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अब Maruti Jimny में चलेंगे ITBP के जवान, आईटीबीपी के बेड़े में हुई शामिल, लद्दाख और अरुणाचल की सीमाओं पर होगी तैनात

Maruti Jimny Joins ITBP Fleet, To Patrol Borders in Ladakh and Arunachal Pradesh

Maruti Jimny: भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के बेड़े में अब मारुति सुज़ुकी की दमदार जिम्नी (Jimny) भी शामिल होंगी। मारुति सुज़ुकी इंडिया लिमिटेड ने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस को 60 जिम्नी गाड़ियां सौंपी हैं। इन गाड़ियों को लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम इलाकों में तैनात किए जाएगा। यह पहली बार है जब केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के बेड़े में जिम्नी को जगह दी गई है। इन वाहनों की तैनाती सीमावर्ती क्षेत्रों में गश्त और निगरानी को और मजबूत करेगी।

Maruti Jimny Joins ITBP Fleet, To Patrol Borders in Ladakh and Arunachal Pradesh

ITBP देश के सबसे कठिन और ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात रहती है, जहां तापमान अक्सर -45 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। ऐसी जगहों पर सुरक्षा बलों को मजबूत और भरोसेमंद वाहनों की जरूरत होती है। वहीं, जिम्नी, अपनी शानदार ऑफ-रोड क्षमताओं के लिए जानी जाती है और ऐसे इलाकों में आसानी से गश्त, सीमा की निगरानी और सैनिकों की आवाजाही के लिए बेहतरीन है।

Maruti Jimny में लैडर-फ्रेम चेसिस

जिम्नी में लैडर-फ्रेम चेसिस और All-Grip Pro (4×4) टेक्नोलॉजी दी गई है, जिससे इसे ऊबड़-खाबड़ रास्तों और मुश्किल इलाकों में भी मजबूत पकड़ और बढ़िया बैलेंसिंग मिलती है। इसके बॉडी डिज़ाइन और स्क्वायर बॉडी रेशियो से ड्राइवर को बेहतर विजिबिलिटी मिलती है, जिससे कठिन रास्तों पर भी ड्राइविंग आसान हो जाती है।

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जिम्नी की ऑफ-रोड क्षमताएं इसे इन इलाकों के लिए बेहद मुफीद हैं। जिम्नी बॉर्डर इलाकों में पेट्रोलिंग, सैनिकों की आवाजाही और आपातकालीन स्थितियों में राहत कार्यों में अहम भूमिका निभाएगी। जिम्नी की “नेवर टर्न बैक” टैगलाइन भी इस बात की पुष्टि करती है कि वह किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।

आईटीबीपी के लिए क्यों है Maruti Jimny खास?

आईटीबीपी के जवानों को जिस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उसके लिए जिम्नी एक बेहतरीन वाहन है। चाहे वह बर्फीले पहाड़ हों या दुर्गम ग्लेशियर, जिम्नी की ताकत इसे इन इलाकों के लिए परफेक्ट बनाती है।

Maruti Jimny Joins ITBP Fleet, To Patrol Borders in Ladakh and Arunachal Pradesh

Maruti Jimny का मेंटेनेंस भी आसान

जवानों के मुताबिक, जिम्नी का कॉम्पैक्ट डिजाइन, पावरफुल इंजन और बेहतर ग्राउंड क्लीयरेंस इसे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी सहज बनाता है। इसके अलावा, जिम्नी का मेंटेनेंस भी आसान है, जो कि दूर-दराज के इलाकों में तैनात बलों के लिए बेहद जरूरी होता है। वहीं, जिम्नी के ITBP में शामिल होने से न केवल बल की लॉजिस्टिक क्षमताएं बढ़ेंगी, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में सप्लाई और कम्यूनिकेशन व्यवस्था भी बेहतर होगी।

नई दिल्ली स्थित ITBP मुख्यालय में आयोजित इस समारोह में ITBP के एडीजी (मुख्यालय) अब्दुल गनी मीर (IPS) और मारुति सुज़ुकी के सीनियर एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (मार्केटिंग और सेल्स) पार्थो बनर्जी मौजूद थे। इस अवसर पर पार्थो बनर्जी ने कहा, “यह हमारे लिए गर्व का क्षण है कि जिम्नी अब ITBP के जवानों के साथ देश की सीमाओं की रक्षा में योगदान देगी। दशकों से मारुति सुज़ुकी की जिप्सी सेना का भरोसेमंद साथी रही है और अब जिम्नी इस विरासत को आगे बढ़ाएगी।”

जिप्सी का सेना से पुराना रिश्ता

भारतीय सशस्त्र बलों के साथ मारुति सुज़ुकी का रिश्ता नया नहीं है। पहले मारुति जिप्सी दशकों तक सेना और अर्धसैनिक बलों की पहली पसंद रही थी। जिप्सी की मजबूती और विश्वसनीयता ने इसे जवानों के बीच लोकप्रिय बनाया। अब जिम्नी के आने से यह परंपरा और मजबूत हो गई है। जिम्नी, जिप्सी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी और बेहतर परफॉर्मेंस के साथ आईटीबीपी के मिशनों में मदद करेगी।

जापान को एक्सपोर्ट की जाती है भारत में बनी जिम्नी

मारुति सुज़ुकी की जिम्नी पिछले 50 सालों से दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुकी है। यह मुश्किल और ऊंचाई वाले इलाकों में अपनी मजबूती और परफॉर्मेंस के लिए प्रसिद्ध है। जिम्नी 5-डोर वर्जन को विशेष रूप से हरियाणा के गुरुग्राम प्लांट में तैयार किया जाता है और इसे 100 से अधिक देशों में निर्यात किया जाता है। हाल ही में मारुति सुज़ुकी ने जिम्नी 5-डोर को जापान को एक्सपोर्ट करना शुरू किया है, जो ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत एक बड़ी उपलब्धि है।

TROPEX-25: हिंद महासागर में भारतीय नौसेना दिखा रही अपनी समुद्री ताकत, हर दुस्साहस का मिलेगा करारा जवाब!

TROPEX-25: Indian Navy's Maritime Exercise in Full Swing to Counter Any Threat

TROPEX-25: भारतीय नौसेना की महत्वपूर्ण थिएटर लेवल ऑपरेशनल एक्सरसाइज (TROPEX-25) इस समय हिंद महासागर क्षेत्र में पूरे जोश के साथ चल रही है। यह एक्सरसाइज हर दो साल में आयोजित की जाती है और इसमें भारतीय नौसेना अपनी सभी एक्टिव यूनिट्स के साथ-साथ थल सेना, वायुसेना और तटरक्षक बल के रिसोर्सेज भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

TROPEX-25: Indian Navy's Maritime Exercise in Full Swing to Counter Any Threat

TROPEX-25 का उद्देश्य भारतीय नौसेना के युद्ध कौशल युद्ध क्षमता को परखना और सुनिश्चित करना है कि किसी भी पारंपरिक, विषम या हाइब्रिड खतरे के खिलाफ देश की समुद्री सुरक्षा के हितों की रक्षा के लिए एक कोऑर्डिनेटेड एंड इंटीग्रेटेड रिस्पांस दिया जा सके।

TROPEX 2025: भारतीय नौसेना की ताकत के आसपास भी नहीं फटकते पाकिस्तान और बांग्लादेश, AMAN-25 के जरिए चीन को बढ़ावा दे रहा है पाक

जनवरी से मार्च 2025 तक तीन महीनों में विभिन्न चरणों में ट्रॉपेक्स-25 को आयोजित किया जा रहा है। यह अभ्यास बंदरगाह पर और समुद्र में दोनों स्थानों पर किया जा रहा है, जिसमें वारफेयर मिशन, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर ऑपरेशंस, लाइव वेपन फायरिंग, और एंफीबियस एक्सरसाइज (AMPHEX) भी शामिल हैं। इस दौरान नौसेना के लगभग 65 जहाज, 9 पनडुब्बियां और 80 से अधिक विभिन्न प्रकार के एयरक्राफ्ट हिस्सा ले रहे हैं।

TROPEX-25: Indian Navy's Maritime Exercise in Full Swing to Counter Any Threat

इसमें देश में निर्मित एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत, स्टेट ऑफ आर्ट विशाखापट्टनम और कोलकाता क्लास डिस्ट्रॉयर्स, कलवरी क्लास पनडुब्बियां और MiG 29K, P8I, HALE सी गार्जियन और MH-60R हेलीकॉप्टर जैसे विमान शामिल हैं।

TROPEX-25: Indian Navy's Maritime Exercise in Full Swing to Counter Any Threat

इस अभ्यास में भारतीय सेना, वायुसेना और तटरक्षक बल को भी शामिल किया गया है। इसमें सुखोई-30, जगुआर, C-130, फ्लाइट रिफ्यूलर, AWACS विमान, एक इन्फेंट्री ब्रिगेड के 600 से अधिक सैनिक और 10 से अधिक तटरक्षक जहाज और विमान भाग ले रहे हैं। इसका उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और जॉइंट ऑपरेशंस कैपेबिलिटी को बढ़ावा देना है।

TROPEX-25: Indian Navy's Maritime Exercise in Full Swing to Counter Any Threat

समय के साथ ट्रॉपेक्स-25 का भी विस्तार हुआ है। यह एक्सरसाइज कोऑर्डिनेटेड प्लानिंग, एक्यूरेट टार्गेटिंग, कॉम्बैट इफेक्टिवनेस और क्रेडिबल जॉइंट ऑपरेशंस में एक बड़ा कदम है, जो भारत के समुद्री हितों की रक्षा करने की दिशा में उठाया जा रहा है। भारतीय नौसेना की इस पहल से न केवल देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होती है, बल्कि ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर भारत की बढ़ती ताकत को भी बताती है।

Indian Army Helicopter Fleet: पुराने हेलीकॉप्टर बेड़े को बदलेगी भारतीय सेना, शामिल करेगी 250 नए चॉपर, ये कॉप्टर हैं रेस में

Indian Army Helicopter Fleet Upgrade: 250 New Choppers to Replace Aging Fleet

Indian Army Helicopter Fleet: भारतीय सेना ने मॉर्डनाइजेशन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने एविएशन सेक्टर को मजबूत करने की योजना बनाई है। इस योजना के तहत, सेना जल्द ही निगरानी और टोही अभियानों के लिए लगभग 250 नए हेलिकॉप्टरों को शामिल करने जा रही है। यह कदम सेना की पुरानी हो चुकी हेलिकॉप्टर फ्लीट को बदलने के लिए उठाया जा रहा है, जिससे सेना की ऑपरेशनल कैपेबिलिटी में जबरदस्त सुधार होगा।

Indian Army Helicopter Fleet Upgrade: 250 New Choppers to Replace Aging Fleet

Indian Army Helicopter Fleet: चेतक और चीता भी बदले जाएंगे

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “हमारी हेलिकॉप्टर फ्लीट अब पुरानी हो चुकी है और इसे बदलना समय की मांग है। चेतक और चीता जैसे हेलिकॉप्टर, जो पिछले कई दशकों से सेना की सेवा में हैं, अब पुराने पड़ चुके हैं। ये हेलिकॉप्टर 1960 के दशक में बनाए गए थे और 1970 के दशक में सेना में शामिल हुए थे। हालांकि, इन पर आज भी भरोसा किया जा सकता है। लेकिन आज के समय में इनमें लेटेस्ट एवियोनिक्स, सेफ्टी फीचर्स और ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी की कमी है।

उन्होंने बताया कि सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत स्वदेशी उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है।” सेना के लिए प्रस्तावित मुख्य हेलिकॉप्टरों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH), रूस का कामोव-226T, और एयरबस H125 शामिल हैं।

Indian Army Helicopter Fleet: सिंगल इंजन बड़ी समस्या

सूत्रों के मुताबिक इन पुराने हेलिकॉप्टरों की एक और बड़ी समस्या उनकी सिंगल-इंजन कॉन्फ़िगरेशन है, जिससे ऑपरेशन के दौरन जोखिम बढ़ जाता है। इसके अलावा, उनकी पेलोड क्षमता भी सीमित है, एक बड़ी समस्या है, जिससे सैनिकों और सैन्य साजोसामान को ले जाने में कठिनाई होती है। इन हेलिकॉप्टरों के लिए स्पेयर पार्ट्स भी नहीं मिल पाते, जिससे इनके मेंटेनेंस में समस्याएं आ रही हैं।

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Indian Army Helicopter Fleet: लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) प्रमुख दावेदार

मेक इन इंडिया पहल के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (LUH) प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। यह हेलिकॉप्टर हाई एस्टीट्यूड इलाकों में बेहतरीन प्रदर्शन करता है और चेतक और चीता हेलिकॉप्टरों की जगह लेने की तैयारी में है।

इसके अलावा, रूस के कामोव-226T और एयरबस का H125 भी इस रेस है। कामोव-226T एक डबल इंजन वाला हेलिकॉप्टर है, जो अपनी सेफ्टी और मॉड्यूलर डिज़ाइन के लिए जाना जाता है। हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध और अन्य जियोपॉलिटिकल परिस्थितियों के चलते इस हेलिकॉप्टर की खरीद में देरी हुई है। दूसरी तरफ, एयरबस का H125 दुनियाभर में अपनी हाई एल्टीट्यूड कैपेबिलिटी और एडवांस एवियोनिक्स के लिए जाना जाता है।

सेना के एविएशन कोर की चुनौतियां

भारतीय सेना का एविएशन कोर, भले ही सेना की सबसे लेटेस्ट ब्रांचों में से एक है, लेकिन मॉर्डन वारफेयर में इसका रोल बेहद अहम है। यह ब्रांच वॉर मिशन, निगरानी, लॉजिस्टिक्स, घायल सैनिकों की निकासी और मानवीय मदद में सबसे आगे रहती है।

भारतीय सेना दुनिया के कुछ सबसे दुर्गम इलाकों में काम करती है, जहां हेलिकॉप्टरों से कनेक्टिविटी संभव है। लद्दाख, सियाचिन ग्लेशियर, उत्तर सिक्किम, और अरुणाचल प्रदेश जैसे हाई एल्टीट्यूड इलाकों में माइन जीरो डिग्री टेंपरेचर, खराब मौसम और पतली हवा में हेलिकॉप्टर ऑपरेट करना बेहद मुश्किल होता है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए, भारतीय सेना ने अपनी हेलिकॉप्टर फ्लीट को अपग्रेड करने की व्यापक योजना शुरू की है।

सेना की एविएशन कोर होगी मजबूत

जुलाई 2023 में रक्षा मंत्रालय ने 20 टोही और निगरानी हेलिकॉप्टरों को किराए पर लेने के लिए एक आरएफआई (Request for Information) जारी किया था, जो पांच सालों के लिए ग्राउंड सपोर्ट एक्विपमेंट्स के साथ आएंगे। फिलहाल, भारतीय सेना की एविएशन कोर लेह, मिसामारी और जोधपुर में तीन ब्रिगेड तैनात हैं, जिनके पास लगभग 190 चीता, चेतक और चीताल हेलिकॉप्टर, 145 ALH (एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर) और 75 रुद्र (ALH-WSI) हेलिकॉप्टर हैं। इसके अलावा, 25 ALH Mk-III हेलिकॉप्टरों के लिए भी ऑर्डर दिए गए हैं।

सेना के एक अधिकारी ने कहा, “हम न केवल पुराने हेलिकॉप्टरों को बदलने पर फोकस कर रहे हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि नए हेलिकॉप्टर मॉर्डन वारफेयर की सभी जरूरतों को पूरा करें। यह कदम भारतीय सेना को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाएगा।”

ALH Dhruv Grounded: ध्रुव हेलीकॉप्टर के ग्राउंड होने से बॉर्डर सप्लाई पर पड़ा असर, सेना ने सिविल हेलीकॉप्टरों से संभाली कमान!

ALH Dhruv Grounded: Army Turns to Civil Helicopters to Maintain Border Supplies!

ALH Dhruv Grounded: भारतीय सेना एडवांस लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर ALH ध्रुव के ग्राउंड होने के असर अब भारतीय सेना की ऑपरेशनल तैयारियों पर दिखने लगा है। इसके चलते सेना को सीमावर्ती इलाकों में जरूरी सामान और रसद पहुंचाने के लिए अब सिविल एविएशन कंपनियों की मदद लेनी पड़ रही है। बुधवार को जारी एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि सेना के ‘सूर्य कमान’ ने थम्बी एविएशन प्राइवेट लिमिटेड के साथ करार कर सिविल हेलीकॉप्टरों के जरिये हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में फॉरवर्ड पोस्ट तक सप्लाई शुरू कर दी है।

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ग्राउंड है ‘वर्क हॉर्स’

भारतीय के ‘वर्क हॉर्स’ कहे जाने वाले स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) ‘ध्रुव’ का बेड़ा तकनीकी खामियों के चलते ग्राउंड कर दिया गया और इसकी उड़ानों पर पूर्णतया रोक लगा दी गई। पिछले महीने 5 जनवरी को पोरबंदर में हुए हादसे के बाद यह फैसला लिया गया था। इस हादसे में भारतीय तटरक्षक बल के ALH मार्क-III हेलीकॉप्टर की ट्रेनिंग उड़ान के दौरान क्रैश हो जाने से तीन कर्मियों की मौत हो गई थी। देशभर में मौजूद लगभग 330 ALH हेलीकॉप्टर हैं, और सभी को ग्राउंड कर दिया गयाा है। यहां तक कि 15 सितंबर को मनाए जाने वाले आर्मी डे और रिपब्लिक डे पर भी ध्रुव और इसके दूसरे वैरिएंट्स ने उड़ान नहीं भरी थी।

ALH Dhruv Grounded: थंबी एविएशन के साथ करार

सेना ने थंबी एविएशन प्राइवेट लिमिटेड के साथ कॉन्ट्रैक्ट करके सिविल हेलिकॉप्टर सेवाएं शुरू की हैं, जिनका ऑपरेशन गुरुवार से शुरू हो गया। थंबी एविएशन बेल 412 हेलिकॉप्टरों का उपयोग करती है, जो आमतौर पर पैसेंजर ट्रांसपोर्ट, वीआईपी उड़ानों और मेडिकल इमरजेंसी सेवाओं के लिए उपयोग किए जाते हैं। अधिकारियों के अनुसार, सेना की जरूरतों के आधार पर इन हेलिकॉप्टरों की संख्या तय की जाएगी।

ALH Dhruv Grounded: हाई एल्टीट्यूड इलाकों में परफॉरमेंस शानदार

भारतीय सेना ध्रुव हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल हाई एल्टीट्यूड इलाकों में रसद, सैनिक साजोसामान और इमरजेंसी सेवाओं में करती है। हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इनकी परफॉरमेंस शानदार है। लेकिन हाल के कुछ सालों में बार-बार तकनीकी खामियों और दुर्घटनाओं के चलते इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। इसी के चलते अब सेना ने सीमावर्ती इलाकों में रसद आपूर्ति और इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए प्राइवेट एविएशन कंपनियों का रुख किया है।

थंबी एविएशन के हेलीकॉप्टरों की मदद से सेना सीमावर्ती इलाकों में तैनात जवानों को खाद्य सामग्री, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने के साथ-साथ सीमा पर चल रहे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए निर्माण सामग्री भी समय पर भेज सकेगी।

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ALH Dhruv Grounded: 2024 में 40,000 घंटे उड़ान

भारत-चीन सीमा पर 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के आसपास कई इलाके ऐसे हैं जो अभी भी सड़क मार्ग से जुड़े नहीं हैं। ऐसे इलाकों में रसद पहुंचाने के लिए वायुसेना और सेना के हेलीकॉप्टर ही एकमात्र विकल्प होते हैं। लेकिन ध्रुव हेलीकॉप्टरों के ग्राउंड होने के कारण यह चुनौती और भी बढ़ गई थी। ALH हेलीकॉप्टर भारतीय सेना और वायुसेना के लिए एक वर्कहॉर्स की तरह काम करते हैं। अकेले 2024 में भारतीय सेना में ALH हेलीकॉप्टरों ने 5,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी थी।

पिछले साल भी हुआ था करार

इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में भारतीय सेना ने पहली बार बॉर्डर इलाकों आवश्यक सप्लाई के लिए निजी सिविल एविएशन कंपनियों के साथ करार किया था। यह कदम खासतौर पर उन फॉरवर्ड पोस्ट के लिए उठाया गया था, जो सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी के कारण अन्य हिस्सों से कट जाती हैं। इसके तहत सेना ने अपने एविएशन रिसोर्सेज की जगह सिविलियन हेलिकॉप्टरों के इस्तेमाल का फैसला किया था, जिससे न केवल लागत में कमी आएगी, बल्कि सैन्य हेलिकॉप्टरों को युद्ध और इमरजेंसी सेवाओं के लिए सुरक्षित रखा जा सकेगा।

इस करार के तहत जम्मू क्षेत्र की 16 रिमोट चौकियों को पूरे साल और कश्मीर और लद्दाख की 28 चौकियों को 150 दिनों तक सिविल हेलिकॉप्टरों के जरिये सप्लाई दी जाएगी। इस पहल के तहत हेलिकॉप्टर ऑपरेशन के लिए लद्दाख में सात, कश्मीर में दो और जम्मू क्षेत्र में एक माउंटिंग बेस बनाए गए हैं, जो कुल 44 चौकियों को कवर करेंगे। इन बेसों का डेवलपमेंट बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम और पीएम गति शक्ति योजना के तहत किया गया है, ताकि सीमावर्ती इलाकों में एक इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार किया जा सके।

Chinese Spyware: भारतीय ड्रोनों में घुसपैठ की साजिश! चीनी पुर्जों से जासूसी और हैकिंग का खतरा, सेना ने रद्द किए 400 ड्रोन के सौदे

Operation Sindoor Spurs Indian Army Push for 5000 Tethered Surveillance Drones

Chinese Spyware: रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए देश की निजी कंपनियों की तरफ से बनाए जा रहे ड्रोन्स में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल पर कड़ी कार्रवाई की है। रक्षा मंत्रालय ने 400 लॉजिस्टिक्स ड्रोन्स के तीन बड़े सौदों को रद्द कर दिया है। यह कदम देश की साइबर सिक्योरिटी और सैन्य गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। सूत्रों का कहना है कि चीनी पुर्जों के चलते ड्रोन्स में हैकिंग और डेटा लीक जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ गया था। इससे पहले भी पिछले साल जून में रक्षा मंत्रालय ने लॉजिस्टिक्स ड्रोनों के एक बड़े ऑर्डर को कैंसिल किया था।

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Chinese Spyware: ड्रोन्स की कुल कीमत 230 करोड़

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, इन सौदों में 200 मीडियम-एल्टीट्यूड, 100 हैवी-वेट और 100 लाइट-वेट लॉजिस्टिक्स ड्रोन्स शामिल थे। इन ड्रोन्स की कुल कीमत 230 करोड़ रुपये से अधिक थी। ये ड्रोन्स मुख्य रूप से भारत-चीन सीमा पर 3,488 किलोमीटर लंबे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर तैनात किए जाने थे। चीन के साथ पूर्वी लद्दाख में 2020 से जारी सैन्य तनाव के बीच इन ड्रोन्स की तैनाती बेहद अहम मानी जा रही थी।

रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, “कुछ भारतीय कंपनियां सेना के लिए बनाए जा रहे ड्रोन्स में चीन में बने इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स का इस्तेमाल कर रही थीं।, जो कि साइबर सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा है। इसके चलते हमारे मिलिट्रीपरेंशन की जानकारी लीक हो सकती थी। ऐसे पार्ट्स के जरिए दुश्मन इन ड्रोन्स को हैक कर सकता है या उन्हें जाम कर सकता है।”

PoK में चला गया था एक ड्रोन

इससे पहले अगस्त 2024 में जम्मू-कश्मीर के राजौरी सेक्टर में एलओसी के पास तैनात एक इन्फैंट्री यूनिट का एक ड्रोन अचानक कंट्रोल से बाहर हो गया था और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में चला गया। इस घटना की जांच में पता चला कि ड्रोन में तकनीकी गड़बड़ी थी। सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे चीनी पर्ट्स के इस्तेमाल की बात कही गई थी।  इस घटना की जांच के बाद ड्रोन निर्माता कंपनी को भी तलब किया गया था।

चीनी पार्ट्स या सॉफ्टवेयर कोड न हो

रक्षा मंत्रालय ने अब ड्रोन्स की खरीद फरोख्त में सख्त नियम लागू करने का फैसला किया है। इन मानकों के तहत ड्रोन निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्रोडक्ट्स में 50 फीसदी से अधिक सामग्री स्वदेशी हो। ड्रोन बनाने वाली कंपनियों को अब यह साबित करना होगा कि उनके ड्रोन्स में किसी भी प्रकार के चीनी पार्ट्स या सॉफ्टवेयर कोड का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके अलावा, इंडिपेंडेंट टेक्निकल चेक एंड वेरिफिकेशन सिस्टम भी लागू किया जाएगा, ताकि किसी भी तरह की सुरक्षा चूक को रोका जा सके।

साथ ही, रक्षा मंत्रालय ने देश के प्रमुख उद्योग निकायों फिक्की, सीआईआई और एसोचैम को भी निर्देश दिया है कि वे अपने मैंबर्स कंपनियों को ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल से बचने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं।

Indian Army drones: भारतीय सेना में शामिल होंगे घातक ड्रोन! चीन-पाकिस्तान की हर हरकत पर रहेगी पैनी नजर

भारत सरकार ने 2020 में गलवान हिंसा के बाद से चीन के साथ सीमा विवाद के चलते कई मिलिट्री इक्विपमेंट्स और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद देश की कई ड्रोन बनाने वाली कंपनियां लागत कम रखने के लिए चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल कर रही थीं, जिससे साइबर सुरक्षा में सेंध लगाने का खतरा बढ़ गया था।

Chinese Spyware: जून 2024 में एक कंपनी का रद्द किया था ऑर्डर

इससे पहले पिछले साल जून में रक्षा मंत्रालय (MoD) ने लॉजिस्टिक्स ड्रोनों के एक बड़े ऑर्डर को रोक दिया था। आर्मी डिजाइन ब्यूरो (ADB) के अतिरिक्त महानिदेशक मेजर जनरल सीएस मान ने रक्षा समाचार को बताया था कि यह बड़ा खतरा है। सरकार पहले ही मिलिट्री सिस्टम्स में चीनी कंपोनेंट्स की घुसपैठ को रोकने के लिए कदम उठा चुकी है। भारतीय सेना ने चेन्नई की धक्षा अनमैन्ड सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के 200 लॉजिस्टिक ड्रोन की खरीद पर रोक लगाई थी। कंपनी पर अपने ड्रोन में चीनी उपकरणों के इस्तेमाल का आरोप था। धक्षा कोरामंडल इंटरनेशनल की सहायक कंपनी है। रक्षा मंत्रालय (MoD) ने 25 जून को CII, FICCI और ASSOCHAM को पत्र लिखकर धक्षा और दो अन्य कंपनियों से रक्षा उपकरण खरीद में सतर्कता बरतने की सलाह दी थी। हालांकि धक्षा कंपनी के प्रवक्ता ने आरोपों को “असत्य और निराधार” बताते हुए कहा था, “हम अपने डिफेंस ड्रोन में किसी भी चीनी पुर्जों का इस्तेमाल नहीं करते।”

ड्रोन्स में चीनी पुर्जों के खतरे

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीनी पुर्जों के इस्तेमाल से सबसे बड़ा खतरा डेटा लीक और मिलिट्री ऑपरेशंस की जानकारी लीक होने का है। चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स में ‘बैकडोर’ प्रोग्रामिंग हो सकती है, जो सिक्योरिटी सिस्टम को बाइपास कर संवेदनशील जानकारी दुश्मनों तक पहुंचा सकती है। कम्यूनिकेशन मॉड्यूल, कैमरा सिस्टम और कंट्रोल सिस्टम में छुपे ये कोड ड्रोन के ऑपरेशन में दिक्कत पैदा कर सकते हैं या दुश्मन के नियंत्रण वाले इलाके में ले जा सकते हैं।

DGMI ने 2010 और 2015 में जारी किए थे निर्देश

रक्षा मंत्रालय के एक इंटरनल नोट के मुताबिक, डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस (DGMI) ने 2010 और 2015 में निर्देश जारी कर सेंसिटिव सिक्योरिटी डिवाइसेज में चीनी पार्ट्स के इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश दिया था।
बावजूद इसके, ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में इस निर्देश का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। 2017 में चीन में लागू एक कानून के तहत वहां की सभी टेक कंपनियों को सरकारी एजेंसियों के साथ डेटा शेयर करना जरूरी है, जिससे चीनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के जोखिम और भी बढ़ जाते हैं। सेना का कहना है कि ड्रोन में लगे सेंसर और फ्लाइट कंट्रोलर रियल-टाइम डेटा और लोकेशन को उन देशों के सर्वर पर शेयर कर सकते हैं।

भारत का ड्रोन बाजार अगले दशक में 40 अरब डॉलर (लगभग 3.36 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंचने की संभावना है। सरकार उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना और ड्रोन रेगुलेशन 2021 जैसे सुधारों के जरिए स्थानीय स्तर पर ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है। भारतीय सेना भी अगले कुछ सालों में 2,500 से अधिक मिलिट्री ड्रोन खरीदने की योजना बना रही है, जिन पर लगभग 3,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

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PINAKA Rocket System: भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए रक्षा मंत्रालय ने 10,147 करोड़ रुपये के महत्वपूर्ण रक्षा सौदों  पर दस्तखत किए हैं। ये करार इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव लिमिटेड (EEL), म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ किए गए हैं। इन सौदों के तहत PINAKA मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम (MLRS) के लिए एडवांस रॉकेट्स और सॉफ़्टवेयर अपग्रेड्स की खरीद की जाएगी, जिससे भारतीय सेना की ताकत में और इजाफा होगा।

PINAKA Rocket System: MoD Signs Rs 10,147 Crore Deal to Boost Indian Army Firepower

ADM टाइप-1 और HEPF Mk-1 रॉकेट्स की खासियत?

रक्षा मंत्रालय ने EEL और MIL के साथ एरिया डिनायल म्यूनिशन (ADM) टाइप-1 (DPICM) और हाई एक्सप्लोसिव प्री-फ्रैगमेंटेड (HEPF) Mk-1 (एन्हांस्ड) रॉकेट्स की खरीद के लिए समझौते किए हैं। PINAKA MLRS के लिए ADM टाइप-1 एक विशेष वॉरहेड है, जो दुश्मन के इलाके में बड़ी मात्रा में सब-म्यूनिशन गिराकर उनके सशस्त्र बलों, वाहनों और जवानों को निशाना बनाता है। इससे दुश्मन को किसी खास क्षेत्र में घुसने से रोका जा सकता है।

HEPF Mk-1 (एन्हांस्ड) रॉकेट्स, पहले से सेवा में मौजूद HEPF रॉकेट्स का एडवांस वर्जन हैं, जिनकी मारक क्षमता और रेंज दोनों में सुधार किया गया है। ये रॉकेट्स दुश्मन के इलाके में गहराई तक सटीक हमले करने में सक्षम होंगे।

PINAKA Rocket System: भारतीय सेना की मारक क्षमता में इजाफा

ADM टाइप-1 (DPICM) और HEPF Mk-1 (एन्हांस्ड) रॉकेट्स की यह खरीद भारतीय सेना के आर्टिलरी रॉकेट रेजिमेंट्स के मॉर्डनाइजेशन की दिशा में एक बड़ा कदम है। इन एडवांस गोला-बारूद के जरिए सेना सटीक और लंबी दूरी तक हमले कर सकेगी, जिससे दुश्मन को खासा नुकसान पहुंचाया जा सकेगा। यह न केवल सेना की ताकत को बढ़ाएगा, बल्कि देश की रक्षा तैयारियों को भी मजबूत करेगा।

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भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ SHAKTI सॉफ्टवेयर अपग्रेड का समझौता

इन रॉकेट्स की खरीद के अलावा, रक्षा मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ SHAKTI सॉफ़्टवेयर के अपग्रेड्स के लिए भी समझौता किया है। यह सॉफ्टवेयर अपग्रेड भारतीय सेना के कम्युनिकेशन एंड कंट्रोल सिस्टम्स को और बेहतर बनाने में मदद करेगा। एडवांस टेक्नोलॉजी के जरिए सेना के ऑपरेशन में तेजी और सटीकता लाई जा सकेगी।

PINAKA Rocket System की बढ़ेगी क्षमता

PINAKA मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम भारतीय सेना के आर्टिलरी कोर का एकअहम हिस्सा है। स्वदेशी रूप से विकसित यह रॉकेट सिस्टम अपने सटीकता और लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता के लिए जानी जाती है। PINAKA का उपयोग दुश्मन के ठिकानों, बंकरों और सैनिकों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। यह प्रणाली दुश्मन के इलाके में तेजी से और बड़े पैमाने पर तबाही मचाने में सक्षम है।

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PINAKA सिस्टम की ताकत को और बढ़ाने के लिए इन नए ADM टाइप-1 और HEPF Mk-1 (एन्हांस्ड) रॉकेट्स की खरीद की गई है। यह प्रणाली पहले से ही भारतीय सेना के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो चुकी है और अब इन एडवांस रॉकेट्स के साथ इसकी क्षमताओं में और अधिक इजाफा होगा।

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ये सौदे न केवल भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करेंगे, बल्कि घरेलू उद्योगों को भी मजबूत बनाएंगे। इससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ की परिकल्पना को साकार करने में मदद मिलेगी और भारत वैश्विक रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाएगा।

Su-57 Fighter Jet: रूस का भारत को बड़ा ऑफर! फिफ्थ-जेनरेशन Su-57 के जॉइंट प्रोडक्शन की पेशकश, AMCA प्रोजेक्ट में सहयोग का वादा

Su-57 Fighter Jet: Russia Offers Joint Production to India, Promises Support for AMCA Project

Su-57 Fighter Jet: रूस ने अपने अत्याधुनिक फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर जेट Su-57 को भारत को निर्यात करने का औपचारिक प्रस्ताव दिया है। Su-57 (जिसे Cy-57 भी कहा जाता है) को लेकर दी गई इस पेशकश में केवल जेट की सप्लाई ही नहीं, बल्कि भारत में इसका संयुक्त उत्पादन और भारत के AMCA के डेवलपमेंट में भी मदद करेगा। रूस की सरकारी रक्षा कंपनी Rostec और हथियार निर्यातक Rosoboronexport ने इस प्रस्ताव की पुष्टि की है।

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Su-57 Fighter Jet: Aero India 2025 में दिखेगी Su-57 की पहली झलक

यह एलान ऐसे समय में हुआ है जब बैंगलुरु में आयोजित होने वाले एयरो इंडिया 2025 शो में Su-57E लड़ाकू विमान को प्रदर्शित किया जाएगा। 10 से 14 फरवरी तक बेंगलुरु के येलहंका एयर फोर्स बेस पर होने वाले इस एयर शो में रूस अपने इस एडवांस फाइटर जेट को दुनिया के सामने लाएगा। इस शो में रूस के पवेलियन में विज़िटर्स को वर्चुअल रियलिटी (VR) फ्लाइट सिम्युलेटर के जरिए Su-57 उड़ाने का भी मौका मिलेगा, जिससे लोग इसके तकनीकी पहलुओं और क्षमताओं को करीब से जान सकेंगे।

Su-57 Fighter Jet: पैट्रियट, NASAMS एयर डिफेंस सिस्टम को दे सकता है चकमा

रूसी रक्षा निर्यातक कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट (Rosoboronexport) के डायरेक्टर जनरल अलेक्जेंडर मिखेव ने बताया कि Su-57 एक अत्याधुनिक फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर है, जो दुश्मन के रडार से बचने में सक्षम है और यह अपने साथ हाई-प्रिसिजन गाइडेड वेपन्स का एक विशाल जखीरा ले जा सकता है। मिखेव ने बताया कि Su-57 ने यूक्रेन में पश्चिमी देशों के एयर डिफेंस सिस्टम जैसे पैट्रियट, NASAMS और IRIS-T के खिलाफ अपनी अपनी उपयोगिता साबित की है।

जहां एक ओर अमेरिका का F-35 फाइटर जेट लंबी दूरी के टारगेट्स को नहीं भेद पाता, तो वहीं Su-57 सभी रेंज के खतरों से निपटने में सक्षम है। इस विमान की मल्टिफंक्शनल कैपेबिलिटी इसे मौजूदा वक्त का सबसे घातक लड़ाकू विमानों में से एक बनाती है।

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Su-57 Fighter Jet: भारत के लिए दिया ये विशेष प्रस्ताव

अलेक्जेंडर मिखेव ने कहा, “हम भारत को न केवल Su-57E की डिलीवरी की पेशकश कर रहे हैं, बल्कि इसका जॉइंट प्रोडक्शन भारत में स्थापित करने और भारत के अपने फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर जेट के विकास में भी मदद करने का प्रस्ताव दे रहे हैं।” भारत के पास पहले से ही हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) जैसी कंपनियां हैं, जो फाइटर जेट्स बना रही हैं। वहीं, अगर Su-57 के जॉइंट प्रोडक्शन का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो इससे भारत के रक्षा उत्पादन को मजबूती मिलेगी।

दुनियाभर में बढ़ रही Su-57 की मांग

रूसी रक्षा कंपनी रोस्तेक ने एक बयान में कहा कि Su-57 की वैश्विक मांग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, और इसी को देखते हुए यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) के विशेषज्ञ इसकी प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। कंपनी ने कहा, “Su-57 एक एडवांस फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर जेट है और हमें बेंगलुरु में एयर शो के दौरान इस लड़ाकू विमान में बड़ी दिलचस्पी की उम्मीद है। विमान को बेहतर बनाने और नए बाजारों में प्रचारित करने के साथ-साथ, हम इसकी बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रहे हैं।”

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इससे पहले भी भारत और रूस ने कई रक्षा परियोजनाओं में मिलकर काम किया है, जिनमें ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम प्रमुख हैं। लेकिन भारत के लिए यह प्रस्ताव कई मायनों में अहम है। सबसे पहले, यह भारत को चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के बढ़ते सैन्य खतरे के मुकाबले एक बड़ी बढ़त दे सकता है। चीन के पास पहले से ही पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान Chengdu J-20 और Shenyang J-35A हैं, जबकि पाकिस्तान भी चीनी मदद से अपनी वायुसेना को एडवांस बना रहा है।

इसके अलावा, भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) का डेवलपमेंट अभी शुरुआती चरण में है। यदि रूस के साथ Su-57 के संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग की संभावना बनती है, तो इससे भारत के अपने स्वदेशी AMCA यानी एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट को बनाने में भी मदद मिलेगी।

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क्या है Su-57 की खासियतें?

Su-57 को इसकी अत्याधुनिक स्टील्थ तकनीक, सुपरक्रूज़ क्षमताओं और मल्टीरोल खूबियों के लिए जाना जाता है। यह विमान हवा से हवा और हवा से जमीन पर मार करने वाले हथियारों से लैस है और लंबी दूरी तक दुश्मन के ठिकानों को निशाना बना सकता है। इसकी तेज रफ्तार और ए़डवांस एवियोनिक्स सिस्टम जबरदस्त है।

इस विमान की एक और बड़ी खासियत है इसकी मल्टी-रोल कैपेबिलिटी। यह न केवल वायु बल्कि जमीनी हमलों, समुद्री निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसी भूमिकाओं में भी शानदार प्रदर्शन करता है। इसके रडार क्रॉस सेक्शन को कम करने के लिए विशेष डिजाइन और मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह रडार की पकड़ में नहीं आता।

Chabahar Port: फिर सामने आया ट्रंप का दोगलापन! चाबहार पोर्ट पर अमेरिका ने भारत को दिया झटका, ट्रंप ने खत्म की छूट; क्या पड़ेगा असर?

Chabahar Port: Trump Drops Waiver, Shocking India!

Chabahar Port: पहले तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 104 भारतीय नागरिकों को जबरन एक अमेरिकी मिलिट्री एयरक्राफ्ट सी-17 ग्लोबमास्टर के जरिए अमृतसर भेजा। वहीं अब ट्रंप ने भारत को दूसरा झटका दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के चाबहार पोर्ट से जुड़े प्रतिबंधों पर दी गई छूट को रद्द करने का आदेश दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत ने चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट के लिए ईरान के साथ 10 साल का समझौता किया था, जिससे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच सुनिश्चित होती।

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Chabahar Port: पहले छूट दी, फिर वापस ली

अमेरिका ने पहले चाबहार पोर्ट के मॉडर्नाइजेशन को प्रतिबंधों से छूट दी थी, क्योंकि यह पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान तक मानवीय मदद पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण मार्ग था। नवंबर 2018 में राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट के लिए छूट प्रदान की थी, जिससे भारत को पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच मिलती थी।

क्या है नेशनल सिक्योरिटी मेमोरेंडम में?

हालांकि, अब व्हाइट हाउस की तरफ से जारी ‘प्रेसिडेंशियल नेशनल सिक्योरिटी मेमोरेंडम’ में ईरान के खिलाफ कई कदम उठाने का एलान किया गया है। मेमोरेंडम में लिखा गया है, “विदेश मंत्री मार्को रुबियो को ऐसे सभी प्रतिबंध छूट को संशोधित या समाप्त करने का निर्देश दिया जाता है, जो ईरान को किसी भी प्रकार की आर्थिक या वित्तीय राहत प्रदान करते हैं, जिसमें ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से संबंधित छूट भी शामिल है।”

भारत के लिए क्यों है चिंता की बात?

पिछले साल मई में भारत और ईरान के बीच एक 10 वर्षीय समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य चाबहार पोर्ट को एक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी हब के रूप में डेवलप करना था। इस पोर्ट के जरिए भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया तक सीधी पहुंच मिलती। यह परियोजना न केवल व्यापारिक दृष्टि से बल्कि रणनीतिक लिहाज से भी भारत के लिए अत्यंत जरूरी थी।

इस परियोजना के तहत भारत पोर्ट के विकास के लिए करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश करने वाला था। इसके अलावा, भारत ने ईरान को चाबहार पोर्ट के बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने के लिए 250 मिलियन डॉलर का क्रेडिट भी ऑफर किया था। भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (PMO) के बीच हुए समझौते के मुताबिक IPGL अगले 10 सालों तक इस पोर्ट को विकसित और संचालित करने वाला था। इसके बाद दोनों देशों के बीच सहयोग को और आगे बढ़ाने की योजना थी।

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भारत के लिए Chabahar Port क्यों है अहम?

ईरान के तटीय शहर चाबहार में स्थित यह पोर्ट भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट को लेकर 2003 में सहमति बनी थी, लेकिन इस परियोजना ने असल रफ्तार 2016 में पकड़ी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान का दौरा किया। 15 सालों में यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला ईरानी दौरा था, और इसी दौरान चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट के समझौते को मंज़ूरी मिली।

2019 में पहली बार चाबहार पोर्ट के जरिए पाकिस्तान को साइडलाइन करके अफगानिस्तान से माल भारत लाया गया। यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा है, जो भारत, ईरान, अफगानिस्तान, रूस, और यूरोप के बीच 7,200 किलोमीटर लंबा ट्रांसपोर्ट नेटवर्क है। इससे भारत की मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच आसान हो जाती है, जो न केवल आर्थिक तौर पर बल्कि कूटनीतिक तौर से भी फायदेमंद है।

हालांकि 2020 में कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि ईरान ने भारत को एक रेलवे प्रोजेक्ट से अलग कर दिया है, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आया। लेकिन अब दोनों देशों के बीच फिर से चाबहार पर अहम समझौता हुआ है, जिसे रिश्तों में सुधार के संकेत के तौर पर देखा गया।

चाबहार पोर्ट का पाकिस्तान और चीन के ग्वादर पोर्ट के मुकाबले भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है। ग्वादर पोर्ट चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का हिस्सा है, भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। ऐसे में चाबहार पोर्ट न केवल भारत के लिए व्यापार का एक वैकल्पिक मार्ग है, बल्कि यह चीन की अरब सागर में बढ़ती मौजूदगी को संतुलित करने का एक साधन भी है।

तालिबान की अफगानिस्तान में वापसी के बाद भारत का मध्य एशिया से संपर्क सीमित हो गया था। ऐसे में चाबहार पोर्ट भारत को काबुल तक अपनी पहुंच बनाए रखने और मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने का मौका देता है। इस पोर्ट के माध्यम से भारत अफगानिस्तान को मानवीय मदद भी पहुंचा सकता है, जिससे उसकी इस क्षेत्र में पकड़ भी बनी रहती है।

चाबहार को INSTC से जोड़ने की तैयारी

चाबहार पोर्ट को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) से भी जोड़ा जाएगा, जिससे भारत, ईरान, अफगानिस्तान, रूस और यूरोप के बीच 7,200 किलोमीटर लंबा परिवहन नेटवर्क तैयार होगा। इससे भारत को मध्य एशिया और यूरोप के साथ व्यापारिक कनेक्टिविटी बढ़ाने में मदद मिलेगी और पाकिस्तान को दरकिनार कर सीधा व्यापार मार्ग मिलेगा। साथ ही, यह पोर्ट अरब सागर में चीन की मौजूदगी को चुनौती देने के लिए भारत के लिए एक अहम रणनीतिक साधन भी साबित होगा।

ट्रंप के फैसले का क्या पड़ेगा असर

अमेरिका के इस फैसले से भारत की कई योजनाओं पर असर पड़ सकता है। चाबहार बंदरगाह के दो पोर्ट हैं- शाहिद बेहेस्ती और शाहिद कलंतरी। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत, चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को टक्कर देने की रणनीति पर काम कर रहा था। यह पोर्ट भारत को चीन-पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के विकल्प के तौर पर अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका देता है। इसके अलावा भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के जरिए मजबूत होते संबंधों को भी इस फैसले से झटका लग सकता है। ईरान, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है, खासकर ऊर्जा क्षेत्र में।

इसके अलावा, भारत अफगानिस्तान में निर्माण परियोजनाओं, दवाइयों और खाद्य आपूर्ति के लिए चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल करता रहा है। चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल भारत के लिए एक सस्ता और सुरक्षित विकल्प था। अब अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत को वैकल्पिक मार्गों की तलाश करनी पड़ सकती है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं। साथ ही, अमेरिका के इस कदम के बाद भारत को अपने निवेश और पोर्ट ऑपरेशन के लिए नए विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, या फिर अमेरिकी दबाव के तहत इन योजनाओं को सीमित करना पड़ सकता है।

तालिबान से हुई थी बैठक

8 जनवरी 2025 को दुबई में भारत और तालिबान के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमीर खान मुत्ताकी के बीच हुई इस हाई-लेवल मीटिंग में चाबहार पोर्ट के जरिए व्यापार बढ़ाने पर चर्चा हुई। इस बैठक के बाद चीन और पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ गईं, क्योंकि चाबहार पोर्ट ग्वादर पोर्ट के लिए एक बड़ा रणनीतिक विकल्प है, जिसे चीन और पाकिस्तान मिलकर विकसित कर रहे हैं।

बैठक के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने सोशल मीडिया पर बताया था कि दोनों पक्षों ने अफगानिस्तान को दी जा रही मानवीय सहायता, द्विपक्षीय मुद्दों और सुरक्षा स्थिति पर चर्चा की। चाबहार पोर्ट के माध्यम से व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमति व्यक्त की। अब तक भारत चाबहार के जरिए अफगानिस्तान को 25 लाख टन गेहूं और 2 हजार टन दालें भेज चुका है।

Illegal Indian Migrants: अमेरिका से बेड़ियों में लौटाए गए भारतीय नागरिक! क्या पीएम मोदी अब भी कहेंगे ‘माय डियर फ्रेंड ट्रंप’?

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Illegal Indian Migrants: अमेरिका से 104 भारतीय नागरिकों को जबरन एक अमेरिकी मिलिट्री एयरक्राफ्ट सी-17 ग्लोबमास्टर के जरिए हाल ही में अमृतसर भेजा गया। अमेरिका के इस तरह वापस भेजे जाने को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है कि जिस तरह से अमेरिका ने इन्हें वापस भेजा है क्या यह अमेरिका का रवैया सही है। ये नागरिक अवैध प्रवासी थे, जो अच्छे जीवन और बेहतर रोजगार की तलाश में डंकी रूट से अमेरिका में घुसे थे। इन्हें अमेरिकी सेना के विमान में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डालकर भारत भेजा गया। यह घटना तब घटी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13-14 फरवरी को अमेरिकी दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से होने वाली है। सवाल यह उठता है कि क्या ट्रंप अब भी भारत के ‘फ्रेंड’ हैं?

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इस घटना के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। सोशल मीडिया पर लोग भारत सरकार की चुप्पी पर हैरान हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या अमेरिका ने अपने सैन्य विमान में भारतीय नागरिकों को अपराधियों की तरह भेजकर भारत का अपमान किया है? और अगर ऐसा है, तो भारत सरकार ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने जब अमेरिकी सेना के विमानों में उनके नागरिकों को हथकड़ियों में भेजा गया, तो उन्होंने विरोध जताया और अपने नागरिकों को सम्मान के साथ वापस लाने के लिए अपने विमान भेजे। लेकिन भारत ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।

Illegal Indian Migrants: कैसे हुआ यह सब?

सूत्रों के अनुसार, इन भारतीयों को अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने और रहने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) एजेंसी ने इन्हें डिपोर्ट करने का फैसला कियाया। हालांकि, जिस तरीके से यह डिपोर्टेशन किया गया, उसने ह्यूमन राइट्स एंड डिप्लोमेटिक एटिकेट्स पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ियां और कमर में जंजीरें बांधकर इन लोगों को अमेरिका के सैन्य विमान में बैठाया गया। यह वही तरीका है, जिसे आमतौर पर खतरनाक अपराधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन अवैध भारतीयों में 25 महिलाएं और 12 नाबालिग बच्चे भी शामिल थे।

Illegal Indian Migrants: अमृतसर एयरपोर्ट पर गुप्त तरीके से लैंडिंग

इस सैन्य विमान की लैंडिंग के समय मीडिया को एयरपोर्ट तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी गई। किसी भी पत्रकार या फोटोग्राफर को विमान की तस्वीरें लेने या प्रवासियों से बातचीत करने की इजाजत नहीं दी गई। हालांकि, कुछ स्थानीय लोगों ने विमान के उतरने का वीडियो बना लिया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

सरकार की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया, जिससे यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार ने इस शर्मनाक स्थिति पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?

Illegal Indian Migrants: कोलंबिया और मेक्सिको का रुख

जहां कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने अमेरिका के इस कदम का विरोध किया, वहीं भारत ने इस मामले में चुप्पी साध ली। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो ने अमेरिकी सैन्य विमान को अपने देश में उतरने की अनुमति नहीं दी थी। उन्होंने अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए खुद का विमान भेजा और यह सुनिश्चित किया कि उन्हें सम्मानजनक तरीके से वापस लाया जाए।

कोलंबिया के राष्ट्रपति ने कहा, “प्रवासियों को हथकड़ी पहनाना और अपराधियों जैसा व्यवहार करना उनकी गरिमा का अपमान है।”

इसके विपरीत, भारत सरकार ने न केवल अमेरिकी सैन्य विमान को अपने एयरपोर्ट पर उतरने दिया, बल्कि इस मुद्दे पर कोई विरोध भी दर्ज नहीं कराया। इस पर सवाल उठ रहे हैं कि भारत ने अपने नागरिकों की गरिमा की रक्षा के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया?

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भारतीयों को क्यों नहीं मिला सम्मानजनक वापसी का अधिकार?

इस घटना के बाद सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार को अपने नागरिकों के सम्मान की परवाह नहीं है? क्या भारत की विदेश नीति में इतनी मजबूती नहीं है कि वह अपने नागरिकों के लिए आवाज उठा सके? वहीं, विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक संक्षिप्त बयान में कहा गया कि, “भारत अवैध प्रवास के खिलाफ है और अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर सहयोग जारी रखेगा।” हालांकि, मंत्रालय ने हथकड़ी और बेड़ियों में लाए गए भारतीय नागरिकों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या भारत ने अमेरिका से इस अमानवीय व्यवहार पर स्पष्टीकरण मांगा है या नहीं।

लेकिन सवाल यह है कि इस सहयोग का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि भारत अपने नागरिकों के साथ हो रहे अपमानजनक व्यवहार को भी नजरअंदाज कर देगा?

Illegal Indian Migrants: भारत को करना चाहिए था विरोध

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय दी है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, मेक्सिको और कोलंबिया ने हथकड़ी लगे प्रवासियों को ले जाने वाली अमेरिकी सैन्य उड़ानों को रोक दिया। जबकि कोलंबिया ने निर्वासितों को “अमानवीय व्यवहार” के बिना लाने के लिए अपना खुद का विमान भेजा। लेकिन भारत ने न केवल हथकड़ी लगे निर्वासितों के साथ एक अमेरिकी जहाज को लैंड करने दिया, बल्कि यह भी दावा किया कि अवैध प्रवास का मुकाबला करने में “भारत और अमेरिका के बीच सहयोग मजबूत और प्रभावी है”। उनका कहना है कि जब अमेरिकी विमान भारतीयों को ला रहा था, तो भारत को इस बात पर जोर देना चाहिए था कि निर्वासितों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए, न कि उनके हाथों और पैरों को अपराधियों की तरह बेड़ियों से बांधा जाए।

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क्या मोदी सरकार ने जानबूझकर चुप्पी साधी?

इस घटना के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रयागराज में गंगा स्नान कर रहे थे। कई लोगों का मानना है कि यह समय जानबूझकर चुना गया, ताकि मीडिया का ध्यान कहीं और लगा रहे और इस मुद्दे पर ज्यादा हंगामा न हो।

सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी की आलोचना हो रही है। कई यूजर्स ने सवाल उठाया है कि अगर यह घटना किसी अन्य सरकार के कार्यकाल में हुई होती, तो क्या मोदी सरकार और समर्थक इतने चुप रहते?

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क्या बदल रहे हैं भारत-अमेरिका संबंध?

यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका दौरे पर जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना भारत-अमेरिका संबंधों में संभावित तनाव का संकेत हो सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति बनने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में बदलाव आ सकता है। ट्रंप के कार्यकाल में भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी में प्राथमिकता दी गई थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि अमेरिका का रुख बदल रहा है।

विदेश और रक्षा मामलों के एक दूसरे जानकार प्रवीण साहनी कहते हैं, अमेरिका ने जिस तरह से 100 से अधिक भारतीय अवैध प्रवासियों, जिनमें महिलाएं और नाबालिग भी शामिल थे, को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर सैन्य विमान के जरिए भारत वापस भेजा। यह सिर्फ अवैध प्रवासियों को वापस भेजने का मामला नहीं है, बल्कि इससे पता चलता है कि भारत-अमेरिका संबंधों में एक गंभीर दरार पैदा हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कई राजनीतिक और कूटनीतिक कारण छिपे हुए हैं।

वह कहते हैं, यह घटना बताती है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका अपनी ताकत को बढ़ाने पर जोर देगा और भारत को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि चीन के खिलाफ हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी के रूप में भारत की भूमिका अब अमेरिका की प्राथमिकता नहीं होगी। वह आगे कहते हैं कि मोदी 2024 में अमेरपिका दौरे पर आए थे, लेकिन उन्होंने ट्रंप की चुनावी रैली में हिस्सा नहीं लिया। जबकि ट्रंप ने रैली में एलान किया था कि उनके मित्र मोदी आएंगे। साहनी के मुताबिक, ट्रंप व्यक्तिगत अपमान को गंभीरता से लेते हैं।

वह आगे कहते हैं कि ट्रंप जानते हैं कि मोदी विश्व नेता के रूप में अपनी छवि को पेश करने में मदद के लिए अमेरिका के समर्थन पर बहुत अधिक निर्भर हैं। प्रवीण के मुताबिक यह बेहद दुख की बात है कि ट्रंप के इतना करने के बावजूद मोदी ‘व्यक्तिगत संबंध’ की खातिर ट्रंप से मिलने के लिए अमेरिका जाएंगे। वह कहते हैं कि ट्रंप ने जिस तरह से देश का अपमान किया है, कोई भी स्वाभिमानी देश ट्रंप के नखरे और अपमान को सहन नहीं करेगा।

सरकार की चुप्पी और मीडिया का रवैया

इस घटना पर भारत सरकार की चुप्पी और मीडिया की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। जब ऑपरेशन गंगा के तहत यूक्रेन से भारतीय छात्रों को लाया गया था, तब मीडिया ने इसे बड़े जोर-शोर से दिखाया था। लेकिन इस बार जब भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़कर लाया गया, तो मीडिया ने इसे नजरअंदाज कर दिया। क्या यह सरकार की नाकामी को छिपाने की कोशिश थी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से भी कई नागरिक इस विमान में थे। सवाल यह है कि जब गुजरात को विकास का मॉडल बताया जाता है, तो वहां के लोग क्यों अवैध तरीके से अमेरिका जाने की कोशिश कर रहे हैं? क्या यह विकास के दावों पर सवाल नहीं उठाता?

अवैध प्रवासियों के बढ़ते मामले और भारत की चुनौती

यह पहली बार नहीं है जब भारतीय नागरिकों को अवैध प्रवास के आरोप में गिरफ्तार कर वापस भेजा गया है। पिछले कुछ वर्षों में अवैध रूप से अमेरिका और कनाडा जाने की घटनाओं में वृद्धि हुई है।

कनाडा में भी हजारों भारतीय छात्रों के लापता होने की खबरें आई हैं, जिन पर अवैध प्रवास का शक जताया गया है। गुजरात और पंजाब के युवा विशेष रूप से अमेरिका और कनाडा में बसने के लिए अवैध रास्ते अपनाते हैं।

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INS Vikramaditya

Indian Navy Aircraft Carrier: भारतीय नौसेना की तीन एयरक्राफ्ट कैरियर को ऑपरेट करने की योजना को सरकार ने खारिज कर दिया है। इसके बजाय, नौसेना अब अपने दूसरे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC) को INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर डेवलप करने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार इस योजना का समर्थन नहीं कर रही है कि नौसेना के पास एक साथ तीन एयरक्राफ्ट कैरियर हों। भारतीय नौसेना का कहना था कि अगर तीन एयरक्राफ्ट कैरियर उपलब्ध रहते हैं, तो उनमें से दो हमेशा एक्टिव रह सकते हैं, जबकि एक मरम्मत या अपग्रेड के लिए डॉक में रहे।

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INS Vikramaditya

Indian Navy Aircraft Carrier: बदलती रणनीति और चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब रिपोर्ट्स में कहा गया है कि चीन अपने न्यूक्लियर-पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है। चीन का चौथा एयरक्राफ्ट कैरियर न्यूक्लियर एनर्जी से ऑपरेट हो सकता है, जिससे उसकी नौसैनिक ताकत और अधिक बढ़ सकती है।

भारतीय नौसेना ने पहले तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की रणनीति बनाई थी, लेकिन अब यह योजना बदली जा रही है। इससे पहले, कई नौसेना प्रमुखों ने तीन एयरक्राफ्ट कैरियर होने की बात कही थी, जिनमें पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल हरी कुमार भी शामिल थे।

हालांकि, सरकार का नजरिया इससे अलग रहा है। 2020 से ही सरकार का झुकाव पनडुब्बियों (Submarines) को प्राथमिकता देने की ओर है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत ने भी तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत पर संदेह जताया था और इन्हें “सिटिंग डक” (आसानी से निशाना बनने वाले) कहकर इनकी उपयोगिता पर सवाल उठाए थे। सरकार को लगता है कि एयरक्राफ्ट कैरियर की तुलना में पनडुब्बियां समुद्री युद्ध में ज्यादा प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, खासकर ऐसे समय में जब चीन एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल (ASBM) विकसित कर रहा है, जो बड़े जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम हैं।

Indian Navy Aircraft Carrier: INS विक्रमादित्य का भविष्य

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल हरी कुमार ने INS विक्रांत जैसे दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उनके पहले के नौसेना प्रमुखों ने सुझाव दिया था कि नया एयरक्राफ्ट कैरियर बड़ा और अधिक क्षमता वाला होना चाहिए, ताकि ज्यादा फाइटर जेट पार्क हो सकें। उनके अनुसार, CATOBAR (Catapult Assisted Take-Off Barrier Arrested Recovery) टेक्नोलॉजी से लैस एयरक्राफ्ट कैरियर कारगर साबित हो सकता है और युद्ध में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

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नौसेना के सूत्रों के मुताबिक, INS विक्रमादित्य, जो रूसी मूल का एक एयरक्राफ्ट कैरियर है, अगले 10-12 वर्षों में रिटायर हो सकता है। ऐसे में नौसेना का मानना है कि नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि एक अतिरिक्त एयरक्राफ्ट कैरियर के तौर पर। चूंकि एक नए नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC-2) को बनाने में कम से कम 10-12 साल लगते हैं, इसलिए नौसेना INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट की तैयारियां अभी से करना चाहती है।

राजनाथ सिंह ने कही थी ये बात

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मई 2024 में यह एलान किया था कि भारत जल्द ही अपने तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण शुरू करेगा, जो INS विक्रमादित्य की जगह लेगा। हालांकि, INS विक्रांत की तरह 45,000 टन का यह विमानवाहक पोत कोचीन शिपयार्ड में निर्मित किया जाएगा और इसमें पारंपरिक इंजन (Conventional Propulsion) होगा।

Indian Navy Aircraft Carrier: भारत के पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर

भारत फिलहाल दो एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेट कर रहा है। इनमें पहला INS विक्रमादित्य है, जो 2014 में भारतीय नौसेना में शामिल हुआ। यह रूस से खरीदा गया था और इसमें स्की-जंप टेकऑफ सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि INS विक्रांत 2022 में भारत में बना पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने बनाया है और यह भी स्की-जंप टेक्नोलॉजी पर आधारित है।

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दोनों विमानवाहक पोत करीब 25-30 फिक्स्ड-विंग लड़ाकू विमानों और 10 हेलीकॉप्टरों को ऑपरेट कर सकते हैं। अगर तीसरा विमानवाहक पोत भी इसी साइज का होता है, तो इसकी क्षमता भी समान होगी।

मनोहर पर्रिकर की ये थी प्लानिंग

पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में भारत के दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत (IAC-2) को 65,000 टन वजन और CATOBAR तकनीक के साथ डिजाइन करने की योजना थी। इस एय़रक्राफ्ट कैरियर को न्यूक्लियर एनर्जी से संचालित करने पर विचार किया गया था। साथ ही, योजना थी कि इस पर 54 फाइटर जेट्स पार्क किए जा सकें। इसके अलावा भविष्य में जरुरत पड़ने पर एय़रक्राफ्ट कैरियर को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS) जैसी अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जा सके।

भारत की तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की नीति क्यों बदली?

भारत सरकार ने नौसेना को स्पष्ट कर दिया है कि अब एय़रक्राफ्ट कैरियर के बजाय पनडुब्बियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसकी जो प्रमुख वजहें बताई गई हैं, उनके अनुसार एक एय़रक्राफ्ट कैरियर न केवल अपने आप में बहुत महंगा होता है, बल्कि उसके साथ काम करने वाले कैरीयर बैटल ग्रुप (CBG) और लड़ाकू विमानों की लागत भी बहुत अधिक होती है।

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इसके अलावा चीन ने लंबी दूरी की एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें (ASBM) विकसित की हैं, जो विशेष रूप से अमेरिकी विमानवाहक पोतों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। अमेरिका के विमानवाहक पोत ज्यादा बड़े और सुरक्षित हैं, फिर भी वे खतरे में हैं। ऐसे में भारत के छोटे और कम प्रोटेक्टेड एय़रक्राफ्ट कैरियर के लिए यह एक गंभीर चुनौती हो सकती है।

सरकार ने 30 वर्षीय सबमरीन कंस्ट्रक्शन प्लान को संशोधित किया है। पहले इसमें 24 पारंपरिक पनडुब्बियों को शामिल किया जाना था, लेकिन अब इसे घटाकर 18 डीजल-इलेक्ट्रिक और 6 परमाणु ऊर्जा संचालित हमलावर पनडुब्बियों (SSN) तक सीमित कर दिया गया है। साथ ही, भारत परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) प्रोग्राम को भी आगे बढ़ा रहा है।

चीन का न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोजेक्ट

नवंबर 2024 में खबरें आई थीं कि चीन अपने परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत कार्यक्रम पर तेज़ी से काम कर रहा है। दक्षिण चीन मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) के अनुसार, चीन एक प्रोटोटाइप न्यूक्लियर रिएक्टर विकसित कर रहा है, जिसे भविष्य में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स में इस्तेमाल किया जा सकता है।

परमाणु-संचालित विमानवाहक पोतों की खासियत यह होती है कि वे लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकते हैं और उन्हें बार-बार ईंधन भरने की जरूरत नहीं होती। इससे उनकी ऑपरेशनल रेंज भी बढ़ जाती है और वे ज्यादा हथियार और ईंधन ले जा सकते हैं। चीन 2035 तक छह एयरक्राफ्ट कैरियर्स को ऑपरेट करने की योजना बना रहा है।

चीन ने हाल ही में अपना तीसरा विमानवाहक पोत फ़ुजियान (Fujian) लॉन्च किया है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम (EMALS) से लैस है। यह तकनीक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स में उपयोग होती है, जिससे ज्यादा भारी और बड़े विमान कम रनवे पर उड़ान भर सकते हैं। फ़ुजियान का उत्तराधिकारी टाइप 004 (Type 004) कहा जा रहा है, जो परमाणु-संचालित हो सकता है।

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