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Cantonment Conspiracy: ‘सैनिक से फिक्शन राइटर’ बने पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे, बताया- देश को कब मिलेगी पहली महिला आर्मी चीफ!

Cantonment Conspiracy: Ex army chief General MM Naravane Debuts with Military Thriller Novel
Cantonment Conspiracy: A Soldier Turns Storyteller

Cantonment Conspiracy: भारतीय सेना के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की पहली किताब इन दिनों काफी चर्चा में है। हालांकि यह उनकी पहली किताब नहीं है। उनकी पहली किताब का नाम ‘Four Stars of Destiny’ था, जिसमें उन्होंने अपने सैन्य जीवन के संस्मरण साझा किए थे। लेकिन यह किताब बाजार में आने से पहले ही विवादों में फंस गई और अभी तक रक्षा मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार कर रही है। लेकिन उनकी पहली कितााब जो बाजार में आने वाली है, उसका नाम ‘Cantonment Conspiracy’ है, एक फिक्शनल मर्डर मिस्ट्री है, जो भारतीय सेना के एक कैंटोनमेंट पर बेस्ड है और 2026 की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस फिक्शनल कहानी में एनडीए की पहली महिला कैडेट बैच की बहादुर अधिकारी रेनुका खत्री मुख्य किरदार की भूमिका में हैं। किताब की लॉन्चिंग के दौरान उन्होंने एक दिलचस्प भविष्यवाणी भी की। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि 44 साल बाद भारत को एक महिला आर्मी चीफ मिले।

Cantonment Conspiracy: Ex army chief General MM Naravane Debuts with Military Thriller Novel
Cantonment Conspiracy: A Soldier Turns Storyteller

Cantonment Conspiracy: महिला अफसर के इर्द-गिर्द घुमती है कहानी

‘Cantonment Conspiracy’ की कहानी दो युवा सैन्य अधिकारियों लेफ्टिनेंट रोहित वर्मा और लेफ्टिनेंट रेणुका खत्री के इर्दगिर्द घूमती है, जिन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक शांत और पुराने छावनी क्षेत्र में तैनात किया गया है। यहां सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तभी एक मेस पार्टी में एक महिला अफसर पर हमला होता है। सारा शक रोहित पर जाता है, लेकिन रेणुका इस मामले की तह तक जाने की ठान लेती है। लेकिन जैसे-जैसे रेणुका तह तक जाती है, कहानी में नए रहस्य और एक मर्डर मिस्ट्री सामने आने लगती है। अब ये मामला सिर्फ एक हमले का नहीं, बल्कि एक छिपे हुए कातिल की तलाश का बन जाता है। ये कहानी ऐसी है, जो आपको हर पल सोचने पर मजबूर कर देती है कि आगे क्या होगा।

बताया- कैसे एक आर्मी चीफ लिख सकता है फिक्शन

हाल ही में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में जब जनरल नरवणे की नई किताब का विमोचन हुआ, तो वहां मौजूद लोगों में यह जानने की उत्सुकता थी कैसे एक सेना प्रमुख फिक्शन लिख सकता है? क्या कोई ऐसा जनरल, जिसने आतंक से लेकर युद्ध के मैदान तक रणनीति रची हो, अब एक मर्डर मिस्ट्री का लेखक भी बन सकता है? कार्यक्रम में खुद जनरल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हमेशा सीरियस और नॉन-फिक्शन क्यों लिखा जाए? कभी-कभी कुछ हल्का, रोमांटिक और मजेदार भी तो हो सकता है।” उन्होंने बताया कि हर इंसान के अंदर एक कहानी होती है। “मैं तो जिंदगी भर कहानियां सुनाता रहा हूं। ये किताब बस उसी का एक नया रूप है।” उनकी इस बात पर उनकी पत्नी वीणा नरवणे सहित सभी ने मुस्कुरा कर सहमति जताई।

सबके अंदर एक कहानी, बस लिखने का साहस चाहिए

जनरल नरवणे ने कहा, “मेरे जीवन के अनुभवों की कई परछाइयां इस किताब में दिखती हैं। हम सबके अंदर कोई कहानी होती है, बस उसे लिखने का साहस चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि फिक्शन की खूबी यह है कि आप बिना किसी जवाबदेही के उसमें अपनी कल्पना को खुली उड़ान दे सकते हैं। इस किताब में उनके उन अनुभवों की भी शामिल किया है, जो उन्होंने सेना में सेवा के दौरान मणिपुर, नागालैंड, जम्मू-कश्मीर जैसे अशांत इलाकों में अपनी पोस्टिंग के दौरान बिताए थे।

Cantonment Conspiracy: वास्तविक जीवन से चुने किरदार

जब उनसे यह पूछा गया कि किताब लिखने में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही, तो जनरल ने बताया कि कहानी का समय और किरदारों की रैंक को सही रखना आसान नहीं था, ताकि सब कुछ असली लगे। इसके अलावा, किरदारों के नाम चुनना भी एक टेढ़ी खीर था। जनरल नरवणे ने यह भी बताया कि किताब में इस्तेमाल हुए कई नाम और किरदार उनकी सैन्य सेवा के दौरान मिले लोगों के नाम से भी मेल खाते हैं। जैसे कि पुस्तक में कमांडेंट का नाम ‘मदन वर्मा’ है, जो उनके दो पुराने कमांडिंग ऑफिसर्स मदन दास और एनएम वर्मा के नामों से मिलते-जुलते हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा, “ना किसी को खुश करने का इरादा था, ना नाराज करने का।”

Cantonment Conspiracy: किताब के लिए कई बार गए थे अकादमी

दिलचस्प बात यह है कि जनरल नरवणे ने अपनी इस किताब की महिला नायिका के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी को रेखांकित करने की कोशिश है। बता दें कि जनरल नरवणे के कार्यकाल में ही सेना में महिलाओं की एंट्री को लेकर एतिहासिक पहल की गई थी। उन्होंने बताया कि इस फैसले में उन्होंने रिटायर्ड एयरफोर्स और नेवी चीफ रहे एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया और एडमिरल करमबीर सिंह की भी मदद ली। उन्होंने बताया, “हमने कई बार अकादमी का दौरा किया था यह देखने के लिए कि महिला कैडेट्स की ट्रेनिंग के लिए क्या-क्या तैयारियां हो रही हैं।”

Cantonment Conspiracy: Ex army chief General MM Naravane Debuts with Military Thriller Novel

संघर्ष की असली जड़ आर्थिक असमानता

हालांकि ‘Cantonment Conspiracy’ को एक फिक्शनल मिलिट्री थ्रिलर के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन इसकी परतों में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों की झलक भी मिलती है। चर्चित पत्रकार सुहास बोरकर और पत्रकार नीलांजना बनर्जी के साथ बातचीत में जनरल नरवणे ने स्वीकार किया कि किताब में रोजगार, बांग्लादेश में उभरते तनाव और सामाजिक विषमता जैसे मुद्दों को भी छुआ गया है। उन्होंने कहा, “सिर्फ बंदूक और वर्दी नहीं, संघर्ष की असली जड़ अक्सर आर्थिक असमानता और अवसरों की कमी होती है।”

कभी तख्तापलट में शामिल नहीं रही भारतीय सेना

इस दौरान जनरल नरवणे ने भारतीय सेना की लोकतांत्रिक परंपरा पर भी चर्चा की। उन्होंने इस बात पर गर्व जताया कि भारतीय सेना, उपमहाद्वीप की अन्य सेनाओं विशेषकर पाकिस्तान की सेना के उलट, कभी तख्तापलट में शामिल नहीं रही है। उन्होंने स्पष्ट कहा, “हमारी सेना अपने दायित्वों को जानती है और सरकार के आदेशों का पालन करती है।”

उन्होंने बताया कि मणिपुर, नागालैंड और जम्मू-कश्मीर जैसे उग्रवाद प्रभावित इलाकों में तैनाती के दौरान उन्होंने महसूस किया कि अधिकतर विवादों की तह में सामाजिक-आर्थिक असंतुलन छिपा होता है। उन्होंने कहा, “जब आप गहराई से अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि ज्यादातर अशांति की जड़ कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था से जुड़ी होती है।”

सम्मान के नाम पर गलत चीजों को छिपाना ठीक नहीं

जनरल नरवणे ने कहा, “मैं जानता हूं कि मेरी पहली किताब शायद मेरे नाम के कारण ज्यादा बिकेगी, लेकिन अगर लोगों को इसकी कहानी पसंद आती है तो मैं आगे और भी फिक्शन लिखने के लिए तैयार हूं, जरूरी नहीं कि वह मर्डर मिस्ट्री हो, वह एक कॉमेडी भी हो सकती है।” वहीं, किताब में फौजी अनुशासन, सम्मान और ईमानदारी की झलक भी पढ़ने को दिखती है। जनरल नरवणे ने कहा, “सम्मान के नाम पर गलत चीजों को छिपाना ठीक नहीं। सच को सामने लाना जरूरी है।”

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अपनी आत्मकथा ‘Four Stars of Destiny’ को लेकर कही ये बात

इस दौरान उनकी आत्मकथा ‘Four Stars of Destiny’ का जिक्र भी हुआ, जो अभी तक रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के इंतजार में है। जनरल नरवणे ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, “वो किताब तो पुरानी शराब की तरह है। जितना समय बीतेगा, उतनी कीमती होती जाएगी!”

कार्यक्रम के आखिर में जब एक छोटे बच्चे ने उनसे पूछा कि सेना में कैसे जाएं, तो जनरल नरवणे ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “खूब सब्जियां खाओ और मोबाइल से बाहर निकलकर मैदान में खेलो।” जनरल नरवणे ने यह भी कहा कि सेना में शामिल होने का फैसला दिल से होना चाहिए, न कि माता-पिता या दोस्तों के दबाव में।

Explainer: Star Wars वाला हथियार अब भारत के पास! Laser-DEW से पलभर में तबाह होंगे दुश्मन के ड्रोन-मिसाइल

Explained: What is India’s Laser-DEW System that Destroys Drones in Seconds?

Laser-DEW: आपने अगर स्टार वार्स मूवीज देखी होंगी तो फिल्मों में वो चमकते लाइटसेबर और अंतरिक्ष में लेजर की गोलियां भी याद होंगी, जो दुश्मनों को पल में खत्म कर देती थीं? साइंस फिक्शन फिल्मों में दिखने वाले लेजर हथियार अब हकीकत बन चुके हैं, और यह कमाल किया है भारत ने! अब भारत भी स्टार वार्स के हथियारों वाली कैटेगरी में शामिल हो गया है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने अपने एमके-दो (ए) लेजर-गाइडेड एनर्जी वेपन (DEW) का सफल परीक्षण किया है। यह हथियार ड्रोन, मिसाइल और छोटे प्रोजेक्टाइल को जेडी नाइट की तरह चुटकियों में बरबाद कर सकता है।

Explained: What is India’s Laser-DEW System that Destroys Drones in Seconds?

रविवार को पहली बार भारत ने अपने 30-किलोवाट लेजर-बेस्ड हथियार का शानदार टेस्ट किया। इस हथियार ने चुटकियों में ड्रोन, मिसाइल, स्वार्म ड्रोन और सेंसर को नष्ट कर दिया। इस कामयाबी के साथ भारत अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और इजरायल जैसे देशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है, जो स्टार वॉर्स जैसे हथियारों की दौड़ में हैं।

Laser-DEW: 3.5 किमी दूर ड्रोन को निशाना बनाया

13 अप्रैल को आंध्र प्रदेश के कुरनूल में नेशनल ओपन एयर रेंज (एनओएआर) में यह परीक्षण हुआ। यह कोई साधारण टेस्ट नहीं था, बल्कि मानो स्टार वॉर्स की गैलेक्सी में जंग का सीन हो! डीआरडीओ की टीम ने दिखाया कि उनका लेजर-डीईडब्ल्यू मार्क-II(ए) हथियार कितना ताकतवर है। इसने 3.5 किलोमीटर की दूरी पर उड़ रहे ड्रोन को निशाना बनाया, सात ड्रोनों के झुंड को नष्ट किया और ड्रोन व जमीन पर लगे निगरानी कैमरों व सेंसर को “ब्लाइंड” कर दिया।

Laser-DEW: कैसे काम करता है यह हथियार?

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि ये लेजर हथियार आखिर करता क्या है? हम सभी ने बचपन में टॉर्च की रोशनी देखी है, जो अंधेरे में एक जगह को रोशन कर देती है। लेकिन इस हथियार की रोशनी इतनी तेज और गर्म होती है कि यह ड्रोन या मिसाइल को पल में जला सकती है। जब रडार या इसके अपने सेंसर किसी टारगेट को पकड़ते हैं, तो यह हथियार उस पर लेजर की शक्तिशाली किरण छोड़ता है। यह किरणें टारगेट को ब्लाइंड कर देती हैं या उसे इतना नुकसान पहुंचाती हैं कि वह काम करना बंद कर देता है। और सबसे मजेदार बात? इसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, बिना किसी महंगे रॉकेट या गोली की जरूरत के। हमारे वैज्ञानिकों का कहना है कि इस हथियार को चलाने की लागत इतनी कम है कि इसे दो-तीन लीटर पेट्रोल जितने खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता है।

Laser-DEW: पूरी तरह से स्वदेशी हथियार

इस हथियार को डीआरडीओ के सेंटर फॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज (चेस), हैदराबाद ने बनाया है। इसमें कई दूसरी डीआरडीओ लैब्स, भारतीय उद्योगों और शिक्षण संस्थानों का भी योगदान रहा है। यह पूरी तरह स्वदेशी हथियार है। डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने कहा, “यह तो बस शुरुआत है। हम लेजर के अलावा माइक्रोवेव और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स जैसे हथियारों पर भी काम कर रहे हैं। ये तकनीकें हमें स्टार वार्स जैसी ताकत देंगी।”

क्यों है यह हथियार खास?

DRDO के मुताबिक, ये तकनीक ‘बीम किल’ पर आधारित है, यानि किसी भी लक्ष्य को भेदने के लिए कोई रॉकेट या मिसाइल नहीं, बल्कि प्रकाश की रफ्तार से चलने वाली लेज़र बीम का इस्तेमाल किया जाता है। पारंपरिक मिसाइलों और हथियारों को चलाने में लाखों रुपये खर्च होते हैं। लेकिन इस हथियार का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बेहद सस्ता पड़ता है, जितना खर्च दो लीटर पेट्रोल का है, उतने में दुश्मन का एक ड्रोन खत्म किया जा सकता है। यानी एक तरफ दुश्मन के पास कम लागत वाले ड्रोन हैं, और दूसरी तरफ भारत के पास उसे हराने के लिए कम खर्च वाली लेजर टेक्नोलॉजी।

इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें पारंपरिक मिसाइल या गोला-बारूद की तरह विस्फोट नहीं होता, न ही भारी खर्च होता है। इसमें सिर्फ ऊर्जा का उपयोग होता है और वह भी इतनी तेज़ कि एक बार टारगेट पर पड़ते ही उसका काम तमाम हो जाता है। आजकल सस्ते ड्रोन हमले एक बड़ा खतरा बन गए हैं। ऐसे में यह हथियार उनसे निपटने का सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका है। साथ ही, यह आसपास के इलाकों को नुकसान पहुंचाए बिना सटीक निशाना लगाता है, जिससे जानमाल की हिफाजत होती है।

डीआरडीओ के सेंटर फॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज (चेस) के वैज्ञानिक डॉ. बी.के. दास ने बताया कि यह तकनीक भविष्य की है। आजकल दुनिया में युद्ध का तरीका बदल रहा है। पहले जहां बड़े-बड़े टैंक और मिसाइलों की बात होती थी, अब छोटे-छोटे ड्रोन और उनके झुंड दुश्मनों के लिए सिरदर्द बन रहे हैं। ऐसे में यह लेजर हथियार हमारे लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह न सिर्फ सस्ता है, बल्कि इसे गाड़ियों पर लादकर कहीं भी ले जाया जा सकता है। यानी चाहे बॉर्डर हो या कोई और जगह, ये हथियार हमारी सेना के साथ तैयार रहेगा।

इसका बड़ा साइज है बड़ी चुनौती

हमारे वैज्ञानिकों के सामने अभी बड़ी चुनौती इसका बड़ा साइज है। अभी ये हथियार इतना बड़ा है कि इसे आसानी से हवाई जहाज या युद्धपोतों पर नहीं लगाया जा सकता। इसे और छोटा करने की कोशिशें की जा रही हैं, ताकि ये हर तरह की जंग में काम आ सके। इसके अलावा, डीआरडीओ अब और भी ताकतवर लेजर हथियार बनाने की योजना बना रहा है, जो 50 से 100 किलोवाट की ताकत के हों। साथ ही, वे एक और नई तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसे हाई-एनर्जी माइक्रोवेव कहते हैं।

भारतीय सेना के पास 23 ऐसे सिस्टम

फिलहाल भारतीय सेना के पास 2 किलोवॉट और 10 किलोवॉट क्षमता वाले करीब 23 ऐसे सिस्टम हैं, जिनकी मारक दूरी 1-2 किलोमीटर तक है। लेकिन अब जो नया Mk-II(A) सिस्टम तैयार हुआ है, वह इससे कहीं ज्यादा शक्तिशाली है। आने वाले 1 से डेढ़ साल में इसका यूजर ट्रायल शुरू किया जा सकता है, और DRDO इस तकनीक को भारतीय कंपनियों को सौंपने की प्रक्रिया में है ताकि इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर हो सके।

तेज बारिश या धुंध में नहीं कर सकते काम

इस तरह के लेजर हथियारों में कुछ देश हमसे काफी आगे हैं। मिसाल के तौर पर, दुनिया के कुछ ही देशों के पास यह तकनीक है — जैसे अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और इज़राइल। अमेरिका ने 60 किलोवॉट क्षमता वाली ‘Helios’ नामक लेज़र प्रणाली को अपनी युद्धपोतों पर तैनात किया है, जिसे 120 किलोवॉट तक बढ़ाया जा सकता है। वहीं इज़राइल भी अपनी ‘Iron Beam’ प्रणाली को अंतिम रूप दे रहा है, जिसकी रेंज 10 किलोमीटर है।

अब आप सोच रहे होंगे कि ये लेजर हथियार इतने कमाल के हैं, तो इन्हें अभी तक हर जगह क्यों नहीं इस्तेमाल किया जा रहा? इसका जवाब है कि अभी इनमें कुछ कमियां भी हैं। मिसाल के तौर पर, ये हथियार पारंपरिक हथियारों जितनी दूरी तक मार नहीं कर सकते। साथ ही, अगर मौसम खराब हो जैसे तेज बारिश या धुंध, तो इनका असर कम हो सकता है। लेकिन हमारे वैज्ञानिक इन कमियों को दूर करने में जुटे हैं। DRDO का कहना है कि जैसे-जैसे तकनीकी प्रगति होगी, वैसे-वैसे इन चुनौतियों को भी दूर कर लिया जाएगा। नई तकनीक जैसे बीम स्टीयरिंग और अडैप्टिव ऑप्टिक्स इस दिशा में मदद करेंगी।

नए एयरो इंजन पर काम कर रहा है DRDO

डीआरडीओ सिर्फ इस हथियार तक सीमित नहीं है। डॉ. कामत ने भारत के पहले पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमान, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) के बारे में भी बताया। इस विमान को तैयार होने में 10-15 साल लग सकते हैं। यह प्रोजेक्ट 2024 में शुरू हुआ है और 2035 तक इसके तैयार होने की उम्मीद है। इसके अलावा, डीआरडीओ एक नए एयरो इंजन प्रोग्राम पर काम कर रहा है, जो छठी पीढ़ी की तकनीक पर आधारित होगा। इसके लिए भारत किसी विदेशी कंपनी के साथ साझेदारी की योजना बना रहा है।

VSHORADS: DRDO का यह नया एयर डिफेंस सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट को पलक झपकते ही कर देगा तबाह, ये हैं खूबियां

इसके अलावा DRDO के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने यह भी बतााया, “कई प्रोजेक्ट अब मैच्योरिटी की ओर बढ़ रहे हैं। अगले छह महीने से एक साल के भीतर VSHORAD, MPATGM, LCA Mark II जैसे कई सिस्टम्स का इंडक्शन शुरू हो जाएगा। LCA Mark II की पहली उड़ान भी इस अवधि में होने की उम्मीद है।”

उनके मुताबिक, DRDO की कई बड़ी तकनीकों और प्रणालियों को जल्द भारतीय सेना के इस्तेमाल के लिए तैनात किया जाएगा, जिससे देश की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को नई मजबूती मिलेगी।

41 Years of Operation Meghdoot: अगर 2006 में UPA सरकार सियाचिन से पीछे हट जाती, तो आज लद्दाख के दरवाजे पर होते चीन-पाकिस्तान!

41 years of Operation meghdoot: what if upa quit siachen in 2006

41 Years of Operation Meghdoot: 41 साल पहले, 13 अप्रैल 1984 को भारत ने ऑपरेशन मेघदूत (Operation Meghdoot) के तहत दुनिया के सबसे ऊंचे और ठंडे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर (Siachen Glacier) पर कब्जा किया था। 2006 में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान सियाचिन से भारतीय सेना को पीछे हटाने की बातें सामने आई थीं (Indian Army Withdrawal Proposal 2006)। उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता चल रही थी, और सियाचिन को डी-मिलिटराइज करने का प्रस्ताव (Demilitarisation Proposal Siachen) चर्चा में था। हालांकि, यह कदम नहीं उठाया गया। आज, जब सियाचिन के आसपास चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां (China’s Military Activities Near Siachen) भारत के लिए एक नई चुनौती बन गई हैं, यह सवाल फिर से उठ रहा है कि अगर 2006 में भारत सियाचिन से पीछे हट जाता, तो आज की स्थिति क्या होती? क्या यह कदम सही होता, या भारत के लिए एक रणनीतिक भूल (Strategic Mistake India) साबित होता? विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र अब केवल भारत-पाकिस्तान के बीच की लड़ाई का मैदान नहीं रहा, बल्कि चीन की रणनीतिक चालों ने इसे एक त्रिकोणीय संघर्ष का केंद्र (India China Pakistan Military Triangle) बना दिया है।

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41 Years of Operation Meghdoot: सियाचिन का इतिहास

सियाचिन ग्लेशियर, जो हिमालय की कराकोरम पर्वत श्रृंखला में 76 किलोमीटर लंबाई में फैला हुआ है, अपनी कठिन जलवायु और ऊंचाई के कारण हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र रहा है। यह ग्लेशियर 20,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस नीचे तक चला जाता है। इसके बावजूद, भारत और पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखी है। हालांकि पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर पर नहीं है, बल्कि वह साल्टोरो रिज से नीचे है। साल्टोरो रिज सियाचिन ग्लेशियर के पश्चिम में एक प्राकृतिक अवरोधक की तरह है, जो भारत को पाकिस्तान और चीन से अलग करती है। यह रिज करीब 110 किलोमीटर तक फैली हुई है और इसकी सबसे ऊंची चोटी बिलाफोंड ला (17,880 फीट) है। यह रिज लद्दाख के डेपसांग मैदानों और शक्सगाम घाटी के बीच एक रणनीतिक ढाल की तरह काम करती है। शक्सगाम घाटी, जिसे 1963 में पाकिस्तान ने अवैध रूप से चीन को सौंप दिया था, अब चीन इस क्षेत्र में सड़कें और सैन्य ढांचा बना रहा है।

सियाचिन का भू-राजनीतिक संदर्भ

1949 के कराची समझौते और 1972 के शिमला समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) तय की गई थी। लेकिन सियाचिन के इलाके पर कोई फैसला नहीं हुआ, क्योंकि यह इलाका नो मेंस लैंड था। 1949 के कराची समझौते के बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को NJ 9842 तक परिभाषित किया गया था। लेकिन NJ 9842 से आगे, सियाचिन ग्लेशियर तक का इलाका अस्पष्ट था। इस समझौते में कहा गया था कि एलएसी NJ 9842 से “उत्तर की ओर ग्लेशियरों की ओर” जाएगी, लेकिन इसे स्पष्ट रूप से चिह्नित नहीं किया गया। 80 के दशक में पाकिस्तान ने यहां पर सैन्य गतिविधियां शुरू कीं। पाकिस्तान ने सियाचिन को अपने नक्शों में दिखाना शुरू कर दिया और विदेशी पर्वतारोहियों को इस क्षेत्र में जाने की अनुमति दी। 1980 तक, यह साफ हो गया कि पाकिस्तान सियाचिन पर कब्जा करने की योजना बना रहा है। उसने इस क्षेत्र में गश्त बढ़ा दी और जापानी पर्वतारोहियों को सियाचिन के रास्ते में मदद करने के लिए अपनी सेना को तैनात किया। यह भारत के लिए खतरे की घंटी थी।

Operation Zafran: बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भारत ने शुरू किया था ये टॉप-सीक्रेट मिलिट्री ऑपरेशन, पाकिस्तान को कर दिया था नजरबंद

कैसे शुरू हुआ ऑपरेशन मेघदूत?

1983 तक, भारतीय खुफिया एजेंसियों ने सियाचिन में पाकिस्तान की गतिविधियों पर नजर रखना शुरू कर दिया था। रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) और भारतीय सेना की खुफिया इकाइयों ने पाया कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में सैन्य चौकियां बनाने की योजना बनाई है। यह भी पता चला कि पाकिस्तान ने यूके और जर्मनी से सियाचिन के लिए विशेष पर्वतारोहण और सैन्य उपकरण खरीदे थे। पाकिस्तान की योजना थी कि वह सियाचिन के साल्टोरो रिज पर कब्जा कर ले, जो इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा और रणनीतिक हिस्सा है।

इसके जवाब में, भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत की योजना बनाई। इस ऑपरेशन का नेतृत्व लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून ने किया, जो उस समय 15 कोर के कमांडर थे। योजना यह थी कि भारत पाकिस्तान से पहले सियाचिन में अपनी स्थिति मजबूत कर ले और साल्टोरो रिज पर कब्जा कर ले। इस ऑपरेशन में चौथी बटालियन ऑफ कुमाऊं रेजिमेंट और लद्दाख स्काउट्स को मुख्य भूमिका दी गई। इसके अलावा, भारतीय वायु सेना (IAF) ने भी इस ऑपरेशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बड़ा फैसला लेते हुए ऑपरेशन मेघदूत शुरू करके सियाचिन पर नियंत्रण हासिल कर लिया। ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत 13 अप्रैल 1983 को हुई, हालांकि इसकी तैयारी कई महीनों से चल रही थी। भारतीय सेना ने सबसे पहले सियाचिन के मुख्य दर्रों बिलाफोंड ला और सिया ला पर कब्जा करने की योजना बनाई। लेकिन इस ऑपरेशन को अंजाम देना आसान नहीं था। सियाचिन में तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है, और ऑक्सीजन की कमी के कारण सैनिकों को ऊंचाई से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

भारतीय वायु सेना ने चीता और मिग-29 हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल करके सैनिकों और जरूरी सामान को सियाचिन तक पहुंचाया। सैनिकों को विशेष रूप से ट्रेनिंग दी गई ताकि वे इस कठिन इलाके में लड़ सकें। 13 अप्रैल 1983 को, भारतीय सेना ने बिलाफोंड ला पर कब्जा कर लिया और वहां तिरंगा फहराया। इसके बाद, सिया ला और अन्य महत्वपूर्ण चोटियों पर भी भारत ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली।

1984 में ऑपरेशन मेघदूत के बाद से भारत ने सियाचिन में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है। लेकिन इसकी कीमत भी भारी रही है। ठंड, हिमस्खलन और ऊंचाई से संबंधित बीमारियों के कारण हर साल कई सैनिक अपनी जान गंवा देते हैं। 2006 में, यूपीए सरकार ने सियाचिन को डी-मिलिटराइज करने की संभावना पर विचार किया था, ताकि दोनों देशों के सैनिकों की जान बचाई जा सके और भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वास बहाली हो सके।

2006 में पीछे हटने का प्रस्ताव

2006 में, भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता के दौरान सियाचिन से सैन्य वापसी का विचार सामने आया था। उस समय यूपीए सरकार में तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच इस मुद्दे पर बातचीत हुई थी। प्रस्ताव था कि दोनों देश सियाचिन से अपनी सेनाओं को हटाएं और इसे एक डी-मिलिटराइज्ड जोन घोषित करें। लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञों और सेना के अधिकारियों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनकी दलील थी कि सियाचिन से पीछे हटने का मतलब होगा इस रणनीतिक क्षेत्र को पाकिस्तान और अप्रत्यक्ष रूप से चीन के लिए खोल देना।

भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह का कहना है कि 1984 में जब पाकिस्तान ने सियाचिन पर कब्जे की योजना बनाई, तो भारतीय सेना ने उससे पहले ही ऑपरेशन मेघदूत के तहत इस रणनीतिक ग्लेशियर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उन्होंने कहा, “हमने श्योक नदी के पास की ऊंची चोटियों को अपने कब्जे में लेकर पाकिस्तान की योजना को पूरी तरह नाकाम किया।” उनके मुताबिक, यह एक ऐसा रणनीतिक क्षेत्र है जो भारत को पाकिस्तान और चीन के बीच की कड़ी को तोड़ने का सामरिक लाभ देता है।

जनरल सिंह ने पुष्टि की कि 2006 में भारत और पाकिस्तान के बीच इस मुद्दे पर बातचीत चल रही थी, लेकिन भारतीय सेना ने सख्त विरोध जताया। “मैंने उस समय NSA एमके नारायणन को स्पष्ट कहा था कि जब तक पाकिस्तान नक्शे पर हमारी स्थिति को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं देता, हम पीछे नहीं हट सकते।”

उन्होंने यह भी कहा कि अगर सेना ने दृढ़ रुख न अपनाया होता, तो राजनीतिक दबाव के आगे घुटने टेकना पड़ता। उन्होंने कहा, “मैंने खुद इस इलाके में खून बहाया है, मैं जानता हूं कि सियाचिन हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। यह कोई बर्फीला बंजर इलाका नहीं, बल्कि भारत की सामरिक शक्ति का प्रतीक है।”

वहीं, रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड मेजर जनरल विवेक अस्थाना कहते हैं, “2006 में सियाचिन से पीछे हटना एक बड़ी रणनीतिक भूल होती। सियाचिन भारत के लिए एक रक्षात्मक ढाल की तरह है। अगर हम उस समय पीछे हट जाते, तो आज चीन और पाकिस्तान की साझेदारी को देखते हुए हमारी स्थिति बहुत कमजोर हो जाती। सल्टोरो रिज पर हमारा नियंत्रण ही हमें इस क्षेत्र में बढ़त देता है।”

चीन की बढ़ती दखलअंदाजी

2025 में सियाचिन के आसपास की स्थिति पहले के मुकाबले ज्यादा से कहीं ज्यादा जटिल हो गई है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने सियाचिन के पास शक्सगाम घाटी और डेपसांग मैदानों में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं। 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए हिंसक संघर्ष के बाद से भारत अब चीन को लेकर सचेत है। चीन ने कराकोरम राजमार्ग के जरिए इस इलाके में अपनी पहुंच बढ़ाई है, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का हिस्सा है। यह राजमार्ग पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है, जिसे भारत अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है। भारत ने हमेशा से सीपीईसी का विरोध किया है। लेकिन अब, सियाचिन के पास चीन की सड़क और बुनियादी ढांचे के निर्माण ने भारत की चिंताएं और बढ़ा दी हैं।

भारत के सामने क्या है चुनौती?

सियाचिन में भारत की स्थिति मजबूत है। सियाचिन के पूर्वी हिस्से में लद्दाख के डेपसांग मैदानों में भारतीय सेना और चीन की पीएलए दोनों आमने सामने हैं। डेपसांग में डीबीओ (दौलत बेग ओल्डी) सड़क, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, इस पर चीन की नजर है। इसके अलावा, सियाचिन के पश्चिम में पीओके में पाकिस्तान की सेना और चीन की सैन्य सहायता ने भारत के लिए खतरे को और बढ़ा दिया है।

भारत ने सियाचिन में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। भारतीय सेना ने सल्टोरो रिज पर अपनी चौकियां स्थापित की हैं और वहां टैंक, तोपें और अन्य हथियार तैनात किए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सियाचिन में सैन्य उपस्थिति बनाए रखना बेहद महंगा और जोखिम भरा है। ठंड, हिमस्खलन और ऊंचाई से संबंधित बीमारियों के कारण हर साल कई सैनिक अपनी जान गंवा देते हैं। ऐसे में, भारत को अपनी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है।

पाकिस्तान को हो जाता ये फायदा

वहीं, 2006 में अगर भारत सियाचिन से पीछे हट जाता, तो सबसे पहला और तात्कालिक लाभ पाकिस्तान को होता। सियाचिन पर भारत का नियंत्रण 1984 से ही पाकिस्तान के लिए एक चुनौती रहा है। साल्टोरो रिज पर भारत की पकड़ ने पाकिस्तान को इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने से रोक रखा है। भारत की वापसी के बाद, पाकिस्तान तुरंत साल्टोरो रिज पर कब्जा कर लेता, जिससे उसे सियाचिन ग्लेशियर का ज्यादातर हिस्सा अपने नियंत्रण में लेने का मौका मिल जाता, जो पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक जीत होती।

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) अनुपम कुमार कहते हैं, “सियाचिन से भारत की वापसी पाकिस्तान के लिए एक सुनहरा मौका होती। वे साल्टोरो रिज पर कब्जा कर लेते और सियाचिन को अपने नियंत्रण में ले लेते। इससे उनकी स्थिति मजबूत होती और भारत के लिए एक नया सैन्य खतरा पैदा होता।”

पाकिस्तान इस क्षेत्र का इस्तेमाल भारत के खिलाफ घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए भी कर सकता था। सियाचिन के पास से गुजरने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर उसकी पकड़ मजबूत हो जाती, जिससे भारत के लिए इस क्षेत्र में निगरानी और रक्षा करना मुश्किल हो जाता।

क्या लद्दाख पर हो जाता चीन का कब्जा?

सियाचिन से भारत की वापसी का सबसे बड़ा लाभ चीन को होता। सियाचिन के पश्चिम में शक्सगाम घाटी में चीन को अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का मौका मिल जाता। साल्टोरो रिज पर पाकिस्तान का कब्जा अप्रत्यक्ष रूप से चीन के लिए फायदेमंद होता, क्योंकि पाकिस्तान और चीन की सैन्य साझेदारी पहले से ही मजबूत है।

2024 में सैटेलाइट इमेज से पता चला कि चीन ने हाइवे G219 से एक सड़क बनाई है, जो सियाचिन ग्लेशियर के उत्तरी हिस्से से महज 50 किलोमीटर दूर तक जाती है। अगर भारत सियाचिन से हट जाता, तो चीन इस सड़क को और आगे बढ़ाकर सियाचिन तक अपनी पहुंच बना लेता। इससे चीन को लद्दाख और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) सड़क तक सीधा रास्ता मिल जाता, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

सैन्य विशेषज्ञ प्रोफेसर मोहम्मद रिजवान कहते हैं, “सियाचिन से भारत की वापसी चीन के लिए एक रणनीतिक जीत होती। वे सियाचिन के जरिए लद्दाख में अपनी सैन्य पकड़ मजबूत कर लेते। इससे भारत की पूरी उत्तरी सीमा खतरे में पड़ जाती।” चीन इस क्षेत्र का इस्तेमाल भारत को घेरने के लिए भी कर सकता था। सियाचिन के पास कराकोरम राजमार्ग, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का हिस्सा है, पहले से ही चीन की सैन्य और आर्थिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सियाचिन पर नियंत्रण के बाद, चीन इस राजमार्ग को और प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकता था, जिससे भारत के लिए एक नया सैन्य खतरा पैदा होता।

वह कहते हैं, “सियाचिन से पीछे हटना भारत के लिए आत्मघाती कदम होता। चीन और पाकिस्तान की साझेदारी को देखते हुए, सियाचिन हमारी रक्षा की पहली पंक्ति है। अगर हम 2006 में पीछे हट जाते, तो आज चीन कराकोरम पास से लद्दाख तक अपनी सैन्य चौकियां बना चुका होता। यह भारत की संप्रभुता के लिए एक बड़ा झटका होता।” उनका कहना है कि सियाचिन में भारत की सैन्य उपस्थिति भले ही महंगी हो, लेकिन यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। 2006 में पीछे हटने का फैसला हमें आज एक ऐसी स्थिति में ला सकता था, जहां हमारी रक्षा की पहली पंक्ति ही टूट जाती।

General Zorawar Singh: हिमालय के हीरो को भारतीय सेना ने किया याद, बताया- कैसे पहाड़ों में लड़ा युद्ध और सिखाया माउंटेन वॉरफेयर का पाठ

General Zorawar Singh: Indian Army salutes the mountain war hero who defined high-altitude warfare

General Zorawar Singh: करीब दो सौ साल पहले, 1841 में, जब डोगरा सेनापति जनरल जोरावर सिंह (General Zorawar Singh) ने तिब्बत (Tibet) की ओर अपना साहसिक सैन्य सफर शुरू किया था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि उनकी यह गाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। उसी विरासत को याद करने के लिए भारतीय सेना (Indian Army) ने दिल्ली कैंट (Delhi Cantt) स्थित मानेकशॉ सेंटर (Manekshaw Centre) में एक अहम संगोष्ठी आयोजित की। जिसमें उनकी वीरता और हिमालय (Himalayas) की ऊंचाइयों में लड़ी गई लड़ाइयों को याद किया।

General Zorawar Singh: Indian Army salutes the mountain war hero who defined high-altitude warfare

“जनरल जोरावर सिंह: अप, क्लोज एंड पर्सनल,” कार्यक्रम को जम्मू-कश्मीर राइफल्स (Jammu and Kashmir Rifles) और सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज (Centre for Land Warfare Studies – CLAWS) ने मिलकर आयोजित किया। इसमें उन कहानियों की याद ताजा की गई, जब जनरल जोरावर सिंह (Zorawar Singh Legacy) ने हिमालय के दुर्गम रास्तों पर अपने साहस और सूझबूझ से इतिहास रचा था। और कैसे अपनी रणनीतियों के जरिए भारतीय सेना के लिए माउंटेन वॉरफेयर (Mountain Warfare India) की नींव रखी, जिसका प्रभाव आज भी सेना में देखने को मिलता है।

General Zorawar Singh ने बढ़ाईं डोगरा राज्य की सीमाएं 

जनरल जोरावर सिंह का सैन्य सफर केवल तिब्बत (Tibet Expedition 1841) तक सीमित नहीं था। वर्ष 1834 में उन्होंने लद्दाख (Ladakh History) पर जीत हासिल करके डोगरा राज्य की सीमाएं बढ़ाईं। यह इलाका उस समय सिख साम्राज्य का हिस्सा था, जिसका मुख्यालय लाहौर में था। कुछ साल बाद, 1839 में, उन्होंने डोगरा राजा गुलाब सिंह तथा लाहौर दरबार की सहमति से बाल्टिस्तान (Baltistan Campaign) में सैन्य अभियान शुरू किया।

फरवरी 1840 तक जोरावर सिंह की सेनाएं बाल्टिस्तान में घुस चुकी थीं, जहां अहमद शाह का शासन था। बेहद मुश्किल जंग के बाद डोगरा सेना ने जून तक स्कार्दू और उसके आसपास की घाटियों पर कब्जा कर लिया। यह जीत आसान नहीं थी। कठिन मौसम, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और दुश्मन की सेना के सामने डोगरा सैनिकों ने हार नहीं मानी। जोरावर सिंह का नेतृत्व ऐसा था कि हर सैनिक में जीत का जुनून था।

इसके बाद अप्रैल 1841 में, जनरल जोरावर सिंह ने तिब्बत की ओर कूच किया। सितंबर तक उनकी सेना नेपाल की उत्तर-पश्चिमी सीमा तक पहुंच गई थी। यह वह समय था जब अंग्रेज हुकूमत भी घबरा गई थी। उन्हें डर था कि जोरावर सिंह की सेना ल्हासा तक पहुंच सकती है। अक्टूबर 1841 में ब्रिटिश सरकार ने लाहौर दरबार को पत्र लिखकर जोरावर सिंह की सेना को तिब्बत से वापस बुलाने को कहा। आखिरकार, 10 दिसंबर 1841 को डोगरा सेना को तिब्बत से लौटना पड़ा। यह वह क्षण था, जिसने जोरावर सिंह के ल्हासा तक पहुंचने के सपने को रोक दिया। दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजों ने खुद 1904 में ल्हासा पर कब्जा किया था, लेकिन तीन साल बाद उन्हें भी पीछे हटना पड़ा।

इन ऐतिहासिक अभियानों ने केवल डोगरा राज्य की सीमाएं नहीं बढ़ाईं, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में भारतीय सैन्य रणनीति और प्रशासनिक व्यवस्था की नींव भी रखी। यही वजह है कि आज भारतीय सेना जनरल ज़ोरावर सिंह को ‘हाई-ऑल्टीट्यूड वॉरफेयर’ (High Altitude Warfare) का अग्रदूत मानती है, जिसका असर आज के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की सीमाओं में देखा जा सकता है।

इस खास मौके पर भारतीय सेना के प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे। उन्होंने कार्यक्रम में दो किताबों का विमोचन भी किया। पहली किताब, “द वॉरियर गोरखा,” मधुलिका थापा ने लिखी है, जो परम वीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा (1962 भारत-चीन युद्ध) की बेटी हैं। धन सिंह थापा को 1962 के भारत-चीन युद्ध में वीरता के लिए यह सम्मान मिला था। दूसरी पुस्तक “ए कश्मीर नाइट एंड द लास्ट 50 इयर्स ऑफ द प्रिंसली स्टेट ऑफ जम्मू एंड कश्मीर” को रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल घनश्याम सिंह कटोच ने लिखा है।

संगोष्ठी में जम्मू-कश्मीर राइफल्स और लद्दाख स्काउट्स के रिटायर्ड और पूर्व सैनिकों के अलावा कई सैन्य विशेषज्ञ और शिक्षाविद भी शामिल हुए। उन्होंने ज़ोरावर सिंह की सैन्य रणनीतियों, खासतौर से ऊंचाई वाले इलाकों में युद्ध के कौशल पर विस्तृत से चर्चा की। और बताया कि कैसे उनकी रणनीतियां आज भी भारतीय सेना की माउंटेन वॉरफेयर (Indian Army Mountain Warfare) की बुनियाद हैं।

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कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने जोरावर सिंह की कहानियों को सुनकर उनके साहस और दूरदर्शिता की तारीफ की। यह सिर्फ एक सैन्य कमांडर की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी शख्सियत की गाथा थी, जिसने मुश्किल हालात में भी हार नहीं मानी। आज, जब भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control – LAC) पर तनाव की बात होती है, जोरावर सिंह की रणनीतियां और हिमालय में उनकी जीत हमें याद दिलाती हैं कि साहस और सूझबूझ से हर चुनौती का सामना किया जा सकता है।

आज जब सीमा पर हालात लगातार बदल रहे हैं और वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक समीकरण नए आकार ले रहे हैं, तो ऐसे में ज़ोरावर सिंह की विरासत को याद करना केवल इतिहास को सम्मान देना नहीं है, बल्कि भविष्य की तैयारी भी है। उनका जीवन इस बात का प्रतीक है कि एक व्यक्ति भी यदि निष्ठा, पराक्रम और उद्देश्य से भरपूर हो, तो वह पूरे इलाके की दिशा बदल सकता है। भारतीय सेना का यह आयोजन इसी सोच का विस्तार है – बीते कल से प्रेरणा लेते हुए, आने वाले कल को सुरक्षित और सशक्त बनाना।

HAL ALH Crash: ध्रुव हेलीकॉप्टर हादसे पर HAL की सफाई, सोशल मीडिया पर फैली ‘झूठी खबरों’ को बताया भ्रामक और एकतरफा

HAL ALH Crash: Hindustan Aeronautics Slams False Reports, Clarifies on Dhruv Helicopter Accident

HAL ALH Crash: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने शुक्रवार को एक अहम बयान जारी कर उन तमाम रिपोर्ट्स को “भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण” बताया जो जनवरी में इंडियन कोस्ट गार्ड के एक एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर ध्रुव (ALH) के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद से लगातार सोशल मीडिया, ब्लॉग्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर सामने आ रही हैं। कंपनी ने कहा है कि कुछ लोग बिना सच्चाई जाने उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं।

HAL ALH Crash: Hindustan Aeronautics Slams False Reports, Clarifies on Dhruv Helicopter Accident

HAL ALH Crash: हाल के हालात नहीं हैं ठीक

पिछले कुछ महीनों से एचएएल के लिए हालात थोड़े मुश्किल रहे हैं। जनवरी में तटरक्षक बल का एक ध्रुव हेलीकॉप्टर पोरबंदर के पास क्रैश (HAL ALH Crash) हो गया था। यह हेलीकॉप्टर एचएएल ने बनाया था, और इसके बाद से ही कंपनी पर सवाल उठने शुरू हो गए। कुछ लोग, जो खुद को रक्षा विशेषज्ञ या पुराने सैन्य अधिकारी बताते हैं, उन्होंने बिना पूरी जानकारी के लेख और ब्लॉग लिखे। इनमें कहा गया कि एचएएल के हेलीकॉप्टरों में खामियां हैं, और पुरानी समस्याएं अभी तक ठीक नहीं हुईं।

एचएल का यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब कई पूर्व पायलट, रिटायर्ड सैन्य अधिकारी और कथित रक्षा विश्लेषक हादसे को लेकर अलग-अलग तरह के दावे कर रहे हैं। कंपनी का कहना है कि ये दावे न केवल तथ्यहीन हैं, बल्कि एचएएल का पक्ष लिए बिना एकतरफा लिखे जा रहे हैं। एचएएल के अनुसार, इन रिपोर्टों में कई पुरानी और सुलझ चुकी तकनीकी बातों को फिर से उछाला जा रहा है, जबकि असलियत यह है कि इन समस्याओं को पहले ही हल किया जा चुका है।

HAL ALH Crash: कंपनी ने दिया स्पष्टीकरण

कंपनी ने अपने स्पष्टीकरण में लिखा है, “ALH दुर्घटना के बाद कुछ प्लेटफॉर्म्स पर HAL को लेकर जो कहानियां गढ़ी गई हैं, वे पूरी तरह से अनुमान और दुर्भावनापूर्ण इरादों पर आधारित हैं। इन लेखों में हमारे नजरिए को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। लेखन एकतरफा है और तथ्यों की बजाय राय आधारित है। कई मुद्दे जो अब पुराने हो चुके हैं, उन्हें फिर से उठाकर HAL को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।”

HAL ने यह भी स्पष्ट किया कि वह हर एक रिपोर्ट का व्यक्तिगत तौर पर जवाब नहीं दे सकती क्योंकि रक्षा क्षेत्र से जुड़े मामलों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए जवाबदेही सीमित होती है। लेकिन कंपनी ने भरोसा दिलाया कि वह भारतीय वायुसेना समेत सभी ग्राहकों के साथ मिलकर हर तकनीकी और रणनीतिक चुनौती का समाधान निकाल रही है। HAL ने दोहराया कि वह देश की रक्षा जरूरतों को समझती है और आधुनिक एविएशन प्लेटफॉर्म्स को लेकर उसकी जिम्मेदारियां स्पष्ट हैं।

एचएएल के प्रमुख डीके सुनील ने पहले बताया था कि पोरबंदर में हुए हादसे की वजह हेलीकॉप्टर का एक खास हिस्सा, जिसे स्वाशप्लेट कहते हैं, टूटना था। यह हिस्सा हेलीकॉप्टर को हवा में स्थिर रखने में मदद करता है। हादसे के बाद एहतियात के तौर पर ध्रुव हेलीकॉप्टरों ALH के पूरे बेड़े, जिसमें करीब 330 हेलिकॉप्टर शामिल हैं, को कुछ समय के लिए ग्राउंड किया गया था। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि कोई और हादसा न हो और सारी मशीनों की अच्छे से जांच हो सके। लेकिन कुछ लोगों ने इस मौके का फायदा उठाकर एचएएल पर निशाना साधना शुरू कर दिया। कंपनी का कहना है कि रक्षा से जुड़े मामले बहुत संवेदनशील होते हैं, इसलिए वह हर छोटी-मोटी खबर का जवाब नहीं दे सकती। फिर भी, वह अपने काम पर पूरा भरोसा रखती है और अपने हेलीकॉप्टरों की गुणवत्ता को लेकर आश्वस्त है।

एचएएल ने यह भी साफ किया कि वह भारतीय वायुसेना और अन्य बलों के साथ मिलकर काम कर रही है। कंपनी का कहना है कि हेलीकॉप्टर जैसी जटिल मशीनें बनाना आसान नहीं है। इनमें कई बार छोटी-मोटी दिक्कतें आ सकती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरी मशीन खराब है। एचएएल ने अपने बयान में सभी से अपील की है कि बिना पुख्ता जानकारी के कोई भी खबर न फैलाएं। कंपनी ने यह भी कहा कि वह अपने हेलीकॉप्टरों को और बेहतर बनाने के लिए दिन-रात काम कर रही है ताकि हमारे सैनिकों को सबसे सुरक्षित और आधुनिक उपकरण मिल सकें।

इस हादसे और उसके बाद की खबरों का असर सिर्फ कंपनी की छवि पर ही नहीं, बल्कि इसके कारोबार पर भी पड़ा। पिछले छह महीनों में एचएएल के शेयरों में करीब 7 फीसदी की गिरावट देखी गई। लेकिन शुक्रवार को कंपनी के बयान के बाद शेयर बाजार में थोड़ी राहत दिखी। दोपहर तक एचएएल के शेयर 2.22 फीसदी की बढ़त के साथ 4,120 रुपये के आसपास कारोबार कर रहे थे। बाजार के जानकारों का कहना है कि यह बढ़त निवेशकों के भरोसे को दर्शाती है। फिर भी, शेयर अभी भी कुछ खास औसत कीमतों से नीचे हैं, जिसका मतलब है कि बाजार में अभी भी थोड़ी सावधानी बरती जा रही है।

LUH Vs H125M Helicopter: क्या भारतीय सेना की पसंद बनेगा HAL का लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर, या फ्रांस का H125M मार ले जाएगा बाजी? क्या होगा मेक इन इंडिया का?

एचएएल भारत की सबसे बड़ी रक्षा कंपनियों में से एक है, और इसका ज्यादातर मालिकाना हक सरकार के पास है। दिसंबर 2024 तक सरकार की कंपनी में 71.64 फीसदी हिस्सेदारी थी। यह कंपनी न सिर्फ हेलीकॉप्टर बनाती है, बल्कि लड़ाकू विमान, इंजन और अन्य रक्षा उपकरण भी तैयार करती है। ध्रुव हेलीकॉप्टर को सेना, वायुसेना और तटरक्षक बल इस्तेमाल करते हैं। यह हेलीकॉप्टर ऊंचे पहाड़ों से लेकर समुद्र तक हर तरह के मौसम में काम कर सकता है।

Heron Mk2 Crash: जम्मू एयरपोर्ट पर भारतीय सेना का हेरॉन ड्रोन क्रैश, वायुसेना का जवान गंभीर रूप से जख्मी

Heron Mk2 Crash: Army Drone Hits IAF Tower at Jammu Airport, Airman Critically Injured
Image Source: Gulistan News

Heron Mk2 Crash: जम्मू हवाई अड्डे के अति सुरक्षित तकनीकी क्षेत्र में गुरुवार को एक बड़ा हादसा हो गया। भारतीय सेना का एक मानवरहित विमान (ड्रोन), जिसे हरॉन एमके-2 (Heron Mk2 UAV) कहा जाता है, भारतीय वायुसेना के एक टावर से टकरा कर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में वायुसेना के एक कर्मी, नायक सुरिंदर पाल, गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया। सेना ने इसके कारणों की जांच शुरू कर दी है। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

Heron Mk2 UAV Crash: Army Drone Hits IAF Tower at Jammu Airport, Airman Critically Injured
Image Source: Gulistan News

Heron Mk2 Crash: सीमा पर निगरानी कर रहा था ड्रोन

गुलिस्तां न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक यह घटना गुरुवार दोपहर करीब 2:45 बजे की है। जानकारी के अनुसार, यह ड्रोन अपनी नियमित उड़ान के बाद हवाई अड्डे पर उतर रहा था। लेकिन अचानक यह नियंत्रण से बाहर हो गया और वायुसेना के टावर से जा टकराया। इस टक्कर से टावर को काफी नुकसान पहुंचा और वहां मौजूद नायक सुरिंदर पाल बुरी तरह जख्मी हो गए। नायक सुरिंदर पाल डिफेंस सिक्योरिटी कोर (डीएससी) से हैं, और उनकी हालत अभी नाजुक बनी हुई है। सूत्रों का कहना है कि यह ड्रोन सेना का हरॉन एमके-2 था, जो इजरायल से लिया गया एक ए़डवांस ड्रोन है। इसका इस्तेमाल हाल ही में जम्मू के सीमा से सटे इलाकों में आतंकी गतिविधियों की जानकारी मिलने के बाद निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए किया जा रहा था।

Heron Mk2 Crash: हाई सिक्योरिटी जोन है जम्मू एयरपोर्ट

बता दें कि जम्मू हवाई अड्डे से नागरिक और सैन्य उड़ानें दोनों संचालित होती हैं। यह एक “हाई सिक्योरिटी ज़ोन” है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों के विमान भी उतरते हैं। ऐसे में इस तरह की घटना चिंता का विषय है। हालांकि, वायुसेना ने स्पष्ट किया है कि इस हादसे से हवाई अड्डे की नियमित उड़ानों पर कोई असर नहीं पड़ा। हादसे की जांच शुरू कर दी गई है, लेकिन  शुरुआती तौर पर तकनीकी खराबी या मानवीय त्रुटि को इस हादसे की वजह बताया जा रहा है।

Heron Mk2 Crash: इजराइल से लीज पर लिया था ड्रोन

इस दुर्घटना में जो UAV (Unmanned Aerial Vehicle) शामिल था, वह भारतीय सेना द्वारा इजराइल से लीज पर लिए गए चार हेरॉन MK2 ड्रोन में से एक बताया जा रहा है। 2021 में रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 के तहत इस तरह के सैन्य उपकरणों को लीज पर लेने की अनुमति दी गई थी। उस समय भारत और चीन के बीच लद्दाख में तनाव चरम पर था। सेना को निगरानी के लिए आधुनिक उपकरणों की जरूरत थी और इस लीज समझौते ने उस कमी को पूरा किया। पहले यह लीज तीन साल के लिए तय की गई थी, जिसे बाद में बढ़ाया भी जा सकता था। हालांकि बाद में इस समझौते को स्थायी खरीद में बदल दिया गया और कुल 10 ड्रोन, जिनमें चार सेना और छह वायुसेना के लिए खरीदे गए।

Heron Mk2 UAV

45 घंटे तक हवा में रह सकता है यह ड्रोन 

हरॉन एमके-2 ड्रोन की बात करें तो इसे इजरायल की कंपनी, इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज, ने बनाया है। यह ड्रोन लंबी दूरी तक उड़ सकता है, ऊंचाई पर रहकर दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख सकता है। यह 45 घंटे तक हवा में रहने की क्षमता रखता है। इसमें खास सेंसर और सैटेलाइट कम्यूनिकेशन सिस्टम लगा होता है,  जो इसे सीमा पर निगरानी के लिए बेहद उपयोगी बनाते हैं।

ड्रोन की तकनीकी खूबियों के बावजूद इसके मैंटेनेंस और ऑपरेशन को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। भारत इससे पहले भी हेरॉन MK1 ड्रोन के 12 क्रैश झेल चुका है। अधिकतर मामलों में तकनीकी खराबी, इंजन फेल होना या ग्राउंड स्टेशन से संपर्क टूटना जैसे कारण सामने आए थे।

अधिकारियों के मुताबिक, अब इस पूरे मामले की बारीकी से जांच की जाएगी। यह देखा जाएगा कि उड़ान से पहले टेक्निकल चेकअप सही तरीके से हुआ था या नहीं, ग्राउंड कंट्रोल से संपर्क में कोई समस्या थी या नहीं, और क्या ऑपरेशनल सिस्टम में कोई मानवीय चूक हुई। यदि जांच में कोई सिस्टम से संबंधित गड़बड़ी सामने आती है, तो इसे कंपनी के समक्ष उठाया जाएगा।

Tahawwur Rana Extradition: 26/11 केस में तहव्वुर राणा की पत्नी समराज राणा का क्या है रोल? ‘मेजर इकबाल’ का भी खुलेगा राज

Tahawwur Rana Extradition: What’s the Role of His Wife Samraz Rana in the 26/11 Case? who is Major Iqbal?

Tahawwur Rana Extradition: 26/11 मुंबई हमले के आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा को अमेरिका से प्रत्यर्पित कर भारत लाया जा चुका है। तहव्वुर राणा के साथ ही एक नाम फिर से चर्चा में आ गया है वह है समराज राणा अख्तर। समराज पाकिस्तानी मूल की कनाडाई नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा की पत्नी हैं। समराज एक समय पर पाकिस्तान सेना की मेडिकल कोर में डॉक्टर रह चुकी हैं। लेकिन अब उनकी पहचान एक ऐसे आरोपी की जीवनसाथी के तौर पर हो चुकी है, जिस पर भारत की सबसे बड़ी आतंकी घटनाओं में से एक की साजिश रचने का आरोप है। तहव्वुर राणा 26/11 मामले में भारत में मुकदमा झेलने वाला तीसरा व्यक्ति होगा। इससे पहले अजमल कसाब और अबू जुंदाल पर भारत में मुकदमा चला था। अजमल कसाब को 2012 में पुणे की यरवदा जेल में फांसी दी गई थी।

Tahawwur Rana Extradition: What’s the Role of His Wife Samraz Rana in the 26/11 Case? who is Major Iqbal?

समराज मूल रूप से पाकिस्तान की रहने वाली हैं और उनके परिवार के कुछ लोग आज भी उत्तर प्रदेश के हापुड़ में रहते हैं। इस बात खुलासा तब हुआ जब मुंबई हमलों से कुछ ही दिन पहले नवंबर 2008 में राणा और समराज ने भारत की यात्रा की थी, जो बाद में 26/11 मुंबई हमले से जुड़ी एनआईए की जांच का हिस्सा बनी।

Tahawwur Rana Extradition: पाकिस्तानी सेना में डॉक्टर थी समराज

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में जन्मी समराज राणा अख्तर की सटीक जन्मतिथि और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं है। कुछ सूत्रों के अनुसार, उनका परिवार मध्यमवर्गीय था, जहां शिक्षा पर खासा जोर दिया जाता था। समराज ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद वह पाकिस्तानी सेना के मेडिकल कोर में शामिल हो गईं। इसी दौरान उनकी मुलाकात तहव्वुर हुसैन राणा से हुई, जो खुद भी उस दौरान पाकिस्तान सेना की मेडिकल कोर में एक डॉक्टर के रूप में कार्यरत था। दोनों की शादी 1980 में हुई और 1990 के दशक के अंत में तहुव्वर और समराज ने सेना की नौकरी छोड़ दी और समराज के साथ कनाडा चले गईं। सूत्रों का कहना है कि तब तक तहुव्वर लश्कर ए तैयबा के संपर्क में आ चुका था।

Ukraine Nuclear Weapons: अगर आज यूक्रेन के पास होते परमाणु हथियार, तो ना ही ट्रंप जेलेंस्की की बेज्जती करते और ना ही रूस की हमले की हिम्मत होती?

सेना छोड़ने के बाद तहुव्वर राणा ने कनाडा और फिर अमेरिका के शिकागो में फर्स्ट वर्ल्ड इमिग्रेशन सर्विसेज का बिजनेस शुरू किया। समराज भी उनके साथ ही रहीं। इस दौरान उनके तीन बच्चे हुए जिनमें दो बेटिया और एक बेटा था। तहुव्वर की कंपनी अमेरिका और भारत समेत कई देशों में काम करती थी। यही कंपनी बाद में जांच एजेंसियों के लिए चिंता का कारण बनी, क्योंकि इस बिजनेस के पीछे आतंकी नेटवर्क कड़ियां सामने आईं। राणा ने भारत में वीज़ा के लिए अपने “Immigrant Law Center” के बिज़नेस प्रपोजल लेटर और अमेरिका के कुक काउंटी से प्राप्त प्रॉपर्टी टैक्स दस्तावेजों को एड्रैस प्रूफ के तौर में जमा किया था।

Tahawwur Rana Extradition: 3 से 21 नवंबर के बीच भारत आए थे दोनों

2008 में 26 नवंबर से कुछ ही दिन पहले, 13 से 21 नवंबर के बीच समराज और तहव्वुर राणा ने भारत की यात्रा की थी। वीज़ा दस्तावेज़ों के अनुसार, समराज को 5 साल का टूरिस्ट वीज़ा और तहव्वुर राणा को 1 साल का बिज़नेस वीज़ा तत्कालीन भारत सरकार की तरफ से जारी किया गया था। सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक, तहव्वुर राणा को 3 मार्च 2006 को पासपोर्ट नंबर JV533373 जारी किया गया था, जो 3 मार्च 2011 तक वैध था। उन्हें 31 अक्टूबर 2008 को भारत की ओर से एक साल का बिज़नेस वीज़ा (नंबर AF232384) जारी किया गया था। जबकि पत्नी समराज राणा अख्तर को 9 अगस्त 2007 को पासपोर्ट नंबर WB694622 जारी किया गया, जो 8 अगस्त 2012 तक वैध था। समराज को 31 अक्टूबर 2008 को पांच साल की अवधि के लिए टूरिस्ट वीज़ा (नंबर AF232383) जारी किया गया था।

Tahawwur Rana Extradition: शोक सभा में शामिल होने की टाइमिंग पर उठे सवाल

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक यात्रा के दौरान उन्होंने दिल्ली, आगरा, अहमदाबाद, कोच्चि और मुंबई जैसे शहरों का दौरा किया था। इस दौरान वह कोच्चि के एक ताज होटल में भी ठहरा था और ताजमहल भी गया था। एजेसियों का कहना है कि इस यात्रा के दौरान राणा ने अपने मित्र डेविड कोलमैन हेडली को भारत में लॉजिस्टिक और कवर सपोर्ट मुहैया कराया था। हालांकि समराज राणा अख्तर के खिलाफ कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, लेकिन देश की जांच एजेंसियां एक बार फिर साजिश में समराज के शामिल होने की जांच कर सकती हैं। हालांकि तहुव्वर का दावा था कि वह समराज की नानी की मृत्यु के बाद शोक सभा में शामिल होने के लिए वह भारत आया था। एजेंसी सूत्रों का कहना है कि यात्रा की टाइमिंग आज भी जांच एजेंसियों के लिए संदिग्ध बनी हुई है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक संयोग था या राणा ने अपनी गतिविधियों को छुपाने के लिए इस यात्रा को एक पारिवारिक दौरे का रूप दिया था?

एनआईए के अनुसार, राणा ने न हेडली को न केवल आर्थिक और लॉजिस्टिक मदद दी बल्कि अपने इमिग्रेशन बिजनेस “First World International” का इस्तेमाल आतंकियों के लिए कवर तैयार करने के लिए किया। इसी कंपनी के जरिए हेडली ने भारत के लिए मल्टीपल एंट्री बिज़नेस वीज़ा प्राप्त किया था और मुंबई में ऑफिस खोलने का नाटक रचा था। राणा ने हेडली के वीज़ा को 2007 में 10 साल के लिए बढ़वाने में भी मदद की थी। इन सभी घटनाओं से यह जाहिर होता है कि तहव्वुर राणा इन हमलों का मास्टरमाइंड था।

Tahawwur Rana Extradition: कौन था ‘मेजर इकबाल’

एनआईए ने अपनी चार्जशीट में आईएसआई के एजेंट मेजर इकबाल को एक सह-साजिशकर्ता के तौर पर नामित किया है। तहव्वुर राणा ने स्वीकार किया था कि वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के मिड-लेवल अफसर ‘मेजर इकबाल’ के संपर्क में था। गौरतलब है कि ‘मेजर इकबाल’ पर लश्कर-ए-तैयबा के जरिए से मुंबई हमलों की फंडिंग और कोऑर्डिनेशन का आरोप है। हेडली ने अपनी गवाही में बताया था कि मेजर इकबाल ने उसे करीब 25,000 अमेरिकी डॉलर दिए थे, ताकि वह मुंबई में एक इमिग्रेशन ऑफिस चलाने का ढोंग कर सके। यह ऑफिस सिर्फ एक कवर था, जिससे हेडली बिना शक के भारत में आ-जा सके और हमले की तैयारी कर सके। मेजर इकबाल ने हेडली को जीपीएस डिवाइस का इस्तेमाल करके मुंबई के ठिकानों की वीडियो रिकॉर्डिंग करने का भी हुक्म दिया था। ये सारी रिकॉर्डिंग पहले मेजर इकबाल को दिखाई जाती थीं, फिर हेडली उन्हें अपने साथ ले जाता था।

खास बात है कि मेजर इकबाल ने शुरू में यह तय किया था कि हेडली को पाकिस्तान से कोई कॉल नहीं आएगी, ताकि शक न हो। मेजर इकबाल ने राणा से भी फोन पर बात की थी, खासकर तब जब हेडली से सीधा संपर्क नहीं हो पाया। मसलन, जुलाई 2008 में मेजर इकबाल ने हेडली को कॉल करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। फिर उसने राणा को फोन किया और हेडली तक अपने निर्देश पहुंचाए। राणा ने हेडली को यह भी कहा था कि वह भारत में अपने किराए का समझौता बढ़ाए, ताकि साजिश का काम चलता रहे। हालांकि मेजर इकबाल आज तक फरार है, और उसकी असली शक्ल-सूरत या ठिकाना किसी को नहीं पता। राणा अब भारत में है, और जांच एजेंसियां उससे मेजर इकबाल के बारे में और जानकारी निकालने की कोशिश करेंगी। शायद इससे पता चले कि मेजर इकबाल कौन था और उसका नेटवर्क कितना बड़ा था।

K9 Vajra-T Howitzers: लद्दाख से रेगिस्तान तक अब दुश्मन की नहीं है खैर, भारतीय सेना के पास आ रहे हैं 100 और K9 वज्र

K9 Vajra-T Howitzers: Indian Army to Get 100 More in $253M Hanwha-L-T Deal

K9 Vajra-T Howitzers: भारतीय सेना अपनी तोपखाना क्षमता (Artillary) को और अधिक घातक और आधुनिक बनाने जा रही है। भारतीय सेना के तोपखाने को आधुनिक बनाने के लिए दक्षिण कोरिया की कंपनी हान्वा एयरोस्पेस (Hanwha Aerospace) ने भारत की लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) के साथ 253 मिलियन डॉलर (लगभग 2100 करोड़ रुपये) का एक नया करार किया है। इस सौदे के तहत भारतीय सेना को 100 अतिरिक्त K9 वज्र-टी स्वचालित तोपें (सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर) मिलेंगी। हाल ही में नई दिल्ली स्थित कोरियाई दूतावास में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस समझौते पर दस्तखत किए गए।

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K9 Vajra-T Howitzers: पहले सौदे की सफलता के बाद दूसरा बड़ा ऑर्डर

नया सौदा पहले के उस ऑर्डर को देखते हुए किया गया है, जिसमें 2017 में 100 K9 वज्र तोपों का ऑर्डर दिया गया था। उस वक्त इस ऑर्डर की डिलीवरी तय समयसीमा से पहली ही कर दी गई थी। जिसके बाद नए ऑर्डर की नींव तैयार हुई। ये तोपें राजस्थान से लेकर लद्दाख तक के विभिन्न इलाकों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल की जा रही हैं। पहले बैच में 50% से अधिक स्वदेशी निर्माण हुआ था, लेकिन इस नए ऑर्डर के तहत भारत में 60% तक लोकलाइजेशन का लक्ष्य तय किया गया है। यानी भारत में बनने वाले इस बैच में अधिक घरेलू कंपनियां, विशेषकर MSME सेक्टर, भाग लेंगी।

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K9 Vajra-T Howitzers: सेना की आधुनिकता में मील का पत्थर

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने दिसंबर 2024 में K9 वज्र-T तोपों की खरीद के लिए L&T के साथ लगभग 7,628.70 करोड़ रुपये का करार किया था। जिसमें 155 मिमी/52 कैलिबर की K9 वज्र-टी तोपों को ‘बाय इंडियन’ श्रेणी के तहत खरीदने की बात थी। जिससे देश की रक्षा उत्पादन नीति ‘आत्मनिर्भर भारत’ को भी बल मिलेगा।

रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “K9 वज्र-T की खरीद से तोपखाना क्षमताओं में जबरदस्त सुधार होगा और सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस बढ़ेगी। यह तोप दुर्गम इलाकों में भी अपनी प्रभावी मारक क्षमता और गतिशीलता से अहम भूमिका निभाएगी।”

K9 Vajra-T Howitzers: सौदे की अहमियत और रक्षा साझेदारी

इस परियोजना से अगले चार सालों में नौ लाख से अधिक मानव-दिवसों का रोजगार पैदा होगा। साथ ही, इसमें कई भारतीय उद्योगों, खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की सक्रिय भागीदारी होगी। यह भारत के औद्योगिक विकास और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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K9 Vajra-T Howitzers: 2021 में 100वीं तोप सेना को सौंपी

भारतीय सेना पहले से ही 100 K9 वज्र-टी तोपों को ऑपरेट कर रही है। इनका पहला ऑर्डर 2017 में दिया गया था, जिसे एलएंडटी ने ग्लोबल कॉम्पिटिटिव बिडिंग और सक्सेसफुल फील्ड टेस्टिंग के बाद हासिल किया था। कंपनी ने तय समय से पहले इन तोपों की डिलीवरी पूरी की, और 2021 में 100वीं तोप सेना को सौंपी गई।

एलएंडटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अरुण रामचंदानी ने बताया कि “पहली खेप की तरह दूसरी खेप भी गुजरात के हजीरा स्थित हमारे आर्मर्ड सिस्टम्स कॉम्प्लेक्स (Armoured Systems Complex) में तैयार की जाएगी। खास बात यह है कि नई तोपों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों, जैसे लद्दाख, में बेहतर प्रदर्शन के लिए अपग्रेड शामिल होंगे।

वहीं, हान्वा एयरोस्पेस के सीईओ और प्रेसिडेंट जे-इल सन ने इस करार को दोनों देशों के बीच गहरे होते रक्षा संबंधों का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, “यह दूसरा ऑर्डर कोरिया और भारत के बीच बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। हम भारत की रक्षा क्षमताओं के लिए एक भरोसेमंद साथी बने रहेंगे और भारत के रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के सपने को पूरा करने में योगदान देंगे।”

K9 वज्र: भारतीय सेना की ताकत

ये तोपें शुरू में राजस्थान के भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात की गई थीं, लेकिन 2020 में लद्दाख में भारत-चीन तनाव के बाद इन्हें पूर्वी लद्दाख में भी तैनात किया गया। K9 वज्र-टी ने भारत के दुर्गम इलाकों में अपनी बेहतरीन क्षमता साबित की है।

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यह एक 155mm/52-कैलिबर ट्रैक्ड सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्जर है, जो लगभग 40 किलोमीटर से अधिक की दूरी तक गोलाबारी कर सकती है और 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है। यह बर्स्ट मोड में प्रति मिनट छह गोले और लंबे समय तक प्रति मिनट 2-3 गोले दाग सकती है।

यह तोप खासतौर पर उच्च हिमालयी इलाकों, जैसे लद्दाख, के लिए तैयार की गई है, जिसमें कोल्ड वेदर किट और मजबूत सस्पेंशन सिस्टम शामिल हैं।

  • वजन: करीब 50 टन
  • इंजन: 1,000 हॉर्सपावर का डीजल इंजन
  • गति: 67 किमी/घंटा तक
  • गोलाबारी की दर: 15 सेकंड में 3 राउंड (बर्स्ट मोड), 8 राउंड प्रति मिनट (अधिकतम)
  • क्रू मेंबर: 5

भारत ने 2015 में K9 को क्यों चुना:

भारतीय सेना के तोपखाने को आधुनिक बनाने की दिशा में एक अहम फैसला साल 2015 में लिया गया था, जब दक्षिण कोरिया की K9 वज्र ने फील्ड ट्रायल्स में रूस की 2S19 मस्ता-एस को पीछे छोड़ दिया।
2010 के दशक की शुरुआत में भारतीय सेना अपने पुराने तोपखाने को बदलने की कोशिश में थी। बोफोर्स तोप घोटाले के बाद से नए हथियारों की खरीद में देरी हो रही थी। उस वक्त सेना के पास मुख्य रूप से सोवियत-युग की तोपें थीं, जो आधुनिक युद्ध की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थीं। खासकर ऊंचाई वाले इलाकों जैसे लद्दाख और सियाचिन में तेज, सटीक और गतिशील तोपों की जरूरत थी।
इसी दौरान रक्षा मंत्रालय ने 155 मिमी/52 कैलिबर की स्वचालित तोपों (सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर) की खरीद के लिए वैश्विक निविदा जारी की। इसमें कई देशों की कंपनियां शामिल हुईं, लेकिन अंतिम मुकाबला दक्षिण कोरिया की हान्वा डिफेंस की K9 थंडर और रूस की 2S19 मस्ता-एस के बीच हुआ।
2015 में इन दोनों तोपों का परीक्षण भारत के अलग-अलग इलाकों में किया गया। इसमें राजस्थान के रेगिस्तान, महाराष्ट्र के मैदान और हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र शामिल थे। इन परीक्षणों में कई मापदंडों पर ध्यान दिया गया:
  • मारक क्षमता: K9 की रेंज 40 किलोमीटर से ज्यादा थी, जबकि 2S19 की रेंज करीब 29-30 किलोमीटर तक सीमित थी।
  • फायरिंग रेट: K9 बर्स्ट मोड में 15 सेकंड में 3 गोले और प्रति मिनट 6-8 गोले दाग सकती थी, वहीं 2S19 की गति इससे कम थी।
  • मोबिलिटी: 50 टन वजनी K9 अपने 1000 हॉर्सपावर इंजन के साथ 67 किमी/घंटा की रफ्तार से चल सकती थी, जबकि 42 टन की 2S19 की गति 60 किमी/घंटा थी। ऊबड़-खाबड़ इलाकों में K9 का हाइड्रोन्यूमैटिक सस्पेंशन इसे बेहतर बनाता था।
  • सटीकता और ऑटोमेशन: K9 में एडवांस फायर कंट्रोल सिस्टम था, जो सटीक निशाना लगाने में मदद करता था। 2S19 में यह तकनीक कम थी।
के9 को चुनने के पीछे बड़ी बात यह भी थी कि हान्वा ने वादा किया था कि K9 का बड़ा हिस्सा भारत में तैयार होगा।

तोपखाने का आधुनिकीकरण

K9 वज्र-टी भारतीय सेना के आर्टिलरी मॉर्डनाइजेशन अभियान का अहम हिस्सा है। इसके तहत सेना कई 155 मिमी तोप प्रणालियों को शामिल कर रही है, जिनमें K9 वज्र, धनुष और शारंग शामिल हैं। इसके अलावा, उन्नत टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS), माउंटेड गन सिस्टम (MGS), और टोड गन सिस्टम (TGS) भी शामिल करने की प्रक्रिया में हैं।

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ATAGS एक स्वदेशी 155 मिमी/52 कैलिबर हॉवित्जर है, जिसे DRDO ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और भारत फोर्ज के साथ मिलकर बनाया है। सेना ने 114 धनुष तोपों का ऑर्डर भी दिया है, जो भारत की पहली स्वदेशी तोप है। इन्हें एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) ने बनाया है और 2026 तक इनकी डिलीवरी पूरी होने की उम्मीद है।

इसके साथ ही, भारत पिनाका मल्टी-रॉकेट लॉन्च सिस्टम (MRLS) में भी निवेश कर रहा है। इस साल फरवरी में 10,147 करोड़ रुपये के अनुबंधों पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें पिनाका के लिए विभिन्न गोला-बारूद शामिल हैं। पिनाका की मारक क्षमता मार्क-I के लिए 40 किमी, मार्क-II के लिए 60-75 किमी और गाइडेड पिनाका के लिए 75 किमी से अधिक है। इसके रेंज को 120 किमी और आगे 300 किमी तक बढ़ाने पर काम चल रहा है।

दक्षिण कोरिया की K9 थंडर

K9 थंडर एक 155 मिमी/52 कैलिबर स्वचालित तोप है, जिसे हान्वा एयरोस्पेस ने तैयार किया है। यह 48 गोले ले जा सकती है और प्रति मिनट छह गोले दागने में सक्षम है। 1999 में पेश होने के बाद से यह दक्षिण कोरिया के डिफेंस एक्सपोर्ट का अहम हिस्सा है और ग्लोबल आटोमेटिक केनन मार्केट में इसकी हिस्सेदारी 50% से अधिक है। पिछले साल तक 1400 से ज्यादा K9 इकाइयां विभिन्न देशों को डिलीवर की जा चुकी हैं या निर्यात के लिए तैयार हैं।

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दक्षिण कोरिया खुद इन तोपों की बड़ी संख्या का इस्तेमाल करता है, जो उत्तर कोरिया से अलग करने वाली डिमिलिटराइज्ड जोन (DMZ) पर तैनात हैं। K9 की खासियत इसका पहाड़ी इलाकों में काम करने की क्षमता है, इसमें एडवांस हाइड्रोन्यूमैटिक सस्पेंशन लगा है। इसे पांच सदस्यों का चालक दल ऑपरेट करता है। K9 थंडर को इस तरह से बनाया गया है कि इस परमाणु, जैविक और रासायनिक खतरों का कोई असर नहीं होता।

MRFA Rafale Deal: क्या ‘मेक इन इंडिया’ होगा राफेल? 114 मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट की डील पर भी जल्द लग सकती है मुहर

114 Rafale fighter jets

MRFA Rafale Deal: भारत और फ्रांस के बीच 114 मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) के लिए जल्द बातचीत शुरू होने की संभावना है। यह समझौता सरकार-से-सरकार (G2G) होगा। अगर यह सौदा अपने अंजाम तक पहुंचता है तो भारत में फाइटर जेट्स की लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के साथ-साथ वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। सूत्रों ने बताया कि इस एमआरएफए सौदे में राफेल लड़ाकू विमान शामिल होंगे। बता दें कि मोदी सरकार ने 2016 में फ्रांस से 36 विमान खरीदे थे।

MRFA Rafale Deal: Will Rafale Be Made in India? 114 Fighter Jet Pact Likely Soon

MRFA Rafale Deal: फाइनल असेंबली लाइन लगाएगी दसॉ एविएशन!

सूत्रों के अनुसार, इस संभावित डील में राफेल बनाने वाली कंपनी फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन (Dassault Aviation) की भूमिका प्रमुख होगी। कंपनी पहले ही भारत को 36 राफेल जेट की सप्लाई कर चुकी है। इस बार कंपनी ने भारत में एक फाइनल असेंबली लाइन लगाने पर सहमती जतााई है, बशर्ते उसे कम से कम 100 जेट्स का ऑर्डर मिले। कंपनी इसके लिए देश के एविएशन सेक्टर का अनुभव रखने वाली किसी प्रमुख रक्षा उद्योग कंपनी के साथ साझेदारी करेगी।

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यह डील दो हिस्सों में होगी। जिसमें कुछ विमान सीधे तैयार हालत में भारत आएंगे, जबकि बाकी विमानों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इस दौरान इसमें कई भारतीय कंपनियों से बड़े पैमाने पर कंपोनेंट्स और पार्ट्स की सोर्सिंग भी शामिल होगी। जिसका मतलब यह है कि भारत में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका और भी मजबूत होने जा रही है।

26 राफेल मरीन फाइटर जेट्स की खरीद पर मुहर

बता दें कि मंगलवार 08 अप्रैल को ही प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने 26 राफेल मरीन फाइटर जेट्स के लिए अब तक की सबसे बड़ी 7 अरब यूरो (63,000 करोड़) की डील को मंजरी दी है। यह डील भारतीय नौसेना के लिए है, और उम्मीद है कि इसे फ्रांसीसी रक्षा मंत्री सेबास्टियन लेकोर्नु की भारत दौरे के दौरान अमली जामा पहनाया जाएगा। हालांकि अभी तक दौरे की तारीख तय नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस डील पर बहुत जल्द मुहर लग सकती है। इसी दौरे के दौरान 114 फाइटर जेट्स की डील को लेकर औपचारिक बातचीत भी शुरू हो सकती है।

MRFA Rafale Deal: सिर्फ औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी

सूत्रों का कहना है कि यह डील एक सिंगल वेंडर के साथ होगी, क्योंकि हम पहले ही 36 राफेल खरीद चुके हैं और अब फ्रांस के साथ औपचारिक बातचीत शुरू करने वाले हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच इस डील को लेकर कई स्तरों पर बातचीत हो चुकी है और बुनियादी समझ बन चुकी है। अब सिर्फ औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं।

भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल केवल 31 स्क्वाड्रन हैं, जबकि यह संख्या 42.5 स्क्वाड्रन होनी चाहिए। यानी जरूरत के मुकाबले लगभग 25 फीसदी जहाजों की कमी है। ऐसे में वायुसेना लगातार सरकार से आग्रह कर रही है कि उसे नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तत्काल आवश्यकता है।

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इस साल फरवरी 2025 में एक प्रेस वार्ता में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा था कि वायुसेना को हर साल कम से कम 35-40 लड़ाकू विमानों की जरूरत है, और तकनीकी रूप से हम पीछे होते जा रहे हैं। उन्होंने यह भी जोर दिया था कि भारत को विदेशी कंपनियों के साथ देश के प्राइवेट सेक्टर को भी आगे लाना चाहिए, ताकि घरेलू स्तर पर फाइटर जेट्स का उत्पादन किया जा सके।

MRFA Rafale Deal: गर्वनमेंट-टू-गर्वनमेंट डील ज्यादा पारदर्शी!

वहीं, इस डील का एक बड़ा फायदा यह भी है कि भारत को “फ्लाई अवे” यानी तुरंत तैयार विमानों के साथ-साथ लोकल लेवल पर मैन्युफैक्चरिंग का अनुभव मिलेगा। इससे न केवल भारतीय इंजीनियरिंग और एविएशन सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश की रणनीतिक आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। वहीं, इस तरह की गर्वनमेंट-टू-गर्वनमेंट डील ज्यादा पारदर्शी होती है और प्रक्रिया तेज चलती है। 2016 में जब 36 राफेल विमानों की डील हुई थी, वह भी G2G मॉडल पर आधारित थी। उस समय भी भारत को तत्काल जरूरत थी और डील को तेजी से आगे बढ़ाया गया था।

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MRFA Rafale Deal: नहीं होगा ओपन टेंडर!

वहीं, यह डील किसी टेंडर प्रक्रिया से होकर गुजरेगी या नहीं? इस पर सूत्रों का कहना है कि चूंकि भारत पहले ही राफेल जेट्स का इस्तेमाल कर रहा है और इसके इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेनिंग सिस्टम डेवलप हो चुके हैं, इसलिए यह डील “सिंगल वेंडर” के तहत की जाएगी। यानी इसमें कोई ओपन टेंडर या दूसरी कंपनियों के शामिल होने की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है।

Bagram Airbase Explainer: किसके कब्जे में है बगराम – अमेरिका, चीन या तालिबान? पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

Bagram Airbase Explainer: अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। यह वही एयरबेस है जहां अमेरिका ने बीस साल तक अपना सैन्य प्रभुत्व बनाए रखा और जहां से उसने तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान चलाए। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह एयरबेस फिर से अमेरिकी नियंत्रण में चला गया है? या जैसा कि कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है, यह अब चीन की निगरानी में है? या फिर तालिबान अब भी इस पर अपनी पकड़ बनाए हुए है?

Bagram Airbase Explainer: Who Controls Bagram Airbase – US or China? What’s Really Happening in Afghanistan Again?

यह सवाल तब खड़ा हुआ जब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि तालिबान ने बगराम एयरबेस अमेरिका को सौंप दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वायु सेना के कई C-17 ग्लोबमास्टर विमान वहां उतरे, जिसमें सैन्य साजो-सामान और खुफिया अधिकारी मौजूद थे। इतना ही नहीं, इसमें CIA के डिप्टी चीफ माइकल एलिस के आने की भी खबर है। लेकिन तालिबान ने इन सभी खबरों को खारिज कर दिया है और इसे “प्रोपेगेंडा” बताया है। तालिबान ने कहा है कि बगराम पर उनका पूरा नियंत्रण है और इसे किसी भी विदेशी ताकत को सौंपने का कोई इरादा नहीं है।

Bagram Airbase Explainer: सोवियत संघ ने बनाया था बगराम एयरबेस

बगराम एयरबेस का इतिहास काफी पुराना और रोचक है। इसे 1950 के दशक में सोवियत संघ ने बनाया था और 1979 से 1989 तक सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान यह उनका प्रमुख सैन्य अड्डा रहा। बाद में, 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने अफगानिस्तान पर हमला किया, जिसके बाद बगराम अमेरिकी सेना का मुख्य केंद्र बन गया। यहां से अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ 20 साल तक अभियान चलाया गया। अपने चरम पर, 2012 में यहां 100,000 से अधिक सैनिक और ठेकेदार तैनात थे। इस एयरबेस में दो बड़े रनवे, विशाल हैंगर, एक अस्पताल और एक हिरासत केंद्र भी था, जिसे “ग्वांतानामो बे ऑफ अफगानिस्तान” भी कहा जाता था।

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यह एयरबेस अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बेहद महत्वपूर्ण है। यह अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से लगभग 40 मील उत्तर में परवान प्रांत में स्थित है और ईरान, चीन और मध्य एशियाई देशों की सीमाओं के करीब है। खास तौर पर, यह चीन के शिनजियांग क्षेत्र में मौजूद परमाणु सुविधाओं से केवल 400 मील दूर है, जिसके कारण इसकी भू-राजनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है।

Bagram Airbase Explainer: क्या हुआ था बगराम के साथ?

15 अगस्त 2021 को अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान को अलविदा कह दिया। इस दौरान बगराम एयरबेस को अफगान सेना के हवाले कर दिया गया, लेकिन तालिबान ने जल्द ही देश पर कब्जा कर लिया और यह उनके नियंत्रण में आ गया। उस समय अमेरिकी की काफी आलोचना हुई थी। अमेरिकी सैनिकों ने बिना स्थानीय सहयोगियों को सूचित किए बेस छोड़ दिया, जिसके बाद तालिबान ने इसे अपने कब्जे में ले लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वहां 7 अरब डॉलर से अधिक के सैन्य उपकरण भी छूट गए थे।

अब, लगभग चार साल बाद, इस महीने अप्रैल 2025 में कुछ चौंकाने वाली खबरें सामने आईं। अफगानिस्तान की खामा प्रेस ने 7 अप्रैल, 2025 को रिपोर्ट दी कि अमेरिकी वायुसेना के कई C-17 ग्लोबमास्टर III विमान बगराम पर उतरे हैं। इन विमानों में सैन्य वाहन, उपकरण और वरिष्ठ खुफिया अधिकारी शामिल थे, जिनमें CIA के उप-निदेशक माइकल एलिस का नाम भी लिया गया। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि तालिबान ने यह एयरबेस अमेरिका को हाई-टेक ऑपरेशंस के लिए सौंप दिया है।

हालांकि, तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इन दावों को “प्रोपेगैंडा” करार देते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा और किसी भी विदेशी सैन्य मौजूदगी की अनुमति नहीं दी जाएगी। तालिबान का कहना है कि बगराम उनके नियंत्रण में है और इसे अमेरिका को सौंपना “असंभव” है।

ट्रंप का दावा: बाइडेन की गलती से चीन का कब्जा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 8 अप्रैल, 2025 को रिपब्लिकन नेशनल कमेटी में दिए एक भाषण में बाइडन प्रशासन पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद बगराम असुरक्षित हो गया था, जिसका फायदा चीन ने उठाया। ट्रंप के मुताबिक, अगर वे सत्ता में होते, तो बगराम पर अमेरिका का नियंत्रण बना रहता, क्योंकि यह न केवल अफगानिस्तान के लिए, बल्कि चीन की परमाणु गतिविधियों की निगरानी के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसे “अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी आपदा” करार दिया और दावा किया कि अब यह एयरबेस प्रभावी रूप से चीन के नियंत्रण में है।

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हालांकि, ट्रंप के इस दावे का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। न तो अमेरिकी सरकार और न ही तालिबान ने इसकी पुष्टि की है कि बगराम पर चीन का कोई नियंत्रण है। इसके उलट, चीन के विदेश मंत्रालय ने मार्च 2025 में एक बयान में कहा था कि उनकी बगराम में कोई सैन्य महत्वाकांक्षा नहीं है, हालांकि चीन ने अफगान लिथियम और अन्य खनिज संसाधनों में निवेश करना शुरू किया है और तालिबान सरकार से दोस्ताना रिश्ते बना लिए हैं। ऐसे में यह आशंका बढ़ती जा रही है कि कहीं चीन इस एयरबेस का इस्तेमाल किसी प्रकार की निगरानी या सामरिक गतिविधि के लिए तो नहीं कर रहा।

Bagram Airbase Explainer: C-17 विमानों की लैंडिग की क्या है सच्चाई?

हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स और फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। क़तर से उड़ान भरने वाला एक अमेरिकी C-17 विमान हाल ही में पाकिस्तान के रास्ते बगराम एयरबेस पर उतरा। फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा ने भी इसकी पुष्टि की है कि एक C-17 विमान कतर के अल-उदेद बेस से पाकिस्तान के रास्ते बगराम पहुंचा। हालांकि यह कोई सामान्य घटना नहीं है। यदि वाकई ऐसा हुआ है तो यह या तो तालिबान और अमेरिका के बीच किसी गुप्त समझौते का संकेत है, या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी खुफिया मिशन हो सकता है।

C-17 ग्लोबमास्टर III विमान सिर्फ एक बड़ा कार्गो प्लेन नहीं है। बल्कि यह अमेरिकी वायुसेना की रीढ़ है। C-17 ग्लोबमास्टर III 170,900 पाउंड तक का भार ले जा सकता है और बिना ईंधन भरे 2,400 समुद्री मील तक उड़ान भर सकता है। यह विमान छोटे और खराब रनवे पर भी उतर सकता है। यह भारी सैन्य सामान, टैंक, ट्रक, ड्रोन और यहां तक कि हेलिकॉप्टर भी ले जाने में सक्षम है। यदि यह विमान वाकई बगराम पहुंचा है, तो सवाल उठता है — इसमें क्या लाया गया?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें एडवांस निगरानी उपकरण, ड्रोन (जैसे MQ-9 रीपर), और शायद खुफिया मिशन के लिए मोबाइल ऑपरेशन यूनिट्स हो सकते हैं। रीपर ड्रोन को खासतौर पर आतंकवादियों पर निगरानी और हमले के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसकी मौजूदगी अफगानिस्तान में फिर से अमेरिकी गतिविधियों की ओर इशारा कर सकती है।

माइकल एलिस की मौजूदगी के क्या हैं मायने?

सीआईए के डिप्टी डाइरेक्टर माइकल एलिस की अफगानिस्तान में मौजूदगी यदि सच है, तो इसका मतलब है कि कोई बड़ी खुफिया रणनीति पर काम चल रहा है। एलिस की विशेषज्ञता राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी कानूनों में है। संभव है कि उनका मिशन तालिबान के साथ किसी खुफिया साझेदारी को फिर से स्थापित करना हो, खासकर ISIS-K जैसे साझा दुश्मनों के खिलाफ।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह ISIS-K जैसे आतंकी समूहों पर नजर रखने के लिए हो सकता है, जो इन दिनों अफगानिस्तान में सक्रिय है और हाल ही में मॉस्को में एक हमले के लिए भी जिम्मेदार था। उनका कहना है कि तालिबान के पास सीमित संसाधन हैं, तो हो सकता है कि तालिबान ने उन पर कार्रवाई करने के लिए अमेरिका से मदद मांगी हो। उनका कहना है कि तालिबान के सामने कई चुनौतियां हैं – आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय मान्यता न मिलना और ISIS-K जैसे दुश्मन। विश्व बैंक के अनुसार, 2021 के बाद अफगानिस्तान की जीडीपी 30% तक सिकुड़ गई है। ऐसे में, तालिबान को अमेरिकी मदद की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए बगराम ईरान और चीन की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना हो सकता है।

पाकिस्तान से भी है तालिबान को चैलेंज

अंरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर रिजवान अहमद कहते हैं कि तालिबान इस वक्त आर्थिक और राजनयिक मोर्चे पर घिरा हुआ है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, विदेशी निवेश और सहायता लगभग ठप है, और दुनिया के ज़्यादातर देश आज भी तालिबान सरकार को मान्यता देने से हिचकिचा रहे हैं। ऐसे में अगर अमेरिका जैसा ताकतवर देश, जो कभी उनका सबसे बड़ा दुश्मन था, अब सहयोग की पहल करता है, तो तालिबान इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

वह कहते हैं कि पाकिस्तान, जो कभी तालिबान का सबसे मजबूत समर्थक था, उसने साल 2023 से अब तक पाकिस्तान ने 10 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थियों को वापस भेज दिया है। वहीं दूसरी ओर, रूस इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या तालिबान को अपनी आतंकी सूची से हटा दिया जाए। यानी तालिबान अब ऐसी स्थिति में है जहां उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है— भले वह सीमित और अस्थायी ही क्यों न हो।

प्रोफेसर रिजवान अहमद के मुताबिक ऐसे में अगर अमेरिका के साथ किसी सीमित समझौते के तहत बगराम एयरबेस को फिर से किसी रणनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने दिया जाता है, तो तालिबान के लिए यह एक सुरक्षा और कूटनीतिक बढ़त का सौदा हो सकता है। इससे उन्हें न सिर्फ क्षेत्रीय ताकतों के दबाव से राहत मिलेगी, बल्कि वैश्विक मान्यता की दिशा में एक छोटा लेकिन मजबूत कदम भी माना जाएगा।

अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति

वह कहते हैं कि अमेरिका अब “ओवर-द-होराइजन” रणनीति पर काम कर रहा है — यानी बिना जमीन पर सैनिक उतारे, किसी भी समय सटीक निशाना लगाने की क्षमता। जुलाई 2023 में कतर के एक अमेरिकी बेस से ड्रोन हमला कर सीरिया में अल-कायदा के एक टॉप कमांडर को मार गिराया गया था। जो अमेरिका की “ओवर-द-होराइजन” रणनीति का हिस्सा था। ऐसे में अगर अमेरिका को बगराम जैसे ठिकाने का दोबारा इस्तेमाल करने का मौका मिलता है, तो वह न केवल अपनी सैन्य पहुंच मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्र में अपनी मौजूदगी भी दोबारा स्थापित कर सकता है — वो भी बिना ज़्यादा सैनिक भेजे।

वहीं बगराम एयरबेस अफगानिस्तान के केंद्र में है, ईरान की सीमा से महज 600 मील की दूरी पर, और चीन के उइगर इलाके (शिंजियांग) से भी पास है, जहां उसके न्यूक्लियर और मिलिट्री प्रोग्राम चल रहे हैं। यानि, अमेरिका को यहां से नज़र रखने और जरूरत पड़ने पर एक्शन ले सकता है।

वह कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने 2024 के चुनावी कैंपेन में बार-बार कहा कि बगराम को छोड़ना एक “ऐतिहासिक गलती” थी और यह चीन के मिसाइल बेस से बस एक घंटे की दूरी पर है। अब, ये दावा भले ही ज़रा बढ़ा-चढ़ाकर हो, लेकिन ट्रंप की बात में रणनीतिक सचाई जरूर है— बगराम की लोकेशन अमेरिका के लिए एक बड़ी ताकत बन सकती है।

‘डील विद द डेविल’ जैसा

प्रोफेसर रिजवान अहमद आगे कहते हैं कि और अगर वाकई ऐसा कुछ हो रहा है, तो ये एक ‘डील विद द डेविल’ जैसा ही है — तालिबान, जो कभी अमेरिका का दुश्मन था, अब शायद उसी के साथ कोई मौन समझौता कर रहा है। और अमेरिका, जिसने तालिबान के खिलाफ दो दशक तक लड़ाई लड़ी, अब उसी के भरोसे इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।

बगराम एयरबेस, जो कभी अमेरिकी शक्ति का प्रतीक था, अब शायद फिर से वैश्विक शतरंज की बिसात पर एक ‘क्वीन’ की तरह लौट रहा है। लेकिन इस बार चालें कहीं ज़्यादा खामोश, तेज और रणनीतिक हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक बात तो तय है कि अगर बगराम में अमेरिका वाकई फिर से सक्रिय हो रहा है, तो इसका असर सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा। ये पूरे मध्य एशिया, ईरान, चीन और रूस की सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।