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Army Air Defence: ड्रोन अटैक से निपटने के लिए ‘स्मार्ट’ बन रही भारतीय सेना, ‘सॉफ्ट किल’ और ‘हार्ड किल’ सिस्टम से ढेर होंगे दुश्मन के Drone

Army Air Defence: Indian Army Gears Up to Counter Drone Attacks with 'Soft Kill' and 'Hard Kill' Systems
Lt Gen Sumer Ivan D’Cunha, Director General Army Air Defence Corps

Army Air Defence: रूस-यूक्रेन जंग में जिस तरह से ड्रोन का इस्तेमाल हुआ है, उससे भारतीय सेना ने बड़ाा सबक लिया है। भारतीय सेना अब मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन की चुनौतियों से निपटने के लिए अपने एयर डिफेंस सिस्टम को और मजबूत करने की तैयारी कर रही है। ड्रोन हमलों के बढ़ते खतरे को देखते हुए सेना के आर्मी एयर डिफेंस खास रणनीति तैयार की है, जिसका मकसद दुश्मन के ड्रोन और हवाई हमलों को रोकना, उन्हें पहचानना और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करना शामिल है।

Army Air Defence: Indian Army Gears Up to Counter Drone Attacks with 'Soft Kill' and 'Hard Kill' Systems
Lt Gen Sumer Ivan D’Cunha, Director General Army Air Defence Corps

भारतीय सेना की आर्मी एयर डिफेंस कॉर्प्स (AAD) के बारे में यह बताना जरूरी है कि यह पहले टेरिटोरियल आर्मी का हिस्सा थी, लेकिन 10 जनवरी 1994 को इसे आर्टिलरी से अलग कर एक स्वतंत्र इकाई बनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य किसी भी हवाई खतरे से समय रहते निपटना है, ताकि वह हमले में तब्दील न हो सके।

सेना का एयर डिफेंस सिस्टम देश के महत्वपूर्ण इलाकों और संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा करता है। यह सुरक्षा कई लेयर्स में काम करने वाले सिस्टम के जरिए दी जाती है, जिससे किसी भी खतरे का पहले ही पता लगाया जा सके और उसे खत्म किया जा सके।

Army Air Defence:  ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ा

आर्मी एयर डिफेंस कॉर्प्स के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल सुमेर इवान डी’कुन्हा ने बताया कि हाल के कुछ सालों में ड्रोन से हुए हमले दुनिया भर चिंता का विषय बन गए हैं। 2019 में सऊदी अरब की ऑयल कंपनी अरामको पर हमला, 2020 में ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की ड्रोन हमले में मौत, 2021 में पठानकोट एयरबेस पर हमला और रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की जंग में ड्रोन एक अहम हथियार होंगे।

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Army Air Defence:  नैनो ड्रोन भी होंगे ट्रैक

भारतीय सेना ने इस खतरे को समझते हुए अपने एयर डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने का फैसला किया है, ताकि किसी भी संभावित हमले को समय रहते रोका जा सके। भारतीय सेना छोटे और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन का पता लगाने के लिए लो-लेवल लाइटवेट रडार (LLLR) को शामिल कर रही है। यह रडार छोटे से छोटे यानी नैनो ड्रोन को भी पहचान सकता है।

इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से अपने और दुश्मन के ड्रोन की पहचान करने की क्षमता भी डेवलप की जा रही है। महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के मुताबिक सेना के ‘आकाशतीर’ कमांड और रिपोर्टिंग सिस्टम को भी अपग्रेड किया जा रहा है, जिससे दुश्मन के ड्रोन को ट्रैक कर उसे समय रहते खत्म किया जा सके। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक IFF (Identify Friend or Foe) और AI बेस्ड प्रोफाइलिंग के जरिए किसी भी संदिग्ध ड्रोन को व्हाइट लिस्ट किया जा सकता है।

L-70 को रिप्लेस करेंगी स्मार्ट सक्सेसर गन

लेफ्टिनेंट जनरल सुमेर इवान डी’कुन्हा के मुताबिक सेना ने द्वितीय विश्व युद्ध के जमाने की पुरानी L-70 और ZU-23mm एंटी-एयरक्राफ्ट गन को नई स्वदेशी स्मार्ट सक्सेसर गनों से रिप्लेस करने का फैसला किया है। अब इनकी जगह स्मार्ट गोला-बारूद वाली नई तोपें तैनात की जाएंगी। इस प्रोजेक्ट के तहत 220 गनों के लिए पहले ही RFP (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) जारी कर दिया गया है। इसका अपग्रेडेड वर्जन स्मार्ट एम्यूनिशन के साथ जुलाई 2025 में ट्रायल के लिए तैयार होगा और 2026 के मई-जून तक कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने की संभावना है। फिलहाल सेना बाहर से गन खरीदने के मूड में नहीं है।

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लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के अनुसार, स्मार्ट गोला-बारूद की खासियत यह होगी कि हर गोला पूर्व-निर्धारित प्रोग्रामिंग के तहत फायर किया जा सकेगा। स्मार्ट एम्युनिशन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि 17 पारंपरिक राउंड के मुकाबले केवल एक स्मार्ट राउंड ही दुश्मन के ड्रोन को गिरा देगा। इसमें 17 हाई एक्सप्लोसिव राउंड की ताकत केवल एक स्मार्ट राउंड में मिल जाती है। इससे दुश्मन के ड्रोन को गिराने की संभावना बढ़ जाती है और लॉजिस्टिक्स की लागत कम हो जाती है। इसके अलावा, 23 एमएम की तोपों के लिए भी फ्रेगमेंटेड एम्युनिशन तैयार किया जा रहा है, जिससे वे और प्रभावी बन सकें।

VSHORADS: छोटे एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत

DRDO ने VSHORADS (वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम) का कुछ ट्रायल्स पूरे कर लिए हैं, लेकिन इसे फाइनल होने में अभी कुछ समय लगेगा। सेना को इस सिस्टम की ज्यादा संख्या में जरूरत है, लेकिन वर्तमान में इसका प्रोडक्शन जरूरत के मुताबिक नहीं हो पा रहा है। इस कमी को पूरा करने के लिए जल्द ही भारतीय उद्योगों को आरएफआई जारी किया जाएगा, ताकि घरेलू रक्षा क्षेत्र को भी बढ़ावा मिल सके।

GM (SP) गन और मिसाइल का डेडली कॉम्बिनेशन

GM (SP) सिस्टम में फ्रैगमेंटेशन एम्यूनिशन वाली गन और 8-10 किमी तक मार करने वाली मिसाइल शामिल होगी। सेना के पास पहले से ही कई रूसी एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, जिन्हें बनाए रखा जाएगा। हालांकि, नए गन सिस्टम के लिए अगले कुछ महीनों में RFP जारी होने की संभावना है। इसके लिए सेना की मैकेनाइज़्ड फॉर्मेशन (टैंक और बख्तरबंद वाहनों की टुकड़ियां) के लिए बड़ी संख्या में सिस्टम की जरूरत होगी। हालांकि, भारतीय रक्षा उद्योग ने कहा है कि इस परियोजना को पूरा करने में 7-8 साल लग सकते हैं। सेना इसे कम समय में पूरा करने की कोशिश कर रही है ताकि क्षमता की कमी को जल्द से जल्द दूर किया जा सके।

क्या है ‘सॉफ्ट किल’ और ‘हार्ड किल’?

ड्रोन हमलों को रोकने के लिए सेना ने पहले ही L-70 गन को “ज़ेन एंटी-ड्रोन एयर डिफेंस सिस्टम” (ZADS) के साथ जोड़ा है। इसे ‘सॉफ्ट किल’ सिस्टम कहा जाता है। इस सिस्टम में रेडियो फ्रिक्वेंसी के जरिए 10 मीटर से 10 किमी तक ड्रोन को ट्रैक करने और उसे जाम करने की क्षमता है, जिससे दुश्मन की ओर से आने वाले छोटे ड्रोन खतरों को नाकाम किया जा सकता है। हालांकि, अगर ड्रोन जाम होने के बावजूद आगे बढ़ता है, तो ‘हार्ड किल’ यानी L-70 की अपग्रेडेड गन उसे तुरंत मार गिरा सकती है।

उन्होंने बताया कि भारतीय सेना ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और DRDO के बनाए इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन और इंटरडिक्शन सिस्टम (IDD&IS) को भी शामिल किया है। यह सिस्टम हाई-पावर लेजर और माइक्रोवेव हथियारों का इस्तेमाल करता है, जिससे दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही नष्ट किया जा सकता है।

ड्रोन हमलों से निपटेंगी मिसाइलें

इसके अलावा भारतीय सेना ड्रोन हमलों से निपटने के लिए कई नई मिसाइलें भी शामिल कर रही हैं। लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा के मुताबिक, QRSAM (Quick Reaction Surface-to-Air Missile) सिस्टम को जल्द ही सेना में शामिल किया जाएगा। यह मिसाइल 30 किलोमीटर तक के दुश्मन ड्रोन या एयरक्राफ्ट को मार गिराएगी। यह DRDO का बेहद सफल प्रोजेक्ट माना जा रहा है और सेना इस पर काफी भरोसा जता रही है। अगले चार से पांच महीनों में इसका कॉन्ट्रैक्ट फाइनल हो सकता है।

साथ ही, AKASH मिसाइल सिस्टम की दो रेजीमेंट पहले ही सेना में शामिल की जा चुकी हैं, और इनका हाई एल्टीट्यूड इलाकों में ट्रायल भी किया जा रहा है। इसके अलावा MRSAM (Medium Range Surface-to-Air Missile) को भी सेना में तैनात कर दिया गया है और इसकी टेस्ट फायरिंग जल्द शुरू होगी।

Army Air Defence: ड्रोन किल सिस्टम

भारतीय सेना अब ‘ड्रोन किल सिस्टम’ विकसित कर रही है, जिसमें ड्रोन के खिलाफ ड्रोन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा। यानी कि इस प्रणाली में “ड्रोन ऑन ड्रोन” या “रॉकेट ऑन ड्रोन” टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा। इसके अलावा, रॉकेट बेस्ड काउंटर-ड्रोन सिस्टम और सेना ट्रैक-माउंटेड (वाहनों पर तैनात) काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर भी काम कर रही है, जिसमें 64 रॉकेट तैनात होंगे, जो दुश्मन के ड्रोन को पल भर में गिरा देंगे।

‘मेक इन इंडिया’ पर फोकस

लेफ्टिनेंट जनरल डी’कुन्हा जोक देकर कहते हैं कि भारतीय सेना अब स्वदेशी टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। इसके तहत देश की निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के साथ मिलकर नई एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी को डेवलप किया जा रहा है। इससे न केवल आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि महंगे विदेशी हथियारों पर निर्भरता भी कम होगी।

वह कहते हैं कि सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती हजारों ड्रोन को सीमित हवाई क्षेत्र में ट्रैक और नष्ट करना है। खासकर तब, जब दुश्मन देश ड्रोन वॉरफेयर में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। वह कहते हैं कि ड्रोन हमलों को रोकने के लिए भारतीय वायुसेना (IAF) के साथ तालमेल बेहद जरूरी है, क्योंकि देश के एयर डिफेंस की प्राथमिक जिम्मेदारी वायुसेना की है। सेना और वायुसेना मिलकर एयर डिफेंस से जुड़ीं नई रणनीतियां बना रही हैं, ताकि फ्यूचर वॉरफेयर में किसी भी हवाई खतरे से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके।

F-35 Stealth Fighter Jet: चीन-पाकिस्तान के बढ़ते खतरे के बीच क्या भारत अमेरिका से खरीदेगा F-35? भारतीय वायुसेना को चाहिए स्टील्थ फाइटर जेट

F-35 Stealth Fighter Jet: Amid Growing Threat from China-Pakistan, Will India Buy F-35 from the US? Indian Air Force Seeks Stealth Fighter Jets

F-35 Stealth Fighter Jet: भारतीय वायुसेना (IAF) जल्द ही सरकार को स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने की सलाह दे सकती है। सरकार में शामिल सूत्रों के मुताबिक, मौजूदा सुरक्षा हालात और पड़ोसी देशों की बढ़ती सैन्य ताकत को देखते हुए भारत इस पर जल्द फैसला ले सकता है।

F-35 Stealth Fighter Jet: Amid Growing Threat from China-Pakistan, Will India Buy F-35 from the US? Indian Air Force Seeks Stealth Fighter Jets

चीन पहले ही स्टील्थ फाइटर जेट्स का इस्तेमाल कर रहा है और वह पाकिस्तान को 40 फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट्स बेचने जा रहा है। इसके अलावा, चीन सिक्स्थ-जनरेशन स्टील्थ टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रहा है। ऐसे में आने वाले समय में भारत की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

स्टील्थ फाइटर जेट्स की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये दुश्मन के रडार को चकमा देने में सक्षम होते हैं। या तो दिखाई नहीं देते या फिर देरी से दिखाई देते हैं, जिससे युद्ध के दौरान दुश्मन को रेस्पॉन्स देने का वक्त नहीं मिल पाता। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अमेरिका भारत को F-35 फाइटर जेट बेचने के लिए तैयार है। इस बयान के बाद यह अटकलें तेज हो गई हैं कि भारत F-35 खरीदने पर विचार कर सकता है।

F-35 Stealth Fighter Jet: एक जहाज की कीमत लगभग 665 करोड़ रुपये!

अगर भारत F-35 खरीदने पर विचार करता है तो सबसे बड़ी चुनौती इसकी कीमत है। क्योंकि एफ-35 फाइटर जेट की कीमत 80 मीलियन डॉलर (लगभग 665 करोड़ रुपये) पड़ती है, जबकि इसकी सालाना मेंटेनेंस कॉस्ट लगभग 7 मिलियन अमेरिकी डॉलर (58 करोड़ भारतीय रुपये) पड़ती है। इसके अलावा इसके लिए खास इकोसिस्टम चाहिए। हाल ही में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने निजी एजेंसी को बातचीत में कहा था, “अभी तक हमें आधिकारिक रूप से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है, लेकिन हम इसे खुले दिमाग से विचार करने के लिए तैयार हैं।”

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रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि F-35 अपनी स्टील्थ टेक्नोलॉजी के चलते डिफेंस और अटैक, दोनों ही मामलों में बेहद सक्षम है। इसका बॉडी पेंट, विशेष डिजाइन और इंटरनल वेपन सिस्टम इसे दुश्मन के रडार से बचने में मदद करते हैं। पूर्व एयर मार्शल पीएस अहलूवालिया ने कहा, “F-35 मल्टीपर्पज फाइटर जेट है, जो युद्ध के दौरान दुश्मन पर जोरदार हमला करने की क्षमता रखता है। यह पहले से ही कई मिलिट्री ऑपरेशंस में इसने अपनी उपयोगिता साबित की है।” हालांकि, अगर भारत इसे खरीदता है, तो यह सुनिश्चित करना होगा कि लॉजिस्टिक्स, मेंटेनेंस और ट्रेनिंग को लेकर भविष्य में कोई समस्या न हो।

F-35 Stealth Fighter Jet: भारतीय वायुसेना को स्टील्थ जेट्स की जरूरत

IAF पहले से ही अपने स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम AMCA पर काम कर रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि 2035-36 तक यह भारतीय वायुसेना में इंडक्ट हो जाएगाा। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए कुछ रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अपनी तात्कालीक जरूरतों को पूरा करने के लिए F-35 खरीदना चाहिए।

अहलूवालिया का मानना है कि “अगर भारत अपनी सैन्य ताकत को मजबूत करना चाहता है, तो दो स्क्वाड्रन (करीब 36-40 विमान) का ऑर्डर देना एक अच्छा फैसला हो सकता है।”

Su-57 और F-35 में कौन है बेहतर?

रूस ने हाल ही में अपना Su-57 स्टील्थ फाइटर एयरो इंडिया 2025 में शोकेस किया था। रूस पहले से ही भारत का सबसे बड़ा रक्षा डिफेंस सप्लायर रहा है, लेकिन अब भारत अपनी डिफेंस पार्टनरशिप को और नेक्स्ट लेवल तक ले जा रहा है, और फ्रांस, अमेरिका और इज़राइल जैसे देशों से भी सैन्य उपकरण खरीद रहा है।

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डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि Su-57 ने अभी तक किसी जंग में हिस्सा नहीं लिया है, जिसके चलते इसकी क्षमताओं के बारे ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।

जबकि F-35 कई देशों के पास है और वॉर मिशन में इसने अपनी उपयोगिता साबित की है। हालांकि, भारत के लिए इसे खरीदना या न खरीदना पूरी तरह से सरकार का फैसला होगा।

F-35 Stealth Fighter Jet: डिटेल्ड टेक्निकल इवैल्यूएशन जरूरी

रक्षा विशेषज्ञ आरके नारंग के अनुसार, “अगर भविष्य में भारत को F-35 खरीदने का प्रस्ताव मिलता है, तो हमें पहले इसका डिटेल्ड टेक्निकल इवैल्यूएशन करना होगा। हमें यह भी तय करना होगा कि हमाररी जरूरत कितने विमानों की है, उनकी डिलीवरी का समय क्या होगा और इसका हमारे स्वदेशी रक्षा कार्यक्रम पर क्या असर पड़ेगा।”

भारत में रक्षा खरीद की प्रक्रिया आमतौर पर लंबी होती है। एक डील को पूरा होने में दो साल तक का समय लग सकता है और पहले बैच की डिलीवरी में पांच से सात साल का वक्त लग सकता है।

F-35 की कीमत कितनी होगी?

एक F-35 लाइटनिंग II फाइटर जेट की कीमत 80 मिलियन डॉलर (करीब 665 करोड़ रुपये) हो सकती है। इसके अलावा, हर साल इसके मेंटेनेंस पर करीब 7 मिलियन डॉलर (करीब 58 करोड़ रुपये) का खर्च आ सकता है।

अमेरिकी गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में यह अनुमान लगाया गया था कि 2088 तक F-35 फ्लीट को बनाए रखने में 1.58 ट्रिलियन डॉलर (करीब 1,30,000 अरब रुपये) का खर्च आएगा।

क्या भारत को अब F-35 खरीदने की जरूरत है?

चीन और पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य शक्ति को देखते हुए भारतीय वायुसेना के लिए स्टील्थ फाइटर जेट्स की जरूरत बढ़ रही है। लेकिन क्या यह जरूरत अमेरिकी F-35 से पूरी होगी या भारत किसी अन्य विकल्प पर विचार करेगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

भारत के पास स्वदेशी स्टील्थ फाइटर प्रोग्राम भी मौजूद है, लेकिन इसमें अभी समय लगेगा। ऐसे में सरकार को तय करना होगा कि वह अमेरिका से F-35 खरीदने का जोखिम उठाना चाहती है या अपने खुद के प्रोजेक्ट पर भरोसा करके आगे बढ़ेगी। फैसला जो भी हो, आने वाले वर्षों में भारत की सैन्य नीति और रक्षा क्षमताओं पर इसका गहरा असर पड़ेगा।

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Su-57 vs F-35: Which Fighter Jet Should India Choose? Ex-IAF & Army Chiefs Weigh In!

Su-57 Vs F-35: अमेरिका का पांचवी पीढ़ी की फाइटर जेट F-35 लाइटनिंग II भारत को खरीदना चाहिए या नहीं, इसे लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। रक्षा विशेषज्ञों की इसे लेकर अपनी-अपनी राय है। कुछ इसे खरीदने के पक्ष में हैं तो कुछ का कहना है कि भारत को रूसी Su-57 फेलॉन की तरफ रुख करना चाहिए। लेकिन इसी बीच भारतीय वायुसेना और भारतीय थलसेना रिटायर्ड प्रमुखों का अहम बयान सामने आया है। पूर्व आईएएफ चीफ एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) विवेक राम चौधरी और पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने भी अपनी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। वीआर चौधरी का कहना है कि भारत को अपने स्वदेशी AMCA प्रोजेक्ट पर फोकस करना चाहिए। वहीं, जनरल नरवणे ने कहा कि भारतीय वायुसेना को अपनी जरूरतों के हिसाब से ही अंतिम फैसला करे।

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Su-57 Vs F-35: भारत को FGFA की सख्त जरूरत

‘द प्रिंट’ के दो अलग-अलग वीडियो इंटरव्यू में दोनों ने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की। द प्रिंट के डिफेंस जर्नलिस्ट स्नेहेश एलेक्स फ़िलिप के साथ बातचीत में पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) वी.आर. चौधरी ने कहा कि भारत को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों (5th Generation Fighter Aircraft – FGFA) की सख्त जरूरत है और भारत को अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट्स पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि इन जहाजों में स्टील्थ टेक्नोलॉजी, डेटा और सेंसर फ्यूजन और बेहतर सुपर-मेन्युवरबिलिटी होती है। इन सभी फीचर्स का मॉर्डन वारफेयर में फायदा मिलता है। इन विमानों को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि ये दुश्मन के रडार सिस्टम से बच सकें और मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दे सकें।

Su-57 Vs F-35: 2018 में मोदी सरकार ने इसलिए तोड़ी रूस से साझेदारी

पूर्व वायुसेना प्रमुख ने बताया कि भारत ने पहले रूस के साथ मिलकर FGFA (Sukhoi Su-57) प्रोजेक्ट में भागीदारी की थी। 2007 में भारत ने इस प्रोजेक्ट में निवेश किया और 2010 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। लेकिन 2018 में मोदी सरकार ने इस प्रोजेक्ट से बाहर निकलने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि भारत के इस प्रोजेक्ट से बाहर निकलने के दो मुख्य कारण थे।

पहला कारण यह था कि भारत ने अपने स्वदेशी फाइटर जेट प्रोजेक्ट (AMCA – Advanced Medium Combat Aircraft) पर फोकस करने का फैसला किया। भारत को यह अहसास हो गया कि वह खुद भी एक पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट बना सकता है। दूसरी वजह थी कि रूस के साथ हुई डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर क्लैरिटी नहीं थी। भारत को यह स्पष्ट नहीं था कि उसे इस प्रोजेक्ट में कितना तकनीकी ज्ञान मिलेगा और भविष्य में यह भारत के लिए कितना फायदेमंद रहेगा।

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यह पूछने पर कि 2018 में भारतीय वायुसेना ने 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट जारी की थी। उस समय चर्चा थी कि अगर अमेरिका भारत को F-35 ऑफर करता है, तो भारतीय वायुसेना इस पर विचार कर सकती है। लेकिन अब जब अमेरिका ने F-35 को लेकर बातचीत शुरू की है, तो सवाल उठता है कि क्या भारत को इसे लेना चाहिए? इस पर पूर्व एयर चीफ मार्शल का कहना है कि भारत को सबसे पहले अपनी क्षमता को बढ़ाने और वायुसेना की ताकत बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि IAF का भविष्य LCA-Mk2, AMCA और MRFA प्रोजेक्ट्स पर निर्भर करेगा।

Su-57 Vs F-35: AMCA प्रोजेक्ट को दे प्राथमिकता

यह पूछने पर कि क्या भारत को F-35 लेना चाहिए या स्वदेशी AMCA पर ध्यान देना चाहिए?  इस सवाल का जवाब देते हुए पूर्व वायुसेना प्रमुख ने कहा कि F-35 भारत के लिए बहुत महंगा सौदा हो सकता है। इसके अलावा, यह विमान अमेरिका की कड़ी निगरानी के तहत आता है, जिसमें भारत को इस जेट ऑपरेशन, रिपेयरिंग औऱ मेंटेनेंस के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ेगा। भारत के पास पहले से ही AMCA प्रोजेक्ट है, जिसके 2035 तक तैयार होने की उम्मीद है। हालांकि, इसमें अभी समय लगेगा, लेकिन भारत को इस प्रोजेक्ट को प्राथमिकता देनी चाहिए।

पाकिस्तान के लिए केवल मिसाइलें काफी

वहीं चीन के पास पहले से ही J-20 पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है, और अब खबरें हैं कि पाकिस्तान भी चीन से पांचवीं पीढ़ी के जेट्स खरीदने की योजना बना रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत को भी तुरंत पांचवीं पीढ़ी का जेट खरीदना चाहिए? इस पर पूर्व एयर चीफ मार्शल ने कहा कि भारत को चीन के बढ़ते खतरे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, लेकिन पाकिस्तान को रोकने के लिए पांचवीं पीढ़ी का विमान जरूरी नहीं है। भारत के पास पहले से ही बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइलें (BVR), ब्रह्मोस मिसाइलें और अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम हैं, जो पाकिस्तान के किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं।

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मेंटेनेंस काफी खर्चीला है F-35 का, बोले- जनरल नरवणे

वहीं पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे का भी कहना है कि अमेरिका का F-35 लाइटनिंग II दुनिया का सबसे एडवांस स्टील्थ फाइटर जेट है। यह लंबी दूरी के मिशन को आसानी से अंजाम दे सकता है। इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन, यह विमान बहुत महंगा है और इसका मेंटेनेंस भी काफी खर्चीला है। इसके सभी कंपोनेंट्स और स्पेयर पार्ट्स के लिए भारत को पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसके अलावा, यह विमान अमेरिका की डिफेंस पॉलिसी से भी जुड़ा है जिससे भारत की स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी पर भी असर पड़ सकता है।

Su-57 फेलॉन का प्रोडक्शन धीमी रफ्तार से

जनरल नरवणे ने आगे कहा कि रूस का Su-57 फेलॉन को अमेरिका के F-35 के मुकाबले तैयार किया गया है। इसमें स्टील्थ डिजाइन, एडवांस सेंसर और बेहतरीन सुपर-मेन्युवरबिलिटी जैसी खूबियां हैं। साथ ही इस जेट को भारतीय वायुसेना के मौजूदा रूसी फाइटर जेट्स के साथ आसानी से इंटीग्रेट किया जा सकता है, जिससे इसे वायुसेना में शामिल करना ज्यादा आसान होगा। वहीं इसकी ऑपरेशनल कॉस्ट F-35 की तुलना में कम है। साथ ही, रूस इस विमान से जुड़ी कुछ टेक्नोलॉजी को भी भारत को ट्रांसफर भी कर सकता है, जिससे देश की आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि Su-57 की स्टील्थ क्षमता F-35 के मुकाबले कमजोर है, और इसका प्रोडक्शन धीमी रफ्तार से हो रहा है। फिलहाल, इसकी सीमित संख्या उपलब्ध है, और यह अभी तक पूरी तरह डेवलप नहीं हुआ है।

Su-57 की स्टील्थ कैपेबिलिटी F-35 के मुकाबले कमजोर

उन्होंने आगे कहा कि भारत के पास तीन विकल्प हैं। पहला, F-35 खरीदना, जिससे भारतीय वायुसेना को लेटेस्ट स्टील्थ कैपेबिलिटी मिलेगी, लेकिन इससे स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी पर असर पड़ सकता है। दूसरा, Su-57 खरीदना, जिससे भारत को रूसी तकनीक और कम लागत का फायदा मिलेगा, लेकिन इसमें स्टील्थ कैपेबिलिटी थोड़ी कमजोर हो सकती है। तीसरा, AMCA प्रोजेक्ट पर फोकस करना, जिससे भारत आत्मनिर्भर बनेगा, लेकिन इसमें 10-15 साल लग सकते हैं। यह प्रोजेक्ट अभी शुरुआती डिजाइन स्तर पर है और इसे ऑपरेशनल होने में 2035-2040 तक का समय लग सकता है।

भारतीय वायुसेना की जरूरतों को देखे भारत

जनरल एम.एम. नरवणे ने कहा कि भारतीय वायुसेना को ही अंतिम निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किसी भी फाइटर जेट का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को अपने वायुसेना बेड़े को मजबूत करने के लिए जल्द ही फैसला लेना होगा। अगर भारत F-35 को चुनता है, तो यह अमेरिका के साथ रक्षा संबंधों को और मजबूत करेगा। यदि भारत Su-57 को चुनता है, तो रूस के साथ उसकी रक्षा साझेदारी और गहरी हो जाएगी। लेकिन अगर भारत AMCA प्रोजेक्ट पर फोकस करता है, तो यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, लेकिन इसे पूरा होने में वक्त लगेगा। अब यह भारत को तय करना होगा कि उसे F-35, Su-57 या AMCA में से किसे चुनना चाहिए। अंतिम फैसला भारतीय वायुसेना की जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाना चाहिए।

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2044 से पहले F-35 की डिलीवरी नहीं!

वहीं, रक्षा विशेषज्ञ और पूर्व सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर संदीप थापर ने इस पूरे मसले पर अपना नजरिया साझा किया है। उनका कहना है कि अमेरिका ने F-35 के लिए कोई सॉलिड कमिटमेंट नहीं दिया है, बल्कि सिर्फ एक संभावित विकल्प के तौर पर इसका उल्लेख किया है। यह बात सही है कि F-35 को दुनिया का सबसे एडवांस फाइटर जेट माना जाता है, लेकिन इसकी कीमत और रखरखाव बेहद महंगा साबित हो सकता है। दूसरी ओर, रूस का Su-57 अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प हो सकता है, लेकिन तकनीकी रूप से F-35 से कुछ हद तक पीछे है।

उन्होंने आगे कहा कि F-35 की खरीद को लेकर सबसे बड़ी समस्या इसका महंगा होना और लंबा डिलीवरी टाइम है। क्योंकि अमेरिका को अपने सहयोगी देशों की जरूरकतों को पूरा करने के लिए लगभग 2500 F-35 बनाने होंगे, जिसमें लंबा वक्त लग सकता है। अमेरिका पहले अपने NATO सहयोगी देशों को प्राथमिकता देगा, जिसके चलते भारत को यह विमान मिलने में 2044 तक का वक्त लग सकता है।  इसके अलावा, अमेरिका ने अब तक यह साफ नहीं किया है कि वह इस विमान की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करेगा या नहीं, जो कि भारत के लिए बेहद जरूरी है। ब्रिगेडियर थापर ने कहा कि अमेरिका की डिफेंस सप्लाई को लेकर ट्रस्ट इश्यू भी रहा है, क्योंकि कई मौकों पर उसने भारत को वादा करके भी जरूरी मिलिट्री इक्विपमेंट्स तय समय पर नहीं दिए।

क्या 10-15 साल का इंतजार कर पाएगा भारत?

ब्रिगेडियर थापर के मुताबिक रूस का Su-57 एक किफायती विकल्प हो सकता है। Su-57 का इंजन और सुपर-मेन्युवरबिलिटी इसकी बड़ी खबूियां हैं, लेकिन यह तकनीकी रूप से F-35 जितना एडवांस नहीं है। हालांकि, रूस भारत को इस विमान के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर देने के लिए तैयार है, जिससे भारत अपनी आत्मनिर्भरता को और बढ़ा सकता है। उनका कहना है कि भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसकी वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता लगातार घट रही है। मौजूदा जरूरतों को देखते हुए भारत को जल्द से जल्द नए लड़ाकू विमान खरीदने की जरूरत है। भारतीय वायुसेना का स्वदेशी AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) प्रोजेक्ट अभी शुरुआती दौर में है और इसे तैयार होने में 2035 से 2040 तक का लंबा समय लग सकता है। ऐसे में, अगले 10-15 वर्षों के लिए भारत को किसी अन्य देश से विमान खरीदना ही होगा।

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दोनों खरीदने का है विकल्प, लेकिन?

ब्रिगेडियर थापर भी मानते हैं कि अगर भारत F-35 को चुनता है, तो यह उसे अमेरिका के करीब ले जाएगा और उसे पश्चिमी देशों के मिलिट्री नेटवर्क से जोड़ देगा। वहीं दूसरी ओर, Su-57 को चुनने से भारत रूस के साथ अपनी पारंपरिक रक्षा साझेदारी को मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि भारत के पास एक और विकल्प यह भी है कि वह दोनों विमानों को खरीदे, लेकिन इससे पहले देश की वित्तीय हालत और डिफेंस बजट को देख कर चलना होगा। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार को लेना है कि क्या वे अमेरिका की ओर झुकेंगे, रूस को तरजीह देंगे, या दोनों के बीच संतुलन बनाए रखेंगे।

Army Father’s Heartfelt Gift: सड़क हादसे में बेटे को खोया, सेना के जवान ने लिया बड़ा फैसला, अंगदान से छह लोगों को दी जिंदगी

Army Father’s Heartfelt Gift: Donates Son’s Organs to Save Lives After Tragic Accident

Army Father’s Heartfelt Gift: बेटे को खोने का गम एक पिता के लिए कितना भारी होता है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। लेकिन जब दुख को हिम्मत में बदल दिया जाए, तो वही कहानी इंसानियत की मिसाल बन जाती है। सेना के हवलदार नरेश कुमार ने अपने 18 साल के बेटे अर्शदीप सिंह की एक हादसे में हुई असमय मौत के बाद जो कदम उठाया, उसने छह लोगों को नई जिंदगी दे दी।

Army Father’s Heartfelt Gift: Donates Son’s Organs to Save Lives After Tragic Accident

8 फरवरी 2025 को हुए एक सड़क हादसे में अर्शदीप गंभीर रूप से घायल हो गए थे। तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उनकी जान नहीं बचा सके। बेटे को खोने के इस असहनीय दर्द के बीच भी हवलदार नरेश कुमार ने ऐसा फैसला लिया, जिसने न सिर्फ कई लोगों को बचाया, बल्कि समाज में अंगदान को लेकर एक बड़ी सीख भी दी।

16 फरवरी को उन्होंने अपने बेटे के लिवर, किडनी, अग्न्याशय (पैंक्रियास) और कॉर्निया को दान करने की सहमति दी। यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने सोचा कि अगर उनके बेटे का कोई अंग किसी और की जिंदगी संवार सकता है, तो इससे बड़ी श्रद्धांजलि कुछ नहीं हो सकती।

Army Father’s Heartfelt Gift: ग्रीन कॉरिडोर से मरीजों तक पहुंचाए अंग

अर्शदीप का लिवर और एक किडनी तुरंत ग्रीन कॉरिडोर के जरिए सेना अस्पताल रिसर्च एंड रेफरल, नई दिल्ली भेजा गया। दूसरी किडनी और लिवर पीजीआई चंडीगढ़ में ऐसे मरीज को ट्रांसप्लांट किए गए, जो टाइप-1 डायबिटीज और क्रॉनिक किडनी डिजीज से जूझ रहा था। इसके अलावा, दो जरूरतमंदों को रोशनी देने के लिए उनके कॉर्निया सुरक्षित रखे गए।

इस पूरी प्रक्रिया में चंडीमंदिर स्थित कमांड हॉस्पिटल की मेडिकल टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह अस्पताल ऑर्गन ट्रांसप्लांट और ऑर्गन रिट्रीवल के लिए जाना जाता है। विशेषज्ञों ने हर जरूरी कदम उठाकर यह सुनिश्चित किया कि हर एक अंग सही समय पर सही मरीज तक पहुंचे।

भारत में हर साल हजारों लोग अंग प्रत्यारोपण के इंतजार में रहते हैं, लेकिन समय पर डोनर न मिलने के कारण कई जिंदगियां खत्म हो जाती हैं। हवलदार नरेश कुमार जैसे लोगों की प्रेरणादायक कहानियां इस धारणा को बदलने में मदद कर सकती हैं। उन्होंने अपने बेटे को खोने के गम को किसी और की जिंदगी की उम्मीद बना दिया।

हवलदार नरेश कुमार का यह फैसला केवल एक पिता के साहस की कहानी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा भी है। उन्होंने अपने गम को सेवा में बदल दिया। यह कदम हमें सिखाता है कि मुश्किल हालात में भी हम दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ कर सकते हैं।

Commander Purnendu Tiwari: अभी भी कतर में क्यों हैं नेवल वेटरन पूर्णेंदु तिवारी, बाकी सात साथी आ चुके हैं भारत, सरकार ने बताई वजह

Qatar Amir's India Visit: Ex-Naval Officers Urge PM Modi to Help Bring Back Retired Commander Purnendu Tiwari

Commander Purnendu Tiwari: कतर में गिरफ्तार किए गए आठ भारतीय नेवल वेटरन्स में से सात अब भारत लौट चुके हैं, लेकिन कमांडर पूर्णेंदु तिवारी अब भी वहां की जेल में बंद हैं। उनकी कानूनी लड़ाई अभी भी जारी है और भारत सरकार लगातार उनके रिहाई की कोशिशें कर रही है। कतर अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी के भारत दौरे से पहले भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों ने प्रधानमंत्री मोदी से अपील की थी कि वे कमांडर पूर्णेंदु तिवारी को भारत वापस लाने में मदद करें।

Why is Naval Veteran Purnendu Tiwari Still in Qatar While Seven Others Returned? Govt Explains

कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी पिछले दिनों दो दिन के भारत पर आए हुए थे। उससे पहले नौसेना के रिटायर्ड अधिकारियों ने कतर के अमीर और प्रधानमंत्री मोदी से अपील की थी कि वे इस मामले का शीघ्र समाधान निकालें। उनकी यात्रा पर लगे प्रतिबंधों को हटाकर तिवारी को भारत लौटने दिया जाए ताकि वे अपनी बूढ़ी मां और परिवार के साथ फिर से मिल सकें।

Qatar Amir’s India Visit: भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों की अपील; कतर में फंसे साथी को भारत वापस लाने की गुहार

विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि कमांडर पूर्णेंदु तिवारी अभी भी कतर में कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। सरकार इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है और उनकी जल्द से जल्द सुरक्षित वापसी के लिए राजनयिक स्तर पर प्रयास कर रही है। बता दें कि कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी दो दिवसीय भारत दौरे पर थे।

Commander Purnendu Tiwari: क्या है मामला?

ये आठों अधिकारी कतर की निजी कंपनी अल-दहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज में कार्यरत थे, जो कतर की सेना और सुरक्षा एजेंसियों को ट्रेनिंग और अन्य सेवाएं प्रदान करती थी। अगस्त 2022 में कतर की सुरक्षा एजेंसियों ने भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अधिकारियों को गिरफ्तार किया था। कतर की कोर्ट ऑफ फर्स्ट इंस्टेंस ने अक्टूबर 2023 में सभी आठों भारतीय अधिकारियों को मौत की सजा सुनाई थी। हालांकि, भारत सरकार के उच्च स्तरीय कूटनीतिक प्रयासों के चलते दिसंबर 2023 में उनकी सजा को घटाकर तीन से 25 साल के कारावास में बदल दिया गया। बाद में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के चलते फरवरी 2024 में सात अधिकारियों को रिहा कर भारत लाया गया, लेकिन कमांडर पूर्णेंदु तिवारी की रिहाई नहीं हो सकी। उस समय खबरें आईं थीं कि उन्हें जासूसी के मामले में गिरफ्तार किया गया है। यह मामला भारत और कतर के बीच एक बड़ा कूटनीतिक मुद्दा बन गया था।

इसके बाद फरवरी 2024 में सात अधिकारियों को भारत लाया गया, लेकिन रिटायर्ड कमांडर पूर्णेंदु तिवारी की रिहाई नहीं हो सकी। उन पर उनकी एक कंपनी के मामले में अलग वित्तीय जांच चल रही है, जिसके कारण उन्हें कतर में ही रहना पड रहा है। विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी अरुण चटर्जी ने बताया कि उनकी कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है और सरकार लगातार कतर प्रशासन से संपर्क में है।

तिवारी को 2019 में नवाजा था प्रवासी भारतीय सम्मान से

भारत लौटने वाले पूर्व नौसेना अधिकारियों में कैप्टन नवतेज गिल, कैप्टन सौरभ वशिष्ठ, कमांडर संजीव गुप्ता, कमांडर अमित नागपाल, कमांडर बीके वर्मा, कमांडर सुगुणाकर पकाला और नाविक रागेश शामिल थे। कमांडर संजीव गुप्ता और कमांडर सुगुणाकर पकाला ने एक साझा बयान में कहा था, “एक साल हो गया जब कतर ने भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अधिकारियों को रिहा किया, लेकिन उनमें से एक साथी अब भी वहीं फंसा हुआ है। उनका कहना था कि कमांडर तिवारी को 2019 में प्रवासी भारतीय सम्मान से नवाजा गया था। उनके साथियों का कहना है कि उनकी गिरफ्तारी और यात्रा प्रतिबंध को जल्द से जल्द हटाया जाना चाहिए।

बता दें कि विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल कतर की जेलों में 600 भारतीय नागरिक बंद हैं, जबकि 2024 में 85 भारतीयों को कतर सरकार ने माफी देकर रिहा किया था।

Delhi-Dhaka Tensions: पीएम मोदी को बांग्लादेश की ‘कमान’ देते ही दिखने लगा असर! यूनुस पर दहाड़ीं शेख हसीना, दिया अल्टीमेटम

Delhi-Dhaka Tensions Rise: Trump Backs Modi, Hasina Slams Yunus with Ultimatum

Delhi-Dhaka Tensions: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने बता दिया है कि एशिया में भारत की भूमिका अभी भी उसके लिए काफी अहम है। वाशिंगटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा था, “बांग्लादेश का मामला मैं प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ रहा हूं।” वहीं ट्रप के इस बयान के दो दिन बाद ही बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस पर जोरदार हमला बोला। हमला भी ऐसा बोला कि उन्होंने युनूस सरकार को आतंकवादियों की सरकार बता डाला।

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Delhi-Dhaka Tensions: पीएम मोदी को दी कमान!

पीएम मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पांच साल बाद हुई मुलाकात कई मायनों में अहम है। दोनों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान एक रिपोर्टर ने ट्रंप से पूछा कि कुछ जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन के पीछे अमेरिका के डीप स्टेट (Deep State) का हाथ था। रिपोर्टर ने पूछा कि क्या पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार ने बांग्लादेश में सत्ता पलट में कोई भूमिका निभाई थी और मुहम्मद यूनुस को मुख्य सलाहकार नियुक्त किया था?

इस सवाल के जवाब में राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कहा वह वाकई चौंकाने वाला था। ट्रंप ने अमेरिकी डीप स्टेट की किसी भी भूमिका से साफ इनकार करते हुए कहा, “यह कुछ ऐसा है जिस पर प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय से काम कर रहे हैं। ईमानदारी से कहूं तो मैं इस बारे में पढ़ता रहा हूं। मैं बांग्लादेश को प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ता हूं।”

हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने सीधे तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया कि अमेरिका भविष्य में बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति में कोई भूमिका निभाएगा या नहीं। लेकिन उनके बयान से यह संकेत जरूर मिला कि अब अमेरिका इस मामले में दखल देने के मूड में नहीं है। वहीं, अमेरिका के इस रुख से बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, कट्टरपंथी इस्लामी गुटों और पाकिस्तान की रणनीति पर असर पड़ सकता है। ट्रंप के इस बयान को भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिका का यह स्पष्ट संकेत है कि वह अब बांग्लादेश के मामलों में सीधा हस्तक्षेप नहीं करेगा और भारत को अपनी पूर्वी सीमा पर खुद फैसला लेने की पूरी छूट होगी।

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सूत्रों के मुताबिक, मोदी और ट्रंप ने बांग्लादेश में हाल ही में हुए राजनीतिक बदलाव को लेकर विस्तार से चर्चा की थी। मोदी ने ट्रंप को बताया कि कैसे शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद कट्टरपंथी ताकतें बांग्लादेश में बढ़ रही हैं और पाकिस्तान वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

Delhi-Dhaka Tensions: पाकिस्तान और बांग्लादेश पर बढ़ा दबाव

मेरठ कॉलेज में डिफेंस स्टडीज और इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रिजवान कहते हैं कि अमेरिका लंबे समय से यह मानता आया है कि दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका सबसे अहम है। पूरे क्षेत्र में अगर कोई स्थिर और जिम्मेदार लोकतंत्र है, तो वह भारत ही है। इसके विपरीत, भारत के पड़ोस में अलोकतांत्रिक व्यवस्थाएं, सत्तावादी शासन और अस्थिरता देखने को मिलती है। ऐसे में जब डोनाल्ड ट्रंप ने बांग्लादेश के मामलों को भारत के हवाले करने की बात कही, तो यह न सिर्फ ढाका के लिए बल्कि इस्लामाबाद के लिए भी एक बड़ा झटका था। जो बाइडेन के कार्यकाल में यह आशंका जताई जा रही थी कि अमेरिकी डीप स्टेट, पाकिस्तान के गुप्त नेटवर्क के जरिए बांग्लादेश में अस्थिरता फैला रहा था।

बाइडेन प्रशासन के दौरान बांग्लादेश में हुए हिंसक प्रदर्शनों, मुजीबुर्रहमान की मूर्तियों के अपमान और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों को लेकर कई रिपोर्टें सामने आई थीं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, अब तक 1500 से अधिक हिंदुओं की हत्या की जा चुकी है, और यह सिलसिला अभी भी जारी है।

प्रोफेसर रिजवान के मुतााबिक, ट्रंप का यह बयान बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि अमेरिका अब इस क्षेत्र में भारत को नेतृत्व की भूमिका देना चाहता है। इससे भारत को दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर मिलेगा और वह इस क्षेत्र में जारी उथल-पुथल को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाएगा। ट्रंप के इस बयान के बाद भारत के पास अब दक्षिण एशिया की राजनीति को अपने पक्ष में मोड़ने का एक सुनहरा मौका है। अमेरिका का समर्थन मिलने के बाद भारत को बांग्लादेश, पाकिस्तान और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी नीतियों को और आक्रामक बनाने का अवसर मिल सकता है।

शेख हसीना का कड़ा पलटवार: “मैं आतंकियों की सरकार को उखाड़ फेंकूंगी!”

ट्रंप के बयान के दो दिन बाद ही बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने समर्थकों वर्चुअली संबोधित करते हुए मोहम्मद यूनुस सरकार पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश वापस जाना मेरी प्राथमिकता है, और मैं सुनिश्चित करूंगी कि आतंकियों की सरकार को उखाड़ फेंका जाए।”

उन्होंने कहा, “यूनुस ने सत्ता में आते ही सभी जांच समितियों को भंग कर दिया और आतंकियों को खुली छूट दे दी। अब निर्दोष लोगों की हत्याएं हो रही हैं, और बांग्लादेश बर्बादी की ओर बढ़ रहा है। लेकिन हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे – हम इस आतंकवादी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे। इंशाअल्लाह!”

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शेख हसीना ने यह भी कहा कि वह हर उस परिवार के साथ खड़ी हैं, जिन्होंने इस राजनीतिक उथल-पुथल में अपनों को खोया है। उन्होंने कहा, “मैं यह सुनिश्चित करूंगी कि सभी हत्यारे कानून का सामना करें। मैं वापस आऊंगी, और यही कारण है कि शायद अल्लाह ने मुझे अब तक जिंदा रखा है।” हसीना ने यह भी दावा किया कि पिछले साल जुलाई-अगस्त में हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए लोगों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई थी। उन्होंने जोर देकर कहा, “अगर उन शवों का अब भी पोस्टमार्टम किया जाए, तो सच सामने आ जाएगा।”

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यूनुस सरकार आतंकवादियों और बाहरी ताकतों के इशारों पर काम कर रही है और उनका एक ही उद्देश्य है – बांग्लादेश को अस्थिर करना और भारत के खिलाफ एक नया मोर्चा खोलना। “अगर आज बांग्लादेश में मोदी सरकार की भूमिका बढ़ रही है, तो यह इसलिए है क्योंकि यूनुस और उनके समर्थकों ने देश को पाकिस्तान के करीब ले जाने की कोशिश की।” शेख हसीना ने साफ कहा कि वह जल्द बांग्लादेश लौटेंगी और अपने समर्थकों के साथ मिलकर लोकतंत्र की वापसी के लिए संघर्ष करेंगी।

ट्रंप के इस बयान का एक और बड़ा असर यह हुआ कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और अवामी लीग को एक नई ताकत मिली है। बीएनपी लंबे समय से यह मांग कर रही थी कि बांग्लादेश में जल्द से जल्द संसदीय चुनाव कराए जाएं। लेकिन मोहम्मद यूनुस और उनकी सरकार चुनावों को टालने के लिए विभिन्न बहाने बना रहे हैं। यूनुस सरकार का कहना है कि पहले न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासन में सुधार होने चाहिए, फिर चुनाव कराए जाएंगे।

अमेरिका ने 29 मिलियन डॉलर की फंडिंग रोकी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से लौटे के ठीक बाद ही ट्रंप प्रशासन ने एक चौंकाने वाला फैसला किया। ट्रंप ने बांग्लादेश के लिए दी जाने वाली 29 मिलियन डॉलर की फंडिंग को भी रोक दिया। यह फंडिंग अब तक USAID (United States Agency for International Development) और UK के DFID (Department for International Development) के जरिए बांग्लादेश को दी जा रही थी। माना जाता है कि यह फंड यूनुस सरकार और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। इसी वजह से भारत ने अमेरिका से मांग की थी कि इस फंडिंग को रोक दिया जाए। ट्रंप प्रशासन ने इस मांग को स्वीकार करते हुए यूनुस सरकार को बड़ा झटका दिया है। साथ ही, ट्रंप ने यह साफ कर दिया है कि उनका बांग्लादेश में कोई इंट्रेस्ट नहीं है और साथ ही मदद देने का भी कोई इरादा नहीं है। अमेरिका के इस कदम के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि यूनुस सरकार का अस्तित्व कितने दिनों तक बना रहेगा?

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भारत के खिलाफ फंडिंग का इस्तेमाल

भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को मान्यता नहीं देगा और केवल एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के साथ ही बातचीत करेगा। इसके विपरीत, पाकिस्तान और तुर्किये यूनुस सरकार का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। पाकिस्तान इस स्थिति का फायदा उठाकर बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों को मजबूत करने और भारत के पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने की कोशिश कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, यूनुस सरकार पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत विरोधी समूहों को आर्थिक और सैन्य मदद देने की योजना बना रही थी। लेकिन अब जब अमेरिका ने खुद को पीछे कर लिया है और भारत को ‘फ्री हैंड’ दे दिया है, तो यूनुस सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

LCA Mk-1A: ‘तू-तू, मैं-मैं’ के बीच HAL का दावा- अप्रैल में मिलेगी गुड न्यूज! तेजस Mk1A का पहला इंजन डिलीवरी के लिए तैयार

LCA Mk-1A: HAL Confirms Tejas Mk1A's First Engine Ready for April Delivery!

LCA Mk-1A: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. डीके सुनील का कहना है कि तेजस Mk1A लड़ाकू विमान के लिए पहला F404-IN20 इंजन पूरी तरह से असेंबल हो चुका है और उसकी अमेरिका में जीई एविएशन की फैसिलिटी में ग्राउंड टेस्टिंग चल रही है। डीके सुनील के मुताबिक उनकी प्राथमिकता भारतीय वायुसेना को तेजस की समय पर डिलीवरी है, न कि आलोचनाओं का जवाब देना। बता दें कि भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया 2025 के दौरान इस परियोजना में हो रही देरी पर खुलकर नाराजगी जताई थी। उन्होंने HAL की क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें एचएएल पर भरोसा नहीं है।

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LCA Mk-1A: वायुसेना को अप्रैल से विमान की डिलीवरी

डॉ. सुनील ने पुष्टि की है कि यह इंजन मार्च तक एचएएल को डिलीवर कर दिया जाएगा, जिसके बाद इसे तेजस Mk1A में इंस्टॉल किया जाएगा। शुरुआती ट्रायल पूरे होते ही यह विमान अप्रैल में भारतीय वायुसेना (IAF) को सौंपा जाएगा। उन्होंने कहा कि विमान का हार्डवेयर पूरी तरह तैयार है और एयरो इंडिया के दौरान जो तेजस Mk-1A प्रदर्शित किया गया था, वह सभी नए फीचर्स से लैस था। उन्होंने बताया कि इसमें बेहतर रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और स्मार्ट मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले जोड़ा गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वायुसेना को जिस तरह की क्षमताएं चाहिए, वह जल्द ही पूरी हो जाएंगी। अगले 15 दिनों में स्वदेशी ‘Astra’ बियॉन्ड-विजुअल-रेंज एयर-तो-एयर मिसाइल की टेस्टिंग की जाएगी और जैसे ही यह सफल होगी, वायुसेना को अप्रैल से विमान की डिलीवरी शुरू की जा सकती है।

HAL के मुताबिक, अब तक तीन तेजस Mk-1A जेट बनाए जा चुके हैं, जिन्हें ‘कैटेगरी B’ इंजन के साथ एयरो इंडिया शो में उड़ाया गया था।

LCA Mk-1A: वायुसेना प्रमुख ने सुनाई थी खरीखोटी

बीते हफ्ते बेंगलुरु में हुए एयरो इंडिया 2025 शो में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने एचएएल के कामकाज के तरीके पर सावल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि तेजस Mk-1A को बिना जरूरी अपग्रेड के ही इस नाम से प्रचारित किया जा रहा है। उनका कहना था कि महज सॉफ्टवेयर बदलने से यह Mk-1A नहीं बन जाता, जब तक वेपन सिस्टम और क्षमताएं पूरी तरह डेवलप नहीं होतीं, तब तक इसे अपग्रेडेड नहीं माना जा सकता। उन्होंने खुलेआम कहा था कि उन्हें एचएएल पर भरोसा नहीं है और मौजूदा हालात उन्हें संतोषजनक नहीं लग रहे। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर एचएएल अपनी क्षमताओं को साबित कर देता है, तो वे सबसे खुश व्यक्ति होंगे। उन्होंने यह भी कहा था, “अगर आप हमें गलत साबित कर दें, तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होगी।” बता दें कि एय़रफोर्स चीफ जब यह बोल रहे थे, तो उनकी ये बातचीत एक कैमरे में रिकॉर्ड हो गई थी।

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एचएएल चीफ बोले- ‘तू-तू, मैं-मैं’ से कुछ नहीं होगा

इस आलोचना के बाद एचएएल चीफ ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उनकी कंपनी बेवजह की बहस में उलझने की बजाय विमान की डिलीवरी पर ध्यान दे रही है। उन्होंने कहा, “हमारे लिए बहस करना जरूरी नहीं, बल्कि विमान समय पर डिलीवर करना ज्यादा अहम है। ‘तू-तू, मैं-मैं’ से कुछ नहीं होगा।”

मार्च 2024 तक मिलना था पहला तेजस

भारतीय वायुसेना ने एचएएल को फरवरी 2021 में 83 तेजस Mk-1A जेट खरीदने का ऑर्डर दिया था, जिसकी कुल लागत 48,000 करोड़ रुपये है। पहला विमान मार्च 2024 तक डिलीवर किया जाना था, लेकिन अब तक यह पूरा नहीं हो पाया है। तेजस Mk-1A के प्रोडक्शन में देरी की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी कंपनी GE एयरोस्पेस द्वारा समय पर F404 इंजन न देना और कुछ जरूरी टेक्निकल सर्टिफिकेशन को बताया जा रहा है।

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एचएएल का कहना है कि भारत ने 2021 में 99 F404-IN20 इंजनों की सप्लाई का ऑर्डर दिया था। इंजन सप्लाई चेन में आई देरी कोविड-19 महामारी के कारण हुई थी। महामारी के चलते ग्लोबल सप्लाई चेन पर असर पड़ा। जिससे उत्पादन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को दोबारा तैयार करने में समय लगा। इस वजह से पूरे प्रोजेक्ट में रुकावट आई और मार्च 2024 तक तय डिलीवरी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।

एचएएल के मुताबिक अब जीई एविएशन ने नई सप्लाई चेन के लिए कुछ नए सहयोगियों के साथ साझेदारी की है, जिससे प्रोडक्शन फिर शुरू हो गया है। जीई ने एचएएल और भारतीय वायुसेना को भरोसा दिलाया है कि अब इंजन स्पेयर पार्ट्स और अन्य कंपोनेंट्स की उपलब्धता में कोई रुकावट नहीं आएगी। हालांकि अब एचएएल को उम्मीद है कि जल्द ही इंजन मिलने शुरू हो जाएंगे और अगले साढ़े तीन साल में 83 तेजस Mk-1A की डिलीवरी पूरी कर दी जाएगी।

120 अतिरिक्त F404-IN20 इंजनों का दूसरा ऑर्डर जल्द

एचएएल का कहना है कि इसी भरोसे के साथ उन्होंने अब 120 अतिरिक्त F404-IN20 इंजनों का दूसरा ऑर्डर देने का फैसला किया है, जो पहले के मुकाबले अधिक है। इन इंजनों की समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है, ताकि तेजस Mk1A कार्यक्रम तय समय के अनुसार आगे बढ़ सके और भारतीय वायुसेना को लगातार इन एडवांस फाइटर जेट्स सप्लाई मिलती रहे।

LCA Mk-1A: वायुसेना के पास 30 से कम फाइटर स्क्वाड्रन

भारतीय वायुसेना इस देरी को लेकर चिंतित है, क्योंकि इसका असर उनकी युद्धक क्षमताओं पर पड़ सकता है। वायुसेना के पास कम से कम 42 फाइटर स्क्वाड्रन होने चाहिए, लेकिन यह संख्या घटकर 30 से भी नीचे आ गई है। इसी कमी को दूर करने के लिए वायुसेना ने 2021 में 48,000 करोड़ रुपये की लागत से 83 तेजस Mk-1A का ऑर्डर दिया था, जिसके बाद अब 67,000 करोड़ रुपये की लागत में 97 और विमानों की खरीदने की योजना बनाई जा रही है। यह सौदा अगले तीन से छह महीनों में फाइनल हो सकता है, लेकिन जब पहले दिए गए विमानों की डिलीवरी ही समय पर नहीं हो रही है, तो नए विमान कब मिलेंगे, इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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नासिक में एक नई प्रोडक्शन लाइन शुरू

एचएएल ने इस प्रोजेक्ट को तेजी से पूरा करने के लिए नासिक में एक नई प्रोडक्शन लाइन शुरू की है, जिससे हर साल कुल 24 तेजस Mk-1A तैयार किए जा सकेंगे। अब तक तेजस केवल बेंगलुरु में बनता था, लेकिन नासिक में भी मैन्युफैक्चरिंग शुरू होने के बाद उम्मीद है कि एचएएल हर साल 24 तेजस Mk-1A बना सकेगा। HAL का दावा है कि आने वाले दशक में भारतीय वायुसेना के पास 350 से अधिक तेजस लड़ाकू विमान (Mk-1, Mk-1A और Mk-2 वेरिएंट) होंगे, जो देश की एयर डिफेंस को मजबूत करेंगे।

F-35 fighter: भारत क्यों खरीदे F-35? अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहाता S-400, नहीं लगा सकेगा ब्रह्मोस! क्या आएंगे केवल 2 स्क्वाड्रन?

F-35 Fighter: Will India Buy It? US Concerned Over S-400, No BrahMos, Only 2 Squadrons?

F-35 fighter: अमेरिकी फाइटर जेट F-35 की खरीद को लेकर तरह-तरह की कयासबाजियां शुरू हो गई हैं। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान संकेत दिया था कि भारत को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स देने की योजना बनाई जा रही है। इस खबर के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि भारत इस सौदे को अंजाम देने के लिए उसी रास्ते पर चल सकता है जिस तरह उसने फ्रांस से राफेल फाइटर जेट्स खरीदे थे।

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हालांकि, भारत सरकार ने साफ किया है कि अभी तक कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला है, लेकिन अमेरिका के साथ बातचीत जल्द शुरू हो सकती है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं है। ट्रंप ने सिर्फ यह संकेत दिया है कि अमेरिका इसे संभव बनाने के लिए रोडमैप तैयार कर सकता है। जब हमें औपचारिक प्रस्ताव मिलेगा, तब हम इस पर विचार करेंगे।”

F-35 fighter: क्या भारत सीमित संख्या में F-35 खरीदेगा?

सूत्रों के मुताबिक, भारत सीमित संख्या में F-35 फाइटर जेट्स खरीद सकता है। ठीक वैसे ही जैसे राफेल सौदे में केवल 36 विमान खरीदे गए थे। इसकी वजह यह है कि F-35 की कीमत बहुत ज्यादा है और इसका मेंटेनेंस भी बेहद महंगा है। इसलिए, भारत पूरे बेड़े को अपग्रेड करने के बजाय इसके दो स्क्वॉड्रन बना सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह सौदा होता है, तो यह सरकार-से-सरकार (G2G) डील के तहत होगा, जिससे कीमत और डिलीवरी की गारंटी मिलेगी।

F-35 fighter: अमेरिका की बड़ी चिंता S-400 एयर डिफेंस सिस्टम

अमेरिका ने पहले भारत को F-35 बेचने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, क्योंकि भारत ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था। अमेरिकी पेंटागन को चिंता है कि S-400 और F-35 को एक साथ ऑपरेट करना मुश्किल होगा, क्योंकि S-400 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह अमेरिकी स्टील्थ विमानों की मूवमेंट को पकड़ सके। सूत्रों के मुताबिक, यदि भारत इस डील को आगे बढ़ाता है, तो अमेरिका भारत से यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी शर्तें रख सकता है कि रूसी सैन्य विशेषज्ञों को F-35 तक पहुंच न मिले।

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अमेरिकी रक्षा विभाग का मानना है कि अगर कोई देश S-400 और F-35 को एक साथ ऑपरेट करता है, तो रूसी रडार सिस्टम अमेरिकी स्टील्थ टेक्नोलॉजी को ट्रैक करने के लिए अपडेट हो सकते हैं। क्योंकि दुनिया में अभी तक किसी भी देश ने S-400 और F-35 दोनों को एक साथ नहीं चलाया है। इससे पहले तुर्किए को भी अमेरिका ने F-35 फाइटर जेट देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उसने भी रूस से S-400 मिसाइलें खरीदीं थीं। वहीं अगर अमेरिका भारत को शर्तों में ढील देता है, तो तुर्किए के लिए F-35 की खरीद के रास्ते खुल सकते हैं। माना जा रहा है कि दोनों सिस्टम्स को अलग रखने के लिए अमेरिका कुछ कड़े मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल्स जारी कर सकता है।

F-35 fighter: क्या टेंपरेरी सॉल्यूशन है F-35?

भारत अपनी वायुसेना के बेड़े को अपग्रेड करना चाहता है। भारत का AMCA (Advanced Multirole Combat Aircraft) प्रोग्राम 2036 से पहले तैयार नहीं होगा, और इसमें और देरी भी हो सकती है। इसलिए, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि F-35 को एक टेंपरेरी सॉल्यूशन के तौर पर देखा जा सकता है, जब तक कि भारत का AMCA पूरी तरह तैयार नहीं हो जाता। हाल ही में भारत ने फ्रांस से राफेल मरीन एयरक्राफ्ट खरीदे थे, ताकि स्वदेशी ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर्स (TEDBF) के डेवलप होने तक नौसेना की जरूरतें पूरी हो सकें। उसी तरह, F-35 को भी टेंपरेरी सॉल्यूशन माना जा रहा है।

वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “F-35 बहुत महंगे विमान हैं। न सिर्फ खरीदना, बल्कि इनका रखरखाव और ऑपरेशन भी बेहद खर्चीला है। ऐसे में भारत एक या दो स्क्वाड्रन (36 विमान) तक सीमित रह सकता है।”

क्या F-35 पर ब्रह्मोस मिसाइल लगने देगा अमेरिका?

F-35 एक हाई-टेक स्टील्थ फाइटर जेट है, और अमेरिका इसे केवल उन्हीं देशों को बेचता है जो उसके पार्टनर या नॉटो देश होते हैं। अगर भारत को यह फाइटर जेट मिलते हैं, तो अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि भारत इसे किसी तीसरे देश (जैसे रूस) को नहीं दिखाएगा या इस पर कोई अतिरिक्त मॉडिफिकेशन नहीं करेगा। यहां कि भारत इसमें अपनी जरूरतों के हिसाब से मिसाइलें भी नहीं लगा सकेगा, जैसे कि सुखोई पर लगाई हैं।

सूत्रों का कहना है कि F-35 फाइटर जेट पर ब्रह्मोस मिसाइल लगाना आसान नहीं होगा। F-35 अमेरिकी तकनीक से बना है और इसमें किसी भी बाहरी हथियार को जोड़ने के लिए अमेरिकी सरकार और लॉकहीड मार्टिन की मंजूरी चाहिए। अब तक अमेरिका ने किसी भी गैर-नाटो या गैर-अमेरिकी मिसाइल को F-35 पर लगाने की अनुमति नहीं दी है।

ब्रह्मोस मिसाइल का आकार और वजन भी समस्या खड़ी कर सकता है। F-35 की स्टील्थ क्षमता बनाए रखने के लिए उसके हथियार इंटरनल बे में रखे जाते हैं, लेकिन ब्रह्मोस इसमें फिट नहीं होती। इसे बाहरी रूप से माउंट किया जा सकता है, लेकिन इससे F-35 का स्टील्थ खत्म हो जाएगा और रडार उसे ट्रेक कर लेंगे। इसके अलावा, अमेरिका के पास पहले से कई विकल्प मौजूद हैं। F-35 के लिए AGM-158 JASSM (स्टील्थ क्रूज मिसाइल), AGM-88 HARM (एंटी-रेडिएशन मिसाइल) और LRASM (एंटी-शिप मिसाइल, जो ब्रह्मोस जैसी ही भूमिका निभाती है) जैसी मिसाइलें हैं। इनका इस्तेमाल अमेरिकी सेना करती है और अगर अगर भारत F-35 लेता है, तो अमेरिका चाहेगा कि भारत इन्हीं मिसाइलों का इस्तेमाल करे। यहां तक कि अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस-एनजी भी AMRAAM या JASSM से है।

ब्रह्मोस को पहले से ही Su-30MKI जैसे लड़ाकू विमानों पर तैनात किया जा रहा है और भविष्य में इसे राफेल और स्वदेशी AMCA जैसे विमानों के साथ भी जोड़ा जा सकता है। अगर भारत F-35 खरीदता है, तो वह कुछ हद तक हथियारों को कस्टमाइज़ करने पर बातचीत कर सकता है, लेकिन ब्रह्मोस के इंटीग्रेशन की संभावना कम है।

Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International
Minister Piyush Goel with Mr. Michael Williamson, President at Lockheed Martin International

क्या ‘मेक इन इंडिया’ होगा F-35?

अमेरिका के साथ इस डील में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि क्या इसे ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत में ही बनाया जा सकता है। हालांकि अभी तक का इतिहास रहा है कि अमेरिका इसे खुद बना कर ही एक्सपोर्ट कर रहा है। लेकिन जॉइंट प्रोडक्शन की चर्चाओं को बल तब मिला जब हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने लॉकहीड मार्टिन इंटरनेशनल के अध्यक्ष माइकल विलियमसन के साथ बैठक की और भारत में रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में निवेश और एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों पर चर्चा की। हालांकि लॉकहीड मार्टिन ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) के साथ मिलकर भारतीय वायुसेना के C-130J ‘सुपर हरक्यूलिस’ विमानों के लिए देश में पहली मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा स्थापित करने का एलान किया है। इसके अतिरिक्त, लॉकहीड मार्टिन और टाटा ने भारतीय वायुसेना के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) जरूरतों के लिए C-130J विमानों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली की भी पेशकश की है। बता दें कि गुजरात में, टाटा और एयरबस ने वडोदरा में C-295 विमानों के जॉइंट प्रोडक्शन के लिए एक संयंत्र स्थापित किया है, जो भारतीय वायुसेना की ट्रांसपोर्ट जरूरतों को पूरा करेगा। इसलिए ऐसी संभावना बेहद कम है कि F-35 को लॉकहीड मार्टिन भारत में बनाएगी।

Explainer Russia-Ukraine Peace Talks: सऊदी अरब में ही क्यों मिलेंगे जेलेंस्की, पुतिन और ट्रंप? क्या प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के हाथों लिखा जाएगा इतिहास?

Explainer: Russia-Ukraine Peace Talks in Saudi Arabia – Why It Matters?

Russia-Ukraine Peace Talks: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एलान किया है कि वह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत करेंगे। हालांकि, इस घोषणा के साथ ही कई सवाल खड़े हो गए हैं, खासकर यह कि ट्रंप ने इस वार्ता के लिए सऊदी अरब को ही क्यों चुना है?

Explainer: Russia-Ukraine Peace Talks in Saudi Arabia – Why It Matters?

ट्रंप ने इस संभावित वार्ता की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई, लेकिन उन्होंने कहा कि यह बैठक निकट भविष्य में हो सकती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी इसमें शामिल हो सकते हैं। सऊदी अरब ने इस पहल का स्वागत किया है और कहा है कि वह रूस-यूक्रेन के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

ट्रंप ने इस वार्ता के लिए पुतिन और जेलेंस्की से फोन पर बातचीत की थी। इसके बाद उन्होंने रूस और अमेरिका के प्रतिनिधियों को बातचीत शुरू करने के लिए कहा। उनकी इस पहल को लेकर सऊदी अरब ने भी बयान जारी कर कहा कि वे इस वार्ता को सफल बनाने में सहयोग करेंगे।

Russia-Ukraine Peace Talks: सऊदी अरब को क्यों चुना गया?

सऊदी अरब को इस वार्ता का स्थल चुनने के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण यह है कि यह एक तटस्थ देश है। यूरोप के कई देश यूक्रेन युद्ध में सीधे शामिल हैं, इसलिए वहां वार्ता कराना मुश्किल था। इसी वजह से सऊदी अरब को एक तटस्थ और सुरक्षित स्थान माना गया, जहां रूस और यूक्रेन दोनों पक्ष बिना किसी पूर्वाग्रह के बातचीत कर सकते हैं।

दूसरा बड़ा कारण यह है कि सऊदी अरब और रूस के बीच मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। 2023 में जब पुतिन ने रियाद का दौरा किया था, तब मोहम्मद बिन सलमान ने उन्हें विशेष मेहमान के रूप में आमंत्रित किया था। इसके अलावा, रूस के खिलाफ इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) ने अरेस्ट वारंट जारी किया है, लेकिन सऊदी अरब इस कोर्ट का सदस्य नहीं है, जिसका मतलब है कि पुतिन वहां बिना किसी कानूनी डर के आ सकते हैं।

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Russia-Ukraine Peace Talks: मध्यस्थ की भूमिका में सऊदी अरब

सऊदी अरब ने अतीत में भी कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। उदाहरण के तौर पर, रूस में कैद अमेरिकी नागरिकों की रिहाई में सऊदी अरब की बड़ी भूमिका रही है। हाल ही में रूस ने अमेरिकी टीचर मार्क फोगल को रिहा किया, जिसमें सऊदी अरब का बड़ा योगदान था।

सऊदी अरब ने कई बार पुतिन और जेलेंस्की को शांति समझौते की संभावना तलाशने के लिए न्योता दिया है। उन्होंने 2023 में जेद्दा में एक अंतरराष्ट्रीय सभा आयोजित की थी, जिसमें कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब अपनी छवि को और मजबूत कर सकता है। गल्फ मामलों के विशेषज्ञ अब्दुल्ला बाबुद मानते हैं कि सऊदी अरब मध्यस्थ की भूमिका निभाने के साथ-साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को भी और गहरा करना चाहता है।

Russia-Ukraine Peace Talks: तेल भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर

सऊदी अरब को इस वार्ता के लिए चुनने के पीछे तेल भी एक बड़ा कारक है। अमेरिका, रूस और सऊदी अरब दुनिया के तीन सबसे बड़े तेल उत्पादक देश हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ है और तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि इस वार्ता के दौरान तेल की कीमतों को स्थिर रखने पर भी चर्चा हो सकती है। 2024 के अंत में, रूस और सऊदी अरब ने ओपेक प्लस के तहत तेल उत्पादन को सीमित करने का फैसला किया था, ताकि वैश्विक बाजार को स्थिर किया जा सके।

अमेरिका को भी अपने ऊर्जा सेक्टर के लिए सऊदी अरब के साथ मजबूत रिश्ते बनाने की जरूरत है। ट्रंप की प्राथमिकता क्लीन एनर्जी से ज्यादा जीवाश्म ईंधन पर केंद्रित रही है, इसलिए सऊदी अरब उनके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है।

ट्रंप का सऊदी अरब से रणनीतिक जुड़ाव

डोनाल्ड ट्रंप जब 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति बने, तब उनकी पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की थी। इस यात्रा से सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली थी।

ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर वह फिर से राष्ट्रपति बनते हैं, तो उनकी पहली विदेश यात्रा एक बार फिर सऊदी अरब हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सऊदी अरब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदता है, तो वे वहां जाने को तैयार हैं।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी संकेत दिया है कि वह अगले चार वर्षों में अमेरिका में करीब 500 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप ने इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि यह निवेश 1,000 अरब डॉलर तक पहुंचे।

अमेरिका-सऊदी संबंध और अन्य कूटनीतिक एजेंडे

सऊदी अरब और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा आर्थिक और सैन्य रणनीति पर आधारित रहे हैं। बाइडन प्रशासन ने जहां सऊदी अरब के साथ संबंधों को संतुलित किया, वहीं ट्रंप इसे और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप, सऊदी अरब, अमेरिका और इज़राइल के बीच एक मजबूत गठबंधन बनाना चाहते हैं। इससे मध्य पूर्व में अमेरिका का प्रभाव बढ़ेगा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सकेगा।

हालांकि, सऊदी अरब को लेकर अमेरिका की नीति हमेशा विवादित रही है। सऊदी अरब का मानवाधिकार रिकॉर्ड खराब रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसने धार्मिक पुलिस को हटाने, महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति देने जैसे सुधार किए हैं, जिससे उसकी छवि में सुधार आया है।

क्या यह वार्ता सफल होगी?

रूस-यूक्रेन युद्ध अब तक के सबसे लंबे और जटिल युद्धों में से एक बन चुका है। ट्रंप की यह पहल युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या पुतिन और जेलेंस्की इस वार्ता को गंभीरता से लेते हैं।

सऊदी अरब की इस वार्ता में भूमिका को लेकर भी अलग-अलग विचार हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक मजबूत शांति वार्ता हो सकती है, जबकि कुछ का कहना है कि सऊदी अरब इस वार्ता से अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को साधने की कोशिश कर रहा है।

फिलहाल, सारी निगाहें इस संभावित वार्ता पर टिकी हैं और आने वाले दिनों में इसका क्या नतीजा निकलता है, यह देखने वाली बात होगी।

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Stryker vs WhAP: Is India's Indigenous Armored Vehicle Superior to the US Infantry Combat Vehicle?

Stryker vs WhAP: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच भारतीय सेना के लिए Stryker Infantry Combat Vehicle (ICV) को खरीदने और भारत में इसके निर्माण को लेकर सहमति बनी है। इस समझौते के तहत 530 Stryker ICV खरीदे जाएंगे, जिनमें से कुछ को सीधे खरीदा जाएगा, जबकि बाकी व्हीकल्स को भारत में साथ मिल कर बनाया जाएगा। इसके अलावा, Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और छह P-8I मेरीटाइम सर्विलांस एयरक्राफ्ट भी भारतीय सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए सौदे में शामिल हैं।

Stryker vs WhAP: Is India's Indigenous Armored Vehicle Superior to the US Infantry Combat Vehicle?

अमेरिका ने पहली बार 2000 के दशक में Stryker को भारतीय सेना को बेचने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तब यह डील अंजाम तक नहीं पहुंच पाई थी। इस दौरान, Stryker केवल भारत-अमेरिका मिलिट्री एक्सरसाइज में ही देखा गया।

पिछले साल, Stryker का लद्दाख में 13,000 से 17,000 फीट की ऊंचाई पर ट्रायल भी किा गया था,  लेकिन भारतीय सेना ने इसमें कुछ कमियां पाईं और इसमें बदलाव की सिफारिश की।

वहीं, 2024 में, Stryker की खरीद को कनाडा में मैन्युफैक्चरिंग होने के चलते रोक दिया गया, क्योंकि भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक तनाव चरम पर था। लेकिन 2025 में, बाइडेन प्रशासन ने भारत में Stryker की मैन्युफैक्चरिंग की अनुमति दे दी। इस योजना के तहत, BEML के साथ साझेदारी में भारत में इसका निर्माण किया जाएगा, जिससे भारतीय सेना की 10 मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री यूनिट्स को इस वाहन से लैस किया जाएगा।

Stryker vs WhAP: भारत के पास है WhAP 

जहां एक ओर भारतीय सेना Stryker को अपनाने की योजना बना रही है, वहीं दूसरी ओर DRDO ने Tata Advanced Systems, महिंद्रा और कल्याणी ग्रुप के सहयोग से Wheeled Armoured Platform (WhAP) डेवलप किया है। यह भारत का पहला स्वदेशी इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल है, जिसे विभिन्न इलाकों में तैनात किया जा सकता है। अब सवाल यह उठता है कि Stryker और WhAP में क्या अंतर है और भारतीय सेना के लिए कौन बेहतर साबित होगा?

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दोनों वाहन आर्मर्ड कैटेगरी में आते हैं, लेकिन इनकी क्षमताएं अलग-अलग हैं। WhAP को सभी प्रकार के इलाकों में चलाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जबकि Stryker को मुख्य तौर पर अर्बन कॉम्बैट के लिए तैयार किया गया है।

WhAP में 600 हॉर्सपावर का इंजन है, जिससे यह पानी और दलदली इलाकों में आसानी से चल सकता है। दूसरी ओर, Stryker 350 हॉर्सपावर इंजन के साथ आता है और इसकी अधिकतम स्पीड 100 किमी/घंटा है, लेकिन यह पानी में चलने में सक्षम नहीं है।

WhAP का वजन 24.5 टन है और इसमें 2+10 लोगों को बैठने की जगह मिलती है, जबकि Stryker का वजन 20.3 टन है और इसमें 3+8 लोगों के बैठने की क्षमता है।

WhAP में न्यूक्लियर सेंसर भी लगा है, जिससे यह रासायनिक, जैविक और परमाणु खतरों का पता लगा सकता है। यह Stryker से हल्का और अधिक फुर्तीला (agile) है, जिससे यह किसी भी प्रकार की सतह पर आसानी से चल सकता है।

WhAP की माइन ब्लास्ट को सहन करने की क्षमता इसे और अधिक सुरक्षित बनाती है। यह कीचड़ और दलदली इलाकों में बेहतर प्रदर्शन करता है। इसकी पावर-टू-वेट रेश्यो 25 है, जो Stryker के 17.24 से कहीं ज्यादा बेहतर है।

Stryker vs WhAP: क्या भारत को जरूरत है Stryker की?

WhAP पहले से ही भारतीय सेना की जरूरतों के हिसाब से डिज़ाइन किया गया है। WhAP को लद्दाख, राजस्थान और पूर्वोत्तर इलाकों में तैनात किया जा सकता है, जबकि Stryker मुख्य रूप से अर्बन वारफेयर के लिए बेहतर माना जाता है। इसके बावजूद, भारत ने Stryker की खरीद और जॉइंट प्रोडक्शन को प्राथमिकता दी है।

इसका कारण यह हो सकता है कि अमेरिका से Stryker खरीदने से भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी और मजबूत होगी। भारत अब अमेरिका के साथ मिलकर आधुनिक रक्षा तकनीक साझा करने की रणनीति अपना रहा है, और Stryker इसी दिशा में एक कदम है।

क्या भारत दोनों वाहनों को तैनात करेगा?

चूंकि Stryker और WhAP दोनों अलग-अलग प्रकार के इलाकों और युद्धों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, इसलिए संभावना है कि भारतीय सेना दोनों को अपने बेड़े में शामिल करे।

WhAP मल्टीपर्पज है औऱ एंफीबियस है, जबकि Stryker के साथ ऐसा नहीं है। स्ट्राइकर को अमेरिकी सेना में पहले से एक भरोसेमंद व्हीकल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय सेना WhAP को और अधिक प्राथमिकता देती है या Stryker को। फिलहाल, भारत अपनी रक्षा क्षमता को बढ़ाने के लिए इन दोनों विकल्पों को परख रहा है।