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Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत? बालेन शाह और सुदन गुरुंग का भारत विरोधी एजेंडा

Nepal Regime Change: Nepal GenZ Protest Balen Shah, US Role & Regime Change, Donald Lu Connection Explained
Donald Lu, Sudan Gurang and Balen Shah

Nepal Regime Change: नेपाल की राजधानी काठमांडू की सड़कों पर जमकर हिंसा हुई है। संसद भवन जलकर खाक हो गया है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को इस्तीफा देना पड़ा है। देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी अब सेना के हाथों में है। यह सब कुछ एक ऐसे आंदोलन के बाद हुआ है जिसे ‘जेन जेड’ यानी युवाओं का आंदोलन बताया जा रहा था। लेकिन अब इस आंदोलन के पीछे छिपे हाथों और अंतरराष्ट्रीय साजिश के सबूत सामने आ रहे हैं।

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Nepal Regime Change: क्या ट्रंप ने पहले ही दे दिए थे संकेत?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 5 सितंबर 2025 को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था, “लगता है हमने भारत और रूस को सबसे गहरे, सबसे काले चीन के हवाले कर दिया है। काश वे साथ में लंबा और समृद्ध भविष्य रखें!” यह बयान उस समय आया जब नेपाल में जेनजेड आंदोलन तेज हो रहा था। ट्रंप के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने एक सुनियोजित संकेत के रूप में देखा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान नेपाल में हो रहे उथल-पुथल से सीधे जुड़ा हुआ है। ट्रंप ने जानबूझकर भारत, रूस और चीन के बीच बढ़ते सहयोग पर चिंता व्यक्त की थी। नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित एक रणनीतिक तौर महत्वपूर्ण देश है। एक अस्थिर नेपाल भारत और चीन दोनों के लिए सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकता है। ट्रंप के इस बयान के अगले ही दिन नेपाल में हिंसक प्रदर्शन तेज हो गए थे, जिससे सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है जिसमें वह दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं।

Nepal Regime Change: आंदोलन का मास्टरमाइंड?

वहीं, इस पूरे प्रदर्शन के पीछे दो चेहरे सबसे आगे नजर आए। पहला है काठमांडू के मेयर बालेन शाह और दूसरा है एक गैर-सरकारी संगठन ‘हामी नेपाल’ के संस्थापक सुदन गुरुंग। ये दोनों ही शख्सियतें अचानक से चर्चा में आई हैं। बालेन शाह को प्रदर्शनकारी अगला प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं तो सुदन गुरुंग को इस आंदोलन का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है।

35 वर्षीय बालेन मई 2022 से काठमांडू के 15वें मेयर है। उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता और बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के यह पद संभालने वाले पहले व्यक्ति बने। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए इस आंदोलन को समर्थन दिया। उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर युवाओं को सरकार के खिलाफ उतरने के लिए उकसाया। उनके इस पोस्ट के बाद ही नेपाल के सात से ज्यादा शहरों में युवा सड़कों पर उतर आए। शुरुआत सोशल मीडिया ऐप पर बैन के विरोध में हुई थी, लेकिन जल्द ही यह प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया।

Nepal Regime Change: अमेरिका से बालेन का कनेक्शन

बालेन शाह का अमेरिका से सीधा कनेक्शन भी सामने आया है। वह अमेरिकी राजदूत डीन आर थॉम्पसन से कई बार मिल चुके हैं। साल 2022 में हुई उनकी पहली मुलाकात की तस्वीरें खुद अमेरिकी राजदूत ने सोशल मीडिया पर साझा की थीं। साल 2023 में अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ ने बालेन शाह को दुनिया के टॉप 100 उभरते हुए नेताओं की सूची में शामिल किया था। इसके अलावा ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे प्रकाशनों में भी उन पर लेख छप चुके हैं।

Nepal Regime Change: कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा

शिक्षा से इंजीनियर बालेन ने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की है और उनका भारत से सीधा संबंध रहा है। उन्होंने कर्नाटक की विश्वेश्वरय्या टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। बालेन शाह के भारत-विरोधी रुख पर भी चर्चा हो रही है। साल 2023 में बालेंद्र शाह ने भारत की नई संसद भवन में ‘अखंड भारत’ के नक्शे के जवाब में अपने कार्यालय में अपने कार्यालय में एक ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया। इस नक्शे में उन्होंने भारत के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के कुछ हिस्सों को नेपाल का अंग बताया।

साल 2023 में उन्होंने प्रभास की फिल्म ‘आदिपुरुष’ में एक संवाद का विरोध करते हुए नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारतीय बॉलीवुड फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी दी थी। उनका तर्क था कि फिल्म में यह संवाद कि ‘सीता भारत की बेटी हैं’ नेपाल की सांस्कृतिक संप्रभुता का उल्लंघन है। हालांकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें यह प्रतिबंध हटाना पड़ा था। उन्होंने नेपाली संस्थानों पर “भारतीय गुलाम” होने का आरोप लगाया। वे नेपाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं, इसलिए उन्हें आमतौर पर भारत-समर्थक नहीं माना जाता।

Nepal Regime Change: सुदन गुरुंग की फंडिंग का खुलासा

दूसरी तरफ सुदन गुरुंग हैं, जो ‘हामी नेपाल’ नाम के एनजीओ का नेतृत्व करते हैं। इसी एनजीओ ने नेपाल में युवाओं को इकट्ठा करने और प्रदर्शन करने का काम किया। सुदन गुरुंग ने इंस्टाग्राम पर ‘हाउ टू प्रोटेस्ट’ यानी ‘कैसे प्रदर्शन करें’ नाम से वीडियो शेयर किए और युवाओं को भड़काया। उनके एनजीओ को कोका-कोला, वाइबर और गोल्डस्टार जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से बीस करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं और इस फंडिंग ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या यह आंदोलन वास्तव में युवाओं का उबााल था या इसे अंतरराष्ट्रीय ताकतों द्वारा प्रायोजित किया गया था।

लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि संगठन को विवादास्पद व्यवसायियों का भी खुला समर्थन मिला। इनमें दीपक भट्टा जैसे अंतरराष्ट्रीय हथियार डीलर शामिल हैं, जिन पर इतालवी कंपनी के साथ बंदूक खरीद सौदे में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इसी तरह शंकर ग्रुप से जुड़े साहिल अग्रवाल भी इस संगठन को फंड कर रहे हैं, जिन पर COVID-19 महामारी के दौरान ब्लैक मार्केट में थर्मामीटर गन बेचने के आरोप में गिरफ्तारी तक हुई थी।

इन सबके अलावा, ‘हामी नेपाल’ को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से जुड़े फंड भी मिले हैं। सीआईए द्वारा स्थापित मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सांदुक रूत जैसे लोग इस संगठन को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि USAID और NED (नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी) जैसी अमेरिकी एजेंसियों से भी अप्रत्यक्ष फंडिंग के स्पष्ट संकेत मिले हैं। इन एजेंसियों ने “लोकतंत्र को बढ़ावा देने” और “युवा सशक्तिकरण” के नाम पर इस संगठन को भारी मात्रा में धन उपलब्ध कराया है।

Nepal Regime Change: भारत विरोधी है गुरुंग?

सुदन गुरुंग का एनजीओ पहले भी भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा है। साल 2025 की शुरुआत में जब भारत के ओडिशा में एक नेपाली छात्रा की मौत हुई थी, तब ‘हामी नेपाल’ ने नेपाल में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम किया था। उन्होंने भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन किए और भारत सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक नारेबाजी की।

Nepal Regime Change: पेट्रोल बम बनाने के तरीके बताए

नेपाल की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को जमीन पर उतारने और हिंसा भड़काने का काम डिस्कोर्ड और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर किया गया। इन ग्रुप्स में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से कहा गया कि वे ‘हत्यारा सरकार’ लिखी हुई डीपी लगाएं। नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को ‘शार्प शूटर’ बताकर शेयर किया गया। इन ग्रुप चैट में हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं।

डोनाल्ड लू का नेपाल कनेक्शन

इस पूरे घटनाक्रम में एक और नाम चर्चा में है, वह है अमेरिकी राजदूत डोनाल्ड लू का। डोनाल्ड लू अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण एशियाई मामलों के सहायक मंत्री हैं। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वह दक्षिण एशिया के देशों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सरकार बदलवाने की साजिश में शामिल हैं। पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने में भी उनकी भूमिका की बात कही जाती है।

डोनाल्ड लू ने पिछले साल दिसंबर में नेपाल का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने नेपाल सरकार के साथ एमसीसी (मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन) समझौते को आगे बढ़ाया था। यह समझौता नेपाल में लंबे समय से विवादों में रहा है। आलोचकों का मानना है कि यह समझौता नेपाल की संप्रभुता के खिलाफ है।

नेपाल में हुए इन हिंसक प्रदर्शनों ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। नेपाल भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। नेपाल में अशांति का सीधा असर भारत की सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल में शांति बहाली की अपील की है। उन्होंने कहा कि नेपाल की स्थिरता और शांति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

नेपाली सेना ने अब देश में कर्फ्यू लगा दिया है और स्थिति को नियंत्रण में लाने का प्रयास कर रही है। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल ने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। हालांकि, अभी तक स्थिति पूरी तरह से शांत नहीं हुई है। नेपाल के इतिहास में यह एक अहम मोड़ है, जहां युवाओं के आंदोलन ने एक सरकार को गिरा दिया, लेकिन इसके पीछे की अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने WhatsApp नहीं किया था इस्तेमाल, अपनाया था ये खास स्वदेशी फोन

SAMBHAV Phone Operation Sindoor

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ किए गए ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार पूरी तरह से अपनी स्वदेशी मोबाइल तकनीक SAMBHAV (Secure Army Mobile Bharat Version) का इस्तेमाल किया। यह खुलासा खुद सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने किया। उन्होंने कहा कि अब सेना इस सिस्टम को और अपग्रेड करने की तैयारी कर रही है।

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SAMBHAV Phone Operation Sindoor: WhatsApp और विदेशी ऐप्स पर लगी रोक

जनरल द्विवेदी ने ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन के 52वें नेशनल मैनेजमेंट कन्वेंशन में बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने व्हाट्सएप या अन्य विदेशी कम्युनिकेशन ऐप्स का इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय पूरी तरह से SAMBHAV फोन पर भरोसा किया गया, जो सेना के लिए सुरक्षित कमांड और कम्युनिकेशन चैनल साबित हुआ।

उन्होंने कहा, “हम स्पाइरल डेवलपमेंट ऑफ इक्विपमेंट के लिए तैयार हैं। संभव फोन ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हुआ। हम व्हाट्सएप और दूसरे ऐप्स पर निर्भर नहीं थे। अब इसे और अपग्रेड किया जा रहा है।”

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: व्होल-ऑफ-नेशन अप्रोच

जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर को केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी समन्वय का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा, “इस ऑपरेशन में सैनिकों से लेकर वैज्ञानिकों, कमांडरों से लेकर नीति निर्माताओं तक सभी का योगदान था। जरूरी कदम पहले से उठाए गए। इसे ‘व्होल-ऑफ-नेशन अप्रोच’ कहा जा सकता है।”

ऑपरेशन सिंदूर 6-7 मई की रात को तब शुरू हुआ जब 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान गई थी। भारतीय सेना ने 7 से 10 मई तक पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी कैंपों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस दौरान 9 आतंकी कैंप ध्वस्त किए गए और 13 से अधिक पाकिस्तानी एयरबेस व मिलिट्री इंस्टॉलेशन पर हमले किए गए।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: क्या है संभव फोन

संभव को जनवरी 2024 में औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया था। इसे आत्मनिर्भर भारत के तहत डेवलप किया गया था। इसका मकसद था सेना के लिए एक ऐसा मोबाइल सिस्टम देना, जो पूरी तरह से सुरक्षित, एन्क्रिप्टेड और नेटवर्क एग्नोस्टिक हो।

यह 5G तकनीक पर आधारित है और इसमें मल्टी-लेयर्ड एन्क्रिप्शन है। इससे अधिकारी चलते-फिरते भी सुरक्षित रूप से बातचीत कर सकते हैं और जरूरी दस्तावेज, फोटो व वीडियो साझा कर सकते हैं।

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: व्हाट्सएप का भारतीय विकल्प: M-Sigma

संभव फोन में एक खास एप्लिकेशन है M-Sigma, जिसे व्हाट्सएप का भारतीय विकल्प कहा जा सकता है। यह सुरक्षित मैसेजिंग और डाक्यूमेंट शेयरिंग के लिए बनाया गया है। M-Sigma के जरिए अधिकारी फोटो, वीडियो, और संवेदनशील दस्तावेज बिना किसी लीक के साझा कर सकते हैं।

एक रक्षा अधिकारी ने बताया, “मोबाइल नेटवर्क अक्सर ईव्सड्रॉपिंग (जासूसी) के खतरे में रहते हैं। ऐसे में सेना को संभव जैसे सुरक्षित मोबाइल इकोसिस्टम की जरूरत थी, ताकि सैनिक और अधिकारी किसी भी स्थिति में बिना रिस्क के बातचीत कर सकें।”

SAMBHAV Phone Operation Sindoor: 30,000 से ज्यादा डिवाइस सेना को मिले

संभव परियोजना की शुरुआत पिछले साल हुई थी। अब तक लगभग 30,000 डिवाइस सेना के अधिकारियों को दिए जा चुके हैं। इन्हें खासतौर पर युद्ध क्षेत्र और सीक्रेट बातचीत के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस सिस्टम को भारतीय उद्योग और शिक्षण संस्थानों की मदद से डेवलप किया गया है। इसमें इंडिजिनस पब्लिक सेल्युलर नेटवर्क का इस्तेमाल होता है।

चीन से बातचीत में भी इस्तेमाल

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, संभव फोन का इस्तेमाल सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर में ही नहीं, बल्कि चीन के साथ सैन्य वार्ता में भी किया गया। अक्टूबर 2024 की आखिरी राउंड की मीटिंग में भारतीय अधिकारियों ने इसी सुरक्षित हैंडसेट से संवाद किया।

इससे यह साफ है कि संभव अब केवल सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं, बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक बातचीत में भी अहम भूमिका निभा रहा है।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि भारतीय सेना अब तकनीक को लगातार अपग्रेड करने पर जोर दे रही है। उनका कहना था –
“आज अगर हमें 100 किलोमीटर तक मार करने वाला हथियार चाहिए, तो कल हमें 300 किलोमीटर तक का हथियार चाहिए। इसी तरह कम्युनिकेशन भी है, जैसे-जैसे दुश्मन तकनीक बढ़ाएगा, हमें भी उससे एक कदम आगे रहना होगा।”

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Army Chief on Op Sindoor: Army Chief on Control of Land in War
File Photo: Indian Army

Army Chief on Op Sindoor: भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक कार्यक्रम में कहा कि भारत के लिए किसी भी जंग का नतीजा अंततः जमीन पर कब्जे से ही तय होगा। उन्होंने कहा कि “कंट्रोल ऑफ लैंड विल बी करेंसी ऑफ विक्ट्री” यानी जमीन पर नियंत्रण ही जीत की असली मुद्रा है। उन्होंने कहा कि युद्ध का नतीजा केवल गोलाबारी से तय नहीं होता, बल्कि जमीन पर कब्जा करने से तय होता है।

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उन्होंने स्पष्ट किया कि वायुसेना और नौसेना दुश्मन की तबाही पर ध्यान देती हैं, लेकिन सेना का काम जमीन को दुश्मन से खाली कराकर कब्जा करना होता है। भारत के संदर्भ में जहां चीन, पाकिस्तान और आतंरिक विद्रोह की चुनौतियां एक साथ मौजूद हैं, वहां थलसेना की भूमिका निर्णायक है।

Army Chief on Op Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र

जनरल द्विवेदी ने अपने संबोधन में हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने दिखाया कि जंग कितनी अप्रत्याशित हो सकती है। कई लोग मान रहे थे कि यह लंबे समय तक चलेगा, लेकिन यह महज चार दिन में समाप्त हो गया। उन्होंने इसकी तुलना रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इराक युद्ध से की।

उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध को शुरुआत में दस दिन का माना गया था, लेकिन वह सालों से चल रहा है। वहीं ईरान-इराक युद्ध दस साल तक चला। इस अनुभव से सीख मिलती है कि युद्ध का समय तय नहीं किया जा सकता।

Army Chief on Op Sindoor: लो-कॉस्ट, हाई-टेक्नोलॉजी का महत्व

आर्मी चीफ ने कहा कि आज के युद्ध में लो-कॉस्ट हाई-टेक्नोलॉजी यानी कम लागत वाली आधुनिक तकनीक बड़े दुश्मन को भी मात दे सकती है। ड्रोन, स्मार्ट वेपन और डिजिटल नेटवर्किंग के कारण छोटे देश भी बड़े प्रतिद्वंद्वी को चुनौती दे पा रहे हैं।

उन्होंने “डेविड एंड गोलियथ” के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि सस्ती और असरदार तकनीक के सहारे किसी भी बड़ी ताकत को रोका जा सकता है।

Army Chief on Op Sindoor: यूनियन वॉर बुक गोपनीय गाइडलाइन

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सरकार ने यूनियन वॉर बुक का इस्तेमाल औपचारिक रूप से नहीं किया, लेकिन इसके सभी पहलुओं को अपनाया गया। यह 200 पन्नों की गोपनीय गाइडलाइन है, जिसमें आपातकालीन स्थिति में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की भूमिका तय की जाती है।

द्विवेदी ने कहा कि यह ऑपरेशन “होल ऑफ नेशन अप्रोच” का उदाहरण था। इसमें सैनिकों से लेकर वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और सरकारी संस्थानों तक, सभी ने मिलकर काम किया।

Army Chief on Op Sindoor: आधुनिक युद्ध का बदलता चेहरा

आर्मी चीफ ने कहा कि आज युद्ध की कोई निश्चित सीमा नहीं रह गई है। साइबर हमले, ड्रोन और मिसाइलें कहीं भी गिर सकती हैं। ऑपरेशन सिंदूर, रूस-यूक्रेन और ईरान-इजराइल संघर्ष इसका उदाहरण हैं।

उन्होंने कहा कि अब फोर्स विजुअलाइजेशन, फोर्स प्रोटेक्शन और फोर्स अप्लीकेशन – इन तीनों पर ध्यान देना जरूरी है। यानी सेना को पहले से स्थिति का आकलन करना, दुश्मन के हमले को झेलना और फिर जवाबी कार्रवाई करनी होगी।

Army Chief on Op Sindoor: हथियारों की रेंज बढ़ाने पर जोर

जनरल द्विवेदी ने कहा कि सेना को अपने हथियारों की रेंज लगातार बढ़ानी होगी। उन्होंने बताया कि लोइटरिंग म्यूनिशंस की रेंज 100-150 किलोमीटर से बढ़ाकर 750 किलोमीटर तक करनी होगी। इसी तरह मिसाइलों और रॉकेट्स की क्षमता भी बढ़ानी होगी।

उन्होंने कहा कि दुश्मन भी लगातार तकनीक विकसित कर रहा है, इसलिए भारत को भी उससे एक कदम आगे रहना होगा। यही वजह है कि आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) पर जोर दिया जा रहा है।

उद्योग और सेना का साझेदारी मॉडल

आर्मी चीफ ने कहा कि सेना अकेले तकनीक को नहीं संभाल सकती। इसके लिए एकेडेमिया, इंडस्ट्री और मिलिट्री – तीनों का तालमेल जरूरी है। उन्होंने कहा कि 2025 से 2035 तक हर साल रक्षा खर्च लगभग 3 लाख करोड़ रुपये होगा और इसमें हर साल 10 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। यह घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त है।

भारत की 2.5 फ्रंट चुनौती

द्विवेदी ने कहा कि भारत को टू एंड हाफ फ्रंट यानी चीन, पाकिस्तान और आतंरिक विद्रोह से एक साथ निपटना होता है। ऐसे में जमीन पर नियंत्रण कायम रखना ही असली जीत है। उन्होंने हाल ही में अमेरिका और रूस के बीच अलास्का में हुई बातचीत का हवाला दिया, जहां दोनों देशों ने युद्ध रोकने के लिए यह तय किया कि किसके पास कितनी जमीन रहेगी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान की गई कार्रवाई

7 मई को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। यह कार्रवाई 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद की गई थी, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर बमबारी की। नौ आतंकी कैंपों को ध्वस्त किया गया और लगभग 100 आतंकियों को मार गिराया गया। इसके अलावा पाकिस्तान के 13 सैन्य ठिकानों और एयरबेस को भी निशाना बनाया गया था।

Nepal crisis: क्या नेपाल हिंसा के पीछे है अमेरिका-आईएसआई का हाथ, बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से क्या है कनेक्शन?

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India

Nepal crisis: काठमांडू और नेपाल के कई हिस्सों में हाल ही में भड़की हिंसा ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। सोशल मीडिया बैन के बाद फैले विरोध-प्रदर्शन में 19 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, जिसके बाद नेपाल सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। हालात अभी भी बेकाबू हैं औऱ वहां सेना ने मोर्चा संभाल लिया है। इन विरोध-प्रदर्शनों के चलते केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। कई राजनीतिक दलों के कई सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है। वहीं, भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ऐसे हालात का फायदा आतंकी संगठन और पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस उठा सकती है। सूत्रों का कहना है कि जैसे बांग्लादेश में छात्र आंदोलन हुआ वैसा ही कुछ नेपाल में देखने को मिल रहा है।

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Nepal crisis: अमेरिका, आईएसआई का हाथ? बांग्लादेश से कनेक्शन

नेपाल में भारी हिंसा हो रही है। युवा, खासकर जेन जेड, सोशल मीडिया बैन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। 3 सितंबर को सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप जैसे 26 प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा दिया, जिसे युवाओं ने अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया। प्रदर्शनकारियों ने संसद पर कब्जा करने की कोशिश की, पीएम केपी शर्मा ओली के घर पर आग लगाई। खुफिया सूत्रों का कहना है कि अमेरिका की सीआईए ने ‘रंग क्रांति’ की साजिश रची। नेपाल भारत-चीन के बीच है, अमेरिका वहां अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। हाल ही में बांग्लादेश में छात्र आंदोलन से शेख हसीना की सरकार गिरी। उसके पीछे भी अमेरिकी की डीप स्टेट का हाथ था। 2024 में बांग्लादेश में कोटा सिस्टम के खिलाफ छात्रों ने विरोध किया था। इससे हसीना सरकार गिरी। दोनों जगह युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से संगठित हुए। वहीं, इससे पहले श्रीलंका 2022 में भी ऐसा हो चुका है।

एजेंसियों का कहना है कि नेपाल अब पाकिस्तान के नए प्रॉक्सी वॉरफ्रंट में बदल सकता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान, धार्मिक और सांस्कृतिक रास्तों का इस्तेमाल कर भारत के हितों को कमजोर करने की कोशिश में है।

भारतीय एजेंसियों का मानना है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन ने भी पाकिस्तान की रणनीति को ताकत दी है। शेख हसीना के जाने और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े मोहम्मद यूनुस के सलाहकार बनने के बाद आईएसआई को खुली छूट मिल रही है। यही वजह है कि नेपाल और बांग्लादेश में इस्लामिक नेटवर्क तेजी से फैल रहे हैं।

Nepal crisis: रज्जाक मस्जिद का विवाद

मुख्य चिंता का केंद्र है सुनसरी जिले के बिराटनगर के पास इनरावा में बन रही रज्जाक मस्जिद। यह मस्जिद बांग्लादेश की एक एनजीओ, अलहाज शमसुल हक फाउंडेशन के जरिए बनाई जा रही है। जुलाई 2025 में इस मस्जिद की नींव रखी गई थी। भारतीय एजेंसियों का मानना है कि इस धार्मिक ढांचे की आड़ में आईएसआई गुप्त ठिकाने तैयार कर सकती है, जिसका इस्तेमाल जासूसी, कट्टरपंथ और आतंकी गतिविधियों के लिए किया जाएगा।

Nepal crisis: धार्मिक ढांचों का इस्तेमाल

खुफिया सूत्रों के अनुसार आईएसआई पहले भी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे इलाकों में मस्जिदों, मदरसों और सांस्कृतिक केंद्रों को अपनी गुप्त गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर चुकी है। ये जगहें देखने में धार्मिक लगती हैं, लेकिन वास्तव में वहां से जासूसी, फंडिंग और वैचारिक ब्रेनवॉशिंग जैसे काम होते हैं। अब वही रणनीति नेपाल में अपनाई जा रही है।

Nepal crisis: जनसांख्यिकीय बदलाव की कोशिश

भारत के विदेश मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि नेपाल जैसे हिंदू-बहुल देश में जानबूझकर कट्टरपंथी तत्वों को बसाने की कोशिश हो रही है। इसे “डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग” बताया जा रहा है, जिसके जरिए नेपाल की धार्मिक संरचना को बदला जा रहा है और भारत की सीमाओं को अस्थिर करने की साजिश रची जा रही है।

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India

Nepal crisis: नेपाल रूट से भारत में घुसपैठ की साजिश

भारत की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से कहती रही हैं कि नेपाल का 1,751 किलोमीटर लंबा खुला बॉर्डर आतंकियों और तस्करों के लिए आसान रास्ता है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे आतंकी संगठन नेपाल की ढिलाई का फायदा उठाकर भारत में घुसपैठ की कोशिश करते रहे हैं। हाल ही में नेपाल के राष्ट्रपति के सलाहकार सुनील बहादुर ठाकपा ने भी एक सेमिनार में इसी खतरे की तरफ इशारा किया।

भारत की सुरक्षा एजेंसियों को जानकारी मिली है कि पाकिस्तान की आईएसआई ने नेपाल के जरिए भारत में आतंकियों को भेजने की नई रणनीति बनाई है। चूंकि भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बेहद सख्त है, इसलिए आईएसआई अब नेपाल रूट पर ध्यान केंद्रित कर रही है। नेपाल और भारत के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जिसे आतंकियों, ड्रग माफिया और हथियार तस्करों ने पहले भी इस्तेमाल किया है।

Nepal Crisis and ISI Terror Plot Against India
KP Sharma Oli Resigned

Nepal crisis: खालिस्तान और जैश ए मोहम्मद के आतंकियों की एंट्री

खुफिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हाल ही में जैश-ए-मोहम्मद आतंकियों ने नेपाल से भारत में घुसपैठ की कोशिश की। इसके अलावा आईएसआई खालिस्तान समर्थक तत्वों को भी इसी रास्ते से भेजने की तैयारी में है। पंजाब सीमा से घुसपैठ में लगातार नाकाम रहने के बाद पाकिस्तान अब नेपाल सीमा का सहारा ले रहा है।

Nepal crisis: बिहार और यूपी में लैंडिंग प्वाइंट

नेपाल रूट से आने वाले आतंकियों और तस्करों का लैंडिंग प्वाइंट अक्सर बिहार और उत्तर प्रदेश होता है। इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी यासीन भटकल जैसे लोगों ने भी इस सीमा का इस्तेमाल हथियार और गोला-बारूद लाने और भारत से बाहर भागने के लिए किया था। दरभंगा जैसे शहर इन आतंकियों के लिए ऑपरेशनल बेस बन चुके थे।

Nepal crisis: नेपाल सरकार की चेतावनी

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी एक प्रेस रिलीज जारी कर पुष्टि की है कि हाल के विरोध-प्रदर्शनों में बाहरी ताकतों का हाथ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, काठमांडू के दरबार स्क्वायर में सीआईए फंडिंग के जरिए आईएसआई, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े लोगों की गुप्त बैठक हुई थी। इसी बैठक में नेपाल में अस्थिरता फैलाने और भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजना बनी।

नेपाल सरकार ने साफ किया है कि उसकी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा और वह अपने भूभाग का इस्तेमाल विदेशी खुफिया एजेंसियों या आतंकी संगठनों को नहीं करने देगी।

पाकिस्तान-तुर्की और इस्लामिक नेटवर्क का खेल

विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल अब आईएसआई और तुर्की समर्थित इस्लामिक नेटवर्क के निशाने पर है। तुर्की से जुड़े संगठनों के जरिए नेपाल में मदरसा और मस्जिद बनाने की कोशिशें तेज हुई हैं। रिपोर्ट्स में सामने आया कि कुछ विदेशी संगठन नेपाल में अनाथ बच्चों और गरीब परिवारों के बच्चों को धार्मिक शिक्षा के नाम पर कट्टरपंथी शिक्षा दे रहे हैं। इसके लिए तुर्की और खाड़ी देशों से करोड़ों रुपए की फंडिंग हो रही है।

हाल ही में सुनसरी जिले के इनरावा में बांग्लादेश स्थित अल्हाज शमसुल हक फाउंडेशन ने मस्जिद की नींव रखी। इस मस्जिद को दावत-ए-इस्लाम का केंद्र बताया जा रहा है। यह गतिविधियां नेपाल की पारंपरिक धार्मिक सहिष्णुता के लिए खतरे की घंटी हैं।

भारत के लिए बढ़ता खतरा

नेपाल में इस्लामिक संगठनों की गतिविधियां सीधे भारत की सुरक्षा पर असर डाल सकती हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पहले से ही कई आतंकी नेटवर्क सक्रिय हैं। अगर नेपाल में आईएसआई और इस्लामिक संगठनों की जड़ें गहरी हो गईं, तो भारत में आतंकियों की घुसपैठ और आसान हो जाएगी।

2008 के कुख्यात IC-814 हाईजैक के पटकथा भी काठमांडू में ही लिखी गई थी। भारतीय खुफिया एजेंसियां पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि नेपाल में आतंकी नेटवर्क बनने की स्थिति में भारत को नई चुनौती झेलनी पड़ सकती है।

आईएसआई का नया जासूसी नेटवर्क

फरवरी 2025 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नेपाली नागरिक अंसारुल मियां अंसारी को गिरफ्तार किया। जांच में पता चला कि वह 2008 से आईएसआई के लिए जासूसी कर रहा था। उसके पास से गुप्त सेना दस्तावेज, लैपटॉप, प्रिंटर और संवेदनशील डेटा बरामद हुआ। वह पाकिस्तान के हैंडलरों से व्हाट्सएप और कॉल के जरिए निर्देश लेता था।

अंसारी नेपाल से भारत आकर यहां तैनात नेटवर्क के जरिए गोपनीय जानकारी पाकिस्तान तक भेजता था। उसके नेटवर्क में झारखंड निवासी अखलाक आजम और दिल्ली स्थित कुछ स्थानीय सहयोगी भी शामिल थे। यह नेटवर्क वेस्ट एशिया, नेपाल और भारत के बीच फैला हुआ था।

सीमा पर कड़ी चौकसी

भारत-नेपाल सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने हालात को देखते हुए चौकसी बढ़ा दी है। बारीकी से चेकिंग की जा रही है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। नेपाल पुलिस और भारतीय एजेंसियां भी समय-समय पर संयुक्त गश्त करती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही नेपाल सीमा पर सुरक्षा और कड़ी कर दी गई थी। खुफिया इनपुट्स मिलने के बाद कई बार तलाशी अभियान चलाए गए।

Ka-226T helicopter deal: रूस ने अपने कामोव हेलीकॉप्टर को लेकर भारत को ऑफर की बड़ी डील! पुतिन के भारत दौरे के दौरान लग सकती है मुहर!

Ka-226T helicopter deal India Russia
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Ka-226T helicopter deal: भारत और रूस के बीच लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े के-226टी (Kamov Ka-226) यूटिलिटी हेलिकॉप्टर सौदे को फिर से जिंदा करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि इस साल दिसंबर में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान इस पर बातचीत की जा सकती है।

सूत्रों का कहना है कि इस बार रूस ने इस प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने के लिए नई पेशकश की है। मॉस्को अब इस हेलिकॉप्टर को अपने स्वदेशी वीके-650वी (VK-650V) इंजन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पैकेज के साथ भारत को देने की तैयारी में है।

Indian Army Helicopter Fleet: पुराने हेलीकॉप्टर बेड़े को बदलेगी भारतीय सेना, शामिल करेगी 250 नए चॉपर, ये कॉप्टर हैं रेस में

Ka-226T helicopter deal: क्यों अहम है यह सौदा?

भारत के पास अभी भी बड़ी संख्या में पुराने चीता और चेतक हेलिकॉप्टर हैं, जो कई दशक से सेवा में हैं। ये हेलिकॉप्टर ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन अब इन्हें तुरंत बदलने की जरूरत महसूस की जा रही है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए 2015 में भारत और रूस के बीच इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (IGA) हुआ था। इसके तहत 200 के-226टी हेलिकॉप्टर बनाने का फैसला हुआ। इसमें से 60 हेलिकॉप्टर रूस से सीधे फ्लाई-अवे कंडीशन में आने थे, जबकि 140 हेलिकॉप्टर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की तुमकुर फैक्ट्री में बनाए जाने थे।

Ka-226T helicopter deal: क्यों अटका यह प्रोजेक्ट?

साल 2022 में यह प्रोजेक्ट अचानक ठप हो गया। इसके पीछे जो वजह बताई जाती है वह है फ्रांस के सफरान कंपनी के एरियस 2G1 इंजन की सप्लाई पर रोक। यूरोपीय यूनियन ने रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते इन इंजनों की सप्लाई बंद कर दी था।

इसके अलावा भारत और रूस के बीच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्वदेशीकरण की शर्तों पर भी सहमति नहीं बन पाई। इसी बीच एचएएल ने अपना खुद का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) डेवलप करना शुरू कर दिया।

हालांकि भारतीय सेना और वायुसेना को 400 से ज्यादा नए हेलिकॉप्टरों की जरूरत है। हाल ही में एयरबस हेलीकॉप्टर्स ने अपने H125 हेलीकॉप्टर के मेन फ्यूजलाज (ढांचा) को बनाने के लिए महिंद्रा एयरोस्ट्रक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ साझेदारी भी की है। एचएएल का LUH औऱ एयरबस के H125 हेलीकॉप्टर को इस साल एरो इंडिया में भी शोकेस किया गया था।

ये हेलीकॉप्टर हैं रेस में

सेना को भी पुराने बेड़े को बदलने के लिए लगभग 250 नए हेलीकॉप्टर्स की जरूरत है। सेना के लिए प्रस्तावित मुख्य हेलिकॉप्टरों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, रूस का कामोव-226T, और एयरबस H125 शामिल हैं। वहीं, कामोव-226T एक डबल इंजन वाला हेलीकॉप्टर है, जो अपनी सेफ्टी और मॉड्यूलर डिजाइन के लिए जाना जाता है। इसके अलावा एमडी हेलिकॉप्टर्स MD 530F ला रही है। साथ ही, मुंबई की मैक्स एयरोस्पेस Bell 407Xi मॉडल लेकर उतरी है, जिसे ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने के लिए बेहतरीन माना जाता है।

जारी किए दो बड़े RFI

रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में दो बड़े रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी किए हैं, जिनके तहत कुल 276 नए हेलिकॉप्टर खरीदे जाएंगे। इनका इस्तेमाल भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड द्वारा किया जाएगा।

पहला रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन अगस्त महीने की शुरुआत में जारी हुआ है। इसमें 200 रिकॉनिसेंस एंड सर्विलांस हेलिकॉप्टर (RSH) की जरूरत बताई गई है। इनमें से 120 हेलिकॉप्टर सेना और 80 वायुसेना को मिलेंगे। ये हेलिकॉप्टर सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी, सैनिकों की त्वरित तैनाती और दुर्गम इलाकों में छोटे लेकिन अहम ऑपरेशनों के लिए उपयोग होंगे।

दूसरा RFI 22 अगस्त को जारी किया गया, जिसमें 76 नेवल यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (NUH) शामिल हैं। इनमें से 51 हेलिकॉप्टर नौसेना और 25 कोस्ट गार्ड को मिलेंगे। इनका प्रयोग समुद्री निगरानी और तटीय सुरक्षा मजबूत करने के लिए होगा।

दोनों ही खरीद प्रक्रियाओं में मेक इन इंडिया पहल को प्राथमिकता दी गई है। इसका अर्थ है कि हेलीकॉप्टरों का उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण अधिकतम स्तर पर भारत में ही होगा। RSH के लिए कंपनियों को 18 अक्टूबर तक प्रस्ताव भेजने का समय दिया गया है और 2026 की शुरुआत में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी होगा। इसके बाद 2027 के मध्य तक कॉन्ट्रैक्ट साइन होने और 2028 से डिलीवरी शुरू होने की संभावना है।

Ka-226T helicopter deal: रूस ने बनाया नया VK-650V इंजन

इंजन की समस्या को हल करने के लिए रूस की यूनाइटेड इंजन कॉर्पोरेशन ने VK-650V टर्बोशाफ्ट इंजन डेवलप किया है। इस इंजन के ट्रायल्स भी पूरे हो चुके हैं और इसे 2025 की शुरुआत में सर्टिफिकेशन भी मिल चुका है।

VK-650V इंजन 650 से 750 हॉर्सपावर तक की ताकत देता है और इसे खासतौर पर गर्म और ऊंचाई वाले इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल (FADEC) सिस्टम लगा है, जिससे यह कम ईंधन की खपत करता है। वीके-650वी इंजन को खासतौर पर 4 टन तक वजन वाले मल्टी-पर्पज हेलिकॉप्टरों के लिए बनाया गया है। यह फ्रेंच Safran Arrius 2G1 इंजन और Pratt & Whitney PW 207K जैसे विदेशी इंजनों का विकल्प बनेगा।

रूस ने भारत को यह प्रस्ताव दिया है कि फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत भविष्य में इस इंजन की असेंबली और निर्माण भारत में भी किया जा सकता है।

Ka-226T helicopter deal: हेलीकॉप्टर की खूबियां

कामोव-226T हेलिकॉप्टर अपने खास को-एक्सियल रोटर डिजाइन की वजह से चर्चा में है। इसमें टेल रोटर नहीं होता, जिससे यह हेलिकॉप्टर ज्यादा कॉम्पैक्ट और हवा के तेज झोंकों में भी स्थिर रहता है। साथ ही, संकरी घाटियों जैसे इलाकों में भी सुरक्षित रूप से ऑपरेट कर सकता है।

इसका मॉड्यूलर डिजाइन इसे मल्टीपर्पज बनाता है। यानी इसके केबिन को तुरंत बदलकर अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल सैनिकों और सामान की ढुलाई, मेडिकल इवैक्यूएशन, टोही मिशन और आपदा राहत जैसे कार्यों में किया जा सकता है। हेलिकॉप्टर का अधिकतम टेकऑफ वेट लगभग 3.8-4 टन है और इसमें 6 लोग (2 पायलट और 4 यात्री) बैठ सकते हैं।

HAL और रूस का जॉइंट वेंचर

इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए एचएएल और रूस की कंपनियों ने मिलकर एक जॉइंट वेंचर इंडो-रशियन हेलीकॉप्टर्स लिमिटेड (IRHL) बनाया था। भारत सरकार ने इसे मेक इन इंडिया प्रोग्राम का हिस्सा मानते हुए मंजूरी दी थी।

अगर नया प्रस्ताव मंजूर होता है तो एएचएल की भूमिका और भी अहम होगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सौदा उसी तरह का मॉडल बन सकता है जैसा एएचएल पहले ही सुखोई-30MKI फाइटर जेट के इंजन AL-31FP के लिए अपनाता आ रहा है।

SSS Defence को मिला स्नाइपर राइफल का बड़ा विदेशी ऑर्डर, 30 मिलियन डॉलर का एम्युनिशन भी करेगी एक्सपोर्ट

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SSS defense .338 Saber sniper rifle (Photo: SSS Defense)

SSS Defence: भारत का डिफेंस प्राइवेट सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है। असाल्ट राइफल्स बनाने वाली प्रमुख कंपनी बेंगलुरु की एसएसएस डिफेंस (SSS Defence) को स्नाइपर राइफल के लिए बड़ा ऑर्डर मिला है। साथ ही, कंपनी के साथ 30 मिलियन डॉलर (करीब 250 करोड़ रुपये) कीमत के एम्युनिशन यानी गोला-बारूद की भी बड़ी डील हुई है। यह डील सेंट्रल यूरोप और एक एशियाई देश के साथ हुई है।

SIG-716i Rifles: अब भारत में ही राइफलें और गोला-बारूद बनाएगी यह अमेरिकी कंपनी, मेक इन इंडिया को मिलेगा बढ़ावा

जानकारी के मुताबिक, जिस देश को यह राइफल सप्लाई की गई हैं, वह भारत का दोस्त है। हालांकि इस डील में देश के नाम का खुलासा कंपनी ने नहीं किया है। लेकिन इस देश को पहले .338 लैपुआ मैग्नम कैलिबर की स्नाइपर राइफल सप्लाई की गई थी। अब उसने पॉजिटिव रेस्पॉन्स देते हुए अतिरिक्त राइफल्स का ऑर्डर दिया है। इस बार ऑर्डर का साइज पहले से कहीं बड़ा है। इसके साथ ही उसी देश ने 7.62×51 मिमी कैलिबर के गोला-बारूद के लिए भी कॉन्ट्रैक्ट किया है।

SSS Defence: इम्पोर्टर से एक्सपोर्टर बना भारत

कुछ साल पहले तक भारत स्नाइपर राइफल के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर था। लेकिन एसएसएस डिफेंस ने न केवल इस माइंडसेट को बदला, बल्कि जुलाई 2024 में पहली बार भारत ने स्नाइपर राइफल निर्यात किया और अब यह कंपनी लगातार नए विदेशी ग्राहकों को भारत के साथ जोड़ रही है।

एसएसएस डिफेंस पहले ही करीब 50 मिलियन डॉलर के गोला-बारूद के ऑर्डर पूरे कर चुकी है, जिन्हें कई मित्र देशों को सप्लाई किया गया। इनमें से कुछ पड़ोसी देशों को भी सप्लाई दी गई थी।

वहीं, भारत सरकार भी इन डील्स में कंपनियों की मदद कर रही है। रक्षा मंत्रालय तेजी से क्लीयरेंस दे रहा है और विदेशी अनुरोधों को भारतीय कंपनियों तक पहुंचा रहा है।

SSS Defence: स्नाइपर प्रतियोगिता में भी दिखाया दम

फरवरी 2025 में हुई ऑल इंडिया पुलिस कमांडो प्रतियोगिता में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) ने स्नाइपर कैटेगरी में पहला स्थान हासिल किया। एनएसजी टीम ने एसएसएस डिफेंस की .338 सेबर स्नाइपर राइफल का इस्तेमाल किया था।

जबकि, दूसरा स्थान महाराष्ट्र पुलिस की फोर्स वन ने हासिल किया, जिसने अमेरिकी बैरेट .50 कैल स्नाइपर राइफल का इस्तेमाल किया। यह वही राइफल है जो अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस के साथ-साथ भारतीय सेना के पास भी सीमित संख्या में मौजूद है।

SSS Defence: सेबर .338 स्नाइपर राइफल की खूबियां

एसएसएस डिफेंस की सेबर .338 स्नाइपर राइफल पूरी तरह भारत में डिजाइन और मैन्युफैक्चर की गई है। यह स्नाइपर राइफल दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित कैलिबर में आती है और इसकी फायर पावर रेंज लगभग 1,500 मीटर तक है। यह राइफल सब 1 एमओए (Minute of Angle) एक्यूरेसी देती है। यानी 100 मीटर पर गोली का फैलाव सिर्फ 3×3 सेंटीमीटर होता है। इसमें भारत में ही बना 27 इंच का मैच बैरल लगा है, जो भारत में बना है। इसमें मोनोलीथिक चेसिस, टू-स्टेज ट्रिगर और भारत में बना सप्रेसर लगा है।

यूरोप और एशिया में कदम

एसएसएस डिफेंस ने हाल ही में सेंट्रल यूरोप के तीन देशों को स्नाइपर राइफल सप्लाई की है। इसके अलावा, कंपनी अब एशिया के दो और देशों को हथियार सप्लाई करने की तैयारी में है। इस पहल से न केवल भारत की “मेक इन इंडिया” को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि यूरोप के बड़े बाजारों में भी भारतीय कंपनियों की पहुंच बढ़ रही है। कंपनी का कहना है कि उसके हथियार न केवल टेक्नोलॉजी के मामले में बल्कि कॉस्ट में भी विदेशी कंपनियों को मात देते हैं। यही वजह है कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं।

CCC 2025 Kolkata: कोलकाता में होगी कम्बाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस 2025, पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन, ऑपरेशन सिंदूर के सबक होंगे मुख्य एजेंडा

CCC 2025 Kolkata: PM Modi to Inaugurate Combined Commanders Conference 2025 in Kolkata | Operation Sindoor Lessons on Agenda
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CCC 2025 Kolkata: भारतीय सेनाएं इस महीने देश की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य विचार-विमर्श बैठक कम्बाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस (Combined Commanders’ Conference – CCC) 2025 का आयोजन करने जा रही हैं। यह सम्मेलन 15 से 17 सितंबर तक कोलकाता में होगा और इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। इस उच्च स्तरीय सम्मेलन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, रक्षा राज्य मंत्री, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, रक्षा सचिव और विभिन्न मंत्रालयों के सचिव भी मौजूद रहेंगे।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: भारतीय सेना में बड़े बदलाव की तैयारी, अब ट्रेनिंग में ड्रोन और साइबर वॉरफेयर होंगे शामिल

CCC 2025 Kolkata: ऑपरेशनल तैयारी पर फोकस

इस साल सम्मेलन की थीम है– ईयर ऑफ रिफॉर्म्स – ट्रांसफॉर्मिंग फॉर द फ्यूचर यानी सुधारों का वर्ष: भविष्य के लिए बदलाव। इसमें मुख्य रूप से इंस्टीट्यूशनल रिफॉर्म्स, डीप इंटीग्रेशन प्रोसेस और टेक्नोलॉजी मॉर्डेनाइजेशन पर चर्चा होगी। इसके साथ ही मल्टी डोमेन ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करने पर भी जोर दिया जाएगा।

भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के शीर्ष अधिकारी बदलते भू-राजनीतिक हालात में सुरक्षा चुनौतियों और युद्ध की नई रणनीतियों पर विचार करेंगे। इस दौरान ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट, आर्गेनाइजेशनल रिफॉर्म्स और भविष्य के जॉइंट मिलिट्री विजन पर भी चर्चा की जाएगी।

CCC 2025 Kolkata: ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े सबक पर होगी चर्चा

इस कॉन्फ्रेंस का एक अहम एजेंडा मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े सबक और अनुभव होंगे। ऑपरेशन सिंदूर को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद लॉन्च किया गया था, जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की जान गई थी। इसके जवाब में भारत ने 7 मई को पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ढांचे को ध्वस्त करने के लिए ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया।

यह ऑपरेशन आतंकवाद के खिलाफ भारत की निर्णायक सैन्य कार्रवाई के रूप में देखा गया और इसमें तीनों सेनाओं ने मिलकर काम किया। अब इस कॉन्फ्रेंस में उस ऑपरेशन से सीखे गए सबक, आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल और जॉइंट ऑपरेशंस की रणनीति पर गहन चर्चा होगी।

CCC 2025 Kolkata: पीएम करेंगे संबोधित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सीडीएस जनरल अनिल चौहान सम्मेलन में टॉप मिलिट्री अफसरों को संबोधित करेंगे। यह सम्मेलन ईस्टर्न कमांड के मुख्यालय कोलकाता में होगा।

प्रधानमंत्री देश की सुरक्षा से जुड़ी नीतियों की सुप्रीम बॉडी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के अध्यक्ष हैं, जबकि रक्षा मंत्री डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) के चेयरमैन हैं। इसलिए इस कॉन्फ्रेंस के एजेंडे पर लिए गए फैसलों का असर सीधे देश की सुरक्षा नीतियों और डिफेंस मॉर्डेनाइजेशन पर पड़ेगा।

कम्बाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में अलग-अलग रैंकों के अधिकारियों और सैनिकों से भी संवाद किया जाता है। इससे जमीनी स्तर की चुनौतियों और अनुभवों को टॉप लेवल की रणनीति में शामिल किया जाता है। इस बार भी सम्मेलन में इंटरेक्टिव सेशन होंगे जिनमें विभिन्न रैंकों के अधिकारी हिस्सा लेंगे। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। वर्ष 2014 तक यह सम्मेलन दिल्ली में होता था, लेकिन उसके बाद इसे अलग-अलग स्थानों पर आयोजित किया जाने लगा। अब तक यह सम्मेलन INS विक्रमादित्य पर, देहरादून, जोधपुर और भोपाल जैसे शहरों में आयोजित हो चुका है। इस बार पहली बार यह कोलकाता में हो रहा है।

CCC 2025 Kolkata: चीन और पाकिस्तान से बढ़ती चुनौतियां

इस सम्मेलन का आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब चीन की नौसैनिक गतिविधियां हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ रही हैं और पाकिस्तान के साथ उसका सामरिक सहयोग भारत के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है। इसके अलावा साइबर, स्पेस और ड्रोन जैसे नए बैटलफील्ड भी सेनाओं के सामने हैं। इन सबको ध्यान में रखते हुए सीसीसी 2025 में ऑपरेशनल रेडीनेस यानी हर हालात में तैयार रहने पर विशेष जोर रहेगा।

वहीं, भारतीय सेनाएं इस समय मॉर्डनाइजेशनप्रक्रिया से गुजर रहे हैं। थलसेना में थिएटर कमांड्स पर विचार चल रहा है, नौसेना में नए युद्धपोत और पनडुब्बियों का निर्माण हो रहा है और वायुसेना में आधुनिक लड़ाकू विमान, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल किए जा रहे हैं। कॉन्फ्रेंस में इन सभी पहलुओं की प्रगति और भविष्य की जरूरतों पर भी समीक्षा होगी।

ध्यान देने वाली यह है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहली बार होगा जब प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री टॉप मिलिट्री लीडरशिप के साथ आमने-सामने बैठकर मिलिट्री मॉर्डनाइजेशन और रिफॉर्म्स पर चर्चा करेंगे। इस वजह से इस कॉन्फ्रेंस को और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Indian Army Flood Relief 2025: बाढ़ से जंग में सबसे आगे भारतीय सेना, 75 जगहों पर बचाई 21,500 जानें, हेलिकॉप्टरों ने भरी 500 घंटे उड़ान

Indian Army Flood Relief 2025: Indian Army at the Forefront of Nation’s Battle Against Floods, 21,500 Civilians Rescued

Indian Army Flood Relief 2025: देश के कई हिस्से इस साल भयंकर बाढ़ की चपेट में हैं, लेकिन इन मुश्किल हालात में भारतीय सेना एक बार फिर सबसे आगे खड़ी दिखाई दी है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को निकालने से लेकर मेडिकल मदद पहुंचाने और राहत सामग्री बांटने तक, सेना के जवान लगातार “सेवा परमो धर्म” की भावना के साथ काम कर रहे हैं।

Dharali HADR OPS: धाराली में आपदा राहत में सेना के आंख, नाक, कान बन रहे K9 वॉरियर्स! सात फीट गहरे मलबे में तलाश रहे जिंदगी

मॉनसून सीजन अप्रैल 2025 से शुरू हुआ और तभी से सेना की टीमें देशभर में मानवीय सहायता और आपदा राहत यानी ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ (HADR) ऑपरेशनों में लगी हुई हैं। अब तक सेना 75 अलग-अलग स्थानों पर सक्रिय रही है, जहां उन्होंने हजारों लोगों की जान बचाई।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सेना ने इस दौरान 126 रेस्क्यू कॉलम तैनात किए। इनकी मदद से 21,500 से अधिक नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया। इसके अलावा 9,700 लोगों को तुरंत चिकित्सा मदद दी गई और प्रभावित इलाकों में 23,500 किलोग्राम से ज्यादा राहत सामग्री पहुंचाई गई। सेना के इंजीनियरों ने राहत और बचाव कार्य को सुचारु बनाने के लिए 29 पुल बनाए, जिनमें से एक पुल 110 फीट लंबा था। साथ ही 12 स्थानों पर बंधों को मजबूत किया गया ताकि बाढ़ का पानी और नुकसान न पहुंचा सके।

भारतीय सेना की इन कोशिशों में हेलिकॉप्टर ऑपरेशनों की भूमिका भी बेहद अहम रही। सेना के हेलिकॉप्टरों ने 500 घंटे से ज्यादा की उड़ान भरकर राहत सामग्री पहुंचाई और फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला। यह ऑपरेशन कई बार ऐसे इलाकों में चलाए गए जहां पहुंचना बेहद मुश्किल था और जवानों ने व्यक्तिगत जोखिम उठाकर अपनी जिम्मेदारी निभाई।

सेना की सबसे उल्लेखनीय कार्रवाई पंजाब में रही, जहां लगातार बारिश ने हालात बिगाड़ दिए थे। अकेले पंजाब में 48 रेस्क्यू कॉलम तैनात किए गए। इनकी मदद से लगभग 10,000 लोगों की जान बचाई गई, 4,700 लोगों को मेडिकल सहायता दी गई और 12,500 किलोग्राम आवश्यक सामग्री बांटी गई। यहां भी सेना के हेलिकॉप्टरों ने 250 घंटे से अधिक उड़ान भरकर राहत कार्य किया। इन हेलिकॉप्टरों ने न सिर्फ़ बाढ़ में फंसे ग्रामीणों को एयरलिफ्ट किया बल्कि उन गांवों में भी मदद पहुंचाई जहां सड़क से जाना संभव नहीं था।

पंजाब में ऑपरेशन के दौरान सेना ने सुरक्षा बलों के जवानों की भी मदद की। लस्सियां, कसोवाल और दरिया मंसूर जैसे इलाकों में बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के करीब 500 जवान फंसे हुए थे। सेना ने इन्हें भी सुरक्षित बाहर निकाला और अग्रिम चौकियों से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया।

बाढ़ प्रभावित इलाकों में सेना के इंजीनियर लगातार काम करते रहे। जहां सड़कें और पुल टूट गए थे, वहां अस्थायी पुल बनाए गए ताकि राहत सामग्री और मेडिकल टीम्स आसानी से पहुंच सकें। कई जगहों पर जवानों ने बंधों को मजबूत किया ताकि गांवों में और पानी न घुस सके। यह काम तेज धाराओं और लगातार बारिश के बीच किया गया।

भारतीय सेना की कोशिशें सिर्फ तकनीकी या सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं रहीं। जवानों ने गांवों और कस्बों में जाकर सीधे नागरिकों से बातचीत की, उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और बच्चों-बुजुर्गों को कंधों पर उठाकर बाहर निकाला। कई वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आईं जिनमें सेना के जवान बाढ़ में डूबते लोगों को बचाते और उन्हें सुरक्षित जगह ले जाते दिखाई दिए।

देश के अलग-अलग हिस्सों से आई तस्वीरें दिखाती हैं कि जब भी संकट आता है, भारतीय सेना सबसे पहले पहुंचती है और सबसे आखिर में लौटती है। चाहें आप उत्तराखंड के हर्षिल-धराली की बात कर लें या हिमाचल प्रदेश या फिर पंजाब, इस साल बाढ़ की तबाही ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया है, लेकिन सेना की त्वरित कार्रवाई ने कई जिंदगियों को बचाया है।

पंजाब से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक सेना की सक्रियता ने यह साबित किया है कि आपदा राहत कार्यों में उसकी भूमिका कितनी अहम है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री पहुंचाना, लोगों को सुरक्षित निकालना और बंधों को मजबूत करना सेना की उस क्षमता को दर्शाता है जो हर स्थिति में लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहती है।

Indian Army Drone Shield: ऑपरेशन सिंदूर की तरह अब पाकिस्तान नहीं कर पाएगा भारत के खिलाफ ड्रोन वॉर, भारतीय सेना करने जा रही है यह बड़ा अपग्रेड

Akashteer
Akashteer System (Pic: Indian Army)

Indian Army Drone Shield: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत पर हमला करने के लिए ड्रोनों का सहारा लिया था। सैकड़ों सर्विलांस और अटैक ड्रोन भारतीय सीमा में दाखिल हुए थे, जिन्हें भारतीय सेना ने अपनी एयर डिफेंस गनों और सिस्टम की मदद से मार गिराया। इसके बावजूद, भारतीय सेना ने इस अनुभव से यह सीखा कि भविष्य में ड्रोन वॉरफेयर और भी बड़े खतरे के रूप में सामने आ सकते हैं। अब सेना अपनी ड्रोन शील्ड यानी एरियल सर्विलांस और सिक्योरिटी सिस्टम को और मजबूत बनाने जा रही है।

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Indian Army Drone Shield: नया रडार सिस्टम खरीदने की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर एरियल सर्विलांस की क्षमता बढ़ाने के लिए एडवांस्ड रडार सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रही है। यह रडार सिस्टम ऐसे एरियल ऑब्जेक्ट्स की भी पहचान सकेंगे जिनका रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) बहुत कम होता है, और जो आम रडार पर आसानी से पकड़ में नहीं आते। इन रडारों को आकाशतीर (Akashteer) एयर डिफेंस नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इससे सेना के कमांडर को आसमान की साफ तस्वीर मिलेगी और दुश्मन के ड्रोन या हवाई खतरे का तेजी से जवाब दिया जा सकेगा। जिसके बाद ऐसे ड्रोन या यूएवी भी ट्रैक हो सकेंगे जिन्हें पहले पहचानना मुश्किल था।

Indian Army Drone Shield: रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन और प्रपोजल जारी

सेना ने इस दिशा में औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। दो अलग-अलग रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (RFI) जारी किए गए हैं। इसके तहत 45 तक लो लेवल लाइट वेट रडार-एन्हांस्ड (LLLR-E) और 48 एयर डिफेंस फायर कंट्रोल रडार-ड्रोन डिटेक्टर (ADFCR-DD) की मांग की गई है। इसके अलावा, एक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) भी जारी किया गया है, जिसमें 10 लो लेवल लाइट वेट रडार-इम्प्रूव्ड (LLLR-I) मांगे गए हैं।

Indian Army Drone Shield: क्या है LLLR-I की क्षमता

LLLR-I एक थ्री-डायमेंशनल यानी 3D एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैनड अरे (AESA) रडार होगा। इसमें कमांडर का डिस्प्ले यूनिट, टारगेट डेजिग्नेशन सिस्टम और पावर सप्लाई यूनिट होगी। यह किसी भी इलाके में काम करने में सक्षम होगा, चाहे वह पहाड़ हो, ऊंचाई वाला क्षेत्र हो, रेगिस्तान हो या समुद्र तटीय इलाका हर जगह ये काम करेगा। इसकी क्षमता होगी कि यह 50 किलोमीटर के दायरे में सभी एरियल टारगेट्स की पहचान सके और एक साथ 100 से ज्यादा टारगेट्स को ट्रैक कर सके।

लो लेवल लाइट वेट रडार-एन्हांस्ड LLLR-E की खूबियां

LLLR-E यानी लो लेवल लाइट वेट रडार-एन्हांस्ड रडार में भी 3D स्कैनिंग की क्षमता होगी, लेकिन इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम (EOTS) और पैसिव रेडियो-फ्रीक्वेंसी डिटेक्शन सिस्टम भी जोड़ा जाएगा। इससे यह छोटे ड्रोन या ड्रोन स्वार्म्स को भी पकड़ सकेगा और 10 किलोमीटर दूर तक टारगेट डेटा वेपन सिस्टम को भेज सकेगा। इसमें दिन-रात ट्रैकिंग की क्षमता में बढ़ोतरी होगी।

Indian Army Drone Shield: एयर डिफेंस फायर कंट्रोल रडार-ड्रोन डिटेक्टर

एयर डिफेंस फायर कंट्रोल रडार-ड्रोन डिटेक्टर (ADFCR-DD) में सर्च रडार, ट्रैक रडार, फायर कंट्रोल सिस्टम और आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड-ऑर-फो (IFF) जैसी सुविधाएं होंगी। यह पूरा सिस्टम एक व्हीकल पर लगाया जाएगा और कम से कम दो L-70 एयर डिफेंस गनों को कंट्रोल कर सकेगा। यानी यह सिस्टम मोबाइल प्लेटफॉर्म पर माउंट होगा जिसमें सर्च रडार, ट्रैक रडार, फायर कंट्रोल सिस्टम और आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड-ऑर-फो (Identification Friend-or-Foe – IFF) क्षमता होगी। साथ ही यह डेटा बहुत शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS) तक भी भेजेगा, ताकि दुश्मन के ड्रोन और मिसाइलों को पहले ही रोका जा सके।

Indian Army Drone Shield: ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभव

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर स्वार्म ड्रोन का इस्तेमाल किया था। इनका लक्ष्य था भारतीय सेना के ठिकानों और नागरिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाना। लेकिन भारतीय सेना की L-70, ZU-23 और शिल्का जैसी एयर डिफेंस गनों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और बड़ी संख्या में ड्रोन गिराए। सेना का मानना है कि अगर इन गनों को आधुनिक फायर कंट्रोल रडार सिस्टम के साथ जोड़ा जाए तो और भी अधिक प्रभावी तरीके से इन खतरों को खत्म किया जा सकेगा।

L-70 गन को अपग्रेड करने की तैयारी

भारतीय सेना अब ऐसा नया फायर कंट्रोल सिस्टम चाहती है जो कई रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम से डेटा प्रोसेस कर सके। यह सिस्टम फायरिंग सॉल्यूशन तैयार करेगा और यह जानकारी गनों और शोल्डर-फायर एयर डिफेंस मिसाइलों दोनों तक पहुंचाएगा। इसका फायदा यह होगा कि दुश्मन के छोटे से छोटे निगरानी ड्रोन या अटैक UAV को भी समय रहते निशाना बनाया जा सकेगा।

L-70 एयर डिफेंस गन ऑपरेशन सिंदूर में वरदान साबित हुई थी। लेकिन यह गन 20-25 साल पुरानी तकनीक पर आधारित है। अब सेना इसे अपग्रेड कर रही है ताकि यह नई पीढ़ी के खतरों से भी निपट सके। नया फायर कंट्रोल रडार सिस्टम खासतौर पर ड्रोन की पहचान करने और उन्हें तुरंत निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। सेना के पास वर्तमान में लगभग 800 L-70 गन मौजूद हैं। इनके लिए नए रडार सिस्टम तैयार किए जाएंगे जो कम से कम दो गनों को एक साथ कंट्रोल कर सकें। इससे दुश्मन के ड्रोन को डिटेक्ट करने और उन्हें गिराने में लगने वाला समय बहुत कम हो जाएगा।

भारतीय सेना ने इस बार साफ किया है कि नए सिस्टम को पूरी तरह स्वदेशी रक्षा उद्योग से ही खरीदा जाएगा। पहले सेना ने विदेशी फायर कंट्रोल सिस्टम खरीदे थे जिनमें रूस और हॉलैंड से लिए गए उपकरण शामिल थे। लेकिन ये सिस्टम 70 और 90 के दशक के थे और पूरी तरह डिजिटल नहीं थे। अब सेना चाहती है कि नए सिस्टम अत्याधुनिक हों और ड्रोन सहित सभी प्रकार के हवाई खतरों को डिटेक्ट कर सकें।

ऑपरेशन सिंदूर में आकाशतीर प्रोजेक्ट

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आकाशतीर प्रोजेक्ट ने भी अपनी क्षमता दिखाई। यह प्रोजेक्ट सभी एयर डिफेंस सेंसर्स को एक नेटवर्क में जोड़ता है। इससे सेना के पास देश के हवाई क्षेत्र की पूरी तस्वीर उपलब्ध हो जाती है। आकाशतीर प्रोजेक्ट का लगभग 60 फीसदी काम ऑपरेशन सिंदूर तक पूरा हो चुका था। इसके तहत अब तक 275 सिस्टम डिलीवर हो चुके हैं और 455 सिस्टम की जरूरत है। इस प्रोजेक्ट से सेना के एयर डिफेंस नेटवर्क को रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस मिलती है।

पहले अलग-अलग रडार सिस्टम से मिली जानकारी को ऑपरेटरों को खुद एनालाइज करना पड़ता था। इसमें समय लगता था और कॉर्डिनेशन में देरी होती थी। लेकिन अब आकाशतीर सिस्टम सभी रडार से डेटा लेकर उसे तुरंत एनालाइज कर देता है और एकीकृत तस्वीर कमांडरों को दिखाता है। इससे दुश्मन के हवाई हमलों का मुकाबला करने में ज्यादा तेजी आती है।

Eastern Ladakh LAC Update: इस साल सर्दियों में भी LAC पर डटे रहेंगे भारतीय सैनिक, चीन से ‘विश्वास’ बहाली तक किसी बदलाव के पक्ष में नहीं है भारतीय सेना

LAC geo-tagging
File Photo

Eastern Ladakh LAC Update: एससीओ समिट में पीएम मोदी और चीना राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत के बाद भी पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय सेना की तैनाती में कोई बदलाव नहीं किया गया है। दोनों नेताओं के बीच तियानजिन में हालिया मुलाकात के बाद भी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा हालात में भी सीमा पर कोई कमी नहीं की जाएगी। वहीं सीमा पर विंटर डिप्लॉयमेंट पहले की तरह जारी रहेगा यानी सर्दियों में भी बॉर्डर पर से सैनिकों की संख्या में कोई कटौती नहीं की जाएगी। जैसा पिछले साल था वैसा ही इस बार भी रहेगा।

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Eastern Ladakh LAC Update: सीमा पर तैनाती की स्थिति

सेना के भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि चीनी सेना भी उतने ही सैनिक और हथियारबंद यूनिट्स लेकर सीमा पर मौजूद है। ऐसे में भारत की तैनाती भी संतुलन बनाए रखने के लिए समान स्तर पर की गई है। पिछले साल 21 अक्टूबर को एलएसी पर पेट्रोलिंग बहाल होने के बाद से हालात शांतिपू्र्ण हैं। जिसके बाद डेपसांग और डेमचोक इलाके में डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

बता दें कि सर्दियों की शुरूआत होने वाली है, जिसके बाद हाई एल्टीट्यूड इलाकों में बर्फ जमने से रास्ते बंद हो जाएंगे और पेट्रोलिंग सीमित हो जाएगी। जिसके चलते सेना का फोकस सप्लाई लाइनों को बनाए रखने पर है। पूर्वी लद्दाख में अप्रैल 2020 के बाद चीन की भारी तैनाती के जवाब में भारत ने भी अतिरिक्त सैनिक, तोपें, टैंक, रॉकेट लॉन्चर, हेलिकॉप्टर और यूएवी तैनात किए थे। हालांकि हालात अब स्थिर हैं लेकिन अप्रैल 2020 से पहले जैसी सामान्य स्थिति अभी तक बहाल नहीं हुई है।

Eastern Ladakh LAC Update: थ्री-डी प्रस्ताव पर काम होना बाकी

भारत ने सीमा पर तनाव कम करने के लिए तीन-चरण में प्रस्ताव रखा है जिसे ‘थ्री-डी’ कहा जा रहा है। इसमें पहला ‘डी’ यानी डिसएंगेजमेंट (सैनिकों को फेस टू फेस डिप्लॉयमेंट से पीछे हटाना) पिछले साल अक्टूबर में पूरा हो गया था। लेकिन दूसरा चरण डी-एस्केलेशन (तनाव घटाना) और तीसरा डी-इंडक्शन (अतिरिक्त सैनिकों को स्थायी ठिकानों पर लौटाना) अब भी पूरा नहीं हुआ है और चीन के साथ बातचीत में इस पर कोई प्रगति नहीं हुई है। जबकि ये दोनों प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक सीमा पर सामान्य हालात नहीं बने रह सकते।

पिछले तीन महीनों में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर दोनों अपने-अपने चीनी समकक्षों से इस मुद्दे पर बातचीत कर चुके हैं। 19 अगस्त को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी की दिल्ली में स्पेशल रिप्रजेंटेटिव स्तर की मुलाकात हुई थी, जिसके बाद दोनों पक्षों ने एक साझा दस्तावेज भी जारी किया था जिसमें बॉर्डर मैनेजमेंट को लेकर बातचीत हुई थी। इसमें बॉर्डर मैनेजमेंट पर सहमति बनाने के लिए वर्किंग ग्रुप के गठन की बात कही थी, जिसमें WMCC के तहत एक वर्किंग ग्रुप बनाया जाएगा, ताकि सीमा पर प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित हो सके और शांति व स्थिरता बनी रहे।

इसके अलावा जनरल लेवल मैकेनिज्म को लेकर बातचीत हुई थी, जो अभी वेस्टर्न सेक्टर (पश्चिमी क्षेत्र) में है, उसके अलावा ईस्टर्न (पूर्वी), मिडल (मध्य) और अन्य सेक्टरों में भी जनरल लेवल मैकेनिज्म बनाया जाएगा। इसका मकसद है कि जमीनी स्तर पर जल्दी और सीधे तौर पर समन्वय हो सके। इसमें कमांडर स्तर के बीच सीधी बातचीत होगी।

साथ ही डिप्लोमैटिक और मिलिट्री लेवल मैकेनिज्म पर दोनों पक्षों ने यह तय किया था कि मौजूदा कूटनीतिक और मिलिट्री चैनलों का इस्तेमाल करते हुए बॉर्डर मैनेजमेंट के लिए कदम उठाए जाएंगे। इसका उद्देश्य है तनाव को कम करना (de-escalation) और उसी फ्रेमवर्क के भीतर काम करना, जिस पर पहले सहमति बनी थी।

वहीं, 31 अगस्त को तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी। इस दौरान मोदी ने स्पष्ट कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता जरूरी है ताकि द्विपक्षीय संबंधों का विकास सुचारू रूप से हो सके। बैठक के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए मौजूदा मैकेनिज्म का इस्तेमाल किया जाएगा और बड़े रिश्तों में किसी तरह की बाधा नहीं आने दी जाएगी।

Eastern Ladakh LAC Update: पीएलए की तैनाती क्यों है चिंता की बात

वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, चीन की कई ‘कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड्स’ कुछ इलाकों से पीछे हटी हैं, लेकिन कई ब्रिगेड्स अब भी एलएसी पर अग्रिम मोर्चे पर तैनात हैं। एक ब्रिगेड में करीब 4500 से 5000 सैनिक होते हैं जिनके पास टैंक, आर्मर्ड व्हीकल, आर्टिलरी और सरफेस टू एयर मिसाइलें होती हैं। यही वजह है कि भारतीय सेना अपनी तैनाती कम नहीं करना चाहती।

वहीं, डी-इंडक्शन यानी अतिरिक्त सैनिकों की स्थायी ठिकानों पर वापसी अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि जब तक चीन पूरी तरह पीछे नहीं हटता और विश्वास बहाली के ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक भारतीय तैनाती में कोई ढील नहीं दी जाएगी।

Eastern Ladakh LAC Update: नए जनरल-लेवल मैकेनिज्म की व्यवस्था

दोनों देशों ने अब एलएसी के अलग-अलग सेक्टरों के लिए नए जनरल-लेवल मैकेनिज्म बनाने पर सहमति जताई है। पश्चिमी सेक्टर (लद्दाख) में भारतीय 14 कॉर्प्स कमांडर और चीनी साउथ शिनजियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट चीफ पहले से बातचीत कर रहे हैं। अब मध्य सेक्टर (उत्तराखंड, हिमाचल) और पूर्वी सेक्टर (सिक्किम, अरुणाचल) के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था की जाएगी। भारत की तरफ से इसमें बरेली स्थित उत्तर भारत एरिया और नगालैंड-आसाम स्थित 3 और 4 कॉर्प्स शामिल हो सकते हैं।

Eastern Ladakh LAC Update: कई इलाकों में पेट्रोलिंग राइट्स नहीं  

पूर्वी लद्दाख में अब भी कई ऐसे इलाकों में भारतीय सेना की पैट्रोलिंग के अधिकार पूरी तरह बहाल नहीं हुए हैं। गलवान, पैंगोंग त्सो झील का उत्तरी किनारा, कैलाश रेंज और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में बफर जोन बनाए गए हैं, जिनकी चौड़ाई 3 किलोमीटर से 10 किलोमीटर तक है। यह बफर जोन भारतीय इलाकों में ही बने हैं।