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Baisaran Terror attack: कश्मीर में तरक्की को रोकने की पाकिस्तान की साजिश, लीथियम भंडार मिलने से बढ़ी चीन-पाक की बेचैनी

Intelligence Inputs
Six Months After the Strike, New Terror Threat Emerges from Lashkar and Jaish in Jammu and Kashmir

Baisaran Terror attack: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले को लेकर रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं। इस आतंकी हमले ने न केवल 26 पर्यटकों की जान ली, बल्कि कश्मीर में शांति और तरक्की की उम्मीदों को भी झटका दिया। भारत का मानना है कि यह हमला पाकिस्तान की उस साजिश का हिस्सा है, जो कश्मीर में अशांति फैलाकर भारत की संप्रभुता को कमजोर करना चाहता है। लेकिन इस हमले के पीछे एक बड़ा एंगल भी सामने आ रहा है। जम्मू में हाल ही में मिला लीथियम भंडार चीन और पाकिस्तान की आंखों को चुभ रहा था। दोनों को लग रहा था कि लीथियम के जरिए भारत दुनिया के बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। वहीं, लीथियम मिलने के बाद कश्मीर की तरक्की को नए पंख मिल जाएंगे, जो पाकिस्तान को नागवार गुजर रहा था।

Baisaran Terror Attack: Pakistan Targets Kashmir's Growth Amid Lithium Discovery

Baisaran Terror attack: पहलगाम हमला: तरक्की पर हमला

पहलगाम हमले (Baisaran Terror attack) में बेकसूर लोग तो मारे ही गए, साथ ही कश्मीर के टूरिस्ट व्यवसाय को भी तगड़ी चोट लगी है। भारत का मानना है कि पाकिस्तान नहीं चाहता कि कश्मीर में शांति और तरक्की हो। अगर कश्मीर में शिक्षा, उद्योग, और रोजगार के मौके बढ़े, तो यह भारत के साथ पूरी तरह जुड़ जाएगा, और पाकिस्तान के दावे बेकार हो जाएंगे। इसलिए पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है, युवाओं को भड़काता है, और कश्मीर में अशांति फैलाने की कोशिश करता है।

पहलगाम हमले (Baisaran Terror attack) का सबसे बड़ा निशाना कश्मीर की पर्यटन इंडस्ट्री और आर्थिक तरक्की को रोकना था। कश्मीर में पर्यटन यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, और पहलगाम जैसे इलाके पर्यटकों के लिए खास आकर्षण हैं। लेकिन इस हमले ने कश्मीर की प्रगति को बड़ा झटका दिया है।

पर्यटन पर असर: बड़ा आर्थिक घाटा

पहलगाम हमले (Baisaran Terror attack) के बाद कश्मीर में पर्यटन इंडस्ट्री को भारी नुकसान हुआ है। सरकार ने सुरक्षा कारणों से 87 में से 48 सरकारी पर्यटक स्थलों को बंद कर दिया। अप्रैल से जून तक का समय कश्मीर में पर्यटकों का सबसे बड़ा सीजन होता है, लेकिन हमले के बाद 10 लाख से ज्यादा बुकिंग्स रद्द हो गईं। इससे पर्यटन इंडस्ट्री को दो हफ्तों में ही 1000 करोड़ रुपये (लगभग 120 मिलियन डॉलर) का नुकसान हुआ।

इसका सबसे बड़ा असर स्थानीय लोगों की आजीविका पर पड़ा। अनंतनाग और बारामूला जैसे जिलों में 70% से ज्यादा लोग पर्यटन पर निर्भर हैं। होटल स्टाफ, टट्टू मालिक, शिकारा चलाने वाले, और हस्तशिल्प के कारीगरों की कमाई पूरी तरह बंद हो गई। एक टट्टू मालिक अब्दुल वहीद वानी ने बताया, “हमला होने के बाद से एक भी पर्यटक नहीं आया। हमारी रोजी-रोटी छिन गई।”

निवेश पर संकट: अंतरराष्ट्रीय निवेश पर असर

कश्मीर में पिछले कुछ सालों में निवेश और तरक्की की नई उम्मीदें जगी थीं। जम्मू-कश्मीर सरकार (Baisaran Terror attack) को 8,500 से ज्यादा निवेश प्रस्ताव मिले थे, जिनमें 1.69 लाख करोड़ रुपये का निवेश और 6 लाख लोगों के लिए रोजगार की संभावना थी। इसके अलावा, 25,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं चल रही थीं, जो उद्योग, स्वास्थ्य, और बुनियादी ढांचे से जुड़ी थीं। लेकिन पहलगाम हमले ने इन सब पर सवाल खड़े कर दिए।

यूएई की कंपनी ईमार ग्रुप ने श्रीनगर में ‘मॉल ऑफ श्रीनगर’ और दूसरी परियोजनाओं के लिए 500 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बनाई थी, जिससे 10,000 नौकरियां मिलने वाली थीं। लेकिन अब यह परियोजना अनिश्चितता में है। नून.कॉम, अल माया ग्रुप, जीएल एम्प्लॉयमेंट, और माटू इनवेस्टमेंट्स जैसी विदेशी कंपनियों ने भी निवेश के प्रस्ताव दिए थे, लेकिन अब वे भी पीछे हट सकते हैं।

घरेलू निवेश पर पड़ सकता है असर

जम्मू-कश्मीर में इस समय 25,000 करोड़ रुपये के निवेश प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। लेकिन हमले (Baisaran Terror attack) के बाद निवेशकों का भरोसा डगमगा गया है। ये प्रोजेक्ट्स कई अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े हैं, जैसे: यहां नई फैक्ट्रियां और कारोबार स्थापित करने की योजनाएं हैं, ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। अस्पताल, क्लीनिक, और मेडिकल सुविधाओं को बेहतर करने पर काम हो रहा था। इसके अलावा सड़कें, बिजली, पानी, और दूसरी जरूरी सुविधाओं को बढ़ाने के लिए प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं।

इन प्रोजेक्ट्स के लिए सरकार ने 1,767 प्रस्तावों को मंजूरी दी है, जिनमें 24,729 करोड़ रुपये का निवेश शामिल है। ये प्रोजेक्ट्स न केवल आर्थिक तरक्की लाते, बल्कि यहां के लोगों की जिंदगी को भी आसान बनाते।

वहीं, जम्मू-कश्मीर में अगर ये प्रोजेक्ट्स अगर पूरे हो गए, तो यहां की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। इसके अलावा, 50,000 करोड़ रुपये के और प्रस्ताव मंजूरी की प्रक्रिया में हैं। लेकिन हाल ही में पहलगाम (Baisaran Terror attack) में हुए आतंकी हमले ने इन योजनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जो प्रोजेक्ट्स पहले से चल रहे हैं या जिन्हें मंजूरी मिलने वाली है, उनके लिए अब नए जोखिम पैदा हो गए हैं। निवेशक अब सोच रहे हैं कि क्या यहां पैसा लगाना सुरक्षित है। कई घरेलू निवेशक अपनी योजनाओं को टाल सकते हैं या फिर से विचार कर सकते हैं। उन्हें डर है कि यहां अशांति बढ़ सकती है।

लीथियम भंडार मिलने से चीन और पाकिस्तान बेचैन

इस हमले (Baisaran Terror attack) के पीछे एक बड़ा एंगल जम्मू के में हाल ही में मिले लीथियम भंडार का भी है। 2023 में जम्मू के रियासी जिले के सलाल-हैमाना इलाके में 5.9 मिलियन टन लीथियम भंडार की खोज हुई थी। यह दुनिया का सातवां सबसे बड़ा लीथियम भंडार है, जिसकी कीमत करीब 500 बिलियन डॉलर (लगभग 41 लाख करोड़ रुपये) है। लीथियम इलेक्ट्रिक बैटरी बनाने में काम आता है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए जरूरी है।

सूत्रों का कहना है कि वहां लीथियम के भंडार मिलने के बाद आतंकवाद (Baisaran Terror attack) में भी बढ़ोतरी हुई। क्योंकि इस खोज ने जम्मू-कश्मीर में आर्थिक तरक्की की नई उम्मीद जगाई। भारत सरकार ने इस लीथियम भंडार को जल्द से जल्द इस्तेमाल करने की योजना बनाई। लेकिन यह खोज चीन और पाकिस्तान को रास नहीं आई। चीन लीथियम के वैश्विक बाजार पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है, क्योंकि वह इसकी सबसे बड़ी आपूर्ति करता है। जम्मू में लीथियम मिलने से भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो सकता है, जो चीन के लिए बड़ा झटका है।

सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान भी नहीं चाहता कि कश्मीर (Baisaran Terror attack) में आर्थिक तरक्की हो, क्योंकि इससे उसका कश्मीर पर दावा और कमजोर होगा। पहलगाम हमला कश्मीर में निवेश और तरक्की को रोकने की साजिश का हिस्सा है। लीथियम भंडार ने कश्मीर को वैश्विक आर्थिक नक्शे पर ला दिया है, और यह हमला इस प्रगति को पटरी से उतारने की कोशिश है।

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पाकिस्तान को डर है कि अगर कश्मीर आर्थिक रूप से मजबूत हुआ, तो उसका कश्मीर पर दावा खत्म हो जाएगा।
पहलगाम हमले (Baisaran Terror attack) को इस नजरिए से देखें, तो यह साफ हो जाता है कि यह सिर्फ आतंकवाद का मामला नहीं है। यह कश्मीर की आर्थिक तरक्की को रोकने की साजिश है, जिसमें लीथियम भंडार एक बड़ा कारण है। हमले के बाद निवेशकों का भरोसा डगमगा गया है, और यही वह मकसद था, जिसे पाकिस्तान हासिल करना चाहता था।

Pahalgam Revenge: बहावलपुर या मुरिदके पर गिर सकती है भारत की गाज, बिना बड़ी जंग के होगा करारा वार

Pahalgam Revenge: Bahawalpur or Muridke Likely Indian Targets, No War Needed

Pahalgam Revenge: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत अब जवाबी कार्रवाई की तैयारी में है। इस हमले में 26 पर्यटकों की जान गई थी, जिसके लिए भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसकी शाखा द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) को जिम्मेदार ठहराया। भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि इस हमले का जवाब जरूर दिया जाएगा, लेकिन यह जवाब सधी हुई रणनीति के साथ होगा, ताकि बड़ा युद्ध न छिड़े।

Pahalgam Revenge: Bahawalpur or Muridke Likely Indian Targets, No War Needed

रक्षा मंत्रालय और सेना के सूत्रों के मुताबिक, भारत लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पार किए बिना लंबी दूरी के हथियारों से सीमित हमले (Pahalgam Revenge) करने की योजना बना रहा है। इस बीच, पाकिस्तान ने भी भारत को चेतावनी दी है कि अगर हमला हुआ, तो उसका जवाब कड़ा होगा।

Pahalgam Revenge: कैबिनेट कमेटी की बैठक में जवाबी कार्रवाई की रणनीति

पहलगाम हमले के बाद 23 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की पहली बैठक हुई थी। इस बैठक में कई कूटनीतिक कदमों (Pahalgam Revenge) का ऐलान किया गया। बैठक में इंडस वाटर ट्रीटी को निलंबित करना, पाकिस्तानी हाई कमीशन को छोटा करना, और भारत में मौजूद सभी पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द करना जैसे फैसले लिए गए। इसके बाद 30 अप्रैल को दूसरी CCS बैठक हुई, जिसमें जवाबी कार्रवाई की सैन्य रणनीति पर चर्चा हुई।

प्रधानमंत्री मोदी ने सेना के प्रमुखों को साफ निर्देश दिए कि उनके पास “पूरी ऑपरेशनल आजादी” है। यानी वे यह तय कर सकते हैं कि जवाबी कार्रवाई (Pahalgam Revenge) का तरीका, टारगेट, और समय क्या होगा। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने बताया, “यह सवाल अब यह नहीं है कि सैन्य कार्रवाई होगी या नहीं, बल्कि यह है कि यह कब होगी। हमारा जवाब जल्दबाजी में नहीं, बल्कि सोच-समझकर, विश्वसनीय और सधी हुई रणनीति के साथ दिया जाएगा। हम बड़े युद्ध की तरफ नहीं जाएंगे।”

पाकिस्तान की जवाबी हमले की धमकी

पाकिस्तान ने भारत को कड़ी चेतावनी दी है। पाकिस्तानी सेना ने कहा कि अगर भारत ने कोई हमला किया, तो उसका जवाब बहुत सख्त होगा। पाकिस्तान ने अपनी सेना को अलर्ट पर रखा है और अपनी पूरे एय़र डिफेंस सिस्टम को एक्टिव कर दिया है। एक सैन्य अधिकारी ने बताया कि पिछले छह दिनों से LoC पर दोनों देशों (Pahalgam Revenge) की सेनाओं के बीच लगातार गोलीबारी हो रही है। पाकिस्तान कुपवाड़ा, बारामूला, उरी से लेकर नौशेरा, सुंदरबानी, अखनूर और पुंछ में सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है। इतना ही नहीं, जम्मू में 198 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा (IB) पर भी गोलीबारी शुरू हो गई है।

29 अप्रैल को भारतीय सेना ने डीजीएमओ हॉटलाइन के जरिए पाकिस्तानी सेना (Pahalgam Revenge) को चेतावनी दी कि वह LoC पर “बिना उकसावे की गोलीबारी” बंद करे। लेकिन रात में पाकिस्तानी सेना ने फिर सीजफायर तोड़ा। उसने जम्मू के परगवाल सेक्टर में गोलीबारी शुरू कर दी। जिसका भारतीय सेना ने दोगुनी ताकत से जवाब दिया। एक अधिकारी ने कहा, “हमारी सेना हर सीजफायर उल्लंघन का मुंहतोड़ जवाब दे रही है।”

LoC पार किए बिना हमला

भारत की सैन्य रणनीति (Pahalgam Revenge) इस बार साफ है, जवाबी कार्रवाई LoC पार किए बिना होगी, ताकि बड़ा युद्ध न छिड़े। इसके लिए लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत 155 मिमी आर्टिलरी गन, 120 मिमी मोर्टार, और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों से पाकिस्तानी सेना के ठिकानों और “आतंकी लॉन्च पैड्स” पर हमला कर सकता है। ये लॉन्च पैड LoC के पास बने हैं, जहां से आतंकी भारत में घुसपैठ करते हैं।

अधिकारी ने कहा, “LoC पार किए बिना भी हम लंबी दूरी के हथियारों से पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। हमें खबरें मिली हैं कि पाकिस्तानी सेना के पास 155 मिमी आर्टिलरी गोले की कमी है। उन्होंने अपना रिजर्व स्टॉक तीसरे पक्ष के जरिए यूक्रेन भेजा है, ताकि वे पैसे कमा सकें।” इसका मतलब है कि भारत की इस रणनीति से पाकिस्तानी सेना पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत के पास और क्या हैं विकल्प

भारत के पास और भी सैन्य विकल्प हैं, जो सधी हुई कार्रवाई (Pahalgam Revenge) के तहत इस्तेमाल किए जा सकते हैं। एक विकल्प है सर्जिकल स्ट्राइक, जैसी 2016 में उरी हमले के बाद की गई थी। उरी में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद भारतीय सेना की पैरा-स्पेशल फोर्स ने LoC के पास चार अलग-अलग जगहों पर आतंकी लॉन्च पैड्स को नष्ट कर दिया था। इस बार भी ऐसी कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें छोटे पैमाने पर सीमा पार जाकर हमले किए जाएं।

दूसरा विकल्प है हवाई हमले, जैसा 2019 में बालाकोट (Pahalgam Revenge) में किया गया था। बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के आतंकी ठिकाने पर भारतीय वायु सेना (IAF) ने हमला किया था। एक सैन्य अधिकारी ने बताया कि इस बार वायु सेना के पास पहले से ज्यादा ताकतवर हथियार और विमान हैं। 2019 में बालाकोट हमले के दौरान वायु सेना के पास 4.5 जेनरेशन राफेल फाइटर जेट्स नहीं थे, लेकिन अब वे मौजूद हैं। इसके अलावा, मिराज-2000, सुखोई-30 MKI जैसे विमान फ्रांस की ‘स्काल्प’ एयर-टु-ग्राउंड क्रूज मिसाइल, इजरायल की क्रिस्टल मेज मिसाइल, और स्पाइस-2000 प्रिसिजन गाइडेड बम से लैस हैं।

अधिकारी ने कहा, “इस बार टारगेट JeM का मुख्यालय बहावलपुर या LeT का मुख्यालय मुरिदके हो सकता है। ये दोनों संगठन पहलगाम हमले में शामिल थे।” लेकिन हवाई हमले एक जोखिम भरा कदम हो सकता है, क्योंकि इससे तनाव बढ़ने की आशंका है।

Coup in Pakistan?: पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की आहट? ISI प्रमुख असीम मलिक को इसलिए बनाया NSA! इमरान खान की बढ़ेंगी मुसीबतें

पाकिस्तान को हमले का डर

पाकिस्तान को भारत की जवाबी कार्रवाई (Pahalgam Revenge) का डर सता रहा है। उसने अपनी सेना को हाई अलर्ट पर रखा है और अपने एय़र डिफेंस सिस्टम को एक्टिव कर दिया है। लेकिन भारत की रणनीति साफ है – जवाबी कार्रवाई सधी हुई होगी, ताकि बड़ा युद्ध न छिड़े। भारत का मकसद पाकिस्तान को यह संदेश देना है कि वह आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा, लेकिन साथ ही वह तनाव को बढ़ने से रोकना चाहता है।

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Coup in Pakistan? ISI Chief Asim Malik's surprise appointment as NSA raises coup fears

Coup in Pakistan?: पाकिस्तान की सियासत में एक बार फिर से बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। सरकार ने 29 अप्रैल 2025 को एक अधिसूचना जारी कर ISI (इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद असीम मलिक को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। यह पहली बार है, जब एक सक्रिय ISI प्रमुख को NSA की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि इस कदम को भारत-पाक के बीच चल रहे तनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को देखते हुए किया गया है। वहीं, कई विशेषज्ञ इसे सैन्य तख्तापलट की आहट मान रहे हैं, खासकर तब जब पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं और उनकी पार्टी PTI पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

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Coup in Pakistan?: NSA का पद कब से खाली था?

पाकिस्तान में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) का पद 3 अप्रैल 2022 से खाली था। इस दिन मोईद यूसुफ ने NSA पद से इस्तीफा दे दिया था। मोईद यूसुफ को 17 मई 2021 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने NSA नियुक्त किया था। वह पाकिस्तान के 9वें NSA थे और उनके पास फेडरल कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा था। मोईद यूसुफ ने इस्तीफा अप्रैल 2022 में इमरान खान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (Coup in Pakistan) और सत्ता परिवर्तन के बाद दिया था। 10 अप्रैल 2022 को इमरान खान की सरकार गिर गई, और शहबाज शरीफ नए प्रधानमंत्री बने। जिसके बाद मोईद यूसुफ ने पद छोड़ दिया, क्योंकि वह खान के करीबी माने जाते थे।

इसके बाद 3 अप्रैल 2022 से 30 अप्रैल 2025 तक, यानी लगभग 3 साल और 27 दिन (करीब 37 महीने) तक NSA का पद खाली रहा। इस दौरान शहबाज शरीफ सरकार ने किसी को भी इस पद पर नियुक्त नहीं किया।

Coup in Pakistan?: क्यों नहीं भरा ये पद?

हालांकि शहबाज शरीफ सरकार ने NSA पद को खाली रखने का कोई आधिकारिक कारण (Coup in Pakistan) तो जाहिर नहीं किया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह सेना और सरकार के बीच तनाव का नतीजा था। सेना का प्रभाव बढ़ने और सरकार की कमजोर स्थिति के चलते यह पद रिक्त रहा। इसके अलावा, इमरान खान और उनकी पार्टी PTI पर दबाव डालने के लिए भी सेना इस पद को भरने से बचती रही, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले सीधे सेना के नियंत्रण में रहें। वहीं अब आईएसआई चीफ मलिक की नियुक्ति से यह नियंत्रण और मजबूत हो गया है।

क्या था अधिसूचना में?

पाकिस्तान सरकार के कैबिनेट सचिवालय ने 29 अप्रैल 2025 को एक अधिसूचना जारी की, जिसमें कहा गया कि लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद असीम मलिक, जो ISI के डायरेक्टर जनरल (DG ISI) हैं, को तत्काल प्रभाव से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) का अतिरिक्त प्रभार (Coup in Pakistan) दिया गया है। अधिसूचना पर कैबिनेट सेक्रेटरी कमरान अली अफजल और सेक्शन ऑफिसर मुहम्मद मीसम ने दस्तखत किए हैं। यह अधिसूचना गजट ऑफ पाकिस्तान में प्रकाशित की जाएगी और इसे सभी मंत्रालयों, प्रांतों और संबंधित विभागों को भेजा गया है।

असीम मलिक की यह नियुक्ति इसलिए भी खास है, क्योंकि वह अख्तर अब्दुर रहमान खान (जिन्होंने 1979-1987 तक ISI प्रमुख और सिक्योरिटी एडवाइजर के तौर पर जिया-उल-हक के साथ काम किया) के बाद दूसरे ऐसे सैन्य अधिकारी बन गए हैं, जिन्हें यह दोहरी जिम्मेदारी दी गई है।

पहलगाम हमले का असर

यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब भारत और पाकिस्तान (Coup in Pakistan) के बीच तनाव चरम पर है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की जान गई थी। इस हमले की जिम्मेदारी द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी, जो लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक मुखौटा संगठन माना जाता है। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को जिम्मेदार ठहराया और इंडस वाटर ट्रीटी को निलंबित करना, वाघा-अटारी सीमा को बंद करना, और पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द करना जैसे कदम कई कड़े उठाए।

वहीं भारत के इन कदमों और संभावित सैन्य जवाब (जैसे सर्जिकल स्ट्राइक) ने पाकिस्तान में खलबली मचा दी। सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने दावा किया कि भारत अगले 24-36 घंटों में हमला कर सकता है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तो यह तक कहा कि अगर भारत ने हमला किया, तो पाकिस्तान परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे संकट के बीच असीम मलिक की नियुक्ति को भारत के खिलाफ रणनीति बनाने के तौर पर देखा जा रहा है।

सैन्य तख्तापलट की आशंका

पाकिस्तान मामलों के जानकार प्रोफेसर सूर्य मलिक ने इस नियुक्ति को सैन्य तख्तापलट (Coup in Pakistan) की आहट बताया। उन्होंने कहा कि असीम मलिक का रिटायरमेंट अक्टूबर 2025 में और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर का रिटायरमेंट नवंबर 2025 में होने वाला है। ऐसे में यह नियुक्ति एक सैन्य तख्तापलट की तैयारी हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मलिक की दोहरी भूमिका (ISI और NSA) मिलने के बाद पाकिस्तानी सेना राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों (Coup in Pakistan) को अपने हिसाब से कंट्रोल कर सकती है। उनका कहना है कि इससे यह भी साबित होता है कि सरकार पर इस समय पर सेना का पूरा नियंत्रण है। शहबाज शरीफ कमजोर प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने इसे “नागरिक संस्थानों का सैन्यीकरण” बताया, जो पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक हो सकता है।

इमरान खान और PTI पर बढ़ा दबाव

कुछ विशेषज्ञ इसे पहलगाम हमले (Pahalgam Attack) के बाद इमरान खान के बयान से जोड़ कर देख रहे हैं। इस हमले के बाद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान, जो इस समय जेल में हैं, उन्होंने अपने आधिकारिक X अकाउंट के जरिए एक बयान जारी किया। यह बयान 29 अप्रैल 2025 को सामने आया, जिसमें खान ने हमले की निंदा की, भारत को चेतावनी दी, और शांति पर जोर दिया। इमरान खान ने अपने बयान में पहलगाम हमले (Coup in Pakistan) को “बेहद परेशान करने वाला और दुखद” बताया। उन्होंने हमले में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की और भारत पर कई गंभीर आरोप लगाए। वहीं, खान ने अपने देश की स्थिति पर भी टिप्पणी की और कहा, “दुख की बात है कि एक फर्जी फॉर्म-47 चुनाव परिणामों के जरिए थोपी गई अवैध सरकार ने राष्ट्र को बांट दिया है।”

वहीं इमरान खान (Coup in Pakistan) के इस बयान के बाद ही नया एनएसए नियुक्त करने का फैसला लिया गया। इस नियुक्ति का एक बड़ा असर इमरान खान और उनकी पार्टी PTI पर पड़ सकता है। इमरान खान इस समय जेल में हैं, और PTI पर सैन्य और सरकारी दबाव बढ़ता जा रहा है। एक सूत्र ने दावा किया कि सेना और सरकार इमरान खान को जेल में खत्म करने की योजना बना रहे हैं, जिसमें PTI के नेता अली अमीन गंडापुर की मदद ली जा रही है। दावा किया जा रहा है कि गंडापुर को जल्द ही PTI का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है, ताकि खान का प्रभाव खत्म हो।

असीम मलिक ने पहले भी PTI के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। 2023 में मई 9 दंगों (जो खान की गिरफ्तारी के बाद भड़के थे) की जांच मलिक ने ही की थी, जिसमें PTI के कई नेताओं और समर्थकों को गिरफ्तार किया गया। उनकी NSA नियुक्ति से PTI पर दबाव और बढ़ सकता है। NSA के तौर पर वह राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर PTI के प्रदर्शनों को और दबा सकते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सेना भारत के साथ तनाव का इस्तेमाल खान की रिहाई की मांग को दबाने के लिए कर रही है। उनकी नियुक्ति से PTI को और सख्ती का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, PTI समर्थक मलिक को “मुनीर का हथियार” मानते हैं, जो खान की रिहाई और उनकी पार्टी की गतिविधियों को रोकने के लिए काम करेगा।

पाकिस्तान में आंतरिक अस्थिरता

पाकिस्तान इस समय कई आंतरिक चुनौतियों (Coup in Pakistan) से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी हमले बढ़ रहे हैं। हाल ही में बलूच विद्रोहियों ने एक ट्रेन को हाईजैक कर 25 यात्रियों की हत्या कर दी थी। इसके अलावा, आर्थिक संकट ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में सेना और ISI की भूमिका और मजबूत हो गई है।

असीम मलिक की नियुक्ति को सेना की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वह भारत के साथ तनाव को बढ़ाकर जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटाना चाहती है। सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर पर भी अपनी छवि सुधारने का दबाव है, क्योंकि खान की गिरफ्तारी के बाद उनकी लोकप्रियता में कमी आई है। मलिक की नियुक्ति से मुनीर को एक भरोसेमंद सहयोगी मिल गया है, जो उनकी रणनीतियों को लागू कर सकता है।

पहला PhD धारक ISI प्रमुख

असीम मलिक ISI के पहले डायरेक्टर जनरल हैं, जिनके पास डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (PhD) की डिग्री है। उन्होंने नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी (NDU), इस्लामाबाद से अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर शोध करके यह डिग्री हासिल की। मलिक ने अमेरिका के फोर्ट लेवनवर्थ में पढ़ाई के दौरान “माउंटेन वॉरफेयर: द नीड फॉर स्पेशलिस्ट ट्रेनिंग” शीर्षक से एक थीसिस लिखी। यह थीसिस पहाड़ी क्षेत्रों में युद्ध की रणनीतियों पर केंद्रित थी। भारत-पाकिस्तान सीमा, खासकर लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) और PoK जैसे इलाकों से भी इसे जोड़ कर देखा जा रहा है।

मलिक एक सैन्य परिवार से आते हैं। उनके पिता, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) गुलाम मोहम्मद मलिक (जिन्हें “जनरल GM” कहा जाता था), 1990 के दशक में 10 कोर, रावलपिंडी के कमांडर थे और कश्मीर में LoC की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे। अपने पिता के नक्शे कदम पर चल कर मलिक ने फौज ज्वॉइन की। उन्होंने पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी (PMA) के 80वें लॉन्ग कोर्स में स्वॉर्ड ऑफ ऑनर जीता। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल नईम खालिद लोधी ने मलिक को “शांत लेकिन सम्मानित” अधिकारी बताया था।

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वहीं, मलिक ने एडजुटेंट जनरल (AG) के तौर पर मई 9, 2023 के दंगों की जांच की थी, जो इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद भड़के थे। उन्होंने पूर्व ISI प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद के खिलाफ कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू की और उसकी निगरानी की। हमीद पर भ्रष्टाचार और सैन्य अनुशासन तोड़ने के आरोप थे।

Defence Ministry: रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला- छह कंपनियों पर तीन साल के लिए और बढ़ाया बैन, रक्षा सौदों में पारदर्शिता पर जोर

Defence Ministry bans six firms for 3 more years, stresses transparency

Defence Ministry: रक्षा मंत्रालय ने छह कंपनियों पर लगे प्रतिबंध को और तीन साल के लिए बढ़ा दिया है। यह फैसला रक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार रोकने के लिए लिया गया है। इन कंपनियों पर पहली बार 2012 में 10 साल का प्रतिबंध लगा था, जो अब 11 अप्रैल 2025 से 11 अप्रैल 2028 तक लागू रहेगा। यह फैसला रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) के उत्पादन विभाग (डीडीपी) और सतर्कता विभाग (डी/विज) ने लिया है।

Defence Ministry bans six firms for 3 more years, stresses transparency

Defence Ministry: कौन हैं ये कंपनियां?

रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) ने जिन छह कंपनियों को प्रतिबंधित किया है, उनमें सिंगापुर टेक्नोलॉजीज काइनेटिक्स (सिंगापुर), इज़राइल मिलिट्री इंडस्ट्रीज (इज़राइल), टी.एस. किसान एंड कंपनी (नई दिल्ली), आर.के. मशीन टूल्स (लुधियाना), राइनमेटल एयर डिफेंस (ज्यूरिख) और रूस की कॉर्पोरेशन डिफेंस शामिल हैं।

इन कंपनियों पर 2009 में सीबीआई की जांच के बाद भ्रष्टाचार और गलत तरीकों से रक्षा सौदों को प्रभावित करने का आरोप लगा था। इसके चलते 2012 में इन्हें रक्षा मंत्रालय के साथ कारोबार करने से रोक दिया गया। 2023 में प्रतिबंध तीन साल बढ़ाया गया, और अब 2025 में फिर से इसे बढ़ाया गया है। रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) ने इस फैसले को अपनी नीतियों के पैरा F.3 के तहत लिया है, जो रक्षा मंत्रालय के साथ व्यापार करने वाली संस्थाओं के लिए दिशानिर्देश और सजा से संबंधित है।

क्यों लगा थाा प्रतिबंध?

2009 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद इन कंपनियों के खिलाफ जांच शुरू की थी, जिसमें रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी और दलाली के सबूत मिले थे। इस मामले में कई कंपनियों और व्यक्तियों पर रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को प्रभावित करने और अनुचित लाभ लेने का आरोप लगा। 2012 में, रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) ने अपनी सतर्कता नीतियों के तहत इन कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया और दस साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया। इस दौरान इन कंपनियों को रक्षा मंत्रालय या इसके किसी भी विंग के साथ किसी भी तरह का व्यापार करने पर रोक लगा दी गई।

रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) के सूत्रों का कहना है, “यह फैसला डिफेंस सेक्टर में पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। हमारी नीतियों के अनुसार, किसी भी तरह की अनैतिक गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रतिबंध को लागू करने की जिम्मेदारी मंत्रालय के सभी विंग्स और सर्विस हेडक्वार्टर्स पर होगी।

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रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) ने अपने दस्तावेज़ में यह भी उल्लेख किया है कि यह फैसला 2016 में जारी किए गए दिशानिर्देशों (पैरा 37, डी(विज) आईडी नंबर 31013/1/2016) के अनुरूप है, जिसमें सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सभी यूनिट्स को निर्देश दिए गए हैं। इस नीति का मुख्य उद्देश्य रक्षा खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और भ्रष्टाचार को खत्म करना है।

Explained NSAB: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में बड़ा बदलाव, रॉ चीफ की वापसी और तीनों सेनाओं के वेटरंस शामिल, भारत की सुरक्षा रणनीति को कैसे मिलेगा फायदा?

Explained NSAB: Major revamp, ex-RAW chief to lead, veterans join, what it means for India’s security

Explained NSAB: 30 अप्रैल 2025 को भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) का पुनर्गठन कर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। इस बोर्ड के नए अध्यक्ष के रूप में पूर्व रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) प्रमुख अलोक जोशी को नियुक्त किया गया है। सात सदस्यीय इस बोर्ड में तीन सैन्य सेवानिवृत्त अधिकारी, दो भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के सेवानिवृत्त अधिकारी, और एक भारतीय विदेश सेवा (IFS) का सेवानिवृत्त अधिकारी शामिल हैं। इस बोर्ड के पुनर्गठन का समय बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

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Explained NSAB: क्या है और क्या करता है?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (National Security Advisory Board – NSAB) भारत की सुरक्षा से जुड़ा एक बहुत महत्वपूर्ण समूह है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) को सलाह देता है, जिसके प्रमुख खुद प्रधानमंत्री होते हैं। NSC देश की सुरक्षा और विदेश नीति के बड़े फैसले लेता है, और NSAB उसे लंबे समय तक चलने वाली योजनाएं और सुझाव देता है। इस बोर्ड का काम है कि यह आतंकवाद, सीमा की सुरक्षा, साइबर खतरों और पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों जैसे मुद्दों पर सरकार को रास्ता दिखाए।

NSAB की शुरुआत 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने की थी। इसमें आमतौर पर सेना, खुफिया एजेंसी, पुलिस और विदेश सेवा के रिटायर्ड विशेषज्ञ शामिल होते हैं। यह बोर्ड सरकार से थोड़ा अलग काम करता है, ताकि वह निष्पक्ष और भविष्य को ध्यान में रखकर सलाह दे सके। उदाहरण के लिए, 2001 में NSAB ने भारत की परमाणु नीति बनाई थी और 2002 में रक्षा से जुड़े बड़े दस्तावेज तैयार किए थे।

Explained NSAB: सात लोगों का नया बोर्ड बनाया

इस बार सरकार ने NSAB को और मजबूत करने के लिए सात लोगों का नया बोर्ड बनाया है। इसका नेतृत्व अलोक जोशी कर रहे हैं, जो R&AW के पूर्व प्रमुख हैं। जोशी ने अपने करियर में कई बड़े खुफिया ऑपरेशन को अंजाम दिया है, और उनकी नियुक्ति से भारत की खुफिया और बाहरी सुरक्षा को नई ताकत मिलेगी। जोशी गहरी रणनीतिक सोच और कूटनीतिक समझ रखते हैं। साथ ही, भारत की विदेश नीति और खुफिया रणनीति को लेकर लंबा अनुभव है।

Explained NSAB: Major revamp, ex-RAW chief to lead, veterans join, what it means for India’s security
Former RAW Chief Alok Joshi

बोर्ड के बाकी छह सदस्य इस प्रकार हैं:

  • एयर मार्शल पी.एम. सिन्हा (रिटायर्ड) वायुसेना के वेस्टर्न एयर कमांड के पूर्व प्रमुख रहे हैं, जो वायुसेना की ताकत और एयर स्ट्रैटेजी में विशेषज्ञता रखते हैं।
  • लेफ्टिनेंट जनरल ए.के. सिंह (रिटायर्ड) थलसेना के साउदर्न आर्मी कमांडर के रूप में सेवा दे चुके हैं, और थल सेना के रणनीतिक अभियानों में लंबा अनुभव है।
  • रियर एडमिरल मॉन्टी खन्ना (रिटायर्ड) नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो समुद्री सुरक्षा व हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीति के जानकार हैं।
  • राजीव रंजन वर्मा (रिटायर्ड IPS) पुलिस के पूर्व अधिकारी हैं और रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के पूर्व महानिदेशक भी रहे हैं। उन्हें आंतरिक सुरक्षा और लॉ एंड ऑर्डर का लंबा अनुभव है।
  • मनमोहन सिंह (रिटायर्ड IPS) सशस्त्र सीमा बल (SSB) के पूर्व महानिदेशक रह चुके हैं। साथ ही, वे भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा सुरक्षा के विशेषज्ञ भी हैं।
  • बी. वेंकटेश वर्मा (रिटायर्ड IFS) पूर्व राजनयिक हैं, रूस में पूर्व राजदूत रह चुके हैं। उनका रक्षा और परमाणु कूटनीति में विशेष योगदान रहा है।

इस बोर्ड में सेना, पुलिस और विदेश सेवा के लोग शामिल हैं, जो इसे हर तरह की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाएगा। यह बोर्ड आतंकवाद, साइबर हमले और पड़ोसी देशों के साथ तनाव जैसे मुद्दों पर एक साथ काम करेगा।

Explained NSAB: क्यों हुआ यह पुनर्गठन?

NSAB का नया स्वरूप ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत को कई तरह की सुरक्षा समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि यह सीमा पार से आतंकवाद का हिस्सा है। इसके बाद भारत ने इंडस वाटर ट्रीटी को रोक लगा दी, सीमा पर सैनिकों की संख्या बढ़ा दी और पाकिस्तान के साथ हवाई यात्रा और व्यापार पर पाबंदी लगा दी। इसके अलावा साइबर हमले और हाइब्रिड वॉर का खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसे में भारत को एक ऐसे रणनीतिक सलाहकार ढांचे की जरूरत थी जो केवल कागजी न रहकर जमीनी, खुफिया, तकनीकी और कूटनीतिक मोर्चों पर सरकार की मदद कर सके।

इन सभी घटनाओं के बीच, NSAB का पुनर्गठन भारत की सुरक्षा को और मजबूत करने का एक जरूरी कदम है। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक के बाद लिया गया, जिसमें आतंकवाद और सीमा सुरक्षा पर गहन चर्चा हुई थी।

NSAB के पुनर्गठन से क्या फायदे होंगे?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) आतंकवाद, उग्रवाद, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, परमाणु नीति, विदेश नीति में रणनीति, सैन्य आधुनिकीकरण, सीमा प्रबंधन, और रक्षा अनुसंधान व विकास पर सलाह देता है। यह भारत की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियां बनाता है।

NSAB का नया स्वरूप भारत की सुरक्षा को कई तरह से मजबूत करेगा। यह बोर्ड देश को मौजूदा और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में मदद करेगा। नए बोर्ड में हर क्षेत्र के विशेषज्ञ एक साथ हैं। इसमें सेना, पुलिस, खुफिया और विदेश सेवा के अनुभवी लोग हैं। नए बोर्ड को हर तरह की समस्या को अलग-अलग नजरिए से देखने और हल करने की ताकत मिलेगी। मिसाल के तौर पर, अलोक जोशी खुफिया जानकारी जुटाने और आतंकवाद से निपटने की योजना बनाएंगे। सैन्य अधिकारी युद्ध और रक्षा की रणनीति पर काम करेंगे, जबकि राजनयिक विदेश नीति को बेहतर बनाएंगे।

पहलगाम हमले ने दिखाया कि आतंकवाद अब भी भारत के लिए बड़ा खतरा है। NSAB का नया बोर्ड आतंकवाद के खिलाफ लंबे समय तक चलने वाली योजनाएं बनाएगा। यह बोर्ड सरकार को सलाह देगा कि पाकिस्तान से आने वाले आतंकवाद को कैसे रोका जाए, खुफिया जानकारी को कैसे बेहतर किया जाए और आतंकवादियों को पकड़ने के लिए क्या कदम उठाए जाएं।

पड़ोसी देशों के साथ तनाव से निपटने में भी यह बोर्ड मदद करेगा। NSAB का बोर्ड इन समस्याओं का गहराई से विश्लेषण करेगा और भारत को सैन्य और कूटनीतिक रणनीति सुझाएगा। मिसाल के तौर पर, अगर पाकिस्तान आतंकियों की मदद कर रहा है, तो बोर्ड भारत को जवाबी कदम उठाने की सलाह दे सकता है।

आज युद्ध सिर्फ बंदूक और टैंक से नहीं, बल्कि कंप्यूटर और ड्रोन से भी लड़ा जाता है। NSAB का नया बोर्ड साइबर हमलों, ड्रोन युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए खतरों से निपटने की योजना बनाएगा। अलोक जोशी जैसे विशेषज्ञ साइबर खुफिया जानकारी को और मजबूत करेंगे, ताकि भारत के बैंक, बिजली ग्रिड और सरकारी सिस्टम सुरक्षित रहें।

NSAB के पुलिस अधिकारी, जैसे राजीव रंजन वर्मा और मनमोहन सिंह, देश की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को बेहतर बनाने की सलाह देंगे। यह बोर्ड केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सुरक्षा को लेकर तालमेल बढ़ाने में भी मदद करेगा।

इसके अलावा NSAB का बोर्ड भारत को दुनिया के मंच पर और मजबूत बनाएगा। यह संयुक्त राष्ट्र और अन्य जगहों पर भारत की सुरक्षा नीतियों को सही तरीके से पेश करने की रणनीति बनाएगा। मिसाल के तौर पर, यह बोर्ड पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थन को दुनिया के सामने लाने के लिए ठोस सबूत और रास्ते सुझा सकता है।

NSAB का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह भविष्य को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाता है। यह बोर्ड अगले 10-20 साल में भारत को किन खतरों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी या पड़ोसी देशों की नीतियां, इन पर सलाह देगा। इससे भारत पहले से तैयार रहेगा।

क्यों जरूरी था बदलाव?

2020 के बाद भारत ने देखा कि चीन और पाकिस्तान के साथ सीमाओं पर तनाव बढ़ा है। साइबर हमले और हाइब्रिड वॉर का खतरा भी गहराया है। ऐसे में भारत को एक ऐसे रणनीतिक सलाहकार ढांचे की जरूरत थी जो केवल कागज़ी न रहकर जमीनी, खुफिया, तकनीकी और कूटनीतिक मोर्चों पर सरकार की मदद कर सके।

अजीत डोभाल को करता है रिपोर्ट

NSAB सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को रिपोर्ट करता है। इसका फीडबैक प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को जाता है। इसका काम है नीतिगत सिफारिशें तैयार करना, जिन पर राष्ट्रीय स्तर पर फैसले लिए जा सकते हैं।

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क्यों भारत के लिए है Gamechange?

भारत आज जिस जियोपॉलिटिकल टकराव के दौर से गुजर रहा है, उसमें NSAB जैसे रणनीतिक सलाहकार बोर्ड का मजबूत और अनुभवी होना जरूरी है। RAW के पूर्व प्रमुख से लेकर सेना और विदेश सेवा के दिग्गजों की मौजूदगी यह सुनिश्चित करेगी कि भारत की सुरक्षा नीतियां व्यापक, व्यावहारिक और भविष्य के प्रति सोच रखते हों। यह बोर्ड न सिर्फ सरकार को सही सलाह देगा, बल्कि भारत की रणनीतिक तैयारी और प्रतिक्रिया क्षमता को भी सुदृढ़ करेगा। बदलते वैश्विक समीकरणों में यह बदलाव भारत के लिए “रणनीतिक आत्मनिर्भरता” की दिशा में एक अहम कदम है।

India-Pak tension: Pahalgam हमले के बाद पाकिस्तान को भारतीय सेनाओं का खौफ, जंग हुई तो उतारेगा ‘प्राइवेट आर्मी’!

India-Pak Tension: Pak Plans to Deploy Private Army Amid Pahalgam Fallout
Image Source: @forwardobservations2.0

India-Pak tension: पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ होने के सबूतों के बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा यानी आईबी और एलओसी पर तनाव चरम पर है। पिछले चार दिनों से लगातार पाकिस्तान की तरफ से सीज फायर तोड़ा जा रहा है और भारतीय ठिकानों पर जमकर गोलाबारी की जा रही है। हालांकि इन हमलों का भारतीय सेना मुंहतोड़ जवाब भी दे रही है। पाकिस्तान को इस बात की दहशत है कि भारत कभी भी हमला कर सकता है, इसके लिए उसने विदेशी निजी सैन्य कंपनी को भी हायर किया है। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तानी सेना ने प्राइवेट मिलिट्री कंपनी (PMC) के करार किया है। कहा जा रहा है कि अगर भारत-पाक के बीच युद्ध के हालात बनते हैं, तो यह कंपनी पाकिस्तान सेना की मदद करेगी।

India-Pak Tension: Pak Plans to Deploy Private Army Amid Pahalgam Fallout
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India-Pak tension: क्या होती हैं पीएमसी?

निजी सैन्य कंपनियां (पीएमसी) ऐसी निजी फर्में हैं जो सैन्य और सुरक्षा सेवाएं देती हैं। ये सरकारी (India-Pak tension) सेनाओं, निजी कंपनियों, या गैर-राज्य संगठनों के लिए काम करती हैं। वैगनर ग्रुप (रूस), वेस्टर्न पीएमसी, मोजार्ट ग्रुप और ब्लैकवाटर (अमेरिका) जैसी पीएमसी ने यूक्रेन, सीरिया, और इराक जैसे संघर्षों में हिस्सा लिया है। पीएमसी में अक्सर पूर्व सैनिक, खासकर विशेष बलों के, शामिल होते हैं, क्योंकि उनकी ट्रेनिंग और अनुभव उच्च स्तर का होता है। डेल्टा पीएमसी में ब्रिटिश सेना के पूर्व स्पेशल फोर्सेस (एसएएस) के जवान शामिल हैं। हालांकि पीएमसी बेहद महंगी होती हैं। वैगनर के सैनिकों को प्रति माह 2500-3000 डॉलर मिलते हैं। इसके अलावा 1989 के यूएन मर्सिनरी कन्वेंशन में भाड़े के सैनिकों की भर्ती और इस्तेमाल पर रोक है। लेकिन पाकिस्तान ने इस पर दस्तखत नहीं किए हैं।

India-Pakistan tension: पाकिस्तानी सेना की काबिलियत पर भरोसा नहीं

सूत्रों ने दावा किया है कि पाकिस्तानी हुक्मरानों (India-Pak tension) में इस कदर दहशत है कि उन्हें पाकिस्तानी सेना की काबिलियत पर भरोसा नहीं हो रहा है। जिस तरह से बलुचिस्तान में वहां की बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने 11 मार्च 2025 को जाफर एक्सप्रेस ट्रेन का अपहरण किया था, जिसमें 100 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को बंधक बना लिया गया था। इस घटना के बाद बंधकों को छुड़ाने में पाकिस्तानी सेना के हाथ पैर फूल गए थे। इस घटना के बाद पाकिस्तानी हुक्मरानों का भरोसा अपनी ही सेना से डगमगा गया था। जिसके बाद माना जा रहा है कि उन्होंने प्राइवेट मिलिट्री कंपनी की सेवाएं लेने का फैसला किया हो। हालांकि सूत्रों का यह भी कहना है कि ये भाड़े के सैनिक शायद ही सीधे एलओसी पर तैनात हों। लेकिन हो सकता है कि वे पाकिस्तानी सेना को लॉजिस्टिक्स या ट्रेनिंग में मदद करें। इस बात के भी कयास हैं कि युद्ध के हालात में जब पाकिस्तानी सेना बॉर्डर पर तैनात हो, तो ये पाकिस्तान के अहम मिलिट्री प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में तैनात हों।

India-Pakistan tension: तुर्किए से भी मांगी मदद

हालांकि पाकिस्तान सेना में 6.5 लाख सक्रिय सैनिक और स्पेशल सर्विस ग्रुप हैं। लेकिन फिर भी पाकिस्तानी सरकार (India-Pak tension) को उन पर भरोसा नहीं है। पाकिस्तानी पहले ही तुर्किए से सैन्य मदद मांगी, जिसके बाद तुर्किए ने पहलगाम हमले के बाद कई सैन्य कार्गो विमान पाकिस्तान भेजे, जिनमें युद्ध उपकरण और हथियार शामिल थे। एक तुर्की वायुसेना का C-130 हरक्यूलिस कार्गो विमान कराची में उतरा, जिसमें अज्ञात युद्ध उपकरण थे। इसके अलावा, छह अन्य C-130 विमान इस्लामाबाद के एक सैन्य अड्डे पर उतरे। इन विमानों में ड्रोन, केमानकेस क्रूज मिसाइलें, और अन्य एडवांस वीपेंस शामिल थे।

CPEC की सुरक्षा करती हैं प्राइवेट सिक्योरिटी फर्म्स

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान (India-Pak tension) ने प्राइवेट सिक्योरिटी फर्म्स की मदद ली हो। इससे पहले 2024 में, ग्वादर पोर्ट की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान ने निजी सुरक्षा कंपनियों (प्राइवेट सिक्योरिटी फर्म्स) को शामिल किया था। जिन्हें खौस तौर पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़े प्रोजेक्ट्स और चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए तैनात किया था। ग्वादर पोर्ट CPEC का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और बलूचिस्तान के पास है, जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम है।

दरअसल ग्वादर पोर्ट (India-Pak tension) और CPEC प्रोजेक्ट्स पर बार-बार आतंकी हमले हुए हैं। इसे बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और अन्य आतंकी समूहों से लगातार खतरा रहता है। मई 2019 में ग्वादर के पर्ल कॉन्टिनेंटल होटल पर BLA ने हमला किया था, और अक्टूबर 2024 में बलूचिस्तान में दो चीनी नागरिकों को निशाना बनाया गया। पाकिस्तान ने CPEC की सुरक्षा के लिए 2016 में एक विशेष सुरक्षा डिवीजन (SSD) बनाई, जिसमें 15,000 सैनिक और पुलिसकर्मी शामिल हैं। इसके बावजूद, आतंकी हमले नहीं रुके।

जिसके बाद पाकिस्तान (India-Pak tension) ने ग्वादर पोर्ट और CPEC प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा के लिए तीन चीनी निजी सुरक्षा कंपनियों को तैनात करने का फैसला किया था। इनमें ड्यूई सिक्योरिटी फ्रंटियर सर्विस ग्रुप, चाइना ओवरसीज सिक्योरिटी ग्रुप, और हुआक्सिन झोंगशान सिक्योरिटी सर्विस शामिल हैं। ये कंपनियां चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के रिटायर्ड अधिकारियों से जुड़ी हैं और इनका मुख्य काम चीनी नागरिकों, बुनियादी ढांचे, और ग्वादर पोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा करना है। इनमें हुआक्सिन झोंगशान सिक्योरिटी सर्विस विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा में माहिर है और ग्वादर पोर्ट की सुरक्षा में अहम भूमिका है।

Pahalgam NIA Probe: एक चेहरा, तीन हमले! NIA जांच में कई खुलासे, हमले में कई आतंकी समूह शामिल!

इसके अलावा पाकिस्तान (India-Pak tension) की अपनी निजी सुरक्षा कंपनियां, जैसे अस्करी गार्ड्स लिमिटेड (AGL) और ज़िम्स सिक्योरिटी, भी ग्वादर और CPEC प्रोजेक्ट्स में सुरक्षा सेवाएं देती हैं। AGL, जो पाकिस्तान सेना के आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट की सहायक कंपनी है, देश की सबसे बड़ी निजी सुरक्षा फर्मों में से एक है। इसके 20,000 से अधिक प्रशिक्षित कर्मचारी हैं, जो ग्वादर जैसे रणनीतिक स्थानों पर संपत्ति सुरक्षा, नकद परिवहन, और अन्य सुरक्षा सेवाएं प्रदान करते हैं।

Pahalgam NIA Probe: एक चेहरा, तीन हमले! NIA जांच में कई खुलासे, हमले में कई आतंकी समूह शामिल!

Pahalgam NIA Probe: Common Link Found in Pahalgam, Gulmarg and Gagangeer Attacks

Pahalgam NIA Probe: पिछले कुछ महीनों में जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमलों ने देश को झकझोर कर रख दिया है। अक्टूबर 2024 में गगनगीर गांदरबल) में एक निर्माण स्थल पर सात मजदूरों की हत्या, गुलमर्ग (बारामुला) के पास बोता पठरी में सेना के वाहन पर हमला और अब पहलगाम (अनंतनाग) में पर्यटकों पर हमला, ये सभी घटनाएं आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में नई चुनौतियां पेश कर रही हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) (Pahalgam NIA Probe) इन हमलों के बीच संबंधों की जांच कर रही है और यह जानने की कोशिश कर रही है कि क्या इनके पीछे कोई साझा साजिश है।

Pahalgam NIA Probe: Common Link Found in Pahalgam, Gulmarg and Gagangeer Attacks

जांच में सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ है कि इन हमलों में पाकिस्तानी आतंकी हाशिम मूसा उर्फ सुलेमान का नाम बार-बार सामने आ रहा है। इसके साथ ही, खुफिया जानकारी की कमी और घुसपैठ पर नजर रखने में चूक भी जांच के केंद्र में है।

Pahalgam NIA Probe: तीन हमलों का एक सूत्र: हाशिम मूसा

एनआईए की जांच (Pahalgam NIA Probe) में पता चला है कि गगनगीर, गुलमर्ग और पहलगाम हमलों में एक साझा कड़ी है पाकिस्तानी आतंकी हाशिम मूसा उर्फ सुलेमान। तकनीकी साक्ष्यों, जैसे कॉल रिकॉर्ड्स और डिजिटल फुटप्रिंट्स से पता चला है कि मूसा ने इन तीनों हमलों के मॉड्यूल्स को निर्देश दिए। वह लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) से जुड़ा है, लेकिन जांचकर्ता इस बात से इंकार नहीं कर रहे कि उसका संबंध घाटी में सक्रिय अन्य पाकिस्तान समर्थित आतंकी समूहों से भी हो सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, आतंकी संगठन अब ‘क्रॉस-पोलिनेशन’ की रणनीति अपना रहे हैं, यानी अलग-अलग संगठनों के आतंकी एक-दूसरे के साथ मिलकर हमले कर रहे हैं। इसका मकसद जम्मू-कश्मीर को अशांत बनाए रखना है। मूसा जैसे आतंकी इस रणनीति के केंद्र में हैं, जो विभिन्न मॉड्यूल्स को जोड़कर हमलों को अंजाम दे रहे हैं।

हमलों का तरीका: सुरक्षित इलाकों को निशाना बनाना

जांच (Pahalgam NIA Probe) में पता चला है कि इन तीनों हमलों में आतंकियों के हमले का पैटर्न एक जैसा ही रहा है। गगनगीर में मजदूरों को, गुलमर्ग में सेना के जवानों और कुलियों को, और पहलगाम में पर्यटकों को निशाना बनाया गया। ये सभी इलाके पहले सुरक्षित माने जाते थे, जहां आतंकी गतिविधियां कम थीं। एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी के अनुसार, “आतंकियों का मकसद सरकार की उपलब्धियों जैसे अनुच्छेद 370 हटाने के बाद हुए विकास और पर्यटन को कमजोर करना है।”

हमलों में इस्तेमाल हुए हथियार और तकनीक भी पहले से ज्यादा एडवांस थे। आतंकियों के पास नाइट विजन डिवाइस, एमपी3 मशीन गन, एके-47 और अन्य आधुनिक हथियार थे। उनकी ट्रेनिंग और हमले की योजना और तैयारियों से पता चलता है कि ये हमले सोच-समझकर किए गए थे। ये हमले राज्य में अलग-अलग जगहों पर हुए थे, लेकिन इनसे सुरक्षा बल भ्रमित हो गए।

खुफिया नाकामी: घुसपैठ पर क्यों नहीं रही नजर?

एनआईए की जांच (Pahalgam NIA Probe) में खुलासा हुआ है कि ये आतंकी भारत में कहां से आए, कब घुसे, इसकी कोई ठोस जानकारी सुरक्षा एजेंसियों के पास नहीं थी। सूत्रों के मुताबिक, आतंकी कम समय में घुसपैठ करने में कामयाब रहे और लंबे समय तक छिपे रहे। उन्होंने घटनास्थल की पहले से रेकी (recce) की थी और हमले के बाद तुरंत गायब हो गए। यह सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वहीं हमले के दौरान फायर डिसिप्लिन और कोऑर्डिनेशन ऐसा था कि सुरक्षा बलों को अंदेशा तक नहीं हुआ। इसके अलावा पहलगाम जैसे पर्यटक स्थल, जो पहले आतंकी हमलों से बचे रहे थे, अब निशाने पर हैं। आतंकी अब उन इलाकों को टारगेट कर रहे हैं, जहां सुरक्षा व्यवस्था लचर है। सूत्रों ने बताया कि ऐसा माना जा रहा है कि ये आतंकी कम एक्टिविटीज वाले इलाकों में आए और महीनों तक डॉर्मेंट सेल्स की तरह छिपे रहे। यही वजह है कि वे लंबे समय तक नजरों से बचे रहे और एक के बाद एक हमला कर पाए।

लोकल नेटवर्क पर कार्रवाई

हमलों के पीछे के नेटवर्क को तोड़ने के लिए सुरक्षा बल (Pahalgam NIA Probe) स्थानीय स्तर पर सक्रिय सहायकों (ओवरग्राउंड वर्कर्स) पर शिकंजा कस रहे हैं। कश्मीर में चार आतंकियों के घरों को ध्वस्त किया गया है और 63 ठिकानों पर छापेमारी की गई है। ये लोग आतंकियों को लॉजिस्टिक सपोर्ट, जैसे हथियार और ठिकाने, उपलब्ध कराते हैं। इनके नेटवर्क को तोड़ना जांच के लिए अहम है, क्योंकि इससे आतंकियों के मूवमेंट और योजनाओं का पता चल सकता है। अब NIA और J&K पुलिस की स्पेशल यूनिट्स का ध्यान इस बात पर है कि इन आतंकियों को स्थानीय स्तर पर किसने सहयोग दिया। OGWs (Over Ground Workers) की पहचान की जा रही है। उनके फोन रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजैक्शन्स और मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है।

Pahalgam terror attack: क्या भारत फिर करेगा सर्जिकल स्ट्राइक या एयरस्ट्राइक? इन चार रणनीतियों से आतंक के समूल नाश की तैयारी

इसके साथ ही, जम्मू-कश्मीर पुलिस और भारतीय सेना के आतंकवाद-रोधी कमांडो पाकिस्तानी आतंकियों की तलाश में जुटे हैं। मूसा जैसे वांछित आतंकियों को पकड़ना या खत्म करना इस समय सबसे बड़ा लक्ष्य है।

मल्टी-ग्रुप कोऑर्डिनेशन की रणनीति

सूत्रों (Pahalgam NIA Probe) का कहना है कि हाशिम मूसा की गतिविधियों से यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान स्थित आतंकी गुट केवल लश्कर-ए-तैयबा तक सीमित नहीं हैं। मूसा जैसे आतंकी मल्टी-ग्रुप कोऑर्डिनेशन कर रहे हैं। यानी जैश-ए-मोहम्मद, हिज्बुल मुजाहिदीन और लश्कर सभी उसे सपोर्ट उपलब्ध का रहे हैं। इन गुटों की रणनीति है कि अलग-अलग नामों से छोटे हमले करें, जिससे एजेंसियां भ्रम में रहें और कोई बड़ा लिंक न बना सकें।

Pahalgam terror attack: क्या भारत फिर करेगा सर्जिकल स्ट्राइक या एयरस्ट्राइक? इन चार रणनीतियों से आतंक के समूल नाश की तैयारी

Pahalgam Terror Attack: Will India Opt for Surgical Strike or Airstrike Again?

Pahalgam terror attack: पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में केंद्र सरकार ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ढांचे को नेस्तनाबूद करने के लिए एक चार-स्तरीय रणनीति तैयार की है। इस रणनीति के तहत न केवल आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, बल्कि स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता को भी बढ़ावा मिलेगा। केंद्र सरकार की इस नई रणनीति का मकसद पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों का समूल नाश करना है।

Pahalgam Terror Attack: Will India Opt for Surgical Strike or Airstrike Again?

Pahalgam terror attack: पहला कदम: स्थानीय मददगारों पर नकेल

सरकार ने सबसे पहले कश्मीर घाटी में मौजूद उन स्थानीय नेटवर्कों को तोड़ने पर फोकस किया है, जो आतंकवादियों को मदद दे रहे हैं। सुरक्षा बल आतंकियों के लोकल ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) का पता लगा रहे हैं। जैसे ही सुरक्षा बलों को किसी कई ओवरग्राउंड वर्कर्स के पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो उनके घरों को ध्वस्त किया जा रहा है। वहीं, इस कार्रवाई में स्थानीय जनता भी सहयोग कर रही है। क्योंकि पहलगाम हमले (Pahalgam terror attack) के बाद से घाटी के लोग भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हुए हैं। हालांकि, यह कार्रवाई बहुत सावधानी से की जा रही है ताकि स्थानीय लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि जब आतंकी नेटवर्क के जमीनी मददगार खत्म होंगे, तो आतंकियों का लॉजिस्टिक सपोर्ट और सुरक्षित पनाहगाहें भी खत्म हो जाएंगी।

सूत्रों का कहना है कि सरकार घाटी के अंदर और बाहर आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता का माहौल बना रही है। स्थानीय लोगों को आतंकवाद के खिलाफ जागरूक किया जा रहा है और उन्हें यह समझाया जा रहा है कि आतंकवाद न केवल कश्मीर, बल्कि पूरे देश के लिए खतरा है। क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ किसी भी रणनीति की सफलता तभी संभव है, जब स्थानीय लोग इसमें सक्रिय रूप से शामिल हों।

Pahalgam terror attack: दूसरा कदम: सीमा पर संभाला मोर्चा

पाकिस्तान के साथ लगी नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर तनाव बढ़ रहा है। पाकिस्तानी सेना ने (Pahalgam terror attack) लगातार चौथी रात को कुपवाड़ा, पुंछ और अखनूर सेक्टरों में बिना उकसावे के गोलीबारी की। हालांकि इसमें छोटे हथियारों का इस्तेमाल किया गया। भारतीय सेना ने हर बार इन हमलों का मजबूती से जवाब दिया। यह रणनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे भारतीय सेना न केवल पाकिस्तानी सेना को इंगेज रख रही है, बल्कि किसी भी बड़े हमले के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत एलओसी पर मौजूदा तनाव का फायदा उठाना चाहता है, ताकि भारतीय खुफिया और आतंकवाद-रोधी एजेंसियां आतंकियों के खिलाफ गुप्त योजनाएं बना सकें।

Pahalgam terror attack: तीसरा कदम: आतंकवाद के खिलाफ पूरे राष्ट्र को एकजुट करना

पहली बार सरकार ने सिर्फ सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर सिविल सोसायटी और आम जनता (Pahalgam terror attack) को भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट करने की रणनीति अपनाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में पहलगाम हमले की कड़ी निंदा की और पूरे देश से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की। कई राज्यों में छोटे-छोटे कैंडल मार्च और शांति यात्राएं आयोजित की जा रही हैं, ताकि पूरे भारत में आतंकवाद विरोधी भावना को मजबूती मिले। सरकार का उद्देश्य है कि कश्मीर का सामान्य नागरिक भी आतंकवाद के खिलाफ खड़ा हो और अलगाववादी सोच पूरी तरह हाशिये पर चली जाए।

सरकार के इन प्रयासों का मकसद जम्मू-कश्मीर को देश के साथ पूरी तरह जोड़ना और आतंकवाद को हराने के लिए एक राष्ट्रीय संकल्प (Pahalgam terror attack) को मजबूत करना है। सरकार का मानना है कि जब पूरा देश एक साथ खड़ा होगा, तभी आतंकवादियों का मनोबल पूरी तरह टूटेगा। यह कदम न केवल घाटी में शांति स्थापित करने में मदद करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि आतंकवाद को लोगों का समर्थन न मिले।

Pahalgam terror attack: चौथा कदम: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को बेनकाब करना

पहलगाम हमले के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की भूमिका को दुनिया के सामने लाने के लिए कूटनीतिक पहल शुरू की है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस, सऊदी अरब समेत कई देशों को पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क की जानकारी दी जा रही है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि पहलगाम हमला (Pahalgam terror attack) पाकिस्तान की जमीं में पल रहे आतंकी संगठनों की साजिश नतीजा है। वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की छवि को चोट पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। भारत ने दुनिया को बताया है कि कैसे पाकिस्तान आतंकी संगठनों को पनाह देकर उन्हें भारत के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध लड़ने के लिए भड़का रहा है।

विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं ताकि वैश्विक समुदाय (Pahalgam terror attack) पाकिस्तान पर दबाव बनाए। सूत्रों का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ लंबे समय तक सफलता तभी मिलेगी, जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होगा। भारत ने पहले भी बालाकोट हवाई हमले जैसे कदमों के जरिए यह दिखाया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में सक्षम है। इस बार भी भारत का लक्ष्य आतंकी ठिकानों को नष्ट कर उनके आकाओं को बेनकाब करना है।

Pahalgam terror attack: बालाकोट का एक्सपीरियंस आएगा काम

सूत्रों के मुताबिक, भारत के पास पहले से ही बालाकोट (Pahalgam terror attack) जैसी कार्रवाई के अनुभव हैं, जब 2019 में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविरों को निशाना बनाकर ध्वस्त किया गया था। उस समय भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक डोजियर तैयार किया था, जिसमें यह साबित हुआ था कि पाकिस्तानी अधिकारी बालाकोट में चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों से वाकिफ थे। इस शिविर में जैश-ए-मोहम्मद के 42 बड़े आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा था। टेक्निकल एविडेंसेज में मसूद अजहर और अन्य आतंकी नेताओं के भड़काऊ भाषणों के सबूत भी शामिल थे।

इस बार भी भारत लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के आतंकियों और उनके आकाओं पर नजर रख रहा है। खुफिया एजेंसियां तकनीकी और मानवीय खुफिया जानकारी जुटा रही हैं, ताकि आतंकी ठिकानों (Pahalgam terror attack) को सटीक निशाना बनाया जा सके। सूत्रों का कहना है कि यह कार्रवाई छोटे आतंकियों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि आतंकवाद के मूल स्रोत को खत्म करने पर ध्यान दिया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट इमेजरी, और कम्युनिकेशन इंटरसेप्ट के जरिए पुख्ता सबूत जुटाए जा रहे हैं।

क्या भारत फिर करेगा सर्जिकल स्ट्राइक या एयरस्ट्राइक?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत फिर से सर्जिकल स्ट्राइक या एयरस्ट्राइक जैसे कदम उठाएगा? भारतीय सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों ने सभी विकल्प खुले रखे हैं। तीन तरह की संभावित कार्रवाइयों (Pahalgam terror attack) पर विचार किया जा रहा है। इनमें छोटे हमले (Targeted Strikes) शामिल हैं। जिनमें भारत आतंकी संगठनों के प्रमुख नेताओं या छोटे ठिकानों को निशाना बना सकता है। यह कार्रवाई सटीक और सीमित होगी, जिससे बड़े पैमाने पर तनाव बढ़ने की आशंका कम रहे।

इसके अलावा बड़े आतंकी शिविरों पर भी एयरस्ट्राइक की जा सकती है, जैसे 2019 के बालाकोट में की गई थी। इसमें भारत पाकिस्तान में मौजूद बड़े आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट करने के लिए हवाई हमले कर सकता है। इसके लिए खुफिया एजेंसियां पहले से ही तकनीकी और मानवीय जानकारी जुटा रही हैं। इसके अलावा एक अन्य विकल्प आतंकवादी संगठनों के आकाओं जैसे मसूद अजहर या हाफिज सईद जैसे लोगों को निशाना बनाया जा सकता है।

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इनमें से कौन सा विकल्प चुना जाएगा, इसे लेकर सरकार में मथंन जारी है। 30 अप्रैल को होने वाली सीसीएस की बैठक में इन विकल्पों पर चर्चा की जा सकती है। क्योंकि इस बार भारत का मकसद केवल जवाब देना नहीं है, बल्कि आतंकवाद के पूरे नेटवर्क को पूरी तरह उखाड़ फेंकना है।

India-China LAC: पाकिस्तान से विवाद के बीच चीन को साधने में जुटा भारत, भविष्य में न हो गलवान, इसके लिए उठाए ये बड़े कदम

India-China LAC: India boosts patrols, tech to prevent Galwan-like clashes
File Photo: Indian Army

India-China LAC: कैलाश मानसरोवर यात्रा की शुरूआत भारत-चीन संबंधों में बड़ा बदलाव लाने वाली है। 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद बंद हुई यह यात्रा दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली का एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही, भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पूर्वी लद्दाख में पेट्रोलिंग पॉइंट्स और महत्वपूर्ण जगहों की जियोटैगिंग शुरू की है, ताकि सीमा की स्पष्ट पहचान हो और भारतीय सैनिकों को पेट्रोलिंग में आसानी हो। इसके अलावा दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच लगातार बातचीत जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं।

India-China LAC: India boosts patrols, tech to prevent Galwan-like clashes
File Photo: Indian Army

India-China LAC: पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुई थी डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया

2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के बीच LAC पर तनाव चरम पर पहुंच गया था। इस दौरान दोनों देशों की सेनाओं ने भारी तैनाती की और कई क्षेत्रों में पेट्रोलिंग बंद हो गई थी। लेकिन पिछले साल 21 अक्टूबर को दोनों देशों के बीच LAC पर पेट्रोलिंग की व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता (India-China LAC) हुआ। इस समझौते के तहत 2020 में शुरू हुए तनाव को कम करने और सैनिकों को पीछे हटाने (डिसइंगेजमेंट) की प्रक्रिया को शुरू किया गया।

इसके बाद, रूस के कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक के बाद शांति बहाली की प्रक्रिया को और मजबूती दी। अक्टूबर 2024 के अंत तक, दोनों पक्षों ने डिसइंगेजमेंट (India-China LAC) की प्रक्रिया पूरी कर ली थी। इस दौरान दीपावली पर दोनों देशों के सैनिकों ने एक-दूसरे को मिठाइयां भी बांटीं। इसके बाद, भारतीय सेना ने बताया था कि उसने पूर्वी लद्दाख के देपसांग क्षेत्र में पांच पेट्रोलिंग पॉइंट्स में से एक पर पहली बार 2020 के बाद गश्त की।

India-China LAC: जियोटैगिंग से क्या फायदा होगा?

LAC पर भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर हमेशा से विवाद रहा है। भविष्य में इस तरह के विवादों को खत्म करने के लिए जियोटैगिंग की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। सूत्रों ने बताया कि कुछ पहाड़ियां तो आसानी से पहचानी जा सकती है, लेकिन कई जगहों को लेकर पर दोनों देशों की धारणाएं अलग-अलग हैं। इन मतभेदों को कम करने के लिए भारत ने LAC पर पेट्रोलिंग पॉइंट्स, महत्वपूर्ण स्थानों, और अन्य पहचान चिह्नों की जियोटैगिंग शुरू की है।

जियोटैगिंग का मतलब है इन स्थानों की भौगोलिक स्थिति को डिजिटल रूप से रिकॉर्ड करना, ताकि उनकी सटीक लोकेशन और सीमाएं स्पष्ट हो सकें। इससे न केवल भारतीय सैनिकों को गश्त में आसानी होगी, बल्कि चीनी सैनिकों के साथ टकराव की आशंका भी कम होगी। सूत्रों के अनुसार, यह कदम भविष्य में सीमा विवाद (India-China LAC) के समाधान के लिए होने वाली बातचीत में भी मददगार साबित होगा।

India-China LAC: निगरानी तंत्र को किया मजबूत

पिछले छह महीनों में भारत ने LAC पर निगरानी को और मजबूत किया है। सेना ने कई तरह के नए ड्रोन खरीदे हैं, जो सीमा पर संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी में मदद कर रहे हैं। ये ड्रोन न केवल सैनिकों की पैदल गश्त में मदद कर रहे हैं, बल्कि लगातार निगरानी भी आसान हो रही है।

इसके अलावा, LAC के साथ कई जगहों पर हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरे लगाए गए हैं। क्षेत्र में हेलीकॉप्टर सॉर्टीज़ (उड़ानें) भी नियमित रूप से की जा रही हैं। सूत्रों ने बताया कि सेना ने सैनिकों की तैनाती के रास्तों पर बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत किया है, ताकि सैन्य आवाजाही में कोई बाधा न आए।

पेट्रोलिंग को लेकर बनाए नए नियम

भारत और चीन ने LAC पर गश्त (India-China LAC) को लेकर नए नियम बनाए हैं, ताकि टकराव की स्थिति से बचा जा सके। दोनों पक्षों ने सहमति जताई है कि प्रत्येक पेट्रोलिंग पॉइंट पर महीने में केवल दो बार गश्त होगी। पेट्रोलिंग की योजना पहले से एक-दूसरे के साथ साझा की जाएगी, ताकि दोनों देशों के सैनिक एक ही समय पर एक ही स्थान पर न पहुंचें।

सूत्रों ने बताया कि सैनिकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे चीनी सैनिकों के साथ फिजिकल कॉन्टैक्ट से बचें। अगर कोई टकराव की स्थिति बनती है, तो सैनिकों को 200 मीटर की दूरी बनाए रखनी है, तस्वीरें लेनी हैं, और अपनी यूनिट को वापस लौटकर स्थिति की जानकारी देनी है। ताकि छोटी-मोटी घटनाएं बड़े विवाद में न बदलें।

कमांडरों के बीच नियमित संवाद

LAC पर तनाव (India-China LAC) कम करने के लिए दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच नियमित संवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, यूनिट कमांडिंग ऑफिसर (CO) महीने में एक या दो बार अपने चीनी समकक्षों से मिलेंगे। वहीं, ब्रिगेड कमांडर हर 3 महीने में मुलाकात करेंगे। जबकि मेजर जनरल और उससे ऊपर के अधिकारी आवश्यकतानुसार अपने चीनी समकक्षों से बातचीत करेंगे। इसके पीछे रणनीति यह है कि इससे न केवल विश्वास की बहाली हो, बल्कि गलतफहमियों को तुरंत सुलझाने में भी मदद मिले।

विश्वास बहाली को लेकर उठाए ये कदम

डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में, भारत और चीन कई विश्वास बहाली के उपाय (Confidence Building Measures) लागू कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, इस साल जून में कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने का फैसला लिया गया, जो 2020 के बाद से बंद थी। यह दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

सूत्रों ने यह भी बताया कि LAC पर मिलिट्री एक्सरसाइज की संख्या कम की जा सकती है, ताकि तनाव की आशंका न बढ़े। हालांकि, सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और सैन्य तैयारियां बिना किसी रुकावट के जारी रहेंगी।

हालांकि ये कदम भारत-चीन संबंधों में सकारात्मक बदलाव का संकेत हैं, लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। LAC पर दोनों देशों की अलग-अलग धारणाएं और सीमा के कुछ हिस्सों पर असहमति भविष्य में विवाद की वजह बन सकती हैं। इसके अलावा, जियोटैगिंग और निगरानी के बावजूद, दोनों देशों को लगातार संवाद और कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत होगी।

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भारत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि उसकी सैन्य तैनाती और तैयारियां किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। LAC पर ड्रोन, कैमरे, और हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल से न केवल निगरानी मजबूत होगी, बल्कि सैनिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

Haji Pir Pass: भारतीय सेना ने दो बार जीता हाजी पीर दर्रा, लेकिन फिर लौटाया, आतंकी यहां से करते हैं घुसपैठ

Haji Pir Pass: Won Twice by India, Returned, Still a Key Route for Terror Infiltration

Haji Pir Pass: 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले से पूरा देश सदमे में है। बैसरन घाटी में हुए इस हमले में 26 लोग मारे गए थे। पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की शाखा द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने इस हमले को अंजाम दिया। इस हमले की साजिश पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलाकोट में रची गई। संभावना जताई जा रही है कि आतंकियों ने हाजी पीर दर्रे के रास्ते घुसपैठ कर पहलगाम तक पहुंचे। यह दर्रा, जिसे भारत ने 1965 में जीता था लेकिन ताशकंद समझौते में पाकिस्तान को लौटा दिया, आज भी आतंकी घुसपैठ का मुख्य रास्ता बना हुआ है। पहलगाम आतंकी हमले ने 51 साल पुरानी उस रणनीतिक भूल पर फिर से बहस छेड़ दी है, जिसके परिणाम भारत आज भी भुगत रहा है।

Haji Pir Pass: Won Twice by India, Returned, Still a Key Route for Terror Infiltration

Haji Pir Pass: हाजी पीर और पहलगाम हमले का कनेक्शन

संभावना जताई जा रही है कि पहलगाम आतंकी हमले में भी हाजी पीर दर्रे का इस्तेमाल हुआ था। आतंकी इसी दर्रे के रास्ते किश्तवाड़ से कोकेरनाग होते हुए बैसरन पहुंचे। पाक अधिकृत कश्मीर के रावलाकोट के निवासी और मानवाधिकार कार्यकर्ता औऱ कश्मीर पीपल्स नेशनल पार्टी के नेता सरदार नासिर अजीज खान ने खुलासा किया कि हाजी पीर के आसपास कई आतंकी प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। यदि हाजी पीर आज भारत के नियंत्रण में होता, तो आतंकी घुसपैठ को रोका जा सकता था। 1965 के पश्चिमी सेना कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने इसे “रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक” बताया था, लेकिन ताशकंद ने इसे बेकार कर दिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जनवरी 2025 में कहा, “1948 और 1965 में हाजी पीर लौटाना भूल थी। यह आतंकवाद का रास्ता बंद कर सकता था।”

 2,637 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है Haji Pir Pass:

यह दर्रा पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थित है। हाजी पीर दर्रा पीर पंजाल रेंज पर 2,637 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और पुंछ-उरी-राजौरी मार्ग पर एक महत्वपूर्ण सड़क को जोड़ता है। यह जम्मू-कश्मीर के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि यदि भारत इस दर्रे को अपने नियंत्रण में रखता तो यह घुसपैठ के रास्ते बंद कर सकता है और पुंछ-उरी के बीच की दूरी को 282 किमी से 56 किमी तक कम कर सकता है। 1948 और 1965 के भारत-पाक युद्ध में इस दर्रे को जीतना भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

Haji Pir Pass: 1948: पहला कब्जा और वापसी

1947-48 के प्रथम भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान ने हाजी पीर दर्रा सहित 78,114 वर्ग किमी जम्मू-कश्मीर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कबाइली हमलावरों (पठान जनजातियों) और पाकिस्तानी सेना के समर्थन से कश्मीर पर हमला शुरू किया। इस ऑपरेशन गुलमर्ग का मकसद कश्मीर को बलपूर्वक हथियाना था। 26 अक्टूबर को महाराजा हरी सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, और भारत ने सैन्य सहायता भेजी। हाजी पीर दर्रा, जो पुंछ-उरी-श्रीनगर मार्ग को जोड़ता है, इस युद्ध में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था। पाकिस्तानी घुसपैठिए और सेना ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह कश्मीर घाटी में प्रवेश का एक प्रमुख रास्ता था। कबाइलियों और पाक सेना ने अक्टूबर 1947 में मुजफ्फराबाद, बारामूला, और उरी पर कब्जा कर लिया। हाजी पीर दर्रा भी उनके नियंत्रण में आ गया, क्योंकि यह रावलाकोट से कश्मीर घाटी तक का सबसे छोटा रास्ता था। दर्रे का नियंत्रण पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह घुसपैठियों और हथियारों की आपूर्ति के लिए लॉजिस्टिक केंद्र था।

भारतीय सेना ने इसके जवाब में नवंबर 1947 से श्रीनगर और उरी को सुरक्षित करने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया। 1 सिख रेजिमेंट और 4 कुमाऊं रेजिमेंट ने बारामूला और उरी को कबाइलियों के कब्जे से मुक्त कराया। जबकि पुंछ 1947 के अंत तक पाकिस्तानी घेराबंदी में था। इसके बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन ईजी (1948) शुरू किया, जिसका मकसद पुंछ को मुक्त कराना और हाजी पीर क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल करना था। मई-जून 1948 में भारतीय सेना ने पुंछ के आसपास कई चोटियों पर कब्जा किया और हाजी पीर दर्रे तक पहुंची। 19 इन्फैंट्री ब्रिगेड और 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड ने इस अभियान में हिस्सा लिया। जून 1948 तक भारतीय सेना ने हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया। इलाका बेहद ऊबड़-खाबड़ था, और पाकिस्तानी सेना ने दर्रे पर भारी हथियार तैनात कर रखे थे। भारतीय सैनिकों ने सांक, लेदीवाली गली, और बेदोरी जैसी चोटियों को जीतकर दर्रे तक पहुंच बनाई। इस जीत ने पुंछ-उरी मार्ग को आंशिक रूप से बहाल किया और घुसपैठ को कम किया।

पाकिस्तानी सेना ने जुलाई-अगस्त 1948 में दर्रे को वापस लेने के लिए कई जवाबी हमले किए। इन हमलों में कबाइली लड़ाकों और पाकिस्तान के रेगुलर सैनिकों ने हिस्सा लिया। भारतीय सेना ने इन हमलों को विफल किया, लेकिन भारी नुकसान भी उठाया। पुंछ घेराबंदी नवंबर 1948 तक जारी रही, जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन लिंक-अप के तहत पुंछ को पूरी तरह मुक्त कराया। ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह और लेफ्टिनेंट कर्नल हरि सिंह जैसे अधिकारियों ने पुंछ और हाजी पीर अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Haji Pir Pass: संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में युद्धविराम

1 जनवरी 1949 को संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में युद्धविराम लागू हुआ। नियंत्रण रेखा (LoC) स्थापित की गई, और हाजी पीर दर्रा पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया। भारत ने युद्ध में दर्रे पर कब्जा किया था, लेकिन युद्धविराम समझौते के तहत इसे वापस करना पड़ा। यह फैसला भारत के लिए रणनीतिक नुकसान साबित हुआ, क्योंकि हाजी पीर बाद में आतंकी घुसपैठ का केंद्र बन गया।

Haji Pir Pass: 1965 में दूसरा कब्जा

पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया, जिसमें हजारों घुसपैठिए (5,000-30,000) कश्मीर में दाखिल हुए ताकि विद्रोह भड़काया जाए। हाजी पीर दर्रा इस घुसपैठ का मुख्य केंद्र था। भारत ने जवाबी कार्रवाई में ऑपरेशन बख्शी और ऑपरेशन फौलाद शुरू किए। 1 पैरा बटालियन, मेजर (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) रणजीत सिंह दयाल और ब्रिगेडियर जोरावर चंद बख्शी के नेतृत्व में, ने 37 घंटे की भीषण लड़ाई के बाद सांक, लेदीवाली गली, और हाजी पीर दर्रा पर कब्जा किया। 28 अगस्त 1965 का दिन भारतीय सेना के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। बारिश, कीचड़, कोहरा, और दुश्मन की गोलाबारी के बावजूद 28 अगस्त को सुबह 10:30 बजे दर्रा भारत के नियंत्रण में था। उस दिन सुबह 10:30 बजे, मेजर रंजीत सिंह दयाल (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) के नेतृत्व में 1 पैरा के जांबाज सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर में हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया। यह हमला पांच इन्फैंट्री बटालियनों और दो आर्टिलरी रेजिमेंट्स की मदद से किया गया था।

यह दर्रा, जो 1947 के बंटवारे के बाद 18 साल तक पाकिस्तान के कब्जे में था, भारतीय सेना के लिए एक बड़ी जीत थी। अगले दिन पाकिस्तान ने जवाबी हमला किया, लेकिन भारतीय सैनिकों ने उसे नाकाम कर दिया। 30 अगस्त तक दर्रे और आसपास की चोटियों पर भारत का पूर्ण नियंत्रण था। 10 सितंबर को नजदीकी काहुता पर कब्जे के साथ हाजी पीर बल्ज को पूरी तरह सील कर दिया गया, और पाकिस्तानी ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए थे। यह मिशन ऑपरेशन बख्शी का हिस्सा था, जिसने पाकिस्तान के ऑपरेशन जिब्राल्टर को विफल किया। हमले से पांच दिन पहले सेना प्रमुख जनरल जे.एन. चौधरी ने आक्रामक रुख अपनाने की जरूरत पर जोर दिया था, ताकि पाकिस्तान को जवाब देने के लिए मजबूर किया जाए।

Haji Pir Pass: पाकिस्तान का ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम

हाजी पीर पर कब्जे ने पाकिस्तान को झटका दिया, लेकिन तीन दिन बाद उसने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया। 1 सितंबर को चंब-जौरियन सेक्टर में उसने टैंकों और पैदल सेना के साथ बड़ा हमला बोला, जिसका मकसद अखनूर का पुल और फिर जम्मू-पुंछ राजमार्ग पर कब्जा करना था। इससे वह जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर नियंत्रण कर जम्मू-कश्मीर को भारत से काट सकता था। खुफिया जानकारी और तैयारी की कमी के कारण भारतीय सेना शुरू में दबाव में थी, लेकिन 6 सितंबर को भारतीय सेना के XI और I कोर ने पाकिस्तानी पंजाब में लाहौर और सियालकोट की ओर बढ़कर जवाब दिया। इससे पाकिस्तान को अपनी सेना वापस खींचनी पड़ी, और अखनूर का पुल आखिरी मौके पर बच गया।

Haji Pir Pass: ताशकंद समझौते में सोवियत दबाव

खास बात यह है कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, जो 5 अगस्त को पाकिस्तानी घुसपैठियों की पहचान के साथ शुरू हुआ और 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम के साथ खत्म हुआ, यह भारतीय सेना की एकमात्र ऐसी आक्रामक कार्रवाई थी जो शुरू से अंत तक पूरी तरह सफल रही। मेजर रणजीत दयाल और ब्रिगेडियर बख्शी को महावीर चक्र मिला, और 1 पैरा को बैटल ऑनर हाजीपीर से सम्मानित किया गया। लेकिन ताशकंद समझौते (10 जनवरी 1966) में भारत ने हाजी पीर दर्रा और 1,920 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तान को लौटा दिया। यह फैसला सोवियत दबाव में लिया गया। पाकिस्तान ने चंब-जौरियन क्षेत्र में अखनूर के पास फटवाल रिज तक कब्जा कर लिया था, जो जम्मू के लिए खतरा था। भारत ने हाजी पीर के बदले चंब से पाकिस्तानी सेना को हटाने की शर्त मानी। यह फैसला कई सैन्य अधिकारियों को गलत लगा, क्योंकि इससे पाकिस्तानी सेना अखनूर से सिर्फ 4 किलोमीटर दूर रह सकती थी। कई विशेषज्ञों का मानना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के “युद्ध न करने” के वादे पर भरोसा किया। शास्त्री की ताशकंद में अचानक मृत्यु ने इस फैसले पर सवाल खड़े कर दिए।

1971 में क्यों नहीं किया कब्जा?

1971 के युद्ध में भारत ने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बनाया और पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ती बाहिनी की मदद की। जिसके बाद बांग्लादेश आजाद देश बना। हालांकि, उस दौरान भारत ने हाजी पीर दर्रे को फिर से कब्जाने की कोशिश की, लेकिन भारी नुकसान के चलते हमला वापस लेना पड़ा। मेजर रमेश बलदानी सहित कई सैनिक शहीद हुए। विश्लेषकों का कहना है कि भारत को फोकस पूर्वी मोर्चे पर था, और पश्चिमी मोर्चे पर हाजी पीर को प्राथमिकता नहीं दी। 1971 में भारत इस दर्रे को दोबारा हासिल करने का मौका चूक गया। बाद में मेजर से लेफ्टिनेंट जनरल बने रणजीत सिंह दयाल ने बाद में एक सााक्षात्कार में कहा था, “यह दर्रा भारत को रणनीतिक बढ़त दे सकता था। इसे लौटाना गलती थी। हमारे लोग नक्शे नहीं पढ़ते।”

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वहीं, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डी.बी. शेकटकर ने 23 सितंबर 2015 को एक बयान में कहा था, “हाजी पीर की वापसी ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया”। उन्होंने विशेष रूप से कहा, “हमें यह नहीं पता कि हाजी पीर दर्रा, जो रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था, उसे वापस करने के क्या कारण थे। आज कश्मीर में होने वाली सारी घुसपैठ उसी क्षेत्र से होती है। अगर हमने उस चौकी को, जिसे हमने कब्जा किया था, अपने पास रखा होता, तो चीजें अलग हो सकती थीं।”