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AMCA Mk2 के लिए बड़ी खबर! GE और GTRE मिलकर बनाएंगे भारत का सुपरफाइटर इंजन, चीन-पाकिस्तान के छूटेंगे पसीने

Indian AMCA Fighter Jet: Adani Defence and MTAR Technologies join hands to bid for Rs 15,000 crore AMCA project amid intense competition

AMCA Mk2: एयरो इंडिया 2025 में अमेरिका की GE एयरोस्पेस ने भारत के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) के साथ साझेदारी की इच्छा जाहिर की है। इस साझेदारी का उद्देश्य भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) Mk2 के लिए एक अधिक पावरफुल इंजन डेवलप करना है। GE पहले ही AMCA Mk1 के लिए F414-GE-INS6 इंजन की सप्लाई कर रही है, लेकिन Mk2 के लिए इससे भी ज्यादा पावरफुल इंजन की जरूरत होगी।

Big Boost for AMCA Mk2! GE & GTRE to Develop India’s Superfighter Engine, A Gamechanger for Defence
AMCA Representative Image

GE का मौजूदा F414 इंजन देता है 98 kN का थ्रस्ट

GE ने पहले ही भारत को F414-GE-INS6 इंजन की सप्लाई के लिए एक समझौता किया है। यह इंजन 98 किलो न्यूटन (kN) का थ्रस्ट जेनरेट कर सकता है और इसे खासतौर पर AMCA Mk1 के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह इंजन पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की कई जरूरतों जैसे स्टील्थ टेक्नोलॉजी, सुपरसोनिक क्रूज क्षमता (बिना आफ्टरबर्नर के) और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को पूरा करता है।

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GE पहले ही भारतीय वायुसेना के लिए तेजस Mk2 के लिए 99 F414 इंजन की सप्लाई कर रही है, जिसका सौदा 2023 में 716 मिलियन डॉलर में हुआ था। इस सौदे के तहत 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग शामिल है।

AMCA Mk2 के लिए क्यों जरूरी है नया इंजन?

GE एयरोस्पेस के एक अधिकारी के मुताबिक, यह इंजन शुरुआती 40 AMCA Mk1 फाइटर्स के लिए पूरी तरह उपयुक्त है। हालांकि, GE ने यह भी स्वीकार किया कि AMCA Mk2 और आगे के वर्जन को अधिक दमदार इंजन की जरूरत होगी। GE एयरोस्पेस अब GTRE के साथ मिलकर एक नया इंजन बनाने की योजना बना रहा है, जो AMCA Mk2 की जरूरतों को पूरा करेगा।

AMCA Mk2 में ऐसे फीचर्स होंगे, जो इसे पांचवीं पीढ़ी से आगे का फाइटर जेट बनाने में मदद करेंगे। GE के अधिकारियों का कहना है कि नए इंजन में मौजूदा इंजन की तुलना में अधिक थ्रस्ट होगा और यह तकनीकी रूप से अधिक एडवांस होगा।

नए इंजन में 110 kN से ज्यादा थ्रस्ट

GE और GTRE के बीच संभावित साझेदारी से AMCA Mk2 के लिए एक पूरी तरह से नया कोर डिजाइन किया जाएगा। यह नया इंजन 110 kN से अधिक का थ्रस्ट पैदा कर सकेगा। बल्कि इसमें नई टेक्नोलॉजी भी शामिल होगी, जिससे इसकी कार्यक्षमता और भी बेहतर होगी। GE के अनुसार, यह नया इंजन AMCA Mk2 की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया जाएगा, जबकि इसे मौजूदा एयरक्राफ्ट डिज़ाइन में कम से कम बदलाव के साथ फिट किया जाएगा। इस रणनीति का उद्देश्य डेवलपमेंट कॉस्ट को कंट्रोल करना और समय-सीमा को बनाए रखना है।

HAL HLFT-42: भारतीय वायुसेना का यह नया सुपरफाइटर न केवल पायलट्स को देगा ट्रेनिंग, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर बरसाएगा बम!

GE अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस संभावित इंजन के मूल डिजाइन (core design) को पूरी तरह नया रूप दिया जाएगा, जिससे यह भविष्य में भी अपग्रेड हो सके। इसका मतलब यह है कि इस इंजन का इस्तेमाल न केवल AMCA Mk2 में, बल्कि आने वाले फाइटर जेट्स के लिए भी किया जा सकता है।

उठा बौद्धिक संपदा (IP) का मुद्दा

GE और GTRE के बीच इस साझेदारी को लेकर बौद्धिक संपदा (Intellectual Property-IP) का सवाल भी उठ रहा है। GE के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अगर यह नया इंजन डेवलप होता है, तो इसके IP अधिकार साझा किए जाएंगे। इसका मतलब यह होगा कि दोनों पक्षों के टेक्निकल कंट्रिब्यूशंस को मान्यता दी जाएगी और GE या GTRE में से कोई भी इसे पूरी तरह से कंट्रोल नहीं करेगा।

2028 तक आएगा AMCA Mk1!

AMCA Mk1 को भारत का सबसे उन्नत स्वदेशी लड़ाकू विमान माना जा रहा है। इसे 2028 तक पेश किए जाने की संभावना है और इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन 2030 के दशक के मध्य तक शुरू हो सकता है। यह भारत के मेक इन इंडिया रक्षा कार्यक्रम के तहत एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है, और अगर GE-GTRE साझेदारी सफल होती है, तो भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को बहुत बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

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HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

HAL HLFT-42: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) अपने Hindustan Lead-in Fighter Trainer (HLFT-42) के डिजाइन में महत्वपूर्ण बदलाव कर रहा है। यह बदलाव भारतीय वायुसेना (IAF) के सुझावों और जरूरतों के आधार पर किए जा रहे हैं, जिससे यह विमान केवल एक ट्रेनर नहीं बल्कि एक मल्टीरोल फाइटर जेट की भूमिका भी निभा सकता है।

HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

HAL HLFT-42: सिर्फ ट्रेनर नहीं, अब जंग में भी कारगर

HAL ने Aero India 2023 में पहली बार HLFT-42 का मॉडल पेश किया था, जिसे वायुसेना के लिए एक एडवांस सुपरसोनिक ट्रेनर के रूप में डिजाइन किया गया था। हालांकि, Aero India 2025 में इस विमान की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े किए। अब HAL अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस दौरान IAF की जरूरतों के अनुसार डिजाइन में बड़े बदलाव किए जा रहे थे।

भारतीय वायुसेना की मांग के अनुसार, HLFT-42 को अब एक हल्के लड़ाकू विमान (Light Combat Aircraft) और अनमेंड एरियल सिस्टम्स (UAS) के लिए एक कमांड सेंटर के रूप में भी डेवलप किया जा रहा है। HAL ने विमान के एरोडायनामिक्स, स्ट्रक्चरल स्ट्रेंग्थेनिंग, एवियोनिक्स और वेपन सिस्टम में सुधार करने पर फोकस किया है। इसके लिए विंड टनल टेस्टिंग और सिमुलेशन किए जा रहे हैं ताकि विमान ट्रेनिंग और युद्ध दोनों हालात में बेहतरीन प्रदर्शन कर सके।

IAF की ट्रेनिंग में HAL HLFT-42 की भूमिका

भारतीय वायुसेना पायलट ट्रेनिंग सिस्टम को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में है। HJT-16 किरण विमानों की जगह अब Intermediate Jet Trainer (IJT-36 “Yashas”) को लाने की योजना बनाई गई है, जो स्टेज- II ट्रेनिंग के लिए होगा। जबकि स्टेज-III ट्रेनिंग के लिए फिलहाल Hawk-132 Advanced Jet Trainer (AJT) का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इसे HLFT-42 से बदलने की योजना बन रही है।

HLFT-42 को Hawk-132 से ज्यादा एडवांस सिस्टम के साथ डेवलप किया जा रहा है। इसमें सेंसर, रडार और एडवांस कॉम्बैट सिस्टम शामिल होंगे, जिससे यह विमान भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए पायलटों को बेहतर तरीके से तैयार कर सके।

HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

HLFT-42: जंग में भी हो सकता है तैनात

भारतीय वायुसेना HLFT-42 को केवल एक ट्रेनर तौर पर ही नहीं, बल्कि युद्धक भूमिका में भी देख रही है। HAL ने इसे डुअल-रोल एयरक्राफ्ट के रूप में डिजाइन किया है, जो शांतिपूर्ण समय में ट्रेनिंग जेट और युद्धकाल में लड़ाकू विमान के रूप में काम कर सके। इस तरह, HLFT-42 भारतीय वायुसेना के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है।

इस विमान को ASRAAM (Advanced Short Range Air-to-Air Missile) और ASTRA जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस करने की योजना है। इससे यह न केवल एक ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर अग्रिम मोर्चे पर लड़ने में सक्षम होगा।

CATS Warrior: क्या HLFT-42 बनेगा मानव-रहित विमानों का ‘मदरशिप’?

HAL इस विमान को सिर्फ एक ट्रेनर या हल्के लड़ाकू विमान तक सीमित नहीं रखना चाहता। HLFT-42 को ‘Combat Air Teaming System (CATS) Warrior’ का मॉथरशिप बनाने की योजना पर भी काम चल रहा है।

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CATS Warrior एक लॉयल विंगमैन (Loyal Wingman) मानव रहित लड़ाकू हवाई वाहन (UCAV) है, जिसे HAL और NewSpace Research & Technologies मिलकर डेवलप कर रहे हैं। यह ड्रोन मानवरहित होते हुए भी मैंड विमानों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ने की क्षमता रखता है। पहले, Tejas Mk1A को CATS Warrior का मॉथरशिप बनाने की योजना थी, लेकिन अब HLFT-42 को इस भूमिका के लिए एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है।

यह कॉन्सेप्ट Manned-Unmanned Teaming (MUM-T) के बढ़ते वैश्विक ट्रेंड के अनुरूप है, जिसमें मानव चालित और मानव रहित विमानों को बेहतर युद्धक तालमेल और मिशन दक्षता के लिए एकीकृत किया जाता है। HAL अब HLFT-42 के संचार प्रणालियों, सेंसर सूट और सॉफ्टवेयर को अपडेट कर रहा है ताकि यह CATS Warrior के साथ आसानी से काम कर सके और आवश्यकतानुसार अपनी भूमिका बदल सके।

HAL HLFT-42: IAF Next-Gen Fighter Trainer with Combat-Ready Capabilities!

इंजन चुनना बड़ी चुनौती, कब होगी तैनाती?

हालांकि HLFT-42 के कई तकनीकी सुधार किए जा रहे हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल अभी भी बना हुआ है – इसका इंजन कौन सा होगा?

इस विमान के लिए GE F414 या स्वदेशी Kaveri इंजन पर विचार किया जा रहा है। चुना गया इंजन HLFT-42 को सुपरसोनिक प्रदर्शन और लड़ाकू अभियानों के लिए जरूरी पावर प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि इंजन विकास में देरी इस विमान की ऑपरेशनल तैनाती को 2030 के शुरुआती वर्षों तक टाल सकती है। भारत के कई एयरोस्पेस प्रोजेक्ट्स में इंजन एक प्रमुख चुनौती रहा है, और HLFT-42 भी इससे अछूता नहीं है।

HAL और IAF के लिए बड़ा मौका

HLFT-42 का नया डिज़ाइन और उसका एडवांस वर्जन भारतीय वायुसेना को न केवल एक बेहतर ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म देगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर एक हल्के लड़ाकू विमान के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

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इसके अलावा, CATS Warrior जैसी भविष्य की क्षमताओं को जोड़कर HAL इसे भारत की डिफेंस इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी छलांग बना सकता है। अगर यह विमान अपने तय समय पर सफलतापूर्वक विकसित होता है, तो यह भारतीय वायुसेना के लिए न केवल एक किफायती समाधान होगा, बल्कि भारत के एयरोस्पेस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में मदद करेगा।

क्या HLFT-42 बनेगा भारत का अगला बड़ा डिफेंस एक्सपोर्ट प्रोजेक्ट

यदि HLFT-42 अपने ट्रेनिंग और लड़ाकू दोनों रूपों में सफल रहता है, तो इसे विदेशी बाजारों में भी बेचा जा सकता है। कई देशों को ऐसे कम लागत, बहुउद्देश्यीय ट्रेनिंग और हल्के लड़ाकू विमानों की जरूरत है, और HLFT-42 इस कैटेगरी में फिट बैठ सकता है।

HAL के पास इस प्रोजेक्ट को वैश्विक बाजार में ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा निर्यात के तहत आगे ले जाने का बड़ा अवसर है। लेकिन यह सब इस पर निर्भर करेगा कि इसे समय पर कैसे विकसित किया जाता है और भारतीय वायुसेना इसे कितना अपनाती है।

अब सबकी नजरें HAL और भारतीय वायुसेना पर हैं कि HLFT-42 को कब अंतिम रूप दिया जाएगा और इसकी पहली उड़ान कब होगी। अगले कुछ सालों में इस विमान की सफलता यह तय करेगी कि यह सिर्फ एक ट्रेनर विमान रहेगा या भारत की वायुशक्ति का एक अहम हिस्सा बनेगा।

Disability Pension: दिल्ली हाईकोर्ट की रक्षा मंत्रालय को फटकार, रिटायर्ड अफसर के मेडिकल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर पेंशन रोकने पर जताई नाराजगी

Disability Pension: Delhi HC Slams MoD for Tampering Records to Deny Retired Officer’s Benefits
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Disability Pension: दिल्ली हाईकोर्ट ने सेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी को विकलांगता पेंशन से वंचित करने के लिए उनके मेडिकल रिकॉर्ड में की गई छेड़छाड़ पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि कुछ अधिकारियों की मनमर्जी के कारण मेडिकल बोर्ड की कार्यवाही में हेरफेर किया जा रहा है और पूर्व अधिकारियों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

Disability Pension: Delhi HC Slams MoD for Tampering Records to Deny Retired Officer’s Benefits
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कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अपने आदेश की एक प्रति रक्षा मंत्रालय के सचिव और थल सेना प्रमुख को भी भेजी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शालिंदर कौर की खंडपीठ ने सुनाया, जिसमें केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया गया।

Disability Pension: कैसे हुई मेडिकल रिकॉर्ड में हेरफेर?

मामला रिटायर्ड कर्नल मनीष मिधा का है, जिनकी विकलांगता पेंशन को लेकर केंद्र सरकार ने अगस्त 2023 में सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) दिल्ली द्वारा दिए गए आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। AFT ने केंद्र को आदेश दिया था कि कर्नल मिधा को उनकी विकलांगता पेंशन 30% से बढ़ाकर 50% तक दी जाए।

हाईकोर्ट के 19 फरवरी को जारी विस्तृत आदेश में कहा गया कि रिलीज मेडिकल बोर्ड (RMB) की मूल रिपोर्ट की जांच करने पर यह स्पष्ट हुआ कि इसमें छेड़छाड़ की गई थी। रिपोर्ट के भाग-7 में जहां मेडिकल बोर्ड की राय दर्ज की जाती है, वहां एक नया पेपर चिपकाकर कहा गया कि कर्नल मिधा को विकलांगता पेंशन का अधिकार नहीं है, क्योंकि उनकी बीमारी सेना की सेवा से न तो जुड़ी हुई है और न ही इससे प्रभावित हुई है।

मेडिकल रिकॉर्ड में यह बदलाव हेडक्वार्टर मेडिकल कॉर्प्स के निर्देशों के तहत किया गया था, जिससे यह साफ हो जाता है कि उच्च स्तर पर इस फैसले को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी।

Disability Pension: क्या था कर्नल मिधा का मामला?

कर्नल मनीष मिधा को प्राथमिक हाइपरटेंशन (High Blood Pressure) की समस्या थी, जो 2012 में तब शुरू हुई, जब उन्होंने असम और जम्मू-कश्मीर में चार साल की लगातार फील्ड पोस्टिंग पूरी की थी। 2012 में मेडिकल बोर्ड ने खुद माना था कि उनकी बीमारी सेना की सेवा से जुड़ी हुई है।

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लेकिन जब उनका रिटायरमेंट मेडिकल बोर्ड (RMB) हुआ, तब भी बोर्ड ने माना कि उनकी स्थिति सेना में सेवा के कारण और गंभीर हुई। लेकिन बाद में उच्च मुख्यालय के चिकित्सा विभाग के निर्देश पर इस फैसले को बदल दिया गया और मूल रिपोर्ट पर एक नई राय चिपका दी गई।

Disability Pension: कोर्ट में कैसे हुआ खुलासा?

कर्नल मिधा की ओर से पेश वकील चैतन्य अग्रवाल ने अदालत में इस हेरफेर को उजागर किया। उन्होंने मूल RMB रिपोर्ट को कोर्ट में पेश किया, जिसमें हेरफेर साफ दिखाई दे रही था। उन्होंने वह पत्र भी अदालत के सामने रखा, जिसमें मेडिकल बोर्ड को अपना फैसला बदलने का निर्देश दिया गया था।

Disability Pension: कोर्ट ने क्या कहा?

दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया और आदेश दिया कि कर्नल मिधा को उनका विकलांगता पेंशन लाभ तुरंत दिया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक अधिकारी मेडिकल बोर्ड की राय को बदलने के अधिकारी नहीं हैं और वे इस पर निर्णय नहीं ले सकते। सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) भी पहले ऐसे मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि मेडिकल बोर्ड के निष्कर्षों को प्रशासनिक हस्तक्षेप से बदला नहीं जा सकता।

Disability Pension: रक्षा मंत्रालय पर लगाया जुर्माना

हाईकोर्ट ने रक्षा मंत्रालय पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और कहा कि सरकार ने अनावश्यक रूप से कर्नल मिधा को अदालत तक खींचा, जबकि वह अपने कानूनी अधिकार के लिए लड़ रहे थे।

सैन्य मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए बड़ी राहत है, जिनकी विकलांगता पेंशन को मनमाने ढंग से रोका जाता है।

रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) के. हरीश ने इस फैसले को महत्वपूर्ण करार देते हुए कहा, “यह बेहद चिंताजनक है कि उन सैनिकों, जिन्होंने वर्षों तक देश की सेवा की, उनके मेडिकल रिकॉर्ड में हेरफेर कर उनके हक को छीना जा रहा है। यह फैसला भविष्य में अन्य ऐसे मामलों में भी मिसाल बनेगा।”

एक अन्य रक्षा विश्लेषक ने कहा कि “सेना में सेवा करने वाले अधिकारियों और जवानों को पहले ही कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। अगर रिटायरमेंट के बाद उन्हें उनके अधिकार से वंचित किया जाता है, तो यह एक गंभीर अन्याय है।”

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा है कि भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय और सेना प्रमुख को आवश्यक कदम उठाने चाहिए। अदालत के इस फैसले के बाद सरकार के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य हो गया है कि रिटायरमेंट मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को किसी भी प्रकार से बदला या प्रभावित न किया जाए और सेवानिवृत्त सैनिकों को उनका उचित हक दिया जाए।

India-Bangladesh: मोदी और मुहम्मद यूनुस की संभावित मुलाकात; क्या BIMSTEC शिखर सम्मेलन में हो सकता है बड़ा फैसला?

India-Bangladesh: Possible Modi-Yunus Meeting; Key Decisions Expected at BIMSTEC Summit?
2015 में इंडियन साइंस कांग्रेस के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मोहम्मद यूनुस।

India-Bangladesh: अप्रैल के पहले सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस की मुलाकात होने की संभावना जताई जा रही है। यह मुलाकात थाईलैंड में 3-4 अप्रैल को आयोजित छठे BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) शिखर सम्मेलन के दौरान हो सकती है। हालांकि, इस बैठक को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इस पर चर्चा जोरों पर है।

India-Bangladesh: Possible Modi-Yunus Meeting; Key Decisions Expected at BIMSTEC Summit?
2015 में इंडियन साइंस कांग्रेस के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मोहम्मद यूनुस।

BIMSTEC में भारत की रणनीति और SAARC की निष्क्रियता

भारत BIMSTEC को एक मॉडल क्षेत्रीय संगठन के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि SAARC (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के कारण प्रभावी रूप से निष्क्रिय हो गया है। BIMSTEC में बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान और नेपाल सदस्य देश हैं। यह संगठन व्यापार, सुरक्षा, कनेक्टिविटी और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है।

India-Bangladesh संबंधों में उतार-चढ़ाव

बांग्लादेश में हाल ही में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित किया है। विशेष रूप से, जब शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया, तब से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्तों में ठहराव देखने को मिला है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में मस्कट में बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हसन से मुलाकात की थी, जिसके बाद उन्होंने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार द्वारा भारत के प्रति अपनाए गए रुख और वहां अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को लेकर चिंता जताई थी।

जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत को बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर गहरी चिंता है और यह भारत के दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने इस मुद्दे पर अपनी चिंताओं को स्पष्ट रूप से उठाया है।

India-Bangladesh: क्या मोदी-यूनुस की बैठक से रिश्तों में आएगी गर्माहट?

अगर यह बैठक होती है, तो यह भारत और बांग्लादेश के बीच बिगड़ते रिश्तों को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में व्यापारिक संबंधों, सुरक्षा सहयोग और BIMSTEC को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है।

राजनीतिक विश्लेषक अनुपम सेनगुप्ता का कहना है कि “भारत-बांग्लादेश के रिश्ते हमेशा से ही स्थिर नहीं रहे हैं। शेख हसीना के कार्यकाल में भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों में मजबूती आई थी, लेकिन उनकी सरकार के जाने के बाद भारत के लिए यह चुनौतीपूर्ण दौर हो सकता है। मोदी और यूनुस की संभावित बैठक दोनों देशों के लिए एक नई दिशा तय कर सकती है।”

BIMSTEC शिखर सम्मेलन और भारत की कूटनीतिक योजना

प्रधानमंत्री मोदी इस शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए थाईलैंड यात्रा करेंगे। यह शिखर सम्मेलन मूल रूप से सितंबर 2024 में आयोजित होने वाला था, लेकिन मेजबान देश में घरेलू राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। अब भारत इस सम्मेलन में अपनी भूमिका को मजबूत करने और दक्षिण एशिया में अपनी कूटनीतिक पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

Pakistan-Bangladesh Nexus: बड़ा खुलासा! बांग्लादेश में 1971 से पहले के हालात बनाना चाहती है पाकिस्तान की ISI, सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर नजर

बांग्लादेश के मामले में, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके हित सुरक्षित रहें, खासकर जब चीन लगातार बांग्लादेश में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

India-Bangladesh: भारत के लिए यह बैठक क्यों महत्वपूर्ण है?

इसकी एक बड़ी वजह बांग्लादेश में चीन का बढ़ता प्रभाव है। चीन लगातार बांग्लादेश में निवेश बढ़ा रहा है और बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग कर रहा है। भारत नहीं चाहता कि बांग्लादेश पूरी तरह से चीन के प्रभाव में आ जाए। वहीं, भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापारिक और सुरक्षा सहयोग महत्वपूर्ण है। Northeast India की सुरक्षा और जल संसाधन प्रबंधन दोनों देशों के लिए एक अहम मुद्दा है। साथ ही, भारत BIMSTEC को मजबूत कर दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, ताकि SAARC की निष्क्रियता का असर क्षेत्रीय सहयोग पर न पड़े।

क्या बांग्लादेश भारत पर दोहरी नीति अपना रहा है?

जयशंकर ने यह भी कहा कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार एक तरफ भारत से अच्छे संबंधों की इच्छा जताती है, लेकिन दूसरी तरफ भारत को घरेलू राजनीतिक अस्थिरता के लिए जिम्मेदार ठहराती है। इस प्रकार की परस्पर विरोधी बयानबाजी भारत-बांग्लादेश के रिश्तों को और जटिल बना सकती है।

राजनीतिक विश्लेषक राजीव त्रिपाठी का कहना है कि “भारत को बांग्लादेश के मौजूदा राजनीतिक हालातों को बहुत बारीकी से समझना होगा। चीन और पाकिस्तान भी वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में हैं। ऐसे में मोदी-यूनुस की बैठक से भारत अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति बना सकता है।”

Taliban-India Relations: क्या अफगानिस्तान में फिर से खुलेगा भारतीय दूतावास? तालिबान संग रिश्ते सुधारने की कूटनीतिक कोशिश या मजबूरी?

क्या मोदी-यूनुस की बैठक से नए समीकरण बनेंगे?

अगर यह बैठक होती है, तो यह न केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों को नई दिशा देने का काम कर सकती है, बल्कि BIMSTEC जैसे संगठन को और अधिक प्रभावी बनाने में भी मदद कर सकती है। भारत को अपनी रणनीति इस तरह से बनानी होगी कि वह बांग्लादेश की नई सरकार के साथ अपने हितों को साधते हुए अपने क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत कर सके।

अभी तक इस बैठक की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अगर यह बैठक होती है, तो इसके नतीजे दक्षिण एशिया की राजनीति और कूटनीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।

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Taliban-India Relations: Diplomatic Reset or Strategic Compulsion?
India's foreign secretary Vikram Misri meets acting Afghan foreign minister Mawlawi Amir Khan Muttaqi in Dubai, marking the first public meeting between a top Indian official and a Taliban representative

Taliban-India Relations: 8 जनवरी 2025 को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई में जब विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने तालिबान सरकार के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्ताकी से मुलाकात हुई थी, तभी लगने लगा था कि अफगानिस्तान और भारत के बीच कुछ चल रहा है। हालांकि इस मुलाकात के दौरान दोनों पक्षों ने व्यापार, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की। लेकिन इसके पीछे की कहानी जो सामने आ रही है, वह यह है कि दोनों देश अपने कूटनीतिक संबंधों को फिर से बहाल करने की तैयारी में हैं।

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Taliban-India Relations: भारत जल्द अफगानिस्तान भेज सकता है राजनयिक और अधिकारी

सूत्रों के मुताबिक अफगानिस्तान में भारत के राजनयिक संबंधों को फिर से बहाल करने की योजना पर तेजी से काम हो रहा है। सूत्रों के अनुसार, भारत जल्द ही “दर्जनों राजनयिक और अधिकारी” अफगानिस्तान भेज सकता है ताकि वहां भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास को फिर से पूरी तरह से शुरू किया जा सके। इस योजना के तहत, तालिबान ने इन अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की गारंटी दी है। इसके अलावा, नई दिल्ली में अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपने की प्रक्रिया भी लगभग तय मानी जा रही है।

Taliban-India Relations: इन नामों पर चल रहा है विचार

विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मिस्री और मुत्ताकी की बैठक के दौरान तालिबान ने नई दिल्ली में अपने दो संभावित राजनयिकों की एक लिस्ट भारत को सौंपी थी, जिसमें नजीब शहीन का नाम सबसे ऊपर है। नजीब शहीन, तालिबान के कतर स्थित प्रवक्ता सुहैल शहीन के बेटे हैं, जो तालिबान की कूटनीतिक पहल का एक प्रमुख चेहरा हैं। सुहैल शहीन, जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते और लिखते हैं, 1990 के दशक में काबुल टाइम्स के संपादक भी रह चुके हैं। वहीं, 30 वर्षीय राजनयिक नजीब शहीन के अलावा अफगान विदेश मंत्रालय में कार्यरत शौकत अहमदजई का नाम भी इस पद के लिए विचार किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार इस प्रतिनिधि को औपचारिक रूप से राजनयिक मान्यता नहीं देगी लेकिन वह भारत में तालिबान सरकार के शीर्ष प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेगा। इस नियुक्ति के बावजूद, तालिबान को अपने झंडे को दूतावास, आधिकारिक कार्यक्रमों या वाहनों पर लगाने की अनुमति नहीं होगी।

Taliban-India Relations: अंतिम चरण में है प्रक्रिया

विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि नई दिल्ली में अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपे जाने की प्रक्रिया भी लगभग अंतिम चरण में है। तालिबान सरकार और भारतीय अधिकारियों के बीच इस मुद्दे को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। 24 नवंबर 2023 को, नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास ने स्थायी रूप से अपना कामकाज बंद करने का एलान किया था। अपने बयान में दूतावास ने कहा था, “अफगान गणराज्य के राजनयिकों ने इस मिशन को पूरी तरह से भारतीय सरकार के हवाले कर दिया है। अब यह पूरी तरह से भारतीय सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस मिशन के भविष्य को कैसे तय करती है।”

इकरामुद्दीन कामिल को बनाया था कार्यवाहक काउंसल

हालांकि मिस्री औऱ मुत्ताकी की बैठक से पहले ही भारत ने मुंबई स्थित अफगानिस्तान के वाणिज्य दूतावास में एक नए महावाणिज्य दूत की नियुक्ति को मंजूरी दी थी। सूत्रों ने बताया कि पिछले साल नवंबर में, तालिबान ने मुंबई स्थित अफगान वाणिज्य दूतावास में भारत में रह रहे एक अफगान नागरिक, इकरामुद्दीन कामिल को कार्यवाहक काउंसल नियुक्त किया था। यह भारत में तालिबान सरकार की तरफ से की गई पहली आधिकारिक नियुक्ति थी। कामिल ने इस्लामाबाद की इस्लामिक यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई की थी, इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली स्थित साउथ एशियन यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की, जिसे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के तहत स्थापित किया गया था।

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India’s foreign secretary Vikram Misri meets acting Afghan foreign minister Mawlawi Amir Khan Muttaqi in Dubai, marking the first public meeting between a top Indian official and a Taliban representative

Taliban-India Relations: अभी तक नहीं आया कोई आधिकारिक बयान

सूत्रों का कहना है कि अफगान दूतावास को तालिबान के कंट्रोल में सौंपे जाने को लेकर भारत सरकार और तालिबान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। अगर भारत तालिबान की तरफ से प्रस्तावित किसी नाम पर मुहर लगाता है, तो यह संकेत हो सकता है कि भारत धीरे-धीरे तालिबान सरकार के साथ अपने संबंध सामान्य करने की ओर बढ़ रहा है। वहीं, भारतीय अधिकारी तालिबान द्वारा नामित किसी भी राजनयिक को मंजूरी देने को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि भारत के लिए एक संभावित विकल्प यह हो सकता है कि वह पहले काबुल में अपना दूतावास को फिर से खोलने की पेशकश करे और उसके बाद ही तालिबान की इस मांग पर विचार करे।

बता दें कि भारत ने अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया था और तब से उसने अपनी मौजूदगी को ‘टेक्निकल टीम’ तक सीमित रखा है। हालांकि, पिछले तीन सालों में भारत लगातार तालिबान के प्रतिनिधियों से मुलाकात करता रहा है। नवंबर 2024 में, पाकिस्तान-ईरान और अफगानिस्तान मामलों के संयुक्त सचिव जेपी सिंह ने काबुल का दौरा किया था और वहां तालिबान के रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याकूब मुजाहिद से मुलाकात की थी।

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तालिबान से सीधी नजदीकी नहीं दिखाना चाहता भारत

भारत अभी तक तालिबान को मान्यता देने से झिझक रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भी तालिबान सरकार को लेकर आशंकित है। अमेरिका, यूरोप और कई अन्य देशों ने अभी तक तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है। इसकी प्रमुख वजहें तालिबान द्वारा महिलाओं के अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंध और लोकतांत्रिक सरकार न होने को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताएं हैं। जिसके चलते भारत अब तक आधिकारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता देने से बचता रहा है। लेकिन अफगानिस्तान में दूतावास को फिर से खोलने की योजना भारत की बदलती विदेश नीति की ओर इशारा कर रही है। भारत के लिए यह समझौता एक कूटनीतिक संतुलन साधने जैसा है। वह तालिबान से सीधी नजदीकी नहीं दिखाना चाहता, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए उसे अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।

तालिबान से दोबारा संपर्क क्यों बढ़ा रहा है भारत?

अब सवाल यह उठता है कि भारत तालिबान से दोबारा संपर्क क्यों बढ़ा रहा है। इसकी प्रमुख वजह क्षेत्रीय राजनीति है। रूस और मध्य एशियाई देशों की बदलती रणनीति भी भारत के इस फैसले को प्रभावित कर रही है। रूस अब अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक और सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। ईरान भी तालिबान सरकार के साथ अपने संबंध सुधारने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। इसके अलावा पिछले साल, चीन ने तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से राजनयिक मान्यता दी थी, जिससे वह ऐसा करने वाला पहला देश बन गया था। वहीं, अफगानिस्तान में चीन और पाकिस्तान का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। चीन पहले ही अफगानिस्तान में खनिज संपत्तियों और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है। पाकिस्तान की तालिबान सरकार के साथ मजबूत कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बने हुए हैं। तालिबान सरकार अब वाखान कॉरिडोर के जरिए चीन से जुड़ने के लिए एक सड़क बनाने की योजना बना रही है। यह सड़क चीन को सीधे मध्य एशिया और मध्य पूर्व तक पहुंच प्रदान करेगी, जिससे बीजिंग इस खनिज संपन्न क्षेत्र में अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ा सकेगा। इसके अलावा, चीनी कंपनियां तालिबान शासन के बाद भी अफगानिस्तान में खनन और बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश कर रही हैं।

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तालिबान से संपर्क बनाए रखे भारत!

जिसके चलते भारत को डर है कि अगर वह अफगानिस्तान में निष्क्रिय रहा, तो उसका प्रभाव क्षेत्रीय राजनीति में कम हो सकता है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अफगानिस्तान में अपनी भूमिका को फिर से मजबूत करे। भारत हमेशा से अफगानिस्तान में स्थिरता और विकास को प्राथमिकता देता रहा है, अब इस समझौते के ज़रिए वहां अपने प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। अफगानिस्तान मामलों के जानकार अज़ीज़ रफीई के अनुसार, “भारत के पास तालिबान से जुड़ने के अलावा कोई और व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है। भारत को कूटनीतिक रूप से तालिबान से संपर्क बनाए रखना चाहिए, अन्यथा यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में पिछड़ सकता है।”

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भारत ने जम कर की है अफगानिस्तान की मदद

ऐसा नहीं है कि भारत ने तालिबान के साथ संबंध बना कर नहीं रखे हैं। बल्कि पिछले कुछ सालों से भारत की अफगानिस्तान नीति मानवीय सहायता और अफगान जनता के कल्याण पर फोकस रही है। भारत ने अफगानिस्तान में लंबे समय तक अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी थी, विशेष रूप से 2001 से 2021 के बीच। इस दौरान भारत ने अफगानिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश किया, जिसमें सड़कों, स्कूलों, बांधों और संसद भवन का निर्माण शामिल था। लेकिन तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद यह सब बदल गया। 2021 के बाद से, भारत ने 50,000 मीट्रिक टन गेहूं, 300 टन दवाइयां और 27 टन भूकंप राहत सामग्री भेजी है। इसके अलावा, भारत ने अफगानिस्तान को कोविड-19 वैक्सीन और अन्य चिकित्सा मदद भी प्रदान की है।

भारत की अफगान नीति में दूरदृष्टि और स्पष्टता की कमी

रिटायर्ड सेना अधिकारी और रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर वी महालिंगम कहते हैं, यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत की अफगान नीति में दूरदृष्टि और स्पष्टता की कमी है। 2021 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो भारत ने उसके साथ अपने राजनयिक संबंध समाप्त कर लिए थे। क्या आज उस फैसले निर्णय के पीछे का तर्क बदल गया है? तालिबान का वही कट्टरपंथी शासन, जो महिलाओं के अधिकारों को कुचल रहा है, धार्मिक अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल रहा है और एक समावेशी सरकार बनाने से इनकार कर रहा है, क्या अब यह किसी भी तरह से भारत के लिए स्वीकार्य हो गया है?

वह आगे कहते हैं, भारत चीन को रोकने के लिए नई दिल्ली में तालिबान के एक राजदूत स्तर के प्रतिनिधि को मान्यता देने की योजना बना रहा है। लेकिन क्या मात्र एक राजनयिक की नियुक्ति से चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सकता है? क्या यह रणनीतिक रूप से तार्किक कदम है? चीन अफगानिस्तान में पहले से ही बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत उसने अफगानिस्तान को अपने आर्थिक मॉडल में शामिल कर लिया है और पाकिस्तान के साथ मिलकर अपनी पकड़ को और मजबूत कर रहा है। क्या भारत को लगता है कि सिर्फ तालिबान के एक प्रतिनिधि को नई दिल्ली में स्वीकार करके चीन के प्रभाव को कम किया जा सकता है?

भारत का असली हित तालिबान सरकार में नहीं, बल्कि अफगान जनता में है

वह कहते हैं, सवाल यह उठता है कि अगर भारत तालिबान को आधिकारिक राजनयिक दर्जा नहीं दे रहा है, तो फिर इस आधे-अधूरे कूटनीतिक समझौते का क्या उद्देश्य है? ब्रिगेडियर वी महालिंगम के मुताबिक उन्हें यह कूटनीति के नाम पर एक गंभीर खेल जैसा प्रतीत हो रहा है। वह कहते हैं कि आज चीन दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक और सैन्य शक्ति है। वह वैश्विक व्यापार और विनिर्माण का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। अमेरिका समेत पूरी दुनिया इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है कि चीन एक मल्टीपोलर वर्ल्ड में एक अहम भूमिका निभाने जा रहा है। ऐसे में भारत को अपनी चीन नीति को व्यावहारिक बनाना होगा। हमें चीन को लेकर किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। भारत के राष्ट्रीय हित सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण हैं। लेकिन भारत को अपनी अफगान नीति को चीन के साथ जोड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार अपनी कट्टरपंथी नीतियों के कारण लंबे समय तक नहीं टिकी रह सकती। तालिबान का शासन एक खास विचारधारा पर आधारित है, जो सिर्फ सुन्नी, हनफ़ी और देवबंदी समुदायों को तरजीह देता है, जबकि दूसरों को हाशिए पर रखता है। भारत के लिए असली हित तालिबान सरकार में नहीं, बल्कि अफगान जनता में है।

‘जिहाद’ छेड़ने वालों को जगह देना, संकट को न्योता देने जैसा

ब्रिगेडियर महालिंगम के मुताबिक नई दिल्ली में ऐसे लोगों को जगह देना, जो आतंकवादी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं और जिनका दीर्घकालिक लक्ष्य दुनिया भर में शरिया कानून लागू करने के लिए ‘जिहाद’ छेड़ना है, अपने ही देश में संकट को न्योता देना है। इतिहास गवाह है कि तालिबान अपनी नीतियों और लक्ष्यों में कभी बदलाव नहीं करता। क्या उन्होंने कभी अपने कट्टरपंथी विचारों को बदला है? क्या उन्होंने कभी आतंकी संगठनों को समर्थन देना बंद किया है? क्या उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्रता दी है? उत्तर हमेशा ‘नहीं’ ही रहेगा।

प्रॉक्सी युद्ध लड़ने की गलती नहीं करे भारत

ब्रिगेडियर महालिंगम आगे कहते हैं, भारत को कभी भी आतंकवादी समूहों का उपयोग करके प्रॉक्सी युद्ध लड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए। अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अफगानिस्तान में अमेरिका ने चरमपंथी गुटों को हथियार और समर्थन दिया, लेकिन बाद में वही गुट अमेरिका के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए। अमेरिका की आंतरिक और बाहरी राजनीति, उसकी अर्थव्यवस्था, और उसकी सुरक्षा चुनौतियां आज इसी रणनीति के नतीजे हैं। भारत को इस रास्ते पर नहीं चलना चाहिए। भारत को अपनी अफगान नीति को स्पष्ट, व्यावहारिक और दीर्घकालिक दृष्टि से तय करना चाहिए। तालिबान को राजनीतिक वैधता देने की कोई भी गलती हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है। भारत को तालिबान के साथ जुड़ने के बजाय, अफगान जनता के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए और अपने कूटनीतिक कदम बहुत सोच-समझकर उठाने चाहिए।

Indian Army SSC Officer 2025: भारतीय सेना में बिना एग्जाम दिए सीधे अफसर बनने का सुनहरा मौका, जल्दी करें 15 मार्च है लास्ट डेट

SSC Officer Recruitment 2025: Golden Opportunity to Join Indian Army Without Exam, Apply Before March 15!

Indian Army SSC Officer 2025: भारतीय सेना ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत NCC स्पेशल एंट्री स्कीम 2025 (नॉन-टेक्निकल) के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। इस भर्ती के तहत अविवाहित पुरुष और महिलाएं (जिनमें सेना में शहीद हुए जवानों के बच्चे भी शामिल हैं) सेना में अधिकारी बनने का सपना पूरा कर सकते हैं। यह योजना भारतीय युवाओं को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करने और उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

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Indian Army SSC Officer 2025: NCC स्पेशल एंट्री क्यों है खास?

भारतीय सेना में भर्ती के कई माध्यम हैं, लेकिन NCC स्पेशल एंट्री स्कीम (नॉन-टेक्निकल) उन उम्मीदवारों के लिए एक बेहतरीन अवसर है, जो बिना CDS परीक्षा दिए सीधे SSB इंटरव्यू के माध्यम से अधिकारी बन सकते हैं। इसके लिए उम्मीदवारों के पास NCC ‘C’ सर्टिफिकेट होना आवश्यक है। इस योजना के तहत चयनित अभ्यर्थियों को शॉर्ट सर्विस कमीशन दिया जाएगा, जिसका मतलब है कि वे पहले 10 साल तक सेवा करेंगे, और बाद में 4 साल का एक्सटेंशन मिल सकता है।

Indian Army SSC Officer 2025: कौन कर सकता है आवेदन?

इस योजना के तहत चयनित अभ्यर्थियों को शॉर्ट सर्विस कमीशन दिया जाएगा, जिसमें पहले दस वर्षों तक सेवा करने का अवसर मिलेगा और इसके बाद चार साल का अतिरिक्त कार्यकाल दिया जा सकता है। आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की आयु सीमा 19 से 25 वर्ष के बीच होनी चाहिए। यानी कि उम्र 19 से 25 वर्ष के बीच होनी चाहिए। यानी जन्म 2 जुलाई 2000 से पहले और 1 जुलाई 2006 के बाद न हुआ हो।

इसके अलावा, आवेदकों को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से कम से कम 50 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातक होना अनिवार्य है। इंजीनियरिंग स्नातकों के लिए भी यह योजना खुली है, बशर्ते उन्होंने अपने पाठ्यक्रम के सभी वर्षों में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक हासिल किए हों। जो उम्मीदवार अंतिम वर्ष में पढ़ाई कर रहे हैं, उन्हें एसएसबी इंटरव्यू में चयनित होने के बाद अपने स्नातक पाठ्यक्रम में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक प्राप्त करने होंगे।

Indian Army SSC Tech Officer: भारतीय सेना में देशभक्ति के जज्बे को इस तरह कर सकते हैं पूरा, अफसर बनने का सुनहरा अवसर

NCC सेवा का अनुभव

इस योजना के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को एनसीसी सीनियर डिवीजन/विंग में कम से कम दो या तीन वर्षों तक सेवा का अनुभव होना आवश्यक है। सेना द्वारा जारी रिक्तियों के अनुसार, एनसीसी पुरुष उम्मीदवारों के लिए 70 पद उपलब्ध हैं, जिनमें से 63 पद सामान्य श्रेणी के लिए और 7 पद युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों के लिए आरक्षित हैं। वहीं, एनसीसी महिला उम्मीदवारों के लिए कुल 6 पद रखे गए हैं, जिनमें से 5 सामान्य श्रेणी के लिए और 1 पद युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों के लिए आरक्षित किया गया है।

भारतीय सेना ने कुल 76 पदों के लिए आवेदन मांगे हैं:

  • NCC पुरुष उम्मीदवारों के लिए 70 पद (63 सामान्य श्रेणी और 7 युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों के लिए)
  • NCC महिला उम्मीदवारों के लिए 6 पद (5 सामान्य श्रेणी और 1 युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों के लिए)।

प्रशिक्षण और ट्रेंनिंग?

चयनित उम्मीदवारों को चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में 49 सप्ताह की ट्रेनिंग दी जाएगी। इस दौरान उम्मीदवारों को सेना के नियमों, रणनीतियों और फिजिकल ट्रेनिंग से गुजरना होगा। प्रशिक्षण के दौरान किसी भी उम्मीदवार को शादी करने की अनुमति नहीं होगी और वे अपने माता-पिता या अभिभावकों के साथ नहीं रह सकेंगे। यदि कोई उम्मीदवार मेडिकल कारणों को छोड़कर किसी अन्य कारण से प्रशिक्षण छोड़ता है, तो उसे सरकार को प्रति सप्ताह 16,260 रुपये की दर से प्रशिक्षण की लागत वापस करनी होगी।

कैसे होगा चयन?

इस योजना के तहत चयन की प्रक्रिया बिना किसी लिखित परीक्षा के की जाएगी। इस योजना के तहत उम्मीदवारों को CDS जैसी लिखित परीक्षा देने की जरूरत नहीं होगी। NCC ‘C’ सर्टिफिकेट होल्डर्स को सीधे SSB इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा। यानी कि योग्य उम्मीदवारों को उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड और एनसीसी ‘सी’ सर्टिफिकेट के आधार पर शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। इसके बाद उन्हें पांच दिवसीय एसएसबी इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा, जहां साइकोलॉजिकल टेस्ट, ग्रुप टेस्टिंग और पर्सनल इंटरव्यू की प्रक्रिया होगी। एसएसबी इंटरव्यू में सफल उम्मीदवारों का मेडिकल परीक्षण किया जाएगा और फिर अंतिम मेरिट लिस्ट जारी की जाएगी। फल उम्मीदवारों को ऑफिसर ट्रेनिंग अकादमी (OTA), चेन्नई में प्रशिक्षण के लिए बुलाया जाएगा।

कैसे करें आवेदन?

इच्छुक उम्मीदवार भारतीय सेना की आधिकारिक वेबसाइट https://joinindianarmy.nic.in पर जाकर 15 मार्च 2025 तक आवेदन कर सकते हैं।

रक्षा विशेषज्ञों की राय

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि NCC स्पेशल एंट्री स्कीम उन युवाओं के लिए एक शानदार अवसर है, जो बिना CDS परीक्षा दिए सेना में अधिकारी बनने का सपना देखते हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना भारतीय सेना को उच्च गुणवत्ता वाले अधिकारी प्रदान करती है। इस योजना के तहत चुने गए युवा पहले से ही एनसीसी में अपनी सेवाएं दे चुके होते हैं और उनके पास सैन्य अनुशासन व रणनीतिक सोच विकसित करने का अच्छा अनुभव होता है। संसद की एक स्थायी समिति रक्षा मंत्रालय से एनसीसी भर्ती के तहत अधिक उम्मीदवारों का चयन करने और इस प्रक्रिया को और अधिक सुदृढ़ करने की सिफारिश कर चुकी है।

रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) संजय मेहरा का कहना है कि “इस योजना से भारतीय सेना को उच्च गुणवत्ता वाले प्रशिक्षित अधिकारी मिलते हैं, जो पहले से ही अनुशासन और लीडरशिप स्किल्स में प्रशिक्षित होते हैं।”

रक्षा मामलों के जानकार कर्नल (रिटायर्ड) अरविंद चौधरी ने कहा कि “आज के समय में भारत को एक मजबूत और युवा सैन्य बल की जरूरत है। NCC स्पेशल एंट्री स्कीम के तहत चुने गए युवा न केवल प्रशिक्षित होते हैं, बल्कि वे बचपन से ही देशभक्ति की भावना के साथ आगे बढ़ते हैं।”

TAIWS: LoC पर भारत पहली बार लगाने जा रहा है यह घातक हथियार, खोज-खोज कर आतंकियों को करेगा ढेर, इजरायल भी होगा फेल!

AI-Powered TAIWS Deployed at LoC: India’s New Lethal Weapon to Track & Eliminate Infiltrators!

TAIWS: भारतीय सेना जल्द ही नियंत्रण रेखा (LoC) पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित ‘ट्रैक एंड शूट’ वेपन सिस्टम तैनात करने की योजना बना रही है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ लगातार जारी है। इस नई टेक्नोलॉजी का उद्देश्य सेना को आधुनिक उपकरणों से लैस करना और सुरक्षा को और अधिक प्रभावी बनाना है। इस प्रणाली का नाम ट्रैक एंड इंटेलिजेंट वेपन सिस्टम (TAIWS) रखा गया है, जिसे विशेष रूप से घनी झाड़ियों और पहाड़ी इलाकों में छिपे आतंकियों को पहचानने और खत्म करने के लिए डेवलप किया गया है।

AI-Powered TAIWS Deployed at LoC: India’s New Lethal Weapon to Track & Eliminate Infiltrators!

क्या है AI बेस्ड ‘Track & Shoot’ वेपन सिस्टम?

TAIWS सिस्टम को अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया गया है, जिसमें प्रायमरी और सेकेंडरी कैमरे शामिल हैं। यह कैमरे लगातार इलाके की निगरानी करेंगे और किसी भी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाकर उसे ट्रैक करेंगे। इस सिस्टम के तहत एक मीडियम मशीनगन (Medium Machine Gun) लगाई गई है, जिसकी प्रभावी रेंज लगभग 1.8 किलोमीटर तक होगी। यानी इस रेंज आया कोई भी घुसपैठिया इस मशीनगन की जद में होगा। यह सिस्टम AI एनेबल्ड प्राइमरी साइटिंग सिस्टम से लैस होगी, जिसमें 40 गुना ऑप्टिकल जूम, थर्मल इमेजिंग कैमरा और एक सेकेंडरी कैमरा सेंसर होगा, जो कम रोशनी में भी स्पष्ट रूप से लक्ष्य की पहचान कर सकेगा।

कैसे काम करेगा यह सिस्टम?

TAIWS सिस्टम संदिग्ध गतिविधियों को ट्रैक कर महज 10 मिलीसेकंड के भीतर उन्हें शूट करने में सक्षम होगा। हालांकि, अंतिम फैसला इसके ऑपरेटर यानी सेना के जवान के पास होगा, जो एक बंकर या ऑपरेशन पोस्ट से इसे कंट्रोल करेगा। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचा जा सके और टारगेट को सटीक रूप से निष्क्रिय किया जाए।

इजरायल और बाकी देशों से क्यों है बेहतर?

TAIWS प्रणाली को अन्य देशों की समान सिस्टम से अलग और अधिक एडवांस माना जा रहा है। इजरायल सहित कई देशों द्वारा विकसित किए गए ऐसे हथियारों की तुलना में भारतीय सेना का यह सिस्टम ज्यादा प्रभावी मानी जा रहा है क्योंकि इसमें सेकेंडरी कैमरा सिस्टम शामिल किया गया है। यह सिस्टम कम रोशनी और घने जंगलों में भी अपनी प्रभावशीलता बनाए रखेगा, जिससे सेना को आतंकियों को पकड़ने में अतिरिक्त मदद मिलेगी।

LoC पर पहली बार इस तरह का सिस्टम

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया सिस्टम भारतीय सेना के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकता है। इसे डेवलप करने वाले रक्षा अनुसंधान विशेषज्ञ, डॉ. आशीष डोगरा का कहना है कि यह वेपन सिस्टम भविष्य के युद्धों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि LoC पर पहली बार इस तरह का ऑटोमेटेड सर्विलांस एंड अटैक सिस्टम लागू किया जा रहा है, जिससे भारतीय सेना की कार्यक्षमता और ज्यादा प्रभावी होगी। उन्होंने यह भी बताया कि परीक्षण के दौरान पाया गया कि इस प्रणाली की पहली गोली का हिट प्रतिशत 100% रहा, जो इसकी सटीकता और विश्वसनीयता को साबित करता है।

AI सिस्टम की खासियत

  • ऑटोमैटिक ट्रैकिंग सिस्टम अपने AI सेंसर के जरिए हर छोटी-बड़ी गतिविधि को ट्रैक करेगा।
  • इसमें तुरंत निर्णय लेने की क्षमता है। यह संभावित घुसपैठिए की पहचान होते ही, यह सिस्टम तेजी से लक्ष्य को लॉक करेगा।
  • शुरुआती परीक्षणों में इसकी पहली गोली का हिट करने का प्रतिशत 100 फीसदी पाया गया।

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TAIWS की तैनाती भारतीय सेना के लिए एक ऐतिहासिक कदम मानी जा रही है। इसके जरिए सेना को LoC पर गश्त के दौरान होने वाले खतरों से बचाने में मदद मिलेगी और घुसपैठियों को तेजी से पहचान कर खत्म किया जा सकेगा। अब तक भारतीय सेना को सीमाओं पर लगातार चौकसी करनी पड़ती थी, जिसमें सैनिकों को कई जोखिम उठाने पड़ते थे। लेकिन इस नई प्रणाली से निगरानी और हमले की प्रक्रिया ऑटोमैटिक हो जाएगी, जिससे न केवल सैनिकों की सुरक्षा बढ़ेगी बल्कि दुश्मन के खिलाफ प्रतिक्रिया भी तेज और प्रभावी होगी।

घुसपैठ रोकने में मिलेगी कामयाबी

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह सिस्टम पाकिस्तान की सीमा पर हालात को पूरी तरह बदल सकता है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा घुसपैठ के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है, जिसके चलते सेना को हाई-टेक सिस्टम की जरूरत महसूस हो रही थी। LoC पर तैनात किए जाने के बाद यह प्रणाली उन आतंकियों को तुरंत ट्रैक कर सकेगी जो घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं या फिर घने जंगलों में छिपे हुए हैं। इससे सेना को कम समय में ज्यादा प्रभावी निर्णय लेने में मदद मिलेगी और घुसपैठ को रोकने में भी सफलता मिलेगी।

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सीमा पर खुद ही निगरानी करेगा यह सिस्टम

TAIWS प्रणाली को तैनात करने से भारतीय सेना को कई फायदे होंगे। सबसे पहला फायदा यह होगा कि सैनिकों को हर समय सीमा पर खड़े रहकर निगरानी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि यह सिस्टम खुद ही निगरानी करेगा और खतरे का पता चलते ही प्रतिक्रिया देगा। दूसरा, यह तकनीक आतंकियों की घुसपैठ को रोकने के लिए ज्यादा प्रभावी होगी क्योंकि यह तेजी से प्रतिक्रिया देगी और लक्ष्य को निष्क्रिय कर सकेगी। तीसरा, यह प्रणाली सेना के लिए युद्ध के मैदान में अधिक आधुनिकता लाएगी और उन्हें अधिक सुरक्षित रखेगी।

जवानों की नहीं जाएगी जान

भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इस प्रणाली को तैनात करने से सेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) अरुण मेहता ने कहा कि TAIWS प्रणाली एक क्रांतिकारी हथियार प्रणाली होगी और यह सेना को एक नई क्षमता प्रदान करेगी। उन्होंने कहा कि यह तकनीक न केवल LoC पर घुसपैठ को रोकने में मदद करेगी, बल्कि यह हमारे सैनिकों की सुरक्षा को भी सुनिश्चित करेगा।” क्योंकि इससे पहले, LoC पर सैनिकों को अपनी जान जोखिम में डालकर आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन करने पड़ते थे। लेकिन अब, AI आधारित यह सिस्टम न केवल इन ऑपरेशंस को सुरक्षित बनाएगा, बल्कि भारतीय सेना की आधुनिक युद्ध क्षमता को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।

भविष्य में कर सकेंगे अपग्रेड

TAIWS प्रणाली का एक और बड़ा फायदा यह है कि इसे भविष्य में और अधिक एडवांस बनाया जा सकता है। इसमें मशीन लर्निंग और AI के और अधिक एडवांस फीचर्स जोड़े जा सकते हैं, जिससे यह खुद ही तेजी से फैसले ले सके और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सके। इसके अलावा, इसे अन्य सुरक्षा एजेंसियों और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के साथ भी साझा किया जा सकता है ताकि अन्य संवेदनशील इलाकों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सके।

सेना ने इस सिस्टम को डेवलप करने के लिए एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है और यह पूरी तरह से आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत तैयार की गई है। इसका निर्माण पूरी तरह से देश में हुआ है और यह भारतीय रक्षा प्रणाली के स्वदेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारत की रक्षा तकनीकों को और मजबूती मिलेगी और देश की सुरक्षा को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

LCA Tejas Mk-1A Delay: तेजस की डिलीवरी में देरी पर ‘एक्टिव’ हुई सरकार, क्या प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए अपनाया जाएगा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल?

LCA Tejas Mk-1A Delay: Govt Steps In, Eyes Public-Private Partnership to Boost Production?

LCA Tejas Mk-1A Delay: हाल ही में बेंगलुरू एयरो इंडिया 2025 में एयर फोर्स चीफ मार्शल एपी सिंह ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के चेयरमैन डीके सुनील को LCA तेजस Mk-1A की डिलीवरी में हो रही देरी को लेकर नाराजगी जाहिर की थी। दोनों के बीच की यह बातचीत गलती से एक कैमरे में रिकॉर्ड हो गई औऱ सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। लेकिन लगता है कि एयर फोर्स चीफ की नाराजगी देख कर सरकार भी एक्टिव हो गई है। सरकार ने Mk-1A की डिलीवरी में हो रही देरी को लेकर तेजी से कदम उठाते हुए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। रक्षा मंत्रालय ने तेजस की डिलीवरी में हो रही देरी और उसके उत्पादन में तेजी लाने के लिए रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह को उस समिति का अध्यक्ष बनाया है, जो एक महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपेंगे।

LCA Tejas Mk-1A Delay: Govt Steps In, Eyes Public-Private Partnership to Boost Production?

रक्षा सूत्रों का कहना है कि रक्षा मंत्रालय ने इस देरी को गंभीरता से लिया है और इस मुद्दे को हल करने के लिए एक पांच-सदस्यीय समिति गठित की है। इस रिपोर्ट में तेजसका प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए सुझाव दिए जाएंगे। इसमें निजी कंपनियों को भी शामिल करने की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा ताकि प्रोडक्शन समय पर हो सके।

LCA Tejas Mk-1A Delay: तेजस की देरी क्यों बनी चिंता का कारण?

भारतीय वायुसेना पहले ही 2021 में 83 तेजस Mk-1A लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दे चुकी है, जिसकी कीमत 48,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसके अलावा, 97 और नए तेजस Mk-1A खरीदने की योजना भी बनाई जा रही है, जिनकी अनुमानित कीमत 67,000 करोड़ रुपये हो सकती है। हालांकि, पहले ऑर्डर किए गए विमानों की डिलीवरी अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। मार्च 2024 तक पहला विमान सौंपने का वादा किया गया था, लेकिन अब 2025 आ गया और एचएएल अभी तक पहला विमान देने में नाकाम रहा है।

बवायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में इस देरी पर कड़ी नाराजगी जताई थी। बेंगलुरु में हुए एयरो इंडिया 2025 शो के दौरान उन्होंने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उन्हें एचएएल पर कोई भरोसा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि एचएएल ने वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में गंभीरता नहीं दिखाई है।

LCA Tejas Mk-1A Delay: एचएएल चीफ ने दी थी ये सफाई?

एचएएल के चेयरमैन डीके सुनील ने इस आलोचना के जवाब में कहा कि “हम किसी बहस में नहीं पड़ना चाहते, हमारा पूरा ध्यान तेजस Mk-1A की डिलीवरी जल्द से जल्द करने पर है।” एचएएल का कहना है कि देरी की मुख्य वजह अमेरिकी कंपनी GE एयरोस्पेस की तरफ से F-404IN इंजन की सप्लाई में देरी और कुछ अन्य टेक्निकल सर्टिफिकेशन से जुड़ी दिक्कतें हैं। हालांकि, एचएएल ने यह भी स्पष्ट किया कि अब जल्द ही इंजन की सप्लाई शुरू हो जाएगी और कंपनी अगले साढ़े तीन सालों में 83 तेजस Mk-1A विमानों की डिलीवरी पूरी कर देगी।

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बता दें कि तेजस Mk-1A को भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल करना बेहद जरूरी है क्योंकि वर्तमान में वायुसेना को लड़ाकू विमानों की संख्या में कमी का सामना करना पड़ रहा है। कागजों पर भारतीय वायुसेना के पास 43 स्क्वाड्रन की जगह मात्र 31 स्क्वाड्रन हैं। हालांकि यह डाटा पांच साल पुराना है और उसके बाद से लगातार विमानों को बेड़े से रिटायर करने की प्रक्रिया जारी है। वहीं, सरकार की योजना अगले कुछ सालों में तेजस Mk-1, Mk-1A और Mk-2 मिलाकर करीब 350 विमानों को वायुसेना में शामिल करने की है।

LCA Tejas Mk-1A Delay: क्या है एचएएल की रणनीति?

एचएएल ने नासिक में एक नई प्रोडक्शन लाइन तैयार की है, जहां हर साल 8 तेजस Mk-1A लड़ाकू विमान बनाए जाएंगे। इसके अलावा, बेंगलुरु स्थित उत्पादन लाइन में हर साल 16 तेजस Mk-1A बनाए जाते हैं। इन दोनों प्लांट्स की क्षमता बढ़ाकर हर साल 24 लड़ाकू विमान तैयार करने की योजना बनाई जा रही है। इसके बावजूद, तेजस के प्रोडक्शन की रफ्तार को और तेज करने की जरूरत है ताकि वायुसेना की जरूरतों को पूरा किया जा सके। वहीं, सरकार अब इस प्रोजेक्ट में निजी कंपनियों को भी शामिल करने पर विचार कर रही है, ताकि उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जा सके। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, अगर एचएएल डिलीवरी तय समय पर नहीं कर पाता है, तो अन्य कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में शामिल किया जा सकता है।

एयर फोर्स चीफ बोले- इंतजार हुआ बेहद लंबा

हालांकि एयर चीफ मार्शल पहले भी तेजस का प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को अपनाने की बात कह चुके हैं। पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित 21वें सुब्रतो मुखर्जी सेमिनार ‘Atmanirbharta in Aerospace: Way Ahead’ में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा था कि भारत में फाइटर जेट्स के उत्पादन में तेजी लाने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को अपनाने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट अगर समय पर पूरा नहीं होता, तो उसकी उपयोगिता खत्म हो जाती है। उन्होंने कहा कि इंडियन एयरफोर्स को अपने बेड़े को मजबूत करने के लिए तेजस की सप्लाई जल्द से जल्द पूरी करनी होगी, लेकिन मौजूदा हालात में यह उम्मीद से काफी पीछे है। उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए डिफेंस सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देने और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर अधिक खर्च करने की जरूरत पर जोर दिया था।

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वायुसेना प्रमुख ने कहा था कि तेजस फाइटर जेट को भारतीय वायुसेना ने 2016 में अपने बेड़े में शामिल करना शुरू किया था, जबकि इसकी परिकल्पना 1984 में की गई थी। पहली उड़ान के 17 साल बाद इसे आधिकारिक रूप से इंडक्शन मिला। अब तक भारतीय वायुसेना के पास तेजस के केवल दो स्क्वाड्रन ही एक्टिव हैं, जबकि 83 तेजस MK-1A के ऑर्डर दिए जा चुके हैं। इसके अलावा, 97 और तेजस खरीदने की योजना पर काम किया जा रहा है। एयरफोर्स को अपनी जरूरतों के हिसाब से तेजस की डिलीवरी समय पर चाहिए, लेकिन उत्पादन में देरी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को इस चुनौती को हल करने के लिए अपने उत्पादन में तेजी लानी होगी और समयसीमा के भीतर फाइटर जेट्स की सप्लाई सुनिश्चित करनी होगी।

पूर्व चीफ ने भी की थी पीपीपी मॉडल की सिफारिश

वहीं मौजूदा एयर चीफ से पहले उनके पूर्ववर्ती रिटायर्ड एय़र चीफ मार्शल वीआर चौधरी भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत एलसीए की मैन्युफैक्चरिंग के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्शन लाइनें बनाने की सिफारिश कर चुके हैं। पिछले साल जोधपुर में वायुसेना की मल्टीनेशनल एयर एक्सरसाइज तरंग शक्ति के दूसरे फेज की समाप्ति पर प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए तत्कालीन एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने कहा था कि तेजस फाइटर जेट की सप्लाई में हो रही देरी को दूर करने के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्शन लाइनें बनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा था कि एचएएल को प्रोडक्शन बढ़ाने और तय समयसीमा पर विमानों की डिलीवरी करने के लिए समाधान खोजने में अहम भूमिका निभानी चाहिए।

बढ़ेंगी निर्यात की संभावनाएं!

वहीं अगर तेजस की मैन्युफैक्चरिंग में प्राइवेट सेक्टर को भी शामिल किया जाता है, तो डिफेंस प्रोडक्शन में शानदार बढ़त देखने को मिल सकती है। कुछ समय पहले ही मलेशिया, अर्जेंटीना और मिस्र जैसे देशों ने तेजस विमान में रुचि दिखाई थी। वायुसेना प्रमुख ने भी कहा है कि एचएएल को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाकर भारतीय वायुसेना की जरूरतों के साथ-साथ निर्यात के अवसरों को भी देखना चाहिए। क्योंकि अगर एचएएल इस मौके को गंवा देता है, तो यह न केवल भारतीय डिफेंस सेक्टर में उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करेगा, बल्कि अन्य देशों को तेजस निर्यात की संभावनाओं को भी कमजोर कर देगा।

China Radar: भारत के मिसाइल कार्यक्रम पर नजर रखने के लिए चीन ने लगाया पावरफुल रडार, 5,000 किलोमीटर तक है रेंज

China Radar: Powerful Surveillance System to Track India's Missile Program with 5,000 km Range

China Radar: चीन ने हाल ही में म्यांमार के नजदीक अपने युन्नान प्रांत में एक नया रडार स्टेशन स्थापित किया है। चीन ने यह नया ‘लार्ज फेज्ड अर्रे रडार’ (LPAR) सिस्टम भारत के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर नजर रखेगा। चीन इस रडार की मदद से बैलिस्टिक मिसाइलों की ट्रायल्स को ट्रैक करने में मदद करेगा। इस रडार की रेंज लगभग 5,000 किलोमीटर तक बताई जा रही है। इस रडार की मदद से चीन न केवल भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) बल्कि भारत के कई हिस्सों तक अपनी पहुंच बना सकता है।

China Radar: Powerful Surveillance System to Track India's Missile Program with 5,000 km Range

China Radar: कैसे काम करता है यह रडार और भारत के लिए क्यों है चिंता की बात?

युन्नान प्रांत में स्थित यह लार्ज फेज़्ड एरे रडार चीन की बैलिस्टिक मिसाइल अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का एक अहम हिस्सा है। यह भारत के पूर्वी तट से होने वाली मिसाइल परीक्षण गतिविधियों पर नजर रख सकता है। इस रडार के जरिए भारत के पूर्वी तट से लेकर बंगाल की खाड़ी और दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से तक सीधी निगरानी हो सकती है। भारत के प्रमुख मिसाइल परीक्षण केंद्र जैसे कि ओडिशा स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से छोड़ी जाने वाली अग्नि-5 और के-4 जैसी मिसाइलों की जानकारी इस रडार के माध्यम से चीन तक पहुंच सकती है। जिसका मतलब है कि भारत की मिसाइल परीक्षण कार्यक्रमों पर चीन की पैनी नजर रहेगी। बता दें कि भारत अपने अग्नि-5 और K-4 जैसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) के परीक्षण डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से करता है।

China Radar: युन्नान में रडार की लोकेशन क्यों है महत्वपूर्ण?

इस रडार की भौगोलिक स्थिति भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। युन्नान प्रांत, म्यांमार की सीमा के पास स्थित है। यह जगह चीन के दक्षिण-पश्चिमी इलाके में आती है और यहां से भारतीय महासागर तक चीन की सीधी निगरानी संभव हो जाती है। इसके अलावा चीन का यह रडार भारत के नौसैनिक मूवमेंट पर भी नजर रख सकता है। इस इलाके में ही भारत की परमाणु-सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (SSBNs) की तैनाती भी है। चीन इस रडार टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भारतीय मिसाइलों की रफ्तार, रेंज और अन्य जरूरी आंकड़ों को जुटाने के लिए कर सकता है, जिससे वह अपनी खुद के मिसाइल डिफेंस सिस्टम को और अधिक एडवांस बना सकता है।

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LPAR की क्या हैं खूबियां

चीन और भारत के बीच एलएसी पर लगातार तनाव बना हुआ है। हाल के कुछ सालों में चीन की सेना (PLA) ने खुद को काफी एडवांस किया है। इनमें LPAR जैसे मॉनिटरिंग सिस्टम्स की अहम भूमिका है। हालांकि इससे पहले भी चीन कोरला (शिंजियांग) में एक LPAR मॉनिटरिंग सिस्टम्स लगा चुका है। जिसकी मदद से चीन भारत के उत्तरी इलाकों पर नजर रखता है। अब युन्नान में नया रडार तैनात करने से चीन की नजर दक्षिण तक भी रहेगी।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के इस कदम से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। भारत लगातार अपने मिसाइल प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है। भारत पहले ही अग्नि-5 इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का सफल परीक्षण कर चुका है। इस मिसाइल की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है। इसके अलावा, भारत का हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

LPAR रडार की खासियत यह है कि इसमें हजारों छोटे एंटीना होते हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप से बीम को डायरेक्ट निर्देशित कर सकते हैं। यह सिस्टम बहुत ही तेजी से मिसाइल लॉन्च और अन्य एरियल एक्टिविटी को ट्रैक करने में सक्षम होती है। यह अमेरिकी ‘PAVE PAWS’ सिस्टम जैसी है, जो 5,600 किलोमीटर तक निगरानी कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा खतरे को भांपते हुए भारत को अपनी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है। भारत पहले से ही मिसाइल इंटरसेप्टर सिस्टम (Prithvi Air Defence – PAD और Advanced Air Defence – AAD) पर काम कर रहा है, जो 5,000 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलों को बीच में ही मार गिरा सकता है। इसके अलावा, भारत को अपनी साइबर सिक्योरिटी को भी एडवांस करना होगा क्योंकि चीन डिजिटल जासूसी में भी माहिर है। जिसे देखते हुए भारतीय मिसाइल प्रोग्राम और डिफेंस कम्यूनिकेशन सिस्टम को सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड रखना बेहद जरूरी है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को भी चीन पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट-बेस्ड मॉनिटरिंग सिस्टम सिस्टम को भी बेहद मजबूत करने की जरूरत है, ताकि चीन की हर हरकत पर नजर रखी जा सके।

EX DHARMA GUARDIAN: भारत-जापान के बीच जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज ‘धर्म गार्जियन’ शुरू, भारतीय सेना फुजी रवाना, जानें क्यों है यह महत्वपूर्ण?

EX DHARMA GUARDIAN: India-Japan Joint Military Exercise Begins, Indian Army Departs for Fuji

EX DHARMA GUARDIAN: भारतीय सेना का एक दल आज जापान के लिए रवाना हुआ। जहां वह भारत-जापान जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज ‘धर्म गार्जियन’ में हिस्सा लेगा। यह अभ्यास जापान के ईस्ट फुजी ट्रेनिंग एरिया में 24 फरवरी से 9 मार्च 2025 तक चलेगा। हर साल यह एक्सरसाइज भारत और जापान में बारी-बारी से होती है। पिछले साल यह राजस्थान में हुई थी।

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भारतीय दल में 120 सैनिक शामिल हैं, जिनमें मुख्य रूप से मद्रास रेजिमेंट के जवान होंगे। जापान की ओर से 34वीं इन्फैंट्री रेजिमेंट के सैनिक इस अभ्यास में हिस्सा लेंगे। कुल मिला कर भारत और जापान की सेनाओं के कुल 240 सैनिक भाग लेंगे।

इस अभ्यास का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना और आतंकवाद-रोधी अभियानों में एक साथ काम करने की क्षमता को मजबूत करना है। इसमें शारीरिक फिटनेस, जॉइंट प्लानिंग और टैक्टिकल एक्सरसाइजेज पर ध्यान दिया जाएगा।

अभ्यास के दौरान दोनों सेनाएं एक-दूसरे के साथ युद्ध की रणनीतियां साझा करेंगी। इसमें संयुक्त ड्रिल, युद्धाभ्यास और आपदा प्रबंधन की रणनीतियां भी शामिल होंगी। इसका मकसद सेनाओं की दक्षता बढ़ाना और उन्हें भविष्य के अभियानों के लिए तैयार करना है।

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यह अभ्यास भारतीय सेना प्रमुख की 14 से 17 अक्टूबर 2024 के बीच जापान यात्रा से जुड़े प्रयासों को आगे बढ़ाएगा और दोनों देशों के रक्षा सहयोग को मजबूत करेगा। ‘धर्म गार्जियन’ भारत और जापान के संबंधों को और मजबूत करेगा। यह क्षेत्रीय सुरक्षा, शांति और स्थिरता में योगदान देगा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देगा।

यह अभ्यास भारत और जापान के लंबे समय से चले आ रहे दोस्ताना और सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करेगा। इससे दोनों सेनाओं के बीच आपसी समझ बढ़ेगी और भविष्य में रक्षा सहयोग को नई दिशा मिलेगी।