महिला नौसेना अधिकारियों लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ए ने INSV तारिणी दुनिया की परिक्रमा पूरी की। यह भारत का पहला सफल प्रयास था, जिसमें किसी दल ने डबल-हैंडेड मोड में परिक्रमा पूरी की।

यह यात्रा 2 अक्टूबर 2024 को गोवा से शुरू हुई थी और लगभग आठ महीने चली। इस दौरान INSV तारिणी ने 25,600 नॉटिकल मील की दूरी तय की। अभियान के दौरान दल ने चार बड़े अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों फ्रेमेंटल (ऑस्ट्रेलिया), लिटलटन (न्यूजीलैंड), पोर्ट स्टेनली (फॉकलैंड द्वीप) और केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) पर कॉल किया।

यह यात्रा बेहद कठिन रही। दक्षिणी महासागर और ड्रेक पैसेज जैसे खतरनाक जलक्षेत्र पार करते समय दल को तूफानों, खतरनाक ऊंची लहरों और बर्फीली हवाओं का सामना करना पड़ा। लंबी अवधि तक अकेलेपन और थकान से भी जूझना पड़ा। लेकिन इन दोनों अधिकारियों ने अपनी मानसिक और शारीरिक शक्ति से हर चुनौती को पार किया।

कैप्टन दिलीप डोंडे ने अकेले लगाया दुनिया का चक्कर

2009-10 में कैप्टन दिलीप डोंडे ने भारतीय नौसेना के लिए अकेले नाव से विश्व की परिक्रमा पूरी की। उनकी यह यात्रा न केवल भारत के समुद्री इतिहास में एक मील का पत्थर थी, बल्कि यह भी साबित करती थी कि भारतीय नाविक वैश्विक स्तर पर असाधारण साहस और कौशल का प्रदर्शन कर सकते हैं। डोंडे ने अपनी नौका, आईएनएसवी म्हादेई पर, चार महासागरों को पार करते हुए लगभग 21,600 समुद्री मील की दूरी तय की। इस दौरान उन्होंने तूफानों, तकनीकी चुनौतियों और अकेलेपन का सामना किया।

कमांडर अभिलाष टॉमी ने बनाया रिकॉर्ड

2012-13 में कमांडर अभिलाष टॉमी ने दुनिया की परिक्रमा करता हुए बड़ी उपलब्धि हासिल की। उन्होंने बिना रुके और बिना किसी बाहरी सहायता के विश्व की परिक्रमा पूरी की, जो भारत के लिए पहली बार था। टॉमी ने भी आईएनएसवी म्हादेई पर 150 दिनों में 23,000 समुद्री मील की यात्रा पूरी की। उनकी यह यात्रा न केवल तकनीकी रूप से कठिन थी, बल्कि इसमें मानसिक और शारीरिक चुनौतियां भी थीं।

1969 में सर रॉबिन नॉक्स-जॉनस्टन ने रचा इतिहास

1969 में सर रॉबिन नॉक्स-जॉनस्टन ने इतिहास रचते हुए दुनिया के पहले व्यक्ति बने जिन्होंने बिना रुके और बिना मदद के एकल नौकायन से विश्व की परिक्रमा पूरी की। उनकी नौका सुहैली पर उन्होंने 312 दिन में 30,000 समुद्री मील की यात्रा पूरी की। इस दौरान उन्होंने तूफानों, उपकरण खराबी और अकेलेपन जैसी चुनौतियों का सामना किया। यह उपलब्धि संडे टाइम्स गोल्डन ग्लोब रेस का हिस्सा थी, जिसमें वे एकमात्र प्रतिभागी थे जो दौड़ पूरी कर सके। उनकी इस साहसिक यात्रा ने समुद्री नौकायन में नया रिकॉर्ड बनाया और दुनियाभर में नाविकों को प्रेरित किया।

MAITREE-XIV and Siyom Prahar: नॉर्थ ईस्ट में भारतीय सेना की दो बड़ी एक्सरसाइज; मैत्री-XIV और ड्रोन अभ्यास सियोम प्रहार से ऑपरेशनल तैयारियों को नई मजबूती

India Military Exercises Maitree-XIV and Siyom Prahar
Maitree-XIV

MAITREE-XIV and Siyom Prahar: भारत के पूर्वोत्तर इलाके में मेघालय के उमरोई में भारतीय सेना और रॉयल थाई आर्मी का संयुक्त अभ्यास मैत्री-XIV (Maitree-XIV) चल रहा है। वहीं दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना ने सियोम प्रहार (Siyom Prahar) अभ्यास के जरिए बैटलफील्ड में ड्रोन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की नई स्ट्रैटेजी का ट्रायल किया है। ये दोनों एक्सरसाइज भारत की बढ़ती सैन्य तैयारियों और रणनीतिक दृष्टिकोण का उदाहरण पेश करती हैं।

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मेघालय में चल रही Maitree-XIV अभ्यास भारत और थाईलैंड की सेनाओं के बीच चल रहा है, जो 14 सितंबर तक जारी रहेगा और इसमें दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे की कार्यशैली, तकनीक और अनुभव साझा कर रहे हैं। इस एक्सरसाइज का मुख्य उद्देश्य इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी तालमेल को बढ़ाना और संयुक्त ऑपरेशनों की क्षमता को और मजबूत करना है।

इस अभ्यास में सैनिकों ने कॉम्बैट कंडीशनिंग के जरिए शारीरिक क्षमता और युद्धक तैयारी को बढ़ाने पर फोकस किया। साथ ही, भारतीय सेना की इन्फैंट्री बटालियन के हथियारों और उपकरणों से परिचित कराने के लिए ओरिएंटेशन कराया गया। क्लोज कॉम्बैट यानी नजदीकी लड़ाई की तकनीकों को विशेष मार्शल आर्ट्स ट्रेनिंग से और प्रभावी बनाया गया।

अभ्यास के दौरान सेमी-शहरी इलाके में कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन और आतंकवादियों को खत्म करने के लिए सर्च एंड डेस्ट्रॉय मिशन भी कराए गए। इसके अलावा, एडवांस फायरिंग प्रैक्टिस में सैनिकों ने एंबिडेक्स्ट्रस यानी दोनों हाथों से फायरिंग करने की क्षमता और सटीक स्नाइपर ट्रेनिंग का प्रदर्शन किया। हाई-रिस्क मिशनों के लिए स्लिदरिंग ड्रिल्स का अभ्यास कराया गया, जिससे सैनिक तेजी से किसी क्षेत्र में उतर सकें और दुश्मन पर तुरंत कार्रवाई कर सकें।

इसके अलावा बस इंटरवेंशन और होस्टेज रेस्क्यू (बंधक मुक्ति) के हालात को भी अभ्यास का हिस्सा बनाया गया। कमरे में घुसकर खतरे को खत्म करने और सुरक्षित क्षेत्र बनाने के लिए रूम इंटरवेंशन ड्रिल्स का आयोजन किया गया। इसके साथ ही, सैनिकों ने रॉक क्राफ्ट ट्रेनिंग के जरिए कठिन इलाकों में चढ़ाई भी की। जंगल में जिंदा रहने के लिए सरवाइवल ड्रिल्स कराए गए, ताकि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी ऑपरेशन सफलतापूर्वक चलाए जा सकें।

सिर्फ कॉम्बैट ट्रेनिंग ही नहीं, बल्कि स्पोर्ट्स और टीम बिल्डिंग गतिविधियों को भी अभ्यास का हिस्सा बनाया गया। इनसे दोनों देशों की सेनाओं के बीच भाईचारा और आपसी विश्वास मजबूत हुआ। Maitree-XIV ने दिखा दिया कि भारतीय सेना और रॉयल थाई आर्मी संयुक्त रूप से किसी भी परिस्थिति में प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं।

एक्सरसाइज सियोम प्रहार

वहीं, दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश में 8 से 10 सितंबर के बीच आयोजित एक्सरसाइज सियोम प्रहार ने भारतीय सेना के भविष्य के बैटल फील्ड की झलक दिखाई। इस अभ्यास का मकसद युद्ध में ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल की रणनीतियों को परखना था। इसे रिटल टाइम वॉर जैसी परिस्थितियों में आयोजित किया गया और इसमें ड्रोन को टैक्टिकल और ऑपरेशनल दोनों स्तरों पर तैनात किया गया।

ड्रोन का इस्तेमाल निरंतर निगरानी, दुश्मन की स्थिति की जानकारी जुटाने, टारगेट हासिल करने और सटीक हमले करने के लिए किया गया। इस अभ्यास ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन सिर्फ एक सहायक उपकरण नहीं बल्कि युद्ध की दिशा बदलने वाला निर्णायक हथियार साबित हो सकते हैं।

India Military Exercises Maitree-XIV and Siyom Prahar
Exercises Siyom Prahar

इस अभ्यास का मुख्य फोकस नए टैक्टिक्स, टेक्नीक और प्रोसिजर्स यानी TTPs डेवलप करना था। इसमें ड्रोन से मिलने वाली जानकारी को पारंपरिक हथियारों और तोपखाने की मारक क्षमता के साथ जोड़ने के तरीकों को परखा गया। इससे जॉइंट टारगेटिंग की प्रक्रिया और तेज निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत किया गया।

सियोम प्रहार ने यह भी साबित किया कि युद्ध के मैदान में परंपरागत हथियारों और नई तकनीकों के बीच तालमेल जरूरी है। भारतीय सेना ने ड्रोन तकनीक और पारंपरिक युद्धक कौशल को एक साथ मिलाकर यह दिखाया कि भविष्य की लड़ाई में कैसे तकनीक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

इस अभ्यास में ड्रोन की लॉक-ऑन क्षमता, गाइडेंस सटीकता, उड़ान स्थिरता और आर्मर पेनेट्रेशन जैसी खूबियों को अलग-अलग परिस्थितियों में परखा गया। रेगिस्तानी धूल, उच्च तापमान और दुर्गम इलाकों जैसी चुनौतियों में भी इनके प्रदर्शन को जांचा गया।

भारतीय सेना ने इस अभ्यास के जरिए यह भी संदेश दिया कि वह लगातार इनोवेशन कर रही है और आने वाले समय की चुनौतियों के लिए तैयार है। अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स यानी ड्रोन को पारंपरिक युद्धक रणनीतियों के साथ मिलाकर सेना ने दिखाया कि भविष्य के युद्ध में तकनीक ही सफलता की कुंजी होगी।

Zorawar Tank ATGM Test: भारत का जोरावर टैंक पहली बार फायर करेगा स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल, रेगिस्तान में होगा बड़ा टेस्ट

Zorawar Tank ATGM Test drdo-lt

Zorawar Tank ATGM Test: भारत अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और लार्सन एंड टुब्रो राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में जोरावर लाइट टैंक से स्वदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) का ट्रायल करने की तैयारी कर रहे हैं। यह ट्रायल्स न सिर्फ मिसाइल की मारक क्षमता को परखने के लिए होगा, बल्कि इससे यह भी पता लगेगा कि जोरावर टैंक की हथियार प्रणाली और मिसाइल इंटीग्रेशन सही से काम कर रही है या नहीं।

Zorawar Light Tank Trials: जानें भारतीय सेना कब शुरू करेगी भारत के स्वदेशी लाइट वेट टैंक जोरावर के ट्रायल्स, दूसरे प्रोटोटाइप में किए ये सुधार

इस ट्रायल को बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रायल्स जोरावर लाइट टैंक की रीयल वॉर कंडीशंस में क्षमता को साबित करेगा और भारतीय सेना की जरूरतों के मुताबिक इसे और प्रभावी बनाएगा। इस ट्रायल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें मिसाइल को जोरावर टैंक के फायर-कंट्रोल सिस्टम के साथ इंटीग्रेट किया जाएगा।

जोरावर लाइट टैंक को खासतौर पर उन इलाकों के लिए तैयार किया गया है जहां भारी टैंक तैनात करना मुश्किल है। पूर्वी लद्दाख जैसे ऊंचाई और नदी-नालों वाले इलाकों में इस्तेमाल के लिए हल्के लेकिन ताकतवर टैंक की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। डीआरडीओ की इकाई कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (CVRDE) और एलएंडटी का बनाया यह टैंक “मेक-वन” कैटेगरी के तहत बनाया गया है और इसका वजन लगभग 25 टन है।

इस टैंक में 105 मिमी की कॉकरिल गन लगी है, जिसमें अत्याधुनिक फायर-कंट्रोल और स्टेबिलाइजेशन सिस्टम मौजूद हैं। अब इसमें स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल ATGM को शामिल करने से इसकी युद्ध क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। यह मिसाइल दुश्मन के भारी बख्तरबंद वाहनों और टैंकों को भी मार गिराएगी।

इस परीक्षण में मिसाइल के सीकर लॉक-ऑन समय, गाइडेंस एक्यूरेसी, उड़ान स्थिरता और कवच भेदने की क्षमता का परीक्षण किया जाएगा। रेगिस्तानी धूल और ऊंचे तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में ATGM के प्रदर्शन को परखना भी इस ट्रायल का अहम हिस्सा होगा। इसके अलावा, यह भी देखा जाएगा कि टैंक का फायर-कंट्रोल सिस्टम मिसाइल के साथ कितनी सहजता से काम करता है।

जोरावर लाइट टैंक को पूर्वी लद्दाख के इलाकों में तैनाती के लिए डिजाइन किया गया है। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव की स्थिति में हल्के लेकिन ताकतवर टैंकों की जरूरत लगातार बनी रहती है। भारी टैंक को इन इलाकों में ऑपरेट करने में दिक्कत आती है। जबकि जोरावर जैसे लाइट टैंक ऊंचाई और मुश्किल इलाकों में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।

GE-404 Engine: तेजस एमके-1ए फाइटर जेट के लिए एचएएल को मिला तीसरा GE-404 इंजन, चौथा इस महीने पहुंचेगा भारत

HAL receives 3rd GE-404 engine for Tejas Mk-1A
Photo by HAL

GE-404 Engine: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक से तीसरे GE-404 इंजन की सप्लाई हो गई है। यह इंजन एलसीए (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) तेजस मार्क-1A कार्यक्रम का अहम हिस्सा है। वहीं, चौथा इंजन इसी महीने भारत पहुंचने की उम्मीद है।

Tejas Mk-1A Price Hike: अब 97 नए तेजस मार्क-1ए को महंगे दामों पर बेचेगी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड! जानें HAL ने क्यों बढ़ाईं कीमतें?

यह डिलीवरी ऐसे समय में हुई है जब भारतीय वायुसेना को तेजस विमानों की जरूरत सबसे ज्यादा है। वायुसेना पहले ही 83 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दे चुकी है और सरकार ने हाल ही में 97 और विमानों की खरीद को मंजूरी दी है। कुल मिलाकर अब 180 स्वदेशी लड़ाकू विमानों का रास्ता साफ हो चुका है। इन विमानों को समय पर तैयार करने के लिए इंजन की सप्लाई बेहद अहम मानी जा रही है।

एचएएल को इस वित्त वर्ष के आखिर तक 12 जीई-404 (GE-404 Engine) इंजन मिलने हैं। इन इंजनों का इस्तेमाल भारतीय वायुसेना के तेजस बेड़े में होगा। अभी तक तीन इंजन एचएएल को मिल चुके हैं और चौथा इंजन जल्द ही डिलीवर होगा। इसके बाद आने वाले महीनों में इंजन सप्लाई और तेज होने की उम्मीद है।

तेजस एमके-1ए की डिलीवरी में पहले ही बहुत देरी हो चुकी है। इस देरी की मुख्य वजह सप्लाई चेन की दिक्कतें और इंजन की उपलब्धता रही। मार्च 2025 में जीई ने पहला इंजन एचएएल को सौंपा था। इसके बाद से धीरे-धीरे इंजन भारत पहुंच रहे हैं। लेकिन उत्पादन लक्ष्य को पूरा करने के लिए समय पर सप्लाई अनिवार्य है।

सूत्रों के मुताबिक एचएएल की योजना 2026-27 तक हर साल 30 तेजस विमान बनाने की है। अभी उत्पादन दर इससे काफी कम है। इंजन सप्लाई सुचारू होने के बाद ही इस लक्ष्य तक पहुंचना संभव होगा।

तेजस एमके-1ए को लेकर भारतीय वायुसेना में काफी उम्मीदें हैं। यह विमान लेटेस्ट एवियोनिक्स, मल्टी-रोल कैपेबिलिटी और स्वदेशी हथियार प्रणालियों से लैस है। इसमें डीआरडीओ की बनाई अस्त्रा मिसाइल, रुद्रम मिसाइल और अन्य स्वदेशी हथियारों को इंटीग्रेट किया जा रहा है। इससे वायुसेना की “बियॉन्ड विजुअल रेंज” क्षमता और दुश्मन के एयर डिफेंस पर हावी होने की क्षमता और बढ़ जाएगी।

सितंबर के आखिर में वायुसेना से मिग-21 की अंतिम दो स्क्वाड्रन रिटायर हो जाएंगी। ऐसे में तेजस एमके-1ए को जल्दी से जल्दी इंडक्शन करना बेहद जरूरी है। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह पहले ही कह चुके हैं कि फोर्स को हर साल 35 से 40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। अभी वायुसेना के पास केवल 31 स्क्वाड्रन हैं और मिग-21 की विदाई के बाद यह संख्या 29 रह जाएगी। जबकि “सैंक्शनड स्ट्रेंथ” 42 स्क्वाड्रन मानी जाती है।

तेजस एमके-1ए की देरी से वायुसेना की “नंबर गैप” समस्या और गंभीर हो रही है। हालांकि, अक्टूबर तक वायुसेना को दो तेजस एमके-1ए विमानों की डिलीवरी होने की संभावना है। एचएएल का कहना है कि इसी महीने इन विमानों के फायरिंग ट्रायल पूरे कर लिए जाएंगे, जिनमें अस्त्रा, ASRAAM और लेजर गाइडेड बम शामिल होंगे। सफल परीक्षणों के बाद विमान वायुसेना को सौंप दिए जाएंगे।

इसी बीच एचएएल और जीई के बीच 113 अतिरिक्त इंजनों की खरीद का एक और सौदा लगभग तैयार है। यह सौदा हाल ही में मंजूर किए गए 97 नए तेजस विमानों के लिए होगा। करीब 1 बिलियन डॉलर की यह डील भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगी।

तेजस एमके-1ए के अलावा एचएएल और जीई के बीच जीई-414 इंजन के संयुक्त उत्पादन पर भी बातचीत चल रही है। यह इंजन तेजस एमके-2 कार्यक्रम में इस्तेमाल होगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत को 80 फीसदी तक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में इस प्रोजेक्ट को “मेक इन इंडिया डिफेंस सेक्टर” की दिशा में बड़ा कदम बताया था।

तेजस एमके-1ए को वायुसेना में शामिल करने का सबसे बड़ा मकसद पुराने मिग-21 विमानों को रिप्लेस करना है। 1960 के दशक से सेवा में रहे मिग-21 अब रिटायरमेंट की कगार पर हैं। उनकी जगह तेजस एमके-1ए को मिलनी है। इंजन सप्लाई और उत्पादन क्षमता बढ़ने से यह प्रक्रिया तेज होगी।

Safran-DRDO Jet Engine India: डीआरडीओ और फ्रांस की सफरान मिल कर बनाएंगे AMCA का इंजन, लेकिन क्या वाकई होगा 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर?

Safran-DRDO Jet Engine India Deal for AMCA, 100% Technology Transfer

Safran-DRDO Jet Engine India: भारत ने अपने पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का जेट इंजन बनाने के लिए फ्रांस की कंपनी के साथ समझौता किया है। यह समझौता भारत के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन और फ्रांस की सफरान के बीच हुआ है। इस समझौते के तहत भारत को पहली बार पूर्ण रूप से जेट इंजन की टेक्नोलॉजी मिलेगी। यह भारत का पहला 100 फीसदी स्वदेशी जेट इंजन होगा जिसे यहीं बनाया जाएगा। वहीं, यह साझेदारी भारत को उस कैटेगरी में ला सकती है, जहां आज तक केवल कुछ ही देश हैं, जिनके पास अपने लड़ाकू विमानों के लिए पूर्ण इंजन बनाने की क्षमता है।

AMCA jet engine: भारत-फ्रांस मिलकर बनाएंगे पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी इंजन, राजनाथ सिंह किया बड़ा एलान, राफेल बनाने वाली कंपनी सफरान के साथ होगी साझेदारी

खास बात यह होगी कि पहली बार देश को जेट इंजन बनाने की पूरी तकनीक यानी 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिलने की संभावना है। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी सफरान (Safran) और भारत की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन की विंग गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE) मिलकर एक नया हाई-थ्रस्ट जेट इंजन डेवलप करेंगे, जो भविष्य के भारतीय लड़ाकू विमान एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) को पावर देगा।

Safran-DRDO Jet Engine India: 100% ToT की पेशकश

इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि फ्रांस ने भारत को 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण क्रिस्टल ब्लेड टेक्नोलॉजी (Crystal Blade Technology) भी शामिल है। यह टेक्नोलॉजी जेट इंजन का सबसे संवेदनशील और अत्याधुनिक हिस्सा है। सामान्यत: कोई भी देश इसे साझा नहीं करता।

क्रिस्टल ब्लेड्स खास धातुओं सुपर-अलॉय से बनाए जाते हैं और उन्हें इस तरह से ढाला जाता है कि वे बेहद उच्च तापमान और दबाव में भी बिना टूटे लंबे समय तक काम कर सकें। यह तकनीक इंजन की विश्वसनीयता, कार्यक्षमता और लाइफ साइकिल को बढ़ाती है। अब तक यह तकनीक केवल कुछ ही देशों के पास थी। डीआरडीओ के पास भी इस दिशा में रिसर्च मौजूद है, लेकिन हाई-थ्रस्ट फाइटर इंजन के स्तर पर इसे आकार देना एक बहुत बड़ी चुनौती रही है।

Safran-DRDO Jet Engine India: AMCA के लिए गेम चेंजर इंजन

इस नए इंजन का इस्तेमाल भारतीय वायुसेना के AMCA प्रोग्राम में होगा, जो एक डबल-इंजन स्टील्थ मल्टी-रोल फाइटर विमान होगा। यह नया इंजन 120 किलो न्यूटन (KN) की क्षमता वाला होगा और भविष्य में इसे 140 KN तक अपग्रेड किया जा सकेगा। इससे भारत का AMCA, जो 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ मल्टी-रोल फाइटर जेट है, पूरी तरह स्वदेशी इंजन पर उड़ सकेगा।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि यह परियोजना लगभग 12 साल में पूरी होगी, जिसमें 9 प्रोटोटाइप इंजन तैयार किए जाएंगे। इसके बाद इन्हें टेस्टिंग और प्रोडक्शन की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा। इंजन को भारत में ही भारतीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के तहत डेवलप किया जाएगा और सफरान अपनी पूरी तकनीक भारत को सौंपेगा। इस विमान के निर्माण में निजी क्षेत्र भी शामिल होगा, जिसमें टाटा ग्रुप, एल एंड टी और अडानी डिफेंस जैसी कंपनियां भी शामिल होंगी।

Safran-DRDO Jet Engine India: पीएम मोदी ने किया था एलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में लाल किले के प्राचीर से जेट इंजन के स्वदेशी विकास पर जोर दिया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी संकेत दिए थे कि भारत जल्द ही लड़ाकू विमानों के इंजन विकसित करने का कार्य शुरू करेगा। इस समझौते को अमलीजामा पहनाने में पिछले दो साल से काम चल रहा था, लेकिन अब मोदी सरकार ने डीआरडीओ को प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है जिसे शीर्ष स्तर पर हरी झंडी मिलने की उम्मीद है।

Safran-DRDO Jet Engine India: फेल हुआ कावेरी

हालांकि भारत पहले भी जेट इंजन बनाने की कोशिश कर चुका है। डीआरडीओ के कावेरी इंजन (Kaveri Engine Project) पर सालों तक काम हुआ लेकिन यह परियोजना कभी सफल नहीं हो पाई। इसका मुख्य कारण था उच्च तापमान सहन करने की तकनीक की कमी। अब फ्रांस की मदद से भारत को यह तकनीक मिलेगी और वह अपनी विफलताओं को पीछे छोड़कर भविष्य की दिशा में बड़ा कदम रख सकेगा।

Safran-DRDO Jet Engine India: कौन-कौन से देश बना पाए अपने इंजन

यह कदम भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज दुनिया में सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ही ऐसे देश हैं जिनके पास अपने लड़ाकू विमानों के लिए इंजन बनाने की क्षमता है। चीन अभी भी रूस के इंजन या उनकी नकल (रिवर्स इंजीनियरिंग) पर निर्भर है।

वर्तमान में भारत अपने लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी कंपनी जीई से इंजन आयात कर रहा है। तेजस लड़ाकू विमानों के लिए 212 F-404 इंजन मंगाए गए हैं और जल्द ही 113 और इंजनों के लिए समझौता होने वाला है। इसके अलावा भारत GE F-414 इंजन भी ले रहा है, लेकिन इसमें तकनीक ट्रांसफर केवल 80 फीसदी तक सीमित है।

Safran-DRDO Jet Engine India: फ्रांस भरोसेमंद साझेदार

सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी प्रस्तावों अक्सर कई शर्तें होती हैं। जो कई बार स्ट्रैटेजिक तौर पर नुकसानदेह होती हैं और भारत की संप्रभुता के साथ समझौता नहीं किया दा सकता। इसके उलट, फ्रांस भारत का भरोसेमंद साझेदार रहा है। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भी फ्रांस ने भारत पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था और भारतीय मिसाइलों के लिए अत्याधुनिक INGPS सिस्टम और मिराज 2000 विमानों के लिए आवश्यक पार्ट्स की सप्लाई जारी रखी थी। यही कारण है कि भारत इस बार फ्रांस पर भरोसा कर रहा है।

Safran-DRDO Jet Engine India: भारतीय वायुसेना के पास 36 राफेल विमान

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास 36 राफेल विमान हैं, जिन्हें 73 KN M-88 स्नेमा इंजन पावर देता है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि भारत दसॉ एविएशन से 114 और मल्टी-रोल फाइटर भारत में बनाने पर विचार कर रहा है। वहीं,
सफरान और डीआरडीओ के 120-140 KN का इंजन आने वाले दशकों में भारतीय वायुसेना के सबसे अहम प्लेटफॉर्म को पावर देगा। इसके जरिए वायुसेना न सिर्फ AMCA बल्कि नौसेना के ट्विन-इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) को भी मजबूती दे सकेगी।

रूस ने भी नहीं दी थी पूरी टेक्नोलॉजी

कई देशों ने भारत को जेट इंजन तकनीक साझा करने या लाइसेंस प्राप्त उत्पादन की अनुमति तो दी, लेकिन कभी भी 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश नहीं की। रूस ने सुखोई Su-30 MKI के लिए AL-31FP इंजन की टेक्नोलॉजी का आंशिक तौर पर ट्रांसफर की थी। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को कोरापुट, ओडिशा में इन इंजनों के उत्पादन का लाइसेंस मिला था। हालांकि, यह केवल असेंबली और कुछ हिस्सों तक सीमित रहा, जबकि डिजाइन, मैटेरियल साइंस और सिंगल-क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड जैसी कोर टेकनोलॉजी रूस ने अपने पास रखी थी।

इससे पहले फ्रांस की सफरान ने मिराज 2000 के लिए Snecma M53 इंजन की कुछ तकनीकी जानकारी और मेंटेनेंस सपोर्ट दिया था। हालांकि, यह भी पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं था, बल्कि ऑपरेशनल और मेंटेनेंस स्तर तक सीमित था।

वहीं, ब्रिटेन ने भी 1960 और 70 के दशक में रोल्स-रॉयस इंजनों की टेक्नोलॉजी भारत के साथ साझा की थी। उस समय HS-748 और जगुआर विमानों के लिए Adour इंजन का लाइसेंस प्राप्त निर्माण हुआ। लेकिन यहां भी टेक्नोलॉजी केवल प्रोडक्शन और मेंटेनेंस तक सीमित रही, जबकि इंजन डिजाइन और कोर टेक्नोलॉजी पूरी तरह से भारत को नहीं मिली थी।

अमेरिका ने भारत को लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एलसीए तेजस के लिए GE F404 इंजन दिया। बाद में F414 इंजन के लिए करीब 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश की गई, जो एलसीए Mk2 और AMCA के लिए प्रस्तावित हैं। लेकिन इसमें भी थर्मल कोटिंग और ब्लेड मशीनिंग जैसी कुछ अहम तकनीकें साझा नहीं की गईं हैं।

बाकी देशों को भी नहीं मिली टेक्नोलॉजी

जेट इंजन की पूरी टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर डिफेंस सेक्टर का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। दुनिया में अब तक ऐसे बहुत ही कम उदाहरण सामने आए हैं जहां किसी देश ने किसी अन्य देश को जेट इंजन की पूरी टेक्नोलॉजी डिजाइन, मैटेरियल साइंस, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रायल्स समेत पूरी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की हो। यही वजह है कि भारत को हाल ही में फ्रांस से मिली 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश को दुनियाभर में एक अपवाद के तौर पर देखा जा रहा है।

इतिहास पर नजर डालें तो चीन और रूस का उदाहरण सबसे प्रमुख हैं। रूस ने चीन को सुखोई Su-27 और Su-30 विमानों के लिए AL-31F इंजन की सप्लाई की थी और साथ ही लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन की अनुमति भी दी थी। चीन की शेनयांग कंपनी ने इन इंजनों का स्थानीय निर्माण शुरू किया और बाद में इन्हीं के आधार पर WS-10 ताइहांग इंजन डेवलप किया। हालांकि, रूस ने चीन को इंजन के कोर डिजाइन और सिंगल-क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड जैसी महत्वपूर्ण तकनीक नहीं दी। चीन ने रिवर्स इंजीनियरिंग और अपनी रिसर्च के जरिए यह क्षमता हासिल की, लेकिन रूस ने उस पर टेक्नोलॉजी की नकल करने का आरोप भी लगाया था।

दूसरा उदाहरण अमेरिका और जापान का है। अमेरिका ने जापान को F-15J और F-2 लड़ाकू विमानों के लिए प्रैट एंड व्हिटनी F100 और GE F110 इंजनों का लाइसेंस प्राप्त प्रोडक्शन करने की इजाजत दी थी। जापान की कंपनी IHI ने इन इंजनों का निर्माण किया। हालांकि, यहां भी मामला आंशिक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तक सीमित रहा। इंजन असेंबली और कुछ सिस्टम के निर्माण की अनुमति तो मिली, लेकिन कोर डिजाइन और एडवांस मेटल अलॉयज और कोटिंग्स की टेक्नोलॉजी साझा नहीं की गई। जापान ने बाद में XF9-1 नामक स्वदेशी इंजन बनाने की कोशिश भी की थी।

दक्षिण कोरिया का अनुभव भी अलग नहीं रहा। अमेरिका ने वहां T-50 गोल्डन ईगल ट्रेनर विमान के लिए GE F404 इंजन की लाइसेंस प्राप्त निर्माण तकनीक दी। सैमसंग टेकविन (जो अब हनवा एयरोस्पेस है) ने इन इंजनों का निर्माण किया। लेकिन कोर डिजाइन और एडवांस टेक्नोलॉजी वहां भी साझा नहीं की गई। नतीजा यह रहा कि दक्षिण कोरिया अभी भी एडवांस जेट इंजनों के लिए अमेरिका पर निर्भर है।

फ्रांस ने भी अपने राफेल विमानों में इस्तेमाल होने वाले Snecma M88 इंजन की पूरी तकनीक किसी भी देश के साथ साझा नहीं की। यूएई और कतर जैसे सहयोगी देशों के साथ केवल ऑपरेशनल सपोर्ट और मेंटेनेंस स्तर का सहयोग किया गया, लेकिन पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं की।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक किसी भी देश ने जेट इंजन की सौ फीसदी तकनीक किसी अन्य देश को नहीं दी। कारण साफ है कि यह तकनीक न सिर्फ सैन्य बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। इसे साझा करने से किसी देश का तकनीकी वर्चस्व और प्रतिस्पर्धी लाभ कमजोर हो सकता है। यही वजह है कि ज़्यादातर मामलों में केवल आंशिक ट्रांसफर, लाइसेंस प्राप्त उत्पादन या मेंटेनेंस स्तर की जानकारी ही साझा की जाती है।

चीन जैसे देशों ने रिवर्स इंजीनियरिंग और स्वदेशी अनुसंधान के जरिए अपनी क्षमता बढ़ाई, लेकिन यह भी पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का उदाहरण नहीं माना जा सकता। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अब भी अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। फ्रांस और रूस ने भी कोर डिजाइन और मटेरियल साइंस की जानकारी साझा करने से हमेशा परहेज किया है।

भारत के लिए फ्रांस की सफरान कंपनी का AMCA प्रोजेक्ट के तहत 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रस्ताव इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह दुनिया के उन चुनिंदा मामलों में शामिल होगा जहां एक देश को इंजन डिजाइन, मैटेरियल साइंस, निर्माण और परीक्षण तक की पूरी जानकारी मिलेगी।

Tethered Surveillance Drones: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना को चाहिए ये खास ड्रोन, जो 9 घंटे तक लगातार रखें दुश्मन पर नजर

Indian Army Drone Warrior
Indian Army Drone Warrior

Tethered Surveillance Drones: पाकिस्तान के खिलाफ हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सेना की रणनीतिक सोच को नई दिशा दी है। इस ऑपरेशन में दोनों देशों की सेनाओं ने बड़ी संख्या में UAV ड्रोनों का इस्तेमाल किया। अब भारतीय सेना ने फैसला किया है कि वह करीब 5000 टेदर्ड ड्रोन सिस्टम खरीदेगी। इन ड्रोन का इस्तेमाल मैदानों, रेगिस्तानों और ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में निगरानी के लिए किया जाएगा।

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सेना ने हाल ही में इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इनफॉरमेशन (RFI) जारी की है। इसमें साफ कहा गया है कि 5000 ड्रोन सिस्टम्स की सप्लाई 24 महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए। सेना की आवश्यकताओं के मुताबिक, ये ड्रोन सिस्टम दिन-रात के अलावा सभी तरह के मौसम में काम करने में सक्षम होने चाहिए। इन्हें 75 प्रतिशत तक की नमी, 35 किमी/घंटा की हवा की रफ्तार और 500 मीटर तक की दृश्यता वाले माहौल के साथ ही हल्की बारिश और बर्फबारी में भी ऑपरेशनल रहना होगा।

क्या हैं Tethered Surveillance Drones?

टेदर्ड ड्रोन यानी बंधा हुआ ड्रोन सिस्टम एक ऐसा निगरानी उपकरण है, जिसमें ड्रोन को जमीन पर स्थित एक टेदर स्टेशन (Ground-based Tether Station) से जोड़ा जाता है। इससे ड्रोन लंबे समय तक हवा में रहकर टारगेट पर नजर रख सकता है। जरूरत पड़ने पर ये ड्रोन अनटेदर्ड मोड (बिना रस्सी/केबल) में भी उड़ सकता है। इस स्थिति में यह और ऊंचाई तक जाकर इलाके की निगरानी करता है और इंटेलिजेंस इनपुट को कन्फर्म करता है।

भारतीय सेना ने साफ किया है कि ये ड्रोन मेक-इन-इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत बनाए जाएंगे। सेना का कहना है कि इनसे महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास निरंतर निगरानी और जानकारी इकट्ठा करने की क्षमता बढ़ेगी। खासकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ये सेना की आंख और कान बनेंगे।

Tethered Surveillance Drones: क्या हों खूबियां

सेना की तरफ से जारी RFI के अनुसार इन ड्रोन का डिजाइन मॉड्यूलर होना चाहिए। इसका मतलब है कि भविष्य में नई टेक्नोलॉजी आने पर इन ड्रोन को बिना इसके स्ट्रक्चर में बदलाव किए अपग्रेड किया जा सकेगा। यह सेना के लिए बेहद फायदेमंद होगा क्योंकि समय के साथ बदलती जरूरतों और आधुनिक टेक्नोलॉजी के हिसाब से इन्हें लगातार अपग्रेड किया जा सकेगा।

इन ड्रोन की उड़ान क्षमता भी खास है। टेदर्ड मोड में ये कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई तक हवा में स्थिर रहकर निगरानी कर सकेंगे। वहीं, अनटेदर्ड मोड में यह 1000 मीटर यानी लगभग 1 किलोमीटर या उससे भी ज्यादा ऊंचाई तक उड़ान भर पाएंगे। इससे सेना को जमीन से दूर तक की तस्वीर साफ मिल सकेगी।

समय की क्षमता की बात करें तो टेदर्ड मोड में ये ड्रोन लगातार 9 घंटे तक आसमान में बने रह सकते हैं। वहीं, अनटेदर्ड मोड में भी ये कम से कम 60 मिनट तक निगरानी करने में सक्षम होंगे। इतनी देर तक हवा में बने रहने से सेना को दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने में मदद मिलेगी।

इन ड्रोन की एक और अहम बात यह है कि इन्हें ऑपरेट करने के लिए किसी बड़े स्टाफ की जरूरत नहीं होगी। सिर्फ एक ऑपरेटर इन्हें कंट्रोल कर सकता है। साथ ही, इनका मिशन रेंज भी जबरदस्त है। अनटेदर्ड मोड में ये ड्रोन 10 किलोमीटर तक एक तरफ जाकर निगरानी कर सकते हैं, जो सेना के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।

ये ड्रोन -10 डिग्री से लेकर 45–50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होंगे। ऊंचाई वाले इलाकों में, जहां मौसम बेहद कठिन होता है, वहां भी इनका इस्तेमाल संभव होगा।

Tethered Surveillance Drones: इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से सुरक्षा

सेना ने खास तौर पर यह भी कहा है कि ड्रोन में काउंटर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर कैपेबिलिटी होनी चाहिए। यानी दुश्मन अगर ड्रोन को हैक करने या उसकी लोकेशन ब्लॉक करने की कोशिश करे, तो ये सिस्टम उसे नाकाम कर सके। इसके साथ ही ये जीपीएस, सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम और डिजिटल मैप्स के साथ कॉम्पैटिबल होने चाहिए।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने यह महसूस किया कि दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखने के लिए ज्यादा एडवांस और लंबे समय तक चलने वाले ड्रोन जरूरी हैं। पाकिस्तान ने भी उस समय अपने यूएवी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। इसके बाद सेना ने तय किया कि भविष्य की लड़ाइयों में लगातार निगरानी को प्राथमिकता दी जाएगी।

Tethered Surveillance Drones: कब तक मिलेंगे ड्रोन?

RFI के अनुसार, जो भी कंपनियां इन ड्रोन को बनाकर सेना को सप्लाई करना चाहती हैं, उन्हें 2 नवंबर 2025 तक अपने प्रस्ताव जमा करने होंगे। सेना चाहती है कि अगले दो सालों के भीतर ये सभी 5000 सिस्टम्स उसकी यूनिट्स तक पहुंच जाएं।

Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत? बालेन शाह और सुदन गुरुंग का भारत विरोधी एजेंडा

Nepal Regime Change: Nepal GenZ Protest Balen Shah, US Role & Regime Change, Donald Lu Connection Explained
Donald Lu, Sudan Gurang and Balen Shah

Nepal Regime Change: नेपाल की राजधानी काठमांडू की सड़कों पर जमकर हिंसा हुई है। संसद भवन जलकर खाक हो गया है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को इस्तीफा देना पड़ा है। देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी अब सेना के हाथों में है। यह सब कुछ एक ऐसे आंदोलन के बाद हुआ है जिसे ‘जेन जेड’ यानी युवाओं का आंदोलन बताया जा रहा था। लेकिन अब इस आंदोलन के पीछे छिपे हाथों और अंतरराष्ट्रीय साजिश के सबूत सामने आ रहे हैं।

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Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 5 सितंबर 2025 को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था, “लगता है हमने भारत और रूस को सबसे गहरे, सबसे काले चीन के हवाले कर दिया है। काश वे साथ में लंबा और समृद्ध भविष्य रखें!” यह बयान उस समय आया जब नेपाल में जेनजेड आंदोलन तेज हो रहा था। ट्रंप के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने एक सुनियोजित संकेत के रूप में देखा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान नेपाल में हो रहे उथल-पुथल से सीधे जुड़ा हुआ है। ट्रंप ने जानबूझकर भारत, रूस और चीन के बीच बढ़ते सहयोग पर चिंता व्यक्त की थी। नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित एक रणनीतिक तौर महत्वपूर्ण देश है। एक अस्थिर नेपाल भारत और चीन दोनों के लिए सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकता है। ट्रंप के इस बयान के अगले ही दिन नेपाल में हिंसक प्रदर्शन तेज हो गए थे, जिससे सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है जिसमें वह दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं।

Nepal Regime Change: आंदोलन का मास्टरमाइंड?

वहीं, इस पूरे प्रदर्शन के पीछे दो चेहरे सबसे आगे नजर आए। पहला है काठमांडू के मेयर बालेन शाह और दूसरा है एक गैर-सरकारी संगठन ‘हामी नेपाल’ के संस्थापक सुदन गुरुंग। ये दोनों ही शख्सियतें अचानक से चर्चा में आई हैं। बालेन शाह को प्रदर्शनकारी अगला प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं तो सुदन गुरुंग को इस आंदोलन का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है।

35 वर्षीय बालेन मई 2022 से काठमांडू के 15वें मेयर है। उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के यह पद संभालने वाले पहले व्यक्ति बने। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए इस आंदोलन को समर्थन दिया। उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर युवाओं को सरकार के खिलाफ उतरने के लिए उकसाया। उनके इस पोस्ट के बाद ही नेपाल के सात से ज्यादा शहरों में युवा सड़कों पर उतर आए। शुरुआत सोशल मीडिया ऐप पर बैन के विरोध में हुई थी, लेकिन जल्द ही यह प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया।

Nepal Regime Change: अमेरिका से बालेन का कनेक्शन

बालेन शाह का अमेरिका से सीधा कनेक्शन भी सामने आया है। वह अमेरिकी राजदूत डीन आर थॉम्पसन से कई बार मिल चुके हैं। साल 2022 में हुई उनकी पहली मुलाकात की तस्वीरें खुद अमेरिकी राजदूत ने सोशल मीडिया पर साझा की थीं। साल 2023 में अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ ने बालेन शाह को दुनिया के टॉप 100 उभरते हुए नेताओं की सूची में शामिल किया था। इसके अलावा ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे प्रकाशनों में भी उन पर लेख छप चुके हैं।

Nepal Regime Change: कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा

शिक्षा से इंजीनियर बालेन ने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की है और उनका भारत से सीधा संबंध रहा है। उन्होंने कर्नाटक की विश्वेश्वरय्या टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। बालेन शाह के भारत-विरोधी रुख पर भी चर्चा हो रही है। साल 2023 में बालेंद्र शाह ने भारत की नई संसद भवन में ‘अखंड भारत’ के नक्शे के जवाब में अपने कार्यालय में अपने कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया। इस नक्शे में उन्होंने भारत के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के कुछ हिस्सों को नेपाल का अंग बताया।

साल 2023 में उन्होंने प्रभास की फिल्म ‘आदिपुरुष’ में एक संवाद का विरोध करते हुए नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारतीय बॉलीवुड फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी दी थी। उनका तर्क था कि फिल्म में यह संवाद कि ‘सीता भारत की बेटी हैं’ नेपाल की सांस्कृतिक संप्रभुता का उल्लंघन है। हालांकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें यह प्रतिबंध हटाना पड़ा था। उन्होंने नेपाली संस्थानों पर “भारतीय गुलाम” होने का आरोप लगाया। वे नेपाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं, इसलिए उन्हें आमतौर पर भारत-समर्थक नहीं माना जाता।

Nepal Regime Change: सुदन गुरुंग की फंडिंग का खुलासा

दूसरी तरफ सुदन गुरुंग हैं, जो ‘हामी नेपाल’ नाम के एनजीओ का नेतृत्व करते हैं। इसी एनजीओ ने नेपाल में युवाओं को इकट्ठा करने और प्रदर्शन करने का काम किया। सुदन गुरुंग ने इंस्टाग्राम पर ‘हाउ टू प्रोटेस्ट’ यानी ‘कैसे प्रदर्शन करें’ नाम से वीडियो शेयर किए और युवाओं को भड़काया। उनके एनजीओ को कोका-कोला, वाइबर और गोल्डस्टार जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से बीस करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं और इस फंडिंग ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या यह आंदोलन वास्तव में युवाओं का उबााल था या इसे अंतरराष्ट्रीय ताकतों द्वारा प्रायोजित किया गया था।

लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि संगठन को विवादास्पद व्यवसायियों का भी खुला समर्थन मिला। इनमें दीपक भट्टा जैसे अंतरराष्ट्रीय हथियार डीलर शामिल हैं, जिन पर इतालवी कंपनी के साथ बंदूक खरीद सौदे में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इसी तरह शंकर ग्रुप से जुड़े साहिल अग्रवाल भी इस संगठन को फंड कर रहे हैं, जिन पर COVID-19 महामारी के दौरान ब्लैक मार्केट में थर्मामीटर गन बेचने के आरोप में गिरफ्तारी तक हुई थी।

इन सबके अलावा, ‘हामी नेपाल’ को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से जुड़े फंड भी मिले हैं। सीआईए द्वारा स्थापित मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सांदुक रूत जैसे लोग इस संगठन को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि USAID और NED (नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी) जैसी अमेरिकी एजेंसियों से भी अप्रत्यक्ष फंडिंग के स्पष्ट संकेत मिले हैं। इन एजेंसियों ने “लोकतंत्र को बढ़ावा देने” और “युवा सशक्तिकरण” के नाम पर इस संगठन को भारी मात्रा में धन उपलब्ध कराया है।

Nepal Regime Change: भारत विरोधी है गुरुंग?

सुदन गुरुंग का एनजीओ पहले भी भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा है। साल 2025 की शुरुआत में जब भारत के ओडिशा में एक नेपाली छात्रा की मौत हुई थी, तब ‘हामी नेपाल’ ने नेपाल में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम किया था। उन्होंने भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन किए और भारत सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक नारेबाजी की।

Nepal Regime Change: पेट्रोल बम बनाने के तरीके बताए

नेपाल की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को जमीन पर उतारने और हिंसा भड़काने का काम डिस्कोर्ड और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर किया गया। इन ग्रुप्स में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से कहा गया कि वे ‘हत्यारा सरकार’ लिखी हुई डीपी लगाएं। नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को ‘शार्प शूटर’ बताकर शेयर किया गया। इन ग्रुप चैट में हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं।

डोनाल्ड लू का नेपाल कनेक्शन

इस पूरे घटनाक्रम में एक और नाम चर्चा में है, वह है अमेरिकी राजदूत डोनाल्ड लू का। डोनाल्ड लू अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण एशियाई मामलों के सहायक मंत्री हैं। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वह दक्षिण एशिया के देशों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सरकार बदलवाने की साजिश में शामिल हैं। पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने में भी उनकी भूमिका की बात कही जाती है।

डोनाल्ड लू ने पिछले साल दिसंबर में नेपाल का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने नेपाल सरकार के साथ एमसीसी (मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन) समझौते को आगे बढ़ाया था। यह समझौता नेपाल में लंबे समय से विवादों में रहा है। आलोचकों का मानना है कि यह समझौता नेपाल की संप्रभुता के खिलाफ है।

नेपाल में हुए इन हिंसक प्रदर्शनों ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। नेपाल भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। नेपाल में अशांति का सीधा असर भारत की सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल में शांति बहाली की अपील की है। उन्होंने कहा कि नेपाल की स्थिरता और शांति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

नेपाली सेना ने अब देश में कर्फ्यू लगा दिया है और स्थिति को नियंत्रण में लाने का प्रयास कर रही है। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल ने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। हालांकि, अभी तक स्थिति पूरी तरह से शांत नहीं हुई है। नेपाल के इतिहास में यह एक अहम मोड़ है, जहां युवाओं के आंदोलन ने एक सरकार को गिरा दिया, लेकिन इसके पीछे की अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।