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Defence Year Ender 2025: अब भारत में ही बन रहे भारतीय सेना के 91 फीसदी गोला-बारूद, दूसरे देशों से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए किया कमाल

Defence Year Ender 2025
Indian Army Ammunition Indigenisation: 91% Ammo Made in India, War Readiness Gets Major Boost

Defence Year Ender 2025: भारतीय सेना ने गोला-बारूद के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए अपने कुल एम्यूनिशन इन्वेंट्री का 91 फीसदी स्वदेशीकरण पूरा कर लिया है। सेना के पास मौजूद 175 प्रकार के गोला-बारूद में से 159 प्रकार अब देश में ही बनाए जा रहे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब दुनिया के कई हिस्सों में अलग-अलग वजहों से ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित हो रही है और आयात पर निर्भर होना मुश्किल होता जा रहा है।

भारतीय सेना का यह प्रयास न केवल आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती देता है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले किसी भी संघर्ष के लिए सेना की फायरपावर को लगातार बनाए रखने में भी मदद करेगा। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के बाद तीनों सेनाएं हाई लेवल ऑपरेशनल रेडीनेस पर हैं और ऐसे में गोला-बारूद की घरेलू उपलब्धता रणनीतिक रूप से बेहद अहम हो गई है।

Defence Year Ender 2025: एम्यूनिशन में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

पिछले साल तक भारतीय सेना 175 में से 154 एम्यूनिशन वैरिएंट्स का स्वदेशीकरण कर चुकी थी, जो लगभग 88 फीसदी था। वर्ष 2025 में इसमें और बढ़ोतरी हुई और अब यह आंकड़ा 91 फीसदी तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी चरणबद्ध तरीके से की गई, जिसमें पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर दोनों को शामिल किया गया।

रक्षा मंत्रालय ने इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड और सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों को प्रोडक्शन से जोड़ा। इससे न केवल उत्पादन क्षमता बढ़ी, बल्कि सेना की जरूरतों के मुताबिक समय पर सप्लाई सुनिश्चित करने में भी मदद मिली। (Defence Year Ender 2025)

Defence Year Ender 2025: बचे हुए वैरिएंट्स पर भी काम तेज

सेना के पास अब भी 16 ऐसे एम्यूनिशन वैरिएंट्स हैं, जिनका स्वदेशीकरण पूरी तरह नहीं हो पाया है। रक्षा मंत्रालय ने इनमें से चार से सात प्रकार के बुलेट्स, रॉकेट्स और मिसाइल्स को देश में ही बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

इनमें रूस से जुड़ा आर्मर-पियर्सिंग फिन-स्टेबलाइज्ड डिस्कार्डिंग सैबोट यानी एपीएफएसडीएस एंटी-टैंक एम्यूनिशन और स्वीडन से डिजाइन किया गया 84 एमएम एम्यूनिशन शामिल है। ये दोनों ही आधुनिक युद्ध में टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ बेहद असरदार माने जाते हैं। (Defence Year Ender 2025)

Defence Year Ender 2025: टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से प्रोडक्शन

रक्षा मंत्रालय ने एपीएफएसडीएस एम्यूनिशन के लिए वर्ष 2015-16 में ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मांग की गई थी। अब पुणे स्थित म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड के मुख्यालय में इसके प्रोडक्शन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।

इसी तरह 84 एमएम एम्यूनिशन के लिए स्वीडन से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिल चुका है और इसका प्रोडक्शन प्लांट भी तैयार किया जा रहा है। इन दोनों एम्यूनिशन के देश में बनने से सेना को आयात पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और इमरजेंसी में सप्लाई बाधित होने का खतरा भी कम होगा। (Defence Year Ender 2025)

Defence Year Ender 2025: इकनॉमिक ऑर्डर क्वांटिटी का फैसला

रक्षा मंत्रालय और सेना ने मिलकर पांच एम्यूनिशन वैरिएंट्स को इकनॉमिक ऑर्डर क्वांटिटी के तहत रखने का फैसला किया है। इन वैरिएंट्स की कुल जरूरत सीमित है और मौजूदा स्टॉक पर्याप्त माना गया है। इसी कारण इनका घरेलू उत्पादन फिलहाल नहीं किया जा रहा है।

यह फैसला संसाधनों के बेहतर उपयोग और उन एम्यूनिशन पर फोकस करने के लिए लिया गया है, जिनकी मांग ज्यादा है और जो भविष्य के युद्ध में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। (Defence Year Ender 2025)

Defence Year Ender 2025: स्मार्ट एम्यूनिशन पर बढ़ता जोर

भारतीय सेना भविष्य के युद्ध को देखते हुए स्मार्ट एम्यूनिशन पर विशेष ध्यान दे रही है। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार आने वाले समय में युद्ध ज्यादा तेज, जटिल और टेक्नोलॉजी आधारित होंगे। ऐसे में सटीक निशाना लगाने वाले, लंबी दूरी तक मार करने वाले और कम कोलैटरल डैमेज वाले एम्यूनिशन की जरूरत बढ़ेगी।

सेना अब आर्टिलरी के साथ-साथ कॉम्बैट यूएवी यानी ड्रोन के लिए भी स्मार्ट एम्यूनिशन हासिल करने की दिशा में काम कर रही है। इससे निगरानी के साथ-साथ सटीक स्ट्राइक करना आसान होगा। (Defence Year Ender 2025)

Defence Year Ender 2025: इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट से फायरपावर मजबूत

साल 2025 में भारतीय सेना ने इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट-6 के तहत लगभग 6,000 करोड़ रुपये का गोला-बारूद खरीदा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी स्थिति में सेना की ऑपरेशनल तैयारी और फायरपावर पर असर न पड़े।

इस प्रक्रिया के तहत कई अहम एम्यूनिशन और हथियार सिस्टम्स को तेजी से सेना में शामिल किया गया, ताकि सीमाओं पर तैनात यूनिट्स को समय पर जरूरी संसाधन मिल सकें। (Defence Year Ender 2025)

डिफेंस रिफॉर्म्स के साल में बड़ा बदलाव

सरकार ने वर्ष 2025 को डिफेंस रिफॉर्म्स का साल घोषित किया था। इस दौरान इंडिजिनाइजेशन, रिकॉर्ड डिफेंस एक्सपोर्ट, जॉइंट मिलिटरी स्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी अपनाने पर खास जोर दिया गया।

पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट के जरिए हजारों आइटम्स के आयात पर रोक लगाई गई और घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी गई। इससे एमएसएमई और स्टार्ट-अप्स को भी रक्षा क्षेत्र में आगे आने का मौका मिला। (Defence Year Ender 2025)

Defence Year Ender 2025: डिफेंस एक्सपोर्ट में भी बढ़त

जहां एक ओर सेना के लिए गोला-बारूद का स्वदेशीकरण किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रक्षा मंत्रालय पीस टाइम में प्रोडक्शन लाइनों को चालू रखने के लिए एक्सपोर्ट पर भी ध्यान दे रहा है।

भारत अब अमेरिका और यूरोप सहित कई देशों को स्मॉल, मीडियम और लार्ज कैलिबर एम्यूनिशन, आर्टिलरी शेल्स, रॉकेट्स और टीएनटी, आरडीएक्स, एचएमएक्स जैसे एक्सप्लोसिव्स निर्यात कर रहा है। इससे न केवल उद्योग को मजबूती मिली है, बल्कि भारत की विश्वसनीय रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में पहचान भी बनी है। (Defence Year Ender 2025)

Indian Army Year Ender 2025: ऑपरेशन सिंदूर से ड्रोन वारफेयर तक, टेक एब्जॉर्प्शन ईयर में भारतीय सेना ने कैसे बदली जंग की तस्वीर

Indian Army Year Ender 2025

Indian Army Year Ender 2025: साल 2025 भारतीय सेना के लिए बेहद अहम साबित हुआ। पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के आतंकी टिखानों पर किए गए ऑपरेशन सिंदूर ने साफ कर दिया कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ अब केवल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि रणनीति के साथ ठोस कार्रवाई भी करता है। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने जिस सटीकता, तकनीक और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, उसने पूरे दुनिया में भारत की सैन्य सोच को नए सिरे से परिभाषित कर दिया। इसी ऑपरेशन ने 2025 को भारतीय सेना के लिए एक निर्णायक साल बना दिया, जहां ड्रोन वारफेयर, प्रिसिजन स्ट्राइक, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और स्वदेशी हथियारों ने युद्ध की तस्वीर बदल दी। भारतीय सेना का यह ट्रांसफॉर्मेशन इस बात का साफ संकेत है कि अब युद्ध केवल बंदूक और टैंक से नहीं लड़े जाएंगे, बल्कि ड्रोन, प्रिसिजन हथियार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और रियल-टाइम इंटेलिजेंस इसकी रीढ़ होंगे।

Indian Army Year Ender 2025: ऑपरेशन सिंदूर: आतंक के खिलाफ ठोस सैन्य कार्रवाई

मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन की पूरी योजना सेना की मिलिट्री ऑपरेशंस ब्रांच में तैयार की गई और इसे डायरेक्टरेट जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस के ऑप्स रूम से मॉनिटर किया गया। इस दौरान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और तीनों सेनाओं के प्रमुख मौजूद रहे।

ऑपरेशन के तहत सीमा पार मौजूद कुल नौ आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया। इनमें से सात ठिकानों को भारतीय सेना ने और दो को भारतीय वायुसेना ने तबाह किया। ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय सेना ने पाकिस्तान के आतंकी लॉन्च पैड्स, हथियार डिपो और सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर सटीक सैन्य कार्रवाई की। यह ऑपरेशन इस मायने में खास रहा क्योंकि इसमें सिर्फ सीमा पार फायरिंग नहीं, बल्कि प्रिसिजन स्ट्राइक, इंटेलिजेंस-ड्रिवन टार्गेटिंग और मल्टी-डोमेन कोऑर्डिनेशन देखने को मिला।

सेना के सूत्रों के मुताबिक, इस ऑपरेशन में आतंकियों की मूवमेंट, सप्लाई लाइन और कम्युनिकेशन नेटवर्क को एक साथ निशाना बनाया गया। इससे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को तगड़ा झटका लगा।

Indian Army Year Ender 2025: एलओसी पर आतंकी लॉन्च पैड्स पर कार्रवाई

साल 2025 में लाइन ऑफ कंट्रोल पर भी सेना ने लगातार दबाव बनाए रखा। दर्जन भर से ज्यादा आतंकी लॉन्च पैड्स को भारतीय सेना के ग्राउंड-बेस्ड हथियारों से नष्ट किया गया। इससे घुसपैठ के रास्ते टूटे और आतंकी नेटवर्क की सप्लाई लाइन बाधित हुई।

10 मई 2025 को हालात तब बदले जब पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारतीय डीजीएमओ से संपर्क कर जंग रोकने की बात कही। इसके बाद दोनों पक्षों में फायरिंग और सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी।

Indian Army Year Ender 2025
Indian Army Ashni Platoon

Indian Army Year Ender 2025: ड्रोन वारफेयर: युद्ध का नया चेहरा

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की ओर से 7, 8, 9 और 10 मई की रात ड्रोन के जरिए हमलों की कोशिश की गई। लेकिन भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स ने इन सभी ड्रोन हमलों को नाकाम कर दिया। किसी भी तरह का नुकसान या जान-माल की क्षति नहीं हुई।

इस दौरान सेना की काउंटर यूएएस और लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम की काबिलियत सामने आई। यह पहली बार था जब आधुनिक ड्रोन खतरों के खिलाफ भारतीय सेना की तैयारियां असल हालात में पूरी तरह परखी गईं।

भारतीय सेना के लिए ड्रोन केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे सीधे युद्ध का हिस्सा बन गए। सेना ने पहली बार बड़े पैमाने पर ड्रोन-बेस्ड यूनिट्स को ऑपरेशनल रोल में तैनात किया।

नई अशनि ड्रोन प्लाटून और शक्तिबाण यूनिट्स को खास तौर पर ड्रोन, लोटरिंग म्यूनिशन और प्रिसिजन अटैक के लिए तैयार किया गया। ये यूनिट्स दुश्मन के ठिकानों पर बिना सैनिकों की जान जोखिम में डाले हमला करने में सक्षम हैं।

ड्रोन के जरिए दुश्मन की लोकेशन, मूवमेंट और हथियारों की जानकारी रियल-टाइम में कमांड सेंटर तक पहुंचाई गई। इससे सेना की प्रतिक्रिया तेज और सटीक हो गई।

Indian Army Year Ender 2025
Indian Army Shaktibaan Regiments

काउंटर-ड्रोन सिस्टम: दुश्मन के ड्रोन पर पड़े भारी

जहां एक तरफ भारतीय सेना ने ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ाया, वहीं दूसरी ओर दुश्मन ड्रोन से निपटने के लिए काउंटर-ड्रोन शील्ड को भी मजबूत किया गया।

2025 में सेना ने इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम (आईडीडी एंड आईएस) मार्क-2 को अपनाया। इसमें हाई-पावर लेजर, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और एडवांस रडार सिस्टम शामिल हैं।

इस सिस्टम की मदद से छोटे, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन को भी आसानी से पकड़ा जा सकता है। सीमावर्ती इलाकों और संवेदनशील सैन्य ठिकानों पर इसकी तैनाती ने सुरक्षा को कई गुना बढ़ा दिया।

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Pinaka MBRL

ब्रह्मोस और पिनाका: प्रिसिजन स्ट्राइक की रीढ़

2025 में मिसाइल क्षमता के मामले में भी भारतीय सेना ने बड़ा कदम उठाया। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्च सिस्टम ने सेना की मारक क्षमता को नई ऊंचाई दी।

29 दिसंबर 2025 को पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल परीक्षण किया गया। करीब 120 किलोमीटर रेंज वाले इस रॉकेट ने भारतीय सेना को डीप स्ट्राइक की नई क्षमता दी। यह रॉकेट दुश्मन के हाई-वैल्यू टार्गेट्स को बहुत दूर से सटीक तरीके से निशाना बना सकता है। यह पूरी तरह स्वदेशी विकास का नतीजा है और भविष्य के युद्ध में अहम भूमिका निभाएगा।

वहीं, ब्रह्मोस मिसाइल ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह साबित कर दिया कि भारत के पास तेज, सटीक और भरोसेमंद स्ट्राइक क्षमता है।

बढ़ी लंबी दूरी की मारक क्षमता

2025 में भारतीय सेना की लॉन्ग-रेंज फायरपावर में बड़ा इजाफा हुआ। दिसंबर 2025 में दक्षिणी कमान की ब्रह्मोस यूनिट ने अंडमान-निकोबार कमान के साथ मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल का सफल कॉम्बैट लॉन्च किया। इस परीक्षण में हाई-स्पीड उड़ान, स्थिरता और टर्मिनल एक्यूरेसी को परखा गया।

इसी साल पिनाका रॉकेट सिस्टम के दो नए रेजीमेंट्स को ऑपरेशनल किया गया। जून 2025 में यह प्रक्रिया पूरी हुई, जिससे स्टैंड-ऑफ फायरपावर और तेज प्रतिक्रिया क्षमता मजबूत हुई।

नए तकनीक से सीमा पर सख्त हुई निगरानी  

2025 में भारतीय सेना ने चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर निगरानी को पूरी तरह टेक्नोलॉजी-आधारित बना दिया। लद्दाख, अरुणाचल और जम्मू सेक्टर में नए रडार, सेंसर्स और सर्विलांस सिस्टम लगाए गए।

हाई-एल्टीट्यूड इलाकों में सैनिकों के लिए बेहतर लॉजिस्टिक्स, ऑल-वेदर इन्फ्रास्ट्रक्चर और तेज मूवमेंट की व्यवस्था की गई। इससे सेना की प्रतिक्रिया क्षमता पहले से कहीं तेज हो गई है।

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Akashteer System (Pic: Indian Army)

Indian Army Year Ender 2025: नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर पर फोकस

भारतीय सेना 2025 में नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर की दिशा में तेजी से आगे बढ़ी है। इसका मतलब है कि मैदान में मौजूद सैनिक, ड्रोन, रडार, आर्टिलरी और कमांड सेंटर सब एक ही डिजिटल नेटवर्क से जुड़े हैं।

इससे सूचना साझा करने में देरी खत्म हुई और जल्दी फैसले लेने की क्षमता बढ़ी। इसे युद्ध के मैदान में यह एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

मिले तीन एएच-64ई अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर

जुलाई 2025 में भारतीय सेना को पहले तीन एएच-64ई अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर मिले। बाकी तीन हेलिकॉप्टर दिसंबर में शामिल हुए। इससे आर्मी एविएशन कॉर्प्स की मारक क्षमता और क्लोज एयर सपोर्ट में बड़ा सुधार हुआ।

नई यूनिट्स और बैटल फॉर्मेशन में बदलाव

2025 में भारतीय सेना ने भैरव बटालियन और अशनि ड्रोन प्लाटून जैसी नई फॉर्मेशंस को मैदान में उतारना शुरू किया। अक्टूबर 2025 में राजस्थान में हुए एक डेमो में इन नई यूनिट्स के साथ आधुनिक तकनीकी उपकरणों का प्रदर्शन किया गया।

इसके अलावा शक्तिबाण रेजीमेंट और दिव्यास्त्र बैटरियों की फॉर्मेशन तैयार की गई, जिन्हें ड्रोन, लोइटर म्यूनिशन और आधुनिक निगरानी सिस्टम से लैस किया गया।

2024 और 2025 टेक एब्जॉर्प्शन ईयर

भारतीय सेना ने 2024 और 2025 को टेक एब्जॉर्प्शन ईयर के रूप में मनाया। इस दौरान सिर्फ तकनीक अपनाने के बजाय उसे मिलिट्री स्ट्रक्चर में पूरी तरह शामिल करने पर जोर दिया गया।

पिछले एक साल में सेना ने करीब 3000 आरपीए, 150 टेथर्ड ड्रोन, स्वार्म ड्रोन, हाई एल्टीट्यूड लॉजिस्टिक ड्रोन और कामिकाजे ड्रोन शामिल किए। इससे निगरानी, लॉजिस्टिक्स और सटीक हमले की क्षमता कई गुना बढ़ी।

डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और इन-हाउस सॉफ्टवेयर

2025 में सेना ने डिजिटल सिस्टम को तेजी से अपनाया। एज डेटा सेंटर्स बनाए गए, ताकि फील्ड लेवल पर तेजी से निर्णय लिए जा सकें। इसके साथ ही कई इन-हाउस सॉफ्टवेयर तैयार किए गए, जैसे इक्विपमेंट हेल्पलाइन और सैनिक यात्री मित्र ऐप, जिससे सैनिकों को सीधी सहायता मिली।

आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में ग्रे जोन वॉरफेयर पर चर्चा

अक्टूबर 2025 में जैसलमेर में हुई आर्मी कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में ग्रे जोन वॉरफेयर, जॉइंटनेस और आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व ने भविष्य की जंग के लिए फोर्स डिजाइन और डॉक्ट्रिन को नई दिशा दी।

अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास और मिलिट्री डिप्लोमेसी

साल 2025 में भारतीय सेना ने फ्रांस, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूएई, ब्रिटेन, श्रीलंका और थाईलैंड के साथ कई संयुक्त सैन्य अभ्यास किए। इन अभ्यासों से इंटरऑपरेबिलिटी, काउंटर टेरर और शहरी युद्ध की तैयारी मजबूत हुई।

Indian Army Year Ender 2025: इनो-योद्धा और स्वदेशी इनोवेशन

नवंबर-दिसंबर 2025 में आयोजित इनो-योद्धा कार्यक्रम में 89 इनोवेशन सामने आए, जिनमें से 32 को आगे डेवलपमेंट और फील्डिंग के लिए चुना गया। इससे जमीनी स्तर से इनोवेशन को बढ़ावा मिला और आत्मनिर्भर सैन्य क्षमता को मजबूती मिली ।

Indian Army Year Ender 2025: सैनिकों की ट्रेनिंग और मानव संसाधन

तकनीक के साथ-साथ 2025 में सैनिकों की ट्रेनिंग पर भी खास जोर दिया गया। नए सिमुलेटर, वर्चुअल ट्रेनिंग सिस्टम और लाइव एक्सरसाइज के जरिए सैनिकों को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार किया गया। युवाओं की भर्ती में भी टेक्नोलॉजी-फ्रेंडली स्किल्स को महत्व दिया गया, ताकि भविष्य की सेना डिजिटल और स्मार्ट हो।

Defence Shares Fall: 79,000 करोड़ रुपये की DAC मंजूरी के बावजूद तीसरे दिन भी गिरे डिफेंस शेयर, जानिए गिरावट की असली वजह

Defence Shares Fall

Defence Shares Fall: डिफेंस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में मंगलवार को लगातार तीसरे कारोबारी दिन गिरावट देखने को मिली। यह गिरावट ऐसे समय आई है, जब कुछ ही दिन पहले डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने करीब 79 हजार करोड़ रुपये के बड़े रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी है। आमतौर पर ऐसी खबरों से डिफेंस शेयरों में तेजी आती है, लेकिन इस बार बाजार का रुख थोड़ा अलग दिखा।

मंगलवार के कारोबार में निफ्टी डिफेंस इंडेक्स करीब 1.5 फीसदी तक गिर गया। बीते तीन कारोबारी सत्रों में यह इंडेक्स कुल मिलाकर 2 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है। इंडेक्स में शामिल 18 में से 16 कंपनियों के शेयर लाल निशान में ट्रेड करते नजर आए। यानी गिरावट सिर्फ कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे सेक्टर में दबाव देखने को मिला।

सबसे ज्यादा गिरावट मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के शेयरों में दर्ज की गई, जो दिन के दौरान करीब 4 फीसदी तक लुढ़क गए। इसके अलावा सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया के शेयरों में करीब 3.5 फीसदी और डेटा पैटर्न्स (इंडिया) में लगभग 3 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। कुछ अन्य डिफेंस कंपनियों के शेयर भी 1 से 2 फीसदी तक नीचे आए।

Defence Shares Fall: गिरावट की वजह क्या है?

बाजार जानकारों का कहना है कि इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह प्रॉफिट बुकिंग है। पिछले कुछ हफ्तों में डिफेंस शेयरों में अच्छी तेजी देखने को मिली थी। खासतौर पर डीएसी मीटिंग से पहले बाजार में यह उम्मीद बन गई थी कि बड़े रक्षा सौदों को मंजूरी मिलेगी। इसी उम्मीद के चलते कई निवेशकों ने पहले ही खरीदारी कर ली थी।

अब जब डीएसी ने वाकई में बड़े प्रस्तावों को मंजूरी दे दी, तो कुछ निवेशकों ने मुनाफा कमा कर अपने शेयर बेचने शुरू कर दिए। शेयर बाजार में इसे अक्सर “बाय ऑन रूमर, सेल ऑन न्यूज” कहा जाता है। यानी खबर आने से पहले खरीद और खबर आते ही बिक्री।

इसके अलावा, साल 2025 में अब तक डिफेंस इंडेक्स करीब 19 से 20 फीसदी तक ऊपर जा चुका है। ऐसे में कई शेयरों की वैल्यूएशन पहले ही काफी बढ़ चुकी थी। साल के आखिरी दिनों में निवेशक थोड़ा सतर्क हो जाते हैं और मुनाफा निकालना पसंद करते हैं। इसका असर भी डिफेंस शेयरों पर पड़ा है।

Defence Shares Fall:  डीएसी की मंजूरी डिफेंस सेक्टर के लिए बेहद अहम

हालांकि शेयरों में गिरावट के बावजूद डीएसी की मंजूरी को सेक्टर के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। 29 दिसंबर को हुई बैठक में सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए कई बड़े प्रस्तावों को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी दी गई। इन प्रस्तावों का मकसद भारतीय सशस्त्र बलों की ताकत बढ़ाना और भविष्य की जंग के लिए उन्हें तैयार करना है।

सेना के लिए जिन सिस्टम्स को मंजूरी मिली है, उनमें लोटरिंग म्यूनिशन सिस्टम, लो लेवल लाइट वेट रडार, पिनाका मल्टी लॉन्च रॉकेट सिस्टम के लिए लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट, और इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम मार्क-2 शामिल हैं। ये सभी सिस्टम ड्रोन खतरे से निपटने और लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की क्षमता बढ़ाएंगे।

भारतीय वायुसेना के लिए अस्त्र मार्क-2 मिसाइल, एसपीआईसी-1000 प्रिसिजन गाइडेंस किट, एलसीए तेजस के लिए फुल मिशन सिमुलेटर, और ऑटोमैटिक टेक-ऑफ लैंडिंग रिकॉर्डिंग सिस्टम को मंजूरी मिली है। इससे एयर कॉम्बैट, ट्रेनिंग और सेफ्टी तीनों मजबूत होंगी।

नौसेना के लिए भी कुछ अहम प्रस्ताव पास किए गए हैं, जिनमें हार्बर में जहाजों को संभालने वाले टग्स, हाई फ्रीक्वेंसी सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो, और हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन शामिल हैं। इनसे समुद्री निगरानी और कम्युनिकेशन बेहतर होगी।

Defence Shares Fall: एनालिस्ट क्यों अब भी पॉजिटिव हैं?

भले ही शेयरों में फिलहाल गिरावट दिख रही हो, लेकिन ज्यादातर मार्केट एनालिस्ट डिफेंस सेक्टर को लेकर मीडियम से लॉन्ग टर्म में पॉजिटिव हैं। उनका कहना है कि डीएसी की मंजूरी का असर तुरंत नहीं, बल्कि आने वाले महीनों और सालों में दिखेगा।

डीएसी की मंजूरी के बाद अगला कदम टेंडर, कॉन्ट्रैक्ट और फिर ऑर्डर मिलने का होता है। इससे डिफेंस पीएसयू और निजी कंपनियों की ऑर्डर बुक मजबूत होगी। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, भारत डायनेमिक्स लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को इन प्रोजेक्ट्स से सीधे फायदा मिलने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का फोकस लगातार स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर बढ़ रहा है। आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत ज्यादातर प्रोजेक्ट्स भारतीय कंपनियों को दिए जा रहे हैं। इसके अलावा डिफेंस एक्सपोर्ट भी लगातार बढ़ रहा है।

फिलहाल जो गिरावट दिख रही है, उसे बाजार जानकार शॉर्ट टर्म करेक्शन मान रहे हैं। उनका कहना है कि जब भी किसी सेक्टर में तेजी बहुत तेज होती है, तो बीच-बीच में ऐसी गिरावट स्वाभाविक होती है। इससे शेयरों की कीमतें कुछ हद तक संतुलित हो जाती हैं।

S4 SSBN Sea Trials: अरिहंत-क्लास की आखिरी सबमरीन के सी ट्रायल्स शुरू, चीन की Type-094 से कितनी अलग है भारत की न्यूक्लियर पनडुब्बी?

S4 SSBN Sea Trials
File Photo

S4 SSBN Sea Trials: भारत ने अपनी चौथी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBN) का ट्रायल शुरू कर दिया है। एस4 के नाम से जाने जानी वाली यह पनडुब्बी पिछले सप्ताह विशाखापत्तनम के शिपबिल्डिंग सेंटर से बाहर निकलकर समुद्र में ट्रायल्स के लिए रवाना हुई। यह अरिहंत-क्लास की आखिरी सबमरीन है और भारत के बेहद गोपनीय प्रोजेक्ट का अहम पड़ाव मानी जा रही है, जो करीब चार दशक पहले शुरू हुआ था।

S4 SSBN Sea Trials: 7,000 टन वजनी पनडुब्बी है एस4

एस4 लगभग 7,000 टन वजनी पनडुब्बी है और इसे खास तौर पर परमाणु हथियार ले जाने और दागने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें आठ के-4 सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) तैनात की जा सकती हैं, जिनकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है। ये मिसाइलें परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम हैं। यह चीन और पकिस्तान के लिए भारत की तरफ से समुद्र में बड़ा जवाब है।

S4 SSBN Sea Trials: सी ट्रायल करीब एक साल तक

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, एस4 का सी ट्रायल करीब एक साल तक चलने की उम्मीद है। इन ट्रायल्स के दौरान पनडुब्बी के सभी अहम सिस्टम, जैसे न्यूक्लियर रिएक्टर, प्रोपल्शन, सोनार, नेविगेशन और वेपन सिस्टम्स की अलग-अलग परिस्थितियों में जांच की जाएगी। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो यह पनडुब्बी 2027 की शुरुआत तक भारतीय नौसेना में औपचारिक रूप से शामिल की जा सकती है।

S4 SSBN Sea Trials: 80 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी

एस4 को अरिहंत-क्लास की बाकी पनडुब्बियों से अलग और ज्यादा ताकतवर माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसमें स्वदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है, जो अब तक बनी चारों पनडुब्बियों में सबसे अधिक है। इसका मतलब यह है कि भारत अब न्यूक्लियर सबमरीन टेक्नोलॉजी में पहले से कहीं ज्यादा आत्मनिर्भर हो चुका है। इसमें रिएक्टर से लेकर सेंसर और कॉम्बैट सिस्टम तक, बड़ी संख्या में भारतीय तकनीक का इस्तेमाल हुआ है।

S4 SSBN Sea Trials: भारत के पास दो ऑपरेशनल एसएसबीएन

इस समय भारत के पास समुद्र में चार एसएसबीएन हैं। इनमें से दो पनडुब्बियां पूरी तरह सेवा में हैं और दो ट्रायल्स के अलग-अलग चरणों में हैं। पहली पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत को 2016 में कमीशन किया गया था और उसने 2018 में अपनी पहली डिटरेंट पेट्रोल पूरी की थी। दूसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिघात अगस्त 2024 में नौसेना में शामिल हुई। तीसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन अपने सभी सी ट्रायल्स लगभग पूरे कर चुकी है और इसके 2026 के अंत तक कमीशन होने की उम्मीद है। अब एस4 के ट्रायल्स शुरू होने के साथ ही भारत का एसएसबीएन बेड़ा एक अहम पड़ाव पर पहुंच गया है।

1984 से शुरू होती है एसएसबीएन की कहानी

भारत की न्यूक्लियर सबमरीन यात्रा की कहानी 1984 से शुरू होती है, जब सरकार ने एडवांस्ड टेक्नोलॉजी व्हीकल (एटीवी) प्रोजेक्ट की नींव रखी थी। उस समय लक्ष्य था कि भारत खुद की न्यूक्लियर पनडुब्बी डेवलप करे, ताकि देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह मजबूत हो सके। इसके तहत शुरुआती योजना तीन एसएसबीएन बनाने की थी, लेकिन बदलते रणनीतिक हालात और तकनीकी जरूरतों को देखते हुए बाद में इसमें बदलाव किए गए।

अरिहंत-क्लास की पहली पनडुब्बी का स्ट्रक्चर 1998 में रखा गया था, उसी साल जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए थे। हालांकि तकनीकी जटिलताओं और गोपनीयता के चलते इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में लंबा समय लगा। आईएनएस अरिहंत को 2009 में लॉन्च किया गया और 2016 में कमीशन किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे इस क्लास की अगली पनडुब्बियों पर काम आगे बढ़ा।

एस5 क्लास पनडुब्बियों की तैयारी

अरिहंत और अरिघात लगभग एक जैसी डिजाइन की पनडुब्बियां हैं। दोनों की लंबाई 110 मीटर से ज्यादा है और इनका वजन करीब 6,000 टन है। इनमें चार वर्टिकल लॉन्च ट्यूब्स हैं, जिनसे या तो 16 के-15 मिसाइलें या फिर चार के-4 मिसाइलें दागी जा सकती हैं। लेकिन तीसरी और चौथी पनडुब्बी, यानी अरिधमान और एस4, को थोड़ा बड़ा बनाया गया है। इनके डिजाइन में 10 मीटर का अतिरिक्त सेक्शन जोड़ा गया है, जिससे इनमें चार अतिरिक्त के-4 मिसाइलें रखी जा सकती हैं। इस तरह ये पनडुब्बियां ज्यादा दूरी तक मार करने में सक्षम हो गई हैं।

एस4 भविष्य में आने वाली बड़ी एस5 क्लास पनडुब्बियों के बीच की कड़ी है। एस5 क्लास की पनडुब्बियां करीब 13,500 टन वजनी होंगी, यानी अरिहंत-क्लास से लगभग दोगुनी। इन नई पनडुब्बियों में ज्यादा मिसाइलें, ज्यादा लंबी रेंज और ज्यादा एडवांस सिस्टम होंगे। एटीवी प्रोजेक्ट के तहत एस5 क्लास की पहली दो पनडुब्बियों का निर्माण पहले ही शुरू हो चुका है। उम्मीद है कि पहली एस5 पनडुब्बी 2030 के शुरुआती वर्षों में सेवा में आएगी और 2030 के दशक के अंत तक कुल चार एस5 एसएसबीएन नौसेना को मिल जाएंगी।

हालांकि एस4 का नाम अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन नौसेना के पुराने रिवाज को देखते हुए माना जा रहा है कि इसका नाम भी “अरि” से शुरू होगा। संस्कृत में “अरि” का अर्थ दुश्मन होता है, और इसी वजह से अरिहंत, अरिघात और अरिधमान जैसे नाम चुने गए हैं।

सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी बढ़ी

रणनीतिक नजरिए से एस4 का समुद्र में उतरना भारत के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। एसएसबीएन ऐसी पनडुब्बियां होती हैं, जो दुश्मन के लिए ढूंढ पाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि इन्हें परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का सबसे सुरक्षित हिस्सा माना जाता है। अगर किसी देश पर अचानक परमाणु हमला हो जाए, तब भी समुद्र में छिपी एसएसबीएन जवाबी हमला कर सकती है। इसे ही “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” कहा जाता है।

के-4 मिसाइलों की लंबी रेंज की वजह से भारत को एक और रणनीतिक बढ़त मिलती है। अब भारतीय एसएसबीएन को दुश्मन के तट के पास जाने की जरूरत नहीं होगी। वे हिंद महासागर या बंगाल की खाड़ी जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाकों से ही अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती हैं। इससे पनडुब्बियों की सुरक्षा और मिशन की सफलता दोनों बढ़ जाती हैं।

एस4 के सी ट्रायल्स की शुरुआत इस बात का संकेत है कि भारत अब उस स्तर के करीब पहुंच रहा है, जहां वह लगातार समुद्र में कम से कम एक एसएसबीएन तैनात रख सके। इसे “कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस” कहा जाता है। इसके लिए आमतौर पर चार से पांच एसएसबीएन की जरूरत मानी जाती है, ताकि कुछ पनडुब्बियां पेट्रोलिंग पर हों, कुछ मेंटनेंस में और कुछ ट्रेनिंग या ट्रायल्स में हों। (S4 SSBN Sea Trials)

चीन के पास 6 ऑपरेशनल एसएसबीएन

चीन की बात करें, तो पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी के पास 6 ऑपरेशनल एसएसबीएन हैं, जो मुख्य रूप से टाइप 094 (जिन-क्लास) हैं। ये चीन की सी-बेस्ड न्यूक्लियर डिटरेंस की रीढ़ हैं। पुरानी टाइप 092 (शिया-क्लास) अब लगभग रिटायर्ड या लिमिटेड रोल में है। नेक्स्ट जेनरेशन टाइप 096 (तांग-क्लास) कंस्ट्रक्शन में है, लेकिन अभी ऑपरेशनल नहीं हैं।

S4 SSBN Sea Trials: टाइप-094 है एस4 से बड़ी और भारी

चीन की टाइप-094 (जिन-क्लास) उसकी पहली पूरी तरह भरोसेमंद बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन मानी जाती है। टाइप-094 का पानी के नीचे डिस्प्लेसमेंट करीब 11 हजार टन है, जबकि भारत की एस4 लगभग 7 हजार टन की है। लंबाई में भी चीन की सबमरीन थोड़ी आगे है। इसका मतलब यह है कि चीनी सबमरीन ज्यादा बड़ी और भारी है, जबकि भारतीय सबमरीन तुलनात्मक रूप से कॉम्पैक्ट है। (S4 SSBN Sea Trials)

S4 SSBN Sea Trials: टाइप-094 में 12 लॉन्च ट्यूब

अब आते हैं मिसाइल क्षमता पर, तो एस4 में 8 वर्टिकल लॉन्च ट्यूब हैं, जिनमें के-4 बैलिस्टिक मिसाइलें लगती हैं। के-4 की रेंज 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है, जो भारत को पाकिस्तान और चीन के बड़े हिस्से को कवर करने की क्षमता देती है।

चीन की टाइप-094 में 12 लॉन्च ट्यूब हैं। इसमें जेएल-2 या नया जेएल-3 मिसाइल सिस्टम लगाया जाता है। जेएल-3 की रेंज 10,000 किलोमीटर से भी ज्यादा मानी जाती है, यानी चीन अपनी सबमरीन से अमेरिका तक को निशाना बना सकता है। इस लिहाज से रेंज और मिसाइल संख्या में चीन आगे है।

लेकिन रणनीति सिर्फ रेंज से नहीं बनती। भारत की सोच अलग है। एस4 को बंगाल की खाड़ी जैसे सुरक्षित समुद्री इलाके में तैनात किया जा सकता है। वहां से बिना ज्यादा खतरा उठाए यह चीन के अहम इलाकों को कवर कर सकती है। यानी भारत को दूर तक जाने की जरूरत नहीं, अपनी ही सुरक्षित समुद्री सीमा से मजबूत जवाबी क्षमता मिल जाती है। (S4 SSBN Sea Trials)

बेहद शोर करती है चीन की टाइप-094

अब बात करते हैं स्टेल्थ की। एसएसबीएन जितनी कम आवाज करती है, उतनी ही ज्यादा सुरक्षित होती है। चीन की टाइप-094 को अक्सर “नॉइजी” यानी ज्यादा आवाज करने वाली सबमरीन माना गया है। शुरुआती वर्जन तो 1970 के दशक की सोवियत तकनीक से भी ज्यादा शोर करने वाले बताए गए। बाद में 094ए वैरिएंट में कुछ सुधार हुए, लेकिन फिर भी यह पश्चिमी देशों की आधुनिक सबमरीन से पीछे मानी जाती है।

भारत की अरिहंत-क्लास भी पूरी तरह साइलेंट नहीं मानी जाती, लेकिन एस4 में डिजाइन और टेक्नोलॉजी में सुधार किया गया है। 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सिस्टम होने के कारण भारत ने अपनी जरूरत के हिसाब से इसमें एकॉस्टिक यानी आवाज कम करने पर खास ध्यान दिया है। (S4 SSBN Sea Trials)

भारत का अपना प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर

रिएक्टर और तकनीक के मामले में भी फर्क है। एस4 में भारत का अपना बनाया प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर लगा है। यह आत्मनिर्भरता की बड़ी मिसाल है। चीन का रिएक्टर घरेलू जरूर है, लेकिन उसमें रूसी डिजाइन का असर साफ दिखता है। तकनीकी तौर पर दोनों देश अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़े हैं, लेकिन भारत ने सीमित संसाधनों में ज्यादा स्वदेशी समाधान तैयार किए हैं।

अब आते हैं ऑपरेशनल स्थिति पर। चीन के पास इस समय करीब 6 टाइप-094 सबमरीन ऑपरेशनल मानी जाती हैं, जो नियमित रूप से गश्त पर जाती हैं। इससे चीन को लगातार समुद्र में परमाणु मौजूदगी मिलती है। भारत अभी उस स्तर पर पहुंचने की प्रक्रिया में है। एस4 के ट्रायल पूरे होने और अरिहंत-क्लास की चारों सबमरीन के सक्रिय होने के बाद भारत भी लगातार समुद्र में कम से कम एक एसएसबीएन रखने की स्थिति में आ जाएगा। इसे ही कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस कहा जाता है। (S4 SSBN Sea Trials)

DG BrahMos Appointment CAT Verdict: डीजी ब्रह्मोस के अपॉइंटमेंट को लेकर कैट का बड़ा फैसला, DRDO की मनमानी पर लगाई फटकार

DG BrahMos Appointment CAT Verdict
DG BrahMos Appointment CAT Verdict: Tribunal Cancels DRDO’s DG BrahMos Selection, Flags Arbitrary Process

DG BrahMos Appointment CAT Verdict: कैट ने ब्रह्मोस डीजी की नियुक्ति को लेकर डीआरडीओ को तगड़ा झटका दिया है। ट्रिब्यूनल ने 25 नवंबर को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत ब्रह्मोस एयरोस्पेस के डायरेक्टर जनरल के पद पर एक अधिकारी की नियुक्ति की गई थी। कैट ने साफ कहा कि यह नियुक्ति मनमानी, बिना ठोस वजह और कानून के मुतााबिक नहीं थी।

कैट ने ब्रह्मोस के डीजी और सीईओ जयतीर्थ आर जोशी को हटाने का आदेश देते हुए डिफेंस मिनिस्ट्री से सीनियर साइंटिस्ट एस नांबी नायडू के नाम पर फिर से विचार करने को कहा है।

कैट का कहना है कि जब चयन प्रक्रिया में शामिल सभी उम्मीदवारों को बराबर अंक दिए गए हों, तो फिर सबसे जूनियर अधिकारी को चुनने की वजह रिकॉर्ड पर लिखित रूप में दर्ज होनी चाहिए। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

DG BrahMos Appointment CAT Verdict:  क्या था पूरा मामला

ब्रह्मोस एयरोस्पेस में डीजी पद के लिए डीआरडीओ ने वर्ष 2024 में चयन प्रक्रिया शुरू की थी। स्क्रीनिंग और इंटरव्यू के बाद तीन उम्मीदवारों का पैनल तैयार किया गया। रिकॉर्ड के मुताबिक, तीनों को 80-80 अंक दिए गए। इसके बावजूद चयन के समय वरिष्ठता, अनुभव, वेतन स्तर और पद की गरिमा जैसे अहम पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया गया।

कैट ने पाया कि चयन पैनल में नामों को अल्फाबेटिकल ऑर्डर में रखा गया, जबकि ऐसा करने का कोई नियम या एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) मौजूद नहीं है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि यह तरीका पारदर्शिता और तर्कसंगत फैसले की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

DG BrahMos Appointment CAT Verdict: नायडू ने दी थी अपॉइंटमेंट को चुनौती

सीनियर साइंटिस्ट एस नांबी नायडू ने 19 नवंबर 2024 को कैट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने दावा किया था कि उनकी सीनियरिटी और अनुभव को नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि वह सभी कैंडिडेट्स में सबसे सीनियर साइंटिस्ट थे, जबकि जोशी सबसे जूनियर थे।

नायडू ने कहा था कि लेवल-16 में एक जाने-माने साइंटिस्ट होने और मौजूदा डायरेक्टर जनरल से सीनियर होने के नाते, उनके मामले पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। अपनी दलील में उन्होंने कहा, “जोशी का अपॉइंटमेंट सरकारी नौकरी में सही चुनाव के सिद्धांतों के हिसाब से नहीं है।”

जोशी ने 2 दिसंबर, 2024 को ब्रह्मोस के डायरेक्टर जनरल का पद संभाला था।

DG BrahMos Appointment CAT Verdict: “प्रतिष्ठित वैज्ञानिक” की अनदेखी पर सवाल

कैट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि खास तौर डिस्टिंग्विश्ड साइंटिस्ट (डीएस) यानी “प्रतिष्ठित वैज्ञानिक” का दर्जा ऑटोमैटिक नहीं होता। यह दर्जा कठोर पीयर-रिव्यू, लंबे अनुभव, वैज्ञानिक योगदान, नेतृत्व क्षमता और उत्कृष्ट रिकॉर्ड के बाद मिलता है। इसलिए डीएस का महत्व कम नहीं आंका जा सकता।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि डीआरडीओ के भीतर डीजी जैसे शीर्ष पद सामान्यतः डिस्टिंग्विश्ड साइंटिस्ट को दिए जाते हैं। साइंटिस्ट ‘एच’ को तब ही मौका दिया जाना चाहिए, जब डीएस उपलब्ध न हों। इस केस में डीएस उपलब्ध होने के बावजूद जूनियर साइंटिस्ट ‘एच’ को तरजीह दी गई, जिसकी कोई ठोस वजह नहीं बताई गई।

कैट ने साफ कहा कि डीआरडीओ चेयरमैन का विवेकाधिकार असीमित नहीं है। विवेकाधिकार का इस्तेमाल कारणयुक्त और रिकॉर्ड पर आधारित होना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि फाइल नोटिंग में न तो अंकों के निर्धारण की स्पष्ट वजह है और न ही यह बताया गया कि बराबर अंक होने के बावजूद किस आधार पर अंतिम चयन किया गया।

अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को “उचित विचार-विमर्श से रहित” बताया और कहा कि ऐसा चयन संवैधानिक शासन की भावना के खिलाफ है। कैट ने यहां तक कहा कि यह चयन प्रक्रिया पहले से तय लगती है और बाद में केवल औपचारिकता निभाई गई।

चार सप्ताह में नए सिरे से विचार करे डीआरडीओ

कैट ने डीआरडीओ को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर इस पूरे मामले पर नए सिरे से विचार करे। साथ ही ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक नया फैसला नहीं हो जाता, तब तक चयनित अधिकारी को अंतरिम प्रभार भी नहीं दिया जाएगा।

ट्रिब्यूनल ने दो टूक कहा कि न्यूनतम पात्रता पूरी करना, अधिक अनुभव और उच्च योग्यता पर भारी नहीं पड़ सकता। खासकर जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पद की हो, तो चयन में सबसे योग्य और वरिष्ठ व्यक्ति को प्राथमिकता देना जरूरी है। (DG BrahMos Appointment CAT Verdict)

Pinaka 120 km range: आज ही DAC ने दी पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट की खरीद को मंजूरी और DRDO ने आज ही कर दिया टेस्ट

Pinaka 120 km range

Pinaka 120 km range: भारतीय सेना के लिए 29 दिसंबर का दिन कई मायनों में बेहद अहम रहा। साल के आखिरी दिनों में डीआरडीओ ने स्वदेशी पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का पहला सफल फ्लाइट टेस्ट किया। तो वहीं दूसरी तरफ डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने करीब 79 हजार करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी। जिसमें भारतीय सेना के लिए पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट भी शामिल है।

Pinaka 120 km range: 120 किलोमीटर की रेंज

डीआरडीओ ने सोमवार को पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट (एलआरजीआर-120) का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया। यह परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में किया गया। इस रॉकेट ने अपनी अधिकतम 120 किलोमीटर की रेंज तक उड़ान भरी और टारगेट को निशाना बनाया। डीआरडीओ के मुताबिक, रॉकेट ने अपनी अधिकतम 120 किलोमीटर की रेंज में तय सभी इन-फ्लाइट मैन्यूवर्स को सफलतापूर्वक पूरा किया और तय लक्ष्य को बेहद सटीकता के साथ निशाना बनाया।

डीआरडीओ के मुताबिक, इस पहले टेस्ट में रॉकेट की उड़ान, डायरेक्शन कंट्रोल, मार्ग में बदलाव की क्षमता और लक्ष्य पर सटीक वार जैसे सभी अहम पहलुओं की जांच की गई। रेंज में लगाए गए रडार, टेलीमेट्री और ट्रैकिंग सिस्टम ने रॉकेट की पूरी उड़ान पर नजर रखी।

Pinaka 120 km range: मौजूद पिनाका लॉन्चर से दागा रॉकेट

यह परीक्षण इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि अब तक पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम की मारक क्षमता 75 किलोमीटर तक सीमित थी। नए लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट के आने से यह दूरी बढ़कर 120 किलोमीटर हो गई है। इसका मतलब यह है कि भारतीय सेना अब दुश्मन के ठिकानों को और ज्यादा दूर से, ज्यादा सटीकता से निशाना बना सकेगी।

खास बात यह रही कि इस लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट को भारतीय सेना में पहले से सेवा में मौजूद पिनाका लॉन्चर से ही दागा गया। पिनाका सिस्टम की विभिन्न रेंज वाली रॉकेट्स को एक ही लॉन्चर से फायर किया जा सकता है। इससे सेना को नए लॉन्चर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी और मौजूदा सिस्टम से ही ज्यादा ताकत हासिल हो सकेगी।

Pinaka 120 km range: रक्षा मंत्री ने दी बधाई

पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट को डीआरडीओ की कई लैब्स ने मिलकर तैयार किया है। इसका डिजाइन और मुख्य विकास का काम आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट ने किया। इसमें हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लैबोरेटरी, डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी और रिसर्च सेंटर इमारत का भी सहयोग रहा। उड़ान परीक्षण का संचालन इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज और प्रूफ एंड एक्सपेरिमेंटल एस्टैब्लिशमेंट ने किया।

यह रॉकेट पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और इसके सभी प्रमुख सिस्टम भारत में ही तैयार किए गए हैं। इससे भारत की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को और मजबूती मिलेगी।

वहीं, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल परीक्षण पर डीआरडीओ को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट का सफल डिजाइन और डेवलपमेंट भारतीय सेनाओं की क्षमता को नई ऊंचाई पर ले जाएगा। रक्षा मंत्री ने इसे सेना के लिए “गेम चेंजर” बताया।

वहीं, डीआरडीओ के चेयरमैन और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव डॉ. समीर वी. कामत ने खुद इस परीक्षण को देखा। उन्होंने परीक्षण में शामिल सभी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों को बधाई देते हुए कहा कि टीम ने तय सभी मिशन उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया है।

यह परीक्षण ऐसे समय में हुआ है, जब आज ही डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम के लिए लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट एम्युनिशन की खरीद को मंजूरी दी है। 29 दिसंबर को हुई डीएसी बैठक में करीब 79 हजार करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, जिसमें लंबी रेंज वाले गाइडेड पिनाका भी शामिल हैं।

Pinaka 120 km range: आर्टिलरी का अहम हिस्सा है पिनाका

वहीं, पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम पहले से ही भारतीय सेना की आर्टिलरी ताकत का अहम हिस्सा है। यह सिस्टम कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागने में सक्षम है। अब लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट के आने से इसकी मारक क्षमता में इजाफा होगा।

नई गाइडेड रॉकेट तकनीक की मदद से सेना अब ज्यादा सटीकता के साथ हमले करेगी। इसका फायदा यह होगा कि कम रॉकेट में ही दुश्मन के अहम ठिकानों को नष्ट किया जा सकेगा। इससे न सिर्फ गोला-बारूद की बचत होगी, बल्कि अनचाहे नुकसान की संभावना भी कम होगी।

Pinaka 120 km range: चार तरह के वारहेड का विकल्प

डीआरडीओ के अनुसार, इस गाइडेड रॉकेट के लिए पॉडेड एम्युनिशन डेवलप किया गया है, जिसमें चार अलग-अलग तरह के वारहेड्स शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि मिशन की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग प्रकार के टारगेट पर अलग तरह का वारहेड इस्तेमाल किया जा सकता है। पोडेड एम्युनिशन की वजह से इन रॉकेट्स को स्टोर करना, ले जाना और दागना भी आसान होगा। सेना के लिए यह एक बड़ी सुविधा मानी जा रही है।

Pinaka 120 km range: कुल 6 रेजिमेंट्स ऑपरेशनल

भारतीय सेना में पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की कुल 6 रेजिमेंट्स ऑपरेशनल हैं। प्रत्येक रेजिमेंट में 3 बैटरियां होती हैं और हर बैटरी में 6 लॉन्चर होते हैं, यानी एक रेजिमेंट में कुल 18 लॉन्चर। इस हिसाब से कुल 18 बैटरियां हैं।

ये रेजिमेंट्स मुख्य रूप से उत्तरी सीमा पर पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल क्षेत्र और पश्चिमी सीमा जम्मू-कश्मीर और पंजाब सेक्टर में तैनात हैं। साथ ही अतिरिक्त रेजिमेंट्स का गठन भी हो रहा है, जिनमें दो और जल्द ऑपरेशनल हो जाएंगी और कुल मिलाकर अगले साल तक 8 रेजिमेंट्स हो जाएंगी। वहीं सेना की योजना में 22 रेजिमेंट्स तक पहुंचनी की है।

INSV Kaundinya: पोरबंदर से मस्कट रवाना हुआ यह ऐतिहासिक जहाज, नारियल रस्सी से सिले शिप में नहीं हैं कीलें और इंजन

INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route
INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route

INSV Kaundinya: भारतीय नौसेना के लिए 29 दिसंबर का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। सोमवार को स्वदेशी पारंपरिक इंडियन नेवल सेलिंग वेसल (आईएनएसवी) कौंडिन्य ने अपनी पहली विदेशी समुद्री यात्रा शुरू की। गुजरात के पोरबंदर से ओमान की राजधानी मस्कट तक की यह यात्रा सिर्फ सफर नहीं है, बल्कि भारत की हजारों साल पुरानी समुद्री विरासत को फिर से जीवित करने की एक अनोखी कोशिश है।

यह यात्रा उस दौर की याद दिलाती है, जब भारतीय नाविक बिना आधुनिक तकनीक के, सिर्फ अपने अनुभव, खगोल ज्ञान और समुद्री समझ के दम पर हिंद महासागर पार करते थे। उस समय भारत और ओमान के बीच व्यापार, संस्कृति और लोगों का आना-जाना समुद्र के रास्ते ही होता था। आईएनएसवी कौंडिन्य की यह यात्रा उन्हीं प्राचीन समुद्री मार्गों को फिर से तलाशने और समझने की कोशिश है।

INSV Kaundinya: पोरबंदर से मस्कट तक ऐतिहासिक सफर

आईएनएसवी कौंडिन्य को पोरबंदर बंदरगाह से औपचारिक रूप से रवाना किया गया। इस मौके पर पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। उनके साथ भारत में ओमान के राजदूत ईसा सालेह अल शिबानी और भारतीय नौसेना के कई वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

नौसेना अधिकारियों ने बताया कि यह यात्रा दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और लोगों से लोगों के संबंधों को और मजबूत करेगी। जब यह जहाज मस्कट पहुंचेगा, तो वह भारत-ओमान की सदियों पुरानी दोस्ती की यादें एक बार फिर ताजा होंगी।

INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route
INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route

क्या है INSV Kaundinya की खासियत

आईएनएसवी कौंडिन्य (INSV Kaundinya) कोई आम जहाज नहीं है। इसे पूरी तरह पारंपरिक स्टिच्ड शिपबिल्डिंग टेक्नीक यानी सिलाई से बने जहाज की तकनीक से तैयार किया गया है। इसमें लकड़ी के तख्तों को कीलों या वेल्डिंग से नहीं, बल्कि नारियल के रेशे से बनी मजबूत रस्सियों से सिला गया है। जोड़ को सील करने के लिए प्राकृतिक रेजिन का इस्तेमाल किया गया है।

यह तकनीक सैकड़ों साल पहले भारत के तटीय इलाकों में आम थी। इसी तरह के जहाजों के जरिए भारतीय नाविक पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक सफर करते थे। आधुनिक स्टील जहाजों से यह पोत बिल्कुल अलग है, यह ऊंची लहरों में भी यह सुरक्षित रहता है।

INSV Kaundinya: अजंता गुफाओं से प्रेरित डिजाइन

INSV Kaundinya का डिजाइन 5वीं शताब्दी के उस जहाज से प्रेरित है, जो अजन्ता की गुफाओं की पेंटिंग्स में दिखाई देता है। उन चित्रों में बने जहाज भारत की प्राचीन समुद्री ताकत और जहाज निर्माण कौशल की कहानी कहते हैं। उसी ऐतिहासिक प्रमाण को आधार बनाकर इस जहाज की रूपरेखा तैयार की गई।

INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route
Ajanta Ship

इस परियोजना की शुरुआत जुलाई 2023 में हुई थी, जब संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होडी इनोवेशंस के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसका उद्देश्य भारत की पारंपरिक समुद्री तकनीकों को दोबारा समझना और उन्हें व्यवहार में लाना था।

INSV Kaundinya: पारंपरिक कारीगरों की मेहनत

INSV Kaundinya का निर्माण सितंबर 2023 में शुरू हुआ। केरल के अनुभवी पारंपरिक कारीगरों की एक टीम ने इसे तैयार किया, जिनका नेतृत्व मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन ने किया। महीनों तक लकड़ी के तख्तों को एक-एक कर नारियल की रस्सियों से सिला गया। यह काम आसान नहीं था, क्योंकि हर जोड़ में संतुलन और मजबूती बनाए रखना जरूरी था।

INSV Kaundinya

फरवरी 2025 में गोवा में इस पोत को समुद्र में उतारा गया। इसके बाद कई तकनीकी और समुद्री परीक्षण किए गए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जहाज खुले समुद्र में लंबी दूरी की यात्रा के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।

INSV Kaundinya: क्या है कौंडिन्य नाम का मतलब

इस जहाज का नाम प्राचीन नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जिनका उल्लेख भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई इतिहास में मिलता है। माना जाता है कि कौंडिन्य भारत से समुद्र के रास्ते दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचे थे और वहां भारतीय संस्कृति के प्रसार में अहम भूमिका निभाई थी। इस नाम के जरिए भारतीय नौसेना ने भारत की उस समुद्री पहचान को सम्मान दिया है, जो समय के साथ इतिहास के पन्नों में दब गई थी।

कौन हैं INSV Kaundinya के कमांडर

आईएनएसवी कौंडिन्य की कमान कमांडर विकास श्योराण संभाल रहे हैं। वहीं, कमांडर वाई हेमंत कुमार इस अभियान के ऑफिसर-इन-चार्ज हैं, जो शुरुआत से ही इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहे हैं। चालक दल में चार अधिकारी और 13 नौसैनिक शामिल हैं। सभी को पारंपरिक नौकायन, हवा और मौसम की समझ तथा आधुनिक सुरक्षा प्रक्रियाओं का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।

नौसेना के अनुसार, यह यात्रा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि पारंपरिक पाल वाले जहाज में मौसम और समुद्री हालात का असर ज्यादा होता है। फिर भी चालक दल पूरी तरह तैयार है और उत्साह से भरा हुआ है।

INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route
INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route

INSV Kaundinya कोई वारशिप नहीं है। इसमें कोई हथियार नहीं हैं और न ही कोई इंजन। यह पूरी तरह हवा और पाल के सहारे चलता है। चालक दल को पाल खोलना, रस्सियां खींचना और दिशा संभालने जैसे काम हाथ से करने पड़ते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। इस जहाज पर कई ऐसे चिह्न और सजावट हैं, जो भारत की समुद्री विरासत और अजंता की कला से प्रेरित हैं।

संजीव सान्याल ने बताई INSV Kaundinya की पूरी कहानी

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य संजीव सान्याल इस पूरी परियोजना से शुरुआत से ही जुड़े रहे हैं। वे बताते हैं, आईएनएसवी कौंडिन्य का विचार सिर्फ एक जहाज बनाने का नहीं था, बल्कि यह समझने का प्रयास था कि भारत ने सदियों पहले बिना आधुनिक तकनीक के महासागरों को कैसे पार किया। उनके शब्दों में, यह परियोजना इतिहास को किताबों से निकालकर समुद्र पर उतारने जैसा है।

उन्होंने बताया, “इसकी शुरुआत दिसंबर 2021 में हुई थी। उस समय उनके और भारतीय नौसेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बातचीत हो रही थी। चर्चा के दौरान यह सवाल उठा कि क्या प्राचीन सिलाई वाली जहाज निर्माण तकनीक को दोबारा से जीवित किया जा सकता है। यही सवाल आगे चलकर एक बड़े प्रोजेक्ट में बदल गया। इसके बाद करीब दो साल तक गहन शोध किया गया। पुराने ग्रंथों और किताबों का अध्ययन हुआ, केरल के पारंपरिक कारीगरों से बातचीत की गई और नौसेना के विशेषज्ञों ने इस विचार को व्यावहारिक रूप देने की योजना बनाई।”

उन्होंने आगे बताया, जुलाई 2023 में इस परियोजना को औपचारिक अनुमति मिली। संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होदी इनोवेशंस कंपनी के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसके बाद जहाज के निर्माण का काम शुरू किया गया। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बिना कील और धातु के सिर्फ रस्सी से सिले गए लकड़ी के तख्ते समुद्र की ऊंची लहरों और तूफानी हालात को कैसे झेल पाएंगे।

INSV Kaundinya Maiden Voyage: Indian Navy Revives Ancient Shipbuilding Tradition on Historic India–Oman Route

संजीव सान्याल के मुताबिक, इस चुनौती का समाधान आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के मेल से निकाला गया। भारतीय नौसेना के नौसैनिक वास्तुकारों ने डिजाइन को आधुनिक इंजीनियरिंग के सिद्धांतों से परखा। आईआईटी मद्रास में जहाज के छोटे मॉडल बनाए गए और उनका परीक्षण किया गया। टोइंग टैंक में मॉडल को पानी में खींचकर देखा गया कि उसे कितना प्रतिरोध मिलता है। वेव बेसिन में अलग-अलग मौसम और लहरों की स्थिति में परीक्षण किए गए। इन सभी परीक्षणों के बाद यह भरोसा हुआ कि यह जहाज खुले समुद्र में सुरक्षित रूप से यात्रा कर सकता है।

सितंबर 2023 में रखी गई जहाज की नींव

सितंबर 2023 में जहाज की नींव (कील सेरेमनी) रखी गई। केरल के प्रसिद्ध मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन और उनकी 20 कारीगरों की टीम ने इस काम की जिम्मेदारी संभाली। ये कारीगर उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जो आज भी इस प्राचीन सिलाई तकनीक को जानते हैं। धीरे-धीरे लकड़ी के तख्तों को एक-एक कर सिलते हुए जहाज को आकार दिया गया। यह काम महीनों चला और इसमें अत्यंत धैर्य और कौशल की जरूरत पड़ी।

वह बताते हैं कि फरवरी 2025 में महाशिवरात्रि की रात को जहाज को पहली बार पानी में उतारा गया। इसके बाद जहाज पर मस्तूल लगाए गए, पाल बांधे गए और अन्य जरूरी साजो-सामान जोड़े गए। मई 2025 में इसे औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया और करवार नौसैनिक अड्डे पर इसका नाम आईएनएसवी कौंडिन्य रखा गया।

INSV Kaundinya: भारत-ओमान रिश्ते होंगे मजबूत

भारत और ओमान के रिश्ते सदियों पुराने हैं। गुजरात के तट से ओमान तक व्यापारिक जहाज नियमित रूप से आते-जाते थे। मसाले, कपड़ा, हाथीदांत और कई अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था। इस यात्रा के जरिए उसी इतिहास को फिर से सामने लाया जा रहा है।

INSV Kaundinya की मस्कट में मौजूदगी न सिर्फ एक वहां की नेवी के लिए खास होगी, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों और जनसंपर्क गतिविधियों का भी हिस्सा बनेगी। इससे दोनों देशों के लोगों को अपने साझा इतिहास को करीब से जानने का मौका मिलेगा।

भारतीय नौसेना इस अभियान के जरिए यह संदेश भी दे रही है कि समुद्री ताकत सिर्फ युद्धपोतों और मिसाइलों तक सीमित नहीं है। संस्कृति, इतिहास और विरासत भी किसी देश की समुद्री पहचान का अहम हिस्सा होती है।

DAC Meeting 2025: डीएसी में 79 हजार करोड़ रुपये के डिफेंस डील्स को मंजूरी, डीप-स्ट्राइक वेपंस, Astra Mk-II और पिनाका को हरी झंडी

DAC Meeting 2025
DAC Meeting 2025: India Clears Rs 79,000 Crore Defence Proposals Focused on Drones, Lasers and Long-Range Strike

DAC Meeting 2025: सोमवार को हुई इस साल की आखिरी डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी की बैठक में तीनों सेनाओं के लिए तकरीबन 79,000 करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। यह बैठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई। इस फैसले से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमताओं में बड़ा इजाफा होगा। खास बात यह रही कि इस बैठक में एंटी-ड्रोन सिस्टम, लंबी दूरी के सटीक मार करने वाले हथियारों और आधुनिक सर्विलांस सिस्टम को प्राथमिकता दी गई।

रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी रिलीज के मुताबिक यह मंजूरी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) के तहत दी गई है। बता दें कि एओएन किसी भी बड़ी डिफेंस डील की पहली और सबसे अहम प्रक्रिया होती है। एओएन मिलने के बाद अब इन प्रोजेक्ट्स पर आगे की खरीद और कॉन्ट्रैक्ट प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इन फैसलों का मकसद सेना को भविष्य की जंग के लिए तैयार करना और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना है।

DAC Meeting 2025: सेना की जरूरतों पर खास फोकस

साल की आखिरी डीएसी बैठक में सबसे ज्यादा फोकस भारतीय सेना की जरूरतों पर रहा। हाल के सालों में दुनिया भर में हुए युद्धों से यह साफ हो गया है कि ड्रोन और प्रिसिजन गाइडेड हथियार अब किसी भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इन्हीं अनुभवों को ध्यान में रखते हुए सेना के लिए कई बड़े सिस्टम्स को मंजूरी दी गई।

सैन्य सूत्रों के मुताबिक सबसे अहम फैसला इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम (IDD&IS) मार्क-II को लेकर लिया गया। यह एक एडवांस्ड काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जिसे खास तौर पर दुश्मन के ड्रोन को पहचानने, ट्रैक करने और नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें हाई-पावर लेजर वेपन सिस्टम लगा होगा, जो लंबी दूरी से ही ड्रोन को मार गिराने में सक्षम है। यह सिस्टम न सिर्फ ड्रोन की मूवमेंट को ट्रैक कर सकता है, बल्कि उनके कंट्रोल और नेविगेशन लिंक को भी जाम कर सकता है।

सेना सूत्रों के मुताबिक, इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम मार्क-II की खासियत यह है कि यह कम पावर वाले, बार-बार फ्रीक्वेंसी बदलने वाले और नॉन-स्टैंडर्ड ड्रोन सिग्नल्स को भी पहचान सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर दुश्मन एक साथ कई ड्रोन भेजता है, यानी ड्रोन स्वार्म अटैक करता है, तब भी यह सिस्टम काम करेगा। इसे टैक्टिकल बैटल एरिया के साथ-साथ देश के अंदरूनी इलाकों में मौजूद अहम सैन्य और नागरिक ठिकानों की सुरक्षा के लिए तैनात किया जाएगा।

DAC Meeting 2025: लो-लेवल लाइट वेट रडार की मंजूरी

ड्रोन खतरे से निपटने के लिए ही सेना को लो लेवल लाइट वेट रडार (इम्प्रूव्ड) यानी LLLR(I) को भी मंजूरी दी गई है। यह एक खास तरह का सर्विलांस रडार है, जिसे छोटे और बेहद नीचे उड़ने वाले ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है। आम रडार सिस्टम कई बार ऐसे छोटे ड्रोन को नहीं पकड़ पाते, लेकिन यह खास रडार इस कमी को दूर करेगा।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह रडार संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों और अहम इंस्टॉलेशंस के आसपास तैनात किया जाएगा। इससे किसी भी संदिग्ध हवाई गतिविधि की समय रहते पहचान हो सकेगी और सेना को तुरंत कार्रवाई का मौका मिलेगा।

DAC Meeting 2025: लोइटरिंग म्यूनिशन से बढ़ेगी सेना की ताकत

डीएसी ने लोइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम की खरीद को भी मंजूरी दी है। इसे आम भाषा में ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी कहा जाता है। यह ड्रोन हवा में कुछ समय तक मंडराता रहता है और जैसे ही टारगेट दिखता है, सीधे उस पर हमला कर देता है। सेना का कहना है कि यह सिस्टम हाई वैल्यू टारगेट्स को बेहद सटीक तरीके से नष्ट करने में मदद करेगा।

यह लोइटरिंग म्यूनिशन पूरी तरह स्वदेशी होगा और इसे हाल ही में गठित शक्तिबाण और दिव्यास्त्र यूनिट्स को दिया जाएगा। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे कठिन माहौल में भी यह सिस्टम काम करने में सक्षम होगा। सेना के अनुसार, इससे दुश्मन पर सिर्फ फिजिकल ही नहीं, बल्कि मानसिक दबाव भी बनेगा।

पिनाका के लिए 120 किलोमीटर रेंज के गाइडेड रॉकेट

सेना की डीप-स्ट्राइक क्षमता को और मजबूती देने के लिए पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम (MLRS) के लिए लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट को मंजूरी दी गई है। अभी तक पिनाका की रेंज करीब 75 किलोमीटर तक थी, लेकिन नए गाइडेड रॉकेट की मदद से यह दूरी बढ़कर 120 किलोमीटर तक हो जाएगी।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, यह रॉकेट पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है और इसमें चार अलग-अलग तरह के वॉरहेड्स लगाए जा सकते हैं। इससे सेना को दुश्मन के हाई वैल्यू टारगेट्स पर ज्यादा असरदार और सटीक हमला करने का विकल्प मिलेगा।

DAC Meeting 2025: नेवी को मिलेंगे और HALE ड्रोन

डीएसी बैठक में भारतीय नौसेना के लिए भी कई अहम फैसले लिए गए। नौसेना के लिए बोलार्ड पुल टग्स की खरीद को मंजूरी दी गई है। ये टग्स बंदरगाहों में जहाजों और पनडुब्बियों को सुरक्षित तरीके से बर्थिंग और अनबर्थिंग में मदद करते हैं। इससे नेवी ऑपरेशंस ज्यादा सुरक्षित और सुचारु हो सकेंगे।

इसके अलावा, हाई फ्रीक्वेंसी सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (HF SDR) मैनपैक की भी मंजूरी दी गई है। यह सिस्टम बोर्डिंग और लैंडिंग ऑपरेशंस के दौरान लंबी दूरी की सुरक्षित कम्युनिकेशन सुनिश्चित करेगा।

सबसे अहम फैसला हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम को लीज पर लेने का है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) क्षमता में बड़ा इजाफा होगा और मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस मजबूत होगी।

बता दें कि अभी भारतीय नौसेना के पास 2 हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम हैं। ये दोनों एमक्यू-9बी सीगार्जियन ड्रोन अमेरिका से लीज पर लिए गए हैं, जो 2020 से ऑपरेशनल हैं। हालांकि, इनमें से एक क्रैश हो गया था, जिसका रिप्लेसमेंट नेवी को मिल चुका है। ये ड्रोन हिंद महासागर में लगातार सर्विलांस और मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। वहीं, अमेरिका से खरीदे गए 31 एमक्यू-9बी ड्रोन्स (जिनमें नौसेना के लिए 15 हैं) की डिलीवरी 2029 से शुरू होगी।

वायुसेना की मारक और ट्रेनिंग क्षमता बढ़ेगी

भारतीय वायुसेना के लिए भी इस डीएसी बैठक में कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। इनमें अस्त्रा मार्क-II एयर-टू-एयर मिसाइल शामिल है, जिसकी रेंज ज्यादा है और यह दुश्मन के विमानों को दूर से ही मार गिराने में सक्षम होगी। इसके अलावा स्पाइस-1000 लॉन्ग रेंज गाइडेंस किट्स को भी मंजूरी दी गई है, जिससे सटीक निशाना लगाया जा सकेगा।

स्पाइस-1000 लॉन्ग रेंज गाइडेंस किट्स को इजरायली कंपनी राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स ने बनाया है। स्पाइस-1000 प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन किट सामान्य अनगाइडेड बॉम्ब्स जैसे 450 किग्रा/1000 पाउंड एमके-83 को स्मार्ट ग्लाइड बॉम्ब में बदल देती हैं। इससे वायुसेना स्टैंड-ऑफ डिस्टेंस से हाई-वैल्यू टारगेट्स (बंकर्स, कमांड सेंटर्स आदि) पर सटीक हमला करने की क्षमता मिलेगी। देगी।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 100 किलोमीटर तक की दूरी से हमला करने की क्षमता देती है, जिससे पायलट को दुश्मन की एयर डिफेंस के खतरे में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। यह दिन हो या रात, किसी भी मौसम में काम करता है और जीपीएस या कैमरे की मदद से बहुत सटीक निशाना लगाता है। इसमें पंख (डिप्लॉयेबल विंग्स) भी होते हैं जिससे यह हवा में दूर तक ग्लाइड कर जाता है।

भारतीय वायु सेना के पास पहले से स्पाइस-2000 है जिसका इस्तेमाल 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक में मिराज-2000 विमानों से किया गया था। स्पाइस-1000 की कुछ किट्स भी 2019 में आपात खरीद के तहत ली गई थीं। स्पाइस-1000 मिराज-2000, जगुआर, सु-30एमकेआई आदि पर इंटीग्रेट हो सकता है।

इसके अलावा डीएसी में वायुसेना के पायलटों की ट्रेनिंग को बेहतर बनाने के लिए एलसीए तेजस के लिए फुल मिशन सिम्युलेटर को मंजूरी दी गई है। वहीं, ऑटोमैटिक टेक-ऑफ और लैंडिंग रिकॉर्डिंग सिस्टम से एविएशन सिक्योरिटी को और मजबूत किया जाएगा।

DAC Meeting 2025: स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में स्वदेशीकरण पर खास ध्यान दिया गया है। ज्यादातर सिस्टम्स देश में ही विकसित किए गए हैं या किए जा रहे हैं। इससे न सिर्फ सेना को आधुनिक हथियार मिलेंगे, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिलेगी।

DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes

DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes
DAC Meeting Approves Rs 79,000-Crore Defence Push, Boosts Drones, Pinaka and Precision Strikes (File Photo)

DAC Meeting 2025: In one of the largest defence procurement clearances of the year, the Defence Acquisition Council (DAC), chaired by Defence Minister Rajnath Singh, on December 29 accorded Acceptance of Necessity (AoN) for proposals worth nearly Rs 79,000 crore, significantly bolstering the operational capabilities of the Indian Army, Navy and Air Force.

The approvals underline India’s accelerating pivot towards counter-drone systems, long-range precision strikes and enhanced surveillance amid evolving battlefield threats.

The decisions were taken at a DAC meeting held in New Delhi, marking a decisive push towards future-ready, technology-intensive warfare, with a strong emphasis on indigenisation and force modernisation.

Army Focus: Counter-Drone Shield and Long-Range Firepower

For the Indian Army, the DAC cleared a series of high-impact proposals reflecting lessons from recent global conflicts, particularly the growing dominance of drones and precision-guided munitions.

A key clearance is for the Integrated Drone Detection & Interdiction System (IDD&IS) Mk-II, a next-generation counter-drone solution equipped with a high-power laser weapon. Designed to detect, track and neutralise hostile drones at extended ranges, the system integrates passive detection, wideband monitoring and precise electronic countermeasures.

Crucially, it can identify low-power, frequency-agile and non-standard drone signals, making it effective against swarm tactics and electronic warfare-enabled threats. The system will protect vital military assets in tactical battle areas as well as population centres in the hinterland.

Complementing this is the approval for Low Level Light Weight Radar (Improved) – LLLR(I), a specialised surveillance radar tailored to detect small, low-flying unmanned aerial systems that often evade conventional radars. Its induction is expected to significantly enhance situational awareness along sensitive borders and critical installations.

Precision Strike and Deep Reach Capabilities

The DAC also cleared procurement of Loiter Munition Systems, described by the Army as a major force multiplier. These “kamikaze drones” combine surveillance and strike capabilities, enabling precision engagement of high-value targets with minimal collateral damage. Indigenous loiter munitions will equip newly raised Shaktibaan and Divyastra units, allowing precision strikes deep into enemy territory even in electronically contested environments. Beyond physical damage, their psychological impact is seen as a key advantage.

Further enhancing deep-strike capacity, the DAC approved Long Range Guided Rocket Ammunition for the Pinaka Multiple Launch Rocket System (MLRS). While existing Pinaka rockets have a range of up to 75 km, the new guided rockets can strike targets up to 120 km away with high accuracy. Developed indigenously, the podded ammunition comes with four different warhead options, enabling tailored responses against high-value enemy targets.

Navy and Air Force: ISR, Mobility and Training Boost

For the Indian Navy, AoN was granted for procurement of Bollard Pull Tugs, essential for maneuvering ships and submarines in harbours, along with High Frequency Software Defined Radios (HF SDR) Manpack to ensure secure long-range communications during boarding and landing operations. The clearance to lease High Altitude Long Endurance (HALE) Remotely Piloted Aircraft Systems is particularly significant, as it will dramatically improve maritime Intelligence, Surveillance and Reconnaissance (ISR) and strengthen Maritime Domain Awareness across the Indian Ocean Region.

The Indian Air Force received approvals for Astra Mk-II beyond-visual-range air-to-air missiles, SPICE-1000 precision guidance kits, Full Mission Simulators for LCA Tejas, and an Automatic Take-off and Landing Recording System. Together, these acquisitions enhance standoff strike capability, air combat dominance, pilot training efficiency and aviation safety.

Strategic Signal

Taken together, the Rs 79,000-crore clearances reflect a strategic recalibration of India’s military posture-one that prioritises technological superiority, indigenous development and preparedness for multi-domain conflicts. With drones, precision strikes and electronic warfare redefining modern battlefields, the DAC’s decisions underscore India’s intent to stay ahead of emerging threats while strengthening self-reliance in defence manufacturing.

IAF S-400 Sudarshan First Image: भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार दिखाई सुदर्शन एयर डिफेंस सिस्टम की झलक

IAF S-400 Sudarshan First Image
IAF S-400 Sudarshan Revealed: First Official Image Marks New Era in India’s Air Defence

IAF S-400 Sudarshan First Image: भारतीय वायुसेना के सबसे ताकतवर एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 की पहली बार पूरी तस्वीर सार्वजनिक रूप से सामने आई है। यह फोटो वायुसेना की सालाना मैगजीन में प्रकाशित की गई है। इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना में “सुदर्शन” नाम दिया गया है।

अभी तक एस-400 की तस्वीरें धुंधली या सैटेलाइट इमेजरी से थीं, लेकिन अब भारतीय वायुसेना ने खुद लॉन्चर की फुल, हाई-क्वालिटी इमेज रिलीज की है, जिसमें भारतीय वायुसेना का राउंडल भी साफ दिख रहा है। पहली बार इसका पूरा लॉन्चर सिस्टम दिखाया गया है। वायुसेना के सूत्रों के मुताबिक, एस-400 अब भारत के एयर डिफेंस आर्किटेक्चर का सबसे अहम स्तंभ बन चुका है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

एस-400 सुदर्शन को दुनिया के सबसे आधुनिक और ताकतवर सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम्स में गिना जाता है। यह सिस्टम एक साथ कई तरह के हवाई खतरों से निपटने में सक्षम है। इसमें फाइटर एयरक्राफ्ट, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल तक को पहचानने, ट्रैक करने और नष्ट करने की क्षमता है।

IAF S-400 Sudarshan First Image: भारत की हवाई ढाल में “गेम-चेंजर”

भारतीय वायुसेना के अनुसार, एस-400 सुदर्शन सिस्टम लड़ाकू विमानों, मानवरहित एरियल व्हीकल यानी यूएवी, क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक मिसाइलों जैसे खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इसकी खासियत यह है कि यह एक साथ कई टारगेट्स पर नजर रख सकता है और अलग-अलग ऊंचाई तथा दूरी पर मौजूद टारगेट को निशाना बना सकता है। यह सिस्टम भारत के वायु क्षेत्र के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच बनाता है। यही वजह है कि इसे भारत की हवाई ढाल में “गेम-चेंजर” माना जा रहा है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि एस-400 के शामिल होने से भारत की एयर डिफेंस क्षमता में जबरदस्त बदलाव आया है। पहले जहां अलग-अलग सिस्टम अलग भूमिकाएं निभाते थे, वहीं एस-400 एक मल्टी-लेयर डिफेंस प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करता है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसकी लंबी रेंज और मल्टी-लेयर सुरक्षा है। इसका मतलब यह है कि कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन से लेकर ऊंची उड़ान भरने वाले फाइटर जेट और लंबी दूरी से दागी गई मिसाइलों तक, सभी के लिए एक ही सिस्टम काफी है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

IAF S-400 Sudarshan First Image: एक साथ कई खतरों से निपटने की ताकत

एस-400 की सबसे खास बात यह है कि यह एक साथ कई टारगेट्स को इंगेज कर सकता है। आमतौर पर पुराने एयर डिफेंस सिस्टम एक या दो टारगेट्स तक सीमित रहते थे, लेकिन एस-400 दर्जनों टारगेट्स को एक साथ ट्रैक कर सकता है। अगर दुश्मन एक साथ ड्रोन, मिसाइल और फाइटर जेट से हमला करता है, तो यह सिस्टम हर खतरे को उसकी प्राथमिकता के हिसाब से निपटाता है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

यह सिस्टम 400 किमी तक बैलिस्टिक मिसाइल्स, 250 किमी तक एयरक्राफ्ट्स, और शॉर्टर रेंज में ड्रोन्स/क्रूज मिसाइल्स को टारगेट कर सकता है। यह एक साथ 80 टारगेट्स ट्रैक और 36 को एंगेज करने की क्षमता रखता है।
इसमें मल्टी-लेयर्ड डिफेंस जिसमें 4 तरह की मिसाइल्स (40एन6, 48एन6ई3, 9एम96ई2) लगी हैं। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

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IAF S-400 Sudarshan Revealed: First Official Image Marks New Era in India’s Air Defence

IAF S-400 Sudarshan First Image: सुदर्शन नाम का मतलब

भारतीय वायुसेना ने एस-400 को सुदर्शन नाम दिया है। सुदर्शन का अर्थ होता है- जो सब कुछ देख सके। यह नाम इस सिस्टम की क्षमताओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है। एस-400 के रडार और सेंसर इतने ताकतवर हैं कि यह सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमान या मिसाइल को ट्रैक कर सकता है।

एक बार किसी टारगेट की पहचान हो जाने के बाद, यह सिस्टम बहुत कम समय में फैसला ले सकता है कि किस मिसाइल से उस खतरे को खत्म करना है। इससे रेस्पॉन्स टाइम बेहद कम हो जाता है, जो किसी भी आधुनिक युद्ध में सबसे अहम है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

पीएम मोदी ने इस साल 15 अगस्त को अनाउंस किया था कि मिशन सुदर्शन चक्र 2035 तक पूरे देश में लागू हो जाएगा। जिसमें मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस शील्ड प्रोजेक्ट कुशा, आकाश, क्यूआरएसएएम मिसाइलें शामिल होंगी।

IAF S-400 Sudarshan First Image: ऑपरेशन सिंदूर में निभाई अहम भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर में इसने अपनी ताकत दिखाई थी। दुश्मन के ड्रोन्स, क्रूज मिसाइल्स और एयरक्राफ्ट्स को इंटरसेप्ट किया। खुद एयरफोर्स चीफ ने कन्फर्म किया कि इसने 5-6 पाकिस्तानी फाइटर्स (जेएफ-17/एफ-16 क्लास) और एक अवॉक्स को 300 किमी की दूरी शूट डाउन किया। यह अब तक का सबसे लॉन्ग रेंज किल माना जा रहा है।

वायुसेना से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 सुदर्शन की क्षमताओं को पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह जंग के दौरान एस-400 ने पाकिस्ताके जहाजों और मिसाइलों को निशाना बनाया। इस ऑपरेशन के दौरान यह सिस्टम पूरी तरह सक्रिय था और हवाई क्षेत्र की सुरक्षा में इसकी भूमिका काफी अहम रही।

सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान एस-400 ने दुश्मन की कई हवाई गतिविधियों को समय रहते ट्रैक किया और उन्हें मार गिराया। इससे भारतीय वायुसेना को अपने लड़ाकू विमानों और अन्य अहम ठिकानों की सुरक्षा में बड़ी सहायता मिली। इस ऑपरेशनल अनुभव ने साबित किया कि यह सिस्टम असल जंग के हालात में भी भरोसेमंद है।

एस-400 के शामिल होने से भारतीय वायुसेना की डिटरेंस क्षमता यानी डर पैदा करने वाली ताकत में बड़ा इजाफा हुआ है। अब किसी भी दुश्मन देश को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि भारत के हवाई क्षेत्र में घुसना आसान नहीं है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

IAF S-400 Sudarshan First Image: इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस की रीढ़

एस-400 सुदर्शन को भारत की इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा माना जा रहा है। इसे अन्य रडार, मिसाइल सिस्टम और कमांड नेटवर्क से जोड़ा गया है, जिससे पूरे देश में एक मजबूत और जुड़ी हुई हवाई सुरक्षा व्यवस्था तैयार होती है। यह IACCS (इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम) से फुली इंटीग्रेटेड है और रियल-टाइम डेटा शेयरिंग करता है। इसका मतलब यह है कि किसी भी खतरे की जानकारी तुरंत पूरे सिस्टम में साझा होती है और जवाबी कार्रवाई तेजी से हो पाती है। यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक एक बड़ा बदलाव है।

इसे पंजाब के आदमपुर बेस, राजस्थान और सिलिगुड़ी ईस्टर्न सेक्टर में डिप्लॉय्ड किया गया है। यह चीन और पाकिस्तान दोनों फ्रंट्स पर डिटरेंस बढ़ाता है। 2018 में 35,000 करोड़ रुपये में 5 स्क्वॉड्रन्स की डील हुई थी, जिनमें से तीन ऑपरेशन हैं, बाकी दो की 2026 में डिलीवरी होगी। (IAF S-400 Sudarshan First Image)

IAF S-400 Sudarshan First Image: फोटो से रणनीतिक संदेश

एस-400 की पहली पूरी तस्वीर का सामने आना सिर्फ एक फोटो रिलीज नहीं है। यह एक रणनीतिक संदेश भी है। इससे यह साफ संकेत गया है कि भारत अब अपनी हवाई सुरक्षा क्षमताओं को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और दुनिया को यह दिखाने में हिचक नहीं रहा कि उसके पास क्या ताकत है। (IAF S-400 Sudarshan First Image)