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Army Chief: सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी बोले- भारत-चीन एलएसी पर हालात ‘संवेदनशील लेकिन स्थिर’

Army Chief said- India-China LAC Situation 'Sensitive but Stable'

Army Chief: सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारत-चीन सीमा पर तनाव को लेकर कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थिति “संवेदनशील लेकिन स्थिर” बनी हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि पूर्वी लद्दाख के देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में पारंपरिक गश्त और चरागाह का काम सामान्य रूप से जारी है।

Army Chief said- India-China LAC Situation 'Sensitive but Stable'

सेना प्रमुख ने कहा, “हमारी तैनाती संतुलित और मजबूत है। हम किसी भी स्थिति को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं।” एलएसी के भविष्य पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि वर्तमान में सीमा पर बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और कैपेसिटी बिल्डिंग पर फोकस किया जा रहा है।

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15 सितंबर को मनाए जाने वाले आर्मी डे पर आयोजित सेना की सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि सभी कोर कमांडर्स को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे गश्त और चरागाह से जुड़े छोटे मुद्दों को जमीनी स्तर पर ही हल करें। उन्होंने कहा, “हमारी तैनाती संतुलित और मजबूत है। हम किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। उत्तरी सीमा पर क्षमता विकास और युद्ध प्रणाली में नवीनतम तकनीक को शामिल करने पर हमारा ध्यान केंद्रित है।” उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा बल स्थानीय मुद्दों को हल करने और सीमावर्ती इलाकों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए तत्पर हैं।

जम्मू-कश्मीर: सीमा पार आतंकवाद जारी

जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश में हालात नियंत्रण में हैं, लेकिन सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशें अब भी जारी हैं। उन्होंने बताया, “पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर सीजफायर समझौता बना हुआ है, लेकिन घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं।”

सेना प्रमुख ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में आतंकी ढांचे अब भी सक्रिय हैं और पड़ोसी देश सीमा पार आतंकवाद को समर्थन दे रहा है। उन्होंने बताया, “पिछले साल जम्मू-कश्मीर में मारे गए 60 फीसदी आतंकवादी पाकिस्तान से थे।”

मणिपुर में स्थिति नियंत्रण में

मणिपुर में हिंसा पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि सरकार और सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों से राज्य में स्थिति नियंत्रण में है। उन्होंने कहा, “सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों और सरकार की सक्रिय पहल से मणिपुर में हालात पर काबू पा लिया गया है।”

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में हिंसा की घटनाएं समय-समय पर सामने आ रही हैं। सेना इन परिस्थितियों में शांति स्थापित करने की कोशिश कर रही है। जनरल द्विवेदी ने बताया, “मणिपुर में हिंसा की घटनाएं साइक्लिक फॉर्म  से हो रही हैं, लेकिन सुरक्षा बल शांति बहाल करने के लिए काम कर रहे हैं। म्यांमार सीमा पर निगरानी बढ़ाई गई है और सीमा पर बाड़ लगाने का काम जारी है।”

सीमा पर टेक्नोलॉजी का बढ़ता उपयोग

सेना प्रमुख ने यह भी उल्लेख किया कि उत्तरी सीमा पर अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को शामिल करने से भारत की युद्धक क्षमताओं में सुधार हो रहा है। उन्होंने कहा, “नवीनतम तकनीकों को युद्धक प्रणाली में शामिल कर उत्तरी सीमा पर क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया है।”

एलएसी पर स्थिति पर सेना प्रमुख के ये बयान उस समय आए हैं, जब भारत और चीन के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के प्रयास जारी हैं।

Eastern Ladakh: हानले से फोटी ला तक सेना की तैयारियां होंगी और मजबूत, गोला-बारूद भंडारण के लिए सरकार से मिली बड़ी मंजूरी

Defence Projects in Ladakh

Eastern Ladakh: पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना की सामरिक क्षमताओं को बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने गोला-बारूद भंडारण और अन्य सैन्य परियोजनाओं के निर्माण को मंजूरी दी है। पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने चीन-भारत सीमा पर सामरिक संरचनाओं की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इन परियोजनाओं को स्वीकृति दी। यह फैसला 21 दिसंबर 2024 को पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की बैठक में लिया गया।

Eastern Ladakh: Hanle to Fotu La, Army Gets Major Boost with Ammunition Storage Approval Eastern Ladakh: Hanle to Fotu La, Army Gets Major Boost with Ammunition Storage Approval Eastern Ladakh: Hanle to Fotu La, Army Gets Major Boost with Ammunition Storage Approval

बैठक में Eastern Ladakh के हानले और फोटी ला जैसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों पर “फॉर्मेशन एम्युनेशन स्टोरेज फैसिलिटी” (FASF) स्थापित करने और भूमिगत कैवर्न के निर्माण की योजना को हरी झंडी दी गई। इसके अलावा, पैंगोंग त्सो झील के किनारे लुकुंग गांव और दुर्बुक क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति को मजबूत करने के प्रस्तावों को भी स्वीकृति दी गई। ये परियोजनाएं अप्रैल से जुलाई 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित की गई थीं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं से सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बलों कीपरेशनल कैपेबिलिटीज में बढ़ोतरी होगी। एफएएसएफ जैसे स्ट्रक्चर गोला-बारूद के सुरक्षित भंडारण और निगरानी के साथ क्विक रेस्पॉन्स कैपेबिलिटी को बढ़ाने में सहायक होंगी। वर्तमान में, अधिकांश गोला-बारूद 250-300 किमी दूर अस्थायी भंडारण केंद्रों में रखा जाता है, जिससे आकस्मिक स्थितियों में रेस्पॉन्स में देरी होती है। इन सुविधाओं के निर्माण से सैनिकों और सामरिक संसाधनों की त्वरित तैनाती सुनिश्चित हो सकेगी।

पूर्वी लद्दाख (Eastern Ladakh) के हानले, फोटी ला, पंगुक, और कोयुल जैसे स्थान सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। फोटी ला, दुनिया के सबसे ऊंचे मोटरेबल पासों में से एक, हानले से 30 किमी दूर स्थित है। यह देमचोक और अन्य अग्रिम मोर्चों को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है। ये स्थान ब्रिगेड स्तर के सैनिकों और अन्य बलों की तैनाती के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य हैं।

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के साथ सेना की परिचालन तैयारियों को मजबूत करने के लिए भूमिगत कैवर्न के निर्माण को स्वीकृति दी गई है। इन संरचनाओं में गोला-बारूद और अन्य सामरिक उपकरणों को सुरक्षित रखा जाएगा। 2020 में चीन के साथ सीमा तनाव के बाद क्षेत्र में सैनिकों की बढ़ती संख्या के साथ स्थायी संरचनाओं की आवश्यकता महसूस की गई थी। ये कैवर्न न केवल शत्रु की निगरानी से बचाव करेंगे, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं से भी सुरक्षा प्रदान करेंगे।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने पूर्वी लद्दाख (Eastern Ladakh) में अन्य सैन्य निर्माण परियोजनाओं को भी मंजूरी दी है। इनमें पैंगोंग त्सो झील के किनारे लुकुंग गांव में अंतर्देशीय जल परिवहन प्लाटून के लिए स्थायी संरचना और एराथ क्षेत्र में एक स्थायी पैदल सेना बटालियन कैंप का निर्माण शामिल है। यह परियोजनाएं सैनिकों और सामरिक उपकरणों की त्वरित आवाजाही सुनिश्चित करेंगी।

इन परियोजनाओं को मंजूरी देते समय पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया है। हानले और फोटी ला क्षेत्र हिम तेंदुए, कस्तूरी मृग, और काले गर्दन वाले सारस जैसे दुर्लभ और संरक्षित प्रजातियों का आवास हैं। पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि निर्माण कार्यों के दौरान पर्यावरणीय दिशानिर्देशों का पालन किया जाए। मंत्रालय ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि परियोजनाओं के कारण वन्यजीवों पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।

LCA Tejas Delivery: क्या मार्च तक मिल पाएगा तेजस फाइटर जेट? वायुसेना को फटाफट डिलीवरी के लिए HAL कर रहा ये बड़ी तैयारी

Tejas Mk-1: HAL Plans Fourth Assembly Line at Nashik to Address Delivery Delays
Air Chief Marshal Amar Preet Singh

LCA Tejas Delivery: देश में स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस (Tejas Mk-1) के उत्पादन में तेजी लाने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने नासिक में चौथी असेंबली लाइन स्थापित करने की योजना बनाई है। एचएएल ने यह कदम अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) की ओर से F-404 इंजन की आपूर्ति में हो रही देरी के चलते उठाया है।

HAL के सूत्रों के अनुसार, GE ने अब तक 26 इंजन के ऑर्डर में देरी की है। हालांकि, कंपनी ने वादा किया है कि मार्च तक पहला इंजन उपलब्ध कराया जाएगा और इसके बाद उत्पादन में तेजी लाई जाएगी।

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Air Chief Marshal Amar Preet Singh

LCA Tejas Delivery: बेंगलुरु और नासिक में मौजूदा असेंबली लाइन्स

वर्तमान में HAL के पास बेंगलुरु में दो असेंबली लाइन्स हैं, जिनकी सालाना उत्पादन क्षमता आठ लड़ाकू विमान है। इसके अलावा, नासिक में भी एक असेंबली लाइन है, जो आठ विमानों का उत्पादन कर सकती है। नासिक प्लांट से पहला तेजस विमान मार्च तक तैयार होने की उम्मीद है।

HAL अब नासिक में दूसरी असेंबली लाइन स्थापित करने की योजना बना रहा है। हालांकि, यह तब ही संभव हो पाएगा जब GE की इंजन आपूर्ति नियमित रूप से शुरू हो जाए। एक नई असेंबली लाइन को स्थापित करने में लगभग 1.5 साल का समय लगेगा।

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नासिक में चौथी असेंबली लाइन: क्यों जरूरी है?

HAL द्वारा नासिक में चौथी असेंबली लाइन का निर्मााण करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह प्रोडक्शन प्रोसेस को तेज करेगा। इससे भारत के लिए लड़ाकू विमानों की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी और वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता को मजबूत किया जा सकेगा।

हालांकि, यह योजना तभी लागू होगी जब GE नियमित रूप से इंजन की आपूर्ति शुरू करेगा। नई सुविधा स्थापित करने में लगभग डेढ़ साल का समय लगेगा। इस योजना की सफलता GE द्वारा समय पर इंजन की आपूर्ति पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर GE नियमित रूप से इंजन की डिलीवरी शुरू कर दे, तो HAL अपने उत्पादन लक्ष्यों को आसानी से पूरा कर सकता है।

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IAF की कम होती स्क्वाड्रन क्षमता

भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए तेजस जेट्स का उत्पादन बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता लगातार घट रही है। IAF के पास 42 स्क्वाड्रन की स्वीकृत संख्या के मुकाबले फिलहाल केवल 31 स्क्वाड्रन ही हैं। इस साल MiG-21 के आखिरी दो स्क्वाड्रन के फेज़ आउट होने के साथ यह संख्या और कम हो सकती है। इसके अलावा, तेजस की पहली पीढ़ी के दो स्क्वाड्रन का उपयोग मुख्य रूप से प्रशिक्षण के लिए किया जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय ने 2021 में HAL के साथ 83 तेजस Mk-1A विमानों (73 फाइटर्स और 10 ट्रेनर्स) की आपूर्ति के लिए 45,696 करोड़ रुपये का समझौता किया था। इसके लिए GE को 99 इंजन की आपूर्ति करनी थी।

हालांकि, अमेरिकी कंपनी ने “सप्लाई चेन दिक्कतों” का हवाला देते हुए समय पर इंजन नहीं भेजे। इस मामले को हल करने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष से चर्चा की थी। इसके बाद भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों के बीच कई बैठकें हुईं।

अब तक HAL ने 40 तेजस LCA विमानों में से 38 की डिलीवरी कर दी है। शेष दो ट्रेनर्स को जल्द ही डिलीवर किया जाएगा। वहीं, HAL ने अपने रिजर्व इंजन के स्टॉक का उपयोग करते हुए पहला तेजस Mk-1A तैयार किया है, जबकि दूसरा उत्पादन में है। पहला Mk-1A अब परीक्षण के विभिन्न चरणों से गुजर रहा है और इसे आगामी एयरो इंडिया 2025 में उड़ान भरते हुए देखा जा सकता है।

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तेजस Mk-1A: धीमे उत्पादन से बढ़ी चुनौती

भारतीय वायुसेना को चौथी पीढ़ी के तेजस Mk-1A फाइटर्स के उत्पादन में देरी का सामना करना पड़ रहा है। वायुसेना प्रमुख ने इस पर निराशा व्यक्त की और कहा, “पहला तेजस विमान 2001 में उड़ा था। लेकिन अब तक पहले 40 विमानों की भी आपूर्ति पूरी नहीं हो पाई है। यही हमारी उत्पादन क्षमता को दर्शाता है, जिसे सुधारने की सख्त जरूरत है।”

तेजस फाइटर जेट के धीमे उत्पादन को देखते हुए वायुसेना प्रमुख ने रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल से उत्पादन क्षमता में सुधार हो सकता है।

वायुसेना प्रमुख ने यह भी बताया कि भारतीय वायुसेना को कम से कम 180 तेजस Mk-1A और 108 तेजस Mk-2 विमानों की जरूरत है। जब तक AMCA प्रोजेक्ट पूरा नहीं होता, ये विमान वायुसेना की ताकत को बनाए रखने में मदद करेंगे।

भारत में 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स की कमी

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में चीन की सैन्य क्षमताओं में हो रहे बड़े बदलावों पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा, “चीन ने सिक्स्थ जनरेशन के दो स्टील्थ फाइटर जेट्स का प्रदर्शन किया है। यह कदम न केवल उनकी तकनीकी क्षमता को दिखाता है, बल्कि क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी बदल सकता है।”

चीन के ये टेललेस, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वाले फाइटर जेट्स पूरी दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय बन गए हैं। इन विमानों की खासियत उनकी कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता है। वहीं, अमेरिका अभी भी अपने छठी पीढ़ी के फाइटर प्रोजेक्ट को अंतिम रूप नहीं दे पाया है।

भारत अभी तक 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के विकास में पीछे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने 2022 में स्विंग-रोल एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। हालांकि, इसका पहला प्रोटोटाइप अगले चार-पांच वर्षों में ही तैयार हो पाएगा। इसका मतलब है कि 2035 तक इन विमानों को वायुसेना में शामिल करना संभव नहीं होगा।

BrahMos Missile Deal: कभी अंडमान पर कब्जा करना चाहता था इंडोनेशिया, अब 3,735 करोड़ रुपये में खरीद रहा ब्रह्मोस, पाकिस्तान का दौरा भी किया रद्द

BrahMos Missile Deal: Indonesia Eyes ₹3,735 Crore Purchase, Drops Pakistan Visit!
Indonesia President Prabowo Subianto

BrahMos Missile Deal: दुनिया बदल रही है और रिश्तों की परिभाषा भी। कभी भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर कब्जा करने की योजना बनाने वाला इंडोनेशिया अब भारत के साथ दोस्ती की नई इबारत लिख रहा है। ताजा खबर यह है कि इंडोनेशिया भारत से ($450 मिलियन) यानी 3,735 करोड़ रुपये की ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने की तैयारी में है। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने इस डील को लेकर भारतीय दूतावास को एक औपचारिक पत्र भेजा है। वहीं, भारत ने भी इस सौदे को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है। बता दें कि इंडोनेशिया के राष्ट्रपति इस बार भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि हैं। वहीं, 26 जनवरी को ही इस डील को लेकर आधिकारिक एलान हो सकता है।

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Indonesia President Prabowo Subianto

BrahMos Missile Deal: डील के लिए भारत दे सकता है लोन

सूत्रों ने बताया कि इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में भारत के जकार्ता स्थित दूतावास को एक पत्र भेजा है, जिसमें 450 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस मिसाइल डील की पुष्टि की गई है। इस डील को और आसान बनाने के लिए भारत इंडोनेशिया को ऋण देने की भी योजना बना रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह ऋण भारतीय स्टेट बैंक या किसी अन्य सरकारी बैंक के माध्यम से दिया जाएगा। पहले EXIM बैंक के जरिए यह प्रक्रिया पूरी होनी थी, लेकिन अब इस पर नए सिरे से काम किया जा रहा है।

इंडोनेशिया के वर्तमान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतों ने 2020 में भारत दौरे के दौरान इस डील की चर्चा की थी, लेकिन वित्तीय कारणों से इसे उस समय अंतिम रूप नहीं दिया जा सका।

इंडोनेशिया इस डील को लेकर काफी उत्सुक है, लेकिन बजट की कमी उसकी राह में रोड़ा बन रही है। इंडोनेशिया सरकार ने पिछले साल सामाजिक योजनाओं पर ज्यादा फोकस किया, जिससे रक्षा क्षेत्र के लिए पर्याप्त फंड नहीं बचा। ऐसे में इंडोनेशिया ने भारत से ऋण की मदद मांगी है। भारत भी इस डील को सफल बनाने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है।

1965 में अंडमान पर चाहता था कब्जा करना

बता दें कि 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, इंडोनेशिया ने पाकिस्तान का समर्थन करते हुए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर कब्जा करने की धमकी दी थी। यह भारत के लिए एक बड़े खतरे की तरह था, क्योंकि इंडोनेशिया पाकिस्तान के पक्ष में दूसरा मोर्चा खोलने की योजना बना रहा था। पाकिस्तान की योजना थी कि उस वक्त इंडोनेशिया  भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर हमला करने और कब्जा करने की रणनीति अपनाए ताकि भारत को कश्मीर और पंजाब में कमजोर किया जा सके।

गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो इस साल भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि होंगे। उनके दौरे से यह उम्मीद की जा रही है कि ब्रह्मोस मिसाइल डील को औपचारिक रूप दिया जा सकता है। हालांकि, उनके पाकिस्तान दौरे की योजना ने भारत के साथ कुछ असहज स्थिति पैदा कर दी थी। लेकिन भारत के नाराजगी जताने के बाद प्रबोवो ने पाकिस्तान का दौरा रद्द कर दिया और अब वे भारत से सीधे मलेशिया जाएंगे।

अब पाकिस्तान का साथ नहीं दे रहा इंडोनेशिया

वहीं, हाल के वर्षों में इंडोनेशिया ने कश्मीर मुद्दे पर ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) की बैठकों में पाकिस्तान का समर्थन करने से परहेज किया है। रिपोर्ट के अनुसार, मध्य एशियाई देशों और सीरिया में पूर्व असद शासन की तरह, इंडोनेशिया ने भी कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन नहीं किया है। गौरतलब है कि हाल के वर्षों में खाड़ी और अरब जगत के नेताओं ने भारत के आधिकारिक दौरों के दौरान पाकिस्तान से दूरी बनाए रखी है। पिछले पांच वर्षों में पाकिस्तान को उच्च-स्तरीय आधिकारिक दौरों की संख्या में भी कमी देखने को मिली है।

फिलीपींस से मिली प्रेरणा

यह पहली बार नहीं है जब भारत ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात कर रहा है। अप्रैल 2024 में, भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल की पहली खेप भेजी थी। इस डील की कीमत करीब 2,700 करोड़ रुपये थी और इसमें तीन मिसाइल बैटरियां शामिल थीं। जनवरी 2022 में फिलीपींस ने $374.96 मिलियन (2,700 करोड़ रुपये) के सौदे के तहत मिसाइल की खरीद की थी। इसके बाद वियतनाम ने भी ब्रह्मोस खरीदने का निर्णय लिया। अब, इंडोनेशिया इस श्रेणी में शामिल होने वाला तीसरा दक्षिण-पूर्व एशियाई देश बन सकता है।

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इंडोनेशिया को क्यों चाहिए ब्रह्मोस?

फिलीपींस की तरह, इंडोनेशिया के पास भी लंबा समुद्री तट है। ब्रह्मोस मिसाइल की तैनाती से उसकी सुरक्षा क्षमता को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति और लंबी समुद्री सीमा को देखते हुए उसे इस तरह की एडवांस्ड मिसाइल तकनीक की आवश्यकता है। इंडोनेशिया के मौजूदा राष्ट्रपति, जो एक पूर्व जनरल हैं, देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं।

इसके अलावा, इंडोनेशियाई वायु सेना के पास पहले से ही रूस निर्मित सुखोई-30 लड़ाकू विमान हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते इन विमानों की रखरखाव संबंधी दिक्कतों को लेकर इंडोनेशिया भारत से मदद मांग सकता है।

पिछले साल ब्रिक्स में शामिल हुआ था इंडोनेशिया

इंडोनेशिया ने पिछले साल जनवरी में ब्रिक्स (BRICS) संगठन में शामिल होकर अपनी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति को मजबूत किया। ब्रिक्स में शामिल होने से इंडोनेशिया और भारत के बीच रुपया-रुपियाह लेनदेन का रास्ता भी खुला। यह डील आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से दोनों देशों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

दिसंबर में नौसेना चीफ गए थे इंडोनेशिया

इससे पहले नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी पिछले साल दिसंबर के मध्य में 4 दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर इंडोनेशिया गए थे। सूत्रों का कहना है कि ब्रह्मोस की बिक्री को लेकर बातचीत पहले से ही जारी थी। नौसेना प्रमुख ने इस यात्रा के दौरान इंडोनेशिया के शीर्ष सरकारी और रक्षा अधिकारियों के साथ द्विपक्षीय चर्चा की थी। उन्होंने इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सजाफ्री सजामसोएद्दीन, इंडोनेशियाई सशस्त्र बलों के कमांडर जनरल अगुस सुबियान्टो और इंडोनेशियाई नौसेना के चीफ ऑफ स्टाफ एडमिरल मुहम्मद अली से भी मुलाकात की थी।

290 किलोमीटर की रेंज

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस के सहयोग से विकसित की गई है। यह मिसाइल 290 किलोमीटर की रेंज और 2.8 मैक (ध्वनि की गति से तीन गुना तेज) की स्पीड से दुश्मन के ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम है। इस मिसाइल की 290 किमी तक की मारक क्षमता इसे किसी भी युद्ध क्षेत्र में निर्णायक हथियार बनाती है। ब्रह्मोस का इस्तेमाल जमीन आधारित, नौसेना और हवाई प्लेटफॉर्म से किया जा सकता है।

China Y-20 Cargo Aircraft: भूकंप प्रभावित तिब्बत के शिगात्से डिंगरी में चीन ने पहली बार उतारा अपना जंबो एयरक्राफ्ट, अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर को देता है टक्कर

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

China Y-20 Cargo Aircraft: हाल ही में तिब्बत के शिगात्से डिंगरी काउंटी में आए 7.1 मैग्नीट्यूड के भूकंप ने इस इलाके को तहसनहस करके रख दिया है। इस भूकंप में कम से कम 126 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक घायल हो गए। भूकंप के झटके नेपाल, भूटान और उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में भी महसूस किए गए। वहीं इस प्राकृतिक आपदा से न केवल जनजीवन प्रभावित हुआ, बल्कि वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर को भी भारी नुकसान हुआ है। राहत और बचाव कार्यों के लिए चीन ने पहली बार अपने अत्याधुनिक Y-20 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया है। इस एयरक्राफ्ट ने शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट पर लैंडिंग की, जो कि दिसंबर 2022 में तैयार हुआ था।

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

China Y-20 Cargo Aircraft: चीनी पौराणिक पक्षी कुनपेंग पर रखा गया है इसका नाम

Y-20 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट यानी कुनपेंग चीन का पहला स्वदेशी रूप से विकसित भारी परिवहन विमान है। इसका नाम चीन की लोककथाओं में एक पौराणिक पक्षी “कुनपेंग” के नाम पर रखा गया है। इसे चीन की वायुसेना ‘चबी गर्ल’ के नाम से भी पुकारती है। यह विमान 73 टन तक भार ले जाने की क्षमता रखता है। यह चीन के सबसे बड़े टैंक ZTZ99 को भी ढोने की क्षमता रखता है। इसे मुश्किल हालात में भी ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। इसे मानवीय राहत, सैन्य अभियान और उपकरणों के ट्रांसपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस विमान में चार शेनयांग WS-20 इंजन लगे हैं,  जो इसे लंबी दूरी तक उड़ान भरने और हवा में ही हवाई ईंधन भरने की क्षमता प्रदान करते हैं।

China-India Talks: बड़ा खुलासा! भारत-चीन वार्ता से पहले भाजपा के इस थिंकटैंक ने किया था बीजिंग का सीक्रेट दौरा, कूटनीतिक संबंधों की बहाली को लेकर की थी बात

Y-20 को दिसंबर 2023 में दुबई एयर शो में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया गया था। यह चीन का सबसे बड़ा मिलिट्री टांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है। इजिप्ट, नाइजीरिया और मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों ने इसे खरीदने में रुचि दिखाई है।

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

China Y-20 Cargo Aircraft से अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर को टक्कर

Y-20 को अमेरिकी C-17 ग्लोबमास्टर के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है। C-17 1995 में लॉन्च हुआ था और अमेरिकी सेना के लिए बेहद कारगर साबित हुआ है। वहीं, Y-20 भी चीन के लिए ऐसी ही भूमिका निभा रहा है। हालांकि, शुरुआती Y-20 वर्जन में रूसी इंजन लगे थे, और “गर्म और ऊंचे” हवाई क्षेत्रों से उड़ान भरने में सक्षम नहीं थे। लेकिन WS-20 इंजन के साथ Y-20B वर्जन ने इन सभी बाधाओं को पार कर लिया है। वहीं चीन ने Y-20 कार्गो विमान पर बेस्ड एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) विमान भी तैयार कर लिया है।

China Y-20 Cargo Aircraft Lands in Tibet: A Challenger to US C-17 Globemaster

शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट का रणनीतिक महत्व

चीन का शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट और Y-20 की तैनाती भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह हवाईअड्डा भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के करीब है और इसे चीन की सैन्य तैयारियों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

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तिब्बत में पांच एयरपोर्ट हैं, जिनका चीन मिलिट्री और सिविल के तौर पर इस्तेमाल करता है। वहीं इनमें से चार एयरपोर्ट भारतीय सीमा से महज 60 किमी की दूरी पर हैं। जबकि शिनजियांग में 2017 से अब तक 15 हवाई अड्डों को अपग्रेड किया गया है, जिनमें से सात मिलिट्री और सिविल उपयोग वाले हैं, जिनमें भारतीय सीमा से सिर्फ 240 किमी दूर स्थित होतान भी शामिल है।

शिगात्से डिंगरी एयरपोर्ट का निर्माण अगस्त 2019 में शुरू हुआ और दिसंबर 2022 में इसे तैयार कर लिया गया। यह एयरपोर्ट तिब्बत में चीन के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि यह एयरपोर्ट नेपाल की सीमा से मात्र 65 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं डोकलाम से इसकी दूरी मात्र 230 किमी है। इस एयरपोर्ट पर चीन ने एक खास बड़ी अंडरग्राउंड फैसिलिटी बनाई है, जिसमें कम से कम तीन प्रवेश द्वार हैं। यह एय़रपोर्ट 3.3 किमी की लंबाई में फैला है।

UNIFIL QRF Vehicles: शांति मिशन में भारतीय वाहनों की एंट्री! अब ‘मेड-इन-इंडिया’ वाहनों पर भरोसा करेंगे लेबनान में तैनात भारतीय जवान

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

UNIFIL QRF Vehicles: लेबनान में संयुक्त राष्ट्र के UNIFIL मिशन में तैनात भारतीय जवानों को पहली बार स्वदेशी वाहन मिलने जा रहे हैं। यह वाहन टाटा मोटर्स ने बनाए हैं और इन्हें 15 जनवरी को मनाए जाने वाले सेना दिवस के मौके पर भारतीय बटालियन तक पहुंचाया जाएगा। इनमें पहली बार टाटा के बने 45 क्यूआरएफ वाहन भी शामिल हैं। इससे पहले भारतीय सेना स्वीडन के बनाए SISU व्हीकल्स का इस्तेमाल करती थी।

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

UNIFIL QRF Vehicles: ड्राई लीज़ व्यवस्था के तहत मिलते हैं वाहन

सेना की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक अभी तक, लेबनान में तैनात 900 भारतीय जवान स्वीडन निर्मित सिसु वाहनों का उपयोग करते थे। यह वाहन संयुक्त राष्ट्र के ड्राई लीज़ व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराए जाते हैं, जहां यूएन इक्विपमेंट्स और व्हीकल्स देता है, और बाकी देश अपने जवान वहां तैनात करते हैं। लेकिन अब, स्वदेशी क्विक रिएक्शन फोर्स (QRF) वाहन भारतीय जवानों को इंस्टेंट रिएक्ट करने और ऑपरेशनल क्षमता में और मजबूती प्रदान करेंगे।

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

टाटा मोटर्स के बनाए ये QRF वाहन सुरक्षा और मोबिल्टी के मामले में काफी एडवांस हैं। इन वाहनों को खासतौर पर खतरों का सामना करने के लिए सैनिकों को तेजी से तैनात करने, पेट्रोलिंग करने, और मानवीय मदद प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये वाहन न केवल जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, बल्कि उनके मिशन की उपयोगिता को भी बढ़ाएंगे।

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टाटा मोटर्स द्वारा बनाए गए 62 वाहनों का यह बेड़ा पिछले साल समुद्री मार्ग के जरिए लेबनान भेजा गया था और अब इन्हें सेना दिवस के अवसर पर औपचारिक रूप से जवानों को सौंपा जाएग। इसमें हाई मोबिलिटी ट्रूप कैरियर व्हीकल्स, यूटिलिटी व्हीकल्स (1 टन और 2.5 टन), मीडियम और लाइट एम्बुलेंस, फ्यूल बोसर्स, और रिकवरी व्हीकल्स शामिल हैं।

UNIFIL QRF Vehicles: ‘Made-in-India’ Vehicles Join Peacekeeping Mission!

भेजे गए 62 स्वदेशी वाहनों में शामिल हैं:

  • हाई मोबिलिटी ट्रूप कैरिज वाहन
  • 1 टन और 2.5 टन यूटिलिटी वाहन
  • मध्यम और हल्के एंबुलेंस
  • फ्यूल बोवर्स
  • रिकवरी वाहन

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से भारत ने शांति प्रयासों में 287,000 से अधिक सैनिकों का योगदान दिया है। अब तक, लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में तैनात भारतीय सैनिक उन वाहनों का इस्तेमाल कर रहे थे, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अन्य देशों से उपलब्ध कराए जाते थे। लेकिन अब, मेड-इन-इंडिया वाहनों के शामिल होने से भारतीय बटालियन स्वदेशी और मजबूत प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो सकेगी। यह कदम न केवल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की उभरती रक्षा निर्माण क्षमताओं और इसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।

Indian Air Force self-reliance: IAF चीफ का बड़ा बयान; चीन के नए स्टील्थ फाइटर जेट्स से सीखे भारत, आत्मनिर्भरता ही है रास्ता

Indian Air Force Self-Reliance: IAF Chief Stresses on Lessons from China Stealth Jets

Indian Air Force self-reliance: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर जोर देते हुए चीन के हालिया सैन्य आधुनिकीकरण का उदाहरण दिया। उन्होंने चीन के सिक्स्थ जनरेशन दो स्टील्थ फाइटर जेट्स को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत को अपने रक्षा अनुसंधान और विकास (R&D) और उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए तेज़ी से काम करना चाहिए।

Indian Air Force Self-Reliance: IAF Chief Stresses on Lessons from China Stealth Jets

Indian Air Force self-reliance: चीन की सैन्य ताकत में हो रहा इजाफा

वायुसेना प्रमुख ने ‘सुब्रतो मुखर्जी सेमिनार’ में कहा, “आज की दुनिया संघर्ष और प्रतिस्पर्धा से भरी हुई है। हमारे पास पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं, जहां चीन और पाकिस्तान ने सैन्यकरण बढ़ा दिया है।” उन्होंने चीन के वायुसेना में हो रहे भारी निवेश का ज़िक्र करते हुए कहा, “हाल ही में चीन के सिक्स्थ जनरेशन दो स्टील्थ फाइटर जेट्स इसका एक उदाहरण है।”

चीन ने हाल ही में चेंगदू में दो नई पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट्स को पहली बार दुनिया के सामने प्रदर्शित किया, जिससे पूरी दुनिया हैरान रह गई। चीन ने 26 दिसंबर को इन दोनों स्टील्थ फाइटर जेट्स की पहली उड़ान का प्रदर्शन किया। ये विमान अपनी एडवांस टेक्नोलॉजी और कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता रखते हैं। इन टेललेस, स्टील्थ विमानों के वीडियो ने अमेरिका तक को चौंका दिया। जबकि अमेरिका अभी तक अपने छठी पीढ़ी के फाइटर प्रोजेक्ट को अंतिम रूप नहीं दे पाया है, वहीं, चीन पहले ही इस क्षेत्र में आगे निकल चुका है।

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वहीं, चीन के पास पहले से ही 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स, जैसे चेंगदू J-20, हैं जिन्हें भारत की सीमाओं के पास होटन और शिगात्से जैसे एयरफील्ड्स पर तैनात किया गया है।

भारत के पास नहीं हैं 5वीं पीढ़ी के जेट्स

भारत अभी भी 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स के उत्पादन से बहुत दूर है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने मार्च 2022 में स्विंग-रोल एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के विकास को मंजूरी दी थी। इसके लिए 15,000 करोड़ रुपये से अधिक की शुरुआती लागत तय की गई है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, AMCA का पहला प्रोटोटाइप अगले चार से पांच वर्षों में तैयार होगा। उत्पादन और शामिल किए जाने की प्रक्रिया 2035 के बाद ही शुरू हो पाएगी।

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तेजस को नहीं मिल पा रहा इंजन 

वायुसेना प्रमुख ने कहा, “पहला विमान 2001 में उड़ा था – यानी 17 साल पहले। फिर, 15 साल बाद 2016 में इसे शामिल किया गया। आज हम 2024 में हैं, लेकिन मेरे पास अभी तक पहले 40 विमान भी नहीं हैं। यही हमारी उत्पादन क्षमता है। हमें इस पर काम करने की सख्त जरूरत है। मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि हमें कुछ प्राइवेट कंपनियों को इसमें शामिल करना होगा। अन्यथा, हालात में कोई बदलाव नहीं आएगा।”

बता दें कि भारत को अपने चौथी पीढ़ी के तेजस मार्क-1ए फाइटर्स का उत्पादन करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके पीछे एक बड़ी वजह GE-F404 टर्बोफैन जेट इंजन की आपूर्ति में हो रही देरी है। अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक द्वारा GE-F404 टर्बोफैन जेट इंजन की आपूर्ति में देरी की वजह से भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं। इसकी वजह है कि वायुसेना को चीन और पाकिस्तान के खतरों से निपटने के लिए 42.5 स्क्वाड्रन की जरूरत है, जबकि उसके पास फिलहाल केवल 30 स्क्वाड्रन ही हैं।

वायुसेना प्रमुख ने आरएंडडी में हो रही देरी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “यदि तकनीक समय पर नहीं पहुंचती है, तो उसका महत्व खत्म हो जाता है। हमें आरएंडडी में शामिल जोखिमों और विफलताओं को स्वीकार करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी।” उन्होंने यह भी कहा, “आत्मनिर्भरता की कीमत चुकानी पड़ेगी, और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए। भले ही इसके लिए ज्यादा खर्च करना पड़े। लेकिन यह हमारे देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।”

रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी पर दिया जोर

वायुसेना प्रमुख ने तेजस फाइटर जेट के धीमे उत्पादन पर भी निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देरी के चलते भारतीय वायुसेना को कई ऑपरेशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। IAF प्रमुख ने चीन और पाकिस्तान से बढ़ते खतरों का ज़िक्र करते हुए कहा कि वायुसेना को कम से कम 180 तेजस मार्क-1ए और 108 तेजस मार्क-2 विमानों की ज़रूरत है। AMCA के प्रोडक्शन और तैनाती तक ये विमान भारतीय वायुसेना की ताकत को बनाए रखने में मदद करेंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि नई तकनीकों को अपनाने और जोखिम लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की जरूरत है। “तकनीक में देरी का मतलब है तकनीक से इनकार। R&D में विफलताओं और जोखिम को स्वीकार करने का रवैया विकसित करना होगा।”

वायुसेना प्रमुख ने रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता से दीर्घकालिक फायदे होंगे, हालांकि शुरुआती चरणों में इसकी लागत अधिक हो सकती है। उन्होंने निजी और सरकारी क्षेत्रों के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया।

ALH Dhruv Crash: जांच पूरी होने तक ध्रुव चॉपर के उड़ान भरने पर लगी रोक! 2023 में भी पूरे बेड़े को कर दिया था ग्राउंड

Dhruv ALH glitch: Army Orders Fleet-Wide Check After Tail Drive Shaft Failure in Dhruv Helicopters
Dhruv Chopper

ALH Dhruv Crash: इंडियन आर्म्ड फोर्सेस ने अपने सभी 330 एडवांस लइट हेलीकॉप्टर (ALH) ‘ध्रुव’ के बेड़े की उड़ान पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है। सशस्त्र बलों ने यह कदम पोरबंदर में तटरक्षक बल के हेलिकॉप्टर हादसे के बाद उठाया है, जिसमें दो पायलट और एक एयरक्रू गोताखोर की मौत हो गई। हादसे के बाद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की एक टीम जांच के लिए घटनास्थल पर भेजी गई है।

ALH Dhruv Crash: Entire Fleet Grounded Pending Investigation!

बता दें कि रविवार को हुए इस हादसे से पहले एएलएच हेलिकॉप्टर अपनी ट्रेनिंग उड़ान पर था। लगभग 90 मिनट की ट्रेनिंग के दौरान 200 फीट की ऊंचाई पर उड़ते समय, हेलिकॉप्टर नाक के बल जमीन पर गिर गया और उसमें आग लग गई। हादसे के तुरंत बाद, हेलिकॉप्टर के फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) बरामद कर लिए गए। इन उपकरणों को दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए भेजा गया है।

ALH Dhruv Crash: एचएएल और कोस्ट गार्ड ने शुरू की जांच

पिछले चार महीनों में एएलएच हेलिकॉप्टरों के साथ यह दूसरी बड़ी दुर्घटना है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और भारतीय तटरक्षक बल ने हादसे की अलग-अलग जांच शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं के पीछे डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने कहा, “इन दुर्घटनाओं में डिजाइन, क्वॉलिटी कंट्रोल, और पायलटों की ट्रेनिंग से जुड़े मामलों की गहराई से जांच होनी चाहिए।”

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वहीं एचएएल सूत्रों का कहना है कि एएलएच  ने अपने आप को साबित किया है। उन्होंने एएलएच का बचाव करते हुए कहा है कि यह विभिन्न उपयोगिता भूमिकाओं में अच्छा प्रदर्शन कर चुका है। वहीं इन हेलिकॉप्टरों की दुर्घटनाओं की दर अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम है। उनके अनुसार, प्रति एक लाख उड़ान घंटों में दुर्घटनाओं की संख्या अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम है।

ALH Dhruv Crash: एएलएच हेलिकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों की रीढ़

देश में निर्मित डबल इंजन वाले 5.5 टन वजनी एएलएच हेलिकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों की रीढ़ माने जाते हैं। ये हेलिकॉप्टर विभिन्न उपयोगी भूमिकाओं में तैनात हैं, इनका इस्तेमाल बचाव कार्य, निगरानी और लॉजिस्टिक सपोर्ट में किया जाता है। खास बात यह है कि 2002 में शामिल किए जाने के बाद से, इसने लगभग 4 लाख उड़ान घंटे पूरे किए हैं। लेकिन हाल में हुए के हादसों ने उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रविवार को हुई दुर्घटना के बाद विशेषज्ञों ने कहा कि स्वतंत्र और व्यापक जांच के लिए बाहरी विशेषज्ञों को भी शामिल करना चाहिए।

2023 में भी बेड़े को किया था ग्राउंड 

यह पहली बार नहीं है जब ALH ध्रुव किसी बड़े हादसे का शिकार हुआ है। 2022 में अरुणाचल प्रदेश में ALH के आर्मर्ड वर्जन ‘रुद्र’ की दुर्घटना में पांच जवानों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके बाद 2023 में चार अलग-अलग हादसे हुए, जिनमें नौसेना, सेना और तटरक्षक बल के ALH हेलिकॉप्टर शामिल थे।

इन लगातार घटनाओं के चलते सशस्त्र बलों ने 250 से अधिक ALH ध्रुव और इसके आर्मर्ड वर्जन ALH रुद्र के पूरे बेड़े को विस्तृत तकनीकी जांच के लिए अस्थाई रूप से ग्राउंडेड कर दिया था। जांच में हेलिकॉप्टर के “कलेक्टिव कंट्रोल” जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों में समस्याएं पाई गई थीं। इसके बावजूद, दुर्घटनाएं जारी रहीं।

वहीं, सशस्त्र बल अभी भी लगातार एएलएच हेलिकॉप्टरों के नए वैरिएंट्स की लगातार खरीद कर रहे हैं। पिछले साल मार्च में, सेना के लिए 25 एएलएच मार्क-III और तटरक्षक बल के लिए 9 हेलिकॉप्टरों के निर्माण के लिए एचएएल के साथ 8,073 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए। इसके अलावा, तटरक्षक बल के लिए 6 नए हेलिकॉप्टरों को मंजूरी दी गई है।

तीन दशकों में 200 से अधिक हेलिकॉप्टर हादसे

भारतीय रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में 22 एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर (ALH) दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं। इन हादसों के अलावा, कई हेलिकॉप्टरों को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी है। 2017 से 2021 के बीच, ALH से जुड़ी छह प्रमुख दुर्घटनाओं की रिपोर्ट दी गई थी।

भारतीय सेना को इन हेलिकॉप्टर हादसों के कारण भारी नुकसान झेलना पड़ा है। पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 200 से अधिक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में कुल 297 लोगों की जान चली गई है।

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कैसे शुरू हुआ ALH ध्रुव का सफर?

पांच टन वजनी इस डबल इंजन मल्टीरोल हेलीकॉप्टर की शुरुआत 1979 में भारतीय वायुसेना के एक कार्यक्रम के तहत हुई थी। 1984 में एचएएल को इसे विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसमें जर्मनी की मेसर्सचिट-बी-ल्को-ब्लोहम को तकनीकी सलाहकार के रूप में शामिल किया गया। हालांकि, यह साझेदारी 1995 में समाप्त हो गई।

पहला प्रोटोटाइप 1992 में उड़ाया गया, लेकिन परियोजना को पूरा करने में कई देरी हुई। अंततः, लगभग 55% स्वदेशी सामग्री के साथ, ALH ध्रुव को 2002 में भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल किया गया। इसका सशस्त्र संस्करण, एमके-IV रुद्र, 2013 में सेना का हिस्सा बना।

ALH ध्रुव के चार प्रमुख संस्करण

  • Mk-I और Mk-II: पारंपरिक कॉकपिट के साथ ये शुरुआती संस्करण भारतीय सशस्त्र बलों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
  • Mk-III: आधुनिक ग्लास कॉकपिट के साथ आता है और तटरक्षक बल में इसका उपयोग खोज और बचाव मिशनों के लिए किया जाता है।
  • Mk-IV रुद्र: यह इसका सशस्त्र संस्करण है, जो उन्नत हथियार प्रणालियों और सटीक हमले की क्षमताओं से लैस है।

मल्टीरोल हेलीकॉप्टर की जरूरत क्यों है?

ALH ध्रुव को बहु-भूमिकाओं के लिए डिजाइन किया गया है। यह ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में सैनिकों और उपकरणों की सप्लाई करने के साथ-साथ युद्ध और आपदा राहत अभियानों में भी उपयोगी है। यह हेलीकॉप्टर भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बेहद अहम है क्योंकि यह दुर्गम और कठिन क्षेत्रों में पहुंचने की क्षमता रखता है।

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हादसों की वजहें

हाल ही में पोरबंदर में हुए हादसे के पीछे तकनीकी खराबी मुख्य वजह मानी जा रही है। इससे पहले भी कई दुर्घटनाओं में ALH ध्रुव के डिजाइन और निर्माण में खामियां सामने आई हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं बूस्टर कंट्रोल रॉड और कलेक्टिव जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स की समस्याएं। ये हेलीकॉप्टर की स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं। इन हिस्सों में खामी आने से हेलीकॉप्टर उड़ान के दौरान अस्थिर हो सकता है।

इसके अलावा, टेल रोटर वाइब्रेशन वॉर्निंग सिस्टम की विफलता भी हालिया दुर्घटनाओं का कारण रही है। यह सिस्टम पायलट को हेलीकॉप्टर में किसी संभावित समस्या के संकेत देता है, लेकिन इसके सही से काम न करने पर पायलट समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठा पाते।

ध्रुव हेलीकॉप्टर का उपयोग ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में सबसे ज्यादा होता है। सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख जैसे इलाकों में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है, जहां तापमान -40°C तक गिर सकता है। इन कठिन परिस्थितियों में मशीनों पर अधिक दबाव पड़ता है।

इन क्षेत्रों में हेलीकॉप्टरों को अत्यधिक दक्षता और स्थिरता की जरूरत होती है। हालांकि, ध्रुव जैसे हेलीकॉप्टर सामान्य परिस्थितियों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, लेकिन इन चुनौतीपूर्ण इलाकों में इन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

ALH ध्रुव जैसे उन्नत हेलीकॉप्टर को उड़ाने के लिए व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन कई मामलों में पायलटों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता। इससे आपातकालीन परिस्थितियों में पायलट सही निर्णय नहीं ले पाते।

विशेषज्ञों का कहना है कि पायलटों को बेहतर प्रशिक्षण और अनुभव प्रदान कर दुर्घटनाओं की संभावना को कम किया जा सकता है।

डिजाइन में सुधार और नए वेरिएंट्स का सुझाव

एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (सेवानिवृत्त) का कहना है, “हम अपने पायलटों और जवानों को खो रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम जांच करें कि ALH जैसे उन्नत हेलीकॉप्टर क्यों दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।”

मेजर जनरल संदीपन हांडा (सेवानिवृत्त) के अनुसार, “ऐसे हेलीकॉप्टर का डिजाइन करना चुनौतीपूर्ण है, जो -40°C की ठंड में ऊंचाई वाले इलाकों में काम कर सके और +50°C की गर्मी में भी। एक ही वेरिएंट के बजाय, ऊंचाई और मैदान के लिए अलग-अलग वेरिएंट पर विचार करना अधिक व्यावहारिक होगा।”

वहीं, लेह स्थित 14 कोर के रसद विभाग के प्रमुख रहे मेजर जनरल ए.पी. सिंह (सेवानिवृत्त) का कहना है कि सेना को चीता और चेतक जैसे हल्के हेलीकॉप्टरों के एक आधुनिक बेड़े की जरूरत है। हालांकि, चीता हेलीकॉप्टर की पेलोड क्षमता सीमित है।

उन्होंने कहा, “हमारे अधिकतर हेलीपैड छोटे हैं, जो 5 टन से अधिक वजन वाले हेलीकॉप्टरों को संभालने में सक्षम नहीं हैं। हमें ऐसे हेलीकॉप्टर की जरूरत है, जो छोटे हेलीपैड पर उतर सके और ज्यादा पेलोड ले जा सके।”

Armed Forces Pension: सरकार पर सख्त सुप्रीम कोर्ट! कहा- देश की रक्षा करने वालों को क्यों लड़नी पड़ रही है कानूनी लड़ाई?

Rehabilitation Of Disabled Officer Cadets Supreme Court

Armed Forces Pension: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि सशस्त्र बलों के कर्मियों और उनके परिवारों को बेवजह के कानूनी झंझटों में न फंसाया जाए। अदालत ने विशेष रूप से पेंशन से जुड़े विवादों को लेकर सरकार द्वारा बार-बार अदालतों में अपील करने की आलोचना भी की।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने इस मामले पर केंद्र से नीति-निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। अदालत ने कहा, “जो लोग देश की सेवा करते हैं, उन्हें बार-बार अदालतों में घसीटना सही नहीं है। पहले से ही बहुत कम लोग सशस्त्र बलों में नौकरी करने के इच्छुक हैं। ऐसे में इन लोगों को कानूनी लड़ाइयों में क्यों फंसाया जाए?”

Armed Forces Pension: देश सेवा करने वालों को न घसीटा जाए कानूनी पचड़ों में

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने केंद्र सरकार की अपील का बचाव करते हुए कहा कि कई मामलों में विकलांगता पेंशन के दावों को चुनौती दी जाती है, क्योंकि वे सर्विस से संबंधित नहीं होते। हालांकि, अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “यह अधिकारी कितने वर्षों तक सेवा में रहे? जो लोग देश की सेवा करते हैं, उन्हें ऐसी लड़ाइयों में क्यों घसीटा जाए? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।”

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि यह मामला न केवल देरी से पेश किया गया, बल्कि इसका कोई ठोस आधार भी नहीं था। यह मामला एक पूर्व भारतीय वायुसेना अधिकारी से जुड़ा था, जो 30 वर्षों की सेवा के बाद टाइप 2 डायबिटीज़ और प्राइमरी हाइपरटेंशन से पीड़ित थे।

Armed Forces Pension: SC Criticizes Govt, Questions Legal Battles for Soldiers

रिलीज़ मेडिकल बोर्ड (आरएमबी) ने शुरू में इन स्थितियों को सेवा से संबंधित नहीं माना था। हालांकि, सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) ने 2023 में दिए गए अपने फैसले में कहा कि वायुसेना की कठोर ट्रेनिंग और उससे जुड़ा तनाव इन बीमारियों का कारण हो सकता है।

एएफटी ने अधिकारी को विकलांगता पेंशन के “राउंडिंग ऑफ” का लाभ देते हुए उनकी पेंशन प्रतिशत को 50 फीसदी तक बढ़ाने का आदेश दिया था। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया और सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, “सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) की स्थापना का उद्देश्य क्या था, अगर हर मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लाना ही है? ये लोग आपके अपने लोग हैं। उन्होंने देश की सेवा की है।” अदालत ने सरकार को याद दिलाया कि एएफटी का गठन सशस्त्र बलों से संबंधित मामलों के तेजी से निपटारे के लिए किया गया था।

हालांकि यह मामला कोई नया नहीं है। दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने एक सैनिक की विधवा को परिवार पेंशन देने से इनकार करने के लिए सरकार और भारतीय सेना पर 50,000 रुपये का जुर्माना ठोका था। इस मामले में जवान की पत्नी को सालों तक न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा।

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अदालत ने तत्कालीन सरकार के रवैये को “कठोर” और “संवेदनहीन” करार दिया था। अदालत ने कहा था कि सरकार को अपने आंतरिक तंत्र को मजबूत करना चाहिए, ताकि पेंशन विवादों से संबंधित अनावश्यक अपीलों को रोका जा सके।

3,000 से अधिक मामले अदालतों में

जानकारी के अनुसार, सशस्त्र बलों के मृत्यु और विकलांगता लाभ से जुड़े मामलों पर रक्षा मंत्रालय की लगभग 3,000 अपीलें विभिन्न उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। अदालत ने इस समस्या की गंभीरता पर ध्यान देते हुए कहा, “हर मामले को अदालत तक लाने का कोई औचित्य नहीं है। सरकार को ऐसी अपीलों को रोकने के लिए ठोस नीति बनानी चाहिए।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि पेंशन और विकलांगता लाभ से संबंधित मामलों में सरकार का दृष्टिकोण मानवीय होना चाहिए। इन मामलों में अनावश्यक कानूनी लड़ाइयों से न केवल प्रभावित व्यक्ति, बल्कि उनके परिवारों को भी मानसिक और आर्थिक नुकसान होता है।

क्या है पेंशन विवाद के पीछे वजह?

कई मामलों में यह देखा गया है कि सरकार तकनीकी मुद्दों का हवाला देकर सैनिकों और उनके परिवारों को लाभ देने से इनकार करती है। अदालत ने इस रवैये की कड़ी आलोचना की और कहा कि पेंशन और विकलांगता लाभ सैनिकों का अधिकार है, न कि कोई विशेषाधिकार।

Armed Forces Tribunals: सुप्रीम कोर्ट बोला- श्रीनगर, जम्मू, शिमला और धर्मशाला में बनें AFT की बेंच, तारीखों पर पेशी के लिए नहीं करना पड़े लंबा सफर

Armed Forces Tribunals: SC Suggests Benches in Srinagar, Jammu, Shimla, and Dharamshala

Armed Forces Tribunals: आर्म्ड फोर्सेज से रिटायर कर्मियों और उनके परिवारों के लिए न्यायिक प्रक्रिया को आसान बनाने के उद्देश्य से, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सशस्त्र बल न्यायाधिकरणों Armed Forces Tribunal (एएफटी) की अधिक रीजनल बेंच बनाने की बात कही है। न्यायालय ने सुझाव दिया कि सर्किट बेंचों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर न्याय उपलब्ध कराया जा सकता है, ताकि आर्म्ड फोर्स  के सदस्यों और उनके परिवारों को लंबी यात्रा और भारी खर्च से बचाया जा सके।

Armed Forces Tribunals: SC Suggests Benches in Srinagar, Jammu, Shimla, and Dharamshala

चंडीगढ़ में Armed Forces Tribunal की केवल एक बेंच

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने चंडीगढ़ के बारे में कहा कि यह क्षेत्र सशस्त्र बलों में योगदान के लिए जाना जाता है। यहां आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल की केवल एक बेंच होने के कारण, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के मामलों को निपटाने में दिक्कत होती है।

Armed Forces Tribunals: श्रीनगर, जम्मू, शिमला और धर्मशाला में बनाएं बेंच

बेंच ने सुझाव दिया कि सर्किट बेंचों को श्रीनगर, जम्मू, शिमला और धर्मशाला जैसे स्थानों पर स्थापित किया जा सकता है, जहां बुनियादी सुविधाएं पहले से उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि हिमाचल के मामले शिमला और धर्मशाला में सुने जा सकते हैं। जबकि जम्मू और श्रीनगर में भी सर्किट बेंच स्थापित की जा सकती हैं। इससे न केवल मुकदमेबाजी की लागत कम होगी, बल्कि सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों को लंबी दूरी तय करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी।

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न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “यदि रीजनल बेंच स्थापित की जाए और स्थानीय बार को इसमें शामिल किया जाए, तो न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ और किफायती बनाया जा सकता है।”

मद्रास बार एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने बताया कि एएफटी में अभी भी कई पद रिक्त हैं। उन्होंने कहा, “चंडीगढ़ में केवल एक बेंच है और एक सदस्य का तबादला हो चुका है, लेकिन उनके स्थान पर किसी की नियुक्ति नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने कई बार नियुक्तियों का आश्वासन दिया है, लेकिन प्रगति न के बराबर है।”

भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि एएफटी के अध्यक्ष आंतरिक प्रशासनिक मुद्दों से अवगत हैं और चयन प्रक्रिया पूरे साल चलती रहती है। हालांकि, उन्होंने रिक्त पदों को समय पर भरने की प्राथमिकता पर जोर दिया।

एडवांस सिलेक्शन प्रोसेस पर विचार करे सरकार

बेंच ने सुझाव दिया कि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए एडवांस सिलेक्शन प्रोसेस पर विचार किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “किसी सदस्य के पद छोड़ने की तारीख की पहले से जानकारी होती है। अगर समय पर नियुक्तियां हो जाएं तो न्याय प्रक्रिया में देरी से बचा जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने सर्किट बेंच के माध्यम से आर्म्ड फोर्स के सदस्यों को जस्टिस मिलने में आसानी होगी। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में शिमला और धर्मशाला में सर्किट बेंच स्थापित की जा सकती हैं। इस पहल से सैनिकों और पूर्व सैनिकों को चंडीगढ़ तक यात्रा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सभी आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में रिक्तियों की स्थिति और चयन प्रक्रिया की जानकारी देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि सशस्त्र बलों के न्याय से जुड़े मामलों को त्वरित और प्रभावी बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है।